इस अंक के लेखक: पूजा तिवारी, गंगा सहाय मीणा, डॉ. अनीता शुक्ल, महमुदा खानम, डॉ. अखिलेश गुप्ता, सुशील कुमार, स्वाति चौधरी, कंचन कुमारी, डॉ. पठान रहीम खान, अंजलि कुमारी, डॉ. श्रीमती स्वाती जाजू, रेणु चौधरी, सोनी पाण्डेय, वंदना शर्मा, राहुल प्रसाद, दिव्या एम पी, डॉ. सोनिया माला, डॉ. भुवाल सिंह ठाकुर, सत्य प्रकाश, सरस्वती मिश्र, ज्योति यादव, सुन्दरम् शर्मा, डॉ. शाहला के.पी, डॉ. निशा यादव इस अंक को लिंक के जरिये नॉटनल पर पढ़ा जा सकता है. जर्नल ऑनलाइन ही है. हम स्त्रीकाल नाम से ही प्रिंट में एक पत्रिका प्रकाशित करते हैं. लेखकों/पाठकों से आग्रह है कि वे अकादमिक रूप से पठनीय प्रिंट अंक के नियमित सदस्य बनें.
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अरुण नारायण कला संस्कृति एवं युवा विभाग और पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल
‘जब हम युवा थे तो कहा जाता था कि किसी सुदूर गांव में किसी झोंपड़ी में दिया या
लालटेन जल रही हो, कोई नौजवान पढ़
रहा हो तो वह राहुल को पढ़ रहा होगा। या उसके इर्द-गिर्द राहुल साहित्य होगा। एक
दौर था जब पूरे हिन्दी में राहुलजी सबपर छाये हुए थे। उन्होंने उत्साहित किया पूरे
हिन्दी समूह को। हमलोगों ने उन्हें देखा नहीं, लेकिन उनके प्रभाव को नजदीक से ग्रहण किया।
ये बातें हिन्दी चिंतक प्रेमकुमार मणि ने कर्पूरी ठाकुर सभागार, पटना में राहुल सांकृत्यायन की 121वीं जयंती समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि अपने संबोधन में कही। कला संस्कृति एवं युवा विभाग एवं पटना संग्रहालय की संयुक्त पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यता सुभाष शर्मा ने की। इस मौके पर खगेन्द्र ठाकुर, अरुण कमल, राहुल जी के पुत्र जेता सांकृत्यायन एवं विजय कुमार चौधरी ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
प्रेमकुमार मणि ने आगे कहा कि बोल्गा से गंगा, तुम्हारी क्षय हो, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दर्शन-दिग्दर्शन जैसी कितनी ही चीजें थीं, जिनसे हिन्दी समाज ने एक नई उर्जा पाई। उन्होंने कहा कि राहुल जी ज्ञान व्याकुल थे। आजमगढ़ के पिछड़े हुए गांव पन्दाहा में नाना के घर उनका जन्म हुआ। नाना सेना में साहब के साथ यात्राएं किया करते थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई एक मदरसे से आरंभ की थी। घूमना उन्होंने अपना धर्म बना लिया। वैचारिक सनातन मठ के स्वामी केदार पांडे, रामउदार साधू बने फिर आर्य समाजी। 1930 में बौद्ध बने। 1936 में कार्यकर्ता की धज धारण की। फिर कम्युनिस्ट बनते हैं, ऐसे कम्युनिस्ट बनते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां भी उसे पचा नहीं पातीं। आधुनिक युग के इस तपस्वी ने संस्कृत, पालि और अनेक विदेशी भाषाएं सीखीं। मानव समाज को किसी राष्ट्रीयता, गांव या खंड में बांटकर नहीं देखा। पूरी दुनिया को एक परिवार माना। हमने हजारीबाग जेल में देखी थी उनकी मेज। जिसपर 12-12 घंटे खड़े होकर वह काम करते थे। दर्शन-दिग्दर्शन कौन लिख सकता है? रशेल की दर्शन की किताब में पश्चिम दर्शन है, लेकिन राहुल जी की पुस्तक उससे आगे जाकर पूरब और पश्चिम का समुच्चय प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि जर्मन आइडियोलॉजी का संबंध भारतीय ज्ञान परंपरा से बनता है। राहुलजी ने धर्मकीर्ति और दिग्नाग को याद किया। उनके कई लेखों और पुस्तकों में धर्मकीर्ति की यह पंक्ति उद्धृत की जाती रही है। धर्मकीर्ति इंडोनिया के थे 660 में उनका निधन हो गया। उन्होंने वेदों को प्रमाण मानने, ईश्वरवाद में विश्वास करने, जातिवाद का अवलेप धारण करने, स्नान में धर्म की कामना, पाप को खत्म करने के लिए शरीर को कष्ट देने का विरोध किया। लेकिन यह कैसी विडंबना है कि हम धर्मकीर्ति के शिष्य के शिष्य के षिष्य शंकराचार्य को लेकर झूम रहे हैं।
कवि अरुण कमल ने कहा कि राहुलजी की सारी यात्राएं उनके जीवन में घर से भागने
से शुरू होती है। उनके नाम यात्रा की तरह ही जीवन और विचारयात्रा के भी विभिन्न
पड़ाव हैं। उनका पहला नाम केदारनाथ पांडेय था। वैरागियों के संपर्क में आये तो
रामउदार दास हो गए, स्वामी हुए आर्य
समाज के प्रभाव में आये लिखने लगे तो गोत्र के हिसाब से रामउदार सांकृत्यायन हो
गए। गोत्र का ख्याल आया तो नाम पड़ा राहुल सांकृत्यायन। कम्युनिस्ट हुए तो कॉमरेड
राहुल सांकृत्यायन हो गए। काषी के पंडितों की सभा हुई तो उन्हें महापंडित की उपाधि
दी गई।
श्री कमल ने कहा कि 4 खंडों की उनकी
जीवन यात्रा देश समाज को देखने की एक अलग दृष्टि देती है। आदमी क्यों दुखी है,
इसे कैसे दूर किया जा सकता है? संन्यासी, वैरागी क्यां होते हैं अभी भी खत्म क्यों नहीं होते,
कौन-सी वृत्ति है जो उन्हें ऐसा करने को
प्रेरित करती है आदि कई सवाल राहुल बुद्ध की तरह ऐड्रेस कर रहे थे। उन्होंने अलग
तरीके से मार्क्स, बुद्ध और यहां की
संत परंपरा को आत्मसात किया। वे बहुत से सवाल अपनी परंपरा से करते हैं। उन्होंने
कहा कि गोपीनाथ कविराज, रामवतार शर्मा और
राहुल ने भारतीय समाज को अलग तरीके से समझा। राहुल ने परमार्थ दर्शन लिखी। यह वेद
वेदांत की समस्त परंपरा का बहुत बड़ा खंडन था। ज्ञान की पिपासा उन्हें श्रीलंका ले
गई, जहां वे बौद्ध बने। वहां
उन्हें सब कुछ मिला। लेकिन जीवन को बदलने का सामूहिक उपक्रम नहीं मिला। उनका
मध्यममार्ग वैरागियों के प्रपंच को देख चुका था। भारतीय राजनीति में उन्होंने
कांग्रेस से जुड़कर काम किया। बिहार सोशलिस्ट पार्टी, बिहार कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा की स्थापना में वे
शामिल रहे। प्रलेस, हिन्दी साहित्य
सम्मेलन आदि से जुड़े। हर समाज में वे रहे। उनका जीवन ही सन्देश है।
आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित बनैलीगढ़ में
राहुल जी 3 माह ठहरे थे। यह सन 1933 का
साल था, जब वहां से शिवपूजन सहाय
के संपादन में ‘गंगा’ पत्रिका निकला करती थी। ‘गंगा’ के पुरातत्व विशेषांक की तैयारी चल रही थी। इसी काम के लिए
राहुलजी लाये गए थे। बाद में वहां लोगों ने राहुल नगर बसाया। कमला जी उस मुहल्ले
को देखने आयीं। श्री ठाकुर ने कहा कि राहुल जी के दर्शन का अवसर मुझे नहीं मिला।
लेकिन उनके दार्जिलिंग स्थित कचहरी रोड आवास मैं गया। वे मसूरी में बसना चाहते थे,
लेकिन कमला जी को वहीं अध्यापकी मिली सो वह
वहीं रह गईं। अंतिम बार 1958 में राहुल जी
पटना आये। लेकिन मैं उनसे मिल न सका। अमवारी में उन्होंने किसानों के लिए
सत्याग्रह किया। किसानों की ओर से ईख काटने के लिए गए। ईख काटने के लिए जैसे ही हशिया
चलाया उनके उपर बरछे की बार की गई। इसी को लक्षित करते हुए कवि मनोरंजन ने लिखा-
‘राहुल के सर से खून गिरे फिर क्यों न यह खून उबल उठे? साधू के शोणित से फिर क्यों सोने की लंका जल न उठे?’
खगेंद्र ठाकुर ने कहा कि राहुल जी की जीवन यात्रा विचार यात्रा भी है। उनकी
यात्रा वैष्णववाद से शुरू होती है। धार्मिक, वैचारिक मान्यता से वे वैष्णव हैं। डेढ़ सौ छोटी बड़ी
पुस्तकें हैं उनकी। उनके बारे में शिवपूजन सहाय का कहा याद आता है कि राहुल जी को
देखकर ऐसा लगता है कि वेद, पुराण सब एक ही
आदमी ने लिखी होगी। राहुलजी ने कहा है कि मैं जीवन में क्षण-क्षण का तो नहीं लेकिन
मिनट-मिनट का हिसाब दे सकता हूं। हमलोग तो प्रतिदिन का भी हिसाब नहीं दे सकते। 1935 में वे रूस गए। वहां ढाई साल रहे। 1939 में विजया दशमी के दिन 17 लोगों के साथ मिलकर कम्युनिस्ट पार्टी बिहार
की स्थापना की। उन्होंने माना कि संपूर्ण भारतीय मनीषा का प्रतिनिधित्व राहुलजी ही
करते हैं। खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी ने राहुल जी को पार्टी से
निकाला नहीं था। बल्कि उनकी पार्टी सदस्यता का रिन्यूअल नहीं किया था। हुआ यूं था
कि हिन्दी सम्मेलन मुम्बई में आयोजित किया गया था जिसमें अपने पर्चे में राहुल जी
ने अंग्रेजी के वरअक्स हिन्दी उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं को रखने की बात कही थी।
इसपर पार्टी ने उन्हें उर्दू को हटाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस आषय का
पर्चा लोगों में बंट गया है इसलिए उचित नहीं होगा। दूसरे दिन पार्टी ने आग्रह किया
कि वे मंच से स्वीकार कर लें कि यह उनकी अपनी राय है पार्टी की नहीं। लेकिन
उन्होंने यह भी नहीं किया। पार्टी ने उन्हें निकाला नहीं, लेकिन 1955 में उनकी
सदस्यता रिन्यूअल कर दी गई।
विकास आयुक्त सुभाष शर्मा ने राहुलजी के बारे में लंबा विवेचनात्मक पर्चा पढ़ा।
कहा कि वे एकमात्र विद्वान हैं जिन्हें महापंडित के रूप में जाना गया। हिन्दी की
वकालत के कारण कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें निकाल दिया। आकाशवाणी में उन्हें कई
बार बुलाया गया। वहां जाने से इसलिए इनकार किया कि अनुबंध तब अंग्रेजी में छपे
होते थे। उन्होंने 36 भाषाओं का ज्ञान
प्राप्त किया। इनमें से 3 भाषाएं शिक्षकों
से सीखी बाकी सभी खुद के प्रयत्नों से। उन्होंने हिन्दी के ज्ञात साहित्येतिहास को
दौ सौ वर्ष पहले का सिद्ध किया। सरहप्पा के दोहों को संगृहीत किया। उन्होंने कहा
कि इतिहास को इतिहासकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राहुलजी
की एशिया का इतिहास प्रोफेशनल इतिहासकारों से भिन्न है। उन्होंने तिब्बत से 17 खच्चरों पर लादकर बौद्ध धर्म से संबंधित कई
महत्वपूर्ण दस्तावेज लादकर लाये और उसे पटना म्यूजियम में संरक्षित करवाया। यह
दुष्कर कार्य था जिसे उन्होंने संभव कर दिखाया। उन्होंने कई देशों का भ्रमण किया।
लोकभाषाओं के महत्व को उचित मान दिया। भोजपुरी के तमाम रूपों की भी बहुत गहरी
व्याख्या की है। 9 नाटक भोजपुरी
में लिखे। अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को स्थान दिलाने का
संघर्ष करते रहे।
विजय कुमार चौधरी ने कहा कि राहुल जी का पूरा लेखन भारतीय परंपरा में निहित था
जो उनके अपने ही जीवनानुभवों से सिंचित हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य समाज से भी
वे जुड़े। जो स्वयं विरोधाभासों से भरा था। वहां पाखंड था, कर्मकांड था। वह पुराने ग्रंथों में आधुनिकता को ढूंढता है।
बुद्ध को उन्होंने महामानव कहा। कहा कि ‘22वीं सदी’ में वे मार्क्स
का स्थूल प्रजेंटेशन करते हैं। वे ऐसे लेखकों में थे जिन्होंने हिन्दी के प्रति
अपनी निष्ठा को खुलकर प्रकट किया। वे निरंतर विचारों की यात्रा में लगे रहे। अपने
को लगातार चैलेंज में लेते रहे।
राहुल सांकृत्यायन के पुत्र जेता सांकृत्यायन ने स्लाइड के जरिये राहुलजी के
जीवनक्रम से जुड़े बहुत सारे दुर्लभ फोटोग्राफ और जानकारियां साझा की। उन्होंने
राहुलजी के किशोर वय से अंतिम वय तक के ढेर सारे चित्र और विविध घटना संदर्भों की
व्याख्या की। सन 1930 से 1963 तक के अनेक संदर्भों को समेटती इन छवियों के
माध्यम से राहुलजी जीवंत हो उठे। मसूरी,कुमाउ, नालंदा, कानपुर, अमवारी, दार्जिलिंग,
रूस, तिब्बत, नालंदा, श्रीलंका आदि कई जगहां की इन तस्वीरों में उनके
जीवन की तरह की वैविध्य नजर आई। कहीं कुमाउ षैली के कुर्ते में हैं तो कहीं,
नालंदा बौद्ध भिक्षुओं के साथ छाता लिए। कहीं
बौद्ध धर्म का चीवर त्याग संघर्ष को उद्धत हैं। कहीं अध्ययन कक्ष में हैं तो कहीं
किसान संघर्ष के मोर्चे पर डंटे हैं। निराला और नेहरू के साथ भी एक अलग दीप्ति के
साथ उनकी छवि दीप्त होती दिखी। जेता ने कहा कि यात्रा से कैसे जीवन बनता है इसकी
वे मिषाल हैं। प्राचीन आर्य की तरह लगते हैं वे। उन्होंने गरीबी देखी थी, गांव में जन्में थे। आर्य समाज से बौद्ध धर्म
और मार्क्सवाद की अपनी यात्रा में उन्होंने समाज को बहुत कुछ दिया।
उन्होंने कहा कि 1960 में श्रीलंका
में दर्षन के आचार्य और डीन का दायित्व संभाला किंतु भारत के किसी वि.वि. ने उनकी
प्रतिभा का उपयोग नहीं किया। उन्होंने दो खंडों में तिब्बती हिन्दी शब्दकोष की
रचना की जिसके प्रथम खंड का प्रकाषन साहित्य अकादेमी दिल्ली ने किया। उन्होंने
तिब्बती संस्कृत कोष की भी रचना की। 1959 में जब उन्हें मध्य एशिया का इतिहास पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान
देने की घोषणा की गई तो आरंभ में उन्होंने उसे लेने से इनकार किया। कहा कि झुककर
सम्मान नहीं लूंगा लेकिन मां और अंततः पार्टी के कहने पर उसे स्वीकार किया,
लेकिन झुककर नहीं। उनके साहित्य का विशिष्ट
परिचय उनकी अप्रतिम इतिहास दृष्टि में है। हमलागों ने उनकी स्मृति में एक स्तूप
खड़ा किया गया। उनकी चीजों को संरक्षित करने की कोशिश करता रहा, लेकिन यह प्रयास
अकेले परिवार के बूते संभव नहीं है। सरकार आये तो उसको बचाया जा सकता है। उन्होंने
कहा कि धर्मकीर्ति पर बहुत सारा काम हुआ है। राहुल जी ने तिब्बत से उनपर बहुत सारी
सामग्री लाई थी जो पटना म्यूजियम में रखी है इसपर नई रोशनी में शोध की जरूरत है।
संपर्कः अरुण नारायण, प्रश्न शाखा, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015 मोबाइल 8292253306
महात्मा जोतीराव फुले किसान, व्यापारी, प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता, आयुक्त और एक बड़ी कंपनी के प्रबंध संचालक थे | दिन-रात मेहनत करते हुए उन्होंने इस संपत्ति का निर्माण किया था | अपनी इस समग्र जमापूंजी को उन्होंने वंचित, दलित, बहुजन और स्त्रियों के उद्धार में खर्च किया था | पैरेलिसिस के अटैक के बाद उनके पास अपनी दवा के लिए भी पैसे नहीं बचे थे | डॉ. विश्राम रामजी घोले और भवालकर जैसे उनके कुछ मित्रों ने थोड़ी बहुत सहायता की | उस समय मामा परमानन्द ने महाराजा सयाजीराव गायकवाड से वैद्यकीय सहायता के लिए गुहार लगाई थी किन्तु उस समय महाराजा गायकवाड विदेश यात्रा पर गए हुए थे | अपनी विदेश यात्रा से जब तक वे लौटते तबतक बिना दवा और इलाज के २८ नवम्बर १८९० को जोतीराव की प्राणजोत बुझ गयी |उन्होंने ब्राह्मण विधवा से दत्तक लिए बच्चे को पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाया था | इसी दत्तक पुत्र ने आगे चलकर सेना की नौकरी में देश-विदेश में नौकरी की थी | १८९७ में प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए सावित्रीबाई फुले का देहांत १० मार्च १८९७ में हुआ |
डॉ. यशवंत की मृत्यु भी १९०५ के प्लेग की रोकथाम के लिए काम करते हुए हुई | उनके उपरांत उनकी बेटी और पत्नी के उदर निर्वाह के लिए कुछ भी नहीं बचा था | इस तरह की विकट परिस्थिति में उन्होंने जोतीराव-सावित्री की किताबों को रद्दी में बेच डाला | घर में बचे थोड़े-बहुत गहने और बर्तनों को भी बेचना पड़ा | आखिर में उन्होंने जोतीराव-सावित्री का घर सौ रूपए में बेच डाला | इसके बाद ये दोनों खड़कमाल आली के फुटपाथ पर रहने लगे | आगे चलकर बेटी का विवाह एक विधुर के साथ हुआ लेकिन बहु को मात्र भीख मांगकर अपना गुजर बसर करना पड़ा | १९३३ में जब उसकी मृत्यु फुटपाथ पर हुई तब एक लावारिस के रूप में पुणे नगरपालिका ने उनका अंतिम संस्कार किया | जिस काल में यह ह्रदयविदारक घटनाएँ फुले परिवार के साथ घटित हो रही थी उस समय में सत्यशोधक आन्दोलन जेधे और जवलकर के कब्ज़े में था | बहुजन नेता केशवराव जेधे करोड़पति थे उनके जेधे मैन्शन जैसे भव्य बंगले से कुछ फर्लांग की दूरी पर जोतीराव-सावित्रीबाई की बहू भीख मांगकर जीवन जी रही थी और लावारिस मर जाने के बाद भी उनकी मदत के लिए कोई भी सामने नहीं आया | उस समय में बहुत से ऐसे बहुजन थे जो अमीर थे किन्तु उनके भीतर अपने बहुजनों की सहायता की कोई वृत्ति नहीं थी | आज भी कमोबेश बहुजनों की स्थिति यही है | चुनावों में और धार्मिक कार्यक्रमों पर करोड़ों रूपए बहा देनेवाले ये बहुजन लोग सामाजिक कार्यों के लिए दमड़ी भर भी खर्च करने के लिए आगे नहीं आते | जोतीराव फुले ‘पूना कमर्शियल एंड कांट्रेक्टिंग कंपनी’ के प्रबंध निदेशक यानी मैनेजिंग डायरेक्टर थे | इस कंपनी की ओर से उन्होंने टनल, पुल, इमारतें, राजभवन, बाँध, कैनल और रास्ते भी बनाये और इन निर्माण कार्यों के लिए उन्होंने उत्कृष्ट दर्जे की रेत, गिट्टी और चुने की आपूर्ति भी की | किताबों का प्रकाशन और उनकी सुलभ बिक्री भी की | हरी सब्जियों की बिक्री पुणे से मुंबई भेजकर की | सोने के गहने बनाने के लिए उपयोग की जानेवाली मोल्ड्स की बिक्री का व्यवसाय भी किया | इन अनंत व्यवसायों को उन्होंने यशस्वी तरीके से किया और जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक संपत्ति की खरी कमाई की लेकिन यह सारी संपत्ति उन्होंने लड़कियों की पाठशाला, महिला छात्रावास, विधवाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह, किसान, दलित-वंचित-बहुजनों पर खर्च की | खुद के लिए उन्होंने इस संपत्ति से एक पैसा भी अपने पास नहीं रखा | जिस बहुजन समाज के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन त्याग दिया उस बहुजन समाज ने जोतीराव की औषधी और उपचार के लिए मदत की जानी चाहिए ऐसा एक क्षण भर विचार भी भला उनके मन में क्यों नहीं आया? उनकी बहू को मदत करने की सामान्य वृत्ति भी जेधे-जवलकर में क्यों नहीं थी ? क्या बहुजन समाज को कृतघ्नता का कोई शाप लगा हुआ है ? क्या वाकई में वंचित बहुजन समाज के पास कृतज्ञ बुद्धि की कोई परख है?
प्रोफेसर हरि नरके पुणे विश्वविद्यालय में महात्मा फुले चेयर के अध्यक्ष हैं. संदीप सपकाले हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा में प्राध्यापक हैं.
2019 का इस लोकसभा चुनाव में बिहार का बेगुसराय चर्चे में इसलिए है कि वहां से जेएनयू के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सीपीआई के उम्मीदवार हैं। चर्चा इसलिए नहीं है कि वे सीपीआई के उम्मीदवार हैं बल्कि चर्चा इसलिए कि उनपर देश विरोधी नारा लगाने के आरोप रहे हैं और वे जेल की हवा भी खा चुके हैं, कि वे जाति के भूमिहार हैं और बेगुसराय भूमिहार बहुल क्षेत्र है। चर्चा है कि सीपीआई के उम्मीदवार होते हुए भी उन्हें भूमिहारों का समर्थन प्राप्त है, जबकि भाजपा ने पार्टी के बड़बोले नेता गिरिराज सिंह को मैदान में उतारा है, गिरिराज सिंह भी भूमिहार जाति से हैं और नवादा से सांसद रहे हैं। कन्हैया कुमार की जीत पर देश का प्रगतिशील और बौद्धिक तबका काफी आश्वस्त है।
इस बार गोड्डा, झारखण्ड से जेएनयू के छात्र नेता वीरेन्द्र कुमार दो बार के सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ चुनाव मैदान में.
एक दूसरी तस्वीर झारखंड में अडानी के लूट व सत्ता के दमन केन्द्र के रूप में चर्चित गोड्डा की है, जहां से जेएनयू के पूर्व छात्र नेता और सामाजिक आंदोलन के अगुआ वीरेन्द्र कुमार भी चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। जहां पिछले दो बार से सांसद रहे निशिकांत दुबे की कारपोरेटी दबंगई चलती है, वहीं इस बार महागठबंधन के उम्मीदवार जेवीएम के प्रदीप यादव भी मैदान में हैं।
गोड्डा लोकसभा क्षेत्र से लम्बे समय से छात्र-आंदोलन व सामाजिक न्याय की लड़ाई से जुड़े हुए वर्तमान में जेएनयू के शोध छात्र वीरेंद्र कुमार को लोकसभा चुनाव में उतारने का फैसला झारखंड जनतान्त्रिक महासभा द्वारा लिया गया है। वे अति पिछड़ी जाति से आते हैं। वीरेंद्र कुमार लगभग डेढ़ दशक से छात्र-आंदोलन से जुड़े हुए हैं। छात्र-आंदोलन के क्रम में उन्होंने बीएचयू से जेएनयू तक की यात्रा की है। इस बीच कुछ वर्षों तक उन्होंने झारखंड के गोड्डा-दुमका इलाके में जनसंघर्षों को भी संगठित किया है। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ कई एक लड़ाईयां लड़ी है। जेएनयू में सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर लड़ते हुए लगातार दमन का मुकाबला किया है। निलंबन से लेकर आर्थिक दंड और मुकदमा तक को झेला है।
पिछले दिनों से उन्होंने झारखंड के जनसंघर्षों से जुड़े युवा साथियों के साथ झारखंड जनतान्त्रिक महासभा गठित कर साहसिक पहल कदमी शुरू की है। झारखंड के ज्वलंत प्रश्नों पर लंबी-लंबी पदयात्राएं की है। जिसमें जनसवाजो पर लगातार पहलकदमी ली गई है। जनता के पक्ष से ज्वलंत सवालों पर जोरदार राजनीतिक हस्तक्षेप किया गया है। अब वे जन राजनीतिक हस्तक्षेप को आगे बढ़ाते हुए गोड्डा लोकसभा में जनता के सवालों पर जनता के सामाजिक-राजनीतिक दावेदारी को बुलंद करने व जन राजनीतिक विकल्प पेश करने चुनाव मैदान में आ खड़े हुए हैं। बावजूद वे मीडिया के कैमरे की चमक उनतक नहीं पहुंच पाई है। वे मीडिया के लिए चेहरा नहीं बन पाए हैं। लेकिन संघर्ष की जमीन पर पांव टिकाए डटे हुए जरूर हैं।
वीरेन्द्र कुमार कहते हैं कि — यह चुनाव एक ऐसे समय में हो रहा है जब पिछले पाँच सालों से मोदी राज में एक तरह से अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। पिछले पाँच सालों में हर रोज सामाजिक न्याय की हत्या हुई है इस देश में, लगातार मुसलमानों को गाय के नाम पर मॉब लिंच करके मार दिया गया है, लगातर आदिवासियों की जमीन छीनने का काम कॉरपोरेट घरानों के इशारों पर भाजपा नेतृत्व वाली सरकार कर रही है, देश के हरेक कोने में दलितों को सरेआम पिटा गया, महिलाओं का बलात्कर कर बर्बरतम हत्या इस भाजपा राज में आम बात हो गई, सरकारी नौकरियों तथा उच्च शिक्षा में पिछड़ों समेत सभी शोषित तबकों को लगातार बाहर करने का प्रयास किया गया, सरकार की गलत नीतियों के वजह से उत्पन्न कृषि संकट के कारण हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, मजदूरों के हक अधिकार देने वाले सारे कानून को खत्म कर शोषणकारी कानून लागू करने का काम मोदी सरकार ने किया है, नौजवानों को हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी के कॉरपोरेट परस्त नीतियों की वजह से हर साल लाखों नौजवान बेरोजगार हो गए, छात्रों का स्कॉलरशिप कम तथा खत्म कर दिया गया। संविधान द्वारा मिले आरक्षण पर लगातार हमला बढ़ा और इसे किसी भी तरह से खत्म करने का प्रयास भाजपा सरकार ने लगातार किया है। पिछले पाँच सालों में मोदी राज में लोकतंत्र और बाबा साहेब के द्वारा बनाये संविधान की लगातार हत्या होती रही है।
इसी सरकार के कार्यकाल में साथी रोहित वेमूला की सांस्थानिक हत्या होती है और किसी भी अपराधी को सजा नहीं मिलता है, इसी सरकार के कार्यकाल में हमारे जेएनयू के साथी नजीब को कैम्पस से ही दिन-दहाड़े गायब कर दिया जाता है और सरकार अभी तक नजीब को खोजने के बजाय एबीवीपी के इशारे पर तमाशा देखती रही, जम्मू-कश्मीर में छोटी बच्ची आसिफ का सामुहिक बलात्कर और उसके बाद उसकी बर्बरतम तरीके से हत्या कर दी जाती है, लेकिन सरकार खामोश रहती है।
देखते ही देखते सरकार ने संविधान के अंदर आरक्षण के मूल बुनियादी आधार को पलट कर या यूँ कहें संविधान की हत्या कर सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण लागू कर अपने ब्राह्मणवादी होने का खुला परिचय दिया है, वहीं दूसरी तरह लाखों आदिवासियों को उनके ही जंगलों से बेदखल करने का आदेश आ जाता है और सरकार बेशर्मों की तरह चुप्पी साध लेती है। इन तमाम सवालों पर सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने और लड़ने वालों को गोली मार देना, जेल में डाल देना तथा देशद्रोही करार देना इस सरकार के कार्यकाल में आम बात गई है।
अति पिछड़े और पसमांदा के प्रतिनिधित्व के नाम पर भाजपा तथा सारी विपक्षी पार्टियाँ हमेशा खामोश रही हैं।
इन सारे सवालों पर सदन के अंदर बैठा विपक्ष सरकार को घेरने में नाकाम रहा है, इन गलत नीतियों के विरोध में विपक्ष सड़कों से हमेशा गायब रहा है। सरकार के खिलाफ अगर किसी ने विपक्ष की भूमिका निभाई है तो वह है यहाँ की जनता और उसका जनआंदोलन। असली विपक्ष के रूप में इस देश और झारखंड राज्य के अंदर छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान, आदिवासी, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिला तथा प्रगतशील बबुद्धिजीवी फासीवादी, ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी, सामंती, भाजपा नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ हमेशा सड़कों पर संघर्षरत रहे हैं।
झारखंड के अंदर लाखों की संख्या में कार्यरत अनुबन्धकर्मियों (पारा शिक्षक, आँगनबाड़ीकर्मी, जलसहिया, रसोईया, मनरेगाकर्मी, कृषि मित्र, बागवानी मित्र, पोषण सखी, ग्रामीण डाककर्मी, पारा स्वास्थ्यकर्मी एवं अन्य विभागों में कार्यरत अनुबन्धकर्मी) को बहुत कम मानदेय में सरकार काम करवा रही है। जब ये अनुबन्धकर्मी अपने जायज माँगों को लेकर सरकार के पास जाते हैं तो भजपा नेतृत्व वाली झारखंड सरकार इन अनुबन्धकर्मी साथियों को लाठी, आँसूगैस के गोले, और जेल उपहार स्वरूप देती है।
गोड्डा के अंदर अडानी कम्पनी को झारखंडियों-आदिवासियों को जमीन लूटने का खुली छूट झारखंड की रघुवर सरकार ने दे रखा है। लहलहाते फसलों को पॉवर प्लांट लगाने के नाम पर अडानी के गुंडों ने रौंद कर बर्बाद कर दिया। यह सब गोड्डा के अंदर अडानी की दलाली करने वाला क्षेत्र का सांसद निशिकांत दूबे के इशारे पर हुआ।
वीरेंद्र आगे कहते हैं कि — वैसे मेरी उपस्थिति सामाजिक न्याय तथा जनता के आंदोलन का साथ झारखंड से लेकर दिल्ली तक हमेशा रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में ये चुनाव मेरे पूरे जीवन का पहला चुनाव है।
भाजपा नेतृत्व वाली सामाजिक न्याय विरोधी फासीवादी सरकार के खिलाफ तथा अडानी और इस तरह के बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ आंदोलन के मैदान में हमेशा लड़ता रहा, लेकिन इस बार चुनाव के मैदान में भी साम्प्रदायिक-सामंती ताकतों, भाजपा तथा फासीवादी नरेंद्र मोदी सरकार, अडानी और उसके दलालों के खिलाफ जनता के समर्थन और सहयोग से लड़ने के लिए तैयार हूँ।
हमारी लड़ाई गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में अडानी और भाजपा के प्रत्याशी तथा अडानी के पैरोकार निशिकांत दूबे से है और उम्मीद करते हैं क्षेत्र की जनता के सहयोग से ये साम्प्रदायिक-फासीवादी-सामंती कॉरपोरेट के दलालों को परास्त करेगी।
हम इस चुनाव में जीते या हारे लेकिन सामाजिक न्याय के लिए, संविधान की रक्षा और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, फासीवादी, साम्प्रदायिक, सामंती ताकतों तथा लूटेरी कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ हमेशा सड़कों पर लड़ते रहेंगे।
पूर्व वामपंथी शोधार्थी (बहुजन) मुलायम सिंह का बिहार की सियासत और उनके संगठन के पूर्व साथी कन्हैया कुमार की बेगुसराय में उम्मीदवारी के बहाने छिड़ी बहस पर यह आलेख पठनीय है. आलेख वामपंथी राजनीति की सीमाओं का एक इंसाइडर रिव्यू है.
मुलायम सिंह
पाँच साल मोदी सरकार के बीत जाने के बाद 2019 में देश में जब फिर से लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। मुल्क की सारी पार्टियाँ अपने ढंग से रणनीति बनाकर चुनाव जीतने की तैयारी कर रही हैं। सभी राज्यों के चुनाव का परिदृश्य अलग-अलग राज्य की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप दिलचस्प है। जहां एक ओर मौजूदा एनडीए गठबंधन के खिलाफ यूपीए गठबंधन है तो वहीं कुछ कुछ राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का अपना गठबंधन मजबूती से चुनाव जीतने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। मोदी सरकार की जुमलेबाजी, झूठ, बेइमानी, भ्रष्टाचार, मंहगाई तथा जनविरोधी नीतियों को सारी पार्टियाँ अपने ढंग से पर्दाफाश कर रही हैं। सियासी ज्ञानियों की माने तो मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एनडीए के विशाल गठबंधन को हराने के लिए उसके विपक्ष में दूसरा मजबूत गठबंधन का खड़ा होना समय की जरूरत है। आगामी संकटग्रस्त परिस्थितियों की आहट को ध्यान में रखते हुए देखें तो इस बार 2019 का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। मोदी-शाह की मौजूदा जुगलबंदी देश में योगियों-ढोंगियों तथा आवारा भीड़ के सहारे आने वाले समय में क्या क्या तबाही मचाने वाली है इसका अंदजा शोषितों और वंचितों की पक्षधर पार्टियों के लोग लगा रहे हैं। लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिररेक्षता तथा सामाजिक न्याय को जिस तरह से ध्वस्त किया जा रहा है। दहशतगर्द संघ के इशारे पर जिस तरह से संविधान तथा संवैधानिक ढाँचे को छेड़ने और बदलने की व्याकुलता दिखाई दे रही है वो देश के 90 प्रतिशत बहुजनों को गुलाम बनाने की एक मनुवादी कोशिश है।
एआईएसएफ के दिनों में मुलायम सिंह डफली बजाते हुए
फिलहाल मेरी
नजर अभी बिहार के चुनाव पर टिकी है। जैसा कि आपको ज्ञात हो कि बिहार विधानसभा
चुनाव के जनादेश को छल से अपहरण करके पलटी मारते हुए नीतीश कुमार ने जब से
मोदी-शाह की बेलगाम जोड़ी का दामन पकड़ा है,
बिहार में आये दिन संघ के आतंकी और साम्प्रदायिक उन्माद की खबरें
फैल रही हैं। नीतीश कुमार के सहारे भाजपा-संघ अपने सांप्रदायिक जहर को बिहार के
जनमानस में फैलाने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा भाजपा-जदयू गठबंधन के विपक्ष में
राजद-कांग्रेस-हम-रालोसपा तथा वीआईपी जैसी विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है। इस
गठबंधन में शोषितों-वंचितों की पार्टियों तथा उनके हितों को ध्यान में रख कर समायोजित किया गया है। इस
गठबंधन में लालू प्रसाद की पार्टी राजद सबसे मजबूत घटक है। सांप्रदायिक फासीवाद के
खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय जनता दल ने दूरदर्शिता दिखाई और दो कदम पीछे हट कर
वामपंथी पार्टियों में भाकपा-माले को भी आरा सीट से एक टिकट देकर गठबंधन में शामिल
किया। यही वो जड़ है जिसकी वजह से तथाकथित प्रगतिशीलों और जातिवादी साम्यवादियों
के पेट में मरोड़ हो रही है।
आइये जानते
हैं कि पेट में उठ रही इस दर्दनाक मरोड़ की असल वजह क्या है। इस मरोड़ की पहली वजह
है कि भाकपा को गठबंधन में क्यों नहीं शामिल किया गया? और उसके पसंदीदा उम्मीदवार को क्यों टिकट
नहीं दिया। पूरे एशिया और यूरोप के एनजीओ, मीडिया और
संस्थानों में बैठे इन अभिजात्य वर्गीय और जातिवादी कामरेडों का तर्क है कि
बेगूसराय से भाकपा के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को टिकट न देना, महागठबंधन के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा। राजद बेगुसराय में फासीवाद के खतरे
की विभिषिका को भांप नहीं पा रहा है। बिहार में या देश में फासीवाद और सांप्रदायिक
ताकतों का अगर सफाया होगा तो वो बिहार के बेगुसराय से होगा अन्यथा मुश्किल है। यह
तर्क नहीं बल्कि सवर्णवादी हित के सम्मोहन के आगोश में अभिजात्य वर्ग एवं शिक्षित
सवर्णों का सनकपन की हद तक गुजर जाना मात्र है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि भाजपा
को हराने के लिए इनके चिंतन और भावावेश के केंद्र में बिहार का 39 लोकसभा सीट नहीं
है। बल्कि सारा तिकड़म और कवायद सिर्फ बेगूसराय में राजद गठबंधन को हराने के लिए किया
जा रहा है। वह भी राजद के ऐसे उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन को जो मोदी लहर में भी सभी
उम्मीदवारों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर थे।
उम्मीदवारी को
लेकर सियासत
भाकपा की तरफ
से उम्मीदवारी का पहला तर्क यह है कि कन्हैया देश का सबसे बड़ा चेहरा है। अगर इनके
इस प्रसिद्धि के तर्क को देखें तो फिर भाकपा को गठबंधन से बाहर होने पर मर्सिया
गाने की क्या जरूरत है। वो तो एक ऐसे विश्व प्रसिद्ध उम्मीदवार को मैदान में उतारी
है तो फिर डर किस बात का है? दूसरा तर्क यह है कि वो बेगुसराय का बेटा है। अहा! क्या महान मार्क्सवादी
तर्क है। आप कहना क्या चाह रहे हैं कामरेड, कि महागठबंधन का
उम्मीदवार कराची से आया है? क्या डॉ तनवीर हसन बेगुसराय का
बेटा नहीं हैं, ये अपने आप में कितना ब्राह्मणवादी और
साम्प्रदायिक मानसिकता वाला तर्क है। तीसरा तर्क यह है कि बेगूसराय लोक सभा
क्षेत्र वामपंथ का गढ़ रहा है इसीलिए उसे लेलिनग्राद कहा जाता है। यह भी एक फर्जी
का गढ़ा हुआ मिथ है। मौजूदा समय में भाकपा का बेगूसराय में न तो एक भी विधायक है
और न ही सांसद। बल्कि 1967 में मात्र एक बार भाकपा वहाँ से लोकसभा चुनाव जीत पाई
है। अब जनाधार के मामले में भी पार्टी दो लाख वोटों के अंदर में सिमट गई है। इसलिए
ये लेलिनग्राद वाला प्रॉपेगेंडा भी भ्रामक है। बल्कि भाकपा के मुकाबले में
राष्ट्रीय जनता दल का जनाधार वहाँ अधिक है। फिर किस तर्क के हिसाब से राजद अपने
जीतने वाले, जमीनी और सबसे जुझारू उम्मीदवार की दावेदारी को
खारिज करे?
पिछली बार
तथाकथित मोदी लहर में राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन 3,69,892 वोट पाकर जीत
के दौड़ में दूसरे नंबर पर थे। महज 58,335 वोट से भाजपा के
उम्मीदवार भोला सिंह से हार गए थे। इस बार कांग्रेस के अलावा बिहार महागठबंधन में
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा, जीतन राम माझी की पार्टी
हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी जैसी पार्टियों
के शामिल होने से राजद का जनाधार और बढ़ेगा तथा डॉ. तनवीर हसन के जीतने की संभावना
सबसे अधिक है। गठबंधन में शामिल उपरोक्त पार्टियों का अपना जातीय जनाधार वोट राजद
गठबंधन में जुड़ने से भाजपा का हारना लगभग तय है। वहीं बेगुसराय सीट पर भाकपा और
जदयू के संयुक्त उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 1,92,639 वोट मिले थे। अब खोते जनाधार वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पिछले
वोट को आगामी चुनाव में हू ब हू मान भी ले तब भी भाजपा के कुख्यात नेता गिरिराज
सिंह को हराने के लिए 2,35,588 वोटों
से अधिक की जरूरत पड़ेगी। वहीं राजद के पिछले उम्मीदवार तनवीर हसन को भाजपा के
उसके कुल 4,28,227 वोट से आगे जाने के
लिए से महज 58,335 वोटों से अधिक की जरूरत है। अर्थात
बेगूसराय सीट पर राजद के जीतने की दावेदारी प्रबल है।
गठबंधन की
सियासत
वामपंथ से
मेरा कई सालों का नाता रहा है। वामपंथी पार्टियों के अंदर रह कर मैने काम किया है
इसलिए उनके तौर-तरीके, नीति और नीयत का मुझे नजदीक से
भान है। आइए गठबंधन की राजनीति को वामपंथी गठबंधन के नजरिये से समझते हैं। वामपंथी
पार्टियाँ गठबंधन करने के दौरान सबसे पहले इस बात पर विचार करती हैं कि किस पार्टी
से गठबंधन करना है। पार्टी तय हो जाने के बाद इस बात पर विचार किया जाता है कि
कितने सीटों पर कौन पार्टी चुनाव लड़ेगी। इसके बाद अंत में क्षेत्र और उम्मीदवार
कौन सा होगा इस बात पर निर्णय होता है। लेकिन यही भाकपा जैसी वामपंथी पार्टी जब
राजद और कांग्रेस से गठबंधन करने जाती है तो गठबंधन होगा कि नहीं होगा, कितने सीटों पर होगा, बिना इस बात की परवाह किए अपने
उम्मीदवार का नाम और क्षेत्र की घोषणा पहले ही कर देती है। महागठबंधन में शामिल न
होने के कारण भाकपा घूम-घूम कर जो मर्सिया गा रही है उसकी तमाम अन्य वजहों में एक
वजह यह भी रही है। राजद के आंतरिक सूत्रों का मानना है कि भाकपा की तरफ से जिन
उम्मीदवारों के नाम पेश किए गए थे उनमें अधिकतर भूमिहार या सवर्ण जाति से थे। अब
दलित-पिछड़े-अकलियत और वंचितों की राजनीति करने वाली राजद वामपंथ की इस
सवर्णपरस्ती पर कैसे मोहर लगा देती। खैर अंततः भाकपा बिहार के महागठबंधन से बाहर
हो गई।
जैसे ही पता चला कि महागठबंधन में उनको जगह नहीं मिली, भाकपा तथा अन्य वामपंथियों के रंगरूटों ने मीडिया पोर्टल, सोशल मीडिया, तथा कई यू-ट्यूब चैनलों पर लालू प्रसाद तथा राजद के खिलाफ लिखने लगे। अब राजद फिर से घोर जातिवादी हो गयी। लालू प्रसाद तथा उनके पूरे परिवार को तथाकथित चारा चोर और भ्रष्टाचारी के विशेषणों से नवाजा जाने लगा। मतलब साफ है कि इनका हित सध जाता तो राजद महान पार्टी हो जाती तथा विगत तीस सालों से मीडिया में बैठे मनुवादियों द्वारा लगातार विकृत की गई लालू प्रसाद और राजद की कलंकित छवि इनके निगाह में धुल कर साफ हो जाती। कहने का आशय यह है कि राजद अगर इनके सवर्णवादी मंसूबों को साधने में साथ देता तो ठीक था। नहीं तो मानो राजद गठबंधन ने देश में आने वाले इंकलाब की लहर को रोक कर भारतीय वामपंथी क्रांति की गति कुंद कर दिया हो। इसके अलावा एक बात और सोचने वाली है कि आरा लोकसभा सीट से महागठबंधन के उम्मीदवार कामरेड राजू यादव को लेकर पूरे देश के वामपंथियों की कोई चिंता नहीं है। शायद आरा में फासीवाद या सांप्रदायिकता का खतरा इनके नजर में नहीं है। जबकि आरा का उम्मीदवार कामरेड राजू यादव भाकपा-माले जैसी लेफ्ट पार्टी का ही है। संघर्ष के हिसाब से देखा जाए तो वहां सामंतियों और उच्च जातियों के आतंक के खिलाफ पिछड़ों और शोषितों का जबरदस्त प्रतिरोध का इतिहास रहा है। आरा का चुनाव प्रचार और माहौल देख कर लग रहा है कि भाकपा-माले खुद वहाँ गंभीर नहीं है। उनके जनसंगठनों के लोग आरा के बजाय बेगूसराय पर अपनी ऊर्जा लगाए हुए हैं। वामपंथ के महीनी जातिवाद और सवर्णपरस्ती का इससे बड़ा उदाहरण आपको कहीं नहीं मिलेगा। वामपंथ के उपरोक्त वैचारिक पतन और विचलनों को गंभीरता से समझा जाना चाहिए ताकि बहुजनों को वास्तविकता से अवगत कराया जा सके।
वामपंथ का
दोहरा चरित्र
आइये गठबंधन
की राजनीति को वामपंथ के वैचारिक तर्कों व नजरिए से समझते हैं। गठबंधन में भाकपा
को शामिल न किये जाने की वजह से बेगूसराय में जो मीडिया के द्वारा माहौल बनाया जा
रहा है उसका संबंध कहीं न कहीं छात्र राजनीति से भी जुड़ा है। जगह जगह इस बात का
रोना-धोना हो रहा है कि जेएनयू की छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि से आये हुए एक युवा
चेहरे को टिकट नहीं दिया गया। जिसके लिए मीडिया, एनजीओ और उच्च संस्थानों में बैठे ब्राह्मणवादी वामपंथियों ने
बिहार में लगातार गठबंधन को कोसना शुरू कर दिया है। जबकि महागठबंधन के उम्मीदवार
तनवीर हसन की पृष्ठभूमि भी छात्र राजनीति रही है लेकिन उसका जिक्र कोई नहीं कर रहा
है बल्कि उल्टा ये प्रोपेगैंडा चलाया जा रहा है कि तनवीर हसन वोटकटवा है। आखिर ऐसा
क्यों हो रहा है, इसको समझने के लिए मैं आपको कुछ महीने पीछे
जेएनयू की छात्र राजनीति की ओर ले चलता हूँ। पिछले सितंबर में जेएनयू में छात्रसंघ
का चुनाव हो रहा था| छात्र राजद की तरफ से जयंत
जिज्ञासु अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे| दूसरी तरफ लेफ्ट
गठबंधन चुनाव लड़ रहा था| चूंकि जेएनयू कैंपस दुनिया
में वैचारिक विमर्शों के लिए जाना जाता है अतः पूरे देश
की निगाह जेएनयू छात्रसंघ चुनाव पर थी|तब कैंपस तथा उच्च
शिक्षण संस्थानों में बैठे सवर्णवादी वामपंथियों का तर्क था कि छात्र राजद को वोट
मत दो नहीं तो ABVP जीत जाएगी| जयंत जिज्ञासु को वोट मत दो नहीं तो गठबंधन हार जाएगा| राजद लेफ्ट गठबंधन का वोट काट रहा है| सब लोग
मिल कर गठबंधन को वोट करो|
आज हू ब हू
राजनीतिक परिस्थिति बिहार के बेगूसराय लोक सभा क्षेत्र में बनी है| लेकिन आज देश के घनघोर जातिवादी
वामपंथियों के सुर और तर्क बदल गए हैं| आप अंदाजा
लगाइये कि कैसे जाति और वर्ग हित के हिसाब से दोमुहें वामपंथियों का सिद्धांत और
तर्क बदल जाते हैं| आज बेगूसराय में ये किसका वोट काट
रहे है क्या बहुजन बुद्धिजीवियों को पता नहीं है| वर्ग
संघर्ष की बात करने वाले ये लोग दलित पिछड़े और मुसलमानों का नाम लेकर किसको झांसा
दे रहे हैं| तुम अपना हित देख कर समाज की परिस्थितियों
की व्याख्या करोगे और सोचते हो कि तुम्हारी धूर्तता को कोई पकड़ नहीं पाएगा। बाबा
साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, लोहिया तथा जगदेव बाबू जैसे नायकों ने अपने समय में मार्क्सवाद की आड़ मे छिपे
इनके इसी ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर किया था| बिहार
लेनिन जगदेव बाबू तो खुलेआम बोलते थे कि ‘मुझे वामपंथी
विचारधारा पसंद है लेकिन भारतीय वामपंथियों से नफरत है’।
लालू प्रसाद के साथ कन्हैया कुमार
मीडिया का
सवर्णवादी चरित्र
चूंकि इन
दिनों बिहार राजनीति में मीडिया के सारे कैमरे और लाव-लश्कर जब सीधे बेगूसराय
क्षेत्र में जाकर शरण ले रहे हैं तो इस हलचल के पीछे की सियासत को समझना बहुत
जरूरी है। आखिर क्या कारण है कि रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में चर्चा के दौरान
कन्हैया कुमार का भाषण दिखाते हैं और यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि बेगुसराय
में मुकाबला भाजपा के गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार में है। जबकि महज 58,335 वोट से भाजपा के उम्मीदवार भोला सिंह से
पिछल बार पीछे रह जाने वाले राजद के उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन का जिक्र करना तक भी
भूल जाते हैं। ये कैसी चाल है कि पिछली बार 39.71% वाले भाजपा के खिलाफ 35.30% वोट
लाने वाले राजद उम्मीदवार तनवीर हसन को मुकाबले से गायब कर देते हैं और मात्र
17.86% वोट पाने वाली भाकपा को टक्कर में खड़ा कर देते हैं। क्या यह अनायास हो रहा
है? मेरे हिसाब से बिल्कुल नही। मीडिया में बैठे सवर्णों
द्वारा पूरी सोची-समझी साजिश के साथ कन्हैया कुमार को उछला जा रहा है। जबकि ऊपर
मैने समझाने की कोशिश की है कि कैसे महागठबंधन के उम्मीदवार का पिछली बार की
अपेक्षा इस बार जीतने की संभावना सबसे प्रबल है। तमाम पिछड़ी, दलित और मुस्लिम जातियों का वोट गठबंधन की तरफ आकर्षित हो चुका है। फिर,
मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से
बहुजन जनता को भ्रमित करने की वजह क्या है?
सोचने वाली
बात ये है कि ये कि ये दावा ठोक रहे हैं कि हम देश में मोदी को हराएंगें। लोकतंत्र
और संविधान बचाएंगें। लेकिन 40 सीटों में एक सीट पर(बाकी जगह नाममात्र के लिए लड़ा
जा रहा है, फोकस सिर्फ एक जगह है)
व्याकुलता के साथ लड़ने वाली भाकपा या तथाकथित वामपंथी गैंग कैसे मोदी को हराएँगे।
अगर अन्य सीट पर भाजपा जीत दर्ज कर लेगी तो एक सीट की चिंता में आतुर हो कर भला
कैसे ये भाजपा को रोक लोगे। सच कहो तो इनका ये तर्क किसी को भी संतुष्टप्रद नहीं
लग रहा है। देश भर के वामपंथियों की नजर अगर एक ही सीट पर टिकी हुई है तो, जो किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा को रोकने में सक्षम नहीं हैं फिर उनके इस
तार्किकता के पतन का कारण क्या है? क्या वो कन्हैया के बहाने
पूरे वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं? या फिर कन्हैया के जरिये
व्यापक सवर्णवादी एवं अभिजात्य हितों के पोषित होने का सपना देख रहे हैं। मेरा
जहां तक मानना है कि यहां वामपंथ का उत्थान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन गरीबी की
ब्रांडिग जिस तरह से सवर्णवादी वामपंथियों के द्वारा किया जा रहा है, वह देश के शहरी मध्यवर्ग और अभिजात्य लोगों की फंतासी को जरूर मानसिक खुराक दे रहा है। मीडिया
या सोशल मीडिया पर इस नैरिटिव को बहुत जोर-शोर से बेचा जा रहा है।
सवर्णवादी
वामपंथियों की कहीं इस छटपटाहट के पीछे कन्हैया को मोदी-विरोध का सबसे बड़ा चेहरा
या आइकन बना कर प्रचारित करना तो नही है। अगर ऐसा है तो ये देश की सवर्णवादियों की
सबसे बड़ी चतुराई है। आखिर देश में मोदी विरोधी तो कई चेहरें हैं। इस मुल्क में
लालू यादव से बड़ा मोदी-संघ का प्रखर विरोधी चेहरा भला दूसरा कौन हो सकता है। सारे
कैमरे और विमर्श की जद से उन्हें किस आधार पर उपेक्षित किया जा रहा है। क्या इस
उपेक्षा के पीछे के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारण कोई बताएगा। सिर्फ नौजवानों की गिनती
करें तो चंद्रशेखर रावण, उमर खालिद, अनिर्बान
भट्टाचार्य, हार्दिक पटेल आदि बहुत सारे चेहरे हैं, लेकिन वे क्यों नहीं प्रोजेक्ट किये जा रहे हैं। सारा छल-प्रपंच एक ही
चेहरे के लिए क्यों हो रहा है। आखिर मंशा साफ है कि दलित, पिछड़ा,
अंबेडकर, रोहित वेमुला आदि का नाम रटते हुए
शब्दों की जादूगरी दिखाओ और परोक्ष में अपने सवर्णवादी हितों की साधना करो। अर्थात
इन जनेऊ जनार्दनों के हिसाब से फूले, अंबेडकर, मंडल, बिरसा और अब्दुल कयूम जैसे नायकों की पीढ़ियों
की सारी बौद्धिक चेतना शून्य हो गयी है न, जो तुम्हारी
धूर्तता और चालबाजियों को समझ नहीं पाएंगी।
इसलिये मतदाताओं
को चाहिए कि वे बिहार में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक सीट पर जो हाय-तौबा मचाया
जा रहा है, गरीब के बेटे के नाम पर सज रहे
बाजार में सवर्णवादी हितों को साधने के लिए जितना बड़ा माहौल बनाया जा रहा है,
उस पर शांति से, थोड़ी देर ठहर कर सोचें। मोदी
को पूरे बिहार या देश में हराए बिना एक सीट पर जीत कर कैसे बोल्शेविक क्रांति हो
सकती है इस मिथ को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
लेखक- मुलायम सिंह, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अध्येता एवं छात्रनेता हैं| आप युनाइटेड ओ.बी.सी फोरम के संस्थापक सदस्य हैं। देश
में सामाजिक न्याय के सवालों को लेकर छात्र एवं युवा आंदोलनों में हमेशा संघर्षरत
हैं|
गन्ना काटने वाले ठेकेदार उन महिलाओं को काम पर रखने के लिए
तैयार नहीं हैं जिनकी माहवारी नियमित होती है. इसीलिए इस इलाके में महिलाओं का
गर्भाशय निकाल देना आम चलन है.
“आप शायद ही इन गांवों में ऐसी महिलाओं से मिल पायेंगे जिनका गर्भाशय है। ये गाँव गर्भाशय विहीन महिलओं के गाँव हैं।” महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखा प्रभावित बीड जिले के हाजीपुर गांव में अपने छोटे से घर में बैठी मंदा उंगले बहुत ही दर्द के साथ यह बमुश्किल बयां कर पाती हैं.
वंजरवाड़ी में, जहाँ 50 प्रतिशत महिलाओं का
गर्भाशय निकाल दिया गया है, महिलाओं का कहना है कि गाँवों
में दो या तीन बच्चे होने के बाद गर्भाशय को निकालना आम बात है।
इन महिलाओं में से अधिकांश गन्ना काटने वाली मजदूर हैं और
गन्ना काटने के मौसम के दौरान पश्चिमी महाराष्ट्र के चीनी बेल्ट में प्रवास करती
हैं; सूखे की तीव्रता के साथ, प्रवासियों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। एक अन्य गन्ना काटने वाली
सत्यभामा कहती हैं, “मुकादम (ठेकेदार) अपने गन्ने के मजदूरों
के समूह में बिना गर्भाशय वाली महिला को लेने को ज्यादा इच्छुक होता है।”
क्षेत्र के लाखों पुरुष और महिलाएं अक्टूबर और मार्च के बीच गन्ना कटर के रूप में काम करने के लिए पलायन करते हैं। ठेकेदार एक इकाई के रूप में गिने गए पति और पत्नी के साथ अनुबंध तैयार करते हैं। गन्ना काटना एक कठिन प्रक्रिया है और अगर पति या पत्नी एक दिन के लिए विराम लेते हैं, तो दंपति को हर ब्रेक के लिए ठेकेदार को प्रति दिन 500 का जुर्माना देना पड़ता है।
माहवारी से काम की रुकावटें
माहवारी की अवधि काम में बाधा डालती है जिसके कारण जुर्माने लगते हैं। बीड में इसका समाधान निकाला गया है बिना गर्भाशय के महिला मजदूर।
“ गर्भाशय निकल जानेके बाद, मासिक धर्म की कोई संभावना नहीं होती है। फिर तो, गन्ना काटने के दौरान ब्रेक लेने का कोई सवाल ही नहीं है। सत्यभामा कहती हैं, ” हम एक रुपया भी नहीं गंवा सकते। ठेकेदारों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान, महिलाएं एक या दो दिन का ब्रेक चाहती हैं जिससे काम रुक जाता है।
एक ठेकेदार दादा पाटिल ने कहा, “हमारे पास एक सीमित समय सीमा में का पूरा करने का लक्ष्य होता है और इसलिए हम ऐसी महिलाओं को नहीं चाहते हैं जिनको उस समय माहवारी हो ।” पाटिल ने जोर देकर कहा कि वह और अन्य ठेकेदार महिलाओं को सर्जरी करने के लिए मजबूर नहीं करते हैं; बल्कि, यह उनके परिवारों द्वारा बनाया गया एक विकल्प है।
दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं ने कहा कि ठेकेदार उन्हें एक सर्जरी के लिए अग्रिम भुगतान करते हैं और यह पैसा उनके वेतन से वसूला जाता है। इस मुद्दे पर एक अध्ययन करने वाले संगठन ‘तथापि’ के अच्युत बोरगांवकर ने कहा: “गन्ना काटने वाले समुदाय में, मासिक धर्म को एक समस्या माना जाता है और उन्हें लगता है कि इससे छुटकारा पाने के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन इससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे एक हार्मोनल असंतुलन, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे, वजन बढ़ने आदि से जूझने लगती हैं। हमने देखा कि 25 साल की उम्र में भी कम उम्र की लड़कियों को इस सर्जरी से गुजरना पड़ा है। ”
तर्क
सत्यभामा के पति और स्वयं गन्ना काटने वाले बंडू उगले, इसके पीछे के तर्क को स्पष्ट करते हैं। “एक टन गन्ना काटने के बाद एक जोड़े को लगभग 250 मिलते हैं। एक दिन में, हम लगभग 3-4 टन गन्ना काटते हैं और 4-5 महीने के पूरे सीजन में एक जोड़ी लगभग 300 टन गन्ना काटती है। हम इस सीजन के दौरान जो कमाते हैं, वह हमारी वार्षिक आय है क्योंकि हम गन्ना काटने से वापस आने के बाद कोई काम नहीं करते हैं, ”उगले कहते हैं। “हम एक दिन के लिए भी छुट्टी नहीं ले सकते। अगर हमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं तो भी हमें काम करना होगा। कोई आराम नहीं है और महिलाओं को होने वाली पीरियड एक अतिरिक्त समस्या है। ”
सत्तर वर्षीय विलाबाई का कहना है कि एक गन्ना काटने वाली महिला का जीवन नारकीय होता है। वह संकेत देती है कि ठेकेदारों और उनके पुरुषों द्वारा महिलाओं का बार-बार यौन शोषण होता है। “गन्ना काटने वालों को गन्ने के खेतों में या एक तम्बू में चीनी मिलों के पास रहना पड़ता है। स्नानघर और शौचालय नहीं हैं। एक महिला के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है अगर इन परिस्थितियों में पीरियड्स हों, ”बूढ़ी महिला कहती है।
इस सूखाग्रस्त इलाके की कई महिलाओं ने कहा कि निजी चिकित्सक सामान्य पेट दर्द या श्वेत प्रदर की शिकायत होने पर भी गर्भाशय निकालने का सुझाव देते हैं.
मायावती को कांशी राम ने अवसर दिया तो उन्होंने अपनी लीडरशिप साबित करके दिखाई. वह न सिर्फ भारत के सबसे बड़े राज्य की अनेक बार मुख्यमंत्री बनीं बल्कि अपनी पार्टी बसपा को उन्होंने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने में भी सफलता हासिल की. वहीं राबड़ी देवी को परस्थितियों ने मुख्यमंत्री बनाया. एक घरेलू गृहणी की भूमिका निभाने वाली राबड़ी देवी बड़ी-बड़ी चुनौतियों से जूझते हुए अपना नेतृत्व साबित किया और बिहार में लगातार सात वर्षों तक मुख्यमंत्री रहीं. नेतृत्व साबित करने की सबसे कठिन डगर अपने बलबूते संघर्ष कर आगे बढ़ने का होता है. पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक) की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मनीषा बांगर इसी तीसरी श्रेणी में आती हैं जिन्हें संघर्षों से आगे बढ़ते हुए अपना नेतृत्व स्थापित करने को ठान लिया है. मनीषा बांगर को भले ही मायावती की तरह अवसर और राबड़ी देवी की तरह परस्थितियां नहीं मिली हों लेकिन उनमें जहां मायावती की तरह कूट-कूट कर साहस भरा है तो दूसरी तरफ राबड़ी देवी की तरह चुनौतियों से जूझने का माद्दा भी है. अगर किसी व्यक्ति में साहस और चुनौतियों से जूझने का माद्दा हो तो उससे भविष्य की बहुत सारी उम्मीदें वाबिस्ता हो जाना स्वाभाविक है. लेकिन जब बात डॉ. मनीषा बांगर की हो तो उन्हें खुद भी अपनी संघर्षशीलता, साहस और चुनौतियों को गले लगाने की कर्मठता पर विश्वास है. वह कहती हैं कि हमें जहां बीते जमाने की सावित्री बाई फुले, फातिमा शेख जैसी महान हस्तियों से प्रेरणा मिली है तो दूसरी तरफ यह स्वीकारने में ऐतराज नहीं कि कुछ सैद्धांतिक मतभिन्नता के बावजूद मौजूदा समय की दो नेत्रियों- मायावती व राबड़ी देवी जैसी शख्सियतों से भी प्रेरणा मिलती है. मनीषा फिलहाल नागपुर लोकसभा सीट से पीपीआई (डी) की उम्मीदवार हैं और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक नितिन गडकरी के सामने चुनौती पेश कर रही हैं.
एक चिकित्सक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाली मनीषा बांगर गत 20 वर्षों से सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. उन्होंने बामसेफ जैसे राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाया तो मूलनिवासी संघ से जुड़ कर नीतिगत फैसले लेने वाली टीम का अभिन्न हिस्सा रहीं. इसी दौरान पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया( डेमोक्रेटिक) के गठन का फैसला हुआ तो उन्होंने इसके संस्थापक सदस्या के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई. दर असल बामसेफ व मूल निवासी संघ जैसे संगठनों ने मनीषा बांगर की योग्यता को पहचाना है और इन संगठनों को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं. उधर मनीषा की खासियत यह है कि वह सफलता के लिए किसी भी शार्टकट को अपनाने के बजाये एक लम्बे संघर्ष के रास्ते को चुना. वह कहती हैं कि “संघर्षों और चुनौतियों की भट्टी में तप कर निखरा हुआ नेतृत्व आमजन के लिए स्वीकार्य होता है. हम इसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं”. सामाजिक आंदोलनों के लम्बे अनुभवों के साथ मनीषा अब राजनीतिक मैदान में कूद पड़ीं हैं. नागपुर लोकसभा से चुनावी मैदान में वह अपना अमिट छाप छोड़ रही हैं. वह कहती हैं कि राजनीतिक संघर्ष का एक पड़ाव है चुनाव. इस पड़ाव के बाद का सफर अनवरत जारी रहेगा.
भूतपूर्व केन्द्रीय संसाधन विकास (राज्य) और धनवाद की पूर्व सांसद रीता वर्मा का यह राजनीतिक अनुभव कई मायने में महत्वपूर्ण है. इस आलेख में वे राजनीति में आने के अपने निर्णय, राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा का चुनाव एवं अपने आदर्श महिला नेताओं के बारे में बता रही हैं.
रीता वर्मा
मुझे कबूल है कि हम बहनें संसद के एक प्रफुल्लित और उज्ज्वल भीड़ के हिस्से हैं, तो क्या जेंडर के आधार पर उन्हें बांटना चाहिए। उस तथाकथित कमजोर लिंग के होने के बाद भी हममें से कुछ, सभी बाधाओं के बावजूद, हमारे संसदीय भविष्य को कामयाब बनाने में सफल रहे।
कई प्रेरणाएं जीवन में भाग्योदय में मदद करती हैं। और मैं अपवाद नहीं हूं। मैं आज जो भी हूं वह मुख्यतः अपने सामर्थ्य के कारण हूं, जिसे मैंने क्रमशः उद्घाटित किया, जो मुझमें मौजूद थी। मेरा जन्म और पालन-पोषण सभ्य मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। मैं इसी वर्ग के मूल्यों के साथ बढ़ी। अपने सामाजिक और पारंपरिक दायित्वों को पूरा करने तथा एक बेटी, पत्नी और मां की भूमिका निर्वाह करने के लिए तैयार हुई; इससे ज्यादा और कुछ नहीं। और बहुत जल्द ही इस वर्ग की संकीर्ण सीमाओं से बाहर निकली। शिक्षा के लिए मेरा प्यार सिर्फ साधारण नहीं था, बल्कि इसने मुझे उस समाज के लिए, जिसकी मैं कर्जदार हूं, योगदान देने का मौका और योग्यता प्रदान की। कैरिअर का महत्व अस्मिता बोध के लिए भी है, तथा दो आय बेहतर घरेलू बजट बनाते हैं, इसलिए भी। एक ओर अधिक संकीर्ण मूल्य, जो मध्यम-वर्गीय होने के कारण आकार लेते हैं, को मैंने त्याग दिया था, संस्थागत विवाह को अस्वीकृत करने के फैसले से। मेरा आत्मविश्वास और भी बढ़ गया, जब मैंने वैसा ही व्यक्ति पाया, जैसा मैं पसंद करती थी, और मैं सफल हुई। जब मैं अपने वैवाहिक जीवन का आनन्द उठा रही थी, तो सब ने सोचा मैं विद्रोही, गैर-जिम्मेदार हूं तथा सभी सामाजिक मूल्यों को निभाने में नकारात्मक साबित हुई, ससुराल की यह प्रबल धारणा बनी और दोस्तों में भी मेरे लिए कुछ ऐसी ही धारणा थी। एक महिला कोई बिकाऊ वस्तु नहीं है, और न ही किसी अनजान व्यक्ति को दहेज की टोकरी के साथ फेंक देने की वस्तु है। यह सिर्फ बीमार समाज की पहचान है, साथ ही यह औरतों के आत्म-सम्मान को भी नीचा दिखाती है।यह आम धारणा है कि महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन अत्यंत कठिनाइयों से भरा होता है, भले ही पूरी तरह प्रतिबंधित क्षेत्र न भी हो।
इससे पहले कि मैं राजनीति में जाती इसके खतरनाक जीवन की जानकारी, पारंपरिक ज्ञान पर आधारित और सार्वजनिक जीवन की चुनौतियों का अज्ञान जो मुझमें थी, वह निश्चित रूप से मेरे लिए भयानक बाधा थी। लेकिन मेरे लिए मेरी क्षमता को प्रकट करने की मेरे भीतर की उत्कंठा अधिक प्रभावी हुई, जो कि न सिर्फ मेरी आत्मसंतुष्टि सिद्ध हुई थी, बल्कि सामाजिक रूप से सादेश्यपूर्ण भी ठहरी।मेरे जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी मेरे पति का न होना बन गयी। यह मुझ पर संकुचित जीवन आरोपित किये जाने के लिए पर्याप्त था, पर्याप्त था मेरे ऊपर दया का बौछार होने के लिए, पर्याप्त था मेरे साथ लोगों की सहानुभूति और संरक्षकत्व से भरा व्यवहार करने के लिए। यह सब सुनिश्चित था यदि मैंने उस भाग्य से समझौता कर लिया होता, जो मेरे जैसी अधिकांश बहनों की ऐसी परिस्थितियों में नियति बन जाता है। पर हर काली गुफा के बाद प्रकाश सुनिश्चित होता है।स्पर्द्धात्मक राजनीति में सभी पार्टियां एक जिताऊ उम्मीदवार खोजती हैं। उन सबने मुझे अपना उम्मीदवार बनाने के लिए संपर्क किया। परंतु मैंने भारतीय जनता पार्टी को बहुत सोच विचार कर चुना। हालांकि मैं यह स्वीकार भी करती हूं कि तब मैं पार्टी के सभी कार्यक्रमो या सभी विचारधाराओं के भीतर मिशनरी उत्साह और अनुशासन से प्रभावित थी तथा इसके प्रभावशाली राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी मुझे प्रभावित किया था। इस चुनाव में मैं सफल हुई या असफल, यह अलग बात है, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं जनता की उम्मीदों पर खरी उतरना चाह रही थी तथा राष्ट्र के पुनर्जागरण के राष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा बनना चाह रही थी, यह सब मेरे लिए चुनाव में कूदने की प्रेरणाएं थीं।
मदनलाल खुराना और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ रीता वर्मा
आधुनिक इतिहास की दो स्त्री-हस्तियां मुझे प्रभावित करती रही हैं, श्रीमती रूक्मणी देवी तथा श्रीमती सरोजनी नायडू। उन दोनों ने भारतीय समाज की सड़ी-गली मान्यताओं रीतियों को तोड़ने का साहस दिखाया तथा भारतीय स्त्रियों को पारंपरिक संस्कारों और प्रतिक्रियावाद (परंपरावाद) से मुक्त करने के प्रयास किए। इस प्रकार उन्होंने आधुनिक जगत में स्त्रीत्व को पुनर्परिभाषित किया, फलतः स्त्रियां सामाजिक व्यवस्था के शोषणमूलक और अन्यायपूर्ण मूल्यों से मुक्त होकर सड़कों पर आयीं तथा अपने पुरुष मित्रों की तरह अपने अधिकारों की मांग कर सकीं।यह समझना बहुत आसान है कि मैं रूक्मिनी देवी से इतना प्रेरित क्यों हुई। उनके रोम-रोम में विद्रोह था। दुर्भाग्य से वह बाल-विधवा थीं, लेकिन उन्होंने इस दुर्भाग्य से कभी हार नहीं मानी। उन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का निश्चय किया तथा अपने गैर-पारंपरिक विचार के कारण उनका विवाह एक अमेरिकन थियोसोफिस्ट डॉ. जॉर्ज अरूदले से हुआ, जो कि समाज में प्रचलित जाति प्रथा और धार्मिक आचरणों के विरोधी थे। अपनी सीखने की इच्छा के कारण उन्होंने शास्त्रीय नृत्य सीखा, जो कि उन दिनों एक अंधविश्वासी ब्राह्मण परिवार की लड़की के लिए सोचना भी असंभव था। शास्त्रीय नृत्य को घातक ‘देवदासी प्रथा’ से बचाकर, एक शुद्ध कला के स्तर तक उठाने का श्रेय किसी को जाता है, तो वह रूक्मिनी देवी हैं। उनके रोम-रोम में कुछ हासिल करने की क्षमता थी और सामाजिक दायित्वों के प्रति भी वह दृढ़ थी। वह आधुनिक भारत की अग्रदूत के रूप में सांस्कृतिक पुनर्जागरण में सहायक रहीं, जिसके लिए उन्होंने ‘कला-क्षेत्र’ नाम से केन्द्र स्थापित किया।श्रीमती सरोजनी नायडु भी किसी भी तरह से कम नहीं थीं, जिन्होंने भारतीय जनमानस के विश्वास को बढ़ाया। उन्होंने कहा, ‘भारत की स्वतंत्रता भारतीय स्त्रियों की स्वतंत्रता में निहित है।’ उनके बारे में सबसे अधिक प्रेरणादायक बात यह है कि उन्होंने ‘महिला आरक्षण’ का विरोध करते हुए कहा कि यह स्त्री-पुरुष की समानता के लिए रुकावट है, और मेरे विचारों में भी आरक्षण जैसी व्यवस्था आत्म-सम्मान के खिलाफ है।श्रीमती इंदिरा गांधी भी एक व्यक्तित्व हैं, जिनमें मुझे रुचि है और जिन्होंने मुझे प्रभावित किया। जनता उनकी स्पष्टता और दृढ़ता की प्रशंसा करती है। ऐसा कहा जाता है कि उनके कैबिनेट में वही एक पुरुष थीं। मेरी समझ में वह एक आदर्श नारी हैं। प्रकृति ने स्त्रियों को कोमल पुष्प सा बनाया है। चूंकि दुनिया उनके प्रति इतनी दयालु नहीं है इसलिए वे दुनियावी चतुराई सीख जाती हैं, यह चतुराई राजनीति से लेकर पावर के खेल में भी महिलाओं की भागीदारी का हिस्सा हो जाती है। मेरे विचार से श्रीमती गांधी ने एक संयुक्त परिवार का बुद्धिमान स्त्री की तरह अपने हितों के पक्ष में अपने निर्णय लागू किए। श्रीमती गांधी बड़ी चालाकी से पुरुषों के मूल्यों को आत्मसात करते हुए भी अपने लिए स्त्रियों जैसा सम्मान और व्यवहार हासिल करने में सफल रहीं।
राजनीति के क्षेत्र में आने के बाद कई तरह के विचार मुझे कौंधते रहे। संसद का समाजशास्त्र क्या है, संसद में, सेंट्रल कक्ष में समितियों में और गलियारों में। क्या पुरुष महिला सांसदों को महिला के रूप में ही देखते हैं या सांसद के तौर पर। प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। सार्वजनिक जीवन पुरुषों की दुनिया है, इसके साथ हमें विवाह करना होता है। एक पारदर्शी स्पेस और संसदीय एजेण्डे में समान भागीदारी आज की एक चुनौती है। किताबों की सूची इसमें मदद नहीं करती और न ही ‘एक सफल राजनीतिक कैरियर के दस कदम’ जैसी कोई युक्तियां हैं। फिर क्या है, एक सफल राजनीतिक भविष्य? लोगों को ऐसे में किनका अनुकरण करना चाहिए। मेरा अनुमान है सभी को अपने-अपने उत्तर ढूंढना चाहिए और अपना रास्ता तैयार करना चाहिए। मैं अभी तक इस खोज के प्रारंभिक चरण में हूं और कई अन्य भी ऐसी कल्पना कर रहे होंगे।यह स्पष्ट है कि, मेरी प्राथमिकता मेरा निर्वाचन क्षेत्र है। मैं उनके हितों को व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर संरक्षित करने का संकल्प करती हूं। मैं सफल होऊंगी कि असफल यह मेरे हाथ में नहीं है। लेकिन मैं समग्र रूप से इसके लिए प्रयत्न करूंगी। मेरी दूसरी प्राथमिकता है अपने देश को कुछ सकारात्मक, ठोस और कुछ नवीन देना। मुझे आशा है कि मेरी योग्यता मौकों का भरपूर प्रयोग करने से मुझे चूकने नहीं देगी। मेरे उत्साह और ईमानदारी के साथ-साथ मुझे बहुत कुछ सीखना है, और बहुत आगे जाना है।(वीमेन पार्लियामेंटेरियन इन इंडिया से साभार)
भारत की द्वितीय स्वास्थ्य मंत्री (प्रथम राजकुमारी अमृत कौर), डॉ. सुशीला नायर, महात्मा गांधी के निजी सचिव श्री प्यारे लाल नायर की छोटी बहन थी तथा महात्मा गांधी की निजी फिजीशियन थीं। उन्होंने 1944 में एक छोटा अस्पताल सेवाग्राम आश्रम में प्रारंभ किया। 1945 में यह छोटा-सा अस्पताल कस्तूरबा अस्पताल के रूप में विकसित हुआ, जो आज महात्मा गांधी इंस्ट्टियूट ऑफ मेडिकल कॉलेज के नाम से देश के चुनिंदे अस्पतालों में शामिल है। सुशीला जी का संसदीय राजनीतिक सफर 1952 में शुरू हो गया था जब वे लेजिस्लेटिव असेम्बली, दिल्ली में चुनकर आयीं.
डा. सुशीला नायर
1957 में पहली बार मुझे लोकसभा में जाने का मौका मिला। 1957 इसलिए भी महत्वपूर्ण था इसी वर्ष भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को सौ वर्ष पूर्ण हुए जिसे ब्रिटिशों ने ‘सिपॉय न्युटीनी’ कहा था। 1857 के उठाव में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और ब्रिटिशों की सेना से लड़ते हुए वह देश के लिए शहीद हुईं। एक ब्रिटिश जनरल, जिन्होंने उनका विरोध किया था, ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘वह शूर थी और 1857 के युद्ध में जिन्होंने संघर्ष किया उनमें वह सर्वोत्तम थी। उन्हीं से प्रेरणा लेकर झांसी के लोगों ने यह निश्चय किया कि उनके सम्मान में लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा झांसी क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए मुझे कहा गया।
मैंने गुड़गांव चुनाव क्षेत्र के लिए टिकट हेतु आवेदन किया था। वहां मेरे भाइयों की कुछ जमीन भी थी। दिल्ली से गुड़गांव ज्यादा दूर नहीं था, जहां पाकिस्तान का घर छोड़ने के बाद हम रह रहे थे। परंतु मौलाना अजाद की गुड़गांव से खड़े रहने की इच्छा थी। मुझे झांसी भेजना सभी दृष्टि से सुविधाजनक था। मैंने झांसी की जमनी पर कभी पैर भी नहीं रखा था। मैंने कांग्रेस के अध्यक्ष देवर भाई को लिखा कि मुझे झांसी चुनाव क्षेत्र से न लड़ने की अनुमति दें, क्योंकि वहां के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। वह और श्री लाल बहादुर शास्त्री दोनों ही दिल्ली के बाहर थे और उनके ही हाथों में उत्तर प्रदेश के चुनाव का भार था। चार या पांच दिनों के पश्चात अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के जंतर मंतर रोड पर के कार्यालय में श्री लाल बहादुर शास्त्री ने मुझे बुलाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने मेरा पत्र पढ़ा और झांसी में मेरी उम्मीदवारी के स्वागत में आये हुए पत्रों को मुझे दिया। उन्होंने कहा, ‘‘सभी संगटनों ने तुम्हारी उम्मीदवारी का स्वागत किया है, जाओ घबराओ मत और झांसी से चुनाव लड़ो। लेकिन मैंने उन्हें इस बात से वाकिफ किया कि उनमें से किसी को मैं नहीं जानती। लेकिन मेरा भ्रम तब टूटा जब उन्होंने मुझे बताया कि वहां सब मुझे जानते थे।
मैं वापस आयी। उसी रात श्रीमती
सूरजमुखी शर्मा, जो झांसी चुनावक्षेत्र की एक आवेदक
थीं मुझे झांसी ले गयीं। उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि मैं चुनाव लड़ सकती हूं, जिससे मुझे काफी अच्छा लगा। राष्ट्रकवि स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त
जो कि राज्यसभा सदस्य थे, सिविल लाइन्स के उनके बंगले पर चुनाव
की तैयारी के लिए रुकी। मुझे उनका व्यवहार काफी अच्छा लगा।
झांसी में मुझे उस बंगले में तीन कमरे मिले। मेरा कमरा सबसे आखिर में था लेकिन स्नानगृह पास होने के कारण मैंने वह चुना। बचे दो कमरों में चुनाव के लिए काम करने वाली महिलाएं रहने वाली थीं जो मेरे ही साथ दिल्ली से आयी थीं। मेरे साथ आये हुए पुरुष कर्मचारी भी उनके पास ही कमरे में रहते थे। उसी कमरे का उपयोग कार्यालय के रूप में भी किया जाना था। राष्ट्रकवि का लड़का और भतीजा, जो कि कॉलेज में पढ़ते थे, हमारी देखभाल करते थे, हमारे लिए भोजन लाते थे तथा अन्य सहायता भी करते थे।
मुझे उपन्यास सम्राट वृंदावनलाल वर्मा
से मिलने ले जाया गया। जिनकी ‘झांसी की रानी’ किताब को मेरी पुस्तक ‘बापू की कारावास की कहानी’ के साथ 1951 (1952) में राष्ट्रकवि
पुरस्कार मिला था। मैं श्री बोधराज साहनी से भी मिली। वह झांसी के प्रमुख वकील थे, जिन्होंने ऐच्छिक निवृत्ति के बाद अपना पूरा समय आर्य समाज के
कार्य के लिए समर्पित किया। श्री धुलेकर जो कि मेरे पर्वूवर्ती हैं, 1952 में झांसी से चुनाव
के बाद अपने सहकारी को पदभार प्रदान करते समय आनंदित थे, जिस प्रकार से 1929 में मोतीलाल नेहरू
को जवाहरलाल नेहरू को प्रदान करते समय हुआ। श्री धुलेकर काका सभी विधानसभा क्षेत्र
में मुझे लेकर गए। एक पिता की तरह उन्होंने मुझे मार्गदर्शन किया। एक दिन जब मैंने
चुनाव प्रचार के दरम्यान खाना खाने से मना किया तब उन्होंने मुझे बहुत डांटा और
खाना खाने के लिए कहा।
उन्होंने कहा कि अगर मतदाताओं के भोजन
को तुम इन्कार करती हो तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। तुम्हें जितना खना है उतना खा
लो परंतु मना मत करो। पान से तो मैं और मेरा ड्राइवर दोनों ही ऊब गए थे। गारोठा को
छोड़कर ललितपुर और मौहानीपुर तहसील के साथ-साथ सभी जिले मेरे चुनाव क्षेत्र में आते
थे। मौरानीपुर और ललितपुर यह दो विधान सभा क्षेत्र झांसी सांसदीय क्षेत्र से
विभक्त किया गया था। सभी को इस चुनाव क्षेत्र में जाने के लिए दोनों दिशाओं में 180 किमी और 100 किमी तक घूमना पड़ता था तभी पूरे
क्षेत्र पर नियंत्रण किया जा सकता था।
रास्ते काफी खराब थे। उस समय झांसी और
ललितपुर के बीच केवल एक पक्की सड़क थी। ललितपुर और मौरनीपुर जाते समय बेतवा नदी
रास्ते में ही पड़ती थी। ललितपुर के किनारे इस नदी में कम पानी था इसलिए गाड़ियां
रेत और पथरीली रास्ते से जा सकती थी। सर्दियों में थोड़ा बहुत पानी इसमें रहता था।
लेकिन मौरनीपुर से झांसी जाते समय रास्ते में डॅम होने के वजह से नाव से ही जाना
पड़ता था, उसमें भी हवा का रुख बदलने तक कई
घंटों तक राह देखनी पड़ती थी। एक रात रामनगर रिप्ता को ढूंढने हम रास्ता खो गए। इस
कारणवश हमें जंगल में रुकना पड़ा। रात होने की वजह से नाव से भी चला नहीं जा सकता
था। दूसरे दिन हवा का रुख ठीक से होने के कारण मुझे दो घंटों तक राह देखनी पड़ी। और
तीसरी बार मौसम की खरबी के कारण में पूर्वनियोजित सभा को नहीं जा सकी। मुझे बड़ा
दुख हुआ। मुझे इसका बड़ा अफसोस हुआ कि इन दो चार दिनों में ही मैं इतनी निराश हुई
तो ये लोग, जो इस तरह का जीवन रोज जीते हैं
उन्हें कैसा महसूस होता होगा? इस नदी पर पुल होना
ही चाहिए।
चुनाव जीतने के बाद मुझे इस मसले को
स्पष्ट करने के लिए एक तो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार के पास जाना था तो
दूसरी तरफ भारत सरकार के पास भी जाना था। इन वर्षों में इस नदी को पार करना बड़ा ही
आनंदपूर्ण था। सरकार ने इस पुल पर से गुजरने वाले वाहनों पर टैक्स भी जारी किया
था। कुछ लोगों ने इसे न होने के लिए आवेदन भी चलाया। मैंने उन्हें याद दिलाया कि
यह टैक्स उस नाव तथा उन सभी असुविधाओं के बदले बहुत ही कम है। मैंने उनसे कहा कि
अमरीका में जब मैं एक विद्यार्थी थी तब मुझसे कहा गया था कि अमरीकन लोगों ने जॉर्ज
वाशिंग्टन ब्रीज की कीमत से साठ गुना कीमत अदा की है फिर भी वे अभी भी टैक्स जमा
करते हैं। क्योंकि इन पैसों से नये पुलों का निर्माण किया जाता था। आंदोलनों के
नेताओं ने बात को समझा और अपनी मांगें वापस लीं।
लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद मैंने
देखा कि वहां महिला सदस्यों की संख्या काफी कम थी जबकि भारत की आवादी में 50 प्रतिशत आबादी महिलाओं की है। वहां श्रीमती उमा नेहरू भी थीं, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मेरी मां के लाहौर जेल में रही
थीं।
दो को छोड़कर बाकी सारी महिलाएं मुझसे
बड़ी थीं। उस समय सांसदों के लिए कोई भी वैधकीय सुविधाएं नहीं थीं। इनमें से कई
महिलाएं मेरी मरीज थीं। उत्तर प्रदेश की श्रीमती शकुंतला अनीमिया की रुग्ण थीं और
मध्य प्रदेश के आदिवासियों की प्रतिनिध के रूप में श्रीमती मिनीमाता को मैं जानती
हूं, जिन का दिल्ली के करीब हवाई दुर्घटना
में देहान्त हुआ।
श्रीमती उमा नेहरू मेरी मां समान थी।
वह हमेशा सरोजनी नायडू और मेरी मां के साथ के लाहौर जेल के अनुभव मुझे बतातीं। हम
साथ ही पेपर पढ़ते थे और महिला कक्ष में काफी का लुत्फ भी उठाते थे।
श्रीमती तारकेश्वरी सिन्हा भी हमारे साथ थीं और श्री कुमारमंगलम की पुत्री पार्वती क्रिश्चिन और रेणु चक्रवर्ती, दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टी में थी। श्रीमती अमू स्वामीनाथन, जिनकी बेटी डॉ. लक्ष्मी सहगल नेताजी के इंडियन नेशनल आर्मी में थीं और पंजाब के श्री सहगल से शादी की थी वह भी हमारे साथ वहां थीं। कर्नाटक की उत्कृष्ट कलाकार, हिन्दी की कई पुस्तकों की लेखिका तथा हिन्दी की विद्वान सरोजिनी माहिशी भी वहां थीं। राजकुमारी अमृत कौर उस समय राज्य सभा सदस्य थीं। 1952 में वह शिमला से लोकसभा के लिए चुनी गई थीं। और 1946 से 1957 में वह जब जागतिक स्वास्थ्य संगठन की बैठक के लिए जिनेवा गयीं, तब नेहरूजी ने मंत्रीमंडल का पुनर्गठन कर श्री डी.पी. करमकर की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का पद सौंपा। वह इंडियन रेड क्रॉस और सेंट-जॉन अम्ब्यूलन्स कार्पस् की चेअरमेन भी रहीं। भारतीय क्षयरोग अशोसिएशन तथा ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडीकल साईंस के कार्यकारी मंडल की वह अध्यक्षा भी रहीं। वह इंडियन कॉन्सिल ऑफ चाई वेलफेलअर एशोसिएशन की अध्यक्ष रहने के साथ-साथ ऑल इंडिया वीमेन्स कांग्रेस (।प्ॅब्) और यंग वीमेन्स क्रिश्चियन एशोसिएशन (ल्ॅब्।) में सक्रिय रहीं। 1964 में हृदय विकार मृत्यु के समय तक उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। संसद के केन्द्रीय सभागृह में ही वह अपना ज्यादातर समय बिताती थीं।
श्रीमती सुचेता कृपलानी भी लोकसभा
सदस्य थीं। उनके पति आचार्य कृपलानी कांग्रेस छोड़कर मध्य-चुनाव में कांग्रेसी
उम्मीदवार के खिलाफ खड़े हुए। चुनाव के दौरान उन्होंने अपने पति की काफी देखभाल की।
श्री सी.बी. गुप्ता जो कि उत्तर प्रदेश के पूर्वनियोजित मुख्यमंत्री थी, राज्यविधानसभा के चुनाव हार जाने के कारण उन्होंने सुचेता जी को
मुख्यमंत्री के पद को संभालने के लिए आमंत्रित किया। इसलिए उन्होंने लोकसभा से
अपना इस्तीफा दिया।
प्रश्नकाल का समय सबसे रोचक रहता था।
प्रश्नकाल के बाद सभी सदस्य सेन्ट्रल हॉल कॉफी का मजा लेते थे। प्रश्नकाल के दौरान
स्पीकर अध्यक्षीय स्थान पर होते थे। इस बीच कोई भोजन अवकाश नहीं होता था।
शून्यकाल आज की तरह गर्म नहीं रहता
था। शून्यकाल के बाद भोजन की व्यवस्था की जाती थी। मुझे ऐसा लगता है कि सदन ने
हमेशा ही अनुशासन रहता था।
श्री एन. अनंतश्यायानाम अयंगर लोकसभा
के अध्यक्ष थे और सरदार हुकुम सिंह उपप्रवक्ता। 1955 और 1956 में दिल्ली विधानसभा की अध्यक्ष होने
के कारण मुझे चेयरमैन पैनल में रखा गया था। दादा साहेब मालवंकर ने सदन के भीतर
काफी अच्छी परंपरा डाली थी। मध्यान्ह भोजन के बाद अध्यक्ष बहुत कम ही सदन में आते
थे।
अध्यक्ष के बारे में हमेशा यह कहा
जाता है कि वह कभी अपना वक्तव्य नहीं देते। लेकिन अनंत श्यायानाम अयंगर बोलने का
कोई भी मौका नहीं गंवाते थे। उनके द्वारा दी गई टिप्पणियों में उनकी विद्वता और
संस्कृत पर उनकी पकड़ साफ जाहिर होती है। मजाक से लोग उन्हें अनंत वचनम् कहा करते
थे। सरदार हुकुम सिंह बहुत ही सौम्य स्वभाव के एक शिक्षित रिटायर्ड न्यायाधीश थे।
मध्यान्ह के बाद सामान्यतः उपाध्यक्ष और पैनल ऑफ चेअरपर्सन्स प्रवक्ता के रूप में
काम करते थे।
पंडितजी दोनों ही सदनों में हमेशा
उपस्थित रहते थे। वह हमेशा अपने मंत्रियों का हौसला बढ़ाने के लिए वहां आते थे।
मुझे याद है वह दिन, जब मैं अध्यक्ष का काम देख रही थी, और एक महत्वपूर्ण चर्चा सत्रा चल रहा था। पंडित जी भी वहां उपस्थित
थे। वह खड़े हुए और कुछ बोलने के लिए इजाजत मांगी। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के
सदस्य ने हाथ उठाकर उन्हें रोकना चाहा, और उन्होंने भी एक सदस्य के रूप में अपनी बात रखने की इजाजत मांगी।
लेकिन मैंने कहा कि वह उनकी बात नहीं रख सकते हैं, आदरणीय पंडितजी ने खड़े होकर सवाल किया कि क्यों वह अपनी बात नहीं
रख सकते। मेरे इस उत्तर ने कि वह केवल मंत्रा के रूप में ही अपनी बात रख सकते हैं, पंडित जी शांत हुए और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी।
एस्टीमेट कमेटी और पब्लिक अकाउन्ट
कमिटी, यह दो महत्वपूर्ण सांसदीय समितियां
थीं जो अध्यक्ष सदस्यों के सरकारी व्ययों पर देखरेख करने का अधिकार देती थीं। उन
दिनों में कोई भी व्यक्ति गलत सूचना देने का ख्वाब भी नहीं देख पाता था। समिति के
दौरे बहुत ही शैक्षणिक होते थे। हम राजस्थान के दौरे पर गए थे। हम ट्रेन में ही
रहे जो हमें जगह-जगह ले जाती थी हमारा खाने-सोने की व्यवस्था सभी ट्रेन में ही थी।
यह यात्रा काफी मजेदार रही। इन दो समितियों के बाद अन्य विभिन्न समितियों को भी
समाविष्ट किया गया। पब्लिक सेक्टर में बढ़ोत्तरी के कारण सभी कामों पर नजर रखना
समिति के लिए कठिन काम था।
प्रश्नकाल के बाद हम पंडितजी के कक्ष
में जाकर मिलते थे। उनके पास सदस्यों से मिलने के लिए समय रहता था। 1962 के चुनाव के बाद मुझे उनके मंत्रीमंडल में सदस्य के रूप में सेवा
करने का मौका मिला। कोई भी अपनी समस्या को लेकर उनके पास जा सकता था खासकर संसदीय
प्रश्न। वह हमेशा अपने मंत्रियों के पक्ष में खड़े रहते थे।
प्रेस के लोग भी मित्र की तरह रहते
थे। उनमें से कुछ ने हमारे साथ स्वतंत्रता संग्राम में काम किया था। हम सारे लोग
सेन्ट्रल हॉल में कॉफी के लिए मिले। भारत के स्वतंत्र होने की भावना अभी भी लोगों
में कायम थी। स्वतंत्रता के समय का आदर्शवाद और एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम
की भावना, चाहे विरोधी पार्टी के लोग ही क्यों न
हों मौजूद थी।
एक बार श्री नाथ पाई ने पंडित जी की
पुस्तक को प्रकाशित और वितरित करने के लिए अपने मंत्रियों पर टिप्पणी की। जब मेरी
बारी आयी, तब मैंने इसका विरोध करते हुए कहा कि
पंडितजी भारत सरकार के एक महान नेता हैं और एक महान स्वतंत्रता संग्रामी भी हैं।
इसके साथ-साथ वह एक महान साहित्यिक भी हैं जिससे कि उसके पुस्तक प्रकाशन आपत्ति
दर्शाने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
मेरे वक्तव्य के बाद पंडितजी ने इस
मसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। मंत्रियों के द्वारा अपनी पुस्तक के प्रकाशन के
कार्य को उन्होंने गलत बताया।
1950, 60 और 1970 में हम महिलाओं के सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर प्रमुख तौर पर
काम करने लगे। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में महिलाओं के प्रति पुरुषों के विचारों
में काफी परिवर्तन देखने को मिला। और उमा भारती जैसी महिला के आने के बाद ऐसा लगा
कि संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अच्छी तरह से उभर के आया। इसका कारण यह है कि
महिलाएं जिन-जिन समाज से आई थीं उस समाज की परिस्थितियां उन्होंने संसद के सामने
रखीं। लेकिन महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बदल रही हैं और उन्होंने घरेलू
जीवन से सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के लिए शुरुआत की है। अगर उन परिवार के
द्वारा दबाव न डाला जाये तो वे अविवाहित रहने के लिए भी तैयार होंगी, लेकिन महिलाओं के द्वारा दिखाये गए इतने आत्मविश्वास के बाद भी
संसद में उनकी स्थिति निराशाजनक ही थी।
आज की महिला सांसद महिलाओं के सामूहिक
आवाज को बुलंद करने में असक्षम हुईं, जो उनकी नैतिक धैर्य की हार को ही दिखाती है। मेरे कार्यकाल में
वरिष्ठ महिला सांसदों द्वारा कनिष्ठ सांसदों को चुप किया जाता था। लेकिन बाद में
इसमें बदलाव आया।
लेकिन पूर्व तथा वर्तमान महिला
सांसदों को इस बात का अवलोकन करना चाहिए कि अंत में उन्हें कानून, सार्वजनिक स्वतंत्रता और जीवन के अन्य क्षेत्रों में से क्या हासिल
हुआ जिससे कि समाज में वह सम्मान पा सके। 40 साल के सांसदीय काल में अभी भी कानून ने महिलाओं को घर में कानूनी
अधिकार नहीं दिये। आज भी यह अधिकार पुरुष को ही प्राप्त है। महिलाओं को नहीं।
हिंदू कानून के अनुसार आज भी पुरुष ही
कर्ता हो सकता है। महिला ने अगर संपत्ति भी अर्जित की तब भी वह परिवार का हिस्सा
होने के कारण उसे वह अधिकार प्राप्त नहीं। क्यों हम सांसद के कानून को बदलने में
असक्षम हुए? क्यों सभी तरफ पुरुषों को स्थान है, महिलाओं को क्यों नहीं? उस समय महिला सदस्यों में राजकीय चेतना थी, लेकिन अब कहीं न कहीं राजकीय चेतना कम देखने को मिलती है। उनमें
बाध्य चेतना तो है लेकिन अंतःचेतना का अभाव है। फिर भी हम उतने ही प्रामाणिक भी
हैं। रेणुका चौधरी, जयंती नटराजन के राज्यसभा और शीला कौल
और उमा भारती के लोक सभा के कार्य से हमें यह प्रतीत होता है। मुझे ऐसा लगता है कि
आज की महिला राजकीय दृष्टि से और सामाजिक दृष्टि से जागरूक है।
महाराष्ट्र के वर्धा संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार चारुलता टोकस से शिवानी अग्रवाल की बातचीत का संक्षिप्त अंश
चारुलता टोकस दायें से तीसरी और शिवानी अग्रवाल दायें से पहली
महाराष्ट्र की राजनीति में चारुलता टोकस आज एक जाना-पहचाना नाम है। वे राज्य महिला कांग्रेस की पिछले तीन वर्षों से अध्यक्ष भी हैं। राज्य के विदर्भ क्षेत्र के वर्धा जिले की वे जिला परिषद अध्यक्ष भी रही हैं। वर्तमान में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की वे वर्धा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं। वर्धा की भूमि से ही मोदी जी ने राज्य में अपने चुनाव प्रचार अभियान की पिछले एक अप्रैल को शुरुआत की है। 5 मार्च को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यहां चुनावी रैली को संबोधित किया है। राजनीतिक विश्लेषक राहुल की रैली में मोदी जी की रैली से ज्यादा भीड़ जुटने के आधार पर इस सीट से कांग्रेस की जीत की उम्मीद जता रहे हैं। कुछ दिन पूर्व यह लोकसभा सीट बीजेपी के सिटिंग एमपी रामदास तड़स के एक टीवी चैनल के स्टिंग के कारण चर्चा में आया था। इसमें वे पिछले लोकसभा चुनाव में दस करोड़ खर्च करने की बात कबूलते नजर आ रहे हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने उससे दुगुने रुपये खर्च करने की बात की है। बहरहाल वर्धा में उनके ही एमपी ने मोदीजी के ‘मैं भी चौकीदार’ स्लोगन की हवा निकाल दी है। चारुलता टोकस-कुनबी जाति (कुर्मी) और रामदास तड़स (तेली)- दोनों ओबीसी तबके से आते हैं। बहरहाल इस सीट पर दोनों के बीच अत्यंत ही नजदीकी मुकाबला होता दिख रहा है।
अपनी प्रारंभिक जिंदगी- पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं? चारुलता- हमारे नाना-नानी स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में सक्रिय रहे। नानी ने अपना ट्रस्ट बनाया था, जिसमें लोगों का इलाज कराया जाता था। नानाजी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी और इस आंदोलन से जुड़ गए। उनकी बेटी यानी मेरी माँ ने घर से ही समाज सुधार का काम शुरू कर दिया था। उस समय घर में दलित- मुस्लिमों को घर में खाना न देने अथवा बनाने की परंपरा थी, पर इस परंपरा को मम्मी ने घर से ही तोड़ा और जिद्द करके उनको ही खाना बनाने के लिए रखा। हमारा जो परिवार है, वह सेक्युलर फैमिली है, जात-पात, धर्म आदि के भेदभाव को नहीं मानता, हमलोग सबको समान मानते हैं। मम्मी ने पुलगांव के कॉटन मिल के कामगारों के यह कहने पर कि ‘आप हमारी समस्याओं को हल करती हैं, आप चुनाव लड़ कर और भी लोगों की समस्याओं को हल करें,’ तो मम्मी ने 1972 में पहला चुनाव लड़ा और जीता, तब वे मिनिस्टर बनी थीं, 2010 में जब उनकी मौत हुई तब भी वे राजस्थान की गवर्नर थीं।
भारतीय समाज में किसी महिला का राजनीति में कदम रखना बड़ी बात होती है, ऐसे में आप राजनीति में कब और कैसे आई? जब मैंने राजनीति की शुरुआत की, मैं कॉलेज से पढ़ कर निकली ही थी। मुझे इसका अनुभव बिल्कुल भी नहीं था। मेरी राजनीति की शुरुआत 1992 में जिला परिषद के चुनाव से जिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में हुई। 5 साल तक मैं जिला परिषद में थी उसके बाद पार्टी में कई पदों पर रही। मैं महाराष्ट्र से यूथ कांग्रेस की वाइस प्रेसिडेंट भी रही। इसके बाद अभी राज्य महिला काँग्रेस की 3 साल से अध्यक्ष हूँ।
आप अपना प्रेरणा स्रोत किसे मानती हैं? इंदिरा गांधी मेरी प्रेरणा स्रोत रही हैं, उन्हीं से राजनीति में आने की प्रेरणा मुझे मिली।
एक स्त्री के तौर पर राजनीति में आने पर आपको किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ा? चूंकि मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीति से जुड़ी रही है, इसलिए राजनीति में आने में मुझे कोई ज्यादा समस्या नहीं हुई पर लोग जिस अपेक्षा से देखते हैं क्योंकि विरासत जो मिली है और जो काम मम्मी ने किया है तो लोग भी मुझसे यही उम्मीद करते हैं, इसलिए मुझे भी उन उम्मीदों में खरा उतरना होगा। परिवार, सास-ससुर, पति आदि की तरफ से मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने मुझे हर विपरीत परिस्थितियों में काफी सहयोग किया। जब मैंने राजनीति में कदम रखा तब मैं कॉलेज की लड़की ही थी। धीरे- धीरे मैंने बहुत कुछ सीखा, महिला होने के नाते बहुत सारी चीजों का सामना भी करना पड़ता है, हममें तो सहनशीलता ऊपर वाले ने दी ही है, उससे भी बहुत फर्क पड़ता है। मैं आराम से चीजों को सुनती थी कोई जवाब नहीं देती थी क्योंकि मुझे पता था कि मेरा काम ही मेरा असल जवाब होगा।
साक्षात्कार
आज आप महिला कांग्रेस की महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष हैं और पार्टी ने आपको वर्धा लोकसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी भी बनाया, राज्य और पूरे देश में महिलाओं की स्थिति कैसे देखती हैं ? पिछले 5 सालों में महिलाओं पर अन्याय-अत्याचार बहुत बढ़े हैं और खासकर महाराष्ट्र में तो बहुत ज्यादा हो रहे हैं। इसपर सरकार का बिल्कुल भी ध्यान नहीं है, इसपर नियंत्रण लाना बहुत ही जरूरी है। कायदे-कानून को सख्त और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से ऐसे मामलों के हल जल्द से जल्द निकालने की जरूरत है।
संसद में महिला आरक्षण बिल लगभग तीन दशकों से अधर में लटका हुआ है। महिला आरक्षण बिल पर मोदी जी ने कहा था कि हमारी मेजोरिटी रही तो बिल जरूर पास करवाएंगे, पर बिल टेबल पर ही रह गई। हमने सरकार से कहा था कि इस मुद्दे पर हम आपके साथ हैं, आप संसद में बिल रखिये पर उन्होंने बिल रखा तक नहीं। हमने हर राज्य में ‘सिग्नेचर कैंपेन’ किया महिलाओं के दस्तखत लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सबको दिया, पर उन्होंने इसपर कुछ नहीं किया। मगर जो हमारा मेनिफेस्टो है, उसमें हमने कहा है कि यदि हम सत्ता में आते हैं तो महिला आरक्षण विधानसभा, लोकसभा में देंगे और नौकरियों में भी 33% महिलाओं को आरक्षण देंगे।
आप यदि चुनाव जीतती हैं तो विशेषकर महिलाओं के लिए आपकी क्या प्राथमिकता होगी? मेरा संघर्ष सबके लिए रहेगा, महिलाओं के लिए खास कर। मैं चाहती हूँ यहाँ महिलाओं के लिए अलग से उद्योग हो, उनके रोजगार के लिए विशेष काम होगा। महिलाओं के स्वास्थ्य से संबंधित बहुत सी समस्याएं होती है जिसे वे अनदेखा करती हैं, कई बार ऐसा होता है कि उनके लिए ट्रीटमेंट महंगा हो जाता है तो मैं चाहती हूँ कि जितना सिंपल और सस्ता ट्रीटमेंट हो सके, मैं उपलब्ध कराउंगी।
मोदी सरकार की नीतियों को आप कैसे देखती हैं? मोदी सरकार की नीतियों के बारे में न ही बोला जाय तो अच्छा है, क्योंकि उनकी कोई नीति ही नहीं है, जो भी उन्होंने बोला, सिर्फ जुमला है।
आप अपने मतदाताओं से क्या अपील करना चाहेंगी? मतदाताओं से यही अपील करना चाहूंगी कि 2014 में आपने सत्ता परिवर्तन के लिए मतदान किया था और आपको सरकार से काफी उम्मीदें भी थी, मगर पिछले 5 सालों में जो आपको अनुभव आया है और अगर आपको लगता है कि आपके साथ सरकार ने विश्वासघात किया है तो जरूर 2019 में कांग्रेस को चुनिए क्योंकि हमने पहले काम किया, फिर बोला है। हम बड़बोलेपन में यकीन नहीं रखते। हम जनता के लिए काम करने में यकीन रखते हैं।