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मुकेश मानस और दीप्ति की कवितायें

 
 
(  मुकेश मानस कवि, कथाकार और विचारक हैं , चर्चित पत्रिका मगहर का संपादन करते हैं  और दिल्ली वि वि में हिन्दी के प्राध्यापक हैं. उनकी इन कविताओं में स्त्री के आत्मीय पुरुष की अभिव्यक्ति है , एक स्त्रीवादी पुरुष की . दीप्ति एम .ए की छात्रा हैं, निरंतर अपनी कविताओं में बेहतर होती जा रही हैं. हो सकता है इन कविताओं में एक स्त्रीमन की अनगढ अभिव्यक्ति मिले , लेकिन युवा स्त्री के मन की थाह  जरूर है इनमें . मुकेश मानस और दीप्ति से क्रमशः 9873134564, 9412526563 पर संपर्क किया जा सकता है ) 
 
मुकेश मानस की कवितायें 
 
1. पहाड़ में बाघ

मुकेश मानस
उत्तराखंड
के एक खूबसूरत पहाड़ की तलहटी में
एक
होटल की तीसरी मंजिल पर
आजकल
ठहरे हुए हैं हम
शाम का
समां है
हमारे
कमरे की बालकनी में
मेरी
बेटी और मैं बैठे हुए हैं
और
निहार रहे हैं पहाड़ी शाम की खूबसूरती
एक
पहाड़ी औरत ले के जा रही है अपने सिर पर
जंगल
से काटी गयी लकड़ी
सूरज
डूबता चला जाता है
खुश
होके कहती है मेरी बेटी-“वडरफुल”
अचानक
एक खामोशी पसर जाती है अन्धेरे सी
फिर
किलक के कहती है वो मुझे
पापा
सुनो तो ज़रा
एक
झरने की आवाज़ आ रही है
झरने
की आवाज़ सुनने की कोशिश में
मुझे
सुनाई देती है पहाड़ पर
एक बाघ
के गुर्राने की आवाज़
मैं उस
पहाड़ी औरत को जाते हुए देखता हूं
तो
ख्याल आता है मुझे
कि
पहाड़ में बाघ अब भी बाकी हैं
और
बाकी है उनकी आवाज़
2013
 
2. बेटी
मेरी बेटी मुझे बुलाती है
मैं दौड़ के जाता हूँ
और मुझे अपने होने की खुशी होती
है
मुझे लगता है कि मैं किसी काम का
हूँ
मेरी बेटी मुझे आदेश देती है
मैं उसके आदेश का पालन करता हूँ
मुझे लगता है मेरा जीवन सफल हो
गया
2010
 
3. माँ
मैंने जब इस धरती पर पहला कदम
रक्खा 
तब मौजूद थी एक स्त्री इस धरती
पर
उसने मुझे मुझे चूमा, मुझे
दुलराया
अपने जीवन की किसी जरूरी धड़कन की
तरह
 मुझे अपने दिल की गहराईयों में बसाया
ये मेरे जीवन का पहला स्पर्श था
पहली छुअन, पहला अपनापन
और किसी दूसरे शरीर की पहली मादक
गन्ध
रोम–रोम तक घटित होने वाल पहला
प्यार था यह
उसके बाद जीवन भर
मैं कहां कहां नहीं गया
क्या-क्या नहीं किया मैंने
जाने किस-किस से प्यार किया
और किस किस से नफ़रत की
अब ये मुझे याद भी नहीं
मगर जीवन भर उसकी बांहें मिली
मुझे संभालती, दुलराती हुई
उसकी सदिच्छाएं मिलीं
अन्धेरों में रौशनी की तरह प्रेरित
करतीं
अपार स्निग्ध प्यार मिला
कि मैं औरों को प्यार करने के
काबिल बना रहूँ
करूणा मिली जिसने मुझे भीतर से इन्सान
बनाए रखा
जब कभी मैं नहीं रहूँगा इस धरा
पर
तब भी रहेगी वो स्त्री
बना रहेगा उसका स्पर्श, उसकी गंध
बनी रहेगी उसकी विराटता
चलता रहेगा संसार उसके इशारों पर
जब मैं नहीं रहूँगा
तब भी रहेगी वो स्त्री इस धरती
पर
2010,
मां के परिनिर्वाण पर
 
4. कमोडिटी
प्रिय पूनम पांडे
मुझे तुम्हारी घोषणा सुनकार बहुत
खुशी हुई
धन्य है तुम्हारा वो देश
जिसके लिए तुम कहीं भी कपड़े उतार
सकती हो
धन्य हैं तुम्हारे वो माता–पिता
जिन्हें तुम्हारे नंगा होने पर
गर्व है
धन्य हैं तुम्हारे वो मित्र और
सहचर
जो तुम्हारी घोषणा सुनकर प्रसन्न
हैं
धन्य है तुम्हारा स्त्री होना
कि तुमने स्त्रीपन की नई मिसाल
दी है
चिढ़ने दो अगर चिढ़तीं हैं तुमसे
बछेन्द्री पाल, मेधा पाटकर,
अरुणा राय
ईरोम शर्मिला, भंवरीबाई वगैरह
वगैरह
पागला गई हैं ये औरतें जो चिढ़तीं
हैं तुमसे
मगर यकीन मानो पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर बहुत
खुश हूँ
इसलिए नहीं कि मैं दलित हूँ और
तुम ब्राह्मण हूँ
इसलिए नहीं कि मेरे मन में ब्राह्मणों
के लिए नफ़रत भरी है
और उनकी लड़कियों के नंगे होने पर
मैं खुश हूँ
यकीन मानो पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर
बहुत  खुश हूँ
इसलिए नहीं कि मैं एक पुरुष हूँ
और तुम एक स्त्री
और हर स्त्री को नग्न देखना
पुरूष की आदिम प्रवृत्ति है
यकीन मानो प्रिय पूनम पांडे
मैं तुम्हारी घोषणा सुनकर बहुत
खुश हूँ
खुश हूँ कि जिसे मैं अपना देश
कहता हूँ
तुम उस देश की नागरिक नहीं हो
खुश हूँ कि जिसे मैं नई पीढ़ी
कहता हूँ
तुम उस पीढ़ी की सद्स्य नहीं हो
खुश हूँ कि तुम आधुनिक स्त्री तो
कतई नहीं हो
तुम तो किसी बाज़ार की एक कमोडिटी
हो
सिर्फ़ एक बिकाऊ माल
खरीदी और बेची जाने वाली कोई
वस्तु हो
देह के बाज़ार में एक विज्ञापन हो
तुम कोई देश नहीं हो
तुम कोई धर्म नहीं हो
तुम कोई जाति नहीं हो
तुम कोई लिंग नहीं हो
2011
माडल पूनम पांडे की यह
घोषणा सुनकर कि अगर टीम इंडिया जीतती है तो वह इस खुशी में कहीं भी नंगी हो सकती
है।

उसे गर्व है कि वह नई पीढ़ी की है। उसके नंगा होने में उसके मां-बाप को कोई
आपत्ति नहीं है। 
 
5. नई भाषा
जिस
भाषा में बातचीत करते हैं हम
वह नाकाफ़ी है
हमारे उन भावों के लिए
जिन्हें हम व्यक्त करके भी
व्यक्त नहीं कर पाते
इसलिए हमें चाहिए एक नई भाषा
बेहद सहज और सरल भाषा
ठीक उस प्यार की तरह
जो हमारे भीतर महक उठता है
एक दूसरे के लिए
कभी-कभी
2011
दीप्ति की कवितायें 
1.

दीप्ति
अपाहिज नहीं हूँ
चल सकती हूँ
पर जंजीरों से जकडी हूँ ,
आँसू भी गिरते हैं
पर जंजीरे नहीं पिघलतीं
मजबूती से बंधी हुयी वो
और मजबूत होती जाती है ,
युग युगान्तर से बंधी
इन जंजीरों को तोडने की
प्रक्रिया अब शुरू हो गयी
है ।
2. मुक्ति की आकांक्षा को
त्याग
मुट्ठी भर भर गेहूँ
चाकी में पिसती – चलाती
अनुभवों को बटोरती
टेनिये में भरती जाती हूँ
चाकी के चारों ओर
कुछ दरदरा गेहूँ ,
बचा रह जाता है
निढाल सा पडा है
अपने आपमें मग्न
दुनिया की चाकी में
बार – बार
पिसने का अनुभव
लेना चहता है ,
तभी इतनी बार पिसकर भी
बचा रह जाता है
वो दरदरा गेहूँ ।
3. 
राजपथ पर चलती मैं अकेली
धूप से बचती   
छतरी ओढे चली जा रही हूँ
धूप की तेज़ किरणें
छतरी को पार कर
मुझे जला रही हैं
और मैं सुकडती चली जा रही
हूँ
,
वहीं पास से लोगों का हूजूम
निकल रहा है
लोग नारे लगा रहे हैं ,
बलात्कार के दोषियों को
फाँसी दो
,
बडे-बडे पोस्टर लटकाये , बडे बेनर उठाये
चले जा रहे हैं ,
उनमें कुछ परेशान हैं
देश की व्यवस्था को लेकर
और कुछ भीड में पीछे चल ,
भीड बढा रहे हैं ,
वो फोन में अश्लील चित्र /
फिल्में देख रहे
और  मुस्कुरा रहे हैं ,
साथ में नारी हक में नारे
लगा रहे है
,
वो आज फिल्में देख मुस्कुरा
रहे हैं
कल बलात्कार कर
खिलखिलायेगें
अपनी मर्दनगी पर इठलायेगे ,
ये देख
मैं वहीं किनारे सडक पर बैठ
गयी
और सोचने लगी
कि कल फिर क्या ये
किसी भीड का हिस्सा बन
नारे लगायेगें
बलात्कारियों को फाँसी दो !
या फिर किसी और हूजूम में
इकट्ठे हों
हिंदुस्तान जिन्दाबाद के नारे लगायेगें

स्त्री-सत्ता : यथार्थ या विभ्रम

अर्चना वर्मा
हम सब जानते हैं कि शब्दों के अर्थ उनके प्रयोग-सन्दर्भ से
निर्धारित होते हैँ। सत्ता का
प्राथमिक अर्थ विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी अस्तित्व है। लेकिन हमारे विषय

अर्चना वर्मा

स्त्री-सत्ता: यथार्थ या
विभ्रम को यहाँ ब्रैकेट में लिखित (Women Power:Illusion or
Reality) के हिन्दी रूपान्तर की तरह प्रस्तुत किया गया है इसलिये इस अर्थ के साथ प्रभुत्त्व और अधिकार की ध्वनियाँ भी जुड़ जाती हैँ। तब इसका सन्दर्भ शक्ति-विमर्श और अर्थ की कोटि राजनीतिक हो जाती है। पितृसत्ता या पुरुषसत्ता की सामाजिक संरचना के अधीन स्त्री का अस्तित्व हमारे विषय को एक साथ पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों और अर्थ की कोटियों से जोड़ देता है। बात चाहे स्त्री के प्रभुत्त्व और अधिकार की हो या अस्तित्व और विद्यमानता की, उसका तात्कालिक अर्थ और सन्दर्भ मर्द और मर्दों की दुनिया में उसकी सत्ता से न केवल जुड़ा बल्कि उसी के द्वारा सीमित, और प्रतिबन्धित भी है। इसलिये जहाँ तक ‘पावर’ या शक्ति के अर्थ मेँ सत्ता का प्रश्‍न है, मामला अभी तक ‘एम्पावरमेण्ट’ या सशक्तीकरण के राजनीतिक प्रयासों के भीतर ही घूम रहा है और सामाजिक पूर्वग्रहों को देखते हुए ये प्रयास बहरहाल अपर्याप्त ही साबित होकर रह जाते हैँ।

हमारे पास मन की तसल्ली के लिये बड़ी सुविधा की तरह हमारे परम्परागत सांस्कृतिक-दार्शनिक अवदान मौजूद हैँ जिन्हें मौका बेमौका उद्धृत करके हम स्त्री के सम्मान की संस्कृति का उत्तराधिकारी होने का दंभ पाल सकते हैँ। मिथक और पुराण किसी संस्कृति का अन्तःकरण कहे जाते हैं। लेकिन फि़लहाल आधुनिकता और उपनिवेश और विज्ञान और औद्योगीकरण के गुलेल ने संस्कृति को उसके अन्तःकरण की गहराइयों में से बाहर निकाल फेंका है। उत्पीड़न और अन्याय के अतीत उत्तराधिकार से मुक्ति की आकांक्षा स्वाभाविक भी है और ज़रूरी भी लेकिन जैसा कि अंग्रेज़ी के एक मुहावरे में होता है, “थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथवॉटर” वैसा न हो जाय यानी कि नहान का पानी फेंकते के साथ बच्चा भी फिँक गया जिसे नहलाया जा रहा था।
शिव और
शक्ति
, पुरुष और
प्रकृति के अलावा अर्धनारीश्‍वर जैसी परिकल्पनाओं
का उत्तराधिकार अभिमान
का विषय हो भी सकता है, है भी, लेकिन अब
वे न किसी जीवित परम्परा की कड़ी की तरह और न हमारे
सामूहिक अवचेतन
मेँ समाई किसी स्मृति या संस्कार की तरह लोकचेतना का
अंश रह गयी हैँ। वे अब सिर्फ इण्डोलॉजी के विद्वानों और उत्सुक
विदेशियों के लिये अध्ययन
का विषय और मुग्धता का सामान हैं। परम्परा के नाम पर
स्त्री-विरोधी रीति-रिवाजों, प्रथाओं और
मान्यताओं से लड़ने के लिये शायद वे परम्परा से ही प्राप्त औजार
की तरह काम मेँ लाई जा सकती हों लेकिन इसके लिये पहले उन्हें
लोकचेतना मेँ पुनर्जीवित करना होगा। लेकिन परम्परा

को फ़िलहाल
हमने ब्राह्मणवादी संस्कृति
के सवर्ण वर्चस्ववाद का उत्तराधिकार घोषित करके उसके
साथ उच्छेदन का रिश्‍ता बनाया है। क्योंकि उनमें सामूहिक
अवचेतन खोजने या उनको लोकचेतना का अंश बनाने की बजाय उन्हीं
मेँ सामाजिक विखण्डनों उत्पीड़नों और अन्यायों की निशानदेही
भी की जा सकती है। महिषासुरमर्दिनी
या काली का जो
अर्थ स्त्रीसत्ता के सन्दर्भ मेँ पढ़ा जा सकता है वह आदिवासी या
दलित सन्दर्भों मेँ बदल दिया जाता है। इसलिये स्त्रीसत्ता और
शक्ति के मिथकों और पुराणकथाओं और दार्शनिक परिकल्पनाओं के सांस्कृतिक
अंतरिक्ष के धुँधले आवेग और बौद्धिक कोहरे की बजाय उचित
है कि जो यथार्थ है – असमानता
– उसको
नापने के ठोस, व्यावहारिक और
सांसारिक पैमानों की तरफ़ देखा जाय। सशक्तीकरण की प्रक्रिया
को निर्धारित और कार्यान्वित
करने के लिये भी ज़रूरी
है कि दुर्बलताओं और दमन के रूपों को जाना और परखा जाय।

भारतीय समाज मेँ लैंगिक असमानता के विषय मेँ स्त्री और शिशु विकास मंत्रालय की स्टेटस रिपोर्ट सितम्बर 2009 मेँ प्रस्तुत की गयी। उसके अनुसार लैंगिक तुलनाओं को किसी भी समाज में स्त्री-पुरुष की असमानताओं को समझने की कुंजी कहा जा सकता है। इसी मान्यता के आधार पर इस असमानता की जाँच के लिये तुलनात्मक पैमाने तय किये गये।
इनमें कुछ जाने माने प्रत्यक्ष पैमाने हैँ
जैसे लैंगिक अनुपात मेँ स्त्री का हिस्सा, कन्या-भ्रूण हत्या, साक्षरता की
तुलनात्मक दर, स्वास्थ्य और
पोषक आहार के सूचक चिह्न, पारिश्रमिक और
वेतन की तुलनात्मक दर, और भूमि तथा जायदाद के स्वामित्त्व का तुलनात्मक अनुपात। इन असमानताओं की नाप आँकड़ों से की जा सकती है। ज़्यादा कठिनाई उन असमानताओं की नाप मेँ आती है जो अप्रत्यक्ष हैँ और शक्ति के वितरण में निहित और सांस्कृतिक उत्तराधिकार मेँ धँसी हुई हैँ। पारिवारिक संसाधनों पर नियंत्रण, निर्णय के अधिकार और आत्मनिर्भरता का अभाव, निर्मूल्य श्रम की व्यर्थता का बोझ इत्यादि दैनिक जीवनस्थितियों में निहित शक्ति का असमान वितरण इतना रोज़मर्रा और साधारण सामान्य है कि खुद को भी दिखाई नहीं देता क्योंकि वह सांस्कृतिक उत्तराधिकार की तरह हमको मिला है।
इन असमानताओं के संशोधन के लिये विकास
की दर को नापने के लिये भी कुछ आयाम और उनके संकेतक निर्धारित किये गये हैं। लैंगिक विकास के तीन आयाम वही हैँ जो मानव विकास के भी हैँ। पहला
आयाम है दीर्घ और स्वस्थ जीवन। इसका पहला संकेतक है नवजात-मृत्युदर और दूसरा सूचक है एक बरस तक जीवित रह गये बच्चे की जीवन प्रत्याशा। विकास का दूसरा आयाम है ज्ञान। इसका पहला संकेतक है एक से सात वर्ष तक की आयु मेँ साक्षरता की दर और दूसरा संकेतक है 15 वर्ष के आयु वर्ग की शिक्षा मेँ लगने वाले औसत वर्ष। विकास का तीसरा आयाम है सन्तोषजनक जीवनस्तर। इसके लिये चुना गया संकेतक है प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति अनुमानित अर्जित आय मेँ स्त्री-पुरुष का हिस्सा।
इन आयामों और उनके संकेतकों को न्यूनतम और अधिकतम के पैमाने मेँ बाँटा गया है और देखा गया है कि किस सिरे पर स्त्री-पुरुष की तुलनात्मक संख्या क्या है। उदाहरण के लिये दीर्घ स्वस्थ जीवन के संकेतक मेँ तुलनात्मक नवजात-मृत्युदर मेँ बच रहने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या अधिक है। इसका अर्थ यह है कि कन्या-शिशु मेँ प्राकृतिक जीवनी शक्ति अधिक होती है जब कि एक वर्ष तक बचे रह जाने वाले शिशुओं की जीवन-प्रत्याशा मेँ
लड़कोँ की संख्या अधिक हो जाती है। और हम सबका जाना माना निष्कर्ष
यह है कि जन्म लेने के बाद जो देखभाल और सारसँभाल ज़रूरी होती है उसकी बेहद कमी कन्या-शिशु की प्राकृतिक जीवनी-शक्ति को
हरा देती है। इन आँकड़ों मेँ भ्रूण-हत्या शामिल
नहीं है। इसका नतीजा देश की जनसंख्या के लैँगिक अनुपात में असन्तुलन है। यही स्थिति शेष दोनो आयामोँ की भी है। मानव विकास और लैँगिक विकास को साथ साथ रखकर देखने का स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि सामान्य मानवाधिकार के स्तर पर भी हमारा समाज स्त्री को कुछ कम मानव या शायद अमानव मान कर चलता है।
लैंगिक समानता के पैमानों
और उपायों को भी तीन आयामों मेँ बाँटा गया है। पहला आयाम – राजनीतिक हिस्सेदारी और निर्णय का अधिकार जिसके संकेतक हैँ संसद, विधानसभा, जिलापरिषद ग्रामपंचायत
की सीटों में और संसदीय निर्वाचन मेँ वोट के अधिकार के प्रयोग में स्त्री की हिस्सेदारी का प्रतिशत। दूसरा आयाम है आर्थिक हिस्सेदारी और निर्णय का अधिकार जिसके संकेतक हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस
सेवा, भारतीय वनविभाग
सेवा मेँ अफ़सरों की संख्या और मेडिकल और
इंजीनियरिंग संस्थानों के दाखिलों की संख्या में स्त्री के हिस्से का प्रतिशत। तीसरा आयाम
है आर्थिक संसाधनों पर अधिकार जिसके संकेतक हैँ जमीन जायदाद पर प्रभावी अधिकार मेँ स्त्री/पुरुष का तुलनात्मक प्रतिशत, अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों में दो लाख तक की कर्ज सीमा वाले खातों मेँ स्त्री/पुरुष खातों का तुलनात्मक प्रतिशत और प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष की अनुमानित अर्जित आय मेँ स्त्री/पुरुष के हिस्सों का प्रतिशत।
स्त्री की दशा के सुधार की दिशा में जन-चेतना मंच, फ़ाउण्डेशन टु
एजूकेट गर्ल्स ग्लोबली, द हंगर प्रोजेक्ट, स्टेप्स विमेन
डेवलपमेण्ट ऑर्गनाइज़ेशन, नेशनल मिशन
फॉर एम्पॉवरमेण्ट ऑफ़ विमेन इत्यादि और अन्य अनेक अनगिनत स्थानीय एन.जी.ओ. कार्यरत हैँ।
उपरोक्त पहलकदमियों के अलावा ICDS यानी (Integrated Child Development
Scheme), राजीव गाँधी नेशनल क्रेश स्कीम फॉर चिल्ड्रेन ऑफ़ वर्किंग मदर्स, धनलक्ष्मी, स्वाधार और
अन्य अनेक योजनाएँ भी लागू की
गयी हैं। यह केवल एक अधूरी और
अपर्याप्त सूची है। प्रादेशिक सरकारों
की भी अपनी अपनी योजनाएँ हैँ
निस्संदेह इन सब प्रयासों के नतीजे में ठोस
विकास और सुधार दर्ज भी किये गये। इनमेँ सबसे
महत्त्वपूर्ण जैसे कि, 1971 मेँ लिंगानुपात प्रति 1000 की तुलना में 930 था। वह 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति 1000 पर 940 हो गया है। 1961 में स्त्री साक्षरता की जो दर कुल 18.3% थी वह 2011 में 4% हो गयी जो वाकई एक मूल और गहन विकास है। 1981 में स्त्री-पुरुष की साक्षरता का अन्तराल 26.6 % था जो 2011 में घटकर 16.7 % रह गया। ये विकास के इंगित हैँ लेकिन बहुत नाकाफ़ी । इनके आधार पर स्त्री-सत्ता यानी शक्ति के यथार्थ होने का निष्कर्ष निकाला जा सकता है। स्त्री और शिशु विकास मंत्रालय की ओर से लगातार स्त्री की दशा के किसी न किसी आयाम के विषय में नियमित रूप से शोध, सर्वेक्षण, विश्‍लेषण चलता रहता है और उनकी स्टेटस रिपोर्ट भी प्राप्त होती रहती है। इन रिपोर्टों से वही बातें प्रमाणित और सत्यापित होती हैँ जिन्हें हम अपने और अपने आस पास के अनुभव से जानते हैं। लेकिन रिपोर्ट आँकड़ों की प्रमाणसम्मत भाषा मेँ बोलती है। जिनको आँकड़े पढ़ना आता हैँ उनके लिये बहुत कुछ व्यक्त करती है। वह हमारे अनुभव के दायरे के बाहर के आते हुए बदलावों को भी दर्ज करती है। आभास को वास्तविक बनाती है और हालात को ‘पिनपॉइण्ट’ करती है। हालात को बदलने और दिशान्वित करने के लिये उनको नियंत्रित करना ज़रूरी है लेकिन एक जीती जागती औरत का ज़िन्दा अस्तित्व उनमें अमूर्त और गुम हो जाता है।
स्त्री सशक्तीकरण बहुत से कारणों और घटकों से निर्धारित होता है जैसे स्थानिकता, सामाजिक और आर्थिक हैसियत, सांस्कृतिक ध्वनियाँ और व्यंजनाएँ, परम्पराएँ और आयु। स्त्री-विमर्श की
तह मेँ इस सार्वभौम सर्वमान्य मूलभूत
सत्य की मान्यता है कि स्त्री के जीवन की मुख्यधारा अन्याय, उत्पीड़न और
शोषण की है, फिर चाहे सहने का फ़ैसला हो या संघर्ष करने का। इसीके संशोधन और प्रतिकार के लिये 1975 में संयुक्त राष्ट्र-संगठन की वैश्‍विक पहल पर सोशल-इंजीनियरिंग आरंभ हुई थी।

वैश्‍विक प्रायोजन के अन्तर्गत भारत मेँ भी बड़े पैमाने पर सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक स्तर के सरकार समर्थित कार्यक्रम बने और कार्यान्वित भी हुए, महिला और शिशु विकास का अलग मंत्रालय बना, बहुत से गैर सरकारी संगठन स्त्रीमुक्ति को एक आन्दोलन में बदलने के अभियान मेँ शामिल हुए। संविधान में अनेक संशोधन हुए लेकिन इस राजनीतिक और रणनीतिक कार्रवाई के अलावा स्त्रीवादी विमर्शों और लैंगिक भेदभाव के अध्ययनोँ का जो भी थोड़ा बहुत अकादमिक कामकाज हुआ वह अंग्रेजी में ही किया जाता रहा। नतीजा यह रहा कि जन-सामान्य और व्यापक समाज मेँ स्त्री-चेतना की
समझ और प्रचार-प्रसार का
कोई सुव्यवस्थित और प्रभावी कार्यक्रम
कार्यान्वित हुआ ही नहीं। समाज में बदलाव आता दिखता है लेकिन बदलाव की समझ आती नहीं दिखती। परिवर्तन की अपरिचित और अज्ञात दिशाओं के प्रति भय, आशंका और असहिष्णुता ज़रूर उमड़ती दीखती है। बार बार प्रश्‍न उठता है कि चेतना-प्रसार के उपयुक्त और व्यापक सामाजिक कार्यक्रम के बिना केवल आर्थिक
सशक्तीकरण से वास्तविक समस्या का आंशिक भी समाधान संभव है क्या?

इतनी सारी योजनाओं के बावजूद GGGP यानी ( Global Gender Gap Index ) के पर्यवेक्षण के अनुसार स्वास्थ्य, शिक्षा और
आर्थिक भागीदारी के स्तर पर जो अन्तराल हैँ वे विकास की सक्रिय बाधाएँ हैँ। कुछ विशिष्ट प्रतीक स्त्रियों को छोड़कर स्थानीय, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय – सभी
स्तरोँ पर सशक्तीकरण अभी अपने शैशव मेँ ही है। CARE (Cooperative for Assistance and
Relief Everywhere) के सर्वेक्षण के अनुसार पूरी दुनिया मेँ नितान्त निर्धनता मेँ रहने वाले लोगों की संख्या कुल मिलाकर 1.3 बिलियन है। इनमेँ 70% स्त्रियों का है। यूनेस्को की मीडियम टर्म स्ट्रैटजी 2008-13 मेँ संगठन की वैश्‍विक प्राथमिकता की जगह लैंगिक समानता को दी गयी है लेकिन पूरी दुनिया में जो 774 मिलियन वयस्क
पढ़ लिख नहीं सकते उनका दो तिहाई औरतों का है। विकासशील दुनिया
और तीसरी दुनिया मेँ honor
klling एक सम्मानित प्रथा है। स्त्री प्रायः शिक्षा और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित है। CARE की एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट की एक टिप्पणी में भारत मेँ किशोर वय की लड़कियों को ” Temporary people who would cease to exist
at least by their fathers once they are married.’ ” (अस्थायी व्यक्ति
जो अस्तित्वहीन हो जायेंगी) कहा गया है क्योंकि यहाँ लड़की के विवाह का अर्थ अब भी बड़े पैमाने पर अपने मातृकुल की सदस्यता से वंचित और अस्तित्वहीन हो जाना है, कम से कम पिता के लिये। घरेलू हिंसा तथा
अपनी स्वतंत्रता पर अन्य सांस्कृतिक और और नैतिक प्रतिबन्ध स्वयं स्त्रियों
को भी स्वीकृत हैं – कहीं
स्वेच्छा से, कहीं मज़बूरी से।
अन्य भारतीय भाषाओं के बारे मेँ नहीं कह सकती लेकिन हिन्दी भाषी प्रदेशों में साहित्य के अलावा अन्य अनुशासनों मेँ कुछ एक छिटपुट प्रयासों के अलावा ज़्यादातर जिम्मेदारी कविता, कहानी, आत्मकथा आदि
साहित्यिक अभिव्यक्तियों के रूप मेँ ही सँभाली गयी है। नतीजा, या तो स्त्री की पीड़ा बखान या फिर उसकी शक्ति के महिमागान मेँ ही अपना मनोतोष खोज लिया जाता है। स्त्रीशक्ति का मतलब यहाँ विद्रोह की दिशाएँ जो पुरुष द्वारा कोख पर कब्जे और देह पर दखल की ज़्यादतियों और शुचितावादी नैतिकता के एकतरफ़ा कानूनों और सज़ाओं के ख़िलाफ़ जाती दिखाई देती हैँ जिन्हें आसानी से लोग अनैतिकता का झण्डा और नैतिकता की
ख़िलाफ़त का पर्याय समझ बैठते हैँ। कुल मिलाकर हिन्दीभाषी समाज के एक हिस्से मेँ स्त्री-पुरुष के बीच एक द्वेष और आक्रोश का सम्बन्ध और परस्पर आक्रामकता की संस्कृति पनपती दिखती है। पितृसत्ता और मातृसत्ता एक दूसरे का प्रतिपक्ष बन जाते हैं। अपवाद ज़रूर मौजूद हैं। मातृसत्ता के समर्थक पुरुष अपवादस्वरूप मिल जाते हैँ लेकिन पिछली पीढ़ी की स्त्रियाँ लगभग निरपवाद रूप से पितृसत्ता की पक्षधरता मेँ शामिल दिखती हैं। कहना यह चाहिये कि पहले की पितृसत्ता और मातृसत्ता में एक गठबन्धन दिखाई देता है जिसमें अब एक बदलाव आया है जिसकी वजह से पारिवारिक समीकरण भी बदल रहे हैं।
बात को शायद थोड़ा खोलकर
कहने की ज़रूरत है। पितृसत्ता पैट्रियार्की का हिन्दी रूपान्तर है। पैट्रियार्क
यानी समुदाय का मुखिया वृद्ध। पिता पीढ़ी के उस वृद्ध के शासन-अनुशासन मेँ न केवल स्त्री बल्कि उसके साथ पुत्र अथवा युवतर पीढ़ी का पुरुष भी शासन और दमन का पात्र है। पितृ+सत्ता के पास एक चेहरा सत्ता का है तो एक चेहरा पिता का भी है। औद्योगीकरण के
पहले की सामाजिक पारिवारिक व्यवस्था
मेँ घर के अन्दर और बाहर की दुनियाओं का बँटवारा था। पितृसत्ता और मातृसत्ता का गठबन्धन दमन-अनुशासन और वात्सल्य का गँठजोड़ रहा होगा। वहाँ वह परस्पर पूरक और प्रभावी भी रहा होगा।
भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया पराधीनता की दशा में, विदेशी शासकों की आवश्‍यकताओं के अनुकूल, विषम भौगोलिक वितरण तथा असमान गति से सम्पन्न हुई। वह एक विकृत और अधूरा औद्योगीकरण
था। उसके साथ आने वाले सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों की गति भी असमान और असन्तुलित ही रह गयी। प्राक्-औद्योगीकरण की
वह दुनिया अधिकांशतः जा चुकी, बची खुची भी जा रही है। वृद्धता अब अनुभव की परिपक्वता का नहीं, विकास की
अवरुद्धता और जड़ता का प्रमाण बन
चुकी है। इसलिये पितृसत्ता और
मातृसत्ता अपनी पकड़ खो बैठे हैँ।
इस दुनिया मेँ उनका रूपान्तर पितृसत्ता से पुरुष-सत्ता मेँ
और मातृसत्ता से स्त्री-सत्ता मेँ
हो चुका है। वे प्रायः पितृसत्ता+मातृसत्ता के
पिछले गठबन्धन यानी स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के पुराने समीकरण के विरुद्ध तो हैं ही, किसी नये समीकरण के उभरने के पहले अक्सर एक दूसरे के भी विरुद्ध दिखाई देते हैँ। इस घालमेल मेँ हो यह रहा है कि यथार्थ बदल गया है लेकिन भूमिकाएँ और कसौटियाँ वही पुरानी चलती चली जा रही हैँ जिन्हें कभी पितृ-सत्ता या
पुरुषसत्ता ने स्त्री पर आयद किया था और जिनके उल्लंघन का दण्ड अब भी स्त्री को अपवाद नहीं, लगभग नियमस्वरूप दिया जाता रहता है।
इसी दुनिया के एक सिरे पर उन आँकड़ों में
से झाँकती सकारात्मक दुनिया है जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है लेकिन दूसरे सिरे पर वे सारी बाधाएँ भी हैँ जिनकी वजह से वह दुनिया यथार्थ बनते बनते रह
जाती है। नये प्रावधानों के बारे मेँ जनसामान्य
के लिये तथा स्वयं स्त्री के लिये भी, सूचना और जानकारी की भयंकर कमी, सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का अभाव, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, जवाबदेही का दुर्बल तंत्र, सुरक्षा के प्रावधानों पर पुलिस द्वारा कार्यान्विति का अभाव और इन सबकी जड़ में समाज का लैंगिक संस्कृति का अभाव, उसके स्वरूप से अपरिचय, और सच को न देखने, न मानने की ज़िद मौजूद हैं।
इस दुनिया मेँ खासकर भारत मेँ, बूढ़े अप्रासंगिक और असहाय, और अधिकतर संसार अभी युवा,

अनुभवहीन और अपनी अनुभवहीनता के प्रति अबोध भी है। अक्सर वे जीवन को एक प्रयोग की तरह जीकर देख रहे हैँ। प्रयोग असफल भी हो सकता है और उसके नतीजों को झेलना वे अभी नहीं जानते।

कुल मिला कर परिदृश्‍य बहुत अस्त-व्यस्त, धुँधला, अबूझ, क्षुब्ध, लगभग संवादहीन और प्रत्याशापूर्ण है। अपनी दुनिया
को हम अक्सर कुछ विस्मित, कुछ भयभीत और आशंकित भाव से देखते पाये जाते हैँ, आखिर यह हो क्या रहा है। भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावादी जीवनमूल्य और लालसा का साम्राज्य, पूँजी और
बाज़ार की नियामक भूमिका, अपरिचित कॉर्पोरेट
अर्थतंत्र का विकट जंजाल आदि इत्यादि इसकी कारण-राशि का निर्माण करते हैं। इस बदलते हुए तंत्र ने एक ओर स्त्री के सामने अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल दिये हैँ तो दूसरी ओर पिछली मूल्य-व्यवस्थाओं, सम्बन्धों के
समीकरणों को ध्वस्त करने का अभियान भी शुरू कर दिया है। निर्णय में समर्थ, उपार्जन में सक्षम आत्मनिर्भर स्त्री के अस्तित्व ने पारिवारिक संरचना और नैतिकता के पुराने मूल्यों का ताना-बाना बदलना शुरू कर दिया है लेकिन अभी उनका बदलना कम और छिन्न-भिन्न होना ज्यादा दिखाई दे रहा है।
इस जगह आकर हम स्त्रीसत्ता के प्राथमिक अर्थ – विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी अस्तित्व की बात कर सकते हैँ। उसके सन्दर्भ मेँ विभ्रम अथवा यथार्थ की बात करें तो स्त्री-विमर्श ने हमको यह सोचने का आदी बना दिया है कि स्त्री होती नहीं, बनाई जाती है। स्त्री के अस्तित्त्व का वस्तुगत यथार्थ स्त्री-शरीर है। अस्ति और अस्मि का, वस्तु और व्यक्ति यानी ‘है’ और ‘हूँ’ का अन्तर यही है कि ‘अस्ति’ या ‘वस्तु’ यानी शरीर प्रकृति-प्रदत्त है। ‘अस्मि’ और ‘व्यक्ति’ उसके अस्तित्त्व का वह हिस्सा है जो समाज और इतिहास द्वारा बनाया जाता है और इतिहास की दीर्घता के कारण प्राकृतिक और वास्तविक सा प्रतीत होने लगता है। लेकिन केवल प्रतीत। वह संस्कृति-सापेक्ष और परिवर्तन-सापेक्ष अतः विकासशील है। अस्तित्व का ‘अस्मि’ तत्त्व जिससे
अस्मिता का निर्माण होता है, हमारा अन्तरंग हिस्सा है जिसे भीतर से देखकर केवल हम जानते हैँ और दूसरा कोई उसे उस रूप मेँ तबतक नहीं जान सकता जबतक वह वैसे ही अनुभव से होकर स्वयं न गुजरा हो। इसीलिये संप्रेषण अनिवार्य है।
स्त्रीसत्ता केअस्मितत्त्व मेँ वह ‘स्वयं’ होती है, अपना आप। इसके विपरीत उसके ‘अस्ति’ तत्त्व मेँ
वह वस्तु होती है, पुरुष के
लिये ‘अन्य’, केवल शरीर। भारतीय समाज में जहाँ यौनिक शुचिता को अबतक स्त्री-जीवन की कसौटी बना कर रखा गया है, शरीर ही स्त्री के लिये सारे फसाद की जड़ बन गया है। वही उसके शोषण, उत्पीड़न, अपमान का
उत्स और मर्यादाओं, अक्षमताओं, बन्धनों का अथ और इति है। इनमेँ वास्तविक तो केवल शरीर है, शेष सब संस्कृतिजनित व्याख्याएँ जिनको संकल्प और संघर्ष से विभ्रम साबित किया जा सकता है। इसका अर्थ आचरण के मूल्यों को पुनःपरिभाषित करना और नये समतामूलक, परस्परता के सम्मानगर्भित मूल्योँ को उन्मेष देना और स्त्री को केवल शरीर और शरीर को केवल कामवस्तु, कब्जे और दखल का सामान समझने वाले मूल्यों का विरोध करना है। मूल्य की संभावना मात्र को नष्ट कर देना नहीं, जैसा कि प्रायः समझ लिया जाता रहा है। स्त्री अपने अब तक के ‘अस्मि’ को, अपने ‘व्यक्ति’ को इस रूप मेँ पहचान चुकी है कि इस वस्तुगत यथार्थ – शरीर
के अलावा हर वह चीज़ बदली जा सकती है जिसे बदलने की ज़रूरत है और जो अन्यायमूलक हैं। अपनी योग्यताएँ, अपनी भूमिकाएँ, सम्बन्धों के समीकरण, मूल्यविधान – सबकुछ। इस सन्दर्भ मेँ पुरुष उसके लिये ‘अन्य’ हो जाता है और परस्पर अन्यता (‘अदरनेस’) का यह सम्बन्ध एक दूसरे की पूरकता की बजाय शत्रुता मेँ बदलने लगता है।
इसी घमासान के बीच पुरुषसत्तात्मक समाज मेँ स्त्रीसत्ता के प्रश्‍न ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के पुराने समीकरण ध्वस्त करके घर नामकी उस पुरानी शरण की सूरत भी बदल दी है। निस्संदेह नये समीकरण भी उभर रहे हैं। परस्परता के नये आश्‍वासन और सहयोग की नयी संरचनाएँ भी बन रही हैँ, नये रिश्‍ते जन्म ले रहे हैँ।लेकिन लेकिन केवल सीमित संसारों के छोटे छोटे कोनों मेँ ही। हमारा समाज मूलतः एक परिवारोन्मुख समाज है। परिवार की मर्यादाएँ और प्रतिबन्ध होते हैँ, घुटन और सीमाएँ भी होती हैँ, लेकिन अपनी शरण और सुरक्षा भी होती है, लेकिन स्त्री
के सन्दर्भ मेँ कई बार सुरक्षा एक भ्रम भी हुआ करती है।
बृहत्तर व्यापकतर परिवेश मेँ स्त्री के
लिये भय के बादल और आशंका की
गड़गड़ाहट है। असुरक्षा का आतंक है – घर
से लेकर सड़क तक हर जगह – दैहिक शोषण, विनय-भंग, बलात्कार, वैवाहिक बलात्कार, हत्या, आत्महत्या, एसिड अटैक। उसने फ़ैसला किया है न डरने का, वह बात अलग है। लेकिन एक सभ्य समाज के लिये यह असुरक्षा न केवल कानून और
व्यवस्था के रूप मेँ चिन्ता का
विषय बल्कि शर्मिन्दगी की वजह और कलंक का पर्याय है। बहुत सारे सिरे सुलझाने की, गुत्थियाँ खोलने की और एक संवाद कायम करने की अविलम्ब ज़रूरत है।
इन सच्चाइयों का नतीजा
क्या यह निकाल कर चुप बैठा जा सकता है कि सारी सरकारी, गैर-सरकारी और
व्यक्तिगत कोशिशों के बावजूद स्त्री-सत्ता मात्र
विभ्रम है? मैँ शायद खासी बेमरम्मत किस्म की आशावादी हूँ। उस चरम आशावाद और घनघोर निराशा के कर्म मेँ कोई ख़ास फ़र्क नहीं रह जाता। घनघोर निराशा का नतीजा भी यही होता हे कि इससे बुरा अब और क्या होगा तो जो करना है, क्यों न एक बार करके देख ही लिया जाय। मैँ मानती हूँ और मानते रहना चाहती हूँ कि विभ्रम यथार्थ का विलोम नहीं बल्कि भावी यथार्थ का पर्याय है। यथार्थ कोई ऐसी पूर्ण परिसमाप्त परियोजना नहीं है जो जैसी बन चुकी वैसी सदा सदा के लिये बन चुकी। यथार्थ एक प्रक्रिया है जिसे हम अपने आचरण से कार्यान्वित करके यथार्थ मेँ बदलते हैँ। जब तक वह यथार्थ हो नहीँ जाती तब तक ही वह विभ्रम है। आचरण और कार्यान्विति को जारी रखने का संकल्प और श्रम उसे यथार्थ बना देगा।
(अर्चना वर्मा
प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं. यह आलेख उन्होंने स्त्रीकाल , गुलबर्गा वि वि और भारतीय भाषा संस्थान के द्वारा आयोजित सेमिनार में बीज वकत्व्य के रूप में पढा था .संपर्क : जे-901, हाई-बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डेन, अहिंसा खण्ड-2, इन्दिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014, इनसे 09871282073 पर भी संपर्क किया जा सकता है . )

हिन्दू पराक्रम का कैसे हो प्रतिकार

 
( भगाणा में दलित लडकियों पर बलात्कार के पीछे की हिन्दू और द्विज मानसिकता  और उसके प्रतिकार की पडताल में एच एल दुसाध का यह आलेख मह्त्वपूर्ण है. एच एल दुसाध हिन्दुस्तान में डायवर्सिटी के प्रवक्ता और संस्थापक विचारक हैं. )  
 
वैसे तो दलित-उत्पीड़न राष्ट्र के जीवन के दैनंदिन जीवन का अंग बन चुका
है.फिर भी रह-रहकर

एच एल दुसाध

ऐसी कुछ घटनाएँ हो जाती हैं कि इस समस्या पर नए सिरे से विचार
करना लाजिमी हो जाता है.हाल के दिनों में अल्प अन्तराल के मध्य दो ऐसी घटनाएँ
सामने आईं हैं.पहली घटना हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गाँव की है जहाँ 2012 में जाटों  द्वारा वहां के तमाम दलित परिवारों का बहिष्कार
कर दिया गया था जो अब भी जारी है.बहिष्कार के विरोध में सौ के करीब अपेक्षाकृत
चमार,खाती इत्यादि जैसी मजबूत दलित जातियों के लोग अपने परिवार और जानवरों सहित
हिसार के मिनी सचिवालय में खुले छत के नीचे आश्रय ले लिए और आज भी वहीँ रह रहे हैं
.किन्तु धानुक जैसी कमजोर दलित जाति के लोगों ने गाँव में ही टिके रहने का निर्णय
लिया.इन्ही धानुक जातियों  की चार लड़कियों
को भगाणा के दबंगों ने 23 मार्च को अगवा कर
दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया.आठवीं और नौवीं क्लास में पढनेवाली इन लड़कियों
का सिर्फ इतना था कि वे पढना चाहती थीं और उनके अभिभावकों ने उन्हें इसकी इजाजत दे
रखी थी.वहां की दलित महिलाओं को अपने हरम में शामिल मानने  की मानसिकता से पुष्ट जाटों को यह मंजूर नहीं
था.लिहाज़ा उन्होंने इन लड़कियों को सजा देकर दलितों को उनकी औकात बता दी.

   इस ह्रदय विदारक घटना के बाद जब किसी
तरह लडकियां उनके परिवार वालों को मिली ,वे उनकी मेडिकल जांच  के लिए जिला अस्पताल पहुंचे जहाँ डाक्टरों ने जांच
में अनावश्यक बिलम्ब कर घोर असंवेदनशीलता का परिचय दिया.उधर पुलिस वालों ने नाम के
वास्ते एफ़आईआर  तो दर्ज कर ली किन्तु
दोषियों का नाम दर्ज नहीं किया.स्थानीय प्रशासन से हताश निराश पीड़ित परिवार दो
सप्ताह पहले दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर पर
बैठकर इंसाफ की गुहार लगाने लगा.इनकी मांग है कि छुट्टा घूम रहे
बलात्कारियों की  अबिलम्ब गिरफ्तारी
हो;फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर छः महीने के अन्दर मामले की सुनवाई हो तथा बलात्कार
पीड़ितों एवं गाँव के समस्त बहिष्कृत परिवारों को गुडगाँव या फरीदाबाद में चार-चार
सौ गज का आवासीय भूखंड और एक-एक करोड़ रूपये मुआवजे के तौर पर दिए जांय.इसके साथ ही
उनकी उनकी मांग है कि पीड़ित लड़कियों के लिए शिक्षा की बेहतर व्यवस्था हो तथा
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी दी जाय.
     देखते ही देखते भगाणा बलात्कार कांड के पीड़ितों इंसाफ दिलाने की मुहिम में दिल्ली के
ढेरों छात्र-शिक्षक,लेखक-एक्टिविस्ट जुड़ गए.किन्तु मीडिया की उदासीनता के कारण उसका
असर 2012 के 16 दिसंबर
को घटित निर्भया कांड जैसा नहीं हुआ.तब निर्भया को इन्साफ दिलानेवालों के सुर में
सुर मिलाते हुए मीडिया ने घटना को इतना हाईलाईट किया कि रायसीना हिल्स से लेकर
राजघाट,कोलकाता से कोयम्बटूर,कश्मीर से चेन्नई तक के लोग उस मुहिम  में शामिल हो गए.उसके फलस्वरूप महिलाओं के
खिलाफ यौन अपराध की रोकथाम के लिए जहाँ कानून में कई संशोधन हुए बही ‘निर्भया’ के नाम
पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बजट में हजार करोड़ का प्रावधान भी हुआ.किन्तु मीडिया
को भगाणा की घटना पर ज्यादा जोर इसलिए देना चाहिए था क्योंकि यह ‘निर्भया कांड’ से
ज्यादा गुरुतर मामला है.निर्भया काण्ड के पीछे जहां मुख्य रूप से ‘यौन –कुंठा’ की
क्रियाशीलता रही,वहीँ  भगाणा कांड के पीछे
यौन कुंठा के साथ एक उभरते समाज के मनोबल को तोड़ने तथा अपने  प्रभुत्व को नए सिरे से स्थापित करने का मनोवैज्ञानिक
सुख लूटने का सुचिंतित प्लान था.ऐसी ही घटनाओं के कारण 21वीं सदी में भी अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि
बर्बर व असभ्य राष्ट्र के रूप में पुख्ता  होती है.
   राष्ट्रीय राजधानी के
छात्र-शिक्षक,बुद्धिजीवी इत्यादि भगाणा पीड़ितों को न्याय दिलाने की चिंता में
व्यस्त थे कि दिल्ली बॉर्डर पर नोएडा के कनावनी गाँव में
29 अप्रैल को एक और बड़ी बारदात हो गयी.वहां दबंगों
ने दलितों की बस्ती में जमकर उत्पात मचाया और उनके घरों को तहस-नहस कर दिया.साथ ही
गाँव के स्कूल और ऑफिसों को भी जेसीबी  से
ढहा दिया.इतना ही नहीं दबंगों ने कई राउंड फायरिंग भी किया जिसमें  एक युवक की मौत हो गयी.छावनी में तब्दील उस गाँव
में पुलिस की उपस्थिति के बावजूद दलित प्राण-भय से   पलायन कर
गए हैं.
 
 
 
     बहरहाल जब-जब भगाणा या कनावनी जैसे
कांड होते हैं तो दलितों के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम व मानवाताबोध संपन्न हिन्दुओं के
खेमे में भी चिंता की लहर दौड़ जाती है.वे सभा संगोष्ठियाँ आयोजित एवं घटनास्थल का
मुयायना कर असहिष्णु हिन्दुओं के बर्बरोचित कार्य की निंदा करने एवं उनके विवेक को
झकझोरने का अभियान चलाते हैं.लेकिन नतीजा शिफर निकलता है.एक अन्तराल के बाद परवर्तित
स्थान पर उनकी दलित-विरोधी भावना का पुनः प्रकटीकरण हो ही जाता है.हिन्दू विवेक को
झकझोरने का अभियान इसलिए निष्प्रभावी होते रहता है क्योंकि दलितों की मानवीय सत्ता
हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अस्वीकृत है.इसलिये शास्त्रों द्वारा मानवेतर रूप
में चिन्हित किया गया मानव समुदाय जब आम लोगों की भांति अपने मानवीय अधिकारों के प्रदर्शन
की हिमाकत करता है,धर्मनिष्ठ हिन्दू उन्हें उनकी औकात बताने के लिए कुम्हेर,चकवाडा
,एकलेरा ,नवलपुर,पिन्ट्री  देशमुख,सीखरा ,बेलछी,पिपरा,भगाणा,कनावनी
जैसे कांड अंजाम दे देते हैं.दलित-उत्पीडन में हिन्दू धर्म की क्रियाशीलता को देखते
हुए डॉ.आंबेडकर को कहना पड़ा था-‘हिन्दू जातिभेद इसलिए नहीं मानते कि वस्तुतः वे
क्रूर हैं या उनके मस्तिष्क में कुछ विकार है.वे जाति-भेद इसलिए मानते हैं कि उनका
धर्म जो प्राणों से भी प्यारा है ,उन्हें जाति-भेद मानने के लिए विवश करता है.अतः
कसूर उन धर्मशास्त्रों का है ,जिन्होंने उनकी ऐसी
मनोवृति कर दी है.’लेकिन हिन्दुओं के शास्त्र ही जब दलित उत्पीड़न  के लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार तब तो यह क्रम
अनंतकाल तक चलता रहेगा ,क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि हिन्दू
आगामी कुछ सौ वर्षो में अपने धर्म-शास्त्रों के प्रति पूरी तरह अनास्थाशील हो
जाएँगे.ऐसे में दलित-उत्पीड़न का प्रतिकार कैसे हो?
    जहां तक प्रतिकार का प्रश्न है
,डॉ.आंबेडकर ने वर्षों पहले उसका मार्गदर्शन कर दिया था.उन्होंने बताया था-‘ये
अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न
हैं.एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है,बल्कि एक वर्ग
द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म,शोषण तथा उत्पीडन
का प्रश्न है’.किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है,उसका एकमेव
उपाय उन्होंने दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करना बताया
था.वास्तव में डॉ.आंबेडकर ने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो
नुस्खा बाताया था वह सार्वदेशिक है.सारी दुनिया में ही जो अशक्त रहे उनपर ही सशक्त
वर्ग का अत्याचार व उत्पीड़न  होता
रहा.सर्वत्र ही ऐसे लोगों को सशक्त बनाकर सबल वर्गों के शोषण-उत्पीड़न से निजात
दिलाई गयी.अतः दलितों को भी हिन्दुओं के बर्बर अत्याचार से निजात दिलाने के लिए उनकी
सशक्तीकरण पर जोर देना होगा.अब जहाँ तक दलितों के सशक्तिकरण का सवाल है आजाद भारत में
तमाम सरकारें ही इस काम में लगे रहने का दावा करती रही हैं.पर बात इसलिए नहीं बनी
की देश के योजनाकारों ने दलित अशक्तिकरण की पहचान का बुनियादी काम ही नहीं किया.
     सारी
दुनिया में ही सभ्यता के हर काल में
धरती की छाती पर अशक्त समुदायों का वजूद
रहा और ऐसा इसलिए हुआ कि जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने
जाति,नस्ल,धर्म इत्यादि के आधार बंटे विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के
मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- का असमान बंटवारा कराकर ही
अशक्त समूहों को जन्म दिया.परिष्कृत भाषा में शक्ति के स्रोतों में सामाजिक  और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन कराकर
ही अशक्त सामाजिक समूहों को जन्म  दिया.जो
समूह शक्ति के स्रोतों पर जितना कब्ज़ा जमा सका वह उतना ही सशक्त और जो जितना ही
इससे वंचित रहा वह उतना ही अशक्त.सारी दुनिया में अश्वेतों ,महिलाओं व अन्य अल्पसंख्यक
अशक्त समूहों की समस्या
पर ध्यान दे तो पाएंगे कि उनको शक्ति के स्रोतों से
दूर रखकर ही अशक्त बनाया गया.सारी दुनिया की पराधीन कौमों के साथ यही समस्या रही
कि विजेताओं ने उन्हें शक्ति स्रोतों से वंचित कर उन्हें कष्ट में डाला.यदि सारी
दुनिया के विजेता गुलाम बनाए गए  लोगों को
शक्ति के स्रोतों में वाजिब शेयर दिए होते, दुनिया में कही भी स्वतंत्रता संग्राम
ही सगठित नहीं होता.अमेरिका का स्वाधीनता संग्राम,फ़्रांस की राज
क्रांति;गांधी,मार्टिन लूथर किंग(जू.)मंडेला का संघर्ष और कुछ शक्ति के स्रोतों के
असमान बंटवारे के विरुद्ध रहा.शक्ति के स्रोतों में सभी तबकों को न्यायोचित
हिस्सेदारी दिलाने के लिए ही ब्रितानी अवाम  ने 500 सालों
के सुदीर्घ संग्राम के बाद संसदीय प्रणाली की ईमारत खड़ी की.सदियों से सार्री
दुनिया में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों में अशक्त
लोगों को हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई मात्र है.
     जिन मानव समुदायों को शक्ति के
स्रोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति
दलितों जैसी नहीं रही.मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी कौम को शक्ति के
तीनों प्रमुख स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक-से पूरी तरह वंचित नहीं किया
गया.मार्क्स के सर्वहाराओं सहित दुनिया के अधिकांश वंचित  कौमों को आर्थिक गतिविधियों से वंचित कर अशक्त
बनाया गया पर राजनीतिक और विशेषकर धार्मिक क्रियाकलाप तो उनके लिए पूरी तरह मुक्त
रहे.अमेरिका के नीग्रो स्लेवरी में जिन कालों का दलितों की भांति ही पशुवत
इस्तेमाल हुआ,उनके लिए पूजा-पाठ अब्राहम लिंकन के उदय पूर्व भी कभी निषिद्ध नहीं
रहा.यही कारण है जिस मार्टिन लूथर किंग (जू.)के मूवमेंट ने अश्वेतों की तकदीर बदल
दी वे बड़े धर्माधिकारी थे जिससे उनकी आवाज़ बड़ी आसानी से लोगों तक पहुँच गयी.आर्थिक
और राजनीति के क्षेत्र से हजारों साल से बहिष्कृत भारत के दलितों के लिए मार्टिन
लिथर की भांति धर्माधिकारी बनना तो दूर देवालयों में पहुँच कर सर्वशक्तिमान ईश्वर
के सामने अपने कष्टों के निवारण के लिए प्रार्थना करने तक का कोई अवसर नहीं
रहा.धार्मिक शक्ति के केंद्र से दलितों का बहिष्कार ही उन्हें अस्पृश्यता की खाई
में धकेलने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार है.हिन्दुओं ने देख लिया कि जब दलित
परमपिता परमेश्वर के घर से ही बहिष्कृत हैं तो हम उन्हें अपने करीब क्यों आने दें.
                मध्ययुग संतों और भारतीय रेनेसां के असंख्य महानायकों सहित ढेरों अन्य आधुनिक
चिंतकों ने दलितों की समस्या पर मगजपच्ची की पर आंबेडकर की भांति कोई भी उनके
अशक्तिकरण के कारणों को सम्पूर्णता में नहीं समझ पाया.इसलिए वे मानवेतरों को शक्ति
के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई नहीं लड़ सके.गुलाम भारत में
जहां तमाम स्वतंत्रता संग्रामी अंग्रेजों के कब्जे में पड़ी आर्थिक और राजनीतिक
शक्ति हिन्दुओं के लिए छीनने में व्यस्त थे वहीँ आंबेडकर बड़ी मुश्किल हालात में
मानव जाति के सबसे अशक्त समूहों को शक्ति से लैस करने व्यस्त थे.उनके प्रयासों से  सदियों से बंद पड़े शक्ति के कुछ स्रोत दलितों के
लिए मुक्त हुए,पर सारे नहीं.स्मरण रहे डॉ.आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के सबसे
असहयाय स्टेट्समैन रहे.यदि वे असहाय नहीं होते,शक्ति के सभी स्रोतों में दलितों की
हिस्सेदारी सुनिश्चित कर देते.लेकिन आजाद भारत में उनके बड़े से बड़े अनुसरणकारी
क्या दलितों की समस्या समझ पाए?मुझे लगता है नहीं.यदि वे दलितों की समस्या समझे
होते तो शक्ति के शेष स्रोतों में उनको हिस्सेदारी दिलाने का प्रयास करते.पर आजाद
भारत में तो शक्ति के सभी स्रोतों की बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में हिस्सेदारी की लड़ाई
लड़ी जा रही है.कोई निजी क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहा है तो प्रमोशन में
आरक्षण की लड़ाई में अपनी उर्जा खपा रहा है.यही कारण है दलित शक्ति के स्रोतों में
मुक्कमल हिस्सेदारी से वंचित हैं.परिणामस्वरूप वे भगाणा और कनावनी में हिन्दू
पराक्रम के सामने असहाय व लाचार नजर आ रहे हैं.बहरहाल  दलित ही नहीं पिछड़े,अल्पसंख्यक और महिलाओं  के शक्ति समस्त स्रोतों में वाजिब शेयर दिलाने
के लिए डाइवर्सिटी से बेहतर कोई विचार तो शायद भारत भूमि पर आया नहीं.किन्तु अफ़सोस
के साथ कहना पड़ता है कि डाइवर्सिटी जैसे अचूक हथियार का इस्तेमाल करने में दलित
समाज  अभी भी खुलकर सामने नहीं आ रहा
है.

प्रसंग : मोदी और दलित

तुलसीराम

( जब द्विज समूह मोदी की
सत्ता की आगवानी के लिए पलक –पावडे बिछाये हुए है , तब मोदी को अति पिछडा और चाय
वाला गरीब बताने के बावजूद दलितों –पिछडों के बीच संदेह के पर्याप्त

तुलसीराम

कारण हैं,
गुजरात के डिटेल में न भी जाया जाय तो . यही संदेह है कि जैसे –जैसे चुनाव खत्म हो
रहे हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश में मोदी और भाजपा का दम फूल रहा है. इस बीच
तुलसीराम जी का जनसत्ता में छपा यह आलेख मोदी और संघ परिवार के दलित विरोधी अभियानों
की गहन पडताल करता है. स्त्रीकाल के पाठकों के लिए जनसत्ता से साभार )

 सैमुअल
हंटिगटन अपनी पुस्तक
‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू
में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो
दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी
दर्शन पर सन 1925
की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल
करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही
देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में
सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।
मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ
रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है।
इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ
आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व
हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू
करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके
चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर
देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक
पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां
दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।
गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह
संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक
स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका
जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध
धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे
इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित
युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर
हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई
महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।
गुजरात में दलित
इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला
न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना
नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे
गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई
थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।
मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की
शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य
विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार
विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के
फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में
पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस
ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर
मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।
सन 2000 में नई
शताब्दी
के आगमन के स्वागत में गुजरात
के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के
बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के
कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में
गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला
दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान
क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने
विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने
के लिए दे दिया।
नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं
पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक
सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत
जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद
से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ
दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि
इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस
कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के
लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता
है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए
नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते
ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे
गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने
दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही
संतुष्टि मिलती है।
तना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया
तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात
बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि
राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें
राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन
एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ
मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।
इस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है।
मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े
लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन
एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद
गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को
इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे
मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग
से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है।
ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।
गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां
वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का
विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है।
गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ
तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही
अपने बयान में कहा- ‘भारत की
वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस हमारे
धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश
गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी
मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित
छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक
दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की
प्रयोगशाला कहा जा रहा है।
मोदी सेवा को दलित धर्म बताते हैं
उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को
आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत
में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार
पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे
डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो
डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके।
संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा
है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस
संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी
की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी
के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।
इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण
की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप
मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान
अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी
दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ
परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए
आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित
विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।
इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए।
अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा
चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का
दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित
पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत
करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना
खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर
बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी
भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों
के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा
के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन
लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया
और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और
राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।
मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं,
लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर
दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में
मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की
मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर
दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई
भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी
दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी
सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित
हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी
दलितों के हित में नहीं है।
मोदी के खिलाफ दलित जनमत
अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज
(उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में
भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये
तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध
बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए
उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब
बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के
खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने
दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के
दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन
में आ गए।
उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ
आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के
प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री
बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई
समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं।
हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन
सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।
गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल
में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी
का प्रचार कर रहे हैं।
इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर
दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे
वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह
जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान
चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन
नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

मनुवादी न्याय का शीर्ष तंत्र

( भगाणा की दलित लड्कियों के साथ बलात्कार के खिलाफ साथियों ने आन्दोलन छेड ही रखा था कि ‘योगगुरु’ रामदेव ने दलित स्त्रियों के लिए अपमान जनक प्रलाप

अरविन्द जैन 

किये . ऐसी प्रवृत्तियों के खिलाफ तंत्र जहां नाकाम है, वहीं समाज के ब्राहमणवादी और पितृसत्ताक चरित्र से संचालित भी होता है. कानूनों के  स्त्रीवादी व्याख्याकार वरीष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन ने सरवोच्च नयायालय द्वारा अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार अधिनियम की दलित स्त्रियों के खिलाफ व्याख्या और किये गये प्रावधानों की तीखी आलोचना की थी . यह आलोचना आज फिर से प्रासंगिक है. मुकेश मानस जी ने इसका हिन्दी अनुवाद उपलब्ध कराया, इसे उन्होंने पहले भी ‘मगहर’ में प्रकाशित किया है. अरविन्द जैन से उनके मोबाइल न 9810201120 पर संपर्क किया जा सकता है ) 

आज के संसदीय लोकतंत्र पर मुट्ठी
भर लोगों ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने संसद में क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं
की भागीदारी को लगभग समाप्त कर दिया है। आज का संसदीय लोकतंत्र सामाजिक द्वन्द्वों
और अन्तरविरोधों से ग्रस्त है। अगर इन सामाजिक द्वन्द्वों और अन्तरविरोधों को सही
समय पर सुलझाया नहीं गया तब शोषितों के पास इसके आधार को ध्वस्त करने के अलावा कोई
विकल्प नहीं रह जाएगा। प्रशासन के असंवेदनशील रवैये कानून के सही ढंग से लागू न होने तथा अपराधी
एवं कुछ नौकरशाहों के मजबूत नापाक गठजोड़ के कारण दलितों का उत्पीड़न यौन शोषण और उनके खिलाफ भेद-भाव बढ़ता जा रहा
है। न्याय व्यवस्था में भी दलित विरोधी उच्च जातिवादी मानसिकता के कारण न्याय न के
बराबर मिल पाता है।
बेलछी से गोहाना तक  भारत में हर 18 मिनट में किसी न किसी दलित पर
जुर्म ढाया जाता है। प्रतिदिन औसतन 11 दलितों को पीटा जाता है.  3 दलित
महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है . हर
सप्ताह 13 दलितों की हत्या होती है और  6 का अपहरण एवं 5 के घर जलाये जाते हैं। नेशनल
क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2009 के दौरान 80489 दलितों
पर किए गए अत्याचार/अपराध के मामले दर्ज़ हुए। इनमें दो हजार मामले हत्या के एवं 7500 मामले बलात्कार से संबंधित दर्ज़ किये गये।
केवल 2008 में ही 30913 मामले
दर्ज़ किये गये हैं।
दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर
नंगा घुमाया जाता है
उन्हें दिन-दहाड़े असहाय चश्मदीद के सामने मार दिया
जाता है और ताज्जुब की बात है कि यह आजादी के छः दशक बाद भी हो रहा है। आंख
निकालना, जिंदा जला देना, हाथ पैर काट डालना, महिलाओं के साथ बलात्कार करना, गांव बर्वाद कर देना (बेलछी, सुन्दूर,गोहाना) और उन्हें आतंकित करना
ताकि वे यह सब चुपचाप सहते रहें तथा इस दुराग्रह पूर्ण घृणा का प्रतिरोध नहीं कर
पाएं। सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता प्राप्त व्यक्ति भी
इस छूआछूत रूपी कैंसर के शिकार हैं।
दलितों का दमन, उत्पीड़न एवं अवमानना हमारे देश के इतिहास का एक
शर्मनाक अध्याय है। उत्तर भारत में अनुसूचित जाति के लड़के/लड़कियां अगर
गैर-अनुसूचित जातियों के लड़के/लड़कियों से प्यार करते हैं या शादी करना चाहते हैं
तो ज्यादातर मामलों में दोनों को परिवार के सदस्यों के द्वारा मार दिया जाता है।
जिसे वे गर्व से ‘ऑनरकिलिंग’ कहते हैं इन अमानवीय क्रूर
हत्याओं में भला क्या शान हो सकती है. 
कुख्यात लक्ष्मणपुर बाथे
जनसंहार
(दिसंबर 1997 में 58 दलितों को रणवीर सेना के
द्वारा उसी गांव में मार दिया गया एवं तीन मल्लाहों को सोन नदी के दक्षिणी छोर पर
गला रेतकर मार दिया गया। इस तरह से इस जनसंहार में कुल 61 लोगों की जान ली गई। सदियों से इस तरह के
उत्पीड़न को अंजाम दिया जा रहा है।
धार्मिक मिथक एवं मिथक
शास्त्र की गहरी जड़ें

पुलिस मामले को दर्ज़ नहीं
करती।
अगर दर्ज़ करती भी है तो उदासीनता के साथ। गरीब-पीड़ितों को धमकाया जाता है।
अपराधी माफिया को संरक्षण दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अनुसूचित जाति एवं
जनजाति (उत्पीड़न निरोधक) एक्ट, 1989 केवल कागज़ी शेर है। दलितों पर
अत्याचार राष्ट्रीय रिकार्ड एवं इतिहास की वस्तु बन चुका है। उनके उत्पीड़न की
मजबूत जड़ धार्मिक मिथकों एवं मिथकशास्त्र में निहित है।
हिन्दुओं के बीच जाति व्यवस्था
चातुर्वर्ण्य
के रूप में सीढ़ीनुमा असमानता पर आधारित है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं
जनजाति (शूद्रों) को सामाजिक स्तर के सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। श्रेणीबद्ध
असमानता हिन्दू धर्म के विभिन्न तबकों को एक-दूसरे से अलग रखने की अक्षुण्ण दीवार
है। दलितों को दास की तरह समाज की सेवा करने के लिए निकृष्ट काम दिये गए। दलितों
को पानी, शिक्षा,  संस्कृति, जीवन एवं आर्थिक उद्यम से वंचित रखा गया है।
मनुस्मृति में दलितों को अच्छे कपड़े, गहने,  खाने आदि से निषेधित किया।
डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में जाति व्यवस्था एक क्रूर यंत्र है , जिसके द्वारा मानवता को दमित एवं दास बनाया गया। इसका सही नाम ‘कुख्यात’ होना चाहिए।  अस्पृश्यता एक ऐसी अमानवीय घटना है ,जो विश्व के अन्य
हिस्सों में नहीं मिलती। इस तरह की घटना दूसरे समाज के प्रारंभिक  प्राचीन
एवं आधुनिक समाज में देखने को नहीं  मिलती
है। अस्पृश्यता की समस्या साधन-सम्पन्न एवं
साधन-विहीन जातियों के बीच का संघर्ष है। एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के साथ
अमानवीय अन्याय किया जाता है। संघर्ष की शुरुआत समानता एवं समान व्यवहार की मांग
से होती है जो उच्च जातीय हिन्दुओं को नागवार है और यही कारण है कि वे गुस्से में
आकर दलितों का अपमान एवं मान-मर्दन करने लगते हैं। ग्रामीण भारत में दलितों को
भयानक से भयानक भेदभाव, निषेघ, प्रतिबंद्ध, दुराग्रह झेलना पड़ता है।
अस्पृश्यता का खत्मा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को खत्म कर दिया गया है तथा इसका किसी भी रूप
में प्रचलन प्रतिबंधित कर दिया गया है। अस्पृश्यता (अपराध) एक्ट, 1955 में लागू किया गया जिसका 1976 में नाम बदलकर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट एक्ट कर दिया गया। संसद ने बाद में अनुसूचित
जाति/जनजाति (अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 पारित
किया। कानूनन खात्मे के बावजूद अस्पृश्यता आज भी धड़ल्ले से प्रयोग में है। इस एक्ट
के तहत 80 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में अपराधी को
इच्छाशक्ति एवं एक खास नजरिया न होने के अभाव में छोड़ दिया जाता है। इस समस्या का
समाधान कभी-कभी केवल दण्ड विधिशास्त्रा से नहीं किया जा सकता। समाजशास्त्राीय
दृष्टिकोण एवं संवैधानिक प्रतिबद्धता से इसका पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है।
अनुसूचित जाति एवं जनजाति
(अत्याचार निरोधक) एक्ट 1989 को इसलिए लागू किया गया ताकि
अनुसूचित जाति एवं जनजाति पर हो रहे उत्पीड़न को रोका जा सके। इस एक्ट की धारा दो
में उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है। ताकि
धारा तीन के तहत इसे दंडनीय अपराध माना जाय। इसके विवरण इस प्रकार हैं:
 उत्पीड़न के अपराध के लिए सजा : अनुसूचित जाति और जनजाति न रहने पर अगर इस अपराध को करता है तो भारतीय दंड संहिता
के तहत 10 साल की जेल हो सकती है। अनुसूचित जाति एवं
जनजाति या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर उन्हें आजीवन करावास की सजा
जुर्माने के साथ दी जायेगी।
जंतर मंतर पर धरने पर बैठी भगाणा  की पीडित दलित लडकियां 
दलित महिलाओं का बलात्कार
क्यों

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार
जो भी
अनुसूचित जाति/जनजाति का नहीं है और किसी व्यक्ति या संपत्ति के विरुद्ध
अपराध करता है तो उसे (भारतीय दंड विधान के तहत 10 साल या अधिक की सजा) लेकिन
पीड़ित को साबित करना होगा कि यह अपराध उसके अनुसूचित जाति/ जनजाति का होने
के कारण किया गया। केवल पीड़ित (लड़की) का अनुसूचित जाति/ जनजाति के सदस्य होने भर
से यह उत्पीड़न का मामला नहीं बनता।
सभी लोग जानते हैं कि अगर
पीड़िता
अनुसूचित जाति से संबंधित न होती तो इस तरह का अपराध करने की जुर्रत भी कोई
नहीं कर सकता है। आजादी के 60 साल के बाद भी खासकर भारतीय गांवों में लोगों
की पहचान उनकी जाति एवं धर्म यहां तक की शहरों में भी एक खास तरह की वेशभूषा एवं
सामाजिक धार्मिक प्रतीकों से उसके धर्म एवं जाति का पता चलता है। अगर दोषी अपराध
करने से पहले उसकी जाति जानता है तो कानून एवं अदालत इसका अनुसूचित जाति एवं
जनजाति एक्ट के तहत संज्ञान लेती है।
कानून टूटा-फूटा और जटिल है

मानवीय सर्वोच्च न्यायालय ने
धारा
3 (2)(अ) एक्ट के तहत यह बताया है कि अनुसूचित जाति
एवं जनजाति होने के कारण अगर इस अपराध को अंजाम दिया जायेगा तब ही यह अस्पृश्यता
विरोधी कानून के अंतर्गत आयेगा। अगर पीड़िता यह साबित नहीं कर पाती कि किसी खास
जाति के होने के कारण उसपर अपराध हुआ है तो 3 (2)(अ) के
तहत कोई भी कार्यवाही नहीं की जा सकती (दिनेश उर्फ बुद्धा बनाम राजस्थान सरकार) (2006 )
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक
बार फिर
से यह बताया है कि अनुसूचित जाति की लड़की के साथ बलात्कार किया गया लेकिन
अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 की
धारा 3 (2)(अ) के तहत यह साबित नहीं किया जा सकता कि उस
पीड़िता के साथ बालात्कार इसलिए हुआ कि वह एक खास जाति से है। केवल अनुसूचित जाति
की होने से इस कानून का प्रावधान इस मामले में लागू नहीं हो सकता। पीड़िता पारधी
समुदाय से है लेकिन उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है कि उपरोक्त कानून के तरह अपने पर
हुए जुर्म को साबित कर सके। उच्च न्यायालय के पास भी कोई साक्ष्य नहीं है जिसके
तहत यह बताया जा सके कि वह एक खास जाति से थी इसलिए उसपर यह अपराध किया गया। अतः
अनुसूचित जाति/जनजाति (अपराध निरोधक) एक्ट, 1989 को
संज्ञान में नहीं लिया जा सकता एवं याचिकाकर्त्ता के मामले में धारा 3 (2)(अ) को खारिज किया जाता है। (रामदास एवं अन्य
बनाम महाराष्ट्र सरकार) . 
पैमाने पर एक नजर

16 वर्षीय युवती के बलात्कार के मामले में जहां
प्रिंसिपल सेशन जज ने आरोपी को आई. पी. सी. धारा 3 (2 अ) अट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज़ किया एवं उसे आजीवन कारावास तथा 10 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। साथ-ही साथ 6 माह का सश्रम कारावास भी मिला। लेकिन माननीय
न्यायमूर्ति सी. नागप्पा और न्यायमूर्त्ति चित्रा वेंकटरमण ने इसे खारिज कर दिया
और बताया कि केवल अनुसूचित जाति की लड़की होने से धारा 3 (2)(अ) 
लागू नहीं किया जा सकता और कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित किया जा
सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म किया गया है। अतः धारा 3(2) (अ) लागू नहीं किया जा सकता और कोई सक्ष्य नहीं
है जिससे यह साबित किया जा सकता है कि किसी खास जाति की होने के कारण ही यह जुर्म
किया गया है। अतः धारा 3
(2)(अ) अनुसूचित जाति एवं जनजाति
अत्याचार निरोधक कानून को खारिज किया जाता है। (एस. बाला रमण बनाम राज्य )
ज्ञानी न्यायमूर्ति ने न केवल
आरोप को एवं उसकी धारा अट्रोसिटी एक्ट को खारिज किया बल्कि सजा को घटा कर सात साल
सश्रम करावास एवं 10 हजार रुपये जुर्माना तय किया। (उपरोक्त वर्णित
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर)।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले
कोई अंधी गली नहीं है।

सी. टी. स्वीनरन सुपुत्र दामोदरण नायर बनाम केरल सरकार (2009)  का
मामला जिसमें 20.1.2005  को रात 12 : 30 बजे आरोपी ने कोझीकोड कारपोरेशन में म. न. वी/
1985 के दरवाजे को तोड़कर मृतक पी. के साथ  बलात्कार किया। आरोपी हिन्दू नायर समुदाय से
है। मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल में पी. एक सहायक नर्स थी जिसकी दो बेटियां थीं। छोटी
बेटी आर. का अन्तरजातीय विवाह आरोपी के ही भाई वेणुगोपाल से था। कोझीकोड के सेशन
जज ने दलित अत्याचार निरोधक एक्ट के तहत दो साल की सश्रम कारावास और सेक्शन 457 आई. पी. सी. के तहत एक हजार रुपये का जुर्माना
किया। धारा 376 आई. पी. सी. के तहत आरोपी को दस साल की सश्रम
कारावास और 5 हजार रुपये का जुर्माना किया गया। (दलित  अत्याचार निरोधक एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत आरोपी को आजीवन कारावास एवं 10 हजार रुपये की सजा दी गई।मूर्धन्य लोक अभियोजक श्री एस.
यू. नाजार ने माना कि भारतीय दंड विधान के तहत साक्ष्य के मद्दे नजर यह नहीं साबित
किया जा सकता कि यह अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। आगे
यह बताया गया कि आरोपी ने कोई ऐसा जुर्म नहीं किया है जिसे धारा 3(2)(अ) अट्रोसिटी  एक्ट 1989 के तहत सजा दी जाय।
रामदास बनाम महाराष्ट्र सरकार ( 2007)  केरल
उच्च न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर माननीय न्यायमूर्त्ति पायस सी. कुरियाकोज
एवं न्यायमूर्ति पी. एस. गोपीनाथन ने एस. सी/ एस. टी. एक्ट 1989 की धारा 3.2 ) अ) को
खारिज करते हुए केवल आई. पी. सी. की धारा 457, 376 को
साबित किया। ज्ञात हो कि इस मामले में पीड़िता की छोटी बेटी से आरोपी जो की हिन्दू
नायर समुदाय से है, भाई की शादी हुई थी। यह विश्वास ही नहीं किया
जा सकता है कि आरोपी को पीड़िता की जाति का पता ना हो। उसने बलात्कार करने का साहस
इसलिए किया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। इस तरह के मामलों में यह मान लेना
चाहिए कि पीड़िता का बलात्कार इसलिए हुआ क्योंकि वह अनुसूचित जाति से है। इस तरह के
अपराध हमेशा उच्च जातियांे के द्वारा नीची जाति की महिलाओं पर वर्चस्व दिखाने के
लिए किए जाते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के ये फैसले अंधी गली नहीं है जिससे
माननीय न्यायमूर्त्ति अनभिज्ञ हों और हर मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों को
दरकिनार कर सके।
उसका बलात्कार (जानबूझकर) नहीं
किया गया कि वह अनुसूचित जाति से है
एक अन्य मामलें मे धु्रवेन्द्र
सिंह एवं अन्य ने पूजा के साथ छेड़-छाड़ किया फिर बलात्कार किया और ये धमकी
दी की अगर इस मामले को किसी से बताया गया तो उसके भाईयों को मार दिया जाएगा। जब भी
वह विद्यालय जाती थी सभी आरोपी उसके साथ बलात्कार करते थे और यह सिलसिला बहुत
दिनों तक चलता रहा।
राजस्थान उच्च न्यायालय के
माननीय
न्यायमूर्त्ति एस. के. गर्ग के मुताबिक अरोपी धु्रवेन्द्र सिंह, सुशील एवं सी. मुमुन्सी पर अट्रोसिटी एक्ट की
धारा तबतक नहीं लगाई जब तक कि ये न पता चले की पीड़िता के साथ इसलिए बलात्कार किया
गया क्योंकि वह अनुसूचित जाति की है। वर्तमान मामले में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं
है जिससे ये साबित हो कि पूजा का बलात्कार इसलिए किया गया क्योंकि वह अनुसूचित
जाति की थी। इसलिए मूर्धन्य स्पेशल जज जिन्होंने ैब्ध्ैज् एक्ट की धारा 3(2)(अ) के तहत जो सजा दिया उसे खारिज किया जाता है
और आरोपियों को इस कथित अभियोग से मुक्त किया जाता है। इस मामले में पप्पू बनाम
राजस्थान सरकार को संज्ञान में लिया जाना चाहिए जिसमें यह बताया गया है कि ऐसे
मामलों में  अट्रोसिटी एक्ट की धारा 3(2)(अ) को संज्ञान में लेने के बजाय जरूरत है इस
तरह के अपराध के तथ्यों पर सही ढंग से प्रकाश डालने की एवं यह साबित करने की कि
अपराध इसलिए किया गया क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति से है। (धु्रवेन्द्र सिंह एवं
अन्य बनाम राजस्थान सरकार (2001) 
सर्वोच्च न्यायलय के फैसले से
पहले का एक मामला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के
माननीय
न्यायमूर्ति उमेश्वर पाण्डेय ने सही ही कहा है कि ये आरोपि घटना के समय 25 साल का था और इस जघन्य अपराध को बर्बर तरीके
से अंजाम दिया जिसने 11 वर्षीय लड़की का अपनी यौन कुंठा को शांत करने
के लिए बलात्कार किया। यह घटना इतनी क्रूर एवं अमानवीय थी कि पीड़िता को बहुत दिनों
तक अस्पताल में रखना पड़ा। यह सर्वविदित है कि यह नाबालिग लड़की ‘दलित’ वर्ग से है और आरोपी एक ‘गैर-दलित’ वर्ग से है, उसी कारण से आरोपी ने पीड़िता के साथ यह क्रूर
एवं जघन्य अपराध करने का दुस्साहस किया। अतः आरोपी को कोई भी सहानुभूति नहीं मिलनी
चाहिए और उसे इस मामले में सजा मिलनी चाहिए। (उदय बहादुर पुत्र रामदेव बढ़ई बनाम
उत्तर प्रदेश , 2005 ) 
प्रमाणित नहीं किया जा सकता
जबतक कि उपस्थिति न हो

माननीय न्यायमूर्ति दलबीर
भंडारी एवं दीपक वर्मा ने धूर्ततापूर्ण व्याख्या करते हुए कहा कि अट्रोसिटी एक्ट की
उपधारा 10 सार्वजनिक स्थल की बात न करके लोकदृष्टि के
दायरे के अंदर की बात करती है ,जिसका मतलब होता है घटना के वक्त जनता की उपस्थिति
आवश्यक है और कोई भी आरोप पर संज्ञान तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि उस घटना का
कोई चश्मदीद गवाह न हो। (अस्मतुन निशा बनाम आंध्र प्रदेश ….अपराधिक अपिल संख्या 766, 2011) 
न्यायमूर्त्ति भंडारी के इस
फैसले का आधार केरल
उच्च न्यायालय का फैसला (ई. कृष्णण नैनार बनाम एम. ए. कुट्टापन
एवं अन्य जिसमें यह बताया गया कि उपधारा 10 के तहत अवमानना तभी की जा
सकती है जब वह (जिसके खिलाफ अवमानना की गई हो) उपस्थित हो,  जिसका आधार है लोकदृष्टि के दायरे के अंदर की
कोई भी जगह है। (1999 ) संक्षेप में कहा जाये तो जनता
के बीच बिना उस आरोपी की उपस्थिति के जिसने यह अपराध किया है, क्या  प्रमाणित  किया जा सकता है? 
 सर्वोच्च न्यायालय की क्या
महान व्याख्या!

विरले ही उदाहरण मिलेंगे
जिसमें
उच्च न्यायलय से लेकर सर्वोच्च न्यायलय ने किसी अपराध की जमीनी व्याख्या की
हो। और तो और न्यायालय ने गरीब पीड़ितों पर यह साबित करने का बोझ डाल दिया कि उसका
बलात्कार केवल इसलिए हुआ कि वह दलित है। कानून की इससे घटिया प्रक्रिया और क्या हो
सकती है! न्यायालय  को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के समझ चुनौतियों का
सामना करते हुए कानून की जमीनी व्याख्या की जानी चाहिए। संवैधानिक सपने एवं जमीनी
वास्तविकता के मद्देनजर हमें यह भी याद करने की जरूरत है कि यह शोषण शाश्वत नहीं
है और ऐतिहासिक बदलाव की प्रक्रिया में दासता की बेड़ियां ध्वस्त होंगी। दलित समाज
में निचले पायदान पर नहीं रहेंगे। जाति व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए अस्पृश्यता का
खात्मा एक दूभर सपना हो सकता है लेकिन शिक्षा, प्रतिरोध एवं सामाजिक चेतना
निश्चय ही दलितों को इतना सबल बनायेगी कि वे आर्थिक एवं राजनैतिक सत्ता पर समान
दावा प्रस्तुत करेंगे।
हाल के इतिहास में दलितों ने
कुछ राज्यों में राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किया है लेकिन उच्च जातियों के बदले एवं
कुण्ठा की भावना से उन पर एवं उनकी महिलाओं पर उत्पीड़न बढ़ा है। यह और भी ज्यादा
दुर्भाग्यपूर्ण है कि दलितों की रक्षा एवं न्याय के लिए दलितों के नेताओं ने उचित
कदम नहीं उठाया है क्योंकि गरीबों में भी गरीब की पुकार बदलाव में खो गई है। यहां
दलित भाईयों एवं बहनों के दुःख दर्द को तथ्य एवं आकड़ों के आधार पर अलग से
व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है।

स्त्री रचनाधर्मिता के तीन स्वर

( इन तीन कवयित्रियों की कविताओं से गुजरना पीडा की एक समान भावभूमि से गुजरना तो है ही लेकिन अलग -अलग सामाजिक स्थितियां और इनके अपने संघर्ष इन कविताओं में स्पष्ट फर्क के साथ देखे जा सकते हैं.
हेमलता माहिश्वर

हेमलता माहिश्वर की कवितायें

उपस्थित / अनुपस्थित

1.
चिपकी रह जाती है
झाड़न में जितनी धूल
उतना सा भी
न रख पाईं वे
बचाकर
अपना मन
मनोंमन कई टन
झाड़कर
घर की धूल

2.फटर फटर
फ़टकतीं झाड़न
बस
चमकाती रहीं
घर का मन
झाड़न की तरह
होते रहे गंदले
उनके मन

3.
घर की
बेज़ान चीज़ों पर पड़ी
परतों को झाड़ते
धूल की
झड़ गये
खुद के
परागकण
एक चमक चढ़ती रही
एक उतरती रही

4.
घर में
अपनी उपस्थिति का
एहसास दिलाते
वे दुनिया से
अनुपस्थित हो गयीं

5.
सर्फ़ या सोडा मिलाकर
गर्म पानी में डूबाकर
फिर रगड़कर
ब्रश मारकर
निचोड़ दिया कटकटाकर
सूखाकर
कड़ी धूप में
फिर कर लिया है तैयार
स्त्री ने
झाड़न
दुबारा इस्तेमाल के लिए
अपना मन भी
यूँ ही धो पोंछ कर
फिर -फिर
रखती हैं
स्त्री
दुबारा धूल चढ़ाने के लिए

विद्रोह
धूप ही ओढ़कर
चल पड़ी हैं वे
कि अंबर होता रहा
तार तार
बार बार, हर बार

चांदनी उतार
अपने मन की
पहन लिए हैं
पत्थर के जूते
कि उग आये हैं
हाथों में बबूल
वाणी की वीणा
टूट गयी
मुखर स्वर कातर
बिखर गया है

है लगी गूंजने
भास्वर दहाड़
नासापुट में बसते हैं
अगिनपखी
कि फेफड़ों में
ज्वालामुखी
जठराग्नि लिए तेज़ाब
कानों में बजते हैं
नगाड़ों के थाप
मनोरमा, प्रियंका
दामिनी, गुड़िया
दर्द एक सा
दूर से दूर तक
दर्दों के टुकडों की चादर
ओढ़ रखी है इन जैसों ने
इस कोने से उस कोने तक

शीतल, सोनी
इरोम शर्मिला
चल पड़े हैं साथ
हो गई है
सुनहरी चांदनी
रक्ताभ धूप
अग्नि तेज़
और उठता
अपने भीतर
उष्ण तूफ़ान

कौशल पंवार की कवितायें 

कौशल पंवार
भंगी महिला


भंगी महिला सहती है
मैला ढोने का दंश
उठाती है मल से भरी टोकरी
घुटने से होती हुई
छाती के बल से
सिर तक पंहुचाती है
भंगी महिला ।
भंगी महिला के ऊपर
गिरता है
टप-टप-टप-टप मलमूत्र
कभी पल्लू से पौंछती
कभी पल्लू को खसकाती
कहीं ढल न जाए
कहीं अंट न जाए
इज्जत सरे बाजार
भंगी महिला
कुरडी पर पहुंचकर
थोडी देर रुकती है
ठहरती है उसकी नजर
सोचती है भंगी महिला
मैं, मलमूत्र से भी गयी गुजरी ?
अरे ! मलमूत्र तो धन्य है
जो कम से कम सिर पर तो है
और भंगी महिला
उठाती है मलमूत्र से भरा बोझा
और चल पडती है
तिलाजंलि देने
उस सभ्य कहे जाने वाले समाज को
धिक्कारती है
हुंकारती है इस व्यवस्था पर
सदियों की यातना का
हिसाब मांगती है
फेंक देना चाहती है
मलमूत्र से भरा बोझा
सभ्य (?) समाज के ऊपर
छीन लेना चाहती है
अपने हिस्से का खुला आसमान
ऐ ! व्यवस्था के ठेकेदारों
अब सम्भल जाओ
देखो, देखो ! वे आ रही है
भंगी महिलाएँ
हाथ में झाडू की जगह
कलम उठाये भंगी महिलएँ ।

कवि



कवि
तुम्हारे पास
कुछ है नहीं ?
जिसकी तुम कल्पना कर सको ।
नहीं दिखती तुम्हें,
मां, बहने, चाची, ताई,
जो भोर में जग जाती है
तुम्हारी दुनियां संवारने के लिए ।

कवि
तुम्हारे पास वह सुगन्ध नहीं ।
जिसकी महक का तुम
आस्वादन कर सको
क्योंकि नहीं सुहाती तुम्हे
वह गटर की बिलबिलाती गंदगी
जो समा लेती है अपने गरल में
उस रामदास को
जो अभी
बिल्कुल अभी
उठकर गया था
तुम्हारे पास
तुम्हारे अन्धेरों को
उजाले में बदलने के लिए ।
कवि
तुम्हारे पास वह दृष्टी भी नहीं
जो अन्धेरे को अन्धेरा कह सके ।

क्योंकि तुम्हारी नजर तो
रही है शंकुतला के नख–शिख पर
हर कालखण्ड़ में

स्त्री को सिर्फ निहारा है तुमने
इनका दर्द नहीं देखा तुमने

नहीं दिखी तुम्हें
जो अभी-अभी
बिल्कुल अभी
मल भरा टोकरा उठाकर
ले गयी है
तुम्हारे घर से !

प्रज्ञा
पांडेय की कवितायें

प्रज्ञा पांडेय
पहले मनुष्य हूँ  
सिर्फ स्त्री  हूँ  मैं’
यह जो परिभाषा उकेरी
कागजों में तुमने
अभिमान में सरपट अपनी अंगुलियाँ दौडाते
कभी भोज पत्र पर लिखा तो
कभी स्क्रीन  पर ।
लिखने के पहले क्या सोचा
तुम्हारा लिखा मैं क्या कभी न पढूंगी .
तुमने बना दी
मेरी तमाम असहमतियों से  नियमावलि
मुझे माँ  बहन  सखी
कहा
पत्नी और अपनी प्रेयसी
अपनी नज़रों से बार बार मुझे परखा
और लिख दिया जो भी
कभी मुझसे पूछा खुद के बारे में
क्या ख़याल रखती हूँ मैं।
मैं तो भूल ही गयी अपना होना।
मुझे एक बार फिर  वही जाना होगा
जहाँ से तुमने भोजपत्रों पर  मुझे उकेरना शुरू किया
तुम्हारे सारे अक्षर मिटाकर मैं फिर से लिखूंगी
खुद को याद कर कर।  याद आता है कि
पहले मनुष्य हूँ  उसके बाद हूँ मैं  स्त्री
वह भी   अपनी  .
 समय के
प्रवाह की
सबसे ज़रूरी  लहरें
अगली बार तुम स्त्री बनकर जन्म लेना।
तब समझ पाओगे

स्त्री की देह में एक जो  गर्भाशय  है वह उसका मान  उसकी थाती है .
हर जोर जुल्म से वह बचाना चाहती है उसे .क्योंकि उसमें वह रचती है   समय के प्रवाह की सबसे ज़रूरी  लहरें। जाने-अनजाने उस के लहू में उस  दायित्व की अस्मिता बहती है।

 जब भी स्त्री सौपती हैं स्वयं को पुरुष को ,अपनी गरिमामय सम्पूर्णता में
अपने मान से लबरेज वह सिर्फ देह नहीं सौपती प्रेम में .
वह सौंप देती है अपनी थाती , धरती को बसाने का स्वप्न .
उसके साथी के लहू में गर्भ की
अस्मित-उष्णता का प्रवाह नहीं
प्रकृति ने पथिक को वह भार  सौपा नहीं।
वह तो चलता रहता  है  नए प्रेम की खोज में
अपनी  नयी दुनिया के उत्स की खोज में ।
स्त्री ब्रम्हांड  को बसाने का स्वप्न लिए गाती है गीत
मिलन के, बिछोह के
बसाव के, उजाड़ के ।

जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

( निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन
से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है. इन दिनों अपने
छात्र और युवा दिनों के बहाने 8 वें और 9वें दशक

निवेदिता

के हलचल से भरे समय की साक्षी हो रही हैं. इस क्रम में इस तीसरे किश्त में प्रेम से स्वप्निल आखों में क्रांति के ख्वाब
बुनती लडकी की कथा दर्ज हुई है और दर्ज हुआ है 84 के भयपूर्ण माहौल में दोस्ती का रंग.
दो किश्तें मोहल्ला लाइव और निवेदिता के अपने वेब साइट खुलाआसमान पर  आ चुकी हैं. निवेदिता से 9835029152 पर या niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

दरवाजे
पर दस्तक हुई

मैं अनमनी सी उठी। मुझे गुस्सा आ रहा था कि सुबह सुबह कौन आ धमका। नींद से जागना
पड़ा। दरवाजा खोला तो सामने एक नौजवान खड़ा था। मुझे देखकर बड़ी उदासी से मुस्कुराया।
गोया मेरी खाबीदा आंखों में तैरते नींद को देखकर मेरे जाग जाने का उसे दुख हो।
उसके बालों के अंदाज में उस जमाने के मषहूर हिरो राजेश खन्ना की हल्की सी झलक थी।
जिसने एक लम्हें के लिए मुझे बेचैन किया। मेरी आंखों में सवाल तैर आए। उसने पूछा
नीतिरंजन जी यहीं रहते हैं। तब तक पापा आ गये। उन्होंने गर्मजोशी  से कहा अन्दर आइये।
पापा
ने परिचय कराया

मेरी बड़ी बेटी है। फिर उनकी तरफ देखकर कहा ये डाक्टर हैं। इन्हीं के बारे में
तुम्हें बता रहा था। अंगोला से अभी अभी आए हैं। वो मुस्कुराए…..गहरे रंग पर
मोतियों जैसे दांत झिलमिलाने लगे। और सुबह के आसमान पर सुलगता सूरज। उसने गहरी
आंखों से मुझे  देखा , आप किस क्लास में पढ़ती हैं? जी अभी मैट्रिक का इन्तहान दिया
है।  वाकया 1980 का है। अंगोला अभी अभी आजाद हुआ था। देश की हालत खास्ता थी। कई देशों
के कम्युनिस्ट मुल्क उनकी मदद के लिए आगे आए। और दुनिया के कई हिस्सों से डाक्टरों
को अंगोला भेजा गया। जिस टीम के लीडर डा शकील बनाए गए थे। मैं ये किस्सा अपने पिता
से कई बार सुन चुकी थी। मुझे अच्छा लगा कि जब इस उम्र के लोग डाक्टर बनकर पैसा
कमाने में लगे रहते हैं कोई नौजवान अपना केरियर दांव पर लगा कर एक दूसरे देश की
सेवा में लगा है।
उस
मुलाकात ने मेरे दिल में
खलिश पैदा की पर हम फिर लंबे समय तक नहीं मिले । पर उसकी खूबसूरत
आवाज पीछा करती रही। सांवला रंग, चेहरे
पर ढ़ेर सारा नमक। पीएमसीएच से पढ़ाई खत्म करने के बाद कई सालों तक डा सेन के
शागिर्द रहे। अंग्रेजी और उर्दू की गहरी समझ। बातों का जादूगर। औरतें उसे अपना
महबूब बनाना पसंद करती थीं।
इस
बीच मेरा दाखिला

मगध महिला कॉलेज में हो गया। हम कॉलेज की नयी जिन्दगी में मशगूल थे। मेरे घर से
लगभग चार किलोमीटर कॉलेज होगा। हम चार लडकियां एक ही रिक्शा पर बैठ कर जाते। कॉलेज
के रास्ते में सड़क के दोनों किनारे पुरानी ईटों की उदास इमारतें थीं। जिनकी
मेहराबों के नीचे चाय और पान की दुकानें। हमारा रिक्शावाला उखड़ी हुई सांसों को
संभाले फूल सी लड़कियों का भार उठाए कुछ गुनगुनाता रहता। मेरी बहन जोना से अक्सर इस
बात पर लड़ाई होती की वह मेरी गोद में नहीं बैठेगी। मैं कहती कि तुम मेरा भार सह
नहीं पाओगी। रिक्शा का पैसा बचाने के चक्कर में हम एक दूसरे पर लदे-फदे कॉलेज
पहुंचते।
कॉलेज
में लड़कियों के जलवे थे।
महिला कॉलेज होने की वजह से वे खुद को ज्यादा आजाद महसूस करतीं।
मेरा मन खेल में खूब लगता। उन दिनों ऐसा कोई खेल नहीं था जो हम नहीं खेलते।
क्रिकेट का तो पागलपन सवार था। मैं तेज गेंद फेकती थी। बाधा दौड़ में हम छलांगे
लगाते। कॉलेज के ऐनुअल डे पर बाहरी लोगों को भी इजाजत थी। बी.एन कॉलेज से लड़के
रिश्तेदार के नाम पर पहुंच जाते। हिरणों की तरह छलांग लगाने वाली लड़कियों की सुडौल
पिंडलियों को घूर-घूर कर आंख सेंकते।  लड़कियां
इन सबों से बेखबर बेबजह हंसती रहती। हमारी एक दोस्त की बहन जिसे सब चंबल की रानी
कहते थे उनका कॉलेज में बड़ा धाक था। दोस्त की बड़ी बहन होने के नाते हमसब रैगिंग से
बच गए। चबंल की रानी का असली नाम बेबी था। बेबी दी मुंहफट और जबानदराज थीं। स्याह
बाल और मोती जैसे दांत थे। जब वो जोर से कहकहा लगाती तो उनके सफेद दांत चमक उठते।
उनसे मिलने कई लड़के आते। उनके इश्क के किस्से मशहूर थे। लड़कियां ईर्ष्या से
देखतीं। उनके बारे में कई रहस्य थे। जो रहस्य हमें खींचता। उस जमाने में वो जीन्स
और टॉप पहन कर आती। एक दिन बेबी दी ने रैगिंग के लिए कुछ बच्चियों को पकड़ा। कहा
तुम्हें इस लड़के से प्यार जताना होगा। वैसे ही जैसे प्रेमी करते हैं। उसको तो
पसीना छूट गया। कोई लड़का पकड़ा गया था कॉलेज के पास चक्कर लगाते। बेबी दी ने उसे
पकड़ लिया। वह सिटपिटा गया । उसने सपनों में भी नहीं सोचा होगा कि लड़़कियां इस कदर परेशान
कर सकती हैं। बेबी दी ने कहा चलो शुरु हो जाओ। लड़की बेचारी रुआंसी हो गयी। आंखों
से आंसू छलक पड़े। बेबी दी खिखिलाकर हंस पड़ी। चलो बख्श दिया।
जाने
ऐसी कितनी कहानियां हैं
। पर उसका मुकम्मिल विस्तार मुश्किल
है। शायद हमसबों के भीतर कहानियां पड़ी रहती हैं। हमारे जीवन के रेशे रेशे
में। पर बयान करना खतरे से खाली नहीं है। वह भी जब आप आपने जीवन अनुभवों को लिख
रहे हों। मशहूर अफसाना निगार इस्मत कहतीं हैं जग बीती और आप बीती बाल बराबर का
फर्क है। जगबीती अगर अपने आप पर बीती महसूस न हों तो वह इन्सान ही क्या है।
 कॉलेज में जाते ही मैंने एआईएसएफ का गठन
किया। उनदिनों एआईएसएफ का जिम्मा उषा दी पर था। उषा दी पेशे से डाक्टर हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता कॉमरेड एच के व्यास की बेटी । खूबसूरत और जहीन।
पहली बैठक उनके साथ हुई। दूसरी बैठक एआईएसएफ के दफ्तर में हुई।
जब
मैं पहुंची तो करीब 10 बज रहे थे। बैठक की अध्यक्ष्ता शकील
कर रहे थे। मुझे देखते ही कहा आईए कॉमरेड। मैं मुस्कुराई।  यह हमारी दूसरी मुलाकात थी। दुबारा उन्हें देख
अच्छा लगा। बैठक में संगठन के विस्तार की योजना बनी । अलग अलग जिम्मेदारियां सौपी
गयी। एक साथी ने कहा कि हमलोग छात्रों के बीच काम करते हैं इसलिए किसी खास पार्टी
के इशारे पर काम क्यों करें? उसकी
बात सुनकर कई साथी उत्तेजित हो गए। कुछ लोगों ने कहा ये बीजेपी का एजेंन्ट है। किसी
ने कहा कांग्रेसी है।  कॉमरेड शकील ने
हस्तक्षेप किया। इतनी बचकानी हरकत की उम्मीद नहीं हैं आपसबों से । किसी ने सवाल
उठाया है तो जबाव दें। इस तरह उत्तेजित होना सही नहीं है। तबतक उस बंदें पर काफी
हमला हो चुका था। उसने चिल्लाकर कहा कॉमरेड ये जो आपके साथी हैं मैं दावा करता हूं
कि इनमें से 80 फीसदी ऐसे लोग हैं जो कम्युनिज्म का
मतलब नहीं समझते। इनमें से तो कुछ लोग तबलीगी जमात वाले भी हैं। उन्होंने कहा
बेहतर होगा आप सब शांत हो जाएं। कौन सच्चा कम्युनिस्ट है कौन झूठा इसका फैसला वक्त
करेगा। हम फिजूल बातों में वक्त गवां रहे हैं। मैं मानता हूं कि हर क्रांति के
अंदर अगली क्रांति के बीज होते हैं। हमारी कोशिश है कि उसके लिए जमीन तैयार हो।
क्रांतिकारियों
के बारे में बचपन से

किस्से सुनते आयी थी। कई किताबें पढ़ी। पर जो सामने था वह उन सबों से कितना मिलता
था। मैं देख रही थी उसकी आंखों में जिसमें लावा दहक रहा था।  बैठक के बाद उन्होंने पुछा क्या आपको घर छोड़
दूं। हम स्कूटर के पीछे बैठ गए। मैंने पीछे बैठे हुए पूछा आपको नहीं लगता कि
समाजावाद का फलसफा और उसे जमीन पर उतारने के फलसफे में बहुत फर्क है? हां इससे इनकार कहा है। पर क्या सारी
बातें मेरी पीठ के पीछे ही कर लेंगी की हम इतमिनान से बैठ कर भी बातें कर सकते
हैं। वैसे मैं मानता हूं कि किसी भी दार्शनिक विचार को जमीन पर लाने के लिए काम
करना होगा। पूरी ताकत और निष्ठा से।  घर के
पास स्कूटर रुका तो मैंने कहा मेरी मां खाना बहुत उम्दा पकाती हैं। आप खा कर जाएं
। नहीं किसी और दिन ये कह कर उसने विदा लिया। दूसरे दिन सबेरे सबेरे हमारे घर
पहुंचे । कॉमरेड अमरजीत कौर पटना आ रही थीं उन्हें लेने जाना है। आपको हमारे साथ
जाना होगा। हमने पापा से पुछा जा सकते हैं? पापा
ने कहा जाओ। राजेन्द्र नगर से स्टेशन का रास्ता लंबा है। सड़क के किनारे इमारतें
बेरंगी और धूल से भरी थीं। वहीं कचहरियां,वही
डाकबंगले,वही रेलवे स्टेशनों के कोलतार से लिपे
वेटिंगरुम ।
वहां
जाकर पता चला कि कॉमरेड अमरजीत नहीं आयी। यह तय हुआ कि कहीं चाय पी जाय। उन्होंने
कहा कि मेरे घर चलते हैं वहीं आपको चाय पिलाता हूं। मेरे दिल की घड़कने तेज हो गयी।
पर मना नहीं कर सकी। ताला खोल कर हम सीधे उनके बरामदे में खड़े थे। सड़क पर मुक्कमल

सन्नाटा था। उसने रेडियो खोल दिया। रेडियो पर लता के गीत गूंज रहे थे। चाय की दो
प्यालिया। गर्म भांप और उसकी मादक हंसी। उसने बहुत धीरे से कहा आपकी आंखें बहुत सुन्दर
है और इस बहाने मेरी आंखों में उतर गया। पहली बार महसूस किया कि मेरे भीतर एक
खूबसूरत औरत है। उसके हाथ मेरे स्याह और धने बालों पर फिसल रहे थे। मेरी आंखें
पिघल रही थी। उस दिन जब मैं वापस आयी तो देर तक जागती रहीं 
बाहर
धूप छिटकी हुई थी।

खिड़की के बाहर सुर्ख फूलों वाले घने दरखत को छूती हवा मेरे गालों को सहला गयी। मैं
नींद में डूब गयी । जब जागी तो बाहर सूरज डूब रहा था। दरख्तों के झुरमट में सूरज
का सुनहरा रंग इस कदर दिल फरेब था जैसे आकाश ने समेट लिया हो उसे अपने आगोश में।
पलंग पर चित पड़ी वह सोच रही थी कि आखिर क्या बात है इस आदमी में कि वह खींचती चली
जा रही है। उसे देखते ही उसके गाल सुर्ख क्यों हो जाते हैं। बैठे-बैठे उसका दिल
चाहता कि वह उसके चौड़े सीने पर सर रख कर सो जाए। घंटों  बे-वजह आयने के पास बैठी रहती। उसका बदन आहिस्ते
आहिस्ते सुलगता रहता।  कोई मेरे दिल से
पुछे तेरे तीरे नीमकश को यह खलिश कहां से होती जो जिगर के पार होता।

मेरा
दिल भर आया।
ये
क्या हो रहा है मुझे। हमने सोचा था कि अब प्रेम कभी नहीं होगा। पिछला धांव इतना
गहरा था कि दिल ही दिल में कसम खायी थी कि अब किसी से दिल नहीं लगायेंगे। किस्मत
की सितमगिरी देखिए कि दिल हमेशा ही लगा रहा।
तुलसी दास ने लिखा है नौजवान औरतें शोले के लौ की मानिंद होती है। इस लौ
में जो जले वो खाक। मैं खुद को सावधान कर रही थी। निवेदिता खुद को संभालो।  इस लौ में किसी और को जलने मत दो।
शकील
मूल रुप से

असरगंज के रहने वाले हैं। हालांकि उनकी मरहूम फूफू कहती थीं कि हमलोग बाराबंकी के
हैं। उनके पूर्वज वालिद अलीषाह के दरबार में थे। उनकी जिम्मेदारी राजा के शस्त्र
भंडार की देख -रेख करना था। बाद में अंग्रजों ने उन्हें गिरफ्तार किया और बंगाल के
मटियाबुर्ज के पास उन्हें रखा गया। कहते है उसी दौर में षकील के पूर्वज उनके पीछे
पीछे मुर्शिदाबाद आए। उन्होंने भी अंग्रजों के खिलाफ जंग लड़ी। बाद में
छिपते-छिपाते मुंगेर आए। जहां उन्होंने चमड़े का व्यापार शुरु किया। आज भी शकील का
गांव चमड़ा गोदाम के नाम से जाना जाता है। ये दिलचस्प इतिहास मुझे और करीब ले आया.
दूसरे
दिन हम फिर मिले

राजेन्द्र नगर रोड न0 11 में उसका घर था। दो कमरे का घर। काफी
साफ और सुन्दर। कमरे में ज्यादा सामान नहीं था। बाहर के कमरे में चार कुर्सिया जो
सफेद तार से बुना हुवा था। कुछ किताबें। और टैपरिकार्डर। उसने कहा जबरदस्त भूख लगी
है। कुछ खायेंगी आप? मेरे जबाव का इंतजार किए बगेर दो अंडे
का ऑमलेट बनाया और ब्रेड सेकें। मक्खन की गहरी परत लगाकर हमें खाने दिया। उनदिनों
मेरे लिए अंड़ा खाना बड़ी बात थी। हमारा बड़ा परिवार था। अमूमन अंड़ा आता नहीं आता तो
पूरा सफाया हो जाता। मुझे लगा इससे लजीज खाना हो ही नहीं सकता। मैंने सरसरी नजर
पूरे कमरे में डाली। बाहर बरामदे के नीचे लगे फूलों को देखती रही। हवा के झोके ने
जोर से दरवाजा बंद कर दिया। मैं चौकी । उसने कहा रहने दीजिए मैं बंद करता हूं।
दरवाजा बंद किया और सिगरेट सुलगा कर कुर्सी मेरे नजदीक खींच लिया।
उसने
बड़ी बेबाकी से पूछा

आपको नहीं लगता हम दोस्ती से आगे निकल आए हैं। मैं कुछ कह नहीं पायी । वह निहारता
रहा। धीरे से मेरे हाथों को थाम लिया। हम खामोश थे। कुछ बह रहा था हमारे भीतर।
गर्म लहू सा। दरवाजे से छनकर शाम की पीली धूप जमीन पर चमक रही थी। कुछ देर चुप्पी
रही। यह अच्छा ही था। मेरी उखड़ी सांसें वापस आ गयी। उसने बहुत शांत और गंभीर आवाज
में कहा आप मुझे अच्छी लगती हैं। सामने पूरी शाम पड़ी थी। लाल घधकती हुई और शायद
रात का एक दुकड़ा भी। वह देखता रहा। मैं तपती रही। हमारी चुप्पी मुहब्बत की गवाह
थी। मैं भीगा भीगा मन लिए लौट आयी।
 दूसरे दिन हमारा रिहर्सल था। जहां हम
रिहसर्ल करते थे वह एक पुराना मकान था। जिसके सामने बड़ा सा लॉन था। जहां बेतरतीब
घांस उगे हुए थे। उस वक्त हल्की हल्की बारिश हो रही थी। हवा में जंगली घासों की
खषबू थी। अंदर से मध्यम सुर में गाने की आवाज आ रही थी। भीतर गयी तो दिलीप
हरामुनियम पर बैठा हुआ था। बाहर बादल तैर रहे थे। उसने तान छेड़ा। पंखी राजा रे
पंखी राजा मीठा बोल। मैं पास बैठ गयी। तुम गाते हो तो लगता है कहीं दूर पहाड़ों पर
आबषार गिर रहा है। वह हंसने लगा। अच्छा तुम भी साथ दो। अरे ऐसे नहीं सुर में। सुर
रहेगा तब सो सुर में गाउंगी। नहीं तुम गा सकती हो। तभी तनु भैया ने कहा जरा तुमलोग
इघर आओ। तनवीर अखतर को हमलोग तनु भैया बुलाते थे। उनदिनों इप्टा के सचिव थे। हम
वहां पहंचे तो देखा सब लोग रेडियो घ्यान से सुन रहे हैं। सबके चेहरे पर हवाईयां
उड़ी हुई थीं। क्या हुआ क्या सुन रहे हैं? ईशारे
से उन्होंने चुप रहने को कहा।
रेडियों
पर गंभीर आवाज गूंजी।
देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हालत नाजुक है। हमसब सकते में
आ गए। मेरी आंखें डबडबा गयी ये क्या हुआ? तनु
भैया ने कहा हमलोगों को इस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। पटना सिटी में सिखों
पर खतरा है। एआईएसएफ के साथियों को भी खबर दी गयी। तय हुआ कि कल सुबह 6 बजे इप्टा ऑफिस में जमा होना है। फिर
वहीं से पटना सिटी चलेंगे।
उनदिनों
हमलोग गदर्नी बाग में
रहते थे। घर पहुंचे तो मायूसी छायी थी। कुछ पता नहीं चल रहा था कि
आखिर क्या हुआ। पापा लगातार रेडियो पर कान लगाए हुए थे। हमारे घर में टेलिविजन
नहीं था। मेरे चेहरे पर मायूसी देख कर उन्होंने कहा तुम सो जाओ। सब ठीक हो जायेगा।
पर मेरी आंखों में नींद नहीं थी। ये सोच कर सिहर गयी की अगर इंदिरा गांधी नहीं बची
तो इस देश का क्या होगा? सारी रात बेचैनी में कटी। घड़ी देखा तो
अभी 4 ही बजे थे। सूरज निकला नहीं था। आसमान
पर गहरे बादल थे। फिर भी मैं उठ कर तैयार हो गयी। घर से निकल ही रही थी कि पापा ने
कहा कहां जा रही हो? शहर में कर्फ्यू लग गया है। उन्होंने
अखबार मेरी तरफ बढ़ा दिया। अखबार के पहले पन्ने पर इंदिरा गांधी की हत्या की खबर
थी।
मां
रो रही थी। पापा के चिंतित थे।
मां ने कहा नहीं जाना है। मैंने डबडबाती आंखों से कहा मां जाने दो।
जाने वाला तो चला गया पर कहर उनपर टूटेगा जो मासूम हैं। हम जल्दी आ जायेंगे।  यह कहते हुए तेजी से निकल गए। आसमान पर से बादल
छंट गए थे। जगह जगह पर पुलिस गश्त कर रही थी। हम घर से निकलकर चौराहे तक पंहुचे ही
थे। पुलिस के जवानों ने रोक लिया। आपको मालूम नहीं कफ्यू लगा है शहर में। जी हम घर
जा रहे हैं। उसने कहा जल्दी निकलिए। मैं आगे बढ़ी स्टेशन की ओर। दुकाने लुट रही थी।
माथे पर पगड़ी बांधे एक सरदार घबराया हुआ आया,मेरी
दुकानें लूट रही हैं मदद करो भाई। मेरा दिल घबराने लगा। पता नहीं क्या होगा। पर
वापस भी नहीं जा सकती थी। फिर ख्याल आया कि सब तो आये होंगे। डरने से काम नहीं
चलेगा।
रिक्शावाला
बोला दीदी स्टेशन

होकर नहीं जाते हैं वहां फसादी हैं। दंगाईयों ने दो होटलों में आग लगा दी। कई
मिठाई की दुकानें लूट ली। आगे बढ़ी तो देखा जिसे जो लूटने का मौका मिल रहा है लूट
रहे हैं। कोई चार पांच सौ लोग जमा हो गए। उनलोगों ने कहा कि स्टेशन पर कई सरदारों
की दुकानें हैं चलो उसे लूटते हैं।  पहली
बार मैं देख रही थी आदमी को जानवर में बदलते हुए। नफरत,व गुस्से से मैं कांपने लगी। अपनी बेचारगी
पर तरस आया। किसी तरह गली-गली करते हुए मुझे लंगर टोली तक ले आया। उससे आगे जाने
के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। इप्टा ऑफिस तक हम नहीं पहुच पाए। किसी तरह अजय
भवन पहुंचे ।
 वहां मुझे देखते ही सहजा दा परेशान हो गए।
सहजा दा का पूरा नाम सहजानंद राय है। अब हमारे बीच नहीं है। पर पूरी जिन्दगी
कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। उन्होंने पुछा तुम किस तरह आयी। मैंने उन्हें
बताया तो प्यार से मेरे सर पर चपत लगायी। पगली! इस तरह आते हैं, कहीं कुछ हो जाता तो! मैंने कहा दादा
साथियों से संपर्क किस तरह होगा। क्या करना है? उन्होंने
कहा अभी इस माहौल में कुछ नहीं किया जा सकता। कर्फ्यू हटने तक इंतजार करना होगा।
मेरी समस्या थी कि अब घर किस तरह लौटें। पड़ोस में फोन किया। पापा नहीं थे। मां ने
कहा भाई को भेजते हैं। प्रियरंजन किसी साथी का मोपेड लेकर बड़ी मुश्किल  से पहुंचा। हम घर के लिए निकले। सड़कों पर गहरा
सन्नटा था। जगह जगह पुलिस गश्त कर रही थी। हमलोग
घर पहंचे तो शाम हो चुकी थी। मां बेचैनी से बरामदे में टहल रही थी।
कर्फ्यू
लंबा खिंचता चला गया

देश के दूसरे हिस्से से हिंसा की खबर आने लगी थी। स्कूल के दिनों में मेरी गहरी
दोस्त थी हरजीत कौर। सुना कि उसका परिवार पंजाब शिफ्ट कर रहा है। मुझे धक्का लगा।
मैं हरजीत से मिलने गयी। वह रो रही थी। मेरा दिल बैठ गया। उसने डबडबायी आंखों से
देखा। फिर धीरे-धीर अपनी मुरझाई उंगलियों से मेरे गाल सहलाने लगी। समय कैसे अचानक
पाट पलट देता है। दुःख बहता रहता है। इस दंगें में कितने लोगों ने अपना सबकुछ
खोया। मैंने अपनी दोस्त खोया। जिन्होंने उस त्रासदी को महसूस नहीं किया है वे नहीं
जानते कि अपनी जगह से उजड़ना क्या होता है?
मुझे
याद नही हम कब तक एक दूसरे के हाथों में हाथ लिए बैठे रहे। मैं उसका रोना सुन रही
थी। आंसुओं के बवंडर के बीच  उसने मेरा
चेहरा हाथों में भर कर कहा जब हम याद आये तो इसे देख लेना। ……आज भी उसका दिया
कड़ा मेरी अलमारी में दमकता रहता है। सहसा वर्षो पुराने दबे हुए आंसू उमड़ते चले आए।
झरती हुई बुंदों के बीच हरजीत का भीगा चमकता चेहरा सामने है। मैंने देखा चमकीली
धूप दरख्तों के पीछे छुप गयी। आज मन खाली-खली सा है। खाली आकाश
,सूखी नदी,हवा कुछ भी नहीं… वह तो मेरे भीतर है।
जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार।
जारी……

स्त्री रचनाधर्मिता की दो पीढियां .

( दो –दो कवितायें दो पीढियों की कवयित्रियों की.
पूनम सिंह और पूजा प्रजापति की कवितायें. फर्क सामाजिक स्थितियों का  भी है
. )
स्त्री
( दो कवितायें)

पूनम सिंह
                                    

पूनम सिंह
       1.
वह आई थी
 शाम के धुंधलके
में
हताश और बदहवास
उसकी आंखों में
रेत के ढूह भरे थे
उसकी चुप्पी अभेद्य थी
अपने कुंए मे कहीं
गहरी डूबी वह
पानी की देह
जिसके असहनीय भार से
बंह्गी की तरह
झूकी जा रही है वह
यह झूकना
स्त्री होने की बुनियादी शर्त है क्या ?
       2. 
यह अप्रत्याशित था
लेकिन ऐसा हुआ
रेत के ढूह में
आकंठ डूबी वह
पानी की देह
अचानक एक दिन
डाल्फिन की तरह
हवा की लहरों में
डुबकियां लगाती
कलाबाजियां दिखाती दूर निकल गई
समय भौंचक होकर देखता रह गया
स्त्री डाल्फिन कब से हो गई ?
पूजा प्रजापति की कवितायें
 
1.तुम्हारी जिम्मेदारियाँ
पूजा प्रजापति
 
जिन
जिम्मेदारियों
को तुम
बोझ
समझकर
लाद देती हो
किसी
दूसरी स्त्री
पर
चंद रुपये देकर
हमारी
भी
गलती-दुखती
हड्डियाँ
चाहती है
मुक्त होना
तुम्हारे
इस बोझ से
लेकिन
हम चाहकर भी
छोड़ नहीं पातीं
तुम्हारी
जिम्मेदारियाँ
क्योंकि
हम स्त्री नहीं
तुम्हारे
घर की
सिर्फ आया है।
2.घिरते घुमड़ते बादल
आज
मैंने भी देखे
घिरते
घुमड़ते बादल
कालिदास
के मेघदूत
और
नागार्जुन के घिरते
बादलों
की ही भांति।
उन्हीं
बादलों के नीचे
देखी
श्रमजीवियों की वो बस्ती
जिसकी
एक-एक झुग्गी में
7-8
लोग गुज़ारा करते हैं
बारिश
के टपकते पानी में
धूप
की जलाती हुई तपिश में
पसीने
से भरी तीक्ष्ण बदबू में।
वहाँ
बादलों का घिरना
आनंददायी
नहीं हैं
बल्कि
उनके लिए चिंतनीय है
कि
टपकते पानी की बौछारों से
माँ
को, या बाप को, या सोते बच्चे को
किसे
बचाये?
उनके
लिए भीगी मिट्टी की सौंधी सुगंध
लुभावनी
नहीं है, बल्कि वह एक
डर
पैदा कर देती है, मिट्टी के भीतर
छिपे
जीव-जंतुओं के प्रति
जो
घुस सकते है बड़ी आसानी से
उनकी
झुग्गी में
और
कर सकते हैं, किसी को भी घायल।
धूप
उनके लिए सेहतकारी नहीं
क्योंकि
वह बिना रोकटोक के
कर
जाती है प्रवेश उनकी झुग्गी में
और
दे जाती है
उनके
शरीर को घाम और काला रंग।
 आज मैंने भी देखे
घिरते
घुमड़ते बादल
कालिदास
के मेघदूत
और
नागार्जुन के घिरते
बादलों
की ही भांति।

दिमाग पर निष्क्रिय होने की चोट उसे निष्क्रिय बनाकर ही छोड्ती है

( सुधा अरोडा का यह आलेख स्त्री
के साथ मानसिक हिंसा की सूक्ष्मतम और निरंतर चलने वाली  प्रक्रियाओं क़ॆऎ स्त्रीवादी व्याख्या करता है .
सुधा अरोडा जितनी मह्त्वपूर्ण कथाकार हैं उतनी ही मह्त्वपूर्ण स्त्रीवादी विचारक .
वे स्त्रीवादी मुद्दों के लिए जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रहती हैं . यह आलेख उनके
द्वारा संदीप मील के संपादन में ‘ बीच बहस में स्त्रीवाद’
नामक शीघ्र प्राकश्य पुस्तक के लिए लिखे गये लेख का हिस्सा है,
एक  हिस्सा हमने  कल प्रकाशित किया था . पूरे लेख के लिए मील की
किताब का इंतजार करना होगा . )

सुधा अरोडा

 

मानसिक यातना के सन्दर्भ में कुछेक औसत संवादों की पड़ताल की जा सकती है —
‘‘ यू डोंट हैव ब्रेन्स ’’
‘‘ यू आर ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स !’’
‘‘ यू आर अ ब्रेनलेस वुमेन ’’
‘‘ तुममें बुद्धि की बहुत कमी है ’’
‘‘ अक्ल की बात तो कभी करोगी नहीं ’’
‘‘ कभी अपनी अक्ल का इस्तेमाल भी कर लिया करो । ’’
‘‘ तुममें बुद्धि नाम की चीज़ ही नहीं है !’’
‘‘ मुंह मत खोलो , वर्ना
पता चल जाता है कि तुम्हारी अक्ल घुटनों में है । ’’
महिला अगर गृहिणी है तो उसे बाहरी स्पेस के मसलों पर ज़बान खोलने पर तत्काल टोक दिया जाता है । एक
लम्बे अरसे तक उसके स्पेस को दाल
चावल भाजी तरकारी यानी रसोई के क्रियाकलापों तक ही केंद्रित कर दिया जाता रहा है ।
मेरे दादाजी अक्सर मेरी
दादी को टोकते थे – ‘ तुझे जिस बात की समझ न हो , उस पर ज़बान मत खोला कर ! ’
यही वाक्य कुछ अलग तरीके से मेरे पिता मेरी मां से कहते थे – ‘ बिज़नेस
की बात जहां आए , तू अपनी सलाह मत दिया कर ’। मां ज़बान खोलें
, उससे पहले उन्हें चुप रहने की हिदायत इस कदर झिड़क कर
दी जाती थी कि मां ने बोलना ही बंद कर दिया ।
हालांकि बाद में पिता ने यह भी महसूस किया कि व्यवसाय को लेकर भी मां की सलाह हमेशा सही साबित होती थी । इसके
बावजूद मां को किसी भी मसले पर
मुंह खोलने का , सलाह देने का या अपनी शिकायत दर्ज़ करने का कभी अधिकार
नहीं दिया गया ।
आज महिलाएं पढ़ी लिखी हैं । हर सामाजिक-राजनीतिक
मुद्दे पर अपनी राय रखती हैं । उसके बावजूद पुरुष उसी धुरी पर अटका है जो उसके बाप-दादा तय कर गए हैं । आज भी एक
पति अपनी समझदार गृहिणी पत्नी से यही
कहता है कि बिजनेस में अपनी बेशकीमती राय अपने पास ही रखो , यू डोंट हैव एनी बिज़नेस सेंस । या तुम्हारी औकात क्या है !
ऐसे में  जब एक बच्चा अपनी मां के आंसू पोंछते हुए कहता है  -‘‘ क्या
हुआ ममा , एट लीस्ट पापा आपको मारते तो नहीं है न ! ’’ तो समझा जा सकता है कि  उस आठ
साल के बच्चे की भी इस माहौल में एक मानसिकता तैयार हो रही है कि पापा अगर मां पर हाथ नहीं उठाते तो वह उतने बुरे नहीं हैं जितना कि
वे हो सकते थे इसलिए हर वक्त डांटने
या ताने देते रहने को जायज ठहराया जा सकता है ।
इन उच्च मध्यवर्गीय संभ्रांत पतियों
के घरों में अक्सर यह होता है कि पति अपनी गाड़ी की चाभी या कोई ज़रूरी कागज़ कहीं रखकर भूल जाता है और इसके लिए पत्नी पर शब्दों
की मूसलाधार बारिश करता है कि चाभी
कहां रखी है ! इसके लिए वह ज़मीन आसमान एक कर देता है । वह जब चीख चिल्ला कर अपना चेहरा लाल कर रहा होता है , पत्नी चाभी से ज़्यादा अपने पति के बढ़ते हुए रक्तचाप को देखकर चिंतित होती है और उसे अपनी सेहत के
लिए शांत रहने की सलाह देती है ।
अन्ततः चाभी पति के शॉर्ट्स की जेब में रखी हुई मिलती है । वह जानता है कि चाभी उसने रखी थी पर अपनी चीख चिल्लाहट पर सॉरी कहने
के बजाय वह हफ़्तों पत्नी से बात
करना बंद कर देता है । पत्नी अपने घर और रसोई की छोटी सी स्पेस में आखिर कब तक इस अबोले से जूझेगी ?  अन्ततः वह पति से संवाद कायम करने की कोशिश में
उस ग़लती के लिए माफी मांगती है जो उसने की ही नहीं । ….. और यह
एक बेहद सामान्य स्थिति है , जिससे लगभग हर गृहिणी ( हाउसवाइफ़ या होममेकर – जो भी कहें ) गुज़रती है ।
एक पढ़ी लिखी समझदार औरत को भी इसी तरह
काट-छील कर अपने से निचले दर्जे पर पहुंचाने का , बार
बार उसकी पोशाक पर उसके बेवकूफ , ईडियट , मूर्ख
, कूढ़मगज होने के चमकदार तमगे टांगकर उसकी रचनात्मक
प्रतिभा और उसके भीतर के कलाकार को कुंद करने का त्रासद आनंद ( सैडिस्टिक प्लेज़र  )
किसी भी  शालीन दिखने
वाले पति के खाते में दर्ज किया जा सकता है ।

कई बार देखने में बेहद
खूबसूरत
और सलीकेदार , प्रतिभावान
औरत का पति , असुरक्षा की भावना के चलते मौखिक रूप से आक्रामक हो जाता है। ऐसा पुरुष जानता है कि वह कमज़ोर
है , इन्फीरियर है , इसलिए
वह सुपीरियॉरिटी का स्वांग रचता है । अपनी हीन भावना को
छिपाने के लिए वह अपनी पत्नी पर
चिल्लाता है , नाराज़ होता है , उसे
घर की नौकरानियों के सामने अपमानित करता है , उस पर
बेबुनियाद आरोप लगाता है और अन्ततः हिंसक हो जाता है ।
एक केस हिस्ट्री  –
उच्च मध्यवर्ग की
एक संभ्रांत

शालीन महिला से सुबह
की सैर के दौरान
पहचान हुई । उसकी
उम्र  साठ
के लगभग थी ।
उस उम्र में भी
वह अपनी जवानी के दिनों
की कुछ धुंधली उम्मीदें , कुछ
मुरझाए हुए सपने आंखों में समेटे
हुए थी । बातचीत
में बेहद  शालीन
और सलीके दार ।
उसके घर की दीवारों
पर खूबसूरत पेंन्टिंग्स लगीं थीं जो
उसने  शादी
से पहले और शादी
के दो-चार साल बाद
तक बनाई थीं ।
पर उसके चेहरे पर एक
खोया सा भाव जमा
बैठा था – जिसे
कहते हैं -‘ लॉस्ट
लुक ‘ ऐसा भाव
जो लंबे अरसे तक ‘ सेंस
ऑफ़ नॉन बिलॉन्गिंग ‘ और ‘ चुप्पी की हिंसा ‘ झेलने से पैदा
होता है । दो
तीन दिन की पहचान
में ही एकाएक खुल कर
अपनी तकलीफ बयान करने लगीं – ” सुधा , आय हैव अब्यूज़्ड
माय बॉडी सो मच
। आय हैव पनिश्ड
इट । टॉर्चर्ड इट ।
नाउ माय बॉडी इज़ टेलिंग
मी – नो मोर ! टेक केअर ऑर आय
लीव यू एंड गो
। ” मैंने अपने शरीर का , अपनी
सेहत का कभी ख्याल
नहीं रखा । अपने
को सज़ा दी , यातना
दी । अब मेरा
शरीर मुझसे कह रहा
है – बहुत हुआ ! अब
मुझे संभालो , नहीं
तो मैं चला !

मैंने उससे कहा – तुम अकेली
नहीं हो

सभी औरतें यही करती
हैं । और कहीं
तो ज़ोर चलता नहीं , बस , अपने को सज़ा
देने बैठ जाती हैं ।
और कोई रास्ता नहीं होता उनके पास ।
अपने को सज़ा देकर ही उन्हें
सुख मिलता है ।
घर को मिटने से बचाए
रखने का सुख , अपने
को तहस नहस करके
भी अपने को त्याग
के आसन पर बिठाने
का सुख और बच्चों
के सिर पर एक
सुरक्षित छत देने का सुख
उस महिला की शिकायत
थी कि
उसके
पति उससे कभी बात
ही नहीं करते । जब
भी वह उससे कहती हैं कि
मुझसे भी दुनिया की खबरें
शेअर करो जो
अपने दोस्तों से करते
हो तो वे कहते
हैं –

यू डोंट हैव एन
आई.क्यू । बात
उससे की जाती है जिसमें
बात समझने लायक थोड़ी बुद्घि हो – आय कैन टॉक
ओन्ली टु इंटेलिजेंट पर्सन ! ” )
तुम्हारे पास बुद्घि नामकी चीज़ नहीं है , मैं
सिर्फ अक्लमंद लोगों से ही
बात कर सकता हूं  )

आगे बताने लगीं कि
बीसेक साल
पहले
जब कोई मित्र दम्पति मिलने आते थे
और उसके पति से
कहते थे कि यू
आर लकी टू हैव
सच अ ब्यूटीफुल वाइफ़ – आप
खुशकिस्मत हैं कि आपकी
बीवी इतनी खूबसूरत है  तो वे ठहाका
मारकर फौरन विशेषण  जड़
देते – ” ब्यूटी विदाउट ब्रेन्स !” फिर अपनी
पत्नी के माथे पर बिखरे
बालों की लट संवारते
हुए माफी मांगते हुए कहते – ” अरे यार , मैं
तो मज़ाक कर रहा
था । ” पर  शादी के लगातार
चालीस साल तक ‘ यू
डोंट हैव ब्रेन्स ‘ या ‘ यू आर अ
ब्रेनलेस वुमेन ‘ या ‘ यू हैव अ
पॉल्यूटेड माइंड ‘ का
हथौड़ा अपने सिर पर
झेलने के बाद उनका
दिमाग़ धीरे धीरे सचमुच सुन्न हो गया , सोचने – समझने
और रिएक्ट करने की ताकत
खो बैठा , याददाश्त
कमज़ोर हो गई और
वह अपना आत्मविश्वास पूरी तरह खो
बैठीं । अच्छी खासी चित्रकार होते हुए भी
उसकी उंगलियां एक सीधी
लकीर तक खींचना भूल गई , मनोचिकित्सक के पास
जाने लगी और एंटी
डिप्रेसेंट गोलियों की अभ्यस्त
हो गई ।
उसकी शिकायत यह भी
थी कि
वह
कभी अपने पति से
बात ही नहीं कर पाती | घर गृहस्थी के सौ
पचड़े होते हैं पर
सुबह पति से बात
करो तो वह कहता
है – मेरे ऑफिस जाने के समय
ही तुम्हें यह गृह
पुराण लेकर बैठना होता है ? ऑफिस
से वह लौटे तब बात
करो तो फिर बवाल
कि अभी थका हारा
लौटा हूं , चैन
से बैठने तो दो
। छुट्रटी के दिन
बात करो तो वह
या तो क्रिकेट देखने में मशगूल
या नेशनल ज्यॉग्राफिकल चैनल । या
क्रॉसवर्ड या सूडोकू या अखबार
। अपनी शादी की सालगिरह
के एक दिन हल्के
मूड में उसने पति को
उसके प्यार के नाम
से पुकार कर कहा -” अच्छा , यह
बताओ , तुम्हें अगर क्रिकेट
या अपनी बीवी – दोनों
में से किसी एक को
चुनना पड़ जाए तो ? ”

उसने बिना पलक झपके उसी
सांस में कहा
-” क्रिकेट
ऑफकोर्स ! दरवाज़ा खुला है , बाहर
जा सकती हो ।  ” और उसने उंगली खुले हुए दरवाज़े
की ओर उठा दी
। वह औरत यह
घटना सुनाते हुए भर्राए
गले से कह रही
थी कि एकदम मन हुआ
कि अभी घर छोड़ूं
और निकल जाउं ? लेकिन
कहां ? अच्छी खासी ज़हीन , कामकाजी
पढ़ी लिखी औरतें भी ,  शादी के बाद
एक गृहिणी की भूमिका
अपना कर अपने लौटने के सारे
विकल्प खुद ही बंद
कर देती हैं ।
यह किसी एक महिला की
कहानी नहीं
है , हज़ारों पढ़ी लिखी समझदार औरतें अपने प्रबुद्ध
प्रगतिशील पतियों से साल-दर-साल चौबीसों
घंटे एक से औसत संवाद सुनती चली जाती हैं कि उनमें अक्ल की कमी है , कि वे बेवकूफ
हैं , कि वे किसी काम की नहीं हैं , कि वे हर समय
नुक्ताचीनी करती हैं – अंग्रेजी में जिसे
नैगिंग वाइफ कहते हैं , और अन्ततः वे इस तथ्य में विश्वास जमा लेती हैं कि सचमुच उनमें कोई कमी है , उनका आई .क्यू  निचले दर्जे का है । हीन बना डालने की साजिश के हथौड़े के वार को लगातार दिमाग़ पर
झेलते हुए उनके सोचने समझने की क्षमता
धीरे धीरे क्षीण हो जाती है , घर आए मेहमानों के बीच
बात करते हुए वे डरती हैं कि पता नहीं इस
बौद्धिक चर्चा में वे कोई बेवकूफी की बात न कह बैठें और उनके पति उनकी कौन सी बात को अन्यथा ले बैठें और वे सबके
बीच हंसने की सामग्री बन बैठें । काम
करने या लिखने-पढ़ने का जज़्बा भी इस जबरन पैदा की गई हीन भावना के चलते दम तोड़ देता है ।
एक आदिवासी प्रथा है कि
एक पेड़ को
अगर काटना है तो उस पर
आरी या कुल्हाड़ी नहीं चलाते बल्कि कुछ आदिवासी मर्द औरतें उस
पेड़ को चारों ओर से गोलाकार घेर कर खड़े हो जाते है और
पेड़ को अपशब्द कहने लगते हैं
तू सूख जा , तू मर जा , तुझ पर ईश्वर का कहर बरसे । गालियां देते हैं और
कोसते
हैं । कुछ ही दिनों में
उस पेड़ के पत्ते सूखने लगते हैं और वह अपने आप टूटकर गिर
जाता है । यही हाल उन औरतों का होता है जिन्हें हर
रोज़ ब्रेनलेस या बेवकूफ़ होने का
खिताब दिया जाता है । 
हैरानी होती है कि औरतें इस कदर इन भ्रामक , गलत
और झूठे इल्जामों के ढेर को अपने भीतर पैठने कैसे देती हैं ? कि एक दिन वे सचमुच
यकीन करने लग जाती हैं कि उनके दिमाग के साथ कोई गंभीर समस्या है , कि दे आर ‘ब्यूटी
विदाउट ब्रेन्स , कि उनके दिमाग़ में प्रदूषण है ! यह सुनते सुनते उनका दिमाग़ सचमुच सुन्न और संज्ञाहीन होकर काम करना बंद कर
देता है । मानसिक तनाव के चलते उनकी
सोचने की ताकत धीरे धीरे भोथरी हो जाती है । निस्संदेह इसके कारण उसकी परवरिश , उसके संस्कारों और उसकी हर कीमत पर घर को बचाए रखने
की उसकी सोच से बावस्ता हैं , जहां ज़हीन , प्रतिष्ठित और कामयाब पुरुष को पति के रूप में पाना
ही उसे अपने जीवन का एकमात्र मकसद लगता है और इस सम्बन्ध को बचाए रखने
की ज़िद में वह अपनी  ज़िन्दगी , अपने
सांस लेने के अधिकार तक को दांव पर लगा देती है ।
ऐसे पुरुषों का एक और
कॉमन संवाद है
– ‘‘ तुम हो क्या ! तुम्हारी औकात क्या है ! ’’ अपने से ज़्यादा कमाने या अपने से  पोस्ट
पर काम करने वाली अपनी ज़हीन पत्नी को कहने में भी वे नहीं हिचकते कि    ‘‘ तुम्हारी
औकात क्या है ? ’’ यह बहुत से पतियों का बेहद प्रिय वाक्य है । वे अपनी औकात के प्रति इत्मीनान से आंखें मूंदे उसे अनदेखा
करते रहते हैं और अपनी पत्नी के अस्तित्व
को कुचल कर रख देने वाले ऐसे तीखे संवाद उच्चारित कर अपने को स्वनिर्मित पेडेस्टल पर खड़ा कर लेते हैं ।
सामान्य संवाद कई हैं और
उनमें से एक है
कि तुम कौन सा दूध की धुली हो । पति की प्रताड़ना से तंग
आकर जब कोई भी औरत अपनी अलग पहचान
बनाना चाहती है तो पुरुष उसके चरित्र पर अपना हंसिया रख देता है । जब भी पति पुरुष का खिलंदड़ापन या उसका लंपट होना पकड़ा जाता है , वह झट अपने चरित्र के दाग को छिपाने के लिए अपनी पत्नी के चरित्र पर लांछन लगाना शुरु
कर देता है । अपने गुनाहों की लकीर को छोटा साबित करने के लिए पति , पत्नी के आरोपित गुनाहों की एक लंबी लकीर सामने आंक कर आश्वस्त हो लेता है । अपनी
पत्नी को झूठा या बदचलन करार देना
उन कमज़ोर पुरुषों का हथियार है जो आत्मविश्लेषण करने या अपने भीतर झांकने से इनकार करते हैं । आक्रामक होना रक्षात्मक होने का ही
हथियार है । इसी महीने 14 जुलाई 2012 को बैंगलोर के एक दंत चिकित्‍सक
डॉक्‍टर का मामला अखबार में आया है कि वह अपनी पत्‍नी को बदसूरत कह कर बार बार और
दहेज की मांग करता था , अपनी पत्‍नी पर शक करता था और अपनी वफादारी साबित करने के
लिये उसने अपनी पत्‍नी को अपना पेशाब पीने पर मजबूर किया । कुंठा और अहंकार की चरम
स्थिति व्‍यक्ति को यातना देने की खौफनाक परिणति तक पहुंचा देती है । यह पत्‍नी तो
अपनी शिकायत लेकर पुलिस स्‍टेशन तक चली गई पर लाखों महिलायें ऐसी हैं जो किसी न
किसी कारणवश अपनी यातना को निजी मसला कहकर उसे घर की चहारदीवारी के भीतर ही दफना
देती है ।
ऐसा नहीं है कि पुरुष
स्त्रियों के हाथों
यातना का शिकार नहीं
होते । कई सामान्य नौकरीपेशा पतियों को अपनी कामकाजी दबंग पत्नियों के विवाहेतर संबंधों को आंखें मूंदकर
स्वीकार करते और सामाजिक भय के कारण पत्नी
की ज़्यादती या आक्रोश को नज़रअंदाज़ करते भी देखा जा सकता है । इसमें संदेह नहीं कि कई औरतें पुरुषों से भी अधिक खूंख्वार और
सैडिस्ट होती हैं । ऐसी औरतों के तांडव
के सामने दस पुरुषों की यातना फीकी पड़ जाए ( बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद की देन ऐसी औरतों की तेज़ी से पनपती हुई जमात के बारे में भी
हमें बात करनी है क्योंकि पितृयार्की
इन्हीं औरतों को आधारस्तंभ बनाकर पनपती है – जब कोई पुरुष अपनी पत्नी को यातना देता है तो अधिकांशतः इसके पीछे उसकी मां ,बहन या उसके जीवन में आयी ‘दूसरी औरत ’ होती है जो बखूबी ‘पत्नी’ की भावात्मक कमजोरी -वल्नरेबिलिटी पहचान कर उसे तहस नहस करने में पुरुष को उकसाती बहकाती है पर क्या इससे
पुरुष क्षम्य हो जाता है ? एक पुरुष
अगर दूसरी औरत के हाथ का खिलौना बनता है और अपने क्रियाकलाप , सोचने -समझने की
सामर्थ्‍य  की चाभी दूसरी औरत के हाथ में
सौंप उसके इंगित पर अपनी पत्नी पर बेवजह खौलता
है तो इससे उसका गुनाह कम नहीं हो जाता )  पर जब हम किसी सामाजिक सामान्य मसले पर बात करते हैं तो अनुपात के तहत ही धारणाएं तय
करते और उनका हल निकालने की कोशिश
करते हैं और मानसिक यातना के मसले में अनुपात 95 / 5 का ही पाया गया है । हो सकता है , अब यह
प्रतिशत बढ़ रहा है । लेकिन यहां हमें उस बड़े अनुपात की बात करनी है , अपवाद की नहीं । हालांकि दोनों तरह की प्रताड़ना में
निबटने के तरीके एक ही है – वह
स्त्री के लिए हों या पुरुष के लिए । जो पक्ष प्रतिकार करने में कमज़ोर होगा , वही प्रताड़ना सहने पर मजबूर कर दिया जाएगा ।

पितृसत्तात्मक समाज का शिकार पुरुष तथा स्त्रीवादी मुक्ति अभियान

( सुधा अरोडा जितनी मह्त्वपूर्ण कथाकार हैं उतनी ही मह्त्वपूर्ण स्त्रीवादी विचारक . वे स्त्रीवादी मुद्दों के लिए जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रहती हैं . यह आलेख उनके द्वारा संदीप मील के संपादन में ‘ बीच बहस में स्त्रीवाद’ नामक शीघ्र प्राकश्य पुस्तक के लिए लिखे गये लेख का हिस्सा है, दूसरा हिस्सा हम क्रमशः प्रकाशित करेंगे . पूरे लेख के लिए मील की किताब का इंतजार करना होगा .  )

सुधा अरोडा






ऐसा लगता है कि  पितृ सत्‍तात्‍मक
व्‍यवस्‍था और शोषण  के विविध रूपों का धारक पुरूष है और इसलिये हिंसा तथा प्रताडना का जिम्‍मेदार भी वही है । हकीकत यह है कि अगर हम कारणों की तह तक जायें तो   सारा असामंजस्‍य और असंतुलन हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था का है जिसके तहत पुरूष स्‍वयं भी उस सामाजिक व्‍यवस्‍था , परंपरागत सोच और रूढिग्रस्‍त संस्‍कारों का शि‍कार – विक्टिम ) है जो बचपन से उसकी शारीरिक संरचना में , उसके सिस्‍टम में इस कदर पैठ गया है कि वह चाहकर भी इससे छुटकारा नहीं पा सकता । पुरूष अपनी वर्चस्‍ववादी भूमिका से बाहर आकर सोच ही नहीं पाता और अन्‍तत:
अपने और अपने परिवार के लिये ऐसा त्रासद माहौल खडा कर देता है जो घ्‍वंस की ओर ही ले जाता है ।

  अक्‍सर हम सामाजिक रूप से प्रतिष्‍ठाप्राप्त कई पुरूषों के बारे में यह सुनते हैं कि जो व्‍यक्ति दूसरों के साथ इतना हंसमुख , जिंदादिल , यारबाश इंसान है , वह अपनी पत्‍नी के प्रति इतना क्रूर , निर्मम और असंवेदनशील कैसे हो सकता है । अगर वह पुरूष भी अपने को टटोले तो उसे खुद भी अपने व्‍यवहार पर संदेह होगा पर जिस तरह के आचरण और व्‍यवहार का वह बचपन से आदी हो चुका है , उसके तहत उसपता ही नहीं चलता कि दूसरों से हंसने बोलने वाला व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी को एक इंसान का दर्जा भी क्‍यों नहीं दे पाता । यह पुरूष अपने घर से लिये गये संस्‍कार और परंपरागत ढांचे को इस तरह अपनी मांस-मज्‍जा का हिस्‍सा बना लेता है कि चाहते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल पाता । दरअसल एक ओर वह खुद अपनी सामाजिक व्‍यवस्‍था और पुरूषवादी सोच का विक्टिम है , दूसरी ओर उसका अहंकार इतना दुर्दमनीय होता है कि अपने गलत आचरण को स्‍वीकार नहीं कर पाता । जो इस माहौल में रहते हुए भी अपने को थोडा सा बदलने की इच्‍छा रखते हैं  उनका परिवार तनावमुक्‍त स्थितियों में सामंजस्‍य बिठाकर रहता है और बच्‍चे एक स्‍वस्‍थ माहौल में बडे होते हैं । 
दोस्‍तोव्‍हस्‍की ने कहा था कि अन्‍तत: सुंदरता ही इस दुनिया को बचाएगी । उनके इस वक्‍तव्‍य का अर्थ स्त्रियों की कोमलता और संवेदना से था या नहीं , कहा नहीं जा सकता पर यह सच है कि स्त्रियां ही इस दुनिया को बदल सकती हैं , इसे ऩृशंसता और क्रूरता से बचाकर मानवीय संवेदना , प्रेम और रागात्‍मकता की ओर ले जा सकती हैं।

स्थितियों में परिवर्तन तभी आयेगा जब भारतीय परिवारों में पुरूष की मानसिकता बदलेगी और इसे बदलने  में सबसे बडी जिम्‍मेदारी एक औरत की ही है । वह जब बेटे को बेटी से उंचा दर्जा देती है , बेटे को घर के काम में हाथ बंटाने को नहीं कहती , अपनी बेटी के लिये अलग मानदंड बनाती है और बहू के लिये अलग , विषमता के बीज वह तभी बो देती है । एक मां और सास के रूप में वह दोहरे मापदंड न अपनाये । वह क्‍यों चाहती है कि उसका दामाद तो उसकी बेटी के इर्द गिर्द घूमता रहे , उसकी बेटी के नाज-नखरे उठाये , उसे हथेलियों पर रखे पर उसका बेटा अगर यही सब करे तो वह उलाहना देती है कि वह तो अपनी बीवी का गुलाम हो गया है। एक औरत स्‍वयं अपनी सास से प्रताडना सहती है पर स्‍वयं सास के ओहदे पर आसीन होते ही वह अपनी शोषक सास का प्रतिरूप बन जाती है । भाभी बनकर अपनी ननद की प्रताडना सहती है पर खुद ननद बनकर अपनी भाभी के पक्ष में खडे होकर भाई की ज्‍यादतियों का विरोध नहीं करती । जब तक औरतों में एक व़हद स्‍तर पर बहनापे की भावना नहीं जगेगी , भारत की सामाजिक संरचना में किसी परिवर्तन की संभावना नहीं हैं ।
एक मां को चाहिये कि बचपन से ही अपने बेटे को एक स्‍त्री का सम्‍मान करने के संस्‍कार दे । उसके घर के काम को कमतर करके न आंका जाये । बेटों में शुरू से ही ऐसे संस्‍कार हों कि बेटे अपने को अपनी बहनों से श्रेष्‍ठ न समझें , अपनी सहपाठिनी या मित्र लडकियों को अपने से कमजोर न समझे , लैंगिक आधार पर काम का बंटवारा न हो । आज पुरूष के समकक्ष अगर स्त्रियां भी घर के लिये आर्थिक सहयोग दे रही हैं तो रसोई और बच्‍चे सिर्फ स्‍त्री की जिम्‍मेदारी क्‍यों हों । जब तक बराबरी की भावना पति पत्‍नी में नहीं पनपती, परिवार नाम की इकाई के ढांचे का ध्‍वस्‍त होना तो निश्चित है ।
आखिर रास्ता क्या है
पुरूष का वर्चस्‍व स्‍थापित करने वाली सामाजिक संरचना जब तक नहीं बदलती , तक तक स्त्रियों को अपने और अपने परिवार को बचाये रखने के लिये कुछ सकारात्‍मक कदम तो उठाने ही होंगे ।
भावात्मक लगाव अपनी जगह है और इसका संबंध एक औरत की शारीरिक संरचना से है । मानसिक यातना से निबटने के लिए भी एक औरत को अपनी रणनीति तय करनी होगी । इसे सिर्फ एक पति के स्वभाव या उसके परिवेश और संस्कारगत माहौल को जिम्मेदार ठहराकर उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता । संवादहीनता की कुंठाओं की पहचान भी ज़रूरी है । जबतक पहचान ही नहीं होगी , समस्या का निदान संभव ही नहीं है ।

जिस तरह आक्रामकता के खिलाफ एक आम औरत को यह बताकर तैयार किया जाता है कि वह पहली ही बार हिंसा के लिए उठे हुए हाथ को रोके । ढीला सा प्रतिकार करना प्रकारांतर से उसे बढ़ावा देना ही है । यह बढ़ावा देकर वह अपना पूरा जीवन एक जल्लाद के हाथों सौंप देती है और अपने शरीर में ज़रा भी ताकत रहने तक पिटती ही रहती है । उसी तरह उपेक्षा , संवादहीनता या चुप्पी भी एक तरह की हिंसा ही है जिसे मैं चुप्पी की हिंसा या सायलेंट वायलेंस का नाम दे रही हूं  और इसे भी कन्फ्रंट या कॉर्नर करने – सामना करने या घेरने की ज़रूरत है । एक पुरुष बरसों अपना खाली समय क्रॉसवर्ड करने या सूडोको के खाली चौकोर भरने या क्रिकेट के चौके-छक्के निहारते हुए काट देता है और अपने परिवार में मां-बीवी-बच्चों से संवाद कायम करने की या तो ज़रूरत महसूस नहीं करता या हिटलरनुमा व्यवहार करता है तो निस्संदेह उसके आत्मकेंद्रित और निरंकुश स्वभाव को सामान्य व्यवहार की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए । इस व्यवहार को बढ़ावा तभी मिलता है जब इसे नज़रअंदाज़ किया जाता है या इस पर सवाल नहीं उठाया जाता या अपने आप को बदलने की कोशिश की जाती है । अपने आप को बदलने से तात्‍कालीन संकट को टाला जा सकता है पर वह कोई हल नहीं है । मुठभेड करना बहुत जरूरी है । हो सकता है कि सवाल उठाये जाने पर भी बदलाव न आये पर दबी हुई कुंठायें एक दिन अचानक विस्‍फोट से बाहर आयें , इससे बेहतर है कि उसे स्‍वस्‍थ संवाद द्वारा सतह पर लाने की एक ईमानदार कोशिश दोनों ओर से की जाये ।