Home Blog Page 30

प्यार के परदे में कैद आज़ादी

विद्याभूषण रावत

यथार्थ की घटनाओं पर आधारित विद्याभूषण रावत की यह कहानी समाज में जेंडर और जाति के स्तरों को स्पष्ट करती है. इसमें पात्रों के नाम बदले गए हैं ताकि उनकी वैयक्तिकता का सम्मान हो. स्थान और कई इवेंट्स को थोडा बदला गया है ताकि लोग उसे किसी घटनाक्रम से न जोड़ सकें.

कलकते की मजदूर कॉलोनी में रहते उसने औरतों को घर से बाहर जाते देखा जो घर पर अपने परिवारों की पूरी देखभाल करती. पढ़ाई में खास मन नहीं लगा लेकिन जैसे कि रीत है, बीए पास तो करना ही था वरना रिश्ता कैसे आता, लिहाजा डिग्री लेने के लिए वापस अपने गाँव आना पड़ा. गाँव में वह कलकत्ता की चर्चा करती और लोग चाव से सुनते. उसकी हिंदी में भोजपुरी मिक्स थी. जब कभी बाहर जाना होता तो बिना मेकअप के घर से बाहर नहीं निकलती. घरवाले चिल्लाते, कितनी देर तक शीशे के आगे खड़ी अपने को देखते रहोगी. परिवार में तीन बड़ी बहनें और एक भाई था. सभी बहनें शादी-शुदा थी और अपने परिवारों में व्यस्त. घर में और कोई बीए नहीं कर पाया था इसलिए सुनीता के अन्दर थोड़े बड़प्पन वाला भाव तो था ही. वह शहर में बसना चाहती थी. औरों की तरह खुद भी नौकरी करना चाहती थी. गाँव जैसे उसे पसंद ही नहीं था. यह तो मज़बूरी थी के वह गाँव आ गयी क्योकि बीए की डिग्री शहर में तो शायद बिना पढ़े नहीं मिलती इसलिए लोग बड़े दूर-दूर से पूर्वांचल की और रुख करते है.

परीक्षा पास होने के बाद उसने सोच लिया कि अब दिल्ली जाना है और कही ‘नौकरी’ करनी है. कोलकाता में ज्यादा गुंजाइश नहीं लगी या यूं कहिये कि परिवार की बहुत रजामंदी न होने की सम्भावना थी, आखिर पापा जो एक फैक्ट्री में मजदूर थे, वह तो यही सपना पाले थे के सुनीता जैसे ही बीए करेगी, उसके लिए एक ‘अच्छा’ सा परिवार देख कर शादी कर दूंगा और अपने जिम्मेवारियो से मुक्त हो जाऊँगा. दिल्ली जाने से पहले ही सुनीता ने गाँव के कुछ लोगो से बातचीत कर अपने लिए एक ‘नौकरी’ ढूंढ ली. उसे कॉल सेण्टर में काम मिल गया. अब दिल्ली जाने का बहाना पुख्ता हो गया. दिल्ली की आबोहवा को उसने कोलकाता से ज्यादा खुला पाया. पूर्वांचल की घुटन से जहाँ खुले तौर पर लड़कों से बात नहीं हो पाती, यहाँ आसान था और एक प्रकार का सशक्तिकरण भी. दो महीने में भी सुनीता की अपने ही कॉल सेण्टर के एक लड़के से दोस्ती हो गयी. दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और एक दिन सुनीता ने अपने पिता को इसकी जानकारी दी तो उन्हें पसंद नहीं आया. ऐसा नहीं था कि पिता को बेटी का अपने लिए ढूँढा रिश्ता पसंद नहीं आया लेकिन लड़का धोबी जाति का था जो पिछड़ी कुर्मी जाति से जातिगत पायदान में बहुत नीचे है, ऐसा रिश्ता तो किसी भी कीमत पर समाज स्वीकार नहीं करता. ये तो हम जानते ही हैं कि भारत के गाँवों में शादी-विवाह दो व्यक्तियों के बीच का मामला नहीं अपितु दो परिवारों और समाजो का रिश्ता है इसलिए समाज की स्वीकार्यता के बिना कोई भी रिश्ता हमारे गाँवों में चल नहीं पायेगा. उसने कुछ ज्यादा विरोध भी नहीं किया और यही कहा के अब आपको ही मेरे लिए लड़का देखना पड़ेगा. सुनीता को गाँव वापस बुला लिया गया. अब वह अपने गाँव और कोलकाता के बीच आती जाती रहती. फिर एक दिन सुनीता के पिता ने खबर दी कि उन्होंने उसके लिए एक लड़का देख लिया है. लड़के के पिता एक बड़े अधिकारी थे और दिल्ली और कोलकाता में उनकी बहुत प्रॉपर्टी थी. लड़का कोई काम नहीं करता था लेकिन उस बारे में तो भारत में आज भी माँ बाप कुछ नहीं कहते, क्योंकि अभी तो ये ही देखा जाता है कि बाप, चाहे लड़के का हो या लड़की का, कितनी प्रॉपर्टी है और वह कितनी जेब ढीली कर सकते है.  सुनीता के पिता ने बताया कि लड़के के पिता कोई दहेज़ नहीं मांग रहे है और बहुत ही ‘सज्जन’ किस्म के व्यक्ति है.. आखिर उनकी इतनी संपत्ति है और एक ही बेटा है तो पैसा किसके लिए चाहिए . सुनीता भी खुश थी कि वह कुछ समय बाद बड़े घर की बहु बनेगी. घर के सभी सदस्य नए दामाद का इंतज़ार कर रहे थे. सुनीता की माँ, उसके पिता, और अन्य रिश्तेदार सभी खुश थे कि वह अपनी बिरादरी के इतने बड़े और पढ़े-लिखे परिवार की बहु बनेगी. सुनीता के मन में भी लाखो सपने तैर रहे थे जैसे कल ही अब सारी सम्पति उसके नाम हो जायेगी और वह अपनी मर्जी की जिंदगी जियेगी. शादी बड़े धूम धाम से संपन्न हुई. माँ-बाप, भाई बहनों ने जो देना था दहेज़ में दिया लेकिन खुश थे कि लड़के वालो की तरफ से बहुत बड़ी डिमांड नहीं थी. कुछ दिनों के बाद ही जब सुनीता घर आयी तो अपने ससुराल की बड़ी-बड़ी बातें बताने लगी. अपने सास ससुर की तारीफ के पूल बांधे जा रही थी और आस पड़ोस के लोग उसकी ख़ुशी में उपर से खुश दिखाई दे रहे थे लेकिन भीतर ही भीतर ये कहते हुए जले जा रहे थे कि ‘न रंग न रूप और देखो किस्मत कितनी बड़ी पायी है’. सुनीता का रंग थोडा सांवला था जिसको गोरा बनाने के लिए वह तरह-तरह के प्रयास रोज-रोज करते रहती. उसके मेकअप का खर्चा भी बहुत ज्यादा होता था जिससे घर में हमेशा कलह की स्थिति रहती थी. अब वह स्वतंत्र थी. शादी के बाद उसकी मांग पूरी भरी और गले से हाथो तक में सोना पूरा लदा हुआ था. वह मन ही मन खुश थी कि उसे इतना ‘बड़ा’ परिवार मिला है.

शादी के कुछ महीनो के बाद सुनीता अपनी मायके आयी. घर में सभी खुश थे और उससे बहुत कुछ सुनना चाहते थे. पैसे और धन सम्पति को ही सबकुछ मान लेने वाले लोग बार बार उसी विषय में बात करना चाहते है लेकिन ये क्या सुनीता बहुत परेशान थी. वह गर्भवती भी हो चुकी थी. उसके माँ बाप तो खुश हुए कि अब बेटी को खुशियों की सारी सौगात मिल रही है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेशो में अन्य स्थानों की तरह ग्रामीण भारत में शादी के एक महीने के ही अन्दर आपको ‘खुश खबरी’ देनी पड़ती है और इसमें जितनी देर होती रही उतने ही ताने लड़के और लड़की दोनों को सुनने पड़ते है लेकिन लड़की की हालत ज्यादा ख़राब होती है क्योंकि उसे घर पर सबको झेलना होता है. सुनीता के माँ बाप ने सोचा ऐसी क्या बात हुई कि उनकी लड़की गर्भवती होने का बावजूद चिंतित है, उसे तो खुश रहना चाहिए था. वह अपनी बात बता ही नहीं पा रही थी कि उसकी बड़ी बहिन अनीता ने उसे अपने पास बुला लिया ताकि कुछ दिन वह भैया भाभी और अन्य लोगो से दूर रह आराम से बात करेगी. अनीता अपनी तीन बेटियों के साथ अकेले रहती थी और उसका अपना संघर्ष था अपने जीवन का और अब एक स्वैच्छिक संघटन में कार्य करते-करते उसका दृष्टिकोण बदला और परिवार में भी जो लोग उसे किसी समय हिकारत की नज़र से देखते थे अब इज्जत देने लगे. यूं कहिये कि अनीता अपने परिवार की लडकियों के लिए तो रोल मॉडल बन चुकी थी. अनीता ने तो सुनीता को यहाँ तक कह दिया के जब उसके पति मानसिक तौर पर बीमार है तो उसे बच्चे करने में थोडा देर करनी चाहिए थी लेकिन हमारे समाज में अधिकांश तह बच्चे बिना योजना के होते है और दूसरे समाज को अपनी पूर्णता दिखाने के लिए एक नतीजे के तौर पर होते है और तीसरा बहुत से लोग ये मानते हैं  कि बच्चे होने के बाद पति पत्नी में रिश्ता मज़बूत होता है और वे एक दूसरे के प्रति ज्यादा जिम्मेवार होते है. शायद, सुनीता भी इन तीनो बातो के प्रभाव में रही होगी और इसीलिये उसे इस बात में कोई आपत्ति नहीं रही होगी. वैसे तो भारतीय समाज में बच्चे पैदा होने चाहिए या नहीं इसका निर्णय औरतें कब करती हैं? कम-से-कम जहाँ सुनीता रह रही थी उस समाज में तो ये अभी तक संभव ही नहीं है.

अनीता के यहाँ कुछ दिन रहकर सुनीता ने अपने दिल का गुबार बाहर निकाला. ‘ दीदी मेरे पति मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं और उनका इलाज़ बहुत दिनों से चल रहा है. उन्हें सिजोफ्रेनिया है. वह मुझे बहुत मारते भी है. उनके माँ बाप ने हमसे ये बात छुपाई कि उनका मानसिक इलाज़ चल रहा है. इससे भी ज्यादा ये कि मुझसे पहले भी इनकी एक शादी थी लेकिन शायद लड़की ने उसे छोड़ दिया’. सुनीता की आँखों में आंसू थे. उसे ये भी चिंता थी कि उसके होने वाले बच्चे पर तो उसके पति की मानसिक बीमारी का असर तो नहीं पड़ेगा. ऐसा सोचना किसी भी स्त्री के लिए सामान्य बात है क्योंकि अपने होने वाले बच्चे की चिंता तो सभी करते है. अनीता ने सुनीता को उसके पति का इलाज करवाने के लिए कहा और उम्मीद जाहिर की के वह ठीक हो जायेंगे. इस बीच में अनीता अपने ससुराल वापस चली गयी और यह कह कर संतोष करने लगी के बच्चा होगा तो शायद पति ठीक हो जायेंगे. अपने पति के ठीक होने के लिए वह ओझा, टोना टोटका जो कुछ हो सकता था करने लगी. उसके परिवार वालो ने भी अपनी तरफ से यही कोशिश की लेकिन बीमारी तो इलाज से ही ठीक होना संभव है.

शादी के एक वर्ष वाद सुनीता के बेटा हुआ और परिवार में सभी और ख़ुशी का माहौल था. वैसे भी शादी के बाद लड़की के ऊपर का प्रेशर तब थोडा कम हो जाता है यदि उसके बेटा हुआ है. बेटी होने का दंड तो बहुत भयानक होता है. सुनीता को अब लगने लगा कि सब ठीक हो जाएगा. हलाकि बेटा होने के बाद उसका पूरा फोकस वहीं हो गया और वह बेटे के प्रति अतिउत्साहित हो गयी. कोई भी उसके सामने उसके बेटे के बारे में कुछ नहीं कह सकता था. उसे लगता के सब उससे जलते हैं क्योकि उसके बेटा हुआ है इसलिए उसको ‘बुरी नज़र’ से बचाने के लिए रोज उसे काला टीका लगाती और उसके अलावा उसे कमरबंध, काले धागे आदि से हाथो और पैरो में बांधे रहते ताकि वे स्वस्थ रहें. कभी भी थोडा सा जुकाम या खांसी उसे होती तो वह पहाड़ सर पर उठा देती.  उसके ससुर भी अब समझाने लगे के वे लोग उसके बेटे की देखभाल करेंगे और बहु के लिए कोई छोटा सा बिज़नस खोलेंगे. सुनीता बचपन से ही स्वयं कुछ करना चाहती थी और घर की चाहरदिवारी में रहना उसे मंज़ूर नहीं था इसलिए उसे अपने सास ससुर की बात सही लगी. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सुनीता के पति का हिंसक चरित्र सामने आता गया. उसके सास ससुर अपने बेटे को कुछ नहीं कहते और बार-बार उसकी बीमारी का बहाना देते. बात सुनीता के सर के उपर से जा रही थी. एक बार वह घर छोड़ कर अपने माँ-बाप के पास वापस आ गयी लेकिन जैसे होता है, घर वालो की रजामंदी से फिर जाने लगी. इस बीच उसके ससुर ने बहुत सी बातें कही कि कुछ प्रॉपर्टी आदि उसके नाम पर कर देंगे यदि वह उनके बेटे की देखभाल करती रही.

अब सुनीता को बात समझ आ चुकी थी के उसके सास ससुर उसे केवल उनके बेटे की सेवा करवाने के लिए चाहते है और उसके बच्चे को खुद बड़ा करना चाहते है. घर पर कलह हो रही थी. रोज मारपीट बढ़ रही थी और सुनीता अब गंभीरता से घर छोड़ने के लिए सोच रही थी लेकिन उसके पास समस्या थी कि वह कहाँ रहेगी और क्या करेग? उसे ससुर ने उसके लिए एक छोटी दूकान की बात कही और कहा कि वह पांच हज़ार रुपये महीना भी उसे देंगे. अब सुनीता समझ चुकी थी कि उसके सास-ससुर कुछ नहीं करना चाहते है और क्योंकि उन्होंने अपने बेटे की पहली शादी और उसके उस पत्नी को छोड़ने और उसके बाद उसकी गंभीर मानसिक बीमारी को छुपाया और अपनी प्रॉपर्टी के नाम से ही उन्हें लुभाते रहे, तो वह अभी भी तरह तरह के प्रलोभन देते जा रहे थे. इस बीच उसके पति उसका बलात्कार करने और मर्डर करने की यह कह कर धमकी देता कि उसका तो इलाज़ चल रहा है इसलिए उसे कुछ होने वाला नहीं है. सुनीता बहुत परेशान हो चुकी थी और अब उसने निर्णय कर लिया के वह उस घर में तो नहीं जायेगी.

सुनीता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई. उसे पता था के बंगाल में चीजें इतनी आसानी से मूव नहीं होती क्योंकि पूरे तंत्र का राजनीतिकरण है. बाते आगे नहीं बढ़ी. फिर  उसने कोर्ट में केस किया लेकिन इससे पहले वह केस करती, उसके ससुर ने भी उस पर मुकदमा कर दिया और उस पर चरित्र का आरोप लगाया और उसके बच्चे को अपना मानने से इनकार कर दिया. सुनीता को लगा कि कोर्ट केस कर वह इस मुकाबले को आसानी से जीत लेगी और अपने बच्चे के साथ एक सम्मान जनक जिंदगी जी लेगी लेकिन महीनो इधर-उधर चक्कर लगाते और कोर्ट में वकीलों के सामने अपनी राम कहानी सुनाते-सुनाते वह परेशान हो चुकी थी. बार-बार यही सवाल उसके मन में था कि उसे न्याय कब मिलेगा? उसे अखबारों की उन कहानियो की तरह भरोसा हो रहा था जिसमे लोगो को न्याय की ख़ुशी में भारत की न्यायपालिका ‘विश्व’ में ‘सर्वोत्तम’ है, कहते हुए टीवी चैनलों पर सुना जा सकता है. अख़बार और मीडिया का तिलस्म हमारे जीवन पर इतना है के हमें पता ही नहीं होता के किसी केस के नतीजे में पहुँचने तक लोगो की कई पीढ़िया ख़त्म हो जाती है. सुनीता को अब कोर्ट से उम्मीद नहीं रही. उसने कलकत्ता छोड़ने का निर्णय किया और उत्तर प्रदेश में अपने गाँव वापस आ गयी.

समय का चक्र चला और सुनीता का अपने पूर्व प्रेमी अनिल से संपर्क हुआ. पता चला कि उसके दो बच्चे हैं और उसका अपनी पत्नी से तलाक हो गया. दोनों के बीच में प्यार की गर्माहट अभी भी थी इसलिए एक दो मुलाकातों में ही दोनों ने एक दूसरे का भरोसा जीत लिया. दरअसल प्यार से ज्यादा ये दोनों की व्यक्तिगत आवश्यकताएँ थीं जो एक दूसरे में पूरी होती दीख रही थी. दोनों के अपने बच्चे थे और उन्हें मम्मी और पापा की तलाश थी, अतः दोनों ने शादी का निर्णय ले लिया.

सुनीता ने अपनी दीदी अनीता से बात की क्योंकि उसे पता था के उसके माता पिता इस शादी के लिए अभी भी तैयार नहीं होंगे. अपने पति के साथ मुकदमो में और वकीलों के हाथो हरासमेंट अब वो सहन नहीं कर पा रही थी. इसलिए उसने अनीता को इसके लिए तैयार कर लिया क्योंकि उसे पता था के अनीता अगर राजी हो गयी तो परिवार में कोई उसकी बात को काट नहीं सकता. इस विषय पर पारिवारिक चर्चा में अनीता को छोड़ पूरा परिवार शादी के खिलाफ था लेकिन परिस्थितयो के अनुसार सबको लगा कि इस कार्य को चुपचाप कर लिया जाए. माँ बाप और रिश्तेदार अब इसलिए तैयार हो गए क्योंकि उनको बेटी की जरुरत थी. एक नवयुवती को, जिसके एक बच्चा भी हो, उसकी दोबारा शादी होना नामुनकिन है इसलिए सुनीता के परिवार ने इस रिश्ते को चुपचाप मंज़ूर कर लिया. सवाल ये था कि शादी कैसे हो, क्योंकि गाँव में शादी करने का मतलब सब को बुलाना और फिर जाति के पूरे सवाल पर अपनी फजीहत करवाना होता इसलिए अनीता ने निर्णय लिया कि विवाह केवल परिवार के मुख्य लोगों की उपस्थिति में मंदिर में होगा. निर्धारित तिथि में लडके के परिवार के सदस्य और सुनीता के परिवार के लोग एक मंदिर में इकठ्ठा हुए. पूर्वांचल में विवाह में एक रस्म लड़की के पिता को करनी पड़ती है जिसमे वह फेरे से पहले वर के पाँव छूते है. सुनीता के पिता विवाह के लिए तैयार हो गए लेकिन एक ‘धोबी’ जाति के लड़के के पाँव छूना उन्हें मंज़ूर नहीं था. उन्हें लग रहा था कि उनके जीवन में जो भी अच्छे काम उन्होंने किये वो सब आज ख़त्म हो गए है और इसलिए अपने दामाद के पैर छूना उन्हें अपराध लग रहा था. उनकी पोतियाँ उनके पास थी. फेरे होने के बाद, जैसे ही अपने दामाद के पाँव छूने की रस्म आई उनकी आँखों में आंसू थे. वह रोक नहीं पाए और अपने पोती के, यानि के अनीता की बड़ी बेटी के गले लगकर रोने लगे. फफक पड़े, ‘ ये बेटी की शादी की ख़ुशी के आंसू नहीं है, ये तो मेरे अपमान के आंसू है. मुझे मेरे कर्मो का फल मिल रहा है. जरुर पिछले जन्म में कोई कर्ज रहा होगा जो आज उतारना पड़ रहा है.”

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी कमजोरी ये है के जाति अभी भी हमारी संवेदनाओं को प्रभावित करने का सबसे बड़ा हथियार है. सुनीता के पिता ने अपनी बेटी के लिए बिरादरी का ‘बड़ा’ ‘कमाऊ’ लड़का देखा जिसने उनकी बेटी का अपमान किया और संभतः उसकी जिंदगी भी ख़त्म कर दी. उस विवाह के समय उन्होंने अपनी बेटी से इस विषय में कुछ पूछा तक नहीं लेकिन जिस लड़के ने उनकी बेटी से ये जानते हुए भी विवाह कर लिया के उसका अभी औपचारिक तौर पर तलाक नहीं हुआ है, उसके एक बेटा भी है, उससे शादी करना उन्हें अपमान लग रहा था क्योंकि वह ‘छोटी’ बिरादरी का है.

सुनीता का विवाह फिर से हो गया. उसे अपने प्रेमी वापस मिल गया. उसकी सास उसे बहुत प्यार करती है लेकिन केवल यह चाहती है कि बहु पूरे परदे में रहे और ‘आदर्श’ हिन्दू बहु की तरह रहे. सुनीता के परिवार में सभी लोग खुश हैं. अब वह अपने बेटे के साथ अपने नए परिवार में ‘खुश’ है. परिवार ‘अच्छा’ है और बहुत ‘पैसे’ वाला है. सुनीता भी अपने पति के साथ काम में हाथ बंटाती है और दूकान में बैठती है. अब उसके चेहरे पर रौनक है लेकिन सर के उपर पर्दा है, अब वह हमेशा अपने बाल बाँध कर रखती है क्योकी उसकी सास कहती है, बाल खुले रखने वाली औरते ‘अच्छी’ नहीं होती. आज सुनीता को अब सर पर पल्लू रखकर और पारंपरिक रस्मों के निभाने में आज़ादी नज़र आ रही है. अब वह अपने जीवन से संतुष्ट है और अपने पूर्व पति से कोई सवाल नहीं पूछना चाहती. वह कोई कोर्ट केस नहीं लड़ना चाहती. सुनीता नाम है व्यवस्था से असंतुष्टि का और परम्पराओं में घुसकर असंतोष को छिपा देने का. सुनीता की कहानी देश के सामाजिक जीवन और न्याय व्यवस्था की असफलता की कहानी है जो महिलाओं को कोर्ट कचहरी जाने से रोकता है, क्योंकि वहा उसे और भी उत्पीडित होना पड़ता है, ये कहानी यह भी है कि कैसे महिलाए परिस्थितियों के दवाब में अपने फैसले लेती है और कई बार विचार नहीं व्यवहार पर निर्णय लेती है, ताकि वे अपने भविष्य को संवार सके. कई बार परम्पराओं के बोझ को उठाने में उतना उत्पीडन नज़र नहीं आता जितना न्याय-व्यवस्था में मौजूद लोगो के दमघोटू सवालों से. नतीजे सामने है, महिलायें स्थायित्व चाहती हैं,  इसलिए मौका मिलने पर कोर्ट से बड़े क्लेम भी छोड़ने को तैयार हो जाती है. सुनीता खुश है क्योंकि उसे एक घर और साथी मिल गया.  हालाँकि ये मिलन ये भी साबित करता है कि हर एक अंतरजातीय दिखने वाला विवाह क्रांतिकारी नहीं होता, यह दो लोगो की आवश्यकताओं का मिलन है. सुनीता और अनिल के रिश्तेदारों को उनके अंतरजातीय होने की भनक भी नहीं है. दोनों अपने अपने घरो पर है, ये बात और है कि यदि कभी राज खुल गया तो क्या सुनीता के मायके के रिश्तेदार उसके साथ बैठने को तैयार होंगे या मान लेंगे कि उनकी बेटी खुश है, जाति से क्या लेना देना? शायद नहीं. इसलिए कई बार इन घटनाओं को छिपाना पड़ता है ताकि सुनीता जैसी जिन्दगिया समाज की ‘इज्जत’ के खातिर क़ुरबान न हो. बहुत से लोग विद्रोह कर देते है लेकिन अधिकांश परिस्थितियों के साथ समझौता कर लेते हैं क्योंकि वैचारिक लड़ाई का रास्ता बहुत लम्बा और कठिन होता है लेकिन व्यक्ति की आज़ादी भी आज़ाद खयालो में होती है. आखिर हम वही होते है जो चाहते हैं. सुनीता जैसी हजारो लडकियों के सपने एक ‘अच्छे’ पति पर आकर ख़त्म जो जाते है और फिर वे घूंघट और दमघोटू परम्पराओं में अपनी आज़ादी महसूस करने लगती है और फिर तभी बाहर निकलती है जब परिस्थतिया मजबूर करती है.

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में दलित, लैंड एंड डिग्निटी, प्रेस एंड प्रेजुडिस, अम्बेडकर अयोध्या और दलित आंदोलन, इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया और तर्क के यौद्धा शामिल हैं।

संविधान के हक में नफ़रत के खिलाफ औरतें

0

सुशील मानव

कल 4 अप्रैल 2019 को 100 से अधिक महिला संगठनों ने मिलकर वूमेन मार्च फॉर चेंज (औरतें उठ्ठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा) का सफल आयोजन किया। दिल्ली में ये महिला मार्च मंडी हाउस से शुरु होकर जंतर-मंतर तक गया, और जंतर मंतर पहुंचकर सभा में तब्दील हो गया। इसमें हर आयु, हर वर्ग, हर जाति और धर्म की छात्राओं, लड़कियों, महिलाओं और ट्रासजेंडर्स ने हजारों की संख्या में भागीदारी निभाई। इसी समय इसके समांतर ही देश के 20 राज्यों में 150 से भी अधिक महिला मार्च निकालकर लोगों से आह्वान किया गया कि पितृसत्तात्मक चौकीदार को उखाड़ फेंकों क्योंकि ये सरकार महिला विरोधी है, नागरिक विरोधी है।

हमसे बात करते हुए ‘एक्शन इंडिया’ एनजीओ की महिला पंचायत में काम करनेवाली संगीता ने बताया कि वो घरेलू हिंसा और उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की काउंसलिंग का काम करती हैं। उन्होंने कहा कि आज हम सड़कों पर इसलिए उतरें हैं क्योंकि सरकार ने लगातार हम महिलाओं के खिलाफ ही काम किया है। ये सरकार हमारी कम्युनिटी की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा नहीं करती। ये सरकार सैनिटरी पैड तक पर जीएसटी लगाती है।

एलजीबीटी समुदाय की रितु कहती हैं- “हम यहां इसलिए खड़े हैं क्योंकि बहुत वायलेंस है, बहुत डिस्क्रिमिनेशन है इस सरकार में। अब हमें ये सरकार नहीं चाहिए। हमें हर जगह इम्पॉवरमेंट चाहिए।”

हमसे बात करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता, एक्टिविस्ट अनीता भारती ने कहा- “आज जिस तरह का माहौल है उसके खिलाफ़ अमन और शांति के लिए हमें सड़कों पर उतरना पड़ा है। हम लोगों को इस चुनाव में ऐसी सरकार चुननी चाहिए जो सबका देखभाल करे, सबको न्याय दिला सके, जो सामाजिक समानता और सबके प्रति इज़्ज़त रखे। वो कहती हैं आज जिन राजनीतिक दलों में औरतें हैं वो भी महिलाओ के 33 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर नहीं बोलती हैं। औरतों की एक पोलिटिकल पार्टी की ज़रूरत तो है जो औरतों के मुद्दे को रखे लेकिन इसके लिए हम महिलाओं को धर्म, वर्ग जाति से परे एक साथ आना होगा ताकि हमारा सबका एक कॉमन मुद्दा हो सके तभी औरतों की कोई पोलिटिकल पार्टी बना पाना संभव होगा।”

‘पहचान’ एनजीओ चलाने वाली फरीदा बताती हैं कि वो स्कूल ड्रॉपऑउट लड़कियों के सशक्तिकरण के लिए काम करती हैं। उन्हें जॉब दिलवाती हैं। वो बताती हैं कि लड़कियों द्वारा स्कूल छोड़ने के दो कारण है। एक तो है परिवार की जनसंख्या। मान लीजिए कि किसी परिवार में पांच बच्चे हैं तो आज की महंगाई के समय में परिवार सोचता है कि किसी एक बच्चे को पढ़ा दें। तो उस एक बच्चे में वो लड़कों की पढ़ाई को प्राथमिकता देते हैं ऐसे में लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। और दूसरा कारण है उनकी पितृसत्तात्मक सोच।

फरीदा बताती हैं कि हमारा मकसद लड़कियों को नाम के साथ पहचान दिलाना है। वो हर धर्म वर्ग की लड़कियों के लिए काम करती हैं। वो बताती हैं कि उनके एनजीओ ने पांच साल तो हरियामा के 12 गांवों में लड़कियों के लिए काम किया है। इसके लिए उन्हें वहां के समाज का विरोध भी झेलना पड़ा है। वो कहती हैं ये सब सरकार का काम है, लेकिन सरकार नहीं कर रही है।

जंतर मंतर पर कार्यक्रम के दौरान मायाराव ने पितृसत्ता पर कटाक्ष करता एक मोनोप्ले प्रस्तुत किया। उनके अलावा धातिन, संघवारी ग्रुप, एमसी फ्रीजक, अमन बिरादरी के छात्रों, ने आजादी और समानता पर कई कार्यक्रम पेश किये। लड़कियों ने मार्च के दौरान नुक्कड़ नाटकप्रस्तुत किया। मंच से कई लड़कियों और औरतों ने गीत गाए। राहुल राम और संजय राजोरा ने मोदी सरकार पर तंज करते पैरीडी गाए। कई महिलाओं और महिला संगठनों के प्रतिनिधियों ने मंच से अपनी बातें रखीं।

पत्रकार भाषा सिंह ने कहा –“हम औरतें नफ़रत की राजनीति को ‘नो’ कहती हैं। हम महिलाएं रेप पोलिटिक्स को ‘नो’ कहती हैं। हम मनुवाद को नकारते हैं। मोहन भागवत और उसकी आरएसएस ब्रिगेड कान खोलकर सुन लें जो ये कहते हैं कि औरतें ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें नहीं तो देश संकट में आ जाएगा। हम औरतें बच्चे पैदा करने की मशीन में तब्दील नहीं होंगी। बहुत लंबी लड़ाई लड़कर हमने अपनी आजादी पाई है, इसे हम एक इंच भी गँवाने को तैयार नहीं हैं। हम पीएम की शक्ल में सत्ता में बैठे हिंदू साम्राज्य को नकारते हैं। जो अपनी योजनाओं के जरिए हमारी देह को टायलेट में तब्दील करते हैं जो हमारे अस्तित्व को रसोईगैस में तब्दील करते हैं। जहां इस सत्ता के प्रतिकार की बात आती है मुस्लिम और दलित औरतें सबसे आगे खड़ी होती हैं। सबरीमाला मंदिर मामले में, ट्रांसजेंडर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ये सरकार नकार देती है, ये सरकार खुद को सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर रखती है। हमारे पास कम समय है। आनेवाले चंद महीनों में हमें बूथ बूथ जाकर अपने संविंधान, अपने अधिकार और अपनी आजादी को बचाने के लिए प्रयास करना है। हम बूथ-बूथ जाएंगे और इस सरकार को नकारेंगे। हम यहां इस मंच से मांग करते हैं कि सोमासेन और सुधा भारद्वाज को रिहा करो। उन तमाम पत्रकारों को रिहा करो। आज हमारा यहां से ये रिजोल्यूशन होना चाहिए कि हम इस सरकार को उखाड़ फेंके।”

दलित महिला अंदोलन के एक प्रतिनिधि ने मंच से कहा- “कैसे देश भर में दलित और आदिवासी महिलाओं को सरकार ने विफल कर दिया है। उज्जवला योजना एक स्वांग है, जिन लोगों को इन योजना के तहत गैस कनेक्शन दिया गया है उनके पास इसे महीने में भरवाने के लिए पैसे तक नहीं हैं। देश में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति कैसी है। ग्रामीण भारत में सड़कें अभी भी एम्बुलेंस के लिए अनफिट हैं। स्वास्थ्य देखभाल और अस्पतालों की कमी के कारण रोजाना ग्रामीणों की मौत होती है। ऐसे क्षेत्र बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासी बहुल इलाकों में हैं और अगर यह बड़े पैमाने पर भेदभाव को इंगित नहीं करता है, तो यह क्या है?”

भारतीय मुस्लिम महिला अंदोलन की हलीमा ने कहा –“अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियों की स्कूल ड्रापआउट करने की दर खतरनाक स्तर पर है। सरकार ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए जितने भी वादे किए हैं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान और बाकी सब वादे देश में विफल हो चुके हैं। सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ट्रिपल तालाक और बुर्का प्रतिबंध और इस तरह के बारे में बात कर रही है। वे देश के सबसे दूर के कोनों में अशिक्षा और स्कूलों की अनुपलब्धता के बुनियादी मुद्दों पर बात नहीं कर रहे हैं।”

जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष, सारिका कहती है- “शहरों की सड़कों से लेकर हमारे देश के गांवों तक, महिलाएं अपनी राजनीतिक चेतना के साथ सामने आएंगी। यह न केवल संविधान को बचाने के लिए बल्कि संविधान को मजबूत करने के लिए भी हमारा संघर्ष है।”

‘सतर्क नागरिक’ की सुमन ने कहा– “विकास के नाम पर हमारे आवासों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। जब भी हम सवाल उठाते हैं और सरकार की जवाबदेही की मांग करते हैं, तो वे हमें हमारे घरों को ध्वस्त करने की धमकी देते हैं। हम बुनियादी अधिकार चाहते हैं।”

नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स की आरती ने कहा- “राज्य की प्रकृति ऐसी है कि महिलाओं के साथ पूर्ण भेदभाव किया गया है। हम अब उनके झूठे वादों पर विश्वास नहीं करेंगे, हम महिलाओं को अब और मूर्ख नहीं बनाया जाएगा। हम इस सरकार को आगामी चुनावों में खारिज कर देंगे।”

महिला किसान समूह की प्रतिनिधि कुंती ने मंच से कहा– “महिलाओं के श्रम को देश में ठीक से मान्यता नहीं मिली है।” महिलाओं के काम पर किसी का ध्यान नहीं जाता और इसे अनदेखा कर दिया जाता है। महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम करने के बाद भी पुरुषों के लिए गौण मानी जाती हैं।”

आखिरी वक्ता के तैर पर बोलते हुए ट्रांसजेंडर पावेल ने कहा- “हमें हमारे अतीत और इतिहास के बारे में बताया जाता है। हम आज भी हमारे इतिहास, हमारे संस्कृति में वहीं खड़े हैं। आज 2019 में भी हमारे साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाता है। हम खुद को किसी और से बेहतर जानते हैं। सरकार हमारे साथ बैठने, हमसे संवाद करने और फिर बिल और कानून बनाने से से इनकार क्यों कर देती है। हमसे इस बारे में बात नहीं की जाती है।लेकिन हम खुद के बारे में बात करेंगे।”

औरतें उठ्ठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा की फैक्ट शीट

जनगणना 2011 के मुताबिक भारत में अभी भी 30 करोड़ से अधिक लोग अभी भी साक्षर नहीं हैं। 40.7 प्रतिशत महिलाएं अभी भी साक्षर नहीं हैं। ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2013-14 के मुताबिक भारत में अभी भी 37% लोग निरक्षर हैं।

अंतरिम केंद्रीय बजट 2019-20 में बजट का 2.7 प्रतिशत शिक्षा के लिए आवंटित किया गया है जो 2012-13 के 3.1% बजट से भी कम है। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और उच्च शिक्षा पर ध्यान देने की आड़ में हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (HEFA) ने नवंबर 2018 तक आवंटित बजट का सिर्फ 39% ही खर्च किया है।

यूजीसी द्वारा भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में महिला अध्ययन केंद्रों के लिए प्रति वर्ष 35 लाख रुपए की धनराशि निर्धारित की गई है। फंड आवंटन में भारी कटौती की गई है। ये कटौती 12.5 लाख से 40 लाख के बीच है।

यू डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (DISE) डेटा 2016 के मुताबिक कक्षा 1 से 10 तक ड्रॉपआउट दर 19.81 प्रतिशत है। इसमें एससी लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 21.9 प्रतिशत, एसटी लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 26.5 प्रतिशत और ओबीसी लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 20.2 प्रतिशत है। जबकि मुस्लिम लड़कियों की ड्रॉपआउट दर के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो उनके विकास और शैक्षणिक आवश्यकताओं के प्रति इस सरकार की मानसिकता को दर्शाता है।

माँगे

 माध्यमिक शिक्षा को बेहतर किया जाए। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को माध्यमिक शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है और सर्व शिक्षा अभियान के साथ इसके विलय को निरस्त किया जाए।

आदिवासी, दलित और मुस्लिम लड़कियों पर विशेष ध्यान देने के साथ सभी वर्ग को सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण माध्यमिक शिक्षा प्रदान करने के लिए एक मजबूत और संकेंद्रित रणनीति तथा योजना विकसित की जाए।

लड़कियों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए माध्यमिक विद्यालयों के लिए महिला अध्यापकों के एक संवर्ग की तैयारी आवश्यक है। यह एक अपेक्षित क्षेत्र बना हुआ है और तत्काल कार्य करने की आवश्यकता है।

मुसलमान लड़कियों के ड्रॉपआउट  करने की दर से जुड़े DISE आंकड़ों को इकट्ठा करना फिर से शुरु किया जाए।

ग्रामीण महिलाओं में 45% से अधिक निरक्षरता दर और दलित आदिवासी तथा मुस्लिम महिलाओं में 55% से अधिक अशिक्षा दर होने के बावजूद वयस्क महिलाओं की शिक्षा के लिए कोई योजना नहीं है। 3 साल तक धीमी गति से चलने के बाद साक्षर भारत कार्यक्रम वर्ष 2018 में आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया और भविष्य की कोई योजना नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा पूरी तरह से वित्त पोषित एक राष्ट्रीय स्तर की योजना विकसित करना जो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की सभी महिलाओं के लिए वयस्क शिक्षा को सक्षम बनाए।

दलित और आदिवासी लड़कियों को मुख्यधारा में लाने में सफलता के बावजूद कुछ ही राज्यों में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) को 10वीं कक्षा तक अपग्रेड किया गया है। जबकि सभी राज्यों में KGBV को 10वीं कक्षा तक अपग्रेड किया जाना चाहिए। साथ ही, अगले 2-3 वर्षो के भीतर कक्षा 12 तक KGBV के अपग्रेड करने की स्पष्ट योजना होनी चाहिए।

आरटीई अधिनियम के तहत प्रदान की जाने वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (विशेषकर सरकारी क्षेत्र में) के लिए शिक्षा बजट पूरी तरह अपर्याप्त है। इसने विशेष रूप से गरीब और ग्रामीण समुदायों की लड़कियों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। शिक्षा के अधिकार के लिए सकल घरेलू उत्पाद के 6% की मांग को पूरा करना और सभी के लिए 18 वर्ष की उम्र तक की शिक्षा आरटीई अधिनियम का विस्तार कर लागू करना। बजट में विश्वविद्यालय के छात्रों को गैर-नेट छात्रवृत्ति के लिए आवंटन के बहाल करना। 

अफसोस कि औरतें उठ तो रही हैं पर मर्दवादी संस्थाएं उन्हे कुचल देना चाहती हैं

4 अप्रैल 2019 को महिला संगठनों ने पूरे देश में ‘बदलाव के लिये वोट’ की राजनीति का आह्वान करते हुए अलग-अलग शहरों में पिछले पांच साल में लगातार बढ़े अन्याय, शोषण और कॉरपोरेट लूट और हिंसा के खिलाफ लोकतांत्रिक ढंग से जुलूस निकाले.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर रैप की शक्ल में गाये जा रहे गीत, भाषण की शक्ल में की जा रही राजनीतिक गोलबंदी और युवा लड़के लड़कियों का तेज धूप में इन सारे कार्यक्रमों को सुनने और रिकॉर्ड करने का जोश देख कर लगा कि कल मीडिया में ये खबर जरूर सुर्खियां बटोरने पर कामयाब रहेगी क्योंकि ये मार्च पूरे देश में हुआ और छात्रों, बुद्धिजीवियों के अलावा ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक संगठनों में काम करने वाली श्रमिक महिलाओं की भागीदारी भी इस जुलूस में भरपूर दिखी.

दूसरा चुनावी माहौल में सत्ता पक्ष के खिलाफ उठ रही जनभावनाओं को मंच देने का काम मीडिया पिछले सालों के मुकाबले ज्यादा करता है.

पर अफसोस कि ये मार्च भी देश भर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भर दी गयी महिला विरोध की भावना की भेंट चढ़ गया. मुख्यधारा मीडिया में इस मार्च कि चर्चा आज न के बराबर दिख रही है. खासकर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो आम लोगों के बीच अभी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं वे लगातार सत्ता के खिलाफ जारी राजनीतिक सामाजिक बदलाव को खारिज करने या आम लोगों के बीच न पहुंचने देने में एक षड़यंत्रकारी भूमिका निभा रहे हैं.

औरतों के मुद्दों पर जारी हर प्रगतिशील बहस का लगातार केवल अंग्रेजी मीडिया तक सिमटे रहना और रीजनल मीडिया खासकर हिंदी मीडिया के 90 फीसदी से ज्यादा हिस्से का भाजपाई सरकार के महिला विरोधी एजेंडा के लिए पूरा समर्थन मीडिया के अंदर मौजूद मर्दवाद द्वारा न केवल पोषित है बल्कि वही वह ताकत भी देता है कि कैसे मीडिया के अंदर मौजूद औरतों की संपादकीय क्षमता को आम लोगों तक नहीं पहुंचने देना है.

पितृसत्तात्मक संस्थाएं, औरतों के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ जारी किसी बहस को आम लोगों के बीच न पहुंचने देने के मकसद में पूरी तरह से गोलबंद नज़र आ रही हैं और उनकी प्रोफेशनल भूमिकायें, औरतों के मुद्दों पर बेहद संदिग्ध हैं, यही वजह है कि पिछले पांच सालों में औरतों ने लगातार हर मुद्दे पर सरकार की जनविरोधी नीतियों का सबसे खुला प्रतिवाद किया है लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाए जिनमें मीडिया से लेकर न्यायालय और नोकरशाही सभी शामिल हैं, उन्होने लगातार आम लोगों से जुड़े हर मुद्दे का समाधान निकालने के बजाय उसे खारिज करने, दबाने और कुचलने का ही काम किया हैै.

पूरे देश में महिलाओं का बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट से नाम गायब होना एक बड़ा मसला है , बावजूद इसके कोई राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है. राजनीतिक पार्टियों का घोर मर्दवादी नेचर उन्हे अब भी औरतों की राजनीतिक इच्छाशक्ति को लोकतंत्र में समुचित जगह देने से इंकार कर रहा है.

पहली महिला कुली, दलित महिला आंदोलन नेत्री जाईबाई चौधरी

दलित आंदोलन की सशक्त क्रांतिकारी नेत्री, दलित बच्चियों की पढ़ाई के लिए विशेष रुप से प्रथम कन्या विद्यालय चोखा मेला कन्या पाठशाला खोलने वाली प्रथम दलित महिला प्रिंसिपल, प्रथम महिला कुली और कोई नही दलित महिला आंदोलन को दिशा देने वाली महार समुदाय में जन्मी जाई बाईचौधरी थी।दलित नेत्री जाईबाई चौधरी का नाम अभी दलित इतिहास के पटल पर जगमगाना बाकी है। बहुत अफसोस होता है कि भारतीय समाज में और खासकर दलित समाज में किए गए उनके योगदान और उपलब्धियों पर कभी खुलकर चर्चा नही हुई है। गाहे-बगाहे जरुर उनका नाम जरुर दलित महिला आंदोलन में लिया जाता रहा है।  परंतु मुझे विश्वास है कि वह समय दूर नही जब उनके द्वारा किए गए समस्त कार्य, चाहे वह लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में हो या फिर दलित महिला आंदोलन की रीढ़ बनकर उसकी मशाल जलाने के लिए किए गए सारे महत्वपूर्ण कार्य, जब समाज के सामने लाये जायेगे तो हमारे दलित आंदोलन के इतिहास में हमारी एक और पुरखिन पुरोधा का नाम जुड़कर हमें नई ऊर्जा और रोशनी देगा।

सामाजिक क्रांतिकारी सावित्रीबाई फुले के परिनिर्वाण से कुल पाँच वर्ष पहले और बाबा साहेब से एक वर्ष बाद पैदा हुई जाई बाई चौधरी के रास्ते आगे चलकर सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब के रास्ते में जा मिले। सिर्फ रास्ते ही नही मिले बल्कि उनके भी पार जाकर, जाई बाई चौधरी ने आगे बढ़-चढ़ कर सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब द्वारा शुरु की गई ज्ञान की परंपरा को बखूबी आगे बढ़ाया।

दलित महिला आंदोलन की पुरोधा जाई बाई चौधरी का जन्म 2 मई 1892 में नागपुर शहर से पन्द्रह किलोमीटर दूर उमरेडमें हुआ। भारत में 1896 में पड़े भयंकर अकाल की विभिषिका से चारों और त्राहि त्राहि मच गई। लोग भूखे मरने लगे। उनके पास  करने के लिए कोई काम काज न बचा। ऐसी कठिन परिस्थिति में गरीब अशिक्षित मेहनती माता पिता अपनी बेटी जाई बाई चौधरी की नन्हीं सी अंगुलियां थामे जीवनयापन के लिए काम की तालाश में उमरेड छोड़कर नागपुर आ गए। बस यही नागपुर में मजदूरी करते हुए जाई बाई चौधरी की प्रारम्भिक प्राईमरी की शिक्षा हुई। मात्र 9 साल की अल्पायु में उनका विवाह बापूजी चौधरी से कर दिया गया। जाई बाई चौधरी के पति के घर की माली हालत बहुत खराब थी। घर में भयंकर गरीबी और भुखमरी थी। घर का खर्च चलाने के लिए छोटी सी जाई बाई चौधरी को कुली का काम करना पड़ा। वे यात्रियों का भारी भरकम सामान अपने नन्हें से सिर पर लादकर नागपुर स्टेशन से कामटी स्टेशन तक आती थी। इन दोनों स्टेशन की बीच की दूरी लगभग दस किलोमीटर है। जो अवस्था बच्चों के खेलने खाने की, बेफिक्री का जीवन जीवन जीने की, माँ बाप का लाड़ प्यार पाने की होती है उस उम्र में जाई बाई चौधरी को कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ी। संयोगवश ऐसे ही सामान ढोते हुए एक दिन एक मिशनरी महिला मिस ग्रेगरी से उनसे बातचीत की । पढ़ा लिखा व्यक्ति अपने हाव भाव, बातचीत और व्यवहार से अलग ही पहचाना जाता है, फिर वह चाहे कोई भी और किसी भी तरह का काम करता हो। पढ़ी लिखी जाई बाई चौधरी को कुलीगिरी करते, सिर पर भारी भरकम सामान ढोते हुए देखकर मिस ग्रेगरी बहुत हैरान परेशान और दुखी हुई । मिस ग्रेगरी ने जाई बाई चौधरी को कुलीगिरी से पूर्ण मुक्ति दिलाने की सोचा, क्योंकि जाई बाई चौधरी के पास इतनी शिक्षा थी कि वह छोटे बच्चों को पढ़ा सकती थी। मिस ग्रेगरी ने उनकी पढ़ाई लिखाई को देखकर, उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर, नागपुर के पास टिमकी में एक मिशनरी स्कूल में चार रुपये महावार की तनख्वाह पर अध्यापिका की नौकरी पर रखवा दिया। परंतु यह नौकरी ज्यादा नही चल पाई क्योंकि जाई बाई चौधरी अछूत कहे जाने वाले महार समुदाय से थी इसलिए उस मिशनरी विद्यालय के विद्यार्थियों ने यह कहकर कक्षाओं का बायकाट कर दिया कि एक हम एक अछूत से नही पढ़ेगे और उन विद्यार्थियों के माता पिता ने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से मना कर दिया। इन परिस्थियों में जाई बाई चौधरी ने मिशनरी स्कूल की नौकरी स्वयं छोड दी। .

जाई बाई चौधरी मिशनरी स्कूल के विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों द्वारा की गई बेईज्जती से बेहद आहत और क्षुब्ध हुई। इस जातिवाद के कारण न जाने कितने दलित समाज के लोग अपनी योग्यता, क्षमता दिखाने और अवसर पाने से वंचित रह जाते है यह सोचकर जाई बाई चौधरी को बहुत गुस्सा आया। उस वक्त उन्हें जातिप्रथा एकदम उस जहरीले नाग की तरह लगी जिसने उन्हे अभी अभी डंस लिया हो और वह सांस भी न ले पा रही हों। लेकिन इस जाति भेद के जहरीले नाग को क्या पता था कि जाई बाई चौधरी कितने मजबूत इरादों वाली महिला थी। वह बेहद बैखोफ निडर हिम्मती और परिश्रमी थी। जो महिला सिर पर दस किलोमीटर दूर सामान ढोकर ले जाती हो, वह इन मुसीबतों से क्या घबराएगी? जाई बाई चौधरी ने अब सीधे-सीधे जातिवाद व उसकी जहरीली जड़ों, जातिवादी ताकतों से टक्कर लेने की सोची। टक्कर लेने का यह बल और आत्मविश्वास शिक्षा से ही आता है। उन्होने उसी वक्त प्रण कर लिया कि वह अपना तमाम जीवन अपने अछूत समाज के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए समर्पित कर देगी। जाई बाई चौधरी जानती थी कि बिना शिक्षा के किसी समाज की तरक्की नही हो सकती और न ही वह अपनी दुख पीड़ा, प्रताड़ना और अत्याचार से मुक्ति पा सकता है। जातिवाद के चंगुल से छूटने के लिए जरुरी है शिक्षा का प्रचार प्रसार करना । इसलिए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ही काम करना शुरू किया। उन्होंने घर-घर जाकर दलित बच्चों को स्कूल लाने की मुहिम शुरु की। इसके लिए उन्होंने 1922 में मंगलवारी की न्यू कालोनी में संत चोखामेला के नाम से संत चोखामेला कन्या पाठशाला खोली।

जाई बाई चौधरी के द्वारा चलाए गए शिक्षा अभियान और उसके प्रति उनकी अप्रतिम अद्भुत समर्पण भावना का पता प्रसिदध दलित साहित्यकार कौशल्या बैसन्त्री की विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा दोहरा अभिशाप के कई पन्नों में लिखा हुआ मिलता है। कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखती है – जाई बाई चौधरी नाम की अछूत महिला ने नई बस्ती नामक जगह पर लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था। यह स्कूल उनके घर के पास ही एक पक्के मकान के दो कमरों में लगता था। यह घर एक दलित ईसाई का था। इस घर के आधे में वे रहते थे और आधा घर स्कूल के लिए दे दिया था। जाई बाई स्कूल चलाने के लिए चंदा एकत्र करने बहुत दूर तक अपना रजिस्टर साथ में लिए घूमती रहती थी। वे अस्पृश्यों की बस्तियों में भी जाकर उन्हें अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए कहती थी। उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में बताती थी। वे हमारे घर भी आई थी और हमें स्कूल भेजने के लिए कहा। माँ ने मुझे और मेरी बड़ी बहन को उनके स्कूल भेजना शुरू किया।

कौशल्या बैसन्त्री जाई बाई चौधरी के स्कूल का वर्णन करते हुए कहती है कि –यह स्कूल उस वक्त प्राइमरी स्कूल ही था (अब हाईस्कूल हो गया है) हम दोनों बहनें नियमित रूप से स्कूल जाती थी । जाई बाई की लड़की भागन बस्ती में लड़कियों को लेने आती थीं। कभी लड़कियाँ जाती, कभी नहीं जाती थी। भागन को देखते छिप जाती थी। परन्तु हम दोनों बहनों का जाना जारी रहा। अगर हम स्कूल जानें में आनाकानी करती तो माँ डांटती थीं। हमारी बस्ती में से सिर्फ हम दो-चार लड़कियाँ ही जाती थी। बाद में दो लड़कियों की शादी हो गई और वह स्कूल नहीं आईं

जाई बाई ने कौशल्या बैसन्त्री के परिवार में शिक्षा की ज्योति जला दी जिससे कौशल्या बैसन्त्री के परिवार की सारी बहने पढ़ लिख गई। कौशल्या बैसन्त्री जो बाद मे चलकर एक समाज सेविका और प्रसिद्ध साहित्यकार बनी उनके अंदर पढ़ लिखकर समाज सेविका बनने का जज्बा पैदा करने और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को संवारने का काम निसंदेह जाई बाई चौधरी का ही था। इसका बात का पता स्वयं कौशल्या बैसन्त्री के आत्मकथन से भी चलता है –

माँ की जाई बाई के साथ अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी। माँ जाई बाई को मौसी कहती थी। जाई बाई कभी-कभी हमारे घर भी आया करती थी । माँ उनका आदर करती थीं। उन्हें कभी-कभी खाना वगैरह खिलाकर ही जाने देती थी। माँ ने अब हम सब बहनों को पढ़ाने का निश्चय कर लिया था। बाकी बहनें अभी छोटी थीं, अभी स्कूल नही जाती थीं। फिर माँ ने बाद में उन्हें पढ़ाने का निश्चय कर रखा था।  और मेरी बहन जाई बाई के स्कूल में जाती थी । हमें शनिवार के दिन दो पारसी महिलाएं गर्ल्स गाइड सिखाने आती थीं। पानी में डूबने पर या आग लगने पर क्या करना चाहिए, एक्सीडेंट वगैरह होने पर रोगी की देखभाल कैसे करनी चाहिए, आदि बातें बताती थीं। रस्सी की मजबूत गाँठे बाँधना भी वे बताती थीं। इसके अलावा खाने की कुछ चीजें पकाना, कुछ सिलाई-कटाई भी सिखाती थीं। नाटक वगैरह के कार्यक्रम भी करती थी। एक बार पृथ्वीराज-संयोगिता नाटक मंचित तिया गया और मैंने उसमें राजा जयचंद की भूमिका की थी। गर्ल्स गाइड में दो ग्रुप थे। एक बड़ी लड़कियों का और दूसरा छोटी लड़कियों का। छोटी लड़कियों के दल को बुलबुल कहते थे। उन्हें गर्ल्स गाइड के दिन सफेद ब्लाउज और नीले रंग का पेटीकोट पहनना पड़ता था। बड़ी लड़कियाँ नेवी ब्लू साड़ी जिसमें सफेद रंग का बार्डर होता था और जिस पर जार्ज पंचम के ताज बने रहते थे, पहनती थीं। दोनों दलों को जार्ज पंचम के ताज के ब्रोच लगाने पड़ते थे, अपने ब्लाउजों पर। ये पारसी महिलाएं हमें कभी-कभी गवर्नर की कोठी पर ले जाती थीं। वहाँ नागपुर के कई स्कूलों की लड़कियाँ आकर अपने कार्यक्रम पेश करती थी। सारी लड़कियाँ गोल घेरा डालकर बैठतीं। सामने लकड़ियां जलाई जाती थीँ। गवर्नर एक गद्दीदार चेयर पर बैठकर कार्यक्रम देखते थे। मेरी बड़ी बहन ने गवर्नर के सामने एक छोटा-सा नाटक खेला था। वह नाटक में एक बच्चे की माँ बनी थीं जिसका एक्सीडेंट हो गया था। उन्होंने रोने का अभिनय किया था। सबने उनके अभिनय को सराहा और उनको इसके लिए गवर्नर के हाथों से एक पीतल की ट्रे इनाम में मिली थी। कार्यक्रम के बाद सबको चाय या काफी या कोको, केक, पेस्ट्री बन, वगैरह खाने को मिलता थथ। जब कभी वाइसराय दिल्ली से नागपुर आते तो वे जिस रास्ते से गुजरने वाले होते थे, वहाँ जाई बाई हमें हाथ में झंड़िया पकड़ाकर खड़ा रखतीं। जब वाइसराय गुजरते थे तब हम झंड़ियाँ हिला-हिलाकर उनका स्वागत करते थे

जाई बाई अपने पूरे परिवार के साथ शिक्षा के लिए तन मन धन से समर्पित थी। कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में एक जगह कहती है –

जाई बाई के स्कूल में पढ़ाई की कोई फीस नहीं ली जाती थी। कभी-कभी शिक्षक नहीं मिलते थे तो उनका लड़का, कभी-कभी बहू भी हमें पढ़ाती थीं। जाई बाई भी कभी-कभी पढ़ाती थीं। हमारे पास ही चोखामेला अस्पृश्य विधार्थी हॉस्टेल था। वहाँ नागपुर से बाहर के लड़के रहते थे। कभी-कभी ये विधार्थी भी हमें पढ़ाने आया करते थे

जाई बाई चौधरी ने अपने द्वारा 1922 में स्थापित संत चोखामेला कन्या पाठशाला में जिस समर्पण लगन और ऊर्जा ताकत से काम किया समाज में उस जैसी कोई मिसाल नहीं है। 1922 से लेकर 1954 तक विद्यालय प्राईमरी, 1954 से 1980 तक सेकेंडरी और 1980 के बाद से यह विद्यालय सीनियर सेकेंडरी हो गया है। अब इस विद्यालय को जाई बाई चौधरी के पोते सुधाकर श्रवण चौधरी चला रहे है। अब भी इसमें कई हजार बच्चे पढ़कर जाई बाई का शिक्षित समाज का सपना पूरा कर रहे है।

जाई बाई चौधरी एक शिक्षिका, एक विद्यालय की प्रिंसिपल होने के साथ-साथ, दलित महिला आंदोलन की झंडाबरदार तथा उसको नेतृत्व प्रदान करने वाली, एक जागरूक लेखिका एव अच्छी बहुत प्रखर और तेजस्वी वक्ता भी थी। जाईबाई चौधरी बाबा साहब के कार्यों, उनके विचार और शिक्षाओं से प्रभावित उनकी पक्की अनुयायी थी। शोषित वंचित समाज के प्रेरणा स्रोत बाबा साहेब दलित समाज में जितना पुरुषों की उपस्थिति को महत्व देते थे उतना ही दलित समाज की महिलाओं को भी। यही कारण था कि बाबा साहेब द्वारा चलाया गया दलित आंदोलन कभी भी एकांगी नही रहा। ऐसा कभी नही हुआ कि जब मिटिंग में केवल और केवल दलित पुरुषों की ही भागीदारी हो और दलित महिलाओं की न हो। बाबा साहेब पूरे वंचित शोषित समाज के प्रेरक थे इसलिए आज भी दलित आंदोलन के साथ साथ दलित महिला आंदोलन और दलित महिला लेखन अपने आप से बिना की बाहरी सहायता या अनुदान के बखूबी चल रहा है।

बाबा साहेब और उनके साथ जुड़ा दलित महिला वर्ग अपने समाज की तरक्की के लिए किस कदर चिंतित था इसका उदाहरण यही है कि प्रत्येक सभा के उपरांत स्त्रियों की सभा जरुर रखी जाती थी और जब सन् 1930 में आठ-नौ अगस्त को, नागपुर में अखिल भारतीय दलित कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ और इस अधिवेशन के साथ दलित महिलाओं का प्रथम अखिल भारतीय दलित महिला अधिवेशन भी हुआ था। जिसकी अध्यक्षता सगुणाबाई गावेकर ने की। जाई बाई चौधरी इस परिषद की रिसेप्सन समिति की सेकेट्री थी। अखिल भारतीय दलित कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में दलित महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए जाईबाई चौधरी ने कहा था – लड़कियों को भी लड़कों के समान पढ़ने के पूरे-पूरे अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। एक लड़की की शिक्षा से  पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है

1930 में आयोजित परिषद में दलित महिलाओं की बड़ी तादाद में भागीदारी बताती है कि उस समय दलित महिला आंदोलन बहुत मजबूत था। उसमें अनेकानेक दलित महिलाएं अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रही थी। जाई बाई चौधरी दलित महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थी। हलांकि सवर्ण महिला आंदोलन के मुद्दे दलित महिला आंदोलन से एक दम अलग हैं। हमारे जातिगत शोषण, अत्याचार और उत्पीड़न पर उनका चुप्पी साधना और उसको महिला आंदोलन की प्रमुख मुद्दों में शामिल न करना यह सवर्ण स्त्री आंदोलन का पुराना इतिहास है। इस बात का पुख्ता आधार और सबूत हमारे पास है।

दलित महिला आन्दोलन गैर दलित महिला आन्दोलन से जुड़ने व उनके साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखता है और रखता रहेगा। दलित महिला आंदोलन की अगुआ नेता जाई बाई के साथ एक बार ऐसी घटना घटी जो पूरे भारत की दलित महिलाओं के लिए बहुत ही अपमान जनक था।

1937 में दिसम्बर में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद’ के अधिवेशन में जाई बाई चौधरी को कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया गया। इस अधिवेशन में अखिल भारतीय महिला परिषद की हिन्दू सवर्ण जाति की महिलाओं ने जाईबाई चौधरी को भोजन की जगह से दूर बिठा कर उनकी बेइज्जती की और भारतीय महिला आंदोलन में अपनी हिस्सेदारी नेतृत्व और हैसियत को अपनी जातीय श्रेष्ठता से साबित किया । जाई बाई चौधरी ने सवर्ण महिला परिषद को ललकारा.  उनके साथ हुए इस ओछे, घृणित, निंदनीय छूआछात भरे अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपनी बात रखने के लिए 1 जनवरी 1938 को नागपुर के धरम पेठ में दलित महिलाओं ने बड़ी भारी सभा की जिसमें हजारों-हजार दलित महिलाओं ने भाग लिया।  सवर्ण महिलाओं द्वारा बरती गई दलित महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण बर्ताव व छुआछूत और भेदभाव का जमकर विरोध किया। जाई बाई चौधरी की साथी नेता’दलित नेत्री अंजनी बाई भ्रतार और सखूबाई ने इन हिन्दू महिलाओं को ‘बेशरम’ और ‘नीच किस्म का आचरण करने वाली’ कहकर कड़े शब्दों में उनकी भर्त्सना कर अपना रोष प्रकट किया’ और दलित महिलाओं को स्वाभिमानपूर्ण स्वाबलम्बी होकर जीने की शिक्षा दी।’ इसी परिषद में रमाबाई अम्बेडकर ने महिला संघ स्थापित किया गया। इस महिला मंडल ने दलित महिलाओं के लिए रात्रि स्कूल शुरू करने का फैसला लिया।

जाई बाई चौधरी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में जितना काम किया दलित समाज और दलित महिला आंदोलन उनके कर्ज को कभी नहीं उतार सकता। आज महाराष्ट्र में दलित महिलाओं का शानदार आंदोलन और समझ है, समाज में काम करने का जज्बा है, शिक्षा के प्रति जो लगाव है, अन्याय के प्रति विद्रोह करने की भावना है यह सब हमारी पुराधाओं के समाज में किए गए समाजिक कार्यो का परिणाम है। जाई बाई चौधरी हमारी प्रमुख पुरोधा है, उनके द्वारा शिक्षा के लिए जलाई गई मशाल और दलित आंदोलन में फूंकी गई हर सांस कभी न बुझने वाली ज्वाला है। जब तक इस धरती पर अन्याय है, छुआछात है, जुल्म है, अशिक्षा है तब तब जाई बाई चौधरी सरीखी जिंदा मशाल हमारे लिए रोशनी स्तम्भ का काम करती रहेगी।

जाने क्या कुछ है महिलाओं के लिए कांग्रेस के पिटारे में: कांग्रेस का घोषणापत्र

राजीव सुमन

“मेरा किया हुआ वादा मैंने कभी नहीं तोड़ा।” कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का यह वाक्य कांग्रेस के इस बार के घोषणा पत्र 2019 का पंच लाईन है. छप्पन पन्नो का यह भारी भरकम चुनावी घोषणा पत्र की पड़ताल स्त्री मुद्दों के सन्दर्भ में यदि देखें तो निम्नलिखित वादे यहाँ साफ़ नज़र आते हैं. ग्रामीण क्षेत्र में आशा कार्यक्रम का विस्तार करने का वादा है और प्रति 2500 से अधिक आबादीवाले गांवो के लिए दूसरी आशा कार्यकर्ता (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) की नियुक्ति करेंगे।

घोषणापत्र जारी करते कांग्रेस के नेता

महिला सशक्तीकरण और जेंडरसंवेदीकरण के मुद्दे पर इस बार कांग्रेस ने बहुत सारे वायदे किये हैं. सबसे पहले तो जेंडरसंवेदी शब्द को सभी योजनाओं पर लागू करने की बात कर रही है. महिला आरक्षण का मुद्दा दशकों से राजनीतिक मुद्दा है पर आज तक वह पारित नहीं हो पाया. पर कांग्रेस के इस घोषणा पत्र में महिला सशक्तिकरण से सम्बंधित विषय पर इसको पहला स्थान दिया गया है. घोषणा पत्र में लिखा है, “कांग्रेस 17 वीं, लोकसभा के पहले सत्र में, और राज्य सभा में, संविधान संशोधन विधेयक पास करवाकर, लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में, महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करेगी।“ दूसरे नंबर पर केन्द्र सरकार के सेवा नियमों में संशोधन करके केन्द्रीय नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने की बात लिखी गई है. इसके बाद समान पारिश्रमिक अधिनियम को प्रभावी ढ़ंग से लागू करने, महिलाओं और पुरुषों को समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने के लिए सभी संबधित कानूनों की समीक्षा की घोषणा है. इसके अलावा विशेष आर्थिक क्षेत्र में कार्यरत्, श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, कामकाजी सुरक्षित छात्रावास और सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था तथा महिलाओं को रात की पाली में काम करने से प्रतिबंधित करने वाले कानून के प्रावधान को रदद् करने की बात शामिल की गई है. ये सभी बातें वास्तव में महिला अधिकारों और उनके विकास के साथ ही समानता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण हैं, पर किसी राजनितिक पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल ये मुद्दे कहीं महज चुनावी वादे न साबित हो जाएं.

समाज के श्रमशील वर्ग की महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण घोषणा है जिसमे प्रवासी महिला श्रमिकों के लिए पर्याप्त रैन बसेरों,  कसबों और शहरों में महिलाओं के लिए स्वच्छ एवं सुरक्षित शौचालयों की संख्या बढ़ाने, सार्वजनिक स्थलों, स्कूलों और कॉलेजों में सेनेटरी नेपकिन वेंडिंग मशीने लगाने की बात है.

महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से कार्यस्थलों पर यौन उत्पीडन अधिनियम 2013 की व्यापक समीक्षा करने  और इस अधिनियम को सभी कार्यस्थलों तक विस्तारित करने के वादे के साथ ही महिला उत्पीडन के किसी भी रूप को समाप्त करने की प्रतिबद्धता इस घोषणा पत्र में है. इसके अतिरिक्त आपराधिक मामलों में महिला एवं बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की जांच के लिए एक अलग जांच एजेंसी स्थापित करने के लिए एक मॉडल कानून पारित करने और राज्य सरकारों से भी इसी मॉडल कानून की तर्ज में कानून बनाने की बात इस घोषणा पत्र में है.

ग्रामीण और निम्न वर्ग की महिलाओं के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM आजीविका) और स्वयं सहायता समूहों को महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बनाने, आजीविका के साधन बढ़ाने और सामाजिक बदलाव की शुरूआत करने के लिए NRLM-2 की शुरूआत करने का वादा भी है.

सामाजिक क्षेत्र में  एकल विधवा, तलाकशुदा, परित्यक्ता और निराश्रित महिलाओं को गौरवपूर्ण और सुरक्षित जीवन प्रदान करने के लिए, राज्य सरकारों के साथ मिलकर, कार्यक्रम लागू करने, महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा कानूनों को शक्ति के साथ लागू करने में मदद करने के लिए प्रत्येक पंचायत में महिलाओं को उनके अधिकारों से परिचित कराने के लिए एक अधिकार मैत्री की नियुक्ति, विवाह के पंजीकरण को कानूनन आवश्यक करने के लिए, कानून बनाने तथा बाल विवाह निरोधक कानून को सख्ती से लागू करने की घोषणा है. इसके अलावा कांग्रेस ने आई.सी.डी.एस. कार्यक्रम का विस्तार कर और हर आंगनवाड़ी में जरूरत और मांग के हिसाब से एक क्रेच प्रदान करने का वादा भी अपने घोषणा पत्र में करती है.

जेंडर संवेदी योजनाओं के अलावा कांग्रेस ने देशद्रोह क़ानून को हटाने अथवा ऐफ्सपा कानून को हटाने का वादा भी किया है. इस कानून को हटाने के लिए इरोम शर्मिला पिछले कई वर्षों से भूल हड़ताल करती रही थीं. शिक्षा पर जीडीपी के 6 प्रतिशत खर्च की घोषणा भी महिलाओं की शिक्षा के लिए कारगर कदम होगा. किसानों के कर्ज डिफाल्ट को क्रिमिनल की जगह सिविल करने का निर्णय भी महिलाओं के हित में है, खासकर उन इलाकों में जहाँ पुरुष किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और महिलायें जिम्मेवारी से पीड़ित हो जाती हैं.

हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सुधा सिंह कहती अपने फेसबुक पोस्ट में लिखती हैं:
“एक होता था ‘भारतीय महिला बैंक’ , जिसे महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन देने और आर्थिक विकास में महिलाओं को बराबरी का सहभागी बनाने के लक्ष्य के साथ यूपीए गठबंधन सरकार ने चलाया था। सन् 2017 में उसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ मिला दिया गया, कोई हंगामा नहीं हुआ। किसी ने नहीं पूछा कि क्या इस बैंक ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया था कि उसे मिटा दिया? इसी तरह से यूपीए में पी चिदंबरम के समय में जेंडर बजटिंग की गई थी, आज इसका भी अता-पता नहीं कि यह किस चिड़िया का नाम है।
फिर भी विकास तो है, धरती पर न सही आकाश में ही सही। वैसे भी भारतवासियों को स्वर्ग का फंडा और स्वर्गिक चीजें जल्दी समझ में आती हैं! न तो भारतीय महिला ज़मीनी है और न महिलाओं के मुद्दे.’

राजीव सुमन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य हैं:

प्रवासी मृत देहों के सम्मान के लिए लड़ने वाली फिल्म आर्टिस्ट चुनाव मैदान में

केरल के कालीकट (कोझिकोड) लोकसभा क्षेत्र से फिल्म आर्टिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता नुज़रथ जहाँ निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं. एयरलाइन्स से कैरियर की शुरुआत करने वाली नुज़रथ ने फिल्म और सामाजिक कार्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज की और अब लोकसभा के लिए निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं. अपने बलात्कारी की ह्त्या करने के आरोप में रेहना जब्बारी को इरान में फांसी दे दी गयी थी. नुजरथ ने उस विषय पर बनी फिल्म में रेहाना की भूमिका की. प्रवासी भारतीयों की मृत देह को भारत वापस लाते हुए उन्हें तौलकर एयरलाइन्स पैसा लेते रहे हैं. लाशों को सामान की तरह समझे जाने के खिलाफ नुजरथ ने मुहीम छेडी और दिल्ली में 30 घंटे तक भूख हडताल की. स्त्रीकाल के लिए नुज़रथ से बात की है शहला के पी ने.

अपने बैकग्राउंड के बारे में बतायें

मेरा जन्म अपनी माँ के घर ओमइझेरी में हुआ था लेकिन मैं अपने पिताजी के गाँव ‘एलमरम कटन’ में पली बढ़ी थी. चलियार नदी के किनारे ही हमारा घर स्थित था. पिताजी नावूर के ग्वालियर रयोन्स कंपनी में काम करते थे.फिर पिताजी उस कंपनी को छोड़कर ‘दोहा’ चले गए. तब मुझे भी उस स्कूल से जाना पडा. वह स्कूल बहुत अच्छा स्कूल था, लेकिन उस स्कूल के बारे में मुझे बुरी बात यह लगी की उस कंपनी से मज़बूरी वश नौकरी छोड़े तो उनके बच्चों को वहाँ पढ़ाई करने नहीं देते थे. यहाँ तक कि मर जाने के बाद भी उनके बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता था. सिर्फ इस बात को छोड़ दें तो वह स्कूल बहुत अच्छा था. मैंने कई जगह पता किया पर उस स्कूल जैसा मैंने दूसरा स्कूल नहीं पाया.

इसके बाद मेरी पढ़ाई कालीकट के चेवायूर के प्रजेंटेशन स्कूल में हुई.पिताजी की जिद थी कि हमें अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ाया जाए. हम तीन बहने और एक भाई थे. पापा बहुत यात्रा करते थे. जब मेरा जन्म हुआ तब पापा पकिस्तान में थे. मुझे लगता है उस समय वहां जाने में कोई प्रतिबन्ध नहीं था. जब मैं तीसरी कक्षा में पहुंची तब खान्नर के काफ्को कंपनी में काम कर रहे थे. उनके मृत शारीर को यहाँ लाने के लिए वहाँ हमारा कोई परिचित नहीं था. तो उनके शरीर को वहाँ ही दफन कर दिया गया. माँ उस समय छब्बीस की थीं. पिता की इच्छा पूरा करने के लिए मां ने हमें उसी स्कूल में पढ़ाया.

प्लस टू के बाद नौकरी करने के लिए मजबूर हुई. ईस्ट-वेस्ट एयरलाइन्स में वाक्-इन-इंटरव्यू में स्टाफ एंड टिकटिंग में नौकरी मिली. वहीँ से जीवन के दुसरे पक्षों से परिचय हुआ. मेरी क्षमता और मेरी भाषा चातुर्य से ही मुझे यह नौकरी मिली. उस समय साक्षात्कार के लिए बारह सौ लोग पहुंचे थे. चुने गए सात लोगों में मैं थी. मेरी जिंदगी का टर्निग प्वाइंट वह था. फिर शादी हो गई. पति एम. के. हमसा मुस्लिम स्टेट कमिटी ऑफिस के सचिव थे. बेटी भी हो गई, तब मैंने नौकरी छोड़ दी. जब बेटी डेढ़ साल की हुई तो नौकरी करने का फिर से मन हुआ. हमारे सपनो से मेल न खानेवाली चीजों को देखने पर ही हमें लगता है कि हमें अपने पैरों पर खड़े होकर जीना है. अपनी माँ को सहारा देना भी मेरा कर्तव्य था. मेरे लिए नौकरी करना अब जरुरी हो गया था. तब पति की अनुमति से ही कालीकट आई. एयर इंडिया में ट्रेनी के रूप में काम करना शुरू किया.

पिताजी की मृत्यु के बाद आपके परिवार की देखभाल किसने की थी?

. यह एह लम्बी कहानी है. धन के नाम पर कई समस्याएँ हुई थीं. पिताजी के बैंक अकाउंट में जितने पैसे थे उसे लेने में भी. फिर हमारे परिवार में भी ऐसे लोग थे जो हमें अच्छी तरह जीते हुए देखना नहीं चाहते थे. पिताजी के कंपनी के फोरमैन पापा के बहुत निकट रहे थे, पापा ने उनसे बहुत से अपने सपने साझा किये थे. पापा को तिन सालों से यहाँ आने की छुट्टी नहीं मिली थी. पापा के उस दोस्त ने उनकी कंपनी के लोगों की एक दिन की तनख्वाह, जो लगभग पचहत्तर हज़ार हुआ था, हमें भेज दिया. हमारे नाना जी उस पैसे से हमारी माँ को एक नारियल का बाग़ खरीद कर दे दिया. उस समय नारियल के बड़े दाम मिलते थे. एक नायर समुदाय के बूढ़े व्यक्ति ने बिना बारगेनिंग किये वह बाग़ हमें दे दिया. बात यह थी कि वे यतीम बच्चों को अपनी भूमि दे रहे थे. आज भी मेरी माँ को उस जमीन से जरुरत के पैसे मिलते हैं.

मेरी दो बहनें हैं जो शिक्षिका हैं. निकाह के बाद ही वे दोनों पढ़ीं. भाई व्यवसायी है. बचपन से ही पढ़ाई में उसकी रूचि नहीं थी. एयर इण्डिया में ट्रेनिंग पूरा होने पर क़तर ऐरवेज ऑफिस में काम मिला. कल यहाँ एयर इण्डिया की नौकरी पूरी हो रही है. आज मुझे फोन आया था कि कल त्रिवेंद्रम में इसका ऑफिस खुल रहा है. लेकिन मैंने ओमान एयरवेज में भी आवेदन किया हुआ था, मेरा वहाँ भी चयन हो गया. बाद में मैंने ओमान एयरवेज में ट्रैफिक असिस्टंट के रूप में नौकरी शुरू कर दी. बेटी को भी वहीँ ले गई. दो साल वहाँ काम किया. फिर मैंने सोचा कि बेटी बड़ी हो रही है. उसे पिता का प्यार भी चाहिए. मैंने वहाँ नौकरी छोड़ दी और यहाँ पहुँच गई. यहीं मुझे ओमान एयरवेज के ऑफलाइन ऑफिस में एअरपोर्ट सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई. फिर जब अमिरात एयरलाइंस पहली बार कोच्चिन में आया तो मुझे वहाँ से फोन आया सुपरवाइजर के लिए. मैं इस अवसर को गंवाना नहीं चाहती थी. मैं कोच्चिन चली गई. बेटी को साथ नहीं लिया, उसकी पढ़ाई बाधित होती. बेटी के पास अपनी माँ को बुला लिया. सप्ताह में एक बार शुक्रवार को त्रिवेंद्रम आती और सोमवार को वापस कोच्चिं चली जाती. यह सिलसिला लगभग साधे चार साल चला.

फिर किंगफिशर में सेल्स मैनेजर के रूप में नियुक्त हुई. इस क्षेत्र में मैं एक सुपरिचित चेहरा हो चुकी थी. फिर किंगफिशर के मंगलोर स्टेशन में आई. बाद में वह कंपनी बंद हो गई. सब लोग चले गए. एक साल और चार महीने की तनख्वाह नहीं मिली थी. जिंदगी में दूसरी बार तंगी थी. मेरा दायित्व बड़ा हो चुका था. पूरा दक्षिण भर का भर मुझपर था. मेरा पद साउथ इंडिया मैनेजर था. पर तनख्वाह नहीं थी. वहाँ के ढाई हज़ार लोगों की नौकरी चली गई.

फिर आर.ए. के. एयरवेज में कंट्री मैनेजर के रूप में नौकरी मिली. सब लोगों ने कहा कि यह कंपनी कभी भी बंद होनेवाली है, मत ज्वाइन करो. मैंने सोचा था कि अगर बंद भी हो जाएगी तो भी दो महीने की तनख्वाह तो मिलेगी. जो भी हो, मैंने ज्वाइन कर लिया. दस महीने बाद यह कंपनी भी बंद हो गई. शाम को ईमेल आया कि रात से उड़ानें नहीं हैं. उमरा के लिए निकले कई यात्री जिद्दा में ही फंस गए हैं. वित्त विभाग बंद कर दिया गया था. सारे एजेंट्स मेरे पास आ गए. स्थिति नाजुक थी. वे रो रहे थे. परिस्थिति गंभीर थी, लोगों ने सुझाव दिया कि अपना मोबाईल फोन बंद कर दो. पर मैंने ऐसा नहीं किया.  मेरे ऊपर लोगों के साढ़े आठ करोड़ रूपए की जवाबदेही बनती. मैं एशिया नेट न्यूज चैनल पर लाइव आई. घंटों में कंपनी खुल गई. समस्या सुलझ गई पर मेरे हाथों में टर्मिनेशन पत्र था.  मुझे वही चाहिए था. कंपनी ने खुद सारे फाइनेंसियल मसले निबटाए. तभी से मैं प्रवासियों के मन में चढ़ी. उनके भीतर मेरे लिए सम्मान बना. क्योंकि कोई और इतना बड़ा जोखिम नहीं लेता. यहाँ के राजनेता, जन प्रतिनिधि और न ही सरकारी महकमे के किसी अधिकारी ने मेरा साथ दिया. उन्होंने कहा कि विदेशी कंपनियों पर  हमारी कोई बंदिश नहीं है. देखिये 165 लोग उमरा केलिए गए थे, वे जिद्दा में फंसे थे. मैं तो घर भी नहीं जा पा रही थी.  मैं बहुत दिनों तक बेरोजगार रही, फिर एयर इंडिया में छह महीने के कान्ट्रेक्ट पर ग्राउंड हैंडलिंग में नौकरी मिली.

कला के क्षेत्र में आपका प्रवेश किस तरह हुआ..?

उ. जब मैं स्कूल में थी, तब नृत्य और संगीत में भाग लेती थी. लेकिन नौकरी मिलने पर सबको छोड़ना पडा. फिर जब किंगफिशर में नाईट शिफ्ट की नौकरी की तब मैंने सोचा कि जीवन का समय क्या ऐसे ही चले जाने हैं. इसी समय मैंने एक कहानी पढ़ी थी, ईरानी लड़की की. कहानी नहीं, पत्र था. रेहाना जब्बारी नाम की एक ईरानियन लड़की द्वारा अपनी माँ को लिखा ख़त. उसके साथ बलात्कार करने वाले इंटेलिजेंस ऑफिसर को उसने मारा था. उस केस में उस लड़की को न्याय नहीं मिला. संयुक राष्ट्र, और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक ने उस लड़की केलिए आवाज उठायी थी. लेकिन उस ऑफिसर के परिवारवाले उसकी माफ़ी के खिलाफ थे, जिसकी वजह से उसे फांसी हुई. जब वह जेल में थी तभी उसने यह ख़त अपनी माँ को लिखा था, जिसे मैंने पढ़ा. मुझे लगा कि इसपर एक फिल्म करना चाहिए. “कथ्युल्जोरू पेन्नू” इसी ईरानी लड़की की फिल्म है जिसमे मैंने उस ईरानियन लड़की की भूमिका निभाई है. फिर मैंने एक डाक्युमेंटरी फिल्म की. कोडुवल्ली नामक ईलाके में अपने हाथों से जंगल बनाने वाले एक व्यक्ति की कहानी है.

पढ़ें : रेहाना जब्बारी का पत्र

सामाजिक कार्यों की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ?

वह कला क्षेत्र में प्रवेश के साथ ही हुआ. किंगफिशर के बंद होने के दौरान. पहले pain and palliative के लिए volunteer service शुरू किया. एह.आई.वी. से पीड़ित लगभग छः सौ लोगों की पैट्रन बन गई. मेरे २१ साल के एयर्लाइन्स जगत के मेरे संपर्क ने मेरी बहुत मदद की. फिर प्रवासी लोगों ने भी मदद दी. मेडिकल कॉलेज के pain and palliative CSR निधि को ही मैंने उपयोग किया था. वह मालाबार सीमेंट का फंड था. छः महीने के अन्दर ही मैंने वह फंड हासिल किया था. सिनेमा जगत में पहुँचने से पहले मैं एयरलाइन में पर्सनालिटी और मोटिवेशनल ट्रेनर बन चुकी थी. एयरलाइन में काम करते वक़्त इस प्रकार के कई विदेशी ट्रेनिग मिलती थी वर्ल्ड क्लास ट्रेनर द्वारा.

इस प्रकार के सोशल वर्क में विभिन्न राजनितिक पार्टियां का क्या रुख होता था?

मैं सबसे निकट संपर्क में हूँ. सबसे डिप्लोमैटिक व्यवहार रखती हूँ. मैं अपने एयर लाइन की नौकरी के दौरान ही उनसे परिचित हुई थी. भले ही इन कामों में उनका सपोर्ट नहीं होता था पर मना नहीं किया कभी और न ही कोई अड़चन खड़ी की. केरल में आई बाढ़ आपदा के समय मैंने अपनी संस्था हैप्पी व्वाईस के जरिये कई कार्य किये.  इसी तरह कालीकट इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर फिर से सेवा बहाल करने में हमने बहुत मेहनत की. इसके लिए कई बार राजनितिक पार्टियों और नेताओं को सामने लाना पड़ा और उनसे कार्य करवाने पड़े. हमने बहुत मेहनत की थी. मैं बहुत संतुष्ट थी.

लोगों की मदद करने केलिए किसी नियम को तोड़ने जरुरत नहीं. हमारी छोटी सी सोच ही जरुरी है बस. देखिये अगर कोई प्रवासी अपने सालों के मेहनत के बाद वापस आकर एक छोटा-सा उद्योग शुरू करना चाहता है तो कई प्रकार की कानूनी अड़चने आती हैं. जबकि बड़े उद्योगपतियों केलिए कुछ और ही व्यवस्था होती है. यह कैसी विडम्बना है.

जब आप सामाजिक कार्यों की तरफ उन्मुख हुईं तो धर्म और धार्मिक समूहों की तरफ से कोई मुश्किल आई?

कभी नहीं. धार्मिक नेताओं ने मेरा साथ दिया. मुझे उस तरह की कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई. हाँ, जो धर्म की आड़ लेकर अपना काम करने वाले हैं उनसे कुछ सुनना पडा था. यहाँ के मुजाहिद, सुन्नी, जमाएत-ए-इस्लाम आदि के नेताओं से मैं बहुत निकट हूँ. मैंने फिल्मो में भी काम किया पर इधर से कोई समस्या नहीं हुई. मैंने अपनी फिल्म प्रीव्यू के लिए प्रख्यात लेखक एम्.टी. वासुदेवन नायर और ओ.अब्दुर्रहीम साहब को ही बुलाया था.  ओ.अब्दुर्रहीम साहब जमाएत-ए-इस्लाम के बड़े सम्मानित नेता हैं. इनके भाषण हमेशा मुझे आकर्षित करते हैं.

रेहाना जब्बारी

आपके सामाजिक संगठन के क्या-क्या कार्य रहे हैं?

एक मैंने पहले बताया ‘सान्त्वानम’ जो एच.आई.वी. से संक्रमित लोगों के लिए काम करती थी, उसकी पैट्रन बनी थी. फिर मालाबार विकास संस्था में काम किया. तभी कालीकट एयरपोर्ट के लिए आवाज उठाया. मेरा अपना एनजीओ है हैप्पी व्याइस. इसी समय प्रवासी मल्पाती फेडरेशन की स्थापना हुई थी. इसमे से मैंने न तो किसी पद पर थी और न ही कोई पैसा लिया. बल्कि इसके लिए आवश्यक कोष और वित्तीय चीजों की व्यवस्था में मेरी अहम भूमिका रही. शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्कूल आदि हमारा लक्ष्य था उसी वक़्त बाढ़ आयी थी. तब हमने डिजास्टर मैनेजमेंट के नाम पर काम किया.

राजनीति में आने और चुनाव लड़ने के निर्णय पर कैसे पहुंची?

प्रवासी मालाबार डेवलपमेंट फोरम के लिए काम करते वक़्त मैंने दिल्ली में भूख हड़ताल में भाग लिया था. मृत शरीर को तौलकर दाम लेनेवाले एयरलाइन के खिलाफ सात दिन तक भूख हड़ताल किया था. मैं तीस घंटे भूखी रही, मेरे साथ तीन और लोग भी थे. दिल्ली के दो डिग्री में हमारा हड़ताल सफल हुआ था. मुझे एहसास हुआ कि अगर इस प्रकार संघर्ष किया जाए तो हक जरुर मिलेगा. यहीं से मुझे संघर्ष की ताक़त का पता चला. मुझे लगा कि राजनीति चीजों को अच्छा करने का बेहतर माध्यम हो सकती है. एक स्त्री भी चुनाव लड़ सकती है. एक नागरिक का यह अधिकार है. केंद्र और राज्य सरकारों के पास बहुत से ऐसे फंड हैं जो लोगों के लिए हैं पर उन तक पहुँच नहीं पाटा. कौन सी पार्टी है, यह देखे बिना हमें यह मांगना है लोगों के लिए, हम पूछेंगे तो जरुर मिलेगा. इसका सबसे सशक्त उदाहरण था मेरे सामने प्रवासियों की लड़ाई और जीत. हमने पूछा, सवाल किये, आवाज उठाई और अधिकार मिले. इसलिए हमारे जन प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है ऐसे फंड को जनता तक पहुंचाना.

आपके साथ कौन-कौन लोग हैं इस चुनाव में? आपने क्या वादा किया है लोगों से?

राजनीति में आने के बाद पहले जो लोग मेरे साथ थे उनमे से दस प्रतिशत लोग ही हैं मेरे साथ. “राजनीति नहीं, वह भी एक स्त्री को, नहीं, तुम्हे डरना चाहिए.” पुरुष सत्ता और उनकी धमकियां एक साथ आयीं. फिर मैंने सोचा कि इतने लोग मेरे साथ हैं और जिंदगी अब सुरक्षित जोन में है. पहले बहुत तंगी देख चुकी हूँ, दस साल की उम्र में थी जब पिता गुजर गए.  क्राइसिस आने पर डरना मत..यही सीखा है मैंने. हमारा आत्मविश्वास ही हमें आगे ले जाता है.

सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के मुद्दे पर आप क्या सोचती हैं?

सबररीमला मुद्दे पर टीवी में कोई समाचार आता है तो मैं तुरंत ही टीवी बंद कर देती हूँ. हमारे यहाँ वास्तविक समस्या वह नहीं है. सबरीमाला एक राजनितिक खेल है. उसे राजनीति से मत जोडीये. एक किलो चावल या एक किलो चीनी की कीमत कितनी बढ़ गई है. यहाँ कितने चीजों की कीमत बढ़ गई है. उसके लिए हम क्या कर सकते हैं?  बड़ी- बड़ी कम्पनियां आकर हमारे छोटे-छोटे उद्दमियों को उनके व्यापार को नष्ट कर रही हैं..उन लोगों की जिंदगी कैसे चलेगी? एक सौ छत्तीस करोड़ लोगों की समस्या मंदिर, मस्जिद या चर्च नहीं है. भूख है, गरीबी है, अशिक्षा है, स्वास्थय है, बेरोजगारी है. उन्हें ठीक ढर्रे पर लाने का मार्ग हमें ढूँढना होगा. उसके लिए बोलना चाहिए, आवाज उठानी चाहिए. इन विषयों पर राजनीति होनी चाहिए! पर हमारी आज की राजनीति बेरोजगारों से नारे लगवाने केलिए बुलाती है, मारपीट करवाती है अपने स्वार्थ केलिए. उन्हें क्या पुलिस स्टेशन में बंद करवाकर गुंडा बनवाना है? मुद्दा यह है कि स्त्रियों केलिए हम कितनी नौकरियों की व्यवस्था कर पाते हैं. मालाबार को देखिये, हमारा मालाबार मसालों केलिए कितना प्रतिष्ठित था. हमारा कोझिकोड व्यापार शहर के रूप में जाना जाता था न! कोझिकोड(कलिकट) के कल्लाई नदी के किनारे टिम्बर का व्यापार दुनिया के सबसे बड़े टिम्बर व्यवसाय में दुसरे नंबर पर था न! पर अब….? क्या हुआ जब यहाँ आपदा आई. हमारा डिजास्टर मैनेजमेंट फेल हो गया तो हमारे मछुआरों ने न जाने कितने लोगों की जान बचाई. पर हमने अपने मछुआरों के लिए क्या किया ? फंड की कमी नहीं है. कितने लोगों को पता है कि इस बार सोशल जस्टिस मंत्रालय में अठारह सौ करोड़ रुपया लैप्स हो गया. वह पैसा लोगों तक कौन लाएगा?

महिला आरक्षण के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

तैंतीस प्रतिशत हो तो केरल की 20 में 6 सीट स्त्रियों को मिलना चाहिए था. लेकिन सबका मिलाकर भी 6 नहीं हो पा रहा. सब बोलते हैं उसके बारे में पर कोई कुछ नहीं करता. सबलोग कहते हैं बीजेपी को हटाना है, उसके लिए पुरुष ही आना चाहिए. मैं उन लोगों से पूछना चाहती हूँ कि दुनिया में कितनी स्त्रियाँ प्रशासक बन गई हैं. वहाँ सब अच्छी तरह से काम हो रहा है. वे अपने देश को संभाल रही हैं. वे बहुत मजबूत होकर पुरुष से भी ज्यादा काम कर रही हैं, कर चुकी हैं.

आपकी लड़ाई मजबूत एल.डी.एफ., यू.डी.एफ. के खिलाफ है. आप उनसे कैसे मुकाबला करेंगी?

देखिये ये पार्टियां ठीक हैं, लेकिन वे कुछ बोलते हैं, कुछ और ही करते हैं. धर्म और राजनीति को मिलाते हैं. धर्म अलग है, राजनीति अलग है.  इन्हें मतजोड़िये. कुछ लोग कहते हैं मुस्लिम लीग इस्लाम की पार्टी है. लेकिन मैं इसको एक राजनितिक पार्टी के रूप में देखती हूँ. दिन में ये पार्टियां दूरियाँ बरतती हैं और शाम होते ही सब एक हो जाती हैं. बड़े राजनीतिज्ञों के बच्चों को देखिये. कोई हड़ताल आदि में भाग लेता है क्या? वे सब विदेशों में पढ़ाई करते हैं और बड़े-बड़े व्यवसाय करते हैं और फिर राजननीतिक उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं. ये सब ठीक नहीं.

जीतकर क्या करेंगी

स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उद्योगों को बढ़ावा देंगे. कोशिश होगी कि रोजगार के लिए अपने क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनायें. लोग नाकौरियों के लिए इस इलाके से बाहर चले जाते हैं. प्रवासी भारतीयों को वोट का अधिकार दिलाने की मुहीम भी मेरा राजनीतिक एजेंडा है.

शहला केपी कालीकट विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाती हैं.

वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (आख़िरी क़िस्त)

 जयप्रकाश कर्दम

  घर के बाहर लड़कों का जमावड़ा, शोर और दरवाजा खटखटाने का अर्थ सुनीता की मां समझती थी। इसलिए जब भी शोर कुछ अधिक होता या दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनायी देती, उनका मन बाहर जाकर उन लड़कों की ख़बर लेने को मचलने लगता। लेकिन स्वयं उठकर दरवाज़े तक न जा पाने की लाचारी के कारण वह अपने मन को मसोस कर रह जाती थीं। और अपनी बेटी की जिस सुंदरता पर वह बहुत नाज़ करती थी अब उसकी ओर असहाय दृष्टि से देखती हुई मन ही मन यह बुदबुदाती थी-‘भगवान किसी ग़रीब के झोंपड़े में इतनी सुंदरता न दे कि सुंदरता ही जान की दुश्मन बन जाए। और यदि सुंदरता दे भी तो उसकी हिफ़ाज़त के लिए घर में दो-चार मर्द ज़रूर दे।’ जब दरवाज़ा खटखटाना कुछ ज़्यादा ही हो गया तो सुनीता की मां ने अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही अपनी पूरी ताक़त से आवाज़ देनी शुरू कर दी, ‘अरे कौन कुत्ता है ये जो बार-बार दरवाज़े पर अपनी थूँथडी मार रहा है।’ सुनीता की मां की यह आवाज़ सुनने के बाद कुछ देर के लिए दरवाज़ा खटखटाना बंद हो जाता था।

     ज़ोर से बोलने में बहुत ऊर्जा ख़र्च होती थी। इससे उनकी सांसें उखड़ जाती थीं और वह निढाल सी हो जाती थीं। तब सुनीता उनकी कमर को सहलाकर उनकी साँसों को संयत करने की कोशिश करती हुई उनको समझाती, ‘तुम इतनी ज़ोर से मत चीख़ो मां। तुम्हारी तबीयत बिगड़ जाएगी।’

    बहुत ज़्यादा बोलना उनके लिए वैसे भी सम्भव नहीं था। अत: अपने बच्चों को ही समझाते हुए वह बोली, ’अब तुम में से कोई भी जाकर दरवाज़ा मत खोलना, चाहे कोई भी हो।’ उनका स्वर पीड़ा में डूबा हुआ था और उनके शब्दों में चिंता और सतर्कता का मिश्रित भाव था।

       ‘ठीक है माँ। हम अब दरवाज़ा नहीं खोलेंगे।’ सुनीता ने उनको आश्वस्त करते हुए कहा।

       दरवाज़ा खटखटाने पर किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया मिलनी बंद हो गयी तो धीरे-धीरे दरवाज़ा खटखटाना बंद हो गया। लेकिन लड़के अभी भी वहां बैठते या घूमते रहते थे। कुछ लड़के उसके घर की दीवार पर चाक से बड़े-बड़े अक्षरों में ‘आई लव यू सुनीता’ भी लिख देते थे। सुनीता की ओर से विरोध में कोई प्रतिक्रिया न पाकर और मौहल्ले में कहीं से भी उसके समर्थन में कोई आवाज़ उठती नहीं देखकर लड़कों का मनोबल बहुत बढ़ गया था। एक दिन किसी लड़के ने मोटे-मोटे अक्षरों में दीवार पर लिख दिया ‘सुनीता, तुम इतनी ख़ूबसूरत हो, तुम्हारी वो भी कितनी सुंदर होगी।’

सुनीता और संजय जब सुबह को स्कूल जाने के लिए घर से बाहर निकले और दीवार पर ये शब्द लिखे देखे तो सुनीता का दिल दहल कर रह गया। शर्म और क्रोध से वह ज़मीन में गड़ सी गयी। छठी कक्षा में पढ़ने वाला संजय अभी बहुत छोटा था और इस तरह की परिस्थितियों का सामना करने की स्थिति में नहीं था। लेकिन ये शब्द पढ़ते ही उसका ख़ून खोल उठा और वह ग़ुस्से में भरकर बोला, ‘किस कुत्ते ने लिखा है यह। ख़ून कर दूँगा साले का।’

      सुनीता ने अपने दुपट्टे से दीवार पर लिखे उन शब्दों को मिटाया और संजय को चुप कराते हुए उसका हाथ पकड़कर आगे की ओर बढ़ते हुए बोली, ‘चल, स्कूल चल।’

       अशोक ने भी यह सब देखा तो ग़ुस्से से उसका शरीर भी फड़कने लगा। ‘कितने घटिया लोग हैं। क्या उनके परिवार में लड़कियाँ नहीं हैं?’

       सुनीता, लड़कों द्वारा उसके साथ की जा रही बदतमीज़ी और बदनामी से वैसे ही अंदर से काफ़ी दुखी थी, इस बात को तूल देकर वह और किसी तरह का बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि अशोक इस बारे में कुछ भी कहे। इससे लोगों को उसके ख़िलाफ़ बात बनाने का एक और मौक़ा मिल सकता था, जिससे उसकी फ़ज़ीहत होने के अलावा और कुछ होने की सम्भावना नहीं थी। इसलिए उसने अशोक को भी शांत करते हुए कहा, ‘सब के घर में बहन-बेटियाँ होती हैं और अपनी बहन-बेटियों की इज़्ज़त-आबरू की परवाह और चिंता भी सबको होती है। लेकिन दूसरों की बहन-बेटियाँ सबको गर्म मास का टुकड़ा लगती हैं। और जिसकी पीठ कमज़ोर हो उस पर हर कोई सवारी गाँठना चाहता है। किस-किस के मुँह लगोगे, किस-किस से लड़ोगे। सारा समाज ही ऐसा है।….. और दलित होना तो और भी बड़ा अभिशाप है इस धरती पर। हर कोई फोकट का माल समझता है।…….. तुम स्कूल चलो। इस सब पर सोचते रहोगे तो स्कूल को देर हो जाएगी।’

     कभी घर की दीवार और कभी सुनीता के चहरे की ओर देख अशोक आश्चर्य से मन ही मन सोचने लगा ‘इतनी बड़ी बात पर भी उसे ग़ुस्सा नहीं आ रहा है और ना ही उसके चेहरे पर कोई तनाव दिखाई दे रहा है। एकदम शांत बनी हुई है। कैसी लड़की है यह। यह हाड़-मास की बनी है या किसी पत्थर की बनी है, जिसके अंदर कोई संवेदना नहीं है।’

सुनीता ने अशोक के चहरे को देखकर यह भांप लिया था कि उसके मन में उथल-पुठल मची है। इससे पहले कि वह कुछ बोल पाता उसकी बाँह पकड़कर आगे की ओर ठेलते हुए सुनीता बोली, ‘चल ना जल्दी से …….।’अशोक हैरत से उसके चेहरे की ओर देखते हुए बिना कुछ कहे आगे की ओर बढ़ गया था।

पढ़ें: वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (पहली क़िस्त)

     सुनीता स्कूल आ अवश्य गयी थी किंतु उसका मन पढ़ाई में बिलकुल भी नहीं लग रहा था। क्लास के दूसरे बच्चों की हँसी-मज़ाक़ में भी वह शामिल नहीं हो रही थी। कक्षा में क्या हो रहा था, उस ओर उसका कोई ध्यान नहीं था। बच्चे आपस में क्या बात कर रहे थे, कक्षा में कोई अध्यापक कब आया और कब गया, किसने क्या पढ़ाया या नहीं पढ़ाया, उसे कुछ पता नहीं था। पत्थर की बुत सी बनी वह स्वयं में ही खोयी हुई थी। तरह-तरह के विचारों का प्रवाह उसे उद्विग्न कर रहा था। उसका मन, मस्तिष्क और आँखें उसके घर, मां-भाई और ख़ुद पर अटकी हुई थी। कोई छात्र या छात्रा कभी उससे कुछ कहता या कोई बात करने की कोशिश करता भी तो वह केवल हाँ-हूँ, में जवाब देकर फिर से स्वयं में खो जाती थी। उसने कक्षा में किसी को पता नहीं चलने दिया, लेकिन अपनी परेशानियों और भविष्य की आशंकाओं को लेकर वह सारा समय तनाव से घिरी रही। स्कूल से घर आते समय भी वह तनाव से ग्रस्त थी, किंतु अशोक के साथ बोलते-बतियाते वह घर आ गयी थी।

     सुनीता के मुँह से स्कूल न जाने की बात सुनकर अशोक हतप्रभ था। उसके मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा था कि ‘कल तो सुनीता को ठीक-ठाक उसके घर के दरवाज़े तक छोड़ा था। तब तक तो उसने ऐसी कोई बात नहीं की थी और ना ही ऐसा कोई संकेत दिया था कि वह आज स्कूल नहीं जाएगी। फिर उसके बाद ऐसी कौन सी बात हो गयी कि वह स्कूल नहीं जा रही हैं?’

      अशोक को सुनीता की मां द्वारा जीवन के व्यावहारिक और तीक्षण अनुभवों के ताप से कही गयी बात अच्छी लग रही थी। उससे भी अधिक उसे उनके मुँह से अपनी प्रशंसा सुनना अच्छा लग रहा था। सुनीता को लेकर उसकी मां के शब्द गहरे दर्द में डूबे थे। वह उनके दर्द को महसूस कर रहा था। लेकिन उनकी बात पर किस तरह वह अपनी प्रतिक्रिया दे, क्या कहे, यह वह नहीं समझ पा रहा था। बिना कुछ शब्द बोले उसने कुछ क्षण उनके चहरे की ओर देखा और फिर ‘क्या कहें आंटी’ कहकर चुप लगा गया। 

      माँ से मिलवाने के बाद सुनीता ने अशोक को परदे के दूसरी ओर अपनी जगह पर लाकर बैठाया और चाय का प्याला उसके हाथों में थमाते हुए बोली, ‘लो चाय पीयो।’

      अशोक ने देखा सुनीता के हाथ में चाय का केवल एक ही प्याला था। उसने जिज्ञासावश पूछा, ‘केवल मेरे लिए? तुम्हारा प्याला कहाँ है?
’‘केवल एक कप चाय ही बनायी थी। सिर्फ़ तुम्हारे लिए।’ सुनीता के बुझे से स्वर में कहा।
‘और तुम? तुम नहीं पियोगी चाय?’ अशोक ने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए पूछा।
‘नहीं, मेरा मन नहीं है।’ कहते हुए वह अशोक के पास में बैठ गयी।
‘और आंटी?……वह भी नहीं पियेंगी चाय?’

      उनकी बातचीत के शब्द परदे के दूसरी ओर बैठी सुनीता की मां के कानों में भी जा रहे थे। इससे पहले कि अशोक के प्रश्न के जवाब में सुनीता बोल पाती, वह बोली, ‘मैं तो चाय-नास्ता सब कर चुकी हूँ बेटा! मेरा तो अब दवाई का टाइम हो रहा है। मैं तो बस दवाई खाकर लेटूँगी। तुम पियो।’

अशोक से इतना कहकर उन्होंने सुनीता को आवाज़ लगायी, ‘सुनीता, मुझे दवाई खिला दे बेटी। बस यह काम और कर दे, फिर मैं लेट जाऊँगी। तुम लोग अपनी बात करते रहना, मैं बीच में तंग नहीं करूँगी तुमको।’

      ‘हाँ मां, अभी देती हूँ।’ यह कहते हुए सुनीता ने मां के पास जाकर उनको दवाई खिलायी और उनको बिस्तर पर लेटाते हुए बोली, ‘यह लो…… अब तुम आराम करो मां।’

हाथ में चाय का प्याला पकड़े हुए अशोक भी वहाँ आ गया था। सुनीता, मां को बिस्तर पर लेटाने लगी तो अशोक ने उसे टोका, ‘अरे, अभी तो आंटी को बैठाया था तुमनेऔर अभी फिर से लिटा रही हो। कुछ देर तो बैठने दो उनको।’

      ‘मां बहुत देर तक बैठ नहीं पाती हैं। उनकी सपाइन पर ज़ोर पड़ता है। थोड़ी देर में ही उनकी कमर दुखने लगती है। इसलिए उनको थोड़ी देर के बाद ही लेटना पड़ता है। यह भी एक समस्या है मां के साथ।’ यह कहते हुए सुनीता ने मां को बिस्तर पर लेटाया और अशोक के साथ परदे के दूसरी आकर बैठ गयी।

      कुछ देर तक वे दोनों मौन बैठे एक-दूसरे की ओर देखते रहे। बीच-बीच में अशोक चाय के घूँट लेता रहा। बात कैसे और कहाँ से शुरू करे, यह सोचकर सुनीता स्वयं को कुछ असहज महसूस कर रही थी। कभी अशोक की ओर और कभी इधर-उधर देखने लगती थी, लेकिन मुँह से कोई शब्द नहीं बोल पा रही थी। मौन कब तक बैठे रह सकते थे। आख़िर अशोक ने मौन को तोड़ा और चाय का आख़िरी घूँट पीते हुए बोला, ‘अब बताओ क्या हुआ है? क्यों स्कूल नहीं गयी तुम आज?’

      ‘बात केवल आज की नहीं है अशोक। बल्कि अब कभी भी मेरा स्कूल जाना सम्भव नहीं  लगता है।’ सुनीता का स्वर निराशा से भरा था।

      ‘क्यों? ऐसी निराशाजनक और हिम्मत हारने वाली बात क्यों ख रही हो तुम।’ अशोक ने उसका उत्साहवर्धन करते हुए कहा।

      ‘मैं कितनी विकट परिस्थितियों का सामना करते हुए स्कूल जा रही हूँ, यह तुम अच्छी तरह समझते हो। मेरे अंदर किसी तरह की निराशा नहीं है। मैं पढ़ना चाहती हूँ। लेकिन परिस्थितियाँ मुझे घर से बाहर क़दम नहीं रखने को विवश कर रही हैं। मैं क्या करूँ?’ सुनीता अपनी विवशता व्यक्त करते हुए बोली।

       ‘मैं जानता हूँ तुम एक धैर्यवान और बहाद्दुर लड़की हो। प्रतिकूल परिस्थितियों में जितना संघर्ष तुम कर रही हो, यह हर कोई नहीं कर सकता। कोई और लड़की होती तो कभी की हिम्मत हार गयी होती। लेकिन तुमने हार नहीं मानी है। यह कम बड़ी बात नहीं है। अभाव, उत्पीड़न सब कुछ सहते हुए भी तुम अभी तक सारी परिस्थितियों का सामना हिम्मत और दृढ़ता से करते हुए स्कूल जाती रही हो। फिर आज ऐसा क्या नया हो गया है जिसने तुमको स्कूल नहीं जाने के लिए विवश कर दिया है?’ अशोक ने उसकी विवशता को जानने की कोशिश करते हुए पूछा।

     अशोक के इस प्रश्न पर सुनीता अत्यधिक गम्भीर और गमगीन हो गयी थी। उसकी ज़िव्हा और चेहरे पर सहसा एक मौन सा पसर गया था। उसकी आँखें नम हो आयी थीं। उसका मौन और नम आँखें उसके दर्द की कहानी बयान कर रही थीं। अशोक को समझते देर नहीं लगी कि हो न हो सुनीता के साथ कोई गम्भीर हादसा हुआ है, जिसने उसकी हिम्मत को तोड़ दिया है। उसने हाथ में पकडा चाय का प्याला एक ओर रखा और सुनीता के हाथों पर अपने हाथ रख, उसको हिम्मत बँधाता हुआ बोला, ‘तुम चुप क्यों हो सुनीता? बतलाओ ना क्या हुआ है तुम्हारे साथ। देखो, हिम्मत मत हारो और घबराओ मत। चाहे जो भी हुआ हो या होने का डर हो, अपने अंदर मत रोको, बताओ। हिम्मत और धैर्य से किसी भी समस्या और चुनौती से पार पाने का रास्ता अवश्य ढूँढा जा सकता है।’

      अशोक के इन शब्दों से सुनीता को थोड़ी सांत्वना और बल मिला। उसने पलकों में आ गए आँसुओं को अपने दुपट्टे के पल्लू से साफ़ किया और अशोक के हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख उसकी ओर देखते हुए बोली, ‘कल शाम के समय संजय अपने दोस्तों के साथ बाहर खेलने गया हुआ था। मैं रात के लिए खाना बना रही थी। सब्ज़ी का भगोना स्टोव पर चढाया तो ध्यान आया कि घर में नमक नहीं है। नमक के बिना सब्ज़ी नहीं बन सकती थी। संजय का कब तक इंतज़ार करती। यह सोचकर कि दो मिनट की ही तो बात है, मैं तुरंत स्टोव बंद कर नमक लाने के लिए पास की दुकान की ओर चल दी। दुकान से नमक लेकर घर लौट रही थी कि अचानक गली में आ रहे सत्ते पहलवान ने सामने खड़े होकर मेरा रास्ता रोक लिया।’

     सत्ते पहलवान का नाम सुनते ही अशोक भी क्षण भर को भय से अंदर तक काँप उठा। लेकिन शीघ्र ही स्वयं को सहज बनाकर उसने आश्वस्ति के लिए सुनीता से पूछा, ‘कौन सत्ते पहलवान? वह जो शहर का सबसे बड़ा गुंडा है? जिस पर लूटपाट, रंगदारी, हत्या, अपहरण और बलात्कार के बहुत सारे मुक़दमे चल रहे हैं? और जो कई बार जेल हो आया है?’
 ‘हाँ, वही, सत्येंद्र ठाकुर उर्फ़ सत्ते पहलवान।’ कहते हुए सुनीता ने हामी में सिर हिलाया।
‘वह तो बहुत ख़तरनाक आदमी है। ……. लेकिन तुमको क्या पता कि वह सत्ते पहलवान ही था? तुम कैसे पहचानती हो उसे?’

    ‘शहर में कौन नहीं पहचानता सत्ते पहलवान को। आए दिन अख़बारों में उसकी फ़ोटो छपती रहती हैं किसी न किसी अपराध की ख़बर के साथ। कभी-कभी राजनीतिज्ञों के साथ भी उसकी फ़ोटो छपती रहती है, अख़बारों और पोस्टरों में। तुमने भी तो कई बार देखी होंगी उसकी फ़ोटो?’

       सुनीता के यह बताते ही लम्बा क़द, भारी-भरकम डील-ड़ोल, पेचदार मूँछों और मोटी-मोटी लाल आँखों वाले सत्ते पहलवान का ख़ूँख़ार चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया और वह सोचने लगा ‘सुनीता सही कह रही है। वही क्या, शहर का कोई भी आदमी देखेगा तो तुरंत पहचान लेगा कि यह सत्ते पहलवान है।’  

पेंटिंग मानल दीव

       ’हाँ, यह बात तो है’ कहकर कुछ क्षणों के लिए वह ख़ामोश हो गया और उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ उभर आयीं। वह सोचने लगा ‘सत्ते पहलवान जैसे भेड़िए के चंगुल से बच निकलना आसान नहीं है। या तो उसकी बात मानकर, उसके इशारों पर नाचकर या फिर अपनी जान देकर ही कोई उसके चंगुल से मुक्त हो सकता है, वरना नहीं। क्या होगा सुनीता का अब? वह भेड़िया उसे खाए बिना नहीं छोड़ेगा। तनिक भी चूँ की तो वह सरे आम उसे अपने जबड़े में भरकर ले जाएगा और उसकी बोटी-बोटी नोंचकर खाएगा। वह चीख़ती-चिल्लाती रहेगी, अपनी रक्षा की गुहार लगाएगी। सारा मौहल्ला देखेगा, लेकिन सत्ते पहलवान के सामने आने की हिम्मत कोई नहीं कर सकेगा। ………… तब सत्ते पहलवान के चंगुल से कैसे मुक्त होगी वह?’

     अशोक को चिंतामग्न देख पहले से डरी हुई सुनीता डर से और अधिक सहम गयी। भयभीत और सहमी हुई नज़रों से उसकी ओर देखते हुए बोली, ‘क्या हुआ अशोक? किस चिंता में डूब गए तुम?’

      सुनीता के ये शब्द सुन वह विचार की दुनियाँ से बाहर आया और अपने ख़ामोशी तोड़ते हुए बोला, ‘सत्ते पहलवान के बारे में तो यह विख्यात है कि जिस चीज़ पर उसकी नज़र चढ़ जाती है, वह उसे छोड़ता नहीं है।’

      अशोक के मुँह से यह सुन सुनीता गहरे सन्नाटे में डूब गयी। भय से उसका शरीर काँपने लगा और असहाय नज़रों से वह अशोक की ओर देखने लगी।

 अपने अंदर के डर को दबाकर उसने घटना के बारे में जानने की कोशिश करते हुए सुनीता से पूछा, ’कुछ कहा सत्ते पहलवान ने तुमसे?’

‘हाँ।’ सुनीता ने डरे-सहमे स्वर में जवाब दिया।
‘क्या कहा उसने?’ सुनीता की आँखों में देखते हुए अशोक ने आगे पूछा।

        ‘बिना कुछ कहे उसने धड़धड़ाते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने दूसरे हाथ से मेरे गालों को छूते हुए बोला तू तो सच में बहुत सुंदर है। तेरे बारे में जितना सुना था उससे भी कहीं ज़्यादा सुंदर। मुझे पता चला है कि यहाँ मौहल्ले के लड़के तुझे बहुत परेशान कर रहे हैं। दुखी-पीड़ितों की रक्षा करना मेरा धर्म है। और सत्ते पहलवान जहाँ खड़ा हो जाता है वहाँ कोई और खड़ा नहीं रह सकता। अब सत्ते पहलवान तेरी रक्षा के लिए आ गया है तो तेरे मौहल्ले के सारे गुंडे-बदमाश अपने आप अपने बिलों में घुस जाएँगे। अब तू निश्चिन्त रह, और बिना डरे कहीं भी आ-जा। परेशान करने की तो बात छोड़, अब कोई तेरी ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत भी नहीं करेगा। तेरे साथ जो कुछ भी करेगा सत्ते पहलवान करेगा।’ इतना कहते-कहते सुनीता की आवाज़ डूबने लगी और शब्द उसके गले में अटकने लगे।

अशोक ने देखा सुनीता बहुत घबरायी हुई थी और घबराहट के कारण उसके माथे पर पसीने की बूँदें उभर आयी थीं। पास में रखे पानी के घड़े से एक गिलास में पानी लेकर सुनीता को देते हुए वह बोला, ‘लो, पहले पानी पियो।’

       सुनीता ने अपने दुपट्टे से माथे पर आए पसीने को पोंछा और दो-तीन घूँट पानी पीकर गिलास को एक ओर रख दिया। अशोक ने उसे कुछ सहज पाया तो बोला, ‘और भी कुछ कहा सत्ते पहलवान ने?’

      ‘हाँ,…..कह रहा था तू बहुत ग़रीब है और अपने परिवार को चलने के लिए बहुत कष्ट उठने पड़ते हैं तुझे। लेकिन अब आगे से तुझे कोई कष्ट उठाना नहीं पड़ेगा। तेरे लिए एक अच्छे घर की व्यवस्था कर दूँगा। कार, ड्राइवर रख दूँगा। रुपए-पैसे की भी कोई कमी नहीं रहेगी तुझे। अपनी मां और भाई के साथ निश्चिन्त होकर सुखी और शान से रहना।’ इतना कहते-कहते वह रुक गयी और अशोक की ओर देखने लगी। उसके लिए अपने मुँह से सत्ते पहलवान का एक-एक शब्द बोलना कठिन लग रहा था। वह महसूस कर रही थी जैसे वह सत्ते पहलवान द्वारा कहे गए शब्द नहीं बोल रही थी, बल्कि हर शब्द के साथ वह ज़हर का घूँट पी रही थी। और उस ज़हर के असर से वह अंदर ही अंदर निर्जीव सी होती जा रही थी। उसका मस्तिष्क और शरीर दोनों शिथिल से हो रहे थे।

सुनीता की मां:स्थिति को भाँपते हुए अशोक भी कुछ क्षण नि:शब्द उसकी ओर देखता रहा। फिर उसके मुँह से सत्ते पहलवान की पूरी बात जानने की जिज्ञासा व्यक्त करता हुआ बोला, ‘इससे आगे?’

      ‘वह बोला मैं शांतिप्रिय आदमी हूँ। मुझे हिंसा और ज़बरदस्ती पसंद नहीं है। इनका सहारा तभी लेना पड़ता है जब कोई मेरी बात नहीं माने। प्यार और अहिंसा की मेरी भाषा समझने वाले लोग मेरी बात ख़ुद ही मान लेते हैं। जो नहीं मानते हैं वे बाद में कुछ भी मानने या ना मानने के लायक नहीं रहते। तुमसे भी प्यार से कह रहा हूँ। मेरी बात चुपचाप मान लो और जब, जहाँ भी तुम्हें बुलाऊँ चुपचाप चली आना। नहीं तो………मेरा नाम सत्ते पहलवान है। इससे आगे मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, समझी…….। इतना कहकर उसने फिर से मेरे गालों को सहलाया और मेरा रास्ता छोड़कर आगे बढ़ गया।’ इतना कहकर सुनीता ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और सिर नीचा कर नज़रें ज़मीन पर गड़ा दीं।

       सुनीता के मुँह से यह सब सुन अशोक भी सकते की सी हालत में आ गया। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या कहे, किस तरह सुनीता को सांत्वना दे। सुनीता के स्कूल नहीं जाने का कारण अब स्पष्ट रूप से उसकी समझ में आ गया था। असहाय दृष्टि से सुनीता की ओर देखते हुए वह गम्भीर सोच में डूब गया।

      सुनीता का मस्तिष्क जैसे ठस्स हो गया था। वह कुछ नहीं सोच पा रही थी। निर्धनता कम बड़ी चुनौती नहीं थी। किंतु निम्न जातीय होना उसके और उसके परिवार के लिएनिर्धनता से भी बड़ी चुनौती और अभिशाप था। जिस सुंदरता को वह अपना एक बड़ा सुखद पक्ष समझती थी और उसकी मां बहुत गर्व से यह कहती थी कि एक से एक अच्छा लड़का मिल जाएगा मेरी सुनीता को शादी के लिए। उसके रिश्ते के लिए मुझे किसी के पास जाने की ज़रूरत नहीं है, लड़के वाले ही मेरे पास आएँगे मेरी बेटी का हाथ माँगने। उसकी वह सुंदरता ही एक दिन उसके लिए इतना बड़ा अभिशाप बन जाएगी, ऐसा उसने कभी किसी बुरे से बुरे सपने में भी नहीं सोचा था।

      बहुत देर तक उसी तरह मौन में डूबे रहने के पश्चात सुनीता ने अपनी गर्दन ऊपर उठायी और अशोक की ओर देखती हुई बोली, ‘मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। ख़ुद को और अपने परिवार को कैसे बचाऊँ। कल रात से मैं बहुत परेशान हूँ। मेरे मन में एक विचार यह भी आया है कि मैं रात के अंधेरे में मां और भाई को लेकर चुपचाप इस शहर से कहीं दूर चली जाऊँ। लेकिन जाएँगे कहाँ? कौन सहारा देगा हमको? और जब यह पता चलेगा कि हम सत्ते पहलवान से बचने के लिए छिपते फिर रहे हैं तो कोई चाहकर भी सहारा नहीं देगा। और सत्ते पहलवान का साम्राज्य भी तो दूर-दूर तक फैला है। उसके लोग सब जगह हैं। वह हमें ज़रूर ढूँढ निकालेगा और फिर……. मेरा जो होगा वो मैं भुगत लूँगी, लेकिन मेरी मां और मेरा भाई …….? उनके बारे में सोचकर ही मैं काँपने लगती हूँ।’

 सुनीता के विचार के प्रति सहमति में सिर हिलाते हुए वह बोला, ’सोच तो तुम सही रही हो। लेकिन, सवाल तो यह है कि यहाँ से भागकर जाओगी कहाँ तुम?’

सुनीता ने आगे बताया, ’यह भी सोचा कि पुलिस में रिपोर्ट लिखवाकर अपने लिए सुरक्षा माँगूँ। लेकिन पुलिस तो सत्ते पहलवान की जड़ ख़रीद ग़ुलाम है। सिपाहियों की तो बात छोड़िए दरोग़ा और एस.पी. तक सब उसके इशारों पर नाचते हैं। वे शायद रिपोर्ट भी नहीं लिखेंगे। और डर यह भी है कि कहीं कोई कार्रवाई करने या सुरक्षा देने के बजाए पुलिस वाले ख़ुद ही………।’

सुनीता के मन की इस आशंका को समझते हुए वह बोला, ’हाँ, पुलिस होती तो ऐसी ही है। कई किस्से सुने हैं पुलिस के, जिनमें पुलिस के पास अपने शोषण और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ शिकायत लिखवाने गयी स्त्रियों के साथ पुलिस ने ही……..।’
‘तब क्या किया जाए? कुछ उपाय सोचो अशोक। हमारे पास समय बहुत कम है। जो कुछ भे करना है बहुत जल्दी करना है।’ असहाय दृष्टि से अशोक की ओर देखती हुई बोली सुनीता
‘सत्ते पहलवान तो है ही, कहीं ऐसा ना हो कि राजू भैया भी…..?…..’ कहते हुए अशोक ने दूसरी चिंता व्यक्त की.
राजू भैया का नाम सुन सुनीता आश्चर्य से अशोक की ओर देखते हुए बोली, ’ये राजू भैया कौन है? अब किसका नाम लेकर डरा रहे हो मुझे?’

राजू भैया के बारे में बताते हुए अशोक बोला, ’डरा नहीं रहा हूँ, आशंका व्यक्त कर रहा हूँ। राजन पंडित उर्फ़ राजू भैया नया बदमाश है। सत्ते पहलवान की तरह वह भी एक ख़ूँख़ार बदमाश और बड़ा भू-माफ़िया है। अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसने भी अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर रखा है और आजकल सत्ते पहलवान को चुनौती दे रहा है। राजनीति में भी उसकी बड़ी गहरी पैठ है। सुना है वह भी औरतों का बहुत शौक़ीन है और रोज़ नई-नई सुंदर लड़कियों को अपने होटल में बुलाता रहता है। जिनको वह लालच से नहीं ख़रीद पाता उनको ज़बरन उठवा लेता है।’

राजू भैया के बारे में यह सब सुन पहले से भयभीत सुनीता का भय और अधिक बढ़ गया। भयभीत स्वर में वह बोली, ’अशोक, मैं पहले ही बहुत डरी हुई हूँ। ऐसा कहकर मेरी जान मत निकलो प्लीज़।’

राजू भैया के बारे में और अधिक जानकारी देते हुए वह बोला, ’मैंने सुना है कि सत्ते पहलवान और राजू भैया दोनों एक-दूसरे के प्रबल प्रतिद्वंदी और जानी दुश्मन बने हुए हैं। कई सम्पत्तियों और स्त्रियों पर क़ब्ज़े को लेकर भी दोनों कई बार आपस में भिड़ चुके हैं। ऐसे लोगों के लिए सुंदर स्त्री सबसे बड़ी युद्ध-भूमि हो सकती है। और अब जब सत्ते पहलवान यहाँ तक आ गया है तो इसकी भनक राजू भैया को भी ज़रूर लग जाएगी और हो सकता है अब तक लग भी गयी हो। देख लेना जल्दी ही राजू भैया या उसका कोई गुर्गा तुम तक ज़रूर पहुँचेगा।’

 अशोक के मुँह से यह सब सुन सुनीता जैसे गहरे, अंधेरे कुएँ में जा पड़ी थी। वहाँ से निकलने का कोई रास्ता उसे नहीं सूझ रहा था। घबराहट से उसका दिल बैठने लगा। उसके मुँह से भी शब्द बाहर निकलने का साहस नहीं कर रहे थे। जैसे-तैसे उसने उसके मुँह से शब्द बाहर निकले, ’यदि ऐसा हुआ तब क्या करूँगी मैं? अभी तक मौहल्ले के आवारा लड़कों और सत्ते पहलवान का ही डर था, ये राजू भैया का एक नया डर बैठा दिया है तुमने। मेरा तो दिमाग़ ही काम नहीं कर रहा है, और सिर पूरी तरह चकरा रहा है। ना भूख-प्यास लग रही है और ना कुछ और सूझ रहा है।’

सुनीता को ढाढ़स बँधाते हुए वह बोला, ’तुम्हारी चिंता समझ रहा हूँ मैं। लेकिन सम्भावित ख़तरे की ओर से आँख बंद कर लेने से तो कोई बात बनने वाली नहीं है। ख़तरे का सामना तो करना पड़ेगा। …….. इन सब से निकलने का मुझे एक उपाय सूझ रहा है। शायद बहुत अच्छा नहीं है, लेकिन तुम्हारी इन परिस्थितियों से उबरने के लिए उससे उपयुक्त कोई अन्य उपाय मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। ……….. हाँ, शायद यहाँ से कोई दूसरा रास्ता मिल जाए।’

अशोक के इन शब्दों में सुनीता को आशा की एक किरण दिखायी दी। वह उत्साहित होते हुए बोली, ’क्या सोच रहे हो तुम? क्या उपाय आ रहा है तुम्हारे मस्तिष्क में, जल्दी बताओ अशोक। मैं जल्दी से जल्दी इस चक्रव्यूह से निकलना चाहती हूँ।’

अशोक ने बताया, ’कुछ दिन पहले मैंने इंटरनेट पर एक ख़बर पढ़ी थी। ख़बर दक्षिण अमेरिका के एक छोटे से देश पेरू की थी। वहाँ भी एक लड़की तुम्हारी तरह बहुत सुंदर थी। उसके पिता की मृत्यु भी उसके बचपन में ही हो गयी थी और उसकी मां बीमार रहती थी। अपनी और परिवार की आजीविका और मां की बीमारी का ख़र्च चलाने के लिए वह लड़की पढ़ाई के साथ-साथ मोडलिंग का काम करती थी।’

अशोक की बात में अपने लिए कुछ न पाते हुए वह बोली, ’लेकिन मेरी समस्या केवल आर्थिक अभाव की समस्या नहीं है अशोक। ……… तुम तो जानते हो मेरे पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और एक सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हुई थी। बहुत कम सेलरी थी उनकी।उसमें ही परिवार की आजीविका आसान नहीं थी। पेंशन तो और भी बहुत कम आती है उनकी। बहुत मुश्किल होता है उससे परिवार का ख़र्च चलाना, लेकिन किसी तरह चला लेते है। मेरी समस्या दूसरी है ……।’

सुनीता के मन की स्थिति को समझते हुए अशोक उसे समझाते हुए बोला, ’हाँ, जानता हूँ सब कुछ। उस लड़की की समस्या भी केवल आर्थिक नहीं थी। तुम्हारी तरह उसकी असली समस्या भी उसकी सुंदरता थी। शहर के लड़कों ने परेशान कर-करके उसका जीना दूभर कर दिया था। लोग उसको तरह-तरह के ओफ़र दे रहे थे। एक तरह से उसकी बोली लगायी जा रही थी। वह भी बहुत तनाव में थी अपनी इस समस्या को लेकर।’

अशोक से यह सुन सुनीता के मन में उस लड़की के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा पैदा हुई। अपनी जिज्ञासा व्यक्त करते हुए वह बोली, ‘तो क्या रास्ता अपनाया उसने अपनी इस समस्या से निकलने के लिए?’

अशोक ने बताया, ’गुंडों से अपनी अस्मिता को सुरक्षित रखना सम्भव नहीं है, और बिकना ही एकमात्र विकल्प है तो क्यों न अपनी क़ीमत पर बिका जाए। यह सोचकर उसने एक दिन इंटरनेट पर एक विज्ञापन दे दिया कि ‘मैं अपना कौमार्य बेचना चाहती हूँ। जो भी सबसे अधिक धनराशि देगा मैं उसी को बेचूँगी।’

उस लड़की के बारे में यह सुन सुनीता संशय से भर गयी। अपने मन का संशय व्यक्त करते हुए वह बोली, ’मीडिया पर उसकी फ़ोटो गयी तो उसकी बेज्जती नहीं हुई होगी? कैसे सामना किया होगा उसने इसका?

अशोक ने बताया, ’उसने इसमें कोई बेज्जती महसूस नहीं की, बल्कि साहस से सामना किया। सोसल मीडिया पर जैसे ही उसकी ख़बर और फ़ोटो वायरल हुई वह सबसे हॉट ख़बर बन गयी। मीडिया के लोगों ने उससे सम्पर्क किया। एक मीडियाकर्मी ने उससे पूछा, ‘तुमने यह क़दम क्यों उठाया? क्या यह पैसे के लिए किया है अथवा चर्चा में आने के लिए कोई पब्लिसिटी स्टंट है ताकि उससे तुम्हें कोई बड़ा काम मिल जाए? या कोई अन्य विवशता रही है?’
‘क्या जवाब दिया उस लड़की ने?’ सुनीता ने उत्सुकता से पूछा।

        ‘उसने मीडियाकर्मी से ही पलट कर प्रश्न किया, ‘तुम यदि मेरी तरह एक सुंदर लड़की होते और तुम्हारे साथ ऐसी स्थिति पैदा होती, जैसी मेरे साथ पैदा हुई हैं तो तुम क्या करते ऐसे में, जहाँ चारों ओर आपको नोंचकर खाने के लिए भेड़िए ही भेड़िए हों और कोई रक्षा करने वाला नहीं हो।’ मीडियाकर्मी के पास उसका कोई जवाब नहीं था।’
‘फिर क्या हुआ?’

‘मीडियाकर्मी ने दूसरा प्रश्न पूछा कि यदि कोई बहुत बदसूरत, बूढ़ा या कोई ऐसा व्यक्ति जिसके शरीर से बदबू आती हो, सबसे ऊँची बोली लगाकर तुम्हारा कौमार्य ख़रीदे तो क्या तुम उसको अपना कौमार्य बेच दोगी?’
‘तो इस पर क्या कहा उसने?’ सुनीता ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त कराते हुए कहा।
अशोक ने बताया, ’उसने कहा ‘हाँ, मैं उसको अपना कौमार्य बेच दूंगी। वह जो भी होगा, कम से कम वह एक पुरुष होगा, भेड़िया नहीं।’
‘हुम्म्म्म्म, तो तुम चाहते हो कि मैं भी उस लड़की की तरह ख़ुद को ……..?’ कहते हुए सुनीता ने प्रश्नसूचक दृष्टि से अशोक की ओर देखा।

’नहीं, मैं अपने दिल से बिलकुल नहीं चाहूँगा कि तुम ख़ुद को बेचो। लेकिन……सत्ते पहलवान भी तो तुमको ख़रीदने की ही बात कर रहा है ना? और ये तुम्हारी गली के लड़के जो तुमको तरह-तरह के प्रलोभन दे रहे हैं, ऐसा करके, एक तरह से वे भी तो तुमको ख़रीदने के लिए तुम्हारी बोली ही लगा रहे हैं।तब………? तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कोई व्यक्ति तुम्हारे शरीर को ज़बरन रोंदे क्या तुम यह पसंद करोगी?’ अपनी बात स्पष्ट करते हुए अशोक ने सुनीता से ही प्रश्न किया। 
सुनीता तुरंत इंकार करते हुए बोली, ’नहीं, बिलकुल नहीं।’

1959 की एक पेंटिंग

सुनीता को यथार्थ का आइना दिखाते हुए वह बोला, ’दुनियाँ के इस बाज़ार में तुम्हारा शरीर तुम्हारा अपना माल है। इससे पहले कि कोई ज़बरदस्ती तुमसे तुम्हारा माल तुमसे लूटे, यह बेहतर है कि तुम इसको किसी उचित ग्राहक को बेच दो। कम से कम इसमें पाशविक हिंसा से बचोगी, और तुम्हारे अंदर लुटने और हारने की पीड़ा नहीं, बल्कि कहीं न कहीं जीतने का अहसास होगा। …….और, एक बार तुम लुटीं तो यह कोई गारंटी नहीं है कि फिर कभी नहीं लुटोगी। वही लुटेरा या कोई अन्य लुटेरा तुम्हें फिर से भी लूट सकता है। तुम बार-बार लूटी जा सकती हो। लेकिन तुमने ख़ुद ही ख़ुद को बेचा तो यह निश्चित है कि कोई तुम्हें तब तक नहीं ख़रीद सकेगा जब तक तुम ख़ुद को बेचना नहीं चाहोगी।’

      सुनीता का मन अशोक की बात को लेकर संशयपूर्ण बना हुआ था। वह बोली, ‘यह बेचना भी तो अपनी इच्छा के विरुद्ध जाना ही हुआ। अपनी ज़िंदगी को अपनी इच्छानुसार जीने का सुख और स्वतंत्रता कहाँ है इसमें भी?’

     अशोक उसके संशय को दूर करते हुए बोला, ’हाँ, मैं तुमसे सहमत हूँ। यह भी अपनी इच्छा के विरुद्ध जाना ही है। लेकिन ख़ुद को बेचना ज़बरन लुटने और नोंचे जाने से कहीं बेहतर विकल्प है।’

     सुनीता का मन अभी भी संशयग्रस्त था। संशय में डूबे स्वर में ही उसने ‘हुम्म्म्म्म’ कहते हुए प्रशंसूचक दृष्टि से अशोक की ओर देखा। अशोक ने आगे कहा, ‘तुम्हारे सामने जिस तरह की परिस्थितियाँ बन गयी हैं, उनमें इस समय यही सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प दिखायी दे रहा है। और यह बिना किसी दिक़्क़त या रिस्क के, बहुत सहजता से हो जाएगा। अब पोस्ट डाली और कुछ ही घंटों में दुनियाँ भर में वायरल हो जाएगी और उसके जवाब में ओफ़र आने लगेंगे। मुझे लगता है केवल कुछ दिन के अंदर ही सब कुछ हो जाएगा और तुम इन सब तनाव और दबावों से मुक्त होकर सामान्य रूप से जी सकोगी।’

      अशोक का यह विचार सुनीता को सही लग रहा था। किंतु इसके उपरांत सामाजिक  स्वीकृति और मर्यादा में बंधा उसका मन इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो पा रहा था। सामाजिक मर्यादा का हवाला देते हुए वह बोली, ‘लेकिन तुम जहाँ की बात कर रहे हो, वहाँ के समाज और हमारे यहाँ के समाज में बहुत अंतर है अशोक। यहाँ कोई लड़की ऐसा क़दम उठा ले तो उसे तुरंत वेश्या क़रार दे दिया जाएगा। और कहीं से भी मुँह उठाकर निकलना दूभर हो जाएगा उसका। और केवल लड़की को नहीं उसके समस्त परिवार को बहिष्कृत कर देंगे और ताने दे-देकर मार देंगे लोग। वह लड़की ऐसा बोल्ड क़दम उठा सकती थी, क्योंकि उसके समाज में इसकी गुंजाइश थी। हमारे समाज में यह गुंजाइश कहाँ है?’

      अशोक ने महसूस किया सुनीता के शब्दों में समाज और संस्कृति के घिसे-पिटे सदियों पुराने परम्परागत आदर्श बोल रहे थे। इस आदर्शवाद की सीलन और घुटनभरी कोठरी से बाहर निकलने का रास्ता दिखाते और उसकी चेतना में यथार्थ की खुली हवा का संचार करने की कोशिश करते हुए वह बोला, ‘क्यों नहीं है गुंजाइश? वहाँ पर भी उसी तरह के पुरुष थे, जैसे यहाँ हैं। उन पुरुषों पर भी यौन हिंसा का वैसा ही भूत सवार था। उनके लिए भी स्त्री एक शरीर थी और वे भी स्त्री को अपनी यौन-तृप्ति का साधन समझते थे। क्या अंतर है वहाँ के समाज में और हमारे समाज में? सब जगह पुरुषों के लिए स्त्री नरम और गरम मास का एक टुकड़ा है, जिसे वे चटखारे के साथ खाने को आतुर रहते हैं। …….. स्त्री का शरीर उसका अपना है। वह अपना शरीर किसको दे, पुरुष कौन होता है यह तय करने वाला। उसे किसके साथ अपने शरीर को बाँटना है और किसके साथ नहीं, इस पर सिर्फ़ स्त्री का अधिकार है। वहाँ के और यहाँ के समाज की बात नहीं है, जहाँ कहीं भी स्त्री के प्रति पुरुष का इस तरह का दमनकारी और वर्चस्ववादी दृष्टिकोण हो, वहाँ सब जगह स्त्री द्वारा अपना शरीर या कौमार्य बेचे जाने की गुंजाइश है।’

सुनीता बहुत ध्यान से अशोक की बातें सुन रही थी। अशोक के इन तार्किक शब्दों ने उसको प्रभावित किया। उसके मस्तिष्क पर छाए संशय के बादल एक-एक कर छंटने लगे थे। उसे लगा वह लड़की उसके अंदर उतर आयी है और उस लड़की की चेतना उसके अंदर प्रवाहित हो रही है। और वहएक ऐसे स्थान पर खड़ी है, जहाँ उसके चारों ओर उसके चाहने वालों की अपार भीड़ है, जिसमें हर कोई उसे पाने के लिए प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है। किंतु हिंसा और आतंक की शक्ल में नहीं,अपितु सब के सब प्रशंसक और याचक की मुद्रा में खड़े हैं। इस अनुभूति ने उसके अंदर विश्वास का संचार किया। किंतु एक बड़ी दुविधा अभी भी उसके मस्तिष्क में बनी हुई  थी, जो उसे बहुत परेशान कर रही थी। अशोक के समक्ष अपनी दुविधा रखते हुए वह बोली, ‘लेकिन मां को पता चलेगा कि उसकी बेटी अपना कौमार्य बेच रही है तो वह तो जीते जी मर जाएगी।’

सुनीता की इस दुविधा से सहमति व्यक्त करते हुए वह बोला, ‘यह चिंता तो ठीक है तुम्हारी। लेकिन सोचो, यदि सत्ते पहलवान, राजू भैया या कोई और तुम्हारी माँ के सामने से ही तुम्हें ज़बरन उठाकर ले जाए और तुम्हारे साथ बलात्कार करे, तब वह क्या कर लेंगी? क्या तब वह जीते जी नहीं मर जाएँगी?’ यह कहते हुए उसने सुनीता की आँखों में देखा।

   अशोक के मुँह से यह सुन उसका दिल अंदर तक कांप उठा। उसके मुँह पर जैसे ताला सा जड़ गया था। पत्थर की तरह स्थित आँखों से वह अशोक की ओर देखती रह गयी। उसके मन की स्थिति को समझते हुए, अशोक ने यथार्थवादी दृष्टिकोण से सोचने का आग्रह करते हुए उससे कहा, ’सब परिस्थितियाँ तुम्हारे सामने हैं। इसलिए मां के दृष्टिकोण से नहीं अपने दृष्टिकोण से सोचो। ………यह भावुकता का नहीं, जीवन के यथार्थ और उसकी चुनौतियों का दृढ़ता से सामना करने का समय है। इसलिए भावुक होकर नहीं, ठंडे दिमाग़ से सोचो।’

      अशोक ने जिस तरह उसे यथार्थ की ज़मीन पर ला पटका था, उसे लगा अशोक सही कह रहा है। उसने महसूस किया कि सच में यथार्थ की इस चुनौती का सामना भावुक रहकर नहीं किया जा सकता। अशोक के शब्दों से उसे मानसिक बल मिला और उसने आदर्श और भावुकता से बाहर निकल यथार्थ की चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से स्वयं को तैयार किया। 

      बात करते हुए अचानक दीवार में टंगी घड़ी की ओर सुनीता की दृष्टि गयी तो देखा साढे दस बज गए थे। उसे याद आया यह तो स्कूल की भी आधी छुट्टी का समय है। वह उठते हुए बोली, ‘अरे, लंच का समय हो गया। तुमको भूख लग आयी होगी। मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आती हूँ।’

 सुनीता के यह कहते ही अशोक को भी खूख और खाना याद हो आया था। वह तत्काल सुनीता की ओर देखते हुए बोला, ‘अरे हाँ, तुमने अच्छा किया याद दिलाकर।……. मैं तो भूल ही गया था। तुमने कल से कुछ नहीं खाया है।………मैं तो अपना लंच लाया हूँ घर से। तुम अपने लिए लेकर आओ जल्दी से, फिर साथ बैठकर खाएँगे।’

      ‘ठीक है, तुम लाए हो तो अपना लंच तो तुम खा लो। मुझे भूख नहीं है।’ सुनीता ने अनिच्छा व्यक्त करते हुए कहा।

     ‘कब तक नहीं खाओगी, ऐं? कब तक भूखी रहोगी? क्या भूखे रहने से सब ठीक हो जाएगा? बिना खाए, भूखी रहकर इन संघर्ष और चुनौतियों का सामना कैसे करोगी तुम? खाना ज़रूर खाओ सुनीता।………..आओ, मेरे खाने में से ही खाते हैं।’ यह कहते हुए अशोक ने सुनीता का हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया और अपना लंच बॉक्स खोलकर उसके हाथों में थमा दिया। 

     अशोक के आत्मीय आग्रह के आगे सुनीता ना नहीं कर सकी। उसने लंच बाक्स को खोला और रोटी का एक टुकड़ा तोड़कर हाथ में लेती हुई बोली, ’वैसे तो सच में मेरा कुछ भी खाने का मन नहीं है अशोक, लेकिन तुम कह रहे हो तो………..।’

    अशोक के लंच बाक्स में दो रोटियाँ और अचार था। दोनों ने एक-एक रोटी खायी। खाना खाने के बाद सुनीता ने चाय बनायी और चाय के प्याले लाकर अशोक के पास आकर बैठते हुए बोली, ‘अब बताओ, क्या करना चाहिए?’

      अशोक ने बिना किसी लाग-लपेट के अपना सुझाव दिया, ’मुझे लगता है तुम्हें उस लड़की की तरह इंटरनेट पर अपना विज्ञापन दे देना चाहिए। एक तो इसमें समय बहुत कम लगेगा। दूसरे, सत्ते पहलवान, राजू भैया, तुम्हारे मौहल्ले के लड़के तथा तुम पर इस तरह की नज़र रखने वाले अन्य लोग भी परस्पर प्रतिस्पर्धा करेंगे। ये छुटभइए तो रास्ते से वैसे ही अलग हट जाएँगे। रही सत्ते पहलवान और राजू भैया की बात तो एक-दूसरे को रास्ते से हटाने के लिए वे दोनों आपस में टकराएँगे। इससे तुम्हारी ओर से ध्यान हटकर उनका ध्यान आपसी लड़ाई और प्रतिद्वंदिता पर केंद्रित होगा। इस सब से तुमको कुछ राहत मिलेगी और इस दौरान कोई न कोई दूसरा रास्ता निकल आएगा।‘

      सुनीता को अशोक के सुझावपूर्ण शब्दों में कोई अनुभवी और सुलझा हुआ व्यक्ति बोलता दिखायी दिया। उसके साथ सहमति में सिर हिलाते हुए वह बोली, ’बात तो तुम्हारी ठीक है, लेकिन मैं इंटरनेट पर अपना विज्ञापन दूँगी कैसे। मेरे पास तो ना कम्प्यूटर है ना मोबाइल।’

     ’उसकी चिंता तुम मत करो। मेरे पास मोबाइल है। इसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है। इस मोबाइल से अपलोड करेंगे तुम्हारी डिटेल्स और जो भी रेसपोंस आएँगे वो मैं तुमको बता दूँगा।’ यह कहते हुए अशोक ने उसकी चिंता को दूर किया।

      ‘ठीक है। लेकिन सब कुछ तुमको ही हेंडल करना होगा। मुझे कुछ पता नहीं है इस बारे में। मेरा तो दिल अंदर से काँप रहा है। मैं बस तुम्हारे भरोसे यह कर रही हूँ।’ सुनीता अभी भी अंदर से पूरी तरह सहज नहीं थी। 

      अशोक ने उसका मनोबल बढाते हुए कहा, ’तुम निश्चिन्त रहो। …..और देखना तुम्हारी समस्या का कोई न कोई अच्छा समाधान निकलेगा इस रास्ते से।’

      अशोक ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर सबसे पहले सुनीता का एक प्रोफ़ाइल बनाया और बहुत सारे समूहों के साथ उसे जोड़ दिया। फिर उसका एक आकर्षक सा फ़ोटो खींचा, और उस फ़ोटो के साथ केप्शन में लिखा ‘मैं अपना कौमार्य बेचना चाहती हूँ’। केप्शन के नीचे लिखा-उम्र 17 साल, रंग गौरा, क़द 5’3’, सुंदर, स्लिम, आकर्षक, वर्जिन। कौमार्य सबसे ऊँची बोली लगाने वाले किसी भी देश, धर्म, नस्ल, जाति के व्यक्ति को बेचा जा सकेगा। स्वस्थ एवं युवा व्यक्तियों को वरीयता दी जाएगी। इच्छुक व्यक्ति अपनी बोली के साथ नीचे दिए पते पर सम्पर्क करें। संदेश के नीचे ईमेल का पता दिया गया था। सभी समूहों में इस संदेश को भेजने के बाद वह सुनीता से बोला, ‘लो, हो गया। चला गया सारी दुनिया में।’

यह कहते हुए अशोक के चेहरे पर कोई परीक्षा पास करने जैसा उत्साह और विश्वास का भाव था। सुनीता कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही कर पा रही थी।उसके अंदर एक नया द्वंद्व पैदा हो गया था क़ि उसके इस क़दम का क्या परिणाम होगा। क्या इससे सचमुच उसकी दुनियाँ बदल जाएगी या वह दुनियाँ भर में एक विश्व-वेश्या के रूप में बदनाम होकर रह जाएगी। आशा के साथ-साथ एक नई तरह का अंजाना भय भी उसके अंदर बैठता जा रहा था। सहसा एक आवेग से उसने अशोक का हाथ अपने हाथों में ले लिया और उसकी आँख़ों में देखते हुए बोली, ‘अशोक। मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है. …… जो भी हो, जैसा भी हो, तुमको ही संभालना है सब। तुम्हारे बिना मैं एक क़दम भी नहीं चल पाऊँगी।’

अशोक ने उसके हाथों की गर्मी को महसूस किया। उसने अपना दूसरा हाथ सुनीता के हाथों पर रखा और उसे आश्वस्त करते हुए बोला, ’तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हारे साथ हूँ और रहूँगा।’

स्कूल की छुट्टी का समय हो गया था। अशोक ने अपना बैग उठाया और ‘अच्छा, मैं चलता हूं। अपना ध्यान रखना’ कहते हुए सुनीता के घर से बाहर क़दम बढ़ा दिए।

सुनीता ने दरवाज़े तक आकर उसे विदा किया और उसके बाहर निकलते ही दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। 

वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम का दलित साहित्य में खासकर महत्वपूर्ण अवदान है. उनके कई उपन्यास एवं कविता-संग्रह प्रकाशित हैं. संपर्क: jpkardam@hotmail.com

चुनाव आयोग को महिला संगठनों का पत्र: समुचित राजनीतिक प्रतिनिधत्व के लिए हस्तक्षेप की मांग

महिला आरक्षण के लिए सक्रिय संगठनों ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर महिलाओं के समुचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप की मांग की है. महिलाओं का एक प्रतिनिधिमंडल इस मांग और पत्र के साथ आयोग और विभिन्न राजनीतिक दलों से मिल रहा है.

चुनाव आयोग को लिखा गया पत्र:

हम, महिलाओं का राष्ट्रीय गठबंधन, राजनीतिक दलों द्वारा अपने द्वारा जारी सूची में महिला उम्मीदवारों को न्यूनतम टिकट दिये जाने के प्रति अपना गहरा असंतोष व्यक्त करने के लिए यह लिख रहे हैं। हमारा मानना है कि राजनीतिक दल जो अपने संगठन में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, वे सही मायने में हमारे लोकतंत्र के प्रतिनिधि नहीं हैं। इसके अलावा, यह पत्र उन सबके लिए भी समान रूप से लिखा गया है जो एक न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था बनाने के लिए जिम्मेदारी की स्थिति में हैं। टिकट आवंटन में यह भेदभाव भारत में पुरुषों और महिलाओं के लिए उपलब्ध अवसरों में जेंडर असंतुलन पैदा करता है.

 नेशनल एलायंस फ़ॉर वीमेन रिज़र्वेशन बिल (कई महिला संगठनों के सदस्यों का एक मंच) पिछले चुनाव आयुक्तों से मिला है। हम कई मौकों पर उनसे अपील करते रहे हैं कि वे सभी राजनीतिक दलों के साथ लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व को लेकर उचित कदम उठाएँ। 16 वीं लोक सभा में केवल 12% महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों का निराशाजनक प्रतिनिधित्व था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश भर के कुल 4896 सांसदों / विधायकों में से केवल 418 यानी 9% महिलाएँ हैं।


हम यह बताना चाहते हैं कि हमारा संविधान सभी नागरिकों के लिए समान अवसरों की परिकल्पना करता है, जेंडर और अन्य भिन्नताओं से परे। हालांकि, यह वास्तव में दुखद है कि हमारी लगभग 50% जनसंख्या वाली महिलाओं को केंद्र और राज्य स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है. यह सब अधिक विडंबनापूर्ण है, क्योंकि संसदीय अध्ययन दल ने स्वयं एक महत्वपूर्ण सिफारिश की थी कि महिलाओं के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हेतु प्रभावी नीतियों के लिए उनका न्यूनतम 33% प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

यह काफी हद तक स्पष्ट है कि पिछले कुछ वर्षों में, कॉर्पोरेट जगत, न्यायपालिका, खेल और यहां तक ​​कि सेना और पारा मिलिट्री फ़ोर्स जैसे पुरुष-केन्द्रित माने जाने वाले संस्थानों सहित विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है. वे ख़ास तौर से दृश्य और प्रभावी मतदाता के रूप में भी उभरी हैं.

फिर भी, राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को अवसर देने के प्रति अनिच्छुक हैं, भले ही वे जेंडर समानता के चैम्पियन होने के दावे निरंतर करते रहते हैं।  वे अक्सर महिलाओं की जीतने की क्षमता  का बहाना लेकर सामने आते हैं या यह कहते हुए बचाव करते हैं कि राजनीति महिलाओं का कैरियर नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व की पितृसत्तात्मक मानसिकता इस तथ्य से परिलक्षित होती है कि वे महिलाओं पर प्रॉक्सी प्रतिनिधि और अक्षम प्रशासक होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन उन पुरुष उम्मीदवारों के साथ सहज होते हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, इनमें कुछ मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध के हैं।


पुरुष उम्मीदवारों के चयन को प्रश्रय और महिलाओं के प्रति जेंडर आधारित भेदभाव राजनीतिक दलों के इरादों के बारे में संदेह पैदा करते हैं। राजनीतिक भागीदारी चाहने वाली महिलाओं के लिए शिक्षा, आर्थिक क्षमता आदि प्रमुख मापदंड हो जाते हैं हालांकि, पुरुषों को इस तरह के सभी मापदंडों से छूट हो जाती है। पुरुष होना ही उनकी योग्यता मान लिया जाता है.

जबकि हम जानते हैं कि इस मुद्दे को मुख्य रूप से राजनीतिक दलों द्वारा हल किया जाना चाहिए लेकिन चुनाव आयोग के लिए यह उचित होगा कि वह राजनीतिक दलों और आम जनता को महिलाओं को समान अवसर देने की जरूरत की याद दिलाये.

भारत का चुनाव आयोग बड़े पैमाने पर चुनावों के सफल और न्यायपूर्ण सञ्चालन के लिए एक प्रतिष्ठा प्राप्त संस्था है। महिलाओं की ओर से आयोग द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप, देश में लोकतंत्र को सुनिश्चित करने की दिशा एन कदम होगा. चुनाव आयोग अगर इस तरह का कदम उठाता है तो यह मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट ’शब्द को एक गहरा अर्थ देगा और बदलते सामाजिक मानदंडों के पालन का एक सन्देश भी देगा।

हमें पूरी उम्मीद है कि चुनाव आयोग को यह निर्णायक कदम समाज में जेंडर असंतुलन को खत्म करने के लिए और महिला मतदाताओं की आकांक्षाओं के लिए जरूरी प्रतीत होगा. हम महिलाएं चुनाव आयोग को संविधान के संरक्षकों के रूप में  देखना चाहते हैं जिसका काम सिर्फ नियमित चुनाव करवाना भर नहीं हो बल्कि आगामी चुनावों में जेंडरभेद रहित स्थितियां निर्मित करने की भी हो.

हम सभी राजनीतिक दलों से, उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से परे जकार आग्रह करते हैं, कि वे महिलाओं के सशक्तीकरण और मुक्ति के उनके बार-बार के चुनावी दावे की दिशा में काम करें। दक्षिण या वाम, हर पंथ के राजनीतिक दलों में सभी ने व्यक्तिगत या सामूहिक क्षमता में महिला आरक्षण के पारित होने का समर्थन करने की बात की है। यह भाषणों और चुनाव घोषणापत्रों में अक्सर किया जाने वाला एक चुनावी वादा रहा है। फिर भी, इस विधेयक को न तो लोकसभा में लाया गया है और  न ही राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वयं संगठन के भीतर जेंडर-न्याय की दिशा में कोई कदम उठाया गया है।

हम इस अवसर पर राजनीतिक दलों के नेताओं को याद दिलाना चाहेंगे कि देश की आधी आबादी को उनके खोखले वादों पर अब सवाल उठ रहे हैं।

चार अप्रैल को बदलाव का आगाज करती महिलायें होंगी सड़क पर

0

4 अप्रैल को विभिन्न मांगों के साथ देश भर में महिलाओं का मार्च होने जा रहा है. चुनावों के समय में महिलाओं ने अपने राजनीतिक एजेंडे साफ़ किये हैं. इसी की एक कड़ी के रूप में देश भर के (अराजनीतिक) महिला संगठनों के आह्वान पर महिलाएं सडक पर होंगी. जातिवाद से आजादी, मनुवाद से आजादी, पूंजीवाद से आजादी की घोषणा करती देश भर की औरतें महिलाओं के लिए समावेशी आवासीय अधिकार की मांग कर रही हैं.

दिल्ली के लिए जारी किया गया पोस्टर

औरतों के खिलाफ हिंसा, समाज में असमता, पितृसत्तात्मक ढांचे के खिलाफ महिलाओं का यह आगाज देश भर में एक समय पर एक साथ होने जा रहा है. उनका नारा है: बदलाव के लिए महिलाये, बदलाव के लिए हमारा वोट.

महिलाओं का मानना है कि वे नफरत और हिंसा के मौजूदा माहौल के खिलाफ और लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिकों के रूप में अपने संवैधानिक अधिकारों का दावा करने सडक पर उतर रही हैं. महिला मार्च फॉर चेंज का उद्देश्य भारत में महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों पर हमलों के खिलाफ आ राही है आवाजों को एकजुट करना है।

‘देश में फासीवादी और नव-उदारवादी ताकतों में इजाफा और समाज में हिंसा ने महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है। अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिमों, दलितों और ईसाइयों पर हमले,  फर्जी एनकाउन्टर, भीड़तन्त्र द्वारा उन पर हमलों ने भय और असुरक्षा का माहौल पैदा किया है।

पिछले कुछ वर्षों में संविधान पर सीधा हमला देखा गया है, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर, जिसमें पोशाक, बोलने, लिखने, खाने और चुनने का अधिकार शामिल है. इस हमले ने महिलाओं को ख़ास तौर पर प्रभावित करता है। असंतोष के स्वरों को व्यवस्थित रूप से शांत कर दिया गया है। जबकि सुधा भारद्वाज, शोमा सेन और कई अन्य लोग जेलों में बंद हैं, गौरी लंकेश जैसी महिलाओं को अपनी वाणी और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग करने के लिए अपनी जान तक गंवानी पडी है.’

इन स्थितियों को चिह्नित करते हुए महिलाओं की समवेत आवाज देश भर में गूंजेंगी.

वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (पहली क़िस्त)

रोज़ की तरह अशोक अपना स्कूल बैग उठकर घर से निकला और सुनीता के घर के बाहर आकर उसे आवाज़ दी, ‘सुनीता।’
हर रोज़ अशोक की आवाज़ सुनते ही सुनीता ‘आ रही हूँ’ कहती हुई अपना स्कूल बैग लेकर घर से बाहर निकल आती थी। लेकिन उस दिन अशोक की आवाज़ सुनकर घर के अंदर से न सुनीता बाहर आयी और न उसकी आवाज़। अशोक को लगा कि शायद सुनीता उसकी आवाज़ सुन नहीं पायी है। उसने फिर से आवाज़ लगायी, ‘सुनीता, जल्दी आओ, नहीं तो स्कूल को देर हो जाएगी।’
इस बार भी उसकी आवाज़ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो यह सोचकर कि शायद सुनीता अभी तैयार नहीं हुई है, वह उसकी प्रतीक्षा करने लगा। किंतु, कई मिनट के बाद भी सुनीता बाहर नहीं आयी तो उसे कुछ विचित्र सा लगा। ‘आज क्या हो गया है सुनीता को? ऐसा तो  कभी होता नहीं है। वह तो हमेशा पहले से ही तैयार रहती है और उसकी एक आवाज़ पर ही घर से बाहर निकल आती है। फिर आज क्यों बाहर नहीं आयी है वह अभी तक, और ना कुछ बता ही रही है कि उसे कितना समय और लगेगा तैयार होने में।’ इस बार उसने थोड़े ऊंचे स्वर में आवाज़ लगायी, ‘सुनीता, अरे भाई सो रही हो क्या अभी। क्या स्कूल नहीं जाना है आज?’

लाल रत्नाकर की पेंटिंग

इस बार उसकी आवाज़ पर प्रतिक्रिया हुई और सुनीता घर के अंदर से बाहर आयी। लेकिन वह बिना स्कूल ड्रेस के थी, घर के कपड़ों में ही। चेहरे से भी वह कुछ बुझी-बुझी और उदास लग रही थी। उसे इस तरह देख अशोक को कुछ आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, ‘क्या हुआ है तुम्हें? आज स्कूल नहीं जाओगी क्या?’
‘नहीं अशोक, में स्कूल नहीं जाऊँगी।’ उसका स्वर उदासी में डूबा हुआ था।
अशोक ने उसके चेहरे के बुझेपन और उदासी को पढ़ने की कोशिश करते हुए पूछा’ ‘क्यों? क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’
‘ऐसा ही समझ लो।’ उसके इस प्रश्न के जवाब में सुनीता से अनमनेपन के स्वर में कहा।

अशोक को आज सुनीता का व्यवहार एक पहेली सा लग रहा था। यूँ परेशान और दुखी तो वह पिछले काफ़ी दिन से थी और अशोक उसके दुःख और परेशानी को जानता-समझता भी था। लेकिन आज वह मानसिक रूप से कुछ अधिक ही परेशान दिखायी दे रही थी। उसकी इस परेशानी को समझने की कोशिश करते हुए वह बोला, ’यह समझ लो क्या होता है। तबीयत ठीक नहीं है तो स्पष्ट बताओ ना क्या हुआ है?’
अशोक का इस तरह अधिकारपूर्वक पूछना सुनीता को अच्छा लगा, किंतु अपने मन का असमंजस व्यक्त करते हुए वह केवल इतना कह पायी, ‘क्या बताऊँ?’
सुनीता के चहरे पर छायी उदासी और रूखेपन से अशोक को यह आभास हो गया था कि सुनीता किसी न किसी गहरी उलझन की शिकार है। वह बोला, ‘कुछ तो है। जो भी है वह बताओ। कुछ ज़्यादा ही परेशान लग रही हो। क्या बात है? आंटी की तबीयत तो ठीक है?’
‘उनकी तबीयत तो ठीक है।’
‘फिर क्या बात है?’
‘मैं बहुत बड़े तनाव और उलझन में हूँ अशोक।’
‘किस बात की उलझन है तुम्हें? ऐं?’ अशोक ने उसके चेहरे पर अपनी आँखें टिकाते हुए गम्भीरता से पूछा
‘अभी तुम स्कूल चले जाओ, नहीं तो तुमको देर हो जाएगी। स्कूल से लौटते हुए आ जाना तब बात करेंगे।’ इतना कहकर सुनीता ने बात को टालने की कोशिश की
‘सुनीता मैं तुम्हारा दोस्त हूँ। मुझसे भी अपने मन की उलझन छिपाओगी तो किसको बताओगी? और बताओगी नहीं तो उस उलझन से कैसे बाहर आओगी?
‘तुमको यह कहने की आवश्यकता नहीं है अशोक कि तुम मेरे दोस्त हो। दोस्त ही नहीं, तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो। इतना सपोर्ट करते हो तुम मुझे, तुमको नहीं बताऊँजी तो किसको बताउँगी। तुम्हारे अलावा दूर-दूर तक और कोई नहीं है जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ।’

तो बताओ न क्या बात है? किस परेशानी में डूबी हो तुम
‘बताउँगी, सब कुछ बताउँगी। पहले तुम स्कूल से तो हो आओ
‘नहीं, मैं भी स्कूल नहीं जा रहा हूँ आज।’
‘क्यों? तुम क्यों नहीं जाओगे स्कूल?‘
‘बस यूँ ही।’

‘तुम जानते हो अशोक कि पढ़ाई हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। तुम यह मानते और कहते भी हो कि हमारी ज़िन्दगी की बेहतरी के रास्ते शिक्षा से ही खुलने हैं। एक दिन भी स्कूल नहीं जाने का मतलब है एक दिन की शिक्षा से वंचित रहना। एक दिन की शिक्षा भी हमें ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे कर सकती है। इसलिए जो भी बात करनी है, वह हम बाद में कर लेंगे। मैं स्कूल नहीं जा पा रही हूँ लेकिन तुम तो स्कूल जाओ।’

‘मैं भी तो तुमसे वही कह रहा हूँ। मेरे लिए ही नहीं तुम्हारे लिए भी पढ़ाई उतनी ही ज़रूरी है। यदि किसी परेशानी के कारण तुम भी एक दिन भी स्कूल नहीं जाओगी तो ज़िंदगी की दौड़ में तुम भी उतनी ही पिछड़ जाओगी। ……….तुम जिस परेशानी के कारण आज स्कूल नहीं जा रही हो, क्या वह परेशानी केवल आज की ही है? और कल तुम स्कूल जाओगी?’

‘नहीं, यह समस्या एक दिन की नहीं हैं। और जिस तरह की समस्या में उलझी हूँ उसे देखते हुए मैं कब और कैसे स्कूल जा पाऊँगी, और कभी जा भी पाऊँगी या नहीं, इस बारे में में कुछ नहीं कह सकती।’ सुनीता के शब्दों में उसकी विवशता का दर्द साफ़ झलक रहा था।

अशोक ने उसके दर्द को महसूस किया और उसके दर्द के साथ जुड़ते हुए बोला, ‘मैं एक दिन स्कूल नहीं जाऊँगा तो मेरी पढ़ाई पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन तुम परेशान बनी रही और इस कारण स्कूल नहीं जा पायी तो तुम्हारा बहुत अधिक नुक़सान होगा।’
‘हाँ, यह तो है………।’ सुनीता ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा।

 ‘जब तक तुम्हारी परेशानी का पता नहीं चल जाएगा मेरा मन भी परेशान रहेगा और इस स्थिति में स्कूल चला भी जाऊँ तो मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगेगा। इसलिए मैं सोचता हूँ कि आज मैं भी स्कूल नहीं जाऊँ और तुम्हारे साथ बैठकर तुम्हारी समस्या पर विचार करें और उसका कोई उचित समाधान खोजने की कोशिश करें। क्यों? ठीक है ना?’ इतना कहते हुए उसने प्रश्नसूचक दृष्टि से सुनीता की ओर देखा।

     सुनीता जिस उलझन और तनाव से गुज़र रही थी, उससे उबरने के लिए उसे भी मानसिक सपोर्ट की बहुत ज़रूरत थी। वह भी चाहती थी कि कोई हो जिसके साथ बैठकर वह अपने मन की परेशानी को बाँट सके और तनाव से कुछ मुक्त हो सके। स्कूल न जाकर उसके साथ बैठकर समय व्यतीत करने के अशोक के आत्मीय निर्णय पर सुनीता मौन रह गयी थी। बिना कुछ बोले अशोक को आने का संकेत करते हुए वह घर के अंदर हो गयी। अशोक भी उसके पीछे-पीछे उसके घर के अंदर प्रवेश कर गया।

     घर के नाम पर वह टीन की छत का एक कमरा था, जिसमें एक ओर चूल्हा और गैस का सिलिंडर रखा था। वहीं पर कुछ बर्तन, आटे का कनस्तर और कुछ डिब्बे रखे थे, जिनमें दाल, चावल और मसाले आदि रखे थे। दूसरी ओर दीवार के साथ एक तख़्त बिछा था जिस पर रूई के गद्दे पर सुनीता की मां लेटी थी। कमरे के बीचों बीच एक रस्सी पर परदा डालकर उसे दो भागों में बाँटा हुआ था। परदे के दूसरी ओर का भाग सुनीता और उसके छोटे भाई संजय के पढ़ने और सोने की जगह थी। जगह बहुत कम थी किंतु किसी तरह दोनों की किताबें और कपड़े रखने के बाद उनके सोने के लिए जगह बनायी हुई थी। संजय स्कूल गया हुआ था।

     घर के अंदर प्रवेश करते ही सुनीता ने माँ से अशोक का परिचय कराया, ‘माँ, ये अशोक है। मेरा स्कूल का सहपाठी और दोस्त। ये ही रोज़ मुझे अपने साथ स्कूल लेकर जाता है।’

     अशोक ने दोनों हाथ जोड़कर उनको अभिवादन करते हुए कहा, ‘नमस्ते आंटी।
‘नमस्ते बेटा!…..जीते रहो| खूब पढ़ो| ख़ूब लम्बी उमर मिलै। खूब तरक्की करो तुम|’ यह कहते हुए उन्होंने स्नेह और वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से अशोक की ओर देखा और बिस्तर से उठकर बैठने की कोशिश की| किन्तु कमजोरी और दर्द के कारण वह उठ नहीं सकी। उठने की कोशिश में उनको बहुत पीड़ा हुई और उनके मुँह से एक कराह निकली। सुनीता ने अपने हाथों का सहारा देकर उनको बैठाया। अशोक करुणा और सहानुभूति से उनको देख रहा था। मां की कमर के पीछे तकिया लगाते हुए सुनीता ने अशोक को बताया, ‘मां को उठने-बैठने में तकलीफ होती है| अपने आप वह उठ-बैठ नहीं पाती हैं। उनको उठाना-बैठाना पड़ता है।’

      ‘जब तुम्हारा भाई और तुम दोनों स्कूल चले जाते हो तब बाद में कौन उठाता-बैठाता है उनको?’ अशोक ने जिज्ञासा व्यक्त करते हुए कहा।

      सुनीता ने उसकी जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया, ’मैं स्कूल जाने से पहले मां के हाथ-मुँह धुलवाकर और उनको नास्ता-पानी देकर जाती हूँ। जब तक हम स्कूल से आते हैं वह बिस्तर पर ही लेटी रहती हैं। स्कूल से आने पर उनको बैठाते हैं।’

      सुनीता के इन शब्दों से अशोक के मन की जिज्ञासा पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। उसके जिज्ञासु मन में दूसरा प्रश्न उभरा, ‘लेकिन टोयलेट जाने की आवश्यकता पड़े तो कैसे जाती होंगी वह?’

      सुनीता ने बताया, ‘सुबह को मैं उनको टायलेट करवाकर जाती हूं। स्कूल से आते ही सबसे पहले उनको टायलेट ले जाती हूं। इस तरह से मैनेज हो जाता है।’

      ‘लेकिन इसमें तो कई घंटे हो जाते हैं। इतनी देर में तो प्यास भी लगती होगी उनको और पेशाब भी आता होगा। हम-तुम लोग भी तो स्कूल में एकाध बार चले ही जाते हैं टायलेट। आंटी कैसे करती होंगी? उनको तो बहुत दिक़्क़त होती होगी?’

      ‘मैं उनको चाय-नास्ता और दवाई देकर जाती हूँ। वैसे तो दवाई के नशे में ही लगभग दोपहर तक वह सोयी रहती हैं। लेकिन फिर भी उनको नींद नहीं आए या पेशाब की दिक़्क़त होती है तो मम्मी को-ओपरेट करती हैं।’

      ‘को-ओपरेट?’ अशोक को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। वह अपना आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला, ‘कैसे को-ओपरेट करती हैं वह?’

     ‘उनको कितना भी ज़ोर से प्रेसर आए, हमारे स्कूल से आने तक वह कंट्रोल किए रहती हैं।’ सुनीता ने स्पष्ट करते हुए कहा।

     ‘लेकिन यह भी तो बहुत सही नहीं है हेल्थ के लिए। ऐसा करने से भी कभी-कभी बीमारियाँ हो जाती हैं।’ अशोक ने स्वास्थ्य के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहा। 

      ‘हाँ, यह बात तो है। लेकिन ऐसा नहीं करें तो करें क्या? और कोई विकल्प भी तो नहीं है।’ सुनीता अपनी विवशता समझाते हुए बोली। उसने आगे बताया, ‘हाँ, एक बात का ध्यान हम ज़रूर रखते हैं कि सुबह के समय मां को बहुत कम पानी पिलाते हैं ताकि मेरे स्कूल से आने तक उनको टायलेट की कोई समस्या नहींहो। और स्कूल से आने पर सबसे पहले मैं उनको टायलेट ही करवाती हूँ।उसके बाद कुछ और करती हूँ।’

      सुनीता के लिए यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। वह सहज रूप से यह सब बता रही थी। लेकिन अशोक को उसकी बातें सुनकर सुखद आश्चर्य हो रहा था। वह सुनीता की ओर देखते हुए बोला, ‘कितना मुश्किल है यह सब। ……. स्कूल जाना, घर का सारा काम करना और मां की देखभाल ….। इतने सारे काम। कैसे कर लेती हो तुम यह सब?’

      ‘करना पड़ता है अशोक। कोई और करने वाला नहीं है ना। …….मजबूरी सब करना सिखा देती है और सब कुछ करने की ताक़त दे देती है।’ यह कहते हुए उसने मां के बिस्तर के पास में रखे लकड़ी के स्टूल को एक कपड़े से साफ़ किया और अशोक को उस पर बैठने का संकेत करते हुए बोली, ‘बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ। फिर तसल्ली से बैठकर बात करेंगे।’

     स्टोव पर चाय का पानी रखने के बाद सुनीता, अशोक के बैठने के लिए जगह बनाने में लग गयी। जब तक चाय का पानी गरम हुआ उसने कपड़े, किताबें आदि ठीक से व्यवस्थित करके अशोक को बैठने के लिए जगह बना दी और चाय के पानी में चीनी डालते हुए अशोक से पूछा, ‘कितनी चीनी लोगे अशोक, हल्की या चखार?।

‘ज़्यादा नहीं, नॉर्मल ही।’
‘ओ के।’

अपने दोनों हाथ बिस्तर पर टिका कर उनके सहारे दीवार से कमर लगाकर बैठने की कोशिश करते हुए सुनीता की मां ने अशोक की ओर देखा और बोली, ‘कैसे हो बेटा? तुम्हारे मम्मी-पापा कैसे हैं

‘अच्छे हैं आंटी।’
‘सुनीता तुम्हारी बहुत तारीफ़ करती है। जिस तरह आजकल का माहौल ख़राब है, उसमें लड़कियों का अकेले घर से निकलना दूभर है। जहाँ देखो वहाँ, गली-मौहल्लों में, चौराहों पर, सब जगह आवारा लड़कों के झुंड दिखायी देते हैं। छुट्टे साँड़ से घूमते ये लुच्चे-लफ़ंगेआती—जाती लड़कियों को गंदी नज़र से देखते हैं और छेड़ते हैं, लड़कियों का जीना हराम किए रहते हैं। लड़की देखने में थोड़ी ठीक-ठाक हो तो और ज़्यादा मुसीबत है। इस माहौल को देखकर मेरा तो मन नहीं करता कि सुनीता घर से बाहर क़दम भी रखे। बिना पढ़े रह ले वो ठीक है, कोई दाग़ लग गया तो जनम ख़राब हो जाएगा। ……बेटा तुम रोज़ स्कूल उसके साथ चले जाते हो और साथ में आ आते हो तो उससे बड़ा सहारा मिलता है, नहीं तो मैं यह सोचकर ही काँप जाती हूँ कि सुनीता को अकेले ही स्कूल जाना पड़े तो कैसे करेगी वह? जब तक यह सही-सलामत घर नहीं लौट आती है, मन में हमेशा डर बना रहता है कि कहीं कुछ ऐसा-वैसा ना हो जाए।’ यह कहते हुए उनके चेहरे पर चिंता की मोटी-मोटी रेखाएँ उभर आयी थीं।

सुनीता की मां ने जो कुछ भी कहा था अशोक उसकी सच्चाई से अच्छी तरह परिचित था। वह स्वयं रोज़ अपनी आँखों से आवारा लड़कों को, लड़कियों को छेड़ते और उन पर भद्दी और अश्लील टिप्पणियाँ करते देखता था। उनकी इन हरकतों का कोई विरोध करे तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। सुनीता के साथ उसे जाते देखकर कई लड़के उस पर भी तरह-तरह की टिप्पणी करते थे। पहले उसे ‘सुनीता का बोडी-गार्ड’ कहकर चिड़ाने की कोशिश की जाती थी। लेकिन वह उनकी बातों पर ध्यान न देकर और बिना उनकी ओर देखे चुपचाप निकल जाता था। उसके हम-उम्र लड़के ‘साले ने क्या पटाखा लड़की पर हाथ मारा है’ कहकर उस पर व्यंग्य करते थे तो बड़ी उम्र के लड़के डराने-धमकाने के अन्दाज़ में बात करते थे। एक दिन शाम को वह किसी काम से कहीं जा रहा था कि गली के कोने पर दो-तीन आवारा क़िस्म के लड़कों ने अकेले में उसको रोक लिया। एक लड़के ने उससे पूछा, ‘क्यों बे, क्या लगती है वो तेरी?’

 उसके कहने के अन्दाज़ से अशोक को यह समझने में देर नहीं लगी कि उसके कहने का आशय क्या है। किंतु, वह अनभिज्ञता प्रकट करता हुआ बोला, ‘कौन? किसकी बात कर रहे हैं आप?’

‘ज़्यादा भोला मत बन। रोज़ जिसके साथ चिपक कर स्कूल जाता है उसकी ही बात कर रहे हैं। अब समझा?’ इस बार दूसरा लड़का बोला था।
‘तो सुनीता की बात कर रहे हो तुम लोग?
‘हाँ, उस की ही बात कर रहे हैं।
‘मेरी कुछ नहीं लगती है वह
‘कुछ नहीं लगती है तो क्यों उसके साथ चिपका फिरता है तू?’

‘हम दोनों एक स्कूल में और एक ही क्लास में पढ़ते हैं और इस कारण स्कूल भी एक साथ चले जाते हैं हम। इसमें चिपकने की कौन सी बात है।’

‘अच्छा, तो यह कोई बात नहीं है?’ उसने लगभग घूरते हुए अशोक की आँखों में अपनी आँखें गड़ाते हुए प्रश्न करते हुए कहा
‘नहीं, मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ भी ग़लत है।’ अशोक ने पूर्ववत उसी सहजता से उसके प्रश्न के जवाब में कहा।

       अशोक की बात को सुना-अनसुना कर तीसरे लड़के ने अपने एक हाथ से उसके मुँह को दबाते हुए धमकी भरे स्वर में कहा, ’ओए, यह सही ग़लत मत सिखा हमें। बस, उस लड़की से दूर रह तू। …..और याद रख वह हमारा माल है। तेरे कारण वह हमारी बात नहीं सुन रही है। पर देखते हैं कब तक नहीं सुनती है। सुननी तो पड़ेगी उसे हमारी बात। राज़ी से सुनेगी तो राज़ी से नहीं तो ग़ैर-राज़ी सुनेगी। तू रास्ते से अलग हट जा, नहीं तो उसके साथ-साथ तेरा भी……., समझ रहा है ना ?……’

       उन लड़कों की बातों के तेवर से अशोक को यह आभास हो गया था कि आने वाला समय सुनीता के लिए बहुत अच्छा नहीं है। उसके साथ कुछ भी हो सकता है। और यदि वह इसी तरह सुनीता के साथ स्कूल जाता रहा तो वह भी चपेट में आए बिना नहीं रहेगा। कई दिन वह इस बात को लेकर परेशान रहा और सोचता रहा कि वह क्या करे और क्या नहीं करे। पहले उसने सोचा ‘ये आवारा लड़के हैं। आए दिन किसी न किसी के साथ मार-पीट करते रहते हैं। यदि मैंने सुनीता के साथ स्कूल जाना नहीं छोड़ा तो ये लोग मेरे साथ भी मार-पीट कर सकते हैं। वे हिंसक और लड़ाके हैं। उनका मुक़ाबला मैं नहीं कर सकता।’ लेकिन सुनीता का ख़याल आया तो वह सोचने लगा ‘इस स्थिति में सुनीता का साथ छोड़ना भी उचित नहीं है। ….. तब क्या करूं?’ इसी उधेड़-बुन में पड़े हुए अंतत: उसे एक उपाय सूझा। अगले दिन मिलते ही उसने सबसे पहले सुनीता को सम्भावित ख़तरे के प्रति आगाह किया, ‘तुम संभल कर रहा करो। स्कूल से आने के बाद भी घर से बाहर अकेले कहीं मत जाया करो।’

       ‘तुम्हारी बात तो ठीक है। स्कूल आते-जाते तो लड़के जो छींटाकशी करते हैं सो करते हैं, स्कूल के बाद किसी काम से घर से बाहर निकलना पड़ जाए तो लोग मुँह से लार टपकाते हुए ऐसे घूर-घूर कर देखते हैं कि वहाँ से गुज़रना मुश्किल पड़ जाता है। अशोक, मैं रोज़ अपने ऊपर उठती बहुत सी नज़रों को देखती हूँ और उन नज़रों की भाषा को भी अच्छी तरह समझती हूँ। इसलिए स्कूल से आने के बाद जब तक बहुत ज़रूरी नहीं हो, मैं अब घर से बाहर नहीं निकलती हूँ। घर का सामान लाने के लिए बाज़ार भी मैं आस-पड़ौस की किसी न किसी आंटी के साथ जाती हूँ और महीने भर का राशन और सब ज़रूरी सामान एक बार ही ले आती हूँ। लेकिन छोटी-मोटी कोई चीज़ लाने के लिए कभी-कभार मौहल्ले की दुकान पर ज़रूर जाना पड़ता है।’

      ‘मेरी बात मानो तो मौहल्ले की दुकान पर भी तुम अकेले मत जाओ अब। ……… तुम्हारा भाई भी इतना बड़ा तो है कि वह दुकान से सामान ला सके।’ 

        ‘हाँ, है तो।’ 

       ‘तो फिर अपने भाई से मँगवा लिया करो, यदि मौहल्ले की दुकान से कोई सामान मंगवाने की ज़रूरत पद जाए तो। इससे वह भी कुछ समझदार और ज़िम्मेदार बनेगा, तुम्हारे काम में कुछ हाथ बँटेगा और इस तरह की समस्या से भी बचोगी।’ अशोक ने सुझाव दिया।

       सुनीता को अशोक का सुझाव सही लगा। उसने सहमति में सिर हिलते हुए कहा, ‘हाँ, यह सही है। तुमने बहुत अच्छा सुझाव दिया है। अब से ऐसा ही करुंगी।’

      उस दिन के बाद से सुनीता ने स्कूल से आने के बाद घर से बाहर निकलना बिलकुल बंद कर दिया था। लेकिन समस्या ख़त्म नहीं हुई थी। पुरुष वातावरण में चारों ओर फैली सुनीता के सुंदर कुँवारे शरीर की मादक गंध लड़कों को आकृष्ट कर रही थी। उस गंध में मदहोश लड़कों ने अब सुनीता के घर के बाहर जमघट लगाना शुरू कर दिया था और इस बात के इंतज़ार में कि कभी तो सुनीता अपने घर से बाहर निकलेगी तभी उससे अपने मन की बात कहेंगे, सारा दिन वहीं पर पड़े रहते थे। मौहल्ले के लोग यह बात अच्छी तरह समझ रहे थे कि लड़कों की भीड़ सुनीता के घर के बाहर ही क्यों रहती है। आस-पड़ौस के एक-दो बड़े बुज़ुर्ग ने उन लड़कों को टोका भी कि ‘यहाँ क्यों जमघट लगाए हुए हो तुम लोग। चलो, यहाँ से हटो और अपने घर जाओ।’ लेकिन लड़कों पर उनकी बात का कोई असर नहीं पड़ा। दो-चार मिनट के लिए वे वहाँ से तितर-बितर हुए और बुज़ुर्ग के वहाँ से हटते ही फिर से जमावड़े में बदल गए।

      व्यक्ति अपने आप में कितना ही सही हो, कमी निकालने वाले कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं। सारा मौहल्ला जानता था कि सुनीता एक सौम्य, शालीन और अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। कभी किसी से कोई फ़ालतू बात करते किसी ने उसे नहीं देखा था और न ही उसके बारे में ऐसा कुछ सुना था। सारा मौहल्ला इस बात के लिए उसकी प्रशंसा करता था कि पिता की असमय मौत के बाद इतनी कम उम्र में किस तरह से परिवार का भार अपने ऊपर लेकर पूरी ज़िम्मेदारी से वह सब कुछ कर रही थी। सारे मौहल्ले के लिए वह एक मिसाल थी। बहुत से लोग उसके प्रति सहानुभूति रखते थे। लेकिन उसके घर के बाहर लड़कों के जमघट और हौ-हल्ले को देखकर मौहल्ले की कुछ औरतें उसके बारे में तरह-तरह की बातें बनाने लगी थीं।

एक दिन आपस में चर्चा करते हुए मीरा नाम की एक औरत कह रही थी, ‘राधा बहन, सुभद्रा बहन, मुझे तो ये लड़की ही कुछ तेज़ लगती है, तभी उसके घर के बाहर सारे मौहल्ले के लड़के जमघट लगाए रहते हैं। नहीं तो मौहल्ले में और भी लड़कियां हैं, किसी और के घर के बाहर तो कोई जमघट नहीं लगता इस तरह का।’

राधा उसके साथ सहमति व्यक्त करते हुए बोली, ‘हाँ, मीरा बहन, देखने में बड़ी सीधी लगती है, पर सीधी नहीं घुन्नी है, पूरी घुन्नी। घुन्ने लोगों का कोई भेद नहीं मिलता है।’

     सुभद्रा ने मीरा और राधा की बात में तड़का लगाते हुए कहा, ‘सुंदर भी तो कितनी ज़्यादा है। लड़के तो सुंदर लड़कियों के दीवाने होते ही हैं। अब लड़के इतनी सुंदर लड़की पर ना मरें तो किस पर मरें।’

      सुनीता की सुंदरता के बारे में सुभद्रा की टिप्पणी का समर्थन करते हुए मीरा बोली, ‘भई उसकी सुंदरता तो ग़रूर करने लायक है। कोई भी इतनी सुंदर लड़की अपनी सुंदरता पर ग़रूर करेगी ही। सुनीता भी अपनी सुंदरता पर ग़रूर करती है, तभी तो मौहल्ले में कभी किसी से कोई बात नहीं करती है। जहाँ गुड होगा मक्खी वहीं तो आकर बैठेंगी। वह भी लड़कों को लुभा रही है, तभी तो इतने सारे लड़के उसके आगे-पीछे नाच रहे हैं।’

      राधा, जिसका घर सुनीता के घर के बिलकुल पास में ही था, उसने अपनी राय देते हुए कहा, ‘मुझे तो ऐसा लगे है कि इस लड़की ने धंधा शुरू कर दिया है। तभी उसके घर के बाहर इतनी भीड़ लगी रहती है लड़कों की। थोड़ी-थोड़ी देर में उसके घर का दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ तो हमारे घर तक भी सुनायी देती है। ग्राहक ही खटखटाते होंगे दरवाज़ा, नहीं तो और कौन खटखटाएगा। इससे पहले तो कभी उसके घर से दरवाज़ा खुलने या खटखटाने की आवाज़ नहीं आती थी।’

      सुभद्रा ने फिर से अन्य औरतों की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘सही कह रही हो बहन तुम। सुना है हमारे मौहल्ले के ही नहीं, दूसरे मौहल्ले के लड़के भी यहाँ के चक्कर काटने लगे हैं अब। हमारे मौहल्ले के लड़कों के साथ उनकी मार-पिटायी भी हुई है।’

      मीरा ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘ऐं, ये कब की बात है? मौहल्ले में इतना सब हो गया और हमें कुछ पता ही नहीं है।’

     राधा ने उसके आश्चर्य को शांत करते हुए बताया, ‘अभी दो दिन पहले की बात है। कई लड़कों के हाथ-पैर टूटे हैं और सिर भी फूटे हैं। पट्टी बंधी हुई हैं कईयों के हाथ, पैर और सिरों में।’

     मीरा आश्चर्य से माथे पार हाथ मारते हुए बोली, ’हाय रे, गाँठ सी लड़की और इतना ज़ुल्म ढा रही है। ये लड़की है या जीती-जागती आफ़त। अभी से मार-काट मचवा रखी है इसने। आगे पता नहीं और क्या-क्या करवाएगी ये। इसके इतनी ही आग लग रही है तो किसी कोठे पर चली जावे कहीं, यहाँ मौहल्ले में क्यों गंद मचा रही है।’

      राधा ने उसकी बात में मिर्च-मसाला लगाते हुए कहा, ’अरे, उसे किसी कोठे पर जाने की क्या ज़रूरत है। उसने तो घर को ही कोठा बना रखा है। और सबसे बड़ा ज़ुलम तो ये है कि उसकी मां को भी कुछ दिखायी नहीं देता। लड़की को ना सही कम से कम उसकी मां को तो अपनी इज़्ज़त-आबरू का ख़याल रखना चाहिए कुछ। वह भी अंधी बनी हुई है।’ 

     ‘उसकी मां तो बीमार है बेचारी। बिस्तर पर अपाहिज पड़ी रहती है। और ज़्यादातर समय दवाइयों के नशे में पड़ी रहती है। वो क्या कर लेगी यदि बेटी कुछ भी ऐसा-वैसा करे तो। कमरे में पर्दा डालकर दो भागों में बाँट रखा है। लड़की घर में किसी को बुलाएगी और कोई आएगा भी तो परदे के दूसरी ओर रखेगी उसे।’ सुभद्रा ने अपनी ओर से स्थिति की व्याख्या करते हुए राधा की बात का समर्थन किया।

      उन औरतों के बीच एक बुज़ुर्ग महिला भी थी। सुनीता के बारे में उन औरतों की इस तरह की बातें सुनना उनको अच्छा नहीं लगा। वह इन औरतों को सुनीता के बारे में नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना छोड़ सकारात्मक होने की नसीहत देते हुए बोली, ’अरे नहीं, ऐसी बात मत करो। इन बातों की गुंजाइश नहीं है। उसका भाई भी तो है। वह भी तो घर के अंदर ही रहता है। उसके रहते कैसे किसी को घर के अंदर बुलाकर कुछ कर सकती है वो।’ 

      मीरा ने बुज़ुर्ग महिला का प्रतिवाद करते हुए कहा, ’अरे काकी, उसका भाई तो अभी बच्चा है। खेलने-कूदने चला जाता है वह तो दूसरे बच्चों के साथ। उसके बाद वह किसी को भी घर में बुलाए, कुछ भी करे, कौन रोकने-टोकने वाला है।’

      मीरा की बात को पानी देते हुए राधा बोली, ’अरी बहन, वह जो करे सो करे, अपने बच्चों को दूर रखो ऐसी लड़की से। मेरी चन्दा कभी-कभी उसके पास चली जाती थी, पर जब से उसके बारे में यह सब सुना है, मैंने तो साफ़ मना कर दिया है उसे सुनीता से मिलने को।’

      सुभद्रा ने भी राधा के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा, ‘सही कहती हो बहन। मैं भी अपने बच्चों से कहूँगी कि वे सुनीता से नहीं मिलें, और ना उससे कोई बात करें।’ 

     औरतों की इस चर्चा ने सुनीता को एक बदचलन लड़की के रूप में मंडित कर दिया था। कुछ ही दिन में उन औरतों की यह आपसी चर्चा उनके मुँह से निकलकर सारे मौहल्ले की दूसरी औरतों में, और उनके माध्यम से पुरुषों में भी फैल गयी कि सुनीता एक आवारा लड़की है और इसीलिए मौहल्ले के लड़के उसके घर के बाहर जमावड़ा लगाए रहते हैं। सुनीता के बारे में इस दुष्प्रचार के बाद उससे सहानुभूति रखने वाले बहुत से लोगों का दृष्टिकोण भी उसके प्रति बदल गया था और अब उन्होंने यह कहते हुए उन लड़कों को टोकना बंद कर दिया था कि ‘जब सिक्का ही खोटा है तो परखने वालों का क्या दोष।’ बल्कि बहुत से घर-गृहस्थी वाले और अधेड़ लोग भी मुँह से लार टपकाते हुए, लोगों से नज़रें बचाकर अंधेरे-उजाले सुनीता के घर के सामने से गुज़रने लगे थे। कभी-कभी थोड़ी-बहुत देर वहाँ बैठ भी जाते थे। इससे लड़कों का उत्साह और बढ़ गया था और कभी-कभी कोई लड़का किसी न किसी बहाने से सुनीता के घर का दरवाज़ा खटखटा देता था। दिन में रास्ता चलता था और कोई न कोई वहाँ से निकलता रहता था। लेकिन साँझ ढलने के बाद गली से लोगों का आना-जाना कम हो जाता था, इसलिए इस तरह की हरकतें शाम के समय ही होती थीं। शुरू में एक-दो बार सुनीता ने दरवाज़ा खोला, लेकिन लड़कों की शरारत को समझकर बाद में सुनीता ने दरवाज़ा खोलना बंद कर दिया था। और कहीं सच में ही कोई आया न हो, यह देखने के लिए सुनीता के बजाए उसका छोटा भाई दरवाज़ा खोलने लगा था।

वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम का दलित साहित्य में खासकर महत्वपूर्ण अवदान है. उनके कई उपन्यास एवं कविता-संग्रह प्रकाशित हैं.
क्रमशः