Home Blog Page 178

डा0 अम्बेडकर और स्त्री अधिकार – सुजाता पारमिता

( आज
आधुनिक भारत के निर्माता डा बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर की जयंती है . बाबा
साहब स्त्री अधिकारों के लिए ठोस पहल लेते रहे . ‘स्त्रीकाल’ परिवार की ओर से उन्हें सादर नमन और उनकी जयंती पर प्रस्तुत है सुजाता पारमिता का लेख।! -संपादन मंडल)
                                                                                                                              

                                                               मैं नही जानता कि इस दुनिया का क्या होगा
                                                                     जब बेटियों का जन्म ही नहीं होगा
                                                                                                                 – डा0 अम्बेडकर

स्त्री सरोकारो के प्रति डा0 अम्बेडकर का सर्मपण किसी जुनून से कम नही था। 86 साल पहले 28 जुलाई 1928 के दिन उन्होने बम्बई विधान परिषद में स्त्रियों के लिये प्रसुति हितों से सम्बंधि एक महत्वपूर्ण बिल पेश किया जिसके समर्थन मे जोरदार वकालत करते हुये कहाँ कि यह देश के हित में है कि माँ को बच्चे के जन्म के दौरान आराम मिले। सरकारी और निजी क्षेत्रों के अंर्तगत आने वाले तमाम कारखाने खदाने या ऐसे सभी उपक्रम जहाँ भारी संख्या में स्त्रियाँ मजदूरी करती है जो खतरनाक है और जिसमें काम करना उनके लिये जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है। यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इस खर्च का वहन करे क्योंकि वे स्त्री श्रमिकों को तभी काम पर रखते है जब उन्हें इससे ज्यादा फायदा होता है। इस बिल का मुख्य आधार अन्य सुविधाओं के साथ ही महिला श्रमिकों के लिये वेतन समेत छुट्टीयों के प्रावधान का था। उन्होंने बरतानिया सरकार से इस बिल को केवल बम्बई विधान परिषद क्षेत्र तक ही सीमित न रखने बल्कि देश भर में लागू किये जाने की अपील की। जबकी भारतीय सामाजिक परम्परा में दलित और स्त्रियों को अपने श्रम की एवज किसी भी सहूलियत की उम्मीद करना भी अपराध माना जाता रहा ।

जनसंख्या नियंत्रण बिल के रूप में डा0 अम्बेडकर ने एक बार फिर बम्बई विधान परिषद मे पी जे रोहम द्वारा नवम्बर 1938 को एक ऐतिहासिक बिल पारित करवाया जिसने मनु के सदियों से चले आ रहे दर्शन को ही ध्वस्त कर दिया जिसने स्त्री को उस गुलाम के रूप में जीने के लिये बाध्य किया था। जिसका अपनी ही देह और कोख पर अधिकार न हो। उसका जन्म स्त्री के रूप  में मात्र इसीलिये हुआ है कि वह पुरूष की सेवा करे, उसे तृप्त करे और बच्चे पैदा करने का साधन बनी रहे। यह सिद्धात सदियों से भारतीय स्त्रियों की भयानक स्थिति के लिए जिम्मेदार रहा जिससे आज भी संघर्ष जारी है। भारत के इतिहास में पहली बार इस बिल ने स्त्रियों को यह अधिकार दिया कि अनचाहे गर्भ से मुक्ति उसका अपना निर्णय होगा और उसकी देह और कोख पर उसका अपना अधिकार साथ ही उन्होंने सरकार से हर भारतीय स्त्री को अनचाहे गर्भ से मुक्ति उसकी मर्जी से और आसानी से मिले इसके लिए उसकी मदद की अपील भी की।
डा0 अम्बेडकर को वायसराय की काऊसिल में 20 जुलाई 1942 को बतौर श्रम सदस्य शामिल किया गया। अपने चार साल (1942-46) के कार्यकाल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कानून बनाये। पुराने कानून में बदलाव किये। यह डा0 अम्बेडकर की ही देन है कि भारतीय श्रम कानून का वजूद न केवल बदला बल्कि वे कही मानवीय बने। महिला श्रमिकों के लिये विशेष सुविधाओं को लागू किया गया। कारखाने और खदानों में काम के घण्टों को घटा कर निर्धारित किया गया। स्त्री और पुरूष श्रमिकों के लिये समान वेतन के अधिकार का भी प्रावधान किया गया। छोटे बच्चों के लिये काम की जगह के आस-पास ही पालना घर बनाये गये। स्वस्थ्य और जीवन बीमे की शुरूआत की गयी, सामाजिक सुरक्षा अधिनियम का निमार्ण किया गया। आज  देशभर में जो कर्मचारी राज्य बीमा निगम के अस्पताल चलाये जा रहे हैं इस नीति को भी डा0 अम्बेडकर ने ही मूर्त रूप दिया था। डा0 अम्बेडकर का योगदान श्रम कानून के क्षेत्र में बहुत व्यापक और सराहनीय था। जबकि पूजीपति वर्ग द्वारा चलाये जा रहे कारखानों मे तो पीने के पानी की भी व्यवस्था नही थी जो डा0 अम्बेडकर के प्रयत्न से ही सम्भव हो पायी। पानी का अधिकार दलितों के लिये हमेशा ही सघर्ष का कारण रहा। डा0 अम्बेडकर भी इस दर्द के साथ ही जन्मे और जियें।
अप्रैल 1947 को डा0 अम्बेडकर ने हिन्दु कोड बिल का मसौदा तैयार कर संविधान सभा में रखा, जिस पर बहस होनी थी। यह बिल मुख्यतः हिन्दु संयुक्त या अविभाजित परिवार में सम्पती के अधिकार से सम्बंधित था। यह बिल स्त्रियों को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता था। अगर उस वक्त पारित हो गया होता। इस बिल की विशेषता यह थी कि यह सिर्फ स्त्री अधिकारों पर ही आधारित था। इस बिल में स्त्रियों को अपनी मर्जी से विवाह और तलाक, पति से अलग रहने पर गुजारा भत्ता गोद लेने (बच्ची को भी गोद लिए जाने) और उनका संरक्षण का भी अधिकार दिया गया था। सम्पती के विभाजन होने पर घर की स्त्रियां जिसमें माँ, पत्नी और बेटी शामिल हैं। सभी का हिस्सा निर्धारित किया गया। इस क्रान्तिकारी बिल से उस वक्त तूफान आ गया जिस देश में स्त्री को कभी  इंसान होने का भी अधिकार न हो उसे एक साथ इतने सारे हक दिये जाने वाले थे लेकिन यह बिल फिजूल की प्रक्रिया से जूझते रहने के बाद अंततः ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। हालांकि इस बिल में सुझाई गयी चार शर्तों को उस वक्त किसी तरह पारित किया गया।
स्वतंत्र भारत मे डा0 अम्बेडकर को संविधान निमार्ण का काम दिया गया। जैसी कि उनसे उम्मीद थी उन्होंने जाति, धर्म और जिन्सीयत के सारे बन्धन तोड़कर सभी भारतीयों के लिये समता के अधिकार को प्राथमिकता दी। आज भारतीय संविधान अपने सभी नागरिकों को समान अधिकार की गारण्टी देता है। चाहे वह अम्बानी बन्धु हो या सड़क पर बैठे भीख मांग कर गुजारा करते या घरों के बर्तन माँजकर परिवार का पेट भरती लाखों जिन्दगियाँ। स्त्रियों के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव को तो कानूनी जुर्म माना गया।
चार साल बाद कानून मंत्री के रूप में डा0 अम्बेडकर ने एक बार फिर हिन्दु कोड बिल को संसद में रखा लेकिन उनकी तमाम कोशिशें बेकार हो गयी जब यह बिल भारी मतों से पराजित हो गया। हिन्दु कोड बिल का पराजित होना डा0 अम्बेडकर के लिये उनकी व्यक्तिगत पराजय थी वे स्त्री अधिकारों के प्रति इतने संवेदनशील थे कि उन्होंने 27 नवम्बर 1951 के दिन कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में इस बिल को कई टुकड़ों में पारित किया लेकिन 2006 में बने घरेलू हिंसा कानून ने आखिर उनके सपने को पूरा किया।

डा0 अम्बेडकर महिलाओं और दलितों की शिक्षा, प्रगति और जागरूकता के लिये जीवन भर संघर्ष करते रहे। उनके सभी सामाजिक आन्दोलनों में दलित स्त्रियाँ भारी संख्या में शामिल रही। चाहे वह पानी के सवाल पर महाड सत्याग्रह हो या मंदिर प्रवेश के लिये काला राम सत्याग्रह या 1942 में नागपुर मे आयोजित किया गया दलित महिला अधिवेशन जहाँ 25000 दलित महिला उपस्थित रही। इसी अधिवेशन में आठ महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये। जिसमें से एक भारतीय स्त्रियों के लिये तलाक का अधिकार शामिल था।
दलित स्त्रियों की स्थिति से संघर्ष डा0 अम्बेडकर के लिए एक महायुद्ध था जिससे वे एक योद्धा की तरह लड़े। उनका संघर्ष देश के उस तबके के लिए था जो सम्मान और न्याय के लिए सदियों से संघर्ष कर रहा था। डा0 अम्बेडकर को दलित और स्त्रियों के लिए हर उस स्थिति से लड़ना था जो उनके हालात के लिए जिम्मेदार थी। उन्होने समय-समय पर ऐसे कई आन्दोलन किए जिसने हिन्दु धर्म की जड़ें हिला दी। 25 दिसम्बर 1927 के दिन उन्होने महाड (महाराष्ट्र) में मनुस्मृति को जला दिया। वह हिन्दु धार्मिक-संविधान जो दलितों और स्त्रियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार था। उस वक्त यह ऐसा शाक-ट्रीटमेंट साबित हुआ जिससे हिन्दु धर्म की जड़ें हिल गई। भारतीय समाज को सोचने पर बाध्य कर दिया कि धर्म से भी विद्रोह किया जा सकता है। धर्म पत्थर पर लिखा फरमान नहीं है जिसे बदला नहीं जा सकता।
दलितों और स्त्रियों के लिए धार्मिक बेडि़यां टूटी, अन्ध विश्वास के उद्योग को भारी धक्का पहुँचा, शिक्षा और जागरूकता की शुरूवात हुई।
डा0 अम्बेडकर जानते थे कि वे जिस वर्ग के लिए संघर्ष कर रहे हैं वह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनैतिक सभी रूप में कमजोर है। उस स्थिति से लड़ना और जीतना कोई आसान काम नहीं। यह चौतरफा लडाई थी जिसमें एक ओर ताकतवर हिन्दु धर्म रक्षक भी थे। इस धर्म युद्ध की लम्बी चली लडाई में डा0 अम्बेडकर ने कई आंदोलन किए। मंदिर प्रवेश के मुद्दे पर उन्होने 1927-30 के बीच दलितों के साथ नासिक के काला राम मंदिर, पूने के पर्वती और अमरावती के अम्बादेवी मंदिर में प्रवेश किया जहाँ हिंसा का भी सामना करना पड़ा।
डा0 अम्बेडकर के लिये हिन्दुधर्म से टक्कर बेमानी थी लेकिन दलितों के स्वाभीमान के लिये यह जरूरी थ। 1929 मे येऊला के अधिवेशन मे यह प्रस्ताव पारित किया गया कि दलितों को हिन्दुधर्म में अत्याचार सहते रहने कि कोई आवश्यकता नही वे चाहे तो किसी भी धर्म में प्रवेश कर सकते है इसी के बाद 12 माहरो (दलित) ने हिन्दुधर्म त्यागकर इस्लाम को अपना लिया। इस घटना से हिन्दु पडि़तों के होश उड़ गये।
डा0 अम्बेडकर ने अपने अन्तिम दिनों तक अपने आन्दोलन को जिन्दा रखा। अपनी मृत्यु से महज दो महीने पहले उन्होने हिन्दु धर्म त्याग कर 14 अक्टूबर 1956 मे नागपुर की दीक्षा भूमि में लगभग 4 लाख दलितों के साथ बौद्ध धर्म को स्वीकार कर दिया। जिसे आज तक दुनिया का सबसे बडा धर्म परिवर्तन माना जाता है। बौद्ध धर्म में प्रवेश की प्रक्रिया आज भी भारत में जारी है।
स्वंतत्रता के 68 सालों बाद भारत मे सवर्ण स्त्रियों कि दशा में काफी बदलाव आया है लेकिन दलित स्त्रियाँ आज भी लगभग उसी स्थिति में है। आधुनिक स्त्रीवादी आन्दोलन भारत में 70 के दशक में आया लेकिन उसका नेतृत्व केवल सवर्ण महिलाओं के ही पास है जो उनके इर्द-गिर्द घूमता है। कुछ एक दलित स्त्रियों के मुद्दे जरूर इस आन्दोलन द्वारा भी लड़े गये जिसका फायदा उन्ही को पहुँचा जो नेतृत्व कर रहे थे उनको नही जो शोषण का शिकार हुये।
भारत में स्त्रियों के अधिकार और सम्मान के लिये सबसे ज्यादा फुले दम्पति और डा0 अम्बेडकर ने ही संघर्ष किया लेकिन महाराष्ट्र के स्त्रीवादी आन्दोलन को छोड़कर शेष भारत में तो उनका नाम भी किसी स्त्रीवादी आन्दोलन में नही लिया जाता। यह ब्राह्मणवादी मानसिकता जहाँ स्त्रीवादी आन्दोलन को सीमित कर रही वही दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का विस्तार कर रही है। दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का इतिहास हजारों साल पुराना है उन्हें लड़ना आता है इस अलगाववादी सोच से अततः किसका नुकसान होगा यह जाहिर बात है।
(साभार जनसत्ता।)

पत्रों में झांकता बच्चन का व्यक्तित्व

रविता कुमारी

हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in

व्यक्ति का अन्तर्बाह्य समायोजन ही व्यक्तित्व की परिभाषा है। जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके विशेष गुणों, रूचियों, कार्यों के आधार पर दूसरों से अलग करता है। डाॅ के. जी. कदम के अनुसार-“व्यक्तित्व का विभाजन-अन्तर्वर्ती पक्षों में इसलिए नही किया जा सकता है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्तित्व के बाह्य और आन्तरिक पक्ष की मन पर जो छाप समग्र रूप में पड़ती है, वह प्रायः अविभाज्य होती है। अतः किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उसके गुणों और महान कार्यों के आधार पर परखा जा सकता है।“1बच्चन का व्यक्तित्व बहुमुखी और विशाल है। बच्चन के व्यक्तित्व को उनके पत्रों के आधार पर आसानी से समझा जा सकता है, क्योंकि लेखक के पत्र उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होते है। उनके व्यक्तित्व में भावना और कर्म, स्वाभिमान और सेवा, विन्रमता और ओजस्विता, व्यक्ति और समाज, मानव और मांगल्य, प्राचीन और नवीन, जीवन और जगत की अनेकानेक भाव-धाराओं और चिन्तन प्रक्रियाओं का सुन्दर सामंजस्य दिखाई देता है। मानवीय भावभूमि और संवेदना की दृष्टि से उनका व्यक्तित्व राष्ट्रीय होकर भी अन्तर्राष्ट्रीय है। उनका व्यक्तित्व निर्मल, सारगर्भित और सामंजस्यवादी व्यक्तित्व है। जिसे उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र साथ उनके काव्य और गद्य में भी देखा जा सकता है।

 बच्चन ने डायरी साहित्य, पत्र-लेखन और आत्मकथा के माध्यम से जीवन जगत और साहित्य के बारे में जो टिप्पणियां की हैैं। उनमें साहित्य के प्रतिमान, जीवन का भाव बोध और समाज की मर्यादा निरूपित हुई है। साथ ही उनकी डायरी और आत्मकथाओं में व्यापक जीवन-दर्शन, जीवन सौन्दर्य की अभिव्यक्ति, सामाजिक जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा तथा मानवतावादी दृष्टिकोण भी अभिव्यंजित हुआ है। जिस प्रकार कहानी, उपन्यास, निबन्ध, संस्मरण, गद्यगीत आदि लिखना एक कला है, उसी प्रकार पत्र-लेखन भी एक कला है। लेखक का हृदय जितनी स्वाभाविकता के साथ उसके पत्रों में व्यक्त हो सकता है। उतनी स्वाभाविकता से अन्य किसी विधा में नहीं। बच्चन का कथन है-“किसी हालत में पत्र वह दर्पण तो है ही जिसमें किसी लेखक का सच्चा प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है।“2 सत्यतः निजी पत्रों में व्यक्ति अपनी बातें दिल खोलकर लिखता है और इस कारण किसी लेखक या कवि के चरित्र-चित्रण के लिए उसके पत्र अत्यन्त सहायक सिद्ध होते हैं। इस दृष्टि से बच्चन के पत्रों को पढ़ने पर उनमें बच्चन का व्यक्तित्व अपने सहज-प्रकृत-रूप में प्रकट हो गया है।

जीवन में आयी मुसीबतों, कठिनाईयों से परेशान होकरकिसी के सहारे की अपेक्षा करना मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस कारण वह अपने कार्य को कराने के लिए दूसरों का सहारा ढूंढने और इधर उधर हाथ मारने लगता है। किन्तु बच्चन ऐसा करना स्वयं को धोखा देना मानते है। वे बचपन से ही बड़े स्वालंबी रहें हैं।स्वालंबन उनके व्यक्तित्व का मूलकेन्द्र है। प्रफुल्ल ओझा ‘मुक्त‘ को 12.09.1939 के पत्र में उन्होंने माना है कि-“जीवन में जो काम अपने केवल अपने बल पर किया जाता है, वही सबसे अधिक सफल होता है।“3निराला की तरह ही बच्चन भी निर्भीकता के साथ जैसा अनुभव करते है, वैसा अपने पत्रों, आत्मकथाओं, डायरी, संस्मरण, कहानी सहित सम्पूर्ण साहित्य में व्यक्त कर देते हैैं। उन पर वासनावादी होने का आरोप लगाया गया तो वे बड़ी निर्भीकता के साथ मनोवैज्ञानिक रूप को स्वीकार कर लेते हैं-“कल छिड़ी, होगी खत्म कल/प्रेम की मेरी कहानी/कौन हूं मैं जो रहेगी/विश्व में मेरी निशानी/क्या किया मैंने नहीं जो/कर चुका संसार अब तक?“4 बच्चन का व्यक्तित्व जीवन की समग्र एवं संपूर्ण चेतनाओं, मानसिक क्षमताओं और व्यवहारों का संकलन है। डाॅ जीवन प्रकाश जोशी उनके विषय में ठीक ही लिखते हैं-“जग-जीवन से जूझने वाला और सैल्फमेड व्यक्तित्व कभी साधारण नही हुआ करता। उसमें एक सहज अक्खड़ता आ ही जाती है जो आलोचना की चीज नही घटाने की चीज है।“5

बच्चन का जीवन सदैव संघर्षमय रहा किन्तु जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में, आशा-निराशा के मध्य झूलते हुए भी उन्होंने रचनात्मक दिशा की ओर कार्य किया, क्योंकि इनका विश्वास है कि-“प्रतिकूल परिस्थितियों में काम कर लेना कोई साधारण क्षमता नही इस पर गर्व करना चाहिए।“6बच्चन जिस प्रकार सेे आजीवन आर्थिक आभावों से जूझते रहे, उस प्रकार ही वे अपने विकास के लिए भी निरन्तर संघर्षरत रहें हैं।विश्वनाथ प्रसाद बटुक को 10.01.1939 को प्रेषित पत्र में वे जीवन में आये संघर्षों से भागना नही बल्कि उनका डटकर सामना करने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं-“जीवन संघर्ष की जगह है। उसमें दृढ़ता से लगे रहना चाहिए। इस संघर्ष में अपने को भूल सको तो वही सुख है। सफलता नाम की किसी वस्तु से मेरा भी परिचय नही।“7बच्चन ने आत्म प्रवचनापूर्ण अनुभवों को अपने साहित्य में स्थान दिया है। उनका व्यक्तित्व सरल और सहज है। वे जीवन जगत के बाह्य आड़म्बरों से दूर रहना चाहते हैं। उनके जीवन में भी सामाजिक संघर्षों का योग है और विसंगतियों का भी, किन्तु उन्होंने सामाजिकता को भी इतने सहज और नरम आवरण के रूप में ओढ़ा है कि उनकी भीतर की अनुभूति पर दाग नही लगा। बच्चन मित्रों में रहते हैं। मित्रों के बीच में सुख और दुखों के क्षणों का भी बंटवारा करते हैं, किन्तु वे मित्रों की जिन्दगी और जीवन में दखलअंदाजी नही करते। यादवेन्द्र सिंह को लिखे 06.03.1936 का पत्र इस तथ्य का द्योतक है कि बच्चन यादवेन्द्र की प्रेयसी के समक्ष तटस्थ भाव से अपने को प्रस्तुत करते हंै। यही उनकी जीवन मर्यादा है और यही उनकी नैतिकता भी है। जब यादवेन्द्र सिंह बच्चन को ऊषा जी के पास भेजते हैं, तब बच्चन का तटस्थ भाव इन पंक्तियों में प्रस्फुटित होता है-“खर्चीली आदत तो उनकी जरूर है। मैं ही जब सोचता हूं तो मेरा ख्याल है, मेरी खातिर में एक दो रूपये तो उठ जाते होंगे मिठाई, नमकीन, फल और क्या-क्या लाकर सामने रख देती है। मैं कितनी बार समझा चुका हूं कि मेरे साथ इस थ्वतउंसपजल की क्या जरूरत, पर वह नही मानती खाना किसे बुरा लगता है?“8

बच्चन बड़े स्वाभिमानी प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य सेवा के लिए सम्मान भी मिला है, परन्तु वे कभी भी सम्मान के पीछे नही चले। वे प्रचार-प्रसिद्धि से दूर भागते थे। इसीलिए वे ऐसी चाजें लिखना पसंद नही करते, जिनमें उनकी विज्ञापनबाजी का बोध हो वे ऐसे विषय पर लिखना चाहते थे, जो जनता के कण्ठहार और मानवता के भूषण हो। उनका स्वाभिमान इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है-“दे मन का उपहार सभी को/ले चल मन का भार अकेले।“9बच्चन का जीवन के प्रति दृष्टिकोण बड़ा स्वस्थ रहा है। वे जीवन और जगत से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं लेकर नही चले, स्वाभिमान, कर्मठता और आत्मविश्वास का सम्बल लेकर चले। इसीलिए प्रतिकूल परिस्थितियों के थपेड़ों से वे हतोत्साहित नही हुए, उनके पुरूषार्थ ने हार नही मानी, आत्मश्रद्धा डगमगाई नही। क्योंकि उनका मानना है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हो प्रत्येक कार्य को निष्ठा और लगन के साथ करते रहना चाहिए। डाॅ जीवन प्रकाश जोशी को लिखे एक पत्र में वे इसी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-“जिस काम के लिए लगन हो वह हर प्ररिस्थितियों में किया जा सकता है। परिस्थितियां हम कहां बदल पाएंगें, अपने को ही बदलना पड़ेगा।“10बच्चन एक भावुक व्यक्ति थे, अतः संवेदनशीलता व सहृदयता उनके व्यक्तित्व का अनिवार्य अंग है। उन्होंने अपने पत्रों में संवेदना के प्रकाशन हेतु व्यापक जीवन दर्शन रेखांकित किया है। संवेदना केवल निराशा में ही नही होती या जीवन सदा एक आंसुओं की धार बना रहे, तभी संवेदना जगे, ऐसा नही है। उनकी अनुभूति संवेदना के गहरे अतल-तल को खोज निकालती है। वे किसी की भी पीड़ा से द्रवित हो उसे उस पीड़ा से उबारने का प्रयास करते हैं। इसी भावना के वशीभूत वे डाॅ जीवन प्रकाश जोशी को 13.09.1953 के पत्र में लिखते हैं-“जब तुमने अपनी चिंता का भागीदार मुझे बना लिया है तो मुझे भी कुछ प्रयत्न करने दो। जब तक तुम्हारी चिंताएं दूर न होगी मैं निश्चिन्त नही बैठा हूं।“11

बच्चन के मन की निष्कपटता सराहनीय है। जिस प्रकार लोग कृत्रिम आवरण ओढ़कर दिखाऊ व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं। व्यवहार की यही दिखाऊ शिष्टता न होने के कारण वे सामान्य लोगों में प्रिय नही है। यही बात उनके पत्रों में बड़े ही स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। बच्चन मन के बड़े निश्चल और निष्कपट वाले व्यक्ति हैं। उनका व्यक्तित्व अंतरंग की शिष्टता और आचरण की सभ्यता से पूर्ण है। उनमें एक तरह का परिष्कार है जो अन्यत्र मुश्किल से देखने को मिलता है। जो बड़ा साहित्यकार होता है वह बड़ा मनुष्य भी होता है-इसके साकार उदाहरण जीवन पर्यन्त रहें बच्चन। जो मन में वही जुबान पर, कोई मुखौटा नही, कोई आवरण नही। छोटे बड़े का भेदभाव नही। यदि कभी कोई कोंच भी दी तो मुस्कान के साथ यह बता दिया कि इसी से बात में धार और रोचकता आती है। विरोध उसे जीवंत बनाता है।इन्दु जैन को लिखे 28.01.1978 के पत्र में वे सरल उन्मुक्त और निश्छल हृदयगामी होने का परिचय मिलता है-“मुझे मालूम है कि तुम ‘बसेरे से दूर‘ को आलोचना की दृष्टि से पढ़ोगी क्योंकि शायद कभी तुम्हें मुझसे टी0 वी0 पर कुछ टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछने पड़े, तुम मुझे नर्वस करना चाहोगी! मैं जानता हूं तुम्हें।“12 सामान्यतः भावुक एवं संवेदनशील व्यक्ति जीवन में अपेक्षित व्यावहारिकता के निर्वाह में अक्षम रहते हैं, किन्तु बच्चन की संवेदनशीलता उनकी व्यावहारिकता की सीख देते हुए वे उदभ्रान्त को 30.07.1965 के पत्र में लिखते हैं-“‘राष्ट्रधर्म‘ में प्रकाशित मेरे संदेश पर आपने जो उदगार प्रकट किये हैं, उसके लिए आभारी हूं। मैं भावुकता के विरूध नही, लेकिन अब व्यावहारिकता पर अधिक जोर देना चाहता हूं।“13

बच्चन के पत्रों से ज्ञात होता है कि उनके व्यक्तित्व में अदभुत गतिशीलता है। वे सागर में जितने गहरे डूब जाना जितनी अच्छी तरह से जानते हैं, उतना ही ऊपर उठकर लहरों पर तैरना भी। यह विशेषता यदि उनमें न होती तो जीवन में आये संघर्षों के बवंड़रों से हारकर वे जीवन के किसी भी मोड़ पर पीछे रह जाते।बच्चन के व्यक्तित्व में गतिशीलता के साथ-साथ दृढ़ता भी मौजूद है। वे किसी एक सूत्र में बंधकर नही रहें। उनमें गजब की सृजन शक्ति थी। बच्चन परम आस्तिकतावादी भी है। परम आस्तिक और आस्थावान उनका चेहरा पत्रों के आइने से झांक रहा है। ईश्वर की सत्ता में मनुष्य का अविश्वास जब नास्तिकता की चरम सीमा तक पहुंच जाता है कि उसकी नास्तिकता ईश्वर के प्रति आस्था में बदल जाती है। बच्चन श्रीराम के साथ-साथ हनुमान जी के भी उपासक एवं परम भक्त हैं। हनुमान के विषय में उनका मत है-“वे इच्छाशक्ति के देवता हैं, जो संकल्प कर लेते हैं, उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। तुलसीदास ने उनके लिए ‘विनय-पत्रिका‘ में ‘हठीले‘ शब्द का प्रयोग किया है-‘ऐसी न कीजिए हनुमान हठीले‘“14बच्चन एक कृतज्ञ एवं विवकेशील व्यक्तित्व है। कृतज्ञता उनके व्यक्तित्व की प्रबल प्रवृत्ति है। अपनी इसी प्रवृत्ति के सम्बन्ध में वे लिखते हैं-“एक शब्द में आप मेरी सबसे प्रबल प्रवृत्ति पूछना चाहें तो मैं बड़ी विनम्रता से कहूंगा-कृतज्ञता, एक बहुतव्यापक अर्थ में।“15 इसी प्रवृत्ति की प्रबलता के कारण वे अपने मित्रों, परिचितों, शुभेच्छुओंके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं।

बहुत कम लोग होते हैं जो दूरदर्शी होते हैं। बच्चन ऐसी ही दृष्टि के धनी थे। कोई भी संभावनाशील व्यक्ति उनकी दृष्टि से बचकर नही रह सकता था। ‘आओ मर जायें‘ लिखने वाले बच्चन पत्रों में एक आशावादी व्यक्तित्व दिखलाई पड़ते हैं। ऐसा आशावादी व्यक्ति जो सदैव अपने कार्य व संघर्ष से निराशाओं को सदैव आशाओं में परिवर्तित करता रहा और वही आशा वे अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से भी करते हैं।बच्चन मानते हैं कि मनुष्य को जीवन में निराशा को कभी स्थान नही देना चाहिए। बल्कि भविष्य के प्रति आशावादी होना चाहिए। 23.06.1965 को प्रेषित पत्र में वे उदभ्रांत को निराशा को छोड़कर जीवन में आशावादी बनने के लिए प्रेरित करते हुए लिखते हैं-“निराशा कोे जीवन में स्थान न दें। अगर आप कुछ नही हैं तो कुछ बनने के लिए संघर्ष करें। खाली मत बैठे। अच्छे लोगों के साथ रहें। बहुत श्रम साधना के पश्चात् ही मनुष्य को थोड़ी सी उपलब्धि होती है।“16 समाज की जटिल परंपराओं और रूढ़ियों में न बंधकर रहने वाले व्यक्ति हैं बच्चन। उन्होंने प्राचीन परम्पराओं को तोड़ते हुए विजातीय, विधर्मी और विभाषी तेजी से विवाह कर यह बता दिया था कि वे समाज की प्राचीन रूढ़ियों, परंपराओं में विश्वाास नही करते। उन्हें हिन्दू-समाज का सारा ढ़ांचा रूग्ण, सड़ा-गला, दुर्गन्धित प्रतीत होता था। हिन्दू समाज में हो रहें छुआछूत के भेदभाव को वे स्वीकार नही करते थे-‘मानव का मानव से लेकिन अलग न अन्तर प्राण‘। शारीरिक रूप से कमजोर व मजबूर लागों के लिए भी उनके मन में श्रद्धा एवं सेवा का भाव है। विकलांगों के लिए उनकी सहानुभूति उदभ्रांत को प्रेषित पत्र में वे लिखते हैं-“विकलांगों के प्रति के प्रति करूणा की भावना रखनी चाहिए। विज्ञान ने आज बहुत से साधन संभवकर दिये हैं कि विकलांग समाजोपयोगी कार्य करके अपनी जीविका कमा सकें और स्वाभिमान से रह सकें। समाज विकलांगों की समस्याओं का यथासंभव निराकरण करके उनकी कुंठाएं कम कर सकता है। शासन-समाज दानों विकलांगों की कुठाओं से उपर उठने में सहायता कर सकते हैं-उन्हें शिक्षित करके, उनके अनुरूप काम सीखा करके, उनके अनुरूप काम दे कर के।“17



बच्चन ने अपने ऊपर आये हर दायित्व को बड़ी निष्ठा एवं ईमानदारी से पूर्ण किया है। पत्रों के आधार पर वात्सल्य की प्रतिमूर्ति उनके व्यक्तित्व की एक अनूठी विशेषता है। जिसके माध्यम से उनकी देश-प्रेम, मानव-प्रेम, विश्व-प्रेम की भावना सदा प्रवाहित होती रही है।बच्चन हिन्दी के काव्यशास्त्र, अलंकार शास्त्र, छन्द, भाषा-शास्त्र, रसादि के साथ-साथ अंग्रेजी के मर्मज्ञ तो हैं ही साथ ही और कई विषयों के भी ज्ञाता हैं।हर विषय में वे अपनी दखल रखते हैं। वे इतिहास, भूगोल, पुराण, धर्मशास्त्र, संस्कृति के मर्मज्ञ हैं। बच्चन इन विषयों के अध्ययनकर्ताओं का मार्गदर्शन भी करते हैं। उनका प्रिय विषय अध्यात्मिकता है। हिन्दी और अंग्रेजी के साहित्यकारों के अतिरिक्त उन्होंने संसार के देशों की अनेक भाषाओं के साहित्य को भी पढ़ा है। बच्चन की ज्ञानार्जन की जिज्ञासा ही उनकी बहुज्ञता का प्रमाण है। बच्चन के पत्र उनके व्यक्तित्व के आन्तरिक पक्ष की विशेषताओं को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करते चलते हैं।

निःसन्देह ही बच्चन के पत्र स्वाभाविकता व आत्मीयता से पूर्ण होने के साथ-साथ स्पष्टता के गुुणों का भी निर्वाह करते हैं। उन्हें जो कुछ कहना होता है उसे दो टूक शैली में कहते हैं। फिर चाहे किसी को बुरा लगे या भला। पत्रों की इन्हीं विशेषताओं से बच्चन के व्यक्त्वि की अनेक विशेषताओं-स्वाभिमानी, समाजसेवी, कर्मठ, आशावादी, संवेदनशीलता, विनम्रता आदि का परिचय मिलता है।


संदर्भ सूची
1.-कवि श्री बच्चनः व्यक्ति और दर्शन, डाॅ. के0 जी0 कदम, पृ0-40
2.- पाती फिर आई, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-36
3.- लोकप्रिय बच्चन, प्रो0 दीनानाथ शरण, पृ0-38
4.- दो चट्टानें, डाॅ. हरिवंशराय बच्चन, पृ0-193
5.- बच्चनः व्यक्ति और कवित्व, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-10
6.-बच्चनः पत्रों में, डाॅ जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-61
7.- बच्चन रचनावली भाग-9, अजित कुमार, पृ0-320
8.-वही, पृ0-320-321
9.-बच्चनः निकष पर, रमेश गुप्ता, पृ0-242
10.-बच्चनः पत्रों में, डाॅ. जीवन प्रकाश जोशी, पृ0-63
11.-वही, पृ0-36
12.- बच्चन रचनावली भाग-9, अजित कुमार, पृ0-86
13.-पत्र ही नही बच्चन मित्र है, उदभ्रांत, पृ0-75
14.- कविवर बच्चन के साथ, अजित कुमार, पृ0-75
15.-नीड़ का निर्माण फिर, डाॅ हरिवंशराय बच्चन, पृ0-198
16.- पत्र ही नही बच्चन मित्र है, उदभ्रांत, पृ0-71
17.- वही, पृ0-199

स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com 

दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक ‘दलित स्त्रीवाद ‘ में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है. बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी के प्रसिद्द आलोचक हैं।  दलित मुद्दों पर इनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर है और यही इनके आलोचकीय व्यक्तिव की खासियत भी है। इनसे इनके मोबाइल न .९८६८२६१८९५ पर संपर्क किया जा सकता है .

भारतीय भाषाओं में दलित स्त्री लेखन को रूपाकार लिए हुए दो दशक से ज्यादा गुजर चुके हैं। यह पूरा दौर दलित स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं, रचनाकारों के लिए कठिन संघर्षों का रहा है। सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने वाले तमाम संगठनों,मंचों और समूहों तक अपनी बात पहुँचाने, उन बातों की गम्भीरता का अहसास कराने और उनकी कार्यसूची में मुमकिन हद तक अपने मुद्दों को जगह दिला सकने में उन्हें जटिल दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। जाति-व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले दलित संगठनों ने जहाँ इस मुहिम को थोडे शक की नज़र से देखते हुए दरकिनार करने की कोशिश की वहीं स्त्रीवादी संगठनों ने जाति और पितृसत्ता के गठजोड़ को तवज्जो देने लायक नहीं समझा। यह जुझारू दलित स्त्रियों और उनके समर्थकों की सतत और पुरजोर पैरोकारी का नतीजा था कि स्त्री आन्दोलन के चौथे राष्ट्रीय अधिवेशन में जाति आधारित यौन-हिंसा और दलित स्त्री के प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह अधिवेशन 1990 में कालिकट में आयोजित हुआ था। (1), यह सिलसिला बाद के अधिवेशनों में सघनतर होता गया। जाति के प्रश्न के साथ आदिवासी स्त्रियों का सवाल भी तिरूपति (1994) के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल हुआ। कोलकाता का 2006 में हुआ अधिवेशन भी उल्लेखनीय रहा। 2, जेण्डर को जाति से जोड़कर देखने-समझने की अकादमिक गतिविधि क्रमश: गति पकड़ती गयी। बेला मलिक ने अपने निबंध ‘अनटचेबिलिटी एंड दलित वीमेंस ऑप्रेशन’ में 20 दिसम्बर, 1998 को दिल्ली में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस असोसिएशन (ए आई डी डब्ल्यू ए) द्वारा अस्पृश्यता और दलित महिला के उत्पीड़न पर आयोजित सम्मेलन को खासा महत्व देते हुए लिखा है कि इस सम्मेलन ने जातिउत्पीड़न तथा पितृसत्तात्मक शोषण की जुगल-बंदी की ओर ध्यान दिलाया। 3, इस सम्मेलन में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की हजारेक दलित महिलाओं ने हिस्सा लिया था। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आयी इन समाजकर्मी महिलाओं ने दलित स्त्री की जिंदगी की वास्तविकता से रूबरू कराया और अपने अनुभवों तथा संघर्षों को बेलाग तरीके से प्रकट किया। इन दलित स्त्रियों में कुछ राजनैतिक रूप से सक्रिय थीं, कुछकृषिमजदूर थीं, कुछ भवन-निर्माण में दैनिक मजदूरी या ठेकेदार के अन्तर्गत काम करती थीं।

बेला मलिक के अनुसार उक्त सम्मेलन ने यह तथ्य रेखांकित किया कि वैसे तो पूरा दलित समुदाय उत्पीड़ित किया जाता है लेकिन उत्पीड़न का अधिकांश दलित स्त्रियों के हिस्से में पड़ता है। घर में भीतर का श्रम विभाजन जोड़दें और पेय जल तक पहुँच, जलावन तथा शौचादि समस्याओं को ध्यान में रखें तो दलित स्त्रियों की बदतर स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। अवमानना व हिंसा की घटनाएं दलित स्त्रियों के साथ सर्वाधिक घटती हैं। उनके उत्पीड़न में ऊंची जाति की स्त्रियों की भागीदारी अक्सर दिखाई पड़ती हैं। (4), दलित महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की प्रकृति को देखते हुए बेला सुझाव देती हैं कि उनकी बेहतर जिंदगी के लिए किए जाने वाले संघर्ष को व्यापक सामजिक मुक्ति के अजेंडा से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। (5), संगठनों का निर्माण पर्याप्त नहीं, मजबूत और सक्रिय प्रतिरोध अपेक्षित है। सतत संघर्ष के बगैर परिवर्तन की संभावना नहीं बनती।

शार्मिला रेगे सामान्य नारीवादी संगठनों के महत्व को नहीं नकारतीं लेकिन दलित स्त्रियों के प्रश्न पर दलित स्त्री संगठनों का होना आवश्यक मानती हैं। (6), उन्होंने उचित ही इस बिडंवना की ओर ध्यान खींचा है कि दलितवाद पुरूषीकरण तथा स्त्रीवाद सवर्णीकरण के आशय तक सिमट गया है। उनके अजेंडें में दलित स्त्रियों को जगह न मिलने के कारण ही इस आशय की निर्मिति हुई है। 1971 में बने दलित पैंथर में भी दलित स्त्रियों की, उनसे सम्बद्ध मुद्दों की अनुपस्थिति रही। शार्मिला रेगे के मत से वाम झुकाव वाले नारीवादी संगठनों ने जाति को वर्ग में विलीन कर दिया तथा स्वायत्त स्त्री समूहों ने उसे भगिनीवाद में। दोनो ने ही ब्राह्मणवाद को चुनौती नहीं दी। (7), ऐसा नहीं है कि इस (नारीवादी) आन्दोलन ने दलित, आदिवासी तथा अल्पसंख्यक समुदायों की स्त्रियों के मुद्दों को उठाया ही न हो। यह मुद्दे उठे ज़रूर और कुछ ठोस उपलब्धियां भी रहीं मगर इन स्त्रियों को केंद्र में रखने वाली नारीवादी राजनीति उभर नहीं सकी। (8), दलित स्त्री की पहचान वाले स्वतंत्र और स्वायत्त संगठन 1990 के बाद बने। अखिल भारतीय स्तर पर बनने वाले संगठनों में ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेन’ तथा ‘आल इंडिया दलित वीमेंस फोरम’ (1994) उल्लेखनीय है। ‘महाराष्ट्र दलित महिला संघठना’ की स्थापना 1995 में की गई। इसी प्रदेश के चंद्रपुर में 1996 में ‘विकास वंचित दलित महिला परिषद’ का गठन हुआ। इस संगठन ने मांग की कि 25 दिसंबर को ‘भारतीय स्त्री मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया जाए। 1927 मे इसी तारीख को डॉ.अम्बेडकर ने मनुस्मृति दहन किया था। (9),

दलित स्त्रीवाद की वैचारिकी के निर्माण के संदर्भ में गोपाल गुरू के लेख ‘दलित वीमेन टॉक डिफरेंटली’ की चर्चा की जाती है। यह लेख  ‘इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के अक्टूबर 14-21,1995 अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख की पृष्ठभूमि में दो तात्कालिक घटनाएं थीं- नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेन (एन एफ डी डब्ल्यू) का निर्माण तथा बीजिंग सम्मेलन में दलित महिलाओं की भिन्न समूह के रूप में भागीदारी। दलित महिलाओं की ‘बात की भिन्नता’ को रेखांकित और स्थापित करना इस लेख में गोपाल गुरू का मकसद है। इसके लिए वे दो कारकों की चर्चा करते हैं- बाहरी कारक तथा भीतरी कारक। बाहरी कारकों में वे उन  ‘गैर दलित ताकतों’ का हवाला देते हैं जो ‘दलित स्त्री के मुद्दे का समरूपीकरण’ कर रही हैं। भीतरी कारकों में  ‘दलितों के बीच पितृसत्तात्मक प्रभुत्व’ का होना है। सत्य के अवबोधन में सामाजिक अवस्थिति को गोपाल गुरू निर्णायक मानते हैं। उनका कहना है कि इसी तर्क से ग़ैर दलित स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों के मुद्दों का प्रतिनिधित्व ‘कम वैध और कम प्रामाणिक’ ठहरता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि दलित स्त्री कार्यकर्ताओं के इस दावे का अर्थ नारीवाद की प्रायोगिक बहुलता का उत्सव नहीं है। दलित स्त्रियों ने महाराष्ट्र में नए किसान आन्दोलन के शुरूआती दौर में नारीवादी रेडिकल राजनीति का समर्थन किया था। यह समर्थन जारी नहीं रह पाया क्योंकि किसान संगठनों की ऊंची आवाज़ में दलित आवाज़ दब गयी। दूसरे, किसान आन्दोलन समृद्ध किसानों के पक्ष में चला गया और दलित कृषि मजदूरों के हित भुला दिए गए। गोपाल गुरू जोर देकर कहते है’ कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर स्त्री मात्र की एकता (सॉलिडरिटी) का दावा ऊँची जाति और दलित महिलाओं के बीच मौजूद अन्तर्विरोधों पर लीपापोती कर देता है।दलित स्त्रियों ने इसीलिए गैर दलित स्त्रियों के लेखन अथवा भाषण में अपने यदा-कदा उल्लेख (गेस्ट अपीरेंस) का विरोध किया और अपनी शर्तों पर खुद को संगठित किया। गैर दलित स्त्रियों द्वारा विकसित नारीवादी सिद्धांत उनकी समझ से अप्रामाणिक हैं क्योंकि वे दलित स्त्री के यथार्थ को नहीं समेटते। इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति एन एफ डी डब्ल्यू द्वारा स्वीकृत बारह सूत्री अजेंडे में तथा मई 1995 में पुणे में संपन्न महाराष्ट्र दलित वीमेंस कॉनफरेंस में पढ़े गए तमाम पर्चों में देखी जा सकती है। गोपाल गुरू बताते हैं कि दलित स्त्रियों ने दलितपन की व्याख्या कड़ाई के साथ जाति के संदर्भ में की और ग़ैर दलित स्त्रियों द्वारा खुद को दलित मान लिए जाने के दावे को नकार दिया।

आंतरिक कारणों का विश्लेषण करते हुए गोपाल गुरू का कहना है कि उत्तर अम्बेडकर काल में दलित नेताओं ने हमेशा दलित स्त्रियों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्तियों को गौण समझा है और कई बार उनका दमन किया है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी दलित पुरूषों का दबदबा कायम रहा है। साहित्य की दुनिया में दलित लेखकों के एकाधिकार की दलित लेखिकाओं ने आलोचना की है। गोपाल गुरू सूचित करते हैं कि दलित लेखक दलित स्त्री रचनाकारों की कृतियों को गंभीरता से नहीं लेते। उनकी प्रवृति इन लेखिकाओं की उपलब्धियों को खारिज करने की होती है। अपने विश्लेषण को सूत्रबद्ध करते हुए गोपाल गुरू तीन निष्कर्ष देते हैं- क) जाति और वर्ग की पहचान के साथ लैंगिक पहचान भी किसी परिघटना में समान भूमिका अदा करती हैं; ख) दलित पुरूष उसी मेकनिज़्म का पुनउत्पादन कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल सवर्णों ने उन्हें दबाने के लिए किया था; ग) दलित स्त्रियों का अनुभव बताता है दलित(दायरे) के भीतर का स्थानीय प्रतिरोध कम महत्वपूर्ण नहीं है। कुल मिलाकर, जो स्थिति बनती है उसमें यह मानने को बाध्य होना पड़ता है कि दलित स्त्रियों की भिन्न बात का दावा सही है। अपनी तरफ से यह साबित करने के बाद कि दलित स्त्री ही दलित स्त्री समुदाय का वैध और प्रामाणिक प्रतिनिधित्व कर सकती है गोपाल गुरू यह चेतावनी भी जोड़ते हैं कि भिन्नता दलित स्त्रियों में भी है। शिक्षा, नौकरी और संगठन में महाराष्ट्र की दलित स्त्रियां जितनी आगे है कर्नाटक की नहीं। तब प्रतिनिधित्व का पेंच उलझ जाता है। लेखक ने समाधान के तौर पर इस सुझाव पर अपनी सहमति दी है कि दलित स्त्री आंदोलन को ग्रासरूट स्तर की दलित स्त्रियों से जुड़ना चाहिए। उन्होंने दलित स्त्रियों को इसके प्रति भी सावधान किया है कि उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को स्पेस मुहैया कराने के क्रम में राज्य द्वारा उनका सहयोजन किया जा सकता है। इस आशंका के साथ ही उन्होंने दलित स्त्रियों की राजनीतिक समझ पर भरोसा भी किया है। सबूत के तौर पर उन्होंने भारत सरकार द्वारा निजीकरण और वैश्वीकरण वाली नयी आर्थिक नीति थोपे जाने की एन एफ डी डब्ल्यू द्वारा संघर्ष छेड़ने के संकल्प का उल्लेख किया है।(10),

गोपाल गुरू के उक्त लेख पर बहस चली। इस बहस में प्रमुख नाम शार्मिला रेगे का उभरा। रेगे ने मोटे तौर पर लेख की स्थापनाओं पर अपनी सहमति व्यक्त की, लेकिन, उन्होंने ‘प्रामाणिकता’ पर आत्यंतिक बल दिए जाने को उचित नहीं पाया। उनके अनुसार हाशिए के लोगों के आंदोलन में आवाजाहीपर रोक नहीं लगनी चाहिए। अपने-अपने संघर्षों तक महदूद रहने के बजाए इन संघर्षों से अर्जित अनुभवों का, विचारों का साझा करना संघर्ष को आगे ले जाने में सहायक होता है। दलितेतर नारीवादी दलित स्त्रियों ‘की तरह’ या दलित स्त्रियों ‘के लिए’ भले ही न बोल सकती हों लेकिन वे दलित नारीवादी की तरह अपनी ‘पुनर्खोज’ तो कर ही सकती हैं। इस तरह की छूट प्रत्यक्ष अनुभवजन्य ‘प्रामाणिकता’ की संकरी गली से बचाती है तथा ‘अस्मितावादी राजनीति’ की संकीर्णता को भी परे ढकेलती है। (11), अस्मितावादी दृष्टि की आलोचना करते हुए महाराष्ट्र की ही चर्चित नारीवादी चिंतक छायादातार ने कहा कि ‘भिन्नता’ और ‘आइडेंटिटी’ पर केन्द्रित हो जाने से आर्थिक शोषण और बाजार की जकड़बंदी की उपेक्षा होती है। स्त्रियों को अधिकार वंचित करने वाली स्थितियों का जन्म यहीं होता है। छाया दातार ने यह भी कहा कि अगर नारीवादी आंदोलन के इतिहास का पुनरावलोकन किया जाए तो मालूम होगा कि पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष में कई मोड़ ऐसे भी आए हैं जब जाति प्रभुत्व के खिलाफ मोर्चा खुला है।  ‘मथुरा रेप केस’ मामला इसका उदाहरण है। दलित पैंथर के साथ भी नारीवादियों ने सहयोग किया है।(12)

दलित आंदोलन में दलित स्त्रियों की भूमिका का पहले-पहल सशक्त रेखांकन मीनाक्षीमून और उर्मिला पवार ने किया। 1989 में प्रकाशित ‘हमने भी इतिहास बनाया’ में इन दोनों आदोंलनधर्मी लेखिकाओं ने डॉं. अम्बेडकर के सामाजिक अभियानोंमें दलित स्त्रियों की भागीदारी का वृतांत लिखा है। दलितस्त्री कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी इसी दौर में निर्मित हुई। परिवार, समाज और राजनीति में व्याप्त पुरूष वर्चस्व से लड़कर परिवर्तन के ऐतिहासिक दस्तावेज में अपना हस्ताक्षर करने वाली दलित स्त्रियों की पहली पीढ़ी का परवर्ती आंदोलन ने लाभ नहीं उठाया। किसी दलित स्त्री का नाम न तो पैंथर के, न ही रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेतृत्वकारियों की सूची में दिखाई पड़ता है। इसकी वजह जानने में बहुत मशक्कत करने की ज़रूरत नहीं। गोपाल गुरू ने पूर्वोद्धत लेख में दलित नेताओं की पितृसत्तात्मक सोच का स्पष्ट जिक्र किया है।

बेबी कांबले मुख्यत: सामाजिक कार्यकर्ता रहीं। आन्दोलनों में शिरकत करते हुए उनके व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। उनकी जुझारू शख्सियत की अभिव्यक्ति उनके आत्मकथन ‘जिण आमुच (जीवन हमारा) में हुई है। यह आत्मकथन धारावाहिक रूप में सन् 1982 में छपा और पुस्तक रूप में 1086 में आया। भारत में किसी दलित लेखिका का यह संभवत: पहला आत्मकथन है । इसमें बेबी कांबले ने अपनी जिंदगी से ज्यादा दलित समुदाय में हो रही उथल-पुथल का चित्रण किया है। उत्तर अम्बेडकरकालीन दलित राजनीति में घुस आई निजी महत्वाकांक्षाओं को निशाने पर लेते हुए लेखिका ने नेताओं के स्वभाव पर तल्ख टिप्पणियाँ की हैं। इस आत्मकथा के अंग्रेजी अनुवाद में लिखे ‘आफ्टरवर्ड’ मे गोपाल गुरू ने लिखा है-‘ दलित स्त्रियों की आत्मकथाएं एक तरफ राज्य के शोषण का प्रतिरोध करती है तो दूसरी तरफ बाज़ार का। उनका लेखन ‘दलित पब्लिक स्फीयर’- साहित्यिक सभाओं, अकादमिक संगोष्ठियों, प्रकाशन केन्द्रों और पहचान दिलाने वाले अन्य क्षेत्रों मसलन राजनीतिक पार्टियों से बाहर रखे जाने के खिलाफ बयान हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं में उनका उल्लेख चलताऊ ढंग से किया जाता है। (13), सार्वजनिक गतिविधियों-रैलियों धरने-प्रदर्शनों में बेबी कांबले की भागीदारी को ध्यान में रखकर गोपाल गुरू टिप्पणी करते हैं कि दलित स्त्रियाँ घरेलू से सार्वजनिक क्षेत्रों में निर्बाध आवाजाही करती हैं (‘दे फ्लो फ्रीली फ्रॉम द डोमेस्टिक टू द पब्लिक स्फीयर्स’) (14), यह बात जितनी आसानी से कह दी गई है वस्तुस्थिति वैसी है नहीं। हाँ, यह अवश्य है कि बेबी कांबले ने आत्मकथा में अपनी पारिवारिक स्थिति-पति-पत्नी के रिश्तों पर कुछ खास नहीं लिखा है। गोपाल गुरू की उक्त धारणा के निर्माण में इसी खामोशी की भूमिका है। अंग्रेजी अनुवादिका को यह खामोशी खटकी होगी। तभी उन्होंने बेबी कांबले का इण्टरव्यु लेते हुए उनकी अंतरंग जिंदगी पर प्रश्न पूछे। यह इण्टरव्यु आत्मकथा के आखीर में अंग्रेजी अनुवाद में दे दिया गया। इसमें बेबी कांबले ने बताया है कि उनकी जिंदगी अन्य दलित औरतों की जिंदगी से बहुत भिन्न नहीं रही। “इन दिनों पत्नियों की पिटाई सामान्य बात थी। पत्नी की निष्ठा पर शक किया जाता था और मैं भी कोई अपवाद नहीं थी। एक बार हम (मैं और पति) एक बैठक में हिस्सा लेने मुंबई गए। हमने सामान्य डिब्बे में यात्रा की। डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। कुछ युवाओं ने मुझे देख क्या लिया कि मेरे पति ने तत्काल मुझ पर शक किया। उन्होंने मुझे इतने जोर से मारा कि मेरी नाक से खून का फौव्वारा फूट पड़ा। भला बताओं कोई किसी को घूरने से कैसे रोक सकता है। लेकिन, यह सब कहने का कोई फायदा नहीं था। हम प्रोग्राम में भी नहीं रूके। उसी शाम को लौट आए। उनका क्रोध ऐसा था कि लौटती बेर ट्रेन में पूरे रास्ते मुझे पीटते रहे।(15), इस प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए प्रश्नकर्ता ने जब अगला सवाल किया तो बेबी कांबले का जवाब था- ‘वे (पति) मुझे बेहद मामूली कारणों पर पीटते थे। बड़े शक्की थे। अपने को निर्दोष साबित करना मेरे लिए बहुत कठिन था। मैं रोती  थी, गिड़गिड़ाती थी, मनाती थी। कभी माहौल हफ्ते भर सामान्य रहा तो बहुत गनीमत थी। शक फिर से अपना सिर उठा लेता था। मुझे फिर यातना की उस चक्की से गुजरना पड़ता था। ज्यादातर औरतों की जिंदगी ऐसी ही थी। …एक मर्द छोड़ दूसरी से शादी करना समस्या का हल नहीं था। हर मर्द में वहीं “पति” मिलता था। इसलिए मैंने तय किया कि दूसरा घर नहीं करूंगी। (16), ‘आत्मकथा’ में इन अनुभवों को क्यों नहीं लिखा? इस प्रश्न पर बेबी कांबले का कहना था कि ‘मैंने व्यक्तिगत पीड़ा के बदले समुदाय की व्यथा को तरजीह दी। फिर अधिकांश औरतों पर जब ऐसी ही हिंसा की जाती थी तो मैं उनसे अलग कहाँ थी?’(17), प्रस्तुत प्रसंग को थोड़े विस्तार से उद्धृत करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि गोपाल गुरू के कथन का समुचित संदर्भ सामने रहे। उस कथन का प्रत्याख्यान भी हो सके। आत्मकथा के हिन्दी या मराठी संस्करणों में चूंकि यह साक्षात्कार नहीं है,इसलिए संभव है कुछ लोग लेखिका की जिंदगी के इस पक्ष से वाकिफ न हों। इस आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद वैसे भी थोड़ा संदिग्ध लगता है। किसी समर्थ अनुवादिका/अनुवादक को यह काम अपने हाथ में लेना चाहिए।

बेबी कांबले ने खुद को अम्बेडकरी आन्दोलन का उत्पाद कहा है। ऐसी तमाम दलित स्त्रियों ने अनगिनत खतरे उठाकर इस आन्दोलन में भागीदारी की, उसे आगे बढ़ाया। यह बिडम्बना ही कही जाएगी कि आन्दोलन दलित स्त्रियों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं हो पाया। आन्दोलन की कार्यसूची में दलित स्त्रियों के अपने मुद्दे उच्च प्राथमिकता पाने से वंचित रहे।

तमिलनाडु में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका गैब्रियल डीट्रिख ने अपने एक लेख में दलित आन्दोलन और महिला आन्दोलन के अंतस्संबंध को समझाने के क्रम में कई घटनाओं काउल्लेख किया है। इसमें दो-एक का जिक्र यहाँ बानगी के तौर पर किया जा सकता है। पहली घटना दलित बहुल जिला उत्तरी आरकोट के अरक्कोणम की है। परैयार जाति के भूमिहीन कृषि मजदूरों के बीच काम करने वाले यहाँ तीन महत्वपूर्ण संगठन हैं-अम्बेडकर मंत्रम्, रूरल वीमेंस लिब्रेशन मूवमेंट (आर डब्ल्यू एल एम) और भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (एल एल एम) मजदूरी, बिजली,पानी और ज़मीन जैसे मुद्दे आर डब्ल्यूएल एम और एल एल एम उठाते हैं और अक्सर मिलकर काम करते हैं। लेकिन कुछ स्थानीय मुद्दों तथा अम्बेडकर जयंती जैसे समारोहों को वे अम्बेडकर मंत्रम्  से जुड़कर मनाते हैं। 20 अप्रैल 1990 को यहाँ कला नामक पचीस वर्षीया युवती ने ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे दी। कला तीन बच्चों की माँ थी। सूचना मिलने पर आर डब्ल्यू एल एम के कार्यकर्ता कला के माता-पिता से मिले। बेटी की लाश दिखाने के लिए उन्हें अस्पताल भी ले गए। प्रारंभिक खोजबीन से उन्हें पता चला कि कला के पति के विवाहेतर संबंध थे और वह अपनी पत्नी को लगातार उत्पीड़ित कर रहा था। कला के माँ-बाप इस घटना की गवाही देने को तैयार थे। चूंकि परिवार दलित (परैयार) था इसलिए अम्बेडकर मंत्रम् के कार्यकर्ता भी अस्पताल पहुँचे। ग्राम प्रधान पेशे से वकील और अम्बेडकर मंत्रम् का कानूनी सलाहकार था। उसने कला के माँ-पिता पर दबाव डाला कि वे बयान दें कि कला बहरी थी और मानसिक रोगी तथा उसकी मृत्यु के लिए कोई अन्य जिम्मेदार नहीं है। पोस्टमार्टम की रिर्पोट  बेनतीजा रहीं । आर डब्ल्यू एल एम चाहता था कि आत्महत्या के लिए उकसाने वाला केस दर्ज हो। अम्बेडकर मंत्रम् पति के पक्ष में था। प्रधान पर दबाव डालकर पंचायत बुलायी गयी। पंचायत ने कला के पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अम्बेडकर मंत्रम् के सहयोग से लाश का अंतिम संस्कार कर दिया गया। आर डब्ल्यू एल एम ने इसकी सार्वजनिक भर्त्सना की। अम्बेडकर मंत्रम् तथा ग्राम प्रधान ने आर डब्ल्यू एल एम के घेराव के विरोध में मार्च निकाला और दबाव बनाया कि आर डब्ल्यू एल एम इस केस से हट जाए। आर डब्ल्यू एल एम का तर्क था कि दलित उत्पीड़न पर सक्रिय होने वाला अम्बेडकर मंत्रम् एक दलित स्त्री को पति द्वारा आत्महत्या पर मजबूर किए जाने के सिर्फ अनदेखा ही नहीं कर रहा है, वह आरोपी की हर तरह से सहायता भी कर रहा है। आखिरकार कला की आत्महत्या का मुकद्दमा चल नहीं पाया।

दूसरी घटना भी इसी जिले की है। श्रीलंका से आए एक परिवार की तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार हुआ। बलात्कारी पड़ोसी दलित युवक था। घटना 7 जुलाई 1990 की है। बच्ची के परिवार के पास बलात्कार के ठोस साक्ष्य थे, फिर भी पीड़िता का मेडिकल परीक्षण नहीं हो सका। अम्बेडकर मंत्रम् ने आनन-फानन में पंचायत बुलायी और आरोपी पर ढाई सौ रूपये का जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा करना चाहा। आर डब्ल्यू एल एम ने जब आरोपी को तलब किया तो अम्बेडकर मंत्रम् के कार्यकर्ताओं ने बलात्कारी का साथ देते हुए आर डब्ल्यू एल एम को यह केस अपने हाथ में लेने से रोका। बड़ी कहा-सुनी के बाद उन्होंने आर डब्ल्यू एल एम की महिला कार्यकर्ताओं को थाने में खबर करने की मोहलत दी। 14 जुलाई को पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सभा बुलायी गयी। डीट्रिख बताती हैं कि अम्बेडकर मंत्रम् से अलग हुए एक गुट ने न्याय मांगने वालों को समर्थन दिया। (20), अम्बेडकर मंत्रम् पुरूष-बहुल संगठन है।

ऐसे तमाम प्रसंग हैं जिनके आधार पर यह बेहिचक कहा जा सकता है कि न्याय और अस्मितावाद के बीच द्वन्द्व की स्थिति पैदा होने पर दलित स्त्रियों तथा उनके संगठनों ने न्याय का पक्ष लिया है। पहचान की राजनीति बराबरी, आजादी और इंसाफ को परममूल्य मानकर नहीं की जा सकती। अपना दायरा बढ़ाने के लिए इन शब्दों को अलंकरण की तरह इस्तेमाल अवश्य किया जाता है। लेकिन, निर्णायक अवसरों पर इन मूल्यों को स्थगित किए जाते हुए देखा जा सकता है। दलित स्त्रियों का संघर्ष मानवाधिकारों के लिए है। मानवाधिकारों की लड़ाई बुनियादपरस्त नहीं लड़ सकते। मानवाधिकारों की सच्ची चिंता अस्मितावादियों के अजेंडे में नहीं आ सकती। अतीत के स्वर्णिम बोझ से दबा मूलनिवासी आंदोलन भी मानवाधिकारो का पैरोकार नहीं हो सकता। दलित स्त्रियां इसी अर्थ में इन सबसे भिन्न हैं। तमिल की प्रख्यात दलित लेखिका एस. तेनमोषी अपने एक निबंध में इसीलिए  बड़ी व्यथा से कहती हैं- ‘इस युद्धभूमि मे दलित स्त्रियां बिल्कुल तनहा हैं, एकदम मित्ररहित। उन्हें इस संघर्ष को इसीलिए सावधानी, आत्म-चेतनता तथा उत्कटता से लेना है।’(21), तेनमोष़ी का मानना है कि ‘अगर वे (दलित स्त्रियां) इस स्थिति को इतिहास के अभिशाप के रूप में नहीं अपितु सुअवसर के रूप में लेंगी तो स्थिति-परिवर्तन नामुमकिन नहीं हैं। (22), इसी निबंध में लेखिका ने यह भी कहा है कि तीव्र जातिगत (रेशियल) उत्पीड़न के समय हम (दलित पुरूषों से) अपने विचार वैभिन्य को पीछे रख देती हैं कुछ वैसे ही पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष में हमारा ग़ैरदलित स्त्रियों के साथ एका बन सकती है। (23),

पारंपरिक वर्चस्ववादियों और दलित अस्मितावादियों में अपने-अपने ढंग से प्रयास किया कि दलित स्त्रीवाद का नारीवादी आन्दोलन से दूरी ही न बनी रहे बल्कि उनके बीच अविश्वास भी बढ़े। जाति में गुंथी पितृसत्ता की उपेक्षा करके,उसके खिलाफ मुकम्मल लड़ाई न छेड़कर स्वयं नारीवादी आन्दोलन ने इस दूरी को बरकरार रखने में जाने-अनजाने सहयोग किया। लेकिन, जल्दी ही दोनों आन्दोलनों को यह बात समझ में आ गयी कि अवसर-विशेष में उनके बीच पनपी पारस्परिकता और समर्थन सार्थक नतीजों का ओर ले जा सकते हैं। नारीवादी संगठनों नें दलित स्त्रीवाद के सामान्य नारीवाद में विलय की कोई मांग न उठाकर आपसी भरोसे की नींव ही मजबूत’ की। दलित लेखिकाओं की रचनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि उन्होंने सीखने-सिखाने और संवाद के दरवाज़े कभी बंद नहीं किए। दलित स्त्री आन्दोलन का आकलन करते हुए विमल थोरात ने लिखा है-‘वह स्त्री पुरूष संबंधों की समतावादी व्याख्या करने के साथ ही, दलित स्त्री के तिहरे शोषण की त्रासदी की अभिव्यक्ति द्वारा दलित स्त्री के प्रति नारीमुक्ति आन्दोलन के संकीर्ण मध्यवर्गीय नजरिए को भी कुछ हद तक बदलने में कामयाब हो रही है। व्यक्ति पहचान के संघर्ष में स्त्री अस्मिता का प्रश्न लेकर साझे समतावादी आन्दोलन में भी वह शामिल हुई है।’(24), कुछ ऐसा ही रजनी तिलक का भी मानना है। वे दलित और स्त्रीआन्दोलन में दलित स्त्रियों की भागीदारी को रेखांकित करते हुए यह भी जोड़ती हैं दलित आन्दोलनमें ‘पितृसत्ता का विद्रूप चेहरा’ तथा स्त्री आन्दोलन में ‘जाति व्यवस्था का विकृत रूप’ पाकर दलित स्त्रियों ने अपने को अलग से संगठित किया। (25), तेलुगु दलित लेखिका नामबूरि परिपूर्णा की कहानी ‘प्रेरणा’ परिवार के ढांचे में ‘पति’ संस्था की क्रूरता दर्शाते हुए सवर्ण और दलित स्त्री के दुख की समानता का बयान करती है। मस्तनम्मा विमला के यहाँ नौकरानी है। विमला औऱ उसका पति प्रसाद जिला परिषद में नौकरी  करते हैं। मस्तनम्मा का पति कोटी रिक्शा चलाता है। प्रसाद और कोटी दोनों ही घर की जिम्मेदारियों के प्रति बेपरवाह। अपनी सारी कमाई पीने-पिलाने पर उड़ाने वाले। पत्नी के प्रति हिंसक भी। मस्तनम्मा रोज-रोज की पिटाई से तंग आकर एक दिन अपने पति पर हाथ उठाती है। इधर घरेलू हिंसा से त्रस्त विमला भी मस्तनम्मा से प्रेरणा लेकर कानूनी सलाह केन्द्र का रूख करती है। (26), बानगी के तौर पर उद्धृत की गई यह कहानी प्राय: सभी भाषाओं में मिल सकती है। ध्यान देने की बात है कि इस ढर्रे की कहानियों में प्रेरणा स्रोत दलित स्त्रियां है। उनकी संघर्ष क्षमता और विकट प्रतिकूलताओं में जिन्दा रहने की कूवत ही उन्हें प्रेरणा केन्द्र बनाती है।

दलित स्त्रीवादी आन्दोलन का जन्म भले ही अस्मितावाद की जमीन पर हुआ मगर जल्दी ही इस आन्दोलन ने अपने को अस्मितावाद की अनुदार चौहद्दी से मुक्त कर लिया। अस्मितावाद उत्तर आधुनिकता की कोख से पैदा हुआ माना जाता है। उत्तर आधुनिकता की जो धारा आधुनिकता के प्रबल विरोध में फूटी है उसी की सिचांई से अस्मितावाद की फसल पली-बढ़ी है। अस्मितावादी बहस को ‘विमर्श’ कहा जाता है। इस विमर्श की परिभाषा है- एकल पहचान की बहिर्गामी, एकोन्मुखी और उदग्र पैरोकारी। अन्य पहचानों के प्रति गहरा शक इसके मूल में है। यह विमर्श अपारदर्शी होता है। ‘ऐतिहासिक अनुभव’ इसे खुलेपन की ओर, पारदर्शिता की तरफ जाने से रोकते हैं। ‘पीड़ा’ पर बोलने का अधिकार पीड़ित को है। पीड़ा के खिलाफ संघर्ष चलाने का अधिकार भी उसी को है। अस्मितावाद के एक समर्थ प्रवक्ता गोपाल गुरू हैं। पीछे हमने चर्चा की कि दलित स्त्रियों पर ग़ैरदलित स्त्रियों के लेखन को वे ‘कम वैध और कम प्रामाणिक’ मानते हैं। इस कथन के अर्थ बोध की प्रक्रिया में ‘कम’ विशेषण का विलोपन लेखक का अभीष्ट है। विमर्श के अध्येताओं को यह बताने की ज़रूरत नहीं। अन्यत्र गोपाल गुरू ने यह प्रतिपादित किया कि दलितों के अनुभवों पर सिद्धांत निर्माण का अधिकार मात्र भुक्तभोगियों को है। इतनी छूट उन्होंने अवश्य दी कि ग़ैरदलितदलित-अनुभवों को मात्र पढ़ने-सुनने के हकदार हैं। (27), लेकिन, यह कैसे हो सकता है कि पढ़ने की छूट मिले और राय बनाने पर प्रतिबंध हो। इस सिद्धांत को स्वीकार लिए जाने पर कई बिडम्बनाएं पैदा होंगी । दर्शनशास्त्री सुंदर सरूक्काइ ने इनका वाजिब संज्ञान लिया है। अब यह महत्वपूर्ण बहस पुस्तक रूप में उपलब्ध है। (28), शायद इस सिद्धांत में निष्ठा के चलते ही  ‘अवमानना’ (ह्युमिलिएशन) पर संपादित अपनी मूल्यवान पुस्तक में गोपाल गुरू ने दलित स्त्री की स्थिति को विचार के बाहर रखा है। यह कहने की ज़रूरत नहीं की जाति और पितृसत्ता के दो पाटों में पिसती दलित स्त्री अवमानना के स्थूल व सूक्ष्म अध्ययन का अपरिहार्य संदर्भ बनती है।(29)

दलित स्त्रीवाद उत्तर अस्मितावादी विचार व आन्दोलन है। आधुनिकता की ओर पीठ किए हुए नहीं, उससे संवाद करता हुआ, मानव-मुक्ति के उसके विश्वास में साझा करता हुआ। देखा जा सकता है कि अस्मितावाद जहाँ वैश्वीकरण, बाजारीकरण और सार्वजनिक क्षेत्रों के कारपोरेटीकरण का समर्थन करता है या उसे चिंता का विषय मानने से इंकार करता है वहीं दलित स्त्रीवाद शुरू से ही उसका विरोध करता रहा है। नैशनल फेडरेशन ऑफ दलित वीमेंस ने निजीकरण और वैश्वीकरण के खिलाफ संघर्ष करने का जो संकल्प लिया उसकी चर्चा पीछे की जा चुकी है। दलित स्त्रीवाद की  प्रमुख हस्ताक्षर उर्मिला पवार ने अपने आत्मकथन की भूमिका में लिखा है:  ‘हम देखते हैं कि वैश्वीकरण, निजीकरण तथा धार्मिक सत्ता के ध्रुवीकरण से जो होड़ का वातावरण निर्माण हो गया है, उसके कारण अगली और उससे अगली पीढ़ियों का भविष्य संकट में पड़ गया है।’(30), बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मकड़जाल का पर्दाफाश अनिता भारती ने अपनी कहानी ‘बीजबैंक’ में किया है। (31), अपनी आलोचना-पुस्तक में वे लिखती है: ‘भूमंडलीकरण, बाजारीकरण के चलते उसके (दलित स्त्री के) श्रम की कीमत दिन पर दिन कम होती जा रही है, जिसके कारण उसके परिवार पर व उसके ऊपर सीधा असर पड़ रहा है। आर्थिक चुनौतियां सुलझने की जगह और उलझ रही हैं’।(32),

एक अर्थ में अस्मितावाद अतीतोन्मुखी है। इधर के अस्मितावादियों में कोई नागवंश का गुणगान करता हुआ उसकी पुनर्स्थापना के सपने देखता है, कोई मौर्य युग की पुनर्प्राप्ति के लिए तड़पता है। इन दिनों मूल निवासी  ‘आन्दोलन’ ज्यादा जोर पकड़े हुए है। इस ‘आन्दोलन’ का मानना है कि इस देश में रहने का हक सिर्फ मूल निवासियों को है। हमलावरों और घुसपैठियों को बाहर किया जाना चाहिए। यहाँ यह याद कर लेना ठीक रहेगा कि डॉ. अम्बेडकर आर्य आक्रमण के इस सिद्धांत को नहीं स्वीकारते थे। ब्राह्मणों को सर्व शक्तिमान मानने से भी उन्हें गुरेज था। भारतीय समाज पर जाति व्यवस्था थोपने का ‘श्रेय’ भी वे ब्राह्मणों को नहीं देते थे। हाँ, उनकी सहयोगी भूमिका से उन्हें इंकार न था। (33), अस्मितावाद ने ब्राह्मणों को (ज्यादातर प्रसंगो में ब्राह्मणवाद का प्रयोग नहीं किया जाता।) इतिहास की नियामक शक्ति मानते हुए उनका लगातार ‘शक्ति संवर्धन’ किया है। अस्मितावादी व्यक्ति की  ‘उत्पीड़ित’ की छवि इसीलिए रूढ़ हो चली है। दलित स्त्री के नजरिए से देखे तो मूल निवासी आन्दोलन एकदम अस्वीकार्य ठहरता है। मूल निवासी व्यवस्था जिस रोमानीकृत रूप में पेश की जाती है उसमें सारी भीतरी दिक्कतें विलुप्त हो जाती हैं। इन दिक्कतों की चर्चा करना भी मूल निवासी सिद्धांतकारो को नागवार गुजरता है। फिर जिस संस्कृति की रूपरेखा पेश की जाती है उसमें स्त्रियाँ दायित्व के बोझ से दबी हुई, संदेह की शूली पर चढ़ाई हुई और सर्वथा अधिकार वंचित ऩजर आती हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की स्वर्णिम अतीत की कल्पना और उसकी परिणतियों पर बेहतर अध्ययन उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक अस्मितावादियों से उनकी समानता को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत संदर्भ में उऩ अध्ययनों से सहायता ली जा सकती है।

उत्तर अस्मितावाद ने प्रयत्न करके ‘उत्पीड़ित’ की छवि से दूरी बनायी है। दलित स्त्रीवाद की विकासयात्रा पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि पीड़ित स्त्री से क्रमश:  शक्ति सम्पन्न दलित स्त्री की अवधारणा निर्मित हो रही है। अस्मितावादी वैचारिकी के तहत लिखी गई आत्मकथाओं के शीर्षक देखें और उसकी दलित स्त्रीवादी दृष्टि से सृजित आत्मकथाओं के शीर्षकों की तुलना करें तो यह बात समझने में आसानी होगी। पहली धारा में ‘अक्करमाशी’, ‘जूठन’, ‘तिरस्कृत’, ‘घाव’, ‘छांग्या रूक्ख’ आदि हैं तो दूसरी में ‘जीवन हमारा’, ‘करक्कु’, ‘आयदान’ हैं। (34), दलित स्त्री की शुरूआती आत्मछवि तमिल की कवि तरेसम्मा के शब्दों में यों मिलती है-

हम गरीब
इसलिए करते हैं मजदूरी
लेकिन वही सिल्की बिस्तर उपहास करता है हमारा
जब हमारा दिन-दहाड़े बलात्कार होता है।
अशुभ-अभागी हैं हमारी जन्मकुंडलियाँ।
हमारे लड़खड़ाते पति भी
खटिया के एक कोने में पड़े हुए
फुफकारते और बदला लेने को चीखते हैं
अगर हम उनकी पकड़ न झेल सकें। (35)

संक्रमण के दौर से गुजरती, क्रमश: आत्मविश्वास अर्जित करती दलित स्त्री तेलुगु दलित रचनाकार जलदि विजयकुमारी की एक कविता में इस तरह आकार पाती है:

अनखिला फूल
विफल ध्यान
…     …     …

मैं एक शापित
पुरूष जाति की दासी
जिसने रूग्ण अक्षरों को बना डाला है सजावटी
और
हैवानियत से सत्ता का इस्तेमाल करते हुए
अपनी लंपट वासनाओं का बंदी
विवाह के नाम पर धोखा
पुरूष-असुरों की मृत्यु धुन पर नाचती लाश
दहेज के कब्रिस्तान में
गूंज रही लय विरोधी विचारधारा की
लेकिन, अगर तुम्हारे हाथ में शहनाई जरा भी अचेत हुई
मैं व्यथित होने वाली नहीं
भीषण बदला
प्रतिरोधी बाना
इसीलिए ओ मां
हताशा और विफलता से पीड़ित
यह हमारा युग है।
आगे बढ़ो हिम्मती बहनों
मैं दूंगी तुम्हारा साथ
मैं अबला नहीं
मैं हूँ, शक्ति
जिसने रचे ढांचे
लुढकाने को पंक
“मैं एक मां”
जिसने जिंदगी बख्शी स्वयं इस जन्म को। 36

पीड़ित से शक्तिसंपन्न व्यक्तित्व में अंतरण प्राय: सभी भाषाओं की दलित स्त्री रचनाकारों में देखा जा सकता है। नयी दलित स्त्री खुदमुख्तार है। अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ़ और अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। उसका संघर्ष और संकल्प बेहतर वर्तमान के साथ काम्य भविष्य के निर्माण के लिए है। नयी दलित स्त्री की कुछ अभिव्यक्तियां देखिए:

1.‘एक दिन आऊंगी मैं/दबावों के चलते नहीं/न किसी की दासी बनकर/तनी हुई रीढ़ के साथ/किसी के सामने झुकती हुई नहीं/बगैर किसी चूक के/किसी को बातचीत की अनुमति दिए बिना/सोचने का समय दिए बिना/आलोचना की परवाह न करके/प्रतिक्रियाओं के लिए अवकाश दिए बगैर/तब मेरा साथी होगा सत्य/कर्म मेरी ताकत.’(के.के. निर्मला, मलयालम)37,

2. ‘बहुत दिनों से देख रही थी/कुछ झंडे पड़े हुए थे/धूप-छांह, वर्षा-पानी से भी/कुछ फ़र्क नहीं पड़ा था इन पे/पास से गुजर रही जनता की आँखें भी/नहीं पड़ रही थीं इन पे/अयोग्य है यह पकड़ने के लिए/कंधे पर उठाकर ज्यों चलना शुरू किया। जनता  के ये सवाल तभी से/आप में से किसी ने उठाया नहीं इसे/इसलिए मैंने उठा लिया/इसके बाद देख रहीं हूँ/एक-एक करके सभी उस स्तूप से/झंड़ा उठाकर चलना शुरू कर दिए/कौन किस तरह जाएगा, यह समझे बिना/कुछ लोग तितर-बितर हुए/कुछ लोग इधर-उधर चल दिए/अंत में देखती हूँ/सभी का गंतव्य/उस एक ही दिशा की तरफ हैं’38,(कल्याणी ठाकुर, बाग्ला)

3.‘मैं हूँ शक्ति/मैं हूँ आशा/मैं हूँ तो कैसी निराशा?/मैं तेरे खेतों में बहती।शीत-जल प्रवाहिनी हूँ।/बांध जब मुझ पर बने/ तो दामिनी हूँ/जो करोगे प्रेम/ तो मैं रागिनी हूँ/झूठी मर्यादाओं में/न मैं बधूंगी/परम्परा और संस्कृति के नाम पर न/मैं दबूंगी‘ (39),(पूनम तुषामड़, हिन्दी)

4.‘बेआवाज़ लहरों वाला सागर/किलकारियां भरता चंद्रमा/बेसुर रात में झींगुरों के प्रेम पर/सोचती-जागती/काली चमड़ी के भीतर सुनने की हामी/भरतीहुई/वार्तालाप/आक्रोश/अट्ठाहास/कराहें/लड़कियां/आदि मचल रहे हैं/एक सिनेमाघर!’ (40), (धन्या ए.डी. मलयालम)

5. अनिता भारती, हिन्दी ‘आँखों में भर लूं/आसमान/दौड़ जाऊं इठलाकर/बादलों पर/सारी दुनिया मेरी है/मन की कलियां/सतरंगी सपने बुन रही हैं/सूरज की गमक आँखों में/भर रही हैं (41),(अनिता भारती, हिन्दी)

जैसे पारम्पारिक वर्चस्ववादियों को शिकायतों का पिटारा लिए बैठा दलित सह्य लगता है वैसे ही अस्मितावादियों को व्यथा में डूबी दलित स्त्री की आवाज़ स्वीकार्य लगती है। लेकिन, यह स्त्री जब स्वयं कदम उठाती है, बाहरी और भीतरी हिंसा के खिलाफ संघर्ष में उतरती है, न्याय का माँग करती है,अपनी शर्तों पर जिन्दगी जीने के ख्वाब बुनती है तो अस्मितावादियों और पारम्परिक वर्चस्ववादियों-दोनों को खटकने लगती है। वर्चस्ववादियों का खटकना तो तुरन्त समझ में आ जाता है लेकिन अस्मितावादियों का बिडम्बनापूर्ण लगता है। इस असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए आम तौर पर अस्मितावादियों के तीन खेमे बनते देखे जा सकते हैं। पहले वर्ग में वे लोग होते हैं जो स्त्री मात्र के प्रति घृणा से भरे रहते हैं। दलित स्त्रियां भी उनकी कोप दृष्टि से बाहर नहीं रहतीं। दूसरी श्रेणी सांस्कृतिक अस्मितावादियों की होती है। भीतर की कमजोरी बाहर न प्रकट हो इस तर्क से, तथाकथित दलित संस्कृति/ मूलनिवासी संस्कृति/ नाग संस्कृति… की पुनर्रचना,पुनर्प्राप्ति के तर्क से, यह लड़ाई हम लड़ ही रहे हैं, के तर्क से दलित स्त्रियों को चुप कराने या अपने अजेंडे की अनुगामिनी  बनाने पर उनका ज़ोर रहता है। तीसरे वर्ग में ऐसे विचारक होते हैं जो दलित स्त्रियों का विरोध नहीं करते। यही नहीं,वे दलित स्त्रियों की बदनामी करने वाले पहले वर्गकी खुलकर आलोचना भी करते हैं। लेकिन, इस वर्ग के लिए जाति का प्रश्न सर्वोपरि होता है। पितृसत्ता को जाति जैसी प्राथमिकता देना उन्हें विचलन लगता है। वे इसीलिए ऐसी लेखिकाओं और जाति तथा पितृसत्ता को समान महत्व देने वाली रचनाओं की चर्चा करने से यथासंभव बचते हैं। दलित स्त्री जीवन को सामान्य दलित जीवन में अन्तर्भुक्त मानकर वे दलित स्त्रीवाद की अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं समझते। (42),

दलित स्त्रीवाद में सौंदर्यशास्त्र को लेकर उत्सुकता का प्राय: अभाव दिखता है। दलित अस्मितावाद में ‘अपना’ सौन्दर्यशास्त्र गढ़ने की जैसी व्यग्रता पनपी औऱ बनी हुई है वैसी  मांग दलित स्त्रीवादियों की तरफ से नहीं की गई है। इसके कारणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पहली वजह यह लगती है कि जो समुदाय मानवधिकारों की लड़ाई लड़ रहा हो उसके लिए राजनीतिक चेतना का महत्व हैं, सौन्दर्यशास्त्र का नहीं। दूसरी यह कि सौंदर्यशास्त्र की प्रकृति में स्त्री के वस्तूकरण की आशंका अंतर्ग्रथित है। तीसरी, विश्व बाजार की घुसपैठ ने वस्तूकरण की आशंका को मजबूती दी है। विचारणीय है कि दलित सौंदर्यशास्त्र के दोनों अधिकारी विद्वान वैश्वीकरण तथा बाजारवाद के समर्थक भी हैं।(43) चौथी वजह यह है कि यह दौर नयी दलित स्त्री के निर्माण का है। इस दौर की प्राथमिक चिंता सशक्तीकरण के संसाधन जुटाने और अनुकूल माहौल बनाने की है। सौन्दर्यशास्त्र इस संदर्भ में दलित स्त्रीवादियों को शायद कोई सहायता नहीं देता। पांचवी और फिलहाल आखिरी वजह दलित सौन्दर्यशास्त्र के ऊपर छपे ग्रंथों की विषयवस्तु है। शरण कुमार लिंबाले द्वारा लिखित ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ देशी-विदेशी साहित्य की चर्चा करने वे बावजूद दलित स्त्री लेखन की नोटिस तक नहीं लेता। ‘दलित वीमेंस राइटिंग, की संपादक के. सुनीता रानी ने प्रस्तुत पुस्तक के बारे में यह कहते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कि पश्चिमी साहित्य, भारतीय साहित्य और दलित साहित्य की चर्चा करने वाले लेखक ने दलित स्त्री साहित्य का उल्लेख तक क्यों नहीं किया। यह तब जबकि मराठी दलित साहित्य में दलित स्त्रियों की सशक्त आवाज़ मौजूद थी। (44), अपनी इस पुस्तक के नए (दूसरे) संस्करण में लिंबाले ने इन पंक्तियों के लेखकों द्वारा लिया गया इंटरव्यू शामिल किया है। दलित स्त्री पर केन्द्रित मेरे प्रश्न के जवाब में उन्होंने यह अवश्य माना कि ‘उसका दोहरा शोषण होता है’, लेकिन, दलित स्त्रियों की आलोचना के केन्द्र डॉ. धर्मवीर का संदर्भ आने पर उन्होंने धर्मवीर का पक्ष लिया। (45),दलित सौन्दर्यशास्त्र के विशेषज्ञ  से यह उम्मीद ग़ैरवाजिब नहीं कि वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील होगा। लिंबाले की संवेदनशीलता का पता चला दलित स्त्रीवादी उर्मिला पवार की आत्मकथा  ‘आयदान’ के प्रकाशन पर। उर्मिला पवार पर हमला करने वालों में शरणकुमार लिंबाले दूसरों से आगे रहे। उर्मिला पवार की आलोचना के मुख्य बिन्दु ये थे-

·         उनकी (उर्मिला की ) सोच फेमिनिस्ट है। (फेमिनिज़्म- आरोप, विपथन के रूप में)

·         अंतरंग बातों को सार्वजनिक करना अम्बेडकरवाद के दायरे में नहीं आता। पति से उनके संबंध कैसे थे- यह बताने में अम्बेडकरवादी दर्शन कहाँ है?

·         क्योंकि उर्मिला नारीवादियों के सम्पर्क में हैं इसलिए ऐसा (ग़ैर अम्बेडकरवादी लेखन) कर रही हैं।

·         जब वे अपने पति हरिश्चन्द्र का शराब पीना नहीं छुड़वा सकीं तो सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में विफल रहेंगी ही।

·         मरणासन्न पति की किडनी एक ज़रूरतमंद युवती को दान करने के उर्मिला के विचार पर स्तब्ध लिंबाले ने कहा कि यह सोच नारीवादी विचारधारा की देन है। ‘एक विवाहिता भला अपने पति के बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकती है?’(46),

दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर दूसरी किताब ओम प्रकाश वाल्मीकि की है। किताब में एक दर्जन से अधिक अध्याय हैं लेकिन दलित स्त्री की पीड़ा या उसका साहित्य किसी भी अध्याय का विषय नहीं बन सके हैं। (47), वाल्मीकि (सौन्दर्यशास्त्री होने के साथ) कवि, कथाकार, आलोचक भी हैं। नहीं याद पड़ता कि किसी कविता या कहानी में उन्होंने नयी दलित स्त्री की शिनाख्त़ की हो, उसका चरित्र रचा हो। उसे समर्थन देने की बात तो इसके बाद हीआती है। उन्होंने किसी आलोचना ग्रंथ में दलित स्त्री आन्दोलन की चर्चा तक नहीं की है। हाँ, उनकी कई कहानियों में ‘पारम्परिक’ दलित स्त्रियों के चरित्र हैं। इनमें कुछ-एक की संघर्ष-क्षमता प्रेरणास्पद लग सकती है। लेकिन नैतिकता/यौन मर्यादा के प्रश्न पर लेखक ने परम्परा का ही समर्थन किया है।(48),

दलित सौन्दर्यशास्त्र और उसके प्रस्तावकों की इन भूमिकाओं से दलित स्त्रीवादियों का शंकित होना स्वाभविक ही है। सौन्दर्यशास्त्र से उनके विकर्षण में इस परिस्थितिजन्य अनुभव की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

दलित स्त्रीवादी आन्दोलन ने अपने विकास का दूसरा पड़ाव कठिनाइयों से गुजरते हुए सफलतापूर्वक पार कर लिया है। अब उसकी सामर्थ्य और स्वतंत्र-स्वायत्त स्थिति पर बहस करने की जरूरत नहीं रह गयी। अस्मितावाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका लगभग निभा चुका है। जैसे अर्सा पहले जातिवादी संस्कृति का मानव विरोधी  रूप पहचाना जा चुका है वैसे दलित धर्म और संस्कृति के किसिम-किसिम के संस्करण भी मानवाधिकारों की राह में अवरोधक के रूप में चिन्हित होने लगे हैं। दलितवाद को छोड़कर अम्बेडकरवाद की तरफ जाना इसीलिए श्रेयस्कर माना जा रहा है। अम्बेडकरी आन्दोलन की विरासत से निकला स्त्रीवाद अपने दम पर अग्रसर है। अम्बेडकरी आन्दोलनों से निकली, जन अभियानों के बीच निर्मित हो रही युवाओं की नयी पीढ़ी इन स्त्रीवादियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती देखी जा सकती है। यह पारस्परिक सहयोग भरोसा पैदा करता है। रूप के स्तर पर ‘जेंडर से ‘सेंसिटिव’ नयी पीढ़ी को अंतर्वस्तु के स्तर पर भी समृद्ध करना इस आन्दोलन की बड़ी जिम्मेदारी है।(49),

अपने संघर्षों, सरोकारों को यह आन्दोलन जितना भविष्योन्मुखी, जनोन्मुखी तथा संवेदनक्षम बनाता जाएगा उतना ही पीड़ित मानवता के काम का साबित होगा। इस क्षेत्र के अध्येताओं तथा सिद्धांतकारों को अस्मितावाद से बाहर आकर उत्तर अस्मितावाद की चर्चा की शुरूआत करनी है। उत्तर अस्मितावाद का स्वरूप अभी बन ही रहा है। स्वरूप निर्माण की दिशा दलित स्त्री आन्दोलन को तय करना है। दलित स्त्री विमर्श रूप के स्तर पर नयी दलित स्त्री को गढ़ सकता है, लेकिन आवश्यकता अन्तर्वस्तु से संपन्न नयी दलित स्त्री के निर्माण की है। यह तभी संभव हो सकता है जब दलित स्त्री आन्दोलन जीवन के आधारभूत मुद्दों पर संघर्ष छेड़े। इन मुद्दों पर संघर्षशील संगठनों, समूहों के साथ सहयोग करे तथा ईमानदार प्रयासों को साझे मंच पर लाने में अपनी भूमिका निभाए। अभी भी सबसे कम साक्षरता दलित स्त्रियों में है। पारिवारिक सम्पत्ति में उनका हिस्सा प्राय: नहीं होता। उन पर हुए जुल्म को प्रशासन हर संभव नज़रअंदाज करने की कोशिश करता है। पुरूषों के मुकाबले उनकी मजदूरी अक्सर कम होती है। काम के घण्टे, अवकाश, उचित परिवेश और हिंसामुक्त परिवार चिंता का विषय बने हुए हैं। इन सबसे टकराए बिना न मानवाधिकारों की रक्षा की बात सोची जा सकती है और न नयी दलित स्त्री के निर्माण को पूरी तरह साकार किया जा सकता है।

दलित स्त्री की सक्रियता, संघर्ष क्षमता और समानधर्माओं के प्रति संवादोन्मुख रवैये से उनके पक्ष को मजबूती मिल रही है।

संदर्भ

1.  ‘Dalit Feminism: Where Life- Worlds and Histories Meet’,

v.Geetha in ‘Women Contesting Culture: Changing

Frames of Gender Politics in India’ (2012), Edited by Kavita Panjabi and ParomitaChakravarti, STREE, Kolkata, P.244.

2.  वहीं. पृ. 245

3.  ‘Untouchabity and Dalit Women’s Oppression’, Bela Malik in ‘Gender and Caste’ (2003 Reprint 2006)  Edited by AnupamaRao. Kali for Women, New Delhi,Pp.102-107

4.  वहीं. पृ.103.

5.  वहीं पृ.103

6.  ‘A Dalit Feminist Standpoint’, SharmilaRege in ‘Gender and Caste’, Pp.90-101. This paper was originally pubslished in Seminar 471, Nov.1998, pp.47-52.

7.  वहीं पृ.93.

8.  वहीं पृ.93.

9.  वहीं पृ.95.

10. ‘Dalit Women Talk Differently’, Gopal Guru, Economic and Political Weekly, Oct.14-21,1995, pp. 2548-50. This essay is reprodueed in ‘Gender and Caste’, pp. 80-85.

11. शार्मिला रेगे, पूर्वोक्त, पृ.99.

12. अनुपमा राव द्वारा ‘जेंडर एंड कास्ट’ की भूमिका में उद्धृत, पृ.4.

13. ‘The Prisons We Broke’ (2008), Baby Kamble, Trans. MayaPandit, Orient Longman, Afterword-Gopel Guru, p.160

14. वहीं पृ.161.

15. वहीं पृ.154-55

16. वहीं पृ.155.

17. वहीं पृ.156-57.

18. ‘Dalit Movements and Women’s Movements’, Gabriele Dietrich in ‘Gender and Caste’, pp.65-66.

19. वहीं पृ.66.

20. वहीं पृ.66.

21. ‘Power That Transcends’, S, Thenmozhi in ‘The Oxford  India Anthology of Tamil Dalit Writing’ (2012) edited by Ravikumar and R.Azhagarasan, Oxford Univorsity Press P.305

22. वहीं पृ.305

23. वहीं पृ.305.

24. ‘दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर’(2008), विमल थोरात, अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली, पृ10.

25. ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’(2011), सम्पादक रजनी तिलक, रजनी अनुरागी, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.12.

26. ‘Flowering from the soil: Dalit Women’s Writing form Telugu’(2012) Translated and Compiled by K.SuneethaRani,Prestige Books International  New Delhi.pp. 38-44

27. ‘The Cracked Mirror: An Indian Debate on Experience and Theory’(2012) Gopal Guru, Sunder Sarukkai, Oxford University Press.

28. कुल नौ अध्यायों की उक्त पुस्तक गोपाल गुरू और सुन्दर सरूक्काइ के बीच संवाद के रूप में है।

29. ‘Humiliation: Claims and Context’(2009) edited by Gopel Guru, Oxford University press.

30. ‘आयदान’(2010) उर्मिला पवार, अनु.माधवी प्र.देशपाण्डे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, ‘आत्मभान’(भूमिका) से उद्धृत।

31. ‘बीजबैंक’ अनिता भारती, ‘कथादेश’ नवम्बर 2011 अंक में प्रकाशित। यह कहानी लेखिका के संग्रह ‘एक थी कोटेवाली’ में भी संग्रहीत है।लोकमित्र प्रकाशन 2012

32. ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ (2013) अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.295.

33. Gabriele Dietrich in ‘Gender and Caste’, pp.74-75.

34. ‘अक्करमाशी’- (दोगला)- मराठी-शरण कुमार लिंबाले, ‘जूठन’,-हिन्दी- ओमप्रकाश वाल्मीकि, ‘तिरस्कृत’- हिन्दी- सूरजपाल चौहान ‘घाव’- तमिल- के.ए. गुणशेखरम,  ‘छांग्या रूक्ख’-(कटा छंटा पेड़)- पंजाबी- बलबीर माधोपुरी।

‘जीवन हमारा’-मराठी- बेबी कांबले, ‘करक्कु’-(एक विशेष पेड़ की धारदार पत्ती) –तमिल- बामा, ‘आयदान’(डलिए की बुनाई)- मराठी- उर्मिला पवार। हिन्दी में सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा  ‘शिकंजे का दर्द’ प्रकाशित है। यह कृति दलित स्त्री लेखन को समझने में सहायता कर सकती है परन्तु लेखिका को दलित स्त्रीवादी कहने में संकोच है।

35. गैब्रिएल डीट्रिख द्वारा उद्धृत  ‘जेंडर एंड कास्ट’, पृ.70. इस भावधारा की दलित स्त्री कविताओं का एक अध्ययन मैंने ‘हमारे हिस्से का सच: तेलुगु दलित स्त्री लेखन’ ‘कथादेश’ मार्च 2006 में प्रकाशित करवाया था।

36.’Flowring from the soil’, pp.300-301.

37. ‘कथादेश’ फरवरी 2010, दिल्ली, पृ.66.

38.‘कथादेश’ सितम्बर 2009, पृ.72-73. अनुवाद-निशांत। जिन कविताओं के अनुवादक/अनुवादिका का नाम नहीं दिया गया है उनका अनुवाद इन पंक्तियों के लेखक ने किया है।

39. ‘मां मुझे मत दो’  (2010), पूनम तुषामड़, सफाई कर्मचारी आन्दोलन, नई दिल्ली, पृ. 51.

40. कथादेश, जून 2012, मलायलम दलित स्त्री कविता पर विशेष आयोजन, अनुवाद- प्रमीला के.पी., पृ.80.

41.‘एक कदम मेरा भी’ (2013), अनिता भारती, बुक्स इंडिया, दिल्ली, पृ.152.

42. ‘हिन्दी दलित साहित्य’ (2011) मोहनदास नैमिशराय, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली। कुल चौदह अध्यायों वाले इन ग्रंथ में एक भी अध्याय दलित स्त्री लेखन पर नहीं है।

‘दलित अस्मिता’ जनवरी-मार्च 2011 अंक में डॉ.रामचंद्र का लेख ‘दलित काव्य में दलित चेतना’ प्रकाशित है। इसमें लेखक ने दलित काव्य/साहित्य की प्राथमिकताएं गिनाई हैं। अपेक्षित विस्तार के साथ परिगणित पंद्रह प्रवृतियों में एक का भी संबंध दलित स्त्री जीवन/संघर्ष/साहित्य तथा पितृसत्ता से नहीं है। नयी पीढ़ी के एक अस्मितावादी द्वारा दलित स्त्री लेखन तथा आन्दोलन का पूर्ण नकार मानीखेज है। पृ.21-24.

43. दलित सौन्दर्यशास्त्र के अधिकारी विद्वान हैं शरणकुमार लिबांले तथा ओमप्रकाश वाल्मीकि। वैश्वीकरण और बाजारवाद पर इनकी मान्यताओं की कुछ चर्चा मैंने अपने एक लेख ‘दलित कविता और समकालीन चुनौतियाँ: जय प्रकाश लीलवान की कविताएं’ में की है। देखिए, ‘दलित अस्मिता’ जुलाई-दिसम्बर 2012, पृ.37-46.

44. ‘Flowering from the Soil’, p.16.ss

45.‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ (2005), शरण कुमार लिबांले, अनु. रमणिका गुप्ता, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.169. प्रासंगिक अंश इस प्रकार है: “उन्होंने (धर्मवीर ने) इस (मातृसत्ता) पर रिसर्च किया है। मैंने उनकी थ्योरी पढ़ी नहीं इसलिए इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।…धर्मवीर ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं। वे हमेशा अपनी बात रेडिकल स्टाइल से रखते हैं। इसलिए उनको समझने में दिक्कतें आती हैं।”

46. ‘The Weave of My Life: A Dalit Women’s Memoirs’(2008) UrmilaPawar, Translated by Maya Pandit, Stree, Kolkata, Quoted from Introduction by Maya Pandit, pp.xx viii- xxix.

47.‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ (2001), ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली.

48. ‘दलित कहानियों का परिदृश्य’, बजरंग बिहारी तिवारी, ‘हंस’ दिसम्बर 2001. पृ.25-29.

49. द्रष्टव्य- ‘Post Feminism: Cultural Text and Theories’ (2009) Stephanie Genz and Benjamin A Brabon, Edinburgh University Press.

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

आज भारत की आद्यशिक्षिका सावित्री बाई फुले का जन्मदिन है. आज के इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए . सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन पर अनिता भारती उन्हें याद कर रही हैं.

3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में जन्मी महान विभूति सावित्रीबाई फुले,मात्र 18 साल की छोटी उम्र में ही,भारत में स्त्री शिक्षा कीऊसर-बंजर जमीन परस्त्री शिक्षा कीनन्हा पौधा रोप उसे एक विशाल छतनार वृक्ष में तब्दील करनेवाली, महान विदुषीसावित्रीबाई फुले के अतुलनीय योगदान को कौन नहीं सराहना करेगा।भारत में सदियों से शिक्षा से महरुम कर दिए गए शोषित वंचित,दलित-आदिवासी, और स्त्री समाज को  सावित्रीबाई फुले ने अपने निस्वार्थ प्रेम,सामाजिक प्रतिबद्धता, सरलता तथा अपने अनथक सार्थक प्रयासों से शिक्षा पाने का अधिकार दिलवाया। शिक्षा के नेत्री सावित्रीबाई फुले ने इस तरह शिक्षा पर षडयंत्रकारी तरीके से एकाधिकार जमाएं बैठी ऊंची जमात का भांडा एक ही झटके में फोड़ डाला।

जिस देश में एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगने वाले के नाम पर पुरस्कार दिए जाते हो, जिस देश में शम्बूक जैसे विद्वान के वध की परंपरा हो, जिस देश में शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने पर यहां के धर्मग्रंथों में उनके कान में पिघला शीशा डालने का फरमान जारी किया गया हो और जिस देश के तथाकथित ब्राह्मणवादी समाज के तथाकथितब्राह्मणवादी कवि द्वारा यहां की दलित शोषित-वंचित जनता को ‘ढोल गंवार शूद्र अरु नारी यह सब ताड़न के अधिकारी’ माना गया हो ऐसे देश में किसी शूद्र समाज की स्त्री द्वारा इन सारे अपमानों, बाधाओं, सड़े-गले धार्मिक अंधविश्वास व रुढियां तोड़कर निर्भयता और बहादुरी से घर-घर, गली-गली घूमकर सम्पूर्ण स्त्री व दलित समाज के लिए शिक्षा की क्रांति ज्योति जला देना अपने आप में विश्व के किसी सातवें आश्चर्य से कम नही था। परंतु अफसोस तो यह है कि इस जाति ना पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान वाले देश में जाति के आघार पर ही ज्ञान की पूछ होती है। प्रतिभाओं का सम्मान होता है।हमेशा जाति के आधार पर यह पुरस्कार, सम्मान और मौके ऊंची जाति के लोगों को आराम से मिलते रहे है। और यदि ऐसा नही है तो सवाल यह कि भारत में आज भी क्रांतिसूर्य सावित्रीबाई फुले के नाम पर ना मनाकर सर्वपल्ली राधाकृष्णऩ के नाम पर क्यों मनाया जाता है जबकि सावित्रीबाई फुले द्वारा स्त्री शिक्षा केक्षेत्र में देश को दिया गया योगदान बेहद गंभीर योगदान है।

शिक्षा नेत्री सावित्रीबाई फुले ना केवल भारत की पहली अध्यापिका और पहली प्रधानाचार्या थी अपितु वे सम्पूर्ण समाज के लिए एक आदर्श प्रेरणा स्त्रोत, प्रख्यात समाज सुधारक, जागरुक और प्रतिबद्ध कवयित्री, विचारशील चितंक, भारत के स्त्री आंदोलन की अगुआ भी थी। सावित्रीबाई फुले ने हजारों-हजार साल से शिक्षा से वंचित कर दिए शुद्र आतिशुद्र समाज और स्त्रियों के लिए बंद कर दिए गए दरवाजों को एक ही धक्के में लात मारकर खोल दिया। इन बंद दरवाजों के खुलने की आवाज इतनी ऊंची और कानफोडू थी कि उसकी आवाज से पुणे के सनातनियों के तो जैसे कान के पर्द फट गए हो। वे अचकचाकर सामंती नींद से जाग उठे। वे सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले पर तरह तरह के घातक और प्राणलेवा प्रहार करने लगे। सावित्री और ज्योतिबा द्वारा दी जा रही शिक्षा ज्योति बुझ जायें इसके लिए उन्होने ज्योतिबा के पिता गोविंदराव को भड़काकर उन्हें घर से निकलवा दिया। घर से निकाले जाने के बाद भी सावित्री और ज्योतिबा ने अपना कार्य जारी रखा। जब सावित्रीबाई फुले घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने निकलती थीं तो उन पर इन सनातनियों द्वारा गोबर-पत्थर फेंके जाते थे। उन्हे रास्ते में रोक कर उच्च जाति के गुण्डो द्वारा भद्दी-भद्दी गाली दी जाती थी तथा उन्हें जान से मारने की लगातार धमकियां दी जातीं थीं। लड़िकयों के लिये चलाए जा रहे स्कूल बंद कराने के अनेक प्रयास किये जाते थे। सावित्री बाई डरकर घर बैठ जायेगी इसलिए उन्हे सनातनी अनेक विधियों से तंग करवाते। ऐसे ही एक बदमाश रोज सावित्रीबाई फुले का पीछा कर उन्हे तंग करने लगा। एक दिन तो उसने हद ही कर दी। वह अचानक उनका रास्ता रोककर खडा हो गया और फिर उनपर शारीरिक हमला कर दिया तब सावित्रीबाई फुले ने बहादुरी से उस बदमाश का मुकाबला करते हुए निडरता से उसे दो-तीन थप्पड़ कसकर जड़ दिए। सावित्रीबाई फुले से थप्पड़ खाकर वह बदमाश इतना शर्मशार हो गया कि फिर कभी उनके रास्ते में नजर नही आया।

सावित्रीबाई ने समय के उस दौर में काम शुरु किया जब धार्मिक अंधविश्वास, रुढिवाद, अस्पृश्यता,दलितों और स्त्रियों पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार अपने चरम पर थे। बाल-विवाह, सती प्रथा, बेटियों के जन्मते ही मार देना, विधवा स्त्री के साथ तरह-तरह के अमानुषिक व्यवहार, अनमेल विवाह, बहुपत्नी विवाह आदि प्रथाएं समाज का खून चूस रही थी। समाज में ब्राह्णवाद और जातिवाद का बोलबाला था। ऐसे समय सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबाफुले का इस अन्यायी समाज और उसके अत्याचारों के खिलाफ खडे हो जाना से सदियों
से ठहरे और सड़ रहे गंदे तालाब में हलचल पैदा करने के समान था ।

1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान इन तीन सालों ने सावित्रीबाई फुले ने अपने पति और प्रख्यात सामाजिक क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लगातार एक के बाद एक बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलकर, सामाजिक क्रांति की बिगुल बजा दिया था। ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी और परिवर्तनकामी काम इस देश में सावित्री-ज्योतिबा से पहले किसी ने नही किया था। समाज बदलाव के इतने दमदार योगदान के बाबजूद इस देश के सवर्ण समाज के जातीय घमंड से भरे पुतलों ने उनके इस शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन केक्षेत्र में दिए योगदान को किसी गिनती में नही रखा। लेकिन सबसे बडीखुशी की बात यह है कि आज स्वयं दलित पिछडा वंचित शोषित समाज उनके योगदान के एक-एक कण को ढूंढकर-परखकर उनके अतुलनीय योगदान की गाथा को सबके सामने उजागर कर रहा है। ना केवल वह उनके काम को ही उजागर कर रहा है अपितु उनको और उनके निस्वार्थ मिशन को आदर्श मानकर उनसे प्रेरणा लेकर उनके नाम पर स्कूल, कालेज, आदि खोलकर दलित आदिवासी व वंचित समाज के छात्र-छात्राओं की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक मदद कर रहा है।

सावित्रीबाई फुले ने पहला स्कूल भी पुणे, महाराष्ट्र में खोला और अठारहवां स्कूल भी पूना में ही खोला । पूना में अस्पृश्यता का सबसे क्रूर और अमानवीय रुप देखने को मिलता है। इसी  स्थान पर दलित-वंचित और स्त्री समाज के लिए लगातार स्कूल खोलना भी एक तरह से इस बात का इशारा था कि अब ब्राह्मवाद की जड़े हिलने में देर नही है। पूना के भिडेवाडा में 1848 में खुले पहले स्कूल में छह छात्राओं ने दाखिला लिया। जिनकी आयु चार से छह के बीच थी। जिनके नाम अन्नपूर्णा जोशी, सुमती मोकाशी, दुर्गा देशमुख, माधवी थत्ते, सोनू पवार और जानी करडिले थी। इन छह छात्राओं की कक्षा ने बाद सावित्री के घर घर जाकर अपनी बच्चियों  को पढाने का आह्वान करने का फल यह निकला कि पहले स्कूल में ही इतनी छात्राएं हो गई कि एक और अध्यापक नियुक्त करने की नौबत आ गई। ऐसे समय विष्णुपंत थत्ते ने मानवता के नाते मुफ्त में पढाना स्वीकार कर विद्यालय की प्रगति में अपना योगदान दिया। सावित्रीबाई फूले ने 1849 में पूना में ही उस्मान शेख के यहॉं मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। 1849 मे ही पूना, सतारा व अहमद नगर जिले में पाठशाला खोली।

महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ना केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया अपितु भारतीय स्त्री की दशा सुधारने के लिए उन्होने 1852 में”महिला मंडल“ का गठन कर भारतीय महिला आंदोलन की प्रथम अगुआ भी बन गई। इस महिला मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चाबन्द कर समाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया।हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था। विधवाओं के सर मूंडने जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए सावित्री बाई फूले ने नाईयों से विधवाओं के ”बाल न काटने“ का अनुरोध करते हुए आन्दोलन चलाया जिसमें काफी संख्या में नाईयों ने भाग लिया तथा विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली। इतिहास गवाह है कि भारत क्या पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन नहीं मिलता जिसमें औरतों के उपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरूष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो। नाइयों के कई संगठन सावित्रीबाई फूले द्वारा गठित महिला मण्डल के साथ जुड़े। सावित्री बाई फूले और ”महिला मंडल“ के साथियों ने ऐसे ही अनेक आन्दोलन वर्षों तक चलाये व उनमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

यहां का इतिहास, धर्मग्रंथ और समाजिक सुधार आंदोनल गवाह है कि हमारे समाज में स्त्रियों की कीमत एक जानवर से भी कम थी। स्त्री के विधवा होने पर उसके परिवार के पुरूष जैसे देवर, जेठ, ससुर व अन्य सम्बन्धियों द्वारा उसका दैहिक शोषण किया जाता था। जिसके कारण वह कई बार मॉं बन जाती थी। बदनामी  से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी, या फिर अपने अवैध बच्चे को मार डालती थी। अपने अवैध बच्चे के कारण वह खुद आत्महत्या न करें तथा अपने अजन्मे बच्चे को भी ना मारें, इस उद्देश्य से सावित्रीबाई फूले ने भारत का पहला ”बाल हत्या प्रतिबंधक गृह“ खोला तथा निराश्रित असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला। स्वयं सावित्रीबाई फूले ने आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाते हुए आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण स्त्री काशीबाई जोकि विधवा होने के बाद भी माँ बनने वाली थी, उसको आत्महत्या करने से रोककर उसकी अपने घर में प्रसूति करवा के उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रुप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर डॉक्टर यशवंत बनाया। इतना ही नही उसके बड़े होने पर उसका अंतरजातीय विवाह किया। महाराष्ट्र का यह पहला अंतरर्जातीय विवाह था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने सारे परिवर्तन के कार्य अपने घर से ही शुरु कर समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत किए। सावित्रीबाई फूले जीवन पर्यन्त अन्तर्राजातीय विवाह आयोजित व सम्पन्न कर जाति व वर्ग विहिन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत रहीं। सावित्री बाई फूले ने लगभग 48 वर्षातक दलित, शोषित, पीड़ित स्त्रियों को इज्जत से रहने के लिए प्रेरित किया उनमें स्वाभिमान और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।

भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर स्त्री और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता। उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोले तथा समाज में व्याप्त सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ जंग लड़ी. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं…

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो / बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती / काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो / ज्ञान के बिना सब खो जाता है / ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है / इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो / दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो / तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है / इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो / ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो /

एक चिंतक के तौर पर सावित्रीबाई का मानना था कि ऊंच-नीच ईश्वर ने नही बनाए है। बल्कि इसको बनाने में तो स्वार्थी इंसान का ही हाथ है। उसी ने अपनी आगे की पीढियों का भविष्य सुरक्षित करने और अपना ऐशोआराम से जीवन जीने के लिए जातियां बनाई है। अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करने पर जब सावित्रीबाई फुले के भाई ने उसे भला बुरा कहते हुए लिखा- तुम और तुम्हारा पति बहिष्कृत हो गए हो। महार मांगो के लिए तुम जो काम करते हो वह कुल भ्रष्ट करने वाला है। इसलिए कहता हूं कि जाति रुढि के अनुसार जो भट्ट जो कहे तुम्हे उसी प्रकार आचरण करना चाहिए। भाई की पुरातनपंथी बातों का जबाब सावित्रीबाई फुले ने खूब अच्छी तरह देते हुए कहा कि- भाई तुम्हारी बुद्धि कम है और भट्ट लोगो की शिक्षा से वह दुर्बल बनी हुई है। एक अन्य पत्र में 1877 मे पडने वाले अकाल का भीषणता का जिस मार्मिकता से वर्णन किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने ना केवल अन्न सत्र चलाएं बल्कि अकाल पीडितों को अनाज देने के लिए लोगो से अपील भी की।1890 में ज्योतिबा फुले का निर्वाण होने के बाद भी सावित्रीबाई फुले पूरे सात साल समाज में काम करती रही। 1897 में महाराष्ट्र में भयंकर रुप से प्लेग फैल गया था. परंतु सावित्रीबाई फुले बिना कि भय के प्लेग-पीडितों की मदद करती रही। एक प्लेग पीडित दलित बच्चे को बचाते हुए स्वयं भी प्लेग पीडित हो गई। अतंत अपने पुत्र यशवंत के अस्पताल में 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले का परिनिर्वाण हो गया।

सावित्रीबाई फुले अपने कार्यों से सदा समाज में अमर रहेगी। जिस वंचित शोषित समाज के मानवीय अधिकारों के लिए उन्होने जीवन पर्यन्त संघर्ष किया वही समाज उनके प्रति अपना आभार, सम्मान, और उनके योगदान को चिन्हित करने के लिए पिछले दो-तीन दशकों से दिल्ली से लेकर पूरे भारत में सावित्रीबाईफुले के जन्मदिन 3 जनवरी को “भारतीय शिक्षा दिवस” और उनके परिनिर्वाण 10 मार्च को “भारतीय महिला दिवस” के रुप में मनाता आ रहा है।


अनिता भारती प्रखर दलित चिन्तक, समाजकर्मी और लेखिका हैं . यह आलेख फॉरवर्ड प्रेस के जनवरी अंक में भी प्रकाशित हुआ है.

ईमेल-anita.bharti@gmail.com
Mob- 9899700768

स्त्रीवाद के भीतर दलित स्त्रीवाद

साभार: विस्फोट.कॉम

‘दलित स्त्रीवाद का सभी मुक्तिकामी आन्दोलनों की उपलब्धियों पर दावा है, सबके साथ अलायंस है ,सबकी सीमाओं को अहसास कराते हुए.’ यह निष्कर्ष पिछले २४ सितम्बर को दलित स्त्रीवाद: चुनौतियां और लक्ष्य विषय पर हुए परिचर्चा का था, जिसे स्त्रीकाल (स्त्री का समय और सच) पत्रिका के दलित स्त्रीवाद अंक के प्रकाशन के अवसर पर स्त्रीकाल और आल इण्डिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के द्वारा आयोजित किया गया था.

स्त्रीकाल की ओर से बोलते हुए संपादक मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने कहा कि स्त्रीकाल अपने प्रकाशन के साथ ही विशेष अंकों का प्रकाशन करता रहा है और सम्बंधित थीम पर परिचर्चा आयोजित करता रहा है , इस बार का अंक चुकी ‘दलित स्त्रीवाद अंक है,’ इसलिए यह परिचर्चा आयोजित हुई है. विषय प्रवेश करते हुए पत्रिका की अतिथि संपादक अनिता भारती ने कहा कि दलित स्त्रीवाद को सवर्ण वर्चस्व के स्त्रीवाद से अलग ढंग से समझने की जरूरत है . यदि दलित स्त्री की मुक्ति की बात करनी है , तो उसे सबसे पहले जाति से मुक्ति की बात करनी होगी , देह –मुक्ति का सवाल दलित स्त्रीवाद का सवाल नहीं है. दलित स्त्री के श्रम भी गैर दलित स्त्री की तुलना में अलग है ,जहाँ उत्पीडन की संभावनाएं अधिक है .’

टाटा इंस्टिट्यूट फॉर सोशल सायंस के एडवांस सेंटर फॉर वीमेनस स्टडीज की चेयर पर्सन मीना गोपाल ने कहा कि ‘जब श्रम और यौनिकता के सवाल को जाति के सवाल के साथ जोड़ कर देखते हैं, तो स्त्रीवादी राजनीति का एक अलग परिप्रेक्ष्य सामने आता है . इसलिए स्त्री आन्दोलन पर बात करते हुए दलित स्त्री आन्दोलन की स्वायतता को अलग से समझा जाना जरूरी है.’

सी डव्ल्यु डी एस की सीनियर फेलो मेरी इ जॉन ने कहा कि पिछले चार –पांच दशकों में स्त्रियों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की है, उसी अनुपात में उनके ऊपर पुरुष हिंसा की घटनाएं बढती भी गई हैं. चाहे वह हिंसा हरियाणा के खाप पंचायतों के द्वारा हो या दिल्ली आदि जगहों में बलात्कार के रूप में हो.’

नाट्यकर्मी तथा सामजिक कार्यकर्ता सुजाता पारमिता ने इस विषय पर आपनी बातचीत में कहा कि दलित स्त्री साहित्य दलित स्त्री के जमीन पर किये गए संघर्ष से पैदा हुआ साहित्य है, इसलिए उसको देखने और समझने के लिए अलग ढंग के नजरिये की जरूरत है. उन्होंने लोककलाओं और साहित्य में दलित स्त्री के दखल पर विस्तृत प्रकाश डाला. वही जे एन यू के भारतीय भाषा केंद्र के प्राध्यापक देवेन्द्र चौबे ने कहा कि दलित स्त्रीवाद के प्रसंग में सबसे बड़ा सवाल है कि हमारे सामजिक –सांस्कृतिक संरचना में दलित स्त्री को कहाँ जगह दी गई है .’

मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका रजनी दिसोदिया ने विषय पर बहस के बाद अपनी टिपण्णी में विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में दलित स्त्री और दलित प्रश्नों के साथ भेद –भाव को स्पष्ट किया , वहीँ उन्होंने समाज में गहरे पैठ चुके जातिवादी मानस के कारण दलित स्त्री के प्रति समाज के हिंसक रवैये पर भी अपनी बात कही. अपनी टिपण्णी में दलित प्रश्नों पर आधिकारिक हस्तक्षेप रखने वाले डा बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि ‘दलित स्त्रीवाद डा आम्बेडकर की पुनर्प्राप्ति का आन्दोलन है. उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवादी लेखन आन्दोलन धर्मी लेखन है, इसकी लेखिकाएं आन्दोलनों से जुड़कर लिखती हैं न कि खाली समयों में अभिव्यक्त होती हैं.’

स्त्रीवादी चिन्तक और कार्यकर्ता रमणिका गुप्ता ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि ‘दलित स्त्रीवादी आन्दोलन से स्त्रीवादी आन्दोलन और मजबूत होगा. उन्होंने दलित स्त्री के तिहरे शोषण की बात करते हुए कहा कि उनका संघर्ष जाति और पितृसत्ता दोनो से है.’ रमणिका गुप्ता ने कहा कि ‘आदिवासी तथाकथित सभ्य समाज से ज्यादा प्रगतिमूलक समाज है. उनकी भाषा और भाषिक मिथक की प्रकृति स्त्रीवादी है . उनकी कई जनजातियों में स्त्री की संतान के लिए उसकी माता की पहचान ही काफी है , इस लिहाज से स्त्रियाँ वहां ज्यादा स्वतंत्र हैं. दिक्कत तब होती है , जब उनके बीच से ही कोई कालेज –विश्वविद्यालयों में पढ़कर सीता –सावित्री के मिथकों से परिचित हो जाता  है .’ उन्होंने इस सदी को प्रतिरोध की सदी कहा और हर स्तर पर चल रहे स्त्रियों के संघर्ष के आपसी साहचर्य को आवश्यक बताया.’ कार्यक्रम का संचालन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह  ने किया और धन्यवाद ज्ञापन ए आई बी एस ऍफ़ के जितेन्द्र यादव ने किया .

समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रश्न

समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रश्न: अनिता भारती के भाषण का वीडियो देखें


‘स्त्रीवाद मानव मुक्ति का आंदोलन है’

अनामिका हिंदी की चर्चित कवयित्री हैं.
उन्होंने उपन्यास भी लिखे हैं और स्त्रीवादी आलोचना की पुस्तकें भी. वे
नियमित तौर पर समसामयिक लेखन भी करती हैं. अनामिका स्त्रीवाद की मुखर
पैरोकार हैं. स्त्रीवाद को वे किसी भी ‘अतिवाद’ से अलग करती हैं और
स्त्री-पुरुष साहचर्य, सहज संबंध की वकालत करती हैं. उनका कहना है कि पुरुष
को ‘महबूब पुरुष’ बनाने का काम स्त्रियों का है. स्त्रीवाद का है. अनामिका
की किताब ‘स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष’ भारतीय परिवेश में स्त्रीवादी
सैद्धांतिकी की किताब है. इसमें वे स्त्री-पुरुष के सहज संबंध का लक्ष्य
स्त्रीवाद के सामने रखती हैं और साथ ही स्त्रियों के बीच ‘वैश्विक सखियापे’
का आदर्श भी.  स्वतंत्र मिश्र से उनकी बातचीत. [
साभार: तहलका ]
 

आपकी किताब  ‘स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष’  भारतीय परिवेश में
स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी को समझने-समझाने की एक पहल है. लेकिन क्या
आपको नहीं लगता  कि यहां स्त्रीवाद अंतिम औरत से कट गया है और यह घोर
अकादमिकता का शिकार हो गया है?



मध्य वर्ग को मैं एक हाइफन की तरह देखती हूं. वह एक पुल की तरह है. मध्य
वर्ग को निम्न वर्ग की दिक्कतें मालूम हैं और उच्च वर्ग का विलसित बिखराव
भी. यह सही है कि मध्य वर्ग के पास शिक्षा पहले आई. यह भी सही है कि उसे यह
समझने में बहुत समय लग गया कि उसकी तात्विक परेशानियां क्या हैं. अपने ही
वर्ग चरित्र से बाहर आने में उसे बहुत समय लग गया. किसी भी सोए हुए को जगने
के बाद उठकर बैठने में और फिर दूसरों को जगाने में थोड़ा समय तो लगता ही
है. गहरी नींद में सोए व्यक्ति को यह लगता है कि पहले मैं जग जाऊं फिर
दूसरे को जगाऊं. यह प्रक्रिया स्वाधीनता आंदोलन के समय से ही शुरू हो गई
थी.1920-30 के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों में स्त्रियों को चौकस
करने वाली बातें लिखी गई हैं. महादेवी वर्मा ने चांद पत्रिका के अपने
संपादकीय में यही सब तो लिखा है. मेरा मानना है कि गरीबी का चेहरा स्त्री
का चेहरा है. इसे रूपक की तरह देखना चाहिए कि जो भी वंचित है वह स्त्री है.
इसलिए गरीबी से स्त्री कभी कटी नहीं है. पूरी दुनिया में सिर्फ 2.2 फीसदी
संपत्ति स्त्रियों के नाम पर है. जो स्त्रियां कमाती हैं, उसे भी वे अपने
तरीके से खर्च नहीं कर सकतीं. औरतें साइनिंग अथॉरिटी बनकर रह जाती हैं.
इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि वे अपनी वंचित सखियों के सुख-दुख से अलग
हैं. अकादमिक स्त्रियों के लेखन में यह अलगाव कहीं नहीं दिखेगा. गांधी जी
के समकालीन लेखकों और लेखिकाओं का लेखन वंचितों को ही समर्पित है. महादेवी
वर्मा का पूरा गद्य वंचितों को ही समर्पित है. आज की महिला साहित्यकारों के
लेखन में भी वंचित तबके की औरतों का दर्द दिखाई पड़ता है.

स्त्रियों
में आपस में खुलकर बतियाने की एक प्रवृत्ति होती है, इसलिए वे किसी से कटकर
रह ही नहीं सकतीं. किसान, दलित, आदिवासी स्त्रियों की कथाएं रिकॉर्ड की जा
रही हैं. उनकी कहानियों को आर्काइव का हिस्सा बनाया जा रहा है. डॉ. मीता
तिवारी जस्सल की पुस्तक अभी-अभी आई है जिसमें लोक गीतों के स्त्रीवादी रंग
का अद्भुत विश्लेषण और अंग्रेजी अनुवाद हुआ है. इसलिए स्त्रीवाद के अंतिम
औरत से कटने की जो बात फैलाई जा रही है वह ठीक नहीं है.


कई लेखिकाएं खुद को स्त्रीवादी न कहलवाने का आग्रह करती हैं. क्या यह स्त्रीवाद को अलगाववाद के फ्रेम में देखने का आग्रह तो नहीं है?


शेक्सपियर के किंग लीयर में बूढ़ा पिता अपनी तीनों बेटियों से पूछता है
कि तुम लोग मुझे कितना प्यार करती हो. बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खूब
ठकुरसुहाती बतियाती हैं. बूढ़े पिता अपनी बेटियों की बात से खुश हो जाते
हैं. इन खोखली बातों की असलियत समझ कर छोटी बेटी बड़े-बड़े बोल नहीं बोलती
और सपाट ढंग से कहती है, ‘पिता जी मैं आपसे उतना ही प्यार करती हूं जितना
मुझे आपसे करना चाहिए. न कम, न ज्यादा.’  कार्डेलीया के इस कथन की त्वरा
(टोन) में ही कुछ लेखिकाओं ने ऐसा कहा है कि मैं अब स्त्रीवादी नहीं रही.
कृष्णा सोबती, मधु किश्वर और मृदुला गर्ग आदि ने ऐसा कहा है. लेकिन ऐसा
नहीं है कि उन्हें स्त्रीवादी दृष्टिकोण से अलग रखकर देखा जा सकता है. वे
पुरुषों के बारे में भी लिखेंगी तो उसमें स्त्री दृष्टि परिलक्षित होगी.
जैसे अपनी चमड़ी से छुटकारा नहीं मिल सकता है वैसे ही लेखिकाओं को
स्त्रीवादी दृष्टिकोण से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. स्त्रीवाद को
संकीर्णता के साथ देखा जा रहा है, जबकि यह तो मानव मुक्ति का आंदोलन है. जो
स्त्रियां अपने को स्त्रीवादी नहीं कहलवाना चाहती हैं, उन सबकी भाषा भी
स्त्रियों की ही भाषा है. स्त्रीवाद को छोटे फ्रेम में नहीं बल्कि बड़े
फ्रेम में देखा जाना चाहिए.

आपने अपनी यह किताब युवा पीढ़ी को समर्पित की है.


जी. मेरी सारी उम्मीद ही युवा पीढ़ी से है क्योंकि पके घड़े पर मिट्टी
नहीं चढ़ती. मेरा सारा समय छात्र-छात्राओं, अपने और मोहल्ले के युवा बच्चों
के साथ ही गुजरता है. मैंने बीजों की पोटली उन्हीं के लिए ली है. मैं
युवाओं की ओर देखती हूं कि उनकी दृष्टि में परिष्कार आया है या नहीं.
हमदर्द का भाव पैदा हुआ है या नहीं. मैं हमेशा कहती हूं कि पूर्वाग्रह एक
किस्म का मोतियाबिंद है. मोतियाबिंद में जैसे साफ-साफ नहीं दिखाई देता है
वैसे ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त नजरें चीजों को ठीक से नहीं देख सकती हैं. जो
व्यक्ति अभी देखने को उत्सुक हैं और जो नई भाषा बोलने को उत्सुक हैं, हम
तो उनसे ही संवाद करना चाहेंगे. साहित्य पूर्वाग्रहों के मोतियाबिंद की
सर्जरी तो करता है फिर भी आंखें होते-होते ही ठीक होती हैं.

जिस
’सखियापे’  की चर्चा आप इस किताब में और अपने तमाम लेखन में करती हैं, क्या
वह विभिन्न जाति, वर्ग और नस्ल की स्त्रियों के शोषण, समस्याओं,
चुनौतियों, संघर्षों के एकरूपीकरण का प्रयास नहीं है?

मैं स्त्रीवाद को
मोनोलिथ कतई नहीं मानती हूं. अलग-अलग समस्याएं हैं और उन्हें एक ही लाठी
से हांका नहीं जा सकता. वर्ग सापेक्ष  समस्याएं हैं. जाति सापेक्ष समस्याएं
हैं. लेकिन स्त्री शरीर स्त्री शोषण की आधारभूमि है– मारपीट, अनचाहा गर्भ,
अनिच्छा संभोग, गाली-गलौच, ट्रैफिकिंग, पोर्नोग्राफी, डायन दहन, सती दहन,
बलात्कार, भ्रूण हत्या आदि-आदि. स्त्री का पूरा शरीर एक टपकता हुआ घाव हो
जाता है जिसे बहुत मान और ध्यान से छूना चाहिए. शारीरिक हिंसा के इन
संदर्भों में दलित, गैरदलित स्त्रियों में भेद नहीं है. उनके दुखों की
आधारभूमि एक ही है.

आपने इस किताब में लोक चरित्रों, कहावतों और कथाओं से स्त्रीवाद
समझाया है. लेकिन उस लोक से स्त्रीवादी आंदोलन व्यापक स्तर पर कट रहा है.
दोनों का एक-दूसरे के प्रति लगाव नहीं रहा. यह शहरों तक ही सीमित रह गया
है.


यह अभियोग भी गलत है. कैनॉनिकल (शिष्ट साहित्य) और कोलोनियल (औपनिवेशिक
साहित्य) दोनों पर पहला प्रहार  स्त्री-विमर्श ने ही किया. मौखिक साहित्य
को सबसे पहले महिलाओं ने तवज्जो दी. लोक गीत, चिट्ठियां, घरेलू बातचीत के
सहज मुहावरे सचेतन रूप में स्त्री साहित्य ने दर्ज किए. भाषा का वितान बड़ा
किया. अगर स्त्रीवाद इतना संभ्रांतवादी होता तब फिर वह इतने सारे स्रोतों
से शब्द नहीं ले पाता. मौखिक साहित्य की तो पूरी बुनियाद ही औरतें हैं.

ऋतु
मेनन और उर्वशी बुटालिया ने विभाजन का इतिहास लिखा. बंटवारे के बाद
स्त्रियों के दर्द का इतिहास तो पूरा का पूरा मौखिक साहित्य ही है.
साक्षात्कार लेना, दादी, नानी की चिट्ठियां उजागर करना, मोहल्ले की
स्त्रियों तक जाना- ये पूरी शोध प्रवृत्ति ही विकेंद्रित करने वाली है. ये
वर्ग चरित्र से बाहर जाने वाली शोध प्रवृत्ति है.