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आरती कुमारी की कविताएं

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आरती कुमारी


युवा कवयित्री, ‘कैसे कह दूँ’ एक काव्य संग्रह, संपर्क: sartikumari707@gmail.com

1.  स्वयं से संवाद
कितना सुखद होता है
अपने होने को महसूस करना
और प्यार करना खुद को।
अलग-अलग रिश्तों में बँटकर
जैसे बँट जाती हूँ मैं ही कई हिस्सों में।
दूसरों की खुशी में कई बार घुलती मैं, जैसे अनचीन्ही
अन्जान हो गयी हूँ अपने ही अस्तित्व से।
मगर तभी कहीं सुदूर एकान्त में
कोई गा रहा होता है
स्नेहिल शब्दों का मधुर गीत
जहाँ सालों भर खिलते हैं फूल
जहाँ हमेशा गूँजता रहता है
कल-कल झरनों का संगीत
जहाँ नदियाँ अठखेलियाँ करती हैं नौकाओं के साथ।
जहाँ सूरज अपनी किरण बाँहे फैलाए
पुचकारता रहता है पेड़ पौधें को हमेशा
जहाँ रात होते ही रुपहली चाँदनी ढ़क लेती है
सबकुछ अपने आगोश में।
आखिर कौन है, जिसने अपनी साँस की लडि़यों में
पियोये हैं सुमधुर गीतों के शब्द।
वहाँ कोई दूसरा नहीं
पेड़ पौधें, , नदी झरनों
ओर सरज चन्द्रमा के साथ थिरक रहा है
मेरा अपनी ही अस्तित्व
उस नीरव एकान्त में।

2.  एक सवाल

क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम मुझे हर उस गलती का
जि़म्मेदार ठहरा सकते हो,
जो मैंने कभी किए हीं नहीं?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम अपनी सारी मुसीबतों की जड़
मुझे बता सकते हो ?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
मुझ पर पाबंदियाँ लगाकर
मुझे चौके के-चूल्हे तक सीमित रख सकते हो?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
मुझसे सपने देखने का अधिकार भी
तुम छिन सकते हो?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
अपने पुरुषत्व  से
तुम मेरे अस्तित्व को
जब चाहे कुचल सकते हो?
या फिर मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम्हें डर है समाज का,
लोक परम्परा का,
रीति -रिवाज का।
पर शायद तुम भूल रहे हो
की इस समाज की रचना
हमसे ही हुई है,
हम हैं तो स्नेह, दुलार, उल्लास-उमंग
धरती पर अब भी कायम है।
हम ही तुम्हारे हमसफर
हम ही तेरे हमराज हैं,
तुम्हारे अंतर्मन की शक्ति बन
हम मुश्किल  से लड़ते हैं,
तुम्हारा हौसला, गुरूर बन
हम बुलंदियों को छूते हैं।
इसलिए मत कोसो
हमें मत बांधो,
मत जकड़ो मसलो मत हमें,
मत रोको, मत टोको
मत कोख में मिटने दो हमें,
खुल कर जीने दो,
अपनी मंजिल छूने दो हमें।
लड़कों के साथ कदम दर कदम
सम्मान से बढ़ने दो हमें।

3. वह लड़की
रोज आती है
‘वह’ लड़की
गन्दे बोरे को
अपने कांधे पर उठाए
और चुनती है
अपनी किस्मत-सा
खाली बोतल, डिब्बे और शीशियाँ
अपने ख्वाबों से बिखरे
कुछ कागज के टुकडा़ें को
और ठूंस देती है उसे
जिंदगी के बोरे में

गरीबी की पैबन्दों का
लिबास ओढ़े
कई पाबन्दियों के साथ
उतरती है
संघर्ष के गन्दे नालों में
और बीनती है
साहस की पन्नियाँ
और गीली लकड़ी-सा
सुलगने लगती है
अन्दर ही अन्दर
जब देखती है
अपनी चमकीली आँखों से
स्कूल से निकलते
यूनिफाॅर्म डाले बच्चों को!

ऐ री मोलकी

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सुनीता धारीवाल जागिंड


सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की और वीमेन टी वी इंडिया पोर्टल की मोडरेटर, संपर्क: suneetadhariwal68@gmail.com .

आज गांव जल बेहड़ा  की आबोहवा बदली-बदली सी है सारे गांव में चर्चा है रुल्दू जाट का छोरा  राममेहर मोल की बहु ल्याया है इसी बात को लेकर गांव में हंसीठठ्ठा व्यंग्य और कहीं-कहीं सन्जीदा बाते हो रही हैं। मतेरी चमारिन गांव में पानी की टून्टी पर बोल रही थी कि रूल्दू जाट की बहु लक्ष्मी ने मोल की बहु को घर में घुसने नहीं दिया और बाहर खेत में तूड़ी व भैंस वाले कोठड़े में ही रामेहर व उसकी मोल की बहु रहते हैं। सारा गांव आने-बहाने रुल्दू के खेत की तरफ आणा-जाणा कर रहा है। मोल की लुगाई की एक झलक पाने के लिए।
गांव के सरकारी स्कूल वाली गली में चार रान्डे (अविवाहित) रामफल, रामकेश, प्यारा और जोगिया भी अपने भीतर  की बात एक दूसरे पर उडेल रहे हैं। सुना है रामेहर 25 हजार मोल देकर बंगाली लुगाई ल्याया है, जोगिया ने अपना खबरी ज्ञान झाड़ा कि मैने पता किया है कि रामेहर ने पांच हजार खुद की कमाई के बचाए थे, बीस हजार मन्डी के आढ़ती लाला अमरनाथ से दो रूपए सैकड़ा पर उठा के ल्याया है। रामफल ने साथियों को समझाया कि देखो भाइयो यदि हम चारो पांच-पांच हजार रुपए रामेहर को देकर लाला के पैसे चुकते कर दे मोल की बहू हम ाी बांट ल्यागें। रामेहर दूर से ल्याया है उसके घरां रहेगी इसलिए वे तीन दिन बरत लेगा हम चारो ह ते में एक-एक दिन बरत ल्यागें। चारो सहमति बना कर उठ खड़े हुए और रामेहर से बात चलाने के उचित अवसर ढूंढने लग गए।

दिन के 20 चक्कर बारी-बारी रामेहर के कोठड़े के लगाए पर रामेहर दिखाई न दिया। रुल्दू जाट के  घर रामेहर की भाभियाँ,  कृष्णा और सुमन दोनों सगी बहने उम्र में रामेहर से छोटी और नेग में बड़ी। घर में कोहराम कर रही हैं, नासपीटा टीबी का मरीज, कुरड़ी का कूड़ा, काली काटड़ी लयाया, साल में एक लींगरा जाम देगी पांच किलटे जमीन के निगल के मानैगी। ऊत पै हारे सुख की रोटी न जरी गई बुढँय़ा के 15 किल्ले मैं ते साढ़े सात-सात बांटे आवे थे दोनों बेबेयां के हारे बालक सुख की खा लेते। फिर दोनों आपस में लडऩे लगी। सुमन बोली ऐ कृष्णा सब तेरा करया धरय है जै तू रोटी दवाई ढंग ते दिए जांदी तो या नौबत कोनी आवै थी। कृष्णा तडक़ कर बोली मेरा के या तो तेरा करया धरया है जवान दयोर था बखत तै बहलयो के बतचाएै जांदी। गात की चमड़ी का के बिगडय़ा करे। आखिरी बखत फूंकण के, काम आया करै, तेरे पै मौका नहीं समाल्या गया। इब रोण तै के जमीन बच ज्यागी। जाऐ रोई तेरे कान्ही तो लखया करदा वो महीना पन्द्रह दिना में उसकी भी राख लैन्दी तो न्यू गाम में घर की माट्टी कोनी उड़ै थी। सुमन बोली चिन्ता न करै बेबे मैं भी देसे न बरदार की बेटी सू इस मोलकी नै तो गाम मै तै निकलवा के दम ल्यूगी।

साभार गूगल

फुलमा बुआ भी तडक़े-तडक़े गांम में पहुंच ली थी और लक्ष्मी को समझाने लगी। भाभी तू भी किसी काम की ना निकली छोरा! मोल की बहू ले आया और सारे गुआन्डा मै रुक्का पड़ रया सै। बुढेया की इज्जत के बट्टा लाग लिया। हां री किसे गरीब की काणी, लडग़ी, लूली व आंन्धी कोई सी भी न थ्याही थम ने। पता नहीं रामेहर नकटा किस ने उठा ल्याया। जा जात न पता न गाम का, न बाप का पता। हारे करम में यू ऐ लि या था। सारे गाम के तानेया नै मेरा गात का छांलणा कर दिया। तेरा भतीजा मोल की ल्याया- मोल की ल्याया। फुलमा का यही रिकॉर्ड सारा दिन बजता रहा।

रामेहर को बहुत  बुरी खांसी थी। खांसी के  साथ खून भी आता था। तूड़ी के  कोठड़े में गरमी का बुरा  हाल था। लगातार खांसना असहनीय था।  थोड़ा आराम मिलते ही रामेहर टूटी खाट पर लेट गया। रामेहर का चार दिन का रेल का सफर कल्पनाओं में बीता था बगल में मोल की दुल्हन को लिए रामेहर ने कितने रंगीन सपने बुने थे जो गांव में कदम रखते ही बदरंग उलझे धांगो में परिवर्तित हो गए थे। रामेहर सोच रहा था उसका घर होगा, बच्चे होंगे,  सच्चाई तो यह थी कि बिन बयाहे उसकी कोई इज्जत न थी। मां के राज में चूल्हे के पास बैठकर घी मक्खन चटनी के साथ बाजरे की रोटी मिलती थी। पिता का दुलार व भाइयों की थपकी भी रामेहर के नसीब में थी। सब कुछ तो समान्य था। जवानी की दहलीज पर रोग से सामना हो गया था। बहुत इलाज करवाया देसी, अंग्रेजी, ओपरी पराई, झाड़ फूंक बाबा ओझा सब किया पर मर्ज बढ़ता गया। ज्यूं-ज्यूं दवा की। अब कुछ भी सामान्य नहीं था। चुल्हे चौके पर बड़ी भाभी  कृष्णा का राज था, खेत क्यार डांगर डोर पर छोटी भाभी सुमन का। अब उसे घर के अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। क्योंकि उसकी गिनती गांव के मलंग रान्डों में थी। उसकी रोटी बाहर ही भेजी जाती थी। चूल्हे तक पहुंच पाना अब केवल एक सपना था। बिना बयाहे मरद की नजर में खोट होता है और रान्डे मलंग होते हैं यहीं समाज का स्थापित सत्य था। जवान होती बेटियों का वास्ता देकर कृष्णा व सुमन ने घर के दरवाजे रामेहर के लिए बन्द करवा दिए थे। रामेहर को मां की रसोई देखे दस साल बीत चुके थे और उस रसोई तक जाने का दरवाजा सिर्फ उसकी अपनी विवाहित पत्नी ही उसे दिखा सकती थी। रामेहर की खुद की शादी के बाद ही उसे घर में जगह मिल सकती थी। रामेहर अच्छी तरह जान गया था कि स मान पाने व सामाजिक रूप से इज्जतदार कहलाऐ जाने के लिए बहु का होना जरूरी था। उसका अनुभव बता रहा था कि शरीर की भूख की व्यवस्था पैसे से गांव में ही उपलब्ध थी और शहर में तो पैसे शारिरिक सुख की उपलब्धता की बहुलता थी। परंतु सामाजिक स्वीकार्यता हेतु उसे उसे घर बार वाला बनना था, जो केवल विवाह से ही संभव था।

बीमारी के कारण उसका कंही से रिश्ता नहीं आता था। उसकी इस समाजिक स्थापना के  लिए बहु बहुत जरूरी थी। चाहे मोल की ही क्यों न हो।  बयाह के गीत, बहु के स्वागत के लोकगीत, आंखों में मां की रसोई  के बर्तन, चुल्हा, हारा, टोकणी, बिलौणी, कढौणी शक्कर व गुड़ के माट सब तैरते रहे। सफर का रामेहर को पता भी न चला था। रामेहर के गांव में पहुंचने से पहले गांव वालों को भनक लग चुकी थी कि रामेहर मोल की बहु ला रहा है। सारे गांव में मोल की बहु का कौतुहल था लोकल बस से उतरते ही रामेहर अपनी नई नवेली बहु को लेकर अपने घर चला दिया। रास्ते में गांव के बच्चों की फौज रामेहर के पीछे लग गई और मोलकी-मोलकी के नारों से गांव की गलियों को गुजांयमान कर दिया। जैसे-तैसे घर पहुंचते ही रामेहर ने मां को आवाज दी, भाभियों की गालियों, तानों, उलाहनों में मां की आवाज सुनाई ही नहीं दी। मां ने गांव व समाज के दबाव में घर में पैर नहीं रखने दिया। रामेहर मां पांव में गिर कर रोया पर सब बेअसर रहा। रुल्दू बैठक में सब देख रहा था बाप की आंखों में तरस का पानी तैर गया पर गांव की चौधराहट के कबच से आर्शिवाद के बोल नहीं निकले। परन्तु रामेहर को गांव के बाहर खेत के तूड़ी वाले कोठड़े में रहने की इजाजत दी गई इस शर्त के साथ कि वह गांव से कोई वास्ता नहीं रखेगा। यह कैसा इज्जतदार बहिष्कृ त जीवन था रामेहर को समझ नहीं आया। रामेहर की बहु का नाम मोलकी पड़ गया था सभी गांव वाले इसी नाम से उसकी बात करते थे। गांव की इज्जत के ठेकेदार भी मोलकी की एक झलक पाने को आतुर रहते थे। आने बहाने रूल्दू के खेत की तरफ हो आते थे कि शायद मोलकी के दीदार हो जाएं। मोलकी का मोल लगा था इसलिए गांव वाले सांझे खाते की बहु कहकर अपनी दबी वासनात्मक इच्छाओं को हवा देते रहते थे। इज्जतदार कहलाऐ जाने वाले लोग भी सरेआम भद्दे अश्लील  मजाक में मोलकी का नाम लेकर ही-ही-ही करते थे।

साभार गूगल

गांव का बुजुर्ग रामदिया माली पंचायत घर का चौकीदार संन्जीदा बुजुर्गों व युवाओं की पंचायत लगा कर रखता था व वहां गांव की महिलाओं को पानी पी-पीकर कोस रहा था। बुरा हो इन बीर बान्तियों का छोरीयां ने पेट में मरवा देती हैं बेडा डूबे इन डाकटरां का,  जिनकी मशीन छोरा-छोरी बतावे। हारी आंखों के आगे ही गाम में मोल की आण लाग ग्यी और बैरा नी के के देख कै मरणा पड़ेगा। आधे गांव मलंगा के होग्ये। छोरीयां का घर तै निकलना मुश्किल हो गया। न्यूऐ छोरियां ने कूख में मरवाओगे तो नरक पाओगे। सन्जीदा युवक भी रामदिया माली की गहराई को समझते थे और आने वाले समय की आहट सुन रहे थे। उधर मोलकी को सिर्फ संकेतों  की व आखों की भाषा समझ आती थी। यहां सब कुछ उसके लिए नया था। मोलकी उस कोठड़े के कोने में बैठी सोच रही थी कि बाबा ने कहा था जब तक पेट में बच्चा न आए घर पर फोन नहीं करना,  न चिट्ठी  लिखवाना। बच्चा पैदा करने के बाद ही गांव में वापिस आना सिर्फ मिलने। मोलकी की पांच बहने उससे छोटी थी दो बड़ी बहने व एक भाई था। बड़ी बहनों को ट्रक वाले 25-25 हजार रुपए में ले गए थे। बाप व भाई खेतों में काम करते थे। बाढ़ का पानी हर साल तबाही लाता था व पानी उतरते ही करजा चढ़ जाता था। दस-दस दिन तक भूखा रहने का अ यास मोलकी को थो इसलिए तीन दिन तक तुड़ी के कोठड़े में पानी पर निर्भर रह कर उसने कोई शिकायत नहीं की थी। मोलकी का बाप जानता था कि बच्चा होने पर ही मोलकी को जमीन जायदाद का हक और घर में जगह मिलेगी, इसलिए कड़े नियम से भेजा था अपनी बच्ची को। मोलकी जल्द से जल्द अपने भाई बहनों के पास जाना चाहती थी इसलिए वह अपने बच्चे के बारे में ही सोचती रहती थी। रामेहर ग भीर रूप से बीमार था मोलकी अब केवल उसके स्वस्थ होने की चिन्ता करती थी और इलाज का ही उपाय करना चाहती थी। पांचवे दिन मोलकी ने अपनी मां के दिए चावल के आटे के लड्डू अपनी पोटली से निकाल कर रामेहर को दिए जैसे-तैसे दो दिन और निकल गए।

सातवें दिन रामेहर को बुलाने ारतु नाई खेत में आया और कहा कि रामेहर को मां ने घर बुलाया है। मोलकी झट से दुप्ट्टïा ओढक़र चप्पल पहनकर रामेहर के पीछे चल दी। भरतु ने रोका कि मां ने अकेले रामेहर को बुलाया है। मोलकी ठहर गई उसे अब खेत के कोठड़े में डर लगने लगा था। वह वहीं सिमट कर बैठ गई और रामेहर का इन्तजार करने लगी। घर पहुंचते ही मां ने रामेहर को चाय पिलाई और कहा बेटे मुझे पता नहीं था तू बहू का इतना शौकीन है। हम तेरे मां-बाप हैं कहीं न कहीं तो तेरा बयाह करते। मैं करमो जली न्यू सोची तेरा रोग लाईलाज है,  किसी की बेटी की विराम माटी हो ज्यागी। पर तू न मान्या पर इब भी देर नहीं हुई है। तेरी बुआ फुलमा तेरा रिश्ता ल्यायी है,  जीन्द के पास गाम की छोरी है, विधवा है। बस तेरे तै चार-पांच बरस ही बड़ी होगी। छोरी के बाप भाई ना है। तेरे सहारे टैम काट लैगी। अपरेशन भी  बण रहया है तेरी सध ज्यागी तेरे पै  कोई जि मेदारी का बोझ भी नहीं पडैगा। दस तोले सोना मै चढा दयूगी। आगलै 25 हजार नकद टीके में देवेंगे और धनदाज सारा दे देंगे। एक भैंस भी देवेंगे और बेटा मोलकी की चिन्ता ना करिए मनै तेरे टोहाना वालो मौसे ते बात कर रखी है वो इस मोलकी ने तीस हजार मै ले ज्यागा। सत्तर  साल का होरया सै चौधरी उसके बुढ़ापे के बचदे दस-पंद्रह साल सुख तै काढ़ लेगा। इस मोलकी की जात न पात इनका तो काम न्यू होया करे। खानदानी टाबरा में इसी बहु ना वै ल्याया करते, मैंने साई पकड़ राखी है मोलकी की। आज रात ने ऐ तेरा मौस इसने ले ज्यागा। गाड़ी लै के आयैगा।

 रामेहर सन्न  रह गया और उसे कुछ समझ  नहीं आया दिमाग सुन्न हो  गया। रामेहर बिना कोई जवाब  दिए खेत की ओर चल दिया।  राह में रामफल, प्यारा, जोगी और रामकेश ने टोक दिया अपनी मंशा जाहिर कर दी। चार कदम आगे गाम के बदमाश छोरेयां ने फिकरा कसया एक बार हमने भी दिखा दे मोलकी तेरा हिसाब तै हो लिया होगा। राममेहर पीछे मुडक़र देखता तो बोले काली गाजर ले रहया सै मेरे बटे थोड़ी सी कांजी हमनै भी प्या दे। रामेहर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। उसके सोचने समझने की शक्ति को, विचारों ने हर लिया था। वह सोच रहा था कि बहु-बहु में फर्क होता है क्या। बहु तो बहु ही होती है चाहे मोल चुकता कर के फेरे लिए हैं चाहे दहेज लेकर फेरे लिए हों। दर्जा तो बहु का ही है और होना चाहिए भी। दहेज की बहु का इतना स मान! यदि कोई देख भी ले तो मरने मारने को उतारु हो जाते हैं औरत के कारण तो कत्ल होते आए। मेरे विवाह को कोई विवाह नहीं मानता। मुझे गांव निकाला मिला सामाजिक उपहास पीड़ा और बहिष्कार मिला। आखिर क्यों मैंने तो विवाह जैसी संस्था को अपनाया है। असहाय व नीरीह मन: स्थिति के साथ रामेहर मोलकी के पास लौट आया। मोलकी ने एक पल में इशारों में अनेक सवाल कर डाले मां ने मुझे भी बुलाया है  क्या-क्या कहा कब हम गांव में जाएंगे आदि-आदि पर रामेहर चुप रहा।
रामेहर मोलकी  की सेवा व प्रेम का कायल हो चुका था। रामेहर किसी भी  कीमत पर उसे छोडऩा नहीं चाहता था, उसने सारी बात मोलकी को बताई और दोनों ने उसी रात गांव छाड़ शहर की राह पकड़ ली। शहर में छोटे से प्रॉपर्टी डीलर का एक कमरा किराए पर ले लिया। पॉपर्टी डीलर की पत्नी दयालु महिला थी। उसने उन्हें दरी, थाली, गिलास, चूल्हा, बल्ब सब दिया और रामेहर ने मिट्टी ढोने वाले ट्रैक्टर ट्राले पर ड्राईवर की नौकरी करनी शुरू कर दी। सौ रुपए दिहाड़ी के पैसों में से नबबे रुपए रामेहर के इलाज के लिए खर्च कर मोलकी खुश थी। मोलकी के लिए अपने पेट की भूख से भी जरूरी उसको कोख की भूख थी जो जल्द से जल्द बच्चा चाहती थी। इसलिए रामेहर के स्वास्थ्य पर वह सब कुछ खर्चना चाहती थी। पंद्रह दिनों में सब सामान्य होने लगा था कि अचानक मकान मालिक की पत्नी के पिता मृत्यु हो गई व अपने बच्चों सहित मायके चली गई। मोलकी की हैसियत समाज में मोलकी ही थी। मकान मालिक आपनी वासना का दास हुआ और भीतर के वहशी ने अकेली मोलकी को तहस-नहस कर दिया। उसकी इज्जत के  चीथड़ों की गवाह हर दीवार थी। उसके शोर शराबे की किसी को भनक तक नहीं मिली। रामेहर रात वापिस आया तो मोलकी लुट चुकी थी। उसके कमजोर शरीर में ताकत नहीं थी कि वह प्रतिकार कर पाता। दोनों ने ही रात को अपने ट्रेक्टर मालिक के घर शरण ली। मालिक की मां दयालु थी दया कर उसने  एक बिस्तर बर्तन, चुल्हा इत्यादि दिया और स्थानाभाव में उन्हें भैंस के कमरे में एक तरफ कोने में स्थान दिया। मोलकी सारा दिन उस महिला के घर का सारा काम करती बदले में उसे एक पाव दूध मिलता जिस मोलकी रामेहर को पिता देती थी।

साभार गूगल

लगभग एक माह बाद मालकिन के बेटों की  बहुए उस घर में आ गई, उन्होंने मोलकी की उपस्थिति को नहीं स्वीकारा उन्हें मोलकी की मुस्कान और चंचल आंखों ने डरा दिया। उन्हें लगा उनके पति बहक जाएंगे यह काला जादू जानती है। उन्हें फंसा लेगी बहुओं ने मोलकी व रामेहर को घर से चले जाने का हुकम सुना दिया। बेबेस मालकिन कुछ न कर सकी वह महिला मेरे घर का पता जानती थी। एक दिन सुबह-सुबह मोलकी को लेकर वह मेरे घर पहुंची। मैंने सिर से पांव तक मोलकी को देखा वह मात्र तेरह वर्षीय बच्ची थी। जिसका अभी तक शरीर भी विकसित नहीं हो पाया था। एक ऐसा पौधा जो खिलने का मतलब भी नहीं जानता था। उसने कातर आंखों से मुझे देखा था। वह मुझ से बहुत कुछ कहना चाहती थी परंतु मेरे पास समय की उपलब्धता बहुत कम थी। उस महिला ने कहा कि इसे काम पर रख लो मेरे पास पहले से ही दो घरेलू नौकर थी इसलिए मुझे जरूरत नहीं थी परन्तु उसे मेरी जरूरत थी, मैंने रखने की इजाजत दे दी। वह मेरे सुबह उठने से पहले ही मेरे घर पहुंच जाती थी। तीनों वक्त का भरपेट खाना उसे अरसे बाद नसीब हो रहा था मैंने उसे उसके पति के लिए खाना भी मेरे घर से ही ले जाने की इजाजत दे दी थी।

वह जब भी मेरे सामने  पड़ती बहुत कुछ कहने की कोशिश  करती थी परन्तु मुझे समय नहीं मिलता था चुनाव नजदीक आते जा रहे थे। लोगों की गहमा-गहमी भीड़ बढऩे लगी थी। मैं सुबह 6 बजे से रात 12 एक बजे तक जन सभाओं को स बोधित करती। रात को आकर सारे दिन का आंकलन करती रात दो बजे सो जाती और वह दिन भर मेरी तलाश में रहती। एक दिन सुबह घर से निकलते ही उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने पूछा क्या चाहिए बोली आप मेरी मां बन जाओ मेरी बात सुन लो। उस सुबह की वह  मेरी पहली याचक थी मैंने उसकी बात सुनने का अगले दिन का समय दे दिया। अगले दिन की मेरी सारी जन सभाएं कैन्सिल कर दी गई मेरी गर्दन व कमर में बेहद पीड़ा थी मैं उठने से भी लाचार थी। मैंने झट से मोलकी की बुलाया और अपनी बात कहने का मौका दिया। मैंने पूछा क्या नाम है वह बोली मोलकी, मैंने पूछा क्या तु हारे पिता ने यही नाम रखा था, बोली नहीं,  यह नाम तो ससुराल का है मेरा नाम तो रिन्की है। पिता का नाम- बोली सईद, गांव का नाम- पता नहीं, जिला- पता नहीं, प्रदेश- पता नहीं, बस देस का पता है वह बांग्ला है, मैंने पूछा नदी पार वाला या इधर वाला वह बोली हिन्दुस्तान वाला। मैंने पूछा चिट्ठी  कैसे जाएगी- बोली पता नहीं बस टेलीफोन नंबर है, बाबा ने कहा है जब बच्चा हो जाए तो ही फोन करना। मैंने न बर मिलाया तो जवाब में न बर उपलब्ध नहीं था।
वह मेरे पैरों  में गिर कर रो रही थी आप मुझे  रख लो हमेशा के लिए बस मुझे रोटी देना मेरे पति को दवाई देना और कुछ नहीं। उसने  जो कुछ घटा मुझे सब बताया। मैंने बहुत तेज दवाईयां ली और अगले ही दिन फिर से अभियान में जुट गई। वह रोज मेरी ओर देखती जैसे  अभी भी कुछ बताना रह गया। उसकी आंखें अभी भी कहती थी मेरी सुनो। एक दिन भीड़ में से वह मुझे ाींच कर अन्दर ले गई और कहने लगी तुम मेरी मां हो सुनो- मेरा जे पति है रामेहर मुझै उसे घिन्न आती है। उसके पास आते ही मेरा जी मिचलाता है, मैं उसकी गन्दगी व बलगम साफ नहीं कर पाती हूं। वह बहुत गन्दा दिखता है। उसके दांत मुंह से बदबू आती है। मैं क्या करूं बताओ मां मैं क्या करूं। मैं मच्छी खाना चाहती हूं। मैं अपने छोटे भाई बहन के पास जाना चाहती हूं पर बाबा ने कहा बिना बच्चे के नहीं आना। बताओ मां मैं क्या करूं। मैं निरन्तर थी। शाश्वत सत्य यह था कि एक बेटी ही अपनी मां से कह सकती थी यह सब।

मेरे पास कोई जवाब नहीं था उसके पास घर का पता नहीं था वह बालिग नहीं थी। सामाजिक रुप से स्वीकार्य भी नहीं थी। मेरे कानूनन हस्त्क्षेप का मतलब उसका बालिग होने तक नारी निकेतन में रहना था। मेरी मसरुनफियत ने उसके फैसले को कुछ समय के लिए टाल दिया था। चुनाव के थमने पर मैंने रिन्की के बारे में घरेलू नौकरों से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह तो पिछले 20 दिनों से नहीं आ रही। अपना वेतन ले गई है और आपसे मिलना चाहती थी उसे उसका पति जबरदस्ती अपने साथ ले गया है। नई जगह जिसका किसी को पता नहीं। आज भी मरे जहन में उसके प्रश्न हैं जिनका उत्तर मुझे केवल रिन्की को ही नहीं बल्कि सभी मोल की बहुओं को देना है। कम से कम महिला प्रतिनिधि होने के नाते हमारी जवाबदेही इस उपजते वर्ग के प्रति ाी उतनी ही बनती है जितनी अन्य मुद्दों के प्रति कन्या भु्रण हत्या से उपजी इस समस्या का सामना ाी समाज को करना है। ऐसी महिलाओं का सर्वेक्षण करना उनकी सामाजिक स्थापना हेतू उचित माहौल व सुरक्षा प्रदान करना उनके शिक्षा, संपत्ति  का हक सुनिश्चित करना जैसे मुद्दों पर ध्यान देना ही होगा और खासतौर पर मेरा आहवान है कि या तो कन्या भ्रुण हत्या बन्द करें अनयथा सांस्कृतिक विविधताओं भरे समाज के लिए तैयार रहें क्योंकि हर गरीब का देश, समाज, जात-पात नहीं केवल मोल होता है और मोलकी किसी ाी प्रदेश की हो सकती है मिल एक दिन जाएगी आपके अपने ही परिवार में!  आपके ही आस पास। विभिन्न भाषाओं को बोलती हुई हास्यपद हरियाणवी या पंजाबी भाषा का प्रयास करती हुई एक और मोलकी।

बेबस मालकिन मोहिनी कुछ न कर सकी। वही भली औरत शहर की लोकप्रिय समाज सेवी महिला नेता प्रियवंदा को जानती थी जो अकसर महिलाओं के बीच उनकी मदद के लिए चली जाती थी। प्रियवंदा स्वयं भी राजनीतिक संघर्षों से जूझ रही थी फिर भी वह आने वाली हर महिला का स मान करना जानती थी।
अगली सुबह मकान मालकिन मोहिनी मोलकी को साथ लेकर प्रियवंदा के घर पहुंच गई। प्रियवंदा ने मोहिनी को देख आवाज दी और अपने दफ्तर  में बुलाया। मोहिनी के साथ एक अबोध लडक़ी को देख प्रियबंदा ने उस लडक़ी के बारे में पूछा तो मोहिनी ने बताया कि आप इसे घरेलू काम के लिए रख लो इसका नाम मोलकी है और यह यहां पर सुरक्षित रहेगी। प्रियवंदा ने मोलकी को एक बारगी सिर से पांव तक देखा यह पक्के काले वर्ण की मात्र 13 वर्षीय बालिका थी जिसका शरीर भी अभी तक विकसित नहीं हुआ था। मोलकी ने भी बड़ी कातर नजरों से प्रियवंदा की ओर देखा था। उसकी आंखे प्रियवंदा से बहुत कुछ कहना चाहती थी, आंखों के इस क्षणिक संवाद से एक अनजाना रिश्ता जन्म ले गया था मोलकी और प्रियवंदा के बीच। प्रियवंदा के पास समय का अधिक आभाव था इत्मिनान से बात करने के लिए वह तो बस दौड़ रही थी उड़ रही थी तुफान के पत्तों की तरह। सियासत के दलदल से बेदाग निकलन चाहती थी कामयाबी के छोर तक। हाथ काट कर शक्ति की कलम पकड़ा देना ही उसके दल की सच्चाई थी, जिसे प्रियवंदा ने त्याग दिया था। वह हवाओं के विपरीत बह रही थी। इसलिए दिन रात एक किए हुए थी। दिनभर जन स पर्क और रात देर तक जरूरी फाईलें व कागजात लिखने व डाक देखने व जवाब बनाने, प्रैस नोट बनाने में और कार्यक्रम बनाने में लग जाती। सुबह जल्दी उठ जनता से मिलना शुरू करती फिर हलके के गांवों गलियों को नापती। जन स पर्क बढ़ाती।

साभार गूगल

प्रियवंदा ने आवश्यकता न होते हुए भी मोलकी को काम पर रख लिया। मोलकी सभी नौकरों से पहले सुबह ही काम पर आ जाती उसने कई महीनों बाद भरपेट खाना खाया था। उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था। वह जाते वक्त अपने पति रामेहर के लिए रोटी छुपा कर ले जाती। सभी नौकर ऐतराज करते मैडम जी यह औरत ठीक नहीं है, इसका चाल चलन ठीक नहीं है यह तो बेशर्म मरदों की आंखों में झाकती है और हंसती है। प्रियवंदा मोलकी का सच जानती थी कि उसे हरियाणवी या हिन्दी कुछ भी सपष्ट बोलना नहीं आता था। प्रियवंदा स्वयं भी उसके टूटे-फूटे बिना सिर पैर के बंगाली उच्चारण वाले हरियाणवी शब्दों को मुश्किल ही समझ पाती थी। मोलकी को तो आंखों की भाषा सरल लगती थी। वह तो बस आंखों से कहने और जानने का प्रयास करती थी। कुछ न समझ आए तो हंस दिया करती थी। दिन बीतते रहे मोलकी यूं ही अपनी हर बात प्रियवंदा को बताने के अवसर तलाशती रहती।

प्रियवंदा के सामने हर दिन नई-नई चुनौतियां आ खड़ी होगी। कभी राजनैतिक कभी सामाजिक कभी पारिवारिक। जिनका प्रियवंदा डट कर सामना करती। दुर्भाङ्गय से प्रियवंदा चुनावी समर में एक अपरिपक्व सेना की कमांडर थी जिसे भर्ती होते ही युद्ध के मोर्चे पर खड़ा कर दिया गया था। जब राजनैतिक दल को छोड़ा तो अपना संगठन बनाना पड़ा। अभी संगठन में कार्यकर्ताओं को जोड़ा ही था कि समय से पहले चुनावों का बिगुल बज गया। कम समय में जितना भी क्षमता वर्घन प्रशिक्षण दे सकी। उतने से ही सन्तोष करना पड़ा। वह जानती थी जो बल और छल कपट अनुभवी संगठनों में होता है उसके संगठन में कही नहीं था। उसका आत्मबल दे िाए वह अपरिवक्त सेना से ही वह समर में अपने योद्धा होने का प्रमाण देना चाहती थी दुनिया को। खासकर उन स्थपित दलों के नेताओं को यह सन्देश देना तो चाहती थी कि उसका वजूद मिटा नहीं है। प्रियवंदा दिन रात एक किए हुए थे, उसे किसी भी चीज की फुरसत नहीं थी न खाने-पीने की न बच्चों की न घर की। बस उसकी धुन में देश धर्म छाया रहता था।

प्रियवंदा एक जरूरी जलसे में जाने के लिए अभी गाड़ी में बैठने ही वाली थी कि मोलकी ने कसकर प्रियवंदा का हाथ पकड़ लिया और कहा कि अभी मेरी बात सुनो। मोलकी उसे दिन की पहली याचक थी इसलिए प्रियवंदा भीतर लौट आई और मोलकी से कहा जल्दी से बताओ मोलकी ने कहा तुम मेरी मां हो तो सुनो यह जो मेरा आदमी है न रामेहर मुझे उस से घिन्न आती है उसके पास आते ही मेरा जी मिचलाता है और मूंह से दांतों से बदबू आती है वह बहुत गन्दा दिखता है। मैं उसकी बलगम व गन्दगी साफ नहीं कर पाती मुझे उबकाई और उल्टी आती है। बताओं मां मैं क्या करूं, कहां जाऊं मोलकी एक सांस में सब बोल गई और रोने लगी मुझे अपनी मां के पास जाना है अपने छोटे भाई बहनों के पास जाना है और वह जोर-जोर से रोने लगी। प्रियवंदा उसकी बात सुनकर जड़ सी हो गई। शास्वत सत्य तो यही था कि एक बेटी ही अपनी मां से कह सकती यह सब जो मोलकी ने प्रियवंदा से कहा था। प्रियवंदा के पास कोई जवाब नहीं था। प्रियवंदा ने उसे ढाढस बंधाया चुप करवाया और उसकी मां के घर भेजने का वादा कर उससे उसका विवरण जानने लगी।
तुम्हारा  नाम – मोलकी, यही है ससुराल का नाम। मेरे बाबा ने तो मेरा नाम रिंकी  रखा था।
मां का नाम – असरफी
पिता का नाम – सईद अली
गांव का नाम – पता नहीं
तालुका तहसील कोई – पता नहीं
फिर क्या पता है- बस देस का नाम पता है बांगला। प्रियवंदा ने फिर पूछा क्या हिन्दुस्तान वाला, मोलकी ने कहा नहीं नदी पार वाला। तो चिट्ठी  कैसे पहुंचेगी-पता नहीं मेरे पास तो बस बाबा का टोलीफोन न बर है। मोलकी ने अपनी मुठ्ठियों में मिंचे मुझे-तुड़े कागज को प्रियवंदा की ओर कर दिया। प्रियवंदा ने तुरन्त फोन मिलाया जिसके जवाब में वह न बर उपलब्ध नहीं था और मोलकी ने आप बीती सारी घटनाएं प्रियवंदा को बता दी थी। मोलकी प्रियवंदा के पैरों में गिर कर रो रही थी और उसके मां-बाप को ढूंढने की गुहार लगा रही थी। प्रियवंदा ने मोलकी से एक ह ते की मोल्लत मांगी कि वह कोशिश जरूर करेगी। प्रियवंदा बेशक दिन भर व्यस्त रहती परन्तु रात को उसे नींद न आती। मोलकी का चेहरा दिन-रात उसके आगे रहता। प्रियवंदा को रास्ता नहीं सूझ रहा था। पुलिस की मदद लेने का मतलब मोलकी को नारी निकेतन में भेज देना था क्योंकि वह अभी नाबालिग थी और वह रामेहर को भी छोडऩा नहीं चाहती थी, क्योंकि वह बीमार था और उसकी सेवा कर रही थी कितनी भी गलानि होती फिर भी वह उसे स्वास्थ करना चाहती थी और बच्चा चाहती थी, क्योंकि उसके बाबा की शर्त थी कि वह बिना बच्चा जने कभी वापिस नहीं आएगी। उसका बाबा यह जानता था कि बच्चा होने पर मोलकी को रामेहर के घर और जमीन की हकदारी मिल जी जाएगी और उसकी बेटी का गुजारा हो जाएगा।

चुनाव में विरोधी प्रत्याशियों द्वारा इस्तेमाल घटिया हथकंडों  ने प्रियवंदा को दिन रात काम करते रहने पर मजबूर कर दिया और प्रियवंदा ने मोलकी के फैसले को कुछ दिन के लिए टाल दिया था। कुटिल व आधारहीन अफवाहों ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया था। अश्लील अफसानों की अफवाहों ने कार्यकर्ताओं को उपहास का केन्द्र बना दिया और एक-एक करके सब घर बैठ गए। प्रियवंदा अकेले ही मोर्चे पर डटी रही। अफवाहों का सामना करती व जवाब देती। स्थितियां हाथ में से रेत की तरह फिसलती चली जा रही थी। बस अब गिनती के चार लोग ही रह गए थे प्रियवंदा के साथ। चुनाव हाथ से निकल चुका था प्रियवंदा के लिए कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। प्रियवंदा आशानुरुप बुरी तरह से पराजित हुई थी। जब वह वापिस घर जाने को मुड़ी तो विजयी प्रत्याशी का विजयी जुलूस  उसके आगे से गुजरा अट्टाहस करते हुए। कुछ मनचले बेहुदा ईशारे कर निकल गए।

प्रियवंदा अपने पुतले को जुलुस में देखकर चौक गई। कुछ गैर जि मेदार लोग प्रियवंदा का पुतला बनाकर जलील कर रहे थे। कभी अलिंगन कर रहे थे कभी उस पुतले को किसी की गोद में कभी किसी की गोद में बैठाकर अश्लीलता की हदें पार कर रहे थे। उसी जुलुस में एक महिला सांसद भी जीप पर सवार थी। उसे महिला होने के नाते यह सब नागवार गुजरा तो उसने इस बेहुदगी को बन्द करने का आग्रह किया परन्तु विजयी नेता नहीं माने। उन्होंने उक्त महिला सांसद से कहा कि यदी उसे नागवार है यह सब तो वह घर चली जाए। वह सांसद जीप से उतरकर घर जाने की ओर मुड़ी और उसके नजरें गाड़ी में बैठी प्रियवंदा की नजरों से मिल गई। प्रियवंदा की आंखे शून्य थी तो उस सांसद की करूणा शून्य कुल मिलाकर शून्य जमा शून्य कुल शून्य ही था। बिना बात किए दोनों अपनी राह चल दी थी। उसे हार का कतई दुख नहीं था क्योंकि उसे तो बस एक योद्धा होना था और योद्धा तो वह हो ही चुकी थी। जिसने अन्तिम सांस तक प्रयास किए थे।

घर पहुंची तो पता चला कि रामेहर मोलकी को एक सप्ताह पहले ही यहां से किसी अनजान शहर ले गया था। उसे भनक लग गई थी कि प्रियवंदा उसे वापिस बंगाल भेज देगी। परन्तु प्रियवंदा का मन नहीं माना उसने मोलकी को खोजने की कोशिश की, पर नाकाम रही। अचानक छह महीने बाद प्रियवंदा को खबर मिली कि मोलकी का पति रामेहर दो दिन पहले ही मर गया है और जलबेहड़ा गांव में उसकी अन्त्येष्टी  की गई है। प्रियवंदा फौरन गांव के लिए निकल पड़ी। रामेहर के घर पहुंचते ही फुलमा बुआ मिली उसी ने बताया कि मोलकी तो काली चुड़ैल थी। छोरे नै खा गी यह तो भला हुआ ग्राम आलैया ने गाम मै न बडऩ देई नहीं तो बैरा न कितने छौरे खा जांदी। रामेहर की मां तो पाछले ह ते ही रामेहर नै गाम मै उठा ल्यायी थी मरणासन्न पडय़ा था रान्ड के धौरे।
मोलकी को रामेहर की मां वहीं शहर में बिलखता छोड़ आई थी जहां वह किसी बनिए के गोदाम के पीछे बने झोंपड़े में रहती थी रामेहर के साथ। प्रियवंदा तुरन्त उस पास के शहर की ओर चल दी। पहुंचकर पता चला कि बनिए ने कुछ दिन अपने घर रोटी दी और फिर एक दिन कुरूक्षेत्र के मेले में उसने फाजिल्का शहर के कश्मीरा सिंह नाम के ट्रक ड्राईवर के हाथ मोलकी को ३० हजार रुपए में बेच दिया। रामेहर के इलाज के लिए मोलकी ने बनिए से पैसे ले लिए थे थोड़े-थोड़े करके। दस हजार की रकम अब ब्याज से तीस हजार बन गई थी। प्रियवंदा कश्मीरा सिंह का पता लगाते-लगाते फाजिल्का ट्रक यूनियन पहुंच गई। पन्द्रह दिनों तक कश्मीरा सिंह के ट्रक का इन्तजार करती रही। आखिकर कश्मीरा सिंह से भेंट हुई तो प्रियवंदा ने मोलकी के बारे में पूछताछ की तो कश्मीरा सिंह बोला बीबी जी किन्हू-किन्हू लबोगे जी ऐत्थे ता दर्जनों मोलकीयां ने जिना दी जवानी ट्रकां ते बीत जांदी है जी, ते बुढापा सडक़ किनारे रूल जांदा है। प्रियवंदा ने याद दिलाया कि वह उस लडक़ी को ढूंढ रही है,  जिसे वह कुरूक्षेत्र मेले से खरीद कर लाया था। कश्मीरा सिंह जोर से हंसा और बोला कि बीबी ओह काली कुड़ी ता अपणे अमली यार बिन्दर वास्ते लै के आया सी सौरे नूं जनानी दा बड़ा चाव सी। मेरे मगर पिया रैंहदा सी। ऊंहनूं तां मैं मुकसर कोल पिन्ड बाजीगरां दे डेरे विच छॅड आया सी। प्रियवंदा को आस बन्धी की मोलकी अब मिल जाएगी।

प्रियवंदा को अंजाम से पहले किसी भी काम को छोडऩा नहीं आता था वह मुक्तसर के रास्ते चल दी और उस बिन्दर अमली के गांव में पहुंच गई। बिन्दर के घर पूछ-पूछ कर पहुंची तो बिन्दर की मां ने बताया कि ओह काली कुड़ी तो पिछले हफ्ते ही न_ गई सारे गहणे ते पैसे लै के। असी ता ओहदी रिपोर्ट वी लिखवाई है। बीबी जी तुहानूं किते मिले ता सानू जरूर दस दैयो असीं उस चुडैल दा मूंह भन्न के और नंगा करके पिन्ड विच घुमा दियांगे। इहो जेही चोरी ठगी करण वालीयां जनानियां तों ता रब ब शे जी। उस दिन पहली बार प्रियवंदा जाने क्यों फूट-फूट कर रोई थी और पांच वर्ष बाद भी प्रियवंदा की आंखे उसी को ढूंढ रही होती हैं, क्योंकि उसे मोलकी के सवालों का जवाब देना है और शायद उन सभी मोलकीयों का , जिन्हें कन्या भ्रूण हत्या जैसे जुर्म ने जन्म दिया है।

जी , ये महिला किसान हैं , हल और ट्रैक्टर चलाती हैं .

रूपा झा

तपती धूप, बरसात में घंटों खेत में काम करती औरतें भारत के किसी भी कोने में दिख जाती हैं. भारत में 80 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं खेतीबाड़ी से जुड़ी हैं लेकिन किसान कहते ही जेहन में पुरुष की ही छवि उभरती है.
पर तस्वीर की पहचान अब बदल रही है. वैशाली जयवंत भालेराव, रिंपी कुमारी और करमजीत अपने गांव में अनोखी हैं,  क्योंकि ये अपने गांव की इकलौती महिला किसान हैं.

[बी बी  सी  हिन्दी  की  पत्रकार रूपा झा मिलीं कुछ उन महिलाओं से जिन्होंने अब खेती किसानी का काम अपनाया है. उनके लिए आसान नहीं रही ये राह. मिलिए तीन महिलाओं से जिनकी परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं, वे ख़ुद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में रहती हैं मगर उन्होंने अब खेती-किसानी को अपना लिया है.रूपा झा की रिपोर्ट का विडियो लिंक  और पूरी रिपोर्ट 
कैमरा और एडिटिंग- नेहा शर्मा ]

वैशाली 40 साल की विधवा हैं- दो नौजवान बच्चे हैं. वर्धा के पेठ गांव में पांच एकड़ खेत हैं,  जिसमें वे कपास दलहन और सोयाबीन उगाती हैं.दोपहर की धूप में- खेतों की मेड़ पर खामोशी से चलते हुए वे पत्तों को प्यार से सहलाती हैं, मिट्टी का मुआयना करती हैं.मैं हैरान हूं उनके आत्मविश्वास और खेती के बारे में उनकी समझ देखकर. खेती की बारीकियां वे ऐसे समझाती हैं जैसे शुरू से बस यही किया हो.पर ये सब कुछ नया है- 20 साल की उम्र में जब ब्याह कर वैशाली आई थीं तो ऐसी भूमिका की कल्पना भी नहीं की थी.लेकिन छह साल पहले उनके पति ने फसल बर्बादी और बढ़ते क़र्ज़ के कारण आत्महत्या कर ली.

वैशाली भालेराव अपने बच्चों के साथ

भारत में 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवार की मुखिया अब औरतें हैं- वैशाली का परिवार भी उनमें से एक है.
ये ज़्यादातर समय तब होता है जब या तो पुरुष पलायन कर जाते हैं या फिर क़र्ज़ के बोझ से अपनी जान दे देते हैं.अपने बच्चों के साथ वैशालीवैशाली ने तय किया पति की आत्महत्या उनके बच्चों के भविष्य की हत्या नहीं कर सकती- वे जिएंगे, लड़ेंगे और जीतेंगे.वैशाली कहती हैं, “मैं 33-34 साल की थी जब ये दुर्घटना हुई. कोई नहीं चाहता- ज़िंदगी की सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना- खेती का ख्याल करो- घर देखो- लेकिन मुश्किल समय था. मुझे करना ही पड़ा. मैंने खुद से कहा- जो मुझे करना चाहिए वह मुझे करना ही होगा.”

जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो दशकों में क़र्ज़ के बोझ और बर्बाद फसल की मार के कारण कम से कम तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है.कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संख्या कम करके आंकी गई है क्योंकि हर मामला पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता है.वैशाली के पति के गुज़रने के बाद उसे ज़मीन का मालिकाना हक़ मिला.क़ानून की नज़र में ज़मीन पर औरतों का बराबर का हक़ है, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है.

वैशाली भालेराव

वैशाली ने उस एक मौक़े को हाथ से नहीं गंवाया. उसके पास मातम मनाने का भी वक़्त नहीं था.कैसा लगता है इकलौती महिला किसान होना – मेरे इस सवाल पर चेहरा दमक उठता है वैशाली का. वह कहती हैं, “बहुत अच्छा. वीरांगना की तरह ..पहले तो मेरे खेत के मज़दूर ही मुझे किसी क़ाबिल नहीं समझते थे कि ये औरत है क्या खेती करेगी- कैसे बीज का चुनाव करेगी लेकिन फिर धीरे-धीरे मुझे काम आ गया और उनको मुझ पर भरोसा.”गांव में वैशाली की हिम्मत और सूझबूझ की तारीफ़ करते कई मिल जाते हैं. और ये कहते भी कि भई औरतों को खेत का हक़ मिलना चाहिए- वैशाली ने तो अपने पति से बेहतर किसानी की है!वैशाली के पास खेती के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सैंकड़ों मील दूर राजस्थान के कोटा ज़िले के एक गांव में दो ग़ैर शादीशुदा बहनों ने अपनी इच्छा से खेती शुरू की है.

32 साल की रिंपी और 26 साल की करमजीत जब मोटरसाइकिल पर सवार मेन रोड पर मुझे लेने आईं तो मैं थोड़ा हैरान हुई. छोटी बहन करमजीत चुहल कर कहती हैं, “आप अकेले हमारे घर तो पहुँच नहीं पातीं तो हम आ गए आपको लेने.” ड्राइवर की सीट पर वही बैठी हैं. रिंपी बड़ी हैं, पूरे घर की ज़िम्मेदारी उनके ही कंधों पर है. वे आईटी सेक्टर में काम करती थीं, जिसे छोड़ खेती करना उन्होंने तय किया. छोटी बहन करमजीत उनके साथ लगी रहती हैं.रिंपी कहती हैं, “सात साल पहले जब मेरे पिताजी गुज़र गए तो मैंने तय किया मैं खेती करूंगी. वैसे तो मेरे पास अच्छी नौकरी थी, लेकिन हमारे पास काफ़ी ज़मीन है. मेरे बड़े भाई हैं, लेकिन उन्हें इस काम में उतनी रुचि नहीं है. मेरे फ़ैसले में मेरे भाई औरे मेरी मां ने साथ दिया. बाकियों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा पर मुझे उसकी परवाह नहीं है.”

ट्रैक्टर चलातीं दो किसान बहनें : रिम्पी और करमजीत

32 एकड़ खेत में खुद ट्रैक्टर चलाती, मज़दूरों को काम बताती, हिसाब-किताब करती, एक-एक फ़ैसले को सूझबूझ से लेती रिंपी को देखकर अच्छा लगा.उनकी उम्र की गांव की बाकी लड़कियां कब का घर बसा चुकी हैं. अपने आंवले, गेहूं और सोयाबीन के खेतों में टलहते हुए रिंपी ने मुझसे कहा, “लड़कियों से और क्या उम्मीद करते हैं लोग- शादी करो, बच्चे करो, घर में रहो. मैं कुछ अलग करना चाहती हूं. शादी मेरे लिए बंधन है. मैं सचमुच अपनी खेती को आगे बढ़ाना चाहती हूं- बहुत आज़ादी से उड़ना चाहती हूं.”

रिंपी की आज़ादी की ख़्वाहिश उस गांव में बहुत पसंद नहीं की जाती.80 साल के सरदार सिंह कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि ये दो बहनें जो कर रही हैं वह ठीक है. उन्हें सही समय में शादी कर अपना घर बसाना चाहिए. खेती भाई करें और बाकी ज़मीन बयाने पर लगा दें. हम अपनी औरतों को बाहर नहीं जाने देते- खेती तो दूर की बात है.”रिंपी को ऐसी नाराज़गी की आदत हो गई है. उन्हें इससे लड़ने की ताक़त अपनी मां सुखदेव कौर से मिलती है.सुखदेव कौरगुलाबी सलवार कमीज और दुपट्टे से सर को ढके सुखदेव कौर बेटियों के नाम पर हुमस कर कहती हैं, “लड़कियों को आज़ादी चाहिए- उड़ना तो वो सीख ही लेती हैं. बस हम उनके पंख न कुतरें. मेरी बेटियों ने दिखा दिया वे बेटों से बढ़कर हैं. मुझे समाज की परवाह नहीं है.”रिंपी अपने पिता से बेहतर कमाई कर रही है- नए खेत खरीद रही हैं और आधुनिक तरीक़े से खेती करने में विश्वास रखती हैं.खेती के तौर-तरीक़े की अब उनको आदत हो गई है पर एक जगह जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता- शहर की मंडी जहां वे अपना अनाज बेचती हैं.हज़ारों टन बोरियों के बीच रिंपी के साथ खड़े होने पर मुझे इसकी वजह का अंदाज़ा हो गया.

रिंपी कहती हैं, ”अब देखिए यहां मेरे अलावा कोई औरत नहीं है. इसीलिए शायद वे इतना घूरते हैं कि मैं यहां क्या कर रही हूं. मैं इसीलिए लड़कियों के कपड़े पहनकर नहीं आती हूं- पैंट कमीज़ में आती हूं ताकि लोग मुझे ज़्यादा न घूरें. लड़कों के कपड़े में लोग मुझे गंभीरता से लेते हैं.”मुझे पता है रिंपी, वैशाली, करमजीत और इनकी तरह की दूसरी औरतों का सफ़र आसान नहीं है, लेकिन इन्होंने तय किया है कि अपने रास्ते तो ये खुद तय करेंगी और हारेंगी नहीं.आज़ाद सशक्त और फ़ैसले लेने का हौसला रखने वाली ये हैं ज़मीन की औरतें- रिंपी और करमजीत ने खेती करने का फैसला लिया – वे धनी परिवार से हैं – पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन वैशाली के पास ऐसे अवसर नहीं थे. पर वो चाहती हैं अपनी बेटी को ये सब कुछ मुहैया कराना ताकि वे अपने फ़ैसले खुद ले. अधिकार के साथ जिए.ये सभी औरतें अपने अंदाज़ में उस परिभाषा का विस्तार कर रही हैं जो गढ़ रही है आधुनिक भारत में ज़मीन से जुड़ी औरतों के नए मायने.

बी बी सी हिन्दी से साभार

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश


( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी आहट  बहुत कम समय में देश की वर्चस्वशाली सांस्कृतिक जमात को सुनाई पड़ रही है और वे बेचैन हैं -अपनी पांचजन्य जैसी पत्रिकाओं में इस घटित हो रही इस सांस्कृतिक क्रान्ति के खिलाफ मुनादी कर रहे हैं. यह सांस्कृतिक आन्दोलन कभी घटित दो सभ्यताओं के टकराव की नीव पर पनप रहा है . इस देश में बड़े पैमाने पर  दुर्गा पूजा का आयोजन होता है  -दुर्गा के लगभग सारे नैरेटिव विजेताओं के द्वारा पराजितों के खिलाफ नैरेटिव है . इस मिथक का काउंटर नैरेटिव एक बड़ा समूह लेकर सामने आया है .  प्रमोद रंजन और रवि प्रकाश महिषासुर शहादत दिवस के रूप में हो रहे देशव्यापी आयोजनों की पड़ताल कर रहे हैं. )


दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने जब 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह दावनल की आग सिद्ध होगा। महज चार सालों में ही  इन आयोजनों ने न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोडऩ पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं। इस साल (2015) देश भर में 300 से ज्यादा स्थानों पर महिषासुर शहादत अथवा महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। यह आयोजन देश की सीमा पार कर नेपाल भी पहुंच गया।  मुख्ययधारा के मी‍डिया की नजरों से दूर, कहीं इसे10-15 उत्साही युवक सांकेतिक रूप से हाथ में तख्तियां लेकर कर रहे हैं, तो कहीं एक से 20 हजार लोगों की भीड़ वाली सभाएं हो रही हैं। इन आयोजनों को देखते हुए यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि भारत की दमित अस्मिताएं इस बहाने अपना अभिनव सांस्कृतिक इतिहास लिख रही हैं।

भारत में जिस दुर्गा पूजा को देवताओं और राक्षसों की लड़ाई बताकर उसे निर्विवाद माना जाता था, वह आज इन आयोजनों के कारण संकट में है। महिषासुर दिवस मनाने वालों का कहना कि वह तो आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी और महिषासुर हम अनार्यों के पुरखा और नायक हैं। आदिवासियों के मिथकीय नायक और देवता रहे महिषासुर को शहीद बताने वाले लोगों में आज ज्यादा संख्या यादव, कुशवाहा, कुम्हार, कुर्मी, निषाद, मांझी, रजक, रविदास आदि वंचित बहुजनों की है।

इन आयोजनों के एक अध्येता के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर दिवस के आयोजकों से बात करना हमारे लिए एक अनूठा अनुभव रहा। इनके पास कहने के लिए ढेर सारी बातें हैं। लेकिन कुछ साझा बातें अनायास ध्यान खींचती हैं। ये सभी आयोजक बताते हैं कि हम ”बचपन से इस विषय में सोचते थे कि दुर्गा की मूर्तियों में जो असुर है, उसका रंग-रूप क्यों हम लोगों जैसा है और क्यों उसे मारने वालों की कद-काठी पहनावा आदि सब उनके जैसा है, जो आज के द्विज हैं’’! बाद में जब उन्होंने अपने स्तर पर विचार किया और खोजबीन की तो आश्चर्यचकित रह गये। उनके आसपास, यहां तक कि कई मामलों में तो अपने घरों में ही मनुज देवा, दैत्येरा, मैकासुर, कारसदेव आदि से संबंधित असुर परंपराएं पहले से ही मौजूद थीं। कुछ आयोजक मानते हैं कि महिषासुर व उनकेगण कोई मिथकीय पात्र नहीं, बल्कि एतिहासिक पात्र हैं, जो उनके कुनबे के रक्षक, प्रतापी राजा अथवा जननायक थे।

सभी आयोजक महिषासुर की ‘पूजा’ का विरोध करते हैं तथा ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का निषेध करते हैं। शायद यही इन आयोजनों की असली ताकत भी है।इन चार सालों में यह एक प्रकार की सांस्कृतिक राजनीति का आयोजन भी बन चुका है। यह न सिर्फ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में हो रहा है बल्कि दूर-दराज के गांव-कस्बों में भी इसकी जबरदस्त चर्चा है। बात सरकारी अमले तक पहुंची है और कई जगहों पर इस उत्सव के दिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाने लगी है।

महिषासुर का एक संबंध भारत की आदिम जनजाति ‘असुर’ की प्राचीन संस्कृति से जुड़ता है, जिनकी कुल संख्या अब देश भर में बमुश्किल 9 हजार बची है। असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं। गुमला के विशुनपुर प्रखंड के सामाजिक कार्यकर्ता अनिल असुर कहते हैं कि ”मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया था। वह हमारे प्रतापी पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं थीं।’’रांची से प्रकाशित ‘जोहार दिशुम खबर’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि, ”महिषासुर को खलनायक बताने वाले लोगों को आदिवासी, पिछडा वर्ग व अन्य वंचित तबकों के बीच उनके नायकत्व को समझना चाहिए।’’पंकज बताते हैं कि ”इस साल (वर्ष 2015 में) देश भर में लगभग 350 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया।’’

महिषासुर दिवस मनाने वाले लोग बताते हैं कि दुर्गा व उनके सहयोगी देवताओं द्वारा महिषासुर की हत्या कर दिये जाने के बाद आश्विन पूर्णिमा को उनके अनुयायियों ने विशाल जनसभा का आयेाजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी समतामूलक संस्कृति को जीवित रखने तथा अपनी खोई संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि विभिन्न स्थानों पर जो आयोजन हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश आश्विन पूर्णिमा वाले दिन ही होते हैं। यह पूर्णिमा दशहरा की दसवीं के ठीक पांच दिन बाद आती है। हालांकि कई जगहों पर यह आयोजन ठीक दुर्गा पूजा के दिन भी होता है तथा कहीं-कहीं आयोजक अपनी सुविधानुसार अन्य तारीखें भी तय कर लेते हैं। कहीं इसे ‘महिषासुर शहादत दिवस’ कहा जाता है तो कहीं ‘महिषासुर स्मरण दिवस’।
आइए, बानगी के तौर पर कुछ चुनिंदा जगहों पर नजर डालते हुए हम इन आयोजनों की तासीर समझने की कोशिश करें। हलांकि रिपोर्ट पूरी करने की समय सीमा के कारण हम इस सूची में क्षेत्रीय विविधता की जरूरत को पूरा नहीं कर पाए हैं। लेकिन यह एक बानगी तो है ही।

1. पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला केकाशीपुर प्रखंड के झालागौडा में महिषासुर शहादत दिवस पर विशाल आयोजन होता है। इस वर्ष यहां इस आयोजन के लिए लगभग 20 हजार लोग जुटे, जिनमें मुख्य रूप से संताल, बावरी, राजहड, महाली आदि आदिवासी जातियों व पिछड़े-दलित तबकों के लोग थे। यहां यह आयोजन चरियन महतो के नेतृत्व में होता है। कुर्मी जाति से आने वाले महतो यह आयोजन न सिर्फ यहां करते हैं, बल्कि उन्होंने कई अन्य स्थानों पर भी इस आयोजन के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया है। वे कहते हैं कि कुर्मी व इस तरह की अन्य अन्न व पशुपालक जातियों की जडें आदिवासी समाज में ही रही हैं, यह कारण है कि हम महिषासुर से गहरा अपनापा महसूस करते हैं। चरियन बताते हैं कि ”हम लोगों ने पहली बार यह आयोजन वर्ष 2011 में दिल्ली के जेएनयू में महिषासुर दिवस मानये जाने की खबर सुनने के बाद किया, लेकिन मेरे मन में यह बात बहुत पहले से थी। वर्ष 1997 में ही मैंने अपने बांग्ला साप्ताहिक नया सूरज में इस संबंध में एक संपादकीय लेख लिखा था।’’वे बताते हैं कि उसका शीर्षक था, ‘मानवता और राष्ट्रीयता विरोधी है दुर्गोत्सव।’इसमें उन्होंने लिखा था कि महिषासुर इस देश के मूल निवासी थे। दुर्गापूजा विदेशी आर्योंद्वारा उनकी हत्या के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। इस प्रकार यह विदेशी आक्रांताओं का गुणगाणन करने का उत्सव है, जो अपने मूल रूप में हमारी राष्ट्रीयता के विरूद्ध है। वर्ष 2010 में उन्होंने अपने इसी विचार को और विस्तार से लिखा, जो पुरूलिया से प्रकाशित जाति संगठन ‘कुर्मी मिलन संगम’के बांग्ला  मुखपत्र ‘अखड़ा’में प्रकाशित हुआ, जिसकी काफी चर्चा हुई। इसे पढ़कर उनके पास स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अजित प्रसाद हेम्ब्रम और शत्रुध्न मुर्मू आए। उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि दुर्गापूजा का विरोध किया जाए। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था। इन लोगों ने तय किया कि वे अपने पूर्वज महिषासुर की याद में कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए दुर्गापूजा के दिन ही महिषासुर शहादत दिवस मनाना शुरू कर दिया। आयोजन के पहले साल भारत सरकार के ज्वाईंट रजिस्ट्रार जनरल स्वप्न विश्वास कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने थे, उसके बाद से बहुजन समाज से आने वाले अनेक बड़े अधिकारी, टेक्नोक्रेट व अन्य प्रभावशाली लोग इस आयोजन में मौजूद रहते हैं।

2. राज्य में विभिन्न जगहों पर हो रहे इन आयोजनों की सारी जानकारियां चरियन की जुबान पर रहती हैं। वे बताते हैं ”वर्ष 2011 में हमारे आयोजन के बाद 2012 में मालदह में भी यह आयोजन शुरू हुआ। 2013 में पश्चिम बंगाल के 24 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया। 2014 में इन आयोजनों की संख्या 74 हो गयी। यह बहुत तेजी से फैल रहा है। इस साल राज्य के 182 स्थानों पर महिषासुर दिवस मनाया गया है।’’

3. पश्चिम बंगाल के 24 परगना (नार्थ) जिला के अशोक नगर थाना क्षेत्र के बीराबांदोपल्ली में इस साल पहली बार महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। यहां आयोजन 20 अक्टूबर को हुआ। आयोजन में लगभग 400 लोग शामिल हुए। इसके आयोजकों में से एक सुरसेनजीत वैरागी बताते हैं कि इस क्षेत्र में दलित अबादी बहुसंख्यक है, जिन्होंने इस आयोजन से काफी उत्साह दिखाया। आयोजन में क्षेत्र के अन्य पिछड़ा वर्ग लोग और मुसलमान भी शामिल हुए। उन्होंने बताया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें आयोजन नहीं करने के लिए एक नोटिस थमा दिया था, लेकिन वे झुके नहीं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के समक्ष सवाल उठाया कि ”किसी को जन्मदिन की पार्टी करने या प्रियजन की मृत्यु पर शोक सभा आयोजित करने के लिए आपसे अनुमति लेने पड़ती है क्या?’’ हार कर पुलिस ने कार्यक्रम में विध्न उत्पन्न नहीं किया। वैरागी कहते हैं कि यह न सिर्फ  हमारे पूर्वजों की हत्या का उत्सव है बल्कि दुर्गापूजा के दौरान जो मूर्तियां बनायी जाती हैं, उनमें मनुष्य की हत्या को दर्शाया जाता है, जिसका बहुत बुरा प्रभाव समाज पर पड़ता है। कोलकाता के सरदिंद बिस्वास के नेतृत्व में भी इस साल महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि इस साल चैबीस परगना नार्थ तथा साउथ, मिदनापुर ईस्ट तथा वेस्ट, बर्धमान, बाकुरा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुडी, कोच्छ विहार, मालदह समेत राज्य के 15 जिलों में दर्जनों जगहों पर शहदत दिवस का आयोजन किया गया है।

4. कोलकाता के शहरी क्षेत्र व कई उपनगरों में भी कई जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन पिछले दो सालों से हो रहा है। इन क्षेत्रों में इसका वाहक बना है समुद्र बिस्वास के संपादन में निकलने वाला बांग्ला पाक्षिक ‘निर्भीक संवाद’। समुद्र बताते हैं कि वे अपने अखबार में इन आयोजनों की तैयारी, इस दौरान होने वाले संभाषण आदि की रिपोर्ट को निरंतर प्रकाशित करते हैं। आयोजन की अवधारणा के पक्ष में कई लेख भी इसमें छपे हैं, जिससे वंचित तबकों में इसके प्रति तेजी से जागरूकता आयी है। समुद्र बिस्वास एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘जनमन’ भी निकालते हैं तथा उन्होंने ‘दुर्गा पूजा आंतरू’ (दुर्गा पूजा की अंदरूनी कथा) शीर्षक से बांग्ला में एक किताब भी लिखी है, जिसमें दुर्गा और महिषासुर की कथा की बहुजन व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस किताब का विमोचन वर्ष 2014 में कोलकता पुस्तक मेला में किया गया था। बिस्वास बताते हैं कि बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला के कालचीनी में 1985 से ही असुर दिवस मनाया जाता रहा है। वर्ष 2011 में दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद से इसने ऐसा बंगालव्यापी स्वरूप ग्रहण कर लिया है कि इस बार आनंद बाजार जैसे दुर्गा पूजा के घनघोर समर्थक अखबार को भी इसके सामने झुकना पड़ा। उसने इस साल इस आयोजन के संबंध में सकरात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।

5.उत्तर प्रदेश के देवरिया के निकट डुमरी में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका के प्रधान संपादक चंद्रभूषण सिंह यादव व लखनऊ में इसी पत्रिका के संपादक राजवीर सिंह के निर्देशन में महिषासुर शहादत दिवस का अयोजन किया जाता है। ‘यादव शक्ति’ ने इस साल 26 अक्टूबर को यह दिवस मनाया, जिसमें वंचित समुदायों के बुद्धिजीवियों ने सांस्कृतिक आजादी की जरूरत पर बल देते हुए अपनी बातें रखीं। इन आयोजनों में शामिल होने वाले लोग बताते हैं कि प्रदेश में कई अन्य जगहों पर भी पिछले दो सालों से यह आयोजन निरंतर हो रहा है।
6. झारखंड के धनबाद जिले के निरसा प्रखंड के मुगमा में भी 2012 के बाद से हर साल महिषासुर को स्मरण किया जा रहा है। इस साल यहां एक नवंबर को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए बहुजन समाज पार्टी के नेता डा रामाशीष राम ने कहा कि ”महिषासुर बहुजनों के महानायक थे। बहुजनों की एकजुटता जरूरी है ताकि हम अपने इतिहास का पुनर्पाठ कर सकें । मनुवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास पर हमारा भरोसा नहीं है।’’संगोष्ठी में करीब 100 लोग शामिल हुए। इनमें ज्यादातर संख्या अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों की थी।

7. झारखंड के गिरिडीह जिला में भी अनेक जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। जिला में इन आयोजनों को वरिष्ठ अधिवक्ता दामोदर गोप का नेतृत्व प्राप्त है। गोप बताते हैं कि वे वर्षों तक सीपीआई (एमएल) के सदस्य रहे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि ”उच्च जातियों के दवाब में कम्युनिस्ट पार्टियां बहुजनों को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाए रखना चाहती हैं।’’वे सवाल उठाते हैं कि ”क्या एक मनुष्य के रूप में सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान हमारे लिए काफी है? सांस्कृतिक गौरव के सारे सुख क्यों सिर्फ उच्च जातियों के लिए हैं?’’गोप का मानना है कि ”सांस्कृतिक और सामाजिक आजादी के बिना सिर्फ आर्थिक लड़ाईयों की बात करना एक छलावा मात्र है। आर्थिक रूप से भी वही समाज समृद्ध हो पाता है, तथा अपनी समृद्धि को लंबे समय तक बरकार रख सकता है, जिसकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक जडें हों।’’इसी जिला के धनवार प्रखंडमें महिषासुर दिवस का आयोजन अरविंद पासवान करते हैं। धनवार में इस साल 24 अक्टूबर को इसका आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि अगले साल से आश्विन पूर्णिमा को गिरीडीह और आसपास के जिलों में और बडे पैमाने पर महिषासुर स्मरण दिवस मनाया जाएगा। झारखंड प्रदेश असुर संघ बनाकर राज्य स्तरीय असुर सम्मेलन करने की भी तैयारी चल रही है।

8. बिहार के मुजफ्फरपुर के सिंकंदरपुर कुंडल में इस साल 26 अक्टूबर (आश्विन पूर्णिमा) को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न कॉलेजों के लगभग 100 छात्र मौजूद थे। यहां एकलव्य सेना के कार्यकर्ताओं ने इस आयोजन का संचालन किया, जिसके कर्ताधर्ता नरेश कुमार सहनी हैं। इस आयोजन से पहले एकलव्य सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने दशहरा के दिन जिलाधिकारी के आवास के सामने खुदीराम स्मारक पर ‘काला दिवस’ मनाकर दलित-पिछड़े लोगों से अपील की कि वे अपने पूर्वज की हत्या के जश्न में शामिल न हों। नरेश कुमार सहनी बताते हैं कि ”मैं बचपन से ही सोचता था कि अगर कथित देवताओं की वंशावलियां हैं तो जरूर असुरों की भी तो वंशावली होगी। आखिर उनके वंशज आज कौन हैं? बाद में दिल्ली  से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस में छपे लेख की जानकारी मुझे हुई तो लगा कि और भी लोग मेरी तरह ही सोच रहे हैं। उस लेख ने मुझे अपनी बात कहने की ताकत दी।’’वे  बताते हैं कि ”हम निषादों (मल्लाहों) की एक उपजाति है – महिषी। यह निषादों की वह उपजाति है जो पशुपालन करती है। महिषासुर हम मल्लाहों के पूर्वज थे।”साथ ही, वे स्वयं ही जोड़ते हैं कि ”महिषासुर जिस काल में रहे होंगे, उस समय जाति व्यवस्था इस रूप में नहीं रही होगी, इसलिए उनकी जाति नहीं निर्धारित की जा सकती। यादव व अन्य जातियां भी उन्हें अपना पूर्वज मानती हैं। सभी अपने जगह सही हैं।’’

9. मुजफ्फपुर के भगवानपुर में भी महिषासुर महोत्सव मनाया। इसके संचालन का जिम्मा उठाया हीरा यादव ने। यह पूछने पर कि क्या विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, वे बताते हैं कि ”पहले विरोध होता था। 2011 में जब यह आयोजन शुरू हुआ तो घर के लोगों ने ही विरोध किया। उनका मानना था कि दुर्गा हिंदुओं की देवी हैं। उनके खिलाफ  आयोजन क्यों? लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि वह कोई धर्मयुद्ध नहीं था। वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी। इसलिए, यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसका हिन्दू धर्म से कोई वास्ता या सरोकार नहीं। ब्राह्मण जाति सभी हिंदुओं का पर्याय नहीं है।’’

10. मुजफ्फपुर जिला के ही मीनापुर प्रखंड के छितरा गांव में वर्ष 2014 में महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी। लेकिन इस वर्ष बिना मूर्ति के ही महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। दरअसल, जैसे-जैसे इस संबंध में मूर्ति पूजा की विरोधी रही आदिवासी मूल की परंपराओं की जानकारी सामने आ रही है, लोग महिषासुर की मूर्ति बनाने को गलत मानने लगे हैं। इसकी जगह इन कार्यक्रमों में प्राय: अपने पूर्वज के रूप में महिषासुर का सिर्फ चित्र लगाया जाता है तथा संभाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। छितरा गांव में हुए आयोजन में आसपास के गांवों के लगभग 1500 लोगों ने भाग लिया। आयोजन में बहुजन जातियों द्वारा पारंपरिक तौर पर गाये जाने वाले गीतों का गायन किया गया तथा जनपक्षधर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये।

11. बिहार के मधेपुरा निवासी, पेशे से शिक्षक हरेराम मूलत: एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी टीम के निर्देशन में एक स्कूल के मैदान में 26 अक्टूबर, 2015को महिषासुर महोत्सव मनाया। इस आयोजन में करीब 150 लोग शामिल हुए। विचार गोष्ठी हुई लेकिन किसी अखबार ने इस खबर को छापना मुनासिब नहीं समझा। हरेराम बताते हैं कि उन्होंने आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति और तस्वीरें सभी अखबारों को दी थीं। लेकिन, न तो कोइ पत्रकार इसे कवर करने आया और न कहीं यह खबर छप सकी। बकौल हरेराम भगत, बिहार विधानसभा के चुनाव की गहमागहमी कारण उनके यहां ज्यादा भीड़ नहीं हो सकी। उन्हें करीब 1000 लोगों के आने की उम्मीद थी। वे कहते हैं कि ”इस क्षेत्र में पहले बामसेफ  के संस्थापक कांशीराम जी का आंदोलन चलता था। इस कारण महिषासुर महोत्सव के लिए लोगों को कनविंश करने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।’’

12. बिहार के नवादा में भी 2012 से महिषासुर शहादत दिवस मनाया जा रहा है। वर्ष 2014 यहां भी महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी, तथा भारी जन जुटान हुआ था। कार्यक्रम के आयोजक रामफल पंडित, एडवोकेट जयराम प्रसाद, उमेश सिंह, सुमन सौरभ और रामस्वरूप मांझी बताते हैं कि इस क्षेत्र में इस आयोजन ने व्यापक समाजिक आलोडऩ पैदा किया है। लोग महसूस करने लगे हैं कि हमें आर्थिक और सामाजिक आजादी तभी मिल सकती है, जब हम अपने ऊपर लादी गयी ब्राह्मणवादी संस्कृति के जुए को उतार फेंके। उनका मानना है कि ”इन आयोजनों के कारण राजनीतिक जागृति भी आयी है।’’

13. बिहार के गंगा पार शहर हाजीपुर से लगभग 16 किलोमीटर दूर भगवानपुर अट्टा में एक नवंबर को महिषासुर के स्मरण के लिए एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1000 लोगों ने शिरकत की, जिसमें बडी संख्या महिलाओं की थी। आयोजक थे – राष्ट्रीय मूल निवासी संघ तथा सत्यशोधक विचार मंच। दो सत्रों में विभाजित यह आयोजन दिन के 12 बजे से रात के 2 बजे तक चला। पहले सत्र का विषय था, ‘महिषासुर कौन, हत्या क्यों, हत्या की जानकारी वंशजों को है या नहीं, और हत्या की जानकारी नहीं होने का परिणाम’, दूसरे सत्र का विषय था, ‘हमारे देश के शास्त्ऱों में में आर्य-अनार्य, देव-दानव, सुर-असुर, सवर्ण-अवर्ण, आदि संघर्षों का विवरण है, तत्कालीन अनार्य, दानव, असुर, अवर्ण कौन थे, तथा उनका संघर्ष तथा छल-कपट से उनकी पराजय के बाद उनके वंशजों की किस रूप में पहचान।’ इन लंबे-चौड़े विषयों पर देश भर से आये सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी राय खूब विस्तार से रखी, जिसका स्वागत वहां मौजूद लोग तालियों की गडग़ड़ाहट से करते रहे। इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में, यादव जाति से आने वाले राष्ट्रीय सत्यशोधक मंच के संयोजक शिवाजी राय, भील आदिवासी समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय मूल निवासी संघ के अध्यक्ष ताराराम मेहना तथा दलित समुदाय से आने वाले बामसेफ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. देशराज ने विस्तार से अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुशवाहा जाति से आने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कुशवाहा ने कहा कि ”मनुवादी व्यवस्था ने देवियों के रूप महिलाओं का दुरूपयोग किया है, इसलिए इन देवियों को अपना आदर्श बनाया जाना गलत है। महिलाओं के सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि उसे पुरूषों के तेज से उत्पन्न बताया जाए। उन्होंने कहा कि आज की महिलाओं को सच्चे सशक्तिकरण और अपमानजनक प्रलोभनों के बीच फर्क करना चाहिए तथा उन सामाजिक शक्तियों के साथ खड़ा होना चाहिए, जो न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।” उदयन राय ने इस अवसर पर कहा कि ”संसद और अदालत के माध्यम से हमें अपने पूर्वजों हत्याओं के विभिन्न जश्नों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए।” आयोजन को दिलीप पाल, महावीर दास सिसोदिया, राजनारायण गुप्ता, विनोद कुमार, कुमारी बेबी, कुमारी प्रार्थना, तनीषा, महेंद्र राय, हास्य कवि गया प्रसाद, सत्येंद्र पासवान, पारसनाथ रजक आदि ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय नेता सुबोध राय ने की तथा संचालन जिवलेश्वर प्रसाद ने किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार के पटना में अधिवक्ता मनीष रंजन, पत्रकार नवल किशोर कुमार, राकेश यादव, सुपौल में अभिनंदन कुमार, सीवान में रामनरेश राम, प्रदीप यादव, पूर्वी चंपारण में बिरेंद्र गुप्ता, पश्चिमी चंपारण में रघुनाथ महतो, शिवहर में चंद्रिका साहू, सीतमाढ़ी में रामश्रेष्ठ राय और गोपाल गंज के थावे मंदिर के महंथ राधाकृष्ण दास महिषासुर की गाथा को शहादत/स्मरण दिवस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कोशांबी के जुगवा में एनबी सिंह पटेल और अशोक वर्धन हर साल एक बडा आयोजन करते हैं। पिछले वर्ष इन लोगों ने अपने गांव का नाम बदलकर ‘जुगवा महिषासुर’ करने व वहां इस आशय का बोर्ड लगाने की घोषणा की थी। मिर्जापुर में कमल पटेल और सुरेंद्र यादव, इलाहाबाद में लड्डू सिंह व राममनोहर प्रजापति, बांदा में मोहित वर्मा, बनारस में कृष्ण पाल, अरविंद गौड और रिपुसूदन साहू इस आयोजन के कर्ताधर्ता हैं। कर्नाटक के मैसूर, तेलांगना के हैदराबाद, मध्यप्रदेश के बालाघाट के मोरारी मोहल्ला और उड़ीसा के कई शहरों में भी महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। बंगाल के पुरूलिया में स्वप्न कुमार घोष तथा उड़ीसा के कालाहांडी में नारायण बागार्थी के नेतृत्व में इस आयोजन पिछले साल मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं थीं। भारत के अतिरिक्त नेपाल में भी कुछ जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने की सूचनाएं हैं, लेकिन वहां के आयोजकों से हम समयाभाव के कारण संपर्क नहीं कर सके।

प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। रविप्रकाशमल्टीमीडिया पत्रकार हैं। फिलहाल बीबीसी हिंदी और दूरदर्शन के लिए नियमित असाइनमेंट । वे प्रभात खबर, देवघर के स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, कोलकाता के संपादकीय प्रभारी, दैनिक भास्कर, रांची के डिप्टी एडिटर और आई नेक्सट के रांची, पटना, आगरा और जमशेदपुर संस्करणों के संपादक रह चुके हैं . संपर्क : janvikalp@gmail.com 


फारवर्ड प्रेस के दिसंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

संजय कुमार शांडिल्य की कविताएं

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पेशे से अध्यापक. मंतव्य, हंस सहित अनेक पत्र -पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क : 9431453709

एक नये कवि से परिचय करा रहे  हैं  हम, विश्वास है आप इन्हें लम्बी दूरी तय करते देखेंगे . इनकी कविताएं इस दावे की गवाह हैं . फुर्सत से पढ़ें : 


1. मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो
हत्यायों और हादसों के अभ्यस्त कस्बे के बीच
पुरातात्विक खुदाई में
टेराकोटा ईंटों से बना
एक पुराना विहार झाँकने लगता है
कुछ दिन की जगमग उत्साहों के बाद कस्बे में
उदासीन लोग हलवाई की दुकानों पर
जलेबियाँ खाने के लिए इकट्ठा होते हैं
तृष्णा ,माया ,बंधन ,मुक्ति के प्रश्न और उनके
उत्तर
हर बरसात में थोड़ा-थोड़ा बिलाते हुए
किसी खपड़े में ,किसी झिकटी में
फावड़े के साथ बाहर निकलते हैं
आपने इन चीजों को जहाँ रख दिया है
वह भी एक पृथ्वी-गर्भ है
नीली स्याही लगी हुई वह तीन हज़ार साल पुरानी दवात
अपनी इबारतों को नहीं पुकार सकती है
किन बेचैनियों में एक नफीस छिला हुआ सिरकंडा उसमें डूबा है
आज इसे कोई नहीं जानता
लोग रामायण और महाभारत याद-रखते बाँचते
समय का कितना यथार्थ बचा पाते हैं?
कोई लड़कर अपने समय की हिंसा से,
प्यार करता है
अपनी प्रेयसी को अस्थियों से बनी चूड़ियाँ भेंट देता है
नंग -धड़ंग त्रिशूल -धारी अनागरिक के हाथों अपने मृत होने से पूर्व
होए, होए पुकारता हुआ
अपनी प्रियतमा को
आँख बंद होने से पूर्व जिसकी एक झलक
मुक्ति है
यह कथा किसी त्रिपिटक में लिखी हुई नहीं है
वह भुर्जपत्र सबसे पहले सड़ा विध्वंस के बाद की पहली बारिश में
होए -होए हो सकता है उस समय की भाषा में
हृदय को विगलित करती करुणा की सबसे
अप्रतिम पुकार हों
जिसे चारागाह में जुगाली करती गाएँ भी समझती हों
जो भाषा शिष्ट हो कर बची हुई है उसमें करुणा के सबसे कम शब्द बचे हैं
हिंसा के ढूँढ़ लो तो हज़ार मिल जाएँगे
कुछ तो मैं लिखता हूँ और मुझे लिखना होगा
जब रामायण और महाभारत सृजन में होंगे
त्रिपिटक रचना में
उस मृदुभांड की वह छोटी सी दवात जिससे चिपकी हुई नीली स्याही आज भी झाँकती है
पृथ्वी गर्भ से
मर्म की विस्मृत ,असंरक्षित वह पुकार कहीं
दर्ज नहीं है
शायद उसका रचा काव्य नहीं हो ,शब्दों का घोंसला हो
कोई तो गाने वाली चिड़िया वहाँ रहती होगी
महाकवियों! मैं इस जलती हुई पृथ्वी पर रहा हूँ
मैंने प्रेम किया है, सरकंडे छीले हैं
मैंने अपनी भाषा में दुनिया की सबसे गहनतम करुणा में
किसी का नाम पुकारा है
मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो ।

साभार गूगल

2. जो नमक का है ज्वार भाटों का है
तुम उस समुद्र को जानती हो जो नमक का है
ज्वार-भाटों का है
वडवानल का है
तुम उसमें रहती हो
तुम उस कुएं को जानती हो
जिसमें नमक के और मुसाफ़िर
रहते हैं
जिससे सिर्फ़ आवाजें लौटती है
समुद्र भी एक बड़ा कुआँ है
फ़र्क सिर्फ़ नमक का है
तुम समुद्र में हो
मैं हूँ कुएं में
सुनों इस आग़ की आवाज़ सुनों
पानी की वासना के नीचे
कुएं और समुद्र से आती है
आग़ की आवाज़

जहाँ पृथ्वी निर्वसना है
बस इस कुएं औरउस समुद्र में
सिर्फ़ नमक का फ़र्क है
जो नमक का है ज्वार भाटों का हैI

3. गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं
लोग तो इस गुलमोहर का भी बुरा मानते हैं
बिखेर देता है हरियाली छोड़ने के क्षण में
सिकुड़ा हुआ लाल फूल
तुम हँसकर पूछती हो कि तुम्हारा हँसना बुरा तो नहीं है ।
जैसे इस अँधेरे में एक-एक कर
डूबने लगेंगे रात के सितारे

एक बड़े गोते में सूरज एक दूसरे आकाश में निकलेगा
और पृथ्वी पर सुबहें नहीं होंगी ।
हँसने से अच्छा कोई व्यायाम नहीं है यह सामान्य वाक्य कहकर मैं परे देखता हूँ
सचमुच तुम्हारी हँसी के बिना यह दुनिया कितनी बेडौल हो गई है
मुझे एक सामूहिक ठहाके में वह पार्क अकबकाया और बदहवास दिखाई पड़ता है
जिसे शाम को खिलखिलाते हुए बच्चे थिर करते हैं ।
फैसलों का परिणाम जिस पर पड़ता हो उसे
फैसले लेने का हक़ होना चाहिए
तुम लगातार हँसती हो और गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं ।

4. गाँव की लड़कियाँ
मैं कहूँ कि गाँव की लङकियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लङकियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लङकियां
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क

मैं कहूँ कि गाँव की लङकियां किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है

गाँव की लङकियां गाँव की लङकियां होती हैं
खूब गहरी
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लङकियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं
आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?

साभार गूगल

5. मॉल में लडकियां

आधी फीसदी की छूट के बावजूद
मुझे यह मेरी दुनिया नहीं लगती

पोस्टर थे जो कह रहे थे स्वतंत्रता
कितना ऊपर उठ सकती थी
कॉकेशियन नस्ल के लोग
मुस्कुराते हुए साथ-साथ थे

वे चाहते थे कि हम अपनी
पहुँच बढाएं इसलिए वे
दूरियाँ घटा रहे थे

हमारी समस्या थी हमारे लोग
जिनके लिए जूते फकत पाँच-सात सौ
फ्राक हज़ार-बारह सौ
और बाहर का खाना
महीने-दो महीने में मसाल-दोसे
भर का मसला था

जो प्यार इन नई झक्क सफेद
इमारतों से आता हमारे लिए
वह फरेब था
इसका पता हमें चलता
तब तक देर हो चुकी होती थी

बाहर धकलने वाले शीशे
के दरवाजे थे
जिनको खोलते हुए
हाथ सहमते थे
कि इन्हें आगे की ओर
खींचे या पीछे धक्का दें

नियोन में जो चीजों के
भाव चमकते थे
वे खाने की टेबुल पर
मेनू में बदल जाते थे

मैं उङना चाहती थी
कॉकेशियन उस हम -उम्र
युवती की तरह
यह ख्वाब मैंने मॉल की
स्वचालित सीढ़ियों को
चढते हुए देखा
एक भरे पर्स के उस प्रौढ़
के साथ
जिसे उङती हुई
युवतियां पसंद थी

प्रेम जितना दिखता
वह वहीं छूट जाता था
इस शहर का मौसम
तेजी से बदल रहा था
पृथ्वी और सूरज के
सम्बन्ध से अलग

मैं इसी दुनिया में रहना चाहती हूँ
मेरा पुरूष साथी परिपक्वता से हँसता है
तुम यहाँ आ तो सकती हो
यहाँ रह नहीं सकती

ललचाने भर दुनिया की सारी जगहें
खुली अलमारियों में रखी थी
हम उङना चाहते थे मगर उङ नहीं
सकते थे

एक लंपट सी खुशी चारों तरफ
उङ रही थी
एक उदास सा फरेब मेरे
साथ-साथ चल रहा था

न यह मेरे भरोसे की दुनिया थी
न मेरी दुनिया मेरे पसंद की

यह आधी फीसदी की छूट न थी
सौ फीसदी की लूट थी

बारह हज़ार के जूते
पाँच हज़ार की कमीज
और वह कॉकेशियन हम उम्र
युवक जो वहाँ नहीं था

फरेब इसमें था कि यह दुनिया
मेरी हो सकती है
यह हर कदम पर यहाँ लिखा था
और ऐसे कि इसपर भरोसा जगता था ।

6. सदियों हुए प्यार किए

सदियों से प्यार को राख करती ज्वालामुखी फूटती है सुबह-शाम
ये रोटियां जो मेरी थाली में हैं ये सदियों पहले
की पकी रोटियां हैं
मेरा विश्वास करो इसे पोम्पेइ में बनाया था
किसी औरत ने जो अपने मर्द से प्यार करतीं थी
अभी रोटियाँ सिंकी ही थी चूल्हे पर
कि ज्वालामुखी उस थाली को पिघला गई
जिसमें वह रोटियाँ परोसती और
अपना प्यार ।
भूख की जली हुई देह का श्राप टहल आता है
हजारों किलोमीटर
प्यार जो जल गई ज्वालामुखी में
उसकी राख आज भी गिरती है इस चाँदनी रात में ।
चूल्हे से सुबह-शाम फूटती है ज्वालामुखियाँ
खत्म हो गया प्यार का आबाद शहर
चूल्हे के राख में लिपटी हुई तुम्हारी देह
मेरी भी और एक बरबाद हुई सभ्यता ।
मैं एक पत्थर हुआ गीत हूँ सदियों से
तुम्हारे पत्थर हुए होठों में फँसा हुआ ।
सदियों से एक सभ्यता की जली हुई लाश है
चाँद की रौशनी में यह शहर मॄत और भस्म ।
मैं तुम्हें और तुम मुझे
बिना प्रेम किए जीवित हैं हम सदियों से ।

7. पृथ्वी के छोर

यह पृथ्वी का एक छोर है :
गाँव पहाड़ की तलहटी है
जहाँ एन्डीज़ मिल रहा है
सपाट मैदानों से
पेरू की किसी लोक भाषा में
कचरा बटोरने का गीत है
घोङे की बग्घी में
पुरूष जब विलासिता के
कार्टुन चुनने निकलेगें
हाथों को काम करता देख
होंठ उन्हें अपने आप गाएंगे।
स्त्रियाँ पास ही शहरी इलाकों में
बच्चे सँभालने निकलेगी
बच्चे ईश्वर सँभालता है
उसी लोक भाषा में यह भी
एक गीत है पृथ्वी के उसी छोर पर।
यह पृथ्वी का दूसरा छोर है
मेरे पङोस में :
मूँज के पौधों में सिरकंडे होने से पहले
सपाट मैदानों के भी अपने पहाड़ हैं
जिनकी तलहटियों से
कुछ स्त्रियाँ खर निकालने निकलेगी
कुछ रह जाएंगी गोबर पाथने।
अभी सरोद की तरह बजेगी पृथ्वी
मूँज धूप में सूखेगा
झूमर और कजरी के गीत साथ-साथ
झरेंगे
लकङियाँ और पत्ते पास के
जंगल से इकट्ठा कर
पुरूष घर लौटेगा।
यहाँ की लोक भाषा में भात
बनने का भी एक लोकगीत है।
फिर किसी सस्ती सी आँच पर
प्रेम वहाँ भी पकेगा और यहाँ भी
एक साथ रात की देह गिरेगी
ओस की तरह
श्रम से दुनिया को भरती हुईं
सुबहें ऊगेंगी
खाली जगहों में
लकीरों की तरह
हम दुनिया के छोर पर
काम करते हुए लोग
सुबह की इन लकीरों को
कविताओं में पढेंगे।

8. तब हम किसी से पूछ नहीं सकते थे 

तब हम खूब चटख लाल और तङके हुए पीले रंगों की कमीजें पहनते
दुख सेमल के फूलों से हलके और उजले गिरते थे
बेआवाज़
हमारे लगाव मेमने की तरह मासूम और नफरतें सिंह की तरह हिंस्र

प्यार हमने तभी किए जब प्यार के बारे में ज्ञान किताबी नहीं था ।

वह साँवली सी लङकी जिसपर पहली बार दिल आया अब दादी बन अपने पोते की मासूम मुस्कुराहट पर फिदा होती होगी
मैं जब आठवीं में था वह बी ए में पढती थी और जैसे आम में मंजर आते हैं वैसे मुस्कुराती थी
मुस्कुराहट का कोई सिलेबस तो तयशुदा होता नहीं
हम आज भी उस मुस्कुराहट का बेसदा और निर्गंध अनुवाद पढना चाहते हैं ।

वे प्यार की सङकें जिसपर हम मोरों की तरह नाचे फिर किसी कस्बे, गाँव या महानगर में नहीं ढले
तब मोहब्बतें कलगी की तरह उगी रहती ऐन ललाट के ऊपर
हम बेखौफ जमाने की आँखों में उसका लाल रंग
गङाये हुए डगरते
हाय वह दूध में मिले हुए हल्दी सी गोराई पहने बैजनी समीज और हरे दुपट्टे वाली परियाँ
हमने तब अपने प्यार को अधिकतर यतीम रखा
जिसका बेइंतहा दर्द कलेजे के किसी गोशे में
सैकड़ों सुइयों की तरह चुभता हैं ।

वासनाओं के ईल्म तब जिन्दगी के अनजाने ईलाके थे
मोहब्बतें खरगोश के कानों में हवाओं की संगीतमय सरगोशियाँ
वे फिल्में जिन्हें देखकर हम रोए रात भर और जिन नायिकाओं से जुङे दिल के सबसे महीन उजालों में
मुट्ठियां भींचते हुए कि जो पर्दे के बाहर चिन रहा होता नायक हम उन दीवारों को आग लगा देते गरचे वो नहीं होता पर्दे पर ।

तब पगडण्डी वही थी जो सरसों के फैले हुए खेतों तक पहुँचने के लिए होती
प्यार तो मैंने तभी किया जब हम प्यार कर सकते थे
लेकिन वे ही मौसम याद हैं जिसमें मुस्कुराहटें
आमों में मंजर की तरह उतरते थे
हम सिनोरिटा का अर्थ जानना चाहते थे और तब किसी से पूछ नहीं सकते थे ।

जुंको फुरुता: जिसे याद रखना ही होगा

मंजू शर्मा 
आज अगर जुंको फुरुता जीवित होती तो 43वाँ जन्मदिन मना रही होती। दु:खद है कि जापानी गुड़िया विश्वस्तरीय प्रसिद्धि पा चुकी है लेकिन जुंको फुरुता को उसके हिस्से के न्याय तक से महरूम रखा गया।

भला इस सदी ने उस बहादुर पीड़िता को कैसे भुला दिया?

केवल तीन दशक पहले पैदा हुई जुंको फुरुता(Junko Furuta),  एक ऐसी बहादुर लड़की , जिसकी अविश्वसनीय लगने वाली कहानी को पढ़ते हुए , हमारे हाथ खुद ही उठ जाएँगे उसे सलाम करने के लिए. 22 नवंबर,1972 को पैदा हुई उस जापानी लडकी ने 17 साल की उम्र में  त्रासदी और यातना को शरीर के पोर-पोर में 44 दिनों तक सहा.

मैं समझ नहीं पा रही कि उसकी कहानी मैं क्यों कह रही हूँ, क्यों सोच रही हूँ उसके बारे में ! क्या इसलिए कि औरतों को वस्तु समझने की वैश्विक सोच हम सब को हर रोज डराती रहती है , एक डरावने हस्र के लिए . क्या इसलिए कि कपडे पहनने के सलीके बताते , बलात्कारियों के प्रति दया भाव जताते लोग हमारे लिए क़ानून बनाने और पालन करने के तंत्र पर काबिज हैं और रोज -रोज हमें अपने बयानों से आतंकित करते हैं. या  इसलिए कि शब्दों से बलात्कार को अंजाम देने वाले  आजम खान जैसे मंत्री -संत्री हमारे अपने ही चुनाव के साथ हमारा मजाक उड़ाते हैं . क्या हम दुनिया भर की औरतें एक जैसी यातना शिविरों के वाशिंदे नहीं हैं ?

आज हमसब भारत में मेक इन इंडिया के भुलावे और प्रपंच में जीते हुए केवल बलात्कार मुक्त इंडिया तक के सपने को साकार होते नहीं देख पा रहे हैं और राजनीतिक और सत्ता के गलियारों से लगभग हर बार , हरेक बलात्कार के पीछे एक बयान आता है , जिसमें कहीं कटघरे में खड़ी की जाती है,   जिसे नोंचा-खसोटा गया। इस सदी में भी और लगभग हर दिन कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी बेटी का चीरहरण होता है ।
ऐसे समय में Junko Furuta की कहानी लिखना आज के समय की माँग है। पुन: आज 22 नवंबर के दिन जुंको अपने जन्मदिन वाले दिन रह-रहकर बार-बार याद आती है। 17 सालकी किशोरावस्था में उसने वह सब भोगा , जिसे सुनकर और पढ़कर झुरझुरी और सिहरन-से कँपकँपी होने लगती है।शरीर के लहू बहादुर जापानी लड़की के बारे में सोचकर बर्फ के समान जम-से जाते हैं। बर्फ होकर रूधिर बस नसों में सिमट जाते हैं।

शायद ही जुंको और उसके माता-पिता ने कभी सपने में भी अनुमान लगाया होगा कि 17वाँ जन्मदिन ही उसका आखिरी जन्मदिन साबित होगा क्योंकि 17वें जन्मदिन को धूमधाम-से मनाने के केवल तीन दिन बाद जुंको 25 नवंबर, 1989 ,  के दिन अपने स्कूल Yashio-Minami हाई स्कूल से छुट्टी के पश्चात्,  वहाँ जा रही थी जहाँ वह पार्ट टाइम जॉब करती थी . लेकिन वहाँ पहुँचने से ही पहले बीच रास्ते में ही जुंको का अपहरण उसी के उम्र के 7 लड़कों द्वारा कर लिया गया और उसे लेकर जाया गया वहाँ , जहाँ 44 दिनों तक न थमने वाली यंत्रणा वह  बहादुर जुंको भोगती रही। और वह  उन मनोरोगी बलात्कारियों से हर दिन प्रताड़ित होती रही क्योंकि उनके लिए वह उनका मनोरंजन करने वाली एक बोलने वाली खिलौना भर थी।

44 दिन,  अर्थात एक महीने और 14 दिन,तकरीबन डेढ़ महीने उसने  अपने अपहरणकर्ताओं द्वारा बनाए गए यंत्रणा शिविर में वह दर्द भोगा,  जो मानवता के नकली गुहार करते इस पश्चिमी और पूर्वी समाज की अमनावीयता की कहानी कहता है.

उसके अपहरणकर्ताओं में से किसी भी लड़के से न कोई दोस्ती और न कोई दुश्मनी थी। अपहरण के दिन से लेकर उसके अत्याचारों का सिलसिला जो शुरु हुआ,  वह उसके दर्दनाक मौत के साथ ही थमा। यंत्रणा के 44 दिनों में जुंको के साथ तकरीबन 400 से अधिक बार बलात्कार हुआ। कैसे सहा होगा जुंको तुमने अपने शरीर के साथ प्लास्टिक की गुड़िये-से भी बदत्तर वह खिलवाड़? ज्यादत्ती की शायद कोई सीमा शायद ही होगी,  जिसे उसके अपहरणकर्ता बलात्कारियों ने पार न की होगी।

जब भी जुंको को भूख लगती तो खाने के लिए उसे तिलचट्टे और प्यास लगने पर उसे मूत्र ही पीने के लिए दिया जाता था। उसे जबरन नग्न ही रखा जाता ताकि जब जरूरत हो तो उसके साथ बलात्कार किया जा सके और तो और दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में उसे नग्नावस्था में बालकनी में सोने को मज़बूर किया जाता था।
अबतक यही लगता था कि दक्षिण-एशियाई देशों में ही स्त्रियों की अच्छी स्थिति नहीं है,पर जुंको की कहानी कुछ और कहती है. तीन दशक पहले के जापान में घटे यह  दर्दनाक हादसा और यंत्रणा तो हमें यही बता रहा है पूरी दुनिया में  स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं ।

अगर ऐसा न होता तो शायद जुंको आज जीवित होतीं। बलात्कार के साथ हैवानियत की क्रूरता और नग्नता भी झेली जुंको ने। घरों में जलने वाले बिजली के बल्ब उसके गुप्तांगों में कितनी ही बार डाला गया,  जिससे उसके योनि और गुदे के अंदरूनी हिस्से बुरे तरीके-से क्षतिग्रस्त हो गए थे । छाती को सुई और धागे-से सिलने के बाद भी इन दरिंदों का मन नहीं भरा और उसके निप्पल को सरौते-से खींच दिया।जुंको का दर्द हम सभी महिलाओं को महसूस होता  है।

जुंको के पूरे नग्न शरीर पर मोमबत्तियों के तरल को टपकाकर उसे फिर सिगरेट से जलाते थे।शरीर का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा था, जिसे इन दरिंदों ने साबूत  और दर्दविहीन छोड़ा था। फिर भी जुंको,  कितनी बहादुर रही होगी इसका अंदाज़ा इसी बात-से लगा सकते हैं कि अपने शरीर को अपहरणकर्ताओं की नज़र से बचाकर घसीटते हुए टेलीफोन बूथ  पर लेकर किसी तरह पहुँची , लेकिन यहाँ भी शायद बहादुर जुंको की किस्मत इतनी अच्छी न थी और एक दरिंदे की नज़र पड़ गयी। उसके बाद तो पढ़ते हुए भी मुट्ठियाँ भींच गयी थीं जब जुंको को उल्टा टाँगकर एक बॉक्सिंग के पंचिंग बैग के समान पेट पर घूँसे से इतना मारा कि वह मुँह से खून की उल्टियाँ करने लगी।लोहे की छड़ से शरीर पर बेदर्दी-से पीटने के बाद भी उन जालिमों के जुल्म की मंशा शायद शांत न हुई होगी और योनि में ग्रिल्ड,  जलते गर्म चिकन डालने के बाद इंतिहा तब हुई जब कैंची को प्रवेश किया।

400 से अधिक बार के बलात्कार –  कोमल शरीर ने कैसे झेला और बर्दाश्त किया होगा , उन नरपिशाचों के पैशाचिक कृत्य को ! सिगरेट के लाइटर से जलने को उसके शरीर का कोई हिस्सा अब बाकी न था.  44वें दिन भी उन्होंने उसके साथ नोंच-खसोट किया और चीरा भी,डंबल से पेट पर मारते रहे .  4 जनवरी 1989 का दिन था वह(मनहूस कहना कुछ ठीक न होगा,क्योंकि तुम तो इस यंत्रणा शिविर से मुक्ति के पथ पर निकल रही थी),  जब वह  हारकर अपने अंतिम प्रयाण की तैयारी कर चुकी थी. लगभग 2 घंटे तक चले अंतिम  यातना के दौर में उसके  शरीर को हर जगह से जलाया गया।

और सजा, इस केस में सजा का मजाक चाहे जो भी हुआ हो, आतंक का  सिलसिला आज भी जारी है. और हम ग्लोब के अलग -अलग हिस्सों के लोग, अलग -अलग समाजों में स्त्री विरोधी इस हिंसा की सहजता में जीने के आदि होते गये हैं ! 

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

अनुपमा तिवाड़ी की कविताएँ

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अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

1. प्यार
प्यार तुम कितने सुन्दर हो.
तुम्हारे हाथ पैर होते
तो मैं
तुमसे लिपट – लिपट जाती
छोडती ही नहीं तुम्हें.
मुझे पता है
तुम पर लगती रही हैं तोहमतें
कभी पश्चिमी संस्कृति की,
तो कभी चरित्रहीनता की.
परन्तु,
तुम तो सदा थे
हो
और रहोगे.
सात समुन्दर पार भी धडकते रहोगे दिलों में चुप – चुप.
बहते रहोगे अविरल आँखों से
रात के अंधेरों में.
प्यार, मुझे पता है
तुम कुचले जाते रहे हो
कभी इज्ज़त की दुहाई दे कर
तो कभी न जाने क्यों – क्यों?
प्यार, तुम जब भी कुचले जाते हो
मेरे गाल पर एक तमाचा लग कर बोलते  हो
जाओ! तुम्हारी दुनिया में हमें स्वीकार करने की हिम्मत ही कहाँ ?
लेकिन प्यार,
तुम हमेशा जिंदा रहोगे
नहीं मरोगे
हारोगे भी नहीं
जीतते ही रहोगे
हर बार – हर बार !

2. तुम्हारा आना 
तुम आए जीवन में
तो जैसे आँखों में दिए जल गए.
आलोकित हो गई मैं
होठ गुनगुनाने लगे
कान भी आहटें सुनने लगे
अंगुलियां उकेरने लगीं
केनवास पर तुमको.
पैर भी पंख बन कर उड़ने लगे.
एक दिन तुम चले गए
चुप से
सब कुछ हो गया
जैसे चुप – चुप.
पर अब भी तुम्हारे इंतजार में
मेरे बाल अंगुल – अंगुल बड़े हो रहे हैं.

3. स्त्रियों का प्रेम 
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं,
धोखा खाती हैं…..
प्रेम करती हैं,
धोखा खाती हैं….
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं

4. रिश्ता
कच्चे धागे सा रिश्ता
मेरा तुम्हारा
टूट सकता है
एक झटके से.
इसमें नहीं बहती
खून की नस कोई
सिरों पर बंधन की कोई गांठ भी तो नहीं.
पर, यह धागा आज भी उतना ही रंगीन है
उतना चमकीला
जितना पहले दिन था.
बांधता है मुझे,
तुमसे
सात जन्मों के बाद तक के बंधन में.

5.  सिक्का – सिक्का यादें 
समझ सकती हूँ
कितना मुश्किल था
तुम्हारे लिए
ये कहना कि
जा रहा हूँ महानगर
तुम्हारा शहर छोड़ कर.
अब नहीं लौटूंगा
बस गया हूँ यहीं.
मेरे शहर में तुम्हारी आखिरी शाम से
मैं सिक्का– सिक्का यादें
गुल्लक में डाल रही हूँ
गुल्लक से निकाल रहीं हूँ
गुल्लक में डाल रही हूँ
गुल्लक से निकाल रही हूँ
न गुल्लक भरती है,
न खाली होती है.

6. तुम्हारी बिंदी 
उस दिन छूट गई थी
जो मेरे कंधे पर
तुम्हारी बिंदी
वो मुस बन कर उग आई है
मेरे कंधे पर.
और तुम्हारे बालों की एक लट
जो छोड़ गई थींतुम
मेरी घड़ी की चेन में,
वो मनी प्लांट बन झूल रही है मेरे आँगन में.
जब भी होता हूँ
तुम्हारी बातों के साथ
देखकर रह जाता हूँ
अपने कंधे के मुस को
और फंसा देता हूँ
अपनी अंगुलियाँ
मनीप्लांट की बेल में.

7.  तुम्हारी कसम 
आज खाई तुमने
कसम
उनसे न बतियाने की
पर, ये तुम हो न !
जो उन्हें सामने न पा कर भी
उनसे बतियाते हो.
और वो – वो हैं
जो कभी नहीं होते फुर्सत में
तुमसे बतियाने की.
चाहे तुम उन्हें कसम दे दो
उनसे न बतियाने की

8.  इंतज़ार 
महीने थे
जो गुज़र गए,
सप्ताह दिन और घंटे हैं
कि बड़े होते जाते हैं.

“सूरजमुखी अँधेरे के” की नायिका का आहत मनोविज्ञान

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अभिलाषा सिंह

.शोध छात्रा , हिन्दी     विभाग , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. सम्पर्क : singh.abhilasha39@gmail.com

हिंदी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक उपन्यासों की एक लम्बी धारा रही है जिसमे हम अज्ञेय, जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी और देवराज का नाम प्रमुख रूप से लेते हैं परन्तु किसी भी स्त्री लेखिका के उपन्यास का नाम इस श्रेणी में नहीं आता जबकि स्त्री साहित्य का उत्स ही मनोविश्लेषण से उपजा है  है. स्त्री साहित्य में प्रमुखतः किसी स्त्री के अंतर्मन का ही चित्रण होता है, परिवेश और परिवार से प्रभावित होति उसकी भावनाएं और उसके लिए निर्णय को पूरी तरह से यदि हम मनोविश्लेषणात्मक  दृष्टिकोण से देखें तो तस्वीर और अधिक स्पष्ट होती है. इसी कड़ी में हम कृष्णा सोबती के सन 1972 में प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास “सूरज मुखी अँधेरे के” को देख सकते हैं जिसमे कथा एक ऐसी लड़की की है जो चाइल्ड एब्यु का शिकार हुई रहती है. बचपन में घटी इस इस घटना के कारण उसकी पूरी यौनावस्था प्रभावित होती है. एक भरी-पूरी लड़की अपनी चढ़ती किशोरावस्था से लेकर ढलती यौनावस्था तक खुद को अधूरा समझती है, खुद के शरीर को हर तरह से प्रयोग कर फेक दिए गए चिथड़े के समान समझने लगती है, जिसमे न कोई आकर्षण होता है, न जिसका कोई प्रयोग हो और न ही जिसकी कोई ज़रूरत महसूस करता है. पर यह सिर्फ उसका ही सोचना है बरक्स इसके उसके जीवन में कई पुरुष sआते हैं. पर सबके सन्दर्भ में वह खुद को खाली और ठंढी  मानने लगती है.

यह उपन्यास तीन भागों/सर्गों में विभाजित है – पुल, सुरंगे और आकाश. तीनों सर्ग रत्ती के जीवन में आयी घटनाओं को कभी फ्लेश बैक तो कभी वर्तमान में दिखाते हैं जैसा की अज्ञेय के उपन्यास “शेखर एक जीवनी” और जैनेन्द्र के उपन्यास “त्यागपत्र” में होता है.“पुल” सर्ग में रत्ती के जीवन में अकेलापन और कुंठा दिखती है. वह खुद को अपने दोस्त रीमा-और केशी के भरे-पुरे परिवार में अकेला और अधूरा महसूस करती है. “सुरंगे” सर्ग में जिस कारण उसकी यह मनोदशा हुई, वह रहस्य उजागर होता है. इसी सर्ग में हम देखते हैं कि पड़ाव की तरह पुरुष उसके जीवन में आते-जाते है पर “आकाश” सर्ग में रत्ती दिवाकर के सानिध्य में खुद को पूर्ण और श्राप से मुक्त पाती है .

साभार गूगल

लेखिका ने उपन्यास में कहीं भी उस व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उजागर नहीं किया है जिसने रत्ती का यौन शोषण किया. यहाँ तक कि कोई संकेत भी नहीं दिया क्यों की लेखिका का ध्येय अपराधी को केन्द्रित करना या उसकी उपन्यास के अन्य पात्रों से भर्त्सना करवाना नहीं था बल्कि जो भुक्तभोगी रत्ती है उसके प्रति समाज के रवैये को दिखाना है कि किस प्रकार हमारे समाज में यौन शोषक के स्थान पर पीड़िता को अपराधी बना दिया जाता है , उसके साथ समाज ऐसा सौतेला व्यवहार करता है कि कह-कह कर बोल-बोल कर उसे वह दर्द भूलने नहीं दिया जाता जिससे उसकी पूरी जिन्दगी प्रभावित होती है और कई बार समाज का ऐसा रूप उस पीड़ित बच्चे में एकाकीपन, कुंठा, त्रास, भय, और भ्रम की स्थिति पैदा कर देता है जिस कारण वह आसानी से किसी पर भरोसा नहीं कर सकता. ऐसा ही कुछ उपन्यास की मुख्य पात्र “रत्ती” के साथ भी होता है. वह जीवन में खुद को अकेली महसूस करने लगती है और उसका ये अकेलापन एकालाप को जन्म देता है जो उपन्यास में कई स्थान पर देखने को मिलता है ऐसा ही कुछ “शेखर एक जीवनी” के मुख्य पात्र शेखर के साथ भी होता है. रत्ती का एकालाप कभी तो उसका मूल्यांकन करने में उसकी सहायता करता है तो अधिकांशतः उसे अवसाद की ओर ढकेलता है.

वह खुद से पूछती है कि इस लड़की को एक बार भी समूची औरत बनने क्यों नहीं दिया गया. वह मानती है कि वह खुद सिर्फ है, उसका तीखापन, कडुआपन सब मर गये हैं. वह फीकी है. एक फीकी औरत. एक लड़की जो कभी लड़की नहीं थी. एक औरत जो कभी औरत नहीं थी. उसके पास है हर बार कहीं पहुच सकने की न मरनेवाली चाह और हर बार वीरान वापसी अपनी ओर. हर बार .अक्सर देखा जाता है कि ऐसी मनोदशा का व्यक्ति अंतर्मुखी स्वाभाव का होता है और रत्ती भी निश्चय ही अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाली है पर इसके विपरीत उसका बाह्य व्यक्तित्व गतिशील और आकर्षक है जिस कारण लोग उसकी ओर आकृष्ट होते हैं, खींचते आते हैं, नज़रें उस पर ठहर जाती हैं क्यों की मनोग्रन्थि उसके मन की है जो देखने वाले को तो नहीं ही दिखती है. तब उसे भी ये महसूस होता है कि अब भी इस मुखौटे पर कुछ ऐसा है की आँखे उठें और रुकें.

फ्रायड का सिद्धांत है कि ‘मानव-मन की दमित इच्छाएं ही अवचेतन मन में रहती है’ इस आलोक में रत्ती के जीवन को देखा जा सकता है, पर इस सन्दर्भ में नहीं कि उसकी काम इच्छा को नैतिकता या आदर्श के कारण दबाया गया हो, क्यों कि फ्रायड के इस सिद्धांत को आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी ख़ारिज कर दिया है और रत्ती के सन्दर्भ में यह सही भी नहीं बैठता. रत्ती उस एक घटना के बाद खुद को कभी शारीरिक पूर्णता के स्तर पर नहीं नाप सकी क्यों की उसे हमेशा ये भय बना रहा की वह अधूरी साबित होगी. उसके अवचेतन का डर उसके चेतन मन को सताता रहा. कई बार ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति की जिस चीज को बुरी तरह से रौंदा जाता है उसका वह चाहते हुए भी सामना नहीं करना चाहता. इसी कारण रत्ती ने खुद को सीमित कर लिया है उसे लगने लगा है कि वह एक ऐसी औरत है जिसने कभी किसी को नहीं पाया जिसको कभी किसी ने नहीं. वह आप ही अपनी सड़क का ‘आखिरी छोर’ है.

इस उपन्यास में हम देखते हैं कि सेक्स/काम/राग जो शरीर की बाकी इन्द्रियों की तरह ही सामान्य क्रिया है और परिस्थिति विशेष में जिसकी खुराक अनिवार्य रूप से जरुरी हो जाती है, रत्ती उससे जबरन भागने लगती है, शरीर की स्वाभाविक आवश्यकता को दबाने लगती है, वह स्त्री-पुरुष के  इस प्राकृतिक संयोग से भय खाने लगी है, इस आदिम सम्बन्ध को झुठलाने लगी है. वह सोचती है कि रातों में किसी के पास न सोकर भी जीना अच्छा है. पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता है कि सेक्स की भावना को एक हद के बाद दबाना कई मामलो में घातक साबित होता है जिसका सम्बंध न सिर्फ भावनात्मक आवेगों के उच्छलन से है बल्कि हार्मोनल चेंज भी व्यवहार को निर्धारित करते हैं. समाज इसे कुछ भी कहे पर इसके पीछे नितांत जैविक कारण है. नैतिकता या आदर्श के जामें से इसे व्यवस्थित और मानकीकृत रूप दे सकते हैं पर दबा नहीं सकते, समाप्त नहीं कर सकतें हैं.
रत्ती अपने स्त्री निहित अंगो को छूती है और हर वक्त अपने अधूरेपन को महसूस करती है. लोगो की बाते खुद उसके अपने शब्द बन कर उसके कानो में घुलते हैं. वह मन में बार-बार दोहराती है कि;
 “रत्ती अच्छी लड़की नहीं. रत्ती कोई औरत नहीं. वह सिर्फ गीली लकड़ी है. जब भी जलेगी, धुआ  देगी. सिर्फ धुंआ .”

साभार गूगल

रत्ती के लिए यह लड़ाई दोहरे छोर पर है, एक तो उसे उस घटना से लड़ना है दूसरा उसे लोगो द्वारा खुद को एक सीमा में निर्धारित कर लिए जाने से. ऐसी स्थिति में व्यक्ति भीड़ में रहते हुए भी खुद को अकेला महसूस करने के लिए मजबूर हो जाता है. इससे आगे की मनोस्थिति यह होती है कि व्यक्ति को अकेलापन और अपना स्थाई दुःख ही अच्छा लगने लगता है रत्ती को भी ये अधूरापन अपना लगने लगा और वह इसमें आनंदित भी रहने लगी. वह फाटक पर पहुचना चाहती है पर अन्दर जाना नहीं. इस प्रकार की मनोग्रंथि में लिप्त व्यक्ति के लिए ऐसे साथी की बहुत जरुरत होती है जो उसे इस अवसाद से निकल सके और जीवन के सकारात्मक पक्ष से उसे जोड़ सके. उपन्यास के प्रारंभ में ही केशी और रीमा जो की पति-पत्नी है और रत्ती के दोस्त भी रत्ती के सन्दर्भ में ऐसी ही भूमिका का निर्वहन करते देखते हैं. केशी उसे समझता है. वह जानता है कि यह लड़ाई पुरुष के विरोध में नहीं बल्कि उसकी खुद से है. केशी उसे मानसिक रूप से सहारा देता है वह नहीं चाहता की रत्ती अपने अतीत में खोकर अपना वर्तमान और भविष्य खराब करे. वह उसे समझाता है कि;
“हमेशा अपने से अपने अन्दर लड़ते रहने का कोई फायदा नहीं. लड़ाई को अपने से बाहर रखकर लड़ना हमेशा अच्छा रहता है.”


रीमा पूरी कोशिश करती है कि रत्ती अपने अतीत से बाहर आये पर रत्ती है कि अपने अतीत को छोड़ना ही नहीं चाहती और झुंझला कर खुद को पढ़ लिए जाने के उत्तेजना से घबड़ा जाती है और उसे लगता है कि रीमा और केशी एक ढकी छिपी पुरानी औरत को धूप दिखाने के बहाने तार-तार हुए उसके कपड़ों पर हाथ फेरा करते हों. वह कहती है;
“मुझे जहाँ होना चाहिए मैं वहीँ हूँ. और मुझे कोई मलाल नहीं रीमा ….मेरा आगे है कहाँ! मुझे तो आँखों के सामने आगे-पीछे होती तस्वीरों को देखना भर है, बस….मेरा कोई भविष्य नहीं. मेरे आगे कुछ नहीं.”


सेक्स मनोग्रंथी से जकड़े व्यक्ति को अपने खालीपन का आभास तो होता ही है पर एक स्त्री के स्तर पर यह पीड़ा दोहरी होती है क्यों कि स्त्री न सिर्फ पुरुष के संसर्ग से खुद को पूर्ण मानती है बल्कि वह अपनी सृजन की क्षमता से खुद के स्त्रीत्व  को तौलने लगती है. स्त्री के लिए यह कई बार सेक्स न कर पाने की तकलीफ से भी ज्यादा तकलीफ देह होता है कि वह सेक्स तो करने के लिए पूर्ण है पर उस सेक्स का कोई बीज उसमे ठहरने की योग्यता नहीं रखता. कृष्णा सोबती ने इस सन्दर्भ को भी कहानी में उठाया है. केशी और रीमा के बच्चे को सहलाते वक्त रत्ती ममत्व से भर जाती है और बच्चा भी उससे पर्याप्त स्नेह पाता है पर ये आभास होने पर की वह इस सुख से वंचित है खुद को सूखा मानने लगती है. जयनाथ से वह कहती है;
“अपने बच्चों के लिए तुम्हे कोई और माँ तलाशनी पड़ेगी. बेटे बनाने की कला तो इस औरत के पास है ही नहीं.”


रत्ती कई पुरुषों से होकर गुजरी पर हर बार उसके लिए वो सब मिटटी का ढेर हो गया. हर बार बीच में वही ढेर मिटटी हो गये वक्त का. उपन्यास पढ़ कर पाठक को ये भ्रम हो सकता है की रत्ती को अपराधबोध हो या वह घटना के लिए स्वयं को दोषी मान रही हो पर ऐसा नहीं है. एक सुधि पाठक यह रचना पढ़ कर यह जान सकते हैं कि रत्ती में यह मनोग्रन्थि उसके साथ हुए उस अपराध के कारण नहीं थी बल्कि उसके आस-पास के लोगो द्वारा रचे गए और जजमेंटल हो जाने के कारण है खास कर उसके बचपन के सहपाठियों द्वारा उसे चिढाया जाना उसमे इस मनोग्रंथि का बीज डालता है और जीवन में आये पुरुष और उन पुरुषों की कभी हड़बड़ी तो कभी रत्ती को न समझ पाने के कारण इस मनोग्रंथि का बीज अंकुरित हो परिपक्व धारणा के रूप में उसके अन्दर घर कर लेता है. रत्ती में अपने साथ हुए कुकृत्य का पछतावा नहीं था बल्कि लोगो के द्वारा बार-बार उसे बोले जाने का क्रोध था. असद भाई से अपनी सफाई देती हुई कहती है;
“जाने क्या-क्या कहा करते हैं ! रत्ती बुरी है. इसे लड़के पसंद हैं, इसे गिरजाघर के पीछे देखा था, मैं तो किसी से कुछ कहती नहीं हूँ असद भाई … पुरानी बात है, फिर भी…!”
वह तिलमिला जाती है जब अज्जू कहती है;
“किसी ने बुरा काम किया था न तुम्हारे साथ! खून निकला था न”

वह चिडचिडी होती जाती है क्यों कि उसके सहपाठी बार-बार उसे छेड़ते, उसका मजाक उड़ाते, उसे तिरस्कृत करते और उसकी उपेक्षा करते हैं. उस अबोध बच्ची का मन हिंसात्मक होता जा रहा था. श्यामली को भी वह पीट देती है जब वह कहती है;
“लड़कियों को पीटती हो और लड़कों से चॉकलेट खाती हो. उनके सामने अपना फ्रॉक उठाती हो”
बच्चे उसके विषय में मनगढ़ंत कहानियां बनाने लगे और पूरे क्लास भर में उसे लेकर गंदी बाते करने लगे;
“पासी ने चिढ़ाकर कर कहा –“कुछ खाओगी…खिलाऊं…?और अपनी निकर टटोलने लगा, रत्ती की छाती में कोई परनाला पिघलकर बाँहों की ओर बह आया और लोहा हो गया पाँव उठाया और पाशी को गले से पकड़ कर जमीन पर दे मारा. बार-बार पटकती गयी की पाशी न हो कोई पत्थर हो, नफरत हो नफरत … ”फिर कभी ऐसा हुआ तो फाड़ डालूंगी …”रत्ती हिली नहीं .खूंखार सी देखती गयी और खड़ी रही.”

साभार गूगल

अपने ही बाल-साथियों द्वारा की गयी ऐसी भद्दी टिप्पणियों  से रत्ती का बाल-सुलभ मन समय से पहले ही अपना बचपन खो देता है और यही बाते उसके अचेतन मन में धीरे-धीरे घर करने लगती है रत्ती कठोर होती जा रही थी. वह कुंठा मनोग्रंथि से ग्रसित होती जा रही थी. उस बाल-सुलभ मन को शांति असद की बातों और सानिध्य से मिलती है. असद ने उसके कठोर हो चुके बाल मनोभाव को सहारा देते हुए कहा था कि;
“रत्ती हमेशा याद रखेगी, वह एक अच्छी लड़की है. प्यारी और बहादुर .”

और यह बात रत्ती को हमेशा याद रहती है जो उसकी अच्छाई को बनाये रखती है. इसे इस सन्दर्भ में भी देख सकते हैं कि रत्ती के जीवन में जो पुरुष आते हैं उनमे कुछ की प्रेमिकायें रहती हैं और कुछ शादीशुदा पर रत्ती किसी के भी अधिकार को छीनने की बजाय खुद ही हट जाती है. एक व्यक्ति जिसके अंदर इतनी नफरत और इतनी कटुता भरी हो वह उसे दूसरे पे उड़ेलने के बजाय खुद ही उसमे जलती रहती है जबकि ऐसा कम ही देखने को मिलता है. ऐसे में लेखिका ने एक आदर्श चरित्र का भी निर्माण किया है. जबकि आम जीवन में ऐसी मनोदशा वाले व्यक्ति दूसरे के प्रति और कठोर और अपने पसंद की चीज के लिए व्यवहारिक स्तर पर और भी जिद्दी देखने को मिलते हैं जो कभी-कभी आपराधिक रूप भी ले लेता है. उस बच्ची को असद के प्रति खिचाव होता है पर उसकी बदनसीबी कि असद असमय ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है और एक बार फिर रत्ती का बचपन मर जाता है.

रतिका (रत्ती) के साथ जो हादसा हुआ रहता है वह इसे चाइल्ड एब्यूज समझ कर समय के साथ भूल भी सकती थी जैसा कि अधिकांशतः बच्चों के साथ होता है पर ऐसा नहीं हुआ, उसे याद था पर जैसा कि पहले ही बता दिया है कि उसे बार-बार याद कराया जाता है. अपने ही साथियों अपने ही लोगों द्वारा. ऐसे में बहुत हद तक संभव है की या तो पीड़ित व्यक्ति का मन सेक्स से हट जाये या अपने विपरीत लिंग के प्रति जिसने उसका शोषण किया हो, उसका मन घृणा और वितृष्णा से भर जाये. पर इस सन्दर्भ में भी सोबती ने रत्ती के रूप में एक अनूठे पात्र का सृजन किया है. रत्ती इस घटना और घटना को बार-बार कुरेदे जाने पर भी सभी पुरुषों से घृणा नहीं करने लगती और न ही उनसे जुड़ने में डरती है बल्कि इस उपन्यास में हम देखते हैं कि हिंदी साहित्य और विशेषकर स्त्री साहित्य के अन्य स्त्री पात्रों की तुलना में रत्ती पुरुषों के साथ कहीं अधिक सहज है. शायद इसी कारण लेखिका ने 19-20 के करीब पुरुष–पात्रों को नायिका के इर्द—गिर्द रचा है. इनमे से कुछ उसे स्वयं को देखने की दृष्टि देते है, कुछ उसे दूर से देखते हैं, कुछ उस तक पहुँचते है पर उसे पा लेने में सिर्फ दिवाकर ही कामयाब रहा.

समय और घटनाओं ने रत्ती को भले एक स्तर पर कमजोर किया हो पर अन्य स्तरों पर उतनी ही मजबूती के साथ एक सशक्त नारी के रूप में पाठक के सामने आती है. वह किसी भी पल पुरुष से डरने वाली या उसपर आश्रित न रहने वाली हिदी की सशक्त नारी पात्र है. ऐसा नहीं की सभी पुरुषों को वह एक जैसा ही व्यवहृत करती है. जगतधर जिसके जीवन में मीता है पर वह चाहता रत्ती को है उसके साथ रत्ती सौम्य है पर वहीँ रोहित जो जबरी उसे पाना चाहता है उसे वह झटकार देती है. वहीँ वह एक आत्मनिर्णय लेने वाली स्त्री भी है वह रोहित से कहती है;
“मुझे किसके साथ कहाँ जाना चाहिए, यह मेरे सोचने की बात है, किसी और की नहीं … सिर्फ अपने चाहने से किसी को पा नहीं लिया जाता.”
रत्ती के अपने सिद्धांत अपने उसूल हैं. सुमेर से वह कहती है;
“जो आँख रहते गलत को रहने दे सिर्फ इसलिए कि कोई सही मानने से इनकार करता है. किसी की बेवकूफी और अपनी बेबसी का विज्ञापन किया जाये…”
रत्ती में सेक्स को लेकर और सिर्फ सेक्स को लेकर ही मनोग्रन्थि है न कि वह कोई मनोरोगी है. रत्ती के इन वक्तव्यों से पाठक उसे मनोरोगी समझने की भूल नहीं कर सकते. पर अपनी इस मनोग्रंथि से लाचार होकर ऐसा भी नही कि वह किसी से किसी स्तर पर समझौता करे. भानु से वह कहती है;
“जब जब कोई नम्बर मिलाया है, कभी सही जगह घंटी नहीं बजी. बजी तो इंगेज मिली. कभी नंबर मिला तो उस ओर उठानेवाला कोई न था. था तो उस ओर से ऐसी आवाज नहीं आई जो मुझ तक पहुँच सके.”
सुब्रामनियम से वह कहती है;
“सुब्बा, ऐसा कुछ नहीं जो मैं चाहने पर चुन सकूँ और न चाहने पर न चुन सकूँ.”
वह ऐसी महिला पात्र है जो अपने मन के अनुकूल ही किसी के साथ राम सकती है न कि सिर्फ काम की इच्छा रखने वाली कोई रोगी. जिस तरह उसके अवचेतन में बचपन की काली परछाई बैठी है उसी तरह स्त्री स्वातंत्र्य और स्वाभिमान को भी उसके पूरे व्यक्तित्व में सभी प्रसंगों में अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है.
बड़े अन्तराल के बाद लेखिका अपना कुछ कहती हैं रत्ती के लिए;
“एक लम्बी लड़ाई. हर बार बाजी हार जाने वाली और हर बार हार न मानने वाली.
हर बार अकेले जूझना. हर बार सिर उठा आगे देखना.हर मोड़ एक मोड़ भर. भविष्य नहीं.
भविष्य वह अंधी आँखों वाला वक्त बना रहा जिससे रत्ती ने कभी साक्षात्कार नहीं किया.
वक्त के पंजो तले जितनी बार छटपटाई, उतनी बार तिलमिलाई. उतनी बार हाँथ-पाँव पटके.
बार-बार सर उठा आगे देखा –
कुछ तो होगा जिसका मुझे इंतजार है !
कोई तो होगा जिसे मेरा इंतजार है !
पर नहीं … रत्ती को सिर्फ रत्ती का इंतजार था.
रत्ती कितनी बार सोचती
“वह ताप कहाँ है, वह आग जो इस जमे हुए को पिघला सके … लेकिन यह पथरीली अहल्या अड़ी कड़ी चट्टान की तरह, हर बार की टकराहट से न पिघलती है, न टूटती है! न छोटी होती है, न बड़ी !… आँख में जितने आकार दिखे अपने भीतरी खोल पर उतने ही रफू और पेबन्द.”
राजन जिससे बरस भर का परिचय था उसे भी वह मना करते हुए कहती है;
“मुझे तुमसे माफ़ी मांगनी है राजन … वह एक काला जहरीला क्षण हर बार मुझे झपट लेता है और मैं काठ हो जाती हूँ”और एक साल के आत्मीय परिचय के बाद जब राजन को वो नहीं मिलता जो एक स्त्री से पुरुष चाहता है तो वह भी अपनी कुंठा उसपे यह कह के निकल देता है कि;
“मुझे हमेशा शक था, तुम औरत हो भी कि नहीं!”

साभार गूगल

जब रत्ती को श्रीपत से लगता है कि वह भी कुछ है और उसकी भी देहरी पर से कुछ उठाया जा सकता है तो वह उसकी और खिचती है पर यह भान होने पर की श्रीपत पर ‘उना’ का अधिकार है तब वह स्वयम ही हट जाती है पर उसका मन फिर उसके खालीपन को धिक्कारता है वह आत्मालाप करती है;
 “रत्ती, तुम्हारे पास अपना कोई पुण्य नहीं. तुम जमे हुए अँधेरे की वह परत हो जो कभी उजागर नहीं होगी. हो सकती तो श्रीपत क्या ऐसी चाहत को रख कर तुम्ही पर छिड़क सकते ?”
अपने अकेले क्षणों में वह खुद की ही आलोचना करती रहती है दिवाकर से वह कहती है;
“जिसके पास मीलों लम्बा एकांत हो, वह अकेले में अपने लिए अपने को क्यों न पढता रहेगा. दिवाकर अकेले में कोई क्या से क्या हो जाता है यह सिर्फ देखकर पता नहीं पाया जा सकता है” 
पर दिवाकर ने उसके अन्तरंग का टेलीफोन नम्बर तलाश लिया था. रत्ती को जब ये लगता है की वह उतरती बरखा है तब उसे दिवाकर विश्वास दिलाता है कि;
 “जो कहना चाहता हूँ नही कहूँगा रत्ती! इसलिए की मैं उसे सच करना चाहता हूँ”
दिवाकर के सानिध्य में रतिका खुद को पढ़ती है. जिसने इतना अकाल जाना, इतना रुखा और अंधेरा भी, फिर भी उसमें कुछ बाकी है. उसका आत्मालाप;
 “रतिका तुमने सर उठा अपने लिए अपनी लड़ाई लड़ी है. कड़वाहट के ज़हर से अपने को अपना दुश्मन नहीं बनाया. दोस्त नहीं मिला तो भी दोस्ती को दुश्मनी नहीं समझा .तुम एक अच्छी लड़की. प्यारी और बहादुर.”
उसे असद की बात याद हो आयी पर ‘प्रीति’ का सोच कर दिवाकर से यह कह कर दूर हो जाती है कि;
   “मैं जुड़े हुए को नहीं तोडूंगी.विभाजन नहीं करुँगी. मेरी देह अब तुम्हारी प्रार्थना है.”  और वह फिर अकेली है पर बिना श्राप के, बिना अधूरेपन के, बिना खालीपन के पर वह अकेली है क्यों की आकाश में न घरौंदे बनते है न धरती के फुल खिलते है.

कृष्णा सोबती ने रत्ती जैसे पात्र की सर्जना कर के हिंदी साहित्य को एक ऐसी नायिका दी है जो सेक्स मनोग्रंथि से ग्रस्त होते हुए भी आत्मिक रूप से सशक्त है. पुरुष जिसके लिए अवरोधक के सामान नहीं बल्कि आलोचक के रूप में आते हैं , जो सिर्फ उसके दोष ही नहीं, उसके गुण भी देखते हैं और जिन गुणों को वह स्वयं भूल गयी है उसे याद भी दिलाते हैं. रत्ती ने बहुत  कुछ बर्दास्त किया  है पर फिर भी उसने अपनी अच्छाई बनाये रखी है. रत्ती कभी कोई गलत कदम नहीं उठाती, वह अपने आत्म विश्लेषण से ही स्थिति के अनुरूप कार्य का चुनाव करती है और इस रूप में वह हिंदी साहित्य की सशक्त नारी पात्र है.

स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति

इंदिरा गांधी 


अनुवाद : कुइलिन काकोति


आज भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी की जयंती है. इस अवसर पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनका एक भाषण . यह भाषण आल इण्डिया वीमेंस कांफ्रेंस भवन के उदघाटन अवसर पर 26 मार्च 1980 को दिया गया था. 

लोगों के बीच इंदिरा गांधी



पिछले कई दशकों से आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेंस भारतीय महिलाओं का संगठित आवाज बनी हुई है. मैं कभी किसी महिला संगठन की सदस्य नहीं बनी, लेकिन मेरी काफी दिलचस्पी उनकी गतिविधियों को जानने में रही है , और जब भी संभव हुआ है मैंने अपनी ओर से उनकी मदद की है .

मुझे खुशी है कि लम्बे समय के बाद आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेंस का अपना घर है और उसका नामकरण हमारे समय की सबसे उल्लेखनीय महिला सरोजिनी नायडू के नाम पर किया गया है . सरोजिनी नायडू, जो अपने भीतर से तो कोमल स्त्री थीं,  लेकिन पुरुष प्रधान समाज में उन्होंने  अपनी उपस्थिति दर्ज कराई –लेखन और राजनीति दोनो में.

1980 में आगा खान पति-पत्नी के साथ इंदिरा गांधी

इस अवसर के महत्व को बढाने और इसे अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए हमारे बीच हमने ‘हिज हायनेस आगा खान’ और ‘हर हायनेस बेगम आगा खान’ को आमंत्रित किया है. ये भारत के दोस्त हैं और इन्होने शिक्षा , स्वास्थ्य और अन्य कल्याणकारी परियोजनायें यहाँ शुरू की हैं या कई परियोजनाओं में मदद की है.

मैं अपने सामने कई प्रसिद्ध महिलाओं को देख रही हूँ, जिन्होंने समाज सेवा, शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, क़ानून आदि विभिन्न क्षेत्र, और हाँ , राजनीति में भी, अपने आपको प्रतिष्ठित किया है. ये लोग भी इस भवन के निर्माण कार्य को पूरा देखकर प्रसन्न हैं. मैं अक्सर कहती हूँ कि मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ. फिर भी पीछे छूट गये लोगों, सुविधाविहीन लोगों , के प्रति अपनी चिंताओं में  से महिलाओं को कैसे नजरअंदाज कर सकती हूँ, जिनको इतिहास के प्रारंभ से ही शासित किया गया है और क़ानून एवं सामाजिक रीतियों में जिनके खिलाफ भेदभाव किया गया है. दुनिया की सारी भाषाओं की शब्दावली यह बताती है कि पुरुष-श्रेष्ठता की भावना कितना व्यापक और घातक है. और इस तथ्य से कुछ लोगों को छोड़कर, सब,  बिना किसी शंका के सहमत भी हैं. इस वक्त मैं ‘ वर्ल्ड एंड वीमेन’ नामक एक किताब पढ़ रही हूँ. इसमें मैंने पढ़ा कि यू एस ए के मिल्स कॉलेज के प्रेसिडेंट मि.लिंग व्हाईट ने पुल्लिंग सर्वनामों के बारे में क्या लिखा है. मैं उन्हें ही उधृत कर रही हूँ, ‘ औरत के रूप में बड़ी हो रही छोटी लडकियों में भाषा की आदत दूसरे लोगों ( महिलाओं सहित) की तुलना में ज्यादा गहरी होती है. यह बताता है कि व्यक्तिव मूलतः पौरुष भाव है और महिलायें मानव की उप-प्रजाति हैं.’ लेखक आगे कहते हैं कि ‘ अब समय आ गया है कि हम समझें कि ये मूर्खता पूर्ण स्टीरियोटाइप हमें कहाँ ले जा रहा है. ये स्टीरियोटाइप बताते हैं किपुरुष नेता है और स्त्री उसकी अनुगामी, पुरुष उत्पादक है और स्त्री उपभोक्ता, पुरुष शक्ति है और स्त्री कमजोरी- यही वह धारणा है, निर्मिति है, जो पुरुष को आक्रामक बनाती है और मानवता को उसका पीड़ित.’

युवा इंदिरा गांधी

इस तरह महिलाओं को बहिष्कृत करके पुरुष ने खुद को पूर्ण मुक्ति और विकास से खुद ही वंचित कर लिया है.
पश्चिमी देशों में महिलाओं की तथाकथित मुक्ति का मतलब पुरुषों के अनुकरण तक सीमित हो गया है. लेकिन मुझे लगता है कि यह एक गुलामी से निकलकर दूसरी गुलामी में फंसने जैसा है. मुक्त होने के लिए स्त्री को सबसे पहले वह होना पडेगा, जो वह है, यानी पुरुष की प्रतिद्वंद्विता में नहीं बल्कि अपनी खुद की क्षमता और अपने व्यक्तिव के परिप्रेक्ष्य में. हम महिलाओं को अधिक सचेत, अधिक सक्रिय और अधिक तत्पर देखना चाहते हैं , इसलिए नहीं कि वे  महिला हैं  , इसलिए कि वे आबादी का आधा हिस्सा हैं. उन्हें पसंद हो या न हो, लेकिन वे अपनी जिम्मेवारियों से भाग नहीं सकतीं और न ही उन्हें इसके लाभ से वंचित किया जा सकता है. भारतीय महिलायें पारम्परिक रूप से रूढ़िवादी हैं , लेकिन वे समन्वय के गुणों से सम्पन्न है – अनुकूलित करने के , आत्मसात करने के गुणों से सम्पन्न. यही उनको दुखों के सामना के लिए और कठिनाइयों से शांतिपूर्वक जूझने के लिए लचीला बनाते हैं, निरंतर परिवर्तित होने,  फिर भी अपरिवर्तित रहने की क्षमता देते हैं, यह भारत का अपना गुण भी है.

पिता के साथ इंदिरा गांधी

इस समय की सबसे बड़े मुद्दे हैं : पहला, आर्थिक और सामाजिक असामनता तथा समृद्ध और विकाशील देशों के बीच अन्याय तथा इन देशों के भीतर के अन्याय, दूसरा, क्या मानव – बुद्धि मृत्यु की होड़ को ख़त्म कर सकेगी,जिसमें वर्चस्व की कामना अनेक तरीकों से व्यक्त होती है – सबसे खतरनाक है, शस्त्रों की होड़  और तीसरा , हमारी अपनी धरती को इंसान की लालच और शोषण से बचाने की जरूरत. हम बहुत देर से प्रकृति के संतुलन और इसके संसाधनों पर अपनी निर्भरता के प्राचीन सत्य के प्रति सजग हो पाये हैं.

इस बड़ी चुनौती का सामना कोई एक सेक्शन अकेले नहीं कर सकता है, चाहे वह कितना ही विकसित क्यों न हो, ख़ासकर जब दूसरे या तो दूसरी दिशा में गतिशील हों या उदासीन हों. कोशिश सार्वभौम होनी चाहिए, सजग और ठोस, यह समझते हुए कि इसमें योगदान के लिए कोई छोटा नहीं है. यह सभी राष्ट्रीयताओं, सभी वर्गों, धर्मों, जाति और लिंग के संयुक्त प्रयास से संभव है.

पारिवारिक फोटोग्राफ में इंदिरा गांधी ( छोटी )

मारे पास व्यर्थ जाया करने के लिए समय नहीं है, इसमें शिक्षित करने की जबरदस्त जिम्मेवारी की जरूरत है. हम एक साथ बढना चाहते हैं, सबके साथ कदमताल से, लेकिन यदि पुरुष संकोच करते हैं, तो क्या महिलाओं को रास्ता नहीं दिखाना चाहिए?

आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस को, ख़ासकर इसकी प्रेसिडेंट श्रीमती लक्ष्मी रघुरमैय्या को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई देते हुए मैं इस भवन को राष्ट्र के नाम समर्पित करती हूँ.

लाजवन्ती

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प्रो.परिमळा अंबेकर

हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677

लाजवन्ती….!!  हाॅं … उसका नाम लाजवन्ती था … । अपने नाम से कोसो दूर खडी , अपने ही नाम से ठिठोली करती हुई …लाजवन्ती !! यह लाज भी बडी अजीब चीज है … न जाने इस शब्द में  क्या जादू है…. बस बंध जाती है खूॅंटे से … दुपट्टे से, चुनरी से…. !! दुपट्टा या चुनरी के लहराते झालर से टंगे, गले का फंदा बनती बनने में देर नहीं   लगती… ! देह के पोर पोर से रिसती है… अंगराग की तरह … बंधा बंधा ढका ढका ….खुशबुदार… !! लेकिन जब खुला खुला….टूटा टूटा….तो… बदबूदार ..!! सब मन और आंख पर लगा अंजन कहिये !! लेकिन मेरी लाजवन्ती तो, अपने पालने के गद्दी के सात परतों के नीचे, उबले चने और पान सुपारी के साथ ही , लाज को भी तह कर रक्ख आयी थी । पालने के संस्कारों को पालने में ही रस्सी के संग झूलते छोड, उतर आयी थी नीचे…नीचे..स्वतंत्र और उन्मुक्त … !! उसकी चालाकी बचपन से ही चलने लगी थी.. !! माॅं,  दादी की मीठी घुट्टी की कडवाहट को, उनके अनदेखे, कै कर लिया होगा लाजवन्ती ने … !!

खैर अब मैं बताने जा रही हूॅं इसी लाजवंती के लाजभरे …   नहीं नहीं ….  लाजमारे किस्से .. !! जोर जोर से ठहाके मारकर हॅंसतीं और  अपने दोनो हथेलियों में होठ  और नाक को भरते , मुॅंह छुपाये… खिसियाहट की हॅंसी भी हॅंसती । ऐसी हॅसी उसकी फैली आॅंख की पुतलियों के मटकने से पता चलता । लाजवंती हमेशा, हमारे बीच होती, लेकिन उसका हॅंसना- बोलना जैसे हमारे बीच होते हुए भी हमारे साथ का नहीं लगता था मुझे। लगता, उसके बोलने की आवाज किसी और के ही कान से जा टकरा रही हैं । उसके चेहरे की मुस्कुराहट की महक किसी और के चेहरे पर, ठंडी सुकून बनकर पसर रही है । उसकी कनखियों के तीर के अहसास से, किसी और के ही शब्दों को अर्थ मिल रहे हैं !!

शायद छठी कक्षा में हम पढते थे । हम लडके और लडकियों के बीच, वह लाजवन्ती कुछ अलग- अलग ही लगती । हमसे भी उसके बडे होने के कोई  दैहिक प्रमाण तो नहीं थे , क्यूॅंकि कद -काठी से लगभग सामान्य थी । सुक्की, गोरी चिट्टी । सदा हॅंसी से खिंचे- खिंचे उसके मुॅंह के आख, कान नाक में सबसे विशिष्ठ रहे थे, उसके गुलाबी मॅसुडे और उनमें उग आयीं झक्क सफेद दाॅंत !! जो समय-बेसमय खिले मिलते। उम्र में हमसे उसका बडी होने का सच्चा – मुच्चा चिठ्ठा तब सामने आया जब वह सचमुच में बडी हो गयी थी । टीचर के पूछनेपर उसके मोहल्ले की लडकियाॅं , अस्फुट इशारों से आपस में ऐसे देखती जैसे किसी गहरे राज को छिपाने का जिम्मा ले रक्खी हों । उसके बाद लाजवन्ती का स्कूल आना बंद हो गया ।

लाजवन्ती का स्कूल न आना… सबसे ज्यादा मुझे अखरने लगा । ठुड्डी को हथेलियों में धरे, हर हमेशा , खिडकी के पार देखते, बेंच पर मेरे बगल में बैठी  लाजवन्ती का चेहरा अचानक खिल जाता । झट सर  घुमाकर मेरी ओर देखती । उस समय , उसका चेहरा मुझे अजीब अजीब सा लगता ….!! खिडकी और मेरे बीच पंेडुलम की तरह उसकी सर तब तक सटकता अटकता रहती, जब तक की बाहर दोपहर के खाने की घंटी न बजती। छठी क्लास के लगभग पंद्रह सोलह लडकियों में उसने मेरे चेहरे पर ऐसा क्या पढ लिया था पता नहीं !! बिना ना नुकर किये मैं भी कबीर की मुतिया की तरह बस हो लेती उसके पीछे….‘‘गले राम  की जेवडी, जिथ खैंचे तित जाउॅं ‘‘। जैसे ही घंटी बजती, यह लाजवंती मेरे दोनों हथेलियों को अपनी मुठियों में कसकर भींचती और मुझे लिये तब तक दौडते रहती जब तक कि, दूर… किसी निश्चित जगह पर वह….खडा नहीं दीख पडता…!  लंबा ,  काले बालों वाला आशिकाना डील -डौल का लडका, चलते हीरो की फैंशन का क्राफ काढे, मुंडी तिरछी किये हुये…., लाजवन्ती के आने के मार्ग को  निहारता हुआ !!

पता नहीं अपने स्कर्ट की जेब में वह कागज का टुकडा कब रक्खे रखती ।  क्षण में, अपने जेब से कागज के टुकडे को मुठ्ठी में भींचकर, मुझे वहीं छोड उसकी ओर दौडते जाती…कागज का गोला बनाती और उसकी हथेली में यह खुद रखती या वही अपना हथेली आगे बढाता, दूर खडे मुझे पता नहीं चलता था … !! पढे बेपढे सभी ढंग के बच्चों की लिखावट जांच जांचकर धारखायी मेरी बुजद्धी आज तक इस सवाल का उत्तर खोज नहीं सकी… आखिर किसी भी लजैग्वेज की एबीसीडी न लिख सकने वाली मेरी लाजवंती , रोज उस लडके को थमाने वाले कागज के टुकडों में लिखा क्या होगा.. ? और लिखा कैसे होगा….? लेकिन बात इतनी तो पक्की होती, दूसरे दिन वह लाजवंती के कागज में उधृत कोडवर्ड का सिरा पकडे पकडे निर्दिष्ट जगह पर रास्ता ताकता जरूर मिल जाता … !!

आज मुझे लगता है….लाजवंती के हाथों से गुदे वे कागज के टुकडे , कोरे कागज के टुकडे नहीं बल्कि, बिना राजमद्रा के वे राजपत्र थे , जिनका किसी भी ढंग से दुरूपयोग होने की गुजाइश ही नहीं । भला उन अलिखित, लिखे पत्रो का शिनाख्त कौन करें … उनका मजमून की जानकारी आये भी तो कैसे आये ? किसे आये …? कागज का हस्तांतर होने की देरी ही नहीं थी, उसी रफ्तार मे मुझे लेकर दौडती,  मुझे लिये लिये स्कूल की ओर लौट पडती । अपना डब्बा खोले खाने बैठे लडकियों की बंदगोले में , ठूॅंसते ठूॅंसाते, जगह बना लेती और मुझे भी लेकर खाने बैठ जाती । चेहरे पर कोई  भाव नहीं कोयी रेशा नहीं … जैसे कुछ हुआ ही नहीं । यह सारा काम अंजाम पर ऐसे पहुॅंचता , जैसे कोई खुफिया मिशन का डेमो चलपडा हो । कभी कागज का गोला, कभी रंगीन पन्नी चढा कवर, कभी यह -कभी वह… चीजों के साथ साथ उनके मिलने की जगह भी  बदलती रही । कभी किले के भीतर का फाटक, कभी किले का बीचों बीचवाला मस्जिद, कभी किले मे भीतरी दीवाले से सटेखडे, घरों की ढिबरियों का आड…. । लाजवंती की दोस्ती का फायदा आज मुझे दो ढंग से दिखता है । एक है अपने स्कूल के सामने सदियों से सीना ताने मौन खडे बहमनी किले के हर पत्थर और सूरत की ऐतिहासिक जानकारी  …. और दूसरा पढते-पढाते समय, अपने सामने खडे हर अपढ बच्चों में लाजवंती के चेहरे का झलक जाना ।  लाजवंती के दिग्दर्शन में चलने वाला वह ड्रामा जैसे भव्य संकलत्रय के सिद्धांत को याद दिला जाता । नाटक के पात्र, काल और घटना के बंदोबस्त की तरह । वही पात्र, वही घटना और वही समय.. ।  इनके मध्य गिट्टी पिट्टी सी घूमती … गले राम की जेबडी पहनी … मैं !

आज से लगभग बयालीस चालीस बरस के पहले की बात है । गुलबर्गा, शहाबाजार नाके के पास का अपना स्कूल , कब्रीस्तान के बगल में खडा-खडा सामने के बहमनी किले के बियाबान को सदा निहारते रहता । शहाबजार नाका, चुंगी नाका भी कहलाता है। जिस स्कूल मे हम पढते थे उस स्कूल की हस्ती बस इतनी सी थी कि वह अपने नाम से कम लेकिन, चुंगीनाका के परिचय से अधिक पहचाना जाता रहा।  सामने के चौरस्ते की सडकें, लोगो को जिन अलग अलग दिशाओं में ले जातीं, बाई  दिशा में जाने वाली उन्हीं सडको के दायें फैलाव में राजपूतो की घनी बस्ती थी । वहीं था लाजवंती का घर । अपने स्कूल के लगभग सारी लडकियाॅं या तो इन राजपूत बस्तियों से थी या, आगे जाकर खुलनेवाले , लकडी का सामिल लगाये बैठे गुजरातियों के घरों से थीं । इन सारी लडकियों का इस स्कूल में पढने के पीछे एक मात्र कारण था कि  वह उनके बस्तियों के अधिक पास बना था ।

 मैं ही ऐसी थी,  जिसका नाता स्कूल के आसपास के किसी बस्ती या इलाके से नहीं था । कोसों दूर से आधे बस के रास्ते , आधे पैर के रास्ते चलकर मुझे हरदिन स्कूल आना पडता था । खैर लाजवन्ती को मेरा, अपने जातीय बंद इलाके से बाहर का होना , अधिक सेक्योर और सहायक लगा होगा । साथ ही उसने मेरे चेहरे पर की लकीरों में बनते एक दो और वाक्यों को पढ भी लिया था शायद-यानी, इन तमाम मामलों में की मेरी सामाजिक , बौद्धिक नासमझी , और हो न हो… सुआमन तोते जैसी मेरा दिले -खुशी सा जिगर का  रखना । जब किसी दिन , किले के भीतरी गली के मोडपर, या किले के गुंबज के पास , या किले के भीतरी डिबरियों के छोर के नीम के पेड के तले……. निश्चित जगह पर वह दिखाई नहीं पडता तो, लाजवंती से अधिक सुआ तोते की तरह पस्त मैं हो जाती । लाजवन्ती का चेहरा ? सपाट, भाव रहित । लेकिन इस सपाटपन को चेहरे पर टंगाये वह मस्त रहती भीतर से । मिलन के नये- नये पैतरें खोजने के जश्न में डूबी डूबी !!

न फोन न मोबाइल, मिलने के प्लान लाजवंती के खुफिया दिमाग में ऐसे आकार लेते जाते जैसे चोरगुंबज के किस्से… !!  कभी कभी जान बूझकर, निश्चित गली के  मोड को छोडकर पिछली गली के छोरपर मुझे लेकर खडी हरती। झांक- झांक कर उस लडके की परेशानी भरे हरकतों को देखते जाती, और अपने गुलाबी मसूडे खिलाते जाती । अपने समय के यारों की सिनमेटि छौंक के स्टीरियो टाइप प्रेम से दूर लाजवन्ती के लिये तो प्रेम….? बस… मुहम्मद बाजी प्रेम का ज्यूॅं भावै त्यॅूं खेल !!

आजकल, केवल लाजवन्ती ही नहीं, वह लडका भी मेरे चेहरे की लकीरों को पढने लग गया था । उस दिन, पंद्रह अगस्त… !! स्कूल के कार्यक्रम के बाद हमें  सीधे पुलिस ग्राडंड जाना था । स्कूल के सामने के स्टैंड से हमें स्टेशन की ओर जानेवाली बस पकडनी थी ।  ताकि पुराने अस्पताल के स्टाॅप पर उतरकर , दो कोस की दूरी पर के पुलिस ग्राउंड चलते जा सकें । बस की पिछली डोर से सटी सीटपर कब्जा जमा लिया था लाजवन्ती  ने । खिडकी के सीट पर बैठे उसके गुलाबी मसूडे अचानक फिर उजागर हो गये । बगल की सीट से मैने देखा, बस के आगे की दरवाजे की रेलिंग पकडे वह लडका बाहर की ओर हवा में झूल रहा है । इस अंदाज में कि उसका लंबा छरहरा सांवला देह, हवा के बहाव के साथ पीछे की खिडकी से बहकर आ जाय, जहाॅं लाजवन्ती बैठी थी । हरेक स्टाॅप पर जब बस रूकती, नीचे उतरकर वह, हवा के झोंके से बिखरे बालों को और बेलबाॅटम पैंट के क्रीज को एकसाथ संवारता । बस सुपर मार्केट स्टाॅप पार कर जगत तक पहुॅंची ही न थी, उसकी निरीह आॅंखें मेरी ओर पलटीं । मैने देखा, लाजवन्ती खिडकी की सीट से उठकर कहीं और चली गयी थी। आये दिन ये घटनाएं नाटक के रिहर्सल की गलतियों की तरह गाहे – बगाहे  दुहराये जाने  लग गये थे । और मैं पिंजर में कैद सुये सी फडफडाकर रह जाती ।

उस दिन लाजवन्ती स्कूल आयी थी । आखिरी बार । मैने सोचा था , बडी होने के बाद उसने स्कूल छोड ही दिया है । खाने की छुट्टी में लाजवन्ती मुझे  बजाय कहीं और ले जाये , अपने घर ले गयी थी । बाहर बैठक में कुर्सी पर बैठी मैं एक साथ घर के बाहर का और भीतर का नजारा देख रही थी । घर का आंतरिक सजावट और भीतरी गंध कुछ और ही कहानी कह रहे थे । लाजवंती की तय की गयी ब्याह की कहानी । माॅं के दिये लड्डू और चूरमे का खाने की ही देरी थी , ताक में बैठी लाजवन्ती मौका पाकर, मेरा हाथ थामें दौडते हुए, दरवाजे के बाहर निकल पडी । अगली गली के उस सुनसान मोड पर ले गयी ,जहाॅं वह खडा था, उसी अंदाज में …तिरछा सिर किये उसके आने के इंतजार में । आज वह अपने कान से मर्फी  रेडियों सटाये खडा था ।  जिससे फिल्म का गीत बजता सुनायी पड रहा था ‘‘ तेरी गलियों में ना रक्खेंगे कदम… आ…ज के बाद… तेरे मिलने को न आयेंगे सनम… आ….ज के बाद …‘‘ मै…दूर खडी थी, वही कागज का गोला, उसकी  हथेली पर … इस बार भी मुझे पता नहीं चल सका कि कागज के गोले को लाजवन्ती ने ही उसके हथेली पर रक्खा, या उसने अपना हाथ आगे बढाया था ….!! लौटते लाजवन्ती के चेहरे पर वही गुलाबी मसूडे खिले हुये थे… उन मसूडों को आदत जो पडी हुई  थी मौके बेमौके खिलने की !! लेकिन… फर्क जरूर मैने महसूस किया । उसदिन उसका चेहरा , अजीब -अजीब सा नहीं लगा मुझे !!
2
इत्तेफाक से लाजवन्ती मुझे फिर मिली चालीस बयालीस साल बाद…. !! शाहबजार के दुर्गामंदिर की पूजा में । दशहरे की झाॅंकी देखने आयी थी लाजवन्ती । वही हॅंसी । वही अंदाज ..!! उम्र की ढलान पर खडी… पर खिली खिली ! उसे पहेचानने की ही देरी थी… अबकी बार उसका हाथ पकडे , मैं दौड पडी, भीड से बाहर … ! मेरी आॅंखों में गहराते -उछलते भाव को लाजवन्ती ने भाप लिया । आदतन , हथेलियों से होंठ और नाक को ओट दिया , और खिसयाकर हॅंसने लगी ।  पुतलियों को बरबस फैलाया और एक अजीब कोण में सिर को उठाते हुए मुझसे पूछा ‘‘ पम्मो…तुझे वो सब याद है.. ? ‘‘ उसने… इस अंदाज में पूछा, जैसे कि वह सब कुछ मेरा किया कराया हो !! इस बार मैने भी अचूक वार किया । अपनी आवाज को एक विशेष अंदाज में दबाते पूछा ‘‘ लाज्जो ….. तेरे वो कागज के गोलों का क्या हुआ… ? सुनकर छूट पडी लाजवंती के ठहाके का स्केल , आवाज में तो बहुत ऊंचा था  लेकिन….. उसके भीतर जमी पडी सीलन की ठंडाई को हमने  महेसूस किया, आपस में महेसूस किया ।
और…. और क्या था ? मेरी हथेलियाॅं उसकी मुठ्ठी में, उसी विशेष अंदाज में दबने लगीं… उसका चेहरा पूरा गुलाबी मसूडों की आभा से भरने लगा …उसके झक्क सफेद दाॅंत..! मैने देखा, अबकी बार, उसमें मिस्सी की गहरी कलई  चढी थी । और भीतर मंदिर में , दुर्गा पूजा की घंटियाॅं बजने लगीं ….  !!