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एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश


( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी आहट  बहुत कम समय में देश की वर्चस्वशाली सांस्कृतिक जमात को सुनाई पड़ रही है और वे बेचैन हैं -अपनी पांचजन्य जैसी पत्रिकाओं में इस घटित हो रही इस सांस्कृतिक क्रान्ति के खिलाफ मुनादी कर रहे हैं. यह सांस्कृतिक आन्दोलन कभी घटित दो सभ्यताओं के टकराव की नीव पर पनप रहा है . इस देश में बड़े पैमाने पर  दुर्गा पूजा का आयोजन होता है  -दुर्गा के लगभग सारे नैरेटिव विजेताओं के द्वारा पराजितों के खिलाफ नैरेटिव है . इस मिथक का काउंटर नैरेटिव एक बड़ा समूह लेकर सामने आया है .  प्रमोद रंजन और रवि प्रकाश महिषासुर शहादत दिवस के रूप में हो रहे देशव्यापी आयोजनों की पड़ताल कर रहे हैं. )


दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने जब 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह दावनल की आग सिद्ध होगा। महज चार सालों में ही  इन आयोजनों ने न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोडऩ पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं। इस साल (2015) देश भर में 300 से ज्यादा स्थानों पर महिषासुर शहादत अथवा महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। यह आयोजन देश की सीमा पार कर नेपाल भी पहुंच गया।  मुख्ययधारा के मी‍डिया की नजरों से दूर, कहीं इसे10-15 उत्साही युवक सांकेतिक रूप से हाथ में तख्तियां लेकर कर रहे हैं, तो कहीं एक से 20 हजार लोगों की भीड़ वाली सभाएं हो रही हैं। इन आयोजनों को देखते हुए यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि भारत की दमित अस्मिताएं इस बहाने अपना अभिनव सांस्कृतिक इतिहास लिख रही हैं।

भारत में जिस दुर्गा पूजा को देवताओं और राक्षसों की लड़ाई बताकर उसे निर्विवाद माना जाता था, वह आज इन आयोजनों के कारण संकट में है। महिषासुर दिवस मनाने वालों का कहना कि वह तो आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी और महिषासुर हम अनार्यों के पुरखा और नायक हैं। आदिवासियों के मिथकीय नायक और देवता रहे महिषासुर को शहीद बताने वाले लोगों में आज ज्यादा संख्या यादव, कुशवाहा, कुम्हार, कुर्मी, निषाद, मांझी, रजक, रविदास आदि वंचित बहुजनों की है।

इन आयोजनों के एक अध्येता के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर दिवस के आयोजकों से बात करना हमारे लिए एक अनूठा अनुभव रहा। इनके पास कहने के लिए ढेर सारी बातें हैं। लेकिन कुछ साझा बातें अनायास ध्यान खींचती हैं। ये सभी आयोजक बताते हैं कि हम ”बचपन से इस विषय में सोचते थे कि दुर्गा की मूर्तियों में जो असुर है, उसका रंग-रूप क्यों हम लोगों जैसा है और क्यों उसे मारने वालों की कद-काठी पहनावा आदि सब उनके जैसा है, जो आज के द्विज हैं’’! बाद में जब उन्होंने अपने स्तर पर विचार किया और खोजबीन की तो आश्चर्यचकित रह गये। उनके आसपास, यहां तक कि कई मामलों में तो अपने घरों में ही मनुज देवा, दैत्येरा, मैकासुर, कारसदेव आदि से संबंधित असुर परंपराएं पहले से ही मौजूद थीं। कुछ आयोजक मानते हैं कि महिषासुर व उनकेगण कोई मिथकीय पात्र नहीं, बल्कि एतिहासिक पात्र हैं, जो उनके कुनबे के रक्षक, प्रतापी राजा अथवा जननायक थे।

सभी आयोजक महिषासुर की ‘पूजा’ का विरोध करते हैं तथा ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का निषेध करते हैं। शायद यही इन आयोजनों की असली ताकत भी है।इन चार सालों में यह एक प्रकार की सांस्कृतिक राजनीति का आयोजन भी बन चुका है। यह न सिर्फ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में हो रहा है बल्कि दूर-दराज के गांव-कस्बों में भी इसकी जबरदस्त चर्चा है। बात सरकारी अमले तक पहुंची है और कई जगहों पर इस उत्सव के दिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाने लगी है।

महिषासुर का एक संबंध भारत की आदिम जनजाति ‘असुर’ की प्राचीन संस्कृति से जुड़ता है, जिनकी कुल संख्या अब देश भर में बमुश्किल 9 हजार बची है। असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं। गुमला के विशुनपुर प्रखंड के सामाजिक कार्यकर्ता अनिल असुर कहते हैं कि ”मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया था। वह हमारे प्रतापी पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं थीं।’’रांची से प्रकाशित ‘जोहार दिशुम खबर’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि, ”महिषासुर को खलनायक बताने वाले लोगों को आदिवासी, पिछडा वर्ग व अन्य वंचित तबकों के बीच उनके नायकत्व को समझना चाहिए।’’पंकज बताते हैं कि ”इस साल (वर्ष 2015 में) देश भर में लगभग 350 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया।’’

महिषासुर दिवस मनाने वाले लोग बताते हैं कि दुर्गा व उनके सहयोगी देवताओं द्वारा महिषासुर की हत्या कर दिये जाने के बाद आश्विन पूर्णिमा को उनके अनुयायियों ने विशाल जनसभा का आयेाजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी समतामूलक संस्कृति को जीवित रखने तथा अपनी खोई संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि विभिन्न स्थानों पर जो आयोजन हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश आश्विन पूर्णिमा वाले दिन ही होते हैं। यह पूर्णिमा दशहरा की दसवीं के ठीक पांच दिन बाद आती है। हालांकि कई जगहों पर यह आयोजन ठीक दुर्गा पूजा के दिन भी होता है तथा कहीं-कहीं आयोजक अपनी सुविधानुसार अन्य तारीखें भी तय कर लेते हैं। कहीं इसे ‘महिषासुर शहादत दिवस’ कहा जाता है तो कहीं ‘महिषासुर स्मरण दिवस’।
आइए, बानगी के तौर पर कुछ चुनिंदा जगहों पर नजर डालते हुए हम इन आयोजनों की तासीर समझने की कोशिश करें। हलांकि रिपोर्ट पूरी करने की समय सीमा के कारण हम इस सूची में क्षेत्रीय विविधता की जरूरत को पूरा नहीं कर पाए हैं। लेकिन यह एक बानगी तो है ही।

1. पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला केकाशीपुर प्रखंड के झालागौडा में महिषासुर शहादत दिवस पर विशाल आयोजन होता है। इस वर्ष यहां इस आयोजन के लिए लगभग 20 हजार लोग जुटे, जिनमें मुख्य रूप से संताल, बावरी, राजहड, महाली आदि आदिवासी जातियों व पिछड़े-दलित तबकों के लोग थे। यहां यह आयोजन चरियन महतो के नेतृत्व में होता है। कुर्मी जाति से आने वाले महतो यह आयोजन न सिर्फ यहां करते हैं, बल्कि उन्होंने कई अन्य स्थानों पर भी इस आयोजन के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया है। वे कहते हैं कि कुर्मी व इस तरह की अन्य अन्न व पशुपालक जातियों की जडें आदिवासी समाज में ही रही हैं, यह कारण है कि हम महिषासुर से गहरा अपनापा महसूस करते हैं। चरियन बताते हैं कि ”हम लोगों ने पहली बार यह आयोजन वर्ष 2011 में दिल्ली के जेएनयू में महिषासुर दिवस मानये जाने की खबर सुनने के बाद किया, लेकिन मेरे मन में यह बात बहुत पहले से थी। वर्ष 1997 में ही मैंने अपने बांग्ला साप्ताहिक नया सूरज में इस संबंध में एक संपादकीय लेख लिखा था।’’वे बताते हैं कि उसका शीर्षक था, ‘मानवता और राष्ट्रीयता विरोधी है दुर्गोत्सव।’इसमें उन्होंने लिखा था कि महिषासुर इस देश के मूल निवासी थे। दुर्गापूजा विदेशी आर्योंद्वारा उनकी हत्या के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। इस प्रकार यह विदेशी आक्रांताओं का गुणगाणन करने का उत्सव है, जो अपने मूल रूप में हमारी राष्ट्रीयता के विरूद्ध है। वर्ष 2010 में उन्होंने अपने इसी विचार को और विस्तार से लिखा, जो पुरूलिया से प्रकाशित जाति संगठन ‘कुर्मी मिलन संगम’के बांग्ला  मुखपत्र ‘अखड़ा’में प्रकाशित हुआ, जिसकी काफी चर्चा हुई। इसे पढ़कर उनके पास स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अजित प्रसाद हेम्ब्रम और शत्रुध्न मुर्मू आए। उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि दुर्गापूजा का विरोध किया जाए। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था। इन लोगों ने तय किया कि वे अपने पूर्वज महिषासुर की याद में कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए दुर्गापूजा के दिन ही महिषासुर शहादत दिवस मनाना शुरू कर दिया। आयोजन के पहले साल भारत सरकार के ज्वाईंट रजिस्ट्रार जनरल स्वप्न विश्वास कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने थे, उसके बाद से बहुजन समाज से आने वाले अनेक बड़े अधिकारी, टेक्नोक्रेट व अन्य प्रभावशाली लोग इस आयोजन में मौजूद रहते हैं।

2. राज्य में विभिन्न जगहों पर हो रहे इन आयोजनों की सारी जानकारियां चरियन की जुबान पर रहती हैं। वे बताते हैं ”वर्ष 2011 में हमारे आयोजन के बाद 2012 में मालदह में भी यह आयोजन शुरू हुआ। 2013 में पश्चिम बंगाल के 24 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया। 2014 में इन आयोजनों की संख्या 74 हो गयी। यह बहुत तेजी से फैल रहा है। इस साल राज्य के 182 स्थानों पर महिषासुर दिवस मनाया गया है।’’

3. पश्चिम बंगाल के 24 परगना (नार्थ) जिला के अशोक नगर थाना क्षेत्र के बीराबांदोपल्ली में इस साल पहली बार महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। यहां आयोजन 20 अक्टूबर को हुआ। आयोजन में लगभग 400 लोग शामिल हुए। इसके आयोजकों में से एक सुरसेनजीत वैरागी बताते हैं कि इस क्षेत्र में दलित अबादी बहुसंख्यक है, जिन्होंने इस आयोजन से काफी उत्साह दिखाया। आयोजन में क्षेत्र के अन्य पिछड़ा वर्ग लोग और मुसलमान भी शामिल हुए। उन्होंने बताया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें आयोजन नहीं करने के लिए एक नोटिस थमा दिया था, लेकिन वे झुके नहीं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के समक्ष सवाल उठाया कि ”किसी को जन्मदिन की पार्टी करने या प्रियजन की मृत्यु पर शोक सभा आयोजित करने के लिए आपसे अनुमति लेने पड़ती है क्या?’’ हार कर पुलिस ने कार्यक्रम में विध्न उत्पन्न नहीं किया। वैरागी कहते हैं कि यह न सिर्फ  हमारे पूर्वजों की हत्या का उत्सव है बल्कि दुर्गापूजा के दौरान जो मूर्तियां बनायी जाती हैं, उनमें मनुष्य की हत्या को दर्शाया जाता है, जिसका बहुत बुरा प्रभाव समाज पर पड़ता है। कोलकाता के सरदिंद बिस्वास के नेतृत्व में भी इस साल महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि इस साल चैबीस परगना नार्थ तथा साउथ, मिदनापुर ईस्ट तथा वेस्ट, बर्धमान, बाकुरा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुडी, कोच्छ विहार, मालदह समेत राज्य के 15 जिलों में दर्जनों जगहों पर शहदत दिवस का आयोजन किया गया है।

4. कोलकाता के शहरी क्षेत्र व कई उपनगरों में भी कई जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन पिछले दो सालों से हो रहा है। इन क्षेत्रों में इसका वाहक बना है समुद्र बिस्वास के संपादन में निकलने वाला बांग्ला पाक्षिक ‘निर्भीक संवाद’। समुद्र बताते हैं कि वे अपने अखबार में इन आयोजनों की तैयारी, इस दौरान होने वाले संभाषण आदि की रिपोर्ट को निरंतर प्रकाशित करते हैं। आयोजन की अवधारणा के पक्ष में कई लेख भी इसमें छपे हैं, जिससे वंचित तबकों में इसके प्रति तेजी से जागरूकता आयी है। समुद्र बिस्वास एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘जनमन’ भी निकालते हैं तथा उन्होंने ‘दुर्गा पूजा आंतरू’ (दुर्गा पूजा की अंदरूनी कथा) शीर्षक से बांग्ला में एक किताब भी लिखी है, जिसमें दुर्गा और महिषासुर की कथा की बहुजन व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस किताब का विमोचन वर्ष 2014 में कोलकता पुस्तक मेला में किया गया था। बिस्वास बताते हैं कि बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला के कालचीनी में 1985 से ही असुर दिवस मनाया जाता रहा है। वर्ष 2011 में दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद से इसने ऐसा बंगालव्यापी स्वरूप ग्रहण कर लिया है कि इस बार आनंद बाजार जैसे दुर्गा पूजा के घनघोर समर्थक अखबार को भी इसके सामने झुकना पड़ा। उसने इस साल इस आयोजन के संबंध में सकरात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।

5.उत्तर प्रदेश के देवरिया के निकट डुमरी में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका के प्रधान संपादक चंद्रभूषण सिंह यादव व लखनऊ में इसी पत्रिका के संपादक राजवीर सिंह के निर्देशन में महिषासुर शहादत दिवस का अयोजन किया जाता है। ‘यादव शक्ति’ ने इस साल 26 अक्टूबर को यह दिवस मनाया, जिसमें वंचित समुदायों के बुद्धिजीवियों ने सांस्कृतिक आजादी की जरूरत पर बल देते हुए अपनी बातें रखीं। इन आयोजनों में शामिल होने वाले लोग बताते हैं कि प्रदेश में कई अन्य जगहों पर भी पिछले दो सालों से यह आयोजन निरंतर हो रहा है।
6. झारखंड के धनबाद जिले के निरसा प्रखंड के मुगमा में भी 2012 के बाद से हर साल महिषासुर को स्मरण किया जा रहा है। इस साल यहां एक नवंबर को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए बहुजन समाज पार्टी के नेता डा रामाशीष राम ने कहा कि ”महिषासुर बहुजनों के महानायक थे। बहुजनों की एकजुटता जरूरी है ताकि हम अपने इतिहास का पुनर्पाठ कर सकें । मनुवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास पर हमारा भरोसा नहीं है।’’संगोष्ठी में करीब 100 लोग शामिल हुए। इनमें ज्यादातर संख्या अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों की थी।

7. झारखंड के गिरिडीह जिला में भी अनेक जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। जिला में इन आयोजनों को वरिष्ठ अधिवक्ता दामोदर गोप का नेतृत्व प्राप्त है। गोप बताते हैं कि वे वर्षों तक सीपीआई (एमएल) के सदस्य रहे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि ”उच्च जातियों के दवाब में कम्युनिस्ट पार्टियां बहुजनों को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाए रखना चाहती हैं।’’वे सवाल उठाते हैं कि ”क्या एक मनुष्य के रूप में सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान हमारे लिए काफी है? सांस्कृतिक गौरव के सारे सुख क्यों सिर्फ उच्च जातियों के लिए हैं?’’गोप का मानना है कि ”सांस्कृतिक और सामाजिक आजादी के बिना सिर्फ आर्थिक लड़ाईयों की बात करना एक छलावा मात्र है। आर्थिक रूप से भी वही समाज समृद्ध हो पाता है, तथा अपनी समृद्धि को लंबे समय तक बरकार रख सकता है, जिसकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक जडें हों।’’इसी जिला के धनवार प्रखंडमें महिषासुर दिवस का आयोजन अरविंद पासवान करते हैं। धनवार में इस साल 24 अक्टूबर को इसका आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि अगले साल से आश्विन पूर्णिमा को गिरीडीह और आसपास के जिलों में और बडे पैमाने पर महिषासुर स्मरण दिवस मनाया जाएगा। झारखंड प्रदेश असुर संघ बनाकर राज्य स्तरीय असुर सम्मेलन करने की भी तैयारी चल रही है।

8. बिहार के मुजफ्फरपुर के सिंकंदरपुर कुंडल में इस साल 26 अक्टूबर (आश्विन पूर्णिमा) को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न कॉलेजों के लगभग 100 छात्र मौजूद थे। यहां एकलव्य सेना के कार्यकर्ताओं ने इस आयोजन का संचालन किया, जिसके कर्ताधर्ता नरेश कुमार सहनी हैं। इस आयोजन से पहले एकलव्य सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने दशहरा के दिन जिलाधिकारी के आवास के सामने खुदीराम स्मारक पर ‘काला दिवस’ मनाकर दलित-पिछड़े लोगों से अपील की कि वे अपने पूर्वज की हत्या के जश्न में शामिल न हों। नरेश कुमार सहनी बताते हैं कि ”मैं बचपन से ही सोचता था कि अगर कथित देवताओं की वंशावलियां हैं तो जरूर असुरों की भी तो वंशावली होगी। आखिर उनके वंशज आज कौन हैं? बाद में दिल्ली  से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस में छपे लेख की जानकारी मुझे हुई तो लगा कि और भी लोग मेरी तरह ही सोच रहे हैं। उस लेख ने मुझे अपनी बात कहने की ताकत दी।’’वे  बताते हैं कि ”हम निषादों (मल्लाहों) की एक उपजाति है – महिषी। यह निषादों की वह उपजाति है जो पशुपालन करती है। महिषासुर हम मल्लाहों के पूर्वज थे।”साथ ही, वे स्वयं ही जोड़ते हैं कि ”महिषासुर जिस काल में रहे होंगे, उस समय जाति व्यवस्था इस रूप में नहीं रही होगी, इसलिए उनकी जाति नहीं निर्धारित की जा सकती। यादव व अन्य जातियां भी उन्हें अपना पूर्वज मानती हैं। सभी अपने जगह सही हैं।’’

9. मुजफ्फपुर के भगवानपुर में भी महिषासुर महोत्सव मनाया। इसके संचालन का जिम्मा उठाया हीरा यादव ने। यह पूछने पर कि क्या विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, वे बताते हैं कि ”पहले विरोध होता था। 2011 में जब यह आयोजन शुरू हुआ तो घर के लोगों ने ही विरोध किया। उनका मानना था कि दुर्गा हिंदुओं की देवी हैं। उनके खिलाफ  आयोजन क्यों? लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि वह कोई धर्मयुद्ध नहीं था। वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी। इसलिए, यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसका हिन्दू धर्म से कोई वास्ता या सरोकार नहीं। ब्राह्मण जाति सभी हिंदुओं का पर्याय नहीं है।’’

10. मुजफ्फपुर जिला के ही मीनापुर प्रखंड के छितरा गांव में वर्ष 2014 में महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी। लेकिन इस वर्ष बिना मूर्ति के ही महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। दरअसल, जैसे-जैसे इस संबंध में मूर्ति पूजा की विरोधी रही आदिवासी मूल की परंपराओं की जानकारी सामने आ रही है, लोग महिषासुर की मूर्ति बनाने को गलत मानने लगे हैं। इसकी जगह इन कार्यक्रमों में प्राय: अपने पूर्वज के रूप में महिषासुर का सिर्फ चित्र लगाया जाता है तथा संभाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। छितरा गांव में हुए आयोजन में आसपास के गांवों के लगभग 1500 लोगों ने भाग लिया। आयोजन में बहुजन जातियों द्वारा पारंपरिक तौर पर गाये जाने वाले गीतों का गायन किया गया तथा जनपक्षधर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये।

11. बिहार के मधेपुरा निवासी, पेशे से शिक्षक हरेराम मूलत: एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी टीम के निर्देशन में एक स्कूल के मैदान में 26 अक्टूबर, 2015को महिषासुर महोत्सव मनाया। इस आयोजन में करीब 150 लोग शामिल हुए। विचार गोष्ठी हुई लेकिन किसी अखबार ने इस खबर को छापना मुनासिब नहीं समझा। हरेराम बताते हैं कि उन्होंने आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति और तस्वीरें सभी अखबारों को दी थीं। लेकिन, न तो कोइ पत्रकार इसे कवर करने आया और न कहीं यह खबर छप सकी। बकौल हरेराम भगत, बिहार विधानसभा के चुनाव की गहमागहमी कारण उनके यहां ज्यादा भीड़ नहीं हो सकी। उन्हें करीब 1000 लोगों के आने की उम्मीद थी। वे कहते हैं कि ”इस क्षेत्र में पहले बामसेफ  के संस्थापक कांशीराम जी का आंदोलन चलता था। इस कारण महिषासुर महोत्सव के लिए लोगों को कनविंश करने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।’’

12. बिहार के नवादा में भी 2012 से महिषासुर शहादत दिवस मनाया जा रहा है। वर्ष 2014 यहां भी महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी, तथा भारी जन जुटान हुआ था। कार्यक्रम के आयोजक रामफल पंडित, एडवोकेट जयराम प्रसाद, उमेश सिंह, सुमन सौरभ और रामस्वरूप मांझी बताते हैं कि इस क्षेत्र में इस आयोजन ने व्यापक समाजिक आलोडऩ पैदा किया है। लोग महसूस करने लगे हैं कि हमें आर्थिक और सामाजिक आजादी तभी मिल सकती है, जब हम अपने ऊपर लादी गयी ब्राह्मणवादी संस्कृति के जुए को उतार फेंके। उनका मानना है कि ”इन आयोजनों के कारण राजनीतिक जागृति भी आयी है।’’

13. बिहार के गंगा पार शहर हाजीपुर से लगभग 16 किलोमीटर दूर भगवानपुर अट्टा में एक नवंबर को महिषासुर के स्मरण के लिए एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1000 लोगों ने शिरकत की, जिसमें बडी संख्या महिलाओं की थी। आयोजक थे – राष्ट्रीय मूल निवासी संघ तथा सत्यशोधक विचार मंच। दो सत्रों में विभाजित यह आयोजन दिन के 12 बजे से रात के 2 बजे तक चला। पहले सत्र का विषय था, ‘महिषासुर कौन, हत्या क्यों, हत्या की जानकारी वंशजों को है या नहीं, और हत्या की जानकारी नहीं होने का परिणाम’, दूसरे सत्र का विषय था, ‘हमारे देश के शास्त्ऱों में में आर्य-अनार्य, देव-दानव, सुर-असुर, सवर्ण-अवर्ण, आदि संघर्षों का विवरण है, तत्कालीन अनार्य, दानव, असुर, अवर्ण कौन थे, तथा उनका संघर्ष तथा छल-कपट से उनकी पराजय के बाद उनके वंशजों की किस रूप में पहचान।’ इन लंबे-चौड़े विषयों पर देश भर से आये सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी राय खूब विस्तार से रखी, जिसका स्वागत वहां मौजूद लोग तालियों की गडग़ड़ाहट से करते रहे। इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में, यादव जाति से आने वाले राष्ट्रीय सत्यशोधक मंच के संयोजक शिवाजी राय, भील आदिवासी समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय मूल निवासी संघ के अध्यक्ष ताराराम मेहना तथा दलित समुदाय से आने वाले बामसेफ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. देशराज ने विस्तार से अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुशवाहा जाति से आने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कुशवाहा ने कहा कि ”मनुवादी व्यवस्था ने देवियों के रूप महिलाओं का दुरूपयोग किया है, इसलिए इन देवियों को अपना आदर्श बनाया जाना गलत है। महिलाओं के सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि उसे पुरूषों के तेज से उत्पन्न बताया जाए। उन्होंने कहा कि आज की महिलाओं को सच्चे सशक्तिकरण और अपमानजनक प्रलोभनों के बीच फर्क करना चाहिए तथा उन सामाजिक शक्तियों के साथ खड़ा होना चाहिए, जो न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।” उदयन राय ने इस अवसर पर कहा कि ”संसद और अदालत के माध्यम से हमें अपने पूर्वजों हत्याओं के विभिन्न जश्नों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए।” आयोजन को दिलीप पाल, महावीर दास सिसोदिया, राजनारायण गुप्ता, विनोद कुमार, कुमारी बेबी, कुमारी प्रार्थना, तनीषा, महेंद्र राय, हास्य कवि गया प्रसाद, सत्येंद्र पासवान, पारसनाथ रजक आदि ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय नेता सुबोध राय ने की तथा संचालन जिवलेश्वर प्रसाद ने किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार के पटना में अधिवक्ता मनीष रंजन, पत्रकार नवल किशोर कुमार, राकेश यादव, सुपौल में अभिनंदन कुमार, सीवान में रामनरेश राम, प्रदीप यादव, पूर्वी चंपारण में बिरेंद्र गुप्ता, पश्चिमी चंपारण में रघुनाथ महतो, शिवहर में चंद्रिका साहू, सीतमाढ़ी में रामश्रेष्ठ राय और गोपाल गंज के थावे मंदिर के महंथ राधाकृष्ण दास महिषासुर की गाथा को शहादत/स्मरण दिवस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कोशांबी के जुगवा में एनबी सिंह पटेल और अशोक वर्धन हर साल एक बडा आयोजन करते हैं। पिछले वर्ष इन लोगों ने अपने गांव का नाम बदलकर ‘जुगवा महिषासुर’ करने व वहां इस आशय का बोर्ड लगाने की घोषणा की थी। मिर्जापुर में कमल पटेल और सुरेंद्र यादव, इलाहाबाद में लड्डू सिंह व राममनोहर प्रजापति, बांदा में मोहित वर्मा, बनारस में कृष्ण पाल, अरविंद गौड और रिपुसूदन साहू इस आयोजन के कर्ताधर्ता हैं। कर्नाटक के मैसूर, तेलांगना के हैदराबाद, मध्यप्रदेश के बालाघाट के मोरारी मोहल्ला और उड़ीसा के कई शहरों में भी महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। बंगाल के पुरूलिया में स्वप्न कुमार घोष तथा उड़ीसा के कालाहांडी में नारायण बागार्थी के नेतृत्व में इस आयोजन पिछले साल मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं थीं। भारत के अतिरिक्त नेपाल में भी कुछ जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने की सूचनाएं हैं, लेकिन वहां के आयोजकों से हम समयाभाव के कारण संपर्क नहीं कर सके।

प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। रविप्रकाशमल्टीमीडिया पत्रकार हैं। फिलहाल बीबीसी हिंदी और दूरदर्शन के लिए नियमित असाइनमेंट । वे प्रभात खबर, देवघर के स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, कोलकाता के संपादकीय प्रभारी, दैनिक भास्कर, रांची के डिप्टी एडिटर और आई नेक्सट के रांची, पटना, आगरा और जमशेदपुर संस्करणों के संपादक रह चुके हैं . संपर्क : janvikalp@gmail.com 


फारवर्ड प्रेस के दिसंबर, 2015 अंक में प्रकाशित

संजय कुमार शांडिल्य की कविताएं

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पेशे से अध्यापक. मंतव्य, हंस सहित अनेक पत्र -पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क : 9431453709

एक नये कवि से परिचय करा रहे  हैं  हम, विश्वास है आप इन्हें लम्बी दूरी तय करते देखेंगे . इनकी कविताएं इस दावे की गवाह हैं . फुर्सत से पढ़ें : 


1. मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो
हत्यायों और हादसों के अभ्यस्त कस्बे के बीच
पुरातात्विक खुदाई में
टेराकोटा ईंटों से बना
एक पुराना विहार झाँकने लगता है
कुछ दिन की जगमग उत्साहों के बाद कस्बे में
उदासीन लोग हलवाई की दुकानों पर
जलेबियाँ खाने के लिए इकट्ठा होते हैं
तृष्णा ,माया ,बंधन ,मुक्ति के प्रश्न और उनके
उत्तर
हर बरसात में थोड़ा-थोड़ा बिलाते हुए
किसी खपड़े में ,किसी झिकटी में
फावड़े के साथ बाहर निकलते हैं
आपने इन चीजों को जहाँ रख दिया है
वह भी एक पृथ्वी-गर्भ है
नीली स्याही लगी हुई वह तीन हज़ार साल पुरानी दवात
अपनी इबारतों को नहीं पुकार सकती है
किन बेचैनियों में एक नफीस छिला हुआ सिरकंडा उसमें डूबा है
आज इसे कोई नहीं जानता
लोग रामायण और महाभारत याद-रखते बाँचते
समय का कितना यथार्थ बचा पाते हैं?
कोई लड़कर अपने समय की हिंसा से,
प्यार करता है
अपनी प्रेयसी को अस्थियों से बनी चूड़ियाँ भेंट देता है
नंग -धड़ंग त्रिशूल -धारी अनागरिक के हाथों अपने मृत होने से पूर्व
होए, होए पुकारता हुआ
अपनी प्रियतमा को
आँख बंद होने से पूर्व जिसकी एक झलक
मुक्ति है
यह कथा किसी त्रिपिटक में लिखी हुई नहीं है
वह भुर्जपत्र सबसे पहले सड़ा विध्वंस के बाद की पहली बारिश में
होए -होए हो सकता है उस समय की भाषा में
हृदय को विगलित करती करुणा की सबसे
अप्रतिम पुकार हों
जिसे चारागाह में जुगाली करती गाएँ भी समझती हों
जो भाषा शिष्ट हो कर बची हुई है उसमें करुणा के सबसे कम शब्द बचे हैं
हिंसा के ढूँढ़ लो तो हज़ार मिल जाएँगे
कुछ तो मैं लिखता हूँ और मुझे लिखना होगा
जब रामायण और महाभारत सृजन में होंगे
त्रिपिटक रचना में
उस मृदुभांड की वह छोटी सी दवात जिससे चिपकी हुई नीली स्याही आज भी झाँकती है
पृथ्वी गर्भ से
मर्म की विस्मृत ,असंरक्षित वह पुकार कहीं
दर्ज नहीं है
शायद उसका रचा काव्य नहीं हो ,शब्दों का घोंसला हो
कोई तो गाने वाली चिड़िया वहाँ रहती होगी
महाकवियों! मैं इस जलती हुई पृथ्वी पर रहा हूँ
मैंने प्रेम किया है, सरकंडे छीले हैं
मैंने अपनी भाषा में दुनिया की सबसे गहनतम करुणा में
किसी का नाम पुकारा है
मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो ।

साभार गूगल

2. जो नमक का है ज्वार भाटों का है
तुम उस समुद्र को जानती हो जो नमक का है
ज्वार-भाटों का है
वडवानल का है
तुम उसमें रहती हो
तुम उस कुएं को जानती हो
जिसमें नमक के और मुसाफ़िर
रहते हैं
जिससे सिर्फ़ आवाजें लौटती है
समुद्र भी एक बड़ा कुआँ है
फ़र्क सिर्फ़ नमक का है
तुम समुद्र में हो
मैं हूँ कुएं में
सुनों इस आग़ की आवाज़ सुनों
पानी की वासना के नीचे
कुएं और समुद्र से आती है
आग़ की आवाज़

जहाँ पृथ्वी निर्वसना है
बस इस कुएं औरउस समुद्र में
सिर्फ़ नमक का फ़र्क है
जो नमक का है ज्वार भाटों का हैI

3. गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं
लोग तो इस गुलमोहर का भी बुरा मानते हैं
बिखेर देता है हरियाली छोड़ने के क्षण में
सिकुड़ा हुआ लाल फूल
तुम हँसकर पूछती हो कि तुम्हारा हँसना बुरा तो नहीं है ।
जैसे इस अँधेरे में एक-एक कर
डूबने लगेंगे रात के सितारे

एक बड़े गोते में सूरज एक दूसरे आकाश में निकलेगा
और पृथ्वी पर सुबहें नहीं होंगी ।
हँसने से अच्छा कोई व्यायाम नहीं है यह सामान्य वाक्य कहकर मैं परे देखता हूँ
सचमुच तुम्हारी हँसी के बिना यह दुनिया कितनी बेडौल हो गई है
मुझे एक सामूहिक ठहाके में वह पार्क अकबकाया और बदहवास दिखाई पड़ता है
जिसे शाम को खिलखिलाते हुए बच्चे थिर करते हैं ।
फैसलों का परिणाम जिस पर पड़ता हो उसे
फैसले लेने का हक़ होना चाहिए
तुम लगातार हँसती हो और गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं ।

4. गाँव की लड़कियाँ
मैं कहूँ कि गाँव की लङकियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लङकियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लङकियां
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क

मैं कहूँ कि गाँव की लङकियां किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है

गाँव की लङकियां गाँव की लङकियां होती हैं
खूब गहरी
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लङकियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं
आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?

साभार गूगल

5. मॉल में लडकियां

आधी फीसदी की छूट के बावजूद
मुझे यह मेरी दुनिया नहीं लगती

पोस्टर थे जो कह रहे थे स्वतंत्रता
कितना ऊपर उठ सकती थी
कॉकेशियन नस्ल के लोग
मुस्कुराते हुए साथ-साथ थे

वे चाहते थे कि हम अपनी
पहुँच बढाएं इसलिए वे
दूरियाँ घटा रहे थे

हमारी समस्या थी हमारे लोग
जिनके लिए जूते फकत पाँच-सात सौ
फ्राक हज़ार-बारह सौ
और बाहर का खाना
महीने-दो महीने में मसाल-दोसे
भर का मसला था

जो प्यार इन नई झक्क सफेद
इमारतों से आता हमारे लिए
वह फरेब था
इसका पता हमें चलता
तब तक देर हो चुकी होती थी

बाहर धकलने वाले शीशे
के दरवाजे थे
जिनको खोलते हुए
हाथ सहमते थे
कि इन्हें आगे की ओर
खींचे या पीछे धक्का दें

नियोन में जो चीजों के
भाव चमकते थे
वे खाने की टेबुल पर
मेनू में बदल जाते थे

मैं उङना चाहती थी
कॉकेशियन उस हम -उम्र
युवती की तरह
यह ख्वाब मैंने मॉल की
स्वचालित सीढ़ियों को
चढते हुए देखा
एक भरे पर्स के उस प्रौढ़
के साथ
जिसे उङती हुई
युवतियां पसंद थी

प्रेम जितना दिखता
वह वहीं छूट जाता था
इस शहर का मौसम
तेजी से बदल रहा था
पृथ्वी और सूरज के
सम्बन्ध से अलग

मैं इसी दुनिया में रहना चाहती हूँ
मेरा पुरूष साथी परिपक्वता से हँसता है
तुम यहाँ आ तो सकती हो
यहाँ रह नहीं सकती

ललचाने भर दुनिया की सारी जगहें
खुली अलमारियों में रखी थी
हम उङना चाहते थे मगर उङ नहीं
सकते थे

एक लंपट सी खुशी चारों तरफ
उङ रही थी
एक उदास सा फरेब मेरे
साथ-साथ चल रहा था

न यह मेरे भरोसे की दुनिया थी
न मेरी दुनिया मेरे पसंद की

यह आधी फीसदी की छूट न थी
सौ फीसदी की लूट थी

बारह हज़ार के जूते
पाँच हज़ार की कमीज
और वह कॉकेशियन हम उम्र
युवक जो वहाँ नहीं था

फरेब इसमें था कि यह दुनिया
मेरी हो सकती है
यह हर कदम पर यहाँ लिखा था
और ऐसे कि इसपर भरोसा जगता था ।

6. सदियों हुए प्यार किए

सदियों से प्यार को राख करती ज्वालामुखी फूटती है सुबह-शाम
ये रोटियां जो मेरी थाली में हैं ये सदियों पहले
की पकी रोटियां हैं
मेरा विश्वास करो इसे पोम्पेइ में बनाया था
किसी औरत ने जो अपने मर्द से प्यार करतीं थी
अभी रोटियाँ सिंकी ही थी चूल्हे पर
कि ज्वालामुखी उस थाली को पिघला गई
जिसमें वह रोटियाँ परोसती और
अपना प्यार ।
भूख की जली हुई देह का श्राप टहल आता है
हजारों किलोमीटर
प्यार जो जल गई ज्वालामुखी में
उसकी राख आज भी गिरती है इस चाँदनी रात में ।
चूल्हे से सुबह-शाम फूटती है ज्वालामुखियाँ
खत्म हो गया प्यार का आबाद शहर
चूल्हे के राख में लिपटी हुई तुम्हारी देह
मेरी भी और एक बरबाद हुई सभ्यता ।
मैं एक पत्थर हुआ गीत हूँ सदियों से
तुम्हारे पत्थर हुए होठों में फँसा हुआ ।
सदियों से एक सभ्यता की जली हुई लाश है
चाँद की रौशनी में यह शहर मॄत और भस्म ।
मैं तुम्हें और तुम मुझे
बिना प्रेम किए जीवित हैं हम सदियों से ।

7. पृथ्वी के छोर

यह पृथ्वी का एक छोर है :
गाँव पहाड़ की तलहटी है
जहाँ एन्डीज़ मिल रहा है
सपाट मैदानों से
पेरू की किसी लोक भाषा में
कचरा बटोरने का गीत है
घोङे की बग्घी में
पुरूष जब विलासिता के
कार्टुन चुनने निकलेगें
हाथों को काम करता देख
होंठ उन्हें अपने आप गाएंगे।
स्त्रियाँ पास ही शहरी इलाकों में
बच्चे सँभालने निकलेगी
बच्चे ईश्वर सँभालता है
उसी लोक भाषा में यह भी
एक गीत है पृथ्वी के उसी छोर पर।
यह पृथ्वी का दूसरा छोर है
मेरे पङोस में :
मूँज के पौधों में सिरकंडे होने से पहले
सपाट मैदानों के भी अपने पहाड़ हैं
जिनकी तलहटियों से
कुछ स्त्रियाँ खर निकालने निकलेगी
कुछ रह जाएंगी गोबर पाथने।
अभी सरोद की तरह बजेगी पृथ्वी
मूँज धूप में सूखेगा
झूमर और कजरी के गीत साथ-साथ
झरेंगे
लकङियाँ और पत्ते पास के
जंगल से इकट्ठा कर
पुरूष घर लौटेगा।
यहाँ की लोक भाषा में भात
बनने का भी एक लोकगीत है।
फिर किसी सस्ती सी आँच पर
प्रेम वहाँ भी पकेगा और यहाँ भी
एक साथ रात की देह गिरेगी
ओस की तरह
श्रम से दुनिया को भरती हुईं
सुबहें ऊगेंगी
खाली जगहों में
लकीरों की तरह
हम दुनिया के छोर पर
काम करते हुए लोग
सुबह की इन लकीरों को
कविताओं में पढेंगे।

8. तब हम किसी से पूछ नहीं सकते थे 

तब हम खूब चटख लाल और तङके हुए पीले रंगों की कमीजें पहनते
दुख सेमल के फूलों से हलके और उजले गिरते थे
बेआवाज़
हमारे लगाव मेमने की तरह मासूम और नफरतें सिंह की तरह हिंस्र

प्यार हमने तभी किए जब प्यार के बारे में ज्ञान किताबी नहीं था ।

वह साँवली सी लङकी जिसपर पहली बार दिल आया अब दादी बन अपने पोते की मासूम मुस्कुराहट पर फिदा होती होगी
मैं जब आठवीं में था वह बी ए में पढती थी और जैसे आम में मंजर आते हैं वैसे मुस्कुराती थी
मुस्कुराहट का कोई सिलेबस तो तयशुदा होता नहीं
हम आज भी उस मुस्कुराहट का बेसदा और निर्गंध अनुवाद पढना चाहते हैं ।

वे प्यार की सङकें जिसपर हम मोरों की तरह नाचे फिर किसी कस्बे, गाँव या महानगर में नहीं ढले
तब मोहब्बतें कलगी की तरह उगी रहती ऐन ललाट के ऊपर
हम बेखौफ जमाने की आँखों में उसका लाल रंग
गङाये हुए डगरते
हाय वह दूध में मिले हुए हल्दी सी गोराई पहने बैजनी समीज और हरे दुपट्टे वाली परियाँ
हमने तब अपने प्यार को अधिकतर यतीम रखा
जिसका बेइंतहा दर्द कलेजे के किसी गोशे में
सैकड़ों सुइयों की तरह चुभता हैं ।

वासनाओं के ईल्म तब जिन्दगी के अनजाने ईलाके थे
मोहब्बतें खरगोश के कानों में हवाओं की संगीतमय सरगोशियाँ
वे फिल्में जिन्हें देखकर हम रोए रात भर और जिन नायिकाओं से जुङे दिल के सबसे महीन उजालों में
मुट्ठियां भींचते हुए कि जो पर्दे के बाहर चिन रहा होता नायक हम उन दीवारों को आग लगा देते गरचे वो नहीं होता पर्दे पर ।

तब पगडण्डी वही थी जो सरसों के फैले हुए खेतों तक पहुँचने के लिए होती
प्यार तो मैंने तभी किया जब हम प्यार कर सकते थे
लेकिन वे ही मौसम याद हैं जिसमें मुस्कुराहटें
आमों में मंजर की तरह उतरते थे
हम सिनोरिटा का अर्थ जानना चाहते थे और तब किसी से पूछ नहीं सकते थे ।

जुंको फुरुता: जिसे याद रखना ही होगा

मंजू शर्मा 
आज अगर जुंको फुरुता जीवित होती तो 43वाँ जन्मदिन मना रही होती। दु:खद है कि जापानी गुड़िया विश्वस्तरीय प्रसिद्धि पा चुकी है लेकिन जुंको फुरुता को उसके हिस्से के न्याय तक से महरूम रखा गया।

भला इस सदी ने उस बहादुर पीड़िता को कैसे भुला दिया?

केवल तीन दशक पहले पैदा हुई जुंको फुरुता(Junko Furuta),  एक ऐसी बहादुर लड़की , जिसकी अविश्वसनीय लगने वाली कहानी को पढ़ते हुए , हमारे हाथ खुद ही उठ जाएँगे उसे सलाम करने के लिए. 22 नवंबर,1972 को पैदा हुई उस जापानी लडकी ने 17 साल की उम्र में  त्रासदी और यातना को शरीर के पोर-पोर में 44 दिनों तक सहा.

मैं समझ नहीं पा रही कि उसकी कहानी मैं क्यों कह रही हूँ, क्यों सोच रही हूँ उसके बारे में ! क्या इसलिए कि औरतों को वस्तु समझने की वैश्विक सोच हम सब को हर रोज डराती रहती है , एक डरावने हस्र के लिए . क्या इसलिए कि कपडे पहनने के सलीके बताते , बलात्कारियों के प्रति दया भाव जताते लोग हमारे लिए क़ानून बनाने और पालन करने के तंत्र पर काबिज हैं और रोज -रोज हमें अपने बयानों से आतंकित करते हैं. या  इसलिए कि शब्दों से बलात्कार को अंजाम देने वाले  आजम खान जैसे मंत्री -संत्री हमारे अपने ही चुनाव के साथ हमारा मजाक उड़ाते हैं . क्या हम दुनिया भर की औरतें एक जैसी यातना शिविरों के वाशिंदे नहीं हैं ?

आज हमसब भारत में मेक इन इंडिया के भुलावे और प्रपंच में जीते हुए केवल बलात्कार मुक्त इंडिया तक के सपने को साकार होते नहीं देख पा रहे हैं और राजनीतिक और सत्ता के गलियारों से लगभग हर बार , हरेक बलात्कार के पीछे एक बयान आता है , जिसमें कहीं कटघरे में खड़ी की जाती है,   जिसे नोंचा-खसोटा गया। इस सदी में भी और लगभग हर दिन कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी बेटी का चीरहरण होता है ।
ऐसे समय में Junko Furuta की कहानी लिखना आज के समय की माँग है। पुन: आज 22 नवंबर के दिन जुंको अपने जन्मदिन वाले दिन रह-रहकर बार-बार याद आती है। 17 सालकी किशोरावस्था में उसने वह सब भोगा , जिसे सुनकर और पढ़कर झुरझुरी और सिहरन-से कँपकँपी होने लगती है।शरीर के लहू बहादुर जापानी लड़की के बारे में सोचकर बर्फ के समान जम-से जाते हैं। बर्फ होकर रूधिर बस नसों में सिमट जाते हैं।

शायद ही जुंको और उसके माता-पिता ने कभी सपने में भी अनुमान लगाया होगा कि 17वाँ जन्मदिन ही उसका आखिरी जन्मदिन साबित होगा क्योंकि 17वें जन्मदिन को धूमधाम-से मनाने के केवल तीन दिन बाद जुंको 25 नवंबर, 1989 ,  के दिन अपने स्कूल Yashio-Minami हाई स्कूल से छुट्टी के पश्चात्,  वहाँ जा रही थी जहाँ वह पार्ट टाइम जॉब करती थी . लेकिन वहाँ पहुँचने से ही पहले बीच रास्ते में ही जुंको का अपहरण उसी के उम्र के 7 लड़कों द्वारा कर लिया गया और उसे लेकर जाया गया वहाँ , जहाँ 44 दिनों तक न थमने वाली यंत्रणा वह  बहादुर जुंको भोगती रही। और वह  उन मनोरोगी बलात्कारियों से हर दिन प्रताड़ित होती रही क्योंकि उनके लिए वह उनका मनोरंजन करने वाली एक बोलने वाली खिलौना भर थी।

44 दिन,  अर्थात एक महीने और 14 दिन,तकरीबन डेढ़ महीने उसने  अपने अपहरणकर्ताओं द्वारा बनाए गए यंत्रणा शिविर में वह दर्द भोगा,  जो मानवता के नकली गुहार करते इस पश्चिमी और पूर्वी समाज की अमनावीयता की कहानी कहता है.

उसके अपहरणकर्ताओं में से किसी भी लड़के से न कोई दोस्ती और न कोई दुश्मनी थी। अपहरण के दिन से लेकर उसके अत्याचारों का सिलसिला जो शुरु हुआ,  वह उसके दर्दनाक मौत के साथ ही थमा। यंत्रणा के 44 दिनों में जुंको के साथ तकरीबन 400 से अधिक बार बलात्कार हुआ। कैसे सहा होगा जुंको तुमने अपने शरीर के साथ प्लास्टिक की गुड़िये-से भी बदत्तर वह खिलवाड़? ज्यादत्ती की शायद कोई सीमा शायद ही होगी,  जिसे उसके अपहरणकर्ता बलात्कारियों ने पार न की होगी।

जब भी जुंको को भूख लगती तो खाने के लिए उसे तिलचट्टे और प्यास लगने पर उसे मूत्र ही पीने के लिए दिया जाता था। उसे जबरन नग्न ही रखा जाता ताकि जब जरूरत हो तो उसके साथ बलात्कार किया जा सके और तो और दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में उसे नग्नावस्था में बालकनी में सोने को मज़बूर किया जाता था।
अबतक यही लगता था कि दक्षिण-एशियाई देशों में ही स्त्रियों की अच्छी स्थिति नहीं है,पर जुंको की कहानी कुछ और कहती है. तीन दशक पहले के जापान में घटे यह  दर्दनाक हादसा और यंत्रणा तो हमें यही बता रहा है पूरी दुनिया में  स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं ।

अगर ऐसा न होता तो शायद जुंको आज जीवित होतीं। बलात्कार के साथ हैवानियत की क्रूरता और नग्नता भी झेली जुंको ने। घरों में जलने वाले बिजली के बल्ब उसके गुप्तांगों में कितनी ही बार डाला गया,  जिससे उसके योनि और गुदे के अंदरूनी हिस्से बुरे तरीके-से क्षतिग्रस्त हो गए थे । छाती को सुई और धागे-से सिलने के बाद भी इन दरिंदों का मन नहीं भरा और उसके निप्पल को सरौते-से खींच दिया।जुंको का दर्द हम सभी महिलाओं को महसूस होता  है।

जुंको के पूरे नग्न शरीर पर मोमबत्तियों के तरल को टपकाकर उसे फिर सिगरेट से जलाते थे।शरीर का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा था, जिसे इन दरिंदों ने साबूत  और दर्दविहीन छोड़ा था। फिर भी जुंको,  कितनी बहादुर रही होगी इसका अंदाज़ा इसी बात-से लगा सकते हैं कि अपने शरीर को अपहरणकर्ताओं की नज़र से बचाकर घसीटते हुए टेलीफोन बूथ  पर लेकर किसी तरह पहुँची , लेकिन यहाँ भी शायद बहादुर जुंको की किस्मत इतनी अच्छी न थी और एक दरिंदे की नज़र पड़ गयी। उसके बाद तो पढ़ते हुए भी मुट्ठियाँ भींच गयी थीं जब जुंको को उल्टा टाँगकर एक बॉक्सिंग के पंचिंग बैग के समान पेट पर घूँसे से इतना मारा कि वह मुँह से खून की उल्टियाँ करने लगी।लोहे की छड़ से शरीर पर बेदर्दी-से पीटने के बाद भी उन जालिमों के जुल्म की मंशा शायद शांत न हुई होगी और योनि में ग्रिल्ड,  जलते गर्म चिकन डालने के बाद इंतिहा तब हुई जब कैंची को प्रवेश किया।

400 से अधिक बार के बलात्कार –  कोमल शरीर ने कैसे झेला और बर्दाश्त किया होगा , उन नरपिशाचों के पैशाचिक कृत्य को ! सिगरेट के लाइटर से जलने को उसके शरीर का कोई हिस्सा अब बाकी न था.  44वें दिन भी उन्होंने उसके साथ नोंच-खसोट किया और चीरा भी,डंबल से पेट पर मारते रहे .  4 जनवरी 1989 का दिन था वह(मनहूस कहना कुछ ठीक न होगा,क्योंकि तुम तो इस यंत्रणा शिविर से मुक्ति के पथ पर निकल रही थी),  जब वह  हारकर अपने अंतिम प्रयाण की तैयारी कर चुकी थी. लगभग 2 घंटे तक चले अंतिम  यातना के दौर में उसके  शरीर को हर जगह से जलाया गया।

और सजा, इस केस में सजा का मजाक चाहे जो भी हुआ हो, आतंक का  सिलसिला आज भी जारी है. और हम ग्लोब के अलग -अलग हिस्सों के लोग, अलग -अलग समाजों में स्त्री विरोधी इस हिंसा की सहजता में जीने के आदि होते गये हैं ! 

सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in

अनुपमा तिवाड़ी की कविताएँ

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अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

1. प्यार
प्यार तुम कितने सुन्दर हो.
तुम्हारे हाथ पैर होते
तो मैं
तुमसे लिपट – लिपट जाती
छोडती ही नहीं तुम्हें.
मुझे पता है
तुम पर लगती रही हैं तोहमतें
कभी पश्चिमी संस्कृति की,
तो कभी चरित्रहीनता की.
परन्तु,
तुम तो सदा थे
हो
और रहोगे.
सात समुन्दर पार भी धडकते रहोगे दिलों में चुप – चुप.
बहते रहोगे अविरल आँखों से
रात के अंधेरों में.
प्यार, मुझे पता है
तुम कुचले जाते रहे हो
कभी इज्ज़त की दुहाई दे कर
तो कभी न जाने क्यों – क्यों?
प्यार, तुम जब भी कुचले जाते हो
मेरे गाल पर एक तमाचा लग कर बोलते  हो
जाओ! तुम्हारी दुनिया में हमें स्वीकार करने की हिम्मत ही कहाँ ?
लेकिन प्यार,
तुम हमेशा जिंदा रहोगे
नहीं मरोगे
हारोगे भी नहीं
जीतते ही रहोगे
हर बार – हर बार !

2. तुम्हारा आना 
तुम आए जीवन में
तो जैसे आँखों में दिए जल गए.
आलोकित हो गई मैं
होठ गुनगुनाने लगे
कान भी आहटें सुनने लगे
अंगुलियां उकेरने लगीं
केनवास पर तुमको.
पैर भी पंख बन कर उड़ने लगे.
एक दिन तुम चले गए
चुप से
सब कुछ हो गया
जैसे चुप – चुप.
पर अब भी तुम्हारे इंतजार में
मेरे बाल अंगुल – अंगुल बड़े हो रहे हैं.

3. स्त्रियों का प्रेम 
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं,
धोखा खाती हैं…..
प्रेम करती हैं,
धोखा खाती हैं….
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं

4. रिश्ता
कच्चे धागे सा रिश्ता
मेरा तुम्हारा
टूट सकता है
एक झटके से.
इसमें नहीं बहती
खून की नस कोई
सिरों पर बंधन की कोई गांठ भी तो नहीं.
पर, यह धागा आज भी उतना ही रंगीन है
उतना चमकीला
जितना पहले दिन था.
बांधता है मुझे,
तुमसे
सात जन्मों के बाद तक के बंधन में.

5.  सिक्का – सिक्का यादें 
समझ सकती हूँ
कितना मुश्किल था
तुम्हारे लिए
ये कहना कि
जा रहा हूँ महानगर
तुम्हारा शहर छोड़ कर.
अब नहीं लौटूंगा
बस गया हूँ यहीं.
मेरे शहर में तुम्हारी आखिरी शाम से
मैं सिक्का– सिक्का यादें
गुल्लक में डाल रही हूँ
गुल्लक से निकाल रहीं हूँ
गुल्लक में डाल रही हूँ
गुल्लक से निकाल रही हूँ
न गुल्लक भरती है,
न खाली होती है.

6. तुम्हारी बिंदी 
उस दिन छूट गई थी
जो मेरे कंधे पर
तुम्हारी बिंदी
वो मुस बन कर उग आई है
मेरे कंधे पर.
और तुम्हारे बालों की एक लट
जो छोड़ गई थींतुम
मेरी घड़ी की चेन में,
वो मनी प्लांट बन झूल रही है मेरे आँगन में.
जब भी होता हूँ
तुम्हारी बातों के साथ
देखकर रह जाता हूँ
अपने कंधे के मुस को
और फंसा देता हूँ
अपनी अंगुलियाँ
मनीप्लांट की बेल में.

7.  तुम्हारी कसम 
आज खाई तुमने
कसम
उनसे न बतियाने की
पर, ये तुम हो न !
जो उन्हें सामने न पा कर भी
उनसे बतियाते हो.
और वो – वो हैं
जो कभी नहीं होते फुर्सत में
तुमसे बतियाने की.
चाहे तुम उन्हें कसम दे दो
उनसे न बतियाने की

8.  इंतज़ार 
महीने थे
जो गुज़र गए,
सप्ताह दिन और घंटे हैं
कि बड़े होते जाते हैं.

“सूरजमुखी अँधेरे के” की नायिका का आहत मनोविज्ञान

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अभिलाषा सिंह

.शोध छात्रा , हिन्दी     विभाग , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. सम्पर्क : singh.abhilasha39@gmail.com

हिंदी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक उपन्यासों की एक लम्बी धारा रही है जिसमे हम अज्ञेय, जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी और देवराज का नाम प्रमुख रूप से लेते हैं परन्तु किसी भी स्त्री लेखिका के उपन्यास का नाम इस श्रेणी में नहीं आता जबकि स्त्री साहित्य का उत्स ही मनोविश्लेषण से उपजा है  है. स्त्री साहित्य में प्रमुखतः किसी स्त्री के अंतर्मन का ही चित्रण होता है, परिवेश और परिवार से प्रभावित होति उसकी भावनाएं और उसके लिए निर्णय को पूरी तरह से यदि हम मनोविश्लेषणात्मक  दृष्टिकोण से देखें तो तस्वीर और अधिक स्पष्ट होती है. इसी कड़ी में हम कृष्णा सोबती के सन 1972 में प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास “सूरज मुखी अँधेरे के” को देख सकते हैं जिसमे कथा एक ऐसी लड़की की है जो चाइल्ड एब्यु का शिकार हुई रहती है. बचपन में घटी इस इस घटना के कारण उसकी पूरी यौनावस्था प्रभावित होती है. एक भरी-पूरी लड़की अपनी चढ़ती किशोरावस्था से लेकर ढलती यौनावस्था तक खुद को अधूरा समझती है, खुद के शरीर को हर तरह से प्रयोग कर फेक दिए गए चिथड़े के समान समझने लगती है, जिसमे न कोई आकर्षण होता है, न जिसका कोई प्रयोग हो और न ही जिसकी कोई ज़रूरत महसूस करता है. पर यह सिर्फ उसका ही सोचना है बरक्स इसके उसके जीवन में कई पुरुष sआते हैं. पर सबके सन्दर्भ में वह खुद को खाली और ठंढी  मानने लगती है.

यह उपन्यास तीन भागों/सर्गों में विभाजित है – पुल, सुरंगे और आकाश. तीनों सर्ग रत्ती के जीवन में आयी घटनाओं को कभी फ्लेश बैक तो कभी वर्तमान में दिखाते हैं जैसा की अज्ञेय के उपन्यास “शेखर एक जीवनी” और जैनेन्द्र के उपन्यास “त्यागपत्र” में होता है.“पुल” सर्ग में रत्ती के जीवन में अकेलापन और कुंठा दिखती है. वह खुद को अपने दोस्त रीमा-और केशी के भरे-पुरे परिवार में अकेला और अधूरा महसूस करती है. “सुरंगे” सर्ग में जिस कारण उसकी यह मनोदशा हुई, वह रहस्य उजागर होता है. इसी सर्ग में हम देखते हैं कि पड़ाव की तरह पुरुष उसके जीवन में आते-जाते है पर “आकाश” सर्ग में रत्ती दिवाकर के सानिध्य में खुद को पूर्ण और श्राप से मुक्त पाती है .

साभार गूगल

लेखिका ने उपन्यास में कहीं भी उस व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उजागर नहीं किया है जिसने रत्ती का यौन शोषण किया. यहाँ तक कि कोई संकेत भी नहीं दिया क्यों की लेखिका का ध्येय अपराधी को केन्द्रित करना या उसकी उपन्यास के अन्य पात्रों से भर्त्सना करवाना नहीं था बल्कि जो भुक्तभोगी रत्ती है उसके प्रति समाज के रवैये को दिखाना है कि किस प्रकार हमारे समाज में यौन शोषक के स्थान पर पीड़िता को अपराधी बना दिया जाता है , उसके साथ समाज ऐसा सौतेला व्यवहार करता है कि कह-कह कर बोल-बोल कर उसे वह दर्द भूलने नहीं दिया जाता जिससे उसकी पूरी जिन्दगी प्रभावित होती है और कई बार समाज का ऐसा रूप उस पीड़ित बच्चे में एकाकीपन, कुंठा, त्रास, भय, और भ्रम की स्थिति पैदा कर देता है जिस कारण वह आसानी से किसी पर भरोसा नहीं कर सकता. ऐसा ही कुछ उपन्यास की मुख्य पात्र “रत्ती” के साथ भी होता है. वह जीवन में खुद को अकेली महसूस करने लगती है और उसका ये अकेलापन एकालाप को जन्म देता है जो उपन्यास में कई स्थान पर देखने को मिलता है ऐसा ही कुछ “शेखर एक जीवनी” के मुख्य पात्र शेखर के साथ भी होता है. रत्ती का एकालाप कभी तो उसका मूल्यांकन करने में उसकी सहायता करता है तो अधिकांशतः उसे अवसाद की ओर ढकेलता है.

वह खुद से पूछती है कि इस लड़की को एक बार भी समूची औरत बनने क्यों नहीं दिया गया. वह मानती है कि वह खुद सिर्फ है, उसका तीखापन, कडुआपन सब मर गये हैं. वह फीकी है. एक फीकी औरत. एक लड़की जो कभी लड़की नहीं थी. एक औरत जो कभी औरत नहीं थी. उसके पास है हर बार कहीं पहुच सकने की न मरनेवाली चाह और हर बार वीरान वापसी अपनी ओर. हर बार .अक्सर देखा जाता है कि ऐसी मनोदशा का व्यक्ति अंतर्मुखी स्वाभाव का होता है और रत्ती भी निश्चय ही अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाली है पर इसके विपरीत उसका बाह्य व्यक्तित्व गतिशील और आकर्षक है जिस कारण लोग उसकी ओर आकृष्ट होते हैं, खींचते आते हैं, नज़रें उस पर ठहर जाती हैं क्यों की मनोग्रन्थि उसके मन की है जो देखने वाले को तो नहीं ही दिखती है. तब उसे भी ये महसूस होता है कि अब भी इस मुखौटे पर कुछ ऐसा है की आँखे उठें और रुकें.

फ्रायड का सिद्धांत है कि ‘मानव-मन की दमित इच्छाएं ही अवचेतन मन में रहती है’ इस आलोक में रत्ती के जीवन को देखा जा सकता है, पर इस सन्दर्भ में नहीं कि उसकी काम इच्छा को नैतिकता या आदर्श के कारण दबाया गया हो, क्यों कि फ्रायड के इस सिद्धांत को आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी ख़ारिज कर दिया है और रत्ती के सन्दर्भ में यह सही भी नहीं बैठता. रत्ती उस एक घटना के बाद खुद को कभी शारीरिक पूर्णता के स्तर पर नहीं नाप सकी क्यों की उसे हमेशा ये भय बना रहा की वह अधूरी साबित होगी. उसके अवचेतन का डर उसके चेतन मन को सताता रहा. कई बार ऐसा देखने में आता है कि व्यक्ति की जिस चीज को बुरी तरह से रौंदा जाता है उसका वह चाहते हुए भी सामना नहीं करना चाहता. इसी कारण रत्ती ने खुद को सीमित कर लिया है उसे लगने लगा है कि वह एक ऐसी औरत है जिसने कभी किसी को नहीं पाया जिसको कभी किसी ने नहीं. वह आप ही अपनी सड़क का ‘आखिरी छोर’ है.

इस उपन्यास में हम देखते हैं कि सेक्स/काम/राग जो शरीर की बाकी इन्द्रियों की तरह ही सामान्य क्रिया है और परिस्थिति विशेष में जिसकी खुराक अनिवार्य रूप से जरुरी हो जाती है, रत्ती उससे जबरन भागने लगती है, शरीर की स्वाभाविक आवश्यकता को दबाने लगती है, वह स्त्री-पुरुष के  इस प्राकृतिक संयोग से भय खाने लगी है, इस आदिम सम्बन्ध को झुठलाने लगी है. वह सोचती है कि रातों में किसी के पास न सोकर भी जीना अच्छा है. पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता है कि सेक्स की भावना को एक हद के बाद दबाना कई मामलो में घातक साबित होता है जिसका सम्बंध न सिर्फ भावनात्मक आवेगों के उच्छलन से है बल्कि हार्मोनल चेंज भी व्यवहार को निर्धारित करते हैं. समाज इसे कुछ भी कहे पर इसके पीछे नितांत जैविक कारण है. नैतिकता या आदर्श के जामें से इसे व्यवस्थित और मानकीकृत रूप दे सकते हैं पर दबा नहीं सकते, समाप्त नहीं कर सकतें हैं.
रत्ती अपने स्त्री निहित अंगो को छूती है और हर वक्त अपने अधूरेपन को महसूस करती है. लोगो की बाते खुद उसके अपने शब्द बन कर उसके कानो में घुलते हैं. वह मन में बार-बार दोहराती है कि;
 “रत्ती अच्छी लड़की नहीं. रत्ती कोई औरत नहीं. वह सिर्फ गीली लकड़ी है. जब भी जलेगी, धुआ  देगी. सिर्फ धुंआ .”

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रत्ती के लिए यह लड़ाई दोहरे छोर पर है, एक तो उसे उस घटना से लड़ना है दूसरा उसे लोगो द्वारा खुद को एक सीमा में निर्धारित कर लिए जाने से. ऐसी स्थिति में व्यक्ति भीड़ में रहते हुए भी खुद को अकेला महसूस करने के लिए मजबूर हो जाता है. इससे आगे की मनोस्थिति यह होती है कि व्यक्ति को अकेलापन और अपना स्थाई दुःख ही अच्छा लगने लगता है रत्ती को भी ये अधूरापन अपना लगने लगा और वह इसमें आनंदित भी रहने लगी. वह फाटक पर पहुचना चाहती है पर अन्दर जाना नहीं. इस प्रकार की मनोग्रंथि में लिप्त व्यक्ति के लिए ऐसे साथी की बहुत जरुरत होती है जो उसे इस अवसाद से निकल सके और जीवन के सकारात्मक पक्ष से उसे जोड़ सके. उपन्यास के प्रारंभ में ही केशी और रीमा जो की पति-पत्नी है और रत्ती के दोस्त भी रत्ती के सन्दर्भ में ऐसी ही भूमिका का निर्वहन करते देखते हैं. केशी उसे समझता है. वह जानता है कि यह लड़ाई पुरुष के विरोध में नहीं बल्कि उसकी खुद से है. केशी उसे मानसिक रूप से सहारा देता है वह नहीं चाहता की रत्ती अपने अतीत में खोकर अपना वर्तमान और भविष्य खराब करे. वह उसे समझाता है कि;
“हमेशा अपने से अपने अन्दर लड़ते रहने का कोई फायदा नहीं. लड़ाई को अपने से बाहर रखकर लड़ना हमेशा अच्छा रहता है.”


रीमा पूरी कोशिश करती है कि रत्ती अपने अतीत से बाहर आये पर रत्ती है कि अपने अतीत को छोड़ना ही नहीं चाहती और झुंझला कर खुद को पढ़ लिए जाने के उत्तेजना से घबड़ा जाती है और उसे लगता है कि रीमा और केशी एक ढकी छिपी पुरानी औरत को धूप दिखाने के बहाने तार-तार हुए उसके कपड़ों पर हाथ फेरा करते हों. वह कहती है;
“मुझे जहाँ होना चाहिए मैं वहीँ हूँ. और मुझे कोई मलाल नहीं रीमा ….मेरा आगे है कहाँ! मुझे तो आँखों के सामने आगे-पीछे होती तस्वीरों को देखना भर है, बस….मेरा कोई भविष्य नहीं. मेरे आगे कुछ नहीं.”


सेक्स मनोग्रंथी से जकड़े व्यक्ति को अपने खालीपन का आभास तो होता ही है पर एक स्त्री के स्तर पर यह पीड़ा दोहरी होती है क्यों कि स्त्री न सिर्फ पुरुष के संसर्ग से खुद को पूर्ण मानती है बल्कि वह अपनी सृजन की क्षमता से खुद के स्त्रीत्व  को तौलने लगती है. स्त्री के लिए यह कई बार सेक्स न कर पाने की तकलीफ से भी ज्यादा तकलीफ देह होता है कि वह सेक्स तो करने के लिए पूर्ण है पर उस सेक्स का कोई बीज उसमे ठहरने की योग्यता नहीं रखता. कृष्णा सोबती ने इस सन्दर्भ को भी कहानी में उठाया है. केशी और रीमा के बच्चे को सहलाते वक्त रत्ती ममत्व से भर जाती है और बच्चा भी उससे पर्याप्त स्नेह पाता है पर ये आभास होने पर की वह इस सुख से वंचित है खुद को सूखा मानने लगती है. जयनाथ से वह कहती है;
“अपने बच्चों के लिए तुम्हे कोई और माँ तलाशनी पड़ेगी. बेटे बनाने की कला तो इस औरत के पास है ही नहीं.”


रत्ती कई पुरुषों से होकर गुजरी पर हर बार उसके लिए वो सब मिटटी का ढेर हो गया. हर बार बीच में वही ढेर मिटटी हो गये वक्त का. उपन्यास पढ़ कर पाठक को ये भ्रम हो सकता है की रत्ती को अपराधबोध हो या वह घटना के लिए स्वयं को दोषी मान रही हो पर ऐसा नहीं है. एक सुधि पाठक यह रचना पढ़ कर यह जान सकते हैं कि रत्ती में यह मनोग्रन्थि उसके साथ हुए उस अपराध के कारण नहीं थी बल्कि उसके आस-पास के लोगो द्वारा रचे गए और जजमेंटल हो जाने के कारण है खास कर उसके बचपन के सहपाठियों द्वारा उसे चिढाया जाना उसमे इस मनोग्रंथि का बीज डालता है और जीवन में आये पुरुष और उन पुरुषों की कभी हड़बड़ी तो कभी रत्ती को न समझ पाने के कारण इस मनोग्रंथि का बीज अंकुरित हो परिपक्व धारणा के रूप में उसके अन्दर घर कर लेता है. रत्ती में अपने साथ हुए कुकृत्य का पछतावा नहीं था बल्कि लोगो के द्वारा बार-बार उसे बोले जाने का क्रोध था. असद भाई से अपनी सफाई देती हुई कहती है;
“जाने क्या-क्या कहा करते हैं ! रत्ती बुरी है. इसे लड़के पसंद हैं, इसे गिरजाघर के पीछे देखा था, मैं तो किसी से कुछ कहती नहीं हूँ असद भाई … पुरानी बात है, फिर भी…!”
वह तिलमिला जाती है जब अज्जू कहती है;
“किसी ने बुरा काम किया था न तुम्हारे साथ! खून निकला था न”

वह चिडचिडी होती जाती है क्यों कि उसके सहपाठी बार-बार उसे छेड़ते, उसका मजाक उड़ाते, उसे तिरस्कृत करते और उसकी उपेक्षा करते हैं. उस अबोध बच्ची का मन हिंसात्मक होता जा रहा था. श्यामली को भी वह पीट देती है जब वह कहती है;
“लड़कियों को पीटती हो और लड़कों से चॉकलेट खाती हो. उनके सामने अपना फ्रॉक उठाती हो”
बच्चे उसके विषय में मनगढ़ंत कहानियां बनाने लगे और पूरे क्लास भर में उसे लेकर गंदी बाते करने लगे;
“पासी ने चिढ़ाकर कर कहा –“कुछ खाओगी…खिलाऊं…?और अपनी निकर टटोलने लगा, रत्ती की छाती में कोई परनाला पिघलकर बाँहों की ओर बह आया और लोहा हो गया पाँव उठाया और पाशी को गले से पकड़ कर जमीन पर दे मारा. बार-बार पटकती गयी की पाशी न हो कोई पत्थर हो, नफरत हो नफरत … ”फिर कभी ऐसा हुआ तो फाड़ डालूंगी …”रत्ती हिली नहीं .खूंखार सी देखती गयी और खड़ी रही.”

साभार गूगल

अपने ही बाल-साथियों द्वारा की गयी ऐसी भद्दी टिप्पणियों  से रत्ती का बाल-सुलभ मन समय से पहले ही अपना बचपन खो देता है और यही बाते उसके अचेतन मन में धीरे-धीरे घर करने लगती है रत्ती कठोर होती जा रही थी. वह कुंठा मनोग्रंथि से ग्रसित होती जा रही थी. उस बाल-सुलभ मन को शांति असद की बातों और सानिध्य से मिलती है. असद ने उसके कठोर हो चुके बाल मनोभाव को सहारा देते हुए कहा था कि;
“रत्ती हमेशा याद रखेगी, वह एक अच्छी लड़की है. प्यारी और बहादुर .”

और यह बात रत्ती को हमेशा याद रहती है जो उसकी अच्छाई को बनाये रखती है. इसे इस सन्दर्भ में भी देख सकते हैं कि रत्ती के जीवन में जो पुरुष आते हैं उनमे कुछ की प्रेमिकायें रहती हैं और कुछ शादीशुदा पर रत्ती किसी के भी अधिकार को छीनने की बजाय खुद ही हट जाती है. एक व्यक्ति जिसके अंदर इतनी नफरत और इतनी कटुता भरी हो वह उसे दूसरे पे उड़ेलने के बजाय खुद ही उसमे जलती रहती है जबकि ऐसा कम ही देखने को मिलता है. ऐसे में लेखिका ने एक आदर्श चरित्र का भी निर्माण किया है. जबकि आम जीवन में ऐसी मनोदशा वाले व्यक्ति दूसरे के प्रति और कठोर और अपने पसंद की चीज के लिए व्यवहारिक स्तर पर और भी जिद्दी देखने को मिलते हैं जो कभी-कभी आपराधिक रूप भी ले लेता है. उस बच्ची को असद के प्रति खिचाव होता है पर उसकी बदनसीबी कि असद असमय ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है और एक बार फिर रत्ती का बचपन मर जाता है.

रतिका (रत्ती) के साथ जो हादसा हुआ रहता है वह इसे चाइल्ड एब्यूज समझ कर समय के साथ भूल भी सकती थी जैसा कि अधिकांशतः बच्चों के साथ होता है पर ऐसा नहीं हुआ, उसे याद था पर जैसा कि पहले ही बता दिया है कि उसे बार-बार याद कराया जाता है. अपने ही साथियों अपने ही लोगों द्वारा. ऐसे में बहुत हद तक संभव है की या तो पीड़ित व्यक्ति का मन सेक्स से हट जाये या अपने विपरीत लिंग के प्रति जिसने उसका शोषण किया हो, उसका मन घृणा और वितृष्णा से भर जाये. पर इस सन्दर्भ में भी सोबती ने रत्ती के रूप में एक अनूठे पात्र का सृजन किया है. रत्ती इस घटना और घटना को बार-बार कुरेदे जाने पर भी सभी पुरुषों से घृणा नहीं करने लगती और न ही उनसे जुड़ने में डरती है बल्कि इस उपन्यास में हम देखते हैं कि हिंदी साहित्य और विशेषकर स्त्री साहित्य के अन्य स्त्री पात्रों की तुलना में रत्ती पुरुषों के साथ कहीं अधिक सहज है. शायद इसी कारण लेखिका ने 19-20 के करीब पुरुष–पात्रों को नायिका के इर्द—गिर्द रचा है. इनमे से कुछ उसे स्वयं को देखने की दृष्टि देते है, कुछ उसे दूर से देखते हैं, कुछ उस तक पहुँचते है पर उसे पा लेने में सिर्फ दिवाकर ही कामयाब रहा.

समय और घटनाओं ने रत्ती को भले एक स्तर पर कमजोर किया हो पर अन्य स्तरों पर उतनी ही मजबूती के साथ एक सशक्त नारी के रूप में पाठक के सामने आती है. वह किसी भी पल पुरुष से डरने वाली या उसपर आश्रित न रहने वाली हिदी की सशक्त नारी पात्र है. ऐसा नहीं की सभी पुरुषों को वह एक जैसा ही व्यवहृत करती है. जगतधर जिसके जीवन में मीता है पर वह चाहता रत्ती को है उसके साथ रत्ती सौम्य है पर वहीँ रोहित जो जबरी उसे पाना चाहता है उसे वह झटकार देती है. वहीँ वह एक आत्मनिर्णय लेने वाली स्त्री भी है वह रोहित से कहती है;
“मुझे किसके साथ कहाँ जाना चाहिए, यह मेरे सोचने की बात है, किसी और की नहीं … सिर्फ अपने चाहने से किसी को पा नहीं लिया जाता.”
रत्ती के अपने सिद्धांत अपने उसूल हैं. सुमेर से वह कहती है;
“जो आँख रहते गलत को रहने दे सिर्फ इसलिए कि कोई सही मानने से इनकार करता है. किसी की बेवकूफी और अपनी बेबसी का विज्ञापन किया जाये…”
रत्ती में सेक्स को लेकर और सिर्फ सेक्स को लेकर ही मनोग्रन्थि है न कि वह कोई मनोरोगी है. रत्ती के इन वक्तव्यों से पाठक उसे मनोरोगी समझने की भूल नहीं कर सकते. पर अपनी इस मनोग्रंथि से लाचार होकर ऐसा भी नही कि वह किसी से किसी स्तर पर समझौता करे. भानु से वह कहती है;
“जब जब कोई नम्बर मिलाया है, कभी सही जगह घंटी नहीं बजी. बजी तो इंगेज मिली. कभी नंबर मिला तो उस ओर उठानेवाला कोई न था. था तो उस ओर से ऐसी आवाज नहीं आई जो मुझ तक पहुँच सके.”
सुब्रामनियम से वह कहती है;
“सुब्बा, ऐसा कुछ नहीं जो मैं चाहने पर चुन सकूँ और न चाहने पर न चुन सकूँ.”
वह ऐसी महिला पात्र है जो अपने मन के अनुकूल ही किसी के साथ राम सकती है न कि सिर्फ काम की इच्छा रखने वाली कोई रोगी. जिस तरह उसके अवचेतन में बचपन की काली परछाई बैठी है उसी तरह स्त्री स्वातंत्र्य और स्वाभिमान को भी उसके पूरे व्यक्तित्व में सभी प्रसंगों में अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है.
बड़े अन्तराल के बाद लेखिका अपना कुछ कहती हैं रत्ती के लिए;
“एक लम्बी लड़ाई. हर बार बाजी हार जाने वाली और हर बार हार न मानने वाली.
हर बार अकेले जूझना. हर बार सिर उठा आगे देखना.हर मोड़ एक मोड़ भर. भविष्य नहीं.
भविष्य वह अंधी आँखों वाला वक्त बना रहा जिससे रत्ती ने कभी साक्षात्कार नहीं किया.
वक्त के पंजो तले जितनी बार छटपटाई, उतनी बार तिलमिलाई. उतनी बार हाँथ-पाँव पटके.
बार-बार सर उठा आगे देखा –
कुछ तो होगा जिसका मुझे इंतजार है !
कोई तो होगा जिसे मेरा इंतजार है !
पर नहीं … रत्ती को सिर्फ रत्ती का इंतजार था.
रत्ती कितनी बार सोचती
“वह ताप कहाँ है, वह आग जो इस जमे हुए को पिघला सके … लेकिन यह पथरीली अहल्या अड़ी कड़ी चट्टान की तरह, हर बार की टकराहट से न पिघलती है, न टूटती है! न छोटी होती है, न बड़ी !… आँख में जितने आकार दिखे अपने भीतरी खोल पर उतने ही रफू और पेबन्द.”
राजन जिससे बरस भर का परिचय था उसे भी वह मना करते हुए कहती है;
“मुझे तुमसे माफ़ी मांगनी है राजन … वह एक काला जहरीला क्षण हर बार मुझे झपट लेता है और मैं काठ हो जाती हूँ”और एक साल के आत्मीय परिचय के बाद जब राजन को वो नहीं मिलता जो एक स्त्री से पुरुष चाहता है तो वह भी अपनी कुंठा उसपे यह कह के निकल देता है कि;
“मुझे हमेशा शक था, तुम औरत हो भी कि नहीं!”

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जब रत्ती को श्रीपत से लगता है कि वह भी कुछ है और उसकी भी देहरी पर से कुछ उठाया जा सकता है तो वह उसकी और खिचती है पर यह भान होने पर की श्रीपत पर ‘उना’ का अधिकार है तब वह स्वयम ही हट जाती है पर उसका मन फिर उसके खालीपन को धिक्कारता है वह आत्मालाप करती है;
 “रत्ती, तुम्हारे पास अपना कोई पुण्य नहीं. तुम जमे हुए अँधेरे की वह परत हो जो कभी उजागर नहीं होगी. हो सकती तो श्रीपत क्या ऐसी चाहत को रख कर तुम्ही पर छिड़क सकते ?”
अपने अकेले क्षणों में वह खुद की ही आलोचना करती रहती है दिवाकर से वह कहती है;
“जिसके पास मीलों लम्बा एकांत हो, वह अकेले में अपने लिए अपने को क्यों न पढता रहेगा. दिवाकर अकेले में कोई क्या से क्या हो जाता है यह सिर्फ देखकर पता नहीं पाया जा सकता है” 
पर दिवाकर ने उसके अन्तरंग का टेलीफोन नम्बर तलाश लिया था. रत्ती को जब ये लगता है की वह उतरती बरखा है तब उसे दिवाकर विश्वास दिलाता है कि;
 “जो कहना चाहता हूँ नही कहूँगा रत्ती! इसलिए की मैं उसे सच करना चाहता हूँ”
दिवाकर के सानिध्य में रतिका खुद को पढ़ती है. जिसने इतना अकाल जाना, इतना रुखा और अंधेरा भी, फिर भी उसमें कुछ बाकी है. उसका आत्मालाप;
 “रतिका तुमने सर उठा अपने लिए अपनी लड़ाई लड़ी है. कड़वाहट के ज़हर से अपने को अपना दुश्मन नहीं बनाया. दोस्त नहीं मिला तो भी दोस्ती को दुश्मनी नहीं समझा .तुम एक अच्छी लड़की. प्यारी और बहादुर.”
उसे असद की बात याद हो आयी पर ‘प्रीति’ का सोच कर दिवाकर से यह कह कर दूर हो जाती है कि;
   “मैं जुड़े हुए को नहीं तोडूंगी.विभाजन नहीं करुँगी. मेरी देह अब तुम्हारी प्रार्थना है.”  और वह फिर अकेली है पर बिना श्राप के, बिना अधूरेपन के, बिना खालीपन के पर वह अकेली है क्यों की आकाश में न घरौंदे बनते है न धरती के फुल खिलते है.

कृष्णा सोबती ने रत्ती जैसे पात्र की सर्जना कर के हिंदी साहित्य को एक ऐसी नायिका दी है जो सेक्स मनोग्रंथि से ग्रस्त होते हुए भी आत्मिक रूप से सशक्त है. पुरुष जिसके लिए अवरोधक के सामान नहीं बल्कि आलोचक के रूप में आते हैं , जो सिर्फ उसके दोष ही नहीं, उसके गुण भी देखते हैं और जिन गुणों को वह स्वयं भूल गयी है उसे याद भी दिलाते हैं. रत्ती ने बहुत  कुछ बर्दास्त किया  है पर फिर भी उसने अपनी अच्छाई बनाये रखी है. रत्ती कभी कोई गलत कदम नहीं उठाती, वह अपने आत्म विश्लेषण से ही स्थिति के अनुरूप कार्य का चुनाव करती है और इस रूप में वह हिंदी साहित्य की सशक्त नारी पात्र है.

स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति

इंदिरा गांधी 


अनुवाद : कुइलिन काकोति


आज भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी की जयंती है. इस अवसर पर स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनका एक भाषण . यह भाषण आल इण्डिया वीमेंस कांफ्रेंस भवन के उदघाटन अवसर पर 26 मार्च 1980 को दिया गया था. 

लोगों के बीच इंदिरा गांधी



पिछले कई दशकों से आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेंस भारतीय महिलाओं का संगठित आवाज बनी हुई है. मैं कभी किसी महिला संगठन की सदस्य नहीं बनी, लेकिन मेरी काफी दिलचस्पी उनकी गतिविधियों को जानने में रही है , और जब भी संभव हुआ है मैंने अपनी ओर से उनकी मदद की है .

मुझे खुशी है कि लम्बे समय के बाद आल इण्डिया वीमेन्स कांफ्रेंस का अपना घर है और उसका नामकरण हमारे समय की सबसे उल्लेखनीय महिला सरोजिनी नायडू के नाम पर किया गया है . सरोजिनी नायडू, जो अपने भीतर से तो कोमल स्त्री थीं,  लेकिन पुरुष प्रधान समाज में उन्होंने  अपनी उपस्थिति दर्ज कराई –लेखन और राजनीति दोनो में.

1980 में आगा खान पति-पत्नी के साथ इंदिरा गांधी

इस अवसर के महत्व को बढाने और इसे अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए हमारे बीच हमने ‘हिज हायनेस आगा खान’ और ‘हर हायनेस बेगम आगा खान’ को आमंत्रित किया है. ये भारत के दोस्त हैं और इन्होने शिक्षा , स्वास्थ्य और अन्य कल्याणकारी परियोजनायें यहाँ शुरू की हैं या कई परियोजनाओं में मदद की है.

मैं अपने सामने कई प्रसिद्ध महिलाओं को देख रही हूँ, जिन्होंने समाज सेवा, शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, क़ानून आदि विभिन्न क्षेत्र, और हाँ , राजनीति में भी, अपने आपको प्रतिष्ठित किया है. ये लोग भी इस भवन के निर्माण कार्य को पूरा देखकर प्रसन्न हैं. मैं अक्सर कहती हूँ कि मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ. फिर भी पीछे छूट गये लोगों, सुविधाविहीन लोगों , के प्रति अपनी चिंताओं में  से महिलाओं को कैसे नजरअंदाज कर सकती हूँ, जिनको इतिहास के प्रारंभ से ही शासित किया गया है और क़ानून एवं सामाजिक रीतियों में जिनके खिलाफ भेदभाव किया गया है. दुनिया की सारी भाषाओं की शब्दावली यह बताती है कि पुरुष-श्रेष्ठता की भावना कितना व्यापक और घातक है. और इस तथ्य से कुछ लोगों को छोड़कर, सब,  बिना किसी शंका के सहमत भी हैं. इस वक्त मैं ‘ वर्ल्ड एंड वीमेन’ नामक एक किताब पढ़ रही हूँ. इसमें मैंने पढ़ा कि यू एस ए के मिल्स कॉलेज के प्रेसिडेंट मि.लिंग व्हाईट ने पुल्लिंग सर्वनामों के बारे में क्या लिखा है. मैं उन्हें ही उधृत कर रही हूँ, ‘ औरत के रूप में बड़ी हो रही छोटी लडकियों में भाषा की आदत दूसरे लोगों ( महिलाओं सहित) की तुलना में ज्यादा गहरी होती है. यह बताता है कि व्यक्तिव मूलतः पौरुष भाव है और महिलायें मानव की उप-प्रजाति हैं.’ लेखक आगे कहते हैं कि ‘ अब समय आ गया है कि हम समझें कि ये मूर्खता पूर्ण स्टीरियोटाइप हमें कहाँ ले जा रहा है. ये स्टीरियोटाइप बताते हैं किपुरुष नेता है और स्त्री उसकी अनुगामी, पुरुष उत्पादक है और स्त्री उपभोक्ता, पुरुष शक्ति है और स्त्री कमजोरी- यही वह धारणा है, निर्मिति है, जो पुरुष को आक्रामक बनाती है और मानवता को उसका पीड़ित.’

युवा इंदिरा गांधी

इस तरह महिलाओं को बहिष्कृत करके पुरुष ने खुद को पूर्ण मुक्ति और विकास से खुद ही वंचित कर लिया है.
पश्चिमी देशों में महिलाओं की तथाकथित मुक्ति का मतलब पुरुषों के अनुकरण तक सीमित हो गया है. लेकिन मुझे लगता है कि यह एक गुलामी से निकलकर दूसरी गुलामी में फंसने जैसा है. मुक्त होने के लिए स्त्री को सबसे पहले वह होना पडेगा, जो वह है, यानी पुरुष की प्रतिद्वंद्विता में नहीं बल्कि अपनी खुद की क्षमता और अपने व्यक्तिव के परिप्रेक्ष्य में. हम महिलाओं को अधिक सचेत, अधिक सक्रिय और अधिक तत्पर देखना चाहते हैं , इसलिए नहीं कि वे  महिला हैं  , इसलिए कि वे आबादी का आधा हिस्सा हैं. उन्हें पसंद हो या न हो, लेकिन वे अपनी जिम्मेवारियों से भाग नहीं सकतीं और न ही उन्हें इसके लाभ से वंचित किया जा सकता है. भारतीय महिलायें पारम्परिक रूप से रूढ़िवादी हैं , लेकिन वे समन्वय के गुणों से सम्पन्न है – अनुकूलित करने के , आत्मसात करने के गुणों से सम्पन्न. यही उनको दुखों के सामना के लिए और कठिनाइयों से शांतिपूर्वक जूझने के लिए लचीला बनाते हैं, निरंतर परिवर्तित होने,  फिर भी अपरिवर्तित रहने की क्षमता देते हैं, यह भारत का अपना गुण भी है.

पिता के साथ इंदिरा गांधी

इस समय की सबसे बड़े मुद्दे हैं : पहला, आर्थिक और सामाजिक असामनता तथा समृद्ध और विकाशील देशों के बीच अन्याय तथा इन देशों के भीतर के अन्याय, दूसरा, क्या मानव – बुद्धि मृत्यु की होड़ को ख़त्म कर सकेगी,जिसमें वर्चस्व की कामना अनेक तरीकों से व्यक्त होती है – सबसे खतरनाक है, शस्त्रों की होड़  और तीसरा , हमारी अपनी धरती को इंसान की लालच और शोषण से बचाने की जरूरत. हम बहुत देर से प्रकृति के संतुलन और इसके संसाधनों पर अपनी निर्भरता के प्राचीन सत्य के प्रति सजग हो पाये हैं.

इस बड़ी चुनौती का सामना कोई एक सेक्शन अकेले नहीं कर सकता है, चाहे वह कितना ही विकसित क्यों न हो, ख़ासकर जब दूसरे या तो दूसरी दिशा में गतिशील हों या उदासीन हों. कोशिश सार्वभौम होनी चाहिए, सजग और ठोस, यह समझते हुए कि इसमें योगदान के लिए कोई छोटा नहीं है. यह सभी राष्ट्रीयताओं, सभी वर्गों, धर्मों, जाति और लिंग के संयुक्त प्रयास से संभव है.

पारिवारिक फोटोग्राफ में इंदिरा गांधी ( छोटी )

मारे पास व्यर्थ जाया करने के लिए समय नहीं है, इसमें शिक्षित करने की जबरदस्त जिम्मेवारी की जरूरत है. हम एक साथ बढना चाहते हैं, सबके साथ कदमताल से, लेकिन यदि पुरुष संकोच करते हैं, तो क्या महिलाओं को रास्ता नहीं दिखाना चाहिए?

आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस को, ख़ासकर इसकी प्रेसिडेंट श्रीमती लक्ष्मी रघुरमैय्या को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई देते हुए मैं इस भवन को राष्ट्र के नाम समर्पित करती हूँ.

लाजवन्ती

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प्रो.परिमळा अंबेकर

हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष . आलोचना और कहानी लेखन  संपर्क:09480226677

लाजवन्ती….!!  हाॅं … उसका नाम लाजवन्ती था … । अपने नाम से कोसो दूर खडी , अपने ही नाम से ठिठोली करती हुई …लाजवन्ती !! यह लाज भी बडी अजीब चीज है … न जाने इस शब्द में  क्या जादू है…. बस बंध जाती है खूॅंटे से … दुपट्टे से, चुनरी से…. !! दुपट्टा या चुनरी के लहराते झालर से टंगे, गले का फंदा बनती बनने में देर नहीं   लगती… ! देह के पोर पोर से रिसती है… अंगराग की तरह … बंधा बंधा ढका ढका ….खुशबुदार… !! लेकिन जब खुला खुला….टूटा टूटा….तो… बदबूदार ..!! सब मन और आंख पर लगा अंजन कहिये !! लेकिन मेरी लाजवन्ती तो, अपने पालने के गद्दी के सात परतों के नीचे, उबले चने और पान सुपारी के साथ ही , लाज को भी तह कर रक्ख आयी थी । पालने के संस्कारों को पालने में ही रस्सी के संग झूलते छोड, उतर आयी थी नीचे…नीचे..स्वतंत्र और उन्मुक्त … !! उसकी चालाकी बचपन से ही चलने लगी थी.. !! माॅं,  दादी की मीठी घुट्टी की कडवाहट को, उनके अनदेखे, कै कर लिया होगा लाजवन्ती ने … !!

खैर अब मैं बताने जा रही हूॅं इसी लाजवंती के लाजभरे …   नहीं नहीं ….  लाजमारे किस्से .. !! जोर जोर से ठहाके मारकर हॅंसतीं और  अपने दोनो हथेलियों में होठ  और नाक को भरते , मुॅंह छुपाये… खिसियाहट की हॅंसी भी हॅंसती । ऐसी हॅसी उसकी फैली आॅंख की पुतलियों के मटकने से पता चलता । लाजवंती हमेशा, हमारे बीच होती, लेकिन उसका हॅंसना- बोलना जैसे हमारे बीच होते हुए भी हमारे साथ का नहीं लगता था मुझे। लगता, उसके बोलने की आवाज किसी और के ही कान से जा टकरा रही हैं । उसके चेहरे की मुस्कुराहट की महक किसी और के चेहरे पर, ठंडी सुकून बनकर पसर रही है । उसकी कनखियों के तीर के अहसास से, किसी और के ही शब्दों को अर्थ मिल रहे हैं !!

शायद छठी कक्षा में हम पढते थे । हम लडके और लडकियों के बीच, वह लाजवन्ती कुछ अलग- अलग ही लगती । हमसे भी उसके बडे होने के कोई  दैहिक प्रमाण तो नहीं थे , क्यूॅंकि कद -काठी से लगभग सामान्य थी । सुक्की, गोरी चिट्टी । सदा हॅंसी से खिंचे- खिंचे उसके मुॅंह के आख, कान नाक में सबसे विशिष्ठ रहे थे, उसके गुलाबी मॅसुडे और उनमें उग आयीं झक्क सफेद दाॅंत !! जो समय-बेसमय खिले मिलते। उम्र में हमसे उसका बडी होने का सच्चा – मुच्चा चिठ्ठा तब सामने आया जब वह सचमुच में बडी हो गयी थी । टीचर के पूछनेपर उसके मोहल्ले की लडकियाॅं , अस्फुट इशारों से आपस में ऐसे देखती जैसे किसी गहरे राज को छिपाने का जिम्मा ले रक्खी हों । उसके बाद लाजवन्ती का स्कूल आना बंद हो गया ।

लाजवन्ती का स्कूल न आना… सबसे ज्यादा मुझे अखरने लगा । ठुड्डी को हथेलियों में धरे, हर हमेशा , खिडकी के पार देखते, बेंच पर मेरे बगल में बैठी  लाजवन्ती का चेहरा अचानक खिल जाता । झट सर  घुमाकर मेरी ओर देखती । उस समय , उसका चेहरा मुझे अजीब अजीब सा लगता ….!! खिडकी और मेरे बीच पंेडुलम की तरह उसकी सर तब तक सटकता अटकता रहती, जब तक की बाहर दोपहर के खाने की घंटी न बजती। छठी क्लास के लगभग पंद्रह सोलह लडकियों में उसने मेरे चेहरे पर ऐसा क्या पढ लिया था पता नहीं !! बिना ना नुकर किये मैं भी कबीर की मुतिया की तरह बस हो लेती उसके पीछे….‘‘गले राम  की जेवडी, जिथ खैंचे तित जाउॅं ‘‘। जैसे ही घंटी बजती, यह लाजवंती मेरे दोनों हथेलियों को अपनी मुठियों में कसकर भींचती और मुझे लिये तब तक दौडते रहती जब तक कि, दूर… किसी निश्चित जगह पर वह….खडा नहीं दीख पडता…!  लंबा ,  काले बालों वाला आशिकाना डील -डौल का लडका, चलते हीरो की फैंशन का क्राफ काढे, मुंडी तिरछी किये हुये…., लाजवन्ती के आने के मार्ग को  निहारता हुआ !!

पता नहीं अपने स्कर्ट की जेब में वह कागज का टुकडा कब रक्खे रखती ।  क्षण में, अपने जेब से कागज के टुकडे को मुठ्ठी में भींचकर, मुझे वहीं छोड उसकी ओर दौडते जाती…कागज का गोला बनाती और उसकी हथेली में यह खुद रखती या वही अपना हथेली आगे बढाता, दूर खडे मुझे पता नहीं चलता था … !! पढे बेपढे सभी ढंग के बच्चों की लिखावट जांच जांचकर धारखायी मेरी बुजद्धी आज तक इस सवाल का उत्तर खोज नहीं सकी… आखिर किसी भी लजैग्वेज की एबीसीडी न लिख सकने वाली मेरी लाजवंती , रोज उस लडके को थमाने वाले कागज के टुकडों में लिखा क्या होगा.. ? और लिखा कैसे होगा….? लेकिन बात इतनी तो पक्की होती, दूसरे दिन वह लाजवंती के कागज में उधृत कोडवर्ड का सिरा पकडे पकडे निर्दिष्ट जगह पर रास्ता ताकता जरूर मिल जाता … !!

आज मुझे लगता है….लाजवंती के हाथों से गुदे वे कागज के टुकडे , कोरे कागज के टुकडे नहीं बल्कि, बिना राजमद्रा के वे राजपत्र थे , जिनका किसी भी ढंग से दुरूपयोग होने की गुजाइश ही नहीं । भला उन अलिखित, लिखे पत्रो का शिनाख्त कौन करें … उनका मजमून की जानकारी आये भी तो कैसे आये ? किसे आये …? कागज का हस्तांतर होने की देरी ही नहीं थी, उसी रफ्तार मे मुझे लेकर दौडती,  मुझे लिये लिये स्कूल की ओर लौट पडती । अपना डब्बा खोले खाने बैठे लडकियों की बंदगोले में , ठूॅंसते ठूॅंसाते, जगह बना लेती और मुझे भी लेकर खाने बैठ जाती । चेहरे पर कोई  भाव नहीं कोयी रेशा नहीं … जैसे कुछ हुआ ही नहीं । यह सारा काम अंजाम पर ऐसे पहुॅंचता , जैसे कोई खुफिया मिशन का डेमो चलपडा हो । कभी कागज का गोला, कभी रंगीन पन्नी चढा कवर, कभी यह -कभी वह… चीजों के साथ साथ उनके मिलने की जगह भी  बदलती रही । कभी किले के भीतर का फाटक, कभी किले का बीचों बीचवाला मस्जिद, कभी किले मे भीतरी दीवाले से सटेखडे, घरों की ढिबरियों का आड…. । लाजवंती की दोस्ती का फायदा आज मुझे दो ढंग से दिखता है । एक है अपने स्कूल के सामने सदियों से सीना ताने मौन खडे बहमनी किले के हर पत्थर और सूरत की ऐतिहासिक जानकारी  …. और दूसरा पढते-पढाते समय, अपने सामने खडे हर अपढ बच्चों में लाजवंती के चेहरे का झलक जाना ।  लाजवंती के दिग्दर्शन में चलने वाला वह ड्रामा जैसे भव्य संकलत्रय के सिद्धांत को याद दिला जाता । नाटक के पात्र, काल और घटना के बंदोबस्त की तरह । वही पात्र, वही घटना और वही समय.. ।  इनके मध्य गिट्टी पिट्टी सी घूमती … गले राम की जेबडी पहनी … मैं !

आज से लगभग बयालीस चालीस बरस के पहले की बात है । गुलबर्गा, शहाबाजार नाके के पास का अपना स्कूल , कब्रीस्तान के बगल में खडा-खडा सामने के बहमनी किले के बियाबान को सदा निहारते रहता । शहाबजार नाका, चुंगी नाका भी कहलाता है। जिस स्कूल मे हम पढते थे उस स्कूल की हस्ती बस इतनी सी थी कि वह अपने नाम से कम लेकिन, चुंगीनाका के परिचय से अधिक पहचाना जाता रहा।  सामने के चौरस्ते की सडकें, लोगो को जिन अलग अलग दिशाओं में ले जातीं, बाई  दिशा में जाने वाली उन्हीं सडको के दायें फैलाव में राजपूतो की घनी बस्ती थी । वहीं था लाजवंती का घर । अपने स्कूल के लगभग सारी लडकियाॅं या तो इन राजपूत बस्तियों से थी या, आगे जाकर खुलनेवाले , लकडी का सामिल लगाये बैठे गुजरातियों के घरों से थीं । इन सारी लडकियों का इस स्कूल में पढने के पीछे एक मात्र कारण था कि  वह उनके बस्तियों के अधिक पास बना था ।

 मैं ही ऐसी थी,  जिसका नाता स्कूल के आसपास के किसी बस्ती या इलाके से नहीं था । कोसों दूर से आधे बस के रास्ते , आधे पैर के रास्ते चलकर मुझे हरदिन स्कूल आना पडता था । खैर लाजवन्ती को मेरा, अपने जातीय बंद इलाके से बाहर का होना , अधिक सेक्योर और सहायक लगा होगा । साथ ही उसने मेरे चेहरे पर की लकीरों में बनते एक दो और वाक्यों को पढ भी लिया था शायद-यानी, इन तमाम मामलों में की मेरी सामाजिक , बौद्धिक नासमझी , और हो न हो… सुआमन तोते जैसी मेरा दिले -खुशी सा जिगर का  रखना । जब किसी दिन , किले के भीतरी गली के मोडपर, या किले के गुंबज के पास , या किले के भीतरी डिबरियों के छोर के नीम के पेड के तले……. निश्चित जगह पर वह दिखाई नहीं पडता तो, लाजवंती से अधिक सुआ तोते की तरह पस्त मैं हो जाती । लाजवन्ती का चेहरा ? सपाट, भाव रहित । लेकिन इस सपाटपन को चेहरे पर टंगाये वह मस्त रहती भीतर से । मिलन के नये- नये पैतरें खोजने के जश्न में डूबी डूबी !!

न फोन न मोबाइल, मिलने के प्लान लाजवंती के खुफिया दिमाग में ऐसे आकार लेते जाते जैसे चोरगुंबज के किस्से… !!  कभी कभी जान बूझकर, निश्चित गली के  मोड को छोडकर पिछली गली के छोरपर मुझे लेकर खडी हरती। झांक- झांक कर उस लडके की परेशानी भरे हरकतों को देखते जाती, और अपने गुलाबी मसूडे खिलाते जाती । अपने समय के यारों की सिनमेटि छौंक के स्टीरियो टाइप प्रेम से दूर लाजवन्ती के लिये तो प्रेम….? बस… मुहम्मद बाजी प्रेम का ज्यूॅं भावै त्यॅूं खेल !!

आजकल, केवल लाजवन्ती ही नहीं, वह लडका भी मेरे चेहरे की लकीरों को पढने लग गया था । उस दिन, पंद्रह अगस्त… !! स्कूल के कार्यक्रम के बाद हमें  सीधे पुलिस ग्राडंड जाना था । स्कूल के सामने के स्टैंड से हमें स्टेशन की ओर जानेवाली बस पकडनी थी ।  ताकि पुराने अस्पताल के स्टाॅप पर उतरकर , दो कोस की दूरी पर के पुलिस ग्राउंड चलते जा सकें । बस की पिछली डोर से सटी सीटपर कब्जा जमा लिया था लाजवन्ती  ने । खिडकी के सीट पर बैठे उसके गुलाबी मसूडे अचानक फिर उजागर हो गये । बगल की सीट से मैने देखा, बस के आगे की दरवाजे की रेलिंग पकडे वह लडका बाहर की ओर हवा में झूल रहा है । इस अंदाज में कि उसका लंबा छरहरा सांवला देह, हवा के बहाव के साथ पीछे की खिडकी से बहकर आ जाय, जहाॅं लाजवन्ती बैठी थी । हरेक स्टाॅप पर जब बस रूकती, नीचे उतरकर वह, हवा के झोंके से बिखरे बालों को और बेलबाॅटम पैंट के क्रीज को एकसाथ संवारता । बस सुपर मार्केट स्टाॅप पार कर जगत तक पहुॅंची ही न थी, उसकी निरीह आॅंखें मेरी ओर पलटीं । मैने देखा, लाजवन्ती खिडकी की सीट से उठकर कहीं और चली गयी थी। आये दिन ये घटनाएं नाटक के रिहर्सल की गलतियों की तरह गाहे – बगाहे  दुहराये जाने  लग गये थे । और मैं पिंजर में कैद सुये सी फडफडाकर रह जाती ।

उस दिन लाजवन्ती स्कूल आयी थी । आखिरी बार । मैने सोचा था , बडी होने के बाद उसने स्कूल छोड ही दिया है । खाने की छुट्टी में लाजवन्ती मुझे  बजाय कहीं और ले जाये , अपने घर ले गयी थी । बाहर बैठक में कुर्सी पर बैठी मैं एक साथ घर के बाहर का और भीतर का नजारा देख रही थी । घर का आंतरिक सजावट और भीतरी गंध कुछ और ही कहानी कह रहे थे । लाजवंती की तय की गयी ब्याह की कहानी । माॅं के दिये लड्डू और चूरमे का खाने की ही देरी थी , ताक में बैठी लाजवन्ती मौका पाकर, मेरा हाथ थामें दौडते हुए, दरवाजे के बाहर निकल पडी । अगली गली के उस सुनसान मोड पर ले गयी ,जहाॅं वह खडा था, उसी अंदाज में …तिरछा सिर किये उसके आने के इंतजार में । आज वह अपने कान से मर्फी  रेडियों सटाये खडा था ।  जिससे फिल्म का गीत बजता सुनायी पड रहा था ‘‘ तेरी गलियों में ना रक्खेंगे कदम… आ…ज के बाद… तेरे मिलने को न आयेंगे सनम… आ….ज के बाद …‘‘ मै…दूर खडी थी, वही कागज का गोला, उसकी  हथेली पर … इस बार भी मुझे पता नहीं चल सका कि कागज के गोले को लाजवन्ती ने ही उसके हथेली पर रक्खा, या उसने अपना हाथ आगे बढाया था ….!! लौटते लाजवन्ती के चेहरे पर वही गुलाबी मसूडे खिले हुये थे… उन मसूडों को आदत जो पडी हुई  थी मौके बेमौके खिलने की !! लेकिन… फर्क जरूर मैने महसूस किया । उसदिन उसका चेहरा , अजीब -अजीब सा नहीं लगा मुझे !!
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इत्तेफाक से लाजवन्ती मुझे फिर मिली चालीस बयालीस साल बाद…. !! शाहबजार के दुर्गामंदिर की पूजा में । दशहरे की झाॅंकी देखने आयी थी लाजवन्ती । वही हॅंसी । वही अंदाज ..!! उम्र की ढलान पर खडी… पर खिली खिली ! उसे पहेचानने की ही देरी थी… अबकी बार उसका हाथ पकडे , मैं दौड पडी, भीड से बाहर … ! मेरी आॅंखों में गहराते -उछलते भाव को लाजवन्ती ने भाप लिया । आदतन , हथेलियों से होंठ और नाक को ओट दिया , और खिसयाकर हॅंसने लगी ।  पुतलियों को बरबस फैलाया और एक अजीब कोण में सिर को उठाते हुए मुझसे पूछा ‘‘ पम्मो…तुझे वो सब याद है.. ? ‘‘ उसने… इस अंदाज में पूछा, जैसे कि वह सब कुछ मेरा किया कराया हो !! इस बार मैने भी अचूक वार किया । अपनी आवाज को एक विशेष अंदाज में दबाते पूछा ‘‘ लाज्जो ….. तेरे वो कागज के गोलों का क्या हुआ… ? सुनकर छूट पडी लाजवंती के ठहाके का स्केल , आवाज में तो बहुत ऊंचा था  लेकिन….. उसके भीतर जमी पडी सीलन की ठंडाई को हमने  महेसूस किया, आपस में महेसूस किया ।
और…. और क्या था ? मेरी हथेलियाॅं उसकी मुठ्ठी में, उसी विशेष अंदाज में दबने लगीं… उसका चेहरा पूरा गुलाबी मसूडों की आभा से भरने लगा …उसके झक्क सफेद दाॅंत..! मैने देखा, अबकी बार, उसमें मिस्सी की गहरी कलई  चढी थी । और भीतर मंदिर में , दुर्गा पूजा की घंटियाॅं बजने लगीं ….  !!

मगध में छठ : स्त्रीवादी पाठ

संजीव चंदन 

मगध का सांस्कृतिक प्रतीक “छठ पूजा’ स्त्रियों के लिए  एक व्यापक अवसर मुहैय्या कराता है, घर से बाहर सामूहिक अभिव्यक्ति  का, धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का, जिसके सम्पूर्ण प्रारूप में स्त्रियों की भागीदारी उनके अस्तित्व के विविध पहलुओं को उद्घाटित करते हैं- पितृसत्तात्मक नियंत्रण में जकड़े  अस्तित्व और उसके भीतर अपने लिए आंशिक स्पेस के पहलू. मगध सहित पूरे बिहार में ऐसे ऐतिहासिक और मिथकीय स्त्री चरित्र रही हैं, जिनकी अपने समकालीन पब्लिक सफीअर में हस्तक्षेपकारी भूमिका रही है,  साथ ही  समकालीन अध्यात्म, धर्म और धार्मिक आन्दोलनों में बौद्धिक तथा भौतिक भूमिका रही है. सुजाता की  गौतम बुद्ध की शिक्षिका और शिष्या के रूप में ऐतिहासिक उपस्थिति , आम्रपाली की पब्लिक स्फीअर से लेकर बौद्ध आंदोलन में प्रभावाकरी भूमिका, भारती (मंडन मिश्र  की पत्नी )का शंकराचार्य से शास्त्रार्थ आदि ऐतिहासिक-अर्धैतिहसिक आख्यान बिहार के सांस्कृतिक किस्सों में शुमार हैं. मगध सहित बिहार के दूसरे हिस्सों में तांत्रिक साधना पद्धति और उसमें देवी उपासना से लेकर स्त्रियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक समान हिस्सेदारी इस क्षेत्र की संस्कृति के प्रमुख अवयव रहे हैं.

इन आख्यानों और उपाख्यानों के निर्माण में हालाँकि पितृसत्ता से नियंत्रित विमर्श तंत्र की महत्वपूर्ण और भेदमूलक दखल है. चूकि इस संक्षिप्त आलेख में छठ पूजा का स्त्रीवादी पाठ करना उद्देश्य है फिर भी धर्म और धार्मिक तंत्र पर पितृसत्तात्मक कब्जे का असर सक्रिय स्त्रियों पर क्या पड़ता है , उसके उदहारण स्वरूप निरंजना निवासी “सुजाता’ की चर्चा यहाँ पर समीचीन है. बोधगया के उरुवेला के पास सेनानी नामक गांव की सुजाता ने तपस्यारत क्षीणकाय गौतम को “खीर “ खिलाकर ‘मध्यम मार्ग ‘ का रास्ता दिखाया. क्या ऐसा संभव है कि तत्कालीन भारत के लगभग सभी प्रमुख अध्यात्मिक स्कूलों से वाद-विवाद करता हुआ गौतम दुःख के निदान का अपना मार्ग ढूढने के लिए तपस्या रत हो और  उसे एक साधारण स्त्री खीर खिलाकर चैतन्य कर दे, मार्ग दिखा दे.तर्क और व्यवहार तो ऐसा कहता है कि गौतम उस स्त्री से शास्त्रार्थ के बिना परास्त होने वाले नहीं थे. खीर और स्नेहपूर्ण वार्तालाप से गौतम को बुद्धत्व की दिशा का भान हुआ होगा. लेकिन बौद्ध स्मृतियाँ इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

जातक कथाओं में सारे बुद्ध, अपने हर अवतरण में सुजाता से खीर प्राप्त करते  हैं, अर्थात इस ईश्वरीय नियति से पहले तो सुजाता के व्यक्तित्व  को नियंत्रित किया गया, फिर बुद्ध कालीन कई सुजाताओं की उपस्थिति की कहानियाँ इस व्यक्तित्व की प्रखरता को नियंत्रित करती हुई कही गईं. मसलन बुद्ध की प्रमुख शिष्या सुजाता , जो अरहंत है, गृहणी सुजाता, जिसे बुद्ध अच्छी और पतिव्रता, नियंत्रित पत्नी होने का उपदेश करते हैं. स्पष्ट है कि अध्यातम के रास्ते इतने आसान नहीं हैं,  स्त्री के अपने व्यकतित्व को अपने तरीके से खड़ा करने के लिए . धार्मिक तंत्र पर पुरुष नियंत्रण उसे अलौकिक श्रेष्ठता तो दे सकती है , देवी के रूप में, लेकिन सांसारिक श्रेष्ठता संभव नहीं, इसके लिए धार्मिक स्मृतियाँ , अनुश्रुतियाँ पितृसत्तात्मक दायरे में स्त्रियों का व्यक्तित्व वृत्त तय करती हैं., विदुषी स्त्रियों के इक्के -दुक्के उद्धरणों को जन स्मृतियों में  यदि ढूढ़ भी लिया जाये तब भी स्त्रियों , श्रमिकों और दलितों का समूह विद्याध्यन, धार्मिक रस्ते से  इश्वर प्राप्ति ,आदि से वंचित  किया गया. बौद्ध मठों में स्त्रियों के प्रवेश के संघर्ष और प्रवेश के बाद भिक्खुओं की तुलना में भिक्खुनियों की दोयम हैसियत आज स्त्रीवादी इतिहासकारों के द्वारा चिह्नित ऐतिहासिक तथ्य हैं. ऐसे में स्त्रियों के लिए धर्म और अध्यात्म का एक रास्ता दिखता है भक्ति मार्ग से, कर्मकांड रहित भक्ति मार्ग. छठ व्रत की भक्ति पद्धति और प्रत्यक्ष ईश्वर से उनका साक्षात्कार उन्हें आकर्षित भी करता  है और धार्मिक स्पेस में आंशिक अधिकार की सुखानुभूति भी देता  है.

भक्ति मार्ग से अध्यात्म और धर्म की इस डगर पर स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर निकलती हैं, जिसका एक बड़ा उदहारण छठ व्रत में उनका बड़े पैमाने पर नदियों के घाटों पर सार्वजनिक रूप से उमडना है. यह एक ऐसा धार्मिक उत्सव है , जिसमें स्त्रियों का इसके सम्पूर्ण प्रक्रिया पर सर्वाधिक नियंत्रण होता है. इस व्रत के स्वरुप को देखते हुए लगता है कि यह जब भी शुरू हुआ होगा, समाज में व्याप्त पुरोहितवाद और उसके संकीर्ण कर्मकांडों के बरक्स हुआ होगा. इस पूजा में बिना किसी मन्त्र या विशिष्ट धार्मिक कर्मकांड के सीधे तौर पर प्रकट प्रकृति देव सूर्य की आराधना की जाती है, नदियों के घाटों पर बिना अपनी  जातीय पहचान के लोग पानी का अर्घ्य देकर अपनी भक्ति निवेदित करते हैं. पूजा का यह फॉर्म स्त्रियों सहित उन सभी जातियों के लिए आसान हो जाता है, जिन्हें शिक्षा के “सष्टांग” से वंचित किया गया था या फिर धार्मिक कर्मकांडों से सायास दूर किया गया था.

हिंदू धर्म में कर्म आधारित पारलौकिक सुख सुविधा एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके सहारे जीवन के अधिकारों से वंचित जाति समूह , स्त्रियों सहित, अपने सांसारिक दुखों का निदान ढूंढते हैं. ईश्वर के साथ लगाव दरअसल जनता के लिए मार्क्सवादी व्याख्या में इन्हीं सन्दर्भों में अफीम की तरह काम करता है. धार्मिक कर्मकांडों से मनोवैज्ञानिक लाभ पाती स्त्रियों के लिए यही कर्मकांड नकारात्मक भूमिका अख्त्यार कर लेते हैं, जब वे उन्हें पुरुषों के वर्चस्व के प्रति अनुकूलित करने लगते हैं और पितृसत्तात्मक वर्चस्व उन्हें स्वाभाविक लगने लगता है. ईश्वर जो अधिकांश मामलों में पुरुष है, स्त्रियों के लिए परलोक में भी पितृसत्तात्मक अनुकूलन का वतावरण बनाता है और व्यावहारिक रूप में स्त्रियाँ अपने सांसारिक पति, पिता और पुत्र के प्रति समर्पित होती जाती हैं.

छठ व्रत नदियों के घाटों  पर अंतिम अर्घ्य के पूर्व लगभग चार दिनों का कर्मकांड है. घर के  धार्मिक वातावरण पर स्त्रियों का नियंत्रण होता है, व्रत करती स्त्रियाँ पूजा की, श्रधा की और पवित्रता की प्रतीक हो जाती हैं. पूजा की सामग्रियां यद्यपि जाति दायरो से मुक्त होकर शूद्र , दलित जातियों के परिवारों से भी लाई जाती हैं, मसलन अर्घ्य का सूप दलित जाति के परिवार ही बनाते हैं, परन्तु व्रत के घर में आकर कठोर शुद्धता से नियंत्रित हो जाती हैं. शुद्धता का यह आग्रह आम तौर पर भी स्त्रियों के अस्तित्व को ही प्रश्नाकिंत करता है. मसलन रजस्वला स्त्री अशुद्ध मानी जाती है और छठ सहित किसी भी धार्मिक कर्मकांड के लिए अयोग्य हो जाती है. पवित्रता और अपवित्रता का सिद्धांत धार्मिक पगडंडियों से होते हुए सामाजिक ताने –बाने  को प्रभावित करते रहे हैं और समाजिक पदानुक्रम में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. यह सिद्धांत स्त्रियों के साथ- साथ एक बड़े जन समूह को दोयम दर्जे की अधिकारहीन जिंदगी जीने के लिए विवश कर देते हैं, वहीं इन वंचित समूहों के भीतर अपनी इस सामाजिक अवस्थिति के प्रति अभ्यस्तता और समर्पण का भाव भी पैदा करते हैं.

छठ व्रत के दौरान गाये जाने वाले गीतों के माध्यम से इस भक्ति मार्ग में पितृसत्तात्मक समाज में अपनी नियत भूमिका के प्रति स्त्रियों की अनुकूलता -निर्मिति को समझा जा सकता है. एक गीत है :
चार पहर रात जल थल सेवली, सेवली चरण तोहार ………
इस गीत में व्रत करती स्त्रियाँ अपने आराध्य देव सूर्य और छठी मैया से अपने ससुराल के लिए अन्न –धन-भण्डार , मांगती हैं, मायके के लिए भाई भतीजा, अपने लिए अखंड सौभाग्य यानि पति की आयु मांगती हैं ,अर्थात अपने लिए उनकी कोई स्वतंत्र कामना नहीं है. इसी गीत में समाज में लड़की –लड़के के भेद को स्वाभाविक सिद्ध करती पंक्तियाँ हैं :“रुनकी झुनकी बेटी मांगील , पोथिया पढन के दामाद’ ( खेलती –कूदती बेटी और पढ़ने वाले दामाद की कामना ). आगे इसी गीत में सेवा समर्पण भाव को स्त्रियों को स्वाभाविक वृत्ति बताने वाली और पीढ़ी दर पीढ़ी इस भाव को अनुकूलित करने वाली अभ्यस्तता भी है ,जब व्रत करती स्त्री अपने लिए अपने बेटे के बहु में सेवा भाव का वरदान मांगती है.
इसका दूसरा पहलू भी है. छठ व्रत चुकी पौरिहित्य से मुक्त है, ईश्वर और उपासक के बीच सीधा सम्बन्ध स्थापित करता है, इसलिए व्रत करती स्त्रियाँ इसके वातावरण  को अपने स्वभाव के अनुकूल साख्य और साहचर्य का वातावरण बना देती हैं. प्रकृति से सहज लगाव के अभियक्ति का अवसर होता है यह समय. उनके गीतों में भी इसकी झलक मिलती है. “ केलवा जे फरलई घउद से ता पर सुग्गा मंडराए,’ मरवाऊ रे सुगवा धनुष से सुग्गा गिरे मुरछाये. सुग्गे से मैत्री और विरोध का यह गीत प्रकृति से स्त्रियों के संबंधों का रूपक है. पुरुष सुग्गे के मौत के बाद जब स्त्री सुग्गा रोती है तो फिर से गीत गाती स्त्री द्रवित हो जाती है- सुगी जे रोव हे विछोह से सुरुज देवा होव न सहाय .
सूरज बाबा मुरली बजावथ कदम तर , सखी सब का बटोरथी  हे, कदम तर 
जैसन फूलवा म्ल्होरिया घर सुन्दर हे ,कि ओइसही ,
 कि सुरुज बाबा मोरो दिनवा सुन्नर हे कि ओइसही ( सूरज मुरली बजा रहे हैं और सखियाँ कदम्ब के पेड़ के नीचे जमा हो कर कुछ चुन रही हैं. वे सुख के दिन के फुल चुन रही हैं, जैसे माली के घर में फुल की शोभा होती है वैसे ही व्रत करने वाली स्त्रियों के दिन की शोभा है ). सुख के इस कामना में सूरज का मानवीकरण और उनसे कृष्ण के रूप में स्नेह की पंक्तियाँ हैं ये. कदम्ब, मुरली और सखियों का कदम्ब के पेड़ के नीचे जमा होना गोपियों और समान्यतः स्त्रियों की भक्ति के मुख्य अब्लम्ब कृष्ण के प्रति भक्ति के प्रतीक हैं. प्रकृति से सम्बन्ध के साथ- साथ कृष्ण भक्ति में खुद के समर्पण और उससे मिलने वाले भक्ति फल के मनोविज्ञान से गाई जाने वाली पंक्ति हैं ये. साथ ही माली, तम्बोली आदि  जातियों के घरों के प्रति स्त्रियों के स्नेह को भी व्यक्त करती हैं पंक्तियाँ.

स्त्रीवादी इतिहासकारों ने बंगला पुनर्जागरण के सन्दर्भ में लिखा है कि कैसे “भद्र” घरों की स्त्रियाँ मालिन, तम्बोलिन आदि स्त्रियों, जिनका  उनके घरों में सहज आना जाना था, के साथ सखी भाव में होती थीं, उनके साथ गाती –नाचती थीं. पुनर्जागरण का सबसे बड़ा कुठारघात इसी सम्बन्ध पर हुआ जब “भद्र पुरुषों” ने अग्रेजों के अनुकरण में इस साहचर्य को “भदेस” और असभ्य करार दिया. छठ के गीतों में वे सम्बन्ध यथावत सुरक्षित हैं. इन पंक्तियों में तो अपेक्षाकृत कम आर्थिक हैसियत वाले उन घरों से महिलाएं अनुराग रखती  और स्पर्धा करती दिख रही हैं. छठ व्रत इस सम्बन्ध को जीवित रहने का उपक्रम सिद्ध हो सकता है. नदियाँ पारिस्थितिकी के अन्य अवयवों सहित सभ्यता के विकास का दंश झेल रही हैं. ऐसे में सूर्य, पेड़ –पौधों सहित पक्षियों तक से नाता जोड़ती स्त्रियों का नदियों के प्रति लगाव प्रकृति के प्रति मानव मन के अनुराग को आश्वस्त करती हैं. लोक व्यवहार के ऐसे पर्व, जो पंडों, पुरोहितों के कर्मकांड से दूर हैं, लोक संस्कृति के संरक्षक होते हैं. बनारस के घाट हों, कुम्भ के दौरान के इलाहाबाद या हरिद्वार के घाट हों या गया के फल्गु के घाट, जहाँ पंडों, पुरोहितों के द्वारा आयोजित शुष्क कर्मकांड चलते रहते हैं, की तुलना में छठ व्रत के दौरान नदियों के घाटों के माहौल ज्यादा सरस ज्यादा मनोरम और ज्यादा समतापूर्ण होते हैं, इसके बावजूद कि सालों से संपन्न होते इस व्रत के भीतर भी शुद्धतावादी कर्मकांडों ने डेरा जमा लिया है.

एक दूसरा पहलू, जो इन दिनों छठ व्रत के आयोजनों का हिस्सा है, वह है मीडिया के बूम के बाद इस पर्व का व्यसायिक दोहन. साथ ही व्रत के दौरान नदियों पर आस्था के उत्सव में शरीक जन समूह के राजनीतिकरण के प्रयास .इस प्रक्रिया में यह पर्व जाने- अनजाने बिहारी अस्मिता का प्रतीक भी बन गया है. मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से लेकर पूर्वांचल के इलाकों तक में सांस्कृतिक  एक सूत्रता का वाहक हो गया है यह पर्व. तो इसी क्रम में इन महानगरों में जो स्त्रियाँ अपने परिवारों के साथ या स्वयं अपने करिअर के प्रक्रम में रह रही हैं, शिक्षा के प्रभाव में आधुनिक हो रही हैं, उन्हें भी अन्य व्रतों की तरह यह व्रत भी परिवार के भीतर पितृसत्तात्मक वर्चस्व में पुनरुत्पादित कर देता है, बल्कि इसकी व्यापकता के कारण इसका कुछ ज्यादा ही असर उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है.

असहिष्णुता/ क्रूरता के खिलाफ एक आयोजन

पुष्पा विवेक 


दलित लेखक संघ के तत्वाधान में  एक  विचार गोष्ठी का आयोजन 15 नवम्बर 2015 एफ- 19 कनॉट पैलेस दिल्ली में सम्पन्न हुआ . वक्ताओं ने ‘ आरक्षण:  दलित- पिछड़ों की भागीदारी’ और ‘बढ़ती असहिष्णुता का ज़िम्मेदार कौन’ , दो  अलग -अलग विषयों पर अपने विचार रखे .  मुख्य अतिथि के तौर पर अशोक वाजपेयी ने कहा कि ‘हम अभी तक साम्प्रदायिकता को बहुत सीमित करके आंक रहे थे। इसमें उपेक्षितों की बात भी शामिल होनी बहुत ज़रूरी है। तभी सामाजिक विषमताएं ख़त्म की जा सकती हैं।’ उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता को धर्म से आगे जाति तक के विस्तार में देखा जाना चाहिए.  मुख्य अतिथि एवम  दलित और स्त्रीवादी चिंतक विमल थोरात ने अपने वकतव्य  में कहा कि ‘  दलितों के प्रति समाज में जो रवैया है, उसे असहिष्णुता की  बजाय क्रूरता कहा जाना चाहिए।’आरक्षण का मुद्दा हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है क्योंकि इसपर छेड -छाड के खतरे बने हुए हैं.’ सञ्चालन के दौरान हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि ‘ हम लेखकों को अपनी-अपनी विचारधाराओं में रह कर इस बढ़ती हुए असहिष्णुता पर मिलकर चोट करनी होगी। क्योंकि आखिरकार हमारा ध्येय  तो मानवता का हित ही है।’ कार्यक्रम के अध्यक्ष रहे कर्मशील भारती ने अपने अध्यक्षीय वक्त्व में कहा कि ‘ यह समय जागने का है और परिवर्तन के अनुकूल भी है। क्योंकि अनेक लेखक संगठन एक साथ हुए हैं। इस ऊर्जा को सहेजकर आगे बढ़ना चाहिए।’

विशिष्ठ अतिथि के तौर पर के. पी. चौधरी ने कहा, ‘  हम व्यक्तिगत तौर पर संवेदनहीन हो गए हैं यदि सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाना है तो हमें अपने निजी लालचों को दरकिनार करना होगा। वरिष्ठ आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘ यह सही है कि दलित उत्पीड़न, हत्याएं आम बात होती जा रही हैं तथा आरोप- प्रत्यारोप के ज़रिये भी शोषण बढ़ा है।. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षण लागू कराये जाने की कठिनाइयों का इतिहास भी सामने रखा.

अन्य वक्ताओं में डॉ.सुधीर सागर ने कहा, ‘ यदि आरक्षण होने के बावजूद भी दलितों की हत्याएं हो रही है तो आरक्षण और भी लाज़मी हो जाता है।’  डॉ. रतनलाल ने अनेक क्षेत्रों का हवाला देते हुए कहा कि ‘ अभी कई क्षेत्रों में आरक्षण लागू ही नहीं है और जब तक सामाजिक विषमताएं बनी रहेंगी तब तक आरक्षण की प्रसांगिगता बनी रहेगी।’ संजीव कुमार ने कहा ‘ हमें अपनी सामूहिक शक्तियों को पहचानकर अमानवीय ताकतों को सबक सीखना होगा। क्योंकि धार्मिक परिवेश में पाप की परिभाषाएं बदल जाती हैं।’ संजीव चन्दन ने आरक्षण के कारण  ओ बी सी और दलितों के बीच बने मध्यम वर्ग और उसकी सकारात्मक भूमिका को चिह्नित किया. और क्रीमी लेयर की बात को बकवास बताया, तब तक जब तक भागीदारी का अनुपात पूरा न हो .  अनीता भारती ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘ दलित उत्पीड़न भारतीय व्यवस्था की नियति बनती जा रही है जिसे हम सबको मिलकर रोकना है।’  उमराव सिंह जाटव ने कहा कि ‘ दलितों को अपने में गुणनातमक बदलाव लाने होंगे।’  मामचंद रिवाड़िया, सूरजपाल चौहान आदि ने भी अपने – अपने विचार प्रकट किये। अरविन्द शेष, बलविन्द्र बलि, बजरंग बिहारी तिवारी,राम सिंह दिनकर, कामता प्रसाद मोर्य, कुलीना कुमारी व चन्द्रकान्ता सिवाल सहित अनेक लेखक , शोधार्थी  और अन्य लोग  भी मौजूद थे। मंच सञ्चालन हीरालाल राजस्थानी ने किया व धन्यवाद ज्ञापन पुष्पा विवेक ने किया।

मासिक धर्म : आखिर चुप्पी कब तक ?

सुनीता धारीवाल


सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की मोडरेटर.

सभी जीवो की मादाएं अपनी  प्रजनन क्षमता के कारण अपने अपने समाज में  उच्च स्थान पाती हैं . कुछ बहुलिंगी प्रजतियों  को छोड़ कर सभी मादाएं अपने अपने निश्चित गर्भ धारण  काल में गर्भ धारण करती हैं. प्रजनन प्रक्रिया सदैव कोतुहल व जिज्ञासा  का विषय रही है,  जिसे अलग -अलग समाजो ने अपने -अपने ढंग से छुपाया व परिभाषित किया है –अधिकतर समाजों ने  इस विषय पर चुप्पी के ही नियम अपनाये हैं . हर किशोरवय मादा में प्रजनन क्षमता का विकास होने लगता है तथा इस दौरान तेजी से  शारीरिक और  मानसिक बदलाव व विकास होने लगता है . मानव मस्तिष्क के एक ओर स्थित एक मटर के दाने के आकार की पिटयुटरी ग्रंथि विभिन्न हार्मोन का स्त्राव करती है,  जो किशोर से वयस्क बनने के लिए उत्तरदायी  होते हैं . स्त्रियों  में जब प्रजनन क्षमता  विकसित होती है तो योनी मार्ग से प्रति माह रक्त का  स्त्राव होने लगता है,  जिसे मासिक धर्म कहा जाता है ,ज्ञात रहे इस धरती की सभी मादाएं मासिक धर्म की इस प्रक्रिया से गुजरती हैं  हमारे समप्रजातीय बन्दर, औरन्ग्युटैन,चिम्पांजी मादाओं में  भी स्त्रियों की तरह प्रति माह  योनी से  रक्त विसर्जित होता है,  जबकि अन्य मादाओं में यह  रक्त किसी भी मार्ग से बाहर नहीं आता और उनका शरीर इस रक्त को भीतर ही समाहित कर लेता है .

वास्तव में प्रकृतिवश संभावित शिशु को सुरक्षा देने के लिए गर्भाशय में रक्त कणों व –कोशिका की एक चाहरदीवारी बनने लगती है प्रतिदिन इस में रक्त की एक परत बनती जाती है,  यदि इस दौरान महिला के अंडे से  शुक्राणु का मिलन हो जाये तो गर्भ धारण हो जाता है और यह रक्त  परत प्रति दिन बढती जाती है और भ्रूण के गिर्द सुरक्षा थैली का निर्माण होता रहता है .यह तरल कवच गर्भस्थ शिशु  को हर प्रकार से गर्भ में ही सुरक्षा प्रदान करता है .शिशु जन्म के समय यह रक्त भी बाहर आ जाता है व मादा शरीर फिर से इसी मासिक प्रक्रिया से गुजरने लगता है. और यदि गर्भ धारण न हो तो यह रक्त अपने निश्चित चक्र काल में योनि मार्ग से बाहर निकल जाता है ,उसी प्रकार जैसे हमारा  शरीर हर अनुपयोगी वस्तु को बाहर निकाल देता है इस  अनुपयोगी रक्त को भी शारीर से बाहर कर देता है और नवीन प्रकिया में लग जाता है .

किन्तु इस वैज्ञानिक जैविक जानकारी के आभाव में इस प्रक्रिया  को सदियों से इतना छुपाया गया की इसके प्रति बहुत सी भ्रन्तियों  व  वर्जनाओं का निर्माण हो गया ,जिनका समाज में कड़ाई से पालन होने लगा .
स्त्रियों  ने भी इसे  प्रकृति द्वारा दिया गया अतिरिक्त बोझ ही समझा .इस प्रक्रिया के दौरान स्त्री को गंभीर पेट दर्द व अन्य कई प्रकार के असहज शारीरक  प्रभाव का अनुभव करना पड़ता है .चूँकि यह प्रक्रिया केवल मादाएं ही झेल रही थी और पुरुष नहीं तो इसे प्रकृति द्वारा स्त्रियों  को दिया जाने वाला दण्ड समझा गया .और यह प्रक्रिया महिला लिंग को हीन समझने व हीन घोषित  करने का आधार भी बना .इस प्रक्रिया ने पाषाण काल में महिलाओं को शिकार करने में बाधा दी , यही प्रकिया व गर्भ धारण की प्रक्रिया स्त्रियों  के भ्रमण में प्राकृतिक बाधा बनी , जिसके कारण उन्हें गुफाओं तक सिमटना पड़ा और असह्य स्त्री को भोजन के लिए भी पुरुष की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी –इन दोनों प्रक्रियाओं ने महिला को लाचार व पुरषों के समकक्ष ताकत में हीन घोषित किया .इसी जैविक अंतर ने लिंग भेद श्रेष्ठ व हीन धारणा को जन्म दिया, जो आज तक स्थापित है – स्त्रियों  का अन्य कई प्रकार से सक्षम होना भी उसे लिंग समानता का दर्जा नहीं दिलवा पाया .

भारत की तरह अनेक देशो में आज भी मासिक धर्म प्रक्रिया को गुप्त विषय ही रखा  जाता है इस बारे में बात नहीं की जाती. आज के आधुनिक वैज्ञानिक दौर में भी विश्व भर में स्त्रियाँ खुद भी मासिक धर्म के बारे में नहीं बताती,  बल्कि ऐसा बताने के लिए सांकेतिक शब्दावली को ही उपयोग में लाया जाता है . उतर भारत में पीरियड्स आना ,कपडे आना ,महीना आना ,सिग्नल डाउन ,रेड सिग्नल , नेचर पनिशमेंट,और आजकल की छोटी बच्चियों में केक कट गया जैसी शब्दावली उपयोग में लाई जा रही है –हर भारतीय भाषा व बोलियों में इसके वैकल्पिक  नाम उपलब्ध हैं,  जो प्रयोग में लाये जाते है . विकसित देशो की महिलाएं  भी मासिक धर्म को  वैकल्पिक नाम से बताती हैं .  चीन में- मेरी  छोटी बहिन आई हुई है , दक्षिण अफ्रीका में –मेरी नानी  ट्रैफिक में फंस गई है  ,लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में –जेनी हेस अ रेड ड्रेस ऑन,ऑस्ट्रेलिया में –आई हैव गोट द फ्लैग्स आउट ,डेनमार्क में –देयर आर कोम्मुनिट्स इन द फन हाउस –ब्रिटेन में- आई ऍम फ्लाइंग द जैपनीस फ्लैग ,फ्रांस में – मेरे अंग्रेज आ गए हैं और जापान में-मेरी  लिटल मिस स्ट्राबेरी आई है जैसे भाव वाक्य बोले जाते है.यहाँ तक कि महिला योनि के भी विश्व भर में अनेक वैकल्पिक नाम बोलचाल में व्यवहार में लाये जाते हैं , जितने भी नाम विश्व में प्रयोग में लाये जाते है वे सब महिला लिंग हीनता को स्थापित करते और पुरुष आमोद को अभिव्यक्त करते ही  सुनाई देते हैं.

भारत में आज भी महिलाएं मासिक धर्म को लेकर अनेक भ्रान्तियो का शिकार है बहुत सी वर्जनायें निभा रही हैं , जिनका आज के युग में कोई औचित्य नहीं रह गया है –आधुनिक शहरो की महिलाये भी घरो में आचार को या अन्य खाद्य पदर्थो को हाथ नहीं लगाती हैं  ,पुरुष की थाली को हाथ नहीं लगाती हैं  ,खाना नहीं बनाती हैं ,जल स्त्रोतों को ,जल भंडारण को हाथ नहीं लगाती हैं ,पौधों, पत्तों  ,नवजात शिशुओं को हाथ नहीं लगाती हैं. इस दौरान इन नियमों का पालन भी होता है –  न नहाना और न सर धोना  व अलग बिस्तर का इस्तेमाल करना ,धरती पर सोना इत्यादि साथ ही इन दिनों में किसी पूजा स्थल पर नहीं जाना ,जलाशयों की ओर नहीं जाना जैसे नियमो का पालन –तर्क ये है की रजस्वला महिला के संपर्क में  आने से यह सब  दूषित हो जायेंगे .
पुरातन समाज में जब स्त्रियों के पास  मासिक धर्म के प्रबंध के लिए आज जैसे अंतः वस्त्रो व सुविधजनक पैड की सुविधा नहीं थी, न ज्ञान था  तब वे यूँ ही पत्ते ,मिटटी राख घास फूंस से अपने रक्त स्त्राव का प्रबंध करती होंगी , जो बहुत ही अस्वच्छ तरीका होगा .

अधिकतर महिलाएं रक्तस्राव के दिनों में नियमों के न पालन करने को मानती हैं  कि ऐसा करने से बाँझपन का श्राप लगता है,  जिसका कोई प्रमाण नहीं .हालाँकि  पिछले दिनों सोशल मीडिया में यह बात बहुत प्रचारित हुई कि किसी खोजी अधययन  ने घोषणा की है मासिक धर्म के दूसरे दिन सर धोने से बाँझ होने का खतरा है ,ऐसी किसी खोज की चिकित्सा  संगठनों ने न कोई पुष्टि की है,  न ही कोई निर्देश आये है ,संभवतः  यह नया क्षेत्र है,  जिस के हर व्यवहार पर  सघन खोज नहीं की गई है .तमाम देशो में अलग अलग प्रकार की गैर व्यावहारिक वर्जनाये हैं.  केन्या में  रजस्वला स्त्री को दुधारू गाय के पास जाने की मनाही है और स्त्रियाँ मानती रही  है उनके  गाय के पास जाने से गाय की मौत हो जाएगी . इस आवश्यक व अपरिहार्य  प्राकृतिक प्रक्रिया को इतना हीन माना जाने लगा कि रजस्वला स्त्री को अछूत की तरह रखा जाने लगा .नेपाल में मासिक धर्म के  दिनों में स्त्री को घर से बाहर एक झोपडी में रखा जाता है जहाँ उसे इन पांच दिनों में अछूत की तरह रखा जाता है –उसे खाना भी वहीँ पहुंचाया जाता है ,

चलिए इस विषय की पृष्ठ भूमि से अलग आज की बात करते हैं , वर्तमान में एक लड़की की मासिक धर्म प्रारंभ होने की औसत  आयु 12 वर्ष से  घट कर 9 वर्ष हो गई है –इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 70 %लड़कियों को प्रथम रज: दर्शन से पहले पता नहीं होता कि यह क्या प्रक्रिया है और सभी ने इसे गन्दा,और प्रदूषित बताया और इसे शर्म का विषय व छिपाने को उचित ठहराया . देश में 88% लडकिया आज भी गंदे व पुराने कपड़ो व राख का उपयोग उपयोग करती हैं –आधुनिक महंगे नैपकिन्स बाकी महिलाओं की पहुँच से आज भी बाहर है .गंदे पुराने वस्त्रों से मासिक धर्म का प्रबंध करने के कारण भारत की 70% महिलाये प्रजनन  प्रणाली संक्रमण  से पीड़ित हैं .13 करोड़ घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं,  जहाँ महिलाएं अकेले में अपना प्रबध कर सकें . 53% सरकारी विद्यालयों में शौचालय नहीं है, जहाँ लडकिया स्कूल में भी अपना प्रबंध कर सकें –ऐसे में लडकियां अधिकतर या तो स्कूल ही नहीं आती या फिर घर चली जाती है –लड़कियों की हाजिरी कम हो जाती है , वे  पढाई में भी पिछड़ने लगती हैं  –अंतत पढाई छूट जाती है
हमने  चंडीगढ़ क्षेत्र में अपने स्तर पर की गई जांच में पाया  कि स्कूलों में मासिक धर्म प्रबंध हेतु कोई व्यवस्था आवश्यक नहीं बनाई गई है.  ऐसा प्रिंसिपल के विवेक पर निर्भर करता है कि वह क्या व्यवस्था अपनाता है. ,लडकियां आपात में  स्कूल का डस्टर इस्तेमाल कर रही है और यहाँ तक की दूसरी लड़की का इस्तेमाल किया हुआ कपडा भी बाँट लेती है ,बच्चियों को पता नहीं वे अपनी सेहत के साथ कितना खिलवाड़ कर रही है –अधिकतर बच्चियां स्कूल से घर चली जाती है .कुछ संस्थाएं स्कूलों में अपने स्तर पर कार्यक्रम चलाती है व स्कूल में सेनेटरी पैड्स इतियादि भी दे कर आती हैं –नाम न छापने की शर्त पर बच्चों  ने बताया की कुछ अध्यापिकाएं खुद ही वह पैड्स ले जाती है,  स्वयं के इस्तेमाल के लिए . स्कूल की अध्यापिकाओं  का कहना कि अकेले पैड्स उपलब्ध करवाने से बात नहीं बन रही –यहाँ सरकारी स्कूलों में पढने वाली बच्चियों को अंत: वस्त्र पहनने का अभ्यास नहीं है . अंत:वस्त्र की अनुपलब्धता के चलते सेनेटरी पैड भी उपयोग में नहीं आ सकते व लडकियां घर जाने की जिद करती हैं , जिसे उन्हें मानना पड़ता है .

आज इस विषय पर विश्व व्यापी चर्चा चल रही है और स्थिति सुधरने के प्रयास हो रहे है -संयुक्त राष्ट्र वीमेन –वर्ल्ड बैंक जैसी अनेक अंतरराष्ट्रीय  प्रभाव पैदा करने वाले संगठनों ने इस विषय को मुख्यधारा के कार्यक्रमों में शामिल कर लिया है व वैश्विक जागरूकता  की रूपरेखा व कार्यक्रम बन गए है –सभी देशो की सरकारों ने अपने किशोर स्वास्थ्य कार्यकमो में मासिक धर्म प्रबंध व स्वच्छता को जोड़ दिया है .भारत सरकार के राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम में इसे शामिल किया गया है व कई प्रदेशों में सफलतापूर्वक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं .आपको सज्ञान होगा कि जम्मू कश्मीर में बाढ़ में फंसी महिलाओं को केरल की  कुटूम्बश्री संस्था ने  दस हजार सेनेटरी नैपकिन बांटे उसकी विश्व भर में प्रशंसा  हुई और आपदा राहत कार्यक्रमों में महिलाओ के पैड्स की राहत देना सदा के लिए जुड़ गया ,दरअसल महिलाओं की इस ज़रूरत पर किसी का ध्यान नहीं गया था और इस ज़रूरत की गंभीरता को कभी किसी ने नहीं समझा परन्तु आज वैश्विक पटल पर अब यह ज़रूरत हाशिये पर नहीं है. जर्मनी स्थित वाश यूनाइटेड  संगठन के सतत  प्रयासों से विश्व भर में मुहीम चलायी जा रही है,  जिसमें  चुप्पी तोड़ने व युवतीयों के  जनन स्वास्थ्य को  सरंक्षण देने का आह्वान विश्व भर में किया जा रहा है .प्रतिवर्ष 28 मई को अन्तरराष्ट्रीय मासिक धर्म दिवस मनाने की पहल की गई जिसमे 140 देशों में कार्यक्रम आयोजित किये गए .

जिस विषय पर सदियों चुप्पी साधी गई हो , उस पर खुल कर चर्चा करना एक चुनौती है चंडीगढ़ क्षेत्र में ‘रेड ब्लिस इंडिया’ नामक  मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम का संचालन कर रही अधिवक्ता विभाति पढिय़ारी का मानना है,  जबकि यह विषय हमारे देश की भावी माताओं से जुडा है और हमारी बच्चियों के स्वास्थ्य से जुड़ा है हमे इसकी गंभीरता को समझना चाहिए .शहर के लोग भी इसे संवेदनशीलता से नहीं लेते और  कसबे और गावं में बात करना और भी कठिन है .जब हम स्कूल में जाते हैं  तो कुछ प्रिंसिपल तो बहुत समझदारी से इसकी  गंभीरता समझते हैं तो कुछ  के लिए यह समय की बर्बादी है .ज्यादतर पुरुषों की प्रथम प्रक्रिया यही होती है , ‘ क्यूँ ढका उधाड़ रहे हो –औरतों की बात औरतों तक रहने दो. क्यूँ महिलाएं यह व्यक्तिगत  विषय शुरू कर अपना सरे आम मजाक बनाना चाहती हैं’  पर धीरे धीरे जब वे इस विषय को अपनी माँ बहिन या बेटी के सन्दर्भ में देखना सुनना शुरू करते हैं तो वह इस विषय को बड़े स्तर पर उठाने की वकालत करने लगते है .अभी शुरुआत है समय लगेगा की चुप्पी सच में टूटे और मासिक धर्म के बारे में शर्मिंदगी के भाव फक्र में बदल जाये .हम सब प्रकृति की इस व्यवस्था की  सरे आम प्रसंशा कर पायें  .

गाँव में भी हम काम कर रहें है वहां पर भी किसी पुरुष कार्यकर्ता का हमरे दल में स्वीकर्य नहीं होता हम लड़कियों  से अलग से बात करते हैं .गाँव कस्बो के अग्रणी पुरुष  हमें देख रहें है व् हमारे  उद्देश्य का निरीक्षण कर रहें है पर खुल कर कुछ नहीं कह रहें हैं.  बात करने की कोशिश भी करो तो बात बदल देते हैं या किनारा कर लेते हैं ,पुरुषों  के लिए भी यह नया अनुभव हो रहा है कि कोई बात कर रहा है वर्ना आज तक पुरषों ने तो मासिक धर्म को लेकर लड़कियों  का  या तो उपहास किया है या लड़कियों का सरे आम मजाक उड़ाया है और अब उन्हें  इसे गंभीर विषय मानने में हिचकिचाहट हो रही है .

लड़कियों  व उनकी माताओं को जागरूक  करना उन्हें उचित प्रबंधन का ज्ञान देने के साथ ही पुरुष वर्ग में इस विषय को ले जाना भी हमारे कार्यकर्म का हिस्सा है –क्यूंकि उतर भारत में पुरुष ही मुख्यतः घर का मुखिया है व पोषक है –अगर उसे इस विषय की गंभीरता का ज्ञान नहीं होगा तब तक वह महिलाओं व बेटियों को स्वच्छ प्रबंधन के लिए सेनेटरी पैड या दवाई का पैसा नहीं देगा .और न ही बेटियां संकोचवश मांग पाएंगी .पुरुष का प्रभाव घरो के फैसले में आज भी अधिकतर सर्वोपरि ही है,  इसलिए उसका जागरूक होना भी जरुरी है –चुप्पी और संकोच टूटेगा तभी कुछ बात बढ़ेगी .विभाति का कहना है की पुरुष चाहे कोई अधिकारी हो चाहे पत्रकार या चाहे कोई और विषय को सुनते ही कन्नी काटने लगता है,  जैसे वह सुन कर कोई अपराध कर रहा हो ,शुरू शुरू में हम कभी प्रेस नोट भी ले जाते तो कुछ पत्रकार महोदय पढ़ कर कहते,  इसका क्या करें हम इस में छापने जैसा क्या है –कोई नहीं छापेगा क्यूंकि संपादक भी पुरुष बैठा है वो मेरा मजाक उडाएगा. ये भी कोई खबर बनती है .पर धीरे धीरे मीडिया और  प्रसाशन को भी हमारी बात समझ आने लगी और हमे सहयोग मिलने लगा अब तक हम पांच हजार लड़कियों तक पहुँच गए है जिन्हें हम ज्ञान दे रहें है ताकि वे स्वस्थ युवती और   भविष्य में स्वस्थ माँ बन सकें .

विभाति के साथ उनके दल में पर्यावरणविद अमनप्रीत ने बताया कि हर मादा हर महीने दस से पैंतीस मिली लीटर खून का स्त्राव करती है,  जिसे इसी भूमि पर ही निबटाना होता है –करोडो टन रक्त रंजित कचरा धरती में ही निबटाना होता है ,आज कल के आधुनिक पैड प्लास्टिक जेल्ल से बने हैं ,  जिन्हें धरती में दबाया जाये तो इन्हें नष्ट होने में डेढ़ सौ साल लगेंगे.  भारत की आधी जनसंख्या यदि इस प्रकार का करोड़ो टन अगलनीय कचरा का हर महीने धरती में दफ़न करने लगेगी तो पर्यावरण का क्या होगा,  इसलिए हम पर्यावरण मित्र पैड बनाने के लिए कृत संकल्प हैं और सस्ते दाम में महिलाओं द्वारा ही तैयार करवाने पर काम कर रहें है .

निस्संदेह  बदलाव हो रहा है पंजाब विश्वविद्यालय की अनेक छात्राओं ,गुरलीन ,श्वेता ,अंकिता ,सोनम  ने माना की अब वे अपने पिता से,  भाई से या पुरुष मित्र से सेनेटरी पैड मंगवाने में भी नहीं हिचकती और इस विषय पर बात कर लेती हैं और वे इसे ईश्वर  का वरदान मानती हैं  और वरदान छुपाये नहीं जाते .ऐसा सोच में बदलाव का कारण उनके शहर का खुला व जागरूक वातावरण है,  जहाँ उन्हें स्कूल में ही मासिक धर्म के प्रति वैज्ञानिक सोच मिल गई थी,  जबकि अन्य छात्राएं आज भी आपत्ति करती है कि उनके साथी लड़के सह्पाठी इतना शिक्षित होते हुए भी पीरिड्स का मजाक बनाते रहते हैं

संतोषजनक व् उत्साहित करने की बात यह है कि चारों ओर  प्रयास शुरू हो गए हैं नेपाल की  सर्वोच्च अदालत ने इस व्यवस्था में दखल दे कर स्त्रियों  को  महीने के दिनों अलग झोपड़ीनुमा घरों में बंद रखने की  प्रथा से मुक्त करने के आदेश दिए हैं,  यह किसी भी सरकार का पहला दखल है,  जो शुभ संकेत है कि महिलाओं की बात महिलाओं तक कह कर इस विषय को और दबाया जाना  अब  निकट समय में ही अतीत की बाते हो जाएँगी

कानाबाती से साभार