महिला आरक्षण के लिए सक्रिय संगठनों ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर महिलाओं के समुचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप की मांग की है. महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल इस मांग और पत्र के साथ आयोग और विभिन्न राजनीतिक दलों से मिल रहा है.
चुनाव आयोग को लिखा गया पत्र:
हम, महिलाओं का राष्ट्रीय गठबंधन, राजनीतिक दलों द्वारा अपने द्वारा जारी सूची में महिला उम्मीदवारों को न्यूनतम टिकट दिये जाने के प्रति अपना गहरा असंतोष व्यक्त करने के लिए यह लिख रहे हैं। हमारा मानना है कि राजनीतिक दल जो अपने संगठन में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, वे सही मायने में हमारे लोकतंत्र के प्रतिनिधि नहीं हैं। इसके अलावा, यह पत्र उन सबके लिए भी समान रूप से लिखा गया है जो एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था बनाने के लिए जिम्मेदारी की स्थिति में हैं। टिकट आवंटन में यह भेदभाव भारत में पुरुषों और महिलाओं के लिए उपलब्ध अवसरों में जेंडर असंतुलन पैदा करता है.
नेशनल एलायंस फ़ॉर वीमेन रिज़र्वेशन बिल (कई महिला संगठनों के सदस्यों का एक मंच) पिछले चुनाव आयुक्तों से मिला है। हम कई मौकों पर उनसे अपील करते रहे हैं कि वे सभी राजनीतिक दलों के साथ लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व को लेकर उचित कदम उठाएँ। 16 वीं लोक सभा में केवल 12% महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों का निराशाजनक प्रतिनिधित्व था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश भर के कुल 4896 सांसदों / विधायकों में से केवल 418 यानी 9% महिलाएँ हैं।
हम यह बताना चाहते हैं कि हमारा संविधान सभी नागरिकों के लिए समान अवसरों की परिकल्पना करता है, जेंडर और अन्य भिन्नताओं से परे। हालांकि, यह वास्तव में दुखद है कि हमारी लगभग 50% जनसंख्या वाली महिलाओं को केंद्र और राज्य स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है. यह सब अधिक विडंबनापूर्ण है, क्योंकि संसदीय अध्ययन दल ने स्वयं एक महत्वपूर्ण सिफारिश की थी कि महिलाओं के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हेतु प्रभावी नीतियों के लिए उनका न्यूनतम 33% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
यह काफी हद तक स्पष्ट है कि पिछले कुछ वर्षों में, कॉर्पोरेट जगत, न्यायपालिका, खेल और यहां तक कि सेना और पारा मिलिट्री फ़ोर्स जैसे पुरुष-केन्द्रित माने जाने वाले संस्थानों सहित विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है. वे ख़ास तौर से दृश्य और प्रभावी मतदाता के रूप में भी उभरी हैं.
फिर भी, राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को अवसर देने के प्रति अनिच्छुक हैं, भले ही वे जेंडर समानता के चैम्पियन होने के दावे निरंतर करते रहते हैं। वे अक्सर महिलाओं की जीतने की क्षमता का बहाना लेकर सामने आते हैं या यह कहते हुए बचाव करते हैं कि राजनीति महिलाओं का कैरियर नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व की पितृसत्तात्मक मानसिकता इस तथ्य से परिलक्षित होती है कि वे महिलाओं पर प्रॉक्सी प्रतिनिधि और अक्षम प्रशासक होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन उन पुरुष उम्मीदवारों के साथ सहज होते हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, इनमें कुछ मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध के हैं।
पुरुष उम्मीदवारों के चयन को प्रश्रय और महिलाओं के प्रति जेंडर आधारित भेदभाव राजनीतिक दलों के इरादों के बारे में संदेह पैदा करते हैं। राजनीतिक भागीदारी चाहने वाली महिलाओं के लिए शिक्षा, आर्थिक क्षमता आदि प्रमुख मापदंड हो जाते हैं हालांकि, पुरुषों को इस तरह के सभी मापदंडों से छूट हो जाती है। पुरुष होना ही उनकी योग्यता मान लिया जाता है.
जबकि
हम जानते हैं कि इस मुद्दे को मुख्य रूप से राजनीतिक दलों द्वारा हल किया जाना
चाहिए लेकिन चुनाव आयोग के लिए यह उचित होगा कि वह राजनीतिक दलों और आम जनता को
महिलाओं को समान अवसर देने की जरूरत की याद दिलाये.
भारत
का चुनाव आयोग बड़े पैमाने पर चुनावों के सफल और न्यायपूर्ण सञ्चालन के लिए एक प्रतिष्ठा
प्राप्त संस्था है। महिलाओं की ओर से आयोग द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप, देश में लोकतंत्र को सुनिश्चित करने की दिशा एन कदम होगा. चुनाव
आयोग अगर इस तरह का कदम उठाता है तो यह मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट ’शब्द को एक गहरा अर्थ देगा और बदलते सामाजिक मानदंडों के पालन
का एक सन्देश भी देगा।
हमें
पूरी उम्मीद है कि चुनाव आयोग को यह निर्णायक कदम समाज में जेंडर असंतुलन को खत्म
करने के लिए और महिला मतदाताओं की आकांक्षाओं के लिए जरूरी प्रतीत होगा. हम
महिलाएं चुनाव आयोग को संविधान के संरक्षकों के रूप में देखना चाहते हैं जिसका काम सिर्फ नियमित चुनाव
करवाना भर नहीं हो बल्कि आगामी चुनावों में जेंडरभेद रहित स्थितियां निर्मित करने
की भी हो.
हम
सभी राजनीतिक दलों से, उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से परे जकार आग्रह करते हैं, कि वे महिलाओं के सशक्तीकरण और
मुक्ति के उनके बार-बार के चुनावी दावे की दिशा में काम करें। दक्षिण या वाम, हर
पंथ के राजनीतिक दलों में सभी ने व्यक्तिगत या
सामूहिक क्षमता में महिला आरक्षण के पारित होने का समर्थन करने की बात की है। यह
भाषणों और चुनाव घोषणापत्रों में अक्सर किया जाने वाला एक चुनावी वादा रहा है। फिर
भी, इस विधेयक को न तो लोकसभा
में लाया गया है और न ही राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वयं संगठन के भीतर जेंडर-न्याय
की दिशा में कोई कदम उठाया गया है।
हम
इस अवसर पर राजनीतिक दलों के नेताओं को याद दिलाना चाहेंगे कि देश की आधी आबादी को
उनके खोखले वादों पर अब सवाल उठ रहे हैं।
4 अप्रैल को विभिन्न
मांगों के साथ देश भर में महिलाओं का मार्च होने जा रहा है. चुनावों के समय में
महिलाओं ने अपने राजनीतिक एजेंडे साफ़ किये हैं. इसी की एक कड़ी के रूप में देश भर
के (अराजनीतिक) महिला संगठनों के आह्वान पर महिलाएं सडक पर होंगी. जातिवाद से
आजादी, मनुवाद से आजादी, पूंजीवाद से आजादी की घोषणा करती देश भर की औरतें महिलाओं
के लिए समावेशी आवासीय अधिकार की मांग कर रही हैं.
दिल्ली के लिए जारी किया गया पोस्टर
औरतों के खिलाफ
हिंसा, समाज में असमता, पितृसत्तात्मक ढांचे के खिलाफ महिलाओं का यह आगाज देश भर
में एक समय पर एक साथ होने जा रहा है. उनका नारा है: बदलाव के लिए महिलाये, बदलाव
के लिए हमारा वोट.
महिलाओं का मानना है कि वे नफरत और हिंसा के मौजूदा माहौल के खिलाफ और लोकतांत्रिक गणराज्य
के नागरिकों के रूप में अपने संवैधानिक अधिकारों का दावा करने सडक पर उतर रही हैं.
महिला मार्च फॉर चेंज का उद्देश्य भारत में महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों पर हमलों
के खिलाफ आ राही है आवाजों को एकजुट करना है।
‘देश में फासीवादी और नव-उदारवादी ताकतों में इजाफा और समाज में हिंसा ने महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है। अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिमों, दलितों और ईसाइयों पर हमले, फर्जी एनकाउन्टर, भीड़तन्त्र द्वारा उन पर हमलों ने भय और असुरक्षा का माहौल पैदा किया है।
पिछले कुछ वर्षों में संविधान पर सीधा हमला देखा गया है, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर,
जिसमें पोशाक, बोलने, लिखने, खाने और चुनने का अधिकार शामिल है. इस हमले ने महिलाओं
को ख़ास तौर पर प्रभावित करता है। असंतोष के
स्वरों को व्यवस्थित रूप से शांत कर दिया गया है। जबकि सुधा भारद्वाज, शोमा सेन और कई अन्य लोग जेलों में बंद हैं, गौरी लंकेश जैसी महिलाओं को अपनी वाणी और
अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग करने के लिए अपनी जान तक गंवानी पडी है.’
इन स्थितियों को चिह्नित करते हुए महिलाओं की समवेत आवाज देश भर
में गूंजेंगी.
रोज़ की तरह अशोक अपना स्कूल बैग उठकर घर से निकला और सुनीता के घर के बाहर आकर उसे आवाज़ दी, ‘सुनीता।’ हर रोज़ अशोक की आवाज़ सुनते ही सुनीता ‘आ रही हूँ’ कहती हुई अपना स्कूल बैग लेकर घर से बाहर निकल आती थी। लेकिन उस दिन अशोक की आवाज़ सुनकर घर के अंदर से न सुनीता बाहर आयी और न उसकी आवाज़। अशोक को लगा कि शायद सुनीता उसकी आवाज़ सुन नहीं पायी है। उसने फिर से आवाज़ लगायी, ‘सुनीता, जल्दी आओ, नहीं तो स्कूल को देर हो जाएगी।’ इस बार भी उसकी आवाज़ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो यह सोचकर कि शायद सुनीता अभी तैयार नहीं हुई है, वह उसकी प्रतीक्षा करने लगा। किंतु, कई मिनट के बाद भी सुनीता बाहर नहीं आयी तो उसे कुछ विचित्र सा लगा। ‘आज क्या हो गया है सुनीता को? ऐसा तो कभी होता नहीं है। वह तो हमेशा पहले से ही तैयार रहती है और उसकी एक आवाज़ पर ही घर से बाहर निकल आती है। फिर आज क्यों बाहर नहीं आयी है वह अभी तक, और ना कुछ बता ही रही है कि उसे कितना समय और लगेगा तैयार होने में।’ इस बार उसने थोड़े ऊंचे स्वर में आवाज़ लगायी, ‘सुनीता, अरे भाई सो रही हो क्या अभी। क्या स्कूल नहीं जाना है आज?’
लाल रत्नाकर की पेंटिंग
इस बार उसकी आवाज़ पर प्रतिक्रिया हुई और सुनीता घर के अंदर से बाहर आयी। लेकिन वह बिना स्कूल ड्रेस के थी, घर के कपड़ों में ही। चेहरे से भी वह कुछ बुझी-बुझी और उदास लग रही थी। उसे इस तरह देख अशोक को कुछ आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘क्या हुआ है तुम्हें? आज स्कूल नहीं जाओगी क्या?’ ‘नहीं अशोक, में स्कूल नहीं जाऊँगी।’ उसका स्वर उदासी में डूबा हुआ था। अशोक ने उसके चेहरे के बुझेपन और उदासी को पढ़ने की कोशिश करते हुए पूछा’ ‘क्यों? क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’ ‘ऐसा ही समझ लो।’ उसके इस प्रश्न के जवाब में सुनीता से अनमनेपन के स्वर में कहा।
अशोक को आज सुनीता का व्यवहार एक पहेली सा लग रहा था। यूँ परेशान और दुखी तो वह पिछले काफ़ी दिन से थी और अशोक उसके दुःख और परेशानी को जानता-समझता भी था। लेकिन आज वह मानसिक रूप से कुछ अधिक ही परेशान दिखायी दे रही थी। उसकी इस परेशानी को समझने की कोशिश करते हुए वह बोला, ’यह समझ लो क्या होता है। तबीयत ठीक नहीं है तो स्पष्ट बताओ ना क्या हुआ है?’ अशोक का इस तरह अधिकारपूर्वक पूछना सुनीता को अच्छा लगा, किंतु अपने मन का असमंजस व्यक्त करते हुए वह केवल इतना कह पायी, ‘क्या बताऊँ?’ सुनीता के चहरे पर छायी उदासी और रूखेपन से अशोक को यह आभास हो गया था कि सुनीता किसी न किसी गहरी उलझन की शिकार है। वह बोला, ‘कुछ तो है। जो भी है वह बताओ। कुछ ज़्यादा ही परेशान लग रही हो। क्या बात है? आंटी की तबीयत तो ठीक है?’ ‘उनकी तबीयत तो ठीक है।’ ‘फिर क्या बात है?’ ‘मैं बहुत बड़े तनाव और उलझन में हूँ अशोक।’ ‘किस बात की उलझन है तुम्हें? ऐं?’ अशोक ने उसके चेहरे पर अपनी आँखें टिकाते हुए गम्भीरता से पूछा ‘अभी तुम स्कूल चले जाओ, नहीं तो तुमको देर हो जाएगी। स्कूल से लौटते हुए आ जाना तब बात करेंगे।’ इतना कहकर सुनीता ने बात को टालने की कोशिश की ‘सुनीता मैं तुम्हारा दोस्त हूँ। मुझसे भी अपने मन की उलझन छिपाओगी तो किसको बताओगी? और बताओगी नहीं तो उस उलझन से कैसे बाहर आओगी? ‘तुमको यह कहने की आवश्यकता नहीं है अशोक कि तुम मेरे दोस्त हो। दोस्त ही नहीं, तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो। इतना सपोर्ट करते हो तुम मुझे, तुमको नहीं बताऊँजी तो किसको बताउँगी। तुम्हारे अलावा दूर-दूर तक और कोई नहीं है जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ।’
तो बताओ न क्या बात है? किस परेशानी में डूबी हो तुम ‘बताउँगी, सब कुछ बताउँगी। पहले तुम स्कूल से तो हो आओ ‘नहीं, मैं भी स्कूल नहीं जा रहा हूँ आज।’ ‘क्यों? तुम क्यों नहीं जाओगे स्कूल?‘ ‘बस यूँ ही।’
‘तुम जानते हो अशोक कि पढ़ाई हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। तुम यह मानते और कहते भी हो कि हमारी ज़िन्दगी की बेहतरी के रास्ते शिक्षा से ही खुलने हैं। एक दिन भी स्कूल नहीं जाने का मतलब है एक दिन की शिक्षा से वंचित रहना। एक दिन की शिक्षा भी हमें ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे कर सकती है। इसलिए जो भी बात करनी है, वह हम बाद में कर लेंगे। मैं स्कूल नहीं जा पा रही हूँ लेकिन तुम तो स्कूल जाओ।’
‘मैं भी तो तुमसे वही कह रहा हूँ। मेरे लिए ही नहीं तुम्हारे लिए भी पढ़ाई उतनी ही ज़रूरी है। यदि किसी परेशानी के कारण तुम भी एक दिन भी स्कूल नहीं जाओगी तो ज़िंदगी की दौड़ में तुम भी उतनी ही पिछड़ जाओगी। ……….तुम जिस परेशानी के कारण आज स्कूल नहीं जा रही हो, क्या वह परेशानी केवल आज की ही है? और कल तुम स्कूल जाओगी?’
‘नहीं, यह समस्या एक दिन की नहीं हैं। और जिस तरह की समस्या में उलझी हूँ उसे देखते हुए मैं कब और कैसे स्कूल जा पाऊँगी, और कभी जा भी पाऊँगी या नहीं, इस बारे में में कुछ नहीं कह सकती।’ सुनीता के शब्दों में उसकी विवशता का दर्द साफ़ झलक रहा था।
अशोक ने उसके दर्द को महसूस किया और उसके दर्द के साथ जुड़ते हुए बोला, ‘मैं एक दिन स्कूल नहीं जाऊँगा तो मेरी पढ़ाई पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन तुम परेशान बनी रही और इस कारण स्कूल नहीं जा पायी तो तुम्हारा बहुत अधिक नुक़सान होगा।’ ‘हाँ, यह तो है………।’ सुनीता ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा।
‘जब तक तुम्हारी परेशानी का पता नहीं चल जाएगा मेरा मन भी परेशान रहेगा और इस स्थिति में स्कूल चला भी जाऊँ तो मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगेगा। इसलिए मैं सोचता हूँ कि आज मैं भी स्कूल नहीं जाऊँ और तुम्हारे साथ बैठकर तुम्हारी समस्या पर विचार करें और उसका कोई उचित समाधान खोजने की कोशिश करें। क्यों? ठीक है ना?’ इतना कहते हुए उसने प्रश्नसूचक दृष्टि से सुनीता की ओर देखा।
सुनीता
जिस उलझन और तनाव से गुज़र रही थी,
उससे उबरने के लिए उसे भी मानसिक सपोर्ट की बहुत ज़रूरत थी। वह भी चाहती थी कि कोई हो जिसके साथ बैठकर वह अपने मन की परेशानी को बाँट सके और तनाव से कुछ मुक्त हो सके। स्कूल न जाकर उसके साथ बैठकर समय व्यतीत करने के अशोक के आत्मीय निर्णय पर सुनीता मौन रह गयी थी। बिना कुछ बोले अशोक को आने का संकेत करते हुए वह घर के अंदर हो गयी। अशोक भी उसके पीछे-पीछे उसके घर के अंदर प्रवेश कर गया।
घर के नाम पर वह टीन की छत का एक कमरा था,
जिसमें एक ओर चूल्हा और गैस का सिलिंडर रखा था। वहीं पर कुछ बर्तन,
आटे का कनस्तर और कुछ डिब्बे रखे थे,
जिनमें दाल,
चावल और मसाले आदि रखे थे। दूसरी ओर दीवार के साथ एक तख़्त बिछा था जिस पर रूई के गद्दे पर सुनीता की मां लेटी थी। कमरे के बीचों बीच एक रस्सी पर परदा डालकर उसे दो भागों में बाँटा हुआ था। परदे के दूसरी ओर का भाग सुनीता और उसके छोटे भाई संजय के पढ़ने और सोने की जगह थी। जगह बहुत कम थी किंतु किसी तरह दोनों की किताबें और कपड़े रखने के बाद उनके सोने के लिए जगह बनायी हुई थी। संजय स्कूल गया हुआ था।
घर के अंदर प्रवेश करते ही सुनीता ने माँ से अशोक का परिचय कराया,
‘माँ,
ये अशोक है। मेरा स्कूल का सहपाठी और दोस्त। ये ही रोज़ मुझे अपने साथ स्कूल लेकर जाता है।’
अशोक ने दोनों हाथ जोड़कर उनको अभिवादन करते हुए कहा, ‘नमस्ते आंटी। ‘नमस्ते बेटा!…..जीते रहो| खूब पढ़ो| ख़ूब लम्बी उमर मिलै। खूब तरक्की करो तुम|’ यह कहते हुए उन्होंने स्नेह और वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से अशोक की ओर देखा और बिस्तर से उठकर बैठने की कोशिश की| किन्तु कमजोरी और दर्द के कारण वह उठ नहीं सकी। उठने की कोशिश में उनको बहुत पीड़ा हुई और उनके मुँह से एक कराह निकली। सुनीता ने अपने हाथों का सहारा देकर उनको बैठाया। अशोक करुणा और सहानुभूति से उनको देख रहा था। मां की कमर के पीछे तकिया लगाते हुए सुनीता ने अशोक को बताया, ‘मां को उठने-बैठने में तकलीफ होती है| अपने आप वह उठ-बैठ नहीं पाती हैं। उनको उठाना-बैठाना पड़ता है।’
‘जब तुम्हारा भाई और तुम दोनों स्कूल चले जाते हो तब बाद में कौन उठाता-बैठाता है उनको?’
अशोक ने जिज्ञासा व्यक्त करते हुए कहा।
सुनीता
ने उसकी जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया,
’मैं स्कूल जाने से पहले मां के हाथ-मुँह धुलवाकर और उनको नास्ता-पानी देकर जाती हूँ। जब तक हम स्कूल से आते हैं वह बिस्तर पर ही लेटी रहती हैं। स्कूल से आने पर उनको बैठाते हैं।’
सुनीता
के इन शब्दों से अशोक के मन की जिज्ञासा पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। उसके जिज्ञासु मन में दूसरा प्रश्न उभरा,
‘लेकिन टोयलेट जाने की आवश्यकता पड़े तो कैसे जाती होंगी वह?’
सुनीता
ने बताया,
‘सुबह को मैं उनको टायलेट करवाकर जाती हूं। स्कूल से आते ही सबसे पहले उनको टायलेट ले जाती हूं। इस तरह से मैनेज हो जाता है।’
‘लेकिन
इसमें तो कई घंटे हो जाते हैं। इतनी देर में तो प्यास भी लगती होगी उनको और पेशाब भी आता होगा। हम-तुम लोग भी तो स्कूल में एकाध बार चले ही जाते हैं टायलेट। आंटी कैसे करती होंगी?
उनको तो बहुत दिक़्क़त होती होगी?’
‘मैं उनको चाय-नास्ता और दवाई देकर जाती हूँ। वैसे तो दवाई के नशे में ही लगभग दोपहर तक वह सोयी रहती हैं। लेकिन फिर भी उनको नींद नहीं आए या पेशाब की दिक़्क़त होती है तो मम्मी को-ओपरेट करती हैं।’
‘को-ओपरेट?’
अशोक को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। वह अपना आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला,
‘कैसे को-ओपरेट करती हैं वह?’
‘उनको कितना भी ज़ोर से प्रेसर आए,
हमारे स्कूल से आने तक वह कंट्रोल किए रहती हैं।’
सुनीता ने स्पष्ट करते हुए कहा।
‘लेकिन
यह भी तो बहुत सही नहीं है हेल्थ के लिए। ऐसा करने से भी कभी-कभी बीमारियाँ हो जाती हैं।’
अशोक ने स्वास्थ्य के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
‘हाँ,
यह बात तो है। लेकिन ऐसा नहीं करें तो करें क्या?
और कोई विकल्प भी तो नहीं है।’
सुनीता अपनी विवशता समझाते हुए बोली। उसने आगे बताया,
‘हाँ,
एक बात का ध्यान हम ज़रूर रखते हैं कि सुबह के समय मां को बहुत कम पानी पिलाते हैं ताकि मेरे स्कूल से आने तक उनको टायलेट की कोई समस्या नहींहो। और स्कूल से आने पर सबसे पहले मैं उनको टायलेट ही करवाती हूँ।उसके बाद कुछ और करती हूँ।’
सुनीता
के लिए यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। वह सहज रूप से यह सब बता रही थी। लेकिन अशोक को उसकी बातें सुनकर सुखद आश्चर्य हो रहा था। वह सुनीता की ओर देखते हुए बोला,
‘कितना मुश्किल है यह सब। ……. स्कूल जाना,
घर का सारा काम करना और मां की देखभाल ….। इतने सारे काम। कैसे कर लेती हो तुम यह सब?’
‘करना पड़ता है अशोक। कोई और करने वाला नहीं है ना। …….मजबूरी सब करना सिखा देती है और सब कुछ करने की ताक़त दे देती है।’
यह कहते हुए उसने मां के बिस्तर के पास में रखे लकड़ी के स्टूल को एक कपड़े से साफ़ किया और अशोक को उस पर बैठने का संकेत करते हुए बोली,
‘बैठो,
मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ। फिर तसल्ली से बैठकर बात करेंगे।’
स्टोव
पर चाय का पानी रखने के बाद सुनीता,
अशोक के बैठने के लिए जगह बनाने में लग गयी। जब तक चाय का पानी गरम हुआ उसने कपड़े,
किताबें आदि ठीक से व्यवस्थित करके अशोक को बैठने के लिए जगह बना दी और चाय के पानी में चीनी डालते हुए अशोक से पूछा,
‘कितनी चीनी लोगे अशोक,
हल्की या चखार?।
‘ज़्यादा नहीं, नॉर्मल ही।’ ‘ओ के।’
अपने दोनों हाथ बिस्तर पर टिका कर उनके सहारे दीवार से कमर लगाकर बैठने की कोशिश करते हुए सुनीता की मां ने अशोक की ओर देखा और बोली, ‘कैसे हो बेटा? तुम्हारे मम्मी-पापा कैसे हैं
‘अच्छे हैं आंटी।’ ‘सुनीता तुम्हारी बहुत तारीफ़ करती है। जिस तरह आजकल का माहौल ख़राब है, उसमें लड़कियों का अकेले घर से निकलना दूभर है। जहाँ देखो वहाँ, गली-मौहल्लों में, चौराहों पर, सब जगह आवारा लड़कों के झुंड दिखायी देते हैं। छुट्टे साँड़ से घूमते ये लुच्चे-लफ़ंगेआती—जाती लड़कियों को गंदी नज़र से देखते हैं और छेड़ते हैं, लड़कियों का जीना हराम किए रहते हैं। लड़की देखने में थोड़ी ठीक-ठाक हो तो और ज़्यादा मुसीबत है। इस माहौल को देखकर मेरा तो मन नहीं करता कि सुनीता घर से बाहर क़दम भी रखे। बिना पढ़े रह ले वो ठीक है, कोई दाग़ लग गया तो जनम ख़राब हो जाएगा। ……बेटा तुम रोज़ स्कूल उसके साथ चले जाते हो और साथ में आ आते हो तो उससे बड़ा सहारा मिलता है, नहीं तो मैं यह सोचकर ही काँप जाती हूँ कि सुनीता को अकेले ही स्कूल जाना पड़े तो कैसे करेगी वह? जब तक यह सही-सलामत घर नहीं लौट आती है, मन में हमेशा डर बना रहता है कि कहीं कुछ ऐसा-वैसा ना हो जाए।’ यह कहते हुए उनके चेहरे पर चिंता की मोटी-मोटी रेखाएँ उभर आयी थीं।
सुनीता की मां ने जो कुछ भी कहा था अशोक उसकी सच्चाई से अच्छी तरह परिचित था। वह स्वयं रोज़ अपनी आँखों से आवारा लड़कों को,
लड़कियों को छेड़ते और उन पर भद्दी और अश्लील टिप्पणियाँ करते देखता था। उनकी इन हरकतों का कोई विरोध करे तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। सुनीता के साथ उसे जाते देखकर कई लड़के उस पर भी तरह-तरह की टिप्पणी करते थे। पहले उसे ‘सुनीता का बोडी-गार्ड’
कहकर चिड़ाने की कोशिश की जाती थी। लेकिन वह उनकी बातों पर ध्यान न देकर और बिना उनकी ओर देखे चुपचाप निकल जाता था। उसके हम-उम्र लड़के ‘साले ने क्या पटाखा लड़की पर हाथ मारा है’
कहकर उस पर व्यंग्य करते थे तो बड़ी उम्र के लड़के डराने-धमकाने के अन्दाज़ में बात करते थे। एक दिन शाम को वह किसी काम से कहीं जा रहा था कि गली के कोने पर दो-तीन आवारा क़िस्म के लड़कों ने अकेले में उसको रोक लिया। एक लड़के ने उससे पूछा,
‘क्यों बे,
क्या लगती है वो तेरी?’
उसके कहने के अन्दाज़ से अशोक को यह समझने में देर नहीं लगी कि उसके कहने का आशय क्या है। किंतु,
वह अनभिज्ञता प्रकट करता हुआ बोला,
‘कौन?
किसकी बात कर रहे हैं आप?’
‘ज़्यादा भोला मत बन। रोज़ जिसके साथ चिपक कर स्कूल जाता है उसकी ही बात कर रहे हैं। अब समझा?’ इस बार दूसरा लड़का बोला था। ‘तो सुनीता की बात कर रहे हो तुम लोग? ‘हाँ, उस की ही बात कर रहे हैं। ‘मेरी कुछ नहीं लगती है वह ‘कुछ नहीं लगती है तो क्यों उसके साथ चिपका फिरता है तू?’
‘हम दोनों एक स्कूल में और एक ही क्लास में पढ़ते हैं और इस कारण स्कूल भी एक साथ चले जाते हैं हम। इसमें चिपकने की कौन सी बात है।’
‘अच्छा, तो यह कोई बात नहीं है?’ उसने लगभग घूरते हुए अशोक की आँखों में अपनी आँखें गड़ाते हुए प्रश्न करते हुए कहा ‘नहीं, मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ भी ग़लत है।’ अशोक ने पूर्ववत उसी सहजता से उसके प्रश्न के जवाब में कहा।
अशोक की बात को सुना-अनसुना कर तीसरे लड़के ने अपने एक हाथ से उसके मुँह को दबाते हुए धमकी भरे स्वर में कहा,
’ओए,
यह सही ग़लत मत सिखा हमें। बस,
उस लड़की से दूर रह तू। …..और याद रख वह हमारा माल है। तेरे कारण वह हमारी बात नहीं सुन रही है। पर देखते हैं कब तक नहीं सुनती है। सुननी तो पड़ेगी उसे हमारी बात। राज़ी से सुनेगी तो राज़ी से नहीं तो ग़ैर-राज़ी सुनेगी। तू रास्ते से अलग हट जा,
नहीं तो उसके साथ-साथ तेरा भी…….,
समझ रहा है ना
?……’
उन लड़कों की बातों के तेवर से अशोक को यह आभास हो गया था कि आने वाला समय सुनीता के लिए बहुत अच्छा नहीं है। उसके साथ कुछ भी हो सकता है। और यदि वह इसी तरह सुनीता के साथ स्कूल जाता रहा तो वह भी चपेट में आए बिना नहीं रहेगा। कई दिन वह इस बात को लेकर परेशान रहा और सोचता रहा कि वह क्या करे और क्या नहीं करे। पहले उसने सोचा ‘ये आवारा लड़के हैं। आए दिन किसी न किसी के साथ मार-पीट करते रहते हैं। यदि मैंने सुनीता के साथ स्कूल जाना नहीं छोड़ा तो ये लोग मेरे साथ भी मार-पीट कर सकते हैं। वे हिंसक और लड़ाके हैं। उनका मुक़ाबला मैं नहीं कर सकता।’
लेकिन सुनीता का ख़याल आया तो वह सोचने लगा
‘इस स्थिति में सुनीता का साथ छोड़ना भी उचित नहीं है। ….. तब क्या करूं?’
इसी उधेड़-बुन में पड़े हुए अंतत:
उसे एक उपाय सूझा। अगले दिन मिलते ही उसने सबसे पहले सुनीता को सम्भावित ख़तरे के प्रति आगाह किया,
‘तुम संभल कर रहा करो। स्कूल से आने के बाद भी घर से बाहर अकेले कहीं मत जाया करो।’
‘तुम्हारी
बात तो ठीक है। स्कूल आते-जाते तो लड़के जो छींटाकशी करते हैं सो करते हैं,
स्कूल के बाद किसी काम से घर से बाहर निकलना पड़ जाए तो लोग मुँह से लार टपकाते हुए ऐसे घूर-घूर कर देखते हैं कि वहाँ से गुज़रना मुश्किल पड़ जाता है। अशोक,
मैं रोज़ अपने ऊपर उठती बहुत सी नज़रों को देखती हूँ और उन नज़रों की भाषा को भी अच्छी तरह समझती हूँ। इसलिए स्कूल से आने के बाद जब तक बहुत ज़रूरी नहीं हो,
मैं अब घर से बाहर नहीं निकलती हूँ। घर का सामान लाने के लिए बाज़ार भी मैं आस-पड़ौस की किसी न किसी आंटी के साथ जाती हूँ और महीने भर का राशन और सब ज़रूरी सामान एक बार ही ले आती हूँ। लेकिन छोटी-मोटी कोई चीज़ लाने के लिए कभी-कभार मौहल्ले की दुकान पर ज़रूर जाना पड़ता है।’
‘मेरी बात मानो तो मौहल्ले की दुकान पर भी तुम अकेले मत जाओ अब। ……… तुम्हारा भाई भी इतना बड़ा तो है कि वह दुकान से सामान ला सके।’
‘हाँ, है तो।’
‘तो फिर अपने भाई से मँगवा लिया करो,
यदि मौहल्ले की दुकान से कोई सामान मंगवाने की ज़रूरत पद जाए तो। इससे वह भी कुछ समझदार और ज़िम्मेदार बनेगा,
तुम्हारे काम में कुछ हाथ बँटेगा और इस तरह की समस्या से भी बचोगी।’
अशोक ने सुझाव दिया।
सुनीता
को अशोक का सुझाव सही लगा। उसने सहमति में सिर हिलते हुए कहा,
‘हाँ,
यह सही है। तुमने बहुत अच्छा सुझाव दिया है। अब से ऐसा ही करुंगी।’
उस दिन के बाद से सुनीता ने स्कूल से आने के बाद घर से बाहर निकलना बिलकुल बंद कर दिया था। लेकिन समस्या ख़त्म नहीं हुई थी। पुरुष वातावरण में चारों ओर फैली सुनीता के सुंदर कुँवारे शरीर की मादक गंध लड़कों को आकृष्ट कर रही थी। उस गंध में मदहोश लड़कों ने अब सुनीता के घर के बाहर जमघट लगाना शुरू कर दिया था और इस बात के इंतज़ार में कि कभी तो सुनीता अपने घर से बाहर निकलेगी तभी उससे अपने मन की बात कहेंगे,
सारा दिन वहीं पर पड़े रहते थे। मौहल्ले के लोग यह बात अच्छी तरह समझ रहे थे कि लड़कों की भीड़ सुनीता के घर के बाहर ही क्यों रहती है। आस-पड़ौस के एक-दो बड़े बुज़ुर्ग ने उन लड़कों को टोका भी कि ‘यहाँ क्यों जमघट लगाए हुए हो तुम लोग। चलो,
यहाँ से हटो और अपने घर जाओ।’
लेकिन लड़कों पर उनकी बात का कोई असर नहीं पड़ा। दो-चार मिनट के लिए वे वहाँ से तितर-बितर हुए और बुज़ुर्ग के वहाँ से हटते ही फिर से जमावड़े में बदल गए।
व्यक्ति
अपने आप में कितना ही सही हो,
कमी निकालने वाले कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं। सारा मौहल्ला जानता था कि सुनीता एक सौम्य,
शालीन और अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। कभी किसी से कोई फ़ालतू बात करते किसी ने उसे नहीं देखा था और न ही उसके बारे में ऐसा कुछ सुना था। सारा मौहल्ला इस बात के लिए उसकी प्रशंसा करता था कि पिता की असमय मौत के बाद इतनी कम उम्र में किस तरह से परिवार का भार अपने ऊपर लेकर पूरी ज़िम्मेदारी से वह सब कुछ कर रही थी। सारे मौहल्ले के लिए वह एक मिसाल थी। बहुत से लोग उसके प्रति सहानुभूति रखते थे। लेकिन उसके घर के बाहर लड़कों के जमघट और हौ-हल्ले को देखकर मौहल्ले की कुछ औरतें उसके बारे में तरह-तरह की बातें बनाने लगी थीं।
एक दिन आपस में चर्चा करते हुए मीरा नाम की एक औरत कह रही थी,
‘राधा बहन,
सुभद्रा बहन,
मुझे तो ये लड़की ही कुछ तेज़ लगती है,
तभी उसके घर के बाहर सारे मौहल्ले के लड़के जमघट लगाए रहते हैं। नहीं तो मौहल्ले में और भी लड़कियां हैं,
किसी और के घर के बाहर तो कोई जमघट नहीं लगता इस तरह का।’
राधा उसके साथ सहमति व्यक्त करते हुए बोली,
‘हाँ,
मीरा बहन,
देखने में बड़ी सीधी लगती है,
पर सीधी नहीं घुन्नी है,
पूरी घुन्नी। घुन्ने लोगों का कोई भेद नहीं मिलता है।’
सुभद्रा
ने मीरा और राधा की बात में तड़का लगाते हुए कहा,
‘सुंदर भी तो कितनी ज़्यादा है। लड़के तो सुंदर लड़कियों के दीवाने होते ही हैं। अब लड़के इतनी सुंदर लड़की पर ना मरें तो किस पर मरें।’
सुनीता
की सुंदरता के बारे में सुभद्रा की टिप्पणी का समर्थन करते हुए मीरा बोली,
‘भई उसकी सुंदरता तो ग़रूर करने लायक है। कोई भी इतनी सुंदर लड़की अपनी सुंदरता पर ग़रूर करेगी ही। सुनीता भी अपनी सुंदरता पर ग़रूर करती है,
तभी तो मौहल्ले में कभी किसी से कोई बात नहीं करती है। जहाँ गुड होगा मक्खी वहीं तो आकर बैठेंगी। वह भी लड़कों को लुभा रही है,
तभी तो इतने सारे लड़के उसके आगे-पीछे नाच रहे हैं।’
राधा, जिसका घर सुनीता के घर के बिलकुल पास में ही था,
उसने अपनी राय देते हुए कहा,
‘मुझे तो ऐसा लगे है कि इस लड़की ने धंधा शुरू कर दिया है। तभी उसके घर के बाहर इतनी भीड़ लगी रहती है लड़कों की। थोड़ी-थोड़ी देर में उसके घर का दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ तो हमारे घर तक भी सुनायी देती है। ग्राहक ही खटखटाते होंगे दरवाज़ा,
नहीं तो और कौन खटखटाएगा। इससे पहले तो कभी उसके घर से दरवाज़ा खुलने या खटखटाने की आवाज़ नहीं आती थी।’
सुभद्रा
ने फिर से अन्य औरतों की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,
‘सही कह रही हो बहन तुम। सुना है हमारे मौहल्ले के ही नहीं,
दूसरे मौहल्ले के लड़के भी यहाँ के चक्कर काटने लगे हैं अब। हमारे मौहल्ले के लड़कों के साथ उनकी मार-पिटायी भी हुई है।’
मीरा ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा,
‘ऐं,
ये कब की बात है?
मौहल्ले में इतना सब हो गया और हमें कुछ पता ही नहीं है।’
राधा ने उसके आश्चर्य को शांत करते हुए बताया,
‘अभी दो दिन पहले की बात है। कई लड़कों के हाथ-पैर टूटे हैं और सिर भी फूटे हैं। पट्टी बंधी हुई हैं कईयों के हाथ,
पैर और सिरों में।’
मीरा आश्चर्य से माथे पार हाथ मारते हुए बोली,
’हाय रे,
गाँठ सी लड़की और इतना ज़ुल्म ढा रही है। ये लड़की है या जीती-जागती आफ़त। अभी से मार-काट मचवा रखी है इसने। आगे पता नहीं और क्या-क्या करवाएगी ये। इसके इतनी ही आग लग रही है तो किसी कोठे पर चली जावे कहीं,
यहाँ मौहल्ले में क्यों गंद मचा रही है।’
राधा ने उसकी बात में मिर्च-मसाला लगाते हुए कहा,
’अरे,
उसे किसी कोठे पर जाने की क्या ज़रूरत है। उसने तो घर को ही कोठा बना रखा है। और सबसे बड़ा ज़ुलम तो ये है कि उसकी मां को भी कुछ दिखायी नहीं देता। लड़की को ना सही कम से कम उसकी मां को तो अपनी इज़्ज़त-आबरू का ख़याल रखना चाहिए कुछ। वह भी अंधी बनी हुई है।’
‘उसकी मां तो बीमार है बेचारी। बिस्तर पर अपाहिज पड़ी रहती है। और ज़्यादातर समय दवाइयों के नशे में पड़ी रहती है। वो क्या कर लेगी यदि बेटी कुछ भी ऐसा-वैसा करे तो। कमरे में पर्दा डालकर दो भागों में बाँट रखा है। लड़की घर में किसी को बुलाएगी और कोई आएगा भी तो परदे के दूसरी ओर रखेगी उसे।’
सुभद्रा ने अपनी ओर से स्थिति की व्याख्या करते हुए राधा की बात का समर्थन किया।
उन औरतों के बीच एक बुज़ुर्ग महिला भी थी। सुनीता के बारे में उन औरतों की इस तरह की बातें सुनना उनको अच्छा नहीं लगा। वह इन औरतों को सुनीता के बारे में नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना छोड़ सकारात्मक होने की नसीहत देते हुए बोली,
’अरे नहीं,
ऐसी बात मत करो। इन बातों की गुंजाइश नहीं है। उसका भाई भी तो है। वह भी तो घर के अंदर ही रहता है। उसके रहते कैसे किसी को घर के अंदर बुलाकर कुछ कर सकती है वो।’
मीरा ने बुज़ुर्ग महिला का प्रतिवाद करते हुए कहा,
’अरे काकी,
उसका भाई तो अभी बच्चा है। खेलने-कूदने चला जाता है वह तो दूसरे बच्चों के साथ। उसके बाद वह किसी को भी घर में बुलाए,
कुछ भी करे,
कौन रोकने-टोकने वाला है।’
मीरा की बात को पानी देते हुए राधा बोली,
’अरी बहन,
वह जो करे सो करे,
अपने बच्चों को दूर रखो ऐसी लड़की से। मेरी चन्दा कभी-कभी उसके पास चली जाती थी,
पर जब से उसके बारे में यह सब सुना है,
मैंने तो साफ़ मना कर दिया है उसे सुनीता से मिलने को।’
सुभद्रा
ने भी राधा के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा,
‘सही कहती हो बहन। मैं भी अपने बच्चों से कहूँगी कि वे सुनीता से नहीं मिलें,
और ना उससे कोई बात करें।’
औरतों की इस चर्चा ने सुनीता को एक बदचलन लड़की के रूप में मंडित कर दिया था। कुछ ही दिन में उन औरतों की यह आपसी चर्चा उनके मुँह से निकलकर सारे मौहल्ले की दूसरी औरतों में, और उनके माध्यम से पुरुषों में भी फैल गयी कि सुनीता एक आवारा लड़की है और इसीलिए मौहल्ले के लड़के उसके घर के बाहर जमावड़ा लगाए रहते हैं। सुनीता के बारे में इस दुष्प्रचार के बाद उससे सहानुभूति रखने वाले बहुत से लोगों का दृष्टिकोण भी उसके प्रति बदल गया था और अब उन्होंने यह कहते हुए उन लड़कों को टोकना बंद कर दिया था कि ‘जब सिक्का ही खोटा है तो परखने वालों का क्या दोष।’ बल्कि बहुत से घर-गृहस्थी वाले और अधेड़ लोग भी मुँह से लार टपकाते हुए, लोगों से नज़रें बचाकर अंधेरे-उजाले सुनीता के घर के सामने से गुज़रने लगे थे। कभी-कभी थोड़ी-बहुत देर वहाँ बैठ भी जाते थे। इससे लड़कों का उत्साह और बढ़ गया था और कभी-कभी कोई लड़का किसी न किसी बहाने से सुनीता के घर का दरवाज़ा खटखटा देता था। दिन में रास्ता चलता था और कोई न कोई वहाँ से निकलता रहता था। लेकिन साँझ ढलने के बाद गली से लोगों का आना-जाना कम हो जाता था, इसलिए इस तरह की हरकतें शाम के समय ही होती थीं। शुरू में एक-दो बार सुनीता ने दरवाज़ा खोला, लेकिन लड़कों की शरारत को समझकर बाद में सुनीता ने दरवाज़ा खोलना बंद कर दिया था। और कहीं सच में ही कोई आया न हो, यह देखने के लिए सुनीता के बजाए उसका छोटा भाई दरवाज़ा खोलने लगा था।
वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम का दलित साहित्य में खासकर महत्वपूर्ण अवदान है. उनके कई उपन्यास एवं कविता-संग्रह प्रकाशित हैं. क्रमशः
(कांग्रेस की टिकट पर महाराष्ट्र के वर्धा से लोकसभा की उम्मीदवार चारुलता टोकस ने अपनी मां दिवगंत राज्यपाल प्रभा राव को याद करते हुए यह आलेख 26 अप्रैल 2010 को उनके दिवगंत होने के पूर्व स्त्रीकाल के लिए लिखा था. यह लेख राजनीति से परे माँ बेटी के प्यार, देख-भाल और अनुशासन के उस पक्ष को उजागर करती है जो दिग्गज राजनीतिज्ञों के सन्दर्भ में जनता से लगभग अछूता रह जाता है. प्रभा राव कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री तो रही ही हैं, लेकिन उनकी बेटी चारुलता ने अपनी राजनीति की शुरुआत स्थानीय स्तर से की…. )
किसी भी व्यक्ति की
जिंदगी पर सबसे ज्यादा प्रभाव उसके माता-पिता का पड़ता है और मैं भी इसका अपवाद
नहीं हूँ. आज अपनी जिंदगी में मैं उन्हीं के दिए गए संस्कारों,दिशा निर्देशों,
कमजोर समय में उनके दिए गये हौसले और ऊँचाईयां तय करते वक्त उनके प्रोत्साहन
द्वारा ही विभिन्न सफल किरदार निभा रही हूँ.
महाराष्ट्र के वर्धा से कांग्रेस की उम्मीदवार चारुलता टोकस
मेरी माँ महामहिम प्रभाताई राव, जो वर्तमान में राजस्थान की राज्यपाल हैं, राजनीति का बड़ा लंबा सफर तय करके आज इस मुकाम पर पहुँची हैं. उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत 1962 में वर्धा जिला परिषद् व पंचायत समिति की सदस्या के रूप में हुई. वे वर्धा जिला मध्यवर्ती बैंक तथा भूविकास बैंक की संचालिका भी रहीं. 1965 में उन्होंने भूविकास बैंक की अध्यक्षा का पद सुशोभीत किया. 1972 में पहली बार कांग्रेस की टिकट पर देवली-पुलगांव विधान सभा क्षेत्र से निर्वाचित हुईं. उसके बाद कई साल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रही, फिर विपक्ष की नेता बनी, महिला आयोग की अध्यक्षा भी रहीं. 1999 में वे लोकसभा की सांसद निर्वाचित हुई और दो बार महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा रहीं. 2000 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस की महासचिव रहीं. अपने उपरोक्त सभी पदभारों का सुचारू रूप से व स्वच्छ तरीके से निर्वाह करने के बाद वे, 2008 में हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल बनीं और जनवरी 2010 से उन्होंने राजस्थान की राज्यपाल का पद ग्रहण किया है.
दिग्गज कांग्रेस नेता प्रभा राव
आज जब मुझसे मेरी
माँ और मेरे बीच के रिश्तों की व्याख्या करने को कहा गया तो काफी सोचने के बाद भी
मुझे लगा कि हमदोनों का रिश्ता एक आम माँ-बेटी जैसा ही है, शायद ही कहीं कोई फर्क
है. मेरी और मेरी बड़ी बहन की शिक्षा के लिए हमलोग देवली तहसील के कोल्हापुर (राव)
गाँव से मुंबई रहने चले आये. हमदोनो बहनों को मुंबई के ‘सेंट कोलंबा’ स्कूल में
दाखिला दिलाया गया. अपने व्यस्त जीवनचर्या से समय निकाल कर हमारा गृहकार्य देखतीं.
दिन में समय नहीं मिलता तो बहुत सवेरे उठकर (सुबह चार बजे उठना उनकी आदत थी) हमारा
काम पूरा कराती थीं. मुझे याद है मैं कई बार प्रश्न-उतर, कभी चित्रकारी,
बुनाई-कढ़ाई या गणित के प्रश्न लेकर सुबह पांच बजे उनके कमरे में पहुंच जाती थी.
मुझे देखकर अपनी फाइलें अलग रखकर मेरा काम पूरा करने में मदद करती थीं.
मुझे खेलकूद का
बचपन से ही बहुत शौक था और इसका श्रेय भी शायद उन्हीं को जाता है क्योंकि अपने
कॉलेज के दिनों में वे एक बहुत अच्छी एथलीट रही हैं. जब उन्होंने मेरी निशानेबाजी
की रूची को जाना तो मुझे बहुत प्रोत्साहित किया. जिस वजह से मैंने कई राष्ट्रीय और
अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में भाग लिया और महाराष्ट्र प्रदेश का प्रतिष्ठित
‘छत्रपति पुरस्कार’ प्राप्त किया.
माँ ने समाजशास्त्र
के साथ-साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी एम. ए. किया है, इसलिए वे हमें संगीत
सीखने को भी प्रेरित करती थी, किन्तु हमारा रूझान खेलों की तरफ ज्यादा रहा.
त्योहारों,
पारिवारिक समारोहों पर हमेशा उनकी कोशिश रहती थी कि वे हमारे साथ मौजूद रहें. एक
बार उनकी बेहद व्यस्तता के दौरान मेरा जन्मदिन पड़ा. शाम को वक्त से थोड़ा पहले ही
वे घर पहुँच गई, किंतु मुझे नाराज पाया. क्योंकि मेरा नया फ्रॉक तो आया ही नहीं
था. वे तुरंत मुझे लेकर बाजार गई और फ्रॉक दिलवाया, जिसे मैंने पहन कर खूब उछल-कूद
मचाई. आज मुझे लगता है कि उनपर वह मेरा इमोशनल अत्याचार था.
लाड़-प्यार के
साथ-साथ उनकी हमेशा कोशिश रही कि हम अनुशासित रहें. उनके कुछ नियम और सिद्धांत थे,
जिनका हमें पालन करना होता था. हमें स्कूल आने-जाने के लिए हमेशा बस इस्तेमाल करने
को कहा गया ताकि हम आम बच्चों के साथ मिलजुल कर रहें और विशिष्ट बच्चों की श्रेणी
से दूर रहें. इस तरह के कई कारण और भी है जिन्हें आज भी अनुकूल-प्रतिकूल माहौल में
मैं सहज ही महसूस करती हूँ. हर छूट मिलती थी मुझे, किन्तु उसके साथ एक हद बंधी
होती थी, जिसको पार करने की हिम्मत न उस वक्त थी और शायद आज भी नहीं है. आज यह डर
नहीं है, बल्कि संस्कार है, जो आत्मसात हो गया है.
छुट्टियों के दौरान
माँ और पिताजी हमें कहीं न कहीं घुमाने जरूर लेकर जाते थे. उनका सोचना था कि आप
जितना सफर करोगे, उतनी ज्यादा अच्छी तरह आप दुनिया को समझ सकोगे. हां घूमने की जगह
अपना बजट देखकर निर्धारित की जाती थी. जब उनको विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व
करने का मौका मिला तो एक बार मुझे और एक बार मेरी बहन को अपने खर्चे पर विदेश लेकर
गईं.
माँ के जीवन में कई
उतार चढ़ाव आये. माँ बसु परिवार से हैं, जिनका इतिहास सामाजिक आंदोलनों और
स्वतंत्रता आंदोलन से सम्बंधित है. हमारे नाना श्री गुलाबराव बसु ने ग्लासगो
यूनिवर्सिटी की इंजीनियरिंग की अपनी डिग्री त्याग दी और गांधी जी के साथ उनके नॉन
को-ऑपरेशन मूवमेंट में शामिल हो गये. हमारी नानी डॉ. मनुभाई बसु ने अपना अस्पताल
कस्तूरबा गांधी ट्रस्ट को समर्पित कर दिया था. माता-पिता के त्याग, बलिदान, साहस
और आत्मविश्वास के गुण मेरी माँ ने आत्मसात किये और मेरे पिताजी का साथ उनको हरकदम
पर मिला. हर चुनौती का सामना वे सहजता से कर लेती हैं. अपनी जिम्मेदारियों को पूरा
करने के लिए वे निरंतर अध्ययन भी करती रहती हैं. उन्हीं से प्रेरणा लेकर मेरे
बच्चे भी किताबें पढ़ने की रूची रखते हैं.
इंदिरा जी के
प्रोत्साहन और विश्वास के कारण माँ ने उनके विश्वसनीय लोगों में जगह बना ली थी.
उन्हें संगठनात्मक कार्यों की जिम्मेदारी सबसे पहले इंदिरा जी ने ही सौंपी थी. सारी
जिम्मेदारियों को काबिलियत से निभाते देख इंदिरा जी ने माँ को मंत्री बनाया तथा
देश-विदेश की विभिन्न कांफ्रेंस में भारत का नेतृत्व दिया है. इंदिरा जी सत्ता में
नहीं थी तब भी माँ लगातार उनके साथ रही. किसी भी प्रदेश में इंदिरा जी के दौरे के
दौरान वे हमेशा उनके साथ ही रहती थीं. एक बार मदुरै के दौरे में विरोधी पक्ष ने
इंदिरा जी पर हमला कर दिया तब माँ और निर्मला देशपांडे जी ने उनके ऊपर लेटकर
उन्हें लाठियों के आघात से बचाया था. हमले की बात सुनकर हम माँ से मिलने गये, तब
उनके शरीर पर घाव देखकर मैं रो पड़ी, किंतु वे मुस्कुरा कर मुझे समझाती रहीं. आज
पुरानी कई घटनाओं को याद करते हुए मुझे उन पर और अधिक गर्व हो रहा है.
इंदिरा जी के इस कथन से सीख लेते हुए कि “राजनीति में अगर रहना है तो टीका-टिप्पणी, निंदा, सहन करने की और पचाने की क्षमता होनी चाहिए” माँ ने जीवन के कटु-अनुभवों से सिख लेते हुए हर स्थिति का सामना करने की शक्ति प्राप्त की. जब मैं जिला परिषद् की अध्यक्षा बनी तो भी उन्होंने मुझे यही समझाया कि ‘किसी का बुरा मत करना. नेकी कर दरिया में डाल’ उनका कहना है कि गरीब के सेवा से ही भगवान की पूजा हो जाती है. श्री कोटेश्वर महाराज में उनका बहुत विश्वास है.
संक्षेप में अगर
उनका वर्णन करूँ तो वे एक कुशल गृहणी हैं जिन्हें मालूम है कि घर के किस कोने को
और किस व्यक्ति को किस वक्त उनकी कितनी जरूरत है. आज भी घर के रख-रखाव सफाई, साज
सज्जा में उनकी पूरी भागीदारी है. सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ अपना पारिवारिक जीवन
भी भरपूर जीती हैं. नाती, नातिनों के खान-पान की आदतों पर भी उनकी नजर रहती है और
उन्हें पौष्टिक भोजन खाने के फायदे बताती हैं. पचहतर वर्ष की उम्र में भी नियमित
व्यायाम, संतुलित आहार लेते हुए और बारह घंटे काम करते हुए वो आज भी हमारी
‘रोल-मॉडल’ हैं. मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उनको अच्छा स्वास्थ, ढेर सारी
खुशियाँ और दीर्घ आयु प्रदान करें.
बिहार के शेल्टर होम में लड़कियों का यौन-शोषण बदस्तूर जारी है. ताजा मामला बिहार के पूर्णिया शेलटर होम से सामने आया है. इस शेल्टर होम से मार्च के पहले सप्ताह में भागी लड़कियों में से एक का वीडियो-बयान स्त्रीकाल को मिला है. इस वीडियो में लड़की ने दावा किया है कि उसे अन्य लड़कियों के साथ हॉटल में ले जाया जाता था और उसका तथा अन्य लड़कियों का यौन-शोषण होता था. उम्रदराज लोग यौन शोषण करते थे. सूत्रों के अनुसार यह वीडियो सीबीआई के अधिकारियों को भी सौंप दिया गया है तथा पिछले दिनों पटना हाई कोर्ट के एडवोकेट अलका वर्मा ने संभवतः इसी वीडियो के संदर्भ में पटना हाई कोर्ट के जनहित याचिका बेंच के सामने मामला लाया था लेकिन बेंच ने उन्हें छुट्टियों के बाद आने को कहा. गौरतलब है कि अलका वर्मा मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में एक जनहित याचिका की वकील हैं. उधर इस वीडियो पर कोई ख़ास कार्रवाई जाँच एजेंसियों की ओर से भी होने की कोई सूचना नहीं है. इस वीडियो के सामने आने से बढ़ सकती हैं राज्य सरकार की मुश्किलें
बिहार में सुशासन के दावों के बावजूद लगातार लड़कियों के यौन -शोषण के मामले सामने आ रहे हैं. मुजफ्फरपुर मामले में दो दर्जन से अधिक आरोपियों पर चार्जशीट दाखिल हुआ है. यह घटना सरकार को कटघरे में खड़े करती है. उसके दावों के बावजूद ऐसी घटनाओं को रोक पाने में उसकी विफलता स्पष्ट है. 6 मार्च को पूर्णिया शेल्टर होम से कुछ लड़कियाँ भाग गयी थीं. उनमें से एक लडकी का वीडियो-बयान स्त्रीकाल को मिला. खबर है कि बाद में वह लडकी राज्य के एक शेल्टर होम में पहुंचा दी गयी.
वीडियो सामने आने के बाद हो सकता है कि चुनावी समय में राजनीति भी तेज हो. निगाहें अब कोर्ट की ओर है. गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर सहित बिहार के शेल्टर होम का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी सुना जा रहा है.
वीडियो में दिया गया लडकी का बयान:
लड़की: पूर्णिया बालिका गृह में रखी थी. वहाँ से भोर हो या रात हो, वहां से ले जाती थी और गलत-गलत काम करवाती थी वहाँ होटल बुक करवा के. जब.कभी भी ले कर चली जाती थी, गलत गलत काम करवाती थी इसलिए मैं वहाँ नहीं रहना चाहती थी इसलिए मैं वहाँ से भाग गई.
सवाल: कौन वहाँ से छोड़ता था तुमको ?
लड़की: नेहा झा ले जाती थी. कौन है नेहा झा? वो वहीँ की स्टाफ थी.
सवाल: ले जो जाता था कौन ले जाता था/
वही नेहा झा और दो चार गो लेडिज रहती थी.
सवाल: कहाँ ले जाता था?
होटल ले जाती थी. होटल पहले से बुक रहता था वो लोग का. वहीँ पर गलत गलत काम करवाती थी बहुत एजेड सब आदमी रहते थे वहाँ पे. गलत गलत काम होता था. साड़ी लडकियों को ले जाया जाता था. इसलिए पांच छे लड़की वहाँ से भागने की कोशिश की. पांच लड़की पकड़ा गई लेकिन मैं नहीं पकड़ाई.
सवाल: कितना दिन से बाल गृह में थी?
लडकी: चौदह दिन से.
सवाल: बाल गृह में क्या काम कराता था तुमसे?
सवाल: काम ऐसे झाडू-पोंछा, खाना बनाना और नहीं करती थी तो मारती थी.
सवाल : कौन मारती थी?
लडकी: वहीँ की स्टाफ मनीषा कुमारी, ललिता कुमारी, कंचन कुमारी ये सब थी.
सवाल: तुम वहाँ से कैसे भागी और क्यूँ भागी ?
लडकी: वहाँ से इसलिए भागी मतलब यही सब करवाती थी रोज-रोज. तंग करती थी इसीलिए. और वहाँ से मैं अकेली नहीं और सारी लड़की लोग भी भागी. जो मतलब आगे थी वो जो है न एक आंटी गेट खोली थी बाहर कपडा पसारने के लिए तबतक गेट खोली तबतक उसका फोन आ गया बात करने लगी और एक लड़की थी मेरे साथ साक्षी कुमारी वो गेट को कस के ठेल दी. गेट को ठेली ना तो उसका मोबाइल वोबाइल सब गिर गया तो उसको वो कस के पकड़ ली. एक ही गो स्टाफ थी और सब अन्दर में थी उसको कस के पकड़ ली तबतक उसको पकड़ी तबतक इधर पांच छ: लड़की भाग गई. इसमे मैं भी भागी और वो तो पकड़ा गई उसको कस के पकड़ के रखी थी, फिर अन्दर से बुलाई बोली तुमसब जल्दी आओ पकड़ो देखो लड़की लोग भागी. जबतक में उ लोग आते तबतक में हमलोग बहुत दूर में जा चुके थे.
सवाल: तुम पापा के साथ रहना चाहती हो या उस लड़का के साथ जिससे तुम शादी किये हो?
लडकी: पापा के साथ रहना चाहते थे पर पप्पा मम्मी रखने को तैयार नहीं हैं.
सवाल: अगर रखने के लिए तैयार हों तब?
लडकी: नहीं होंगे . इतना तो पता है.
पति के साथ रहना चाहती है?
लडकी: हाँ,
तुम अपने पति के साथ खुश हो रहने में?
लडकी: हाँ.
तुम्हारा उमर तो कम है जैसा लग रही है चेहरा से? नाबालिग लड़की हो इसीलिए तुमको बाल सुधार गृह में रखा गया.
लडकी:वहाँ रखा गया तो ठीक है लेकिन गलत-गलत काम होता था इसलिए वहाँ नहीं रहना.
क्या तुम्हारे साथ भी गलत काम किया गया?
लडकी: हाँ, मेरे साथ भी किया गया.
इसलिए तुम उस बाल गृह में नहीं रहना चाहती हो?
लडकी: हाँ,
तो क्या तुमको अगर कोर्ट में हाज़िर कराया जाए तो फिर बाल सुधार गृह में जाओगी या अपने घर जाओगी?
पिछले दिनों बेगुसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार द्वारा एक महिला पत्रकार को दिये गये सेक्सिस्ट जवाब, जाति के मसले पर उनकी समझ और आये उनके बयान, जेएनयू के छात्र आन्दोलन में उनकी भूमिका और उनके समर्थकों द्वारा उनके आलोचकों को दी जाने वाली माँ-बहन की गलियों पर उनकी चुप्पी का विश्लेषण करता सरोजकुमार का लेख:
सरोज कुमार
कन्हैया की पॉलिटिक्स क्या है !“देखिए जो लोग जाति को टिकाए रखना चाहते हैं, वे लोग कहते हैं कि जाति की ही बात न करो. यह करनी भी है तो हमीं करेंगे, अपमानित लोग नहीं करेंगे. यानी जुल्म सहते रहो.” -मान्यवर कांशी राम
चुनाव लड़ने की घोषणा करते कन्हैया कुमार और दायें उनके समर्थकों द्वारा लेखक को सोशल मीडिया में मिलती धमकियां और गालियाँ
पटना में 15 मार्च को बीबीसी हिन्दी के कॉनक्लेव के युवाओं और राजनीति से संबंधित सत्र में कन्हैया कुमार का स्वागत करते करते हुए संस्थान की पत्रकार रूपा झा ने कहा कि कन्हैया युवा चेहरा हैं और बहुत लोगों के लिए उम्मीद भी लेकर आए हैं. चूंकि उस दिन मान्यवर कांशी राम की जयंती थी, तो कन्हैया कुमार अपने संबोधन की शुरुआत में ही कांशी राम का नाम लेना और फिर न्यूजीलैंड में एक मस्जिद में नमाज पढ़ रहे करीब 40 लोगों की हत्या पर शोक प्रकट करना नहीं भूले. जाहिर है, वे बीते कई महीनों से बेगूसराय में लोकसभा चुनाव की अपनी उम्मीदवारी को लेकर जुटे हुए थे. कथित सेकुलर खेमे की किसी पार्टी के लिए दलित और मुसलमान वोट बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. दलितों के हितैषी होने का दावा तो घोर ब्राह्मणवादी और सांप्रदायिक भगवा बिरादरी भी करती है! खैर, कन्हैया भी इन दोनों तबकों का हितैषी होने का दावा बार-बार करते रहे हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा है या फिर संदेह की कई परतें उनके इर्द-गिर्द मौजूद हैं?
दलित-बहुजन आक्रोश
और आंदोलन पर काबिज होने की कवायद
जाहिर है, कन्हैया की ‘बहुत लोगों’ की उम्मीद बनकर उभरने की शुरुआत फरवरी, 2016 के उन्हीं दिनों हुई, जब रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या विमर्श का सबसे प्रमुख मुद्दा था और उसके विरुद्ध देशभर में मोदी सरकार के खिलाफ आक्रोश था. लेकिन 9 फरवरी को जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में क्रिएट किए गए विवाद के बाद मुख्यधारा की मीडिया, राजनीति और यहां तक कि बौद्धिक-अकादमिक तबके में भी जेएनयू अचानक सबसे प्रमुख मुद्दा बना जाता है और रोहित वेमुला संबंधित विमर्शों को परिदृश्य से बाहर करने की कोशिश होती है. कन्हैया कहते हैं (बीबीसी के उस कार्यक्रम में भी) कि रोहित वेमुला हो या फिर हालिया रोस्टर का मामला, जेएनयू इन मुद्दों का केंद्र (प्रतिरोध का) रहा है. जाहिर है, जेएनयू एक अहम संस्थान है और इसने विभिन्न मुद्दों और आंदोलनों-प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है. लेकिन क्या कोई भी शख्स या संस्थान इतना अहम हो जाता है कि बाकी उसके सामने चीजें गौण हो जाती हैं? क्या यह कोई छुपी हुई बात है कि दरअसल, कोई संस्थान या व्यक्ति नहीं, बल्कि यह दलित-पिछड़े-आदिवासी जैसे बहुजन वर्ग ही हैं, जिन्होंने रोहित वेमुला से लेकर खुद से संबंधित रोस्टर मुद्दे को लेकर आंदोलन खड़ा किया और सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया. रोहित वेमुला के मुद्दे पर आंबेडकर स्टुडेंट्स एसोसिएशन या फिर संस्थान देखें तो हैदराबाद विश्वविद्यालय की भूमिका को कोई नजरअंदाज कर सकता है क्या? या फिर रोस्टर के मुद्दे पर दिल्ली विश्वविद्यालय या इस जैसे अन्य संस्थानों को! जेएनयू महत्वपूर्ण संस्थान है, लेकिन इसके या किसी भी संस्थान या व्यक्ति के बहाने बहुजन जनता और उनके संघर्ष को हाशिए पर नहीं ढकेला जा सकता. पर कन्हैया ऐसा ही करते नजर आते हैं.
सेक्सिस्ट बोल!
जाति के प्रश्न को लेकर उनकी और उनके समर्थकों की मंशा पर तो पहले से ही सवाल उठते रहे हैं. लेकिन उन्होंने बीबीसी पत्रकार रूपा झा से पलटकर जो सवाल किया, वह उनके सेक्सिस्ट नजरिए को उजागर कर देता है. उनकी लोकप्रियता में उनकी जाति (भूमिहार) का भी फायदा मिला होगा, इस सवाल के जवाब में कन्हैया पलटकर रूपा झा से पूछते हैं ‘आपको मिला है क्या?’ रूपा झा कहती हैं कि कहीं न कहीं मिला ही होगा. तब कन्हैया उनसे कहते हैं, “दस बजे रात में जब आप दिल्ली में निकलेंगी तो जो मनचले हैं क्या आपको बस आपका नाम रुपा झा सुनकर छोड़ देंगे.”
विडंबना कि कार्यक्रम के दर्शकदीर्घा में आपको उत्साहपूर्ण कलरव सुनाई देगा (वीडियो में). जब कन्हैया इतने ‘पॉपुलर’ नहीं हुए थे, तो जेएनयू विवाद से करीब एक साल पहले उनपर एक लड़की के साथ बदतमीजी करने का आरोप लगा था और जेएनयू प्रशासन ने उनपर जुर्माना भी लगाया था. कन्हैया ने कथित तौर पर खुले में पेशाब करने पर टोकने पर उस लड़की के साथ बदतमीजी की थी. अब उन्होंने एक महिला पत्रकार पर सेक्सिस्ट टिप्पणी की. तो क्या वे अभी तक सेक्सिस्ट नजरिये से बाहर नहीं निकले हैं? वैसे भी, प्रगतिशीलता बस किसी एक समुदाय के प्रति आपकी अच्छी सोच से तो नहीं तय होती, बल्कि हर वंचित तबके, दलित हों या महिलाएं, सबके प्रति आपकी सोच से ही तय होती है. ऐसा तो नहीं चलेगा कि आप किसी के लिए प्रगतिशील रहें और बाकि के लिए संकीर्ण सोच रखें.
यह भी अनायास नहीं है कि बहुत लोगों के कथित ‘उम्मीद’ और युवा ‘नायक’ की महिला पत्रकार पर यह सेक्सिस्ट टिप्पणी कोई मुद्दा नहीं है. वरना सोचिए, शरद यादव की टिप्पणियों पर कितना हंगामा हुआ था. यहां तक कि लेफ्ट की वृंदा करात तक शरद यादव पर हमला बोलती रही हैं, उन्हें माफी मांगने को कहती रही हैं और एनडीटीवी में ‘शरद यादव, माइंड योर लैंग्विज’ जैसे कॉलम लिखती रही हैं. तो क्या युवा उम्मीद को कोई कहेगा कि कन्हैया, माइंड योर लैंग्विज!
रूपा झा को यह कहकर कि आपको झा जानकर कोई मनचला/अपराधी छोड़ देगा क्या, कन्हैया एक और पूर्वग्रह भी दिखाते हैं. ऐसा कहकर वे जताना चाहते हैं कि महिला मानो कोई जातिविहीन तबका है. क्या वे बताएंगे कि मनचलों, बलात्कारियों, हत्यारों का शिकार सबसे ज्यादा कौन-महिलाएं होती हैं? बहुजन महिलाएं क्या जाति की वजह से और आसान शिकार नहीं होतीं. लक्ष्मणपुर बाथे में कुल 58 में 27 महिलाओं, जिनमें कुछ गर्भवती थीं, क्यों भूमिहारों की रणवीर सेना ने क्यों मार डाला था? क्या इसकी वजह जाति नहीं थी! संसद में महिला आरक्षण को लेकर भी बहुजनों की यह तो चिंता है कि अगर महिला आरक्षण लागू हो तो उसमें भी वंचित समूहों की महिलाओं का प्रतिनिधित्व हो.
देखें वह वीडियो जिसमें कन्हैया कुमार बीबीसी की पत्रकार को सेक्सिस्ट जवाब देते हैं. पत्रकार उन्हें जेंडर और जाति की समझ देती है और झिड़कती भी है सवाल के बदले सवाल करने पर
जाति का सवाल
दलित हों या मुसलमान
या कोई भी अन्य बहुजन वर्ग, उनका नाम रटना आसान है बल्कि राजनीतिक ‘फायदे’ का सौदा भी लगता है,
लेकिन वहीं समुदाय जब प्रतिनिधित्व मांगने लगता है, तो सवर्ण तबके को दिक्कत होने
लगती है. मान्यवर कांशी राम ने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा था कि सवर्ण जातियां
यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश करती हैं और हमेशा नेतृत्व पर कब्जा करने की कोशिश
करती हैं. कन्हैया कांशी राम का नाम लेकर कह रहे थे कि उनके विचारों का समाज बनाने
की कोशिश होनी चाहिए. तो फिर नेतृत्व को लेकर हमेशा सजग रहे कांशी राम के विचारों
को मानते हुए कन्हैया ने नेतृत्व खुद करने की जिद को त्याग कर क्यों नहीं किसी
बहुजन को नेतृत्व करने देने का सोचा?
लेकिन नेतृत्व का
मुद्दा कन्हैया की पार्टी से भी स्पष्ट होता है. बिहार में पार्टी की राज्य कार्यकारिणी
में मुख्यतया भूमिहार समेत अन्य सवर्ण जातियां हैं. वहीं, बेगूसराय में भी पार्टी
में सवर्णों, मुख्यतया भूमिहारों का आधिपत्य है. गृह क्षेत्र होने के आलावा
कन्हैया या उनकी पार्टी ने उनकी उम्मीदवारी के लिए बेगूसराय को इसलिए भी चुना है
क्योंकि वहां भूमिहारों की अच्छी-खासी आबादी है और कन्हैया उसी समुदाय के हैं.
लेकिन, जाति का सवाल उठाते ही कन्हैया और उनके समर्थकों की ओर से इस तरह के कुछ सपाट जवाब उछाले जा रहे हैं: मसलन, “किसी सवर्ण जाति का होने भर से उन पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए….कन्हैया की जाति देख रहे लोग खुद जातिवाद कर रहे हैं.” कन्हैया ने बीबीसी के कार्यक्रम में खुद ही कहा, “जाति का हम कोई एप्लीकेशन (आवेदन) दिए हैं कि हमारी जाति क्या होगी?…आपकी जाति क्या होगी, इसमें आपकी क्या भूमिका है?” यह बेहद चालाकी भरा और धूर्त जवाब है. जाति की व्यवस्था किस समुदाय ने बनाई थी और इसकी यथास्थिति कौन-बनाए रखना चाहता है? जातिगत हाइरार्की फायदा कौन समुदाय उठाता आ रहा है. जवाब इसी में है कि क्यों सीपीआइ में नेतृत्व पर भूमिहार जैसे सवर्ण समुदायों का कब्जा है. मिसाल के तौर पर, 2015 में बिहार की पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में से करीब दर्जन भर लोगों को हटाया गया और उनमें अधिकतर वंचित बहुजन समुदाय के थे. अगले साल 31 सदस्यीय कार्यकारिणी में करीब 23 सवर्ण समुदाय के पार्टी नेता थे. अब भी ऐसा ही हाल है, जिसका नजारा पटना की प्रेस वार्ता को संबोधित करने वालों में भी दिखा जब उनकी उम्मीदवारी का ऐलान किया गया. और जाहिर है, देश के बाकी संस्थानों के प्रतिनिधित्व में किन जातियों का कब्जा है.
पप्पू यादव के साथ कन्हैया कुमार. पप्पू यादव महागठबंधन के बड़े नेता और विपक्ष की राजनीति को एकजूट करने में लगे शरद यादव के खिलाफ मधेपुरा से चुनाव लड रहे हैं. कन्हैया ने पप्पू यादव का समर्थन किया है
कन्हैया की दावेदारी दिखाती है कि नेतृत्व के मुद्दे को लेकर न तो पार्टी में बदलाव नजर आ रहा है, न ही कन्हैया जैसे सवर्ण नेताओं में. बल्कि उनकी उम्मीदवारी से पुष्ट हो रहा है कि दरअसल, वे लोग यथास्थिति को बनाए रखना चाहते हैं. इसमें सवर्णों से भरी पड़ी मीडिया का भी कम योगदान नहीं है. मीडिया मोदी/भाजपा के सामने भले ही कन्हैया को ‘देशद्रोही’ ठहराए लेकिन वे तेजस्वी/राजद के सामने मीडिया के लिए बहुत ‘अच्छे’ और ‘स्वीकार्य’ हो जाते हैं. यों ही नहीं, बेगूसराय में मीडिया के धड़े कन्हैया और भाजपा नेता गिरीराज सिंह के बीच मुकाबला दिखा रहे हैं और पिछले साल करीब पौने चार लाख वोट पा कर कुछ ही हजार वोट से भाजपा उम्मीदवार भोला सिंह से हारने वाले राजद उम्मीदवार तनवीर हसन को नजरअंदाज कर रहे हैं. जाहिर हैं, जाति का प्रश्न ही है, जो इन सभी के मुखौटों को नोच फेंकता है. यह अनायास नहीं है कि चुनाव लड़ने की घोषणा के समय कन्हैया के साथ बैठे चेहरे सवर्ण ही होते हैं और जब बीबीसी में सवर्णों के लिए 10% आरक्षण का सवाल किया जाता है तो गोलमोल जवाब देते हैं.
कौन हैं कन्हैया के
फॉलोवर, और कन्हैया किनके साथ
कन्हैया और उनके कथित प्रगतिशील वाम समर्थक भले ही नकारते हों, लेकिन उनके इर्द-गिर्द सवर्णों और मुख्यतया भूमिहारों की गोलबंदी नजर आती है. यह गोलबंदी अलग-अलग पार्टियों और समूहों से भी नजर आ रही है. यहां तक कि बेगूसराय के पूर्व भाजपा सांसद भोला सिंह ने नवंबर, 2017 में कन्हैया को आज का भगत सिंह बता डाला था. ठीक इसी तरह सवर्ण सेना के प्रमुख भागवत शर्मा ने हाल ही में कन्हैया की तारीफ की और उसे समर्थन दे डाला. इन तीनों में एक समानता यह है कि ये तीनों भूमिहार समुदाय से हैं. वहीं, भाजपा के वर्तमान उम्मीदवार गिरिराज सिंह (भूमिहार) भी बेगूसराय से नहीं लड़ना चाहते थे. इससे भी जाहिर है कि दरअसल वहां कन्हैया और उनके बीच भूमिहार वोट के बंट जाने का खतरा उन्हें लग रहा है, जो उनके लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है. हालांकि भागवत शर्मा का बयान कुछ और भी संकेत कर रहा है. भागवत कहते हैं कि ‘दरअसल भूमिहारों को भूमिहारों से, सवर्णों को सवर्णों से आपस में लड़ाने का काम, उन्हें तोड़ने का काम पार्टियां कर रही हैं, चाहे एनडीए हो या महागठबंधन.’ जो वे या भूमिहार नहीं चाहते. उदाहरण वे नवादा सीट का देते हैं, जहां से गिरिराज का पत्ता कटा, और चंदन कुमार (भूमिहार) को एनडीए की टिकट दी गई. जहानाबाद के वर्तमान सांसद अरुण कुमार (भूमिहार) भी वहां से लड़ने वाले थे.’ भागवत ने कन्हैया कुमार (भूमिहार) का भी समर्थन किया था. जाहिर है, दरअसल ये लोग चाहते हैं कि भूमिहार-भूमिहार आपस में नहीं भिड़े या कोई नहीं हारे, बल्कि जितना ज्यादा भूमिहार जीत सके, जीते. अरुण कुमार ने इसी रणनीति के तहत नवादा छोड़कर अब फिर जहानाबाद से लड़ने का फैसला लिया है. सो कन्हैया भी इसी समुदाय के नए ऊर्जावान लीडर हैं, जो भूमिहारों/सवर्णों की परंपरागत छवि वालों में ही नहीं बल्कि खुद को प्रगतिशील दिखाने वाले सवर्णों में भी स्वीकार्य हैं, जो लोग सीधे बरमेसर मुखिया टाइप नहीं बोलते. तो असल में यह दरअसल भूमिहार समुदाय के खुद को पुनरुत्थान करने की कोशिश है और कन्हैया पर दांव इसी रणनीति का हिस्सा है.
महागठबंधन के विरोध
के लिए पप्पू यादव से समझौता
कन्हैया पहले यह कहते रहे कि उनकी लड़ाई महागठबंधन से नहीं है और वे भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा नहीं करेंगे. लेकिन जाहिर है, महागठबंधन में जगह नहीं मिलने के बाद वे अपनी इसी बात से पलटते नजर आ रहे हैं. बेगूसराय में वे खुद राजद के खिलाफ उतरे ही हैं, वहीं उन्होंने मधेपुरा से पप्पू यादव का भी समर्थन कर दिया. उन्हीं पप्पू यादव पर जिनपर सीपीआइएम के ही नेता अजीत सरकार की हत्या का आरोप लगा था. पप्पू यादव ने राजद से सीट नहीं मिलने के बाद मधेपुरा से पर्चा भरा है, जहां से महागठबंधन की ओर से शरद यादव चुनाव लड़ रहे हैं. जाहिर है, कन्हैया की नजदीकियां भी बहुत कुछ संकेत दे देती हैं.
इसके अलावा क्राउड फंडिंग के जरिये धन जुटाने को लेकर भी कन्हैया सवाले के घेरे में हैं. पप्पू यादव के समर्थन और फिर क्राउड फंडिंग को लेकर वे पार्टी लाइन से इतर जाते भी नजर आते हैं. उनकी पार्टी के नेता अतुल अंजान ने बीबीसी को कहा कि कॉरपोरेट क्राउड फंडिंग का पार्टी समर्थन नहीं करती है. वहीं पप्पू यादव को लेकर भी राज्य नेतृत्व ने अनभिज्ञता जताई. जाहिर है, अपनी पार्टी को ‘कनफ्यूज पार्टी ऑफ इंडिया’ बताने वाले कन्हैया पार्टी से भी ऊपर उठे प्रतीत होते हैं. हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है. जेएनयू में कन्हैया तो प्रेसीडेंट बन गए थे, पर उसके अगले साल उनका संगठन (एआइएसएफ) चुनाव ही नहीं लड़ पाई थी. इसी तरह जेएनयू में 2017 के छात्रसंघ चुनाव में जब अपराजिता राजा अध्यक्ष पद के लिए खड़ी हुईं तो आरोप लगे कि कन्हैया ने कथित तौर पर उनकी बजाए संयुक्त लेफ्ट (जिसमें एआइएसएफ) शामिल नहीं था, उसके उम्मीदवार ( गीता कुमारी) का समर्थन किया था. गौरतलब कि अपराजिता राजा सीपीआइ नेता डी. राजा की बेटी हैं और दलित समुदाय से आती हैं. तो क्या कन्हैया को बस अपने जीतने भर से वास्ता है!
जेएनयू में छात्र आन्दोलन
जेएनयू आंदोलन में
कन्हैया की दोहरी भूमिका
जेएनयू में बतौर छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की कार्यप्रणाली पर भी बहुजन छात्रों ने सवाल उठाए थे. मसलन, कन्हैया पर आरोप हैं कि उन्होंने प्रवेश परीक्षा में द्विस्तरीय आरक्षण को खत्म करने वाले चार्ट पर हस्ताक्षर किए और आरक्षण तथा इन जैसे अन्य मुद्दों को यूजीबीएम में अपने विशेषाधिकार के जरिए चर्चा से रोक दिया. जाहिर है, यह कोई उनकी जाति का सवाल भर नहीं है कि उन्होंने किस जाति में जन्म लिया, बल्कि उनकी आलोचना उनके रवैये, अतीत के क्रियाकलाप और हाल के उनके कदमों को ध्यान में रखते हुए हो रही है. लेकिन, उनके समर्थकों को भला कौन समझाए. भक्त यहां भी हैं. मारने-पीटने की धमकी से लेकर गालियां देने वाले भक्त! मोदी भक्तों की तरह खबरों-बातों को तोड़-मड़ोड़ने वाले, फेक न्यूज फैलाने वाले, प्रोपगेंडा फैलाने वाले भक्त! मसलन, वे कह रहे हैं कि ‘कन्हैया को बेगूसराय से महागठबंधन ने टिकट नहीं दिया गया ताकि वे वहीं फंसे रहें और भाजपा के खिलाफ अन्य जगहों पर प्रचार न करें.’ तो कोई नीतीश कुमार का पुराना वीडियो डालकर वायरल करने की कोशिश कर रहा है कि नीतीश कुमार ने कन्हैया को समर्थन दिया, तो कई जीतन राम मांझी के समर्थन देने की बात फैला रहा है. जाहिर है, तिकड़में वही हैं!
कुछ ऐसी चुप्पियां भी हैं, जो बहुत शोर करती हैं. मसलन, बरमेसर मुखिया पर, भूमिहारों के बहुजनों पर अपराध पर चुप्पी, खासकर बेगूसराय में. जाहिर है, यकीन कैसे किया जाए!
सरोज कुमार मीडिया-शोधार्थी और फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं.
ये लेखक के निजी विचार हैं. स्त्रीकाल संपादन मंडल की सहमति अनिवार्य नहीं है.
उन्होंने समाज
राजनीति और साहित्य तीनों ही मोर्चे पर हाशिये की आवाज को एक अलग स्वर दिया।अपने
जीवन के अमूल्य 20 वर्ष बिहार में समाज और राजनीति में स्त्रियों की आवाज मुखर
करती रहीं।बिहार विधानसभा और बिहार विधान परिषद की सदस्य रहीं और लगभग 28 वर्ष
साहित्य में अस्मितावादी विमर्श को विकसित करने में लगीं रहीं।उन्होंने हर तरह की
वर्जनाओं और आम आदमी के खिलाफ खड़ी सामंती ताकतों से लोहा लिया।अपने जीवन के 89 वें
साल में भी वे लिखती ही रहीं।’
ये बातें आज
पटना में रमणिका गुप्ता की स्मृति में आयोजित शोक सभा में शामिल वक्ताओं ने
कही।साहित्यिक संगठन बागडोर, दूसरा शनिवार, समन्वय
और कोरस की संयुक्त पहल पर पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में इसका आयोजन संपन्न
हुआ।उपस्थित लोगों ने रमणिका गुप्ता की फोटो पर पुष्पांजलि अर्पित की, उनसे
जुड़ी स्मृतियां साझी की और उनकी कविताओं का भी पाठ किया।
प्रेमकुमार मणि
ने उनसे जुड़ी ढेर सारी यादों को साझा करते हुए कहा कि वे बिहार झारखंड में
समाजवादी आंदोलन की जुझारू कार्यकर्ता रहीं। आरंभिक दिनों में उनकी अच्छी तस्वीर
मेरे जेहन में नहीं थी लेकिन 90 के दशक में युद्धरत आम आदमी और रमणिकाफाउंडेशन के
माध्यम से
साहित्य में उन्होंने जो हस्तक्षेप किया उससे
उनके प्रति मेरी धारणा बदल गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा हाशिये की आवाज को
बल प्रदान किया।
पटना कॉलेज
के प्राचार्य रमाशंकर आर्य ने कहा कि रमणिका जी से उनका पहला परिचय 1997 में हजारीबाग
में हुआ जब वह उतर भारत में पहली बार दलित लेखकों का सम्मेलन आहूत करवाईं।उन्होंने
कहा कि उनके रमणिका फाउंडेशन में नृविज्ञानी रामदयालमुंडा, के.के.
नाग और मैं भी संस्थापकों में शामिल किया।उन्होंने हाशिये के समाज के लिए जो काम
किया उसका उदाहरण हिन्दी पटटी में उन्हें नजर नहीं आता। खासी संपन्न खत्री परिवार
में जन्म लेने के बाद भी उन्होंने जिस तरह से अपने का डिकास्ट किया उसका कोई शानी
नहीं।वे हमेशा आम आदमी की तरह सहज, सरल जीवन
जीने की हिमायत करती रहीं।उनका घर हाशिये के समाज से आनेवाले एक्टिविस्टों का
अड्डा था।श्री आर्या ने कहा कि रमणिकाजी ने देश के स्तर पर आदिवासियों का संगठन
खड़ा किया और उनके बेहतरी के लिए लगातार लगी रहीं।उन्होंने उनकी आत्मकथा ‘आपहुदरी
और हादसे को सीमोन दी बोबुआर और प्रभा खेतान की आत्मकथा की परंपरा की अगली कड़ी
बतलाया।
प्रो.तरुणकुमार
ने कहा कि रमणिका जी बहुत ही जीवटवाली शख्सियत थीं।साहित्य समाज के प्रति जिस
समर्पण के साथ उन्होंने काम किया उसकी नजर हिन्दी में जल्दी नजर नहीं आती।
पत्रकार
प्रमोद कुमार सिंह ने कहा कि रमणिका जी से उनकी मुलाकात का सुयोग कवि पंकज चौधरी
के माध्यम से संभव हुआ जब वह पटना में दलित लेखकों के एक सम्मेलन के सिलसिले में
आईं।उन्होंने कहा कि उन्होंने हर तरह की वर्जिनिटी को खुद के जीवन और साहित्य दोनों
ही धरातलों पर तोड़ा और समाज के अंतिम आदमी के पक्ष में अंत अंत तक लगीं रहीं।
कवि
नरेन्द्रकुमार ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पितकरते हुए उनकी कविता वरमाला रौंद दूंगी’ का
पाठ किया।
कवि राकेश
शर्मा ने कहा कि रमणिका जी शोषित, दमित समाज के
लिए आजीवन संघर्षरत रहीं।उनका जीवन हमें प्रेरित करता है किस माज के लिए एक लेखक
को किस तरह का जीवन जीना चाहिए।
संस्कृति
कर्मी समता राय ने कहा कि हम संस्कृर्ति कर्मियों को उनसे सबक लेना चाहिए कि जनता
के लिए किस तरह से लेखन और संघर्ष दोनें ही स्तरों पर काम करना चाहिए।
कार्यक्रम का
संचालन अरुण नारायण ने किया। इस मौके पर अरविंद पासवान, धृव
कुमार, अरविंद कुमार, अशोक कुमार
क्रांति आदि कई लोगां ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का समापन रमणिका जी की याद में दो
मिनट के मौन के साथ संपन्न हुआ।
“दलित
स्त्रीवाद पितृसत्ता और जाति के ढांचागत शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज उठाता है और विवाह
संस्था में लोकतांत्रिकता चाहता है. दलित स्त्रीवाद राज्य–समाजऔर परिवार में पितृसत्ता व सत्ता की जकड़न
से मुक्ति चाहता है और सभी संस्थाओं में ढांचागत लोकशाही एवं व्यवहारिक बराबरी
चाहता है. घरेलू
कामों और श्रमाधारित कार्यों के लिये सम्मान एवं सम्मानजनक वेतनमान चाहता
है. दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के बहुस्तरीय शोषण और जेंडर–विभेद के विभिन्न रूपों से घर,कार्यस्थल, वर्ण आधारित समाज, सड़कों और ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता के विभिन्न
फलकों परसंघर्षरत है.”
–
रजनी तिलक (स्त्रीकाल पत्रिका के वेब वर्ज़न में प्रकाशित अरुण कुमार प्रियम के साथ
एक साक्षात्कार में )
“दलित
स्त्रीवाद अंतरजातीय–अंतरधार्मिक विवाह को सामजिक
बदलाव का अस्त्र मानता है, जो सामुदायिक पितृसत्ता को खंडित करता है. यह दलित स्त्री को अपने फैसले लेने की आजादी
देता है. ये दलितों के आतंरिक जातिवाद का खंडन करता है
और जाति,जेंडर, वर्ग, और योग्यता के ब्राह्मणवादी मापदंडों को खारिज
करके समता–समानता, बंधुत्व और बहनापे की नींव पर प्रबुद्ध भारत के
निर्माण का स्वप्न देखता है. दलित स्त्रीवाद परिवार में लोकतांत्रिक मूल्यों
के सृजन का पक्षधर है.”
(वही )
उपर्युक्त दोनों उद्धरण रजनी तिलक
के स्त्री चिंतन का मूल आधार हैं. ये उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक साथ एक
साक्षात्कार में कहा था. रजनी तिलक ने स्त्रीवादी सैद्धांतिकी पढ़कर अपना स्त्री
चिंतन विकसित नहीं किया. न ही उन्होंने स्त्री चिंतन के कोई सिद्धांत दिए. हाँ, उनके
चिंतन से कोई भी सिद्धान्तकर स्त्रीवाद के सिद्धांत गढ़ सकता है. रजनी तिलक का
स्त्री चिंतन एक सृजन है. उन्होंने अपने स्त्रीवाद को रचा है.रजनी तिलक का स्त्री
चिंतन उनके द्वारा समता के लिए किये गए संघर्ष से पैदा होता है. उनका स्त्री चिंतन
मूलतः दलित स्त्री और अल्पसंख्यक यौनिकता (गे, लेस्बियन, ट्रांस जेंडर और किन्नर )पर
केन्द्रित है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह सवर्ण स्त्री के अपने अधिकारों की
लड़ाई में उसके साथ नहीं हैं. लेकिन वो सवर्ण या जिसे भारत में मुख्य धारा का
स्त्रीवाद कहा जाता है और दलित स्त्रियों की जीवन स्थितियों और समस्याओं में फर्क
करती हैं. इसीलिए उनके चिंतन का लक्ष्य
समूह हाशिये की यौन अस्मिताएं और दलित स्त्री है. रजनी तिलक के स्त्रीवाद और सवर्ण
स्त्रियों के स्त्री चिंतन में फर्क है. इसलिए रजनी तिलक के स्त्री चिंतन को अलग
नजरिये से देखा जाना चाहिए. रजनी तिलक का स्त्री चिंतन डॉ. अम्बेडकर के स्त्री
सम्बन्धी विचारों को स्त्रियों के जीवन में वास्तविक रूप में लागू करना है. रजनी
तिलक का स्त्री चिंतन आन्दोलन धर्मी है. यह खाली समय में कमरे में बैठकर लिखा गया
या किया गया विमर्श नहीं है. इन्होंने आन्दोलन से जुड़कर और उसमें काम करके स्त्रीवाद की अपनी समझ विकसित
की है.
मर्यादाओं के फ्रेम में जकड़ी स्त्री
को समाज ने इतने अवसर तक नहीं दिए कि वह अपने भीतर की धडकनें भी ठीक से सुन
पाती.जब कभी उसने अपने मानवीय अस्तित्व को आवाज दी तब हर तरफ से उस पर हमले होने
लगे. इस पीड़ा के एहसास ने उसके स्त्रीत्व और स्त्री रूप में उसकी अस्मिता को
तीव्रतर किया.
रजनी तिलक अपने जीवन के सफ़र में संघर्ष
करने से कभी पीछे नहीं हटीं. खुद की पहचान और अपने अस्तित्व को स्थापित करने की
लड़ाई उनके चिंतन को ऊंचाई प्रदान करती है.
रजनी तिलक पुरुष से अलग एक दुनिया
बनाने की बात नहीं करतीं हैं. उनका मानना है जब तक समाज स्त्री के प्रति सहज नहीं
होगा तब तक स्त्री मुक्ति का प्रश्न अधूरा है. मानवता का प्रश्न सम्पूर्ण मानव
जाति का प्रश्न है न कि केवल स्त्री या केवल पुरुष का.
1970 के दशक में ही स्त्री मुक्ति
को हवा देने वाली बेट्टी फ्रिडन ने नारीवाद की पहली लहर से अपने को अलग करते हुए
‘द सेकंड स्टेज’ नामक किताब लिखकर ‘परिवार’ को महत्व देना शुरू किया. लेकिन वो ‘परिवार’
जाहिर है पारम्परिक परिवार नहीं था. रजनी तिलक भी ऐसा मानती हैं कि ‘परिवार’ हो, लेकिन वो
पितृसत्तात्मक ढांचे वालापरिवार न हो.वो चाहती हैं कि परिवार लोकतान्त्रिक हो.
जब तक पितृसत्तात्मक पूंजीवादी समाज
में निजी संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए
वैध पुत्र यानि शादी से उत्पन्न पुत्र की अनिवार्यता और परिवार में पुरुष
(पिता, भाई, पति और पुत्र) का अधिनायकवादी वर्चस्व बना रहेगा तब तक औरत की
अस्मिता, अस्तित्व, अधिकार, सम्मान और समानता का हर संघर्ष अधूरा रहेगा. इसलिए वो
अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाह को सामाजिक बदलाव का अस्त्र मानती हैं और इसीलिये
वो परिवार के लोकतंत्रीकरण की मांग करती
हैं. वो कहती हैं कि संम्पत्ति, सत्ता और सम्मान में बराबर हिस्से के लिए औरतों को
सभी संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल हथियार की तरह करना चहिये.
रजनी तिलक मानती थीं कि हाशिये की
सभी अस्मिताओं को गौण अंतर्विरोधों पर संवाद करते हुए साझे संघर्ष की भूमिका बनानी
चाहिए.वो यह भी मानती थीं कि जब तक दलित स्त्री और स्त्री के संपत्ति के अधिकार
सुनिश्चित नहीं होंगे और उत्तराधिकार को पुत्राधिकार से मुक्त कर विस्तार नहीं
किया जायेगा तब तक स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण की व्यवस्था बनी रहेगी.
इसी जेंडर-विभेदऔरस्त्रीअसमानताके
कारण समाजमेंजोसंकुचनहैउसने रजनी तिलक कोउद्वेलित किया औरउन्होंनेसामाजिक
बदलावकेलिएकामकरनाआरम्भकिया और उन्होंनेअपने शुरुआती दिनों में पी.एस.ओ. (प्रोग्रेसिवस्टूडेंट्सआर्गेनाइजेशन
) नामकेप्रगतिशीलछात्रसंगठनकोज्वाइनकियाऔरआई.टी.आई. (औद्योगिकप्रशिक्षणसंस्थान) मेंयूनियनबनायी.
इसीदौरानवामपंथीविचारधाराकेसाथ-साथ रजनी तिलक अम्बेडकरवादी आन्दोलन और साथ ही स्त्रीवादी
संगठनों में भी जुड़ गयीं . रजनी जी ‘दलितपैंथर’ की दिल्ली यूनिट की संस्थापक सदस्य
हैं. ‘दलितपैंथर’ का संविधान बनाने में अन्य साथियों के साथ उनकी भी बराबर की हिस्सेदारी
थी.रजनी तिलक ने एक साक्षत्कार में बताया कि ‘दलितपैंथर’ कीदिल्लीयूनिटकागठनकरनेकेबादहमने
‘अखिलभारतीयआंगनवाड़ीयूनियन’ बनाई. ये सब काम करते हुए रजनी तिलक ने सन
2005सेदलितस्त्रीवादपरमहिलाआन्दोलनकेसाथचर्चाआरंभकी . 2007 मेंनागपुरमेंअक्टूबर
महीनेमेंदलितस्त्रीवादपरकार्यशालाआयोजितकी. सन2008 में ‘राष्ट्रीयदलितमहिलाआन्दोलन’
नाम से उत्तर भारत में दलित-आदिवासी महिलाओं की नेटवर्किंग के लिए संगठन
कीस्थापनाकी. बिहार, झारखण्ड, हरियाणा ,उत्तरप्रदेश, उड़ीसाऔरदिल्लीमें ‘राष्ट्रीयदलितमहिलाआन्दोलन’
कीएकहजारों सदस्यहैं. रजनीजीनेदलितों परहोरहेअत्याचारोंकीशताधिकफैक्टफाइंडिंगकीऔरअपने
जीवन के अंतिम दिनों में भी लगातार सक्रियरहीं . उन्होंने दलित, आदिवासी और अकेले रहने
वाली महिलाओं को डायन कहकर मार देने की घटनाओं का बिहार, झारखण्ड और उड़ीसा के१२जिलो
में ‘राष्ट्रीयमहिलाआयोग’ के साथ मिलकर अध्ययन किया और उन्होंने पाया कि‘डायन’
कहकर मारी जाने वाली औरतें सिर्फ दलित-आदिवासी और पिछड़े समुदाय की हैं.
रजनीतिलकनेस्त्री-मुक्ति आन्दोलन में जाति के सवाल पर लम्बी बहस चलाई एवं समांतर दलित आन्दोलन में जेंडर के सवाल को लगातार उठाया. वामपंथीऔरअन्यप्रोग्रेसिवआंदोलनोंमेंदलितमहिलाओंकेसवालएवंउनकेनेतृत्वपरबहसचलाई. स्त्रीवादी संगठनों के साथ जाति, वर्ग, पितृसत्ता और यौनिकता और यौन व्यापार पर संवाद के लिए उन्होंने दिसम्बर, 2015 में ट्रांसजेंडर, यौनकर्मी महिलाओं और प्रगतिशील महिला संगठनों के साथ एक 2 दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली स्थित गाँधी शांति प्रतिष्ठान में किया. इस संगोष्ठी का विषय था, ‘Resisting Caste and Patriarchy :Building Alliances’जिसमें उत्तर और दक्षिण भारत में स्त्री मुद्दों पर काम करने वाले स्त्री संगठनों, छात्र संगठनों, ट्रांसजेंडर समुदाय और यौनकर्मी महिलाओं, समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियोंने हिस्सा लिया. पहली बार यौनकर्मी महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के बारे में बौद्धिक वर्ग ने जाना कि इन समुदायों में जाति कैसे काम करती है. इस संगोष्ठी के बाद तथकथित मुख्य धारा के नारीवाद और दलित स्त्रीवाद के बीच संवाद का सिलसिला शुरू हुआ. रजनी तिलक ने एक पुल का काम करते हुए तमाम मुक्तिकामी संगठनों और व्यक्तियों के बीच संवाद का जरिया बनीं और एक साझे संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार हुई. जिसके फलस्वरूप महिलाओंकेसंसद, विधान सभाओं और विधान परिषद में भागीदारी हेतु आरक्षण के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण में दलित,आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदाय की महिलाओं के समानुपातिक प्रतिनिधित्व की मांगउ ठायी. स्त्री-मुक्ति आन्दोलन में दलित महिलाओं के स्टैंड-पॉइंट से स्त्री के सवालों को देखने के लिये महत्वपू र्ण हस्तक्षेप किया. स्त्री-मुक्ति आन्दोलन में हाशिये की महिलाओं के सवालों पर अलग से स्थान बनाने में वो सफल हुईं.
रजनी तिलक हाशिये की स्त्रियों के सरोकारों और उनप र होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज को मुखर करने हेतु ‘आंदोलित’ नाम की एक लघु पत्रिका का संपादन भी 2010 के बाद से लगातार कर रही थीं. इनके संपादकीय कर्म का सबसे महत्वपूर्ण काम है ‘राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन’ के जरिये नयी लेखिकाओं की खोज और उनके सृजन कर्म को व्यापक जन समाज तक पहुँचाने के लिए ‘अखिल भारतीय दलित महिला लेखन’ नामक श्रृंखला पुस्तक का संपादन. इसपुस्तकका संपादन रजनी जी ने2011 में शुरू किया. अब तक इसके दो खण्डों का प्रकाशनहो चुका है. तीसरा खण्ड जल्दी की प्रकाशित होने वाला है, जो दलित महिलाओं के आत्मकथ्यों पर आधारित है.
दलित स्त्रियों केआंदोलन में स्त्री-पुरुष समानता की मांग की जाती है।यहां पुरुषों का विरोध नहीं है,बल्कि स्त्री जागृति के साथ पुरुषों को जागृत करके महिलाओं के प्रति पुरुषों से समानता और सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।इसी आधार पर इस पुस्तक में ‘दलित स्त्री की दुनिया में पुरुष’ नाम का स्तम्भ प्रकाशित किया गया है. इस स्तम्भ में बेबी ताई काम्बले का एक लेखहै-‘मेरे निर्माण में बाबासाहब अंबेडकर का योगदान.’ रजनी तिलक जी के इस सम्पादकीय कौशल और जेंडर की सूझ-बूझ से पता चलता है कि वह रेडिकल नारीवादियों की तरह पुरुष विहीन स्त्रियों की दुनिया के निर्माण की पक्षधर नहीं थीं.
रजनी तिलक की चिंताओं में समाज का
शोषित वर्ग और हर समुदाय की स्त्री, समाज में हाशिये पर पड़े यौनिक-अल्पसंख्यक और
स्तरीकृत समाज के अंतिम सिरे पर खड़ा मनुष्य है. रजनी तिलक को प्राध्यापकीय लेखकों
की लॉबी ने कभी लेखक माना ही नहीं. न ही उनके लिखे को कोई तवज्जो दी. रजनी तिलक ने
कहानियां, कविताएं, लीफलेट्स, पम्फलेट्स, आंदोलनों में वितरित करने के लिए पर्चे,
स्त्री शिक्षा,स्त्रियों पर यौन हिंसाके विरोध के प्रति जनमानस में चेतना के
प्रसार के लिए लिए पर्चे लिखे. दलित-आदिवासी स्त्रियों और दलितों पर होने वाले
अत्याचार की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट और उनके साथ काम करते हुए जो अनुभव हासिल किया
उसको अपने आलेखों और निबन्धों में समाज से साझा किया. हिंदी साहित्य का कोई
अध्येता शायद ही रजनी तिलक के चिंतन और उनके काम के साथ कभी न्याय कर पाए. यदि
समाज विज्ञान का कोई शोध अध्येता उन पर शोध पूर्ण काम करेगा तो दलित और स्त्रियों
पर किये गए रजनी तिलक के काम से बौद्धिक समाज रूबरू हो सकेगा.
रजनी जी की
कविताओं के बारे में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में
अध्यापन करने वाले, ख्यातिप्राप्त कवि और आलोचक
प्रो. गोबिंद प्रसाद ने लिखा है कि “अधिकांश कविताओं की सांसें स्त्री मन
में उठने वाले सहज प्रश्न और चिंताओं से बुनी गयी हैं”.( रजनी तिलक के काव्य
संग्रह ‘हवा सी बेचैन युवतियां’ के फ्लैप से ) प्रो. गोबिंद प्रसाद ने ये बात रजनी
जी के दूसरे काव्य संग्रह की कविताओं के बारे में कही है. लेकिन ये बात उनके
सम्पूर्ण कविता-कर्म में लागू होती है. दुनिया में स्त्री ही वह मनुष्य है जिसकी
चिंताओं के घेरे में हर जीवन-व्यापार है. वो महज अपनी और अपनी समानधर्मा के
सुख-दुःख के बारे में ही चिंतित नहीं है. वह एक सर्जक है. जो नयी संतति का सृजन
करती है. इसलिए उसे प्रकृति द्वारा रची गयी हर शय की चिंता रहती है कि हर चीज बची
रहे और विकसित हो एवं अपने चरम उत्कर्ष तक पहुंचे. जब हम रजनी तिलक के पहले काव्य
संग्रह की कविताओं को देखते हैं तो ये पाते हैं कि वो जीवन से लबरेज़ हैं और उसे
आशा से देखती हैं. तभी वो ‘युद्ध नहीं बुद्ध चाहिये’ कविता में कहती हैं कि-
“क्यों खड़ी की तुमने बारूद के ढेर पर हमारी दुनिया मुझे जीवन से आस है मैं सावन को आँखों में भरकर बहारों में झूलना चाहती हूँ शांति, ज्ञान, करुणा मेरा गहना युद्ध,क्रूरता, तृष्णा तुम्हारा हथियार हिरोशिमा की तड़प मैं भूलना चाहती हूँ.”(पदचाप, पृष्ठ 6 )
यह रजनी तिलक और उनके प्रतिबद्ध
लेखन की विश्व दृष्टि है. हाशिये को अपने सृजन के दायरे में लाने वाले रचनाकारों
से एक सवाल अकसर पूछा जाता है कि आपकी विश्वदृष्टि क्या है? यह भी तोहमत लगायी गयी
कि अस्मितावादी कवि-लेखक सिर्फ अपना रोना रोते हैं. अपनी मुक्ति को ही वो मनुष्य
की मुक्ति मान लेते हैं. उनके सवालों का जवाब हैं रजनी जी की कवितायें और उनका वैचारिक लेखन. रजनी जी दलित-शोषित
समुदाय की स्त्री की प्रतिनधि आवाज हैं, लेकिन वो सिर्फ दलितों की पीड़ा और चिंताओं
के बयान तक सीमित नहीं है. उनकी चिंता यह
भी है कि ये धरती जो मनुष्य के जीवन का
आधार है, कैसे बचे? क्योंकि आज वैश्विक स्तर पर देखने को मिल रहा है कि फासीवाद और
पूंजीवाद के गठजोड़ ने दुनिया को बारूद के ढेर पर लाकर खड़ा कर दिया है. आज संहारक
हथियारों की बिक्री से विश्व शांति का ढोंग करने वाले अमेरिका जैसे देश अपनी
जी.डी.पी. की विकास दर ऊँची कर रहे हैं. रजनी जी को यह नहीं चाहिए. उनकी चिंता है
कि धरती बची रहे. उनका मानना है कि जब धरती बची रहेगी तभी मनुष्यता भी बचेगी. वो
ऐसी धरती चाहती हैं जो हरी-भरी हो. क्योंकि वो विकास के उस खतरे को देख रही हैं जो
आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकारों से वंचित कर रहा है. रजनी तिलक सावन
को आँखों में भरने की कामना करती हैं. वो नहीं चाहतीं कि दुनिया
में युद्ध हों. वो नहीं चाहतीं कि नागासाकी और हिरोशिमा जैसी त्रासदी फिर दोहरायी
जाये. इसलिए वो कहती हैं-
“हम जंग नहीं चाहते जीना चाहते हैं हम विनाश नहीं सृजन चाहते हैं हम युद्ध नहीं बुद्ध, चाहते हैं.” (वही, पृष्ठ-7)
रजनी तिलक ये बखूबी जानती हैं कि युद्ध
के दौरान अमेरिका ने जापान के दो शहरों, नागासाकी और हिरोशिमा में परमाणु बम
गिराये थे. उन बमों का असर आज तक वहां बना हुआ है. आज भी वहां के बच्चे मानसिक और
शारीरिक रूप से असक्षम पैदा हो रहे हैं. परमाणु विकिरण ने मानव जीन्स तक को
प्रभावित किया है. यह बात रजनी तिलक समझती हैं कि युद्ध में सबसे ज्यादा महिलाएं
ही प्रभावित होती हैं. इसलिए वो कहती हैं कि हम जीना चाहते हैं. हमें युद्ध नहीं,
बुद्ध चाहिए. ये उनकी वैचारिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धता है. रजनी तिलक की एक्टिविस्ट
और सर्जक एक कविता में बहुत आसानी से पहचानी जा सकती है. कविता है-‘तुम्हारा मानव
अधिकार’
“दादा तुमने मुझे स्नेह दिया छोटी बहन समझ मानवाधिकार का अर्थ सिखाया तुम थे जिसने उसे वाकील का घर दिखाया विश्वास नहीं होता.
जानना चाहती हूँ आज मैं बच्चों और स्त्रियों के सवाल क्या मानव अधिकार के सवाल नहीं? बच्चों की मुस्कान स्त्रियों का स्वाभिमान क्या उनका मानवाधिकार नहीं?” (वही,पृष्ठ 21-22)
स्त्री के पास अत्याचारों के अनुभवों का एक भण्डार होता
है जिसकी चाभी शायद ही कभी किसी के पुरुष के हाथ लगती होगी. स्त्री के प्रति बहुत
सदाशयी पुरुष भी अनुकूल समय देखकर पाला बदल देता है. रजनी ऐसे सदाशयी पुरुषों से
भी सवाल करती हैं. ये सवाल करने की ताकत उन्हें जीवन में मिले अनुभवों और उनकी आंच
में तपकर बाहर निकलने से आई है. स्त्री की नज़र और उसका मन हर भाव को बहुत सटीक
तौलता है. स्त्री किशोरावस्था से ही हर छुवन और शब्द के अर्थ को बिना किसी व्याकरणिक और शब्दकोशीय ज्ञान के
समझ लेती है. स्त्री जैविक उमर से पहले
सामाजिक उमर में बड़ी हो जाती है. जब वह कैश्योर्य जीवन के हुलसते दरिया को पार कर यथार्थ की भीषण
जमीन पर खड़ी होकर दुनिया को देखती है तो सच्चे-झूठे मनोभावों को पहचानने की शक्ति उसमें आ जाती है.
यही शक्ति रजनी तिलक से यह कहलवाती है कि-
“परिंदा हूँ मुझे खुला आसमान चाहिये, न बरगला मैं पिंजरा तोड़ के आयी हूँ. मुझे मेरी मंजिल है प्यारी, न डिगा मैं कांटे रौंद के आई हूँ. ढूंढ कोई और महबूबा न बहा अश्क, मैं आशिकी की दीवारें फांद कर आयी हूँ.”(वही,पृष्ठ 14)
रजनी तिलक जी की इस कविता का आरंभिक
सिरा जहाँ से शुरू होता है वहां उनकी ‘दलित साहित्य (वार्षिकी), 2005 में प्रकाशित कहानी ‘बेस्ट ऑफ़ करवा चौथ’ का
अंतिम सिरा जुड़ता है. यह कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी है. यह कहानी रजनी
तिलक की ही कहानी है. यह कहानी उन तमाम स्त्रियों की कहानी भी हो सकती है, जिनके
जीवन की कहानियां प्रकाश में नहीं आयीं हैं. इस कहानी में वर्णित कथ्य भारत ही
नहीं, विश्व की हर स्त्री का कथ्य है. लेकिन हर स्त्री उस मंजिल तक नहीं पहुँचती.
न ही पहुँचने की हिम्मत करती है, जहाँ ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ’ की नायिका पहुँचती है.
मानसिक द्वंद्व से गुजरती हुई इस कहानी की नायिका अपनी मंजिल को खुद के लिए करवा
चौथ का सर्वोत्तम उपहार मानती है. तमाम स्त्री रचनाकारों की कहानियां ऐसी हैं
जिनका कथ्य इस कहानी के कथ्य से मिलता-जुलता है, लेकिन उनमें और रजनी तिलक में यही फर्क है कि बाकी स्त्री
विषयक स्त्री-पुरुष लेखकों की कहानियां शादी और परिवार जैसी घोर स्त्री विरोधी और
पितृसत्तात्मक संस्थाओं से अपनी कहानी के स्त्री-चरित्र को बाहर निकलने का रास्ता
न दिखाकर बार-बार उन्हीं संस्थाओं की गुलामी करने के लिए बाध्य करते हैं. आप कह
सकते हैं कि यह तो संघर्ष से पलायन है.
लेकिन पूरी कहानी में जो द्वंद्व लेखिका ने उभारा है उसको देखते हुये आप यह
जानेंगे कि संघर्ष करते हुये जिन्दगी के नए रास्ते तलाशती एक स्त्री का बयान है
रजनी तिलक की कहानी ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ.’ रास्ता नहीं उसने तो संभावनाओं का
राजमार्ग खोज लिया है. जिस पर चलकर वो मानसिक और भावनात्मक रूप से उत्तरोत्तर
मजबूत होती चलती है. जो अपने पति की पहल पर तलाक के कागजातों पर हस्ताक्षर करने के
बाद अपनी किशोरवय बेटी को भी मानसिक और भावात्मक रूप से दृढ़ बनने के लिये तैयार
करती है. कहानी की नायिका से उसकी बेटी का संवाद देखने लायक है-
“आठ बजे जब मैं अपनी बेटी के साथ
खाना खाने बैठी तो मैंने दिन की बातें याद करते हुये उसे बताया कि आज मैंने तलाक
पर अपनी सहमति दे दी है.
सुनकर बेटी को दुःख हुआ, लगभग वह
रोने लगी. मुझे देखकर वह हैरान भी थी….
“मम्मी आप खाना कैसे खा सकती हैं?”
मैं संयत थी. ग्यारह साल बाद इस भ्रमजाल की डोर को काट कर. मुझे न सुख था न दुःख.
“खाना तुम खा लो… बेटे… जीने के
लिये… और लड़कर जीने के लिये खाना जरूरी है. उसने बेमन से खाना खाया.” (बेस्ट ऑफ करवाचौथ, दलित साहित्य
वार्षिकी-2005,पृष्ठ 335)
रजनी जी की नायिका इस पड़ाव पर अनेक
संताप, दुःख और मानसिक पीड़ाओं से गुजरकर पहुंची है. जब एक कम्युनिष्ट पति अपनी
पत्नी और पांच साल की बेटी को घर से निकाल देता है उसके बाद के संघर्ष का बयान
देते हुए नायिका कहती है, “पांच साल की
बेटी को लेकर मैं दर-बदर यहाँ-वहां किराये की खोलियों में भटकती रही. बहुत कठिन
दिन थे. न पूरी तनख्वाह न रहने को छत. बेटी के स्कूल व क्रेच का खर्चा.ऊपर से
तरह-तरह की असुरक्षा. सुबह से शाम तक बेटी का स्कूल, नौकरी. नौकरी से दोपहर को
क्रेच, फिर नौकरी, फिर शाम को क्रेच… फिर घर, भागदौड़… कभी वीमेन सेल तो कभी
सेल से वापस उसके द्वारा भेजे ‘दूतों’ के साथ समझौतों की बैठकें…” यह एक सामान्य
स्त्री का संघर्ष था जो पितृसत्तात्मक समाज की सभी संस्थाओं- परिवार, शादी, ससुराल
आदि सभी के कायदों को अपना चुकी थी. उनमें इसका विश्वास मजबूत हो रहा था. लेकिन एक
स्वतंत्र चेता स्त्री इन संस्थाओं की उदारता के प्रति शशंकित भी थी. इसलिये जब कभी
वो अपनी चेतना को अभिव्यक्ति देना चाहती तो उसको प्रताड़ना झेलनी पड़ती. यह बहुत
पीड़ादायक होता. रजनी की कहानी की नायिका, जो अम्बेडकरवादी है, ने एक कम्युनिष्ट
कार्यकर्त्ता से शादी की थी जो हर तरह की गैरबराबरी से मुक्त, जेंडर विभेद से
रहित, शोषितों-मजदूरों की सत्ता वाले समाज के लिये घर से बाहर आन्दोलन करता है. जो
निजी संपत्ति की अवधारणा पर विश्वाश नहीं करता है. जो स्त्री-पुरुष की जेंडर
आधारित भूमिकाओं को ध्वस्त करने की बातें
सभा गोष्ठियों में करता है. जो क्रांति की बात करता है. क्रांति का मतलब
समाज में हर तरह के शोषण और भेदभाव से मुक्ति. अस्तित्वमान व्यवस्था में आमूलचूल
परिवर्तन. लेकिन अपनी ही तरह की सोच रखने वाली पत्नी जो वैचारिक रूप से चेतना
संपन्न है, जब अपनी बात कहती है तो उसकी हंसी उड़ाई जाती है. उसे मानसिक रूप से
प्रताड़ित किया जाता है. उस समाज में स्त्री के लिए, उसके विचारों के लिये जगह न
थी. उसकी भूमिका उस क्रांतिकारी समाज में भी वही पुरानी वाली थी जो परम्परवादी
समाज में थी. नायिका कहती है कि “शादी के
तुरंत बाद हम हनीमून को रोक कर कलकत्ता में राजनैतिक सेमिनार के लिये गए थे. वहां
एडवोकेट भगवान दास भी थे,जिन्हें मैं अंकल कहकर पुकारती थी. इस सेमिनार में भगवान
दास जी दलित मुद्दों पर एक कार्यशाला ले रहे थे. अचानक वो कुछ देर के लिये बाहर
गये. उनके जाते ही उनके बारे में हमारे पति महोदय ने अशोभनीय बातें बोलनी शुरू
कीं. उनके लौट आने पर चुप बैठ गये. मुझे यह बात कुछ हजम न हुई. शाम को वापस
धर्मशाला (जहाँ हम इनके दोस्तों के साथ सामूहिक रूप से रुके थे.) जाकर मैंने सुबह
की बात पर आपत्ति जतायी.
मेरी आपत्ति पर इन्होंने तुरंत
चुटकी ली और अपने साथियों को बुलाकर मेरी मजाक उड़ा दी. हँसते-हँसते लोटते-पोटते इन
तीनों मित्रों ने कहा-
“ये तो भगवानदास की चेली
निकली…पक्की अम्बेडकरवादी.”
अम्बेडकरवादी होना जैसे कोई गाली हो.इस शादी से
मैं विचारों में ठगी गयी. यह व्यवहार मैं सहन नहीं कर पा रही थी. मेरी रुलाई फूटने
लगी.मैं धम्म से वहीं बैठ गयी. रिश्तों का कम्यून. दोस्तों के बीच उनकी-मेरी निजता
का कोई भेद नहीं था,बल्कि वे मुझसे भी ज्यादा नजदीक थे. मैं कहाँ से अनावश्यक वहां
प्रवेश कर गयी. वहां मेरे लिये रत्ती भर जगह न थी. मैं अब उनके बीच अनर्गल विचित्र
दर्शन का अनुसरण करने वाली चेली और घर की मेहरी थी. मैं दोस्तों की कतार से उतार
कर चारदीवारी में पहुंचा दी गयी. मुझे अब रोटी बनाना, नौकरी करना, हर बात में हाँ,
मेरा कर्तव्य होना चाहिए था.मैंने अपनी शादी के सात साल इसी वातावरण में कैद होकर
झेले.” (वही,पृष्ठ 333) रजनी तिलक की स्त्री इतना ही नहीं वह भारतीय
कम्युनिस्टों के सिद्धांत और व्यवहार में
जमीन-आसमन के फर्क को भी रेखांकित करती है. वह परम्परावादी पुरुषों को उनके स्त्री
विरोधी दकियानूसी विचारों के लिये बहुत दोष नहीं देती है. वह कहती है परम्परवादी
पुरुष जैसा व्यवहार निजी जीवन में करता है वह उसका दर्शन है, लेकिन एक कम्युनिस्ट
का दर्शन तो वह नहीं कहता है जो वह अपने निजी जीवन में बरतता है. वह कहती
है-
“कम्युनिस्ट पति का चरित्र और उसका
व्यवहार आम आदमी से अलग नहीं था. हर तरह से दमनकारी था. किसी भी तरह से समानता
वाला नहीं था. ये वो विद्वान हैं जो शब्दों व कुतर्कों के तीरों से दर्शन की आड़
में अस्मिता को ज्यादा छेद सकते हैं. पुरातनपंथी पति कहेगा तुम मेरी हो. मेरे सिवा
किसी की कल्पना न करो. बिल्कुल ठीक. क्योंकि यही उसका दर्शन व समझ है. उसकी समझ की
सीमाएं हैं.परन्तु प्रगतिशील साथी कहेगा कि मैं विद्वान हूँ. तुमसे ज्यादा जानता
हूँ. मैं एक सिद्धांत के लिये प्रतिबद्ध हूँ.(खोखले अव्यवहारिक सिद्धांत) मेरे
प्रति और उसके प्रति एकनिष्ठ होना तुम्हारे लिये आवश्यक है. वरना हमारी पटरी अलग.
रात को दिन, दिन को रात कहते-कहते मैं थक गयी.” (वही)
ये कम्युनिस्ट पुरुषों के निजी और
वैचारिक जीवन का प्रमुख तनाव है. इस तानव को कमोबेश हर लेखिका ने अपने सृजन
में रेखांकित किया है. रजनी जी की स्त्री
इस द्वंद्व को झेलकर बाहर निकलती है और बेटी को साथ लेकर आगे बढ़ती है. जैसा मैंने
पहले कहा है कि रजनी जी की चिंताओं के घेरे में हाशिये का समाज है. हाशिये के समाज
में भी सबसे निचले पायदान पर स्त्री है. वैसे हर समुदाय की स्त्री दोयम स्थिति में
है. लेकिन दुनिया भर के समाजों में स्त्री एकरैखिक सामाजिक-लैंगिक श्रेणी नहीं है.
स्त्रियों में सामाजिक,आर्थिक, भौगोलिक स्तरीकरण है. जैसे उत्तर भारत और
पूर्वोत्तर भारत की स्त्रियों की स्थिति एक जैसी नहीं है. ऐसे ही कश्मीर की स्त्री
और देश के बाकी हिस्सों की स्त्रियों की हालत एक जैसी नहीं है. ऐसे ही अफ्रीका की
काली औरतों और वहां की गोरी औरतों की स्थिति एक जैसी नहीं है. भारत में जाति की
विशिष्टता के कारण यहाँ की अछूत और दलित-आदिवासी
स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक हैसियत भी सवर्ण स्त्री जैसी नहीं है. स्त्री
के जीवन के इस स्तरीकरण और अवसरों की समानता को चित्रित करती हुई रजनी तिलक ‘औरत
औरत में अंतर है’ शीर्षक से अपनी एक कविता में कहती हैं-
“एक भंगी तो दूसरी बामणी एक डोम तो दूसरी ठकुरानी दोनों सुबह से शाम खटती हैं बेशक एक दिनभर खेत में दूसरी घर की चारदीवारी में शाम को एक सोती है बिस्तर पे तो दूसरी काँटों में
एक सतायी जाती है स्त्री होने के कारण दूसरी सतायी जाती है स्त्री और दलित होने पर जन्मती है एक नाले के किनारे दूसरी अस्पताल में
एक सत्तासीन है दूसरी निर्वस्त्र घुमायी जाती है” (पदचाप, रजनी तिलक, पृष्ठ 41-42)
रजनी तिलक स्त्रीवाद के ‘सार्वभौम
बहनापा’ की भ्रमित करने वाली अवधारणा को प्रश्नांकित करते हुए ‘योनि है क्या औरत ?’ नामक अपनी कविता में कहती
हैं-
“कल तक हमने भी बहनापे के राग अलापे हाँ, ‘जागोरी’ ‘सहेली’ ‘निरंतर’ ‘फोरम’ की बहनों के साथ हमारे जज्बात सब सांझे थे परन्तु आज शरीर और मन से आजाद तुम तुम्हारा सुन्दर संसार हम कहाँ हैं इस दुनिया में?”(वही, पृष्ठ 83)
रजनी तिलक स्त्रीवाद के उस अकादमिक
जगत से सवाल करती हैं, जो यह तो कहता है कि स्त्री-स्त्री में कोई फर्क नहीं होता
है. लेकिन वो भारत के वर्ण-व्यवस्था वाले सामाजिक स्तरीकरण और आर्थिक गैरबराबरी से
पैदा हुई विषमता की मार झेल रहे स्त्री समुदाय में भी हाशिये पर अवस्थित
दलित,आदिवासी,पसमांदा और गरीब स्त्री के सवालों को अपनी बहस का केंद्र नहीं बनाता
है. भारत का स्त्रीवाद इन समुदायों की
स्त्रियों को अपने आन्दोलनों में भीड़ के रूप में इस्तेमाल करता है, लेकिन नेतृत्व
देने से कतराता है. स्त्रीवादी आन्दोलन से हासिल हुए अधिकारों का विलासिता पूर्ण
उपभोग भारत की उच्च वर्ग और उच्च जाति की स्त्रियाँ कर रही हैं. दलित, आदिवासी और
पसमांदा स्त्रियों द्वारा बनाये गये दबाव से पैदा हुए अवसरों के लाभ लेते हुए
सवर्ण और उच्च वर्ग की ये स्त्रीवादी अनेक अकादमिक संस्थानों में ऊँचे वेतन पर
नियुक्त हो गयीं. आने-जाने और सभा सेमिनारों में भाग लेने के लिए विलासपूर्ण
यात्रा सुविधाएं हासिल किया. अपने वर्गीय विकास को स्त्री समुदाय का विकास बताया.
लेकिन जो महिलाएं भीड़ का हिस्सा थीं उनकी हालत जस की तस बनी हुई है. उनकी
सामाजिक-आर्थिक हालत में कोई बदलाव नहीं आया है. तभी रजनी तिलक अपने समुदाय की
स्त्रियों की हालत बयान करते हुए कहती हैं कि हम-
“भारत के नक़्शे पर भिनभिनाती मक्खियों सी? हुनर नहीं, शिक्षा नहीं रोजगार नहीं रहने को आवास नहीं रात को अँधेरे में डूबी हुई आँखें हैं निराशा में डूबे माँ-बाप सुबह सबेरे दुधमुहों को भेजते हैं सड़कों पर बटोरती है लोहा,रद्दी,कूड़ा बुहारती सड़क,गली,चौबारा!!” (वही)
दलित स्त्री के निर्णय लेने, चयन की
आजादी और उसकी यौनिकता पर खुद के नियंत्रण के सवाल पर रजनी तिलक उन सवर्ण
स्त्रीवादी महिलाओं से सवाल करती हैं, जो यौन कर्म को उद्योग का दर्जा देकर वैध
बनाने की बात करती हैं. सच यह है कि यौन कर्म में लगी सभी महिलाएं सामाजिक रूप से
दलित-पिछड़ी-आदिवासी महिलाएं हैं. जो अपनी जिंदगी चलाने के लिए बीस रुपये में अपना
शरीर बेचने को तैयार हो जातीं हैं. इनके पास काम नहीं है. जो काम मिलता है उसके
लिए वो उपयुक्त नहीं हैं. इनके कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है.
जो प्रशिक्षण यदि दिया भी जाता है तो वह मात्र खाना-पूर्ति होता है. कुछ सवर्ण
स्त्रीवादी ऐसे हाल में कहती हैं कि यौन-कर्म को उद्योग का दर्जा देकर वैध बनाया
जाए. रजनी तिलक तब सवाल करती हैं कि-
“तुमने हमसे कहा क्या हुआ अगर तुम्हारे पास स्किल नहीं शिक्षा नहीं,पैसे की विरासत नहीं वर्ण शंकर देवदासी हो कोल्हाटी की बार गर्ल या नौटंकी की बेड़िनी एक योनि तुम्हारी भी है तुम इसे जमीं बना लो ‘सेक्सवर्क’ का बीज जमा दो पीढ़ी पर पीढ़ी तर जाओगी हम बहनें तुम्हारी तुम्हारे लिये लड़ जाएँगी पुलिस,कानून,पार्लियामेंट से भीड़ जाएँगी सेक्स वर्क को इज्जत दिलाएंगी हम संसद पहुँच कानून बनाएंगी” (वही) रजनी तिलक ऐसी स्त्रीवादियों से एक प्रश्न करते हुए पूछतीं हैं कि- “एक योनि सवर्ण बहिना की उन्हें अपनी योनि पर खुद का नियंत्रण चाहिये तब दलित स्त्री की आबरू पर बाजारू नियंत्रण क्यों? धन्य हो… आपके बहनापे का आप जैसी जिनकी मुक्तिदात्री हों उनकी मुक्ति क्या? गुलामी क्या? (वही,पृष्ठ 83)
रजनी तिलक स्त्रीवाद की मूलभूत
अवधारणा ‘सार्वभौम भगिनीवाद’ को भी प्रश्नांकित करती हैं और वो यह कहती हैं कि यह
कैसा बहनापा है जो खुद की यौनिकता पर तो स्वयं के नियंत्रण की बात करता है, लेकिन
जिनको ‘बहनें’ कहता है उनको अपनी यौनिकता को बाजार के हवाले कर देने की बात कहता
है. यहाँ रजनी दलित और सवर्ण स्त्रीवाद के फर्क को रेखांकित करती हैं. यही नहीं वो
दलितवादी चिंतन में दलित स्त्री की जगह और
वहां उसके चयन के अधिकार और स्वतंत्रता के हक़ पर दलित पुरुष को भी सवालों के घेरे
में लातीं हैं और कहती हैं-
“ तुम मेरे कौमी भाई ! अपनी आजादी मांगते हो बताते और हमें समझाते हो उसे पूरी कौम की आजादी! कौम की आजादी क्या औरतों की गुलामी है?” (वही, पृष्ठ 31)
दलित समाज में स्त्री के दोयम दर्जे
और मुक्ति की बात तो दलित साहित्यकार और चिंतक करते हैं,लेकिन दलित स्त्री अपनी
मुक्ति की आवाज खुद नहीं उठा सकती. उसे दलित समाज में नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं
आने दिया जायेगा. दलित पुरुष ये मानता है कि दलित मुक्ति में ही दलित स्त्री की
मुक्ति समाहित है. दलित चिंतक यह मानते ही नहीं कि दलित समुदाय की स्त्री दलित
समुदाय में ही गुलामी का जीवन जी रही है. दलित पुरुष हर तरह के भेदभाव से अपनी
मुक्ति की बात तो कहता है, लेकिन जब दलित स्त्री दलित समाज में व्याप्त पितृसत्ता
से मुक्ति की बात कहती है तो दलित पुरुष उसकी इस आवाज को दलित आन्दोलन को पीछे
धकेलने वाली या सवर्ण महिलाओं द्वारा प्रायोजित कृत्य कहता है. यही मुख्य वजह है
कि दलित स्त्रीवाद का जन्म हुआ. जिसके फलस्वरूप रजनी तिलक ने दिल्ली में
अगस्त-सितम्बर 2017 में प्रो. हेमलता
महिश्वर, डॉ. रजत रानी मीनू, प्रो. विमल थोरात, रजनी अनुरागी आदि सृजनात्मक दलित
महिलाओं के साथ ‘दलित लेखिका मंच’ नामक दलिक लेखिकाओं का संगठन बनाया. दलित
स्त्रियों का संघर्ष कई स्तरों में है. उसे अपने घर-परिवार में भी लड़ना है और अपने
लिए जगह बनानी है. उसे वर्ण व्यवस्था से भी संघर्ष करना है. अपने घर में अपने
भाई-बाप और घर के बाहर वर्ण-जाति की भेदभाव मूलक व्यवस्था के पोषक ब्राह्मणवादी
पुरुष से भी लड़ना है. रजनी तिलक का सृजनात्मक कर्म और उनका एक्टिविज्म एक साथ सभी
मोर्चों पर संघर्षरत था. घर-परिवार और बाहर की विषमता पूर्ण दुनिया से संघर्ष करते
हुए रजनी तिलक जी ने 30 मार्च, 2018 को इस
दुनिया को अलविदा कह दिया. उनका असमय जाना समता और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के
लिए बड़ी क्षति है, लेकिन उन्होंने साझे संघर्ष की जो विरासत छोड़ी है आने वाली
पीढ़ियाँ उस विरासत के सहारे समतामूलक समाज-निर्माण की मंजिल प्राप्त करने के लिए
अपनी यात्रा जारी रखेंगी.
–अध्येता दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी दलित
लेखन में पीएच.डी. हैं. दलित,
स्त्री और हाशिये की अस्मिताओं के मुद्दों पर लिखते रहते हैं. आलोचना की एक किताब ‘पितृसत्ता और साहित्य’ प्रकाशित. तीन सम्पादित किताबें, ‘यह पलास के फूलने का समय है, चुनिन्दा दलित आदिवासी कविताएँ’ ,‘मार्क्सवाद और अम्बेडकर, अभय मौर्य’ एवं ‘हिंदी
दलित साहित्य की यात्रा’प्रकाशित हैं. ‘पाखी’, ‘हंस’, ‘स्त्रीकाल’, ‘बयान’, ‘दलित साहित्य वार्षिकी’, ‘अपेक्षा’, ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘मगहर’ आदि पत्रिकाओं में लेख व शोध पत्र प्रकाशित
हैं.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन.संपर्क– 9560713852
युवा आलोचक अरुण प्रियम स्त्रीवादी आलोचना में सक्रिय हैं : akpriyam@gmail.com
2017 में प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, स्त्रीवादी चिन्तक, कवयित्री, संपादिका रजनी तिलक की आत्मकथा ‘अपनी जमीं अपना आसमां’ ‘ईशा ज्ञानदीप’ प्रकाशन से आई। आत्मकथा 120 पेज में बाईस उपशीर्षकों में बाँटकर लिखी गई है। आत्मकथा बचपन से शादी तक के कालखंड की है ।पुस्तक को लेखिका ने अपने माता पिता को समर्पित किया है।
रजनीतिलक
चूकि लेखिका रजनी
तिलक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता रही है इसलिए उनकी आत्मकथा में उनके समाज जनित
अनुभवों का खूब वर्णन है। दलित जीवन की आत्मकथा में यदि कोई दलित स्त्री आत्मकथा
लिखें और उसमें उसके स्त्री होने के कारण झेले गए दुख और पीड़ा न हो, ऐसा संभव नहीं है।
इस आत्मकथा में इस तरह के प्रंसग अनेक बार आए है। इस आत्मकथा का अनोखापन इसी में
है कि लेखिका ने इसको अपने सामाजिक कार्यों में हुए व्यक्तिगत अनुभवों को बहुत मन
से लिखा है।
आत्मकथा ‘अपनी जमीं अपना
आसमां‘ में चार चरित्र मुख्य रूप से दिखाई देते है जिनमें लेखिका का बड़ा भाई
मनोहर लाल, पिता दुलारे लाल यानी भाईजी , मां जावित्री देवी
यानी भाभी और लेखिका के भाई मनोहर लाला का दोस्त रमेश भौसले। पूरी आत्मकथा इन्हीं
पात्रों के आस पास घूमती है। पूरी आत्मकथा में लेखिका रजनी तिलक जिस चरित्र से
सबसे ज्यादा प्रभावित है वह है उसका अपना बड़ा भाई मनोहर लाल मानव, जो कि लेखिका रजनी
तिलक से तीन साल बड़ा है। लेखिका के अनुसार वह घर और बाहर की दुनिया में उसका सबसे
बड़ा सहयोगी, उसका आदर्श, उसको बाहर की दुनिया
से अवगत कराने वाला, उसको सामज सेवा के
लिए प्रेरित करने वाला, उसकी हर परेशानी व
दुख में साथ खड़ा रहने वाला उसका भाई मनोहर लाल ही था।ऐसे समय जब‘भाई’नामक जीव बहनों के
घर से बाहर पढ़ने-लिखने, कास करने के लिए
रोड़े अटकाता हो मतलब घर में पितृसत्ता को ढ़ोने और लागू करवाने वाला भाई ही हो तो
ऐसे में मनोहर लाल मानव जैसे भाई विरले ही होते है, जो अपनी बहनों के
साथ उनके अधिकारों के सुरक्षा के लिए समाज और परिवार के सामने तनकर खड़े हो जाते
है। लेखिका रजनी तिलक ने एक दलित परिवार में मनोहर लाल मानव को बड़े लड़के यानी
बड़े भाई को इतना उदार, इतना सहयोगी और इतना
समझदार दिखाकर दलित साहित्य में एक आदर्श भाई के रुप में अमर कर दिया है। मनोहर
लाल के होने के कारण ही एक डरी दबी सहमी शर्मसार हीन भावना के बोझ से दबी तिलक से
रजनी और फिर‘रजनी तिलक’ बनतीहै। यह उनकी पूरी
आत्मकथा में झलकता है।
आत्मकथा में दूसरा
महत्वपूर्ण चरित्र है‘भाई जी’यानि लेखिका रजनी
तिलक के पिता। लेखिका के पिता जुझारू, अत्यंत मेहनती, परिस्थितियों के
शिकार, अपनी दिमागी रुप से बीमार पत्नी के प्रति समर्पित पति और एक जिम्मेदार पिता
के रूप में सामने आते है। चूँकि लेखिका परिवार की सबसे बड़ी पुत्री है और परिवार
में उससे छोटे उसके पाँच भाई बहन जिनमें तीन भाई बहन संजय, मनोज, अनिता तो काफी छोटे
दिखाए गए है, तो स्वाभाविक रूप से पिता यानी भाईजी
दुलारेलाल अपनी पत्नी के बीमार होने के बाद बच्चों के लालन पालन के लिए घर के बड़े
बच्चों यानी लेखिका और उसके बड़े भाई मनोहर लाल पर निर्भर हो गए। इस पूरी आत्मकथा
में पिता के चरित्र में निरंतर विकास होते हुए दिखाया गया है। कहीं कहीं वह
लड़कियों की पढ़ाई के लेकर संकीर्ण तो कहीं उस संकीर्णता को झटककर उन्हें पूरी
आजादी देते हुए नज़र आते है। कहीं खुद गरीबी से जूझते हुए घर के खर्चों में कटौती
करते हुए तो कहीं पर परिवार का भरण पोषण करने के लिए बच्चों के खर्चों में कटौती
हुए नज़र आते है। लेखिका रजनी तिलक के अनुसार वह कहीं पर वह एक दयालु पिता की तरह, जो अपने बच्चों की
बीमारी से दुखी भगवान के आगे हाथ जोड़ते हुए कि उनका बीमार बच्चा ठीक हो जाएं, तो कहीं बड़े भाई
मनोहर की पत्नी के सामने अपनी बेटी को कम महत्व देते हुए नज़र आते है। कुल मिलाकर
कहा जाएं तो इस पूरी आत्मकथा में पिता दुलारे लाल अपने विरोधाभासों पर मुक्ति पाते
हुए दिखाई देते है।
इस आत्मकथा का सबसे महत्वपूर्ण पात्र है लेखिका रजनी तिलक की बीमारी से
जूझती हुई माँ‘जावित्री देवी’। अपने दूसरे विवाह
की खुशहाल गृहस्थी में रमी जावित्री देवी पूरे मोहल्ले में सबसे आकर्षक व्यक्तित्व
वाली, पांचवी कक्षा तक पढ़ी लिखी, अत्यन्त मेहनती , बच्चों के परवरिश के
प्रतिअत्यन्त सजग, स्वाभिमानी और सुघड़
समझदार है। वह मोहल्ले की अन्य दलित महिलाओं की तरह नहीं सोचती। वह अपने बच्चों के
लिए सुन्दर भविष्य के लिए सपने देखती है और उन्हें साकार करने की हिम्मत और ताकत
भी रखती है। वह सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि अपने मोहल्ले की अन्य दलित औरतों को
भी इस विषय में समझाती है। लेखिका रजनी तिलक अपनी माँ के बारे में बताते हुए एक
जगह कहती है-‘गली की औरतें जब
गोबर पाथने जाती और अपनी लड़कियों को साथ ले जाती तो वह उन्हें टोककर रोकती और
कहती- चम्पा, बिरमों तुम जो काम कर रही हो इन
लड़कियों से मत करवाओं। इन्हें स्कूल भेजों। पढ़ाओं-लिखाओं। इन्हें ऐसाबनाओं कि गोबर पाथने
का काम इन्हें न करना पड़े।’ऐसे ही आत्मकथा में
माँ की हिम्मत और साहस भरा एक और प्याज वाला प्रसंग आया है जो बहुत ही रोचक है। एक
दिन जब पिता की पहली पत्नी जिसकी मृत्यु हो गई थी तो उसके रिश्ते का भाई, जा रिश्ते में मामा
हुए यानी चुन्नी मामा , सोनीपत से प्याज का
ट्रक लेकर आया और उसने बिना माँ से पूछे सारा प्याज घर के एक खाली कमरें में भर
दिया और यह कहा कि वह तीन-चार दिन में उसे यहाँ से ले जायेगा। कुछ दिन बीतने पर भी
जब उसने नहीं उठाया तो माँ में कहा- भैया यह प्याज हटालो, कब तक यहां पड़ी
रहेगी?चुन्नी मामा ने माँ को घूरते हुए कहा –
ये मेरे जीजा का घर है। तू कौन होती है मुझसे पूछने वाली?‘’ भाभी यानी माँ ने
फिर प्यार से कहा-‘भैया वो तेरे जीजा
है तो मैं तेरी बहन हुई न?ये बच्चे तेरे भानजे भानजी हैं। इन्हें
तकलीफ क्यों दे रहा है?कल सारा प्याज उठा ले। आराम से कह रही
हूं। यह हमारा घर है कोई स्टोर तो नहीं न?चुन्नी मामा के
द्वारा पिता को शिकायत करने पर भाभी ने भी पिता जी को बोल दिया- सुनो जो इसे कह हो
आज शाम चार बजे तक प्याज नहीं उठाया तो मैं सड़क पर फेंक दूंगी। भाभी ने उसे चेता
दिया कि शाम को चारबजे आकर प्याज नहीं
उठायेगा तो वह सड़क पर फेंक देगी या लोगों में बाँट देगी भाभी वहीं करने वाली थी।
वो जो कहती थी वह करती थी। चार बजे चुन्नी मामा को आने के वक्त प्याज बाहर फेंकने
को तैयारी कर ली। सबी वक्त पर चुन्नी मामा एक ट्रक ले कर आए और अपना सारा प्याज
भरकर ले गए।
लेखिका रजनी तिलककी माँ जावित्री देवी और कौशल्या
बैसन्त्री की आजी जैसे स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी, मेहनती, समय से आगे की सोचने वाली, मक्त भाव से जीने वाली चरित्र ही दलित
महिलाओं के प्रेरणास्रोत है.
अपनी जमीं अपना आसमां में एक और चरित्र
है जो लेखिका के जीवन बहुत प्रभावित करता है और उसे प्रेरणा देता है। इस चरित्र का
नाम रमेश भौंसले है। जो कि एक एल.एल.ए. का बेटा है। लेखिका के बड़े भाई का दोस्त
है। वह लेखिका के आगे पढ़ने लिखने, बढ़ने और सामाजिक कार्यों को करने की
प्रेरणा देता है। वह बहुत सिद्धांतवादी है। जैसे उसके पिता ईमानदार है वह भी वैसा
ही ईमानदार है। अपनीतीन बहनों की शादी करवाने के लिए, पिता की मृत्यु के बात अपनी बहनों के
लिए पिता के भूमिका में आ जाता है। और एक दिन लेखिका को एक बस में टिकट कंडेक्टर
के रूप में मिला। यहाँ यह सवाल बड़ा कौंधता है कि जो रमेश अपनी दोस्त की बहन रजनी
को घर से बाहर निकल करकाम करने की प्रेरणा देता है वह अपनेघर की लड़कियों की शादी के लिए इतना
अधिक परेशान क्यों रहता है और उसने अपनी बहनों को सामाजिक कार्यों में क्यों नहीं
जोड़ा?
खैर बकौल लेखिका – रमेश का स्नेह मेरे
जीवन के हर मोड़ पर छांव बन छाया रहा था । दोस्त बनकर वह मुझे नैतिक बस दे रहा था।
बदले में उसे कुछ नहीं चाहिए। रमेश और मेरा रिश्ता ऐसा ही था। वह मेरी जिन्दगी में
उगते सूरज की तरह था जिसकी पहली किरण से मैंने नई जिन्दगी देखी। जिन्दगी के नये
अर्थ सीखें। उसके असीम स्नेह और सानिध्य में मैं ऐसी शाख्सियत बन गई जिसकी जिन्दगी
में छद्म धारणाओं, वायदों की कोई अहमियत नहीं थी। जहां प्रेम प्रेरणा बनकर व्यक्तित्व को
कुंठाओं से मुक्त कर शिखर पर पहुँचाता है।
आत्मकथा ‘अपनी जमीं अपना आसमां’ में पाठक लेखिका रजनी तिलक के संधर्षशील जीवन से रूबरू होते है। यह आत्मकथा एक सक्रिय सामाजिक और स्त्री कार्यकर्ता की आत्मकथा है। पूरी आत्मकथा में उनके कार्यों का ब्यौरा है। आंगनवाड़ी वर्कर यूनियन बनाने से लेकर थियेटर में काम करने करने तक, कविता लिखने से लेकर गरीब दलित बच्चों लिए स्कूल खोलने तक, दिल्ली से लेकर बम्बई की यात्रा तक, अम्बेड़करवादी कार्यकर्ता से लेकर मार्क्सवादी कार्यकर्ता तक, आई.टी.आई में कटिंग टेलरिंग की छात्रा से लेकर दलित स्त्री नेतृत्व तक के अनेक- अनेक अनुभव आत्मकथा में समाये हुए हैं। लेखिका अपने स्वप्नो, अपने आदर्श, अपनी दिशा और अपने स्वयं के प्रेम और समाज के प्रेम को लेकर अपनी जीवन की कहानी को बुनकर ताना-बाना तैयार करती है और उसे सहेजकर दूसरों को प्रेरणा देने, अधिकारों की लड़ाई में आगे बढ़ने, उनसे जूझने का बल देती है।’अपनी जमीं अपना आसमां दलित और स्त्री साहित्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान है। इसके लिए लेखिका बहुत बधाई की पात्र है।
सुधा सिंह दिनकर की कृति ‘उर्वशी’ 1961 में प्रकाशित हुई। दिनकर की अन्य रचनाओं से अलग इसका मिज़ाज है। दिनकर जिस वीरता, राष्ट्रगौरव, ओज और ललकार के भाव के लिए जाने जाते हैं; उन सबसे अलग यहाँ उनका रंग देखने को मिलता है। दिनकर ने इस कृति में अन्य सभी चीजों से ध्यान हटाकर स्त्री-पुरुष के कोमल किंतु गंभीर संबंधों के विश्लेषण पर अपने को केन्द्रित किया है। दिनकर की इस कृति को लेकर लेखन में बहुत वाद-विवाद भी हुए। ‘कल्पना’ के अप्रैल 1963 अंक में ‘उर्वशी’ पर भगवतशरण उपाध्याय का लेख प्रकाशित हुआ। अन्य कई नामचीन साहित्यकारों मसलन अज्ञेय, नगेन्द्र, कुँवरनारायण, शिवप्रसाद सिंह, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, मुक्तिबोध, देवीशंकर अवस्थी, रामविलास शर्मा आदि ने ‘उर्वशी’ पर लेख लिखे हैं। किसी एक कृति पर एक साथ, एक समय में इतने महत्वपूर्ण साहित्यिकों ने शायद ही भागीदारी की हो। इससे कृति का महत्व तो स्वयंसिद्ध है। सवाल उसकी ऐतिहासिक अवस्थिति की है। वह कितनी और किससे महान है, किससे कम या कमतर है- यह साबित करने का नहीं है। साथ ही इस महत्व-निरूपण की कसौटी क्या होगी या कि नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो ‘प्रतिमान’ क्या होंगे जिसके आधार पर इसकी महत्ता या कमतरी को बताया जा सके!
जिन दो महत्वपूर्ण आलोचकों ने इस सवाल से टकराने की कोशिश की है उनमें मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा का नाम प्रमुख रुप से उल्लेखनीय है। रामविलास शर्मा को ‘उर्वशी’ उदात्त भाव की और श्रृंगार भाव से ऊपर उठी हुई कृति लगी, उन्होंने कहा कि ‘निराला के बाद मुझे किसी वर्तमान कवि की रचना में ऐसा मेघमन्द्र स्वर सुनने को नहीं मिला।'[i] वहीं मुक्तिबोध इस कृति की भाषा और श्रृंगारिकता की आलोचना करते हैं। रामविलास जी जिस कारण ‘उर्वशी’ को पसंद करते हैं कि ‘इसमें (‘उर्वशी’ में) नारी-सौन्दर्य के अभिनन्दन के अतिरिक्त मातृत्व की प्रतिष्ठा भी है।'[ii] वहीं मुक्तिबोध को इसमें कुंठित और स्वार्थी क़िस्म का काम भाव दिखाई देता है जिसमें केवल बेडरूम के दृश्य हैं।[iii] ‘उर्वशी’ के उद्देश्य के बारे में मुक्तिबोध स्पष्ट हैं कि कवि को कोई बड़ी बात नहीं कहनी। उसे काम की महत्ता प्रतिपादित करनी है और उसे लोकोत्तर बताना है। ”सच तो यह है कि लेखक को, सिर्फ एक बात छोड़कर, और कोई खास बात कहनी नहीं है। उसके पास कहने के लिए ज़्यादा कुछ है ही नहीं। और जो कहना है वह यही कि कामात्मक अनुभवों के माध्यम से आध्यात्मिक प्रतीति सिद्ध हो सकती है। किन्तु यह कहने के लिए उसने व्यापक आयोजन किया है, वह उसे पूरे समारोह के साथ अपना समय लेते हुए कहना चाहता है।” [iv] इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘उर्वशी’ का उद्देश्य काम की प्रतिष्ठा करना और जीवन में स्त्री-पुरुष के दैहिक आकर्षण की महत्ता को सिद्ध करना है। जयशंकर प्रसाद जिस प्रश्न को मनु के मुख से कहलाकर उपेक्षित छोड़ देते हैं अथवा श्रद्धा का अतिकाल्पनिक चरित्र जिसे उभरने नहीं देता वह प्रश्न बहुत दूर तक ‘उर्वशी’ में प्रतिष्ठित है। व्यक्ति की निजता की प्रतिष्ठा और स्त्री-पुरुष के एकांतिक आकर्षण कोई वर्जनीय क्षेत्र नहीं है, उस पर बात करना विचलन नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि साहित्य की जिस कसौटी को नैतिकतावादियों ने गढ़ा और आगे चलकर प्रगतिशील साहित्य ने जिस तरह से साहित्य को बिना बृहत्तर सामाजिक सरोकार के साहित्य मानने से इंकार कर दिया- इन दो अतियों का निषेध ‘उर्वशी’ का पाठ तैयार करता है। साहित्य की नैतिकतावादी कसौटी काम को कविता का प्रमुख विषय नहीं मानती, कविता का एक गौण हिस्सा भर मानती है। काम वहाँ अपने आप में विषय नहीं है। वह विषय का निर्धारणकर्ता भी नहीं है। काम अगर किसी तरह जीवन में आता है तो अत्यंत दबे-ढँके स्वर में, अदृश्य –अगोचर हो तो और भी अच्छा है। काम जीवन का हेतु नहीं हो सकता वह केवल जीवन के क्रम को चलाए रखने में मदद करता है। इससे ज़्यादा उसकी भूमिका नहीं है। द्विवेदीयुग तक इस नैतिकतावादी दृष्टि का हिंदी साहित्य में बोलबाला रहा। दूसरी तरफ प्रगतिशील साहित्यिकों की दृष्टि यह मानती है कि साहित्य के निजी सरोकार और साहित्य की निजता – साहित्य का बहुत छोटा दायरा है। मनुष्य की भावनाएँ जिनमें कामभावनाएँ भी शामिल हैं, हमेशा बड़े दायरे में अभिव्यक्त होनी चाहिए। उन्हें बृहत्तर सामाजिक सरोकारों से जुड़ना चाहिए तभी वे उत्कृष्ट हो सकती हैं। स्पष्ट है कि बृहत्तर मानव समुदाय की समस्या काम और कामजनित सुख तब तक नहीं हो सकते जब तक कि समस्त संसार में विषमता का लोप न हो जाए।
काम के प्रति आधुनिक हिंदी साहित्य का जो भी रवैय्या रहा है वह पूरी तरह सही नहीं है, काम कोई त्याज्य या अछूत विषय नहीं है। काम की एक पूरी परंपरा एक पूरा अनुशासन हमारी सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में मौजूद रहा है। काम हमारे साहित्यकारों और आलोचकों में कभी वर्जनीय नहीं रहा । सवाल यह है कि काम और कामजनित मुद्दों को वर्जनीय किन हालातों में किन लोगों द्वारा बनाया गया ? काम और इससे संबंधित मसले अपने आप में वर्जनीय हैं, यह कहना मूढ़ता होगी। बल्कि यह मध्यकालीन संकीर्णता है। पहले काम को दरबार के साथ जोड़कर आम जनों से, नागरिक के जीवनोत्सव से अलग कर दिया गया। दरबार और आम जीवन में बड़ी फाँक के कारण दो विपरीत तरह की जीवनशैली ने जन्म लिया। जिनमें एक के साथ दूसरे का मेल संभव नहीं था। एक तरफ ऐश्वर्य, समृद्धि, भोग का प्रदर्शन दूसरी तरफ जीवनयापन की जद्दोजहद। यह अंतराल जितना अधिक बढ़ता गया उतना ही साहित्य और विचार में वर्जनाओं ने जगह बनानी शुरू की। एक क़िस्म की वर्जना नैतिकतावादी-निषेधवादी दृष्टि ने बनाई दूसरे क़िस्म की वर्जना सत्ता वर्ग द्वारा पैदा की गई । एक के लिए जो निष्क्रिय भोग था, आनंद था, दूसरे पक्ष के लिए वह ऐय्याशी थी। फलतः काम के प्रति खास तरह की निषेधात्मक नैतिकतावादी दृष्टि ने जन्म लिया। इसके परिणामस्वरुप समाज में काम और कामजनित मुद्दों पर बात करना तकरीबन निषिद्ध करार दे दिया गया। काम को जीवन से अलग कर दिया गया। जीवन के बीच का यह अंतराल आधुनिककाल में और गहरा हुआ।
संस्कृत साहित्य और रीतिकाल के प्रति जिस तरह की आलोचना विकसित हुई उसका कारण ही यही था। जो चीज साहित्य में चित्रित थी वह जनता के जीवन का हिस्सा नहीं थी, इसमें तनिक संदेह नहीं। जनता के जीवन की ज्वलंत समस्याओं को चित्रित करने के क्रम में कई चीजों को जनता के जीवन से बाहर की चीज समझ लिया गया, उन पर बात करना संकीर्ण निजतावादी दृष्टि का परिचायक माना गया, काम भी उन विषयों में से एक था। यह निर्विवाद है कि लेखक को यह पूरा अधिकार है कि वह किस विषय पर लिखे। विषय का चयन लेखक की रुचि, उसकी विश्वदृष्टि और भावधारा के अनुरूप होगी। आलोचना का काम है कि वह लेखक द्वारा उठाए गए विषय में संभावनाओं पर बात करे। ‘उर्वशी’ के केन्द्र में स्त्री-पुरुष के काम-संबंधों का चित्रण है, इसके द्वारा आध्यात्मिक उद्देश्य की प्राप्ति की बात की गई है। कवि यहाँ काम को अंतिम साध्य न मानकर उसकी एक लोकोत्तर व्याख्या करने का प्रयास करता है। ‘उर्वशी’ का कथानक अवश्य पौराणिक है पर ‘उर्वशी’ की कथा पौराणिक नहीं है। जो कही गई कथा है उसका संबंध आधुनिक भावबोध से है। आध्यात्मिकता का कलेवर मात्र है। सवाल यह है कि इस कलेवर की जरुरत क्यों पड़ी ? जीवंत काम के विषयों के रहते हुए पौराणिक आख्यान में जाने की जरुरत क्यों महसूस हुई ? यह आधुनिक भावबोध क्या है जो ‘उर्वशी’ में अभिव्यक्त हुआ है?
सबसे पहली चीज जिसे मुक्तिबोध अघटनीय मानते हैं, वह है स्त्री और पुरुष का प्रेम विशेषकर रति सुख की गहराइयों पर चर्चा करना। इस विषय पर हिंदी में ‘उर्वशी’ के अलावा दूसरी रचना नहीं है। एक वर्जित विषय के रूप में इसे देखा जाता रहा है, लेकिन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इस मिथ को तोड़ा है। मुक्तिबोध इस संबंध में जिन शब्दों में दिनकर की आलोचना करते हैं, उसमें वही परंपरित नजरिया व्यक्त है, जो देह और दैहिक संबंध के विषय में चुप रहने में विश्वास करता है, खास तरह के रोमान भाव को बनाए रखने में विश्वास करता है। जब स्त्री-पुरुष की दैहिक जरूरतों और समस्याओं पर खुलकर बात करेंगे तो यह रोमान टूटेगा। मुक्तिबोध ने लिखा है, ” वैसे तो मैं कल्पना नहीं कर सकता कि रति-सुख की विविध संवेदनाओं की बारीकियाँ और गहराइयाँ नर और नारी के बीच चर्चा का विषय हो सकती हैं। यही क्या, नर भी संभवतः उन्हें भूल जाता होगा।”[v] यह खास नैतिकतावादी दृष्टि है जिसमें रति और काम को पुंसवादी नजरिये से देखा गया है। स्त्री-पुरुष के संबंध में यह सबसे प्रमुख नजरिया भी है। पुरुष जहाँ स्त्री के शरीर को कामपूर्ति का साधन मात्र समझता है, स्त्री की कामचेतना की बात तो सोचना भी दुष्कर है। इसमें काम और रति की विविध बारीकियों पर बोलना, गहराइयों पर चर्चा करना स्त्री के पक्ष से स्पष्ट निर्लज्जता और बदचलनी मानी जाती है। बंद वर्जनाओं वाले समाज में पुरुष के पक्ष से भी यह प्रगल्भता है जिस कारण मुक्तिबोध कहते हैं कि वह सोच नहीं सकते या कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसे में काम और रति-संबंधों की गहराइयों और बारिकियों को रचना के केन्द्र में रखना एक आधुनिक दृष्टि है। ‘उर्वशी’ के संबंध में दो चीजों को देखना दिलचस्प होगा एक कि काम की जो भारतीय परंपरा रही है, ‘उर्वशी’ उसमें क्या जोड़ती-घटाती है? दूसरा कि काम या यौनिकता को देखने की जो दृष्टि है उसका ‘केन्द्’ बिन्दु ‘ कौन सा है? संस्कृत ग्रंथों में काम संबंधी चर्चा अग्राह्य नहीं रही है। संभोग या मैथुन की विस्तृत चर्चा खेती और यज्ञ के रूपकों में की गई है। वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’ भगवद्गीता के समान महत्व वाला जीवनशैली का शास्त्र है। कालिदास की विभिन्न कृतियाँ कामसूत्र की विभिन्न मान्यताओं और प्रविधियों का विस्तार करती हैं। संस्कृत साहित्य के विभिन्न ग्रंथों पर इसका असर देखा जा सकता है। राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने एक लेख में इस बात का उल्लेख इस प्रकार किया है, ”कालिदास जैसे महाकवियों के रचनालोक में वात्स्यायन रचे-बसे हैं। ये कवि उनकी मान्यताओं और प्रविधियों को कलात्मक विन्यास और विस्तार दोनों देते हैं। वात्स्यायन न होते, तो कालिदास शिव और पार्वती के समागम और दोनों के ऐंद्रिय सुख का इतना सूक्ष्म वर्णन न कर पाते।”[vi] उल्लेखनीय है कि ‘कामसूत्र’ काम और संभोग का पूरी दुनिया में जाना-माना शास्त्र है। देह और देहजनित सुख, स्त्री-पुरुष की कामुकता पर लिखा गया सबसे पुराना प्रामाणिक ग्रंथ है। कामसूत्र के लिखे जाने के पहले तक वैदिक देवताओं की प्रतिष्ठा हो चुकी थी यानि लोक और लोकोत्तर का स्पष्ट विभाजन किया जा चुका था। कर्मफल और सत्ता द्वारा फैलाए गए अंधविश्वासों का प्रचार था। साहित्य और काव्य के आनंद की भी लोकोत्तर व्याख्या की परंपरा चल पड़ी थी। लेकिन कामसूत्रकार ने किसी अलौकिक अतीन्द्रिय सुख को लक्षित करके रचना नहीं की। इस मायने में ‘कामसूत्र’ एक क्रांतिकारी कृति है ,यह पूरी तरह से सेकुलर रचना है। कोई देवता या ईश्वर अथवा कोई अलौकिक आनंद या पिछले जन्म का भोग या अगले जन्म का फल, कोई विषयान्तर या पर्देदारी के बिना यह कृति रची गई है। हमारे यहाँ काम और कामजनित आनंद की यह भौतिक परंपरा की जड़ें बहुत गहरी रही हैं लेकिन धीरे धीरे इसे अपदस्थ करके स्त्री-पुरुष संबंधों की नैतिकतावादी भाववादी दार्शनिक व्याख्याएँ की गईं। इसमें भक्तिकाल का बड़ा अवदान है , भक्तकवियों ने काम के प्रति निषेधवादी रवैय्या अपनाया, और काम को स्त्री -पुरुष के विचलन का कारण बताकर निंदा की। भक्तिकाल में सामान्य जन के लिए नैतिक श्रेष्ठत्व हासिल करने का आसान जरिया था, सांसारिक सब चीज की आलोचना करना और प्रत्येक क्रिया को पारलौकिक बनाकर पेश करना। भक्ति का प्रसार सामान्य जनों में एक आंदोलन की तरह हुआ लेकिन सामान्य जनों में भौतिक सुख-साधनों के अभाव की प्रतिक्रिया संसार के प्रत्येक सुख और स्वयं संसार को भी निस्सार बताकर ही हुई। कामसूत्रकार की भौतिक सुख में भी देह के सुख की बात करना, उसके विज्ञान को रचना और उसे बिना किसी आध्यात्मिक अवलंब के खड़ा करना, बहुत बड़ी बात थी और इस तरह की किसी प्रकार की व्याख्या तत्कालीन सामंती समाज में प्रचलित कर पाना मुश्किल काम था, जहाँ राजा भी देवता था और देवता भी राजा राम थे!
‘उर्वशी’ की ख्याति काम को प्रधान विषय बनाने के कारण है लेकिन इसका सबसे कमजोर पक्ष काम को आध्यात्मिक रंगत दे देना है। कवि अगर भौतिक सुख की विशेषकर संभोग और रति सुख को ही अपने काव्य का विषय बनाता है तो रचना श्रेष्ठ नहीं कहलाएगी, कहीं न कहीं रचनाकार की चेतना में यह भाव है। जबर्दस्ती के आध्यात्म के कारण एक प्रकार का उथला दर्शन ‘उर्वशी’ की सबसे बड़ी कमजोरी है। अगर 1961 में कोई रचना स्त्री-पुरुष संबंधों को केन्द्र करके लिखी जा रही है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह काम के आध्यात्मिक पक्ष की चर्चा करे। काम पर बात करते हुए आध्यात्म का सहारा लेना एक विशेष दृष्टि के कारण पैदा होता है। दर्शन में आत्म और परमात्म के संबंधों की व्याख्या और परमात्मा में लीन होना, महादशा को प्राप्त करना आदि प्रक्रियात्मक व्याख्याएँ काम और स्त्री-पुरुष से जुड़े बहुत बड़े सच को छिपाने का काम करती हैं। उल्लेखनीय है कि दर्शन, साहित्य, विषय (आत्मगतता) , काम सबको पुंसवादी दृष्टि से देखा गया है। दर्शन में जो ‘आत्म’ है उसमें स्त्री के लिए जगह नहीं है, वह पुरुष है! इस आत्म को परमात्म या परमपुरुष से मिलना है। इस परमपुरुष से मिलन ही सबसे बड़ा सुख है। यह ‘आत्म’ जिस तरह से दर्शनशास्त्रों में चित्रित है वह ‘पुरुष आत्म’ है, उसकी उपलब्धियों और नाकामियों का चित्र है। इस आत्म का गहरा संबंध ‘स्व’ की उपलब्धियों से है, यह ‘स्व’ पुरुष है। इसके अलावा जो दूसरा बिंदु है कि काम के प्रश्न को देखते कहाँ से हैं, उसका प्रस्थान बिन्दु कौन सा है ? काम की प्रक्रिया और उपभोग में स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हैं। सवाल यह है कि जब काम पर विचार कर रहे हैं तो दोनों पक्षों को शामिल करके बात हो रही है अथवा किसी एक के दृष्टिकोण को केन्द्र में रखकर बात हो रही है ? आम तौर पर काम की विवेचना का पक्ष पुंसवादी विवेचना का पक्ष रहा है। आधुनिककाल में स्त्रीवादी आंदोलनों के पहले तक स्त्री की कामचेतना, काम में स्त्री की आनंदावस्था उसकी संतुष्टि के सवाल उठाए ही नहीं गए। आधुनिक युग में महिला आंदोलनों के दवाब के कारण औरतों में ‘स्व’ की चेतना प्रबल होती है। इस दौर में औरतें प्रचलित मान्याओं को सीधे चुनौती देती हैं। उल्लेखनीय है प्रचलित विमर्शों में स्त्री को देह कहकर लांछित किया गया । ऐसी अवस्था में काम ,स्त्री देह और उसके सुख की बातें स्त्री पक्ष से करना ,अपने आपमें नए स्त्री परिप्रेक्ष्य का आगमन था। स्त्री आंदोलनों के फलस्लरूप पैदा हुए स्त्री विमर्श में स्त्री अपने देह को स्वीकार करती है, उस देह को जिसके आधार पर उसे हीनतर सिद्ध किया जाता रहा उसे वह अपनी विशेषता बतलाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिम के स्त्रीवादी विमर्शों के भारत आगमन से बहुत पहले हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में स्त्री अस्मिता और पहचान के सवाल उठाए गए हैं। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान छपनेवाली पत्र-पत्रिकाओं में स्त्री और स्त्री से जुड़े विषयों पर स्वयं लेखिकाओं की रचनाएँ बड़ी संख्या में छप रही थीं। महादेवी ने सन् 1942 में ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ लिखकर स्त्री की अस्मिता और सामाजिक परिस्थितियों पर गंभीर रूप से ध्यान खींचा है। पश्चिम के स्त्रीवादी विमर्श में सर्वाधिक चर्चित किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’ में बहुत दूर तक स्त्री के शरीर के सवाल केन्द्र में हैं। इसके बाद की स्त्रीवादी आलोचना में स्त्री यौनिकता के प्रश्न महत्वपूर्ण होकर उभरे। ‘उर्वशी’ इस स्तर पर निराश करती है कि यह स्त्री के कोण से यौनिकता के प्रश्न को नहीं देखती। यह पुंसवादी दृष्टि से यौनिकता के प्रश्न को देखती है इसलिए इसमें उठाए गए मुद्दों में विषय के क्रांतिकारी होते हुए भी नयापन नहीं है। मुक्तिबोध जब घोषित करते हैं कि ”उर्वशी’ एक विलक्षण काव्य है। दैहिक काम संवेदनाओं की परिपूर्ति में परमतत्व के साक्षात्कार का प्रयत्न ही इस विलक्षणता को जन्म देता है।”[vii] तो यह पूछना जरूरी लगता है कि किसकी ‘दैहिक काम संवेदनाओं की परिपूर्ति’? उर्वशी की या पुरुरवा की, अथवा समभाव से दोनों की? पुरूरवा की उक्ति है- ”रूप का रसमय निमन्त्रण या कि मेरे ही रूधिर की वह्नि मुझको शांति से जीने न देती। हर घड़ी कहती, उठो, इस चन्द्रमा को हाथ से धरकर निचोड़ो, पान कर लो यह सुधा, मैं शांत हूँगी।”[viii] उठने की ललकार, हाथ से निचोड़ना, पान करना फिर शांति का आश्वासन ये सारी कामुक क्रियाएँ पुरुष संदर्भ से हैं। पुरूरवा, उर्वशी के समक्ष अपना परिचय और प्रेम-निवेदन इस प्रकार करता है- ”मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं। अन्ध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ, बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ। ……………………………………….. ……………………………………….. मैं तुम्हारे बाण का बिंधा हुआ खग, वक्ष पर धर सीस मरना चाहता हूँ। मैं तुम्हारे हाथ का लीला-कमल हूँ, प्राण के सर में उतरना चाहता हूँ।”
पुरूरवा का यह प्रेम-निवेदन ठेठ पुंसवादी दृष्टिटकोण का परिचायक है। वह नायक है अब भोक्ता होना चाहता है। सुख पाना चाहता है। एक कामातुर और ताक़तवर पुरूष को सुंदर स्त्री को भोगने का अधिकार हमारा शास्त्र देता है। पुंसवादी परंपरा देती है, यहाँ स्त्री का मन और उसकी बाधाएँ, इच्छा अनिच्छा , आनंद जैसे सवाल सामने ही नहीं आते। उर्वशी जिस भाव से देह भाव का निषेध करती है, वहां स्त्री का अपनी देह को लेकर कोई नजरिया व्यक्त नहीं होता। बल्कि आध्यात्मिकता का रंग देने के लिए इस तरह की उक्तियाँ उससे कहलवाई गईं हैं। ”पर, क्या बोलूँ? क्या कहूँ ? भ्रान्ति यह देह-भाव। …………………….. प्रिय! मैं केवल अप्सरा विश्वनर के अतृप्त इच्छा-सागर से समुद्भुत।” उर्वशी के चरित्र को लेकर रचनाकार के मन में यह द्वन्द्व नहीं कि वह स्त्री के संदर्भ में किसी आधुनिक विचार को सामने रख रहा है। सन् 1960 की आधुनिक स्त्री की अस्मिता का निरूपण करना भी उसका लक्ष्य नहीं है। उर्वशी की पहचान क्या है, यह उर्वशी से कहलाए गए रचनाकार के शब्दों में- ”नारी की मैं कल्पना चरम नर के मन में बसनेवाली।” उर्वशी का वक्तव्य सुन पाठक को यह लग सकता है कि वह किसी स्त्री की नहीं किसी सुख-दुख से परे किसी अलौकिक जीव की कथा सुन रहा हो। प्रणय स्त्री के जीवन का एक हिस्सा है। उसके पहले और बाद भी स्त्री के अस्तित्व के साथ जुड़ी अनेक दुश्वारियों से जैसे उर्वशी का परिचय ही नहीं। वह कहती है- ”भू-नभ का सब संगीत नाद मेरे निस्सीम प्रणय का है, सारी कविता जयगान एक मेरी त्रयलोक-विजय का है। प्रिय मुझे प्रखर कामना-कलित, सन्तप्त, व्यग्र, चंचल चुम्बन, प्रिय मुझे रसोदधि में निमग्न उच्छल, हिल्लो-निरत जीवन। तारों की झिलमिल छाया में फूलों की नाव बहाती हूँ, मैं नैश-प्रभा, सब के भीतर निश की कल्पना जगाती हूँ।” स्त्री के संबंध में कहें कि उसकी अस्मिता, अस्तित्व इनके साथ सदियों से जुड़ी सामाजिक भेदभाव जैसे कोई मुद्दा ही नहीं। बस उसकी एक ही भूमिका है कि वह निस्सीम प्रणय भाव में डूबी रहती है। अगर मान लें, जैसा रचनाकार कहना चाहता है कि यह चिरंतन स्त्री की छवि है तब भी स्त्री-पुरुष दोनों के काम संबंधों की सामाजिकता का विवेचन करना जरुरी है। उर्वशी कहती है- ” मैं देश-काल से परे चिरन्तन नारी हूँ। मैं आत्मतंत्र यौवन की नित्य नवीन प्रभा, रूपसी अमर मैं चिर-युवती सुकुमारी हूँ।” उर्वशी के रूप में स्त्री के चिरन्तन रूप की जितनी दार्शनिक व्याख्या कर लें परन्तु स्त्री के अस्तित्व के साथ, उसकी अस्मिता के साथ, उसकी देह और यौनिकता के साथ जुड़े जितने पक्ष हैं उनमें से किसी पर भी बात न करना , केवल स्त्री-पुरूष के चिरन्तन मोह और प्रणय की बात करना सत्य के बड़े पक्ष को ओझल करना है। यहां पर उल्लेखनीय है कि ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार लेते हुए दिनकर ने जो भाषण दिया था वह उनके साहित्य संबंधी विवादास्पद नजरिए का प्रमाण है और उसकी ओर आलोचकों ने तकरीबन ध्यान ही नहीं दिया। [i] कल्पना का उर्वशी विवाद, सिंह, गोपेश्वर, (सं), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 117 [ii] कल्पना का उर्वशी विवाद, सिंह, गोपेश्वर, (सं), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 117 [iii] मुक्तिबोध रचनावलीः पाँच(1980), जैन, नेमिचंद्र, (सं), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, 1985,पृ. 468 [iv] वही, पृ. 469 [v] वही, पृ 468 [vi] त्रिपाठी, राधावल्लभ, ऐसी कुगति भई वात्स्यायन की, प्रतिमान, जनवरी-जून, 2014(वर्ष 2, खण्ड2, अंक1), निगम, आदित्य और अन्य,(सं), सीएसडीएस, दिल्ली, पृ. 253-54 [vii] मुक्तिबोध रचनावलीःपाँच, पृ. 463 [viii] उर्वशी, पुरूरवा की उक्ति
सुधा सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफेसर हैं.