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अलकनंदा साने की कविताएं

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अलकनंदा साने 

हिंदी – मराठी में समान रूप से लेखन एवं इस क्षेत्र में लगभग ४५ वर्षों से सक्रिय
हिंदी मराठी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,रिपोतार्ज,आलेख, साक्षात्कार प्रकाशित. संपर्क :alknanda31@gmail.com

१. 
मैं अक्सर  स्त्री विमर्श की बात करती हूँ
मैं बताती रहती हूँ सरेआम
कि मेरे घर के पुरुष
काम में हाथ नहीं बंटाते
कि मुझे एकाध बार लेना पड़ती है
कहीं जाने की अनुमति
कि बच्चे की बीमारी में
रुकना पड़ता है मुझे ही घर पर
या कि मेहमानों का जिम्मा होता है
अंतत:मुझ पर .

रिश्तेदारी निभाना
लगती है मुझे महति जिम्मेदारी
मुझे ही देखना पड़ता है
कितना बाकी है महीना
और कितनी शेष है
दाल-चावल,भाजी-तरकारी.

पृथ्वी की तरह
अपनी ही धुरी पर
आत्म मुग्ध घूमती रहती हूँ
और सूर्य के आसपास रहने से
मिलती है जो ऊर्जा,ऊष्मा
उसे ताप कहकर खारिज करती रहती हूँ

उस समय मुझे नहीं याद आती
गढ़ चिरोली के जंगलों में रहनेवाली
वह आदिवासिन
जो हर महीने उन दिनों
चिथड़ों में रेत भरकर बांधती है
सृजन की रक्तिम बूंदों को
और निकल पड़ती है लकड़ी बीनने

मैं कमाठीपुरा की
उन औरतों को भी भूल जाती हूँ
जो बिकती हैं, सब्जी-भाजी की तरह
उन्हें बैठने की अनुमति नहीं होती
मेरे हमाम से भी कम जगह में
ठूंस-ठूंसकर खड़ा किया जाता है उन्हें
और  आवाज दे-देकर
बिकवाती हैं  खुद ही, खुद को ताजा कह-कहकर

मैं भूल जाती हूँ उस औरत को भी
जिसका आदमी उसकी योनि पर
ताला लगाकर जाता है दिहाड़ी पर

मैं अपने घर से निकलकर पहुँच जाती हूँ
कहीं भी इत्मीनान से
भाषण झाड़ने, जोश खरोश से
गिनवाती हूँ अपनी तकलीफें
वृहद आकार में
और बटोरती हूँ तालियां दर्जनों में

क्या मैं सचमुच जानती हूँ स्त्री के दुःख को
क्या मुझे पता है
कैसे होता है
बिना घर के, बिना दीवार के
बिना प्रेम के, बिना सुरक्षा के रहना
बिना आशा के, बिना विश्वास के जीना

बेहद आसान है
अख़बार के शीर्षकों में बने रहना
पर बिलकुल भी आसान नहीं है
मुड़ी-तुड़ी चिन्दियों की तरह
किसी अँधेरे कोने में पड़े रहना

साभार गूगल

२.
मैं कम्प्यूटर पर काम करती हूँ
तब वह अपने पल्लू को
बेवजह ठीक करते हुए
झांककर देखती है स्क्रीन को
और मेरा प्रोफाइल फोटो देखकर
खुश हो जाती है.

मेरे पैरों के नीचे से
आहिस्ता से झाड़ू निकालते हुए
कहती है-आपका अख़बार में छपा फोटु
दिखाया था तेरह नंबर वाली दीदी ने

मैं धीरे से, नपी तुली मुस्कान के साथ
गर्दन हिलाती हूँ
तभी घनघनाती है घंटी
कहती हूँ– जरा उठाना उसे
उठाकर देते हुए उसकी नजर
मेरे कीमती मोबाईल,
नर्म मुलायम हथेली
और नेल पेंट से रंगे नाखूनों पर होती है

यकायक बोल उठती है,
नाटक के स्वगत की तरह
मुझे भी पढ़ना था
पर नहान आते ही
भेज दिया उन लोगों ने यहाँ
पढाई की बात को इम्प्रोवाइज करती है
और बताने लगती है
जेठ-ननदोई की बुरी नजर के बारे में
उसके सारे सम्बोधन
सिमटे रहते हैं
‘इन लोग’ और ‘उन लोग’ में

उसे भरम है
कि पढ़ी लिखी होती
तो शायद ‘इनका’ और ‘उनका’
विरोध कर पाती
बुरी नजर से बची रह पाती

मैं उसका भरम तोडना नहीं चाहती
उसे नहीं बताती
कि नहान आने पर
उसके लोगों में और मेरे लोगों में
कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता
नर्म, मुलायम,रंगी-पुती उँगलियाँ
की बोर्ड पर चले या चकले पर
कुत्तों और भेड़ियों की नजर नहीं बदलती
अख़बार में छपा फोटो
सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता

मैं उसे यह भी नहीं बताती
कि उनकी समाजवादी नजर में
उसके और मेरे अलग होने का कोई अर्थ नहीं होता
साक्षर/निरक्षर होना कोई मायने नहीं रखता
उनके लिए
नहान आने के बाद
लड़की का स्त्री में बदल जाना ही
सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है

३.
सोचती हूँ
किसी दिन निकल जाऊं
घर छोड़कर
बहुत हुआ भटकना
मन के बियाबान में
अब काया  को दिखाऊं
असलीवाला जंगल
और पता करूँ
कैसे होता है, बिना छत के रहना

सोचती हूँ
किसी दिन कुछ भी न पकाऊं
सो जाऊं ऐसे ही
घुटने पेट के पास मोड़कर
महसूस करूँ भूख को
जिसे बहुत पढ़ा है
अख़बारों में, किताबों में,कहानियों में

सोचती तो यह भी  हूँ
कि जब भी निकलूं घर से
निर्वसन ही रहूँ
जानूं कि कैसे होता है
धूप में जलना, बारिश में भींगना,
ठण्ड से सिहरना

बहुत बखान सुना है
रोटी,कपड़ा और मकान का
पर  जानती हूँ
भूखी तो रह लूंगी कुछ दिन
और बिना छत के भी
पर निर्वस्त्र होना आसान नहीं है

बहुत मुश्किल  होता है
वर्धमान से महावीर हो पाना !!!

४.

परिवहन निगम की
बसों की तरह
जब ठसाठस भर गईं अलमारियां
तो किताबें चुपचाप बाहर निकल आईं
और अपने लिए जगह बना ली
पलंग के कोने पर
खाने की मेज पर
सोफे के हत्थों पर
यहाँ तक कि फ्रिज पर भी
और रच बस गईं सहजता से
जैसे रम जाता है कोई आप्रवासी
नए शहर में

किताबों को पता था
कि रेशमी साड़ियां और असली-नकली गहने
अविव्य* की तरह
अलमारियों में भले जगह पा लें
पर रास नहीं आएगी  उन्हें
बाहर की दुनिया

अविव्य बंद रहेंगे सदा खोल में
और किताबें, आम आदमी की तरह
घूमेंगी निर्द्वंद्व पूरे जगत में
उन्हें जरूरत नहीं होगी
किसी प्रहरी की

साडी और गहने बाहर निकले भी तो
बनी रहेगी हमेशा  एक दूरी,
किताबों के लिए आसान होता है
साधारण आदमी की तरह घुलना-मिलना
और ह्रदय से सम्मानित होना
एक अनपढ़ भी
सर माथे रखता है किताबों को
और ख़ौफ़ खाता है
आभूषण और आभरणों से

किताबें नहीं घबराती परिवर्तन से
बाहर नहीं होती कभी चलन से
उनका स्थान पक्का होता है
और पक्का होता है मान-सम्मान
उनका पुराना होते जाना
किसी बुजुर्ग-सी हैसियत पाता है
और उन्हें भय नहीं होता
जीर्ण होते जाने का

यहाँ-वहां बिखरी किताबें
और उनका साथ
निर्भय बनाता है हमें
गहरी नींद में सुलाता है
गहने डराते हैं, सोने नहीं देते

इन दिनों मैंने ख़ारिज कर दिया है
किताबों के लिए एक अलग
अलमारी का प्रस्ताव
मुझे नापसंद है किसी का
अवि होते जाना !!!

*अति विशिष्ट व्यक्ति

साभार गूगल

5. 
मेरे सलोने चेहरे को
और सुन्दर बनाने के लिए
ठुड्डी पकड़कर ,
माँ ने लगा दी थी छोटी-सी बिंदी
तब तुम कहीं आस-पास भी नहीं थे

पिता की उंगली पकड़कर मेले में घूमते हुए
जब मै मचली थी
कांच की रंगीन चूड़ियों के लिए
तुम तब भी कहीं नहीं थे

फिर मेरी बिंदी और चूड़ियों का स्वामित्व
तुम्हारे पास कैसे चला गया ?

6. 

तुम आते रहे हमेशा  मेरे द्वार
अलग-अलग स्वांग रचाकर

कभी सूरज, कभी चंदा,
कभी विष्णु,कभी शिव
कभी राम, कभी कृष्ण
कभी याज्ञवल्क्य , तो कभी गौतम

तुम्हारे लिए मै कभी अदिति बनी, कभी रोहिणी
कभी लक्ष्मी बनी, कभी पार्वती
कभी सीता बनी तो कभी राधा
कभी गार्गी, कभी अहल्या
और मुझे जबाला बनाना तो सबसे आसान रहा तुम्हारे लिए

हर युग में तुमने मुझे तदर्थ ही लिया
और मै निभाती रही संविदा की तरह
तुम्हारे नियमों को

कभी सोचो मुझे देह से परे
और जान लो
कि इक्कीस ग्राम की आत्मा
रहती है मुझमें  भी

7.

लड़की जात हो—-ठठाकर मत हँसो
लड़की जात हो—-पैर फैलाकर मत बैठो
लड़की जात हो—-तनकर मत चलो
लड़की जात हो—-सबके बीच बाल मत औन्छो
लड़की जात हो —-गर्दन नीची रखो
लड़की जात हो —-नजरें झुकाए रखो
लड़की जात हो —–थोडा-सा  करो और  ज्यादातर मत करो

देह कन्या से बूढ़ी हो गई
पर दिमाग से नहीं गई—- लड़की जात …

8. 
अ’ अनार का सीख रही थी
तभी दौड़ते-भागते
‘ड’ आ पहुंचा डर लेकर
और माँ ने पकड़ा दिया
‘स’ सुरक्षा का

सुगन्धित फूल की तरह खिल रहा स्त्रीत्व
अपने साथ ‘ल’ लज्जा का लेकर आया
और साथ-साथ चलते रहे ‘ड’ और ‘स’ भी
‘ड’ के साथ कई बार जोड़ना चाहा ‘नि’ को
निडर बनाने के लिए
पर यह न हो सका
‘स’ के साथ ‘अ’ जरूर जुड़ गया
अनजाने, अनचाहे
और ‘स’ सुरक्षा का असुरक्षित हो गया

हाँफते – हाँफते ,
थकी-मांदी
चढ़ ही गई किसी तरह कितने ही दशकों की सीढ़ियां
‘अ’ अनार का पीछे छूट गया था
धीरे -धीरे ‘ड’ डर का
और ‘स’ सुरक्षा का , जिसमें ‘अ’ जुड़ गया था
वह भी भूल गई मैं
‘ल’ लज्जा का भी कहीं गुम हो गया

अब मेरे साथ था
‘म’ मुक्त का
‘ब’ बेहिचक का
‘ग’ गरिमा का
‘प’ प्रणाम का
सब कुछ नया था
बस पुराना था तो अपने भीतर का
भरपूर स्त्रीत्व
उससे भी निवृृत्ति पाकर
मैं चलना चाहती थी
व्यक्ति के ‘व’  को साथ लेकर

लेकिन जल्दी ही जान गई
कि सब कुछ छोड़ा जा सकता है
पर अपने स्त्रीत्व को नहीं
याद दिलाता ही रहता है हर वक्त कोई न कोई

बहत्तर साल की उस नन के मुकाबले
अभी भी युवा हूँ मैं
और कितने ही कमज़र्फ़
घूम रहे हैं मेरे आस-पास भी

महिला आरक्षण के लिए संवाद

12 दिसंबर को  एन एफ आई डवल्यू  और स्त्रीकाल के संयुक्त तत्वावधान में ‘ महिला आरक्षण : कहाँ हैं रूकावटे’ विषय पर एक सार्थक राउंड टेबल, अंसल भवन (कस्तूरबा मार्ग ) स्थित एन एफ आई डवल्यू के कार्यालय में हुआ . बातचीत में विभिन्न महिला  संगठनों के कार्यकर्ताओं , सामाजिक चिंतकों , क़ानूनविदों , पत्रकारों , आदि भाग लिया. एन एफ आई डवल्यू, आयडवा, राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोँलंन , आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस, भारतीय महिला मोर्चा , जे. डवल्यू .पी , ए आई एस एफ, सत्यशोधक महिला समाज, सम्बुद्ध महिला संगठन, सी  डवल्यू  . एस. डी, दलित लेखक संघ, सहित अन्य संगठनों के प्रतिनिधि, दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू के शोधार्थी तथा अन्य बुद्धिजीवी शामिल हुए.
तीन घंटें तक चले विचार -विमर्श में महिला आरक्षण को लेकर विभिन्न समूहों की एक सहमति बनी कि वर्तमान संसद के कार्यकाल के रहते हुए यह बिल पारित करवाने की कोशिश की जाये. वर्तमान सरकार को संसद में पूर्ण बहुमत है और दूसरी बड़ी पार्टियां भी सैद्धांतिक रूप से इस बात पर सहमत हैं कि महिला आरक्षण को लागू  किया जाना चाहिए, इसलिए भी यह अवसर है जब महिला आरक्षण के लिए हमें एक दवाब समूह के रूप में काम करना चाहिए .
शामिल प्रतिभागियों ने पंचायतों में महिला आरक्षण से प्रतिनिधित्व में आये गुणात्मक परिवर्तन और महिला मुखिया एवं सरपंचों द्वारा कुशल कार्य सम्पादन की चर्चा की.  वक्ताओं की चिंता पितृसत्तात्मक सोच और पुरुष -वर्चस्व की राजनीति के द्वार इसे ‘ सर्वसम्मति’ तक टाले जाने  को लेकर दिखी. मूल बहस जाति-प्रतिनिधित्व , अल्पसंख्यक स्त्रियों के प्रतिनिधित्व को लेकर भी केन्द्रित रही. अनेक प्रतिनिधियों ने पीछे -छूट गये समूहों की वाजिब भागीदारी का सवाल उठाया और महिला आरक्षण के भीतर दलित -आदिवासी -पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी सुनिश्चित कराये जाने पर जोड़ दिया.
बातचीत का एक हिस्सा : ( वीडियो लिंक देखें  ) :
 राउंडटेबल के बाद महाराष्ट्र के लोक शायर संभाजी  भगत ने ‘ ओ हिटलर के साथी’ , उनकी  प्रसिद्द प्रस्तुति, को गाया और अंत में किसान नेता शरद जोशी के निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए दो मिनट का मौन रखा गया.
 राउंड टेबल में एनी राजा ( एन एफ आई डवल्यू)  , गार्गी चक्रवर्ती ( एन एफ आई डवल्यू),  जगमाती सांगवान( आयडवा) , मंजू काक( आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस ), योगिता सिंह ( भारतीय महिला मोर्चा )  विमल थोराट ( सामाजिक चिन्तक ),  रजनी तिलक ( राष्ट्रीय दलित आन्दोलन ) , पद्मिनी कुमार ( जे  डवल्यू पी ) अरविंद जैन ( स्त्रीवादी कानूनविद ) , निधीश त्यागी ( लेखक एवं सम्पादक बी बी सी हिन्दी )  छाया खोब्रागडे ( सम्बुद्ध महिला संगठन) , नूतन मालवी ( सत्यशोधक महिला समाज ) सुजाता पारमिता (चिंतक एवं कार्यकर्ता )  अनिता भारती ( लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता )  नूर ज़हीर  ( लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता ) सुनील कुमार सुमन ( आदिवासी चिंतक ) प्रमोद रंजन ( सलाहकार सम्पादक फॉरवर्ड प्रेस ) कौशल पंवार ( लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता ), हीरालाल राजस्थानी ( दलित लेखक संघ ) अपराजिता ( ए आई एस एफ), कृपा गौतम ( सामाजिक कार्यकर्ता ) , अरुणा सिंह ( एन एफ आई डवल्यू), संभाजी राव भगत ( सामजिक कार्यकर्ता और लोक शायर ), धम्म संगिनी ( सी डवल्यू एस डी), अरुण कुमार प्रियम , सुनीता कुमारी  सहित कई कार्यकर्ताओं ने भगा लिया.
संचलान और समन्वयन स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने किया .
On 12 December, an illuminating Round Table discussion was organised under the joint aegis of NFIW and Streekaal on “Reservation for Women: The bottlenecks” at the NIFW office at Ansal Bhawan, Kasturba Marg, New Delhi. Representatives of women’s organisations, social thinkers, jurists, journalists and others participated in the meet. The participants included representatives of NFIW, Rashtriya Dalit Mahila Andolan, All India Women’s Conference, Bharatiya Mahila Morcha, JWP, AISF, Satyashodhak Mahila Samaj, Sambuddh Mahila Sangathan, CWSD, Dalit Lekhak Sangh and other organisations, besides research scholars of JNU and Delhi University and other intellectuals.
At the end of the three-hour discussion, a consensus was arrived at for making concerted efforts to ensure the passage of the Women’s Reservation Bill before the expiry of the term of the present Lok Sabha. The present government enjoys a majority in the Lok Sabha and all other major parties also, in principle, agree that reservations for women should be implemented. Hence, this is the right time to work as a pressure group for the implementation of women’s reservation.
The participants pointed out that a qualitative change had come about in the Panchayati Raj institutions after the introduction of women’s reservation and the women office-bearers of Panchayats are working diligently and efficiently. The speakers, however, expressed the apprehension that patriarchal mindset and male-dominated politics may lead to the implementation of the measure being put off till there is “unanimity’ on the issue. The issue of representation of various castes and of women from the minority communities was also discussed. Many speakers talked about the need for adequate representation of the ‘left-behind’ communities and emphasised that it should be ensured that Dalits, Tribals, OBCs and minorities get adequate representation within the women’s reservation.
At the end, Sambhaji  Bhagat, folk poet from Maharashtra presented his famous poem ‘O Hitler Ke Saathi’. The meet ended with a two-minute silence to condole the passing away of peasant leader Sharad Joshi.
Those who spoke at the Round Table included Annie Raja (NFIW), Gargi Chakravarti (NFIW), Jagmati Sangwan (AIDWA), Manju Kak( All india Women Conference ), Yogita Singh ( Bhartiya Mahila Morcha ), Vimal Thorat( Writer and Thinker) , Rajani Tilak ( Rashtriya Dalit Andolan ), Padmini Kumar ( JWP), Adv. Arvind Jain ( Feminist Lawyer ) , Nidheesh Tyagi( Writer and Editor BBC Hindi) , Chhaya Khobragade ( Sambuddh Mahila Sangathan ), Nootan Malvi (Satyashodhak Mahila Samaj) , Sujata Parmita( Thinker and activist ) Anita Bharti ( Writer and activist), Noor Zaheer,( writer and activist ) Sunil Kumar Suman (Adivasi thinker), Pramod Ranjan( Consulting Editor Forward Presss)   Kaushal Panwar ( writer and social activist) ,Hiralal ( Dalit Lekhak Sangh), Kripa Gautam ( Social Activist) , Aprajitha ( AISF), Aruna Singh ( NFIW), Sambhaji Rao bhagat ( Folk singer and social activist), Dhamm Sangini ( CWSD), Arun Kumar Priyam , Sunita Kumari and several others.
Sanjeev Chandan, Editor of Streekaal, conducted and co-ordinated the event.

परिवर्तनगामी चेतनाकी संवाहक प्रस्तुति… ‘सपने हर किसी को नहीं आते’

हनीफ मदार

उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी सामाजिक उथल-पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह – तरह के बदलाव आये हैं जो सामान्यतः सकारात्मक से कहीं ज्यादा नकारात्मक हैं | इस वक़्त में कैसे हमारी जिंदगियों में बाजारी अंधी चकाचौंध प्रवेश कर जाती है और कैसे हमारे सामाजिक व्यक्तित्व को, व्यक्तिवादी अंधी सोच में तब्दील कर देती है और कब हम अपने ही भाई, अपने पड़ोसी के सामने उठ खड़े होते हैं, हमें अंदाजा भी नहीं होता | चारों तरफ से बाजारी हमलों से घिरी हुई हमारी वर्तमान पीढ़ी का,सामाजिक रूप से इन्हीं बेरहम सवालों से जूझते हुए उनके जबाव खोजने का रचनात्मक प्रयास है नाटक ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ |

एक अदद ऑडिटोरियम के अभाव के बावजूद भी मथुरा में आधुनिक थिएटर एवं रंगमंचीय गतिविधियों का अलख जगाये रखने वाली ‘संकेत रंग टोली’की साथी एवं ‘कोवैलेंट ग्रुप’ की संस्थापक सदस्य ‘आशिया मदार’ के निर्देशन में ‘राजेश कुमार’ का यह नाटक भारतेंदु नाट्य अकादमी की पच्चीस दिवसीय कार्यशाला के समापन पर हाइब्रिड पब्लिक स्कूल के एच पी एस सभागार में 16 दिसम्बर 2015 को मंचित हुआ | ‘आशिया मदार’ खुद भारतेंदु नाट्य अकादमी से 2015 के बैच की पास-आउट हैं और व्यक्तिगत तौर पर यह उनकी पहली प्रस्तुति थी |इसलिए व्यावहारिक तौर पर कार्य शैली में किसी प्रोफेशनल निर्देशकीय दक्षता कम ही दिखाई दी किन्तु नाटक की डिजायन और प्रस्तुति को देखते हुए एक प्रशिक्षित व्यक्ति की कुशलता भी स्पष्ट दिखी | ज्यादातर नये लोगों के साथ काम करते और कराते हुए राजेश कुमार के बेहद संवेदनशील इस नाटक और नाटककार के मूल भाव को दर्शकों तक संप्रेषित करने में आशिया मदार बखूबी सफल रहीं |

यह कहने में गुरेज़ नहीं है कि फिलवक्त में राजेश कुमार ऐसे इकलौते हिंदी नाटककार हैं जो निरंतरता में ऐसे नाट्यालेखों को लिख रहे हैं जो यथा स्थिति ही बयान नहीं करते बल्कि वे एक चेतना भी पैदा करते हैं और प्रतिरोध भी | वर्तमान की ताज़ा सामाजिक राजनीतिक और मानसिक विसंगतियों पर मुकम्मल चर्चा के लिए न चाहते हुए भी नाटक में पात्रों की अधिकता कोई नई बात नहीं है | लेकिन मथुरा जैसे छोटे शहर में बड़ी कास्ट के नाटकों का चुनाव और चयन निश्चित ही एक चुनौती तो है ही और यह चुनौती आशिया मदार के सामने भी रही | चूँकि राजेश खुद सक्रिय रंगकर्म से जुड़े हैं तो उन दुश्वारियों को भी भले से समझते हैं जो हिन्दी नाटक कर रहे नाट्य दलों को हर दिन परेशान करती हैं |इसलिए उनके नाटक एक पात्र को कई – कई भूमिकाये निभाने की सहूलियत भी देते हैं | जो इस नाटक में भी हुआ |

नाटक की शुरूआत पूंजीवादी विकास की दिशा में निरंतर बढती राजधानी दिल्ली में एक अपार्टमेन्ट के एक कमरे में किराए पर रह रहे सात दोस्तों के उन जीवन अनुभवों से होती है जो प्रतीक रूप में विविधताओं से भरी भारतीय सामाजिक सांस्कृतिकता के वे पहरुए नजर आते हैं,  जो खोई हुई महानगरीय दिशाओं से बचते हुए मैत्री में जीवन का रस तलाश रहे हैं | पहले दृश्य में ही सातों की आपसी चुहल, बहस और खिलंदड़पन इनके चारित्रिक विकास के साथ दर्शकों से कम्युनिकेट होने लगता है, किन्तु यहीं किसी सपने की तरह पूंजीवादी चकाचौंध के साथ,बाज़ार कब इनके बीच आकर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देता है इसकी भनक तक उनको नहीं हो पाती |

इसके बाद जो होता है, बाहरी तौर पर बेहद सहज दिखतीं घटनाएं, परिस्थितियाँ और वातावरण दृश्य दर दृश्य नाटक को गति प्रदान करते हुए अंत तक ले जाते हैं जहाँ रंगकर्मी‘समीर’ (कलीम ज़फर) प्यार, मोहब्बत और रोमांस की अंधी अभिजनवादी दौड़ का शिकार होकर खुद को पुनः खुद में ही खोजने को विवश होता है | वहीँ नव धनाढ्य  पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करता गैर-संवेदनशील ‘रजत’ (अन्तरिक्ष शर्मा) स्वार्थ केन्द्रित आधुनिकता के साथ दोस्तों को छोड़ कर अमेरिका शिफ्ट हो जाता है | जबकि सिस्टम में रहकर ही उसे बदलने का स्वपन देखने वाला ‘सफल’ (रवि) खुद ही सिस्टम की अव्यवस्थित और भ्रष्ट कार्यप्रणाली का शिकार होकर आत्महत्या कर लेता है | वामपंथी रुझान और स्पष्ट समझ के साथ ‘अभय’ (सनीफ मदार) जब इस दमन तंत्र का विरोध करता है तो उसे भी उसके पिता की तरह ही मार दिया जाता है |

सीधा-सपाटजीवन जीता और किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता ‘इरफ़ान अंसारी’ (पुलकित फिलिप) शक भरी एक ख़ास मानसिकता के चलते बेवज़ह गिरफ्तारी के चलते अपने दोस्तों के बीच ही खुद को अजनबी और असुरक्षित महसूस करने लगता है| डिजिटल इंडिया में अल्पसंख्यक होने का दंश उसे उस कमरे रुपी घर को छोड़कर ‘घेटों’ में जा बसने को मजबूर कर देता है | वहीँ 84 के सिख विरोधी मानसिकता का शिकार, अब घर-घर जाकर वाटर प्यूरीफायर बेचते हुए वर्तमान बेरोजगारी से जूझता युवा ‘सरदार जोगेन्दर सिंह उर्फ़ जोगी’ (कपिल कुमार ) और साहित्यिक रुझान वाले‘कबीर’ (जितेन्द्र सिंह कर्दम) को कोई भी घटना भावुकता में बहा नहीं ले जा पाती बल्कि अंत में अकेले या कम संख्या में होने के बावजूद भी कबीर का एकसंवाद-“वे खतरनाक या ताकतवर तभी तक हैं जब तक हम समझते हैं |” इंसानी हकों के लिए निरंतर संघर्ष करने कीओर इशारा करता है | यहाँ आकर नाटक में प्रयुक्त की गई “पाश” की कविता ‘हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के खिलाफ ….|’ बेहद अर्थपूर्ण और जरूरी लगती है |

मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स या रैम्प पर कैटवाक करती मॉडल के रूप में बाजारी गुलामी को ही स्त्री, मुक्ति और आज़ादी समझ रही है |बाजारी सेल्स गर्ल के प्रतीक रूप में मंच पर उतरती ‘मॉडलस’ (शालिनी श्रीवास्तव, शबाना मदार, पूनम कुमारी, टीना फिलिप) के साथ स्त्री की शारीरिक संरचना को नाप-तौलके पैमाने में आकर्षण की व्याख्या देता बाज़ार का प्रतिनिधि‘डी के’ (सूरजचौहान )नाटकके पहले दृश्य से स्पष्ट भाषा के साथ एक नया स्त्री विमर्श रचता है | ‘श्रेया’ (बोबीना)के रूप में खुद को आधुनिक समझती एक ऐसी लड़की का किरदार, जो प्रेम के नाम पर इंसानी ज़ज्बातों से खेलने को टाइम पास कह कर यह स्पष्ट करती है कि इंसानी प्रेम और संवेदना को आकार देने का जिम्मा भी अब बाज़ार ने ही उठा रखा है |

प्रथमदृष्टया यथास्थितिवादी लगने वाला यह नाटक दरअसल बाहरी तौर पर किसी भी प्रतिरोध को थोपने के बजाय आंतरिक रूप से मज़बूत, चेतनशील और परिवर्तनगामी होनेकी बात कहता है क्योंकि इस ठन्डे, संवेदनहीन और अंधी सामाजिकता में ‘सपने हर किसी को नहीं आते’ |

हालांकि नाटक को सम्पूर्णता और दृश्यों को साफ़ करने में ज़फर अंसारी, टीकम सिंह, प्रदीपकुमार, अनिरुद्ध गुप्ता, नीरज चौधरी, सनीफ मदार और सूरज चौहान ने कई- कई चरित्रों को बखूबी अंजाम दिया | निर्देशकी की लाख कोशिशों के बावजूद भी कुछ कलाकारों के साथ भाषाई व्याकरणीय अशुद्धता और उच्चारण की गलतियां एवं नाटक का अनुपयुक्त जगहों पर अधिक लाउड हो जाने जैसी खामियां, जहाँ रंगमंच में बृज भाषाई लोगों के साथ भाषाई स्तर पर लम्बी रिहर्सल की मांग करतीं हैं वहीँ निर्देशक के लिए अगली प्रस्तुतियों में एक चुनौती के रूप में खड़ी होतीं हैं |

संसाधनों की कमी और अकादमी के बेहद सीमित बजट के बाद भी ‘अयान मदार’ के सहयोग से तैयार किया गया सैट भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बना रहा | संगीत संकलन और संचालन भी श्रमसाध्य काम दिखा जिसे ‘पुलकित फिलिप’के सहयोग से खुद‘आशिया मादार’ ने अंजाम दिया | ‘एम्० गनी’ खासी मेहनत और मशक्कत के बाद भी प्रकाश परिकल्पना में खल रहे साधनों के अभाव को छुपा पाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए |

आशिया मदार

अंत में अभीप्सा शर्मा, अरबाज़ खान, किशन सिंह, विपिन शर्मा, अनीता चौधरी, पुश्किन सफी, की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ सम्पूर्णता में यह नाट्य प्रस्तुति,दर्शनीय और दर्शकों को पूरी तरह से कम्युनिकेट करने में सफल रही | अंत में नाटक की इस सफलता पर भारतेंदु नाट्य अकादमी के सहनिदेशक रमेश चन्द्र गुप्ता के साथ उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन स्वरुप भाटिया एवं संकेत रंग टोली के अध्यक्ष राहुल गुप्ता तथा उपाध्यक्ष निर्मल पूनिया के द्वारा निर्देशक आशिया मदार को सम्मानित किया गया|

निदेशक आशिया मदार के बारे में 
रंगमंच आपकी रगों में रचा बसा है | होश संभालते ही अपने घर में हो रही रंग गतिविधियों में संलग्नता | रंगकर्म की शुरूआत बचपन से‘संकेत बाल रंग टोली’ के साथ बाल रंगकर्म से, एम० गनी व सनीफ मदार के सानिध्य में | “कोवैलेंट ग्रुप” की संस्थापक सदस्य | अनेक नाटकों में अभिनय के साथ बैक स्टेज की कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को सम्भाला |
2015 में ‘भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ’ से नाट्य कला में परास्नातक डिप्लोमा |
अकादमी द्वारा आयोजित इस प्रस्तुति परक नाट्य कार्यशाला में नाटक “सपने हर किसी को नहीं आते” पहला निर्देशित नाटक |
संपर्क : ईमेल- 30madaar30@gmail.com

समीक्षक हनीफ मदार कहानियां लिखते हैं . सामाजिक -सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय, ऑनलाइन मैगजीन हमरंग के संपादक. संपर्क:  08439244335

इंसाफ अधूरा है

कुमारी ज्योति गुप्ता


कल रविवार( 20 दिसंबर ) को  16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड का एक आरोपी जुबेनाइल होने के आधार छूट जायेगा. आम्बेडकर यूनिवर्सिटी , दिल्ली की शोधछात्रा ज्योति इस घटना को स्त्री के खिलाफ एक परिघटना मान रही हैं . साहित्य और समाज में घटित उद्धरणों से वे स्त्री की पीड़ा को समझने -समझाने की कोशिश कर रही हैं . सच है कि इस वीभत्स बलात्कार काण्ड के सबसे क्रूर आरोपी को जुबेनाइल होने के आधार पर मिली  छूट  से बन रहे आक्रोश और जुबेनाइल क़ानून में निहित मानवाधिकार का एक द्वंद्व तो है ही.  इस बीच एक अच्छी बात हुई कि अब तक जिस पीडिता का नाम छिपाया जा रहा था , काल्पनिक  निर्भया नाम से पुकारा जा रहा था , उसका नाम उसकी माँ ने सार्वजनिक किया , वह ज्योति सिंह थी. नाम छिपाने की परम्परा भी स्त्री विरोधी है , जो यौन हिंसा की शिकार स्त्री के ‘ इज्जत खो देने’ की सोच से बनी थी , जिसका अर्थ होता है कि पीडिता ही अपराधी है. पीडिता को पीडिता मानने और नाम छिपाने की परम्परा को हतोत्साहित किया ही जाना चाहिए. 
                                                                                                                                         संपादक



16 दिसम्बर को निर्भया को नम आंखों से श्रद्धांजलि दी गई। प्रश्न  यह है कि2012 की रात बसंत विहार क्षेत्र में  हैवानियत की शिकार बनी निर्भया के साथ न्याय हुआ? उसका आरोपी तो नाबालिग होने के कारण बाहर आर हा है।तीन वर्ष पूरे हो  गए और लगता है जैसे कल की ही बात है, क्योंकि इस घटना को भूलने कामतलब ही नहींब नता।भूला वही जाता है, जो एक बार हो लेकिन यह सिलसिला तो कभी थमा ही नहीं। हर रोज़ अखबारों में यह खबर मिल ही जाती है कि आज फिर किसी निर्भया को किसी दरिंदे ने अपनी हवस का शिकार बनाया। आंखों के सामने वे सारी तस्वीरें आ जाती हैं और यही प्रश्न करती है कि कब तक हमारी तस्वीरों के सामने मोमबत्तियां जलाई जाएंगी? कब तक बंद करो , बंद करो का नारा लगाते हुए लोग जंतर-मंतर पर इकट्ठा होंगे? कब तकन्याय की गुहारल गाई जाएगी? सब चुप हैं। इमराना, अरुणा, निर्भया सब पूछ रही हैं क्यों चुप हैं सब?

निर्भया की मां नेअपनी दिवंगत हो चुकी बेटी को याद करते हुए कहा ‘‘दुनिया भर में मेरी बच्ची को 16 दिसम्बर को श्रद्धांजलि दी जाएगी। हालात बदलनी चाहिए।अपनीबिटिया की फोटों के आगे खड़े होने पर एक अपराध-बोध होता है कि तीन सालों के बाद भी इंसाफ अधूराहै।जिस दरिंदे ने बेटी को सबसे अधिक दर्द दिया, वह महज नाबालिग होने के चलते बाहर आ जाएगा।उसे सजा मिलती तो सही मायने में इंसाफ होता”. पिता बद्रीनाथ ने कहा “हर दिन नाबालिग की रिहाई की बातें सुुनकर डर लग रहा है कि आखिर क्या सच में कानून उसकी उम्र के चलते उसकी गुनाह की सजा नहीं दे पाएगा।’’1

इतनी दरिंदगी से अपने काम को अंजाम देने वाले मुजरिमको सिर्फ और सिर्फ जुबेनाइल के आधर पर छोड़ा जा रहा है।जुबेनाइल यानी जो सेक्सुअली अपरिपक्व हो।सोचने वाली बात यह है कि अपरिपक्व स्थिति में इस दरिंदे ने एक लड़की की इतनी दर्दनाक हालतकर दी , दस पन्द्रह साल बाद स्थिति क्या होगी सोचकर बदन सिहर उठता है।इतनी घिनौनी हरकत करने पर मुजरिम को जुबेनाइल के आधार पर छोड़ा जा रहा है। धन्य है हमारी न्याय व्यवस्था! अरुणा को बेदर्दी से बलात्कार कर मौत के घाट उतारने की कोशिश  की गई।बयालिस वर्ष वह कोमा में रही । घर परिवारवालों ने भी उसका साथ छोड़ दिया और उसका आरोपी महज सात साल की सजा काटकर छूट गया।क्या कुछ अपराध के लिए तयसुदा सजा के मानदण्ड बदलने की जरूरत नहीं है? निर्भया के साथ भी यही हो रहा है।उसके माता-पिता सरकार से , कानून से न्याय की मांग कर रहे हैं।आरोपी को ऐसी सजा मिले कि इसतरह का काण्डकरने की सोचने पर भी दरिंदा सिहर जाए।अगर ऐसा ही न्याय होता रहा जैसा कि हो रहा है तो फिर बंद कीजिए लड़कियों का बाहर निकलना क्योंकि जब वह सुरक्षित ही नहीं तो सब व्यर्थ है।

हर गली हर नुक्कड़ परआंखों में हवस लिए शिकारी ताक में बैठा हुआ है।स्कूलजाती, कालेज जाती,काम पर निकली लड़की के घर से निकलने का समय तय है लेकिन वह कितनी सुरक्षित लौटेगी यह तय नहीं। यह ऐसा छिपा हुआ राक्षस है, जो दिखाई नहीं देता।जिसके दंश औरत जाति के शरीरको कब लहूलुहानकर दे, कोई पता नहीं। नमिता सिंह ने इसलिए लिखा है ‘‘छिन्नमस्ता की प्रिया अकेली नहीं जो भाई के हवस का शिकार होती है या सोना चौधरी के ‘पायदान’ की आंचल जो गांव में बैठक के कमरे में रोज रात कोअपने भाई या उसकेदोस्तों के हाथों कुचली जाती है।किसके पास रोते हुए जाए वह बच्ची , इमराना या रानी‐‐‐या कोईऔर‐‐‐।’’2 इस यातना सेउबारने वाला कोई नहीं जिसका हाथ सिर पर सुरक्षा के लिए होनाचाहिए वही औरत से उसका औरतपन छीन लेना चाहता है।

अतः हम कह सकते हैं कि समय बदला, सत्ता बदली,सोंच बदली पर औरत की स्थिति अभी भी नहीं बदली।सचमुच वह पीड़ा भोगने के लिए अभिशप्त  है। यह सब देखकर तो यहीलगता है कि जैसे हर तरफ पुरुष की चित्कार है, हाहाकार है , जैसे वहचुनौतिपूर्ण शब्दों में  कह रहा हो कहां तक भागोगी समाज हमारा ,सत्ता हमारी है।किसी न किसी रूप मेंतुम भोगने ,सहने , पीडि़त होने के लिए अभिशप्तहो। प्रभा खेतान ने इसी सच की अभिव्यक्ति करते हुए लिखा ‘‘छिः मुझे नफरत है इस पुरुष  जातिसे।नफरत है उससे जो मासूम, छोटी, नादान लड़की को भी नहींछो ड़ता‐‐‐क्या समाज स्त्री की रक्षा करताहै? क्या पुरुष  की कामुक हवस का शिकार होने से मासूम लड़कियां बच पाती हैं?’’3 सचमुच स्त्री का लेखन उसके अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति होती है।अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्ति जब होती हैतो वहरोम-रोमको झकझोर देती है।

निर्भया, अरुणा, इमराना, रानी‐‐‐न जाने कितनी ऐसी हैं, जो जिनकी आत्मा न्याय का इंतेजार कर रही हैं।जबतक इनके साथ न्याय नहीं होगा तबतक ये हर औरत में जिंदा रहेंगी। हमारे यहां इंसाफ और न्याय की हालत देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ‘सुनो तुम चाहे जिसे चुनो मगर इसे नहीं इसे बदलो।’ हर बलात्कार पीडि़ता के माता-पिता इसी आस में जिंदगी काट रहे हैं कि कब उनकी मृतक बेटी को इंसाफ मिलेगा और हमारा कानून सिर्फ जुबेनाइल के आधार पर आरोपी कोछोड़ रहा है।इसकी समीक्षा करने की जरूरत है। खासकर जब अपराध हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से जुड़ाहो।आकड़े बताते हैं कि निर्भयाकाण्ड के बाद फैले असंतोष और सामाजिक क्रांति के बाद भी कुछ नहीं बदला।

संदर्भ सूची-
1‐संपादक-ओमथानवी ,जनसत्ता, 17 दिसम्बर,2015 , पृ0सं0-3
2‐ सिंह नमिता- ‘कुचला जाता हर रोज आंचल’, संपादक-महेन्द्र मोहन गुप्ता, दैनिक जागरण, कसौटी अंक-2सिम्बर-2005, जमशेदपुर, पृ0सं0-1
3‐ खेतानप्रभा-छिन्नमस्ता, पहला संस्करण-199,एदूसरीआवृत्ति- 2004, राजकमलप्रकाशनप्रा0 लि0, नई दिल्ली-110002, पृ0 सं0-119

 कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

यौन हिंसा पर चुप्‍पी तोड़ो ! ऐपवा का जेंडर संवेदी अभियान

दोस्‍तो,
2012 में दिल्‍ली में सामूहिक बलात्‍कार की एक बर्बर घटना ने यौन हिंसा के खिलाफ हम सभी को सड़कों पर उतार दिया था. तब हमारे आन्‍दोलन ने इस बात को जोर के साथ चिन्हित किया था कि हमारे समाज के पितृसत्‍तात्‍मक पूर्वाग्रह और शक्ति संरचना ही ऐसी है जिसमें बलात्‍कार जैसे अपराध पनपते हैं, और इन प्रवृत्तियों को बदलना जरूरी है. नेता और पुलिस ही नहीं और भी कई ऐसे लोग हैं जो बलात्‍कार होने पर महिला के कपड़ों और चरित्र पर सवाल उठाते हैं और बलात्‍कारी का बचाव करते हैं. इतना ही नहीं, बलात्‍कार महिलाओं के प्रति हिंसा और भेदभाव के मौजूदा ताने-बाने का अभिन्‍न अंग है. दिसम्‍बर 2012 के आन्‍दोलन में महिलाओं ने ‘बेखौफ आजादी’ की मांग उठाई – लेकिन फिर भी आये दिन ‘सुरक्षा’, ‘संस्‍कृति’ आदि के नाम पर महिलाओं से ही उनकी आजादी पर अंकुश लगाने के लिए कहा जा रहा है. महिलाओं के प्रति रोजमर्रा की हिंसा और भेदभाव इतनी ‘आम बात’ बन गई है कि प्राय: ही हम उसे पहचान भी नहीं पाते हैं.

महिलाओं और बच्‍चों के प्रति अपराध की घटनायें सामने आने पर विरोध प्रदर्शन और सजा की मांग करना ही हमारे लिए काफी नहीं है. यह भी बहुत जरूरी है कि हम महिलाओं के प्रति और जेण्‍डर के प्रति खुद अपने नजरिए और अपने विचारों को भी परखें और जांचें. हम अपनी बेटियों और बेटों की पर‍वरिश कैसे करते हैं, महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के बारे में हम क्‍या सोचते हैं, या कि हम महिलाओं और लड़कियों के लिए अपनी दुनिया को ज्‍यादा सुरक्षित और पूरी आजादी के साथ जीने लायक कैसे बना सकते हैं – आदि सवालों पर भी जरूर खुले मन से बातचीत करनी चाहिए.

जेण्‍डर के सवाल पर होने वाले सरकारी प्रचार और विज्ञापनों में गहरी जड़ें जमाये पितृसत्‍तात्‍मक पूर्वाग्रहों पर बिल्‍कुल भी चोट नहीं की जाती है. हमारे समाज में महिलाओं को जंजीरों और बंधनों में जकड़ने वाले असली मुद्दों के प्रति चुप्‍पी बनाये रखने वाली साजिश में ऐसा प्रचार अपना योगदान करता है. समस्‍या की जड़ तक पहुंचने में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं है. इन मुद्दों को हल करने की दिशा में एक व्‍यापक अभियान की जरूरत है जो ‘दूसरों’ में ही नहीं वरन् अपने अंदर भी पितृसत्‍तात्‍मक नजरिए और पूर्वाग्रहों से संघर्ष करे.

इसी उद्देश्‍य से ऐपवा दिल्‍ली में एक गहन जैण्‍डर सेन्सिटाजेशन (जागरूकता) अभियान की शुरूआत कर रही है. हम चाहते हैं कि इन सवालों पर बहसें चलाई जायें और जागरूकता बढ़ाने के लिए आसान हिन्‍दी में सामग्री तैयार की जाय. हम इस हेतु वालंटियर बनने के लिए सभी इच्‍छुक मित्रों को आमंत्रित कर रहे हैं, आप genderjustice.aipwa@gmail.com पर ईमेल भेज कर इस अभियान में जरूर शामिल हों. इस अभियान के लिए पहली कार्यशाला 9 जनवरी 2016 को आयोजित की जायेगी. समय और स्‍थान की सूचना जल्‍द ही आपको दे दी जायेगी. साथ ही, इस अभियान के लिए अपने विचारों और सुझावों से भी हमें जरूर अवगत करायें, हमें पूरी उम्‍मीद है कि आप अपने नाम और फोन नम्‍बर जल्‍द ही भेज देंगे.

आइये ‘यौन हिंसा पर चुप्‍पी तोड़ो !’ अभियान से नये साल की शुरूआत करें
genderjustice.aipwa@gmail.com पर संपर्क कर इस अभियान के वालंटियर बनें.

Break the Silence on Gender Violence!
A Gender Sensitization Campaign in Delhi

Friends,
In 2012, a horrific gang-rape in Delhi woke up thousands of us to come out on the streets against sexual violence. Our movement then pointed out that it is society’s own patriarchal prejudices and power structures that breed rape. Politicians, policemen, and many others blame women’s clothes or conduct for rape, and defend rapists. Moreover, rape is part and parcel of a larger matrix of violence and discrimination against women. Women in the December 2012 movement demanded ‘Fearless Freedom’ (Bekhauf Azadi’) – but time and again, women are told to sacrifice their freedom in the name of ‘safety’, ‘culture’ and so on. Everyday gender violence and discrimination is so ‘normal’ that very often, we fail even to recognize it.
It is not enough for us to protest and demand punishment when crimes against women and children come to light. It is urgently needed that we question our own attitudes and ideas towards women and towards gender. We need to have conversations about how we bring up our daughters and our sons; about how we think about women’s Constitutional rights; about what our society, our Governments, and we ourselves can do to make our world a safer and freer place for women and girls.
Existing sarkari campaigns on the issue of gender tend to avoid addressing the deepest patriarchal prejudices. They participate in the conspiracy of silence around the real issues that shackle and restrict women in our society. They are reluctant to rock the boat. We need a citizens’ campaign to address these issues and to fight the patriarchal attitudes and prejudices – not only in ‘others’ but in ourselves.
That’s why AIPWA is committed to launching a sustained gender-sensitization campaign in Delhi. We aim to conduct discussions and create sensitization material in everyday spoken Hindi. We call for volunteers to mail us at genderjustice.aipwa@gmail.com. The first workshop towards this campaign will be held on 9 January 2016 – we will inform you of the time and place soon. Meanwhile, we welcome your ideas and suggestions, and hope you’ll send us your names and contact numbers soon.

In the coming New Year – join the campaign to ‘Break the Silence on Gender Violence’!
Volunteer at: genderjustice.aipwa@gmail.com

जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

जितेन्द्र श्रीवास्तव 

चर्चित कवि, संपादक: उम्मीद, कविता और आलोचना की कई किताबें प्रकाशित, इग्नू के  हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर . संपर्क :09818913798

नमक हराम

आँखों के जल में होता है नमक
पर कितना
किससे पूछा जाए!

क्या वह स्त्री ठीक-ठीक बताएगी
आँखों के जल में नमक का अनुपात
जिसकी उम्र का अधिकांश
आँसुओं से भीगे आँचल को सुखाने में बीता है

या बताएगी वह अपराधी घोषित कर दी गई नदी
जिसने समुद्र में अपने विलय से इनकार कर दिया

वैसे पूछा तो उससे भी जा सकता है
जिसकी माँ स्वर्ग सिधार गई उसके जन्म-समय
प्रसव पीड़ा, रूढि़यों और सुविधाओं की कमी से

निश्चय ही उसका कंठ अब भी सूखा होगा
पर वह हुआ निरा पुरुष तो बोलेगा कितना सच!

सदियों से आँखों की गहराई का उपमान रहा है समुद्र
पर शायद ही कभी किसी ने याद किया हो
दोनों को साथ-साथ नमक के लिए
शायद ही कभी किसी ने विचार किया हो
दोनों के खारेपन के अंतर पर

समुद्र चाहे जितना हो अगम
छिपा नहीं पाता अपना खारापन
पर स्त्रियाँ अनादि काल से पी रही हैं अपना खारापन
बदल रही हैं
आँखों के नमक को चेहरे के नमक में
और पुरुष चमत्कृत है खुश है
कि यह रूप-लावण्य उसके लिए है

वह खुश होता है जैसे समुद्र पर
वैसे ही स्त्री पर
उसके लिए दोनों महज सौन्दर्य हैं
कभी-कभी क्रोध में
रक्त-मज्जा में समाए स्वभाववश
कहता वह दोनों को अबूझ भी

वैसे पूछिए कभी किसी ऐसे पुरुष से
जिसने प्रेम नहीं किया स्त्री को स्त्री में बदलकर
कि कितना नमक होता है
आँखों से बहती जलधारा में
तो वह नहीं बता पाएगा
संभव ही नहीं बता पाना उसके लिए

यह समुद्र का पानी नहीं
जिससे छान लिया नमक
यह पीडि़त खदबदाती आत्मा का जल है
इसमें चाहे जो हो नमक का अनुपात वह अनमोल है
और मुहावरे में कहें तो इस नमक को
अपना सुख समझता पुरुष पूरा नमक हराम है।

रामदुलारी

रामदुलारी नहीं रहीं
गईं राम के पास
बुझे स्वर में कहा माँ ने

मैं अपलक निहारता रहा माँ को थोड़ी देर
उनका दुःख महसूस कर सकता था मैं

रामदुलारी सहयोगी थीं माँ की
तीस वर्ष से लम्बी अवधि तक
माँ के कई दुःखों की बँटाइदार

माँ के अलावा सब दाई कहते थे रामदुलारी को
काम में नाम डूब गया था उनका
कभी-कभी माँ उनके साहस के किस्से सुनाती थीं

सन दो हजार दस में तिरासी वर्ष की आयु में
दुनिया से विदा हुईं रामदुलारी ने
कोई तिरसठ वर्ष पहले सन् उन्नीस सौ सैंतालिस में
पियक्कड़ पति की पिटाई का प्रतिरोध करते हुए
जमकर धुला था उसे
गाँव भर में दबे स्वर में
लोग कहने लगे थे उन्हें मर्द मारन
पर हिम्मत नहीं थी किसी में सामने मुँह खोलने की

रामदुलारी ने वर्षों पहले
जो पाठ पढ़ाया था अपने पति को
उसका सुख भोग रही हैं
गाँव की नई पीढ़ी की स्त्रियाँ
उनमें गहरी कृतज्ञता है रामदुलारी के लिए
वे उन्हें ‘मर्द मारन’ नहीं
‘योद्धा’ की तरह याद करती हैं

जातियों में सुख तलाशते गाँव में
हमेशा जाति को लांघा था रामदुलारी ने
कोई भेद नहीं था उनमें बड़े-छोटे का
सबके लिए चुल्लू भर पानी था उनके पास

माँ कहती हैं
व्यर्थ की बातें हैं बड़ी जाति अपार धन
रामदुलारी न किसी बड़ी जाति में पैदा हुई थीं
न धन्ना सेठ के घर
पर उनके आचरण ने सिखाया हमेशा
निष्कलुष रहने का सलीका
बाभनों,  कायस्थों, ठाकुरों, बनियों, भूमिहारों में
डींगें चाहे जितनी बड़ी हों अपनी श्रेष्ठता की
पर कोई स्त्री-पुरुष नहीं इनमें
जो  आस-पास भी ठहर सके रामदुलारी के।

रक्त में खुशी 

मैंने पूछा
थोड़े संकोच थोडे़ स्नेह से

‘कैसे हैं पति
हैं तुम्हारे अनुकूल’

उसने कहा
मुदित मन से लजाते हुए

‘जी, बहुत सहयोगी हैं
समझते हैं मेरी सीमा
अपनी भी’

उस दिन मेरा मन बतियाता रहा हवाओं से फूलों से
पूछता रहा हालचाल राह के पत्थरों से
प्रसन्नता छलकती रही रोम-रोम से
यूँ ही टहलते हुए चबा गया नीम की पत्तियाँ
पर खुशी इस कदर थी रक्त में कि कम न हुई मन की मिठास

मैंने खुद से कहा
चलो खुश तो है एक बेटी किसी की
और भी होंगी धीरे-धीरे।

परवीन बाॅबी

कल छपी थी एक अखबार में
महेश भट्ट की टिप्पणी
परवीन बाॅबी के बारे में

कहना मुश्किल  है
वह एक आत्मीय टिप्पणी थी
या महज रस्म आदायगी
या बस याद भर करना
पूर्व प्रेमिका को फिल्मी ढंग से

उस टिप्पणी को पढ़ने के बाद
मैंने पूछा पत्नी से
तुम्हें कौन-सी फिल्म याद है परवीन बाॅबी की
जिसे तुम याद करना चाहोगी सिर्फ उसके लिए

मेरे सवाल पर कुछ क्षण चुप रही वह
फिर कहा उसने
प्रश्न एक फिल्म का नहीं
क्योंकि आज संभव हैं यदि
अपने बिंदासपन के साथ
ऐश्वर्या राय, करीना कपूर, रानी मुखर्जी
प्रियंका चोपड़ा और अन्य कई के साथ
नई-नई अनुष्का शर्मा रुपहली दुनिया में
तो इसलिए कि पहले कर चुकी हैं संघर्ष
परवीन बाॅबी और जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियाँ
स्त्रीत्व के मानचित्र विस्तार के लिए

उन्होंने ठेंगा दिखा दिया था वर्जनाओं को
उन्हें परवाह नहीं थी किसी की
उन्होंने खुद को परखा था
अपनी आत्मा के आईने में
वही सेंसर था उनका

परवीन बाॅबी ने अस्वीकार कर दिया था
नैतिकता के बाहरी कोतवालों को
उसे पसंद था अपनी शर्तों का जीवन
उसकी बीमारी उपहार थी उसे
परंपरा, प्रेमियों और समाज की

जो लोग लालसा से देखते थे उसे
रुपहले पर्दे पर
वे घर पहुँचकर लगाम कसते थे
अपनी बहनों-बेटियों पर

परवीन बाॅबी एक अट्टहास थी व्यंग्य की
उसके होने ने उजागर किया था
हमारे समाज का ढोंग

उसकी मौत एक त्रासदी थी
उसकी गुमनामी की तरह
लेकिन वह प्रत्याख्यान नहीं थी उसके स्वप्नों की
भारतीय स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष में
याद किया जाना चाहिए परवीन बाॅबी को
पूरे सम्मान से एक शहीद की तरह
यह कहते-कहते भर्रा गया था
पत्नी का चेहरा दुःख से
लेकिन एक आभा भी थी वहाँ
मेरी चिर-परिचित वही आभा
जिसने कई बार रोशनी दी है मेरी आँखों को।

बेटियाँ

यह दिसम्बर की पहली तारीख की
ढल रही शाम है

धूप चुपके से ठहर गयी है
नीम की पत्तियों पर

इस समय मन में उजास है
इसमें टपकता है शहद की तरह
बेटियों का स्वर

बेटियाँ होती ही शहद हैं
जो मिटा देती हैं
आत्मा की सारी कड़वाहट

अभी कुछ पल बाद धूप सरक जाएगी
आँचल की तरह पत्तियों से
पत्तियाँ अनन्त काल तक नहीं रोक सकतीं धूप को
पर बेटियाँ नरम धूप की तरह
बनी रहती हैं सदा
पिता के संसार में

जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में

जो न हँसें बेटियाँ
तो अँधेरे में खो जाते हैं पिता।

मैं इक चिडि़या हूँ पापा!

मैं इक चिडि़या हूँ  पापा
देखो तो!

धरती चिडि़या के पास है
आसमान उसकी आस है
पंख उसके पास हैं
बिना रोक-टोक वह उड़ती है
थक जाए तो
जिस टहनी पर चाहती है
बैठती है
गीत अपने गाती है

देखो तो पापा
चिडि़या कितनी खुश है!
दाना उसकी चोंच में है
उसका घर
उसकी पसन्द है

देखो तो पापा
उसका घर!
वह दुनिया की पहली वास्तुकार
कितनी सजग उसकी दृष्टि
कितना सघन संसार

सोचो तो पापा
मैं तुम्हारी बिटिया
इक चिडि़या हूँ
अपने मन की!

सोचो तो पापा
सेचो न!

ओ मेरी बेटियो याद रखना

आओ बैठो मेरी गोदी में
झूलो मेरी बाँहों में
ओ मेरी बेटियो!
तुम लोगों के आने के बाद
शायद मनुष्य होने लगा हूँ
तुम लोगों की हँसी में हँसने लगा हूँ

तुम लोग नहीं जानतीं
तुम लोगों की जिह्वा पर विराजती पवित्रता और होठों की हँसी
हमारे समय में जीवन की आशा है

उम्र की तिजहरी में
यदि घेरने लगे उदासी चारों ओर से
तब भी कोशिश करना हँसते रहने की
तुम लोगों के खिलखिलाने में बचा रहेगा जीवन
बचा रहेगा मेरा विश्वास

ओ मेरी बेटियो!
जब जाना यह घर छोड़कर
मेरी आँखों के आँसू मत पोछना
डरना भी मत!
इन्हीं आँसुओं में झलकेंगी
मेरी छोटी-छोटी बेटियाँ

मेरी मुझसे बड़ी बेटियाँ
मेरी छाती पर खेलतीं मेरी बेटियाँ

ओ मेरी बेटियो याद रखना
यदि जीवन में दुःख का आलाप दीर्घ होने लगे
तब भी परछाइयों के पीछे-पीछे मत भागना
डरना नहीं किसी आईने से!

ओ मेरी बेटियो!
मेरी आँख की पुतलियो!
न डरना न हारना
लड़ना समय से।

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को

चिन्तकों ने कहा है
पेट न हो तो शायद
आदमी स्वाभिमान से जिए

वह पेट ही है
जो मुझे खींच लाया एक ऐसे शहर में
जहाँ दिन बड़े विचित्र थे
रातें बड़ी भयावह
दृश्य अमावस में पहाड़ जैसे थे

उस शहर में कुछ पल बढ़ते थे
मैं भी कुछ दूर आगे तक
फिर लगता था
कहाँ जा रहा हूँ-कहाँ आ गया हूँ
इस तरह कब तक चलेगा
कैसे मिटेगी प्यास थूक घोंटने भर से

समझ में नहीं आता था
कि आदमी के चेहरे बदले हैं
या जीवन की भाषा
या मेरी आँखों में उतर आया है
किसी पोखर का रंग

सचमुच जीने के ढेर सारे उपाय
निरर्थक बेमानी-से लगते थे
हार जाऊँगा हर पल लगता था

पर ऐसे ही पलों में
अक्सर स्मृतियों से झाँकता था एक चेहरा
बहुत उदास पर मुस्कराता हुआ
प्राणवायु की तरह

सोचता था किसी दिन लौटूँगा
सगुन का पान लिए फलों की टोकरी के साथ
जैसे लौटते हैं सपने वसन्त के दिनों में
फागुन के रंगों में
जैसे लौटते हैं पत्ते पतझड़ के बाद टहनियों तक
मैं भी लौटूंगा उस चेहरे तक

इस प्रकार एक अपरिचित शहर में
असमय मृत्यु से बचाती रही
स्मृतियों में बसी एक स्त्री

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को।

जनवरी की एक सुबह उठीं तीन स्त्रियाँ

जनवरी की एक सुबह
लगभग साढ़े चार बजे उठीं तीन स्त्रियाँ
आँखों में नींद और देह में थकान लिए

उन्हें तैयार करना था
अपने-अपने पति को आॅफिस के लिए

उनके पति उठे जब बिस्तरों से
देह तोड़ते हुए
आँख मलते हुए

वे तैयार थीं चाय लेकर
बँध चुका था टिफिन गरम हो चुका था नहाने का पानी
रखा जा चुका था तौलिया  अपनी जगह पर
कपड़े तैयार थे इस्त्री करके
जूते में लग चुका था पाॅलिश

और अब जो करना था पुरुषों को
वह समस्या थी देह की।

सपने में एक लड़की: सोनमछरी

कस्बे में लड़का है
लड़के के सपने में लड़की है: सोनमछरी

लड़की का आना
लड़की का जाना
सिर को झुकाना
झुका के न उठाना
कभी मुस्कुराना कभी लाज से भरभराना

कभी उसकी आँखों में कातिक कभी सावन
कभी बैसाख का आना

बहुत कुछ का लड़के की समझ में न आना
उम्र की ताप में बस देह का पकना
कहीं कुछ टूटना कहीं जुड़ना कोई सपना

उसका कस्बे में होना
गरीबी में जीना
किसी हसीन शाम के लिए तरसना उभ्र भर
उसकी फितरत में भरता है कुछ
जैसे जीने की लालसा अपनी तरह से

पर जिन्दगी की अपनी कहानी है
वह लड़का जिसका दिन
शुरू होता है एक नए सपने से
और जिसकी रात
शोक की रजाई में मुँह छिपाकर
लेट जाती है उससे चिपककर

उस लड़के के सपने में
आती है एक लड़की: सोनमछरी।

आभा चतुर्वेदी

चार वर्ष बाद
आज अचानक दिखी वह
‘कहो ना प्यार है’ का पोस्टर निहारती हुई

चार वर्ष पहले वसन्त के दिनों में
आभा चतुर्वेदी से आभा द्विवेदी हुई
वह आभा शर्मा होना चाहती थी

पर जो न हो सका
विवश हो उसे आँख के काजल की तरह धोकर
उसे बनना पड़ा आभा द्विवेदी

आज वही आभा निहार रही थी पोस्टर
मैंने एक बार फिर गौर से देखा
और बढ़कर चौंका  दिया उसे

मुझे देख विस्मित उसने
पल भर में ही पूछ लिए न जाने कितने प्रश्न
पर नहीं दिया मेरे पहले ही सवाल का जवाब

मैंने पूछा पति-परिवार के बारे में
वह बताने लगी माँ-बाप भाई के बारे में

मैंने पता पूछा घर का
तो देते हुए नम्बर कहा उसने
अकेली रहती हूँ
आभा चतुर्वेदी लिखती हूं
आस-पास के लोग इसी नाम से जानते हैं

हतप्रभ-सा मैं कह न सका कुछ भी
जबकि बातें बहुत थीं मेरे पास

आज चार वर्ष बाद अचानक इस तरह
एक टाकिज के सामने खड़ी
फिल्मी पोस्टर निहारती आभा चतुर्वेदी
मुझे पहले से भली-भोली लगी।

लड़कियाँ

हमारे समय की सबसे बड़ी घटना है
कि लड़कियाँ कविता बनना नहीं चाहतीं

घर से लेकर कविता तक में
मुक्ति के लिए तड़प रही लड़कियाँ
घर और कविता को सजाते-सजाते
सजावट का सामान बनना नहीं चाहतीं

वे नहीं चाहतीं कि उन्हें बोझ समझा जाए

अपने जीवन के तमाम फैसले
स्वयं करना चाहती हैं लड़कियाँ

लड़कियाँ जीवन में पल-पल की घुटन से
मुक्त होकर इन्सान की तरह
पूरे सुकून से जीना चाहती हैं

वे अक्सर देर से घर लौटने पर
पिता या पति की आँखों में
संदेह नहीं, बस प्रेम देखना चाहती हैं

अब लड़कियाँ कहावतों से बाहर आना चाहती हैं
जीवन में देखना चाहती हैं अपनी आँखों से
‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’

यह स्त्री, जिसे देख रहे हैं आप
(धारचूला की अपनी छात्राओं को याद करते हुए)

चढ़ती दोपहर की
चिलचिलाती धूप में
जब चुभती हैं किरणें

उतर रही है एक स्त्री
पीठ पर घास का गट्ठर लेकर
पहाड़ी जंगल से घर की ओर

यह स्त्री मुँह अंधेरे
घर से निकली थी
कुछ रूखा-सूखा बाँधकर

घर पहुँचकर इस स्त्री को
मवेशी खिलाने के साथ-साथ
चिन्ता करनी है घर-भर के पेट की

इस स्त्री ने नहीं देखी हैं रेलगाडि़याँ
लखनऊ और दिल्ली

मुजफ्फरनगर की एक मनहूस दोपहर
शूल की तरह चुभती है इसे

यह चिडि़याघर और भूल-भूलैया नहीं चाहती
अपनों का सुख चाहती है
पहाड़ का सुख चाहती है

यह स्त्री जिसे देख रहे हैं आप
यह तीस की उम्र में
सैंतालिस की चिन्ताओं का घर है।

सोनचिरई

(एक सोहर सुनने के बाद)

बहुत पुरानी कथा है
एक भरे पूरे घर में
एक लड़की थी सोनचिरई

वह हँसती थी
तो धूप होती थी
फूल खिलते थे

वह चलती थी
तो वसन्ती हवा चलती थी

जिधर निकल जाए
लोगों की पलकें बिछ जाती थीं

और जैसाकि हर किस्से में होता है
उसका विवाह भी एक राजकुमार से हुआ

राजकुमार उस पर जान लुटाता था
उसके होंठ उसकी तारीफ में खुलते
उसकी जिह्वा उसके प्रेम के सिवा
और सारे स्वाद भूल गई थी

उसकी आँखों में नींद
और दिल में करार न था

और ऐसे ही दो-चार वर्ष बीत गए
सोनचिरई की गोद न भरी
ननद को भतीजा
सास को कुल का दिया
पति को पुरुषत्व का पुरस्कार न मिला

ननद कहने लगी ब्रजवासिन
सास करने लगी बाँझ
और जो रात-दिन समाया रहा उसमें साँसों की तरह
उसने कहा तुम्हारी स्वर्ण देह किस काम की
अच्छा हो तुम यह गृह छोड़ दो
तुम्हारी परछाईं ठीक नहीं होगी हमारे कुल के लिए

सोनचिरई बहुत रोई
मिन्नतें की
पर किसी ने न सुनीं

आँसुओं बीच एक स्त्री
घर के बाद
भटकने लगी ब्रह्माण्ड में

उसे जंगल मिला
जंगल में बाघिनी मिली
उसने उसे अपना दुःख सुनाया
और निवेदन किया कि वह उसे खा ले

बाघिनी ने कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
मैं तुझे न खाऊंगी
वरना मैं भी बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई क्या करती!

वहाँ से साँप की बांबी के पास पहुँची
बांबी से नागिन निकली
नागिन ने उसका दुःख सुना
फिर कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
जो मैं तुझे काट खाऊँगी
तो बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई बहुत उदास हुई
फिर क्या करती!
गिरते-पड़ते माँ के दरवाजे पहुँची

माँ ने धधाकर हालचाल पूछा
कौन सी विपत्ति में दुलारी बिटिया ऐसे घर आई है

बेटी ने अपना दुःख सुनाया
और चिरौरी की कि थोड़ी सी जगह दे दो माँ रहने के लिए

माँ ने कहा विवाह के बाद बेटी को
नैहर में नहीं रहना चाहिए
लोग-बाग क्या कहेंगे
वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो

और सुनो बुरा न मानना बेटी
जो तुम्हारी परछाँई पड़ेगी
तो मेरी बहू बाँझ हो जाएगी

यह कहकर माँ ने अपना दरवाजा बन्द कर लिया
अब सोनचिरई क्या करती!

उसने धरती से निवेदन किया
अब तुम्हीं शरण दो माँ
दुःख सहा नहीं जाता
इन कदमों से चला नहीं जाता
जो लोग पलकों पर लिए चलते थे मुझे
उनके ओसारे में भी जगह न बची मेरे लिए
अब कहाँ जाऊँ तुम्हारी गोद के सिवा

धरती ने कहा तुम्हारा दुःख बड़ा है
लेकिन मैं क्या करूँ
जहाँ से आई हो वहीं लौट जाओ

जो मैं तुमको अपनी गोद में रख लूँगी
तो ऊसर हो जाऊँगी

और मित्रो इसके आगे जो हुआ
वह किसी किस्से में नहीं है

हुआ यह कि सब ओर से निराश
सोनचिरई बैठ गई एक नदी के किनारे

एक दिन गुजरा
दो दिन गुजरा
तीसरे दिन तीसरे पहर एक सजीला युवक
प्यास से बेहाल नदी तट पर आ मिला

उसने सोनचिरई को देखा
सोनचिरई को देख
पल भर के लिए वह सब कुछ भूल गया

उसने विह्वल हो नरम स्वर में
सोनचिरई से दुःख का कारण पूछा
और सब कुछ जान लेने पर
अपने साथ चलने का निवेदन किया

सोनचिरई पल-छिन हिचकी
फिर उसके साथ-साथ हो ली

और उसके साथ पूरी उम्र जीकर
जब वह मरी
तो आँसुओं से जार-जार उसके आठ बेटों ने
उसकी अर्थी को कंधा दिया

सोनचिरई आठ बेटों की माँ थी
वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बाँझ नहीं होतीं

वे रचती हैं!
वे रचती हैं तभी हम-आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता

वे होती हैं तभी पुरुष
पुरुष होते हैं!

सुनीता की कविताएँ

सुनीता 

युवा कवयित्री. दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में शोधरत . संपर्क :sunitaws@gmail.com

1. हम लड़कियाँ
पहली बार जब मुझे आई थी माहवारी
अम्मा ने कहा
बच्चा रुकने का खतरा है
मन में एक सवाल आया था
माहवारी का बच्चा रुकने से क्या सम्बन्ध ?
उस वक़्त कुछ समझ में कहा आया था
अम्मा ने सबकी नजरों से बच के
टाटी का ढाई बन्हा कटवाया था
अब मेरे स्कूल जाने और आने का वक़्त
तय होने लगा था
और रास्ते लम्बे और लम्बे होते जा रहे थे
मेरी दुनिया से लड़के गायब कर दिए गये
और कुछ ‘मनचली’ लडकियां भी
मेरी सुबहें जल्दी और जल्दी होती जा रही थी
मैं अम्मा की जगह लेने लगी थी
मेरे गाँव की लड़कियाँ ब्याही जा चुकी थीं
और मैं स्कूल जाने लगी थी अकेली
उन दिनों मैं रास्ते में अकेली
एकदम अकेली होती जा रही थी
और गाँव वाले कहते थे कि
पढ़ने वाली लडकियां होती हैं रंडी
मेरी छठवीं कक्षा की दोस्त कनीज
कहा करती थी कि अच्छी लड़कियाँ
रास्ते में नजरे झुकाकर चलती हैं
और जोर जोर से हँसना भी ठीक नही
और मैं डरती और डरती चली जा रही थी
रास्ते के किनारे शौच को बैठा पुरुष
अपना लिंग हिलाता
हम सहेलियां अपने मन का प्रेम तो छुपा लेती थीं
पर माहवारी की तारीखें नहीं
हमें याद है उन दिनों एक-दूसरे को ढकते हुए चलना
मेरी सहेलियां जो सवर्ण थीं
नही होता था फर्क मेरे और उनके दर्द में
उन मुश्किल दिनों में वे भी
होती थीं एकदम अकेली
रसोई में तो सख्त मनाही थी
सर्दियों में भी चटाई पर सोती थीं
मुझे याद है कि उन दिनों
काम न करने के कारण
मैं कई बार पड़ती थी मार
आज भी हम डरते हैं उस दाग से
मेरे अन्दर से रिसता खून
उतर आया है मेरे चेहरे पर
मानो दाग न हुआ अपराध हो
और हम अपराधी !!

2. हमें डर लगता है
हमें डर लगता है किराये के कमरों में
आंबेडकर की फोटो लगाने से
घुलने मिलने में डर लगता है
पास पड़ोस के लोगों से
कहीं पूछ न लें हमारा पूरा नाम
गावों में डर लगता है
हिन्दुओं के खेतों में हगने से
खेत से सटी सड़कें भी होती हैं उन्हीं की
देखकर देते हैं
गालियाँ धड़ल्ले से
मेरे भैया जो अब नाम के आगे लगाते हैं सिंह
क्योंकि डरते हैं हमारे लोग
काम न मिलने से
आरक्षण को ख़त्म करने की
बहस हो चली है तेज
उनका  नाम पूछने पर
वे बताएँगे अपना नाम
पाण्डेय ,राव साहब ,पंडी जी चाय वाले
उत्तर और दक्षिण के भूगोल से
नहीं हैं बाहर हम अभी भी
यहाँ शहरों में भी हैं
गलियाँ बाल्मीकि और भंगियों की
हमें डर लगता है
जिन्दा जलाये जाने से
बलात्कार और फांसी पर चढ़ाये जाने से
हमें नहीं चाहिए ऐसा समाज
जो पीछा करता है हमारे नाम और काम से.

3. दिल्ली
पूरा का पूरा शहर भाग रहा है
गाड़ियाँ, मेट्रो, सड़कें और वक्त भी
नहीं भाग पाते सड़कों के किनारे
और सड़कों के बीचो-बीच खड़े पेड़-पौधे
वक्त नहीं भागता यौनकर्मियों का भी
जिनकी शामें ढलते ही
सदियों सी लम्बी हो जाती हैं रातें
वे ठूस दी गयी होती हैं
कोठों में प्रेम के नाम पर
बचपन निकल जाता है
भूख की आग मिटने में
वह बच्चा फेंक आता है अपनी उम्मीदें
कूड़े के ढेर पर
वह मोची अपने सपने गुथकर सिल देता है
ग्राहकों के जूतों में
हमें तेजी से पहुंचता रिक्शेवाला
नहीं जा पाता मेट्रो में भागकर भी.

4. मैं
मैं जातीय दीवार की वो ईंट हूँ
जिसके खिसक जाने से
पूरी दीवार ढह जाती है
हकीकत हूँ उस परिवार की
जहाँ हर ख्वाहिशें मिटा दी जाती हैं
मैं उस समाज का आइना हूँ
जिसमे जुल्म की सूरत बदलती रहती है.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम

मुहीम की संयोजक निकिता आजाद बता रही हैं ‘ हैप्पी टू ब्लीड’ कैम्पेन के बारे में 


निकिता आजाद ने २० नवम्बर को सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुरोहित परयार गोपालकृष्णन  को पत्र लिखा. मंदिर के इस मुख्य पुरोहित ने इसके पहले कहा था कि, ‘यदि प्यूरिटी चेकिंग मशीन का आविष्कार हो जाये, जो यह देखे कि महिलाएं माहवारी के दिनों  में हैं या नहीं , तभी वह महिलाओं के मंदिर में जाने देने पर विचार करेगा.  पुजारी के इस सेक्सिस्ट रिमार्क के बाद निकिता आजाद ने अपने कुछ साथियों के साथ उसे एक पत्र लिखा, जो ‘यूथ की आवाज’ में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ. इसके साथ ही निकिता और उसके साथियों ने सोशल मीडिया में ‘ हैप्पी  टू ब्लीड’ , कैम्पेन 21 नवम्बर से शुरू किया, जो जल्द ही वायरल हो गया. फिर क्या – जैसा कि इन दिनों चलन सा हो गया है उन्हें सोशल मीडिया के उग्र हिन्दूवादी, जो खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं, समूह से गालियाँ मिलनी शुरू हुई . उन्हें वेश्या , ज्यादा पढी –लिखी , एंटी हिन्दू , राष्ट्रद्रोही आदि विशेषणों से नवाजा गया.

गर्ल्स कॉलेज पटियाला की छात्रा निकिता ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए बताया कि ‘उनकी मुहीम किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, महिलाओं के लिए प्राकृतिक ‘ माहवारी’ को सभी धर्मों में टैबू की तरह देखा जाता है.’ छात्र आन्दोलनों से जुडी निकिता कभी छात्र संगठन डी एस ओ से जुडी रही हैं . वे कहती हैं कि ‘ यह मुहीम किसी छात्र संगठन के बैनर तले नहीं है. यह एक समविचार छात्रों का समूह है. ‘हैप्पी टू ब्लीड’ कैपेंन और सबरीमाला के पुरोहित को पत्र निकिता और उनके साथी सुखजीत की संयुक्त पहल से स्वरूप में आये. निकिता कहती हैं, ‘ हम छात्राओं ने हाल ही में अपने कॉलेज के  सुपरिन्टेन्डेन्ट के खिलाफ मुहीम छेड़ी थी , जब उसपर छात्राओं के साथ छेड़ –छाड़ का आरोप लगा था.

निकिता कहती हैं , ‘ माहवारी को शर्म का विषय बनाना  पितृसत्ता का एक फॉर्म है , ऐसा नही है कि यही एक धूरि है पितृसत्ता की, बल्कि पितृसत्ता एक जटिल संरचना है– यह स्त्रियों को दोयम नागरिक बनाती है. महिलाओं और दलितों पर शुद्धता –अशुद्धता का निर्धारण कर वर्चस्वशाली सत्ता सम्पत्ति पर कब्जे के समीकरण बनाती रही है – सम्पत्ति के अधिकार से इसी तरह उन्हें वंचित किया गया है. मिल्कियत न देने की साजिशों की हद है कि एक समूह को पैरों से उत्पन्न बताया गया.’

निकिता आजाद

माहवारी का टैबू  स्त्री की गत्यात्मकता , निर्णय का उसके अधिकार , उसकी देह पर उसके अधिकार , आदि के साथ जाकर जुड़ता है . माहवारी शुरू होते ही लडकी के सेक्सुअल व्यवहार और उसके हर आचार – व्यवहार पर नियंत्रण शुरू हो जाता है , इसके कारण २३ प्रतिशत महिलायें स्कूल छोड़ देती हैं. ८८ % महिलाओं को कपड़ों का इस्तेमाल करना पड़ता है.’

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए निकिता बताती हैं कि उनके पिता कृभको, लुधियाना में कार्यरत हैं, और माँ शिक्षिका हैं. ‘ हमारा घर लोकतांत्रिक रहा है. माहवारी शुरू होने के साथ घर में ख़ास समस्या नहीं हुई लेकिन समाज में चलन है कि माहवारी के दिनों में तुलसी के पेड़ को हाथ न लगाओ, खराब हो जाएगा , मंदिर  जाने से भी रोका जाता है . स्कूल के दिनों में याद है कि माहवारी के कारण हम दो लड़कियों को स्कूल में होने वाले हवन में जाने नहीं दिया गया था. घर में अपने सैनिटरी पैड छिपाना या इनके विज्ञापन आ रहे हों तो चैनल स्विच करने के लिए दौड़ना आदि तो आम बात है. ’

विषय के प्रति स्पष्टता के साथ निकिता कहती हैं कि ‘यह समस्या सामाजिक है, व्यवस्थागत भी है. इसे स्टेट के इंटरवेंशन से ही ख़त्म किया जा सकता है. एन जी ओ के स्तर पर,  कोर्पोरेट फंडेड एन जी ओ के स्तर पर यह संभव नहीं है. हम बाजार , कॉर्पोरेट के द्वारा स्त्रियों के शरीर को कमोडिफाय करने के खिलाफ हैं. बाजार अपना उत्पाद बेचना चाहता है. सैनिटरी नैपकीन के ‘ व्हिस्पर’ जैसे नाम पितृसत्ता के अनुरूप हैं.  अधिकांश महिलाओं के लिए स्टे फ्री , व्हिस्पर जैसे नैपकिन खरीदना मुमकीन नहीं है.’

‘जल्द ही हम अपने सात दिवसीय ‘ हैप्पी टू ब्लीड’ मुहीम की रिपोर्ट प्रकाशित करेंगे और आगे के अपने कैम्पेन के उद्देश्य और लक्ष्य बताएँगे.  हम चाहते हैं कि महिला आयोग स्टैंड ले और राज्य की जिम्मेदारी सुनिश्चित कराये कि माहवारी के दिनों में महिलाओं के लिए मुफ्त और सब्सिडाइज्ड हेल्थ केयर उपलब्ध हो. हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि स्कूलों में किशोरी योजना सहित अन्य स्कीम सही तरीके से इम्प्लीमेंट हों.’ निकिता के अनुसार चूकि वे निजी स्कूल की छात्रा रही हैं इसलिए माहवारी के बारे में शरमाते हुए बताया भी गया अन्यथा सरकारी स्कूलों से तो चैप्टर ही गायब कर दिया जाता है.

चेंज डॉट ओ आर जी पर मुहीम के द्वारा स्वास्थय  मंत्री को लिखा गया पत्र. अपने हस्ताक्षर के लिए क्लिक करें :  HAPPY TO BLEED: An Initiative to break menstrual taboos and myths!

‘हैप्पी तो ब्लीड मुहीम के बाद अभी स्वास्थय मंत्री को एक पत्र भेजा जा रहा है इस मांग के साथ कि महिलाओं के स्वास्थ्य से सम्बंधित सभी स्कीम इप्लीमेंट हों , नए स्कीम चलाये जाएँ और पहले से जो हैं उनका रिव्यू हो. इसके लिए जनवरी से हम ग्राउंड कैम्पेन करने वाले हैं.’

निकिता अपने साथ आये सभी लोगों का आभार जताती हैं , जो इस लोकतांत्रिक मुहीम में उनके साथ आये.

सोनी पांडेय की कविताएं

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

1. छोटे शहर की लड़की

छोटे शहर की लड़की
पारुल
जा रही है ब्याह कर
मुखौटों  के शहर दिल्ली
पति दिल्ली में  लाखों  के पैकेज पर कार्यरत है
गाड़ी . फ्लैट . और सुख सुविधाओँ से भरा जीवन होगा
बेटी का
इस लिए पिता ने लाखोँ खर्च कर भेज दिया
बेटी को बड़े शहर दिल्ली
अभी आऐ हुए
ज़ुमा – ज़ुमा चार दिन ही हुए थे कि पति ने फरमान जारी किया
ये गवारु परिधान
सिन्दूर . बिन्दी उतारो और
ठीक वैसे रहो
जैसे रहती हैं  बिल्डिंग  की औरतें
पारुल ने छोड़ दिए
पिहर के परिधान
अब वह पहनती है ठीक वही कपडे जो पहनता है
बड़ा शहर दिल्ली
अभी ज़ुमा -ज़ुमा आए चार माह ही गुजरे हैं  कि पति चाहता है
पारुल नौकरी करे ठीक वैसे
जैसे करती हैँ बिल्डिंग की  अन्य औरतें
फरमान जारी किया
पूरे दिन घर मेँ बैठी रहती हो गवारोँ की तरह
नौकरी करो
एम0ए0. बी0एड0
पारुल अब पढाती है पब्लिक स्कूल मेँ ठीक वैसे
जैसे पढाती हैं  औरतें छोटे शहरों  की
जैसे पढ़ाता है बड़ा शहर दिल्ली
सुबह आठ बजे से रात बारह तक
पति करता है काम बड़े पैकेज पर
बैंक  भर रहा है रुपयों  से
पति पारुल को पहनाता है मँहगे कपड़े . क्रेडिट कार्ड से कराता है खरीददारी
लेकिन नहीँ जानना चाहता पारुल की पसन्द
नही सुनना चाहता उसकी भावुक फरियाद
तुम औरतें सेण्टीमेण्टल होती हो
थोड़ी क्रेजी भी
जिन्दगी मेँ प्रेम एक जरुरत है फिजिकल
ठीक वैसे . जैसे भागती हुई मैट्रो मेँ जीता है
बड़ा शहर दिल्ली
पारुल तलाशती है मैट्रो में  बैठी
हम उम्र औरतों की आँखों  में
अपना छोटा शहर
अनगिन आँखोँ में  पाती है
प्यास अपनी सखियों  के सपनों की
भूख उड़ान की . मन भर अपने मन की
तलाश अपने पसन्द के कपड़ों  की
ख्वाहिशें  अपनी . अपना जीवन
अपनी शर्तों  पर जीना
लेकिन पिता चाहते हैं  बेटी राज करे पति के बड़े पैकेज की नौकरी मेँ
ठीक वैसे ही , जैसे करती हैं  छोटे शहर की लड़कियाँ
जीता है बड़ा शहर दिल्ली
लगा कर मुखौटा आधुनिकता का पारुल जीती है पति के शर्तोँ पर समेट कर आँखों
मेँ छोटे शहर के सपने .अपना जीवन
और तलाशती है हर एक मेँ अपना छोटा शहर ।

2. मुनिया अपना गाँव छोड़ आई 

कुल तेरह की थी
मुनिया
जब ठेकेदार संग अपने टोले की लड़कियों  और जवान औरतों संग
आई थी शहर
ईँट के भट्ठे पर
कमाने
विधवा माँ के लिए
थोड़ा सा धन जुटाने
कि .छुड़ाई जा सके
बनिये से चार बिस्से रेहन की ज़मीन ।
इसी माह जाना था उसने माहवारी का दर्द
माँ थोडी सहमी थी
बेटी सयानी हो गयी
फिर भी भेजना जरुरी था
कोई चारा नहीँ
ज़मीन छुड़ानी है ।

मस्त . मासूम मुनिया
पूरे दिन चालती है . फोडती है मिट्टी के ढेले
सानती है . माढती है
थापती है ईँटे और जल्दी – जल्दी समेट कर छोटे .
पुराने बक्से मेँ रुपये
भाग जाना चाहती है
वापस अपने गाँव , सिवान
बस इतना जानती है कि दुनिया
बिहार और उसका देस
सिवान है
बाकी सब परदेस ।

मुनिया की सुकोमल उँगलियों
बलिष्ठ माँसपेशियों
और सुडौल उभारों  को देख कर
ठेकेदार मुस्कुराता है
पुरानी मजुरनियों  को कनखी से समझाता है
आए दिन रात को शराब परोसने की  ऐवज में  पचास की नोट पकडाता है
मुनिया फँसती गयी वैसे ही जैसे चारे के लालच मेँ फँसती है मछली और अन्ततः
बिक जाती है मनुष्यों  के बाजार में  ।

मुनिया के बक्से मेँ रुपया है
नये कपड़े हैँ
कुछ चाँदी के गहने है
बरसात मेँ ट्रैक्टर पर बैठकर लौट रही है अपने देस सिवान
पूरे एक साल में  बन गयी है सुडौल . सुगढ औरत ।

खेत छूट गया
अब टोले भर के लडके उसे रण्डी पुकारते हैं
माँ आँखे चुरा कर चलती है
जीना मुहाल है
रात मेँ खटकता है अक्सर दरवाजा
माँ दस साल की छोटी बेटी को छाती से साट कर
चमईनिया माई को गुहराती है ।
अब मुनिया माँ के लिए बोझ है कोई ब्याह को तैयार नहीँ
कोई रास्ता नहीँ
एक बार फिर मुनिया . टोले की कुछ लड़कियों  और औरतों  संग आ गयी है भट्ठे पर
ठेकेदार अब कोई नयी लड़की चाहता है ,मुनिया को कनखियाता है
मुनिया जानती है कि नहीं  लौट पाएगी भोगी हुई लडकी
वापस अपने देस
इस लिए . बार – बार परोसती है खुद को
बचा कर कुछ लड़कियों  को पाती है सुकून
भेज कर बरसात मेँ वापस उन्हेँ अपने देस
लौट आती है इंटों  के बीच
सुलगती भट्ठी को देखर रोती है
और उँगलियों  से बनाकर
दुनिया का गोला
खोजती है अपना देस सिवान ।

3. अपनी जड़ें  तलाशती सन्नो 

पिता ने तलाश ली है
नई उर्वरा ज़मीन
खूब विस्तार है
पास ही नदी बहती है
दरवाजे पर राजा की सवारी है
परजा है
पसारी हैं
दूर तक फैला है ठाट
पिता की इकलौती सन्तान सन्नों
खोदी जा रही है जड़ समेत
धूम – धडाके . गाजे – बाजे
सहनाईयों  की धुन  पर चल रहा है कुदाल
हल्दी . मटमंगरा .
बारात . द्वारपूजा
और अन्ततः सिन्दूरदान
उखड़ गयी सन्नों
कराहते . रोते . चित्कारते पहुँची
नई ज़मीन मेँ
गाड़ी जारही है सन्नो
भर रहे हैँ घाव
निकल रही हैं  शाखाएँ
लेकिन जड़ों से उखाड़ी गयी सन्नों  जानती हैं
उखडना उसकी विवशता है
उखाडी जा सकती है एक बार फिर से बेटों के हाथों
और बीच से काटकर
बांटी भी जा सकती है
इस लिए अपनी जड़ोँ की तलाश मेँ गढना चाहती बेटी के लिए
एक ऐसा गमला जिसे आसानी से जड़ समेत आयात – निर्यात किया जा सके . बिना उखाडे ।

4. हम पूरब मेँ सूर्य को निहार लेते हैं 

अल सुबह
पूरब मेँ उगते सूर्य को निहारना
वस्तुतः एक ऐसी क्रिया है
जो जोड़ती है हमेँ जड़ोँ से ।
हम औरते
सभ्यता के गमले मेँ
उगा हुआ बोनजाई हैँ
जिसे आसानी से हस्तानान्तरित किया जा सकता है ।
संवेदना की ज़मीन से उखाड़कर
पैदा होते ही रोप दिया जाता है आँगन मेँ एक किनारे
गमले मेँ
खाद .पानी देकर इस तरह तैयार किया जाता है कि
एक तय समय सीमा मेँ
दान किया जा सके दूसरे के आँगन मेँ ।
दूसरे आँगन मेँ जगह बदलती जरुर है
किनारे से हटा कर आँगन के मध्य तुलसी की तरह सजा दिया जाता है और जरुरत भर
खाद . पानी समय – समय पर मिलता है
सम्मान थोड़ा बढाकर ।
हम औरतेँ जड़ोँ की तलाश मेँ पूजतीँ हैँ तुलसी
भोरे निहार आती हैँ सूरज
कि . उनकी जडोँ से इनका उतना ही गहरा नाता है
जितना शिशु का गर्भनाल से और
मन ही मन कर लेती हैँ सन्तोष की सूरज आज भी माँ के गर्भनाल से जुड़ा
जोड़ता है उन्हेँ जड़ोँ से ।

5. हत्याओं  के इस दौर में
हत्याओं  के इस दौर मेँ
हत्यायें बिना किसी धारदार हथियार के वार के होती हैं  ।

ये हत्यायें समूह में  घेर कर की जाती हैं तोड कर मनोबल
और  जीते जी बना दिया जाता है जिन्दा लाश ,
मार कर व्यक्ति की पहचान ।

ये हत्यायें अनैतिकता की पराकाष्ठा पर पहुँच  सुखा  देती हैं  मनुष्यता के
जड़ मेँ बचे जीवन के अन्तिम अवशेष को और शेष बचता है केवल बंजर उजाड़ ज़मीन
.
जहाँ हत्याओँ का औजार संवेदनाओं की रेत में दबाकर सहेजा जाता है ।

ये हत्यायें गवाह हैं अपने समय की साजिशों के, जिन्हें  लिखते समय काँप
जाती है इतिहास की कलम
और न जाने कितनी कोशिशें रक्तरंजित चित्कारती मिलती हैं  भग्नावशेषों पर ।

हाँ  मैँ जानती हूँ हत्यायें होती रही हैं  हर युग में  मनुष्यता के
विरुद्ध और मरता रहा है इमान
संसार की सबसे भयंकर त्रासदी की तरह ,
जिसकी समाधि पर लेते हैं  शपथ आज भी लोग जन क्रान्ति की
शायद इनकी समाधि के वजूद ने बचा रक्खा है थोड़ा सा नैतिक पक्ष जीवन का ।

ये हत्यायें कभी राजनीतिक
कभी सामाजिक और कभी
साहित्यिक हत्यायें होती हैँ
जिसके निशान मिल जाते हैँ
गली . कूचे . कारखानों और थोडा सा गोदान मेँ ।
जहाँ होरी और धनिया का लोक संघर्ष अपनी  सै मेँ जिन्दा है
गाँधी और लेनिन की समाधियोँ मेँ गाता है
निराला के बादल राग सा दहाडता है
ओढकर हत्याओँ का कफन अपने पूरे वजूद के साथ ।

हत्यायें सिद्ध करती हैं अपने नुकिले नाखुनोँ का पैनापन
धारदार दाँतोँ का आघात
पीठ में  घोपे जाने वाले खंजरों  का वज्र आघात ।

इन हत्याओँ की नीव पर रखी गयीँ है हर दौर मेँ निमार्ण की बुलन्द इमारतेँ
और उसकी इबारत मेँ लिखी मिलती है चुटकी भर मनुष्यता
और बचा रह जाता है हर दौर मेँ मनुष्य ।

तुम हत्याओँ के प्रणेता बन भले चमको अपने दौर मेँ किन्तु इतिहास के पास
तुम्हारे लिए काली स्याही के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं  होगा .
जिसे याद कर थूकेगी मनुष्यता और याद करेगी हत्यारों  की साजिशें ।

हत्यायें थमी नहीं थीं  हत्याऐँ होती रही हैं
हत्यायें जारी हैं  इस दौर में  अपने चरम पर चित्कारते हुए
बेचैन है मनुष्यता ।

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

प्रति 
प्रधान मंत्री 
भारत सरकार 
प्रिय महोदय,
यह पत्र भारतीय मुस्लिम महिलों के लिए इन्साफ और बराबरी की हमारी चिंताओं से आपको वाकिफ़ कराने के उद्देश्य से प्रेरित है. 1985 के शाहबानों प्रकरण के बाद से आज तक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के सन्दर्भ में कभी सुना नहीं गया- हमारे देश की राजनीति को बहुत –बहुत शुक्रिया ! मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस को कुछ रेवायती और पितृसत्ताक पुरुषों ने कब्जा रखा है और उन्होंने मुस्लिम पर्सनल ला में किसी सुधार के प्रयास को रोकने की ही कोशिश की है.  इस तरह मुस्लिम महिलाओं को कुरआन-शरीफ़ से मिले अधिकारों से और भारतीय नागरिक होने के अधिकारों से महरूम रखा गया है. प्रायः सभी मुस्लिम मुल्कों, जैसे मोरक्को , ट्यूनीशिया, टर्की , इजिप्ट , जॉर्डन आदि यहाँ तक कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुस्लिम मुल्कों ने भी विवाह और परिवार के मामलों में पर्सनल लॉ को कोडिफाय किया  है- धन्यवाद हमारे खुदसाख्त रेवायती नेताओं का कि भारतीय मुसलमानों को यह सुविधा नहीं हासिल है परिणाम स्वरूप, हमारे समाज में तीन –तलाक और बहु –विवाह के मामले जारी हैं.

साभार गूगल

जैसा कि जाहिर है , सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस अनिल दवे और आदर्श कुमार गोयल ) ने भारत सरकार को 23 नवम्बर तक अपना जवाब फ़ाइल करने के लिए कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ जेंडर –विभेद को संविधान की धारा 14,15 और 21 के तहत मूल अधिकारों का एवं अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाना चाहिए ? हम भी मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ क़ानूनन भेदभाव संविधान की उक्त धाराओं का उल्लंघन है. हमने अभी –अभी 10 राज्यों के 4710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गये रीसर्च के परिणाम प्रकाशित किये हैं. 92.1% महिलाएं मौखिक और एकतरफा तलाक पर प्रतिबन्ध की पक्षधर हैं , वहीं 91.7% महिलाएं बहु-विवाह के विरोध में हैं. 83.3% महिलाओं ने कहा कि कोडिफायड मुस्लिम पारिवारिक लॉ बनाये जाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिल सकेगा. अलग –अलग राज्यों में हमारे जमीनी कार्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर हैं कि हिन्दू , क्रिश्चन , पारसी पर्सनल लॉ की तरह कोडिफायड मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया जाना जरूरी है, यह मुस्लिम महिलाओं की बराबरी और गरिमा को सुनिश्चित करेगा.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में ( बी एम एम ए) एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और खासकर मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है. यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है. 9वें साल में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सदस्यों की संख्या 70,000 तक हो गई है, जो 13 राज्यों में फ़ैली है. यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और कुरआन के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है.

साभार गूगल

भारतीय मुस्लिम महिलाओं को न्याय शरीयत क़ानून , 1937 में  और डिजाल्युशन ऑफ़ मुस्लिम मैरेज एक्ट , 1939 में सुधार  से अथवा नये मुस्लिम पर्सनल लॉ के निर्माण से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने कुछ सालों से हजारो मुस्लिम महिलाओं, वकीलों , धार्मिक विद्वानों की सलाह/ सुझाव से कुरआन के सिद्धांतों के अनुरूप मुस्लिम फॅमिली लॉ का ड्राफ्ट बनाया है, जिसमें विवाह की उम्र, मेहर , तलाक़, बहु-विवाह , निर्वाह –भत्ता (मेंटेनेंस) और बच्चों पर अधिकार जैसे विषय शामिल हैं. इस ड्राफ्ट के कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. शादी की न्यूनतम उम्र , लडकी के लिए 18 और लड़के के लिए 21. 
2. बिना बलप्रयोग के और बिना किसी धोखे के दोनो पार्टी की सहमति
3. निकाह के समय दुल्हे के एक साल की आय के बराबर का न्यूनतम मेहर 
4. मौखिक तलाक अवैध घोषित हो. तलाक –ए-अहसन 90 दिन के भीतर अनिवार्य आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया से हो 
5. शादी के भीतर निर्वाह की जिम्मेदारी पति पर हो , यद्यपि पत्नी का स्वतंत्र आर्थिक आधार हो,  तो भी. 
6. मुस्लिम वीमेंस प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट , 1986 के अनुसार मेंटेंनेस
7. बहु –विवाह अवैध घोषित हो 
8. माँ और  पिता, दोनो बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक हों 
9. बच्चे का संरक्षण ( कस्टडी ) उसके हितों के अनुसार और उसकी इच्छा के अनुरूप हो 
10. हलाला अपराध की श्रेणी में हो 
11. मुता निकाह भी अपराध की श्रेणी में हो
12. सम्पत्ति के मामले में  कुरआन के नियम लागू हों, कर्ज अदायगी और वसीयत के बाद  
13. लड़कियों को लड़कों की तरह वसीयत/ उपहार या हिबा के जरिये संपत्ति में बराबर भाग हो 
14. निकाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन
15. तलाक , बहु –विवाह नियमों के उल्लंघन की स्थिति में काज़ी को जिम्मेवार माना जाये


इस पत्र के साथ पूरे ड्राफ्ट की कॉपी संगलग्न है. यह मसौदा  मुस्लिम महिलाओं की मांगों और उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ है और इसके प्रावधान उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करेंगे.
हमारा अनुरोध है , कि सरकार किसी कानूनी पहल का निर्णय लेती है , तो मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार और बराबरी तथा न्याय के संदर्भ में उनके मत का आदर करे.
सधन्यवाद !
नूरजहाँ साफ़िया नियाज़ ज़ाकिया सोमान
संस्थापक , भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन



भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का नेतृत्व



प्रधानमंत्री को इस पत्र  के बाद एन डी टी वी पर ‘बड़ी खब’ की बहस के लिए उसकी प्रस्तुतिकर्ता निधि का नोट 


 भारत में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, करीब 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी चाहती हैं। सिर्फ तलाक शब्द का जिक्र भर कर देना, खासकर आजकल सोशल मीडिया के स्काइप, एसएमएस, व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर तलाक कह देना, इससे समाज में चिंता बढ़ गई है।

देश के 10 राज्यों में एक गैरसरकारी संस्था ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ ने 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय जानी। यह संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए काम कर रही है। उसने पाया कि ज्यादातर महिलाएं आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर थीं और घरेलु हिंसा का शिकार थीं। इन महिलाओ ने शादी, तलाक, एक से ज्यादा शादी, घरेलू हिंसा और शरिया अदालतों पर खुलकर अपनी राय रखी।

राय देने वालों में 73 फीसदी गरीब तबके से थीं, जिनकी सालाना आय 50 हजार से भी कम है। सर्वे में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। यह अध्ययन सन 2013 में जुलाई से दिसम्बर के बीच हुआ।

अध्ययन में सामने आए नतीजों के मुताबिक 92% मुस्लिम महिलाएं मौखिक तलाक के खिलाफ़ हैं। मुस्लिम महिलाओं ने तलाक को एकतरफा नियम बताया। 93% चाहती हैं कि कानूनी प्रक्रिया का पालन हो। उन्होंने तलाक के केस में मध्यस्थता की मांग की। ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ का कहना है कि 2014 में महिलाओं के 235 मामले, जो कि महिला शरिया अदालत में आए, में से 80 फीसदी मौखिक तलाक के थे।

अपने कार्यक्रम ‘बड़ी खबर’ से पहले जब कुछ रिसर्च की तो हैरान करने वाली जानकारी मिली। कई इस्लामिक देशों में ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी  है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया, अलजीरिया, ईराक, ईरान, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में तो इस पर 1961 में रोक लगा दी गई थी…जब फेमिली लॉ आर्डिनेंस लागू किया गया था। इसके तहत हर शादी की रिजिस्ट्री और तलाक से पहले सुलह की कोशिशें एक सरकारी अधिकारी के सामने ज़रूरी हैं। यह भी पता चला की दूसरी शादी पर मलेशिया और ब्रुनेई में रोक है और तुर्की, मिस्त्र, सूडान, ईराक और पाकिस्तान में यह सख्त कायदों के बाद ही हो सकती है।

कई इस्लामिक देशों में एक तलाकशुदा महिला को जीवन निर्वाह के पैसे पति से मिलते हैं, लेकिन हमारे यहां भारत में उसको वक्फ बोर्ड पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना रहा है कि सबसे बड़ी मुश्किल मुस्लिम महिलाओं में जानकारी की कमी है। अन्य देशों में महिलाओ ने इस प्रथा के विरोध में आवाज उठाई है, लेकिन यहां उस प्रकार की सक्रियता देखने को नहीं मिली है। इस बारे में अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समय-समय पर चिन्ता जाहिर कर देता है। कहते हैं कदम उठाएंगे, लेकिन हर बार कुछ रुकावटें आ जाती हैं।

नूरजहां साफिया नियाज संबोधित करती हुई

अल्पसंख्यक आयोग के के पूर्व चेयरमेन प्रोफेसर ताहिर महमूद का कहना है कि ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी लगा देनी चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को समाप्त कर देना चाहिए। वे मुस्लिम लॉ पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना रहा है कि मौलवियों ने समाज में सुधार की कोशिशों में रोड़े अटकाए। उनका कहना है कि इसमें न्यायपालिका के दखल की जरूरत है।

बड़ी खबर’ कार्यक्रम के दौरान भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की जैबुनिसा रेयाज का कहाना था कि कुरान की रोशनी में ट्रिपल तलाक के मामलों में सुधार की बड़ी जरूरत है। तलाक में कानून की मदद मिले, सुलह की कोशिशों में भी ऐसी मदद मिले,जिसमें जवाबदेही बनती हो। मौजूदा तरीका बिल्कुल नाकाफी है।

सर्वेक्षण को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरगी महली का कहना था कि यह सैम्पल साइज बहुत छोटा है। इस सर्वे को मुस्लिम महिलाओं की आवाज न समझा जाए। उनका यह भी कहना था कि महिलाओं के लिए जो इंतजाम हैं, वे काफी हैं। बहरहाल हमारे साथ सेंटर फार स्टडी अॉफ डेवलपिंग सोसायटी के असिस्टेंट प्रोफेसर हिलाल अहमद का कहना था कि वे इस स्टडी का स्वागत करते हैं। प्रगतिशील मुस्लिम आवाजों को बुलन्द होने की जरूरत है

पत्र आंदोलन के अधिकारिक ब्लॉग से और नोट एन डी टी वी का एक ब्लॉग , साभार