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स्त्री-छवियाँ बदली हैं लेकिन आदिवासी स्त्रियाँ आज भी अपने पुरखिन जैसी

अश्विनी पंकज

मानव विकास के इतिहास में औरतों की हैसियत क्या थी इसका पता हमें उन गुफा शैल चित्रों और पाषाण कलाकृतियों से मिलता है जिन्हें हमारे पूर्वजों ने लाखों-हजारों साल पहले बनाया है।

पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के अनुसार भारत के मध्यप्रदेश स्थित भानपुर के ‘दर की चट्टान’ के ‘कपमार्क्स’ और ‘भीमबैठका’ के ‘रॉक पेंटिंग’ दुनिया के सबसे पुराने गुफा शैल चित्र हैं। लगभग दो से पांच लाख साल पुराने। 

भीमबैठका के गुफा चित्रों में स्त्री का रेखांकन एक संपूर्ण इंसान के रूप में हुआ है। वहां के चित्रों में हम स्त्री को वे सारे काम करते हुए देखते हैं जो जीवन और समाज के लिए जरूरी हैं। जैसे अपने लिए पुरुष साथी चुनना, शिकार करना, पशु पालना और युद्ध करना। 

स्त्री की इस सामान्य छवि में बदलाव 40 हजार साल पहले होता है। जब इंसानी समाज का एक हिस्सा प्राकृतिक गुफा-कंदराओं को छोड़कर खेती और ग्राम व्यवस्था के आरंभिक चरण में प्रवेश करता है। जो सिर्फ पत्थरों से औजार ही नहीं बल्कि मूर्तियां भी बनाता है।

इंसानी इतिहास में कला का यह दूसरा रूप, जो पाषाण शिल्प है, हमें एक भिन्न तरह के सामाजिक अवस्था की सूचना देता है। क्योंकि पाषाण शिल्प की कलाकृतियां गुफाओं में मिले रॉक पेंटिंग से बिल्कुल अलग हैं। यानी दोनों का बनाने वाला समाज एक नहीं है। दो तरह के समाज हैं।

गुफा शैल चित्रों का इंसानी समाज पूर्णतः शिकारी अवस्था में और सामूहिक दिखायी देता है। जिसमें स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है। उनका समाज सामूहिक है और स्त्री-पुरुष एकसमान हैं। जीने और खुद को बचाए रखने के लिए दोनों शिकार और युद्ध साथ-साथ करते हैं। 

लेकिन पत्थर से मूर्तियां बनाने वाला समाज व्यक्ति केंद्रित है। उसकी सामूहिकता खंडित हो चुकी है। क्योंकि उसकी पाषाण कृतियां एकल मनुष्य की हैं। यह व्यक्तिवादी मनुष्य स्त्री और पुरुष में भेद करता है। उसके लिए स्त्री सिर्फ उपभोग की वस्तु है। 

इसीलिए पाषाणशिल्प की अधिकांश कलाकृतियां केवल औरतों की हैं। दैहिक सुंदरता का प्रदर्शन करती हुई औरतों का। सुंदरता और भोग की वस्तु बन गई स्त्री का।

जर्मनी में मिली वीनस ऑफ होहले फेल्स (Venus of Hohle Fels) नामक प्रागैतिहासिक स्त्री कलाकृति 38 हजार साल पुरानी है। जिसमें सिर्फ नारी अंगों को प्रमुखता दी गई है। जिस तरह से यह दोनों हाथों को कमर पकड़े खड़ी है उससे लगता है मानो वह अपनी देह का प्रदर्शन कर रही है।

1988 में ऑस्ट्रिया में मिली स्त्री आकृति टमदने व (Venus of Galgenberg) इससे भी ज्यादा ‘प्रदर्शनीय’ है। संपूर्णता में पाई जाने वाली यह दुनिया की पहली स्त्री मूर्ति है। क्योंकि इसके पहले मिली सभी चारों स्त्री आकृतियां आधी अधूरी प्राप्त हुई हैं।

पुरातत्वविदों ने इसे ‘आलंकारिक आकृति’ ( Strategic Figurine) और ‘विशिष्ट योनी’ (Distinct Vulva) नाम दिया है। किसी मॉडल की तरह देह को परोसती हुई यह स्त्री आकृति 30 हजार साल पहले की है।

स्त्री देह के प्रदर्शन का जो सिलसिला 40 हजार साल पहले की पाषाण कृति से शुरू होता है, वह रुकता नहीं है। हम पाते हैं कि 40 हजार साल के कालखंडों में अलग-अलग समय में बनाई गई प्रायः सभी स्त्री आकृतियां एक जैसी हैं। सभी में स्त्री की एक जैसी मुद्रा है। 

पाषाण शिल्प की औरतें खेती-किसानी का कोई काम नहीं करतीं। गुफा और शैल चित्र के स्त्रियों की तरह वे न तो शिकार में जाती हैं और न ही युद्ध करती हैं। सिर्फ सजी-धजी गुड़िया की तरह खड़ी मर्द के हुक्म या आमंत्रण का इंतजार करती है। 

हड़प्पा काल की स्त्री नर्तकी है। पुरुषों के इशारे पर नाचती हुई स्त्री। 

पाषाण शिल्प वाले समाज की स्त्री हड़प्पा के बाद, मात्र हजार सालों के भीतर ‘नगरवधु’ (आम्रपाली) बना दी जाती है। जिसे दीक्षा और संघ में प्रवेश देने के लिए बुद्ध भी राजी नहीं हैं। क्योंकि स्त्री का काम तो केवल कुल के मरदों के लिए नाचती हुई देह का समर्पण करना है।

पहली सदी में पुरुषवादी सत्ता धर्म के सहारे स्त्री को देवी बना देता है। ताकि मरदों के लिए वह अपनी योनी को ‘पवित्र’ बनाए रखे। सीता-सावित्री के किस्से इसी दौर में गढ़े जाते हैं। 

गुप्त काल में, जो हिंदुओं का स्वर्णकाल है, स्त्री पूरी तरह से यौन कुंठा का साधन बन जाती है। अब वह पूरी तरह से गुलाम है। मर्द उसका स्वामी और परमेश्वर है।  

छठी शताब्दी में संस्कृत में रचा गया वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’ और खजुराहों में पत्थरों से बनाई गई कलाकृतियां ‘सभ्य’ समाज के यौन कुंठाओं के प्रमुख उदाहरण हैं। 

इनसे पता चलता है कि इंसानी समूह के एक वर्ग में, पिछले 40 हजार सालों के दौरान स्त्रियों का क्या हश्र हुआ है। उनकी सामाजिक अवस्था का किस प्रकार से और किस हद तक अवमूल्यन किया गया है। 

अफसोस की बात है कि सभ्य समाज ‘कामसूत्र’ को ‘काम-कला’ का उत्कृष्ट और क्लासिक ग्रंथ मानता है। अप्राकृतिक यौन क्रियाओं, कुंठित काम वासनाओं और स्त्री उत्पीड़न से भरे खजुराहों के पाषाण शिल्प को मनुष्यता की विश्व धरोहर घोषित करता है।

वहीं हम देखते हैं कि गुफा और शैल चित्रों वाले इंसानी समूह में, जिसके वंशज ‘सभ्यता के इतिहास’ के हर दौर में ‘असभ्य’ माने जाते हैं, जंगली और आदिवासी कहे जाते हैं, औरतों की सामाजिक हैसियत आज भी वही है, जो दो लाख साल पहले थी। 

पवित्रता और अपवित्रता की धार्मिक-सामाजिक अवधारणा से परे। उन्मुक्त और आजाद। पुरुष के साथ सहभागी और समाज के साथ सामुदायिक। हर स्तर पर सहजीवी। चाहे मामला साथी चुनने का, शिकार का या फिर दुश्मन से युद्ध करने का हो। धरती और जीवन के रचाव, बचाव और संघर्ष … सभी मोर्चे पर आदिवासी स्त्रियां आज भी लाखों साल पहले के पुरखा औरतों जैसी हैं।

साहित्यकार, रंगकर्मी अश्विनी पंकज आदिवासी अधिकार के प्रवक्ता एवं उसके लिए संघर्षरत एक्टिविस्ट हैं.

राजनीति को महिलाओं ने बदला है फिर भी मतदाता उनके प्रति उदासीन

यशस्विनी पाण्डेय

धर्म को न मानने वाली एक बिन-ब्याही मां ‘जेसिंडा ऑर्डन’न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक औरत हैं जिसे हम अपने भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में देश की पॉलिटिक्स तो दूर, अपने घर में घुसने लायक भी न समझें. 21 जून 2018 में जेसिंडा ने एक बेटी को जन्म दिया वो दुनिया में दूसरी ऐसी लीडर हैं जो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का रोल निभाने के दौरान मां बनींप्रेगनेंट होते ही लोगों ने पूछा कि क्या वो मैटरनिटीलीव लेंगी? लेंगी तो देश का क्या होगा?जेसिंडा ने एक रेडियो प्रोग्राम में कहा, “मैं लीव लूं या न लूं, ये मेरी चॉइस होगी . हर औरत का अधिकार होता है ये चुनना कि वो कितना और कब तक काम करना चाहती है .

संसद में ब्रेस्टफीडिंग करती सांसद

जिस तरह से स्त्रैण समझे जाने वाले गुणों करुणा,संवेदना,कंपैशन को राजनीति की लाइमलाइट में ले आई हैं वह काबिले तारीफ़ है। वरना जिस तरह से राजनीति हमेशा एक मर्दाना/ मस्क्यूलिन इलाक़ा रहा है, वहाँ भाषा से लेकर व्यवहार तक में स्त्रीत्व के लिए कोई खास जगह है नहीं। और है भी तो उसे बहुत बोलने के बहुत अवसर नही मिलते या फिर शायद सत्ता में आने के बाद भी वो खुद इस लायक नहीं होतीं कि अपने को बेहतर संतुलित बौद्धिक और कुशल राजनैतिक सामाजिक नेता साबित कर सकें. देश के महत्वपूर्ण और निर्णय लेने वाले पदों पर पुरुष ही आसीन रहते हैं .

कुछ समय पहले यूनाईटेडनेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’  की एक रिपोर्ट सामने आई है . 2018 में हुए इस शोध में सामने आया है भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा आर्थिक विकास हुआ है. यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया गया था . ताकि आर्थिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सके. इस बात से पता चलता है महिलाएं जिस भी काम में हाथ डालती हैं वे उसे पूरी तत्परता और कमिटमेंट से करने की कोशिश करती हैं, हालाँकि अपवाद हर जगह है ,और हर किसी में अपनी दुर्बलताएं हैं पर तुलनात्मक रूप से एकाग्रता और प्रतिबद्धता की बात की जाये तो महिलाएं अक्सर ही बेहतर साबित होती हैं. राजनीति आम महिलाओं के लिए एक नया क्षेत्र है; उसके बावजूद उन्होंने यहां आते ही अपने काम से पहचान बना ली है. लेकिन इसके बावजूद अभी भी समाज राजनीति में महिलाओं को देखने का आदि नहीं है . हाल ही में ‘इंडिया स्पेंड’ नामक एक डेटाएनेलेसिस करने वाली न्यूजसाईट ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में हुए विधानसभा चुनावों पर एक शोध किया है. इसमें सामने आया है कि इस चुनाव में इन पांच राज्यों में चुने गए कुल विधायकों में महिला विधायकों की संख्या सिर्फ नौ प्रतिशत हैं . जबकि 2013-14 में हुए चुनावों में यह संख्या 11 प्रतिशत थी. इनमें मिजोरम में अकेला ऐसा राज्य है जहां महिला उम्मीद्वारों की संख्या बढ़ने के बावजूद आज भी कोई महिला विधायक नहीं है. जबकि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा यानी राज्य के कुल 14 प्रतिशत महिलाएं चुनी गईं .

इस शोध में सामने आया है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों से महिला मतदाताओं और चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीद्वारों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. लेकिन इस सबके बावजूद महिला विधायक बहुत कम संख्या में चुनी जाती हैं, और यह तो तब है जबकि महिला विधायक पुरुष विधायकों से ज्यादा बेहतर काम करती हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर पाया गया. इस शोध को ज्यादा तथ्यात्मक बनाने के लिए नासा द्वारा ली गई तस्वीरों का भी अध्ययन किया गया था. जिससे महिलाओं और पुरुषों के विधानसभा क्षेत्रों में बिजली के प्रसार का फर्क सामने आया. इन तस्वीरों में पता चला कि महिला विधानसभाओं में न सिर्फ बिजली का प्रसार पुरुष विधानसभाओं से ज्यादा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण में भी वे काफी आगे हैं. महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या भी 22 फीसदी कम पाई गई . लेकिन यह अफसोसजनक है कि महिला विधायकों के इतना बेहतरीन काम करने के बाद भी आम जनता उनकी अपेक्षा पुरुष विधायकों को ही ज्यादा चुनती हैइसका एक महत्वपूर्ण कारण ये है लोगों की मानसिकता कि पुरुष ही इस काम के लिए फिट और बेहतर है और हो सकता है, उसे गलतियाँ करने का हक़ भी है.

महिला विधायकों को कम संख्या में चुने जाने के कुछ अहम कारण

1.        महिला उम्मीदवारों से लेकर महिला मतदाताओं तक दोनों ही पक्ष, आज भी राजनीति को सिर्फ पुरुषों का ही कार्यक्षेत्र मानते हैं और उन्हें ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहयोग करते हैं. इसलिए बतौर नेता महिलाओं की कार्य क्षमता पर समाज के लोगों को अभी भी ज्यादा विश्वास नहीं है; यहां तक की स्वयं महिलाएं भी महिला विधायकों पर भरोसा करके उन्हें वोट नहीं देतीक्योंकि पुरुष सत्तात्मक सोच कहीं न कहीं पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में होती हैं. आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं भी अपने पिछड़ेपन और समाज और जिंदगी को और बेहतर करने न बना पाने का स्वयं कारण हैं.

shayreyouressays.com से साभार

2.        महिलाओं को अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने का नुकसान राजनीति में भी भरना पड़ता है.परिवार, पार्टी या फिर अन्य सामजिक समूहों की तरफ से महिला उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के लिए उस तरह से दिल खोल के आर्थिक सहायता नहीं मिलती जैसे की पुरुषों को मिलती है. आर्थिक रूप से पुरुषों की अपेक्षा कमजोर होने के कारण वे अपने लिए बहुत आक्रामक प्रचार नहीं कर पाती. इसका प्रमुख कारण आज भी भारत के हर क्षेत्र में कानून बनने के बाद भी महिलाओं को अपनी सम्पति में आधा हिस्सा उसे नहीं मिलता उसे घर से ही आर्थिक दृष्टि से निर्भर रहने का सिस्टम बनाया गया है.

कमजोर चुनाव प्रचार के कारण न तो महिला उम्मीदवार ज्यादा लोगों तक पहुंच पाती हैं, न ही उम्मदीवारों को अपने विश्वास में ले पाती हैं. प्रभावी चुनाव प्रचार से लेकर, मतदाताओं को तोहफे देकर लुभाने तक में अक्सर ही महिलाएं, पुरुष उम्मीदवारों से पिछड़ जाती. सबका उन्हें मिलने वाले मतों की संख्या पर बहुत सीधा और नकारात्मक असर पड़ता है.

3.        बड़ी-बड़ी पार्टियां आज भी बहुत कम संख्या में महिलाओं को टिकट देती हैं ‘नेशनल इलेक्शनवाच’ नामक एक संस्था के अनुसार भाजपा और काँग्रेस ने इन पांच राज्यों में सिर्फ 12 प्रतिशत महिलाओं को ही टिकट दिया था. महिलाओं को टिकट देने में राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां ही अभी बहुत ज्यादा उत्साही नहीं दिखाई दे . में क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपने इलाके में महिला उम्मीदवारों को आगे लाने का कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता.

4.        चुनावों में जिस तरह से जाति, समुदाय और धर्म का का कार्ड चलता है उस तरह से लिंग कार्ड नहीं चलता. मतलब यह कि आज भी ज्यादातर वोटर अपने समुदाय या जाति के उम्मीदवार को एकजुट होकर वोट देते हैं, लेकिन यह बात महिला उम्मीदवारों पर लागू नहीं होती. महिला मतदाता कभी भी एकजुट होकर महिला उम्मीदवार को वोट नहीं देती क्योंकि आम तौर पर महिलाएं राजनीति और देश की चर्चा नहीं करतीं. यहां एक तथ्य यह भी है की घर-परिवार की महिलाएं अक्सर ही अपनी पसंद से वोट डालने को स्वतंत्र नहीं होती. उन्हें परिवार के मुखिया की पसंद से वोट डालना होता है;अक्सर ही किसी परिवार की वोट सामूहिक रूप से किसी खास मतदाता या पार्टी को डाली जाती है. इस कारण भी महिला उम्मीदवार के पिछड़ने की संभावना बढ़ जाती है.

असल में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना उन्हें न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत करेगा बल्कि देश में सामाजिक संतुलन व शांति की संभावना भी बढ़ जाएगी. इसके लिए बड़ी राजनीतिक पार्टियों को पहल करनी . पहले तो सालों से लटके महिला आरक्षण बिल को ही पारित करना होगा. निश्चित तौर पर यह आरक्षण बिल राजनीति में महिलाओं की भूमिका और सक्रियता बढ़ाने में सहयोगी साबित होगा. इसके साथ ही महिलाओं को भी राजनीति को करियर के तौर पर देखना शुरू करना होगा. उन्हें इन पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना चाहिए कि राजनीति उनके वश का नहीं, उनमे इतनी योग्यता नहीं, या उसमे केवल शोषण ही है. शोषण तो उनका परिवार, समाज व ऑफिस में भी किसी न किसी का स्तर पर होता है. बल्कि शोषण सबके जीवन में किसी न किसी स्तर पर है इसलिए महिलाओं को सबसे पहले तो मानसिक रूप से खुद को तैयार करना होगा खुद को इस योग्य पहचानने का कि उसकी सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक योग्यता और प्रतिभा कितनी है ? और कैसे और निखारनी है ? अपने स्त्री के गुणों भी साथ में निखारते हुए .

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

एक विदुषी पतिता की आत्मकथा: दूसरी क़िस्त

कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी 
अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता

1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन मुन्नी गुप्ता ने किया है, जिसका प्रकाशन श्रुति बुक्स, गाजियाबाद से हुआ है. यह एक वेश्याकी आत्मकथा है. इस किताब की लम्बी भूमिका का एक अंश एवं आत्मकथा का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए. दूसरी क़िस्त

तस्वीर साभार पंजाब केशरी

जिसे अपनी ज़िन्दगी की हर सांस के साथ औरत होने के हश्र-आगाज़ से हश्र-अंजाम की तरफ कदम-दर-कदम यकसर जा रहीहै, वह केवल गर्म गोश्त तो नहीं हो सकती, केवल पेशे में बे-बाईस दुनियावी खयानत, छलावे की वजह से जलालत सहती –वेश्या नहीं हो सकती. उसमें एक इंसानी वुजूद हर लम्हा ‘परिपक्व होने को है. ज्यादातर तो यहाँ हर तबका अवसाद (anxiety) के बदगुमान हालात और मनोविकृत आघात (Psychotic trauma) से उभरी संवेदनाओं की कशाकशी है. हर ख्वाहिश – आरजूओं, तमन्नाओं, जज्बातों के हासिल खोजती है. चिंता, अंदरूनी अशांति, अनचाही स्थितियों में जाने को मुखातिब होने को है. उत्पात मचाने को है . खलबली पैदा करने को है. ज़िन्दगीऔर जिस्म यानी जिस्म-ओ-जाँ में इक जोर की तड़प उठती है, जिसे जिस्म के हिसार के बाहर ज़िन्दगीको लाना दुश्वार लगता है और जिस्म की सरहदों में गर्म हवाओं के बवंडर जो उठ रहे हैं उन्हें बुझाने की खातिर एक औरत का गर्म जिस्म चाहिए ये तमन्ना जाग जाग उठती है. अपने बदन की गर्मी को राहत देने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को उतावला है. उत्तेजना, गर्माहट, एक अवसाद पैदा कर रहा है. यह अवसाद एक आक्रोश में बदल रहा है और रुखसार को बेचैनी से भर देता है. औरत ही है जो जिस्म की आग बुझा सकती है. दोशीजा हो तो फिर आग में और सरगर्मी बढ़ जाती है. यही मंशा आदमी के भीतर उसे आग के खिलाफ योजनाबद्ध होने पर मजबूर करता है. आग जो जिस्म की है, उसे बुझाने में आदमी किसी भी औरत की अंदरूनी झिल्ली को काटकर उसे पूरी तरह परास्त करके ही राहत पा सकता है.

ऐसे में वेश्या अगर ये कहे कि वह औरत है और वेश्या होकर अगर वह औरत होने की सज़ा से गुजर सकती है तो औरत होने पर बात क्यूँ नहीं कर सकती? इस समूची कवायद में यदि वह कोई तार्किक सवाल कर दे, मसलन मंटो ने जब खुद पर बोलते हुए यह कहा –“ऐसा होना मुमकिन है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो ज़िंदा रहे.” तो फिर यह मुमकिन क्यूँ नहीं कि जिस्मफरोशी जो एक पेशा है और वेश्या होना पेशे के मुताबिक़ दिया गया पदनाम है. आखिर वेश्या है तो एक औरत ही जो इस पेशे में आई है या ज्यादातर जबरन घसीट लाई गई. तो वह एक औरत होकर क्यूँ नहीं जी सकती. या फिर औरत होकर क्यूँ न जिए. वेश्या (पहचान) एक औरत की वास्तविक, अस्मिता नहीं बन सकती, वो रोज़ी है. ज़िन्दगी जीने की खातिर बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने का ज़रिया है. जबकि वेश्या का औरत होना उसका वाजिब अभिमान है. इस लिहाज़ से वेश्या एक औरत की अस्मिता में रह कर जीने की हक़दार है. इस दुनिया में मर्द भी तो दलाल हैं इसी पेशे में या अन्य पेशों में. फिर वे मर्द की हैसियत से कैसे रहते हैं- खालिस दलाल क्यूँ नहीं रहते?

मानदा बताती है –मैंने जब राजबाला से उसकी सम्पन्नता का कारण पूछा तो उसने बताया– वेश्यालय में किस्म-किस्म के लोग आते हैं. रईस जमींदारों के बच्चे अपने दोस्त, मित्रों सहित खुलेआम वेश्याओं के पास जाते हैं. इन्हें लोक-लज्जा का भय नहीं सताता. ये गीत-संगीत, मदिरा पान आदि द्वारा मौज-मस्ती में लिप्त होते हैं. ये छोटी-मोटी खोला बाड़ियों में नहीं आते.

एक और दल लम्पटों का है जो सामाजिक निंदा से डरता है. समाज में ये ऊँचे पदों पर जो बैठे हैं और सम्मानित हैं- ये लुके-छिपे ढंग से वेश्यालयों में कदम रखते हैं, इनके आगमन का मूल कारण वासना पूर्ति मात्र है. गीत-संगीत अथवा अन्य किसी प्रकार के मनोरंजन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं. ये रात के अँधेरे में आते हैं और अँधेरा रहते ही चले जाते हैं.

दूसरी ओर लोक-समाज में भी अपनी मान-मर्यादा और सुनाम को बचाए रखते हैं. कवि, साहित्यकार, समाज सुधारक, नामवर वकील, स्कूल शिक्षक, कॉलेज प्रोफ़ेसर, राजनैतिक नेता, उपनेता, सरकारी दफ्तर के बड़े कर्मचारी, ब्राह्मण, महामहोपाध्याय पंडित, विद्याभूषण, तक. . .  आदि उपाधि प्राप्त अध्यापक, पुरोहित, महंत और छोटे-मोटे व्यवसायी ये सभी इसी श्रेणी के हैं.

मेरे पास हाईकोर्ट के एक विख्यात वकील का आना जाना है, वे ऊँचे कुल के ब्राहमण के बेटे हैं. उनका नाम है श्री. . . .उम्र कुछ अधिक होगी. वे मुझे भरपूर रुपये देते हैं. एक दिन मैंने मजाक में उनसे कहा था, “तुमहाई कोर्ट के ऊँचे स्थान पर प्रतिष्ठित होगे.”

यहाँ तक कि अब तो सरकारें भी कारोबारियों की दलाली में शामिल होती जा रही हैं. फिर कोठे और लोकतंत्र के मंदिर में कैसा फर्क? ईमान और रूह तो सरकारें भी गिरवी रख आई हैं – कारोबारियों के घरानों में. सांसद, मंत्री खुद मुनाफाखोर ठेकेदारों कारोबारियों की दलाली में मशगूल हैं, न्यायपालिकाएं हैसियतवाले और पूंजीपति कारोबारियों के दलालों की ही पैरवी में खड़े कानूनगो के हक़ में फैसले दे रही है. कभी मेहनतकशों का हक़ मारकर गलत तरीके से कमाई गई दौलत के खिलाफ कोई फैसला नहीं आया.इन कारोबारियों के दलाल बड़े बड़े नामीगिरामी वकील हैं और यहाँ तक कि खुद राज्य सरकारें हैं, ये कारोबारी आम आदमी के खून पसीने की गाढ़ी कमाई को कौड़ियों के मोल लूटकर गैर- मुलक़ में बसने जा रहे हैं. मुलक़ के हाकिम दवा कम्पनियों के कारोबारियों की मुनाफाखोरी में हिस्सेदार और दलाली में शामिल हैं, पेशा चिकित्सा है तो दवा कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने की दलाली क्यूँ? ऐसे तमाम पेशे जो सम्मान और रुतबे से जुड़े रहे हैं, उन पर भी सवाल उठ रहे हैं. कानून किनके हक में है, यहीं से तमाम बातें साफ़ हो जाती हैं. आज़ादी के पहले पेशेवर मुलाजिमों के किस्से और आज़ादी के पचहत्तर सालों बाद भी दलाल स्ट्रीट बने हर हैसियत वाले पेशे के कायदों में भला क्या फर्क आया है?

मंटो ने इस मसले पर जिक्र किया है – “हम लिखने वाले पैग़ंबर नहीं. हम क़ानून साज़ नहीं.. क़ानून साज़ी दूसरों का काम है- हम हुक़ूमतों पर नुक़्ताचीनी करते हैं लेकिन ख़ुद हाकिम नहीं बनते.  हम इमारतों केनक़्शे बनाते हैं लेकिन हम मै मारनहीं. हम मर्ज़ बताते हैं लेकिन दवाखानों के मोहतमिम (व्यवस्थापक) नहीं.”

मानदा ने लिखा इसलिए कि हमारी नजर साफ़ हो सके. इसलिए नहीं कि ये वेश्या कथा बनके रह जाय. इसकी कमाई यही है कि इन्साफ की लड़ाई में ताकत हासिल हो. ईमान से जीते हुए लड़ाई जारी रह सके.

वह कहती है- “अच्छे घरों के शरीफ बेटे के रूप में प्रसिद्द अपने इन दोनों पढ़े-लिखे उच्च शिक्षा प्राप्त दलालों को जब मैं देखती हूँ तब यह सोचने पर बाध्य हो जाती हूँ – इस संसार का कैसे भला हो! कभी-कभी यह सोचती हूँ कि वह ऐसी मानसिकता वाले क्यूँ हैं? उनके स्वभाव को देखते हुए मेरा मन वेदना से भर उठता और यह मैं बार-बार विचार करती कि जिस जाति के उच्चशिक्षित भद्र घरों के शरीफ मर्द वेश्याओं की दलाली करते हैं, दलाली ही नहीं करते वेश्याओं को वेश्यावृत्ति का पेशा छोड़ते देख वे बार-बार उन्हें इसी पेशे में लिप्त रहने का प्रलोभन देते हैं और समाज में भद्र और शिक्षित कहलाते हैं.”

मानदा भी हमारे समक्ष ईश्वर की ही तरह आत्मकथा में हाज़िर होकर भी अनाम होते हुए हाजिर नाज़िर बनी रहती है. अगर एक वेश्या को ईश्वर के बारे में बात करनी पड़े तब वह इस सूरत में खुद को समर्पित करने केबजाय ईश्वर के सामने किस तरह संदेश देगी यह बात ‘एक वेश्या का आखिरी ख़त’, जिसे मनास अग्रवाल हमारे सामने लेकर आये. वेश्या एक पत्रकार को लिखे खत में ईश्वर पर बात करते हुए कहती है  – “आपने एक बार पूछा था कि हमारे कोठे में भगवान की मूर्तियों का मुँह छत की तरफ़ क्यूँ है? दरअस ल मेरे आने से पहले तक हमारे पलंग उनकी मूर्तियों के सामने ही हुआ करते थे। लेकिन एक रात जब एक मर्द स्खलित होने ही वाला था, ईश्वर की मूर्तियों को निहारती मेरी स्थिर और एक टक पुतिलयों ने देखा कि भगवान ने अपनी आँख झुका ली है। और तब से वो मूर्तियाँ छत को घूर रही हैं। मैं हर उस शख्स को ग्राहक समझती हूँ जो इन कोठों पर आता है। भले ही वो हमारा ईश्वर ही क्यूँ ना हो। बस ईश्वर के साथ ये सहूलियत जुड़ी रहती है बल्कि बाक़ी ग्राहकों की तरह उसे कोठों से निकलते वक्त गर्दन झुकानी नहीं पड़ती। क्योंकि ईश्वर कभी लौटकर नहीं आते। जहाँ तक मैं जानती हूँ किसी भी ईश्वर की कोई लड़की नहीं थी। शायद इसीलिए वह ईश्वर था क्यूंकि उसने अपनी विवशताओं को बात पहले ही पहचान लिया था।

मानदा भी ईश्वर को याद करते हुए स्मृति पटल पर लाकर अपने तर्क भरे भरोसे से कहती है –“ईश्वर की इस पवित्र दुनिया में आदमी कितने बनावटी उपायों से स्त्री-पुरुषों को पाप के रास्ते पर आकर्षित करते हैं.” यह दो अलग तरह की वेश्याओं के विचार हैं. मगर ईश्वर से आदमी तक होकेगुजर जाना, एक निष्कर्ष को पाना और उसे जानने का उपक्रम बेहद रोचक और दिलचस्प वाकया है.

फोटो: सुविदा दत्त. साभार

यहीं कहीं से मानदा यानी एक वेश्या के बतौर लिखने की जंग, एक जद्दोजहद शुरु होती है. इस बहाने मानदा ने जुबानी व कलमकार होके तमाम-तमाम जिरहें कीं. ये बातें खतरनाक साबित हों सकती हैं या जोखिम से भरी बहस से भरी हैं. मगर ये यात्रा जुल्म, ज्यादतियों के खिलाफ नाफरमानी की तरफ मुड़ चली हैं. ये सवाल और ख्याल मर्दवादी समाज संरचना पर चोट कर रहे हैं. इन्साफ की देवी भी एक औरत की ही सूरत में हर मुलक़ कीअदालत में आँखों पर पट्टी बांधे खड़ी है. एक वेश्या आँखों की पट्टी हटाकर देखने को बाध्य कर रही है. इंसानी अदालत में बार-बार कह रही है दुनिया की हर वेश्या एक औरत है. औरत जोकि दिलोदिमाग से दुरुश्त है,  एक औरत होकर वेश्या के पेशे में रहते हुएइन्साफ की गुहार लगा रही है, मर्दवादी समाज की सोच और संस्कृति की फितरतों, कानूनी उसूलों, सलीकों और राजनीतिक कायदे-तहज़ीब के खिलाफ गवाही दे रही है, मुखालफत कर रही है.  ऐसे में वेश्या की जिरह बहस के बरक्स मर्दवादी मूल्यों की घेराबंदी और प्रतिवाद के समक्ष क्या सरोकार हो सकते हैं? कहीं ये तो नहीं कि बदले में यही मर्दवादी कट्टरपंथी दस्तूर उसे क्या ऐसे में इज्जत बख्सेंगे? क्यायह सच नहीं कि इसके एवज में वे मिलकर एक वेश्या से उसके जीने की आज़ादी छीन नहीं लेंगे?

इन सवालों के सामने यह व्यवस्था वेश्या को कत्ल करने में जरा भी संकोच करेगी भला?  क्यूँ ऐसा हुआ कि आज तक वेश्याओं के बचाव में कोई मजबूत, सख्त दलील नहीं हुई? कोई जन-आन्दोलन नहीं हुआ, न ही कभी इस तरह के मामले न्यायपीठ में जिरह का हिस्सा बने? सवाल तो ये भी कि भला कौन वकालत करे वेश्याओं के हक और पक्ष में? आखिर वह भी औरतें हैं और वेश्या होना उनका पेशा मात्र है. इन बातों से वह समाज मेंबेदखल होने की सजा, यातना, दंश, यन्त्रणा, क्यूँ सहे? औरत होने का सम्मान क्यूँ खोये? बुनियादी सहूलियतों से वंचित होने की तकलीफें क्यूँ झेलें?

वेश्याओं ने यूँ तो दुनिया भर में अपनी-अपनी जुबानों में अनगिनत दास्तानें लिखीं हैं. मैं भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि दुनिया भर में लिखे वेश्याओं के लेखन पर एकदम नये तरीके से, निष्पक्ष, न्यायिक होकर तमाम जुबानों में मूल को इंटरेक्टिव जुबान में तर्जुमा करने की ज़रूरत है. इस कवायद से ही तमाम मुल्कों में मजहबी और कौमी वैश्विक मर्दवादी मानसिकता और फलसफे को तोड़ा जा सकता है. सख्त और बर्बर संरचना को ढहाया जा सकता है. वह वेश्या होने के साथ-साथ एक औरत है, ब-हैसियत एक औरत की अपनी आइडेंटिटी है, सेल्फ रिस्पेक्ट है और वह विदुषी भी यकीनन हो ही सकती है कम या ज्यादा, बेहतर या नाकाफी. इस पर तो बहस हो सकती है. मगर बने बनाये सड़ांध भरे मर्दवादी कायदों की जड़ में नमक घोला जा सकता है – रूढ़, रुग्ण, कुंठित ग्रन्थियों को आदमी के भीतर से खत्म करने का एक प्रयास तो किया ही जा सकता है. मैं भरोसे के साथ कह सकती हूँ कि यह एक गम्भीर चुनौती है. इसकाखामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है, किसी एक के पक्ष में रहकर यह मुगालता होना भी ठीक न होगा कि इन्साफ के लिए यह लड़ाई लड़ने के खतरे कम नहीं हैं.

जब धर्म और सत्य की लड़ाई हो सकती है तो फिर एक कम्युनिटी जो दुनिया भर में फैली है उसके हक़ और इन्साफ के लिए एक नये धर्म और सत्य को स्थापित करने की लड़ाई भला क्यूँ लड़ी नहीं जानी चाहिए. मंटो ने एकबारगी कहा था “मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है.”

लोकतंत्र में लोकरंजक भूमिकाएं अगर जरूरी हैं तवायफ जरुरी हैं, वेश्याएँज़रूरी हैं, तो इन औरतों की अस्मिताएं भी उतनी ही ज़रूरी है ये क्यूँ न हो. मानदा की डिमांड यही है. औरत की भूमिका हर रूप में ज़रूरी है तो उसकी अस्मिता, अभिमान, स्वाभिमान और अस्मिता भी उतनी ही ज़रूरी है.

साभार गूगल

इस काम के लिए दुनियाभर के हर वेश्यालयों की गहराई से पड़ताल करनी होगी. ज़रूरत है दुनिया भर में वेश्याओं की लिखी आत्मकथाओं को क्म्युनिकेटिव लैंग्वेज में लाने की. ज़रूरत है इन मसाइलों पर खुलकर फैसले करने की. ये ऐसे मसले हैं, जिन्हें जगजाहिर करते हुए उस पर हर तरीके से सोचने और काम करने की ख़ासा ज़रूरत महसूस की जा रही है. औरतों की अज्ञात, अपार संभावनाएं, सम्वेदनाएँ, जटिलताओं से होकर गुजरने का मतलब है एक बड़ी चुनौती से टकराना. ये दुनिया वेश्याओं से खाली नहीं हो सकती तो उनकी अस्स्मिताओं से कैसे बच निकले, इस फिराक में क्यूँ हैं सारी व्यवस्थाएं? जो अब तक नहीं हुई, इन मसलों पर बात करने की ज़रूरत अगर करनी पड़े तो ये भी होना ही चाहिए.

यह एक तरह से औरत के भीतरी इलाकों में चली आ रही सदियों की अनगिनत लड़ाइयों की इबारतें हैं, जिन्हें पढ़ने, समझने तक ही बंधकर सीमित नहीं रहना होगा. इसके हासिल को पाने के लिए नई-नई तकनीक और वैज्ञानिक सोच से गम्भीर प्रविधियों को लागू करने की ख़ासा ज़रूरत है. यह काम जिस दिन दुनिया के हिस्से में होना शुरू होगा- इकट्ठे युनाईट होकर, उसी लम्हे से हम एक मुकम्मल और तरक्कीपसंद इंसानी दुनिया को रच सकने की कूबत पैदा कर सकेंगे. वरना औरतों के जिस्म के बाज़ार की चकाचौंध में मॉडर्न सभ्यताएं औरतों के कत्ल से सने हाथ लिए इसी तरह हमारे बीच बनी रहेंगी. इंसानी ऊंचाइयों की जो असली दुनिया है वह जैविक, मानसिक, नस्लीय, गैरबराबरी से छुटकारा पाने के लिए सेन्स ऑफ ह्यूमर की डिमांड से भरी है, यह हो तो बेहतर है, हमारे दिलोदिमागमें जो सेंसर लगे हैं उन्हें खारिज कर नये तरीके से सोच की स्क्रीनिंग होनी चाहिए. औरतें जो वेश्याएँहैं मानो उनके पर काटकर उन्हें आज़ाद छोड़ा गया है, पर तो फिर भी निकल आयेंगे. हमें हीइन औरतों के भीतर अस्मिता की परवाज के परिंदों कीहिफाजत करनी होगी..

 तुम्हें मुझ से जो नफ़रत है वही तो मेरी राहत है
मेरी जो भी अज़िय्यत* है वही तो मेरी लज़्ज़त है
 (*कष्ट, यातना, तकलीफ़)

सच कहूँ तो किताब का तर्जुमा करने की पेशकश दिसम्बर सन 2013 में हो गई थी लेकिन कुछ अड़चनें , नामालूम जाने कहाँ कहाँ से आईं और मुझे झकझोरती चली गईं. यही वजह है कि यह मजमून अब जाकर पूरा हो सका है. धीरे-धीरे यह रहस्य भी समझ सकी कि परफेक्शन हर दिन का अंत है और हर सुबह की शुरूआत. अब तक के मेरे अभ्यास का एक छोटा-सा प्रयास है यह तर्जुमा. उम्मीद है आपको यह किताब पसंद आयेगी. हाँ यह कहना जरूरी है किकिसी भाषा को जानने मात्र से कोई अनुवादक की यात्रा तय नहीं कर सकता और न ही अनुवादक मूल पथ का दावेदार हो सकता है बल्कि उस भाषा के मिजाज को पूरी तरह से आत्मसात करके ही रचना के साथ न्याय किया जा सकता है.     

इन्हीं चंद ख्यालों के साथ – एक आशा, एक उम्मीद, गहरी आकांक्षाओं के बीच यह किताब अब आपके हाथ में है. आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार हमेशा रहेगा.ढेरों उम्मीदों, सपनों और चुनौतियों से भरी यह किताब एक नई दुनिया बनाने की तरफ बढ़ा कदम साबित हो इसी भरोसे के साथ …

क्रमशः
मुन्नी गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-700073

उनकी प्रतिबद्धता हाशिये के लोगों के साथ ताउम्र रही

संजीव चंदन

वे एक अभिनव समुच्चय थीं- सामाजिक समता के प्रति समर्पित एक योद्धा, आदिवासियों के अधिकारों की प्रवक्ता, स्त्री-पुरुष समता के प्रति प्रतिबद्ध चिंतक और जमीनी कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, संपादक. जीजिविषा इतनी कि निजी और सार्वजनिक को सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों से भर देना चाहती थीं. हाँ, आख़िरी क्षण तक रचने की बेचैनी के साथ रमणिका गुप्ता सक्रिय रहीं.

रमणिका गुप्ता जनता के साथ

22 अप्रैल 1930 को पंजाब में पैदा हुई रमणिका गुप्ता 26 मार्च 2019 तक की जीवन यात्रा में बिहार, खासकर झारखंड और दिल्ली में सक्रिय रहीं. बिहार और झारखंड की उनकी सक्रियता जमीनी संघर्ष की रही और दिल्ली में साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित.  रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनवाद और हजारीबाग में बीते, जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं, ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् और विधान सभा में उनकी भूमिका के तय होने के शहर रहे ये. उनकी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में इन शहरों में उनकी सक्रियता और उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के निर्माण की तस्वीर उभरती है. जिसे पढ़ते हुए ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से कोयलानगरी की राजनीति को समझने वाली नई पीढी को स्त्री की आँख से धनबाद/झारखंड से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोई स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है.

रमणिका गुप्ता के होने का मतलब समझने के लिए उनकी जीवन-यात्रा को दो कालखंडों और दो व्यक्तित्वों में बाँटकर देखा जा सकता है- 7वें से-9वें दशक तक झारखंड/ बिहार में ट्रेड यूनियन,जनांदोलन और बाद में संसदीय राजनीति में सक्रिय व्यक्तित्व तथा 90 के बाद से जीवनपर्यन्त दिल्ली में साहित्य-संस्कृति को समर्पित व्यक्तित्व. अपने पहले कालखंड में वे अपेक्षाकृत अधिक बेचैन व्यक्तित्व हैं, वे सांगठनिक प्रतिबद्धता से अधिक जनता के हित को तरजीह देती रही इसलिए वे समाजवादी, वामपंथी और कांग्रेसी राजनीति में आवाजाही करती रही. हालांकि जहाँ भी रहीं मजदूरों, आदिवासियों और स्त्रियों के लिए संघर्ष उनकी पहली प्राथमिकता थी इसलिए भी वह लड़ते हुए, अपनी बात कहते हुए संगठनों के दायरे से बाहर निकल आती थीं. मजदूरों की अस्मिता और अधिकार के लिए उनका एक संघर्ष बहुत चर्चित रहा जिसमें उनका नारा था, ‘“हम कौन हैं लिख कर दो- हमारा नाम क्या है लिख कर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो-हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहाँ खटते हैं लिखकर दो !” संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति पूंजीपतियों और सरकारी बाबुओं के रवैये को जो लोग जानते हैं वे इस नारे के महत्व को समझ सकते हैं.

महिलाओं के सम्मान और अपने अधिकार के लिए वे किसी भी हद तक जाकर संघर्ष कर सकती थीं. ऐसा ही एक वाकया बिहार विधानसभा का है, जब 22 जुलाई 1983 को सदस्यों की महिला विरोधी टिप्पणियों पर वे सदन और सदन के बाहर खूब बरसीं थीं. अश्लील टिपण्णी का आरोप इंदरसिंह नामधारी और वृषिण पटेल पर था.  इंदर सिंह नामधारी बाद में झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष हुए लोकसभा के सदस्य बने और वृषिण पटेल बिहार की कई सरकारों में मंत्री बने. वृषिण पटेल उसी पार्टी लोकदल (नेता कर्पूरी ठाकुर) के सदस्य थे जिसकी तब सदस्य थीं अपमानित हुईं रमणिका गुप्ता. रमणिका गुप्ता ने हाल के दिनों में बताया था कि ‘जेंडर के आधार पर मुझे गालियां कई बार खानी पडीं. एकबार मैं कोई मुद्दा उठाते हुए टेबल पर चढ़ गयी तो एक नेता चिल्लाये, ‘नाच नचनिया नाच.’ऐसे कई अनुभव रमणिका अपने राजनीतिक जीवन के दौरान का बताती हैं. रमणिका ने यह भी बताया था कि उनकी सीट के तब पीछे ही बैठने वाले लालू प्रसाद ऐसी ओछी टिप्पणियों से दूर रहते थे.’ राजनीतिक जीवन के ऐसे कई वाकये रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ और ‘आपहुदरी’ में दर्ज हुए हैं, जिनकी धमक दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक पहुँची, इंदिरा गांधी तक भी.

90 के बाद के समय की सक्रियता में उन्होंने अपनी रचनात्मकता को सम्भाला और उससे अधिक आदिवासी, महिला और दलित लेखन एवं अभिव्यक्ति को. ‘युद्धरत आम आदमी’ नामक पत्रिका में उन्होंने विभिन भाषाओं के आदिवासी, महिला और दलित रचनाकारों को जगह दी. कई प्रतिभाओं को तराशा, निखारा, सामने लाया. उनकी खुद की दो दर्जन किताबों के प्रकाशन का कालखंड है यह, जिसमें कई कविता संग्रह, उपन्यास, कहानी संग्रह, बहु चर्चित आत्मकथा और यात्रा वृत्तांत आदि शामिल हैं. आख़िरी दिनों में उनकी रचनात्मक ऊर्जा देखते बनती थी. इन दिनों ‘हाशिये उलांघती औरत’ शीर्षक से 5 खंडों में विभिन्न भाषाओं की महिला रचनाधर्मिता को उन्होंने सामने लाया.

जीवन और कर्म में बेवाक रमणिका गुप्ता ने हिन्दी समाज और भाषा की पुनरुत्थानवादी एवं वर्चस्वादी जड़ता के विरुद्ध संघर्ष किया और संघर्षों को प्रोत्साहित किया. 9वें दशक के बाद हिन्दी साहित्य में राजेन्द्र यादव और रमणिका गुप्ता दो कल्ट-व्यक्तित्व के रूप में सामने आये जिन्होंने हाशिये की अभिव्यक्ति से खुद को जोड़ा और उनके लिए प्लेटफार्म सृजित किया. तुलनात्मक तौर पर रमणिका गुप्ता ने अस्मिताओं के संघर्ष की हर विकास यात्रा का ज्यादा करीबी साथ दिया जबकि राजेन्द्र यादव ने अपने लिए सीमायें तय कर ली थीं.

लगभग 90 सालों तक की रमणिका गुप्ता की जीवन-यात्रा ऐसे खुदमुख्तार स्त्री की जीवन यात्रा है जिसने अपने लिए और एक स्त्री के लिए समाज में तय सारी हदों को पार किया. समृद्ध पंजाबी खत्री परिवार में पैदा हुई रमणिका गुप्ता के परिवार में भाई और भाभी कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े थे शायद यह पहली प्रेरणा रही हो लेकिन उन्होंने घर की दहलीज को बार-बार लांघा,जो किसी स्त्री की खुदमुख्तारी की पहली शर्त होती है. हालांकि निरंतर बेचैन मन और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व ने उन्हें वैचारिक संगठनों में स्थिर नहीं रहने दिया, कई बार निर्णयों की विसंगतियां भी सामने आयीं लेकिन स्वनिर्मित सीमाओं के भीतर उनमें एक निरन्तरता हमेशा रही- ‘हाशिये के लोगों’ के प्रति प्रतिबद्धता!

संजीव चंदन स्त्रीकाल के सम्पादक हैं.

महादेवी-काव्य-संध्या का आयोजन:महादेवी वर्मा के गीतों का गायन और समकालीनों का काव्यपाठ

                   

महादेवी वर्मा की 112 वीं जयंती पर संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से स्त्रीकाल और समकालीन रंगमंच ने महादेवी-काव्य-संध्या का आयोजन 26 मार्च को संगीत-नाटक अकादमी के प्रांगन में किया. पहले सत्र में महादेवी वर्मा की कविताओं का गायन एवं दूसरे सत्र में समकालीन 7 कवयित्रियों का कविता पाठ हुआ.

ऊपर उषा ठाकुर महादेवी को गाती हुई, नीचे बायें से दायें नीतीशा खालको, मृदुला शुक्ला, लीना मल्होत्रा, शुभा, अनिता भारती, रजनी अनुरागी और रश्मि भारद्वाज


आयोजन के पूर्व साहित्यकार एवं आदिवासी-दलित-महिला अधिकारों की प्रवक्ता रमणिका गुप्ता के स्मृतिशेष होने की खबर आयी. कार्यक्रम की शुरुआत में उन्हें याद करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया. कई कवयित्रियों ने उन्हें अपनी कवितायेँ समर्पित करते हुए कविता-पाठ किया.
प्रथम सत्र में गायिका उषा ठाकुर ने महादेवी की ‘कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो’ ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली, ‘विहंगम मधुर स्वर तेरे’ आदि 9 कविताओं/गीतों का गायन किया. उनके साथ तबले पर संगत किया अंजनी कुमार झा ने और पैड एवं कीबोर्ड पर थे बाबलू और जयदेव शर्मा.

दूसरे सत्र की शुरुआत नीतीशा खालको ने जम्मू के बकरवाल समुदाय की लडकी ‘आसिफा’ की याद में कविता पढ़ते हुए की. आसिफा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी थी. नीतीशा की कविता ‘अखबार और आसिफा’की पंक्तियाँ हैं, ‘
रोज आसिफा आती है
बतियाती है
और छूने की नाकाम कोशिश करती है
और यह कहकर वापस अखबार में समा जाती है
कि अगली बात मुझे 33 करोड़ देववासियों
की देवनगरी और देवभूमि में मत आने देना
मुझे जीने देना
आसिफा बकरवाल बन नहीं
बल्कि आदमजात मात्र


पढी गयी कविताओं में स्त्री के संघर्ष, स्वप्न दर्ज हुए और जेंडर-भेद की स्थितियों को भी ये कवितायेँ संबोधित करती दिखीं. शुभा ने अपनी अन्य कविताओं के साथ अपनी चर्चित कविता ‘गैंगरेप’ भी सुनायी, गैंगरेप की पंक्तियाँ:
‘हमारे शास्त्र पुराण, महान धार्मिक कर्मकांड, मनोविज्ञान मिठाई और
नाते रिश्तों के योग से लिंग इस तरह
स्थापित हुआ जैसे सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता
आश्चर्य नहीं कि मां की स्तुतियां
कई बार लिंग के यशोगान की तरह सुनाई पड़ती हैं।
लिंग का हिंसक प्रदर्शन उस समय ज़रूरी हो जाता है जब लिंगधारी का प्रभामंडल
ध्वस्त हो रहा हो”

अनिता भारती की कविताओं में स्त्री-आंदोलनों के अंतरविरोध की पहचान स्पष्ट होती है और भविष्य की स्त्री की तस्वीर पेश होती है. उनकी एक कविता ‘रहस्य’ की पंक्तियां हैं:
पर मेरी बेटी
जो हमसबके भविष्य की सुनहरी नींव है
जो जन्मघुट्टी में सीख रही है
सवाल करना
कब से? क्यों? कैसे? किसका?
मुझे पता है वह हालत बदल देगी
उसमें है वह जज्बा
लड़ने का, बराबरी का
क्योंकि उसे पता है संगठन, एकता का रहस्य


रजनी अनुरागी की कविता स्त्री की अस्मिता के पक्ष में कथन हैं. उनकी पढ़ी गयी कविताओं में से एक ‘फूलन’की पंक्तियाँ हैं:
तुम अकेली और वो कायर लिंग थे केवल
तुम्हारे मान मर्दन की तमाम कोशिशों के बावजूद
वह अट्टहासी क्रूर हिंसा तुम्हें तोड़ नहीं पाई
तुम टूट भी नहीं सकती थीं
कि तुमने जान लिया था स्त्री जीवन के डर का सच
जान लिया था कि स्त्री का मान योनि में नहीं बसता
वह बसता है स्त्री के जीवित रहने की उत्कट इच्छा में
यह जान लेना ही तुम्हारा साहस था
जिसे तुमने नहीं छोड़ा
जीवन की आखिरी सांस तक

उपस्थित श्रोता

रश्मि भारद्वाज की एक कविता पाठ और आलोचना के जेंडर-भेद को स्पष्ट करती है. कुछ पंक्तियाँ हैं:
एक पुरुष ने लिखा प्रेम
रची गयी प्रेम-परिभाषा
एक स्त्री ने लिखा प्रेम
लोग उसके शयन-कक्ष का भूगोल तलाशने लगे
एक पुरुष ने लिखा स्त्रियाँ
वह सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं
एक स्त्री ने लिखा पुरुष
वह सीढियां बनाती थी
स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द
वे वहां उसकी देह की ज्यायमीतियाँ ढूंढते हैं

रमणिका गुप्ता की स्मृति में मौन


मृदुला शुक्ला की पढ़ी गयी एक कविता प्रेम में अस्तित्व और भूमिका के बदलने का आश्वासन चाहती है, प्रेम में स्त्री के हिस्से पारम्परिक समर्पण में बदलाव चाहती है. पात्र और बिम्ब तथा नियत का बदलाव:
जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
बूढी औरत दे रही थी
चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उसी तस्वीर में
एक जवान आदमी दीवार से सिर टिकाये
गुडगुडा रहा था हुक्का
एक बूढा बैठा बजा रहा था सारंगी
मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
वचन और फेरों के फेर के बगैर
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए बदल सकते हो
दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो की जगह भर

लीना मल्होत्रा की यह कविता जेंडर निर्माण को स्पष्ट करती है यह चिह्नित करते हुए कि औरत की देह किस तरह उसका एकमात्र अस्तित्व बना दी जाती है. हालांकि यथास्थिति का स्वीकार भी नहीं है सिर्फ स्त्री के भीतर, संभावनाएं विद्रोह की भी हैं:
क्यों नहीं रख कर गई तुम घर पर ही देह
क्या दफ्तर के लिए दिमाग काफी नहीं था
बच्चे को स्कूल छोड़ने के लिए क्या पर्याप्त न थी वह उंगली जिसे वह पकड़े था
अधिक से अधिक अपना कंधा भेज देती जिस पर टँगा सकती उसका बस्ता
तुमने तो शहर के ललाट पर यूं कदम रखा
जैसे
तुम इस शहर की मालकिन हो
और बाशिंदों को खड़े रहना चाहिए नज़रे झुकाए
अब वह आग की लपट की तरह तुम्हें निगल जाएंगे
उन्हें क्या मालूम तुम्हारे सीने में रखा है एक बम
जो फटेगा एक दिन
उन्हें ध्वस्त करता हुआ
वे तो ये भी नहीं जानते
तुम भी
उस बम के फटने से डरती हो।
काव्य संध्या का संचालन राजेश चन्द्र और धन्यवाद ज्ञापन संजीव चन्दन ने किया.

वह आत्मीय और दृष्टिसंपन्न संपादक हमें अलविदा कह गयी

अनिता भारती

जानी मानी लेखिका, दलित आदिवासी और स्त्री लेखन की सशक्त पैरोकार रमणिका गुप्ता जी छब्बीस मार्च दोपहर तीन बजे दुनिया छोड़कर चली गई। रमणिका जी बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव की थी। मैं तो हमेशा उनको आंटी कहकर ही बुलाती थी। रमणिका जी का भी मुझपर बहुत स्नेह था। मेरा उनसे पहला परिचय तब हुआ जब मैंने उत्तर प्रदेश के डोमकच्छ समुदाय के बीच पसरी भुखमरी और गरीबी पर लेख लिखा था, जो उस समय जनसत्ता के रविवारीय पृष्ठ में छपा था। रमणिका जी को वह लेख बहुत पंसद आया था और उसी लेख को बाद में उन्होंने अपनी मासिक पत्रिका युद्धरत आम आदमी में भी छापा था । इसके बाद जब मैंने दलित सामाजिक क्रान्तिकारी गब्दूराम बाल्मीकि और कश्मीरी कविता की जनक ललदेह पर काम किया, तो उस मह्त्वपूर्ण काम को सबसे पहले रमणिका जी ने ही युद्धरत आम आदमी में  जगह दी। रमणिका जी को हमेशा मौलिक काम और नये विचारों को सुनने समझने में बहुत रुचि थी। यह बात गलत भी नही है कि युद्धरत आम आदमी जैसी नामचीन पत्रिका के कारण ही दोनों प्रख्यात दलित व्यक्तित्व गब्दूराम वाल्मीकि और दलित कवयित्री को मह्त्वपूर्ण स्थान मिला।

रमणिका गुप्ता

जब हंस का दलित साहित्य विशेषांक आया जिसके सम्पादक अजय नावरिया और श्योराज सिंह बैचेन थे। उस अंक में शामिल कुछ लेख स्पष्ट रुप से दलित स्त्री विरोधी विचारधारा वाले थे, उस अंक के खिलाफ मैंने हंस के संपादक राजेन्द यादव जी को अपना एक लेख दिया था परन्तु उन्होंने उसे छापने से एकदम इंकार कर दिया। रमणिका जी को भी हंस के इस दलित विशेषांक से बहुत आपत्ति थी। परंतु उन्होने अपनी आपत्ति तुरंत राजेन्द्र यादव जी को फोन कर जता दी थी। परंतु मेरे रमणिका जी को यह बताने पर कि वह मेरी आपत्ति लेने से इंकार कर रहे है तो मेरा यही लेख रमणिका जी ने कहा – मुझे दो मैं छापूंगी और उन्होने उस लेख को बडे सलीके से युद्धरत आम आदमी में छापा।

रमणिका जी के व्यक्तित्व की यही खासियत उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह बहुत खुले दिल से सबके लेखन का स्वागत करती थी और उसे अपनी पत्रिका में ससम्मान स्थान देती थी। इसी प्रकार उन्होंने कथादेश पत्रिका के चले धर्मवीर प्रकरण पर अपना सशक्त विरोध दर्ज करते हुए ‘स्त्री नैतिकता का तालीबानीकरण’ विशेषांक घोषित किया और उस विशेषांक के संपादन कार्य में  अतिथि संपादक के तौर पर विमल थोरात, प्रोमिला और अपने साथ मुझे भी इस अंक का संपादक बनाया। इस अंक पर हमने लगभग पूरे साल काम किया। अंक बेहद शानदार निकला। अब यह अंक पुस्तक के रुप में आ चुका है। इसी दौरान रमणिका जी से और भी पहचान और दोस्ती हो गई। उनके साथ रहने से एक तरह की भावनात्मक और बौद्धिक सुरक्षा का अहसास रहता था।

   रमणिका जी की उम्र जरुर बढ़ रही थी पर इस बढ़ती उम्र से उनकी उर्जा, उनके आत्मविश्वास या फिर उनकी गतिविधियों में कोई फर्क आया हो ऐसा दिखाई नही देता था। उनमें रोज नए विचारों और रोज नये कार्य करने की प्रेरणा और लालसा रहती थी । रमणिका जी ने जितना लिखने-पढ़ने व अपनी पत्रिका व आंदोलन से जुडने का मौका नयी पीढ़ी को दिया उतना उन्होने अपने लेखन कार्य को भी पूरा महत्व दिया। वह नये-नये युवक-युवतियों से पहली मुलाकात में ही कह देती थी युद्धरत आम आदमी के लिए लिखो मैं छापूंगी जबकि आजकल के संपादको का यह हाल है कि वे नये लोगों के प्रति अतिरिक्त कठोर होते हैं।

    रमणिका जी दलित स्त्री और आदिवासी मुद्दो और उनके अधिकारों को लेकर बड़ी संवेदनशील थी। उनकी दलित मुद्दों की समझ बहुत स्पष्ट थी। जब कभी भी दलित गैर दलित विषय या लेखन पर विवाद हुआ तो वह निर्भीकता से अपना पक्ष रखती थी। उनकी निगाह में लेखकों की कोई जाति नही होती और कोई छोटा बडा नही था । फिर चाहे किसी ने एक कविता लिखी या चाहे किसी के चार कविता संग्रह हो वह सबको एक समान प्यार, दुलार सम्मान और अवसर देती थी। इतनी बड़ी लेखिका और एक प्रसिद्ध सम्पादक होते हुए भी स्वयं किसी को भी फोन करने में नहीं हिचकिचाती थी और बड़े अधिकार से अपनी बात मनवा लेती थी और उससे अपनी पत्रिका में छापने के लिए सामग्री ले लेती थी। उन्होंने अपने एक अपन्यास मौसी पर मुझे लेख लिखवाया था, जोकि उन्हें बहुत पसंद आया था वो हमेशा मुझे और लिखने की प्रेरणा देती थी।

अभी पिछले दिनों जब वह अपोलो में भरती थीं तो मैं बजरंग , हीरालाल राजस्थानी और सुनीता उनसे मिलने अपोलो अस्पताल गए थे। वे बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उन्हें सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी।  उन्हें ऐसी स्थिति में देखकर हम सबको दुख हुआ। बाद में जब वह जगी तो हम सबने उनके लेख, कविता, कहानी आदि पर ज्यों ही बात करनी शुरू कि तो हमें उनकी हालत हमें एकदम सुधरी हुई लगी। उन्होंने उस हालत में बड़ी खुशी से  बताया उनकी आत्मकथा आपहुदरी कोर्स में लग गई है। उन्होंने मेरे सावित्रीबाई फुले की कविताओं वाले लेख को खूब सराहा और कहा मैं उसे छाप रही हूँ। हीरालाल राजस्थानी जी ने अपनी कुछ कविताएं उनको सुनाई। रमणिका जी ने भी अपनी भी कविता सुनाई। बजरंग जी ने अपने उस लेख के बारे में बताया जो उन्होंने उनके ऊपर लिखा था और किसी अखबार में  छपा था। इतनी सारी बातों और हंसी मजाक के बीच हम सबने महसूस किया कि रमणिका जी की दवाई, उनकी ऊर्जा, उनका हिम्मत उनकी उस पढ़ाई लिखाई के वातावरण में ही है। रमणिका जी एकदम चुस्त दुरूस्त हो गई ऐसा लगा।

रमणिका फाउंडेशन से सम्मानित होती अनिता भारती

 उनके स्वभाव में जितनी सरलता थी, जितनी निश्छलता थी, उतना ही कहीं न कहीं उनके विरोधाभास भी नजर आ जाता था। कहीं से गाहे बगाहे उनके मातहत काम करने वाले वर्करों के प्रति बरती गई आर्थिक और व्यक्तिगत कठोरता भी सुनाई दे जाती थी। कभी-कभी दिखाई भी दे जाती थी । लेकिन यह भी सही है कि रमणिका जी के घर आफिस रमणिका फाउंडेशान जाने में मुझे कभी किसी तरह से झिझक, डर या असहजता महसूस नहीं हुई। वे हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करती थी और अपनी नई किताबों के प्लान में, हमेशा जुड़ने के लिए कहती थी। आज उनके न रहने पर मन दुखी है। मुझे लगता है मैंने सचमुच एक स्नेहिल व्यवहार वाली, बुद्धिमान औरत, किताबों में डूबती उतरती, नये लोगों का भरपूर अवसर देने वाली शख्सियत को खो दिया है। सच है रमणिका आंटी आप को भूलना बहुत मुश्किल है।

अनिता भारती साहित्यकार एवं सोशल एक्टिविस्ट हैं/ संपर्क:
anita.bharti@gmail.com

सृजन की ताक़त रखने वाली महिलाओं से दुनिया की संस्कृतियाँ क्यों डरती हैं !

राजीव सुमन

रजस्वला होने की उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में के प्रवेश-निषिद्ध के संदर्भ से दुनिया भर में और विभिन्न धर्मों में माहवारी को लेकर मान्यताओं की पड़ताल करता है राजीव सुमन का यह आलेख .

अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में सोशल मीडिया पर रेहाना ने अपनी एक तस्वीर पोस्ट की थी, ठीक उस समय जब वह अपनी एक दोस्त के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सबरीमला मंदिर में प्रवेश की कोशिश कर रही थीं. हालांकि, वे मुख्य द्वार तक पहुँचने में सफल रही थीं, लेकिन बाद में प्रचण्ड विरोध की वजह से उन्हें वापस होना पडा था. इस तस्वीर के पोस्ट होने के बाद से अयप्पा भक्तों में खलबली मची हुई है.इस तस्वीर में वो काले कपड़े पहनी हैं और माथे पर चन्दन का लेप है.उनके बैठने के तरीके में उनकी जांघें दिख रही हैं. आरोप है कि पुलिस को रेहाना के ख़िलाफ़ “अश्लीलता प्रदर्शित करने” वाली तस्वीर पोस्ट करने और “अयप्पा भक्तों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने” की शिकायत मिली जिसके बाद उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है. रेहाना को गिरफ्तार कर 15 दिनों के न्यायिक जांच के लिए भेजा गया. रेहाना पेशे से टेलीकॉम तकनीशियन हैं औरसरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल में काम करती हैं. साथ ही, एक मॉडल भी हैं.

यह जो घटना है, वह कोई गांधी या आंबेडकर के जमाने की नहीं है. बस दो-चार माह पुरानी है. मान्यताएं अपने समय के समाज की कमजोरियां होती हैं. खासकर, जब वह धर्म से जुडी हों. मूर्ख और भक्त में कोई ख़ास फर्क नहीं होता बस भक्त अनिवार्य रूप से मूर्ख नहीं होते जब बात धार्मिकता की नहीं हो तो. यह पूरा निरर्थक विवाद एक ऐसे समय में है जहां इसकी कोई सार्थकता नहीं थी. इस मसले में सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह सही है, पर राज्य उसे तामील कर पाने में असमर्थ साबित हो रहा है तो सिर्फ अपनी राजनैतिक दुरभिसंधियों और वोट बैंक की राजनीति के कारण. वरना सबरीमला में मौजूद मंदिर के भगवान स्वामी अयप्पा इतने भी कमजोर कुंवारे नहीं हैं कि ‘रजस्वला’ उम्र की महिलाओं के मंदिर प्रवेश कर जाने से उनका कौमार्य भंग हो जाए !

स्त्रियों पर अश्लीलता फैलाने का यह आरोप ख़ास तरह की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के संकीर्ण नजरिये की देन है. वरना कोई कारण नहीं कि थुलथुल तोंद, नंगे सीने और खुली जांघों के साथ सबरीमला मंदिर में प्रवेश करने वाले पुरुषों को अश्लील के साथ-साथ फूहड़ ना कहा जाए ! रेहाना को केवल एक सॉफ्ट टार्गेट के रूप में उन हिन्दुत्ववादी संगठनो द्वारा देखा जा रहा है जो उसे मुसलमान के रूप में देख-समझ रहे हैं, वह भी बाहर से. ‘बाहर से’ कहने का अभिप्राय है कि वे दक्षिण में रहनेवाले मुसलमानों, सबरीमाला मंदिर में जाने से पहले मस्जिद में जाने की परम्परा को या उसके ताने-बाने को उत्तर भारत के हिन्दू-मुस्लिम चश्मे से देखने की कवायद में लगे हैं और अपनी राजनितिक रोटी सेंक रहे हैं. वरना, धार्मिक एकता की मिशाल इससे बेहतर नहीं मिलती. इतना ही नहीं १९६५ में बने कानून की धारा 3 भी स्पष्ट रूप से अन्य धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को मंदिर में जाकर पूजा करने से नहीं रोकती.

सबरीमला मंदिर जाने से पहले मस्जिद जाते रहे हैं भक्त

सबरीमला के रास्ते में, स्वामी अयप्पा के मंदिर से करीब 60 किलोमीटर पहलेएक छोटा-सा कस्बा पड़ता  है इरुमलै.इरुमलै में एक भव्य सफ़ेद वावर मस्जिद है जहां रुकना सबरीमला केदर्शनार्थियों एक नियम है.

भक्तगण अयप्पा और ‘वावरस्वामी’ की जयकार करते हुए मस्जिद की परिक्रमा करते हैं और वहां से विभूति और काली मिर्च का प्रसाद लेकर ही यात्रा में आगे बढ़ते हैं. यहपरंपरा पिछले 500 साल से भी अधिक समय से चल रही है.मस्जिद कमेटी हर साल सबरीमला मंदिर से अपने रिश्ते का उत्सव मनाती है, इस उत्सव को चंदनकुकुड़म (चंदन-कुमकुम) कहा जाता है.इरुमलै में काफ़ी मुसलमान आबादी है और पहाड़ी की चढ़ाई चढ़कर थके तीर्थयात्री अक्सर आराम करने के लिए किसी मुसलमान के घर रुक जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि वावर एक सूफ़ी संत थे जो भगवान अयप्पा में गहरी श्रद्धा रखते थे. उनकी अयप्पा भक्ति इतनी मशहूर हुई कि सदियों से चली आ रही सबरीमला यात्रा में उनका ठिकाना एक पड़ाव बन गया. तो रेहाना की वजह से जो लोग हिन्दू-मुस्लिम विवाद पैदा करना चाहते हैं उन्हें न तो भारत की धार्मिक-ऐतिहासिक परम्परा का भान है और न ही सबरीमला और वावर के तानेबाने का. केरल सरकार और केरल टूरिज़्म ने इस विशिष्टता को शीर्ष महत्व दे रखा है.

सबरीमला दक्षिण का और केरल का बहुत प्राचीन तीर्थ है. सबरीमला मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में पंडालम राजवंश के युवराज मणिकंदन द्वारा कराया गया था. यहाँ सभी धर्मों के लोगों की आस्था है, स्त्रियों की भी, चाहे वो किसी धर्म के क्यों न हों. पर केवल स्त्रियों का प्रवेश वहां वर्जित है, वह भी रजस्वला धारण करने की क्षमता रखनेवाली स्त्रियों का. लेकिन यह वर्जना भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कानूनी तौर पर ख़त्म हो चुकी है.

एक पौराणिक कथा के अनुसार, अयप्पा का जन्म उस स्त्री राक्षस को हराने के लिए हुआ था जिसे कोई भी पराजित नहीं कर पा रहा था. दो पुरुष देवताओं शिव और विष्णु के संयोग से उत्पन्न अयप्पा ने उसे पराजित किया और वह राक्षसी से एक खुबसूरत स्त्री में परिवर्तित हो अयप्पा से शादी का प्रस्ताव दे बैठी. लेकिन अयप्पा ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. फिर भी बार बार प्रणय निवेदन किये जाने पर अयप्पा ने एक प्रस्ताव रखा कि वह उस दिन उससे शादी करेगा जब नए भक्त उनके यहाँ आना बंद कर देंगे..इसलिए भक्तगण किसी रजस्वला क्षमतावाली स्त्री को अयप्पा के पास नहीं आने देना चाहते. उन्हें लगता है कि वही स्त्री रूप धरकर अयप्पा को भ्रष्ट करने आ सकती है..

इसी घटना के बहाने माहवारी  से जुडी विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, परम्पराओं, रुढियों और समाजशास्त्रियों, मानव विज्ञानियों के विचारों को जानने समझने की कोशिश इस लेख के माध्यम से किया गया है. माहवारी  को लेकर दो तरह की धारणाएं वैश्विक समाज में शुरू से रही हैं. एक इसे पवित्रता और संस्कृति के उद्भव के रूप में देखता है और दूसरी धारणा इसे अशुद्धता के रूप में देखती है.

सांस्कृतिक रूप से पवित्र और शक्तिशाली है माहवारी :

रजस्वला, माहवारी  या मेंसेस को लेकर भारतीय धर्म और संस्कृति में ही नहीं वरण दुनिया की तमाम संस्कृतियों में परस्पर विरोधी विचारों का समावेश दिखलाई पड़ता है. कुछ ऐतिहासिक संस्कृतियों में माहवारी  को पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है जो मानसिक क्षमताओं में वृद्धि करनेवाला, और बीमारियों को ठीक करने में पर्याप्त सक्षम. चेरोकी जनजाति में मान्यता (चेरोकी दक्षिणपूर्वी वुडलैंड्स, अमेरिका)रही है कि माहवारी  रक्त स्त्री की शक्ति का स्रोत है और इसमे दुश्मनों को नष्ट करने की शक्ति है. प्राचीन रोम में, प्लिनी द एल्डर ने लिखा था कि एक माहवारी का स्राव करती हुई स्त्री अपने शरीर को अनावृत करती है तो वह गड़गड़ाहट, वायुमंडल में बिजली की कड़क को डरा सकती है. अगर वह नग्न होकर मैदान के चारों ओर घूमती है, तो इल्लियाँ,कीड़े-मकोड़े और झींगुर मकई के खेत से भाग जाते हैं. कई परम्पराओं में रजस्वला नंगी स्त्रियों के नाच से बारिश होने की मान्यता है..

माहवारी  रक्त को पुरुषों की शक्ति के लिए विशेष रूप से नुकसानप्रद माना जाता है. अफ्रीका में, माहवारी  रक्त का उपयोग सबसे शक्तिशाली जादू टोने में किया जाता है. शुद्धि और विध्वंस दोनों रूपों में. माया सभ्यता के पौराणिक आख्यानो में माहवारी  की उत्पत्ति को वैवाहिक संबंधोंको नियंत्रित करने वाले सामाजिक नियमों के उल्लंघन करने की सजा के रूप में दिखाया गया है. माया चंद्रमा देवी के पुनर्जन्म होने से पहले काला जादू टोन में माहवारी के रक्त सांप और कीड़ों में बदल जाते हैं.

जहां महिलाओं के मासिक रक्त को धर्म से जोड़ा जाता है वहाँ विश्वास यह है कि इसे अलग रखा जाना चाहिए. इस तर्क के अनुसार, जब यह पवित्र रक्त अपवित्र चीजों के संपर्क में आता है तब यह खतरनाक रूप से ‘अशुद्ध’ हो  जाता है. ऐसा माना गया है कि मासिक स्राव करती हुई स्त्री खतरनाक होती है.

कई पारंपरिक धर्म माहवारी  को धार्मिक रूप से अशुद्ध मानते हैं, हालांकि मानवविज्ञानी बताते हैं कि ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ की अवधारनाएं गहराई से जुडी हुई हैं.विभिन्न संस्कृतियां माहवारी  को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखती हैं. पश्चिमी औद्योगिक समाजों मेंमाहवारी  के बारे में कई आचरण नियमो, मानदंडों और बात-व्यवहार में यह विश्वास जताया गया है कि माहवारी  को गोपनीय रखा जाना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत,  प्राचीन काल में कई शिकारी-समूह समाजों में, विशेष रूप से अफ्रीका में, माहवारी को बहुत सकारात्मक रूप से स्वीकार किया गया है वह भी बिना किसी तरह की अशुद्धता का भावार्थ रखे.

“मेन्स्ट्रूऐशन” (माहवारी ) शब्द व्युत्पतिपरक रूप से “मून” (चन्द्रमा) से संबंधित है.”मेन्स्ट्रूऐशन” (माहवारी )और “मेंसेस” (मासिक)शब्द लैटिन मेन्सिस (महीना) से व्युत्पन्न हुए हैं, जो ग्रीक भाषा में “मेने” (मून) (चन्द्रमा) और अंग्रेजी शब्दों के ”मंथ” (महीना) और “मून”(चंद्रमा)से जुड़ते हैं.

स्त्री का माहवारी और चंद्रमा की गतिकी का संबंध मिथकों और परंपराओं में एक आनुष्ठानिक आदर्श के रूप में पूरी दुनिया में व्यापक रूप से मान्य है. प्राचीन संस्कृतियों में ऐसा विचार है कि माहवारी  व्यापक ब्रह्मांडीय गतिकी के ताल की साम्यता के साथ होता है या उसे होना चाहिए.यह विचार दुनिया भर के पारंपरिक समुदायों के मिथकों और अनुष्ठानों के केंद्र में सबसे दृढ़ विचारों में से एक है. प्राचीन पौराणिक कथाओं के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक जो माना जाता है वह क्लाउड लेवी-स्ट्रॉस का थाजोएक फ्रांसीसी मानवविज्ञानी और नृवंशविज्ञानी थे जिनका महत्वपूर्ण काम‘संरचनात्मकता’ और ‘संरचनात्मक मानव विज्ञान’ के सिद्धांत के विकास में था औरजिन्हें “आधुनिक मानव विज्ञान के पिता” के रूप में जाना जाता है, का निष्कर्ष था किएक साथ उत्तर और दक्षिण अमेरिका के मूल मिथकों में पुरुषों की चिंता व्यक्त हुई

 कि जब तक कि महिलाओं के माहवारी  की  अवधि की सावधानीपूर्वक निगरानी नहीं की जाती और ब्रह्माण्ड की गतिकी के साथ नहीं होता, ब्रह्मांड के अराजकता की स्थिति में आने की संभावना बनी रहेगी.

कई पारंपरिक समाजों-संस्कृतियों में प्राकृतिक घटनाओं-ज्वार भाटा,चंद्र गति,मौसमी अवधि औरमाहवारी को एक आदर्श साम्य और लय की संकल्पना के रूप में देखा जाता है जो अपने उच्चतम और समग्र सद्भाव लय में होने पर ऐसा माना जाता है कि आध्यात्मिक शक्ति और प्रजनन क्षमता प्रदान करता है. चन्द्रमा का समय और मासिक चक्र के समय के सम्बन्ध में कई गहन साम्य हैं. बारीक निरिक्षण से चन्द्रमा की एक पूरी गति और माहवारी  के स्राव का समय नियत है (29.1-29.5).

नृतत्व विज्ञानी बकली और गॉटलिब के ‘पार-सांस्कृतीय अध्ययन’ से पता चलता है कि, माहवारी  के बारे में समाज में जो टैबू  है वह लगभग सार्वभौमिक है. इनमें से कई में ‘अशुद्धता की अवधारणाएं’ शामिल हैं तोकई माहवारी  परंपराएं “एकदम अलग, यहाँ तक कि अर्थों और प्रयोजनों में विपरीत अर्थ देने वाली हैं.” कुछ पारंपरिक समाजों में, माहवारी के कर्मकांडी अनुष्ठानो के पीछे यह पाया गया है कि महिलाएं इससे आनंदित होती हैं क्योंकि इसके बहाने वे पुरुषों से कुछ दिनों दूर रहती हैं, अनचाहे यौन संबंधों, घरेलु दबाओं और कामों से. यह एक तरह से इन सब चीजों से महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करता है और उन्हें मजबूत बनाता है.

नृतत्व विज्ञानी वेन मैग्गी द्वारा एक जीवंत उदाहरण प्रदान किया गया है, जो कलशा घाटी (उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान) में महिलाओं की सामुदायिक बशली (सामूहिक बड़ामाहवारी  गृह) को उनके ‘सबसे पवित्र स्थान’ के रूप में वर्णित करता है, जो पुरुषों द्वारा सम्मानित हैऔर महिलाओं द्वारा सभी स्त्री जरूरतों के रख-रखावके एक ऐसे केंद्र के रूप में विकसित है जहां बहनापा और शक्ति की एकजुटता प्रदर्शित हो सके. एक सांस्कृतिक विकासवादी शोधवृति समवायके मुताबिक, माहवारी  के रक्त को समय-समय पर पवित्र रूप से चिह्नित करने के विचार को महिला हितों द्वारा अपने हित में स्थापित किया गया था, हालांकि बाद में, मवेशी स्वामित्व और पितृसत्तात्मक शक्ति के उदय के साथ, वही मान्यताएं औरटैबू महिलाओं के उत्पीड़न को तेज करने के लिए धार्मिक मठाधीशों द्वारा उपयोग किया गया था.

सांस्कृतिक सिद्धान्तकारों, खासकरअमेरिका की 78 वर्षीया जूडी ग्रान जिनका लेखन स्त्रीवाद और समलैंगिकता पर रहा है, का मानना है कि ‘मेटाफॉर्मिक सिद्धांत’ (वर्तमान समय की भौतिक संस्कृति का विस्तार प्राचीन माहवारी  संबंधी अनुष्ठानों में निहित है, जिसे “मेटाफॉर्म” कहा जाता है. मेटाफॉर्म माहवारी  से संबंधित उभरते ज्ञान को शामिल करने के लिए बनाई गई अनुष्ठान, संस्कार, मिथक, विचार, या कहानियां हैं.)संस्कृति के निर्माण में और मनुष्यों के सबसे शुरूआती अनुष्ठानों के रूप में माहवारी केंद्रीय व्यवस्थापक विचार के रूप में महत्व रखता है.

समाजशास्त्री एमाइल दुर्खेम (Emile Durkhem)का तर्क है कि मनुष्य का धर्म पूरी तरह से माहवारी  के संबंध में उभरा है. उनका कहना है कि एक निश्चित प्रकार की कार्रवाई-सामूहिक आनुष्ठानिक कार्रवाई- अलग-अलग मानव भाषा और विचार के अलावा एक साथ टोटेमवाद, कानून, विजातीय संबंध और नातेदारी स्थापित कर सका.यह सबकुछ शुरू हुआजब रक्त के प्रवाह ने समय-समय पर लिंगों के बीचके संबंधों को तोड़ दिया. ‘द नेचर एंड ओरिजिन ऑफ़ टैबू’में दुर्खेम लिखते हैं कि  ‘सभी रक्त भयानक हैं’,  ‘और इसके साथ संपर्क रोकने के लिए सभी प्रकार के टैबूकी शुरुआत हुई’.माहवारी  के दौरान, मादाएं ‘एक प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई का प्रयोग करती हैं जो अन्य लिंग को उनसे दूर रखती है’.यह वही खून महिलाओं और जानवरों की नसों के माध्यम से समान रूप से चल रहा था, जो ‘टोटेमिक’-भाग-मानव, भाग-पशु-पूर्वज के प्राणियों में रक्त की अंतिम उत्पत्ति का सुझाव देते थे. एक बार जबमाहवारी का रक्त संबंध शिकार के रक्त से जोड़ दिया गया, तब शिकारी के लिए कुछ जानवरों का सम्मान करने के लिए तर्कसंगत रूप से संभव हो गया जैसे कि वे अपने रिश्तेदार थे, यह ‘टोटेमवाद’ का सार है. समूह के साझा रक्त के भीतर इनके’भगवान’ या ‘टोटेम’ का निवास था, ‘जिससे यह पता चलता है कि रक्त एक दिव्य चीज है.जब यह खत्म हो जाता है, भगवान खत्म हो रहा है’.

विभिन्न धर्मों में स्त्रियों के मासिक रक्त स्राव की मान्यताएं और विचार:

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म (थेरावाद या हीनायन) में माहवारी  को “एकप्राकृतिक शारीरिक उत्सर्जनकी क्रिया के रूप में देखा जाता है जिसमे महिलाओं को हर महीनेजाना पड़ता है, इससे कुछ भी कम या ज्यादा के रूप में नहीं”. इस अर्थ में बौद्ध धर्म में इसमे किसी भी तरह का मूल्य आरोपित नहीं किया गया है. न शुद्धता-अशुद्धता का और न ही पवित्रता-अपवित्रता का. हालांकि, जापान में बौद्ध धर्म की कुछ शाखाओं में, माहवारी  के दौरान महिलाओं को मंदिरों में भाग लेने से प्रतिबंधित करता है. निचरेन बौद्ध धर्म (जापान) में माहवारी  को धार्मिक अभ्यास में आध्यात्मिक बाधा नहीं माना जाता है,हालांकि माहवारी  वाली महिला अपनी सुविधा और आराम के लिए धार्मिक अनुष्ठानों में जाने या नहीं जाने का वरन सकती है।

ईसाई धर्म
अधिकांश ईसाई सम्प्रदायों में माहवारी  से संबंधित किसी भी विशिष्ट अनुष्ठान या नियमों का पालन नहीं किया जाता है. कुछ सम्प्रदायों में ‘लेविटीस’ के पवित्रता संहिता खंड में निर्धारित नियमों का पालन माहवारी  के संबंध में किया जाता है. यहकुछ हद तक यहूदी धर्म के अनुष्ठान “निदाह”(Niddah) के समान हैं.कुछ चर्च के पादरी ने अशुद्धता की धारणा के आधार पर महिलाओं के बहिष्कार करने का बचाव किया. अन्य पादरियों का मानना है कि पुराने नियम के हिस्से के रूप में शुद्धता कानूनों को त्याग दिया जाना चाहिए.

माहवारी में नेपाली महिलायें एकांतवास को विवश की जाती हैं

परम्परावादी चर्च
पूर्व के अधिकाँश रूढ़िवादी चर्च के कई अधिकारियों और ओरिएंटल रूढ़िवादी चर्च (जिसे रूसी, यूक्रेनी, यूनानी और भारतीय रूढ़िवादी चर्च भी कहा जाता है) के कुछ हिस्सों सहित रोमन कैथोलिक चर्च से अलग कुछ ईसाई संप्रदायों ने महिलाओं को सलाह दी कि वे समुदाय के साथ माहवारी  की अवधि के दौरान समागम न करें.
रूढ़िवादी चर्च के कंज़र्वेटिव / परंपरावादी सदस्य माहवारी  के दौरान पवित्र कम्युनियन से दूर रहने की प्राचीन प्रथा का पालन करते हैं.ग्रीस, रूस और अन्य ऐतिहासिक रूप से रूढ़िवादी ईसाई देशों में यह काफी आम अभ्यास है.हालांकि, ज्यादातर गैर-रूढ़िवादी देशों में- खासकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका में-महिलाओं की अधिसंख्य आबादी इस प्राचीन मान्यता का अभ्यास नहीं करती है,हालांकि कुछ संख्या ऐसी महिलाओं की है जो इस प्रथा को अभी भी मानती हैं.

हिन्दू धर्म
हिंदू धर्म में, माहवारी  महिलाओं को परंपरागत तौर पर अनुचित रूप से अशुद्ध मानता है और इस दौरान के कुछ सख्त नियमों के पालन का आदेश देता है. माहवारी  के दौरान, महिलाओं को “रसोई और मंदिरों में प्रवेश करने”, फूल पहनने, श्रृंगार करने,यौन संबंध रखने या अन्य पुरुषों या महिलाओं को छूने की मनाही करता है. महिलाएं खुद को अशुद्ध, संक्रमित और प्रदूषित के रूप में देखें और स्वयं को अलग-थलग रखें. लेकिन इसी हिन्दू धर्म में शक्ति की पूजा के रूप में आसाम के कामख्या मंदिर में मासिक रक्त को देवी के प्रसाद के रूप में देखा जाता है और इसका उत्सव मनाया जाता है.भारत के असम में जून में आयोजित वार्षिक प्रजनन त्योहार अंबाबाची मेला के दौरान पृथ्वी का माहवारी  मनाया जाता है. अंबुबाची के दौरान, कामख्या मंदिर में देवी कामख्या के वार्षिक माहवारी  की पूजा की जाती है.

इसलाम
माहवारी  के दौरान, महिलाओं को इबादत या प्रार्थना करने से मनाही है, रमजान का उपवास नहीं करना चाहिए. माहवारी  के दौरान तीर्थयात्रा की अनुमति है किन्तु काबा की परिक्रमा निषिद्ध है. माहवारी  की अवधि के दौरान उन्हें विशेष सम्मान और मान दिया गया है. उन्हें किसी भी महत्वपूर्ण उद्देश्य के बिना मस्जिद की प्रार्थना स्थल में प्रवेश नहीं करने की सलाह दी जाती है, लेकिन उन्हें मुसलमानों की सभा और त्यौहारों ईद में उपस्थित होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इस अवधि के बाद, एक स्नान (गुस्ल)जरुरी है. कुरान की पारंपरिक इस्लामी व्याख्या एक महिला की माहवारी  अवधि के दौरान संभोग को रोकती है, लेकिन भौतिक अंतरंगता को नहीं.

यहूदी धर्म
यहूदी धर्म में, माहवारी  के दौरान एक महिला को “निदाह”(Niddah) कहा जाता है और कुछ कार्यों से इस दौरान उन्हें प्रतिबंधित किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, यहूदी “तोराह”(Torah)(यहूदी धर्म में ‘तोराह’ कई अर्थों की एक श्रृंखला लिए हुए है.किन्तु सामान्य रूप से तनख की 24 पुस्तकों की पहली पांच किताबों (पेंटाटेच) से इसका मतलब किया जाता हैजो आमतौर पर रब्बीनिक टिप्पणियों के साथ मुद्रित होती हैं. इन सभी अर्थों के लिए तोराह में यहूदी लोगों की उत्पत्ति जिसमें नैतिक और धार्मिक दायित्वों के एक समूह में शामिल जीवन का एक तरीका और नागरिक कानूनशामिल है.) माहवारी  वाली महिला के साथ यौन संभोग को रोकता है. “निदाह” का अनुष्ठान बहिष्कार माहवारी  के दौरान और उसके बाद लगभग एक सप्ताह तक उस महिला पर लागू होता है, जब तक कि वह खुद को एक ‘मिक्वाह’(Mikvah) ( एक तरह का आनुष्ठानिक स्नान) से पवित्र न कर ले, जो मूल रूप से केवल विवाहित महिलाओं पर लागू है. इस दौरान, एक विवाहित जोड़े को यौन संभोग और शारीरिक अंतरंगता से बचना चाहिए. रूढ़िवादी यहूदी धर्म इस अवधि के दौरान महिलाओं और पुरुषों को एक-दूसरे को छूने या चीजों के आदान-प्रदान से रोकता है. रूढ़िवादी यहूदी इस नियम का पालन आज भी करते हैं, जबकि इसी धर्म की अन्य शाखाओं के अधिकाँश यहूदी इन मान्यताओं को नहीं मानते.तोराह की तीसरी किताब ‘लेविटीस’और ओल्ड टेस्टामेंट में माहवारी स्त्रियों को धार्मिक रूप से अशुद्ध माना जाता है – “जो भी उसे छूता है वह शाम तक अशुद्ध रहेगा” (नया अंतर्राष्ट्रीय संस्करण).माहवारी  वाली महिला को छूना, उस वस्तु को छूना जिस पर वह बैठी या लेटी थी या उसके साथ संभोग करने से भी व्यक्ति धार्मिक रूप से अशुद्ध हो जाता है. आधुनिक यहूदी धर्म में इन नियमों को किस हद तक माना जाता है वह उसकी रूढ़िवादिता पर निर्भर है.

बहाई विश्वास
बहाई विश्वास के संस्थापक बहाउलह, किताब-ए-अकदास में लोगों और चीजों की आनुष्ठानिक अशुद्धता के सभी रूपों को नकारते हुए स्वच्छता और आध्यात्मिक शुद्धता के महत्व पर बल दिया.माहवारी  वाली महिलाओं को प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया और उपवास करने की व्यर्थता को बताया. प्रार्थना की जगह कविता पढ़ने के लिए (स्वैच्छिक) विकल्प दिया.

जैन धर्म
कई महत्वपूर्ण जैन ग्रंथों में महिला के माहवारी  को अशुद्ध माना गया है. ऐसा माना गया है कि माहवारी  में होने वाला रक्तस्राव शरीर के भीतर सूक्ष्म जीवों को मारने के लिए होता है, जिससे मादा शरीर नर शरीर के मुकाबले कम हिंसक बन जाता है. हालांकि,इस विचार में कोई वैज्ञानिकता नहीं है. जैन धर्म महिलाओं को माहवारी  के दौरान खाना बनाने या मंदिर में जाने की इजाजत नहीं देता है.

शिंतो धर्म
जापान के समाज में, शिंटो धर्म आज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.“कामी” (Kami),वे आत्माएं या घटनाएं हैं जिन्हें शिंटो धर्म में पूजा जाता है. वे भूमि के तत्व, प्रकृति की ताकतों के साथ-साथ प्राणियों और गुणों को व्यक्त कर सकने वाले कुछ भी हो सकते हैं; वे मृत व्यक्तियों के आत्मा भी हो सकते हैं. कई कामी को पुराने कुलों के प्राचीन पूर्वज माना जाता है. शिंतो धर्म में ऐसी मान्यता है कि ये कामी आपकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं करेंगे यदि आपके वस्त्र पर रक्त के निशान, गंदगी या मृत्यु का अपराध किया है.माहवारी  पूरी तरह से खून नहीं है, यह प्राचीन जापान को पता नहीं था. नतीजतन, माहवारी  की महिलाएं को माहवारी  की अवधि के दौरान किसी भी कामी मंदिरों में जाने की अनुमति नहीं थीं. आज भी, महिलाओं को माहवारी  के दौरान शिंतो समाधियों और  मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत नहीं है. कुछ मामलों में, महिलाओं को ‘अशुद्धता’ के कारण पवित्र पहाड़ों के शीर्ष पर चढ़ने से पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. इसके अलावा, इस परंपरा को इस विश्वास में कुछ हद तक जीवित रखा जाता है कि गर्भाशय के अन्दर से निकालने वाला स्राव एक प्रकार की मौत है.जापान को इतना साफ-सुथरा और घरों को स्वच्छ रखने के पीछे कामी के इस  सिद्धांत को कारण के रूप में देखा जा सकता है.

सिख धर्म
सिख धर्म में, महिला को मनुष्य के बराबर दर्जा दिया जाता है और मनुष्य के रूप में शुद्ध माना जाता है. सिख गुरु सिखाते हैं कि कोई अपने शरीर को धोकर शुद्ध नहीं हो सकता है. मन की शुद्धता असली शुद्धता है. उन्हें शुद्ध नहीं कहा जाता हैजो केवल अपने शरीर को धो लेने मात्र को शुद्ध समझ लेते हैं. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानाक ने माहवारी  के दौरान महिलाओं को अशुद्ध मानने की प्रथा की निंदा की.
सिख धर्म में भगवान के नाम पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है. आपके कपड़े खून से सने हों, या नहीं हों.चाहे माहवारी  के रक्त से दागदार हो, ये बातें आध्यात्मिक महत्व के नहीं हैं. इस प्रकार, माहवारी  के दौरान किसी महिला पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है. वह गुरुद्वारा जाने, प्रार्थनाओं में भाग लेने और सेवा करने के लिए स्वतंत्र है.
 स्त्रियों के माहवारी  को लेकर इन भिन्न और परस्पर विरोधी विचार रखने वाले धर्मो, सम्प्रदायों, समाजों ने मूलतः स्त्रियों को काबू में रखने और पितृसत्ता को मजबूत और सुचारू बनाए रखने की कवायद में ही इस तरह के रीती-रिवाजों को ज़िंदा रखा हुआ है. किन्तु आधुनिक समय में इसका विरोध एक आन्दोलन और सामूहिक प्रतिरोध में देखा जा सकता है. हम देखते हैं कि 1970के दशक से, विभिन्न कला रूपों ने माहवारी  के विषय को छूना और अपने शो में शामिल करना शुरू दिया था.कुछ कलाकारों, लेखकों और कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी ने स्त्रियों के माहवारी  टैबू को एक उत्सव में परिवर्तित कर दिया था.स्त्री मुक्ति आंदोलनो के साथ मिलकर, जुडी शिकागो के “रेड फ्लैग” आर्टशो ने राजनितिक और सांस्कृतिक रुढ़िवादियों पर करारा प्रहार किया. इस शो में “एक महिला खून से सना टैम्पन अपनी योनि के भीतर से हाथ सेपकड़कर निकाल रही है’. जूडी शिकागो का 1971 का यह कला दृश्य उस वक़्त आलोचना के केंद्र में था. इसने महिलाओं के प्रति और खासकर माहवारी  के दौरान महिलाओं के एलियनेशन और उनके साथ क्रूरता और भेदभाव पर कठोर चोट किया. 1970 के दशक का “रेड फ्लेग” शायद पहला कला रूप था जिसने इतनी कठोरता के साथ इस मुद्दे को उठाया था. जूडी शिकागोदुनिया की सबसे अग्रणी नारीवादी कलाकारों में थीं जिन्होंने, 1998 में इसका प्रिंट शिकागो के म्यूजियम ऑफ़ मेंसट्रूएशन को दान करदिया. उनकी कुछ अन्य कलाकृतियां ‘डिनर पार्टी’,  ‘बर्थ प्रोजेक्ट’, ‘होलोकॉस्ट प्रोजेक्ट’ और ‘मेन्सट्रूएशन बाथरूम’ हैं जो स्त्री के माहवारी  और सामाजिक-सांस्कृतिक टैबू के खिलाफ एक कला आन्दोलन को मजबूत करता है.

“इस रक्त को बहने दें, मासिक रक्त का कलात्मक पुनरुत्थान” थीम से कई प्रदर्शन उस दौरान हुए जो ज्यादातर स्त्रियों के शारीरिक अनुभव के साथ थोपे गए सामाजिक टैबू को कम करने का प्रयास था.वर्तमान में एक कलाकार एच प्लेविस ने अपनेमाहवारी  रक्त को एकत्र कर उसे जेली के साथ मिश्रित किया और इसे एक खरगोश की शक्ल दिया.वह कहती हैं,”मैंने सोचा कि जेली एक अच्छा पदार्थ है क्योंकि यह मुझे अपनी माहवारी  में प्लाज्मा की याद दिलाता था,”. प्लेविस के लिए, उसका खून कला का एक टुकड़ा बन गया था. उनके एक शो “कर्नेस्की’ज इनक्रेडिबल ब्लीडिंग वीमेन”जो ‘माहवारी  जादू है’ के थीम पर खेला गया शो था, उसमें यह ‘खरगोश’ भी शामिल था.

न्यू ब्लड: थर्ड वेव फेमिनिज्म एंड द पॉलिटिक्स ऑफ मेनस्ट्रूशन कीलेखिका क्रिस बॉबेल कहती हैं, “आम तौर पर, माहवारी  आन्दोलन माहवारी  की शर्मिंदगी का प्रतिरोध करने और ज्ञान एवं देखभाल करने के विकल्पों के  विस्तार का प्रयास करती है.” उनका मानना ​​है कि कला परिवर्तन शुरू करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है.इस तरह की कला उत्तेजक रूप से दर्शकों को माहवारी  के बारे में उनकी धारणाओं और सामाजिक टैबू को चुनौती देती है. यह शक्तिशाली कला है औरउन मान्यताओं को खारिज करता है जो समाज में माहवारी  के बारे में प्रचलित है.माहवारी  एक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन इसका अर्थ भेदभावपूर्ण है और क्योंकि यह काफी हद तक महिलओं का अनुभव है, उसे मूल्यहीन समझ लिया गया है.कार्नेस्की का मानना ​​है कि कला और उसकी उपसंस्कृति माहवारी  से जुडी चुनौतीपूर्ण मानदंडों के लिए महत्वपूर्ण हैं.“महिलाओं के रूप में, हमने एक ऐसी दुश्मन संस्कृति को अपनाया हुआ है जो स्त्रियों से नफ़रत करता है, जिसने माहवारी  को निषिद्ध किया हुआ है और जो कहता है कि यह गंदा है.हमें अपने इस सम्मान को पुनः प्राप्त करना बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शरीर के सबसे शक्तिशाली चीजों में से एक है और हमें इसका जश्न मनाना  चाहिए. “

अंत में, हमें प्रख्यात नारीवादी सुसान बी एंथनी के इस सैद्धांतिकी से सहमति रखते हुए लड़ाई को जारी रखने की जरुरत है, जिसमे वह लोकतन्त में स्त्री और पुरुष के लिए दोटूक संबंधो की बात करते हुए कहती हैं, “पुरुष, उसके अधिकार, और इससे ज्यादा कुछ नहीं, स्त्री,उसके अधिकार, और इससे कम कुछ नहीं”. हमें भी इसी फ्रेम में स्त्री मुद्दों के साथ आगे बढ़ना चाहिए.

सन्दर्भ सूची:
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3. Delaney, Janice, Mary Jane Lupton, and Emily Toth. The Curse: A Cultural History of Menstruation. New York: E. P. Dutton, 1976.
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6.  Knight, Chris. Blood Relations: Menstruation and the Origins of Culture. New Haven, Conn.: Yale University Press, 1991.
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10. Ruether, Rosemary Radford. “Women’s Body and Blood: The Sacred and the Impure.” In Through the Devil’s Gateway: Women, Religion, and Taboo, edited by Alison Joseph. London: SPCK, 1990.
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15. DharmacariJnanavira, “A Mirror for Women? Reflections of the Feminine in Japanese Buddhism”Western Buddhist Review4, retrieved 28 May 2006.
16.  “Should cloth be reckoned impure if blood-stained, How may minds of such be deemed pure, who suck the blood of mankind? Says Nanak: With a pure heart and tongue God’s Name you utter: All else is worldly show, and false deeds.” (Guru Granth Sahib Ji, pg. 140).
17.  Knight, C. (1995). Blood relations: Menstruation and the origins of Culture. London & New Haven: Yale University Press. p. 443. Re-drawn after Wright, B. J. (1968). Rock Art of the Pilbara Region, North-west Australia. Canberra: Australian Institute of Aboriginal Studies. fig. 112.

राजीव सुमन स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल के सदस्य हैं.

क्या आप छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद मिनीमाता को जानते हैं?

ज्योति प्रसाद

कुछ ही हफ़्ते बाक़ी हैं इस देश के लोकतंत्र के चुनावों में. मीडिया से लेकर देश का छोटे से छोटा चौक तमाम तरह की चर्चाओं से गरम है. राजनीति के नाम पर मुंह पर रूमाल रख लेने वाले भी अपने विचारों को साझा करने से नहीं हिचकिचा रहे. सबके अपने अपने मत और तर्क हैं. सभी लोगों के अपने मूल मुद्दे हैं जिनसे टीवी का टीआरपी वाला मीडिया बेख़बर है. लेकिन इस देश की आम औरत और आम आदमी अपने मुद्दे जानते हैं.

मिनीमाता

वह बड़ा ही साहसी दिन होगा जब आधी आबादी का दृढ़ निश्चय, इतिहास में जबरन घुसकर अपने हिस्से के मिलते-जुलते चरित्रों को खींच लाएगा. अपनी मज़बूत ज़मीन को समझेगा. ऐसा होना चाहिए. ऐसा होना होगा. ऐसा हो रहा है. किसी ‘प्लेटोनी’ और ‘अरस्तुनी’ के दिमागों की चर्चा तो हुई होगी कभी. उनके ख़याल भी तो होंगे कि राज्य कैसा हो और इसका शासन कैसे चलाया जाए?

क्या हर बात जाने भी दो यारों से ख़त्म करने की कोशिश की जाए? जवाब है –“नहीं, कतई नहीं!” जिंदा जलाए जाने पर भी औरतों की नस्ल ऐसी है कि मैदान में बराबर टिकी हुई है. आज भी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है. अंग्रेज़ी की बहुत ही चर्चित फ़िल्म “किल-बिल-2” (2004) में एक ग़ज़ब का दृश्य है. कई लोगों को वह गप भी लगता है. उस दृश्य में बदला लेने वाली औरत को ज़मीन में दफ्न कर दिया जाता है. लेकिन वह औरत ज़मीन को फाड़कर बाहर आ जाती है. उसी रात को एक कैफे में जाकर एक गिलास पानी मांगती है. कहने को तो यह दृश्य एक एक्शन फ़िल्म का दृश्य मात्र है लेकिन अगर औरताना जिजीविषा के बरक्स इस दृश्य को देखे तो औरतें इतिहास में इसी तरफ अपनी कब्रों से बाहर आती रही हैं.

बात अगर राजनीति के संदर्भ में हो तो आज भी भारत में 33 प्रतिशत आरक्षण की आवाज़ बुलंद है. पच्चीस-छब्बीस बरसों में 33 प्रतिशत आरक्षण औरतों को नहीं मिल पाया है. भले ही यह एक असफलता हो पर जो बात-बार की जाती वह वास्तव में वह गूंज बन जाती है. गूंज की ख़ासियत यह है कि वह ज़रा देर से मरती, पर अपने को दोहराना नहीं छोड़ती. इसलिए राजनीति में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की मांग एक गूंज बन चुकी है, जो मर नहीं रही है.

घर और ख़ासतौर से रसोईघर की रौनक मान ली गई औरतों के पांव जब राजनीति गलियारों में पड़े तो ऐसा नहीं रहा कि उनका सफ़र आसान रहा हो. उन्हें उतने ही भयानक और तीखे हमलों से गुज़ारना पड़ा जो हवा में ग़ायब हो गए और कुछ अनुभव तो दर्ज़ भी नहीं हो पाए. उन्हीं महिलाओं और उनसे जुड़ी कुछ बातों को इस साल के लोकसभा चुनावों में जानना बेहद ज़रूरी और दिलचस्प होगा.

छत्तीसगढ़ की मिनीमाता

‘न्यूटन’ फिल्म सन् 2017 में रिलीज़ हुई थी. यह फ़िल्म भारतीय लोकतंत्र के उन राज्यों की स्थिति दिखाती है जिसे टीवी और फ़िल्मों की दुनिया ने सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘झींगा लाला’ शब्दों में तब्दील कर दिया है. भारत में इन राज्यों को रेड बेल्ट कहकर भी पुकारा जाता है. छत्तीसगढ़ ऐसा ही राज्य रहा है. दूर दिल्ली से इन राज्यों की भरी-पूरी विरासत का अंदाज़ा तमाम तरह के राष्ट्रीय पुरस्कारों के दौरान ही पता चलता है. सन् 1913 में जन्मी मिनीमाता इसी तरह की ख़ास शख्सियत थीं. उनका असली नाम मीनाक्षी देवी था. उनके जन्म का क्षेत्र असम राज्य है. पर उनकी कर्म-भूमि छत्तीसगढ़ प्रदेश रहा.

सन् 1952 में पहली बार लोक सभा सदस्य बनने वाली मिनीमाता को जनता के बीच राजमाता भी कहा जाता था. 1952 के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1957, 1962, 1967, और 1971 के वर्षों में वे लगातार जीत दर्ज़ करते हुए सासंद बनती रहीं और अपने काम को करती रहीं. समाज में में उनकी छवि लोकप्रिय नेत्री की रही. उनके नाम से छत्तीसगढ़ में कई सरकारी स्थलों और छात्रवृत्तियों के नाम हैं. एक अच्छी नेत्री या बेहतर नेता किसी पार्टी विशेष का नहीं होता. इसलिए मिनीमाता को कांग्रेस पार्टी से जोड़कर और उनके कामों का सही विश्लेषण न करके उनके साथ नाइंसाफी कर सकते हैं.

उनके बारे में गूगल की दुनिया में काफी लेख और यूट्यूब पर गीत भी मिल जाएंगे. उनके बारे में ऑनलाइन दुनिया काफी कुछ बताती है कि उन्होंने उन तमाम लोगों के लिए काम किया जिन्हें अभी तक सही सम्मान हासिल नहीं हुआ है. अस्पृश्यता विधेयक को संसद में पास करवाने में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा. गैर-बराबरी को उन्होंने समझा कि यह किसी भी समाज के लिए कितना घटक है और उसे ख़त्म करने में वह लगातार काम करती रहीं. उनके कामों में ममतामयी छवि के चलते ही उन्हें मिनीमाता कहकर पुकारा गया है. किसी व्यक्ति के काम ही उसके व्यक्तित्व के बारे में अधिक बताते हैं.  

छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद

यह एक और विशेषता है कि औरत जब राजनीति में आती है तो अपने साथ वह किसी दूसरे के दर्द को समझने का हुनर भी साथ लाती है जिसे उसकी ज़ात ने हजारों साल से जीया है. मिनीमाता का कुछ ऐसा ही चरित्र था. कई उल्लेखनीय लेखों से यह जानकारी मिलती है कि उनका राजधानी दिल्ली में जो घर था वह सांसद का घर कम बल्कि आश्रम ज़्यादा था. क्या आज के युवा नेताओं और महिला नेताओं को यह नहीं सीखना चाहिए जो नेता बन जाने पर अपनी ज़मीन और लोगों से कटकर बैठे रहते हैं.   

एक विमान हादसे में इनकी मृत्यु सन् 1972 में हुई. यह राजनीति में किसी अहम् स्थान का असमय शून्य होने जैसा था. इन्हों बहुत कम वक़्त में बड़ा चरित्र बनाया. अपने कामों से राजनीति में वह जगह बनाई जो आगे आने वाले समय में बहुत लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है. 

ज्योति प्रसाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, समसामयिक मुद्दों पर लिखती हैं. 

महिला विधायक पुरुष विधायकों से विकास करने में 21 ही साबित होती हैं!

यूं तो विकास की बागड़ोर पूरी दुनिया में पुरुषों के हाथों में हैं, लेकिन शोध बताते हैं की विकास के मामले में भी महिलाएं पुरुषों को काफी पीछे छोड़ दे रही हैं. और यह तो तब है जबकि राजनीति को पुरुषों का कार्यक्षेत्र समझा जाता है. महिलाओं के पास बहुत कम व सीमित राजनीति अनुभव के बावजूद भी वे इस क्षेत्र में पुरुषों को बड़ी चुनौती दे रही हैं.

हाल ही में यूनाईटेड नेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’ की एक रिपोर्ट सामने आई है. 2018 में हुए इस शोध में सामने आया है भारत में महिला विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा आर्थिक विकास हुआ है. यह शोध महिला विधायकों को चुनने के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करने के लिए किया गया था. ताकि आर्थिक विकास पर एक नेता के लिंग के कारण पड़ने वाले प्रभावों की जांच की जा सके.

इस शोध में 1992 से 2012 के बीच के 4,265 राज्य विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया गया था. शोध में जिन चार विधानसभा चुनावों को लिया गया है, उस दौरान चुनाव जीतने वाली महिला विधायकों की संख्या लगभग साढ़े चार फीसदी से बढ़कर आठ फीसदी हो गई थी. इस अध्ययन में महिला और पुरुष विधायकों के कामों को भ्रष्टाचार, कार्यकुशलता, योजनाओं को लागू करना आदि बिन्दुओं के माध्यम से परखा गया है.

यूनाईटेड नेशन यूनिवर्सिटी के ‘वर्ल्ड इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’ की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि महिलाओं और पुरुषों के निर्वाचन क्षेत्रों के बीच विकास में एक चौथाई का अंतर है. नासा द्वारा ली गई तस्वीरों में पता चला था कि महिला विधानसभाओं में न सिर्फ बिजली का प्रसार पुरुष विधानसभाओं से ज्यादा हुआ है, बल्कि सड़क निर्माण में भी वे काफी आगे हैं. नासा की इन तस्वीरों यह भी सामने आया कि में महिला निर्वाचन क्षेत्रों में पुरुष निर्वाचन क्षेत्रों की अपेक्षा अधूरी सड़क परियोजनाओं की संख्या भी 22 फीसदी कम है.

पढ़ें: महिला आरक्षण के समर्थन में राहुल गांधी

वे चार कारण जो महिला विधायकों को पुरुष विधायकों से बेहतर साबित करते हैं.

१- महिला विधायक अपराधों में कम लिप्त होती हैं. कुछ समय पहले केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 1765 सांसद और विधायक, कुल 3045 केसों में ट्रायल का सामना कर रहे हैं. यानी की कुल सांसदों और विधायकों के 36 प्रतिशत, किसी न किसी में अपराध के केस में फंसे हुए हैं. जाहिर है कि सामाजिक अपराधों में फंसना किसी के भी ऑफिस के कामकाज को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है. अदालतों के चक्कर काटने में भी बहुत सारी ऊर्जा, पैसा और दिमाग लगता है.

बहुत बार खुद को दोषी साबित होने से बचाने के लिये गवाहों की खरीद-फरोख्त या फिर उन्हें ठिकाने लगाने तक की भी योजना बनाई जाती है. ये सारी चीजें पुरुष विधायकों का कामकाज नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं. जबकि महिला विधायक ऐसे केसों में न फंसी होने के कारण अपने क्षेत्र की जिम्मेदारियों पर और भी ज्यादा ध्यान केंद्रित कर पाती हैं.

२- महिला विधायक पुरुष विधायकों से कम भ्रष्ट व अधिक कुशल होती हैं. हाल ही में जरनल ऑफ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गेनाइजेशन में प्रकशित एक शोध में सामने आया है, कि सरकार में ज्यादा महिलाओं का होना भ्रष्टाचार को सीमित करता है. 125 देशों में हुए इस शोध में पता चला है, कि जिन देशों की संसद में महिलाओं की संख्या ज्यादा है, वहां भ्रष्टाचार काफी कम पाया गया है. इस बात की पुष्टि भारत में होने वाले बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त महिलाओं की न्यूनतम संख्या देखकर भी होती है.

भ्रष्टाचार में कम लिप्त होना भी महिलाओं को अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार साबित करता है. इस कारण उनका पूरा ध्यान अपने निजी आर्थिक हित साधने की बजाय अपने क्षेत्र के लोगों के विकास में अधिक लगता है.

३- पुरुष नेताओं की तुलना में महिलाओं में राजनीतिक अवसरवाद भी कम होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षित लड़कियां /महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम महत्वाकांक्षी हैं. अपने करियर को लेकर वे लड़कों जितनी उतावली और अवसरवादी नहीं हैं. राजनीति के क्षेत्र में आने वाली महिलाएं भी बहुत ऊंची राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं पालती. उन्हें लगता है पुरुषों के इस क्षेत्र में उनका एक बार विधायक बनना भी बड़ी बात है. सो महिलाओं का ध्यान भविष्य में फिर से विधायक बनने से ज्यादा अपनी वर्तमान जिम्मेदारियों पर ज्यादा होता है.

पढ़ें : सभी सरकारें दोषी हैं महिला आरक्षण बिल के मसले पर: महिला आयोग अध्यक्ष

४- महिला विधायकों में राजनीतिक असुरक्षा पुरुष विधायकों से कम होती है. भविष्य में वे फिर से विधायक बन सकेंगी या नहीं, सक्रिय राजनीति में रहेंगी या नहीं, इन सब बातों में वे पुरुषों से कम असुरक्षित महसूस करती हैं. भावी राजनीतिक असुरक्षा के चलते पुरुष नेताओं का ज्यादा ध्यान हमेशा जोड़-तोड़ करने में ही लगा रहता है.

सत्ता में बने रहने के लालच के चलते पुरुष नेता बहुत बार अनैतिक साठगांठ भी करते हैं. अपनी भावी राजनीतिक सुरक्षा के मद्देनजर वे अक्सर ही गुंडे, बदमाशों यहां तक की अंडरवर्ल्ड से भी मदद लेने में नहीं हिचकते! जबकि कोई भी महिला नेता असामाजिक तत्वों की मदद लेकर अपनी भावी राजनीतिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने में दिमाग नहीं लगाती. (अपवाद हो सकते हैं)

उपरोक्त सभी शोध, आंकड़े और तथ्य इस बात की तरफ साफ तौर पर इशारा करते हैं, कि महिला निर्वाचन क्षेत्रों में ढ़ांचागत विकास ज्यादा हुआ है. लेकिन यह विडंबना ही है कि पुरुषों की अपेक्षा बेहतर परिणाम लाने के बावजूद, राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आज भी बहुत ही कम है. इसलिए महिलाओं का ज्यादा से ज्यादा संख्या में राजनीति में आना आज और समाज दोनों की जरूरत है. महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता से न सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं का फायदा होगा बल्कि हमारे सामाजिक विकास के लिए भी अधिक फायदेमंद साबित होगा.

एक विदुषी पतिता की आत्मकथा

कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी
अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता

1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब “शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन मुन्नी गुप्ता ने किया है, जिसका प्रकाशन श्रुति बुक्स, गाजियाबाद से हुआ है. यह एक ‘वेश्या’ की आत्मकथा है. इस किताब की लम्बी भूमिका का एक अंश एवं आत्मकथा का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए.

लड़कियों के दुःख अजब होते हैं सुख उससे अजीब
हँस रही हैं और का जल भीगता है साथसाथ.”  
परवीन शाकिर

दुनिया की किसी भी ‘आत्मकथा’ में दोशीजा, दुखतर से होते हुए औरत होने की अनंत और अतिरंजित यात्रा में जाना एक अद्भुत क्षण है. यह घटना घटित हो ये तब और भी जरूरी हो जाता है जब एक औरत इस सफर में सिलसिलेवार खुद से होकर गुजरी हो. अपनी जुबानी खुद के भीतर-बाहर की दुनिया के बारे में बात करने को राज़ी हो या जरूरत महसूस करती हो. यह राजीनामा बेहद जटिल, संश्लिष्ट, सघन अनुभूतियों और अनुभवों से बना होता है. उसके इन्द्रिय-जालों में गुह्यशिरायें हैं और ये गुत्थमगुत्थ संरचनाओं से मिलकर बनी हैं. बात भले ही सुनने में अजीब लगे लेकिन इसके पीछे एक संजीदा, गहरी, त्रासद अनुभूति छिपी हुई है.

इस बात से समझा जा सकता है कि हर औरत अपने बाहर की दुनिया में जीती हुई अपने भीतर की औरत को समझने और उसे बाहर की दुनिया से सामना करने के लिए तैयार कैसे कर सकती है इसकी खातिर वह खुद एक (‘स्वनिर्मित तिलिस्मी’ इसे आप कह सकते हैं, किन्तु उस लिपि से वह औरत बखूबी वाकिफ है) फैंटस ऐन्द्रिक-लिपि निर्मित करती है, जिसमें  ‘आत्म’ की तलाश और दुनिया के भीतर ‘औरत’ होने के अर्थ छिपे जो हैं, एक ‘थेसारस’ होता है. वह जो कुछ महसूस करती है, उन नर्म और कठोर सम्वेदनाओं की एक चित्रशाला भीतर हर लम्हा बनती रहती है, झेले-भोगे सच की स्मृतियों की ‘नव्य शैली’ विकसित होती रहती है और बारीक-शिल्प में तराशा हुआ संग्रहालय रचा जा रहा होता है. औरत इन भित्तितंत्रिकाओं में अनगिनत भित्तिचित्रों से खुद को बारम्बार रचती है. साथ ही भीतर-भीतर असंख्य भित्तिचित्र उकेरती है. इस चित्रशाला, संग्रहालय और थेसारस के बाहर और भीतर ‘औरत’ एक जिस्म व खुद से रू-ब-रू औरत की रूह में जो दूरी है, वह एक कुशल-अकुशल शिल्पकार की भांति रचना-मूर्ति की नक्काशी करती है, एक जीवंत कार्यशाला के भीतर बरसों तक रहकर जीती है, एकवृहद चित्रशाळामहीन कारीगरी से बुनती है जिन्हें कभी अनुकूल और कभी प्रतिकूल हालातों में अपने भीतर बन रही छवियों को नई-नई शक्ल सूरत में ढालती रहती है. इस चित्रशाला में एक औरत की इन्द्रियों से अनुभूत असंख्य तस्वीरें और कलाकृतियाँ होती हैं, खुद के चुने हुए रंध्रिकाओं के रंग शामिल होते हैं. अन्तःकरण के इस कैनवास में औरत ढेरों संवेदनाओं को हर सांस-सांस रंगती चलती है. वह इनमें जीती हुई तमाम औरतों की ध्वनियाँ और लोक संजोती है, अनगिनत पहलुओं की छायाप्रति ही चित्र अपनी समूची भूमिका में पारदर्शी प्रिज्म की तरह चमकता है, परावर्तित होती है उसके भीतर से हर लम्हा नई नई रंगआमेज़ प्रकीर्णन छवियाँ उभरती रहती हैं.

कितने मजबूर हो गए होंगे
अनकही बात मुँह पे लाने को

पुल्त्ज़िर प्राइज़ विजेता नाबाकोव ने कहा था कि अपनी बीबी के बगैर मैं एक भी नावेल नहीं लिख सकूंगा. जाहिर है कि इन्हीं मायनों में औरत किसी भी मुकाम तक पहुँचने में बेहद जरुरी भूमिका निभाती है. अब अगर औरत को ही लिखना हो वह सब कुछ, जो उसकी अंदरूनी और बाहरी दुनिया में उसके साथ होता आ रहा है तो सोचिये कि कितनी मुश्किलें आएँगी, जो चुनौतियाँ हैं जिन्हें एकमुश्त ही औरतें बर्दाश्त करती आई हैं औरतों के खिलाफ हो रहे हमलों को सहते हुए एक एक सम्वाद को अल्फाज को सच के पर्दे में उतारना, अफसानानिगार की तरह पेश करना कितना मुश्किल होगा? और यह भी कि इसमें कितनी बेतकल्लुफी, बेखौफ आवाजें और अंदाज़ में कितनी हिम्मत, कितनी साफगोई चाहिए होगी. औरत के भीतर पैदा हुए मेटाफर में वह कितनी खूबसूरत, दिलचस्प, साफ़-सफ्फाक, नए मायनों से भरी, जटिल वुजूद के ताने-बाने बुने, सिलवटों और उलझनें, कशिश को अनोखेपन और जिंदादिली से कैसे निबाहेगी? उसका ‘पर्सनालिटी एसेंस’ कैसा होगा.

अगर औरत वेश्या हो तो वह ऐसे में विदुषी होने की सूरत को कैसे निखारेगी? इसका आधार क्या होगा? मानदा ने सारी खूबियों के साथ काम करते हुए आत्मकथा लिखी. इससे हमें यह बात समझनी होगी –वह सब कुछ जो हम में आलोचनात्म कयोग्यता पैदा करता है, जो हमें प्रिय परंपराओं को भी विवेक की कसौटी पर परखने के लिए प्रेरित करता है, जो हमें वैचारिक रूप से स्वस्थ बनाता है और हममें एकता और राष्ट्रीय एकीकरण पैदा करता है, उसी को हम प्रगतिशील साहित्य कहते हैं.ये बातें सज्जाद जहीर ने प्रगतिशील आन्दोलन का पहला मेनीफेस्टो 1925  में लिखने के दौरान कहा था. इस लिहाज़ से एक विदुषी की आत्मकथा बेहद मानिख्ज़ अफसाना बनकर उभरी है.

यह विचार भले ही अजीब लगे, मगर दिलचस्प यह है कि एक औरत वेश्या होकर इल्म की दस्तकारी को कैसे अपने हक में इस्तेमाल करेगी? वह जरा भी हिचकिचाए बगैर ये माद्दा कैसे पैदा करे कि कोई अलफ़ाज़ अविश्वसनीय व अतार्किक न लगे. हकीकत से नाता यूँ बने कि जो वेश्या है वह आपकी याददाश्त में जगह बना ले, जरा भी हरकत हलचल किए बिना ही. औरत जो वेश्या के पेशे में रत है वह अपनी कठिनाई, कड़वी अनुभूति से हर पल गहरे तक आपको खुद में जोड़े रख सके. एक ज़िंदा हुश्न की लानत-मलानत के संग-संग मानो आपके साथ-साथ चलती चली जा रही है अपने आखिरी इम्तिहान की तरफ भरोसे और तस्दीक के साथ.

मर्द की नजर में औरत तो कई-कई पहचानों व नामों में तस्लीम की गई – अगर औरत में समझदारी है, सूझबूझ है, लॉजिक है, बोलने की तल्खी है, कला है, तो वह औरत मर्द की निगाह में ‘बौद्धिक रंडी’ कहकर अपमानित होगी ही, या की जायेगी. अगर औरत में खूबसूरती है, अदब है, अदा है, सुख़न है, काहिन है, फिक्रत परस्ती है तो शहर-ए-इल्म-ओ-फन में हंगामा परवर जमात उसे ‘ट्रॉफी’ की तरह इज्ज़त-शोहरत बख्सेंगे. अगर औरत ने खाना-खराबी(घर छोड़ दिया है) में बिताई है जवानी तो बे-दिमागी बाज़ार के मुक्तलिफ़ लोग उस गैरत की नस्ल को बेआबरू करने में कोई कसर न छोड़ेंगे, अस्मत को सरेबाजार कुचल कर रख देंगे.

औरत की अस्मत मर्द की निगाह में है ही क्या? कभी आश्रमों में रहने वाली सन्यासिनों को वेश्या बनाने में आध्यात्म के पाखंड, कभी नफरतों में कौम और जमातों की औरतों को बेआबरू करते वहशी कौमें, चुलबुली, बिंदास लड़की देखकर हवश में डूबे बेलगाम रईसजादे, शादी में ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ करती शौकिया अपाहिज दिमागों वाले परिवार, घर, मकानात क्या किसी वेश्यालयों से कम हैं. जहाँहर रात एक ही मर्द से ज़िन्दगीभर का सौदा तय हुआ है. क्यूंकि जब उसे ब्याहकर (यानी मर्दानगी के दरीचे में) लाया था तब उसके प्यूरिटी ऑफ़ वर्जिनिटी की कीमत थी. वो जवान पट्ठे जो नंगी निगाहों से औरतों को बेपर्दा देखने के शौक़ीन हैं, पोर्न के बाज़ार से लाये गये मसालेदार नंगी औरतों के चलचित्र को देखते- सनकी, चस्की, बददिमाग, अपराधी, इश्कबाज जिस्म के धंधे में दलाली करते लौंडे, चकलाघर तो इन मर्दों के भीतरी घरानों में हर लम्हा नस-नस में दौड़ता है. रेड लाईट एरिया इसके लिए सबसे मुफीद बाज़ार हैं जहां नंगी औरतों का शौक रखने वाले जवाँ मर्द और उम्रदराज़ मर्दों की तादाद ऐसी है जो औरत के गर्म गोश्त का लुत्फ़ की चाहत में वे सभी अपने-अपने भीतरी तहखानों में बिलकुल बेअदब और नंगे हैं. उन्हें कुँवारी लड़की, जवान औरत, पेशेवर वेश्या, तवायफ चाँद रात में चाहिए. उन्हें हर शबजिस्म का उत्ताप बुझाने को बंद कमरों के भीतर एक अदद बीबी चाहिए जिससे नशीले गोश्त की ताज़ी गंध आती है. ये मर्द गंदले अनुभवों, जोशीलेपन की जेहालत और मर्दानगी के सलीके में बद से बद्तर किस्म के दिमागी बीमार लोग हैं ऐसी जमातें हर शहर में ठंसी पड़ी हैं. आधुनिकता के लबादे में तो तमाम खूबसूरत लड़कियाँ प्रति माह बंधी रकम की खातिर यौन-कुंठा से भरे रईसजादों की रखैलें बनने को मजबूर या राजी हैं. आखिर कब तक औरतें हर हाल में सोसाइटी के लिए कलंक ही बनी रहेंगी? औरत होने की हैसियत कब हासिल करेंगी. दोशीजा कब तलक मर्दों की फितरत और फजां में नीच, अछूत, घटिया मानी जाती रहेगी.

आत्मकथा में मानदा से बातचीत में रमेश बाबू का मर्दवादी नजरिया बेहद तल्ख और साफ़-सफ्फाक है. उसे समाज के ताने-बाने पर पूरा भरोसा है तभी तो यह बात कह पाए तीन हज़ार रुपये दफ्तर में कैश जमा कर मेरी चोरी की बदनामी ख़त्म हो जायेगी? दो चार लड़कियों को घर से बाहर निकालने के बावजूद मैं समाज में सर उंचा उठा कर चलूँगा और शराब पीना वह तो सम्पन्नता का लक्षण है. तुमने खुद अपना भला नहीं समझा. अब तुम्हारी मुक्ति असंभव है. मैं भी देखूंगा, तुम्हारे मन में जो नयानया नीति ज्ञान जागा है, वह कितनी दूर तक तुम्हारी रक्षा कर सकता है .दोशीज़ा मानदा को ‘वेश्या मानदा’ के सफ़र तक लाने में इसी भद्रलोक के रमेश बाबू ने बड़ा रोल निभाया और मानदा को ‘फिरोजा बीबी’ के किरदार से लेकर ‘मिस मुखर्जी’ के किरदार तक लाने में इसी भद्र लोक के वकील की भूमिका रही है.लम्बे समय से लड़कियों को जिन्दा दफन करने की रस्म चली आई है. औरत के सामने चुनौतियाँ हैं, जिन्हें हर मायने में औरतें ही हक़ और हकूक की लड़ाई से हासिल कर सकती हैं. मर्द हर हाल में औरतों के मसले में ज्यादा आक्रामक होते हैं. आक्रामक होना एक तरह की मानसिक कुंठा से, अवसाद और उत्तेजना से उपजी मानसिक बीमारी है,

हर उत्तेजना के रिलेटिव सिग्नीफिकेंट होते हैं, जो इंसान के जैविक, भौतिक परिस्थिति में अनुकूलन को तय करते हैं. उत्तेजनाएं औरतों में भी होती हैं तो उनमें यह भावना बड़े पैमाने पर क्यूँ नहीं जागती कि वे भी मर्दों, जवान लड़कों के साथ यौन अत्याचार कर सकें. मतलब अनुकूलता के लिए विकृति को सामाजिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक वायुमंडल से ऊर्जा मिलती है. मर्द इस मामले में पुरसुकून महसूस करता है. कारण उसके अनुकूलन के लिए सोशल इन्वायरमेंट हमेशा मौके देता है. औरतों को इसका प्रतिकूल प्रभाव झेलना पड़ता है. सेंसोरी एडोप्टेशनलेवल ही क्वालिटेटिव आस्पेक्ट पैदा करने की क्षमता देता है. यह औरतों के लिए कैसे फायदेमंद हो तब जबकि वे भी यौन उत्कंठाओं और उत्तेजनाओं के दौर से गुजरती हैं मगर सोशल कंडीशंस फेवरेबल न होने के कारण उन्हें उन पर काबू पाने या उन्हें खत्म करने के मौके नहीं मिलते.

इस मायने में दोनों ग्राहक हैं औरत और मर्द जो उत्तेजनाओं को बैलेंस करने के लिए एडजेस्टिव बिहैवियर की तलाश में अगर जा सकें तो सेंसेसरी डिसऑर्डर होने से बचा जा सकता है. बेस्ट सोशल ऑर्डर और बेहतर उत्पादन हो सकता है. अन्तःग्राहक इनके भीतरी इलाके में सें सोरी चैनल और सेन्सस ओर्गंस को बेहतर तरीके से मुकम्मिल रिजल्ट्स दे सकते हैं. सेंसेसंस के इन घटकों में औरतें और मर्द दोनों में ही क्वालिटी, इन्टेनसिटी और विविदनेस के कारण मेंटल इम्प्रेसंस का क्वांटीटेटीव इफेक्ट समझा जा सकता है. मगर इसके लिए दोनों को यानी मर्द और औरत को सेंसेसरी एक्सपीरियंस को समझना होगा.

औरतें मर्दों के मुकाबले अधिक भावुक और तीव्र उत्तेजनाओं की ग्राहिका होती हैं. मर्दों में तनाव की वजह से हार्मोनल डिस्टर्बेंस अधिक प्रभावी होता है. औरतें इस मामले में थोड़ी स्थिर और ज्यादातर अवसाद की अवस्था में ही क्षणिक ही असंतुलित होती हैं. आदमी अपने भीतर उठी उत्तेजनाओं और संवेगों-आवेगों से बाहर निकलने की खातिर उपाय की कोशिशें कहीं अधिक करता है. वह उसके परिणामों की परवाह नहीं करता. औरतें अपनी उत्तेजनाओं और संवेगों के उत्ताप को तोड़ने के लिए जैव-विविधता में अन्य प्राणी को साथी मानकर तरह-तरह से इमोशनल शेयरिंग के जरिये निदान पाने में लगी रहती हैं, जिसका खामियाजा ज्यादातर वक्त उन्हें जिस्मानी या अंदरूनी आघात के तौर पर भुगतना पड़ता है.

औरतें हमेशा जैविक बदलावों के कारण मर्दों के मुकाबले कहीं अधिक पारिस्थतकीय संघर्षों से जूझती रही हैं साथ ही मनोवैज्ञानिक अस्थिर हालातों में बार-बार बदलावों से उन्हें अधिक मुश्किलें झेलने को मिली. मर्द इन्हीं परिस्थितियों में अधिक उग्र और आक्रोशित भाव-दशाओं में जीते हैं. इसी का नतीजा है वे अधिक प्रभावशाली तरीके से बगैर जज्बाती हुए फैसले ले सकते हैं. आदमी की दुनिया में बाहरी दुनिया की हलचलें और उनके परिणामों का बड़ा असर होता है, महिलाओं में यही घटना भीतरी दुनिया और संवेगों-आवेगों के उत्तेजकों, ऊतकों की वजह से एक डिसबैलेंस पैदा करने की स्थितियां बनी रहती हैं .

इनके कांसिक्वेंसेस मिलकर ही तय करते हैं कि मानदा जैसी औरत एक दोशीजा की ज़िन्दगीसे बाहरी मजबूत सुरक्षा कवच को, खोल को, आवरण को, तोड़कर औरत बनने की यात्रा में जब निकली तब कैसे वह वेश्या बनने की गुमनाम राह की ओर जा पहुंची और इन सबके बीच उसने अपने भीतरी इलाकों में औरत के होने उसके वुजूद की मजबूत पहाड़ियों को छुआ तो वह विदुषी होने की खिलती कोंपलों को दिलोदिमाग से, अपने लहू के कतरे कतरे से सींचा-रोंपती रही. कठिन हालातों, मुश्किलों से भरी अनगिनत ढलानों और ऊंचाइयों से होकर गुजरी मगर वह मजबूत इरादों के साथ औरत की अस्मिता को लेकर हर पल चिंतित रही.

औरत एक वेश्या के भीतरी खोल में कैसे जिंदा रह सकती है, कैसे बची रह सकती है, कैसे इंसानी पाकीज़ा इल्म्कारी का हिस्सा हो सकती है, कैसे पेशे में ईमान और जिस्म की तकलीफों के दरिया को पुरसुकूँ दे सकती है, कैसे सियाह दीवार-ओ-दर में रहकर इल्म की कशीदाकारी को सूझबूझ से कायम रख सकती है.

यह सब कुछ घटित होना कतई आसान तो नहीं हो सकता. ये यात्रा संकटों, संघर्षों, चुनौतियों की भरी पूरी दास्ताँ इसीलिए बनती चली गई, जहाँकोई एक सिद्धांत फिट नहीं बैठ सकता, किसी व्यावहारिक फार्मूले में वह कैद नहीं की जा सकती, कोई एक हासिल तो पाना काफी दुष्कर है,

इसी तरह रेयर जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से अगर किसी भौगोलिक दायरेमें पैदा होने वाली नस्लें अपना रूप-गुण बदल सकते हैं, जैसा कि ‘प्युबरती स्टेज’ में पहुँचते ही कैरेबिया के सेलिनास की संतानें अपने भीतर बदलाव महसूसती हैं तो यकीनन यह अचरज नहीं. इसी तरह से मनोविकृति के कारण पैदा हुए ‘मेंटल डिसऑर्डर’ से जो यौन कुंठाओं में जीता मर्दवादी समूह है-  खासकर जहाँ जवान और उम्रदराज़ मर्दवादी इलाके हैं, जहाँइंसानी तालीम के बजाय कुंठाओं को शांत करने की चाहत में ये कम्युनिटी औरतों को ‘सेक्स ट्वाय’ की तरह इस्तेमाल करते हैं. प्युबरती पीरियड ज्यूँ ही परवान चढ़ता है, यौन ग्रन्थियों की लिप्सा बुझाने की खातिर हर उम्र की औरतों के संग अपराध की फेहरिस्त बढ़ती जाती है. कुछ तो कानूनी कायदों में पागिरिफ्त रवायतों के साथ औरतों पर तरह-तरह से जुल्म ढाते हैं, अत्याचार करते हैं, जिस्मानी चोट करते हैं, कहर बरपाते हैं. ये कुंठाओं में जीती मानसिक विकृतियों में गुजर करती बीमार जमातें दुनिया को भला क्या देंगी? खूबसूरत और सेहतमंद माहोल तो हरगिज़ पैदा नहीं करेंगी.

किसी वेश्या को ऐसा किरदार निभाते हुए कोई गर यह देखे कि वह एक फनकार है, तो जाहिर है उसे दानिशमंद जीने न देंगे. खाकिश्तर (डस्टी) बना के ही छोड़ेंगे. फक़त ऐसे में उसे दरख्त-ए-ज़र्द से होकर तो गुजरना ही होगा. बे-निहायत की तमन्ना, कियामत की महबूबा होना ही होगा. यह कतई आसान तो हरगिज़ नहीं, वरना दुनिया की तमाम वेश्याओं ने अपनी तकलीफ की दास्तानें इबादत की बुर्ज़ तक पहुंचाने और दुनिया की पलस्तर लगी दीवारों पर दर्ज करने में कोई कसर न छोड़ी होती.

हर वेश्या को अपने-अपने किरदार निभाने के मौके और विकल्प कहाँ, कब, कैसे मिलेंगे? यह एक बड़ा सवाल है. मानदा ने वेश्या होकर भी बेहद कड़ाई से अपनी खामोशी को ठीक एल्विना रो की तरह ही भीतर बरसों तक कैसे छिपाए रखा होगा?

इसी सिलसिले में याद हो आई नंदिता दास की शॉर्ट फिल्म ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ सन 2017 में रिलीज़ हुई, जिस पर बोलते हुए मंटो साफ़ करते हैं कि वेश्याएँ उनके लिहाज से क्यूँ लिखने के मामले में जरुरी विषय रहीं, वे पर्दानशीन खामियों के धागे खोलते नजर आ रहे हैं. वो कहते हैं, क्यों न लिखूं वेश्याओं के बारे में, क्यों वो हमारे माश्शरे (समाज) का हिस्सा नहीं हैं? उनके यहाँ मर्द नमाज या दुरुह पढ़ने तो नहीं जाते हैं, उन्हें वहां जाने की पूरी इजाजत है लेकिन हमें उनके बारे में लिखने की नहीं. क्यों नहीं?

वेश्या होकर नलिनी जमीला जब अपनी जुबानी लबालब तकलीफ की दर्दमंद झील को भीतर के दर्रों से बाहर की दुनिया में लेकर आई तब औरत होने की तकलीफ और जिन्दगी के हादसों की तहें खुली. वो कैसे ज़र्फ़ वाली हुई होगी यह तय करने में कि अपनी मासूम और नादान बच्चियों की भूख मिटाने की खातिर एक पेशे में दाखिल हुई जहाँइक वक्त में ही पचास रूपये से अधिक कमा सकती है, जिस्म का सौदा करके. वहीं दूसरी तरफ ये भी कहती है, वेश्यावृत्ति तबतक बढ़ेगी जबतक समाज में यौन उत्पीड़न हो और जब तक सेक्स में विविधता का आनंद लेने में रुचि हो।

वहीं इब्दिता-ए-इश्क से शुरू हुई रूमानी, फन्तासी दास्ताँ मानदा को कहाँ ले आई? गिरहों का खुलना और गिरह में दाम पाना इसे जुस्तजू कहें या मुस्तकिल (स्थायी) गम कहें. औरत के भीतर की गिरहें कैसे खुलेंगी और रुदाद (कथा) को कैसे हासिल होगी मंजिल, ये मुश्किल है समझ पाना. राज़ ए अलफ़ाज़ में जीकर जाना रवायत किसे कहते हैं और उल्फत की सजा क्या है? इक रवायत चली आई है, दिल्लगी से बेरुखी की. मगर देखें कैसे जिए कोई बिना गिरहों के खुली हवा में, परवाज़ पखेरू लेके. एक मता-ए-कूचा-ए-बाज़ार (गली और बाज़ार की चीज़) की जीनत बनके कोई कब तलक सहे दरिंदगी के अफ़साने.

भूले से मोहब्बत कर बैठा नादां था बेचारा दिल ही तो है।

            हर दिल से खता हो जाती है बिगड़ो ना खुदारा दिल ही तो है.             ये दुनिया जो मानदा की है यानी एक ‘औरत’ के बाहर की दुनिया, एक ‘वेश्या’ औरत के सीकचों के बाहर की दुनिया, एक ‘विदुषी’ जनाना के बाहर की दुनिया है, जिसमें वह सांस लेती, जीती है, सोचती है, विरोध जताती है, गिरामी है, मर्दवादी और सामन्ती ख्यालों-उसूलों को नकारती है. उसी मानदा के भीतर एक जवाँ, शोख, हसीन ‘दोशीजा’ तमाम हालातों के बीच औरत होने की तरफ बढ़ती है. बचपना बिताती शरारत से भरी, खानदान की चहेती लड़की है, जिसे तरह-तरह की किताबें, रिसाले, शायरी, नज्में, दास्तान, पढ़ने का शौक है. उसके घर में एक जवान शिक्षक है जो उसके भीतर पल रही संवेदनाओं, संभावनाओं को लेकर चिंतित है. मानदा अपनी ख्वाहिशें किससे कहे? सो उसे दोस्त, सखा, गुरु, इल्मकार दास्तानगो मिले. जिनके संग वो घर के भीतर बाहर सुकून, हिफाजत और आज़ादी महसूस करती है. मनहूसियत और अवसाद से परे खुली हवा में उड़ने को बेताब है. पिता दूसरी शादी की वजह से नई नवेली दुल्ह्न के संग मुतमईन हैं. गाड़ी है, बंगला है, नौकर-चाकर हैं, फिर भी एक घुटन, एक अकेलापन, एक बेचैनी पल रही है मानदा के भीतर. वह उम्र की सबसे उद्दाम उमंगों वाली, उत्तेजक आवेग-संवेगों, उन्मुक्त राहों की ओर कदम बढाये बह निकली है. ऐसे में उसे हर पल इक साझीदार, एक पार्टनर मिले, एक संगी, एक हमराह, उसकीबात करने सुनने वाला हो और सलाह देने वाला हो. मगर कौन उसे इस उम्र में हमसाया बने, संग-संग परवाज़ को राज़ी हो? दुलार जो पिता से नहीं मिल सका. माँ, जो उसे इस जहान में लाई वह कूच कर गई. मानदा के वक्त की सुइयों के साथ साथ हम-नशीं शायद कोई नहीं. समय-चक्र में साथ-साथ सोचने, समझने और मानसिक हालत में प्रमोट करने वाला एक इंसान इक हम-नफ़स (दोस्त) चाहिए, जोकि उसे अपने गुरु और अपने सखा और बड़े भाई रमेश दा में दिखा. यहाँ से ज़िन्दगीनई नई घुमावदार और मुश्किल यात्राओं की ओर गई. एक सहरा-ब-सहरा साथ चलता रहा. वो कहे भी क्या, सहरा-जादों ने उसे नहीं बख्शा? ये ज़हर जो दिमागों में तकसीम के बोया गया. उसे उधेड़ना, खोलना, खुलेआम जिरह-मुबाहिश करना बेहद जरुरी हो गया है. मानदा के अल्फाज को कोई तो जगह मिले.

जो है इक नंगहस्ती* उसको तुम क्या जान भी लोगे
अगर तुम देख लो मुझको तो क्या पहचान भी लोगे
(* जिसका जीवन लज्जा का कारण हो.)

क्रमशः
मुन्नी गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता-700073