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पोर्न के आइने में सामाजिक-सांस्कृतिक चेहरा: क़िस्त एक

डॉ. अनुपमा गुप्ता व डॉ. मनोज चतुर्वेदी

[चेतावनी : इस अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं का विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह है कि इस लेख को अपने परिवार के अव्यस्क सदस्यों के हाथों में न पड़ने दें। हम सब यह जानते हैं कि समाज की कुछ सच्चाईयाँ कितनी ही कड़वी क्यों न हों, उन्हें छुपाये रखने से तो निश्चित ही उन्हें कभी बदला नहीं जा सकेगा। उनकी कड़वाहट को सबके सामने ले आने से, इन समस्याओं पर गंभीर चर्चा प्रारम्भ हो सकती है, तथा इससे ही उनके स्वस्थ समाधान की ओर बढ़ने की राह निकलेगी, इसी यकीन और उम्मीद पर हम यह शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे हैं।]

भारतीय सोशल मीडिया पर पोर्न (पोर्नोग्राफी का संक्षिप्त रूप) का प्रसारण व साझाकरण सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए आज एक नये खतरे की तरह देखा जा रहा है। चेतावनी में सच कितना है इसकी पड़ताल के लिए हमारी पहल का परिणाम इस शोध पत्रा के रूप में प्रस्तुत है, जिसमें हमने देश के सभी उम्र और वर्गों में एक अत्यंत लोकप्रिय सोशल मीडिया ‘व्हाट्सएप’ पर धड़ल्ले से साझा की जा रही पोर्न सामग्री के एक लघु विश्लेषण का प्रयास किया। यह एक स्टिंग ऑपरेशन था, क्योंकि लेखक द्वय के अतिरिक्त अध्ययन समूह के मात्रा एक सदस्य को ही इसकी जानकारी थी।

उद्देश्य (Aims and objectives)

इस शोध का उद्देश्य यह जानना था कि भारतीय मध्य सामाजिक वर्ग में, जिसकी पिछली पीढ़ियों में पोर्न सामग्री को छुप कर व्यक्तिगत तौर पर ही देखा/पढ़ा जाता रहा है, अब उस वर्ग में भी सोशल मीडिया पर पोर्न सामग्री को बांटने के नये रुझान क्या कुछ नयी स्वास्थ्य, सामाजिक और जेण्डर समस्याएँ पैदा कर रहे हैं। इस सवाल से उठे मुद्दों का विश्लेषण करने के लिए निम्न लक्ष्य तय किये गये।

  1. समाज के शिक्षित, सफल, यौन-संतुष्ट माने जाने वाले वर्गों में पोर्न की लोकप्रियता आज के दौर में किस स्तर तक है, तथा यह पोर्न किस प्रकार का है?
  2. हाल के वर्षों में इसके इस तरह साझे मंचों पर अबाध प्रदर्शन तथा साझाकरण की नई प्रक्रिया के मूल में कौन से कारक सक्रिय हो सकते हैं।
  3. यौनिकता के ‘अमान्य’ माने जाने वाले स्वरूप, यानी पोर्न पर इस तरह की सार्वजनिक चर्चा से क्या पुरुषों की रतिक्रिया सम्बम्धी अपेक्षाएं-आकांक्षाएं, अपनी पत्नियों व अन्य स्त्रियों से उनका सामाजिक व्यवहार, उनका अपना स्वास्थ्य और नैतिक मूल्य नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं?
  4. यदि हाँ, तो ये प्रभाव कितने और किस प्रकार के हो सकते हैं?
  5. इस प्रक्रिया से स्त्री की सामाजिक स्वतंत्रता, यौन-छवि और स्वास्थ्य को क्या कोई हानि हो सकती है? 

इस विषय पर पूववर्ती शोध-पत्र (Literature search)

जहाँ तक हमारी जानकारी है, यह शोध भारत में अपने प्रकार का सर्वप्रथम प्रयास है। इंटरनेट पर इस विषय पर प्रामाणिक भारतीय अध्ययनों को ढूंढने की हमारी कोशिश असफल रही। हालांकि युवाओं पर सोशल मीडिया के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों पर कुछ अध्ययन जरूर हुए हैं, किन्तु पोर्न के सोशल मीडिया पर प्रवेश और प्रसार विषय पर कोई अध्ययन नहीं मिल सका। कुछ लोकप्रिय सामाजिक पत्रिकाएँ आजकल अपने सेक्स विशेषांक निकालती हैं लेकिन उनमें शोध अध्ययनों की गंभीरता नहीं होती और पोर्न पर कुछ विशेष कहा नहीं जाता। हालांकि पश्चिमी देशों में इस विषय पर हुए कई एक अध्ययन हमें मिले, मगर हमारे देश की यौन-संस्कृति के लिए वे बहुत कुछ अप्रासंगिक ही होते; साथ ही व्हाट्सएप माध्यम पर साझा पोर्न को लेकर किए गए हमारे इस विशेष अध्ययन की तरह का कोई प्रपत्रा हमें इंटरनेट पर उपलब्ध पश्चिमी शोधसाहित्य में भी नहीं मिला। व्यक्तिगत स्तर पर पोर्न देखने को ले कर हुए शोधों के विस्तार में जाने का हमने प्रयास नहीं किया।

फिर भी पोर्न के बारे में सामान्य जानकारी के लिए हमने कुछ वेबसाइट्स की मदद ली। परिभाषा के अनुसार पोर्नोग्राफी यौनक्रिया से सम्बंधित किसी वस्तु या क्रिया का व्यवसायिक चित्रण है जो किताबों, पत्रिकाओं, तसवीरों, एनीमेशन, आवाजों की रिकॉर्डिंग, फोन कॉल, फिल्मों या वीडियो गेम्स के रूप में कामोत्तेजना पैदा करने के लिए परोसा जाता है। इसमें आंखों द्वारा साक्षात देखी गई यौन गतिविधियाँ शामिल नहीं हैं। पोर्न और कामशास्त्र (pornography Vs Erotica/positive porn) में अंतर यह माना जाता है कि कामशास्त्र में रतिक्रिया को एक कला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसमें अनुभवों और भावनाओं का भी पर्याप्त स्थान होता है; जबकि पोर्न का उद्देश्य सिर्फ़ सनसनीखेज शारीरिक क्रियाओं या दृश्यों द्वारा कामोत्तेजना पैदा करना होता है। इसी संदर्भ में सॉफ्ट पोर्न वह है जिसमें यौनक्रिया की तरफ इशारा भर हो जबकि हार्ड पोर्न में वास्तविक यौनक्रिया दर्शायी जाती है।1 यदि भारत की बात करें तो हमारे देश के कानून में पोर्न देखने की अनुमति तो है लेकिन इसका किसी भी रूप में उत्पादन, प्रकाशन अथवा प्रसारण गैरकानूनी है। हालांकि इस कानून को कभी दृढ़ता से लागू नहीं किया गया। वर्ष 2015 में एक बार सरकार ने 857 पोर्न वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया था मगर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों के व्यवसाय में इससे हो रहे बड़े आर्थिक नुकसान को देखते हुए यह प्रतिबंध पांच दिन बाद ही हटा लिया गया और अब यह प्रतिबंध सिर्फ़ चाइल्ड पोर्न पर है।2

जर्नल ऑफ सेक्सुअल मेडीसिन में प्रकाशित एक शोध3 के अनुसार पोर्न देखने वाले लोग तीन तरह के हो सकते हैं–

  • रीक्रियेशनल (Recreational) : वे जो सिर्फ मनोरंजन व कामेच्छा में बढ़ोत्तरी के लिए पोर्न देखते हैं। ये लोग पोर्न देखने वाले लोगों की कुल संख्या का 75% हैं और हफ्ते में करीब 24 मिनट के लिए पोर्न से रूबरू होते हैं। तीनों में से सिर्फ़ इसी समूह के लोग मनोचिकित्सकों द्वारा सामान्य माने गये हैं। निम्न अन्य दो समूहों का पोर्न देखने का तरीक़ा मनोविकार की श्रेणी में आता है।
  • डिस्ट्रेस्ड (Distressed) : वे लोग जो किसी तरह के यौन अवसाद से पीड़ित हैं। ये संख्या में सबसे कम हैं।
  • कम्पल्सिव (Compulsive) : वे जिन्हें इसका व्यसन जैसा हो गया है। ये हैं तो मात्र 11-12 % लोग, मगर हफ्ते में अपने लगभग 110 मिनट पोर्न को दे रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनकी कामेच्छायें अतृप्त हैं और ये उनकी प्राथमिकताओं में आती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इनमें से कुछ लोगों के लिए पोर्न देखना शराब या नशीली दवाओं की तरह का वास्तविक व्यसन बन सकता है।

अमेरिका की एक मनोवैज्ञानिक एना ब्रिजेज द्वारा किये गये कुछ और अध्ययनों के परिणामों में पुरुषों के पोर्न गतिविधियों में अत्यधिक लिप्त होने की वजह से वास्तविक कामेच्छा में कमी, यौन-साथी के साथ प्रेम की अंतरंगता में कमी व हिंसक व्यवहार भी परिलक्षित किये गये हैं।4

शोध की रूपरेखा, अध्ययन समूह का चयन एवं पद्धति (Material and Methods) :

हमारे अध्ययन के अत्यंत व्यक्तिपरक (Subjective) रूप को देखते हुए हमने शोध की गुणात्मक पद्धति (qualitative research design) को चुना जिसमें सचेत प्रेक्षण तथा साक्षात्कार (critical observation and interview)  विधियों का उपयोग किया गया।

शोध के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सबसे पहले हमारा यह सुनिश्चित करना जरूरी था कि यह सामग्री सीधे पोर्न वेबसाइट्स से हम तक नहीं पहुंची, और न ही इसे लोगों द्वारा निष्क्रिय रूप से केवल देखा भर जा रहा है, बल्कि यह व्हाट्सएप पर आपस में व्यापक रूप से साझा की जा रही सामग्री में से है और इस पर सदस्यों द्वारा लम्बी चर्चायें, रायशुमारी व लाइक्स जारी हैं।

हम ऐसे मानव समूह को खोज रहे थे जिसके ‘सुसंस्कृत-सामाजिक व यौन-संतुष्ट’ होने की संभावना अधिक से अधिक, और इसीलिए पोर्न गतिविधियों में शामिल होने की संभावना कम से कम हो। इस खोज के पीछे हमारी परिकल्पना यह थी कि अन्य पुरुष समूहों में तो ये गतिविधियाँ ज्यादा ही होने की संभावना है, इसलिए हमारा यह अध्ययन समूह इस पैमाने पर ‘सबसे कम गतिविधि’ (standard for minimum porn activity on social media)  का मानक बनाया जा सकता है और फिर बाक़ी समूहों पर भविष्य में होने वाले अन्य अध्ययनों के परिणामों की तुलना इससे की जा सकेगी। इसके लिए हमने जून 2018 में दस दिनों के लिए एक ऐसे व्हाट्सएप ग्रुप में सेंध लगाई जो सफल पारिवारिक जीवन जी रहे, मध्य वय (45 वर्ष से अधिक उम्र), उच्च मध्य वर्ग के प्रतिभाशाली, ग्रेजुएट/पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षित व एक अति प्रतिष्ठित सफेद कॉलर व्यवसाय से जुड़े पुरुषों का था, और जहाँ पोर्न नियमित रूप से परोसा और सराहा जाता है। देश के हिन्दीभाषी प्रदेशों के प्रतिनिधित्व वाला, पांच साल पहले (वर्ष 2013 में) बनाया गया यह ग्रुप कॉलेज जीवन में एक साथ पढ़े ऐसे पुरुषों का है जिनमें आपस में इतनी अंतरंगता है कि वे, अपनी प्रतिष्ठित सामाजिक छवि वाले जीवन में पूर्ण वर्जित, पोर्न जैसे विषय को आपस में खुल कर साझा कर सकें। यहाँ स्त्रियों की सदस्यता पूर्ण रूप से वर्जित है। वर्तमान में इस ग्रुप में कुल 16 सदस्य हैं (जिन्होंने अपनी पुरानी कक्षा के कुल 56 साथियों में से स्वयं को एक खास दल की तरह चुना है) और इनमें से 9-10 सदस्य ग्रुप में चल रही चर्चाओं में नियमित व सक्रिय भाग ले रहे हैं। यहाँ एक दिन में करीब 10 से 100 तक पोर्न सामग्री की पोस्ट्स साझा की जाती हैं।

अवलोकन के लिए हमारे द्वारा चुने गये दस दिन क्रमिक नहीं, बल्कि अक्रमिक तरीक़े से चुने गये (randomly selected) जून माह के कोई भी दस दिन थे, ताकि एक ही विषय पर 1-2 दिन चलती चर्चा से बचा जा सके और जहाँ तक हो अधिकांश तरह की सामग्री के सेम्पल इकट्ठा हो सकें। इस अवलोकन के दौरान लेखक द्वय इस ग्रुप के सदस्यों से नितांत अपरिचित बने रहे और उन्होंने मात्रा प्रेक्षक की भूमिका निभाते हुए चर्चा को किसी खास दिशा में मोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया। हमने साझा की जा रही सामग्री की सामान्य विषयवस्तु को और उस पर सदस्यों की प्रतिक्रियाओं को दर्ज किया, साथ ही सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएँ मिलने वाली पोस्ट्स पर विशेष रूप से ध्यान दिया। शुरुआती आठ दिनों तक साझा की गई पोर्न सामग्री के अवलोकन के पश्चात उपलब्ध आंकड़ों व रुझानों का एक बार मोटे तौर पर प्रारंभिक विश्लेषण किया गया जिससे कुछ समान व बार-बार उभरने वाली अवधारणाएँ (common themes) नज़र आने लगीं। इसके बाद, इन अवधारणाओं के आधार पर हमने कुछ प्रश्न तैयार किये और फिर ग्रुप के एक प्रतिनिधि, सक्रिय सदस्य का टेलीफोनिक साक्षात्कार लिया गया। इस साक्षात्कार में हम उन तीन खास चुनी गई पोस्ट्स पर सदस्यों की प्रतिक्रियाओं के विस्तार में भी गये जो, इन आठ दिनों में हमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लगीं।

अवलोकनों तथा साक्षात्कार के विश्लेषण से उभरी अवधारणाओं की पुनःपुष्टि अगले दो दिनों में की गई।

अवलोकन के परिणाम (Results) :

अवलोकन की दस दिनों की अवधि के दौरान हमारे अध्ययन के माध्यम रहे व्हाट्सएप ग्रुप में पोर्न का जो स्वरूप हमें नज़र आया, उसमें शौकिया (amateur) तौर पर बनाई गई और व्यवसायिक पोर्न (reality porn) दोनों प्रकार की तथा सॉफ्ट व हार्ड पोर्न सभी तरह की सामग्री शामिल थी। ग्रुप के अतिसक्रिय सदस्य पोर्न देखने वाले लोगों की कम्पल्सिव (Compulsive) श्रेणी में पाये गये3

सर्वाधिक चर्चित व पसंद की गई कुल 16 (I से XVI) सामग्रियों का विवरण (content analysis) तालिका 1 में प्रस्तुत किया गया है। इन सभी सामग्रियों को हमारे द्वारा चुनने का आधार यह था कि इनमें से हरेक में पांच से अधिक लोगों ने रुचि ली। तालिका 1 में वे अवधारणाएँ भी प्रस्तुत की गई हैं जो हमारे अवलोकन का परिणाम हैं और जिनके आधार पर आगे के साक्षात्कार के प्रश्न तय किये गये।

टेलीफोनिक साक्षात्कार में अध्ययन ग्रुप के प्रतिनिधि से पूर्वनिर्धारित निम्नलिखित पहले दस प्रश्न ही पूछे जाने थे। किन्तु साक्षात्कार के दौरान चर्चा की दिशा में बदलाव आने से 11वें और 12वें प्रश्न पूछने की स्थिति बनी।

1.            सोशल मीडिया पर इस तरह की गतिविधियों में शामिल होने के लिए पुरुष प्रेरित क्यों होते हैं? इसमें आपके लिए सकारात्मक चीज क्या है?

उत्तर : यूँ ही मज़े के लिए। कोई खास औचित्य हो ऐसा नहीं है। कहा जाता है न, कि राजनीति लोगों को बांटती है मगर पोर्न जोड़ता है।

2.            क्या पोर्न का साझाकरण सभी उम्र और वर्गों के पुरुषों में इतना ही लोकप्रिय है जितना आप लोगों में?

उत्तर : हाँ, ये यूनिवर्सल है, मगर केवल इस तरह के निजी ग्रुपों में ही।

3.            व्हाट्सएप के आने के पहले क्या आप लोग ऐसे ही किसी प्लेटफार्म पर पोर्न को साझा कर सकते थे?

उत्तर : नहीं, पहले ये नामुमकिन था। हाँ, दो लोगों के बीच निजी बातचीत में एस एम एस जरूर भेजे जा सकते थे।

4.            क्या इस तरह पोर्न को साझा करने और उस पर चर्चा करने से आपके ग्रुप का कोई पुरुष इतना निर्भीक बन सकता है कि अपने आस-पास की स्त्रियों का काम-आह्नान कर सकें?

उत्तर : नहीं, किसी पुरुष के व्यक्तित्व या उसकी दबंगई पर इन सब का कोई असर नहीं पड़ता। न ही कुंठा नाम की कोई चीज इससे हो सकती है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में निश्चित ही इसका कोई महत्व नहीं है। जैसा कि मैंने कहा, ये सिर्फ मस्ती के लिए है।

5.            यदि स्त्रियाँ भी इसी तरह सार्वजनिक पोर्न साझा करने या उस पर चर्चाओं में शामिल हों तो क्या आप ज्यादा खुलापन महसूस करेंगे?

उत्तर : नहीं, कोई भी पुरुष ये नहीं चाहेगा कि स्त्रियाँ भी इन प्लेटफार्म्स पर उनके साथ रहें।

                यदि हमें शामिल न करके स्त्रियाँ स्वयं आपस में ऐसी बातें करें तो ठीक है। कम से कम मुझे तो उनके इस तरह की बातें करने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी पत्नी तो एक ऐसे ही स्त्रियों वाले ग्रुप में है भी; हालांकि वहाँ सॉफ्ट पोर्न ही साझा होता है।

6.            सदस्यों की कभी-कभी की कुछ ज्यादा ही उद्दंड टिप्पणियों के पीछे क्या दोस्तों के साथ दिखने का दवाब (peer pressure) भी काम कर रहा होता है?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

7.            एक बच्चे और उसकी टीचर के बीच स्नेह की अभिव्यक्ति आपको कामोत्तेजक क्यों लगती है?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

8.            कियारा अडानी द्वारा की गई बहू की भूमिका वाली फिल्म में क्या आपको एक यौन असंतुष्ट पत्नी और इस सच्चाई से अनभिज्ञ एक पति दिखाई देता है?

उत्तर : क्या सच में ऐसा है? हमने वीडियो को इतने ध्यान से नहीं देखा। असंतुष्ट पत्नी का मतलब आखिर होता क्या है?

               कामतृप्ति/चरमसुख तो वीर्य स्खलन की तरह ही आसानी से होने वाली चीज है। हमें इसका अनुभव 12-13 साल की उम्र से ही होने लगता है। मुझे मालूम है कि औरतों को भी आसानी से ही ऐसा होता है। मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि मैं ये हर बार कर सकता हूँ। यदि हम अपनी पार्टनर को कामतृप्ति का अनुभव न करा पाये तो हमारी (मर्दानगी) व्यर्थ है।

9.            क्या लैला-मजनूं वाली वह कविता आपको वीभत्स नहीं लगी?

उत्तर : कोई जवाब नहीं दिया गया।

10.          क्या आपको लगता है कि आपमें से किसी ने विवाहेतर सम्बंधों का अनुभव लिया है? या फिर, पोर्न देखने, साझा करने और इसका मज़ा लेने की यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ़ एक मौखिक व्यायाम व नैनसुख मात्रा है?

उत्तर : हममें से करीब सभी के विवाहेतर सम्बन्ध चल रहे हैं। हम ये सोचने में वक्त बिल्कुल बरबाद नहीं करते कि इसमें क्या सही है और क्या ग़लत। यहाँ सिर्फ बेल्ट के नीचे वाले अंग काम कर रहे होते हैं।

11.          ये स्त्रियाँ कौन होती हैं जिनसे आपके स्तर के पुरुष ऐसे सम्बंध बना सकते हैं–पहचाने हुए आसपास के परिवारों की स्त्रियाँ, कॉलेज की लड़कियाँ या आपके मातहत काम करने वाली कर्मचारी।

उत्तर : नहीं, ये अक्सर अधिकारियों या निजी व्यवसायियों की ऊबी हुई पत्नियाँ होती हैं।

12.          एक आखिरी सवाल–क्या आप लोग अपनी पत्नियों को भी इन अधिकारियों या निजी व्यवसायियों की पत्नियों की राह पर जाने की अनुमति देंगे, यदि वे भी अपनी यौन जरूरतों को आपको न बता पा रही हों; ठीक वैसे ही, जैसे आप उन्हें अपनी जरूरतें नहीं समझा पाते?

उत्तर : सच कहूँ तो इस बारे में अपने मन में मैं बिल्कुल निश्चित हूँ कि यह उसकी ज़िंदगी है और उसे पूरा अधिकार है कि अपनी प्राथमिकताएँ खुद तय कर सके। शर्त बस इतनी है कि इसके बारे में मुझे नहीं बताया जाना चाहिए क्योंकि मैं खुद भी सचाई बताने का ये अत्याचार उस पर नहीं कर रहा हूँ। क्या ग़लत है, क्या सही ये तो सिर्फ़ सामाजिक अभिव्यक्तियाँ हैं; जब तक कोई इंसान अपने मन में स्वयं को चैन से जीता हुआ पा रहा है, तब तक हर चीज सही है।

विवेचन (Discussion) :

इस अध्ययन में समाज के शिक्षित, सफल, यौन-संतुष्ट माने जाने वाले वर्गों में आज के दौर में लोकप्रिय पोर्न की और उसके लिए जुनून की जो झलक हम देख सके वह बहुत कुछ चिंतित करने वाली है।

इस शोध में अध्ययन समूह के सदस्यों की पसंद और प्रतिक्रियाओं से निम्नलिखित अवधारणाएँ सामने आईं जिनमें से पहले समूह को दरअसल नकारात्मक नहीं माना जा सकता क्योंकि वे चिकित्सीय दृष्टि में सामान्य प्राकृतिक यौन उद्दीपनों को ही दर्शाती हैं। किन्तु दूसरे समूह यानी नकारात्मक पहलुओं में रखी गई अवधारणाएँ पोर्न संसार की समाज-निरपेक्ष-यौनिकता में भले ही स्वीकार ली जाएँ, परन्तु हमारे सामाजिक स्वास्थ्य के लिए उन्हें निश्चित ही नकारात्मक कहा जायेगा :

प्राकृतिक उद्दीपन : नग्नदेह के प्रति आकर्षण (सीमा में); अनन्वेशित प्रतीत होती स्त्रा देह का अदमनीय आकर्षण; स्त्रा से समर्पण की चाह; युवा लड़कियों की देहयष्टि निहारने का नैनसुख; असामान्य जगहों या समयों पर रतिक्रिया के प्रति आकर्षण।

नकारात्मक पहलू : सामान्य सामाजिक व्यवहारों का उपहास; सस्ते व द्विअर्थी प्रहसन; कामेच्छा व यौनतृप्ति का पुरुषजीवन में बहुत अहम माना जाना; यौनक्रिया को जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप पर आरोपित करना; पुरुषों के कामोत्तेजन के लिए स्त्रा के दर्द झेलने या अस्वास्थ्यकर तरीके अपनाने का और यहाँ तक कि किसी भी स्तर की हिंसा का सहज स्वीकार; अश्लील भाषा को बढ़ावा; यौन सम्बन्धों में विवाहित स्त्रियों को तजरीह देना; बच्चों या वृद्धों को स्त्रा देह के पास देख कर ईर्ष्याभाव; स्त्रा-पुरुषों के लिए यौन व्यवहारों के दोहरे मापदंड रखना; किसी भी स्त्रा को जबरन या धोखे से स्पर्श करने की कामना; एक लम्बे यौन अनुभव के बावजूद भी स्त्रा की असल यौन प्रकृति के बारे में बड़ी नासमझी व स्त्रियों की यौन असंतुष्टि के बारे में अज्ञान; जीवन के प्रति स्त्रियों के पुरुषों से अलग नज़रिये का और उनके पारिवरिक-सामाजिक बोध का उपहास; उन्हें एक सामान्य बुद्धि वाला मानव न मान कर उनसे सिर्फ यौन संतुष्टि पाने की अपेक्षा रखना; प्रत्येक स्त्रा में यौन साथी को ढूंढना; वैवाहिक सम्बन्धों में झूठ की अनिवार्य उपस्थिति की स्वीकार्यता; तीसरे लिंग के व्यक्तियों को निकृष्ट मानना; अनुमति लिए बिना स्त्रियों की तस्वीरें साझा करना; यौन अपराधों का संज्ञान तक न लेना; नैतिक जिम्मेदारी और भावनाओं से पल्ला झाड़ने वाला रवैया।

साक्षात्कार में सामने आये मनोभाव : सोशल मीडिया पर पोर्न के सार्वजनिक साझाकरण को यदि हम साक्षात्कार में व्यक्त किये गये विचारों से जोड़ें तो एक दूसरे कोण की भी संभावना दिखाई देती हैµक्या यह संभव है कि यह खास पुरुष समूह अपनी प्रकृति में ही उग्र कामेच्छा रखता हो और पोर्न का साझाकरण इस कामेच्छा के उग्र होने का कारण नहीं, बल्कि परिणाम हो? पोर्न देखने या उस पर चर्चा की वजह से उनके व्यवहार न बदले हों, बल्कि उनके व्यवहार इस प्रकार के हैं कि पोर्न भी उनके जीवन का सामान्य पहलू बन गया है, जैसा कि हमें उत्तर भी मिले (साक्षात्कार प्रश्न 1, 3, 4)। बहरहाल, इस दूसरे कोण से देखने पर भी हमारे अध्ययन के परिणाम महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये अब भी उस 20-30 प्रतिशत सभ्य पुरुष जनसंख्या (कुल 56 के समूह में से 10-16) के यौन व्यवहारों को पहचानने का कार्य कर रहे हैं। 

Shot of a young couple having relationship problems at home

अपने शोध के पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों को हम यदि एक-एक करके देखें, तो हमें महसूस हुआ कि अपने जैसे दोस्तों के साथ देखने के कारण इन पुरुषों के लिए इन पोस्ट्स की उग्रता/अटपटापन शायद कम हो जाता है, जिनमें से कुछ बहुत आपत्तिजनक थीं। इन्हें देखना, स्वीकारना बल्कि अपनी साप्रयास छुपाई गई मानसिकताओं पर चर्चा करना आसान हो जाता है जब साथ में और लोग भी देख रहे हों। भारतीय उपमहाद्वीपीय जीवन में अन्यथा असंभव प्रतीत होती काम-कल्पनाएँ भी (fantasies) कुछ पूरी हुई लगती हैं। खासकर तब, जब इस सब से उपज सकने वाले नैतिक व स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रश्नों की बात कोई भी न उठा रहा हो। हमने जब ऐसे प्रश्न उठाने की कोशिश की तो इनसे बच कर निकल जाने की प्रवृत्ति साफ नज़र आई। (साक्षात्कार प्रश्न 6, 7, 9, 10)

जैसा कि हमारा अनुमान था, आज पोर्न के सार्वजनिक मंचों पर साझाकरण प्रक्रिया की लोकप्रियता में वैसे तो व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया की समाज के हर कोने तक सरल पहुँच का बहुत बड़ा हाथ दिखाई दिया (साक्षात्कार प्रश्न 2, 3, 5) किन्तु इसके साथ ही मूल में आज वर्ष 2018 में भी उसी कारक की सक्रियता मुख्य थी जो आज से 30 वर्ष पहले, इस वर्ग की पिछली पीढ़ी के साथ थी, यानी कि अतृप्त व अनियंत्रित कामेच्छाओं की अभिव्यक्ति (तालिका 1)।

साक्षात्कार के दौरान इस बात से चाहे शुरू में इनकार किया गया हो (साक्षात्कार प्रश्न 1, 4) किन्तु सभी परिणामों को एक साथ देखने से प्रतीत हुआ कि पोर्न देखने से चाहे न भी हो मगर पोर्न पर इस तरह की सार्वजनिक चर्चा से पुरुषों की काम-कल्पनाएँ, उनका यौनमनःस्वास्थ्य और आसपास की स्त्रियों को देखने का उनका तरीक़ा जरूर प्रभावित हो सकता है, जैसा कि बच्चे और उसकी टीचर के वीडियो पर उनकी प्रतिक्रियाओं में देखा जा सकता है (तालिका 1, सामग्री VIII)। हमने ये भी देखा कि पुरुष इस ग्रुप पर अपनी उपस्थिति को अहम मान रहे हैं और पसंद आने वाली पोस्ट्स पर चर्चाएँ कर पाने का समय अपनी दिन भर की व्यस्तता में से नियमित रूप से निकाल रहे हैं जिसका अर्थ है कि यह उनके लिए दिन का एक जरूरी अंग है। और इसी के आधार पर हमने इन्हें कम्पल्सिव श्रेणी3 में रखा। अब यह अलग मुद्दा है कि इन अतिरंजित कल्पनाओं में से कितनी इस वर्ग के लिए असल में पूरी हो सकती होंगी, क्योंकि जैसा कि हमने साक्षात्कार में पाया कि उनके विवाहेतर सम्बंधों में भी अधिकांशतः उनकी अपनी पत्नियों जैसी ही दूसरे लोगों की लगभग यौननिरक्षर सी पत्नियाँ होती हैं (साक्षात्कार प्रश्न 11)। यद्यपि साक्षात्कार में दावा किया गया कि वे चैन से हैं (साक्षात्कार प्रश्न 12), मगर स्पष्ट था कि विवाहेतर सम्बन्ध भी उनकी कामेच्छा को तृप्त नहीं कर पा रहे हैं जिसका कारण पोर्न की वजह से अतिरंजित उनकी काम-कल्पनाएँ हो सकती हैं जैसा कि एना ब्रिजेज ने अपने अध्ययनों में पाया4 और या फिर भारतीय संदर्भों में उनकी यौन-साथिनों का अनाड़ीपन भी हो सकता है जिसकी वे शिकायत करते पाये गये।

सभी स्त्रियों की पर्याप्त सामाजिक स्वतंत्राता यूँ तो हमारे समाज में अभी भी एक दिवास्वप्न ही है क्योंकि उन्हें सभी प्रकार के पुरुष वर्गों से इसके लिए जूझते हुए हम हर रोज देखते हैं। किन्तु क्या अपने इस अध्ययन से हम ये प्रारंभिक निष्कर्ष निकाल सकते हैं (तालिका 1 सामग्री VIII) कि हमारे अति सभ्य माने जाने वाले इस अध्ययन वर्ग के संपर्क में आती शिक्षित, व्यवसायिक रूप से सफल स्त्रियों को भी कदाचित अपनी यौन-पहचान से मुक्ति अभी नहीं मिली है? कार्यस्थलों व सामाजिक कार्यकलापों में रात-दिन स्त्रियों के साथ मिल कर काम करते हुए इन अति-शिक्षित, लम्बे समय से विवाहित व सुसंस्कृत पुरुषों में से कम से कम 30» (56 में से 16 इसे स्वीकार कर सके, अन्य के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती) के मनों में स्त्रियों की एक यौन वस्तु से अधिक उपयोगिता की कोई सामाजिक छवि अब तक भी नहीं बन रही है। इसके अतिरिक्त इस प्रक्रिया में पुरुषों और उनके देह-संपर्क में आती कई स्त्रियों में यौन-संक्रमणों तथा भांति-भांति की हिंसा का शिकार बनने की संभावनाओं के बीज भी पनप रहे हों तो हमें आश्चर्य नहीं होगा।

हमें यह भी प्रतीत हुआ कि एक पोर्न ग्रुप का सदस्य होते हुए भी अपनी पत्नियों के साथ इन पुरुषों का व्यवहार बदलने का खतरा तो हालांकि नहीं है (क्योंकि दरअसल वे उनके दृष्टि व रुचिक्षेत्रा से ही बाहर हो गई प्रतीत हुईं) और न ही अनुपलब्ध प्रतीत होने वाली स्त्रियों से उनका व्यवहार (कम से कम इस वर्ग-समूह के पुरुषों का)। किन्तु सामने दिखने वाली हर स्त्रा में अपना काम-साथी ढूंढने की उनकी अतिउत्सुक नज़र को, मुंह भींच कर बंद किये हुए समाज में कोई सार्वजनिक समर्थन नहीं मिल सकता, यह जान कर ही उनका व्यक्तित्व कई मुद्दों पर सार्वजनिक व गोपन, इन दो खंडों में विभाजित अवश्य दिखाई दिया। साक्षात्कार में ‘ये तो सिर्फ़ मस्ती या मज़े के लिए है’ कहने वाले पुरुष, ग्रुप में आपस में बात करते हुए इस पोस्ट पर जमकर तालियाँ पीटते और खुश होते दिखाई दिये कि, ‘‘एक आदमी किसी औरत के कपड़ों के बारे में सबसे ज्यादा आनंद ये सोच कर लेता है कि वह इन कपड़ों के बिना कैसी दिखेगी!’’ साथ ही नैतिक मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रियाएँ एक ओर चुप रह जाने और दूसरी और बिंदास चरित्रा दिखाने की रहीं (साक्षात्कार प्रश्न 9, 10)। ऐसा व्यवहार वे दोस्तों के सामने सिर्फ ‘मर्दाना’ दिखने के लिए भी कर सकते हैं (साक्षात्कार में प्रश्न 6 का जवाब नहीं दिया गया) अथवा यदि उनकी प्रतिक्रियाओं पर निगाह डालें तो वे सचमुच ही इस तरह सोच रहे हो सकते हैं। स्त्रियों के प्रति उनके नज़रिये में भी दुविधाओं का आभास होता है। वे स्वयं शायद प्रत्येक स्त्रा को यौन उब्लधता की दृष्टि से परखना चाहते हैं; लेकिन स्त्रियाँ या तो इस दृष्टि से घृणा करती हुई दिखती हैं, या फिर यौनकुंठित मालूम होती हैं; और इससे वे और भी भ्रमित हो जाते हैं। इस छोटे समयकाल व छोटे समूह के अध्ययन द्वारा यह बहुस्तरीय दोहरा व्यवहार हमें दिखाई तो दिया, लेकिन इन सभी सच प्रतीत होती संभावनाओं में से मात्रा इस अध्ययन के आधार पर पूरा सच खोजना बहुत मुश्किल है। इस दोहरे व्यवहार की व्याख्या तथा संभावित परिणाम आगे के शोधों का विषय हो सकते हैं।

पुरुषों की इन सब दूसरी ही दुनिया की लगती दुविधाओं से परे, इस दुनिया के दायरे में वापिस लौटें तो हमारी सामाजिक मान्यताएँ आज भी भारतीय स्त्रा की शास्त्रा-मान्य ‘पारिवारिक, मासूम व त्यागमयी’ वाली सार्वजनिक छवि में किसी भी प्रकार के बदलाव के खि़लाफ लामबंद हैं, जिसकी वजह से स्त्रियों की स्वाभाविक यौनेच्छा तक का क्रूर निरादर जारी है। यह उलटबांसी वाकई हैरतअंगेज़ है कि जहाँ एक ओर संस्कृति द्वारा घर की चारदीवारी के भीतर स्त्रियों से कोई उग्र यौन आकांक्षाएँ न रखने की कड़ी अपेक्षा है जो शायद उन्हें रति-उदासीन बना रही है (और जो पुरुषों के अनुसार उन्हें घर से बाहर यह आनंद खोजने को मजबूर कर रही है—(तालिका 1 सामग्री XIV); वहीं दूसरी ओर घर से बाहर उन्हीं स्त्रियों से पुरुषों द्वारा सर्वथा मुक्त यौनव्यवहार की अपेक्षा भी की जा रही है। जहाँ एक ओर पार्टनर को यौनतृप्ति न दे पाना उनके अंहकार को चोट पहुंचाता है, वहीं पत्नी की यौन असंतुष्टि के बारे में वे पूर्ण अनभिज्ञ हैं (साक्षात्कार प्रश्न 8)!

महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम में प्राध्यापक डा. अनुपमा गुप्ता स्त्रीकाल की संस्थापक संपादकों में हैं और डा मनोज चतुर्वेदी फिरोजाबाद में ईएनटी डॉक्टर हैं.

क्रमशः

यह आलेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन के स्वास्थ्य अंक में प्रकाशित है.

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आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

विवेक मिश्र

रचना किसी भी समय में आसान नहीं होता. कोई समय पुरुष रचनाकार केलिए जितना कठिन और जोखिम भरा होता है स्त्री के लिए हमेशा उससे कहीं ज्यादा कठिन और जोखिम भरा होता है. उसके अपने द्वंद्व और अपने जीवन संघर्ष उसे और कठिन तथा जोखिम भरा बनाते हैं.

क्लॉक वाइज विजय श्री तनवीर, अंजू शर्मा, सपना सिंह, रजनी दिसोदिया

हम जब लिखते हैं तो किसी न किसी रूप में जीवन और उसके आस-पास फैले यथार्थ का ही संधान करते हैं, …और जीवन सृष्टि के कितने कौनों अंतरों में कितनी-कितनी परतों में सतत प्रवाहमान है. ऐसे में किसी कहानी में किसी घटना, या उससे जुड़े यथार्थ को समय सापेक्ष रखकर ही पकड़ा जा सकता है. पर सापेक्षता में आज कठिनाई ये है कि जिस गति से समय बीतता है, आज उससे कई गुणा तेज़ी से वह बदल जाता है. आप एक बात को जब तक जानते हैं, समझते हैं तब तक वह बदल जाती है. इसलिए ऐसे समय में किसी घटना, उससे जुड़े यथार्थ को पकड़ना उसके लिए कोई मेटाफर रचना बहुत कठिन हो जाता है. इसलिए कहा जा सकता है कि आज रचना के लिए बहुत सारा कच्चा माल हमारे चारों तरफ होते हुए भी अच्छी और स्थायी प्रभाववाली रचना, कोई कहानी लिख पाना बहुत चुनौतीपूर्ण काम है. आज रचनाकार जब तक एक समय से ताल मिलाकर यथार्थ का एक कोना पकड़ता है, तो उसी समय उससे उसका दूसरा कोना छूट जाता है.

आज सूचनाओं के विस्फोट के इस समय में जो अभी नया है वह पलक झपकते पुराना हो जाता है, जो सच्चा है वो झूठा हो जाता है और जो झूठा है वो सच्चा हो जाता है. आज क्षणिक आधुनिकता का समय है जहाँ बच्चे के पैदा होने से उसके पालने में आने तक समय और उसकी समझ बदल जाती है. यह एक खंड-खंड यथार्थ का,एक फ्रेक्चर्डरियलिटी का समय है, और ऐसे समय में निर्मित होती स्मृति भी उसी फ्रेक्चर्ड रियलिटी का रिफ्लेक्शन है. इसलिए वह भी खंड-खंड है, फ्रेक्चर्ड है. इसलिए यथार्थ, स्मृति और कल्पना से मिल के भी कोई सर्वस्वीकृत पात्र, कोई पूरे समय का प्रतिनिधित्व करता नायक, या कोई रचना नहीं बन पाती. यूँ तो हर समय में समाज के हर वर्ग के स्वप्न, समय से अपेक्षाएं, आकांक्षाएंअलग-अलग ही रही आई हैं. पर आज वह वर्ग विभेद व्यक्तिक हो गया है. आज व्यक्तिगत स्तर पर सबके स्वप्न, उनकी आकाक्षाएँ अपने समय और समाज से अपेक्षाएं बिलकुल अलग हैं, या कहूँ कि हो सकती हैं. ऐसे में रचनाकार न तो किसी वर्ग विशेष की कोई फार्मूलाबद्ध रचना लिख सकता है और न ही एकरेखीय आत्मालाप जैसी रचना लिख सकता है.पर इस सब के वाबजूद आज हिंदी कथा संसार में इतनी स्त्री रचानाकार सक्रिय हैं और समय के विविध कोणों और आयामों को पकड़ते और परखते हुए कहानियाँ लिख रही हैं. यह बहुत सुखद और आश्वस्त करने वाला है.

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.इसलिए ऐसे समय में जब हम स्त्री लेखन की बात करते हैं तो उसमें कोई एक ट्रेंड, एक प्रवृत्ति को रेखांकित करना कठिन ही नहीं, असंभव लगता है. इसलिए मैं किसी एक प्रवृत्ति की बात न करते हुए एक ध्वनि, एक अनुगूँज की बात करता हूँ. एक रेसोनेंस, एक फील की बात करता हूँ. और इस तरह समकालीन महिला लेखन में जो ध्वनि मुझे सुनाई देती है…वह है जीवन जीते हुए- जीवन जीने के तरीके, उसके नए उद्देश्यों का संधान, उसका विश्लेषण, और कई बार अब तक जो जिया जा चुका हैउसका मूल्यांकन, मान्य-अमान्य, नैतिक-अनैतिक के द्वंद्व के बीच मौलिक सुख और संतोष, एक देह-एक लिंग के संकट और संघर्ष से ऊपर एक मनुष्य मात्र का सुख और संतोष. उसकी चाहना. सही-गलत से ऊपर जीवन की रोशनी, उसकी महक की तलाश. जिसको पाकर कोई कह सके कि हां.. चाहे एक पल ही सही अपने-सा, निरा अपने-सा, बिलकुल मौलिक, आदिम इच्छाओं से भरा जीवन जिया. ये अनुगूँज मुझे सुनाई देती है.. आज स्त्री लेखन का स्वर पितृसत्ता से टकराहट भर नहीं है. आजके स्त्री लेखन में फेमिनिज्म की टोन बदली है. अब उसमें पहले जैसी अकुलाहट नहीं है बल्कि अब यह सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है. हाल ही में गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश-क्रोएशिया प्रवास की डायरी’, मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास‘मल्लिका’, किरण सिंह का ‘शिलावहा’ और सुजाता का पहला उपन्यास ‘एक बटा दो’ पढ़ा. और लगा कि अनुभव का एक बहुत विराट संसार मेरे सामने खुला. जहाँ स्त्री-पुरुष संघर्षों से उलझने के बजाय उनसे आगे निकलके एक ऐसे संसार को दिखाने की कोशिश है जो इन सब बातों में कहीं छूट गया था. लेकिन यहाँ बात कहानियों की है और वो भी उन चार महिला कहानीकारों को केंद्र में रखके की जानी है जिनका पहला कहानी संग्रह हाल ही में आया है.और ये कहानीकार हैं रजनी दिसोदिया, अंजू शर्मा,विजयश्री तनवीर और सपना सिंह.

सबसे पहले बात सपना सिंह के संग्रह ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ की कहानियों की… सपना सिंह की इस संग्रह में जो कहानियाँ हैं, उनके केंद्र में जो स्त्री है वो आपकी देखी और जानी-पहचानी स्त्री है पर ये कहानियाँ आपको उस जानी-पहचानी स्त्री की अनजानी-अनदेखी दुनिया में ले जाती हैं. और तब आपको लगता है कि कितना कुछ था जो जानने से रह गया था. और कितना कुछ आप जानते नहीं थे बल्कि अपने अपने पूर्वाग्रहों की वजह से अनुमान लगाए थे. आप जिसे जानते थे वह वो छवि थी जो आपने स्त्री की बना रखी थी.तब जानते हैं कि जहां आपने उस जानी-पहचानी स्त्री को जान बुझक्कड़ बनकर कोई सलाह दे डाली थी वहाँ वह चाहती थी आप चुपचाप उसके साथ चलते रहतेऔर कुछ न कहते. ये तो कतई नहीं कि इस दुनिया को आप उससे बेहतर जानते हैं. ये कहानियाँ इन स्त्रियों के बहाने आपके जाने पहचाने आपके आसपास के पुरुषों के दिल-दिमाग को, उनके मनोविज्ञान को भी उजागर करती हैं. ‘फिरमारे गए गुलफाम’ ऐसी ही एक कहानी है. संग्रह की शीर्षक कहानी ‘उम्र जितना लंबा प्यार’ के साथ-साथ‘कम्फर्ट ज़ोन से बाहर’, ‘जाएगी कहाँ?’ और‘कमिटमेंट’ इस संग्रह की ख़ास कहानियाँ हैं. सपना सिंह की कहानियों में ‘लोक’ और‘लोक की भाषा’ बहुत जीवंत रूप से सामने आती है. ये कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे किरण सिंह, योगिता यादव और सोनी पांडे की कहानियों में बदलता गाँव, अपनी आवाज़ खोजती और उसे पाती स्त्री और उसके जीवन की दुश्वारियां सामने आती हैं. सपना सिंह ने एक लम्बे अंतराल के बाद इधर फिर से लिखना शुरू किया है इसलिए जो अभी हाल में छपी कहानियाँ हैं उनमें लेखिका कहीं थोड़ी झिजकती, सकुचाती या कहते-कहते रुक जाती लगती है.

 दूसरा संग्रह है विजयश्री तनवीर का‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ विजयश्री तनवीर की कहानियों पर कुछ कहने से पहले मैं उनके कहन, उनकी शैली और उनकी भाषा पर ये कहना चाहूँगा कि पहले ही संग्रह में भाषा की ये परिपक्वता, ये प्रवाह बहुत कम दिखाई देता है. दूसरी बात यो कि कहानियाँ बाहर से ज्यादा भीतर की और उससे भी ज्यादा स्त्री-पुरुष की पारस्परिकता की कहानियाँ हैं. ये कहनियाँ बताती हैं कि एक ने क्या कहा और दूसरे ने क्या समझा, एक ने क्या चाहा और दूसरे से क्या मिला. ये बताती हैं कि जीवन की आपाधापी के बीच स्त्रियाँ कैसे अपने वर्तमान से जुडी रहकर कितनी तरलता से अपने अतीत में जाकर लौट सकती है. और वह ऐसा बार-बार करती है, और लौट कर पाती है कि इस बीच समय तो बीता पर जिस तरह बीते समय में वह मैच्योर हुई है जीवन और रिश्तों को लेकर उसका साथी नहीं हुआ. वह अभी भी वहीँ खड़ा है- उसकी अपेक्षाएं अब भी वही हैं, पर अब वह एक नहीं दो है- एक पति के रूप में अपनी पत्नी के साथ अलग और एक प्रेमी के रूप में उसके साथ अलग. ‘पहले प्रेम की दूसरी पारी’ कहानी बहुत सरल तरीके से अपनी यह बात कह जाती है. ‘भेड़िया’ एक मनोवैज्ञानिक कहानी है. यथार्थ और कल्पना के बीच जूझता एक आदमी. यह कहानी हम जो जीते हैं और जो जीना चाहते हैं की कशमकश के बीच एक धुंधलके से शुरू होकर दुसरे धुंधलके में ख़त्म हो जाती है. विजयश्री की कहानियों का फील, उनका वातावरण उनकी ताकत है.पर दो-एक कहानियाँ पढ़ने के बाद आप उस वातावरण के कल्पना लोक में यथार्थ ढूँढने लगते हैं और वो आपको उस तरह नहीं मिलता बल्कि कई जगह कहानी वास्तविकता से बहुत दूर खड़ी दिखाई देती है.‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ जैसे शीर्षक बहुत चतुराई से पाठक को अपनी और खींचते हैं और पठनीयता की वजह से आप इन कहानियों को पढ़ भी जाते हैं पर स्त्री जीवन की गहरी पड़ताल,यथार्थपरक विश्वसनीय वातावरण के अभाव में इन कहानियाँ और इनके पात्रों से पाठक की एक दूरी बनी रहती है. लेखिका को जादुई भाषा औरलगातार कौतुहल पैदा करती किस्सागोई और जीवन के गुदगुदाते प्रसंगों के साथ जीवन के बहुस्तरीय यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश भी करनी होगी.

तीसरा संग्रह है अंजू शर्मा का ‘एक नींद हज़ार सपने’ संग्रह में ‘छतवाला कमरा और इश्क वाला लव’ जैसी प्रेम कहानियाँ होने के बाद भी मैं कहूँगा कि अंजू की कहानियाँ न तो रूमानियत से भरी कहानियाँ हैं और न ही केवल स्त्री मन की कहानियाँ हैं, इनका विमर्श भी स्त्री विमर्श तक सीमित नहीं है. ये समय, समाज, जाति, धर्म और आर्थिक विषमताओं से उपजे संघर्षों को भी बहुत अच्छे से पकडती हैं. पहली कहानी ‘गलीनंबर दो’ एक बौने की कहानी है जो बहुत सुंदर मूर्तियाँ बनाता है और उसका व्यक्तित्व, असली क़द अपने आसपास के लोगों से बहुत बड़ा और विशाल होकर सामने आता है. ‘समय रेखा’ प्रेम को नए ढंग से परिभाषित करती कहानी है. ‘भरोसा अभी कायम है’ घोर अविश्वास के समय में कहीं किसी कोने में थोड़े से बचे रहे आए भरोसे की कहानी है. आज जब पूरा देश हिन्दू-मुसलमान हुआ चाहता है ऐसे में एक हिन्दू परिवार को एक मुस्लिम इलाके में उसके मुस्लिम पड़ोसी उसे पलायन से न केवल रोक लेते हैं बल्कि उसके टूटे भरोसे को फिर उसमें पैदा करते हैं. इस तरह यह एक उम्मीद की कहानी बनकर सामने आती है. ‘नेमप्लेट’ स्त्री अस्मिता की एक मार्मिक कहानी है. जहाँ अंत में स्त्री न केवल अपना स्व ढूँढती है बल्कि उसपर भरोसा करके अपने रास्ते पे चल भी पड़ती है.

चौथा संग्रह रजनी दिसोदिया का है-चारपाई. भारत में धर्म, भाषाऔर क्षेत्रवाद से छुटकारा मिल सकता है पर आपकी जाति यहाँ आपका पीछा नहीं छोड़ती. समाज काजातीय विभाजन, उसके आधार पर सदियों से होता आ रहा शोषण, उसके ख़िलाफ़ संघर्ष, उसके बीच आए पूंजी और तकनीकी विकास से आधुनिक से दिखते समाज के भीतर सेयहाँ-वहाँ से झांकते विद्रूपों और विरोधाभासों को रजनी दिसोदिया की कहानियाँ बहुत बारीकी से पकडती हैं. वे जातिवाद पर, जातिवादी मानसिकता पर विमर्श ही नहीं करतीं बल्कि उसपर कड़ा प्रहार भी करती हैं. उनकी कहानियाँ ऑनर किलिंग, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे पूरी शिद्दत से उठाती हैं. ‘सांचकहूँ तो’ संग्रह की ऐसी ही एक कहानी है. ये कहानियाँ मध्यवर्गीय खोखली ठसक को जगह-जगह ध्वस्त करती हैं. यह उस सवर्ण मानसिकता पर प्रहार करती हैं जहाँ पढ़ाई-लिखाई, आधुनिकता सब दिखाने के लिए है. सारी आधुनिकता बाहर है घर की देहरी के भीतर और दिमाग के अंदर वही सदियों पुराने जीवन मूल्य जड़ें जमाए बैठे हैं. ‘चारपाई’ तीं पीढ़ियों को जोडती एक मार्मिक कहानी है- कहानी में एक पुरानी खात है जिससे परिवार के युवा और किशोर नए घर में जाने से पहले छुटकारा पाना चाहते हैं और बुजुर्गरामस्वरूप जिनकी पत्नी और गाँव की स्मृतियाँ उससे वावस्ता हैं वह उसे छोड़ना नहीं चाहते. पर उनकी बहू कैसे वह खाट किसी को बिना बताए नए घर में ले आती है, कैसे वह एक पुराने सामान को नहीं एक स्मृति को बचा लेती है यह पाठक को याद रह जाता है.नए समय में प्रवेश करते हुए हम कैसे अपना लोक, उसकी परंपरा के कुछ अंश संजोकर स्मृतियों के रूप में अपने साथ बचाए रख सकते हैं इस ओर इशारा करती है.

इन चारों संग्रहों पर संक्षेप में बात करते हुए लगता है कि आवाज़ों कीकमी नहीं बल्कि बाज़ार के शोर औरचकाचौंध में कुछ मौलिक स्वरों को पढ़ने और पहचाने की ज़रूरत है.

विवेक मिश्र हिन्दी के चर्चित कथाकार हैं. यह आलेख स्त्रीकाल और मेरा रंग द्वारा आयोजित समकालीन महिला कथा-लेखन पर एक बातचीत के लिए लिखा गया था. संपर्क: 9810853128/vivek_space@yahoo.com

लूला से लालू तक: क्या बिहार और ब्राजील का एक ही पैमाना है!

नचिकेत कुलकर्णी

इन क्षेत्रों में, क्रमशः बिहार और ब्राजील में, शोषित सामाजिक-आर्थिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो प्रमुख नेता, वर्तमान में भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में हैं। हम इन आरोपों के राजनीतिक तर्क से चिंतित हैं, जिसे केवल राजनीतिक प्रतिशोध या पक्षपातपूर्ण रवैये के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता है।

बाये लालू प्रसाद और दायें लूला

लालू प्रसाद और लूला दा सिल्वा के खिलाफ कानूनी मामले और फिर उन्हें दी गयी जेल इस बात के उदाहरण हैं कि दक्षिणपंथी ताकतें भ्रष्टाचार के मुद्दे का सेंटर-लेफ्ट के लोकप्रिय राजनीतिक संरचनाओं के खिलाफ एक हथियार के रूप में कैसे इस्तेमाल करती हैं। कोई यह नहीं कह रहा है कि लालू के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) या लूला के पार्टिडो डॉस ट्रबलहैडोर्स (वर्कर्स पार्टी या पी टी) नस्ल/जाति-वर्ग संबंधों के सामाजिक परिवर्तन का प्रयास कर रहे थे। हालांकि, इन राजनीतिक ताकतों के उदय ने शोषित वर्गों में राजनीतिक जागरण जरूर लाया, उन्हें आगे बढ़ाया। कई मायनों में, इन दलों के नेतृत्व वाली सरकारों ने सत्ता के पुनर्वितरण की एक व्यवस्था बनायी/ माहौल बनाया (एक ऐसी प्रक्रिया जो निश्चित रूप से ब्राजील या बिहार में पूरी होने को शेष है) जिसने संबंधित क्षेत्रों में परंपरागत रूप से प्रभावी वर्गों को खतरा पैदा कर दिया। दुखद विडंबना यह है कि भारत में वामपंथ की कई आवाजें जो लूला के बारे में काफी मुखर हैं, लालू के बारे में अपेक्षाकृत उदासीन हैं।

इसे भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने का वर्चस्वशाली वर्गों द्वारा एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है – जो सत्ता से दूर हो गया है या बेनकाब हो चुका है. इसके जरिये वह अपनी स्थिति को मजबूत करने या फिर से हासिल करने की कोशिश करता है। माइकल टेमर ने महाभियोग के बाद 2013 में ब्राज़ील के राष्ट्रपति के रूप में वर्कर्स पार्टी के डिल्मा रूसेफ़ की जगह ली, जो संवैधानिक तख्तापलट से कम नहीं था।

जगन्नाथ मिश्रा को चारा घोटाला मामले में बरी कर दिया गया था। कैसे योजनापूर्वक टार्गेट किया जाता है इसे समझने के लिए देख सकते हैं कि कैसे टेबर, ब्राजील में पेट्रोब्रास घोटाले में एक प्रमुख अभियुक्त, या बिहार में चारा घोटाले के एक प्रमुख अभियुक्त जगन्नाथ मिश्रा के साथ बहुत ही नरमी से पेश आया गया,  क्योंकि उनकी सामाजिक स्थिति और राजनीतिक विचारधारा वर्चस्वशाली हितों के अनुरूप है। भ्रष्टाचार का मुद्दा एक मजबूत बहाना है जिसका इस्तेमाल दक्षिणपंथी ताकतें लोकतंत्र को खत्म करने के लिए खंजर की तरह करती हैं. यह दुर्जेय राजनीतिक विरोधी को चुनावी राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने तक सीमित नहीं है बल्कि  एक गहरे स्तर पर, यह लोकप्रिय जनादेश को कम करने के साथ-साथ जनता की एजेंसी को कम करने का तरीका है। ऐसा नैतिकता का उन्माद पैदा करके हासिल किया जाता है जो अंततः एकाधिकारवाद की ओर जाता है। इसे समझने के लिए मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी के उदय का मार्ग प्रशस्त करने वाला अन्ना हजारे परिघटना एक केस है।

भ्रष्टाचार पर भावनात्मक बयानबाजी – व्यक्ति के नैतिक दोषों तक ही सीमित है और यह वंचन एवं सत्ता से बेदखली के मुद्दों को पीछे धकेल देती है। ये (वंचन और सत्ताहीनता) संरचनात्मक/ व्यवस्थागत समस्या हैं जिसे जनता की सामूहिक कार्रवाई से ठीक किया जा सकता है। सामाजिक राजनीतिक यथास्थिति को बनाए रखने हेतु दक्षिणपंथी ताकतों के लिए यह जरूरी है कि वे इन संरचनात्मक मुद्दों को केंद्र के लाने की क्षमता रखने वाली राजनीतिक प्रगति और लक्ष्यों को रोके, राजद और पी टी ऐसी ही दो राजनीतिक संभावनायें थीं। भ्रष्टाचार विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के लिए एक सुरक्षित आड़ है, क्योंकि इसमें शक्ति और संपत्ति के संबंधों पर एक खरोंच आये बिना नैतिक आक्रोश के माध्यम से अशांति उत्पन्न करने की क्षमता है। लूला और लालू के मामले में की गयी जांच और उनके फंसाने के एक समान तरीके भी उन्हें एक सूत्र में जोड़ते हैं। जन लोकपाल के विरोध में और विधेयक को लागू करने की जल्दबाजी के खिलाफ बोलते हुए लालू प्रसाद ने संसदीय लोकतंत्र के संस्थानों को खतरे में डालने के बारे में चेतावनी दी थी. उन्होंने आगाह किया था कि किसी अनुत्तरदायी प्राधिकरण में जांच की शक्ति देना भी खतरनाक है।

ब्राजील में इस तरह के खतरे तथाकथित “ऑपरेशन कार वॉश” से आए, जिसने पी टी और उसकी सरकार को निशाना बनाया। मूल रूप से, एक आपराधिक जांच के जरिये ब्राजील को अपराध मुक्त करने के इस ऑपरेशन का नेतृत्व एक न्यायाधीश, सर्जियो मोरो ने किया था, जो अब ब्राजील में दक्षिणपंथी सरकार में न्याय मंत्री हैं। मोरो ने पी टी के नेतृत्व को ठिकाने लगाने के लिए अपनी व्यापक शक्तियों का गैरजिम्मेवराना इस्तेमाल किया। वास्तव में, उसी समय के आसपास, भारत एक उन्माद से गुजर रहा था, जो मूलतः विनोद राय (तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) जैसे गैरजिम्मेवार लेखाकार द्वारा पैदा किया गया था और जो मोरो-एस्के फैशन में काम कर रहे थे। भारत के साथ-साथ ब्राज़ील में भी भ्रष्टाचार विरोधी उन्माद के बाद उभरे सर्वसत्तावाद से यह और जरूरी हो गया है कि उस कठिन समय में कही गयी लालू प्रसाद की बार्तो पर गंभीर तवज्जो दी जाये. यह जरूरत विशेषकर उस लेफ्ट या सेंटर-लेफ्ट के लिए है जो भ्रष्टाचार विरोधी तामझाम से जुड़ने को बेताब होता है या जुड़ जाया करता है।

ईपीडवल्यू से साभार. नचिकेत कुलकर्णी लोक वांग्मय गृह (प्रकाशन) के संपादक मंडल में हैं.

स्त्रीकाल शोध जर्नल अंक (31)

इस अंक के लेखक: पूजा तिवारी, गंगा सहाय मीणा, डॉ. अनीता शुक्ल, महमुदा खानम, डॉ. अखिलेश गुप्ता, सुशील कुमार, स्वाति चौधरी, कंचन कुमारी, डॉ. पठान रहीम खान, अंजलि कुमारी, डॉ. श्रीमती स्वाती जाजू, रेणु चौधरी, सोनी पाण्डेय, वंदना शर्मा, राहुल प्रसाद, दिव्या एम पी, डॉ. सोनिया माला, डॉ. भुवाल सिंह ठाकुर,  सत्य प्रकाश, सरस्वती मिश्र, ज्योति यादव, सुन्दरम् शर्मा, डॉ. शाहला के.पी, डॉ. निशा यादव इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है. जर्नल ऑनलाइन ही है. हम स्त्रीकाल नाम से ही प्रिंट में एक पत्रिका प्रकाशित करते हैं. लेखकों/पाठकों से आग्रह है कि वे अकादमिक रूप से पठनीय प्रिंट अंक के नियमित सदस्य बनें.

स्त्रीकाल शोध पत्रिका अंक 31

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा. स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

बोल्गा से गंगा, तुम्हारी क्षय हो के रचयिता ने दी समाज को नई उर्जा: प्रेम कुमार मणि

अरुण नारायण
कला संस्कृति एवं युवा विभाग और पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल

‘जब हम युवा थे तो कहा जाता था कि किसी सुदूर गांव में किसी झोंपड़ी में दिया या लालटेन जल रही हो, कोई नौजवान पढ़ रहा हो तो वह राहुल को पढ़ रहा होगा। या उसके इर्द-गिर्द राहुल साहित्य होगा। एक दौर था जब पूरे हिन्दी में राहुलजी सबपर छाये हुए थे। उन्होंने उत्साहित किया पूरे हिन्दी समूह को। हमलोगों ने उन्हें देखा नहीं, लेकिन उनके प्रभाव को नजदीक से ग्रहण किया।

ये बातें हिन्दी चिंतक प्रेमकुमार मणि ने कर्पूरी ठाकुर सभागार, पटना में राहुल सांकृत्यायन की 121वीं जयंती समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि अपने संबोधन में कही। कला संस्कृति एवं युवा विभाग एवं पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यता सुभाष शर्मा ने की। इस मौके पर खगेन्द्र ठाकुर, अरुण कमल, राहुल जी के पुत्र जेता सांकृत्यायन एवं विजय कुमार चौधरी ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

प्रेमकुमार मणि ने आगे कहा कि बोल्गा से गंगा, तुम्हारी क्षय हो, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दर्शन-दिग्दर्शन जैसी कितनी ही चीजें थीं, जिनसे हिन्दी समाज ने एक नई उर्जा पाई। उन्होंने कहा कि राहुल जी ज्ञान व्याकुल थे। आजमगढ़ के पिछड़े हुए गांव पन्दाहा में नाना के घर उनका जन्म हुआ। नाना सेना में साहब के साथ यात्राएं किया करते थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई एक मदरसे से आरंभ की थी। घूमना उन्होंने अपना धर्म बना लिया। वैचारिक सनातन मठ के स्वामी केदार पांडे, रामउदार साधू बने फिर  आर्य समाजी। 1930 में बौद्ध बने। 1936 में कार्यकर्ता की धज धारण की। फिर कम्युनिस्ट बनते हैं, ऐसे कम्युनिस्ट बनते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी उसे पचा नहीं पातीं। आधुनिक युग के इस तपस्वी ने संस्कृत, पालि और अनेक विदेशी भाषाएं सीखीं। मानव समाज को किसी राष्ट्रीयता, गांव या खंड में बांटकर नहीं देखा। पूरी दुनिया को एक परिवार माना। हमने हजारीबाग जेल में देखी थी उनकी मेज। जिसपर 12-12 घंटे खड़े होकर वह काम करते थे। दर्शन-दिग्दर्शन कौन लिख सकता है? रशेल की दर्शन की किताब में पश्चिम दर्शन है, लेकिन राहुल जी की पुस्तक उससे आगे जाकर पूरब और पश्चिम का समुच्चय प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि जर्मन आइडियोलॉजी का संबंध भारतीय ज्ञान परंपरा से बनता है। राहुलजी ने धर्मकीर्ति और दिग्नाग को याद किया। उनके कई लेखों और पुस्तकों में धर्मकीर्ति की यह पंक्ति उद्धृत की जाती रही है। धर्मकीर्ति इंडोनिया के थे 660 में उनका निधन हो गया। उन्होंने वेदों को प्रमाण मानने, ईश्वरवाद में विश्वास करने, जातिवाद का अवलेप धारण करने, स्नान में धर्म की कामना, पाप को खत्म करने के लिए शरीर को कष्ट देने का विरोध किया। लेकिन यह कैसी विडंबना है कि हम धर्मकीर्ति के शिष्य के शिष्य के षिष्य शंकराचार्य को लेकर झूम रहे हैं।

कवि अरुण कमल ने कहा कि राहुलजी की सारी यात्राएं उनके जीवन में घर से भागने से शुरू होती है। उनके नाम यात्रा की तरह ही जीवन और विचारयात्रा के भी विभिन्न पड़ाव हैं। उनका पहला नाम केदारनाथ पांडेय था। वैरागियों के संपर्क में आये तो रामउदार दास हो गए, स्वामी हुए आर्य समाज के प्रभाव में आये लिखने लगे तो गोत्र के हिसाब से रामउदार सांकृत्यायन हो गए। गोत्र का ख्याल आया तो नाम पड़ा राहुल सांकृत्यायन। कम्युनिस्ट हुए तो कॉमरेड राहुल सांकृत्यायन हो गए। काषी के पंडितों की सभा हुई तो उन्हें महापंडित की उपाधि दी गई।

श्री कमल ने कहा कि 4 खंडों की उनकी जीवन यात्रा देश समाज को देखने की एक अलग दृष्टि देती है। आदमी क्यों दुखी है, इसे कैसे दूर किया जा सकता है? संन्यासी, वैरागी क्यां होते हैं अभी भी खत्म क्यों नहीं होते, कौन-सी वृत्ति है जो उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करती है आदि कई सवाल राहुल बुद्ध की तरह ऐड्रेस कर रहे थे। उन्होंने अलग तरीके से मार्क्स, बुद्ध और यहां की संत परंपरा को आत्मसात किया। वे बहुत से सवाल अपनी परंपरा से करते हैं। उन्होंने कहा कि गोपीनाथ कविराज, रामवतार शर्मा और राहुल ने भारतीय समाज को अलग तरीके से समझा। राहुल ने परमार्थ दर्शन लिखी। यह वेद वेदांत की समस्त परंपरा का बहुत बड़ा खंडन था। ज्ञान की पिपासा उन्हें श्रीलंका ले गई, जहां वे बौद्ध बने। वहां उन्हें सब कुछ मिला। लेकिन जीवन को बदलने का सामूहिक उपक्रम नहीं मिला। उनका मध्यममार्ग वैरागियों के प्रपंच को देख चुका था। भारतीय राजनीति में उन्होंने कांग्रेस से जुड़कर काम किया। बिहार सोशलिस्ट पार्टी, बिहार कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा की स्थापना में वे शामिल रहे। प्रलेस, हिन्दी साहित्य सम्मेलन आदि से जुड़े। हर समाज में वे रहे। उनका जीवन ही सन्देश है।

आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित बनैलीगढ़ में राहुल जी 3 माह ठहरे थे। यह सन 1933  का साल था, जब वहां से शिवपूजन सहाय के संपादन में ‘गंगा’ पत्रिका निकला करती थी। ‘गंगा’ के पुरातत्व विशेषांक की तैयारी चल रही थी। इसी काम के लिए राहुलजी लाये गए थे। बाद में वहां लोगों ने राहुल नगर बसाया। कमला जी उस मुहल्ले को देखने आयीं। श्री ठाकुर ने कहा कि राहुल जी के दर्शन का अवसर मुझे नहीं मिला। लेकिन उनके दार्जिलिंग स्थित कचहरी रोड आवास मैं गया। वे मसूरी में बसना चाहते थे, लेकिन कमला जी को वहीं अध्यापकी मिली सो वह वहीं रह गईं। अंतिम बार 1958 में राहुल जी पटना आये। लेकिन मैं उनसे मिल न सका। अमवारी में उन्होंने किसानों के लिए सत्याग्रह किया। किसानों की ओर से ईख काटने के लिए गए। ईख काटने के लिए जैसे ही हशिया चलाया उनके उपर बरछे की बार की गई। इसी को लक्षित करते हुए कवि मनोरंजन ने लिखा-

‘राहुल के सर से खून गिरे
फिर क्यों न यह खून उबल उठे?
साधू के शोणित से फिर क्यों
सोने की लंका जल न उठे?’

खगेंद्र ठाकुर ने कहा कि राहुल जी की जीवन यात्रा विचार यात्रा भी है। उनकी यात्रा वैष्णववाद से शुरू होती है। धार्मिक, वैचारिक मान्यता से वे वैष्णव हैं। डेढ़ सौ छोटी बड़ी पुस्तकें हैं उनकी। उनके बारे में शिवपूजन सहाय का कहा याद आता है कि राहुल जी को देखकर ऐसा लगता है कि वेद, पुराण सब एक ही आदमी ने लिखी होगी। राहुलजी ने कहा है कि मैं जीवन में क्षण-क्षण का तो नहीं लेकिन मिनट-मिनट का हिसाब दे सकता हूं। हमलोग तो प्रतिदिन का भी हिसाब नहीं दे सकते। 1935 में वे रूस गए। वहां ढाई साल रहे। 1939 में विजया दशमी के दिन 17 लोगों के साथ मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी बिहार की स्थापना की। उन्होंने माना कि संपूर्ण भारतीय मनीषा का प्रतिनिधित्व राहुलजी ही करते हैं। खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी ने राहुल जी को पार्टी से निकाला नहीं था। बल्कि उनकी पार्टी सदस्यता का रिन्यूअल नहीं किया था। हुआ यूं था कि हिन्दी सम्मेलन मुम्बई में आयोजित किया गया था जिसमें अपने पर्चे में राहुल जी ने अंग्रेजी के वरअक्स हिन्दी उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं को रखने की बात कही थी। इसपर पार्टी ने उन्हें उर्दू को हटाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस आषय का पर्चा लोगों में बंट गया है इसलिए उचित नहीं होगा। दूसरे दिन पार्टी ने आग्रह किया कि वे मंच से स्वीकार कर लें कि यह उनकी अपनी राय है पार्टी की नहीं। लेकिन उन्होंने यह भी नहीं किया। पार्टी ने उन्हें निकाला नहीं, लेकिन 1955 में उनकी सदस्यता रिन्यूअल कर दी गई।

विकास आयुक्त सुभाष शर्मा ने राहुलजी के बारे में लंबा विवेचनात्मक पर्चा पढ़ा। कहा कि वे एकमात्र विद्वान हैं जिन्हें महापंडित के रूप में जाना गया। हिन्दी की वकालत के कारण कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें निकाल दिया। आकाशवाणी में उन्हें कई बार बुलाया गया। वहां जाने से इसलिए इनकार किया कि अनुबंध तब अंग्रेजी में छपे होते थे। उन्होंने 36 भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इनमें से 3 भाषाएं शिक्षकों से सीखी बाकी सभी खुद के प्रयत्नों से। उन्होंने हिन्दी के ज्ञात साहित्येतिहास को दौ सौ वर्ष पहले का सिद्ध किया। सरहप्पा के दोहों को संगृहीत किया। उन्होंने कहा कि इतिहास को इतिहासकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राहुलजी की एशिया का इतिहास प्रोफेशनल इतिहासकारों से भिन्न है। उन्होंने तिब्बत से 17 खच्चरों पर लादकर बौद्ध धर्म से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज लादकर लाये और उसे पटना म्यूजियम में संरक्षित करवाया। यह दुष्कर कार्य था जिसे उन्होंने संभव कर दिखाया। उन्होंने कई देशों का भ्रमण किया। लोकभाषाओं के महत्व को उचित मान दिया। भोजपुरी के तमाम रूपों की भी बहुत गहरी व्याख्या की है। 9 नाटक भोजपुरी में लिखे। अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को स्थान दिलाने का संघर्ष करते रहे।

विजय कुमार चौधरी ने कहा कि राहुल जी का पूरा लेखन भारतीय परंपरा में निहित था जो उनके अपने ही जीवनानुभवों से सिंचित हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य समाज से भी वे जुड़े। जो स्वयं विरोधाभासों से भरा था। वहां पाखंड था, कर्मकांड था। वह पुराने ग्रंथों में आधुनिकता को ढूंढता है। बुद्ध को उन्होंने महामानव कहा। कहा कि ‘22वीं सदी’ में वे मार्क्स का स्थूल प्रजेंटेशन करते हैं। वे ऐसे लेखकों में थे जिन्होंने हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा को खुलकर प्रकट किया। वे निरंतर विचारों की यात्रा में लगे रहे। अपने को लगातार चैलेंज में लेते रहे।

राहुल सांकृत्यायन के पुत्र जेता सांकृत्यायन ने स्लाइड के जरिये राहुलजी के जीवनक्रम से जुड़े बहुत सारे दुर्लभ फोटोग्राफ और जानकारियां साझा की। उन्होंने राहुलजी के किशोर वय से अंतिम वय तक के ढेर सारे चित्र और विविध घटना संदर्भों की व्याख्या की। सन 1930 से 1963 तक के अनेक संदर्भों को समेटती इन छवियों के माध्यम से राहुलजी जीवंत हो उठे। मसूरी,कुमाउ, नालंदा, कानपुर, अमवारी, दार्जिलिंग, रूस, तिब्बत, नालंदा, श्रीलंका आदि कई जगहां की इन तस्वीरों में उनके जीवन की तरह की वैविध्य नजर आई। कहीं कुमाउ षैली के कुर्ते में हैं तो कहीं, नालंदा बौद्ध भिक्षुओं के साथ छाता लिए। कहीं बौद्ध धर्म का चीवर त्याग संघर्ष को उद्धत हैं। कहीं अध्ययन कक्ष में हैं तो कहीं किसान संघर्ष के मोर्चे पर डंटे हैं। निराला और नेहरू के साथ भी एक अलग दीप्ति के साथ उनकी छवि दीप्त होती दिखी। जेता ने कहा कि यात्रा से कैसे जीवन बनता है इसकी वे मिषाल हैं। प्राचीन आर्य की तरह लगते हैं वे। उन्होंने गरीबी देखी थी, गांव में जन्में थे। आर्य समाज से बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद की अपनी यात्रा में उन्होंने समाज को बहुत कुछ दिया।

उन्होंने कहा कि 1960 में श्रीलंका में दर्षन के आचार्य और डीन का दायित्व संभाला किंतु भारत के किसी वि.वि. ने उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं किया। उन्होंने दो खंडों में तिब्बती हिन्दी शब्दकोष की रचना की जिसके प्रथम खंड का प्रकाषन साहित्य अकादेमी दिल्ली ने किया। उन्होंने तिब्बती संस्कृत कोष की भी रचना की। 1959 में जब उन्हें मध्य एशिया का इतिहास पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान देने की घोषणा की गई तो आरंभ में उन्होंने उसे लेने से इनकार किया। कहा कि झुककर सम्मान नहीं लूंगा लेकिन मां और अंततः पार्टी के कहने पर उसे स्वीकार किया, लेकिन झुककर नहीं। उनके साहित्य का विशिष्ट परिचय उनकी अप्रतिम इतिहास दृष्टि में है। हमलागों ने उनकी स्मृति में एक स्तूप खड़ा किया गया। उनकी चीजों को संरक्षित करने की कोशिश करता रहा, लेकिन यह प्रयास अकेले परिवार के बूते संभव नहीं है। सरकार आये तो उसको बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि धर्मकीर्ति पर बहुत सारा काम हुआ है। राहुल जी ने तिब्बत से उनपर बहुत सारी सामग्री लाई थी जो पटना म्यूजियम में रखी है इसपर नई रोशनी में शोध की जरूरत है।

संपर्कः अरुण नारायण, प्रश्न शाखा, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015 मोबाइल 8292253306

महात्मा फुले के अंतिम दिनों की दुर्दशा का जिम्मेवार कौन?

प्रो. हरी नरके/अनुवाद-संदीप मधुकर सपकाले

महात्मा जोतीराव फुले किसान, व्यापारी, प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता, आयुक्त और एक बड़ी कंपनी के प्रबंध संचालक थे | दिन-रात मेहनत करते हुए उन्होंने इस संपत्ति का निर्माण किया था | अपनी इस समग्र जमापूंजी को उन्होंने वंचित, दलित, बहुजन और स्त्रियों के उद्धार में खर्च किया था | पैरेलिसिस के अटैक के बाद उनके पास अपनी दवा के लिए भी पैसे नहीं बचे थे | डॉ. विश्राम रामजी घोले और भवालकर जैसे उनके कुछ मित्रों ने थोड़ी बहुत सहायता की | उस समय मामा परमानन्द ने महाराजा सयाजीराव गायकवाड से वैद्यकीय सहायता के लिए गुहार लगाई थी किन्तु उस समय महाराजा गायकवाड विदेश यात्रा पर गए हुए थे | अपनी विदेश यात्रा से जब तक वे लौटते तबतक बिना दवा और इलाज के २८ नवम्बर १८९० को जोतीराव की प्राणजोत बुझ गयी |उन्होंने ब्राह्मण विधवा से दत्तक लिए बच्चे को पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाया था | इसी दत्तक पुत्र ने आगे चलकर सेना की नौकरी में देश-विदेश में नौकरी की थी | १८९७ में प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए सावित्रीबाई फुले का देहांत १० मार्च १८९७ में हुआ |

डॉ. यशवंत की मृत्यु भी १९०५ के प्लेग की रोकथाम के लिए काम करते हुए हुई | उनके उपरांत उनकी बेटी और पत्नी के उदर निर्वाह के लिए कुछ भी नहीं बचा था | इस तरह की विकट परिस्थिति में उन्होंने जोतीराव-सावित्री की किताबों को रद्दी में बेच डाला | घर में बचे थोड़े-बहुत गहने और बर्तनों को भी बेचना पड़ा | आखिर में उन्होंने जोतीराव-सावित्री का घर सौ रूपए में बेच डाला | इसके बाद ये दोनों खड़कमाल आली के फुटपाथ पर रहने लगे | आगे चलकर बेटी का विवाह एक विधुर के साथ हुआ लेकिन बहु को मात्र भीख मांगकर अपना गुजर बसर करना पड़ा | १९३३ में जब उसकी मृत्यु फुटपाथ पर हुई तब एक लावारिस के रूप में पुणे नगरपालिका ने उनका अंतिम संस्कार किया | जिस काल में यह ह्रदयविदारक घटनाएँ फुले परिवार के साथ घटित हो रही थी उस समय में सत्यशोधक आन्दोलन जेधे और जवलकर के कब्ज़े में था | बहुजन नेता केशवराव जेधे करोड़पति थे उनके जेधे मैन्शन जैसे भव्य बंगले से कुछ फर्लांग की दूरी पर जोतीराव-सावित्रीबाई की बहू भीख मांगकर जीवन जी रही थी और लावारिस मर जाने के बाद भी उनकी मदत के लिए कोई भी सामने नहीं आया | उस समय में बहुत से ऐसे बहुजन थे जो अमीर थे किन्तु उनके भीतर अपने बहुजनों की सहायता की कोई वृत्ति नहीं थी | आज भी कमोबेश बहुजनों की स्थिति यही है | चुनावों में और धार्मिक कार्यक्रमों पर करोड़ों रूपए बहा देनेवाले ये बहुजन लोग सामाजिक कार्यों के लिए दमड़ी भर भी खर्च करने के लिए आगे नहीं आते | जोतीराव फुले ‘पूना कमर्शियल एंड कांट्रेक्टिंग कंपनी’ के प्रबंध निदेशक यानी मैनेजिंग डायरेक्टर थे | इस कंपनी की ओर से उन्होंने टनल, पुल, इमारतें, राजभवन, बाँध, कैनल और रास्ते भी बनाये और इन निर्माण कार्यों के लिए उन्होंने उत्कृष्ट दर्जे की रेत, गिट्टी और चुने की आपूर्ति भी की | किताबों का प्रकाशन और उनकी सुलभ बिक्री भी की | हरी सब्जियों की बिक्री पुणे से मुंबई भेजकर की | सोने के गहने बनाने के लिए उपयोग की जानेवाली मोल्ड्स की बिक्री का व्यवसाय भी किया | इन अनंत व्यवसायों को उन्होंने यशस्वी तरीके से किया और जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक संपत्ति की खरी कमाई की लेकिन यह सारी संपत्ति उन्होंने लड़कियों की पाठशाला, महिला छात्रावास, विधवाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह, किसान, दलित-वंचित-बहुजनों पर खर्च की | खुद के लिए उन्होंने इस संपत्ति से एक पैसा भी अपने पास नहीं रखा | जिस बहुजन समाज के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन त्याग दिया उस बहुजन समाज ने जोतीराव की औषधी और उपचार के लिए मदत की जानी चाहिए ऐसा एक क्षण भर विचार भी भला उनके मन में क्यों नहीं आया? उनकी बहू को मदत करने की सामान्य वृत्ति भी जेधे-जवलकर में क्यों नहीं थी ? क्या बहुजन समाज को कृतघ्नता का कोई शाप लगा हुआ है ? क्या वाकई में वंचित बहुजन समाज के पास कृतज्ञ बुद्धि की कोई परख है?

प्रोफेसर हरि नरके पुणे विश्वविद्यालय में महात्मा फुले चेयर के अध्यक्ष हैं. संदीप सपकाले हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा में प्राध्यापक हैं.

मीडिया की सुर्खियों से दूर जेएनयू के एक और छात्र नेता झारखंड के गोड्डा से उतरे मैदान में

विशद कुमार

2019 का इस लोकसभा चुनाव में बिहार का बेगुसराय चर्चे में इसलिए है कि वहां से जेएनयू के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सीपीआई के उम्मीदवार हैं। चर्चा इसलिए नहीं है कि वे सीपीआई के उम्मीदवार हैं बल्कि चर्चा इसलिए कि उनपर देश विरोधी नारा लगाने के आरोप रहे हैं और वे जेल की हवा भी खा चुके हैं, कि वे जाति के भूमिहार हैं और बेगुसराय भूमिहार बहुल क्षेत्र है। चर्चा है कि सीपीआई के उम्मीदवार होते हुए भी उन्हें भूमिहारों का समर्थन प्राप्त है, जबकि भाजपा ने पार्टी के बड़बोले नेता गिरिराज सिंह को मैदान में उतारा है, गिरिराज सिंह भी भूमिहार जाति से हैं और नवादा से सांसद रहे हैं। कन्हैया कुमार की जीत पर देश का प्रगतिशील और बौद्धिक तबका काफी आश्वस्त है।

इस बार गोड्डा, झारखण्ड से जेएनयू के छात्र नेता वीरेन्द्र कुमार दो बार के सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ चुनाव मैदान में.

एक दूसरी तस्वीर झारखंड में अडानी के लूट व सत्ता के दमन केन्द्र के रूप में चर्चित गोड्डा की है, जहां से जेएनयू के पूर्व छात्र नेता और सामाजिक आंदोलन के अगुआ वीरेन्द्र कुमार भी चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। जहां पिछले दो बार से सांसद रहे निशिकांत दुबे की कारपोरेटी दबंगई चलती है, वहीं इस बार महागठबंधन के उम्मीदवार जेवीएम के प्रदीप यादव भी मैदान में हैं।

गोड्डा लोकसभा क्षेत्र से लम्बे समय से छात्र-आंदोलन व सामाजिक न्याय की लड़ाई से जुड़े हुए वर्तमान में जेएनयू के शोध छात्र वीरेंद्र कुमार को लोकसभा चुनाव में उतारने का फैसला झारखंड जनतान्त्रिक महासभा द्वारा लिया गया है। वे अति पिछड़ी जाति से आते हैं। वीरेंद्र कुमार लगभग डेढ़ दशक से छात्र-आंदोलन से जुड़े हुए हैं। छात्र-आंदोलन के क्रम में उन्होंने बीएचयू से जेएनयू तक की यात्रा की है। इस बीच कुछ वर्षों तक उन्होंने झारखंड के गोड्डा-दुमका इलाके में जनसंघर्षों को भी संगठित किया है। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कई एक लड़ाईयां लड़ी है। जेएनयू में सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर लड़ते हुए लगातार दमन का मुकाबला किया है। निलंबन से लेकर आर्थिक दंड और मुकदमा तक को झेला है।

पिछले दिनों से उन्होंने झारखंड के जनसंघर्षों से जुड़े युवा साथियों के साथ झारखंड जनतान्त्रिक महासभा गठित कर साहसिक पहल कदमी शुरू की है। झारखंड के ज्वलंत प्रश्नों पर लंबी-लंबी पदयात्राएं की है। जिसमें जनसवाजो पर लगातार पहलकदमी ली गई है। जनता के पक्ष से ज्वलंत सवालों पर जोरदार राजनीतिक हस्तक्षेप किया गया है। अब वे जन राजनीतिक हस्तक्षेप को आगे बढ़ाते हुए गोड्डा लोकसभा में जनता के सवालों पर जनता के सामाजिक-राजनीतिक दावेदारी को बुलंद करने व जन राजनीतिक विकल्प पेश करने चुनाव मैदान में आ खड़े हुए हैं। बावजूद वे मीडिया के कैमरे की चमक उनतक नहीं पहुंच पाई है। वे मीडिया के लिए चेहरा नहीं बन पाए हैं। लेकिन संघर्ष की जमीन पर पांव टिकाए डटे हुए जरूर हैं।

वीरेन्द्र कुमार कहते हैं कि — यह चुनाव एक ऐसे समय में हो रहा है जब पिछले पाँच सालों से मोदी राज में एक तरह से अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। पिछले पाँच सालों में हर रोज सामाजिक न्याय की हत्या हुई है इस देश में, लगातार मुसलमानों को गाय के नाम पर मॉब लिंच करके मार दिया गया है, लगातर आदिवासियों की जमीन छीनने का काम कॉरपोरेट घरानों के इशारों पर भाजपा नेतृत्व वाली सरकार कर रही है, देश के हरेक कोने में दलितों को सरेआम पिटा गया, महिलाओं का बलात्कर कर बर्बरतम हत्या इस भाजपा राज में आम बात हो गई, सरकारी नौकरियों तथा उच्च शिक्षा में पिछड़ों समेत सभी शोषित तबकों को लगातार बाहर करने का प्रयास किया गया, सरकार की गलत नीतियों के वजह से उत्पन्न कृषि संकट के कारण हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, मजदूरों के हक अधिकार देने वाले सारे कानून को खत्म कर शोषणकारी कानून लागू करने का काम मोदी सरकार ने किया है, नौजवानों को हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी के कॉरपोरेट परस्त नीतियों की वजह से हर साल लाखों नौजवान बेरोजगार हो गए, छात्रों का स्कॉलरशिप कम तथा खत्म कर दिया गया। संविधान द्वारा मिले आरक्षण पर लगातार हमला बढ़ा और इसे किसी भी तरह से खत्म करने का प्रयास भाजपा सरकार ने लगातार किया है। पिछले पाँच सालों में मोदी राज में लोकतंत्र और बाबा साहेब के द्वारा बनाये संविधान की लगातार हत्या होती रही है।

इसी सरकार के कार्यकाल में साथी रोहित वेमूला की सांस्थानिक हत्या होती है और किसी भी अपराधी को सजा नहीं मिलता है, इसी सरकार के कार्यकाल में हमारे जेएनयू के साथी नजीब को कैम्पस से ही दिन-दहाड़े गायब कर दिया जाता है और सरकार अभी तक नजीब को खोजने के बजाय एबीवीपी के इशारे पर तमाशा देखती रही, जम्मू-कश्मीर में छोटी बच्ची आसिफ का सामुहिक बलात्कर और उसके बाद उसकी बर्बरतम तरीके से हत्या कर दी जाती है, लेकिन सरकार खामोश रहती है।

देखते ही देखते सरकार ने संविधान के अंदर आरक्षण के मूल बुनियादी आधार को पलट कर या यूँ कहें संविधान की हत्या कर सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण लागू कर अपने ब्राह्मणवादी होने का खुला परिचय दिया है, वहीं दूसरी तरह लाखों आदिवासियों को उनके ही जंगलों से बेदखल करने का आदेश आ जाता है और सरकार बेशर्मों की तरह चुप्पी साध लेती है। इन तमाम सवालों पर सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने और लड़ने वालों को गोली मार देना, जेल में डाल देना तथा देशद्रोही करार देना इस सरकार के कार्यकाल में आम बात गई है।

अति पिछड़े और पसमांदा के प्रतिनिधित्व के नाम पर भाजपा तथा सारी विपक्षी पार्टियाँ हमेशा खामोश रही हैं।

इन सारे सवालों पर सदन के अंदर बैठा विपक्ष सरकार को घेरने में नाकाम रहा है, इन गलत नीतियों के विरोध में विपक्ष सड़कों से हमेशा गायब रहा है। सरकार के खिलाफ अगर किसी ने विपक्ष की भूमिका निभाई है तो वह है यहाँ की जनता और उसका जनआंदोलन। असली विपक्ष के रूप में इस देश और झारखंड राज्य के अंदर छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान, आदिवासी, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिला तथा प्रगतशील बबुद्धिजीवी फासीवादी, ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी, सामंती, भाजपा नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ हमेशा सड़कों पर संघर्षरत रहे हैं।

झारखंड के अंदर लाखों की संख्या में कार्यरत अनुबन्धकर्मियों (पारा शिक्षक, आँगनबाड़ीकर्मी, जलसहिया, रसोईया, मनरेगाकर्मी, कृषि मित्र, बागवानी मित्र, पोषण सखी, ग्रामीण डाककर्मी, पारा स्वास्थ्यकर्मी एवं अन्य विभागों में कार्यरत अनुबन्धकर्मी) को बहुत कम मानदेय में सरकार काम करवा रही है। जब ये अनुबन्धकर्मी अपने जायज माँगों को लेकर सरकार के पास जाते हैं तो भजपा नेतृत्व वाली झारखंड सरकार इन अनुबन्धकर्मी साथियों को लाठी, आँसूगैस के गोले, और जेल उपहार स्वरूप देती है।

गोड्डा के अंदर अडानी कम्पनी को झारखंडियों-आदिवासियों को जमीन लूटने का खुली छूट झारखंड की रघुवर सरकार ने दे रखा है। लहलहाते फसलों को पॉवर प्लांट लगाने के नाम पर अडानी के गुंडों ने रौंद कर बर्बाद कर दिया। यह सब गोड्डा के अंदर अडानी की दलाली करने वाला क्षेत्र का  सांसद निशिकांत दूबे के इशारे पर हुआ।

वीरेंद्र आगे कहते हैं कि — वैसे मेरी उपस्थिति सामाजिक न्याय तथा जनता के आंदोलन का साथ झारखंड से लेकर दिल्ली तक हमेशा रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में ये चुनाव मेरे पूरे जीवन का पहला चुनाव है।

भाजपा नेतृत्व वाली सामाजिक न्याय विरोधी फासीवादी सरकार के खिलाफ तथा अडानी और इस तरह के बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ आंदोलन के मैदान में हमेशा लड़ता रहा, लेकिन इस बार चुनाव के मैदान में भी साम्प्रदायिक-सामंती ताकतों, भाजपा तथा फासीवादी नरेंद्र मोदी सरकार, अडानी और उसके दलालों के खिलाफ जनता के समर्थन और सहयोग से लड़ने के लिए तैयार हूँ।

हमारी लड़ाई गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में अडानी और भाजपा के प्रत्याशी तथा अडानी के पैरोकार निशिकांत दूबे से है और उम्मीद करते हैं क्षेत्र की जनता के सहयोग से ये साम्प्रदायिक-फासीवादी-सामंती कॉरपोरेट के दलालों को परास्त करेगी।

हम इस चुनाव में जीते या हारे लेकिन सामाजिक न्याय के लिए, संविधान की रक्षा और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, फासीवादी, साम्प्रदायिक, सामंती ताकतों तथा लूटेरी कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ हमेशा सड़कों पर लड़ते रहेंगे।

विशद कुमार पेशे से पत्रकार हैं.

बिहार- सियासत और लेनिनग्राद का मिथ

पूर्व वामपंथी शोधार्थी (बहुजन) मुलायम सिंह का बिहार की सियासत और उनके संगठन के पूर्व साथी कन्हैया कुमार की बेगुसराय में उम्मीदवारी के बहाने छिड़ी बहस पर यह आलेख पठनीय है. आलेख वामपंथी राजनीति की सीमाओं का एक इंसाइडर रिव्यू है.

मुलायम सिंह

पाँच साल मोदी सरकार के बीत जाने के बाद 2019 में देश में जब फिर से लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। मुल्क की सारी पार्टियाँ अपने ढंग से रणनीति बनाकर चुनाव जीतने की तैयारी कर रही हैं। सभी राज्यों के चुनाव का परिदृश्य  अलग-अलग राज्य की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप दिलचस्प है। जहां एक ओर मौजूदा एनडीए गठबंधन के खिलाफ यूपीए गठबंधन है तो वहीं कुछ कुछ राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का अपना गठबंधन मजबूती से चुनाव जीतने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। मोदी सरकार की जुमलेबाजी, झूठ, बेइमानी, भ्रष्टाचार, मंहगाई तथा जनविरोधी नीतियों को सारी पार्टियाँ अपने ढंग से पर्दाफाश कर रही हैं। सियासी ज्ञानियों की माने तो मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एनडीए के विशाल गठबंधन को हराने के लिए उसके विपक्ष में दूसरा मजबूत गठबंधन का खड़ा होना समय की जरूरत है। आगामी संकटग्रस्त परिस्थितियों की आहट को ध्यान में रखते हुए देखें तो इस बार 2019 का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। मोदी-शाह की मौजूदा जुगलबंदी देश में योगियों-ढोंगियों तथा आवारा भीड़ के सहारे आने वाले समय में क्या क्या तबाही मचाने वाली है इसका अंदजा शोषितों और वंचितों की पक्षधर पार्टियों के लोग लगा रहे हैं। लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिररेक्षता तथा सामाजिक न्याय को जिस तरह से ध्वस्त किया जा रहा है। दहशतगर्द संघ के इशारे पर जिस तरह से संविधान तथा संवैधानिक ढाँचे को छेड़ने और बदलने की व्याकुलता दिखाई दे रही है वो देश के 90 प्रतिशत बहुजनों को गुलाम बनाने की एक मनुवादी कोशिश है।

एआईएसएफ के दिनों में मुलायम सिंह डफली बजाते हुए

फिलहाल मेरी नजर अभी बिहार के चुनाव पर टिकी है। जैसा कि आपको ज्ञात हो कि बिहार विधानसभा चुनाव के जनादेश को छल से अपहरण करके पलटी मारते हुए नीतीश कुमार ने जब से मोदी-शाह की बेलगाम जोड़ी का दामन पकड़ा है, बिहार में आये दिन संघ के आतंकी और साम्प्रदायिक उन्माद की खबरें फैल रही हैं। नीतीश कुमार के सहारे भाजपा-संघ अपने सांप्रदायिक जहर को बिहार के जनमानस में फैलाने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा भाजपा-जदयू गठबंधन के विपक्ष में राजद-कांग्रेस-हम-रालोसपा तथा वीआईपी जैसी विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है। इस गठबंधन में शोषितों-वंचितों की पार्टियों तथा उनके हितों को  ध्यान में रख कर समायोजित किया गया है। इस गठबंधन में लालू प्रसाद की पार्टी राजद सबसे मजबूत घटक है। सांप्रदायिक फासीवाद के खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय जनता दल ने दूरदर्शिता दिखाई और दो कदम पीछे हट कर वामपंथी पार्टियों में भाकपा-माले को भी आरा सीट से एक टिकट देकर गठबंधन में शामिल किया। यही वो जड़ है जिसकी वजह से तथाकथित प्रगतिशीलों और जातिवादी साम्यवादियों के पेट में मरोड़ हो रही है।

आइये जानते हैं कि पेट में उठ रही इस दर्दनाक मरोड़ की असल वजह क्या है। इस मरोड़ की पहली वजह है कि भाकपा को गठबंधन में क्यों नहीं शामिल किया गया? और उसके पसंदीदा उम्मीदवार को क्यों टिकट नहीं दिया। पूरे एशिया और यूरोप के एनजीओ, मीडिया और संस्थानों में बैठे इन अभिजात्य वर्गीय और जातिवादी कामरेडों का तर्क है कि बेगूसराय से भाकपा के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को टिकट न देना, महागठबंधन के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा। राजद बेगुसराय में फासीवाद के खतरे की विभिषिका को भांप नहीं पा रहा है। बिहार में या देश में फासीवाद और सांप्रदायिक ताकतों का अगर सफाया होगा तो वो बिहार के बेगुसराय से होगा अन्यथा मुश्किल है। यह तर्क नहीं बल्कि सवर्णवादी हित के सम्मोहन के आगोश में अभिजात्य वर्ग एवं शिक्षित सवर्णों का सनकपन की हद तक गुजर जाना मात्र है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि भाजपा को हराने के लिए इनके चिंतन और भावावेश के केंद्र में बिहार का 39 लोकसभा सीट नहीं है। बल्कि सारा तिकड़म और कवायद सिर्फ बेगूसराय में राजद गठबंधन को हराने के लिए किया जा रहा है। वह भी राजद के ऐसे उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन को जो मोदी लहर में भी सभी उम्मीदवारों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर थे।

उम्मीदवारी को लेकर सियासत

भाकपा की तरफ से उम्मीदवारी का पहला तर्क यह है कि कन्हैया देश का सबसे बड़ा चेहरा है। अगर इनके इस प्रसिद्धि के तर्क को देखें तो फिर भाकपा को गठबंधन से बाहर होने पर मर्सिया गाने की क्या जरूरत है। वो तो एक ऐसे विश्व प्रसिद्ध उम्मीदवार को मैदान में उतारी है तो फिर डर किस बात का है? दूसरा तर्क यह है कि वो बेगुसराय का बेटा है। अहा! क्या महान मार्क्सवादी तर्क है। आप कहना क्या चाह रहे हैं कामरेड, कि महागठबंधन का उम्मीदवार कराची से आया है? क्या डॉ तनवीर हसन बेगुसराय का बेटा नहीं हैं, ये अपने आप में कितना ब्राह्मणवादी और साम्प्रदायिक मानसिकता वाला तर्क है। तीसरा तर्क यह है कि बेगूसराय लोक सभा क्षेत्र वामपंथ का गढ़ रहा है इसीलिए उसे लेलिनग्राद कहा जाता है। यह भी एक फर्जी का गढ़ा हुआ मिथ है। मौजूदा समय में भाकपा का बेगूसराय में न तो एक भी विधायक है और न ही सांसद। बल्कि 1967 में मात्र एक बार भाकपा वहाँ से लोकसभा चुनाव जीत पाई है। अब जनाधार के मामले में भी पार्टी दो लाख वोटों के अंदर में सिमट गई है। इसलिए ये लेलिनग्राद वाला प्रॉपेगेंडा भी भ्रामक है। बल्कि भाकपा के मुकाबले में राष्ट्रीय जनता दल का जनाधार वहाँ अधिक है। फिर किस तर्क के हिसाब से राजद अपने जीतने वाले, जमीनी और सबसे जुझारू उम्मीदवार की दावेदारी को खारिज करे?

पिछली बार तथाकथित मोदी लहर में राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन 3,69,892 वोट पाकर जीत के दौड़ में दूसरे नंबर पर थे। महज 58,335 वोट से भाजपा के उम्मीदवार भोला सिंह से हार गए थे। इस बार कांग्रेस के अलावा बिहार महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा, जीतन राम माझी की पार्टी हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी जैसी पार्टियों के शामिल होने से राजद का जनाधार और बढ़ेगा तथा डॉ. तनवीर हसन के जीतने की संभावना सबसे अधिक है। गठबंधन में शामिल उपरोक्त पार्टियों का अपना जातीय जनाधार वोट राजद गठबंधन में जुड़ने से भाजपा का हारना लगभग तय है। वहीं बेगुसराय सीट पर भाकपा और जदयू के संयुक्त उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 1,92,639 वोट मिले थे। अब खोते जनाधार वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पिछले वोट को आगामी चुनाव में हू ब हू मान भी ले तब भी भाजपा के कुख्यात नेता गिरिराज सिंह को हराने के लिए 2,35,588 वोटों से अधिक की जरूरत पड़ेगी। वहीं राजद के पिछले उम्मीदवार तनवीर हसन को भाजपा के उसके कुल 4,28,227 वोट से आगे जाने के लिए से महज 58,335 वोटों से अधिक की जरूरत है। अर्थात बेगूसराय सीट पर राजद के जीतने की दावेदारी प्रबल है।  

गठबंधन की सियासत

वामपंथ से मेरा कई सालों का नाता रहा है। वामपंथी पार्टियों के अंदर रह कर मैने काम किया है इसलिए उनके तौर-तरीके, नीति और नीयत का मुझे नजदीक से भान है। आइए गठबंधन की राजनीति को वामपंथी गठबंधन के नजरिये से समझते हैं। वामपंथी पार्टियाँ गठबंधन करने के दौरान सबसे पहले इस बात पर विचार करती हैं कि किस पार्टी से गठबंधन करना है। पार्टी तय हो जाने के बाद इस बात पर विचार किया जाता है कि कितने सीटों पर कौन पार्टी चुनाव लड़ेगी। इसके बाद अंत में क्षेत्र और उम्मीदवार कौन सा होगा इस बात पर निर्णय होता है। लेकिन यही भाकपा जैसी वामपंथी पार्टी जब राजद और कांग्रेस से गठबंधन करने जाती है तो गठबंधन होगा कि नहीं होगा, कितने सीटों पर होगा, बिना इस बात की परवाह किए अपने उम्मीदवार का नाम और क्षेत्र की घोषणा पहले ही कर देती है। महागठबंधन में शामिल न होने के कारण भाकपा घूम-घूम कर जो मर्सिया गा रही है उसकी तमाम अन्य वजहों में एक वजह यह भी रही है। राजद के आंतरिक सूत्रों का मानना है कि भाकपा की तरफ से जिन उम्मीदवारों के नाम पेश किए गए थे उनमें अधिकतर भूमिहार या सवर्ण जाति से थे। अब दलित-पिछड़े-अकलियत और वंचितों की राजनीति करने वाली राजद वामपंथ की इस सवर्णपरस्ती पर कैसे मोहर लगा देती। खैर अंततः भाकपा बिहार के महागठबंधन से बाहर हो गई।

जैसे ही पता चला कि महागठबंधन में उनको जगह नहीं मिली, भाकपा तथा अन्य वामपंथियों के रंगरूटों ने मीडिया पोर्टल, सोशल मीडिया, तथा कई यू-ट्यूब चैनलों पर लालू प्रसाद तथा राजद के खिलाफ लिखने लगे। अब राजद फिर से घोर जातिवादी हो गयी। लालू प्रसाद तथा उनके पूरे परिवार को तथाकथित चारा चोर और भ्रष्टाचारी के विशेषणों से नवाजा जाने लगा। मतलब साफ है कि इनका हित सध जाता तो राजद महान पार्टी हो जाती तथा विगत तीस सालों से मीडिया में बैठे मनुवादियों द्वारा लगातार विकृत की गई लालू प्रसाद और राजद की कलंकित छवि इनके निगाह में धुल कर साफ हो जाती। कहने का आशय यह है कि राजद अगर इनके सवर्णवादी मंसूबों को साधने में साथ देता तो ठीक था। नहीं तो मानो राजद गठबंधन ने देश में आने वाले इंकलाब की लहर को रोक कर भारतीय वामपंथी क्रांति की गति कुंद कर दिया हो। इसके अलावा एक बात और सोचने वाली है कि आरा लोकसभा सीट से महागठबंधन के उम्मीदवार कामरेड राजू यादव को लेकर पूरे देश के वामपंथियों की कोई चिंता नहीं है। शायद आरा में फासीवाद या सांप्रदायिकता का खतरा इनके नजर में नहीं है। जबकि आरा का उम्मीदवार कामरेड राजू यादव भाकपा-माले जैसी लेफ्ट पार्टी का ही है। संघर्ष के हिसाब से देखा जाए तो वहां सामंतियों और उच्च जातियों के आतंक के खिलाफ पिछड़ों और शोषितों का जबरदस्त प्रतिरोध का इतिहास रहा है। आरा का चुनाव प्रचार और माहौल देख कर लग रहा है कि भाकपा-माले खुद वहाँ गंभीर नहीं है। उनके जनसंगठनों के लोग आरा के बजाय बेगूसराय पर अपनी ऊर्जा लगाए हुए हैं। वामपंथ के महीनी जातिवाद और सवर्णपरस्ती का इससे बड़ा उदाहरण आपको कहीं नहीं मिलेगा। वामपंथ के उपरोक्त वैचारिक पतन और विचलनों को गंभीरता से समझा जाना चाहिए ताकि बहुजनों को वास्तविकता से अवगत कराया जा सके।

वामपंथ का दोहरा चरित्र

आइये गठबंधन की राजनीति को वामपंथ के वैचारिक तर्कों व नजरिए से समझते हैं। गठबंधन में भाकपा को शामिल न किये जाने की वजह से बेगूसराय में जो मीडिया के द्वारा माहौल बनाया जा रहा है उसका संबंध कहीं न कहीं छात्र राजनीति से भी जुड़ा है। जगह जगह इस बात का रोना-धोना हो रहा है कि जेएनयू की छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि से आये हुए एक युवा चेहरे को टिकट नहीं दिया गया। जिसके लिए मीडिया, एनजीओ और उच्च संस्थानों में बैठे ब्राह्मणवादी वामपंथियों ने बिहार में लगातार गठबंधन को कोसना शुरू कर दिया है। जबकि महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन की पृष्ठभूमि भी छात्र राजनीति रही है लेकिन उसका जिक्र कोई नहीं कर रहा है बल्कि उल्टा ये प्रोपेगैंडा चलाया जा रहा है कि तनवीर हसन वोटकटवा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, इसको समझने के लिए मैं आपको कुछ महीने पीछे जेएनयू की छात्र राजनीति की ओर ले चलता हूँ। पिछले सितंबर में जेएनयू में छात्रसंघ का चुनाव हो रहा था| छात्र राजद की तरफ से जयंत जिज्ञासु अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे| दूसरी तरफ लेफ्ट गठबंधन चुनाव लड़ रहा था| चूंकि जेएनयू कैंपस दुनिया में वैचारिक विमर्शों के लिए जाना जाता है अतः पूरे देश की निगाह जेएनयू छात्रसंघ चुनाव पर थी|तब कैंपस तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में बैठे सवर्णवादी वामपंथियों का तर्क था कि छात्र राजद को वोट मत दो नहीं तो ABVP जीत जाएगी| जयंत जिज्ञासु को वोट मत दो नहीं तो गठबंधन हार जाएगा| राजद लेफ्ट गठबंधन का वोट काट रहा है| सब लोग मिल कर गठबंधन को वोट करो|

आज हू ब हू राजनीतिक परिस्थिति बिहार के बेगूसराय लोक सभा क्षेत्र में बनी है| लेकिन आज देश के घनघोर जातिवादी वामपंथियों के सुर और तर्क बदल गए हैं| आप अंदाजा लगाइये कि कैसे जाति और वर्ग हित के हिसाब से दोमुहें वामपंथियों का सिद्धांत और तर्क बदल जाते हैं| आज बेगूसराय में ये किसका वोट काट रहे है क्या बहुजन बुद्धिजीवियों को पता नहीं है| वर्ग संघर्ष की बात करने वाले ये लोग दलित पिछड़े और मुसलमानों का नाम लेकर किसको झांसा दे रहे हैं| तुम अपना हित देख कर समाज की परिस्थितियों की व्याख्या करोगे और सोचते हो कि तुम्हारी धूर्तता को कोई पकड़ नहीं पाएगा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, लोहिया तथा जगदेव बाबू जैसे नायकों ने अपने समय में मार्क्सवाद की आड़ मे छिपे इनके इसी ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर किया था| बिहार लेनिन जगदेव बाबू तो खुलेआम बोलते थे कि ‘मुझे वामपंथी विचारधारा पसंद है लेकिन भारतीय वामपंथियों से नफरत है’।

लालू प्रसाद के साथ कन्हैया कुमार

मीडिया का सवर्णवादी चरित्र

चूंकि इन दिनों बिहार राजनीति में मीडिया के सारे कैमरे और लाव-लश्कर जब सीधे बेगूसराय क्षेत्र में जाकर शरण ले रहे हैं तो इस हलचल के पीछे की सियासत को समझना बहुत जरूरी है। आखिर क्या कारण है कि रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में चर्चा के दौरान कन्हैया कुमार का भाषण दिखाते हैं और यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि बेगुसराय में मुकाबला भाजपा के गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार में है। जबकि महज 58,335 वोट से भाजपा के उम्मीदवार भोला सिंह से पिछल बार पीछे रह जाने वाले राजद के उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन का जिक्र करना तक भी भूल जाते हैं। ये कैसी चाल है कि पिछली बार 39.71% वाले भाजपा के खिलाफ 35.30% वोट लाने वाले राजद उम्मीदवार तनवीर हसन को मुकाबले से गायब कर देते हैं और मात्र 17.86% वोट पाने वाली भाकपा को टक्कर में खड़ा कर देते हैं। क्या यह अनायास हो रहा है? मेरे हिसाब से बिल्कुल नही। मीडिया में बैठे सवर्णों द्वारा पूरी सोची-समझी साजिश के साथ कन्हैया कुमार को उछला जा रहा है। जबकि ऊपर मैने समझाने की कोशिश की है कि कैसे महागठबंधन के उम्मीदवार का पिछली बार की अपेक्षा इस बार जीतने की संभावना सबसे प्रबल है। तमाम पिछड़ी, दलित और मुस्लिम जातियों का वोट गठबंधन की तरफ आकर्षित हो चुका है। फिर, मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से बहुजन जनता को भ्रमित करने की वजह क्या है?  

सोचने वाली बात ये है कि ये कि ये दावा ठोक रहे हैं कि हम देश में मोदी को हराएंगें। लोकतंत्र और संविधान बचाएंगें। लेकिन 40 सीटों में एक सीट पर(बाकी जगह नाममात्र के लिए लड़ा जा रहा है, फोकस सिर्फ एक जगह है) व्याकुलता के साथ लड़ने वाली भाकपा या तथाकथित वामपंथी गैंग कैसे मोदी को हराएँगे। अगर अन्य सीट पर भाजपा जीत दर्ज कर लेगी तो एक सीट की चिंता में आतुर हो कर भला कैसे ये भाजपा को रोक लोगे। सच कहो तो इनका ये तर्क किसी को भी संतुष्टप्रद नहीं लग रहा है। देश भर के वामपंथियों की नजर अगर एक ही सीट पर टिकी हुई है तो, जो किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा को रोकने में सक्षम नहीं हैं फिर उनके इस तार्किकता के पतन का कारण क्या है? क्या वो कन्हैया के बहाने पूरे वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं? या फिर कन्हैया के जरिये व्यापक सवर्णवादी एवं अभिजात्य हितों के पोषित होने का सपना देख रहे हैं। मेरा जहां तक मानना है कि यहां वामपंथ का उत्थान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन गरीबी की ब्रांडिग जिस तरह से सवर्णवादी वामपंथियों के द्वारा किया जा रहा है, वह देश के शहरी मध्यवर्ग और अभिजात्य लोगों की  फंतासी को जरूर मानसिक खुराक दे रहा है। मीडिया या सोशल मीडिया पर इस नैरिटिव को बहुत जोर-शोर से बेचा जा रहा है।

सवर्णवादी वामपंथियों की कहीं इस छटपटाहट के पीछे कन्हैया को मोदी-विरोध का सबसे बड़ा चेहरा या आइकन बना कर प्रचारित करना तो नही है। अगर ऐसा है तो ये देश की सवर्णवादियों की सबसे बड़ी चतुराई है। आखिर देश में मोदी विरोधी तो कई चेहरें हैं। इस मुल्क में लालू यादव से बड़ा मोदी-संघ का प्रखर विरोधी चेहरा भला दूसरा कौन हो सकता है। सारे कैमरे और विमर्श की जद से उन्हें किस आधार पर उपेक्षित किया जा रहा है। क्या इस उपेक्षा के पीछे के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारण कोई बताएगा। सिर्फ नौजवानों की गिनती करें तो चंद्रशेखर रावण, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, हार्दिक पटेल आदि बहुत सारे चेहरे हैं, लेकिन वे क्यों नहीं प्रोजेक्ट किये जा रहे हैं। सारा छल-प्रपंच एक ही चेहरे के लिए क्यों हो रहा है। आखिर मंशा साफ है कि दलित, पिछड़ा, अंबेडकर, रोहित वेमुला आदि का नाम रटते हुए शब्दों की जादूगरी दिखाओ और परोक्ष में अपने सवर्णवादी हितों की साधना करो। अर्थात इन जनेऊ जनार्दनों के हिसाब से फूले, अंबेडकर, मंडल, बिरसा और अब्दुल कयूम जैसे नायकों की पीढ़ियों की सारी बौद्धिक चेतना शून्य हो गयी है न, जो तुम्हारी धूर्तता और चालबाजियों  को समझ नहीं पाएंगी।

इसलिये मतदाताओं को चाहिए कि वे बिहार में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक सीट पर जो हाय-तौबा मचाया जा रहा है, गरीब के बेटे के नाम पर सज रहे बाजार में सवर्णवादी हितों को साधने के लिए जितना बड़ा माहौल बनाया जा रहा है, उस पर शांति से, थोड़ी देर ठहर कर सोचें। मोदी को पूरे बिहार या देश में हराए बिना एक सीट पर जीत कर कैसे बोल्शेविक क्रांति हो सकती है इस मिथ को गंभीरता से समझने की जरूरत है।   

लेखक- मुलायम सिंह, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अध्येता एवं छात्रनेता हैं| आप युनाइटेड ओ.बी.सी फोरम के संस्थापक सदस्य हैं। देश में सामाजिक न्याय के सवालों को लेकर छात्र एवं युवा आंदोलनों में हमेशा संघर्षरत हैं|

महाराष्ट्र की ये महिलायें अपना गर्भाशय निकालने को क्यों हैं मजबूर (!)

गन्ना काटने वाले ठेकेदार उन महिलाओं को काम पर रखने के लिए तैयार नहीं हैं जिनकी माहवारी नियमित होती है. इसीलिए इस इलाके में महिलाओं का गर्भाशय निकाल देना आम चलन है.

“आप शायद ही इन गांवों में ऐसी महिलाओं से मिल पायेंगे जिनका गर्भाशय है। ये गाँव गर्भाशय विहीन महिलओं के गाँव हैं।” महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखा प्रभावित बीड जिले के हाजीपुर गांव में अपने छोटे से घर में बैठी मंदा उंगले बहुत ही दर्द के साथ यह बमुश्किल बयां कर पाती हैं.

वंजरवाड़ी में, जहाँ 50 प्रतिशत महिलाओं का गर्भाशय निकाल दिया गया है, महिलाओं का कहना है कि गाँवों में दो या तीन बच्चे होने के बाद गर्भाशय को निकालना  आम बात है।

इन महिलाओं में से अधिकांश गन्ना काटने वाली मजदूर हैं और गन्ना काटने के मौसम के दौरान पश्चिमी महाराष्ट्र के चीनी बेल्ट में प्रवास करती हैं; सूखे की तीव्रता के साथ, प्रवासियों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। एक अन्य गन्ना काटने वाली सत्यभामा कहती हैं, “मुकादम (ठेकेदार) अपने गन्ने के मजदूरों के समूह में बिना गर्भाशय वाली महिला को लेने को ज्यादा इच्छुक होता है।”

क्षेत्र के लाखों पुरुष और महिलाएं अक्टूबर और मार्च के बीच गन्ना कटर के रूप में काम करने के लिए पलायन करते हैं। ठेकेदार एक इकाई के रूप में गिने गए पति और पत्नी के साथ अनुबंध तैयार करते हैं। गन्ना काटना एक कठिन प्रक्रिया है और अगर पति या पत्नी एक दिन के लिए विराम लेते हैं, तो दंपति को हर ब्रेक के लिए ठेकेदार को प्रति दिन  500 का जुर्माना देना पड़ता है।

 माहवारी से काम की रुकावटें

माहवारी की अवधि काम में बाधा डालती है जिसके कारण जुर्माने लगते हैं। बीड में इसका समाधान निकाला गया है बिना गर्भाशय के महिला मजदूर।

 “ गर्भाशय निकल जानेके बाद, मासिक धर्म की कोई संभावना नहीं होती है। फिर तो, गन्ना काटने के दौरान ब्रेक लेने का कोई सवाल ही नहीं है। सत्यभामा कहती हैं, ” हम एक रुपया भी नहीं गंवा सकते। ठेकेदारों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान, महिलाएं एक या दो दिन का ब्रेक चाहती हैं जिससे काम रुक जाता है।

एक ठेकेदार दादा पाटिल ने कहा, “हमारे पास एक सीमित समय सीमा में का पूरा करने का लक्ष्य होता है और इसलिए हम ऐसी महिलाओं को नहीं चाहते हैं जिनको उस समय माहवारी हो ।” पाटिल ने जोर देकर कहा कि वह और अन्य ठेकेदार महिलाओं को सर्जरी करने के लिए मजबूर नहीं करते हैं; बल्कि, यह उनके परिवारों द्वारा बनाया गया एक विकल्प है।

दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं ने कहा कि ठेकेदार उन्हें एक सर्जरी के लिए अग्रिम भुगतान करते हैं और यह पैसा उनके वेतन से वसूला जाता है। इस मुद्दे पर एक अध्ययन करने वाले संगठन ‘तथापि’ के अच्युत बोरगांवकर ने कहा: “गन्ना काटने वाले समुदाय में, मासिक धर्म को एक समस्या माना जाता है और उन्हें लगता है कि इससे छुटकारा पाने के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन इससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे एक हार्मोनल असंतुलन, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे, वजन बढ़ने आदि से जूझने लगती हैं। हमने देखा कि 25 साल की उम्र में भी कम उम्र की लड़कियों को इस सर्जरी से गुजरना पड़ा है। ”

तर्क

सत्यभामा के पति और स्वयं गन्ना काटने वाले बंडू उगले, इसके पीछे के तर्क को स्पष्ट करते हैं। “एक टन गन्ना काटने के बाद एक जोड़े को लगभग  250 मिलते हैं। एक दिन में, हम लगभग 3-4 टन गन्ना काटते हैं और 4-5 महीने के पूरे सीजन में एक जोड़ी लगभग 300 टन गन्ना काटती है। हम इस सीजन के दौरान जो कमाते हैं, वह हमारी वार्षिक आय है क्योंकि हम गन्ना काटने से वापस आने के बाद कोई काम नहीं करते हैं, ”उगले कहते हैं। “हम एक दिन के लिए भी छुट्टी नहीं ले सकते। अगर हमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं तो भी हमें काम करना होगा। कोई आराम नहीं है और महिलाओं को होने वाली पीरियड एक अतिरिक्त समस्या है। ”

 सत्तर वर्षीय विलाबाई का कहना है कि एक गन्ना काटने वाली महिला का जीवन नारकीय होता है। वह संकेत देती है कि ठेकेदारों और उनके पुरुषों द्वारा महिलाओं का बार-बार यौन शोषण होता है। “गन्ना काटने वालों को गन्ने के खेतों में या एक तम्बू में चीनी मिलों के पास रहना पड़ता है। स्नानघर और शौचालय नहीं हैं। एक महिला के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है अगर इन परिस्थितियों में पीरियड्स हों, ”बूढ़ी महिला कहती है।

इस सूखाग्रस्त इलाके की कई महिलाओं ने कहा कि निजी चिकित्सक सामान्य पेट दर्द या श्वेत प्रदर की शिकायत होने पर भी गर्भाशय निकालने का सुझाव देते हैं.

द हिन्दू बिजनस लाइन से साभार

एक बहुजन नेत्री की संभावनाएं : मनीषा बांगर

इर्शादुल हक़

मायावती को कांशी राम ने अवसर दिया तो उन्होंने अपनी लीडरशिप साबित करके दिखाई. वह न सिर्फ भारत के सबसे बड़े राज्य की अनेक बार मुख्यमंत्री बनीं बल्कि अपनी पार्टी बसपा को उन्होंने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने में भी सफलता हासिल की. वहीं राबड़ी देवी को परस्थितियों ने मुख्यमंत्री बनाया. एक घरेलू गृहणी की भूमिका निभाने वाली राबड़ी देवी बड़ी-बड़ी चुनौतियों से जूझते हुए अपना नेतृत्व साबित किया और बिहार में लगातार सात वर्षों तक मुख्यमंत्री रहीं. नेतृत्व साबित करने की सबसे कठिन डगर अपने बलबूते संघर्ष कर आगे बढ़ने का होता है. पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक) की राष्ट्रीय अध्यक्ष  डॉ. मनीषा बांगर इसी तीसरी श्रेणी में आती हैं जिन्हें संघर्षों से आगे बढ़ते हुए अपना नेतृत्व स्थापित करने को ठान लिया है.
मनीषा बांगर को भले ही मायावती की तरह अवसर और राबड़ी देवी की तरह परस्थितियां नहीं मिली हों लेकिन उनमें जहां मायावती की तरह कूट-कूट कर साहस भरा है तो दूसरी तरफ राबड़ी देवी की तरह चुनौतियों से जूझने का माद्दा भी है. अगर किसी व्यक्ति में साहस और चुनौतियों से जूझने का माद्दा हो तो उससे भविष्य की बहुत सारी उम्मीदें वाबिस्ता हो जाना स्वाभाविक है. लेकिन जब बात डॉ. मनीषा बांगर की हो तो उन्हें खुद भी अपनी संघर्षशीलता, साहस और चुनौतियों को गले लगाने की कर्मठता पर विश्वास है. वह कहती हैं कि हमें जहां बीते जमाने की सावित्री बाई फुले, फातिमा शेख जैसी महान हस्तियों से प्रेरणा मिली है तो दूसरी तरफ यह स्वीकारने में ऐतराज नहीं कि कुछ सैद्धांतिक मतभिन्नता के बावजूद मौजूदा समय की दो नेत्रियों- मायावती व राबड़ी देवी जैसी शख्सियतों से भी प्रेरणा मिलती है.
मनीषा फिलहाल नागपुर लोकसभा सीट से पीपीआई (डी) की उम्मीदवार हैं और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक नितिन गडकरी के सामने चुनौती पेश कर रही हैं.

एक चिकित्सक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाली मनीषा बांगर गत 20  वर्षों से सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. उन्होंने बामसेफ जैसे राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाया तो मूलनिवासी संघ से जुड़ कर नीतिगत फैसले लेने वाली टीम का अभिन्न हिस्सा रहीं. इसी दौरान पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया( डेमोक्रेटिक) के गठन का फैसला हुआ तो उन्होंने इसके संस्थापक सदस्या के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई. 
दर असल बामसेफ व मूल निवासी संघ जैसे संगठनों ने मनीषा बांगर की योग्यता को पहचाना है और इन संगठनों को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं. उधर मनीषा की खासियत यह है कि वह सफलता के लिए किसी भी शार्टकट को अपनाने के बजाये एक लम्बे संघर्ष के रास्ते को चुना. वह कहती हैं कि “संघर्षों और चुनौतियों की भट्टी में तप कर निखरा हुआ नेतृत्व आमजन के लिए स्वीकार्य होता है. हम इसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं”.
सामाजिक आंदोलनों के लम्बे अनुभवों के साथ मनीषा अब राजनीतिक मैदान में कूद पड़ीं हैं. नागपुर लोकसभा से चुनावी मैदान में वह अपना अमिट छाप छोड़ रही हैं. वह कहती हैं कि राजनीतिक संघर्ष का एक पड़ाव है चुनाव. इस पड़ाव के बाद का सफर अनवरत जारी रहेगा.


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इर्शादुल हक पेशे से पत्रकार हैं.