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महात्मा फुले का क्रांतिकारी स्त्रीवाद

ललिता धारा


आम्बेडकर कालेज आॅफ कामर्स एण्ड इकानामिक्स, पुणे के गणित व सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष और संस्थान की उपप्राचार्या. ‘फुलेज एण्ड वीमेन्स क्वश्चन (2011) का सम्पादन । संपर्क : lali.dhara@gmail.com .

महात्मा फुले (1827-1890) को भारत की सामाजिक क्रांति के पितामह के रूप में याद किया जाता है परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि वे भारत की लैंगिक क्रांति के जनक भी थे। बचपन और किशोरावस्था में ही स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता के बीज उनके मन में पड़ गए थे। उन्होंने सावित्रीबाई के साथ लगभग 50 वर्षों तक 19वीं सदी के महाराष्ट्र में महिला सुधार आंदोलन में काम किया। फुले दंपत्ति सच्चे अर्थों में एक-दूसरे के साथी थे। जोतिराव की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था और ना ही उनके कार्य को सावित्रीबाई से अलग करके देखा जा सकता है। फुले दंपत्ति ने अपने सिद्धांतों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारा।

प्रांरभिक प्रभाव
जोतिराव गोविंदराव फुले, माली जाति के थे, जिसके सदस्य पारपंरिक रूप से बगीचों की देखभाल करते थे और ब्राह्मणवादी (हिंदू) जाति पदक्रम में उन्हें ‘‘नीची जाति’’ का या शूद्र माना जाता था। इस समुदाय के सदस्यों से यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे शिक्षा प्राप्त करें। उनकी नियति तो केवल ‘‘उच्च जातियों’’ के अधीन रहकर काम करना थी। इन सामाजिक अवरोधों के बावजूद, जोतिराव को उनकी बाल विधवा मौसी सगुनाबाई के कारण अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। जोतिराव की मां की मृत्यु तभी हो गई थी जब वे बहुत छोटे थे और सगुनाबाई, जो तत्समय के हिसाब से अत्यंत प्रबुद्ध स्त्री थीं, उनकी देखभाल के लिए पुणे आकर रहने लगीं।

अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए उन्होंने एक समर्पित मिशनरी जाॅन के घर में घरेलू काम और बच्चों की देखभाल करना शुरू कर दिया। जाॅन एक यतीमखाना चलाते थे। जोतिराव अपनी मौसी के साथ रोज़ जाॅन के घर जाते थे। वहां काम करते हुए सगुनाबाई ने अंग्रेज़ी के कुछ शब्द सीख लिए। वहीं उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के ईसाई मूल्यों को भी जाना, जिन पर उनके कार्यस्थल में अक्सर चर्चा होती रहती थी। उन्होंने जोतिराव को भी इन्हीं मूल्यों की शिक्षा दी। उनके ज़ोर देने पर जोतिराव को एक स्काॅटिश मिशन स्कूल में भर्ती कराया गया। इससे जोतिराव का परिचय पश्चिमी सुधारवादी साहित्य से हुआ। फ्रांस में पुनर्जागरण के बाद, संस्थागत धर्म की आलोचना और फ्रांस व इंग्लैण्ड में उत्तर-क्रांति काल के राजनैतिक विचारों ने भी उन पर गहरा असर डाला। थोमस पेन की पुस्तकें ‘‘राईट्स आॅफ मैन’’ व ‘‘एज आॅफ रीज़न’’ से भी वे गहरे तक प्रभावित हुए। इन पुस्तकों में मनुष्यों के प्राकृतिक अधिकारों और धर्म सहित सभी पारंपरिक संस्थाओं पर खुलकर विचार और उनकी समालोचना करने पर ज़ोर दिया गया था।

गूगल से साभार

यह महत्वपूर्ण है कि सगुनाबाई ने 1846 में ‘‘अछूतों’’ के लिए एक स्कूल प्रारंभ किया था परंतु कोई मदद न मिलने के कारण, उन्हें छः महीने के अंदर वह स्कूल बंद करना पड़ा। इस तरह, सगुनाबाई और उनके कार्यों के रूप में फुले दंपत्ति को एक रोल माॅडल उपलब्ध था।युवा जोतिराव पर कई तरह के प्रभाव पड़े,  जिनका वर्णन उन्होंने स्वयं अपने मौलिक लेख ‘‘शेतकर्याचा आसुड’’ में किया है, ‘मैं अपने बचपन के मुसलमान पड़ोसियों और मेरे साथ खेलने वाले मुस्लिम बच्चों का बहुत एहसानमंद हूं, जिनके कारण मुझे स्वार्थी हिंदू धर्म के मिथ्या वचनों का सच समझ में आया और मैं यह जान सका कि जातिभेद किस तरह की गलत सोच पर आधारित है। मैं पुणे के स्काॅटिश मिशन और सरकारी संस्था का भी आभारी हूं, जिनके ज़रिए मैं कुछ शिक्षा प्राप्त कर सका और मुझे यह पता चला कि हर मनुुष्य के क्या अधिकार हैं…मैं ब्रिटिश सरकार के स्वतंत्र शासन का भी धन्यवाद करता हूं, जिसके कारण मैं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर सका…'(देशपांडे, 2002, पृष्ठ 183)।

इसके साथ-साथ, गौतम बुद्ध, कबीर, अश्वघोष (‘‘वज्रसूची‘‘ पुस्तक के लेखक) के विचारों और लेखन व ईसा मसीह और पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का भी उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

ऐतिहासिक संदर्भ
19वीं सदी में भारत में अनेक समाजसुधार आंदोलनों की शुरूआत हुई। ये आंदोलन सबसे पहले बंगाल में उभरे और धीरे-धीरे महाराष्ट्र सहित देश के अन्य भागों में फैल गए। अंग्रेज़ों ने 1818 में पुणे पर अपना शासन कायम किया और इसके साथ ही, ब्राह्मणों के पेशवा राज का अंत हो गया। इन  समाजसुधार आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण पक्ष था महिलाओं की स्थिति में बेहतरी पर उनका ज़ोर। भारतीय समाज में महिलाओं का दर्जा अत्यंत निम्न था और सतीप्रथा, बाल विधवाओं पर लादे जाने वाले क्रूर प्रतिबंध, बहुत छोटी उम्र में शादी व पर्दा प्रथा जैसी बुराईयों की ओर  भी समाजसुधारकों की निगाहें गई ।

गूगल से साभार

जिस समय जोतिराव युवा हो रहे थे, लगभग उसी समय समाजसुधार आंदोलन धीरे-धीरे गति पकड़ रहे थे। परंतु ये सुधार आंदोलन मुख्यतः ऊँची जातियों से उपजे थे और महिलाओं के प्रति उनकी चिंता, ऊँची जातियों की महिलाओं तक सीमित थी। परंतु ये आंदोलन वर्गीय-जातीय हितों से ऊपर उठने की क्षमता भी रखते थे और ऐसा हुआ भी, जिसके नतीजे में जोतिराव फुले के नेतृत्व में गैर-ब्राह्मण समाजसुधारकों को इस आंदोलन में प्रवेश मिला। जोतिराव ने जाति व लिंग भेद पर आधारित हिंदू ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था को मानवाधिकार विमर्श के सिद्धांतों की कसौटी पर कसना शुरू कर दिया। उन्हें यह एहसास हुआ कि शूद्रों, अतिशूद्रों व महिलाओं की मुक्ति की कुंजी शिक्षा में है क्योंकि इन वर्गों को ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था ने जानबूझकर और जबरदस्ती शिक्षा से दूर रखा था।

फुले के लैंगिक सुधार


जोतिराव का पहला स्त्रीवादी कदम था अपनी युवा पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सीखने के लिए प्रोत्साहित करना। जब वे मिशनरी स्कूल में पढ़ रहे थे, तभी से उन्होंने सावित्रीबाई और अपनी मौसी सगुनाबाई को पढ़ाना शुरू कर दिया था। सावित्रीबाई एक मेधावी और ज्ञानपिपासु विद्यार्थी थीं और आगे चलकर उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र हासिल किया। फुले दंपत्ति ने लड़कियों के लिए अपना पहला स्कूल 15 मई, 1848 को पुणे के भिड़ेवाड़ा इलाके में शुरू किया। सावित्रीबाई इस स्कूल की प्रधानाचार्या थीं। इस स्कूल में सभी जातियों की लड़कियां एक छत के नीचे पढ़ती थीं। पहले साल स्कूल में 25 लड़कियों ने दाखिला लिया। उसी वर्ष, उन्होंने अछूत लड़कियों के लिए भी एक स्कूल शुरू किया। सावित्रीबाई, सगुनाबाई, फातिमा शेख और उनके कुछ पुरूष सहकर्मी इन स्कूलों में पढ़ाते थे। अगले चार सालों में फुले दंपत्ति ने महिलाओं के लिए 18 स्कूल शुरू किए।

अपने स्कूलों की एक वार्षिक परीक्षा के मौके पर जोतिराव ने लिखा, ‘‘महिलाओं को शिक्षा देना, उनकी मेधा को जगाना, उन्हें वह सम्मान देना,  जिसकी वे  अधिकारी हैं और उनके कल्याण की जि़म्मेदारी लेना, हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं के विरूद्ध है…’’। यहां वे शिक्षा को सम्मान और गरिमा से जोड़ते हैं और बिना किसी लागलपेट के महिलाओं के शिक्षा पाने के अधिकार के दमन के लिए हिंदू धर्म को दोषी ठहराते हैं। बंबई के गवर्नर को 5 फरवरी, 1852 को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, ‘‘मेरा यह विश्वास है कि स्थानीय निवासियों की बेहतरी के लिए यह आवश्यक और महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को शिक्षा प्रदान की जाए और इसी विश्वास के चलते, हमने एक पाठशाला की स्थापना की है ताकि ये लक्ष्य पूरा हो सके।’’ जोतिराव की मान्यता थी कि समाज की बेहतरी के लिए महिला शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, उनके दौर के अन्य समाजसुधारक, महिलाओं को केवल इतनी शिक्षा प्रदान करने के हामी थे जिससे वे बेहतर पत्नी और मां बन सकें। जोतिराव के लिए शिक्षा, महिलाओं के मानवाधिकारों का अविभाज्य भाग था। एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं…‘‘अगर पुरूष, महिलाओं को उनके मूल मानवाधिकार मिलने की राह में रोड़ा न बनें तो एक स्वतंत्र विश्व अस्तित्व में आएगा जिसमें सभी महिलाएं और पुरूष संतुष्ट व प्रसन्न रहेंगे’’।

गूगल से साभार

कई स्कूल खोलने के बाद फुले दंपत्ति ने अपना ध्यान अन्य सामाजिक बुराईयों पर कंेद्रित किया। उस समय बाल विवाह आम था, विशेषकर ‘‘ऊँची जातियों’’ में। कम उम्र की लड़कियों की उनसे काफी बड़े पुरूषों से शादी कर दी जाती थी और वे किशोरावस्था में ही विधवा हो जाती थीं। विधवा होने के बाद उनका सामाजिक और यौन जीवन समाप्त हो जाती थी परंतु विडंबना यह थी कि वे परिवार के अन्य पुरूषों के हाथों शारीरिक शोषण का आसान शिकार बन जाती थीं। अगर वे इस शारीरिक शोषण के कारण गर्भवती हो जाती थीं तो उन्हें और बदनामी झेलनी पड़ती थी। उनके पास इसके सिवा कोई रास्ता नहीं बचता था कि या तो वे स्वयं की जान ले लें या अपने बच्चे की या दोनों की। इस स्थिति से द्रवित होकर फुले दंपत्ति ने सन् 1863 में अपने घर के दरवाजे गर्भवती बाल विधवाओं के लिए खोल दिए। उन्होंने ब्राह्मणवाड़ा में बड़े-बड़े पोस्टर लगाए, जिसमें उन्होंने बाल विधवाओं से सीधे अपील की कि यदि वे गर्भवती हो जाएं तो हिम्मत न हारंे। उन्हें यह निमंत्रण दिया गया कि वे फुले दपंत्ति के घर आकर रहें और वहीं अपने बच्चे को जन्म दें। उसके बाद वे चाहें तो वहीं रहें और चाहें तो कहीं और चली जाएं। फुले दपंत्ति का यह सहानुभूतिपूर्ण रूख और किसी के चरित्र पर उंगली न उठाने की उनकी नीति ने उन्हें अपने साथी समाजसुधारकों से एकदम अलग और ऊँचा दर्जा दिया और वे ब्राह्मणवादी पुरातनपंथियों के निशाने पर आ गए। सावित्रीबाई ने व्यक्तिगत तौर पर 35 से अधिक ब्राह्मण बाल विधवाओं की प्रसूति में उनकी मदद की। फुले दंपत्ति ने बाल विवाह की सामाजिक बुराई के खिलाफ व्यापक लेखन भी किया।

फुले ने ब्राह्मण विधवाओं के साथ हो रहे क्रूर व्यवहार की कटु निंदा की। उनका कहना था जहां विधुर पुनर्विवाह कर सकते हैं, वहीं विधवाओं को फिर से विवाह करने से रोका जाता है। इस पितृसत्तात्मक भेदभाव की जड़ें, उनके अनुसार, हिंदू धार्मिक ग्रंथों में थीं। ब्राह्मण समाजसुधारक भी बाल विधवा समस्या पर चर्चा और बहस करते थे परंतु एकदम अलग दृष्टिकोण से। वे इस प्रथा के खिलाफ जो तर्क देते थे, उनमें पीडि़तों के दुःख के प्रति संवदेनशीलता कहीं नहीं झलकती थी। वे विधवाओं की कामेच्छा को दबाने के कारण समाज की नैतिकता पर पड़ने वाले ‘‘भयावह’’ प्रभावों के प्रति चिंतित थे। वे यह भी कहते थे कि बाल विधवाओं को महिलाओं के अस्तित्व के मूल उद्देश्य-मातृत्व-से वंचित रखा जा रहा है। उनका यह भी कहना था कि बाल विधवाएं ‘‘पवित्र’’ बनी रहें, इसके लिए उनके माता-पिता और सास-ससुर बहुत परेशान और चिंतित रहते हैं। कुल मिलाकर ज्यादा से ज्यादा वे बाल विधवाओं के दुःखों पर चिंता व्यक्त करते थे। केवल गैर-ब्राह्मण सुधारक यह देख पा रहे थे कि यह लैंगिक व जातिगत भेदभाव से ग्रस्त समाज में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है। शायद इसका कारण यह था कि वे भारतीय सामाजिक पदक्रम को नीचे से ऊपर की ओर देख रहे थे।

जोतिराव ने लैंगिक अत्याचारों, विशेषकर सतीप्रथा के खिलाफ कड़ा रूख अपनाया। उनका कहना था कि ‘‘जब किसी महिला का पति मर जाता है तो उसे बहुत कष्ट और दुःख भोगने पड़ते हैं। उसे अपनी मृत्यु तक विधवा के रूप में रहना पड़ता है। अक्सर वह अपने पति की चिता पर बैठकर स्वयं भी जल मरती है। परंतु क्या आपने कभी किसी पुरूष को अपनी पत्नी की मृत्यु पर दुःख के कारण ऐसा करते देखा है? महिलाएं अपने पति की पूजा करती हैं, उसके बावजूद पुरूष दो तीन महिलाओं से शादी कर लेते हैं। परंतु एक बार किसी पुरूष से शादी हो जाने के बाद, कोई महिला दूसरे पुरूष से शादी नहीं कर सकती और ना उसे अपने घर ला सकती है।’’ यहां भी जोतिराव बिना लागलपेट के पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर हल्ला बोलते हैं-ऐसी व्यवस्था पर जो पुरूषों को महिलाओं से कहीं ऊँचा दर्जा देती है और उन्हें अनेक विशेषाधिकार उपलब्ध करवाती है।

कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं
सावित्रीबाई व जोतिराव संतानहीन थे। जोतिराव पर यह जबरदस्त दबाव था कि वे पुनर्विवाह करें परंतु उन्होंने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उनका तर्क यह था कि अगर संतान न होने का कारण वे होते तो क्या सावित्री को पुनर्विवाह करने की इजाज़त मिलती? उनके इस निर्णय ने जोतिराव को उन चंद समाजसुधारकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में लैंगिक समानता को जगह दी। फुले दंपत्ति ने उनके घर पर रहने वाली एक ब्राह्मण विधवा द्वारा त्याग दिए गए लड़के को गोद लिया। उन्होंने उसका नाम यशवंत रखा और उसे डाक्टरी की शिक्षा दिलाई। अपने इस असाधारण और साहसिक कदम से फुले दंपत्ति ने जाति, मातृत्व, पितृत्व व वंशावली से संबंधित कई परंपरागत विचारों को खुलकर चुनौती दी।

गूगल से साभार

सन 1873 में जोतिराव ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की जो कि एक गैर-ब्राह्मणवादी सामाजिक-आध्यात्मिक आंदोलन था। इस आंदोलन ने जाति और लिंग से जुड़े मुद्दों को उठाया। सत्यशोधकों ने मुंबई के महिला श्रमिकों के महिला व श्रमिक के तौर पर दमन के विरूद्ध संघर्ष को समर्थन दिया। सन् 1893 के 25 मार्च को जेकब मिल की 400 महिला श्रमिकों ने अपने पुरूष अधिकारियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। यह शायद अपने अधिकारों के लिए भारतीय महिला श्रमिकों का पहला स्वप्रेरित आंदोलन था। सत्यशोधकों ने समाज को पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्त कराने के लिए बिना ब्राह्मण पंडितों और धार्मिक रीतिरिवाजों के विवाह करवाने शुरू किए। इन विवाहों में दंपत्ति केवल प्रतिज्ञाओं का आदान-प्रदान करते थे। इन प्रतिज्ञाओं को जोतिराव ने 1887 में लिखा था और इन्होंने पारंपरिक हिंदू विवाहों के समय पढे़ जाने वाले मंत्रों का स्थान लिया। इन प्रतिज्ञाओं में वधु यह मांग करती थी कि उसके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार हो और वर यह आश्वासन देता था कि वधु की इस मांग को वह पूरा करेगा। इसके बाद दोनों मिलकर यह शपथ लेते थे कि वे ज़रूरतमंदों और दमितों की भलाई के लिए अपनी जि़ंदगियां समर्पित करेंगे।

पहला सत्यशोधक विवाह 25 दिसंबर 1873 को सीताराम जाबाजी अलहत व मंजूबाई ज्ञानोबा निम्बारकर के बीच हुआ और इसमें कोई पंडित मौजूद नहीं था। ब्राह्मण पंडितों ने सत्यशोधक विवाह को अदालत में यह कहते हुए चुनौती दी कि इससे उनका रोज़गार प्रभावित हो रहा है और इस तरह के विवाह, उनके धार्मिक अधिकारों का अतिक्रमण हैं। हर शादी के बाद एक नया मुकदमा दायर किया जाता था परंतु जोतिराव ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दृढ़ता से सभी मुकदमे लड़े। यद्यपि स्थानीय और जिला न्यायालयों ने उनके खिलाफ फैसले दिए परंतु वे उच्च न्यायालय से मुकदमा जीत गए। फुले के नेतृत्व में सत्यशोधकों की यह दृढ़ मान्यता थी कि अंतर्जातीय विवाह, जातिप्रथा को तोड़ने का बेहतरीन जरिया हैं। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह करने वालों को अपना पूरा सहयोग और समर्थन दिया। कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने कई विधवाओं का पुनर्विवाह भी करवाया।

जोतिराव ने 1885 में ‘‘सतसार’’ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका सत्यशोधक समाज के सदस्यों के बीच बहस और चर्चा का मंच बन गई। इस पत्रिका में सदस्यों के जाति व लैंगिक मुद्दों पर विचार प्रकाशित किए जाते थे।सतसार के दूसरे अंक में जोतिराव ने पंडिता रमाबाई द्वारा ईसाई धर्म स्वीकार करने का समर्थन किया। उन्होंने ऐसा दो कारणों से किया। पहला, वे इस कदम को दमनकारी धर्म से मुक्ति के रास्ते के रूप में देखते थे और दूसरा, वे इसे एक महिला के विद्रोह और अपनी बात को दृढ़ता से कहने की क्षमता का प्रतीक मानते थे। इसी अंक में उन्होंने ताराबाई शिन्दे की 1882 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘स्त्री-पुरूष तुलना’’ पर हुई उन्मादी प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना की। इस पुस्तक में पुरूषों को यौन संबंधों में उनके दोहरे मापदंडों और पाखंड के लिए आडे़ हाथों लिया गया था। जोतिराव फुले यहीं रूके नहीं। उन्होंने ताराबाई का बचाव किया और उनके विचारों का खुलकर समर्थन किया। जोतिराव ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरूषों को प्राप्तविशेषाधिकारों और छूटों की निंदा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जोतिराव ने सत्यशोधक समाज को दार्शनिक आधार देने के लिए और हिंदू धर्मग्रंथों के विकल्प के तौर पर ‘‘सार्वजनिक सत्य धर्म’’ पुस्तक लिखी। उन्होंने लिखा कि जो लोग सत्य के पथ पर चलना चाहते हैं उन्हें महिलाओं और पुरूषों की समानता में विश्वास रखना होगा।

जोतिराव ने कभी ‘‘मानुस’’ (मनुष्य) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। वे हमेशा ‘‘स्त्री-पुरूष’’ शब्द का इस्तेमाल करते थे। भारत में ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। ‘‘सर्व एकांदर स्त्री पुरूष’’-सभी पुरूष व महिलाएं-इस वाक्यांश का उनका प्रयोग, उनकी लैंगिक जागरूकता और संवेदनशीलता को चिन्हित करता है। वे ‘महिलाओं’ को ‘पुरूषों’ में शामिल नहीं करते थे। वे भारत में महिलाओं के दमन की वैचारिक जड़ें हिंदू धर्म में और पूरी दुनिया में महिलाओं के निचले दर्जे के लिए संगठित धर्मों को जिम्मेदार ठहराते थे।

भारत में पत्नी का धर्म वही मान लिया जाता है जो उसके पति का धर्म होता है। जोतिराव ने ‘‘सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक‘‘ में लिखा कि महिलाओं और लड़कियों को अपना धर्म चुनने का अधिकार है। वे महिलाओं को किसी व्यक्ति की पुत्री/पत्नी/मां की बजाए एक स्वतंत्र व्यक्ति मानते थे। बल्कि उन्होंने तो यह साबित करने का भी प्रयास किया कि महिलाएं, मानसिक और नैतिक दृष्टि से पुरूषों से श्रेष्ठ होती हैं। जोतिराव का मानना था कि अगर भारत की महिलाएं शिक्षा, मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा से वंचित हैं, तो उसका कारण हिन्दू धर्मग्रंथ हैं जो जातिगत व लैंगिक ऊँच-नीच की वकालत करते हैं और शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं को हमेशा पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं।

आदर्श दंपत्ति थे फुले
जोतिराव की लैंगिक चेतना का एक उदाहरण यह है कि उन्होंने न केवल सावित्रीबाई को साक्षर बनाया वरन् उन्हें कवियत्री बनने के लिए प्रोत्साहित भी किया। सावित्रीबाई की कविताओं का पहला संग्रह ‘‘काव्य फुले‘‘ 1854 में प्रकाशित हुआ। जोतिराव की पहली पुस्तक इसके काफी बाद प्रकाशित हुई। उनकी कविताएं नवशिक्षित महिलाओं की चिंताओं को प्रतिबिंबित करती हैं, जिनकी आधुनिक सोच और महत्वाकांक्षाएं, तत्कालीन परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं थीं। सावित्रीबाई पहली आधुनिक क्रांतिकारी मराठी कवि मानी जाती हैं। जोतिबा की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों ‘गुलामगिरी‘ (1873) व ‘शेतकर्याचा आसुड़‘ (1883) में व्यक्त कई विचार, ‘काव्य फुले‘ (1854) में पहले से ही मौजूद थे। इससे यह स्पष्ट है कि जोतिराव अपने विचारों को व्यक्त करने के पहले उन पर अपनी पत्नी के साथ विस्तृत विचार-विमर्श करते थे। उनकी पत्नी इन बौद्धिक तर्कोें को समझतीं थीं और जोतिराव की मेधा को पहचानने वाली वे पहली व्यक्ति थीं। एक कविता में वे जोतिराव को ‘अछूतों के क्षितिज पर ऊगता हुआ सूरज‘ निरूपित करती हैं और वह भी दुनिया के यह स्वीकार करने के 20 वर्ष पूर्व।

महात्मा फुले की मृत्यु 28 नवंबर, 1890 को हुई। वे अपने पीछे महिलाओं की मुक्ति और उनके सशक्तिकरण से संबंधित विचारों और कार्यों की समृद्ध विरासत छोड़ गए। जोतिराव की मृत्यु के बाद, सावित्रीबाई ने 1897 में उनकी मृत्यु तक अपने पति के सामाजिक व राजनैतिक कार्यों को आगे बढ़ाया। फुले दंपत्ति की कथनी और करनी, सिद्धांत और व्यवहार में कोई फर्क नहीं था। उनके मन में एक-दूसरे के प्रति बहुत प्रेम और सम्मान था। फुले के स्त्रीवादी विचार उनके समय से बहुत आगे थे। उन्होंने समालोचना भी की और रचनात्मक कार्य भी। उन्होंनें केवल कहा नहीं, किया भी। इसलिए यह न्यायोचित होगा कि हम उन्हें भारत की लैंगिक क्रांति के पितामह के रूप में स्वीकार करें।
फारवर्ड प्रेस के नवंबर अंक से साभार

राजनीति की स्त्रीविरोधी वर्णमाला

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

बिहार चुनाव में महिला मतदाताओं की उल्लेखनीय भागीदारी, बल्कि पुरुष मतदाताओं से ज्यादा महिला मतदाताओं के मतदान करने की खबरें सुर्खियों का हिस्सा थीं. महिला मतदाता के रूप एक नागरिक के रूप में कुल नागरिक संख्या में आधे की हिस्सेदार हैं, लेकिन अभी तक राजनीति अपनी भाषा के स्तर पर भी उनके प्रति संवेदनशील नहीं हो पाई है.सबलोग के ‘ स्त्रीकाल’ कॉलम के लिए इसी विषय पर युवा आलोचक नीलिमा चौहान का यह विचार-आलेख. 
‘स्त्रीकाल’ के लिए स्त्रीवादी दृष्टि से लिखे आलोचनात्मक विचार –आलेख और रचनायें आमंत्रित हैं.
                                                                                                                                                          
यह महज संयोग नहीं है कि देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए राजनेताओं द्वारा जनमंचों के जरिए लगातार स्त्री विरोधी टिप्पणियां की  जा रही हैं। और यह भी महज संयोग नहीं है कि देश की जनता और उस जनता की आधी आबादी बिना किसी प्रकार का संज्ञान लिए इन टिप्पणियों को अनदेखा करती आई है। हाल ही में देश के संस्कृति मंत्री द्वारा दी गई टिप्पणी के स्त्री विरोधी स्वर को लेकर सोशल मीडिया में थोड़े – बहुत हंगामें के साथ ही लोगों ने हालिया अतीत के उन सभी स्त्री विरोधी प्रसंगों को याद तो अवश्य किया परंतु उसके बाद यह बात सदा की तरह आई गई हो गई। दरअसल राजनीतिक सामाजिक मसलों पर समय- समय पर दी गई स्त्री विरोधी टिप्पणियों में राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा ही वह आवरण है, जिसके कारण नेताओं का पितृसत्तात्मक अवचेतन अभिव्यक्त होकर भी आमजन के संज्ञान में नहीं आ सका और उस बयान की अपराधिकता और उस अपराधिकता की गंभीरता के प्रति आम राय अलग अलग होकर रह गई  ।

मुलायम सिंह यादव , नरेंद्र मोदी जैसे सामंती अभिवृत्ति के नेताओं से लेकर अपेक्षाकृत कहीं उदार व समझदार माने जाने वाले नेता अरविंद केजरीवाल तक,  सभी नेताओं ने,  विभिन्न अवसरों पर जाने- अनजाने स्त्री विरोधी भाषा का इस्तेमाल करते हुए यह सिद्ध किया है कि भारतीय राजनीति का तेवर पूरी तरह पुरुषवादी विचार से आक्रांत है. स्त्री के प्रति हिंसा के तमाम रूपों के बारे में अपनी राय जाहिर करते हुए ये राजनेता सामंती समाजीकरण के वशीभूत होकर  बलात्कार को लड़कों की माफी योग्य गलती बताते हैं, तो बलात्कार के विरोध और अपने हकों के लिए आंदोलनरत स्त्रियों को डेंटिड पेंटिड स्त्रियों का टाइम पास घोषित कर देते हैं। और यदि उन्मादी भीड़ किसी युवती को हिंसा का शिकार बनाए बिना छोड़ देती है, तो यह भीड़ की सदाशयता , भलनमसाहत और उदारता की कोटि का उल्लेखनीय कर्म हो जाता है । यदि स्त्री की प्रंशसा करनी हो तो उसे त्याग और सहनशीलता की देवी की पदवी देकर समता के दावों को खारिज कर दिया जाता है ।

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बांग़्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रशंसा में की गई टिप्पणी कि ‘ महिला होने के वाबजूद वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ रही हैं,’ उतनी ही खतरनाक है जितनी कि इंदिरा गांधी के लिए लिए की जाने वाली प्रशंसात्मक टिप्पणी “ओनली मैन इन द कैबिनेट’’ है ।इस तरह के तमाम तर्कों के पीछे वक्ता की गहरी जेंडर भेदकारी मानसिकता लक्षित होती है। मोदी द्वारा बोले गए इस सामान्य व समाज-सम्मत प्रतीत होने वाले इस वक्तव्य की भाससिक निर्मिति के पीछे स्त्री के लिए चुनौतीपूर्ण व विरोधात्मक सामाजिक वातावरण है । पुरुषों द्वारा अधिशासित दुनिया में एक स्त्री के द्वारा अपना महत्त्व सिद्ध किए जाने पर उस सफलता के लिए पुरुष होने से तुलना किया जाना वस्तुत: उसकी उपलब्धि को कमतर कर देना है और यह तुलना स्त्री के लिए उतनी ही अपमानजनक हो सकती है,  जितना किसी पुरुष के किसी व्यवहार के लिए  ” चूड़ियां पहन रखीं हैं ” और “स्त्रियों की तरह रोता और डरता है”, जैसी अभिव्यक्तियां. ये अभिव्यक्तियाँ पुरुष को अपने पौरुष का अपमान लगती आई हैं । पुरुषों के लिए जो जेंडर से बद्ध शब्दावली अपमान किए जाने का हेतु बनती है वही जेंडर पोषित शब्दावली स्त्री के लिए सम्मान या प्रशंसा का कारण कैसे हो सकती है ।

बीते अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अरविंद केजरीवाल का मंचीय भाषण स्त्री विमर्शकारों के द्वारा की गई कटु आअलोचना का शिकार बना । स्त्री की सहनशीलता के लिए चट्टानी ताकत और उफ्फ तक न करने की बात से और अपने परिवार की दो स्त्रियों को अपनी सफलता का श्रेय देकर वे दरअसल स्त्री समाज के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देना चाहते थे.  अरविंद ने जिस प्राकृतिक सहनशीलता की बात की वह दरअसल समाजीकरण के जरिए स्त्री में जबरन आरोपित गुणावली का हिस्सा मात्र है, जिसे उन्होंने सहज मान लिया,  वह गुण वस्तुत: स्त्री पर आरोपित वंचनापूर्ण परिस्थितियों का नतीजा है ; यह  बहुत बारीक व परिपक्व समझ से ही जाना जा सकने वाला सत्य है। अपने परिवार की स्त्रियों  को अपने हिस्से आई शोहरत और कामयाबी  का श्रेय देकर वे नरेंद्र मोदी के द्वारा स्थापित मूल्यों को विस्थापित करना चाह रहे थे, किंतु स्त्रियों पर आरोपित इस महानता के बोझ के निहितार्थ स्त्री के विकास में कितने बड़े बाधक हैं,  यह महीन समझ एक जननेता में नहीं थी। आशय सकारात्मक होते हुए भी अपरिपक्व भाषिक अभिव्यक्ति के कारण एक शिक्षित व समतापूर्ण विचारों के धारक वाली छवि के बावजूद उन्हें स्त्री अस्मिता के प्रति असंवेदनशील होने का दोषी पाया गया ।

वास्तव में स्त्री के प्रति हिंसा और अनुदारता को समाज में स्वीकृत कर्म माना गया है और उसके बरक्स स्त्री के प्रति की गई अहिंसा और ज़रा सी भी उदारता को प्रशंसा की कोटि में रखा जाता  है । किंतु इन परम्परा सम्मत भाषिक संरचनाओं से, यहां तक कि स्त्री की प्रशंसा के लिए प्रयुक्त अभिव्यक्तियां भी एक प्रकार की मेलोड्रामात्मक चेष्टा की प्रतीत होती है। भाषा के ये अर्थ विचलन ही स्त्री की सामाजिक स्थिति की दयनीयता प्रकट करते हैं। राजनीतिज्ञों द्वारा इस तरह के भाषिक छ्लावे के पीछे उनकी अपरिपक्व भाषिक योग्यता के साथ-साथ उनका यह विश्वास भी काम कर रहा होता है कि जनता में भी भाषा को डिकोडीकृत करने की योग्यता नहीं है । इस तरह की अभिव्यक्तियां करते हुए जननेता अपनी सामाजिक छवि व लोकप्रियता की हानि होने की आशंका से मुक्त क्योंकर दिखाई देते हैं। संभवत: इसका कारण यही है स्त्रियों की आबादी को स्वतंत्र राय वाला वोटर समझा ही नहीं जाता,  साथ ही उन्हें यह आश्वस्ति भी होती है उनके द्वारा बोले गए समाज सम्मत और साधारण से लगने वाले कथनों के पीछे की स्त्री विरोधी मानसिकता की भयानकता को समझने लायक योग्यता उन वोटरों में नहीं होगी । संभवत: यह सभी कथन इस आश्वस्ति का भी परिणाम होते होंग़े कि राजनीति पर अंतत: पुरुष समाज काबिज है और उसकी मानसिक संरचना के अनुरूप इस्तेमाल की गई भाषिक अभिव्यक्तियां उनके पुरुषत्व का पुनर्बलन करेगी और अंतत: उन नेताओं को एक सामाजिक स्वीकृति दिलाने का महत कार्य करेंग़ीं ।









जननेताओं द्वारा बलात्कार को लड़कों की भूल मानकर क्षम्य अपराध माने जाने की सलाहियत देते सामंती नेता स्त्री के वस्त्रों और चाल-चलन को अपराध के लिए आमंत्रण का दोषी मानकर पुरुष समाज की यौन हिंसा के कुकृत्यों को स्वाभाविक घोषित करते हैं। बलात्कार से बचने के लिए लड़कियों को रात में घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए ,व मातापिता के नियंत्रण में रहना चाहिए,  जैसे उपदेश जारी करने वाले नेता दरअसल पितृसत्ता को शाश्वत मानकर स्त्री को सदैव निचले पायदान पर रहने वाला प्राणी घोषित कर रहे होते हैं । इस मर्दवादी संरचना में इस सत्ता को काबिज रखने में हर मर्द दूसरे मर्द के साथ है और स्त्री के खिलाफ है । और अपनी भाषा को लेकर इसलिए बेपरवाह है,  क्योंकि उनके द्वारा की गईं इन अभिव्यक्तियों का उनके राजनीतिक कैरियर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । आज तक के इतिहास में ऎसा नहीं हुआ है कि ,अपनी स्त्री विरोधी टिप्पणियों के कारण किसी नेता को अपने कार्यक्षेत्र में कोई खामियाजा भुगतना पड़ा हो । और न ही कभी स्त्रियों ने अपनी वोट शक्ति के बल पर किसी स्त्री की समता के समर्थक समझदार नेता को चयनित करने की पहल की हो । हमारे देश में धार्मिक , भाषिक , सांस्कृतिक अस्मिताओं पर  बंटे हुए वोट बैंक अवश्य हैं किंतु स्त्री की अस्मिता के आधार पर किसी मत शक्ति का कोई वजूद नहीं है । यही कारण है कि राजनेता मंचों के माध्यम से स्त्री के सम्मान व अस्मिता का दमन करने वाले बयान जारी कर पाते हैं और बिना किसी विरोध या नुकसान को  भुगते अपना राजनीति कैरियर जारी रख पाते हैं ।

राजनीतिक व्यक्तित्वों की भाषा में इस्तेमाल होने वाले उपमान प्राय: सेक्सिस्ट तेवर लिए हुए होते हैं । बीजेपी के नेता कैलाश विजयवर्गीय का यह कथन कि “ जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीताहरण होता ही है । औरतों को लक्षमण रेखा नहीं लांघनी चाहिए ” जैसे कथनों में प्रयुक्त उपमान नेताओं की मध्यकालीन सामंती सोच को ही परिलक्षित करती है ।  धार्मिक वैमनस्य का निपटारा करने के लिए भी स्त्रियों की देह व सम्मान का हनन करने को सर्वाधिक संहारक नुस्खे के रूप में इस्तेमाल किए जाने की औपनिवेशिक सोच का ही परिणाम है कि आज भी स्त्री राजनीतिक हिंसा का निरीह शिकार बनाई जा रही है । खाप पंचायतों से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक के सत्ताधीन स्त्री के प्रति हिंसा को प्रतिशोध व दंड का एक अचूक उपाय मानते हैं । टीएमसी नेता तापस लाल का कथन कि वे “अपने कार्यकर्ताओं को माकपा की महिलाओं के रेप करने के लिए भेजेंग़े ” जैसी अभिव्यक्तियां दरअसल स्त्री के प्रति भाषिक हिंसा का उदाहरण है। अचरज है कि कार्यस्थलों पर यौनिक हिंसा को प्रतिबद्ध करने वाले कानूनों की सीमा में सत्तासीन व्यक्तियों के मुखारविंद से निःसृत होने वाली यह हिंसात्मक टिप्पणियां नहीं आती और बिना किसी कानूनी कार्यवाही के ऎसे बयान देने वाले नेता नि:शंक घूमा करते हैं । संसद में भी स्त्री सांसदों के लिए सेक्सिस्ट टिप्पणियों के लिए आजतक किसी नेता पर यौन हिंसा का मामला दायर करने का कोई उदाहरण महिला सांसदों ने भी पेश नहीं किया है ।

पितृसत्ता स्त्री को ही स्त्री के खिलाफ इस्तेमाल करती है । जैसे औपनिवेशिक दासता को पुखता करने में स्वजातीय लोगों का और दलित उत्पीड़न में दलित को ही एक आसान और सस्ते टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है । पितृसत्ता की कोई भी इकाई को ले लीजिए , सबमें स्त्री को ही शोषण  का माध्यम और उपकरण दोनों ही बनाया जाता है।जिस भाषिक संरचना के जरिए पितृसत्ता का आधिपत्य बना हुआ है वह वस्तुत: माओं की गोद के माध्यम से संतानों के बहुत भीतर तक प्रवाहित कर दी गई  है। स्त्री को ही पितृसत्ता का सहज माध्यम बनाकर पोषित किए गए संस्कारों का ही नतीजा है कि प्राय: स्त्री ही स्त्री के विरुद्ध पितृसत्ता की वकालत करती पाई जाती है। यही कारण है कि ममता बनर्जी जैसी नेता भी अपने प्रदेश की बलात्कृत स्त्री को यौन कर्मी बताकर उसके खिलाफ हुए अत्याचार की भयावहता को कम आंकती पाई जाती हैं । दमन के दुष्चक्र में फंसी स्त्री के पास अपने तात्कालिक बचाव के लिए किसी झूठे दिलासे में फंसने के उपाय के सिवाय जब कोई विकल्प व कोई सूझ नहीं होती तब वह पितृसत्ता के द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए सबसे भरोसे का औजार मात्र होकर रह जाती है । वाले भाषा व भावों के मर्मज्ञ विद्वत जगत में भी इस तरह की बयानबाजी को डीकोड करने की क्षमता नहीं पाई जाती विरोध की बात तो बहुत दूर की बात है ।

जब मुरली मनोहर जोशी कहते हैं कि ‘ रेप के लिए वेस्ट्रन कल्चर दोषी है । भारतीय संस्कृति तो महान है .’  तब वे यह जानते हैं कि उनकी अपने वक्तव्य के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती और जनता उनसे यह नहीं पूछेगी कि फिर यह महान संस्कृति पुरुषों को बलात्कार करने से रोक क्यों नहीं पाती? नेताओं की इस दुराव भरी मर्दवादी भाषिक अभिव्यक्तियों का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, यह राजनेता भलीभांति जानते हैं, इसलिए उनके वक्तव्यों और खाप पंचायतों की निरंकुशता में कोई अंतर नहीं है । हमारे देश की जनता धार्मिक वैमनस्य वाली शब्दावली के प्रति जितनी संवेदनशील है, उतनी ही संवेदनहीन वह स्त्री विरोधी शब्दावली के लिए है,  इसलिए भारतीय सत्ता में केवल पुरुष या पुरुष प्रधानता दिखाई देती है और स्त्री को आरक्षण दिए जाने संबंधी विधेयक कई वर्षों से लम्बित है और स्त्री की राजनीति में सहभागिता का प्रश्न बना हुआ है ।

किसी भी व्यवस्था की स्वीकृत भाषिक संरचना उस व्यवस्था के द्वारा स्वीकृत मूल्य चेतना का ही प्रतिफल होती है। इसलिए यह दावा करना कि किसी प्रकार का स्त्री विरोधी कथन केवल नेताओं की जिह्वा का विचलन मात्र है,  पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। भाषा के जरिए अभिव्यक्त होने वाली व्यवहार सरणियां वक्ता के अवचेतन का प्रकटन करती हैं। इसलिए नेताओं द्वारा कथित स्त्री विरोधी टिप्पणियों के निहितार्थों को गंभीरता से लिया जाना और इस तरह की मानसिकता के सुधार के लिए उपचारात्मक और निदानात्मक प्रक्रियाओं को दुरुस्त किया जाना चाहिए। स्त्री की सत्ता में सहभागिता का दिवास्वप्न यथार्थ में परिवर्तित हो जाने के लिए यह सवार्धिक आवयक है कि मंचस्थ होकर सार्वजनिक रूप से कही गई स्त्री विरोधी टिप्पणियों के लिए नेताओं को जिम्मेदार ठहराए जाने के लिए कोई वैधानिक कार्यवाही का प्रावधान हो । यह भी आवश्यक है कि नेताओं के लिए सीमांतीय अस्मिताओं के प्रति संवेदनशीलता की पैदाइश करने के मकसद से जेंडर संवेदनशीलता की कार्यशाला आयोजित की जाएं। विद्वत स्त्री समाज का यह विशेष दायित्व बनता है कि सोशल मीडिया जैसे मंचों पर इस तरह के मुद्दों की गंभीरता के प्रति संवेदनशीलता पैदा की जाए । शिक्षा के मौलिक प्रारूप में बालिकाओं को अपनी अस्मिता की पहचान और उसके दमन का विरोध करने की चेतना पैदा करने की फौरी पहल की जानी चाहिए ।

रिया मिश्रा की कविताएं

रिया मिश्रा

कक्षा बारहवीं में अध्ययनरत
संपर्क :द्वारा पुष्पेन्द्र फाल्गुन, ३१ कल्पतरु कॉलोनी, कामठी कैंटोनमेंट, कामठी, जिला नागपुर 441001.

( किशोर रिया मिश्रा की ये कविताएं उसकी काव्य -प्रतिभा और उसकी साहित्यिक सम्भावनाओं की गवाह हैं. ) 


माँ,  तेरे नहीं होने से

एक दिन अचानक कहा सबने
कि तुम बड़ी हो गई हो
क्यों और कैसे
यह सवाल मैंने खुद से ही पूछा
लेकिन न जवाब मेरे पास है
न किसी और के पास
माँ, तेरे नहीं होने से
सबने मुझे अचानक
बड़ा बनाना शुरू कर दिया
किसी ने कहा
तुम्हें अपनी छोटी बहनों की
दीदी ही नहीं माँ भी बनना है
किसी ने कहा
तुम्हें ख्याल बड़ी समझदारी से रखना होगा
लेकिन किसी ने नहीं बताया कि
समझदारी का ख्याल
मैं अपने भीतर कैसे पैदा करूँ
अब तक तो मैं बिना काँधे के
रोना भी नहीं सीख पाई
(माँ थी तो उसकी बाँह मैंने
कई बार भिगोई थी अपने आंसुओं से
माँ को भी पसंद था
अपनी बांह पर मेरे आंसुओं को सूखने देना)
माँ, तेरे नहीं होने से
अब लोग कहते हैं
मुझे सबके आंसुओं को पोछना सीखना होगा
लेकिन कैसे यह कोई नहीं बताता
आजकल मैंने महसूस किया है
कि तेरे जाने के बाद आंसू
आँखों में आने से पहले ही सूख जाते हैं
और बहनों के आँखों में तैरते आंसू
मुझे अजीब गुस्से से भर देते हैं
मैं बात-बात पर भड़क उठती हूँ
लेकिन फिर जल्दी ही समझ जाती हूँ
अपनी गलती
माँ, तेरे नहीं होने से
मैं अपने होने को समझना चाहती हूँ
और समझने को होना

बे-आवाज़

व्यस्त तेज भागते समय ने
रिश्तों से सारे रस ही निकाल लिए
तस्वीरों की मुस्कराहट बेचैन करती है
रास्ते नाम लेकर पुकारते हैं
रेशमी रिश्तों के टूटने का दर्द
सब सहते हैं
आँसुओं से भीगी हुई है वह जगह
जहां हम आखिरी बार मिले थे
एक भरे घर में
अलग-सलग पड़ी जिंदगी में
अब कोई कुछ नहीं बोलता
तुम चले गए एकदम से अचानक
जैसे चली जाती है बत्ती
टूट जाती है डोर
उखड जाता है पेड़
शोक मनाते रिश्तों को पता था
कि मैं एकदम से चुप हो जाऊंगी
उदास भी दिखने लगूंगी
पर माफ़ करने के लिए भी कोई चाहिए
कि बस बे-आवाज़ करने के लिए ही होते हैं रिश्ते

तलाश

जाना क्यों जरूरी था
जाने के लिए
खुशियों को छोड़ना क्यों जरूरी था
खुशियों के लिए
कुछ हसीन पलों को भूलना था
तुम्हें भुलाने के लिए
लगातार बदलते इस मौसम में
वजह तलाशती हूँ जीने के लिए

आजादी

भीड़ में काफी हैं
केवल दो आँखें
मुझे यह अहसास कराने के लिए
कि मैं लड़की हूँ

अब लड़कियां निकली हैं
अपने लिए नई परिभाषा गढ़ने
छूने अपना आकाश
अपनी जमीन पर
खड़ी हो गई हैं लड़कियां

हर चिड़िया लड़ाकू नहीं होती
और सारी चिड़िया सुन्दर भी नहीं होती
पर हर चिड़िया आजाद होना चाहती है
सभी उड़ भी नहीं पाती आसमान तक

मैं तुम्हारे ख्याल को इस तरह छूना चाहती हूँ
कि वह अपना रूप धरने लगे
चिड़िया तुम्हें देखना ही होगा ख्वाब खुले पंखों का
मैं तुम्हारे साथ आजाद होना चाहती हूँ

चाइल्ड केयर लीव बनाम मातृत्व की ठेकेदारी पर ठप्पा

नीलिमा चौहान


पेशे से प्राध्यापक नीलिमा ‘आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक ‘बेदाद ए इश्क’ प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com.

हमारे समाज में हमेशा से ही मातृत्व व स्त्रीत्व को एकदूसरे का पर्याय माना जाता रहा है । सभ्यता के विकास के तमाम दावे भी कभी  इस सवाल से नहीं टकराना चाहते कि संतान को जन्म देने के बॉयोलॉजिकल दायित्व के अलावा संतान को पालने का पूरा दायित्व भी क्यों केवल स्त्री का ही  होना चाहिए । पितृसत्त्तात्मक समाज ने बहुत सी सोची समझी नीति के तहत स्त्री को मातृत्व के तमाम दायित्वों से बांधकर रखा है । न  केवल बांधा है बल्कि स्त्री के उस  दायित्व का महिमामंडन  भी  किया  है ।मातृत्व के सभी पैमाने भी  समाज  ने एकतरफा सोच के तहत बनाए और उन दायित्वों की  पूर्ति के साथ स्त्री की  पूरी  की  पूरी  हस्ती  को नत्थी कर  दिया । समाज चाहे  कितना  भी  प्रोग्रेसिव क्यों न हो गया हो और यहां स्त्री  की  मुक्ति के तमाम तामझाम क्यों न दिखाई  देते  हों मातृत्व  की  भूमिका पर कोई भी  सवाल उठाया जाना अप्रत्याशित ही  नहीं  बल्कि निषिद्ध   सा  है । गर्भ के नौ महीनों में स्त्री  का स्वास्थ्य और संतान के जन्म के बाद मां व संतान दोनों के स्वास्थ्य पोषण और न्यूट्रीशन के लिए समाज के एक तबके में जरूर जागरूकता दिखाई  देती  है।  लेकिन यही  वह तबका है , जिनमें  मां  बनने के बाद स्त्रीत्व  के विकास की  संभावनाओं के अवरुद्ध होने पर उपेक्षा या उसादीनता का रवैया दिखाई  देता है ।

हमारे देश के सरकारी क्षेत्र के संगठनों में चाइल्ड केयर लीव  के नये  प्रावधान के जरिये समाज और राज्य ने पहली  बार नौकरीपेशा स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है ।  सात सौ तीस  दिन की सवैतनिक छुट्टियां बच्चे के 18 साल की आयु तक एकसाथ या कुछ भागों  में  स्त्री  कर्मचारियों  को दिये जाने के इस प्रावधान  का नौकरीपेशा स्त्रियों , उनके परिवारों और स्त्री  संगठनों ने  स्वागत  किया । लेकिन साथ  ही इस नियम के अनुपालन और शर्तों को लेकर कुछ सवालात भी उभरते दिखाई  दिए । इस प्रावधान का यह अर्थ तो है ही कि बच्चे की परवरिश को राज्य  द्वारा भी  केवल स्त्री का दायित्व  मान  लिया गया है । साथ  ही  इसका यह  भी  अर्थ  है  कि मातृत्व के बाद स्त्री अपने  करियर के किसी  के दौर  में  हो तब  भी  स्त्री को ही समझौता करना होग । मतलब पिता यानि पुरुष के करियर को संतान की  परवरिश के दायित्व  से आजाद  ही  रहने की सहूलियत  पर सरकारी  नियम का ठप्पा  ।

सवाल यहां  यह  भी  उठता है  कि स्त्री और पुरुष जब अपने  कार्यक्षेत्र  में बराबर  की  सहभागिता  कर रहे हैं तो केवल स्त्री  को  ही बच्चे की  परवरिश की  सहूलियत  देने के स्थान पर पुरुष को  भी  इस  परवरिश का भागीदार  बनाने  का  कोई उपक्रम राज्य  को  क्यों नहीं  करना  चाहिए । इस सवाल के साथ  शायद हमारे समाज  का  पितृसत्तात्मक  ढांचा पुरजोर तरीके से टकराव की  हालत में चौकन्ना  दिखाई  देता है ।  दूसरे देशों  की  तरह यदि   माता पिता  दोनों  को  ही इस सुविधा के लिए नामजद कर दिया जाए तो यह पहल हमारे स्त्री -पुरुष बराबरी  के दावों  को तो सच्चा करार दे सकती  है पर शायद  इसके व्यावहारिक रूप  में बहुत सी  रुकावटें और रूढियां  पेश  आएंगी  । अभी बच्चे के जन्म के समय पिता को मिलने वाली  15 दिन की  पैटर्निटी  लीव  के  दुरुपयोग के कई  किस्से  मांओं के द्वारा सुनने  को मिलते हैं । यदि स्त्री के बजाए पुरुष पर बच्चे की  परवरिश की  जिम्मेदारी  आएगी  तो क्या पुरुष  स्वयं को सामाजिक शर्मिंद्दगी  के भाव  से  आजाद  रख पाएगा ।  इन छुट्टियों का उद्देश्य बच्चे के स्वास्थ्य और परीक्षाओं के समय की  जरूरतों  को ध्यान  में रखते हुए प्रस्तावित  किया गया था । जाहिर है कि इन छुट्टियों को दिये जाने का  बच्चे को स्तनपान कराने और उसकी साफ सफाई  से अलग उद्देश्य भी  है । बच्चे  की  पढ़ाई  के लिए पिता उतनी  ही  उपयोगी  भूमिका निभा  सकते हैं  जितनी कि मां । फिर भी  घर बैठने के टैबू  और कार्यक्षेत्र की चहल पहल  के आकर्षण और करियर की जद्दोजहद से समझौता करने के लिए पुरुषों की मानसिक तैयारी  नहीं  होती  है । जेंडर की सामाजिक ट्रेनिंग के चलते यह चुनौती  पूरी तरह  से  माँ की  मानकर  राज्य  भी  अधिक प्रयोगात्मक होने या विवादास्पद होने से बच जाता है ।

यूं  देखा जाए तो स्त्री  की  उपेक्षा के माहौल में इस तरह की  सुविधा स्त्री  को अपने घर संतान और काम से बेहतर तरीके से न्याय करने का मौका देती है । नौ से पांच की  नौकरी के साथ बच्चे के पालन स्वास्थ्य , पढाई  के अलावा बच्चे को संस्कारित करने और बेहतर नागरिक बनाने का दायित्व केवल परिवार का ही  नहीं  है यह राज्य का भी बच्चे के प्रति पहला दायित्व है। इसलिए इन छुट्टियों को लेने के साथ  जुड़ी  शर्मिंदगी का माहौल खत्म किये जाने की  पहल होनी  चाहिए । इन छुट्टियों को  पाने के लिए शर्तें  और नियम लचीले होने चाहिए ताकि  संगठनो में इनको पारित करने के नाम पर चलने वाली  राजनीति और चूहेमारी कम  हो सके । हम  देखते हैं कि अक्सर महिला कॉलेजों में जहां  90 प्रतिशत स्त्रियां  ही  काम कर रही  हैं वहां संगठन  के हेड  कई व्यवधान पैदा कर राजनीति  खेलते हैं  और जरूरतमंद कर्मचारी को इनका लाभ उठाने के लिए बहुत सी खींचातानी से गुजरना पडता है । अक्सर इस क्षेत्र की  स्त्री  कर्मचारियों को  गर्भावस्था के दौरान  ही  नौकरी  से त्यागपत्र देकर घर बैठना पड़्ता है और बच्चे के जन्म के बाद भी  वे दायित्वों में इस तरह डूब-थक  जाती  हैं कि दोबारा नौकरी  पाना या कर पाना उनके लिए दु:स्वप्न हो जाता है । इस तरह से हम अच्छी  प्रतिभाओं को अवसरहीनता के अंधेरे कुएँ की  ओर धकेलते हैं तथा साथ  ही स्त्री  स्वतंत्रता के दावों को  भी  धूमिल करते हैं ।

गैरसरकारी  असंगठित क्षेत्रों में भी इन छुट्टियों का प्रावधान किए जाने के लिए  राज्य  को ही  आगे आकर पहल करनी  चाहिए और सामाजिक संगठनों के सहयोग से स्त्री श्रम को उचित देय दिये जाने की पहल होनी  चाहिए । हमारे समाज में जहां न्यूनतम  मजदूरी दर से भी कम पर श्रमिकों से काम लेने का प्रचलन है वहां खेत सड़कों और मिलों और घर घर जाकर काम करने वाली स्त्री श्रमिकों के मातृत्व का दायित्व बहुत अधिक क्रूर और अमानवीय दिखाई देता है । गर्भावस्था के दौरान ही नहीं शिशु जन्म के तुरंत बाद से ही निमनतर वर्ग की स्त्रियों को कठोर हालातों में श्रम करना पड़्ता है । जहां स्त्री स्वास्थ्य बच्चे का स्वास्थ्य और परवरिश की  पूरी प्रक्रिया अभिशप्त माहौल  में होती  है । जहां  ठेकेदार के द्वारा  भवन निर्माण स्थल पर पेड़ के  तले पड़े 6 माह के शिशु को कार द्वारा कुचल दिए जाने की घटनाएं  भी हमें उद्द्वेलित नहीं कर पातीं : ऎसे में व्यवस्थित श्रम और स्त्री के लिए मातृत्व अधिकारों  की  मांग  करना एक दुस्स्वप्न लगता है । हमारी  ताकत का एक बहुत बड़ा  हिस्सा और मजबूत इच्छा शक्ति और बेहतर समाज  की जरूरत के खयाल के मद्देनज़र हमें इस दिशा में सोचने के लिए खुद को तैयार करना  होगा ।

फिलवक्त तो हालात यह हैं कि इस तरह की पहलकदमियों  के बावजूद भी युवावस्था में कदम रखती स्त्री के लिए एक बहुत बडी  आशंका मातृत्व के समय अपने स्त्रीत्व और अस्तित्व की टकराह्ट की होती  है । क्या ही  अच्छा हो  कि  राज्य अपनी इस आधी  आबादी  के लिए बेहतर सुविधाओं अवसरों की समान उपलब्धता पर गौर फरमाए । साथ ही  समाज व परिवार का ढांचा  भी उदार बनाया जाना जरूरी  है  क्योंकि भौतिक सुविधाओं के अलावा व्यावहारिक स्तर पर भी स्त्री  को बच्चे की  परवरिश के लिए सहयोग और सामंजस्य का माहौल मिल सके । आखिर संतान अकेले स्त्री का ही  नहीं  समाज और राज्य दोनों का दायित्व  है ।

कंफर्ट जोन के बाहर

सपना सिंह

प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित .  संपर्क : sapnasingh21june@gmail.com

वह गुस्से में थी! बहुत-बहुत ज्यादा गुस्से में।

‘‘साले, हरामी, कुत्ते …………….’’ उसके मुंह से धाराप्रवाह गालियाँ निकल रही थी। हाॅँलाकि उसे बहुत सारी गालियाॅँ नहीं  आती थीं। हर बार वह इन्हीं दो-चार गालियों के बहुवचन इस्तेमाल करती। आज भी उसकी जबान यही कर रही थी और मैं समझ गयी कि हमेशा की तरह आज भी उसका अनु भईया से झगड़ा हुआ है ……………. और शायद वह एकाध करारा हाथ भी पा गयी थी। इस तरह वह तभी बमकती थी जब झगड़ा वाकयुद्ध से आगे जाकर हाथयुद्ध में बदलता था। और अक्सर झगड़ा अपने अंतिम स्टेज में यही रूप ले लेता था ………………. प्रतिक्रिया स्वरूप वह सिर्फ फनफना कर रह जाती थी।

यूं  भी आजकल उसके जीवन में जो कुछ चल रहा था ……………… उसे लेकर मैं आशकिंत रहा करती थी। ‘‘कूल डाउन’’ मैंने उसे शांत करने का प्रयत्न किया ये पानी पी! चिल्ड है ……………… सोच वो तेरा सो काल्ड मि. जेन्टल मैंन जो तेरी ये फुलझडि़याॅँ सुन ले तो बेचारा वही गश खाकर गिर जाये ………’’
‘‘साले …………. सब एक से होते हैं …………..’’ बेपरवाही में कहा था उसने ……………. जबकि यही ………….. बात कई तरह से घुमा फिराकर मैं उससे कह चुकी थी पर सीधे -सीधे कह पाने की हिम्मत नहीं होती थी …………….. मैं हंस पड़ी थी, ‘‘सब! माने ? और भी हैं क्या …………………?’’
‘‘तुझे क्या लगता है ……………… किसी और की जरूरत है …………..?’’ फिर वही स्निग्ध हंसी ………………… उसके होठों पर तो तिरती ही है ये हंसी ……….. साथ ही नम होती आॅँखों, थरथराती पलकों, फड़क उठती नाक और गर्दन की खिंच जाती नसों तक उसकी हंसी में झिलमिल हो उठते। मेरी चिंता और बढ़ जाती!

वैसे भी आजकल उसे देखकर अच्छा – अच्छा सा लगता है ……. वो कहते हैं न कि फीलगुड टाइप का एहसास ………. और ये एहसास ही कमबख्त मेरी चिंता का कारण! पर एक चालीस पार औरत का यूॅँ कायान्तरण क्या चिंता का कारण नहीं होना चाहिए! उसका शांत और स्निग्ध चेहरा ……………. सौम्य सादगी में लिपटा व्यक्तित्व! दिन ब दिन उसकी पंसद सोफियाना हो रही थी। उसके कपड़े उसकी डेलिगेट्स ज्यूलरी, उसके हैंडबैग्स ……….. सब उसपर सूट करते थे। उसके मूड को रिफ्लेक्ट करते थे। पहले कैसे जेवरों से लदी-फदी रहती थी ……………. जब जाओं, ज्वेलरी और साडि़यों की प्रदर्शनी लगाकर बैठ जाती। ये देखों पिछले महीने ली ………….. ‘‘ये साड़ी …………. अभी मैरिज एनवर्सरी में इन्होंने दिलाई’ …………..। पर अब, कैसे, पेस्टल कलर के सलवार सूट पहनती थी ……………….. ज्यादातर सफेद बेस वाले …………….. उसे देख मुंह से निकल जाता
………. गार्जियस!

विन्सेंट वैन्गाग , साभार गूगल

हम बैठे बातें करते रहे ……………. वह अभी कुछ दिन स्तुति के पास रहकर आई थी …………… उसी के बारे में बातें कर रही थी ………….. हाॅस्टल की स्थिति बड़ी खराब है …….. खाना भी ठीक नहीं मिलता …. साथ की दोनों लड़कियाॅँ ……. शायद पिछड़े वर्ग की हैं …. स्तुति का उनसे तालमेल नहीं बैठता ………’’
मैंने उसे समझाया  – कुछ दिन में एडजस्ट हो जायेगी ………… अभी अभी घर की सुख सुविधा से बाहर निकली ………… समय तो लगेगा ना ’’

‘‘मौली से मेरी दोस्ती लगभग सत्रह वर्ष पुरानी है। तब से जब मैं विवाह करके इस  अजनबी शहर में आयी थी। पति के सबसे करीबी दोस्त की पत्नी थी  मौली! पहले मैं उसे पति के अन्य दोस्तों की पत्नियों की तरह भाभीजी ही कहती थी। पर, बाद में हम भाभीजी टाइप की औपचारिकताओं से बाहर निकल आये थे। हमारे घर भी पास-पास थे। अक्सर हमारी दोपहरें एक साथ बीततीं ………………… ‘किटी पार्टी’ मूवी, शांपिंग और दोस्तों के घर या मुहल्ले के मुण्डन, कीर्तन इत्यादि समारोहों में हम साथ ही जाते। हाॅँ, साड़ी ज्यूलरी खरीदने वह अनु भइया के साथ ही जाती  जिनके बिल अक्सर मेरी कल्पना के  बाहर होते थे। बाद में सास-ससुर के परलोक सिधारने के बाद जब उसने सलवार सूट पहनने शुरू  किये जो जरूर मैं उसकी खरीदारी में साथ जाती थी। जब उसने सूट पहनने शुरू किये तो हमारे मोहल्ले में ये भी एक क्रांतिकारी कदम माना गया। हम जिस शहर में रहते थे यहाॅँ बहुओं के सिर से पल्ला सरक जाना भी एक न्यूज बन जाती थी, सलवार कुर्ता पहनना तो एकदम ही कल्पनातीत था। मौली के सिर पर पल्ला पहले भी नहीं टिकता था ………. बाद में तो उसने धड़ल्ले से सलवार कुर्ता पहनना शुरू कर दिया ……….. हमारे ग्रुप में वह पहली थी … जिसने साड़ी को सिर्फ खास ओकेजन के लिए रख छोड़ा था। अब तो मैं और बाकी सारी सहेलियाॅँ भी इस सुविधाजनक पहनाने को ‘नेशनल ड्रेस ’ की तरह धारण करने लगे हैं। हममें से ज्यादातर के सास-ससुर परलोकवासी हो चके हैं …………… या फिर ससुराल का घर छोटा होने या अन्य कारणों से कुछ ने अलग घर बना लिया है और टिपीकल पल्लूधारी बहूपने की भूमिका से बाहर आ चुकी हैं।

हम बहुत सी अतंरंग बातें भी साझा करने लगे थे। जैसे शादी के फौरन बाद जब मैं शुरू -शुरू में उससे मिलती थी ………. हमारे आपसी संबंधों की बाबत पूछते, उसने आपसे आप बताया था उफ, ये तो तूफान थे ………… पता है एक बार मैं मायके गई थी …….. पापा तब यहीं पोस्टेड थे ………… पहुॅँच गये फिल्म के दो टिकट लेकर …….. मुझे अपने पतिदेव से ये भयंकर शिकायत थी – फिल्म-विल्म देखने दिखाने में उनकी कतई रूचि नहीं थी। बड़े ……… गैर रोमांटिक किस्म के आदमी थे ………. और बाॅक्स क्या होता है ………. कैसा होता है .? मैंने कभी देखा जाना नहीं ……………..
‘‘कौन सी फिल्म थी ………….’’ मैंने उत्साह से पूछा था ।
‘‘अरे डफर,  फिल्म कौन देख रहा था …?’’
‘‘फिर …..?’’
‘‘नहीं समझी …..’’ वह खिल्ल से हंस दी थी ……… पर समझ कर मुझे वितृष्णा ही हुई थी। ऐसी भी क्या बेताबी कि कहीं भी शुरू हो जाओ……।

एक बार हम अपने मातृत्व के अनुभव शेयर कर रहे थे। मैं उसे बता रही थी कि पतिदेव ने उस दौरान मेरा और बेबी का कितना ध्यान रखा था। बेबी के गीले नैपी बदलने से लेकर रात में उसके जगने पर गोद में लेकर बहलाने तक सबकुछ ……..वह उदास हो गयी थी। ‘‘ मेरी याद में सिर्फ एक दृश्य है’’ सात महीने की स्तुति, कफ और खाॅसी से परेशान ……….. रो-रोकर बेहाल शराब के नशे में बेसुध पति नींद में खलल बरदाश्त नहीं कर पाये थे – चिल्लाकर बोले थे, बाहर ले जाओं ……… सिर पर क्यों चिलवा रही हो ……………. ’’ वह कड़ाके की ठंड में बच्ची को कंबल में लपेट बाहर बरामदे में टहलती रही थी ……….।

कुछ भूलता नहीं प्रिया ………….. भले ही सबकुछ भूला हुआ मान लिया जाय! बिटिया आठ महीने की थी ….. जब दोबारा प्रेगनेट हुई थी ………….. फटट से अबार्शन करा दिया ……………. केस बिगड़ गया…………. बीस दिन हास्पिटल में रही ……. बाद में जाने क्या प्राॅब्लम आयी कि कंसीव ही नहीं कर पायी। चार-पाॅँच साल तो ध्यान ही नहीं दिया – फिर लगा एक बेटा तो होना ही चाहिए ………… उसे नहीं पति को ज्यादा चाव था बेटे का …………. मानो ये भी एक स्टेटस सिबंल हो उसके रीबाॅक के टीशर्ट, शार्टस और जूतों की तरह जिन्हें पहन वह बड़ी शान से बैडमिंटन खेलने क्लब जाता था। वह तो अपनी देह की दुर्गति से इतनी डरी हुई थी कि एक बेटी से ही संतुष्ट थी। पर अभी बस्स कहाॅँ था। इलाज का दौर चला। वर्ष दर वर्ष सरकते गये ………….. देवर की शादी हो गई ………… तीन वर्ष के भीतर देवरानी ने एक बेटा एक बेटी पैदा कर मानों दुनियां फतह कर ली। हर कोई उसे कोंचता ………. जैसे एक बेटा न पैदा कर वह अपराधी हो ………………… उसकी कोख बजंर हो गई थी … क्या ये सिर्फ उसका कसूर था …….? कितना मना किया था उसने अबार्शन के लिए ……….. डाॅक्टर ने भी कहा था ‘हो जाने दीजिए’ पर, उसने कहाॅँ सुना था …. एक ही रट थी , बेटी छोटी है, अभी दूसरा बच्चा संभाल नहीं सकते ……… पर, क्या यही सच था? हफ्ते भर पहले ही तो गई थी वो क्लीनिक भ्रूण के सेक्स टेस्ट के लिए। गर्भ में लड़की
थी।

विंसेंट वैन्गाग , साभार गूगल

लखनऊ में बड़े ननदोई स्वास्थ विभाग में डायरेक्टर थे। ननद ने बुलवाया ………फिर ढेरों टेस्ट। टेस्ट ट्यूब बेबी की प्लानिंग। कितनी मुश्किल से सफलता मिली ………. दो महीने बाद पता लगा ‘‘गर्लचाइल्ड’’ है ………. तुरंत अबाॅट करा दिया गया …………. अगली …… दो बार भी यही हुआ। अंततः कनसर्निग डाॅक्टर ने नाराज होकर हाथ खड़े कर दिये – अजीब जाहिल लोग हैं। लोग बच्चा पैदा करने में असमर्थ होने पर टेस्ट ट्यूब या आई.एफ.बी. तकनीक को अपनाते  हैं ………. उन्हें किसी भी तरह एक बच्चा चाहिए होता है ………… यहाॅँ तो सिर्फ लड़का चाहिए ………….. मजाक बना रखा है इन लोगों ने मेडिकल सांइस का ………….. इतना श्रम, इतना पैसा और वक्त और उसपर शरीर की दुर्गति ……… किसलिए …….?’’

वह थक चुकी थी …….. इन सारी प्रक्रियाओं से । यूॅँ भी सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए शरीर का संबंध उसे भीतर तक अपने आपसे वितृष्णा से भर देता। उसे पता था वह बहुत पहले से अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के लिए बाहर निर्भर रहता है ……………. उन्हीं दिनों से जब वह उसकी वंश बेंल बढ़ाने  की चाहतों पर अपने शरीर की बलि चढ़ा रही थी। कई तरह के आपरेशनों दवाइयों ने उसे शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी तोड़ कर रख दिया था। पति को उसकी तकलीफों से कोई लेना देना नहीं। बेहद गर्म दवाओं ने उसके गले से लेकर पेट तक छाले पैदा कर दिये …………. वह कुछ निगलने तक में असमर्थ। पेट के दर्द और जलन से पूरे समय छटपटाहट …….. पर उसे क्या …… ? वह तो बिला नागा क्लब में खेलने जाता ……. वापस आकर फिर बन ठन कर निकल जाता ………. बारह …… एक बजे रात तक लौटता तो नशे में धुत्त पूरी तरह तृप्त …।
मैंने अपने पतिदेव के मुख से उनके दोस्त के कारनामें सुने थे ……. लगभग सभी जानते ……….. थे …… खुलेआम कोई नहीं बोलता था।
‘‘अरे, उसे तो रोज नयी चाहिए ………..।’’ मैं आश्चर्य करती, ‘‘झूठ।’’ मिलती कहाॅँ होंगी …..।’’
‘‘मिलने की तो मत कहो ………… आजकल कौन सी लड़की या औरत इन सब में लिप्त हैं ……………. कहा नहीं जा सकता ……….. शहर में हर पैसे वाला आदमी अब ये सब करना ……… स्टेटस सिबंल मानने लगा है ’’ मेरे चौकने पर आगे जोड़ा जाता,’’ अब हम जैसे कुछेक ही होते हैं जो एक के साथ ही चिपके हैं …………।’’
प्रकट में भले मैं हसंकर उनकी चुटकी लेती भई अपने श्रीमान जी तो न ठहरे पैसे वाले न ऊॅँचे स्टेटस वाले बेचारे। पर, भीतर कहीं एक अव्यक्त सी चिंता सिर उठा ही लेनी।

मौली के ठाठ देखकर कोई भी उससे रश्क कर सकता था। उसकी लेटेस्ट साडि़याॅँ, ब्राडेड पर्स और फुटवेयर, महंगी और डिजायनर ज्यूलरी। क्या कुछ नहीं था ….. दूसरे बच्चे के लिए उसकी ख्वाहिश और कवायद से हम सखियाॅँ परीचित थी। पर, ये तो हर दूसरे घर की कहानी है। पढ़े-लिखे, आधुनिक कहे जाने परिवारो के भीतर भी हमने लड़कों के लिए ऐसी कवायदें देखी थीं ……………. हममें से कई इन स्थितियों से गुजर भी चुके थे। हमेशा परिवार या पति ही पूरी तरह दोषी नहीं होते ……………….. हम ये भी जानते थे। हम औरतों के भीतर भी पुत्रवती होने के लिए एक जबरदस्त ललक होती है।

पिछले कुछ समय से मौली ज्यादा खुलकर मुझसे अपनी बातें शेयर करने लगी थी……………. मुझे लगता था वह अपने शरीर के बाझपने से उतनी आहत नहीं जितना अनु भईया की चरित्रहीनता से। मैं एक अच्छी श्रोता थी ………………. चुपचाप बिना उसे टोके … बिना कोई सलाह दिये …………………. उसके कहे को सुन लेती थी ……………. और भीतर जज्ब भी कर लेती थी …. पर उस बार तो उसकी बाते अलग थीं ………….. उसके कहने का ढ़ग अलग था ……………. वह करीब तीन महिने बाद मिली थी। स्तुति के मेडिकल में चयन की खुशखबरी पर मैंने उसे फोन पर बधाई दी थी और ये सोचे बैठी थी कि ……………… वह स्तुति के एडमिशन हाॅस्टल बगैरह की तैयारियों में जुटी  होगी इस लिए नहीं दिख रही ।

गमलों की कुड़ाई करती मैं मौली को सीढियां चढ़ती देख खुरपी रख उसकी ओर बढ़ गई थी, कहाॅँ गायब हो गई थी तू……….? स्तुति का एडमिशन हो गया ……..? ……हाॅस्टल कैसा है ….? मैंने एकसाथ ढेरों प्रश्न उसकी तरफ ठोक दिये थे। वह वहीं बांलकनी में रखी  केन की कुर्सी पर ढहती हुई ………..आॅँखे मूंद मुझे हाथ के इशारे से चुप रहने को …… शांत होने को इशारा किया। मुझे लगा वह थकी हुई है …………. मैं भीतर आ गई थी …………. उसके लिए पानी और गुड़ लेने। उसे प्यास लगने पर पानी के साथ और किसी भी मिठाई की अपेक्षा गुड़ खाना ज्यादा अच्छा लगता था ……….। मैं …… पानी लेकर बाहर आयी तो उसे उसी तरह बैठे पाया ……..। मन से थका हुआ व्यक्ति, बाहरी थोड़े से भी श्रम से पूरी तरह थका हुआ नज़र आता है। पर उसके चेहरे पर नज़र पड़ते ही मेरे विचारों को झटका सा लगा था ……… ये तो कोई नई ही मौली थी,  बिल्कुल ऐसे ही तो आॅँखे बंद कर वह हमेशा इसी कुर्सी पर निढ़ाल, बुझी और थकी हुई सी ढह जाया करती थी, पर आज ये कुर्सी पर पड़ा हुआ शरीर, ये गुंदी पलकों वाला चेहरा …………. न ही थका लग रहा है ……. न ही बुझा हुआ। पता नहीं क्यों पर बड़ी शिद्यत से ये एहसास हो रहा है कि इन पलकों को इसलिए मूंदकर नहीं बैठा गया कि भीतर की पीड़ा आॅँखों से छलक न उठे ………..। इतनी शांति और इतनी तृप्ति मैंने इसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखी थी। वह भीतर उतरी हुई थी ………………. अपने भीतर कहीं गहरे …….. किसी सुख में लबालब भरी हुई सी। ना ऽ ये चेहरे पर छलक पड़ती सूकून भरी शांति ……… महज बेटी की सफलता से उपजी हुई नहीं हो सकती।
‘‘मौली ……।’’ मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रक्खा, ‘‘क्या बात है ……… कुछ कहना है ……..? ’’

उसने आॅँखें खोलीं खूब गहरी नजरों …..…….. से देखा था मुझे ‘‘हाॅँ, कहना है …….. तुमसे ही तो कहती रही हॅूँ ……… सबकुछ ………. पर आज कोई दुखड़ा नहीं ……… आज तो सुख कहूॅँगी ……..’’ नीला, दुनिया की सभी औरतें अपने पति की इज्जत करना चाहती हैं …….. प्यार करना चाहती हैं। पति के रूप में परमेश्वर की कामना करती हैं …………….. मैं भी उन्हीं औरतों जैसी ही तो थी। पति द्वारा बहुत बहुत तिरस्कृत होने के बावजूद कभी कभी उसपर दया, प्यार जैसा कुछ उभड़ता बेड के किनारे से खिसक कर मैं उसकी तरफ ….. उसके लिहाफ में घुस आती ………. उसके सीने से लगकर सोने ……… को जी चाहता ….. उसके बाहों में सर रख कर उसके सीने में अपनी नाक घुसाकर माथे पर उसकी ठुडडी और बालों पर उसके हाथों की सहलाहट …………..  इन सबके लिए मन तड़प सा उठता ………. उसके लिए बहुत-बहुत नफरत महसूसेन के बावजूद ……… उसी से इन कोमल भावनओं की आशा भी करती थी। जाती थी इस आशा से कि …………. वह हर तरह से तृप्त आदमी, मुझे अपनी बाहों में ले ………… सांतवना का हाथ मेरे सिर पर फेर मेरी थकी आॅँखों को थोड़ी सी सूकून भरी नींद देदेगा। पर …………….. होता यूॅँ था कि मेरे सानिध्य से उसकी तृप्त देह में फिर से कामनाओं की आंधियाॅँ उठने लगतीं। मुझे थपकाते, सहलाते, पुचकारते, वह मुझे अनुग्रहित सा करता, स्वयं तृप्त होता और फिर मुंह फेरकर खराटे लेने ………. लगता। अगले पूरे समय मैं अपने आपकों लताड़ती ……….. फिर भी कही गहरे इस संतोष को भी जीती कि मैं अपने शरीर से उसे तृप्त कर पायी। सुबह जब वह मुझे इस अदांज से देखता …. मानों रात को मैं अपनी शारीरिक तृप्ति के लिए उसके पास आई थी तो जाने कैसी घिन सी छूटती अपने ही शरीर से ……. उस वक्त भीतर से यही इच्छा होती , उसे एक थप्पड़ रसीद कंरू और चिल्लाकर बोलूं
‘‘ बड़े पति बने फिरते हो ……….. मर्द होने का बड़ा घंमड है तुम्हें ……..जाने कितनी को अपने नीचे से निकाल चुके हो …………. कभी जानने की कोशिश की कि तुम्हारी खुद की बीबी पिछले चैबीस वर्षो में कभी एक बार भी तुमसे तृप्त हुई ………..?  वो क्या कहते हैं ………….. आर्गेज्म किस चिडि़या का नाम है? पता है तुम्हें
…………..?’’

साभार गूगल

वह धाराप्रवाह बोल रही थी और मैं टेशंन में थी कि कहीं कोई धमक न पड़े ..……… एकाएक वह अपना मुंह मेरे कान के पास लाकर बोली, ‘‘सुन जो मैं उससे कह दॅूँ, हाॅँ, मैंने आर्गेज्म नाम की चिडि़या का पूरा नाम – पता जान लिया है …… और साॅरी, पति महोदय ……….. ये जानकारी, आपके द्वारा नहीं किसी और के द्वारा मुझे उपलब्ध हुई है, तो साले, उस पति का क्या हाल होगा ……..? ’’
हे ………. भगवान। तू पगला गई है क्या ………….. कैसी बकवास कर रही है ……. पी तो नहीं ली ………..?’’

वह खिलखिला उठी थी – बच्चों जैसी निर्दोष हंसी, ‘‘ बेवकूफ! नशा तो अब टूटा है …………. अब तक तो जैसे नशे में जीती चली आई थी ………. सच, हम अपने इर्द गिर्द कितने सारे भ्रम बुन लेते हैं न ……….. और उन भ्रमों के नशे में जीते चले जाते हैं । ’’
‘‘ये देख।’’ इसने अपने हाथ मेरे सामने लहराये, ‘‘देख इन हाथों पर नसें उभरने लगी हैं गर्दन, आॅँखों, होठों के किनारों की गहरी पड़ती लकीरें ……….. तेजी से सफेद होते बाल ………. ढीले पड़ते बदन के कसाव ………………… उठते बैठते दर्द के साथ आवाज करती हड्डियाॅँ ………… उम्र के निशान अपने होने का एहसास तेजी से बिखेर रहे हैं’’ उसने झटके से अपना कुर्ता ऊपर उठा दिया, ‘‘ये देख, ये कटा-फटा पेट …….उसने यहाॅँ अपने होंठ रक्खे थे – वो मेरा नीलकंठी शिव ……………………. मेरी आत्मा में भरी सारी टीसों को सोख लिया उसने ………… सच, जीवन में कुछ अच्छा होना होता है न तो आहटें पहले सुनाई देने लगती हैं ……….. बेटी का मेडिकल में चयन और अचानक उसी शहर में उसका मिलना। लगा बीच का वक्त बस्स बीत गया …………………… बिना उस एहसास का हुये, बदले या विकृत किये ………… हमने जो ………… जीया वो सबकुछ शारीरिक लटर-पटर से कुछ आगे था ……….. ज्यादा था ……….. कुछ बड़ा ……………. समथिंग  नेमलेस ………हमें तो ये भी नहीं पता कि हम फिर कभी मिलेंगे या नहीं बस्स लगता है, कोई चाहत कोई तृष्णा अब बची ही नहीं ………. गले तक भरा हुआ मन ………..’’
‘‘मौली ……. चुप हो जाओं’’ मेरी आवाज सख्त होने के चक्कर में फट सी गई थी, ‘‘मैं नहीं सुनना चाहती कुछ भी …………………… जब्त कर ले अपने भीतर ………… अपने इन निजी सुखों को ……………. बाहर दुनियाॅँ मंे इनका कोई मोल नहीं ………… ऐसे सुख अनैतिक है ……………’’

उसकी आॅँखों में बूंदे चमचमा उठी थी ‘‘सारी जिंदगी संत्रास दुःख अपमान सहना, सहते चले जाना …………… बिना अपनी गलती जाने एक सजा की तरह जिंदगी काटते जाना नैतिक है? क्यों …? और अपनी खुशियों की तरफ थोड़ा सा हाथ बढ़ा लेना या उन्हें एक छोटे से क्षण में जी लेना अनैतिक! सुख हमेशा वर्जित और अनैतिक क्यों होता है……………….? वो एक दाण मैंने अपनी आत्मा की पूरी सजगता …………. रोम रोम की पूरी चेतना के साथ जीया है ……….. ना ऽ काई पूजा, प्रार्थना, इबादत, सज़दा …….. ऐसे शब्द भी उस क्षण की पूर्णता को परिभाषित नहीं कर सकते ……………….. बस्स जी लेना जैसे हीक भर जाये ……….’’ ‘‘पर, …..’’ मैं हकला गई थी। मौली का ये रूप मेरी कल्पना के किसी भी ………….. ओर छोर से परे था। जेवरें गढ़वाती मौली शाॅपिंग करती मौली। बार-बार अस्पताल में भर्ती होती मौली ……….. तीज, करवाचैथ और वट सावित्री के ब्रत रहती मौली किटी पार्टीज अटेंड करती मौली। आम पत्नियों की तरह पतियों की बुराई करती मौली ………… इन सारे सारे रूपों में मौली मेरे लिए बिल्कुल स्वभाविक थी पर ये मौली ? ये शांत निर्मल रूप जाने क्यों मुझे अटपटा सा लग रहा था। उसके चेहरे से झलकती निर्दोष खुशी देख कर उसके लिए खुश होने का मन हो रहा था …………… अपने कंफर्ट जोन से निकलती हुई इस औरत के लिए न तो मैं ठीक से खुश हो पा रही थी ……………… न ही उसे लताड़ने के लिए जबान साथ दे रही थी …………… एक चिंता सी उग रही थी भीतर ……….. बस्स।

हाशिए की पीड़ा की शाश्वत अभिव्यक्ति : ‘मैं साधु नहीं’

डॉ. विमलेश शर्मा

राजकीय कन्या महाविद्यालय अजमेर, राजस्थान  में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : vimlesh27@gmail.com

समय शाश्वत है औऱ इसके साथ- साथ सहमतियाँ और प्रतिरोध चलते रहते हैं। कुछ मान्यताएँ देश, काल , परिस्थतियों के साथ उपजती हैं । जो उनके बहाव के साथ चलती है वे अनुकूल पर जो विसंगतियों का कारक बनती हैं वहाँ एक प्रतिरोध उपजता है।  यह प्रतिरोध वस्तुतः सामाजिक वर्जनाओं के प्रति और असत्य के प्रति होता है। आज जहाँ सत्य हाशिए पर है वहाँ पर संवेदनाओँ की बात करना हास्यास्पद लगता है परन्तु अदीब इन संवेदनाओं को अपनी लेखनी से हर काल , परिस्थिति और सरोकारों को उकेरता रहा है।  ये कलमें उन तमाम स्थितियों पर अपनी संवेदनशील नजर डालती है जिन पर समाज सिर्फ बहस करता है। इन्हीं भावों को लेकर हीरालाल राजस्थानी का काव्य संग्रह ‘मैं साधु नहीं’ एक सच्चा विरक्तिभाव और लेखकीय प्रतिबद्धता  लिए हमारे समक्ष उपस्थित होता है। अपने कहन से लेखक यह भी स्पष्ट कर देता है कि प्रतिबद्ध होना कट्टर होना नहीं है। प्रतिबद्धता गतिशीलता को साथ लेकर चलती है। इस संकलन में लेखक आहत है सामाजिक संरचना के वीभत्स पहलुओं  से, स्त्री विरोधी सोच से और उन तमाम पहलूओं से जिनसे शोषण जन्म लेता है, शायद इसीलिए इन कविताओं में व्यवस्था के प्रति विरोध है, एक प्रतिकार है , एक संवेदना है तमाम हाशिए के लिए और एक चिंता है मानवता को बचाने के लिए।  आज जब सभी सभ्यताएँ अतिवादी विकास के मुहाने पर खड़ी हैं  और हर ओर शहरीकरण और आधुनिकीकरण हावी है तब हर व्यक्ति सूकून की तलाश में  गाँवों की ओर रूख करना चाहता है ।  परन्तु इसके ठीक उलट लेखक का  मानना है कि गाँव से शहर भले हैं। इसके पीछे है मनुवादी सोच औऱ जातिगत समीकरण जो गाँवों में अब भी पूरी वीभत्सता के साथ मौजूद है । शहर कई -कई स्थितियों में बेहतर हैं क्योंकि वहाँ न जाति-धर्म का भेद है और ना ही खून के रंग का  भेद। हालांकि कई शहरों में स्थितियाँ उलट है परन्तु बनिस्पत गाँवों के ऐसे शहर बहुत कम हैं-
गाँव से शहर भले/ जहाँ न ठाकुर का कुआँ/ न मनुवादी मुंडेरे/ नगर निगम का पानी/ जो बिना भेदभाव के/ गली-कूचों की रगों में/संचारित हो..

कवि इस संकलन में हाशिए की सभी संवेदनाओं को ज़ज़्ब करता है । स्त्री संवेदनाओं और संघर्ष पर संग्रह में सर्वाधिक कविताएँ हैं जहाँ लेखक उसके समकक्ष खड़ा होकर उन स्थितियों को महसूसने का प्रयास करता है जिसे स्त्री इल्म और हुनर में बराबरी का हक रखते हुए भी सदियों से झेलती आई है। सर्वश्रेष्ठ, गाँव से शहर भले, शोषक और चलन कविता इन्हीं भावो को लेकर हमारे समक्ष उपस्थित होती है।  इन कविताओं में स्त्री है, उसका शोषित पक्ष है, परिवार है और पुंसवादी सोच से टकराव भी है। सर्वश्रेष्ठ कविता स्त्री पुरूष के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति है। जहाँ वे दोनों ही अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और परिणामतः रिश्तों में एक तनाव उपज़ता है। गाँव से शहर भले  कविता एक अजीब सी तसल्ली देती है कि “गाँव से शहर भले हैं /जहाँ स्त्रियाँ/रूढ़ियों की कील नहीं समझी जाती.” । वह स्त्री के उस शोषण को महसूस करता है जिसे वो सदियों से भोगती आयी है और उन्हीं भावों को साधारणीकृत करते हुए वह शोषित पलों में अपने आपको एक स्त्री रूप में पाता है और लेखकीय संवेदना का विस्तार शोषक कविता की इन पंक्तियों में देखा जा सकता  कि “शोषण जब मेरा होता है तो मैं अपने-आपको/ स्त्रियों की कतार में पाता हूँ।”
तकनीक के दौर में आज भले ही दुनिया हथेली में सिमट गई हो परन्तु इस क्रांति का एक बहुत बड़ा खामियाजा नई पीढ़ी अवसाद और अकेलेपन के रूप में भुगत रही है। आज हर ओर गलाकाट प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का माहोल है। परिणामतः व्यक्ति भीड़ं में रहकर भी अकेला है। शख्शियत कविता इसी अजनबीपन को इंगित करती है परन्तु साथ ही कवि सकारात्मक भी है कि अगर आत्मविश्वास औऱ मनोबल है तो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी डटा रह सकता है- लहरों की तरह, उछालें, तोहमतें की छीटें, मेरे दामन पर, मगर , मैं खड़ा था , चट्टानों की तरह!! इस संग्रह की कविताओँ में वस्तुतः वही चिंता लघुतर कलेवर में है जो प्रसाद की ‘कामायनी’ में है और यही कारण है कि सभी वर्ग इन कविताओं में अपनी समस्याओं के साथ आ खड़े हुए हैं। वे स्त्री हो या पुरूष दोनो से ही अहं को त्यागकर समरस जीवन जीने की बात करते हैं। इसीलिए वे शरीरों से आगे बढ़ने की बात कहते हैं- “ आओ ,हम दोनों ही, इंसान बनने की कोशिश करें, जो शरीरों से आगे, मानवता के मापदण्ड स्थापित करती हो!”

लेखक अनेक सामाजिक विषयों पर अपनी कविता ठेठ देसी  ढंग से रखता है क्योंकि आम जन की परेशानियाँ वैश्विक नहीं है । वह रोज इन्हीं अनुभवों से गुज़रता है। दहेज जैसी सामाजिक विसंगति पर वे अपने विचार ‘चलन ’ शीर्षक कविता में लिखते हैं और बहुत सधे हुए शब्दों में कह देते हैं कि धनवान हो या गुणवान दोनों ही प्रकार के वर खरीदना आज सुलभ हो गया है, “आखिर! दहेज का चलन जो है”। कवि वस्तुतः एक अकुलाहट को जीता है। घटित को शब्दों में बदलने की प्रक्रिया में अनेक शब्द गिरते हैं,बैठते हैं और जब किसी दबाव वश बाहर नहीं निकल पाते हैं तो सड़ने लगते हैं। इसीलिए वो लिपिबद्ध होना चाहते हैं । इसीलिए लेखक लिखता है औऱ उन तमाम कुचालों का जिक्र करता है जो सदियों से धर्म और जाति व्यवस्था के नाम पर फैलायी जा रही है।  वह कहता है सदियों से यह जो खेल खेला जा रहा है आज भी उतने ही शातिराना ढंग से समाज में उसकी रवायतें मौजूद हैं।  गाँव की खाप पंचायत हो या शहर का सफेदपोश तबका सभी अपना काम करने में माहिर हैं। “गाँव की खाप हो / या शहर की लॉबी हो/ उत्पीड़न का तांडव/ अपनी घाघ बुद्धि से / मानवीय मूल्यों को/  घायल करने का दाव / आज भी नहीं चूकता ।”(खेल की जाति, जाति का खेल ) हाशिए के उस वर्ग की पीड़ा को जो सदा से अभावों में रहा है उसे बखूबी ‘मंदिर और मैला’ कविता मे उकेरा गया है।

आज विसंगतियों से भरे इस युग में अगर किसी चीज़ को वाकई बचाना है तो वह है मानवता और इसके बचाव में उन दकियानूसी  और रूढ़िवादी मूल्यों को तोड़ना आवश्यक है  जो तथातथित वैदिक परम्परा की देन है । इस प्रक्रिया में वह पुरजोर आवश्यकता महसूस करता है इतिहास के पुनर्लेखन की जिससे मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित मापदण्डों का पुनर्निर्माण किया जा सके। इसीलिए वे दकियानूस धार्मिक ग्रंथों को वेस्ट मैटिरियल मानते हैं और बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट की ही तर्ज़ पर सार- सार को गहि ले ,थोथो देय उड़ाय की बात कहते हैं। कवि संवेदना शब्दों से प्रभावशाली वर्ग की गंधाती ,बजबजाती औऱ सड़ांध मारती हुई संस्कृति पर प्रहार करने की कोशिश करते हैं- “वेस्ट मटिरियल की तरह पड़े/ ये रामायण/  महाभारत/ कुरआन/ बाईबिल और / वेद पुराण इत्यादि को गला कर/ कुछ मानवीय मूल्यों पर केन्द्रित मानदण्डों का पुनर्निमाण आवश्यक है।”
पूँजीकरण, शौषण और बेलगाम काली पूँजी के बल पर हर असहाय को दबाया गया है। भावनाओं से खेल कर उसे वास्तविक विषयों  से दूर किया गया है। अन्याय पर टिकी व्यवस्था में अहिंसा एक असंभव कल्पना है और कवि मन बारीकियों से इन तमाम पहलूओं  को देखता है। वह समाजवाद के उस पक्ष से आहत है जिसे एक आदर्श रूप में देशवासियों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। यहाँ धर्म हर पल रंग बदलता है और एक असहाय ना जाने किन आशाओं के झरनों की तलाश में जीवन जिए चले जाने की फ़िराक में जीता है। इन कविताओं में कवि कहीं आशान्वित होता है ,कहीं बागी होता है और कहीं हताश होता है। कवि आशान्वित है क्योंकि वह कलम का धनी है और  यही कलम संघर्ष के खिलाफ लड़ती है और,“ बहुत बारीक सी उन संवेदनाओं को साकार करती/जो मेरे मन में /पल-पल बढ़ रही होती/और /मेरी अँगुलियों को/ संगठित होना सिखा / मुझे साधु(निकम्मा)/ होने से भी बचाती है। ”

कविताओं के शिल्प पर बात की जाए तो यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि वैचारिकता को जिस सहजता का जामा पहनाकर कविताएं प्रस्तुत की गई हैं वह सिर्फ हीरालाल राजस्थानी ही कर सकते हैं। कवि का शिल्प के प्रति कोई विशेष आग्रह नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि कवि का मंतव्य शायद भावों और चिंताओं को उस आम जन तक पहुँचाना रहा है जहाँ से ये ग्रहण की गई हैं। यहाँ कोई बिम्ब विधान नहीं है, ढाँचे के प्रति बुनाव़ट का प्रयास नहीं है क्योंकि कवि उस हाशिए की पीड़ा को अभिव्यक्त करना चाहता है जो अपने निजपन में परिवेश में आए तमाम बदलावों  के बावजूद आज भी उतना ही सहज है, सच्चा है जैसा पहले था ।

संकलन की 60 से अधिक कविताएं नाना विषयों को सहेजती हुई चलती हैं परन्तु मानवीय संवेदना को स्वर प्रदान करना और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद इन कविताओं का मूल स्वर है।  लेखकीय प्रतिबद्धता समाज में घट रहे खौफनाक मंजर को ना सिर्फ अनुभव करती है वरन् वह उसे बाहर से भी देखना चाहता है। यहाँ लेखकीय तटस्थता अनेक मंजर देखती हुई आखिरकार उस नतीजे पर पहुँचती है कि स्वार्थ के पैमाने पर उतरती संस्कृति एक दिन व्यापार में बदल जाती है।  स्त्री और दलित कविताओं के केन्द्र में है जो यह बताता है कि कवि मन संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ने में कुशल है। वस्तुतः ये कविताएं उस वर्ग की चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसका वास्तविक सौन्दर्य मानवता का शुद्ध रूप है। स्पष्ट है इस उद्देश्य के साथ कविता के सौन्दर्य को बनावटीपन और सायास  अलंकारों से अलंकृत करने की कहाँ आवश्यकता है । ज़ाहिर है ऐसे शब्द तो अपनी प्रकृति से ही मानवीय पगडंडियों से चलते हुए ह्रदय के गह्वरों में सौन्दर्य के झरने स्वतः ही ढूँढ लेंगें।

पहले बाबरी , फिर दादरी , फिर हिन्दुत्व के नाम पर बहादुरी

90 साल की लेखिका कृष्णा सोबती को जब दिल्ली के मावलंकर
हाल
के मंच पर व्हील चेयर में बैठाकर लाया गया तो जो दृश्य उपस्थित हुआ वह दुनिया
के किसी भी निरंकुश सत्ता के लिए आसानी से हजम करने वाला दृश्य नहीं था. मंच से
कहे गये कृष्णा सोबती के शब्द उस बुजुर्ग लेखिका के शब्द थे, जो अपने देश को सह –अस्तित्व
का एक ऐसा भू –भाग के रूप में देखना चाहती है, जहां आने वाली पीढियां सुकून का
जीवन जी सकें, जहां जीने –रहने –खाने के ऊपर सत्ता या किसी लम्पट तंत्र की
निगाहबानी नहीं हो .
कृष्णा सोबती ने बढ़ती
असहिष्णुता के प्रति अपनी
चिंताओं से समाज को आगाह करते हुए कहा  ‘ पहले बाबरी , फिर दादरी, फिर हिंदुत्व के नाम
पर बहादुरी’. यह पंक्ति कोई तुकबंदी नहीं है, यह पिछले कुछ दशकों से देश के भीतर
बन रहे वातावरण को नकारती वरिष्ठ लेखिका का
उदगार है , चिंता और आक्रोश है. 1 नवंबर को मावलंकर
हाल में ‘ प्रतिरोध’ के लिए साहित्यकार –इतिहासकार –वैज्ञानिक –सामाजिक कार्यकर्ता
इकट्ठा हुए . यहाँ उपस्थित लोग देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ इकट्ठा हुए थे.
इनमें से कई लोगों ने पिछले दिनों अपने सम्मान वापस किये थे, इस आशा में कि सरकार
की संवेदना अपने देश के विवेकशील लोगों के ध्यानाकर्षण के बाद शायद जाग जाये,
लेकिन दुखद था कि सरकार और उसके लोगों ने इस समूह का नाम ‘ गैंग’ दे दिया और इनकी
चिंताओं का माखौल उड़ाना शुरू किया.
                                                                         
मावलंकर हाल में
वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती ने
जहां अपनी चिंताएं जाहिर की, वहीं इतिहासकार रोमिला
थापर ने सत्ता और संघ के लोगों के इस दुष्प्रचार कि सम्मान लौटाने
वालों ने , बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ बोलने वालों ने इसके पहले कभी प्रतिरोध में
आवाज नहीं उठाई थी, का जवाब दिया. रोमिला थापर ने इमरजेंसी , 84 के
दंगों , बाबरी मस्जिद के गिराये जाने , गुजरात के दंगों सहित अनेक अवसरों की याद
दिलाई जब अदीबों ने,  बुद्धिजीवियों ने अपना
प्रतिरोध दर्ज कराया था. प्रसिद्ध इतिहासकार ने अपने एक अनुभव के आधार पर अफ़सोस
जताया कि ऐसा समय कभी नहीं आया था जब किसी बुद्धिजीवी को अपनी बात कहने के लिए
पुलिस संरक्षण में सभाओं में जाना पड़े. हाल के दिनों में मुम्बई में रोमिला थापर
को एक व्याख्यान देने के पहले पुलिस ने उन्हें अपनी ओर से सुरक्षा –कवर उपलब्ध
कराया.
इतिहासकार इरफ़ान
हबीब ने अपने अंदाज में
इतिहास और वैज्ञानिकता से हो रहे खिलवाड़ पर सवाल उठाया- एक
वाजिब तंज के साथ कि दुनिया में हुए आविष्कारों को लेकर ये लोग दावा करते हैं कि
इसका उल्लेख वेदों में भी मिलता है, ये लोग वेदों के वैसे आविष्कार सामने क्यों
नहीं लाते , जिसे दुनिया में अभी अविष्कृत नहीं किया गया है . ये लोग वैसे
फ़ॉर्मूले क्यों नहीं बताते कि यह ज्ञान भी वेदों में है , इसे दुनिया नहीं जानती.’
1 नवम्बर को मावलंकर हाल में इकट्ठा बुद्धिजीवी
किसी एक विचारधारा से नहीं थे, जिसका दावा संघ और सरकार के लोग करते हैं. वैसे लोग
भी उस हाल में मौजूद थे , जिन्हें इस सभा में ‘वैष्णव जन’ के गायन पर ऐतराज था, या
आयोजकों में एक,  कवि अशोक वाजपेयी ,  के द्वारा इस असहिष्णु माहौल का समाधान रामायण –महाभारत –रामचरितमानस
की पंक्तियों में ढूँढने की कवायद के प्रति आलोचक रुख के लोग भी वहां उपस्थित थे.
दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय ने ‘ वैष्णव जन’ में समाधान खोजने की आलोचना भी
सार्वजनिक रूप से वहां की. इसके बावजूद सैकड़ों की संख्या में अलग –अलग विचारधाराओं के लोग उपस्थित थे तो उसका एक मतलब है.  और यह मतलब है कि समाज की अगुआई का एक बड़ा तबका
, देश का बौद्धिक नेतृत्व यह समझता है कि पिछले कुछ दिनों में देश का माहौल खतरनाक
मोड़ पर है.
आयोजकों ने हिन्दू
आक्रामकता के शिकार लेखकों
–सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धीजिवियों के परिवार से
भी लोगों को आमंत्रित किया था. सत्ता और आक्रामक हिंदुत्व को निराश होने के लिए यह
पर्याप्त है कि अपने परिजन की ह्त्या के बावजूद ये लोग तार्किकता और वैज्ञानिकता
को समर्पित मुहीम से पीछे नहीं हटे हैं. देश की राजधानी सहित देश के अन्य हिस्सों
में बुद्धिजीवियों , तार्किक और वैज्ञानिक समूहों और लेखकों की आवाज को सत्ता के
द्वारा ‘ ‘मैन्युफैक्चर्ड विरोध’ मात्र कह देने से इन्हें नकारा नहीं जा सकता है.
रोमिला थापर का भाषण यहाँ सूना जा सकता है .
मावलंकर हाल के
आयोजन के संयोजकों में
भले ही अशोक वाजपेयी , ओम थानवी एम के रैना हों , लेकिन वहां
बड़ी संख्या में उपस्थित बुद्धिजीवी इस बात के संकेत थे कि इस माहौल के प्रति
अकुलाहट सभी बुद्धिजीवियों में है . इसके पहले भी एम. एम कलबुर्गी की ह्त्या के
विरोध में जंतर –मंतर पर इसी तरह लेखक –सामाजिक कार्यकर्ता –बुद्धिजीवी जुटे थे.

“मोर्चे पर कवि” / राजा रोज कुरते बदलता है/लेकिन राजा नंगा है

 जनता के बीच सीधे जाकर अपनी कविताओं की प्रस्तुति द्वारा देश में बढ़ते जा रहे साम्प्रदायिक तनाव के माहौल में सकारात्मक हस्तक्षेप और प्रतिरोध के उद्देश्य से आयोजित “मोर्चे पर कवि” के का पहला आयोजन 31 अक्टूबर की शाम कनाट प्लेस स्थित सेन्ट्रल पार्क के एम्पिथियेटर में किया गया. शाम साढ़े तीन बजे के आसपास प्रशांत टंडन, वंदना राठौर, नीलाभ, उज्ज्वल भट्टाचार्य, यास्मीन खान, अभिषेक श्रीवास्तव, जगन्नाथ, देवेश, अशोक कुमार पाण्डेय और पंकज श्रीवास्तव सहित कुछ लोग एकत्र हुए और नुक्कड़ नाटकों वाली शैली में तीन ताल की ताली बजाकर वहाँ घूमने आये लोगों से अपील की कवितायेँ सुनने की. पंकज श्रीवास्तव ने संचालक की भूमिका निभाते हुए बताया कि यह कार्यक्रम सीधे जनता के बीच कवितायेँ सुनने सुनाने के एक वृहत्तर उद्देश्य से शुरू किया गया है.

देवेश ने हबीब जालिब की प्रसिद्द नज़्म “मैं नहीं मानता” के पाठ से शुरुआत की तो अशोक ने अहमद फराज़ की नज़्म “तुम अपनी अक़ीदत के नेज़े” पढ़ते हुए कहा कि यह पहल इस लिए कि इस देश में वे हालात कभी न आने पायें जो पाकिस्तान में हैं. कविता पाठ की शुरुआत यास्मीन खान से हुई. इसी बीच संगवारी के साथी आ गए और पंकज ने उन्हें जनगीतों के साथ आमंत्रित कर लिया. गोरख और फैज़ के गीतों ने वह समा बांधा की श्रोताओं की संख्या बढ़ने लगी और गीतों की टेक पर दूर खड़े लोग भी तालियों की संगत देने लगे.

इसके बाद वरिष्ठ कवि नीलाभ ने कवितायें और ग़ज़लें पढ़ीं. क्रम बढ़ता गया धीरे धीरे. राज़ देहलवी की ग़ज़लें हों या नवीन, सुमन केशरी की कविता या लीना द्वारा किया नागार्जुन का पाठ हो या निखिल आनंद गिरि की तंजिया ग़ज़ल हो, लोगों ने बहुत चाव के साथ सुना और सराहा. कुछ युवा साथियों ने भी कविता पढने की इच्छा जताई और उनमें से एक को मंच दिया गया.अब भी कुछ कवियों के नाम छूट रहे हैं.
तभी पंकज की नज़र भीड़ में बैठे हेम मिश्रा पर पड़ी. दो साल से अधिक जेल में काट कर आये हेम ने बहुत विनम्रता और प्रतिबद्धता के साथ अपनी बात रखते हुए एक अनुदित कविता सुनाई तो एम्पिथियेटर तालियों से गूँज उठा.

अंत से ठीक पहले अभिषेक ने यूजीसी भवन पर धरने पर बैठे छात्र साथियों के समर्थन में एक प्रस्ताव पेश किया जिसे ध्वनिमत से पारित किया गया.अंत में उज्ज्वल भट्टाचार्य अपनी कविताओं के साथ उपस्थित हुए. राजा रोज कुरते बदलता है/लेकिन राजा नंगा है. दूर तक गयी बात और पंकज प्रेरित हुए अपना गीत “गुजरात का लला” प्रस्तुत करने के लिए जिसने माहौल को एकदम उत्तेजित कर दिया. अंत में मंच पर फिर आये संगवारी के साथी और इस आयोजन को हर महीने करने के संकल्प के साथ विदा ली गयी.

बाद तुम्हारे

सुनीता झाड़े


सुनीता झाड़े मराठी और हिन्दी में कविताएँ  लिखती हैं  तीन मराठी कविता संग्रह प्रकाशित संपर्क: commonwomen@gmail.com

( पिछले दिनों हमारे मित्र और पत्रकार  देवेंद्र वानखेड़े नहीं रहे . उनकी हमसफ़र और मराठी कवयित्री सुनीता झाड़े की कविताएँ उन्हें याद करते हुए )


तुम मेरे सारे मकाम को जानते थे
उस तक पहुचती हुई हर राह को
देखो तो वहां तक सफर कर रही हूँ  मै
मुझे तुम्हे बताना है,
सहर होने तक अपने सफर की बातें
बताओं तो, कहां हो तुम
बाद तुम्हारे… तुम्हारे बाद

———————–

आज,
तुम्हारे आवाज का नाम मिटा दिया
डिअर हबी
अब नंबर खुला है
तुम्हारी चाहत की तरह
बाद तुम्हारे… तुम्हारे बाद

———————–

हर त्योहार के पीछे
कोई पौराणिक कहानी छपी होती है
ठीक वैसे ही हमारे सारे त्योहार
तुम्हारे प्रिस्कीपशन पर लिखे होते
डिस्चार्ज पेपर पर उसकी वास्तविक कहानी
कृष्ण गणेश राम हनुमान लक्ष्मी दुर्गा भोले शंकर
सभी अस्पताल में
नानक गुरु यशु साई पीर बाबा फकीर सारे
एक के पीछे  एक वहीं…

याद आया अबकी बार कोई भगवान आयसीयु में था
गार्ड बाहर आकर पूछ रहा था, फिर चीख रहा था
भाई भगवान के साथ कोई है?
देर तक उस पॅसेज में सन्नाटा छाया रहता, एक दबी सी हंसी के साथ
देखो तो यहां भगवान के लिए कोई  नही…??

तुम्हे कभी बताया नही
लेकिन  तिज-त्योहारो में दिल दिमाग पर
अस्पताल की अधार्मिक  बु सी बनी रहती थी
और तुम नाराज मेरे धार्मिक  हस्तक्षेप को लेकर
कई कई दिनो तक…

पता है, इन सजे हुऎ बाजारों से खिजा सा रहाता मन
कुछ लेने में मन ही नही लगता…

हर बार पाक बनाते  समय
समय समय पर दवाईंया याद दिलाना
जेहन में बस एक ही विषय…
बाजार में हर बार दुधिया, पत्ताकोबी, पमकीन
कितनी सारी चीजें,  जिससे परहेज था तुम्हे
उन्हे परे रख वो सारी चीजें इकठ्ठे करना तकलीफ देह था,
उस पर तुम्हारा इन सारी चीजों से एतराज…खुन्नस भी

शुरु – शुरु  में लगा पहली बार ही.. फिर अगली बार…
फिर जब बार बार अस्पताल जाना पडा तो… मायूस
मैं भूल  गई अपना धर्म, धर्म के रक्षा हेतु  के तीज-त्योहार
मेरे सामने बस एक ही धर्म, तुम्हारे प्राणो की रक्षा करना
और उसके लिए
हर दर, हर व्दार, हर चौकी, हर चौखट, हर दरगाह पर
पेड, पौधे, मिट्टी, पानी  सब पर…
अपने आप को चढाकर कुबुल हो आई थी मैं, हां…
फिर भी तुम ना रहे
एक इन्सान का दूसरे इन्सान के लिए  विश्वास रुक गया.

अब जब की तुम मिट्टी हो चुके हो साथी
मेरी जात भी माटी हो गई है…
तुम मानो ना मानो,
मै तुम्हारी परछाई ही हूं…
बाद तुम्हारे…तुम्हारे बाद

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पता नही तुम मेरे बारें में क्या सोचते हो
जबकी तुम कहीं नही हो
उच्चार से वाणी से
लेकिन  मैं जब भी कुछ सोचना
समझना  चाहती हूँ
वही दहशत सामने आ जाता है
पता नही तुम क्या सोचोगे
क्या कहोगे और कैसे
अभी भी सींचना है जहर
बाद तुम्हारे … तुम्हारे बाद

———————-
कितना मुश्किल होता है कितना मुश्किल
वेंटिलेटर  से किसी अपने को निकालना
ऎसे लिखकर
हम जानते इससे इसकी जान को खतरा हो सकता है
यह जानते हुऎ कि… हम सहमति देते है
नीचे दस्तखत, उसके नीचे नाम, उसके नीचे रिश्ता…
रिश्ता जो हमेशा के लिए खत्म होने जा रहा है…
चूकी इसके बाद तुम नहीं  रहोगे शरीर से
मैं शरीर धर्म से तुम्हारी पत्नी…
कितने लडखडा रहे थे कदम
कलम हाथ से छूट  रही थी
ऑंखो से कुछ भी नही दिख रहा था कुछ भी नही
इर्द-गिर्द अपनो का जमावडा था
और मेरे सामने तुम निष्प्राण
मैं तुम्हे कितना ढूंढ  रही थी, कितनी   आवाज दे रही थी
हाथों में हाथ  लिए तुम्हारे दिल को सहलाते
माथे को सहलाते की कहीं से कोई आहट मिल जाए
कि तुम हो
कोई पीर बाबा का चमत्कार
कुछ तो हो, कोई तो कहे, कोई तो बताये
तुम यहां, तुम वहां, तुम इस इस रास्ते से…
तुम्हारे बगल में कितनी ही स्क्रीन लगी थी
उसपर कितनी ही रेखाऎ दौड रही थीं
एक शुरु होती जरा दूर  जाके ठहरती
वापस दूसरी  वही से वही तक…
मैं ढूंड रही थी इनमें से कौन- सी रेखा
ख्नीच  कर लाऊ तुम्हारे हाथों  की लकीरों के लिये…

कहते हैं हाथों की  लकीरों में नसीब होता है
मैंने कई दिनो से तुम्हारे हाथों  में कोई लकीर ही नही देखी थी
सफेद मुलायम नरम हाथ  जैसे गुड्डों का हुआ करता है
बस वैसे ही…
आख़िरी  समय में फूल  गये थे दोनो हाथ
बाकी शरीर कोरा था मौन…
तुम्हारा यह मौन हो जाना मुझे दिखता था
इसलिए मैं चिखती थी, चिल्लाती थी
सुनो, सुनते क्यो नही हो तुम, सुनो तो
काश मेरे भितर के सन्नाटे को समझ पाते
काश कभी…
तुम्हारा धीरे धीरे चले जाना भांप रहा था दिल
और एक छटपटाहट कि कैसे…
मेरे सामने हो रहा था सब
ये फिर, ये फिर, ये फिर…
कही कुछ चुक रहा था फिर भी
वो समय ही था जो मुझे जबरन अपने साथ लिये जा रहा था
और मैं कठपुतली की तरह…
सबसे कह रही मैं,  कभी सोचा न था ऎसा…

कभी सोचा न था
इतना साथ देने के बाद
ये वक्त मुझे अपना गुनहगार ठरहराएगा…
बाद तुम्हारे…तुम्हारे बाद
————————

बाबड़ी

कविता

चर्चित कहानीकार ,
‘ मेरी नाप के कपड़े,’ ‘उलटबांसी’, ‘नदी जो अब भी बहती है ‘ (कहानी संग्रह)
‘मेरा पता कोई और है’, ‘ये दिये रात की जरूरत थे ‘ (उपन्यास)
सम्पर्क: kavitasonsi@gmail.com

सीढी-दर-सीढी उतरती मैं हांफती हूं. दिन में भी ऐसा घुप्प अन्धेरा कि उंगलियों को उंगलियां न दिखाई दे…कबतक, आखिर कबतक चलती रहूंगी इस तरह… किस सफर में हूं मैं कि दहशत है – रगो रेशे में. अब आखिर कहां जाना है… कितना भीतर… कि अन्त क्यों नहीं आता आखिर. कैसी तलाश है यह.. किसकी तलाश है आखिर…?

कौन सा सपना है यह जो हर रात मेरी नींद में बदस्तूर जागता है, खंगाल कर ले आता है मेरे भीतर का वह कुछ जो कि मुझे पता ही नहीं, कि है भी मेरे भीतर. पानी… पानी चाहिये मुझे. पर पानी न जाने कहां विलुप्त… कई दृश्य भय बन कर कांप उठते हैं.. मेरे रोम-रोम से जैसे मेरा भय बह निकला हो. आत्मा सूखी.. डिहाईड्रेटेड… मैं खुद जैसे निचुड़ी जा रही हूं.

अनी.. अन्वी.. मेरी आवाज़ किसी भूत बंगले की तरह गूंजती है उस सन्नाटे में… लौट आती है फिर मेरे ही पास. मैं दौड़ रही हूं. हलक सूख रही है.. जीभ लटपटाई हुई, कि तभी अनी कहती है मुझे झकझोर कर –  मम्मा पानी चाहिये..? इसी टेबल पर तो है पानी. आप ही ने तो सोते वक्त रखा था. मैं उसे गले से लगा लेती हूं.  मेरी प्यास बुझ गई हो जैसे.

अनी की आंखें भी ठीक उसी की तरह है.. वाचाल, बातूनी. उसकी एक-एक चमक में हजारों किस्से.. किस्सों में भी कितने किस्सेतर अफसाने… वह ठीक मेरे उलट है, यह अम्मा कहती है… यह सब कहते हैं. अन्वी कहीं ठहरती नहीं, टिकती नहीं… कभी भी, किसी हाल में, किसी के भी कहने से.. मुझे भी पसन्द है यह. मैं उसको इसी तरह निडर बनाये रखना चाहती हूं और उसे इसी तरह बनाये रखने के इसी उपक्रम में न जाने कितने डर, कितना संशय, कितनी अनाम पीड़ायें… यह शायद मां हो कर ही समझा जा सकता है.

वे कहते हैं अक्सर, हद करती हो तुम भी. .. बेटी आंखों से ओझल नहीं हुई कि… उसे जीने दो उसका बचपन. इस तरह तो… सोचती हूं मैं भी, इस तरह तो… जानती हूं मैं भी इस तरह तो…

पर चारा कोई और नहीं हैं मेरे पास. मेरा भय दु:स्वप्न बनकर पीछा करता रहता है हमेशा. धुर जाड़े की रातों में पसीने से नहाई हुई उठती हूं मैं और जानलेवा गर्मी में भी भय से थरथराती हुई. सांसे धीरे-धीरे थिर होती हैं. बगल में सोई अनी को नींद में मुस्कुराते देखकर, कभी अपने गले में उसे गलबहियां डाले सोई जान कर, मैं अपनी बांहे उसके इर्द-गिर्द कसकर लपेट लेती हूं, इतना कसकर कि नींद में भी कई बार कसमसा उठती है वह. … मुझे लगता है कि अब सुरक्षित है वह… कि अब कोई डर नहीं. फिर भी नींद है कि आते-आते आती है और स्वप्न है कि जाते-जाते भी नहीं जाता.

साभार गूगल

मेरा पांव अन्धेरे में किसी ठोस चीज़ से टकराया है. चीख निकलती है बहुत तेज, पर जैसे गले में ही रूंध जाती है. सबकुछ बिल्कुल उसी सपने जैसा. मेरी सांस-सांस रो रही है. मेरा रोम-रोम जैसे किसी अज्ञात पीड़ा से लिथड़ा हुआ. तलगृह में जैसे और अंधेरा हो आया हो, घना घनघोर, घुप्प अंधेरा. अब अपना ही भान कहां रह गया है. अन्वी, अनी, मेरी प्यारी अनी… मैं अंधेरे में टटोलती- टोहती जब किसी भी ज्ञात-अज्ञात वस्तु से टकराती हूं भीतर तक सिहर उठती हूं. सिहरना सुकून बनता है पर थोड़ा ठहरकर. कुछ नहीं, कुछ भी नही, कुछ भी तो नहीं. सुकून आता है और फिर बिला जाता है. कहां हैं.. कहां है मेरी बिटिया अनी…मैं हमेशा की तरह उस सपने के गिरफ्त में हूं. और हमेशा की तरह ही सोचना चाहती हूं, समझाना चाहती हूं खुद को, बेकार ही डरती हूं मैं. ऐसा कभी कुछ नहीं हो सकता उसके साथ…

…बच्ची जरूर है अनी पर समझदार भी है. उसे बनाया है मैंने समझदार. मैं कहती रहती हूं उससे, बेटा कोई भी अगर प्यार करते-करते टच करना चाहे तो मत करने देना. किसी को किस्सू भी मत करने देना चेहरे पर, लिप्स पर तो कभी नहीं… डांट देना उसे… समझीं आप? मैं जोड़ती हूं.. मम्मा, पापा और अपने परिवार के लोगों को छोड़कर. फिर कहते-कहते ठिठकती हूं इस ‘परिवार’ शब्द पर. नहीं, सिर्फ मम्मा-पापा. वह चुप सुनती रहती है सब हमेशा के बिल्कुल विपरीत… बेटा, मैं आपको कुछ बता रही हूं न.. सुन रही हैं न आप?.. हां, मां… वह अपनी चंचल नजरों से थाहती रहती है आस पास… कुछ अनोखा, कुछ अलग-सा, नटखट-सा करने, हो सकने की संभावना की तलाश में… मुझे लगता है मेरी बातें तो बस यूं हीं… बेटा पहले मेरी बात पर ध्यान दीजिये. सुनिये प्लीज… सुन तो रही हूं मम्मा … वह खीज भरे स्वरों में कहती है… इतने-इतने खिलौनों के बीच मां की ये बेकार की बातें, नसीहतें.

पहली बार मन तभी हिला था क्षण भर को, जब तीन-साढ़े तीन की ही थी वह.. टाऊनशिप की अपनी सुविधायें… क्लब, जिम, किड्स रूम, लायब्रेरी… मैं शाम को थोड़ा वक्त निकाल लेती हूं… अन्वी खेलती रहती है किड्स रूम में. मैं थोड़ा पढ़ लेती हूं… पर पढ़ते-पढ़ते सांस अंटकी होती है, बस अनी में. उठ-उठ कर झांक आती हूं. वह खेलने में मग्न होती है, दूसरे बच्चों के साथ. अन्वी को किड्स रूम का आकर्षण खींचता है. उसकी आंखों की चमक में दिखलाई देते हैं मुझे –  ‘सी-सॉ’, ‘स्लाइड्स’, ‘रोप्स’ और झूले. उसके हाथों की लहक में होती है नन्हें चेस, टेबल टेनिस, कैरम, पज़ल्स और लूडो से खेलने की ललक. चीज़ों को हासिल करने की नन्हीं कोशिशें भी. वह दूसरे बच्चों से कभी-कभी लड़ती भी है. कभी-कभी रोती-रोती आती है मेरे पास… मां गुल्लू ने मुझ से पिंग-पॉंग छीन लिया… एंजल मुझे स्लाइड्स पर फिसलने नहीं देती. मैं झगड़े को सुलझाने की कोशिश में कभी कामयाब होती हूं, कभी नाकामयाब. मैंने एक तरकीब निकाली है. किड्स रूम खुलते-खुलते ही मैं अनी को लेकर पहुंच जाती हूं कि दूसरा कोई इतनी जल्दी कहां आ पायेगा. अनी खुश रहे, इन्ज्वाय करे, बस. और अनी भी शाम होते ही पूछती है, मम्मा लायब्रेरी नहीं जाना..? मैं मुस्कुरा कर कहती हूं, जाना है मेरी बच्ची.

…जल्दी-जल्दी पहुंचने की यही ललक उस दिन थिराती है, डर बन कर बैठ जाती है मेरे भीतर और तभी शुरु होती है अन्तहीन दु:स्वप्नों की यह श्रृंखला. मैं पढ़ रही हूं आदतन, डूब कर, भूल कर सबकुछ… अन्वी नहीं आती देर तक. मैं सोचती हूं खेल रही होगी वह. इस बियाबान में यही तो एक जगह है जहां कुछ ताजी पत्रिकाओं का चेहरा देख पाती हूं. फिर थोड़ी देर को ही सही, अन्वी से अलग होकर अपना कुछ लिख-पढ़ पाना. अन्वी नहीं आई है मेरे पास देर से, पर मुझे सुकून ही है. तभी, लिखते-लिखते थमती हूं मैं. मेरे भीतर जैसे कुछ कौंधा हो. चौंकती हूं मैं,  मैं तेज कदमों से निकलती हूं. बस चार कदमों की दूरी पर है किड्स रूम. पर मुझे लगता है न जाने कितनी दूर है वह… यह दरवाज़ा क्यों भिड़ा रखा है अनी ने… अनी बेटा, दरवाज़ा क्यो बंद किया, खोलो… अनी कुछ बोलती नहीं. मैं सहमी सी अनी को जल्दी से अपनी गोद में समेट लेती हूं… “संजय तुम? तुम यहां क्या कर रहे थे.. दरवाज़ा क्यों बंद था…”
“अंदर ठंडी हवा आ रही थी…”
“तो…?” मेरी आवाज़ तल्ख है.
“और बगल के कमरे में पार्टी चल रही है. बच्चे आकर सारा सामान तितर-बितर कर देते हैं…” मेरी आवाज़ अब भी सम पर नहीं है… “तो..? ठीक करो. बच्चे तो खेलेंगे ही न.. तुम्हारा काम है ठीक करना.”

उसका सहमापन मेरी आवाज़ के तीखेपन को कुछ और कड़वाता है. क्षण भर को सोचती हूं मैं, शायद ठीक कह रहा है यह.. तभी तो इतना… पर भीतर से आती दूसरी आवाज़ जैसे मेरे भय में और पलीता लगा देती है. सहमता वह है जिसके भीतर कुछ गलत हो. वह पीठ फेर लेता है.. सामान ठीक करने के उपक्रम में लग जाता है. मैं निकलते-निकलते भी कहती हूं… “देखो आगे से कभी कोई बच्चा खेलता हो तो दरवाज़ा बन्द नहीं होना चाहिये…” मैं अनी को लिये-लिये लायब्रेरी से अपना बैग उठाती हूं और… मैं घर नहीं जाती, नीचे लॉन में लगे झूले पर आ बैठती हूं. अन्वी बहुत सहमी सी है. क्यों… मेरा भय या कि मां का यह रौद्र रूप देखकर… मै टटोलना चाहती हूं उसे… पर कैसे? मै ंपूछती हूं  – “बेटा वो अंकल वहां क्या कर रहे थ्रे..?” अनि कुछ भी नहीं कहती…
मैं फिर उससे पूछती हूं… “बैठे हुये थे..? खेल रहे थे आपके साथ…? ट्वायज से या फिर…”
अनि छोटा सा उत्तर देती है – ” नहीं.”
“फिर…?” वह चुप है…
“बोलिये बेटा मम्मा तो आपकी फ्रेंड है न… मम्मा से तो आप सबकुछ बताते हैं…”
“वो…” अनी कह कर रुकती है थोड़ी देर को….
“वो क्या बेटा…? बोलिये…”
“अंकल मुझे प्यार कर रहे थे…” ‘प्यार’ शब्द मेरे भीतर गर्म लावे की तरह बहता है… यह ताप जैसे सहने लायक ही न हो…
“प्यार, कैसा प्यार…?” शायद मैं बच्ची पर चीखी हूं… “बोलिये बेटा, बोलिये कुछ…  मम्मा से नहीं बतायेंगी? आप उनके इतने पास क्यों बैठी हुई थी..?”
“वो बातें कर रहे थे मुझसे…
“कौन सी बातें…?”
” कुछ नहीं मम्मा, बस ऐसे ही…”

मैं फिर नहीं कहती उससे कुछ. एक चॉकलेट ले कर आती हूं उसके लिये. सोचती हूं शायद वह अपने आप ही बताये कुछ.

… मैं सोचती हूं, शायद अन्वी ठीक कह रही हो… शायद वह बस बातें कर रहा हो उससे… शायद मैं बेबात डर रही हूं. कुछ होता तो अन्वी कहती नही..?

शेखर को मैं फोन करती हूं – ” जल्दी आओ…”
“कोई खास बात…? मैं साढ़े आठ तक घर आ जाउंगा…”
“नहीं, अभी आओ. और घर नहीं, क्लब. मैं यहीं हूं.”

शेखर का इंतजार करती मैं अन्वी को दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिये भेजती हूं. शेखर आते हैं. मेरी बातें सुनते हैं ध्यान से. चुपचाप सुनते रहते हैं, कहते कुछ भी नहीं. मैं फिर चिढ़ उठती हूं – ” बोल क्यों नहीं रहे कुछ?”
“क्या बोलूं, यह सब तुम्हारा वहम है. इन टेम्पररी स्टाफ़ कि इतनी हिम्मत नहीं है कि…. और फिर मैं तो क्लब का सेक्रेटरी हूं. वह ऐसा नहीं कर सकता, बस थोड़ा खयाल रखता है मेरे कारण. तुम बस ऐसे ही…”
मैं खीज और चिढ़ के आवेग से जैसे गुस्से से बाहर हो रही हूं…”ऐसा नहीं कर सकता… यह विश्वास कितना घातक हो सकता है तुम सोच भी नहीं सकते. इन छोटी-छोटी चीज़ों की अनदेखी करना दर असल हमारे डरपोक स्वभाव का ही परिचायक है. हम बुरी या फिर अप्रिय बातों के बारे में कुछ सोचना ही नहीं चाहते…. इसे स्वीकार करना हमारे लिये मुश्किल होता है. अघटित घटित हो ले वह ठीक, पर उसे…. ऐसा नहीं कर सकता क्यों..? ऐसे ही टेम्पररी टाईप के लोग जो अपनी पत्नी और परिवार से दूर रह कर दो पैसे कमा रहे हैं, उनके इन दुष्कर्मों में लिप्त होने की संभावना ज्यादा होती है. ज्यादा पैसे नहीं, सुविधा नहीं, मनोरंजन का कोई साधन नहीं, शिक्षा नहीं और ढेर सारा खाली वक्त… शैतान का घर तो यह हमारा दिमाग ही होता है. रोज अखबार और टी वी में खबरें देखते हो पर…”
“मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहता. मेरी बेटी ठीक है, नॉर्मल है और मैं क्यों मानूं तुम्हारी कोई उथली सी बात?” शेखर उठकर बेटी को बुलाने चल देते हैं…

साभार गूगल

मैं भन्नाई सी उठ खड़ी होती हूं. बेटी को लेती हूं उनसे और चल देती हूं इस पशोपेश के साथ कि शेखर नहीं मानेंगे ऐसा कुछ. वह मेरे साथ नहीं खड़े होंगे बेटी की सुरक्षा के इस मोर्चे पर. वे स्त्री नहीं हैं और औरतों के इस भय को नहीं समझ सकते वे. मुझे ही अन्वी की परछाई बन कर रहना होगा, चलना होगा उसके साथ. परछाई की प्रवृत्ति से भी इतर रहना होगा उसके साथ. धूप और साये, दिन और रात, सुबह और शाम सब में. उससे बनाना होगा वह रिश्ता कि कुछ भी… मेरी आंखों से अदेखा न छूट जाये. कोई गुंजाइश ही कहीं छूटी न रह जाये.

मैं उस रात पहली बार अनी को एक पल को भी अपनी बाहों से अलग नहीं होने देती….

...उसी रात वह सपना जन्मा था मेरे भीतर, फिर पला-बढ़ा था. मेरी रातों के सुकून को किसी बाघ की तरह झपट्टा मार कर ले भागता. नींद के नाम से मैं डरने लगी थी उसी दिन से. जागना अच्छा लगने लगा था, सुकूनदेह. मैं ढूंढ़-ढूंढ़ कर काम निकालती, फिर निपटाती उसे देर रात तक. फिर कोई नया काम. सोना जब मजबूरी हो जाता तो सो लेती पर वैसे ही बेहिस, बेमन. आंखें दिन भर जले तो जले, थकान पूरे वज़ूद पर हावी हो तो हो. चेहरा चाहे जितना बुझा-बुझा लगे लेकिन कोई बात नहीं…

...मै सोचती हूं, खूब सोचती हूं इस सपने के बावत और नकारना चाहती हूं इसका अस्तित्व. तर्क ढूंढ़ती हूं, समझाती हूं खुद को चाहे वे तर्क कितने ही खोखले हों, कितने ही कमजोर. मै कई वर्ष पीछे देखती हूं… सपने में दिखनेवाली नीचे की ओर निरंतर जाती हुई वे सीढ़ियां… मुझे बावड़ियों की याद आती है…

दिल्ली में मेरे घूमने की मनपसन्द जगहें, बाबड़ियां… मतलब वो सीढ़ीदार कुंए जिनका इस्तेमाल प्राचीन काल में जल संरक्षण और उपयोग के लिये होता था. मुगल काल और उससे भी पहले दिल्ली में लोगों की पानी संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिये बादशाहों और राजाओं ने बावड़ियों का निर्माण करवाया, जहां मुसाफिर न सिर्फ अपनी प्यास बुझाते बल्कि आराम भी कर सकते थे.

हैली रोड की अग्रसेन की बावड़ी, कहते हैं, महाभारत काल में बनवाई गई वह बहुमंजिली बावड़ी है जो मुझे कभी भी किसी राजमहल से कम नहीं दिखी. इसकी कारीगरी मुझे मंत्रमुग्ध करती है. पंचमंजिले बावड़ी में छत की जगह छायादार नीम का बड़ा-सा पेड़, हर स्तर का आधा बुर्जीदार हिस्सा, लाल-पत्थर की इसकी सीढ़ियां सब मुझे बेतरह खींचती थी. शेखर कहते भी थे तब, क्या मिलता है तुम्हें इस खंडहर में… पानी… कहां है पानी… वह नीचे गंदला सा कुछ? मै मां से सुना हुआ मुहावरा दुहरा देती… ‘गुजरा हुआ फिर भी मसूदाबाद है…’ और सोचती हूं मसूदाबाद से मतलब मुर्सिदाबाद, मुरादाबाद या कि कुछ और सोचती रहती.

पानी के लिये मेरी ललक से शेखर तब भी वाकिफ थे. नहाना, तैरना कभी मुझे अच्छा नहीं लगा. पर पैर डाल कर बैठना, पानी में खड़े होना मुझे बेहद पसन्द है. पानी मुझे खींचता है बेतरह. सड़क मार्ग से जाते हुये अब भी कहीं छोटा सा जलाशय या कि पोखर मुझसे मिलने की जिद ठान लेता है और मैं बीच राह उतरने की. सारी थकान, सारी बेचैनी जैसे पानी खींच ले जाता है, मुझे मुक्त करता हुआ, नई ज़िंदगी देता हुआ. मुझे पानी से मतलब है, सिर्फ पानी से…

…वह दिल्ली थी. गरम, तपती, जलती, झुलसती दिल्ली और वहीं उन बावड़ियों का होना मेरे लिये राहत था. फ्रीलांसिंग के उस दौर में कहीं से कहीं जाती, गर्मी की दुपहरियों में रुक जाती ठिठक कर, खास कर कनॉट प्लेस या जनपथ में हुई तो अग्रसेन की बावड़ी पर. उनसे मिलना वैसा ही था जैसे अजनबी शहर में बहुत अपने से मिलना. सुख-दुख बतिया कर हल्का हो लेना. अतीत की कहानियां समेटे बावड़ियां मुझे नानी-दादी की तरह प्यारी लगतीं, अपनत्व और ममत्व से भरी हुई. अपने प्यार की छांह में सबको समेट लेने को आतुर. राजों की बावड़ी (मेहरौली), खाड़ी बावड़ी (चांदनी चौक), फिरोजशाह कोटला की बावड़ियां… मैं तालाशती रहती अपने लिये एक नया ठौर. एक नया पनाहगाह. मुझे लगता और हमेशा लगता दिल्ली को किलों और मकबरों का शहर कहने की बजाय बावड़ियों का शहर भी कह सकते हैं और खूब-खूब कह सकते हैं…

…तो मुझे लगता और खूब-खूब लगता यह सपना कहीं उन बावड़ियों से हो कर चला आया है मुझ तक. वही बुर्जिया, वही मेहराब, वही सीढ़ियां और वही मेरी बेचैनी और छटपटाहट. जब कभी किसी अपने से दूर हो जायें तो पुकारते ही हैं वे. छटपटाती ही है आत्मा उनकी खातिर. चारु कहती थी तब, तुम्हें डर नहीं लगता ऐसे एकांत में अकेले चल देने से, इन सुनसान जगहों पर. सेफ कहां होती है ऐसी जगहें, ऐसे मत जाया करो. मैं हंस देती, बस… अंदर का सन्नाटा बाहर के सन्नाटे से ज्यादा भयावह होता है.

पालिका बाज़ार के सेंट्रल पार्क में शाम दोपहर गुटर गूं करते जोड़े, जंतर-मंतर के कोने-कंदरे में बैठी आपस में मशगूल जोड़ियां… पर पता नहीं क्यों, मैं उनमें से एक नहीं थी, न होना चाहती थी. शेखर के साथ होने के बावजूद मैं जिद कर के अग्रसेन की बावड़ी ही जाती, और जाती तो जाती. शेखर भी तब साथ-साथ चल देते, पर आज की तरह कुढ़ते-खीजते हुये नहीं बल्कि दिल से.

मैं सोचती हूं और खूब-खूब सोचती हूं इस सपने का मतलब..? कि तभी कुछ याद आता है… ठीक शादी से पहले की बात… शेखर के बहुत दोस्त थे, मेरे कम. शेखर बोलते थे, बातें करते थे और मैं घुन्नी… ऐसे में ही प्रशांत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया था. मैंने दोस्ती की थी, पर लक्ष्मण रेखा तय करते हुये. उसे शेखर के बारे में बताया भी था धीरे-धीरे… अपनी वर्षों पुरानी दोस्ती…. हमारे सपने… हमारा परिवार… हमारी मुश्किलें… हमारी ख्वाहिशें… और एक दोस्त की तरह वह सबकुछ सुनता, दिल से सुनता. और मुझे लगता कि मैं बोल भी सकती हूं किसी से इस तरह खुलकर. उस दिन जब मैं हिन्दुस्तान के दफ्तर से लौट रही थी, वह अपनी ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ले कर आ गया था. उसी ने कहा था – इंडिया गेट चलते हैं, धूप में बैठ कर अच्छा लगेगा. मैं अपना हक दिखाते हुये कह गई थी नहीं, अग्रसेन की बावड़ी… इतिहास का वह विद्यार्थी चौंक पड़ा था क्षण भर को, यह कहां है..? मैं उसी हक से उसकी हथेलियां खींचती हुई कहती हूं, मैं ले चलती हूं न. वहां पहुंचने के बाद मेरे अंदाज़े के विपरीत वह खुश हुआ था. मुझे भी अच्छा लगा था. जाड़े का दिन सो इक्का-दुक्का लोग. सीढ़ियां उतरते वक्त वह इतना करीब था कि उसकी सांसें मेरी पसलियों को छू रही थीं. मैं थोड़ा अलग हो कर चलने लगी थी. वह ठिठका था थोड़ी देर को, फिर करीब आकर पूछा था उसने – ‘”यार ये जगहें कहां से तलाश लेती हो तुम?…”
“क्यों, पसन्द नहीं आई?”
“नहीं, बहुत पसन्द आई इसीलिये तो…” उसकी फुसफुसाहट मेरी कान के लबों को गर्मा गई थी. मुझे लगा लौट जाना चाहिये. मेरी जिद ने कहा था –  क्यों?.
“और कहां तक चलना है?”
“मैंने कहा था न, इसकी गहराई डेढ़ सौ फुट है. सोचो अभी और कितना नीचे जाना होगा.”
“नीचे जाना मुझे बेहद पसन्द है.” उसके स्वरों के रहस्य भाव में ऐसा कुछ था जिससे मैं चौकी थी पहली बार. पर मैंने अपने चौंकने को एक चौकन्नेपन से ढंका था…”१९७५ तक इसमें खूब पानी था. पर अब जलस्तर थोड़ा नीचे चला गया है. बस एक मंजिल और, बीच वाले मंजिल से पानी दिखने लगता है…” मैं उसे जताना चाहती थी, मैं वैसी ही हूं अब भी – निडर, निरपराध और निर्बोध…

साभार गूगल

मैं सबकुछ भूल कर खुशी से चिल्लाती हुई उसकी तरफ पलटती हूं – “प्रशांत, देखो पानी… वो देखो!”
पर प्रशांत की नजरों की तलाश की मंजिल कुछ और थी…. झुक कर उसने एक झटके से चूम लिये हैं मेरे दोनों होंठ…”पानी ही तो तलाश रहा था मैं भी…”

मेरे होठ बेवसी से ज्यादा सिले हैं या कि विस्मयविमूढ़ता से, कहना मुश्किल है. एक ही क्षण में बहते जल-सा साफ और पारदर्शी रिश्ता मैला और गंदला हो गया था और मैं मूक – हंसे-रोये बगैर…

मैं कब तक खड़ी थी चुपचाप मुझे नहीं पता. तंद्रा टूटी थी तो उसी की आवाज़ से…”कम ऑन, तुम तो ऐसे शो कर रही हू जैसे कि तुम्हें किसी ने पहली बार छुआ हो. शेखर तो साथ ही रहता है न तुम्हारे, फिर….”
मैं बटोरती हूं खुद को और कहती हूं…” शेखर और मैं साथ जरूर रहते हैं पर अकेले नहीं और शेखर ने मुझे कभी इस तरह नहीं…”
उसके होंठों का विद्रूप बढ़ जाता है. व्यंग्य और तिलमिलाहट से चेहरा टेढ़ा और लाल…”फिर किसी डॉक्टर से जाकर दिखलाओ उसे, मर्द ही है न…?” फिर थोड़ा रुक,कर थोड़े संयत स्वरों में कहता है वह… “तुम्हारी बेतकल्लुफी और संकेतों से ही तो… और तुम ऐसे दिखा रही हो…”

मेरा दुख, मेरी ग्लानि, मेरी पीड़ा सब थहरा देते हैं मुझे. मैं थकी-हारी सी बैठ जाती हूं वहीं. खूब रोती हूं. किसके लिये यह मुझे भी पता नहीं.

मेरे रोने से शायद ग्लानि जागी है उसके भीतर… कहता है वह – ” सॉरी, माफ कर दो मुझे.” उसके इस बार के कंधे छूने में कोई लस्ट नहीं है पर कोइ लगाव भी नहीं महसूसती मैं.
जो कुछ मरना था मर चुका है… खाली हो चुकी है वह कोई जगह… और मैं रोना चाहती हूं बस… मैं कहती हूं – “तुम जाओ प्रशांत…”
” और तुम?…”
” मैं यहीं रहना चाहती हूं.”
“यहां?”
” हां.” मेरा स्वर दृढ़ है. वह एक बार देखता है मुझे, फिर चला जाता है बिना मुड़े, रुके. मैं रोती हूं – खूब रोती हूं, वहीं बैठ कर… मेरा रोना तर्पण है एक रिश्ते का. तर्पित तो जल में ही करते हैं न सब.. ग्रहण करता है जल हमारी सारी इच्छायें, दुविधायें और वह सबकुछ जो हम समेट कर नहीं रख सकते या कि नहीं रखना चाहते. सचमुच गंदला हो आया है पानी का वह हिस्सा.

…मैं सोचती हूं, यह सपना यहीं से उपजा होगा. अपने भीतर के उस टूटन से. फिर सोचती हूं इस सपने से अन्वी का क्या वास्ता, उस सपने में अनी क्यों होती है आखिर? मैं एक कमजोर-सा ही सही पर नया तर्क तलाशती हूं… मैं टूटने नहीं देना चाहती अनी के भीतर कहीं भी, कुछ भी. इसीलिये उस सपने में अपनी जगह अनी दिखती है मुझे, ठीक उसी जगह – हताश, टूटी हुइ, निचुड़ी हुई-सी, कभी-कभी रोती-बिलखती, कभी बिसूरती, निस्सहाय, अकेली अनी. उसकी निर्भाव आंखें… और सीढ़ियां दर सीढ़ियां उतरती, उसे खोजती हुई मैं.

शेखर मुझे इस तरह परेशान देखकर कहते हैं कभी-कभी, अभी तो बच्ची है वह. आज के दौर की बच्ची… कल को बड़ी होगी, उसे तुम्हारा इस तरह परछाई बनना, पहरे देना भायेगा? कौन बच्चा पसन्द करता है यह सब? तुम्हें पसन्द था? कल बड़े होने पर वांछित-अवांछित कई तरह के संबंध होंगे उसकी ज़िंदगी में… देह भी कभी न कभी, कहीं न कहीं… कब तक उसे प्रोटेक्ट करती रहोगी?

…मुझे हैरत होती है, यह सब सुनकर. शेखर मुझे इतना ही समझते हैं.

मैं कहती हूं और पूरी दृढ़ता से कहती हूं, आगे क्या होगा, वह क्या करेगी, कैसे जीयेगी वह उसका निर्णय होगा. अभी तो मसला है और एक ही है कि वह खुद निर्णय और फैसले लेने तक तो निर्बाध बड़ी हो ले, एक पुरसुकून बचपन जीते हुये. एक ऐसा बचपन, जिसकी स्मृतियां उसे कल उदास या दुखी नहीं बनाये. उससे ज़िंदगी को खुशी-खुशी जीने का जज्बा न छीन ले. मेरी कोशिश तो बस इतनी सी है, शेखर!

साभार गूगल

मैं जब अपनी सहेलियों को भीड़-भाड़ में आस-पड़ोस में, कहीं भी बच्चों को निर्द्वंद्व छोड़ती हुई देखती हूं तो अच्छा तो लगता है पर हैरत भी होती है. इन्हें कभी भय नहीं होता या कि मैं ही कुछ ज्यादा… शायद शेखर ठीक ही कहते हैं, अनी के बचपने को बनाये रखने की कोशिश में मैं जो लगतार उससे छीनती रही हूं वह उसका बचपन ही है… किसी आगत अनहोनी की आशंका में उससे उसका आज छीन रही हूं मैं.

निधि मेरे थोड़ी करीब है. अपनी बच्ची को ले कर कुछ पजेसिव भी. मैं उससे बांटती हूं अपनी भावनायें, कहती हूं कि जब भैया मायके में गर्मी के दिनों में अनी को अपने एसी वाले कमरे में सोने के लिये ले जाते हैं तो बारहा मना करती हूं मैं और अगर तब भी वो ले ही गये तो मैं तबतक नहीं सोती जबतक अनी को वहां से किसी बहाने ले न आऊं या कि वह खुद उठकर आ न जाये मेरे पास…बराबर के भाईयों के साथ उसे अकेले न खेलने देना…  मैं जानती हूं इस तरह सोचना गलत है, रिश्तों पर इतना अविश्वास…पर मैं क्या करूं…. पूछती हूं मैं उससे कि क्या यह डर उसे भी सताता है, या कि मैं ही… वह पुष्ट करती है मेरे भय को. मुझे थोड़ा सुकून मिलता है.

अनी मेरे बगैर नहीं रह सकती. पांच साल की बच्ची की उम्र ही कितनी और औकात ही क्या? जहां कहीं जाती हूं, चाहते न चाहते चलना ही होता है उसे मेरे पीछे. इच्छा-अनिच्छा का यहां कोई महत्व नहीं रह जाता. चाहे मजबूरी ही सही पर लम्बी-लम्बी जर्नी, बाई रोड भी. यह समझते हुये भी कि उसे उल्टियां आयेंगी, चक्कर आयेगा, बीमार भी हो सकती है वह. फिर भी… मां लोगों से मिले, बाहर निकले, घूमने या सेमिनार में बोलने जाये अन्वी को बेहद पसन्द है. कहीं से कोई बुलावा आया नहीं कि अनी का कूदना शुरु. मुझे मां को बोलने के लिये ले कर जाना है… मैं अपनी मम्मा की सबसे अच्छी फ्रेंड हूं न! मैं मम्मा को फलां जगह ले कर जा रही हूं. अनी अपनी सहेलियों से ऐसी ही बातें करती है…

विजयनगरम जाने की बात से वह ऐसे ही फुदक रही थी और उसकी फुदकन मेरे भीतर भय जगा रही थी. दस घंटे की कार की सवारी, फिर ट्रेन, फिर तीन दिनों का सेमिनार. कैसे जाऊंगी मैं? कैसे संभाल पाऊंगी उसे? पर सब उसकी आंखों की उसी चमक की खातिर…

होटल में उसका बेड अलग है. मैं समझाती हूं उसे, मां को हर जगह ले के जाने वाली बच्ची तो नहीं हो सकती न! अब तुम्हें बड़ों की तरह अकेले सोना भी सीखना होगा. वह घबड़ाती है, परेशान होती है पर मान जाती है धीरे-धीरे…

दिन भर फुदकती रहती है वह, ऊपर-नीचे, दूसरे कमरे तक, दूसरे लोगों के पास. उन्हें कवितायें सुनाती है. मैं अपनी सांकल थोड़ी ढीली कर देती हूं. वह खुश रहे, मुस्कुराये बस…

…पर मुश्किलें हैं, और दूसरी हैं. अनी की हर पल कुछ न कुछ बोलते रहने वाली जुबान बेचैन है. बोले तो किससे और क्या.. भाषा की दीवार चीन की दीवार हुई जाती है. फिर भी बगैर बोले-बतियाये वह बांध ही लेती है लोगों को अपने नटखटपन से. साथ आये हिंदीभाषी लोगों को वह घोंट-घोंट कर कवितायें पिलाती है.

अन्वी खुश है. अनी दौड़ती-भागती रहती है, बातें करती रहती है. मेरा डर भी घूमता रहता है मुझसे आंख-मिचौली का खेल खेलता हुआ. अनी स्वतन्त्र है. पर यही तो है डर का सबब भी. मुझे पूरे दो सत्रों में मंच पर रहना है. बेचारी अनी… पहला दिन बीत जाता है, नि:शंक.. दूसरा… … मैं मंच से रह-रह कर देख रही हूं, ऊबी हुई है वह शायद लम्बे-लम्बे वक्तव्यों से. अपनी मम्मा की बारी की प्रतीक्षा में है वह. इशारे-इशारे में कहती है वह –  ‘मम्मा आप कब बोलोगी?’  मैं नजरें झुका लेती हूं कोई देख न ले. समझ न ले इस मौन वार्तालाप को. मंच पर बैठने का अनुभव अभी बहुत नया-सा है. सो उसकी गरिमा का ध्यान थोड़ा ज्यादा. अपने से ज्यादा अपनी बेटी की खुशी में खुश हूं मैं. उसकी आंखें खुशी से चमक रही हैं.

चमकविहीन आंखें कैसी होती है.. कैसी होती है उनकी उदासी मैं जानती हूं…मैं समझती हूं… अनी के चेहरे पर उन आंखों की कल्पना भी असहनीय है मेरे लिये.

अनी कुछ देर तक दिखने के बाद गायब है. मैं सोचती हूं, वह होगी इधर-उधर कहीं. मेरी बारी आती है चली जाती है. पर अनी नहीं आती. यह अनहोनी ही है. ऐसा कैसे हो सकता है आखिर. मैं घबड़ाती हूं, बेचैन होती हूं पर प्रयत्नशील भी कि ये बेचैनी चेहरे पर न आ जाये. मैं उठ कर देखना चाहती हूं पर लगता है यह मंच की अवज्ञा होगी. मैं कुछ देर बाद धीरे से मंच से खिसक लेती हूं… मैं ढूंढ़ती हूं उसे हर तरफ, अपने कमरे में, परिचितों के कमरों में. कान्फ्रेन्स रूम के पीछे-आगे. रिसेप्शन पर पूछती हूं, बच्ची है कुछ खरीदने न निकल गई हो… ‘पीला फ्रॉक पहने कोई बच्ची बाहर गई है क्या?…’ ‘कौन?…’ ‘आपकी बच्ची?…’ ‘नहीं…’ घबराती हूं मैं, अब कहां.. कितने सारे डर, कितने सारे सपने सब इकट्ठे हो कर मेरे आंसुओं में निकलने लगते हैं.

मुझे खयाल आता है तलगृह का… कल बुक एक्जीवीशन तो उसी में था. तलगृह का खयाल मन में जैसे सारी आशंकाओं को जगा जाता है. मेरे हाथ-पांव सब ठंडे मेरे लिये. कदम उठाऊं तो कैसे, और जाऊं तो कहां?

सीढ़ियां उतरते हुये मुझे खयाल आता है सपनों का, ऐसे ही तो बस सीढ़ियां-सीढ़ियां. मैं जिसे अबतक बाबड़ी की सीढ़ियां समझती रही… मैं बेसमेंट के अन्धेरे में टटोलती-टोहती हूं, हर टकराहट मन में बेचैनी पैदा करती है. फिर शान्त होती हूं यह सोच कर कि अनी यहां नहीं है… बेचैनी फिर बढ़ती है, अनी यहां भी नहीं है. फिर कहां है आखिर?

साभार गूगल

मैं दौड़ती हूं ऊपर की तरफ. कान्फ्रेन्स रूम के पास तक पहुचती हूं… अनी सामने से आती दिखती है. हाथों में जलेबियां लिये और किन्हीं एक महिला की उंगलियां थामे हुये. मैं चीख पड़ती हूं, गले लगा लेती हूं उसे… “कहां चली गई थी मुझे बताये बगैर.”
वह शांत भाव से कहती है – “मम्मा, आप तो ऊपर बैठी थीं न फिर आप से कैसे कहती! और आपने ही तो कहा था कि वहां बातें नहीं करते.”
“फिर भी आप इशारे से कह कर जातीं.” मैं एक बेचारा-सा ही सही तर्क ढूंढ़ने की कोशिश करती हूं.
“मम्मा आप तो मुझे देख भी नहीं रही थीं. देखती तब न!”

वह महिला हंसती है. मुझे पहले-पहल लगता है मुझ पर हंस रही है वो. मैं अपने आप से कहती हूं, नहीं वह ऐसे ही हंस रही है… वो कहती है – ” बच्ची का मुंह मीठा करवाने ले गई थी. बहुत ही अच्छी कवितायें सुनाती है. मैं इसे इसकी प्रतिभा के लिये प्रोत्साहित करना चाहती थी.” अहिंदीभाषी लोगों की शुद्ध-शुद्ध किताबी हिन्दी में कहती है वह, फिर आगे की बात अंग्रेज़ी में… “बाहर चॉकलेट की दुकानें बन्द थीं, दोपहर के कारण, सो यहीं से जलेबियां दिलवा दी. आप भी चलिये, भोजन लग चुका है.”
मैं पहले शर्मिन्दा होती हूं फिर धीरे-धीरे तटस्थ – “शुक्रिया.”

रात हम मां बेटी जब घूम-फिर कर कमरे में आती हैं तो अनी सोते-सोते मेरे गले में बांहे डाल कर पूछती है, “मम्मा, आप इतना डरती क्यों हैं?”
मैं बहुत देर तक चुप रहने और सोचने के बाद कहती हूं…” पता नहीं बेटे.”

अनी सो चुकी है. मैं धीरे से उसे अलगा कर उसे उसके बिछावन पर रख आती हूं. तकिया कंबल सब लगा कर.

बत्तियां बन्द कर चुकी हूं मैं. कोई है जो अंधेरे का फायदा उठाकर मुझे कहीं ले जा रहा है, सीढ़ी-दर-सीढ़ी जैसे अपने भीतर ही उतर रही हूं मैं… अन्धेरे में कई दृश्य गड्डमड्ड हैं… क्या उस ‘पता नहीं’ के जवाब में…?

अनी का प्रश्न, अपना यह एकांत और अंधेरा सब मिलकर जैसे मुझे सामना करने का साहस देते हैं, अपने भीतर की उन अंधी बावड़ियों का जहां जाने से मैं खुद डरती हूं… जिससे नजरें चुराते-चुराते भागती हूं मैं और अनी के लिये अपने भय के लाख-लाख दूसरे कारण और तर्क ढूंढ़ती हूं…

नन्हीं सी मैं घर के उस ड्राइवर की गोद में हूं जो सबका प्रिय है. जो अक्सर मुझे गोद में बिठा कर रखता है, जांघों पर अपनी पूरी ताकत से दबा कर – जहां मेरा दम घुटता है…

ट्यूशन पढ़ाने वाले भैया की वो गंदी सी चुम्मियां जिसमें वो होठ गालों से नहीं सटाते, होठों पर रगड़ते हैं, कस कर…

उस दूर के अधेड़ जीजा जी का पांव दबबाने के बहाने जगह-जगह उंगलियां फिराना…

मैं चुप थी और चुप होती गई थी. कोई प्रतिरोध नहीं करना स्वभाव का एक हिस्सा बन गया हो जैसे. बस दुख… भीतर तक पसरता एक अजनबी, अनचाहा और अनजाना सा दर्द.

मैं सोचती हूं, घर में इतने-इतने लोग… किसी को तो समझना था, किसी को बचा लेना था मुझे… खास कर मां को. पर उतने भरे-पूरे परिवार में किसी को इतनी समझ नहीं थी. किसी के पास इतना वक्त नहीं था. सबके अपने हिस्से के काम, सबकी अपनी एक दुनिया.  मैं फूट-फूट कर रोती हूं, सिसकती हूं, सिसकती रहती हूं…

मैं उठ कर अनी के पास चली जाती हूं.  सुबकते-सुबकते मैं कब सो गई हूं, अनी को अपनी बांहो के घेरे में लिये हुए मुझे पता नहीं.

...नींद में फिर वही सपना आया है लेकिन अबकि कुछ बदले रूप में. सपने में वैसी ही कोई बावड़ी है, कोई नीचे उतर रहा है चुपचाप, उदास… धीरे-धीरे… ध्यान से देखती हूं, यह मैं हूं और बावड़ी है, गंधक वाली बाबड़ी, जिसे सुल्तान इल्तुतमिस ने कुतुबुद्दीन एबक के इस्तेमाल के लिये बनवाया था.. कहते हैं, इसकी पानी में गंधक की मात्रा बहुतायत में है और यह चर्मरोगों और बहुत से अन्य रोगों के लिये रामबाण का काम करता है…नीचे उतरकर उलीच-उलीच कर उसके पानी से अपना अंग-अंग धोती हूं, सोचती हूं मन-ही-मन –  शायद मेरे भीतर के तलगृह में छुपे इन यादों को भी धो कर मिटा सके यह… मै निर्मल हो लूं ऐसे कि मन में कुछ भी न बचा रह जाये, कुछ भी नहीं.

हंस – सितंबर, २०१२ में  प्रकाशित