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यौन हिंसा पर चुप्‍पी तोड़ो ! ऐपवा का जेंडर संवेदी अभियान

दोस्‍तो,
2012 में दिल्‍ली में सामूहिक बलात्‍कार की एक बर्बर घटना ने यौन हिंसा के खिलाफ हम सभी को सड़कों पर उतार दिया था. तब हमारे आन्‍दोलन ने इस बात को जोर के साथ चिन्हित किया था कि हमारे समाज के पितृसत्‍तात्‍मक पूर्वाग्रह और शक्ति संरचना ही ऐसी है जिसमें बलात्‍कार जैसे अपराध पनपते हैं, और इन प्रवृत्तियों को बदलना जरूरी है. नेता और पुलिस ही नहीं और भी कई ऐसे लोग हैं जो बलात्‍कार होने पर महिला के कपड़ों और चरित्र पर सवाल उठाते हैं और बलात्‍कारी का बचाव करते हैं. इतना ही नहीं, बलात्‍कार महिलाओं के प्रति हिंसा और भेदभाव के मौजूदा ताने-बाने का अभिन्‍न अंग है. दिसम्‍बर 2012 के आन्‍दोलन में महिलाओं ने ‘बेखौफ आजादी’ की मांग उठाई – लेकिन फिर भी आये दिन ‘सुरक्षा’, ‘संस्‍कृति’ आदि के नाम पर महिलाओं से ही उनकी आजादी पर अंकुश लगाने के लिए कहा जा रहा है. महिलाओं के प्रति रोजमर्रा की हिंसा और भेदभाव इतनी ‘आम बात’ बन गई है कि प्राय: ही हम उसे पहचान भी नहीं पाते हैं.

महिलाओं और बच्‍चों के प्रति अपराध की घटनायें सामने आने पर विरोध प्रदर्शन और सजा की मांग करना ही हमारे लिए काफी नहीं है. यह भी बहुत जरूरी है कि हम महिलाओं के प्रति और जेण्‍डर के प्रति खुद अपने नजरिए और अपने विचारों को भी परखें और जांचें. हम अपनी बेटियों और बेटों की पर‍वरिश कैसे करते हैं, महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के बारे में हम क्‍या सोचते हैं, या कि हम महिलाओं और लड़कियों के लिए अपनी दुनिया को ज्‍यादा सुरक्षित और पूरी आजादी के साथ जीने लायक कैसे बना सकते हैं – आदि सवालों पर भी जरूर खुले मन से बातचीत करनी चाहिए.

जेण्‍डर के सवाल पर होने वाले सरकारी प्रचार और विज्ञापनों में गहरी जड़ें जमाये पितृसत्‍तात्‍मक पूर्वाग्रहों पर बिल्‍कुल भी चोट नहीं की जाती है. हमारे समाज में महिलाओं को जंजीरों और बंधनों में जकड़ने वाले असली मुद्दों के प्रति चुप्‍पी बनाये रखने वाली साजिश में ऐसा प्रचार अपना योगदान करता है. समस्‍या की जड़ तक पहुंचने में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं है. इन मुद्दों को हल करने की दिशा में एक व्‍यापक अभियान की जरूरत है जो ‘दूसरों’ में ही नहीं वरन् अपने अंदर भी पितृसत्‍तात्‍मक नजरिए और पूर्वाग्रहों से संघर्ष करे.

इसी उद्देश्‍य से ऐपवा दिल्‍ली में एक गहन जैण्‍डर सेन्सिटाजेशन (जागरूकता) अभियान की शुरूआत कर रही है. हम चाहते हैं कि इन सवालों पर बहसें चलाई जायें और जागरूकता बढ़ाने के लिए आसान हिन्‍दी में सामग्री तैयार की जाय. हम इस हेतु वालंटियर बनने के लिए सभी इच्‍छुक मित्रों को आमंत्रित कर रहे हैं, आप genderjustice.aipwa@gmail.com पर ईमेल भेज कर इस अभियान में जरूर शामिल हों. इस अभियान के लिए पहली कार्यशाला 9 जनवरी 2016 को आयोजित की जायेगी. समय और स्‍थान की सूचना जल्‍द ही आपको दे दी जायेगी. साथ ही, इस अभियान के लिए अपने विचारों और सुझावों से भी हमें जरूर अवगत करायें, हमें पूरी उम्‍मीद है कि आप अपने नाम और फोन नम्‍बर जल्‍द ही भेज देंगे.

आइये ‘यौन हिंसा पर चुप्‍पी तोड़ो !’ अभियान से नये साल की शुरूआत करें
genderjustice.aipwa@gmail.com पर संपर्क कर इस अभियान के वालंटियर बनें.

Break the Silence on Gender Violence!
A Gender Sensitization Campaign in Delhi

Friends,
In 2012, a horrific gang-rape in Delhi woke up thousands of us to come out on the streets against sexual violence. Our movement then pointed out that it is society’s own patriarchal prejudices and power structures that breed rape. Politicians, policemen, and many others blame women’s clothes or conduct for rape, and defend rapists. Moreover, rape is part and parcel of a larger matrix of violence and discrimination against women. Women in the December 2012 movement demanded ‘Fearless Freedom’ (Bekhauf Azadi’) – but time and again, women are told to sacrifice their freedom in the name of ‘safety’, ‘culture’ and so on. Everyday gender violence and discrimination is so ‘normal’ that very often, we fail even to recognize it.
It is not enough for us to protest and demand punishment when crimes against women and children come to light. It is urgently needed that we question our own attitudes and ideas towards women and towards gender. We need to have conversations about how we bring up our daughters and our sons; about how we think about women’s Constitutional rights; about what our society, our Governments, and we ourselves can do to make our world a safer and freer place for women and girls.
Existing sarkari campaigns on the issue of gender tend to avoid addressing the deepest patriarchal prejudices. They participate in the conspiracy of silence around the real issues that shackle and restrict women in our society. They are reluctant to rock the boat. We need a citizens’ campaign to address these issues and to fight the patriarchal attitudes and prejudices – not only in ‘others’ but in ourselves.
That’s why AIPWA is committed to launching a sustained gender-sensitization campaign in Delhi. We aim to conduct discussions and create sensitization material in everyday spoken Hindi. We call for volunteers to mail us at genderjustice.aipwa@gmail.com. The first workshop towards this campaign will be held on 9 January 2016 – we will inform you of the time and place soon. Meanwhile, we welcome your ideas and suggestions, and hope you’ll send us your names and contact numbers soon.

In the coming New Year – join the campaign to ‘Break the Silence on Gender Violence’!
Volunteer at: genderjustice.aipwa@gmail.com

जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

जितेन्द्र श्रीवास्तव 

चर्चित कवि, संपादक: उम्मीद, कविता और आलोचना की कई किताबें प्रकाशित, इग्नू के  हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर . संपर्क :09818913798

नमक हराम

आँखों के जल में होता है नमक
पर कितना
किससे पूछा जाए!

क्या वह स्त्री ठीक-ठीक बताएगी
आँखों के जल में नमक का अनुपात
जिसकी उम्र का अधिकांश
आँसुओं से भीगे आँचल को सुखाने में बीता है

या बताएगी वह अपराधी घोषित कर दी गई नदी
जिसने समुद्र में अपने विलय से इनकार कर दिया

वैसे पूछा तो उससे भी जा सकता है
जिसकी माँ स्वर्ग सिधार गई उसके जन्म-समय
प्रसव पीड़ा, रूढि़यों और सुविधाओं की कमी से

निश्चय ही उसका कंठ अब भी सूखा होगा
पर वह हुआ निरा पुरुष तो बोलेगा कितना सच!

सदियों से आँखों की गहराई का उपमान रहा है समुद्र
पर शायद ही कभी किसी ने याद किया हो
दोनों को साथ-साथ नमक के लिए
शायद ही कभी किसी ने विचार किया हो
दोनों के खारेपन के अंतर पर

समुद्र चाहे जितना हो अगम
छिपा नहीं पाता अपना खारापन
पर स्त्रियाँ अनादि काल से पी रही हैं अपना खारापन
बदल रही हैं
आँखों के नमक को चेहरे के नमक में
और पुरुष चमत्कृत है खुश है
कि यह रूप-लावण्य उसके लिए है

वह खुश होता है जैसे समुद्र पर
वैसे ही स्त्री पर
उसके लिए दोनों महज सौन्दर्य हैं
कभी-कभी क्रोध में
रक्त-मज्जा में समाए स्वभाववश
कहता वह दोनों को अबूझ भी

वैसे पूछिए कभी किसी ऐसे पुरुष से
जिसने प्रेम नहीं किया स्त्री को स्त्री में बदलकर
कि कितना नमक होता है
आँखों से बहती जलधारा में
तो वह नहीं बता पाएगा
संभव ही नहीं बता पाना उसके लिए

यह समुद्र का पानी नहीं
जिससे छान लिया नमक
यह पीडि़त खदबदाती आत्मा का जल है
इसमें चाहे जो हो नमक का अनुपात वह अनमोल है
और मुहावरे में कहें तो इस नमक को
अपना सुख समझता पुरुष पूरा नमक हराम है।

रामदुलारी

रामदुलारी नहीं रहीं
गईं राम के पास
बुझे स्वर में कहा माँ ने

मैं अपलक निहारता रहा माँ को थोड़ी देर
उनका दुःख महसूस कर सकता था मैं

रामदुलारी सहयोगी थीं माँ की
तीस वर्ष से लम्बी अवधि तक
माँ के कई दुःखों की बँटाइदार

माँ के अलावा सब दाई कहते थे रामदुलारी को
काम में नाम डूब गया था उनका
कभी-कभी माँ उनके साहस के किस्से सुनाती थीं

सन दो हजार दस में तिरासी वर्ष की आयु में
दुनिया से विदा हुईं रामदुलारी ने
कोई तिरसठ वर्ष पहले सन् उन्नीस सौ सैंतालिस में
पियक्कड़ पति की पिटाई का प्रतिरोध करते हुए
जमकर धुला था उसे
गाँव भर में दबे स्वर में
लोग कहने लगे थे उन्हें मर्द मारन
पर हिम्मत नहीं थी किसी में सामने मुँह खोलने की

रामदुलारी ने वर्षों पहले
जो पाठ पढ़ाया था अपने पति को
उसका सुख भोग रही हैं
गाँव की नई पीढ़ी की स्त्रियाँ
उनमें गहरी कृतज्ञता है रामदुलारी के लिए
वे उन्हें ‘मर्द मारन’ नहीं
‘योद्धा’ की तरह याद करती हैं

जातियों में सुख तलाशते गाँव में
हमेशा जाति को लांघा था रामदुलारी ने
कोई भेद नहीं था उनमें बड़े-छोटे का
सबके लिए चुल्लू भर पानी था उनके पास

माँ कहती हैं
व्यर्थ की बातें हैं बड़ी जाति अपार धन
रामदुलारी न किसी बड़ी जाति में पैदा हुई थीं
न धन्ना सेठ के घर
पर उनके आचरण ने सिखाया हमेशा
निष्कलुष रहने का सलीका
बाभनों,  कायस्थों, ठाकुरों, बनियों, भूमिहारों में
डींगें चाहे जितनी बड़ी हों अपनी श्रेष्ठता की
पर कोई स्त्री-पुरुष नहीं इनमें
जो  आस-पास भी ठहर सके रामदुलारी के।

रक्त में खुशी 

मैंने पूछा
थोड़े संकोच थोडे़ स्नेह से

‘कैसे हैं पति
हैं तुम्हारे अनुकूल’

उसने कहा
मुदित मन से लजाते हुए

‘जी, बहुत सहयोगी हैं
समझते हैं मेरी सीमा
अपनी भी’

उस दिन मेरा मन बतियाता रहा हवाओं से फूलों से
पूछता रहा हालचाल राह के पत्थरों से
प्रसन्नता छलकती रही रोम-रोम से
यूँ ही टहलते हुए चबा गया नीम की पत्तियाँ
पर खुशी इस कदर थी रक्त में कि कम न हुई मन की मिठास

मैंने खुद से कहा
चलो खुश तो है एक बेटी किसी की
और भी होंगी धीरे-धीरे।

परवीन बाॅबी

कल छपी थी एक अखबार में
महेश भट्ट की टिप्पणी
परवीन बाॅबी के बारे में

कहना मुश्किल  है
वह एक आत्मीय टिप्पणी थी
या महज रस्म आदायगी
या बस याद भर करना
पूर्व प्रेमिका को फिल्मी ढंग से

उस टिप्पणी को पढ़ने के बाद
मैंने पूछा पत्नी से
तुम्हें कौन-सी फिल्म याद है परवीन बाॅबी की
जिसे तुम याद करना चाहोगी सिर्फ उसके लिए

मेरे सवाल पर कुछ क्षण चुप रही वह
फिर कहा उसने
प्रश्न एक फिल्म का नहीं
क्योंकि आज संभव हैं यदि
अपने बिंदासपन के साथ
ऐश्वर्या राय, करीना कपूर, रानी मुखर्जी
प्रियंका चोपड़ा और अन्य कई के साथ
नई-नई अनुष्का शर्मा रुपहली दुनिया में
तो इसलिए कि पहले कर चुकी हैं संघर्ष
परवीन बाॅबी और जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियाँ
स्त्रीत्व के मानचित्र विस्तार के लिए

उन्होंने ठेंगा दिखा दिया था वर्जनाओं को
उन्हें परवाह नहीं थी किसी की
उन्होंने खुद को परखा था
अपनी आत्मा के आईने में
वही सेंसर था उनका

परवीन बाॅबी ने अस्वीकार कर दिया था
नैतिकता के बाहरी कोतवालों को
उसे पसंद था अपनी शर्तों का जीवन
उसकी बीमारी उपहार थी उसे
परंपरा, प्रेमियों और समाज की

जो लोग लालसा से देखते थे उसे
रुपहले पर्दे पर
वे घर पहुँचकर लगाम कसते थे
अपनी बहनों-बेटियों पर

परवीन बाॅबी एक अट्टहास थी व्यंग्य की
उसके होने ने उजागर किया था
हमारे समाज का ढोंग

उसकी मौत एक त्रासदी थी
उसकी गुमनामी की तरह
लेकिन वह प्रत्याख्यान नहीं थी उसके स्वप्नों की
भारतीय स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष में
याद किया जाना चाहिए परवीन बाॅबी को
पूरे सम्मान से एक शहीद की तरह
यह कहते-कहते भर्रा गया था
पत्नी का चेहरा दुःख से
लेकिन एक आभा भी थी वहाँ
मेरी चिर-परिचित वही आभा
जिसने कई बार रोशनी दी है मेरी आँखों को।

बेटियाँ

यह दिसम्बर की पहली तारीख की
ढल रही शाम है

धूप चुपके से ठहर गयी है
नीम की पत्तियों पर

इस समय मन में उजास है
इसमें टपकता है शहद की तरह
बेटियों का स्वर

बेटियाँ होती ही शहद हैं
जो मिटा देती हैं
आत्मा की सारी कड़वाहट

अभी कुछ पल बाद धूप सरक जाएगी
आँचल की तरह पत्तियों से
पत्तियाँ अनन्त काल तक नहीं रोक सकतीं धूप को
पर बेटियाँ नरम धूप की तरह
बनी रहती हैं सदा
पिता के संसार में

जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में

जो न हँसें बेटियाँ
तो अँधेरे में खो जाते हैं पिता।

मैं इक चिडि़या हूँ पापा!

मैं इक चिडि़या हूँ  पापा
देखो तो!

धरती चिडि़या के पास है
आसमान उसकी आस है
पंख उसके पास हैं
बिना रोक-टोक वह उड़ती है
थक जाए तो
जिस टहनी पर चाहती है
बैठती है
गीत अपने गाती है

देखो तो पापा
चिडि़या कितनी खुश है!
दाना उसकी चोंच में है
उसका घर
उसकी पसन्द है

देखो तो पापा
उसका घर!
वह दुनिया की पहली वास्तुकार
कितनी सजग उसकी दृष्टि
कितना सघन संसार

सोचो तो पापा
मैं तुम्हारी बिटिया
इक चिडि़या हूँ
अपने मन की!

सोचो तो पापा
सेचो न!

ओ मेरी बेटियो याद रखना

आओ बैठो मेरी गोदी में
झूलो मेरी बाँहों में
ओ मेरी बेटियो!
तुम लोगों के आने के बाद
शायद मनुष्य होने लगा हूँ
तुम लोगों की हँसी में हँसने लगा हूँ

तुम लोग नहीं जानतीं
तुम लोगों की जिह्वा पर विराजती पवित्रता और होठों की हँसी
हमारे समय में जीवन की आशा है

उम्र की तिजहरी में
यदि घेरने लगे उदासी चारों ओर से
तब भी कोशिश करना हँसते रहने की
तुम लोगों के खिलखिलाने में बचा रहेगा जीवन
बचा रहेगा मेरा विश्वास

ओ मेरी बेटियो!
जब जाना यह घर छोड़कर
मेरी आँखों के आँसू मत पोछना
डरना भी मत!
इन्हीं आँसुओं में झलकेंगी
मेरी छोटी-छोटी बेटियाँ

मेरी मुझसे बड़ी बेटियाँ
मेरी छाती पर खेलतीं मेरी बेटियाँ

ओ मेरी बेटियो याद रखना
यदि जीवन में दुःख का आलाप दीर्घ होने लगे
तब भी परछाइयों के पीछे-पीछे मत भागना
डरना नहीं किसी आईने से!

ओ मेरी बेटियो!
मेरी आँख की पुतलियो!
न डरना न हारना
लड़ना समय से।

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को

चिन्तकों ने कहा है
पेट न हो तो शायद
आदमी स्वाभिमान से जिए

वह पेट ही है
जो मुझे खींच लाया एक ऐसे शहर में
जहाँ दिन बड़े विचित्र थे
रातें बड़ी भयावह
दृश्य अमावस में पहाड़ जैसे थे

उस शहर में कुछ पल बढ़ते थे
मैं भी कुछ दूर आगे तक
फिर लगता था
कहाँ जा रहा हूँ-कहाँ आ गया हूँ
इस तरह कब तक चलेगा
कैसे मिटेगी प्यास थूक घोंटने भर से

समझ में नहीं आता था
कि आदमी के चेहरे बदले हैं
या जीवन की भाषा
या मेरी आँखों में उतर आया है
किसी पोखर का रंग

सचमुच जीने के ढेर सारे उपाय
निरर्थक बेमानी-से लगते थे
हार जाऊँगा हर पल लगता था

पर ऐसे ही पलों में
अक्सर स्मृतियों से झाँकता था एक चेहरा
बहुत उदास पर मुस्कराता हुआ
प्राणवायु की तरह

सोचता था किसी दिन लौटूँगा
सगुन का पान लिए फलों की टोकरी के साथ
जैसे लौटते हैं सपने वसन्त के दिनों में
फागुन के रंगों में
जैसे लौटते हैं पत्ते पतझड़ के बाद टहनियों तक
मैं भी लौटूंगा उस चेहरे तक

इस प्रकार एक अपरिचित शहर में
असमय मृत्यु से बचाती रही
स्मृतियों में बसी एक स्त्री

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को।

जनवरी की एक सुबह उठीं तीन स्त्रियाँ

जनवरी की एक सुबह
लगभग साढ़े चार बजे उठीं तीन स्त्रियाँ
आँखों में नींद और देह में थकान लिए

उन्हें तैयार करना था
अपने-अपने पति को आॅफिस के लिए

उनके पति उठे जब बिस्तरों से
देह तोड़ते हुए
आँख मलते हुए

वे तैयार थीं चाय लेकर
बँध चुका था टिफिन गरम हो चुका था नहाने का पानी
रखा जा चुका था तौलिया  अपनी जगह पर
कपड़े तैयार थे इस्त्री करके
जूते में लग चुका था पाॅलिश

और अब जो करना था पुरुषों को
वह समस्या थी देह की।

सपने में एक लड़की: सोनमछरी

कस्बे में लड़का है
लड़के के सपने में लड़की है: सोनमछरी

लड़की का आना
लड़की का जाना
सिर को झुकाना
झुका के न उठाना
कभी मुस्कुराना कभी लाज से भरभराना

कभी उसकी आँखों में कातिक कभी सावन
कभी बैसाख का आना

बहुत कुछ का लड़के की समझ में न आना
उम्र की ताप में बस देह का पकना
कहीं कुछ टूटना कहीं जुड़ना कोई सपना

उसका कस्बे में होना
गरीबी में जीना
किसी हसीन शाम के लिए तरसना उभ्र भर
उसकी फितरत में भरता है कुछ
जैसे जीने की लालसा अपनी तरह से

पर जिन्दगी की अपनी कहानी है
वह लड़का जिसका दिन
शुरू होता है एक नए सपने से
और जिसकी रात
शोक की रजाई में मुँह छिपाकर
लेट जाती है उससे चिपककर

उस लड़के के सपने में
आती है एक लड़की: सोनमछरी।

आभा चतुर्वेदी

चार वर्ष बाद
आज अचानक दिखी वह
‘कहो ना प्यार है’ का पोस्टर निहारती हुई

चार वर्ष पहले वसन्त के दिनों में
आभा चतुर्वेदी से आभा द्विवेदी हुई
वह आभा शर्मा होना चाहती थी

पर जो न हो सका
विवश हो उसे आँख के काजल की तरह धोकर
उसे बनना पड़ा आभा द्विवेदी

आज वही आभा निहार रही थी पोस्टर
मैंने एक बार फिर गौर से देखा
और बढ़कर चौंका  दिया उसे

मुझे देख विस्मित उसने
पल भर में ही पूछ लिए न जाने कितने प्रश्न
पर नहीं दिया मेरे पहले ही सवाल का जवाब

मैंने पूछा पति-परिवार के बारे में
वह बताने लगी माँ-बाप भाई के बारे में

मैंने पता पूछा घर का
तो देते हुए नम्बर कहा उसने
अकेली रहती हूँ
आभा चतुर्वेदी लिखती हूं
आस-पास के लोग इसी नाम से जानते हैं

हतप्रभ-सा मैं कह न सका कुछ भी
जबकि बातें बहुत थीं मेरे पास

आज चार वर्ष बाद अचानक इस तरह
एक टाकिज के सामने खड़ी
फिल्मी पोस्टर निहारती आभा चतुर्वेदी
मुझे पहले से भली-भोली लगी।

लड़कियाँ

हमारे समय की सबसे बड़ी घटना है
कि लड़कियाँ कविता बनना नहीं चाहतीं

घर से लेकर कविता तक में
मुक्ति के लिए तड़प रही लड़कियाँ
घर और कविता को सजाते-सजाते
सजावट का सामान बनना नहीं चाहतीं

वे नहीं चाहतीं कि उन्हें बोझ समझा जाए

अपने जीवन के तमाम फैसले
स्वयं करना चाहती हैं लड़कियाँ

लड़कियाँ जीवन में पल-पल की घुटन से
मुक्त होकर इन्सान की तरह
पूरे सुकून से जीना चाहती हैं

वे अक्सर देर से घर लौटने पर
पिता या पति की आँखों में
संदेह नहीं, बस प्रेम देखना चाहती हैं

अब लड़कियाँ कहावतों से बाहर आना चाहती हैं
जीवन में देखना चाहती हैं अपनी आँखों से
‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’

यह स्त्री, जिसे देख रहे हैं आप
(धारचूला की अपनी छात्राओं को याद करते हुए)

चढ़ती दोपहर की
चिलचिलाती धूप में
जब चुभती हैं किरणें

उतर रही है एक स्त्री
पीठ पर घास का गट्ठर लेकर
पहाड़ी जंगल से घर की ओर

यह स्त्री मुँह अंधेरे
घर से निकली थी
कुछ रूखा-सूखा बाँधकर

घर पहुँचकर इस स्त्री को
मवेशी खिलाने के साथ-साथ
चिन्ता करनी है घर-भर के पेट की

इस स्त्री ने नहीं देखी हैं रेलगाडि़याँ
लखनऊ और दिल्ली

मुजफ्फरनगर की एक मनहूस दोपहर
शूल की तरह चुभती है इसे

यह चिडि़याघर और भूल-भूलैया नहीं चाहती
अपनों का सुख चाहती है
पहाड़ का सुख चाहती है

यह स्त्री जिसे देख रहे हैं आप
यह तीस की उम्र में
सैंतालिस की चिन्ताओं का घर है।

सोनचिरई

(एक सोहर सुनने के बाद)

बहुत पुरानी कथा है
एक भरे पूरे घर में
एक लड़की थी सोनचिरई

वह हँसती थी
तो धूप होती थी
फूल खिलते थे

वह चलती थी
तो वसन्ती हवा चलती थी

जिधर निकल जाए
लोगों की पलकें बिछ जाती थीं

और जैसाकि हर किस्से में होता है
उसका विवाह भी एक राजकुमार से हुआ

राजकुमार उस पर जान लुटाता था
उसके होंठ उसकी तारीफ में खुलते
उसकी जिह्वा उसके प्रेम के सिवा
और सारे स्वाद भूल गई थी

उसकी आँखों में नींद
और दिल में करार न था

और ऐसे ही दो-चार वर्ष बीत गए
सोनचिरई की गोद न भरी
ननद को भतीजा
सास को कुल का दिया
पति को पुरुषत्व का पुरस्कार न मिला

ननद कहने लगी ब्रजवासिन
सास करने लगी बाँझ
और जो रात-दिन समाया रहा उसमें साँसों की तरह
उसने कहा तुम्हारी स्वर्ण देह किस काम की
अच्छा हो तुम यह गृह छोड़ दो
तुम्हारी परछाईं ठीक नहीं होगी हमारे कुल के लिए

सोनचिरई बहुत रोई
मिन्नतें की
पर किसी ने न सुनीं

आँसुओं बीच एक स्त्री
घर के बाद
भटकने लगी ब्रह्माण्ड में

उसे जंगल मिला
जंगल में बाघिनी मिली
उसने उसे अपना दुःख सुनाया
और निवेदन किया कि वह उसे खा ले

बाघिनी ने कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
मैं तुझे न खाऊंगी
वरना मैं भी बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई क्या करती!

वहाँ से साँप की बांबी के पास पहुँची
बांबी से नागिन निकली
नागिन ने उसका दुःख सुना
फिर कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
जो मैं तुझे काट खाऊँगी
तो बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई बहुत उदास हुई
फिर क्या करती!
गिरते-पड़ते माँ के दरवाजे पहुँची

माँ ने धधाकर हालचाल पूछा
कौन सी विपत्ति में दुलारी बिटिया ऐसे घर आई है

बेटी ने अपना दुःख सुनाया
और चिरौरी की कि थोड़ी सी जगह दे दो माँ रहने के लिए

माँ ने कहा विवाह के बाद बेटी को
नैहर में नहीं रहना चाहिए
लोग-बाग क्या कहेंगे
वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो

और सुनो बुरा न मानना बेटी
जो तुम्हारी परछाँई पड़ेगी
तो मेरी बहू बाँझ हो जाएगी

यह कहकर माँ ने अपना दरवाजा बन्द कर लिया
अब सोनचिरई क्या करती!

उसने धरती से निवेदन किया
अब तुम्हीं शरण दो माँ
दुःख सहा नहीं जाता
इन कदमों से चला नहीं जाता
जो लोग पलकों पर लिए चलते थे मुझे
उनके ओसारे में भी जगह न बची मेरे लिए
अब कहाँ जाऊँ तुम्हारी गोद के सिवा

धरती ने कहा तुम्हारा दुःख बड़ा है
लेकिन मैं क्या करूँ
जहाँ से आई हो वहीं लौट जाओ

जो मैं तुमको अपनी गोद में रख लूँगी
तो ऊसर हो जाऊँगी

और मित्रो इसके आगे जो हुआ
वह किसी किस्से में नहीं है

हुआ यह कि सब ओर से निराश
सोनचिरई बैठ गई एक नदी के किनारे

एक दिन गुजरा
दो दिन गुजरा
तीसरे दिन तीसरे पहर एक सजीला युवक
प्यास से बेहाल नदी तट पर आ मिला

उसने सोनचिरई को देखा
सोनचिरई को देख
पल भर के लिए वह सब कुछ भूल गया

उसने विह्वल हो नरम स्वर में
सोनचिरई से दुःख का कारण पूछा
और सब कुछ जान लेने पर
अपने साथ चलने का निवेदन किया

सोनचिरई पल-छिन हिचकी
फिर उसके साथ-साथ हो ली

और उसके साथ पूरी उम्र जीकर
जब वह मरी
तो आँसुओं से जार-जार उसके आठ बेटों ने
उसकी अर्थी को कंधा दिया

सोनचिरई आठ बेटों की माँ थी
वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बाँझ नहीं होतीं

वे रचती हैं!
वे रचती हैं तभी हम-आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता

वे होती हैं तभी पुरुष
पुरुष होते हैं!

सुनीता की कविताएँ

सुनीता 

युवा कवयित्री. दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में शोधरत . संपर्क :sunitaws@gmail.com

1. हम लड़कियाँ
पहली बार जब मुझे आई थी माहवारी
अम्मा ने कहा
बच्चा रुकने का खतरा है
मन में एक सवाल आया था
माहवारी का बच्चा रुकने से क्या सम्बन्ध ?
उस वक़्त कुछ समझ में कहा आया था
अम्मा ने सबकी नजरों से बच के
टाटी का ढाई बन्हा कटवाया था
अब मेरे स्कूल जाने और आने का वक़्त
तय होने लगा था
और रास्ते लम्बे और लम्बे होते जा रहे थे
मेरी दुनिया से लड़के गायब कर दिए गये
और कुछ ‘मनचली’ लडकियां भी
मेरी सुबहें जल्दी और जल्दी होती जा रही थी
मैं अम्मा की जगह लेने लगी थी
मेरे गाँव की लड़कियाँ ब्याही जा चुकी थीं
और मैं स्कूल जाने लगी थी अकेली
उन दिनों मैं रास्ते में अकेली
एकदम अकेली होती जा रही थी
और गाँव वाले कहते थे कि
पढ़ने वाली लडकियां होती हैं रंडी
मेरी छठवीं कक्षा की दोस्त कनीज
कहा करती थी कि अच्छी लड़कियाँ
रास्ते में नजरे झुकाकर चलती हैं
और जोर जोर से हँसना भी ठीक नही
और मैं डरती और डरती चली जा रही थी
रास्ते के किनारे शौच को बैठा पुरुष
अपना लिंग हिलाता
हम सहेलियां अपने मन का प्रेम तो छुपा लेती थीं
पर माहवारी की तारीखें नहीं
हमें याद है उन दिनों एक-दूसरे को ढकते हुए चलना
मेरी सहेलियां जो सवर्ण थीं
नही होता था फर्क मेरे और उनके दर्द में
उन मुश्किल दिनों में वे भी
होती थीं एकदम अकेली
रसोई में तो सख्त मनाही थी
सर्दियों में भी चटाई पर सोती थीं
मुझे याद है कि उन दिनों
काम न करने के कारण
मैं कई बार पड़ती थी मार
आज भी हम डरते हैं उस दाग से
मेरे अन्दर से रिसता खून
उतर आया है मेरे चेहरे पर
मानो दाग न हुआ अपराध हो
और हम अपराधी !!

2. हमें डर लगता है
हमें डर लगता है किराये के कमरों में
आंबेडकर की फोटो लगाने से
घुलने मिलने में डर लगता है
पास पड़ोस के लोगों से
कहीं पूछ न लें हमारा पूरा नाम
गावों में डर लगता है
हिन्दुओं के खेतों में हगने से
खेत से सटी सड़कें भी होती हैं उन्हीं की
देखकर देते हैं
गालियाँ धड़ल्ले से
मेरे भैया जो अब नाम के आगे लगाते हैं सिंह
क्योंकि डरते हैं हमारे लोग
काम न मिलने से
आरक्षण को ख़त्म करने की
बहस हो चली है तेज
उनका  नाम पूछने पर
वे बताएँगे अपना नाम
पाण्डेय ,राव साहब ,पंडी जी चाय वाले
उत्तर और दक्षिण के भूगोल से
नहीं हैं बाहर हम अभी भी
यहाँ शहरों में भी हैं
गलियाँ बाल्मीकि और भंगियों की
हमें डर लगता है
जिन्दा जलाये जाने से
बलात्कार और फांसी पर चढ़ाये जाने से
हमें नहीं चाहिए ऐसा समाज
जो पीछा करता है हमारे नाम और काम से.

3. दिल्ली
पूरा का पूरा शहर भाग रहा है
गाड़ियाँ, मेट्रो, सड़कें और वक्त भी
नहीं भाग पाते सड़कों के किनारे
और सड़कों के बीचो-बीच खड़े पेड़-पौधे
वक्त नहीं भागता यौनकर्मियों का भी
जिनकी शामें ढलते ही
सदियों सी लम्बी हो जाती हैं रातें
वे ठूस दी गयी होती हैं
कोठों में प्रेम के नाम पर
बचपन निकल जाता है
भूख की आग मिटने में
वह बच्चा फेंक आता है अपनी उम्मीदें
कूड़े के ढेर पर
वह मोची अपने सपने गुथकर सिल देता है
ग्राहकों के जूतों में
हमें तेजी से पहुंचता रिक्शेवाला
नहीं जा पाता मेट्रो में भागकर भी.

4. मैं
मैं जातीय दीवार की वो ईंट हूँ
जिसके खिसक जाने से
पूरी दीवार ढह जाती है
हकीकत हूँ उस परिवार की
जहाँ हर ख्वाहिशें मिटा दी जाती हैं
मैं उस समाज का आइना हूँ
जिसमे जुल्म की सूरत बदलती रहती है.

यूं शुरू हुई हैप्पी टू ब्लीड मुहीम

मुहीम की संयोजक निकिता आजाद बता रही हैं ‘ हैप्पी टू ब्लीड’ कैम्पेन के बारे में 


निकिता आजाद ने २० नवम्बर को सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुरोहित परयार गोपालकृष्णन  को पत्र लिखा. मंदिर के इस मुख्य पुरोहित ने इसके पहले कहा था कि, ‘यदि प्यूरिटी चेकिंग मशीन का आविष्कार हो जाये, जो यह देखे कि महिलाएं माहवारी के दिनों  में हैं या नहीं , तभी वह महिलाओं के मंदिर में जाने देने पर विचार करेगा.  पुजारी के इस सेक्सिस्ट रिमार्क के बाद निकिता आजाद ने अपने कुछ साथियों के साथ उसे एक पत्र लिखा, जो ‘यूथ की आवाज’ में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ. इसके साथ ही निकिता और उसके साथियों ने सोशल मीडिया में ‘ हैप्पी  टू ब्लीड’ , कैम्पेन 21 नवम्बर से शुरू किया, जो जल्द ही वायरल हो गया. फिर क्या – जैसा कि इन दिनों चलन सा हो गया है उन्हें सोशल मीडिया के उग्र हिन्दूवादी, जो खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं, समूह से गालियाँ मिलनी शुरू हुई . उन्हें वेश्या , ज्यादा पढी –लिखी , एंटी हिन्दू , राष्ट्रद्रोही आदि विशेषणों से नवाजा गया.

गर्ल्स कॉलेज पटियाला की छात्रा निकिता ने स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए बताया कि ‘उनकी मुहीम किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, महिलाओं के लिए प्राकृतिक ‘ माहवारी’ को सभी धर्मों में टैबू की तरह देखा जाता है.’ छात्र आन्दोलनों से जुडी निकिता कभी छात्र संगठन डी एस ओ से जुडी रही हैं . वे कहती हैं कि ‘ यह मुहीम किसी छात्र संगठन के बैनर तले नहीं है. यह एक समविचार छात्रों का समूह है. ‘हैप्पी टू ब्लीड’ कैपेंन और सबरीमाला के पुरोहित को पत्र निकिता और उनके साथी सुखजीत की संयुक्त पहल से स्वरूप में आये. निकिता कहती हैं, ‘ हम छात्राओं ने हाल ही में अपने कॉलेज के  सुपरिन्टेन्डेन्ट के खिलाफ मुहीम छेड़ी थी , जब उसपर छात्राओं के साथ छेड़ –छाड़ का आरोप लगा था.

निकिता कहती हैं , ‘ माहवारी को शर्म का विषय बनाना  पितृसत्ता का एक फॉर्म है , ऐसा नही है कि यही एक धूरि है पितृसत्ता की, बल्कि पितृसत्ता एक जटिल संरचना है– यह स्त्रियों को दोयम नागरिक बनाती है. महिलाओं और दलितों पर शुद्धता –अशुद्धता का निर्धारण कर वर्चस्वशाली सत्ता सम्पत्ति पर कब्जे के समीकरण बनाती रही है – सम्पत्ति के अधिकार से इसी तरह उन्हें वंचित किया गया है. मिल्कियत न देने की साजिशों की हद है कि एक समूह को पैरों से उत्पन्न बताया गया.’

निकिता आजाद

माहवारी का टैबू  स्त्री की गत्यात्मकता , निर्णय का उसके अधिकार , उसकी देह पर उसके अधिकार , आदि के साथ जाकर जुड़ता है . माहवारी शुरू होते ही लडकी के सेक्सुअल व्यवहार और उसके हर आचार – व्यवहार पर नियंत्रण शुरू हो जाता है , इसके कारण २३ प्रतिशत महिलायें स्कूल छोड़ देती हैं. ८८ % महिलाओं को कपड़ों का इस्तेमाल करना पड़ता है.’

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए निकिता बताती हैं कि उनके पिता कृभको, लुधियाना में कार्यरत हैं, और माँ शिक्षिका हैं. ‘ हमारा घर लोकतांत्रिक रहा है. माहवारी शुरू होने के साथ घर में ख़ास समस्या नहीं हुई लेकिन समाज में चलन है कि माहवारी के दिनों में तुलसी के पेड़ को हाथ न लगाओ, खराब हो जाएगा , मंदिर  जाने से भी रोका जाता है . स्कूल के दिनों में याद है कि माहवारी के कारण हम दो लड़कियों को स्कूल में होने वाले हवन में जाने नहीं दिया गया था. घर में अपने सैनिटरी पैड छिपाना या इनके विज्ञापन आ रहे हों तो चैनल स्विच करने के लिए दौड़ना आदि तो आम बात है. ’

विषय के प्रति स्पष्टता के साथ निकिता कहती हैं कि ‘यह समस्या सामाजिक है, व्यवस्थागत भी है. इसे स्टेट के इंटरवेंशन से ही ख़त्म किया जा सकता है. एन जी ओ के स्तर पर,  कोर्पोरेट फंडेड एन जी ओ के स्तर पर यह संभव नहीं है. हम बाजार , कॉर्पोरेट के द्वारा स्त्रियों के शरीर को कमोडिफाय करने के खिलाफ हैं. बाजार अपना उत्पाद बेचना चाहता है. सैनिटरी नैपकीन के ‘ व्हिस्पर’ जैसे नाम पितृसत्ता के अनुरूप हैं.  अधिकांश महिलाओं के लिए स्टे फ्री , व्हिस्पर जैसे नैपकिन खरीदना मुमकीन नहीं है.’

‘जल्द ही हम अपने सात दिवसीय ‘ हैप्पी टू ब्लीड’ मुहीम की रिपोर्ट प्रकाशित करेंगे और आगे के अपने कैम्पेन के उद्देश्य और लक्ष्य बताएँगे.  हम चाहते हैं कि महिला आयोग स्टैंड ले और राज्य की जिम्मेदारी सुनिश्चित कराये कि माहवारी के दिनों में महिलाओं के लिए मुफ्त और सब्सिडाइज्ड हेल्थ केयर उपलब्ध हो. हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि स्कूलों में किशोरी योजना सहित अन्य स्कीम सही तरीके से इम्प्लीमेंट हों.’ निकिता के अनुसार चूकि वे निजी स्कूल की छात्रा रही हैं इसलिए माहवारी के बारे में शरमाते हुए बताया भी गया अन्यथा सरकारी स्कूलों से तो चैप्टर ही गायब कर दिया जाता है.

चेंज डॉट ओ आर जी पर मुहीम के द्वारा स्वास्थय  मंत्री को लिखा गया पत्र. अपने हस्ताक्षर के लिए क्लिक करें :  HAPPY TO BLEED: An Initiative to break menstrual taboos and myths!

‘हैप्पी तो ब्लीड मुहीम के बाद अभी स्वास्थय मंत्री को एक पत्र भेजा जा रहा है इस मांग के साथ कि महिलाओं के स्वास्थ्य से सम्बंधित सभी स्कीम इप्लीमेंट हों , नए स्कीम चलाये जाएँ और पहले से जो हैं उनका रिव्यू हो. इसके लिए जनवरी से हम ग्राउंड कैम्पेन करने वाले हैं.’

निकिता अपने साथ आये सभी लोगों का आभार जताती हैं , जो इस लोकतांत्रिक मुहीम में उनके साथ आये.

सोनी पांडेय की कविताएं

सोनी पांडेय

कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com

1. छोटे शहर की लड़की

छोटे शहर की लड़की
पारुल
जा रही है ब्याह कर
मुखौटों  के शहर दिल्ली
पति दिल्ली में  लाखों  के पैकेज पर कार्यरत है
गाड़ी . फ्लैट . और सुख सुविधाओँ से भरा जीवन होगा
बेटी का
इस लिए पिता ने लाखोँ खर्च कर भेज दिया
बेटी को बड़े शहर दिल्ली
अभी आऐ हुए
ज़ुमा – ज़ुमा चार दिन ही हुए थे कि पति ने फरमान जारी किया
ये गवारु परिधान
सिन्दूर . बिन्दी उतारो और
ठीक वैसे रहो
जैसे रहती हैं  बिल्डिंग  की औरतें
पारुल ने छोड़ दिए
पिहर के परिधान
अब वह पहनती है ठीक वही कपडे जो पहनता है
बड़ा शहर दिल्ली
अभी ज़ुमा -ज़ुमा आए चार माह ही गुजरे हैं  कि पति चाहता है
पारुल नौकरी करे ठीक वैसे
जैसे करती हैँ बिल्डिंग की  अन्य औरतें
फरमान जारी किया
पूरे दिन घर मेँ बैठी रहती हो गवारोँ की तरह
नौकरी करो
एम0ए0. बी0एड0
पारुल अब पढाती है पब्लिक स्कूल मेँ ठीक वैसे
जैसे पढाती हैं  औरतें छोटे शहरों  की
जैसे पढ़ाता है बड़ा शहर दिल्ली
सुबह आठ बजे से रात बारह तक
पति करता है काम बड़े पैकेज पर
बैंक  भर रहा है रुपयों  से
पति पारुल को पहनाता है मँहगे कपड़े . क्रेडिट कार्ड से कराता है खरीददारी
लेकिन नहीँ जानना चाहता पारुल की पसन्द
नही सुनना चाहता उसकी भावुक फरियाद
तुम औरतें सेण्टीमेण्टल होती हो
थोड़ी क्रेजी भी
जिन्दगी मेँ प्रेम एक जरुरत है फिजिकल
ठीक वैसे . जैसे भागती हुई मैट्रो मेँ जीता है
बड़ा शहर दिल्ली
पारुल तलाशती है मैट्रो में  बैठी
हम उम्र औरतों की आँखों  में
अपना छोटा शहर
अनगिन आँखोँ में  पाती है
प्यास अपनी सखियों  के सपनों की
भूख उड़ान की . मन भर अपने मन की
तलाश अपने पसन्द के कपड़ों  की
ख्वाहिशें  अपनी . अपना जीवन
अपनी शर्तों  पर जीना
लेकिन पिता चाहते हैं  बेटी राज करे पति के बड़े पैकेज की नौकरी मेँ
ठीक वैसे ही , जैसे करती हैं  छोटे शहर की लड़कियाँ
जीता है बड़ा शहर दिल्ली
लगा कर मुखौटा आधुनिकता का पारुल जीती है पति के शर्तोँ पर समेट कर आँखों
मेँ छोटे शहर के सपने .अपना जीवन
और तलाशती है हर एक मेँ अपना छोटा शहर ।

2. मुनिया अपना गाँव छोड़ आई 

कुल तेरह की थी
मुनिया
जब ठेकेदार संग अपने टोले की लड़कियों  और जवान औरतों संग
आई थी शहर
ईँट के भट्ठे पर
कमाने
विधवा माँ के लिए
थोड़ा सा धन जुटाने
कि .छुड़ाई जा सके
बनिये से चार बिस्से रेहन की ज़मीन ।
इसी माह जाना था उसने माहवारी का दर्द
माँ थोडी सहमी थी
बेटी सयानी हो गयी
फिर भी भेजना जरुरी था
कोई चारा नहीँ
ज़मीन छुड़ानी है ।

मस्त . मासूम मुनिया
पूरे दिन चालती है . फोडती है मिट्टी के ढेले
सानती है . माढती है
थापती है ईँटे और जल्दी – जल्दी समेट कर छोटे .
पुराने बक्से मेँ रुपये
भाग जाना चाहती है
वापस अपने गाँव , सिवान
बस इतना जानती है कि दुनिया
बिहार और उसका देस
सिवान है
बाकी सब परदेस ।

मुनिया की सुकोमल उँगलियों
बलिष्ठ माँसपेशियों
और सुडौल उभारों  को देख कर
ठेकेदार मुस्कुराता है
पुरानी मजुरनियों  को कनखी से समझाता है
आए दिन रात को शराब परोसने की  ऐवज में  पचास की नोट पकडाता है
मुनिया फँसती गयी वैसे ही जैसे चारे के लालच मेँ फँसती है मछली और अन्ततः
बिक जाती है मनुष्यों  के बाजार में  ।

मुनिया के बक्से मेँ रुपया है
नये कपड़े हैँ
कुछ चाँदी के गहने है
बरसात मेँ ट्रैक्टर पर बैठकर लौट रही है अपने देस सिवान
पूरे एक साल में  बन गयी है सुडौल . सुगढ औरत ।

खेत छूट गया
अब टोले भर के लडके उसे रण्डी पुकारते हैं
माँ आँखे चुरा कर चलती है
जीना मुहाल है
रात मेँ खटकता है अक्सर दरवाजा
माँ दस साल की छोटी बेटी को छाती से साट कर
चमईनिया माई को गुहराती है ।
अब मुनिया माँ के लिए बोझ है कोई ब्याह को तैयार नहीँ
कोई रास्ता नहीँ
एक बार फिर मुनिया . टोले की कुछ लड़कियों  और औरतों  संग आ गयी है भट्ठे पर
ठेकेदार अब कोई नयी लड़की चाहता है ,मुनिया को कनखियाता है
मुनिया जानती है कि नहीं  लौट पाएगी भोगी हुई लडकी
वापस अपने देस
इस लिए . बार – बार परोसती है खुद को
बचा कर कुछ लड़कियों  को पाती है सुकून
भेज कर बरसात मेँ वापस उन्हेँ अपने देस
लौट आती है इंटों  के बीच
सुलगती भट्ठी को देखर रोती है
और उँगलियों  से बनाकर
दुनिया का गोला
खोजती है अपना देस सिवान ।

3. अपनी जड़ें  तलाशती सन्नो 

पिता ने तलाश ली है
नई उर्वरा ज़मीन
खूब विस्तार है
पास ही नदी बहती है
दरवाजे पर राजा की सवारी है
परजा है
पसारी हैं
दूर तक फैला है ठाट
पिता की इकलौती सन्तान सन्नों
खोदी जा रही है जड़ समेत
धूम – धडाके . गाजे – बाजे
सहनाईयों  की धुन  पर चल रहा है कुदाल
हल्दी . मटमंगरा .
बारात . द्वारपूजा
और अन्ततः सिन्दूरदान
उखड़ गयी सन्नों
कराहते . रोते . चित्कारते पहुँची
नई ज़मीन मेँ
गाड़ी जारही है सन्नो
भर रहे हैँ घाव
निकल रही हैं  शाखाएँ
लेकिन जड़ों से उखाड़ी गयी सन्नों  जानती हैं
उखडना उसकी विवशता है
उखाडी जा सकती है एक बार फिर से बेटों के हाथों
और बीच से काटकर
बांटी भी जा सकती है
इस लिए अपनी जड़ोँ की तलाश मेँ गढना चाहती बेटी के लिए
एक ऐसा गमला जिसे आसानी से जड़ समेत आयात – निर्यात किया जा सके . बिना उखाडे ।

4. हम पूरब मेँ सूर्य को निहार लेते हैं 

अल सुबह
पूरब मेँ उगते सूर्य को निहारना
वस्तुतः एक ऐसी क्रिया है
जो जोड़ती है हमेँ जड़ोँ से ।
हम औरते
सभ्यता के गमले मेँ
उगा हुआ बोनजाई हैँ
जिसे आसानी से हस्तानान्तरित किया जा सकता है ।
संवेदना की ज़मीन से उखाड़कर
पैदा होते ही रोप दिया जाता है आँगन मेँ एक किनारे
गमले मेँ
खाद .पानी देकर इस तरह तैयार किया जाता है कि
एक तय समय सीमा मेँ
दान किया जा सके दूसरे के आँगन मेँ ।
दूसरे आँगन मेँ जगह बदलती जरुर है
किनारे से हटा कर आँगन के मध्य तुलसी की तरह सजा दिया जाता है और जरुरत भर
खाद . पानी समय – समय पर मिलता है
सम्मान थोड़ा बढाकर ।
हम औरतेँ जड़ोँ की तलाश मेँ पूजतीँ हैँ तुलसी
भोरे निहार आती हैँ सूरज
कि . उनकी जडोँ से इनका उतना ही गहरा नाता है
जितना शिशु का गर्भनाल से और
मन ही मन कर लेती हैँ सन्तोष की सूरज आज भी माँ के गर्भनाल से जुड़ा
जोड़ता है उन्हेँ जड़ोँ से ।

5. हत्याओं  के इस दौर में
हत्याओं  के इस दौर मेँ
हत्यायें बिना किसी धारदार हथियार के वार के होती हैं  ।

ये हत्यायें समूह में  घेर कर की जाती हैं तोड कर मनोबल
और  जीते जी बना दिया जाता है जिन्दा लाश ,
मार कर व्यक्ति की पहचान ।

ये हत्यायें अनैतिकता की पराकाष्ठा पर पहुँच  सुखा  देती हैं  मनुष्यता के
जड़ मेँ बचे जीवन के अन्तिम अवशेष को और शेष बचता है केवल बंजर उजाड़ ज़मीन
.
जहाँ हत्याओँ का औजार संवेदनाओं की रेत में दबाकर सहेजा जाता है ।

ये हत्यायें गवाह हैं अपने समय की साजिशों के, जिन्हें  लिखते समय काँप
जाती है इतिहास की कलम
और न जाने कितनी कोशिशें रक्तरंजित चित्कारती मिलती हैं  भग्नावशेषों पर ।

हाँ  मैँ जानती हूँ हत्यायें होती रही हैं  हर युग में  मनुष्यता के
विरुद्ध और मरता रहा है इमान
संसार की सबसे भयंकर त्रासदी की तरह ,
जिसकी समाधि पर लेते हैं  शपथ आज भी लोग जन क्रान्ति की
शायद इनकी समाधि के वजूद ने बचा रक्खा है थोड़ा सा नैतिक पक्ष जीवन का ।

ये हत्यायें कभी राजनीतिक
कभी सामाजिक और कभी
साहित्यिक हत्यायें होती हैँ
जिसके निशान मिल जाते हैँ
गली . कूचे . कारखानों और थोडा सा गोदान मेँ ।
जहाँ होरी और धनिया का लोक संघर्ष अपनी  सै मेँ जिन्दा है
गाँधी और लेनिन की समाधियोँ मेँ गाता है
निराला के बादल राग सा दहाडता है
ओढकर हत्याओँ का कफन अपने पूरे वजूद के साथ ।

हत्यायें सिद्ध करती हैं अपने नुकिले नाखुनोँ का पैनापन
धारदार दाँतोँ का आघात
पीठ में  घोपे जाने वाले खंजरों  का वज्र आघात ।

इन हत्याओँ की नीव पर रखी गयीँ है हर दौर मेँ निमार्ण की बुलन्द इमारतेँ
और उसकी इबारत मेँ लिखी मिलती है चुटकी भर मनुष्यता
और बचा रह जाता है हर दौर मेँ मनुष्य ।

तुम हत्याओँ के प्रणेता बन भले चमको अपने दौर मेँ किन्तु इतिहास के पास
तुम्हारे लिए काली स्याही के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं  होगा .
जिसे याद कर थूकेगी मनुष्यता और याद करेगी हत्यारों  की साजिशें ।

हत्यायें थमी नहीं थीं  हत्याऐँ होती रही हैं
हत्यायें जारी हैं  इस दौर में  अपने चरम पर चित्कारते हुए
बेचैन है मनुष्यता ।

प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिला आंदोलन का पत्र/ तीन तलाक से निजात की मांग

प्रति 
प्रधान मंत्री 
भारत सरकार 
प्रिय महोदय,
यह पत्र भारतीय मुस्लिम महिलों के लिए इन्साफ और बराबरी की हमारी चिंताओं से आपको वाकिफ़ कराने के उद्देश्य से प्रेरित है. 1985 के शाहबानों प्रकरण के बाद से आज तक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के सन्दर्भ में कभी सुना नहीं गया- हमारे देश की राजनीति को बहुत –बहुत शुक्रिया ! मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस को कुछ रेवायती और पितृसत्ताक पुरुषों ने कब्जा रखा है और उन्होंने मुस्लिम पर्सनल ला में किसी सुधार के प्रयास को रोकने की ही कोशिश की है.  इस तरह मुस्लिम महिलाओं को कुरआन-शरीफ़ से मिले अधिकारों से और भारतीय नागरिक होने के अधिकारों से महरूम रखा गया है. प्रायः सभी मुस्लिम मुल्कों, जैसे मोरक्को , ट्यूनीशिया, टर्की , इजिप्ट , जॉर्डन आदि यहाँ तक कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुस्लिम मुल्कों ने भी विवाह और परिवार के मामलों में पर्सनल लॉ को कोडिफाय किया  है- धन्यवाद हमारे खुदसाख्त रेवायती नेताओं का कि भारतीय मुसलमानों को यह सुविधा नहीं हासिल है परिणाम स्वरूप, हमारे समाज में तीन –तलाक और बहु –विवाह के मामले जारी हैं.

साभार गूगल

जैसा कि जाहिर है , सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस अनिल दवे और आदर्श कुमार गोयल ) ने भारत सरकार को 23 नवम्बर तक अपना जवाब फ़ाइल करने के लिए कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ जेंडर –विभेद को संविधान की धारा 14,15 और 21 के तहत मूल अधिकारों का एवं अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन क्यों नहीं माना जाना चाहिए ? हम भी मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के साथ क़ानूनन भेदभाव संविधान की उक्त धाराओं का उल्लंघन है. हमने अभी –अभी 10 राज्यों के 4710 मुस्लिम महिलाओं के बीच किये गये रीसर्च के परिणाम प्रकाशित किये हैं. 92.1% महिलाएं मौखिक और एकतरफा तलाक पर प्रतिबन्ध की पक्षधर हैं , वहीं 91.7% महिलाएं बहु-विवाह के विरोध में हैं. 83.3% महिलाओं ने कहा कि कोडिफायड मुस्लिम पारिवारिक लॉ बनाये जाने पर मुस्लिम महिलाओं को भी न्याय मिल सकेगा. अलग –अलग राज्यों में हमारे जमीनी कार्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर हैं कि हिन्दू , क्रिश्चन , पारसी पर्सनल लॉ की तरह कोडिफायड मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया जाना जरूरी है, यह मुस्लिम महिलाओं की बराबरी और गरिमा को सुनिश्चित करेगा.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में ( बी एम एम ए) एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और खासकर मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है. यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है. 9वें साल में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की सदस्यों की संख्या 70,000 तक हो गई है, जो 13 राज्यों में फ़ैली है. यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और कुरआन के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है.

साभार गूगल

भारतीय मुस्लिम महिलाओं को न्याय शरीयत क़ानून , 1937 में  और डिजाल्युशन ऑफ़ मुस्लिम मैरेज एक्ट , 1939 में सुधार  से अथवा नये मुस्लिम पर्सनल लॉ के निर्माण से ही सुनिश्चित किया जा सकता है. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने कुछ सालों से हजारो मुस्लिम महिलाओं, वकीलों , धार्मिक विद्वानों की सलाह/ सुझाव से कुरआन के सिद्धांतों के अनुरूप मुस्लिम फॅमिली लॉ का ड्राफ्ट बनाया है, जिसमें विवाह की उम्र, मेहर , तलाक़, बहु-विवाह , निर्वाह –भत्ता (मेंटेनेंस) और बच्चों पर अधिकार जैसे विषय शामिल हैं. इस ड्राफ्ट के कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. शादी की न्यूनतम उम्र , लडकी के लिए 18 और लड़के के लिए 21. 
2. बिना बलप्रयोग के और बिना किसी धोखे के दोनो पार्टी की सहमति
3. निकाह के समय दुल्हे के एक साल की आय के बराबर का न्यूनतम मेहर 
4. मौखिक तलाक अवैध घोषित हो. तलाक –ए-अहसन 90 दिन के भीतर अनिवार्य आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया से हो 
5. शादी के भीतर निर्वाह की जिम्मेदारी पति पर हो , यद्यपि पत्नी का स्वतंत्र आर्थिक आधार हो,  तो भी. 
6. मुस्लिम वीमेंस प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट , 1986 के अनुसार मेंटेंनेस
7. बहु –विवाह अवैध घोषित हो 
8. माँ और  पिता, दोनो बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक हों 
9. बच्चे का संरक्षण ( कस्टडी ) उसके हितों के अनुसार और उसकी इच्छा के अनुरूप हो 
10. हलाला अपराध की श्रेणी में हो 
11. मुता निकाह भी अपराध की श्रेणी में हो
12. सम्पत्ति के मामले में  कुरआन के नियम लागू हों, कर्ज अदायगी और वसीयत के बाद  
13. लड़कियों को लड़कों की तरह वसीयत/ उपहार या हिबा के जरिये संपत्ति में बराबर भाग हो 
14. निकाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन
15. तलाक , बहु –विवाह नियमों के उल्लंघन की स्थिति में काज़ी को जिम्मेवार माना जाये


इस पत्र के साथ पूरे ड्राफ्ट की कॉपी संगलग्न है. यह मसौदा  मुस्लिम महिलाओं की मांगों और उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ है और इसके प्रावधान उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने में मदद करेंगे.
हमारा अनुरोध है , कि सरकार किसी कानूनी पहल का निर्णय लेती है , तो मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार और बराबरी तथा न्याय के संदर्भ में उनके मत का आदर करे.
सधन्यवाद !
नूरजहाँ साफ़िया नियाज़ ज़ाकिया सोमान
संस्थापक , भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन



भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का नेतृत्व



प्रधानमंत्री को इस पत्र  के बाद एन डी टी वी पर ‘बड़ी खब’ की बहस के लिए उसकी प्रस्तुतिकर्ता निधि का नोट 


 भारत में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, करीब 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी चाहती हैं। सिर्फ तलाक शब्द का जिक्र भर कर देना, खासकर आजकल सोशल मीडिया के स्काइप, एसएमएस, व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर तलाक कह देना, इससे समाज में चिंता बढ़ गई है।

देश के 10 राज्यों में एक गैरसरकारी संस्था ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ ने 4710 मुस्लिम महिलाओं की राय जानी। यह संस्था मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए काम कर रही है। उसने पाया कि ज्यादातर महिलाएं आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर थीं और घरेलु हिंसा का शिकार थीं। इन महिलाओ ने शादी, तलाक, एक से ज्यादा शादी, घरेलू हिंसा और शरिया अदालतों पर खुलकर अपनी राय रखी।

राय देने वालों में 73 फीसदी गरीब तबके से थीं, जिनकी सालाना आय 50 हजार से भी कम है। सर्वे में शामिल 55 फीसदी औरतों की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई और 44 फीसदी महिलाओं के पास अपना निकाहनामा तक नहीं है। यह अध्ययन सन 2013 में जुलाई से दिसम्बर के बीच हुआ।

अध्ययन में सामने आए नतीजों के मुताबिक 92% मुस्लिम महिलाएं मौखिक तलाक के खिलाफ़ हैं। मुस्लिम महिलाओं ने तलाक को एकतरफा नियम बताया। 93% चाहती हैं कि कानूनी प्रक्रिया का पालन हो। उन्होंने तलाक के केस में मध्यस्थता की मांग की। ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ का कहना है कि 2014 में महिलाओं के 235 मामले, जो कि महिला शरिया अदालत में आए, में से 80 फीसदी मौखिक तलाक के थे।

अपने कार्यक्रम ‘बड़ी खबर’ से पहले जब कुछ रिसर्च की तो हैरान करने वाली जानकारी मिली। कई इस्लामिक देशों में ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी  है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ट्यूनीशिया, अलजीरिया, ईराक, ईरान, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में तो इस पर 1961 में रोक लगा दी गई थी…जब फेमिली लॉ आर्डिनेंस लागू किया गया था। इसके तहत हर शादी की रिजिस्ट्री और तलाक से पहले सुलह की कोशिशें एक सरकारी अधिकारी के सामने ज़रूरी हैं। यह भी पता चला की दूसरी शादी पर मलेशिया और ब्रुनेई में रोक है और तुर्की, मिस्त्र, सूडान, ईराक और पाकिस्तान में यह सख्त कायदों के बाद ही हो सकती है।

कई इस्लामिक देशों में एक तलाकशुदा महिला को जीवन निर्वाह के पैसे पति से मिलते हैं, लेकिन हमारे यहां भारत में उसको वक्फ बोर्ड पर निर्भर रहना पड़ता है। राष्ट्रीय महिला आयोग का कहना रहा है कि सबसे बड़ी मुश्किल मुस्लिम महिलाओं में जानकारी की कमी है। अन्य देशों में महिलाओ ने इस प्रथा के विरोध में आवाज उठाई है, लेकिन यहां उस प्रकार की सक्रियता देखने को नहीं मिली है। इस बारे में अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समय-समय पर चिन्ता जाहिर कर देता है। कहते हैं कदम उठाएंगे, लेकिन हर बार कुछ रुकावटें आ जाती हैं।

नूरजहां साफिया नियाज संबोधित करती हुई

अल्पसंख्यक आयोग के के पूर्व चेयरमेन प्रोफेसर ताहिर महमूद का कहना है कि ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी लगा देनी चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को समाप्त कर देना चाहिए। वे मुस्लिम लॉ पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना रहा है कि मौलवियों ने समाज में सुधार की कोशिशों में रोड़े अटकाए। उनका कहना है कि इसमें न्यायपालिका के दखल की जरूरत है।

बड़ी खबर’ कार्यक्रम के दौरान भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की जैबुनिसा रेयाज का कहाना था कि कुरान की रोशनी में ट्रिपल तलाक के मामलों में सुधार की बड़ी जरूरत है। तलाक में कानून की मदद मिले, सुलह की कोशिशों में भी ऐसी मदद मिले,जिसमें जवाबदेही बनती हो। मौजूदा तरीका बिल्कुल नाकाफी है।

सर्वेक्षण को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरगी महली का कहना था कि यह सैम्पल साइज बहुत छोटा है। इस सर्वे को मुस्लिम महिलाओं की आवाज न समझा जाए। उनका यह भी कहना था कि महिलाओं के लिए जो इंतजाम हैं, वे काफी हैं। बहरहाल हमारे साथ सेंटर फार स्टडी अॉफ डेवलपिंग सोसायटी के असिस्टेंट प्रोफेसर हिलाल अहमद का कहना था कि वे इस स्टडी का स्वागत करते हैं। प्रगतिशील मुस्लिम आवाजों को बुलन्द होने की जरूरत है

पत्र आंदोलन के अधिकारिक ब्लॉग से और नोट एन डी टी वी का एक ब्लॉग , साभार 

आरती कुमारी की कविताएं

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आरती कुमारी


युवा कवयित्री, ‘कैसे कह दूँ’ एक काव्य संग्रह, संपर्क: sartikumari707@gmail.com

1.  स्वयं से संवाद
कितना सुखद होता है
अपने होने को महसूस करना
और प्यार करना खुद को।
अलग-अलग रिश्तों में बँटकर
जैसे बँट जाती हूँ मैं ही कई हिस्सों में।
दूसरों की खुशी में कई बार घुलती मैं, जैसे अनचीन्ही
अन्जान हो गयी हूँ अपने ही अस्तित्व से।
मगर तभी कहीं सुदूर एकान्त में
कोई गा रहा होता है
स्नेहिल शब्दों का मधुर गीत
जहाँ सालों भर खिलते हैं फूल
जहाँ हमेशा गूँजता रहता है
कल-कल झरनों का संगीत
जहाँ नदियाँ अठखेलियाँ करती हैं नौकाओं के साथ।
जहाँ सूरज अपनी किरण बाँहे फैलाए
पुचकारता रहता है पेड़ पौधें को हमेशा
जहाँ रात होते ही रुपहली चाँदनी ढ़क लेती है
सबकुछ अपने आगोश में।
आखिर कौन है, जिसने अपनी साँस की लडि़यों में
पियोये हैं सुमधुर गीतों के शब्द।
वहाँ कोई दूसरा नहीं
पेड़ पौधें, , नदी झरनों
ओर सरज चन्द्रमा के साथ थिरक रहा है
मेरा अपनी ही अस्तित्व
उस नीरव एकान्त में।

2.  एक सवाल

क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम मुझे हर उस गलती का
जि़म्मेदार ठहरा सकते हो,
जो मैंने कभी किए हीं नहीं?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम अपनी सारी मुसीबतों की जड़
मुझे बता सकते हो ?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
मुझ पर पाबंदियाँ लगाकर
मुझे चौके के-चूल्हे तक सीमित रख सकते हो?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
मुझसे सपने देखने का अधिकार भी
तुम छिन सकते हो?
क्या मैं लड़की हूँ इसलिए
अपने पुरुषत्व  से
तुम मेरे अस्तित्व को
जब चाहे कुचल सकते हो?
या फिर मैं लड़की हूँ इसलिए
तुम्हें डर है समाज का,
लोक परम्परा का,
रीति -रिवाज का।
पर शायद तुम भूल रहे हो
की इस समाज की रचना
हमसे ही हुई है,
हम हैं तो स्नेह, दुलार, उल्लास-उमंग
धरती पर अब भी कायम है।
हम ही तुम्हारे हमसफर
हम ही तेरे हमराज हैं,
तुम्हारे अंतर्मन की शक्ति बन
हम मुश्किल  से लड़ते हैं,
तुम्हारा हौसला, गुरूर बन
हम बुलंदियों को छूते हैं।
इसलिए मत कोसो
हमें मत बांधो,
मत जकड़ो मसलो मत हमें,
मत रोको, मत टोको
मत कोख में मिटने दो हमें,
खुल कर जीने दो,
अपनी मंजिल छूने दो हमें।
लड़कों के साथ कदम दर कदम
सम्मान से बढ़ने दो हमें।

3. वह लड़की
रोज आती है
‘वह’ लड़की
गन्दे बोरे को
अपने कांधे पर उठाए
और चुनती है
अपनी किस्मत-सा
खाली बोतल, डिब्बे और शीशियाँ
अपने ख्वाबों से बिखरे
कुछ कागज के टुकडा़ें को
और ठूंस देती है उसे
जिंदगी के बोरे में

गरीबी की पैबन्दों का
लिबास ओढ़े
कई पाबन्दियों के साथ
उतरती है
संघर्ष के गन्दे नालों में
और बीनती है
साहस की पन्नियाँ
और गीली लकड़ी-सा
सुलगने लगती है
अन्दर ही अन्दर
जब देखती है
अपनी चमकीली आँखों से
स्कूल से निकलते
यूनिफाॅर्म डाले बच्चों को!

ऐ री मोलकी

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सुनीता धारीवाल जागिंड


सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की और वीमेन टी वी इंडिया पोर्टल की मोडरेटर, संपर्क: suneetadhariwal68@gmail.com .

आज गांव जल बेहड़ा  की आबोहवा बदली-बदली सी है सारे गांव में चर्चा है रुल्दू जाट का छोरा  राममेहर मोल की बहु ल्याया है इसी बात को लेकर गांव में हंसीठठ्ठा व्यंग्य और कहीं-कहीं सन्जीदा बाते हो रही हैं। मतेरी चमारिन गांव में पानी की टून्टी पर बोल रही थी कि रूल्दू जाट की बहु लक्ष्मी ने मोल की बहु को घर में घुसने नहीं दिया और बाहर खेत में तूड़ी व भैंस वाले कोठड़े में ही रामेहर व उसकी मोल की बहु रहते हैं। सारा गांव आने-बहाने रुल्दू के खेत की तरफ आणा-जाणा कर रहा है। मोल की लुगाई की एक झलक पाने के लिए।
गांव के सरकारी स्कूल वाली गली में चार रान्डे (अविवाहित) रामफल, रामकेश, प्यारा और जोगिया भी अपने भीतर  की बात एक दूसरे पर उडेल रहे हैं। सुना है रामेहर 25 हजार मोल देकर बंगाली लुगाई ल्याया है, जोगिया ने अपना खबरी ज्ञान झाड़ा कि मैने पता किया है कि रामेहर ने पांच हजार खुद की कमाई के बचाए थे, बीस हजार मन्डी के आढ़ती लाला अमरनाथ से दो रूपए सैकड़ा पर उठा के ल्याया है। रामफल ने साथियों को समझाया कि देखो भाइयो यदि हम चारो पांच-पांच हजार रुपए रामेहर को देकर लाला के पैसे चुकते कर दे मोल की बहू हम ाी बांट ल्यागें। रामेहर दूर से ल्याया है उसके घरां रहेगी इसलिए वे तीन दिन बरत लेगा हम चारो ह ते में एक-एक दिन बरत ल्यागें। चारो सहमति बना कर उठ खड़े हुए और रामेहर से बात चलाने के उचित अवसर ढूंढने लग गए।

दिन के 20 चक्कर बारी-बारी रामेहर के कोठड़े के लगाए पर रामेहर दिखाई न दिया। रुल्दू जाट के  घर रामेहर की भाभियाँ,  कृष्णा और सुमन दोनों सगी बहने उम्र में रामेहर से छोटी और नेग में बड़ी। घर में कोहराम कर रही हैं, नासपीटा टीबी का मरीज, कुरड़ी का कूड़ा, काली काटड़ी लयाया, साल में एक लींगरा जाम देगी पांच किलटे जमीन के निगल के मानैगी। ऊत पै हारे सुख की रोटी न जरी गई बुढँय़ा के 15 किल्ले मैं ते साढ़े सात-सात बांटे आवे थे दोनों बेबेयां के हारे बालक सुख की खा लेते। फिर दोनों आपस में लडऩे लगी। सुमन बोली ऐ कृष्णा सब तेरा करया धरय है जै तू रोटी दवाई ढंग ते दिए जांदी तो या नौबत कोनी आवै थी। कृष्णा तडक़ कर बोली मेरा के या तो तेरा करया धरया है जवान दयोर था बखत तै बहलयो के बतचाएै जांदी। गात की चमड़ी का के बिगडय़ा करे। आखिरी बखत फूंकण के, काम आया करै, तेरे पै मौका नहीं समाल्या गया। इब रोण तै के जमीन बच ज्यागी। जाऐ रोई तेरे कान्ही तो लखया करदा वो महीना पन्द्रह दिना में उसकी भी राख लैन्दी तो न्यू गाम में घर की माट्टी कोनी उड़ै थी। सुमन बोली चिन्ता न करै बेबे मैं भी देसे न बरदार की बेटी सू इस मोलकी नै तो गाम मै तै निकलवा के दम ल्यूगी।

साभार गूगल

फुलमा बुआ भी तडक़े-तडक़े गांम में पहुंच ली थी और लक्ष्मी को समझाने लगी। भाभी तू भी किसी काम की ना निकली छोरा! मोल की बहू ले आया और सारे गुआन्डा मै रुक्का पड़ रया सै। बुढेया की इज्जत के बट्टा लाग लिया। हां री किसे गरीब की काणी, लडग़ी, लूली व आंन्धी कोई सी भी न थ्याही थम ने। पता नहीं रामेहर नकटा किस ने उठा ल्याया। जा जात न पता न गाम का, न बाप का पता। हारे करम में यू ऐ लि या था। सारे गाम के तानेया नै मेरा गात का छांलणा कर दिया। तेरा भतीजा मोल की ल्याया- मोल की ल्याया। फुलमा का यही रिकॉर्ड सारा दिन बजता रहा।

रामेहर को बहुत  बुरी खांसी थी। खांसी के  साथ खून भी आता था। तूड़ी के  कोठड़े में गरमी का बुरा  हाल था। लगातार खांसना असहनीय था।  थोड़ा आराम मिलते ही रामेहर टूटी खाट पर लेट गया। रामेहर का चार दिन का रेल का सफर कल्पनाओं में बीता था बगल में मोल की दुल्हन को लिए रामेहर ने कितने रंगीन सपने बुने थे जो गांव में कदम रखते ही बदरंग उलझे धांगो में परिवर्तित हो गए थे। रामेहर सोच रहा था उसका घर होगा, बच्चे होंगे,  सच्चाई तो यह थी कि बिन बयाहे उसकी कोई इज्जत न थी। मां के राज में चूल्हे के पास बैठकर घी मक्खन चटनी के साथ बाजरे की रोटी मिलती थी। पिता का दुलार व भाइयों की थपकी भी रामेहर के नसीब में थी। सब कुछ तो समान्य था। जवानी की दहलीज पर रोग से सामना हो गया था। बहुत इलाज करवाया देसी, अंग्रेजी, ओपरी पराई, झाड़ फूंक बाबा ओझा सब किया पर मर्ज बढ़ता गया। ज्यूं-ज्यूं दवा की। अब कुछ भी सामान्य नहीं था। चुल्हे चौके पर बड़ी भाभी  कृष्णा का राज था, खेत क्यार डांगर डोर पर छोटी भाभी सुमन का। अब उसे घर के अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। क्योंकि उसकी गिनती गांव के मलंग रान्डों में थी। उसकी रोटी बाहर ही भेजी जाती थी। चूल्हे तक पहुंच पाना अब केवल एक सपना था। बिना बयाहे मरद की नजर में खोट होता है और रान्डे मलंग होते हैं यहीं समाज का स्थापित सत्य था। जवान होती बेटियों का वास्ता देकर कृष्णा व सुमन ने घर के दरवाजे रामेहर के लिए बन्द करवा दिए थे। रामेहर को मां की रसोई देखे दस साल बीत चुके थे और उस रसोई तक जाने का दरवाजा सिर्फ उसकी अपनी विवाहित पत्नी ही उसे दिखा सकती थी। रामेहर की खुद की शादी के बाद ही उसे घर में जगह मिल सकती थी। रामेहर अच्छी तरह जान गया था कि स मान पाने व सामाजिक रूप से इज्जतदार कहलाऐ जाने के लिए बहु का होना जरूरी था। उसका अनुभव बता रहा था कि शरीर की भूख की व्यवस्था पैसे से गांव में ही उपलब्ध थी और शहर में तो पैसे शारिरिक सुख की उपलब्धता की बहुलता थी। परंतु सामाजिक स्वीकार्यता हेतु उसे उसे घर बार वाला बनना था, जो केवल विवाह से ही संभव था।

बीमारी के कारण उसका कंही से रिश्ता नहीं आता था। उसकी इस समाजिक स्थापना के  लिए बहु बहुत जरूरी थी। चाहे मोल की ही क्यों न हो।  बयाह के गीत, बहु के स्वागत के लोकगीत, आंखों में मां की रसोई  के बर्तन, चुल्हा, हारा, टोकणी, बिलौणी, कढौणी शक्कर व गुड़ के माट सब तैरते रहे। सफर का रामेहर को पता भी न चला था। रामेहर के गांव में पहुंचने से पहले गांव वालों को भनक लग चुकी थी कि रामेहर मोल की बहु ला रहा है। सारे गांव में मोल की बहु का कौतुहल था लोकल बस से उतरते ही रामेहर अपनी नई नवेली बहु को लेकर अपने घर चला दिया। रास्ते में गांव के बच्चों की फौज रामेहर के पीछे लग गई और मोलकी-मोलकी के नारों से गांव की गलियों को गुजांयमान कर दिया। जैसे-तैसे घर पहुंचते ही रामेहर ने मां को आवाज दी, भाभियों की गालियों, तानों, उलाहनों में मां की आवाज सुनाई ही नहीं दी। मां ने गांव व समाज के दबाव में घर में पैर नहीं रखने दिया। रामेहर मां पांव में गिर कर रोया पर सब बेअसर रहा। रुल्दू बैठक में सब देख रहा था बाप की आंखों में तरस का पानी तैर गया पर गांव की चौधराहट के कबच से आर्शिवाद के बोल नहीं निकले। परन्तु रामेहर को गांव के बाहर खेत के तूड़ी वाले कोठड़े में रहने की इजाजत दी गई इस शर्त के साथ कि वह गांव से कोई वास्ता नहीं रखेगा। यह कैसा इज्जतदार बहिष्कृ त जीवन था रामेहर को समझ नहीं आया। रामेहर की बहु का नाम मोलकी पड़ गया था सभी गांव वाले इसी नाम से उसकी बात करते थे। गांव की इज्जत के ठेकेदार भी मोलकी की एक झलक पाने को आतुर रहते थे। आने बहाने रूल्दू के खेत की तरफ हो आते थे कि शायद मोलकी के दीदार हो जाएं। मोलकी का मोल लगा था इसलिए गांव वाले सांझे खाते की बहु कहकर अपनी दबी वासनात्मक इच्छाओं को हवा देते रहते थे। इज्जतदार कहलाऐ जाने वाले लोग भी सरेआम भद्दे अश्लील  मजाक में मोलकी का नाम लेकर ही-ही-ही करते थे।

साभार गूगल

गांव का बुजुर्ग रामदिया माली पंचायत घर का चौकीदार संन्जीदा बुजुर्गों व युवाओं की पंचायत लगा कर रखता था व वहां गांव की महिलाओं को पानी पी-पीकर कोस रहा था। बुरा हो इन बीर बान्तियों का छोरीयां ने पेट में मरवा देती हैं बेडा डूबे इन डाकटरां का,  जिनकी मशीन छोरा-छोरी बतावे। हारी आंखों के आगे ही गाम में मोल की आण लाग ग्यी और बैरा नी के के देख कै मरणा पड़ेगा। आधे गांव मलंगा के होग्ये। छोरीयां का घर तै निकलना मुश्किल हो गया। न्यूऐ छोरियां ने कूख में मरवाओगे तो नरक पाओगे। सन्जीदा युवक भी रामदिया माली की गहराई को समझते थे और आने वाले समय की आहट सुन रहे थे। उधर मोलकी को सिर्फ संकेतों  की व आखों की भाषा समझ आती थी। यहां सब कुछ उसके लिए नया था। मोलकी उस कोठड़े के कोने में बैठी सोच रही थी कि बाबा ने कहा था जब तक पेट में बच्चा न आए घर पर फोन नहीं करना,  न चिट्ठी  लिखवाना। बच्चा पैदा करने के बाद ही गांव में वापिस आना सिर्फ मिलने। मोलकी की पांच बहने उससे छोटी थी दो बड़ी बहने व एक भाई था। बड़ी बहनों को ट्रक वाले 25-25 हजार रुपए में ले गए थे। बाप व भाई खेतों में काम करते थे। बाढ़ का पानी हर साल तबाही लाता था व पानी उतरते ही करजा चढ़ जाता था। दस-दस दिन तक भूखा रहने का अ यास मोलकी को थो इसलिए तीन दिन तक तुड़ी के कोठड़े में पानी पर निर्भर रह कर उसने कोई शिकायत नहीं की थी। मोलकी का बाप जानता था कि बच्चा होने पर ही मोलकी को जमीन जायदाद का हक और घर में जगह मिलेगी, इसलिए कड़े नियम से भेजा था अपनी बच्ची को। मोलकी जल्द से जल्द अपने भाई बहनों के पास जाना चाहती थी इसलिए वह अपने बच्चे के बारे में ही सोचती रहती थी। रामेहर ग भीर रूप से बीमार था मोलकी अब केवल उसके स्वस्थ होने की चिन्ता करती थी और इलाज का ही उपाय करना चाहती थी। पांचवे दिन मोलकी ने अपनी मां के दिए चावल के आटे के लड्डू अपनी पोटली से निकाल कर रामेहर को दिए जैसे-तैसे दो दिन और निकल गए।

सातवें दिन रामेहर को बुलाने ारतु नाई खेत में आया और कहा कि रामेहर को मां ने घर बुलाया है। मोलकी झट से दुप्ट्टïा ओढक़र चप्पल पहनकर रामेहर के पीछे चल दी। भरतु ने रोका कि मां ने अकेले रामेहर को बुलाया है। मोलकी ठहर गई उसे अब खेत के कोठड़े में डर लगने लगा था। वह वहीं सिमट कर बैठ गई और रामेहर का इन्तजार करने लगी। घर पहुंचते ही मां ने रामेहर को चाय पिलाई और कहा बेटे मुझे पता नहीं था तू बहू का इतना शौकीन है। हम तेरे मां-बाप हैं कहीं न कहीं तो तेरा बयाह करते। मैं करमो जली न्यू सोची तेरा रोग लाईलाज है,  किसी की बेटी की विराम माटी हो ज्यागी। पर तू न मान्या पर इब भी देर नहीं हुई है। तेरी बुआ फुलमा तेरा रिश्ता ल्यायी है,  जीन्द के पास गाम की छोरी है, विधवा है। बस तेरे तै चार-पांच बरस ही बड़ी होगी। छोरी के बाप भाई ना है। तेरे सहारे टैम काट लैगी। अपरेशन भी  बण रहया है तेरी सध ज्यागी तेरे पै  कोई जि मेदारी का बोझ भी नहीं पडैगा। दस तोले सोना मै चढा दयूगी। आगलै 25 हजार नकद टीके में देवेंगे और धनदाज सारा दे देंगे। एक भैंस भी देवेंगे और बेटा मोलकी की चिन्ता ना करिए मनै तेरे टोहाना वालो मौसे ते बात कर रखी है वो इस मोलकी ने तीस हजार मै ले ज्यागा। सत्तर  साल का होरया सै चौधरी उसके बुढ़ापे के बचदे दस-पंद्रह साल सुख तै काढ़ लेगा। इस मोलकी की जात न पात इनका तो काम न्यू होया करे। खानदानी टाबरा में इसी बहु ना वै ल्याया करते, मैंने साई पकड़ राखी है मोलकी की। आज रात ने ऐ तेरा मौस इसने ले ज्यागा। गाड़ी लै के आयैगा।

 रामेहर सन्न  रह गया और उसे कुछ समझ  नहीं आया दिमाग सुन्न हो  गया। रामेहर बिना कोई जवाब  दिए खेत की ओर चल दिया।  राह में रामफल, प्यारा, जोगी और रामकेश ने टोक दिया अपनी मंशा जाहिर कर दी। चार कदम आगे गाम के बदमाश छोरेयां ने फिकरा कसया एक बार हमने भी दिखा दे मोलकी तेरा हिसाब तै हो लिया होगा। राममेहर पीछे मुडक़र देखता तो बोले काली गाजर ले रहया सै मेरे बटे थोड़ी सी कांजी हमनै भी प्या दे। रामेहर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। उसके सोचने समझने की शक्ति को, विचारों ने हर लिया था। वह सोच रहा था कि बहु-बहु में फर्क होता है क्या। बहु तो बहु ही होती है चाहे मोल चुकता कर के फेरे लिए हैं चाहे दहेज लेकर फेरे लिए हों। दर्जा तो बहु का ही है और होना चाहिए भी। दहेज की बहु का इतना स मान! यदि कोई देख भी ले तो मरने मारने को उतारु हो जाते हैं औरत के कारण तो कत्ल होते आए। मेरे विवाह को कोई विवाह नहीं मानता। मुझे गांव निकाला मिला सामाजिक उपहास पीड़ा और बहिष्कार मिला। आखिर क्यों मैंने तो विवाह जैसी संस्था को अपनाया है। असहाय व नीरीह मन: स्थिति के साथ रामेहर मोलकी के पास लौट आया। मोलकी ने एक पल में इशारों में अनेक सवाल कर डाले मां ने मुझे भी बुलाया है  क्या-क्या कहा कब हम गांव में जाएंगे आदि-आदि पर रामेहर चुप रहा।
रामेहर मोलकी  की सेवा व प्रेम का कायल हो चुका था। रामेहर किसी भी  कीमत पर उसे छोडऩा नहीं चाहता था, उसने सारी बात मोलकी को बताई और दोनों ने उसी रात गांव छाड़ शहर की राह पकड़ ली। शहर में छोटे से प्रॉपर्टी डीलर का एक कमरा किराए पर ले लिया। पॉपर्टी डीलर की पत्नी दयालु महिला थी। उसने उन्हें दरी, थाली, गिलास, चूल्हा, बल्ब सब दिया और रामेहर ने मिट्टी ढोने वाले ट्रैक्टर ट्राले पर ड्राईवर की नौकरी करनी शुरू कर दी। सौ रुपए दिहाड़ी के पैसों में से नबबे रुपए रामेहर के इलाज के लिए खर्च कर मोलकी खुश थी। मोलकी के लिए अपने पेट की भूख से भी जरूरी उसको कोख की भूख थी जो जल्द से जल्द बच्चा चाहती थी। इसलिए रामेहर के स्वास्थ्य पर वह सब कुछ खर्चना चाहती थी। पंद्रह दिनों में सब सामान्य होने लगा था कि अचानक मकान मालिक की पत्नी के पिता मृत्यु हो गई व अपने बच्चों सहित मायके चली गई। मोलकी की हैसियत समाज में मोलकी ही थी। मकान मालिक आपनी वासना का दास हुआ और भीतर के वहशी ने अकेली मोलकी को तहस-नहस कर दिया। उसकी इज्जत के  चीथड़ों की गवाह हर दीवार थी। उसके शोर शराबे की किसी को भनक तक नहीं मिली। रामेहर रात वापिस आया तो मोलकी लुट चुकी थी। उसके कमजोर शरीर में ताकत नहीं थी कि वह प्रतिकार कर पाता। दोनों ने ही रात को अपने ट्रेक्टर मालिक के घर शरण ली। मालिक की मां दयालु थी दया कर उसने  एक बिस्तर बर्तन, चुल्हा इत्यादि दिया और स्थानाभाव में उन्हें भैंस के कमरे में एक तरफ कोने में स्थान दिया। मोलकी सारा दिन उस महिला के घर का सारा काम करती बदले में उसे एक पाव दूध मिलता जिस मोलकी रामेहर को पिता देती थी।

साभार गूगल

लगभग एक माह बाद मालकिन के बेटों की  बहुए उस घर में आ गई, उन्होंने मोलकी की उपस्थिति को नहीं स्वीकारा उन्हें मोलकी की मुस्कान और चंचल आंखों ने डरा दिया। उन्हें लगा उनके पति बहक जाएंगे यह काला जादू जानती है। उन्हें फंसा लेगी बहुओं ने मोलकी व रामेहर को घर से चले जाने का हुकम सुना दिया। बेबेस मालकिन कुछ न कर सकी वह महिला मेरे घर का पता जानती थी। एक दिन सुबह-सुबह मोलकी को लेकर वह मेरे घर पहुंची। मैंने सिर से पांव तक मोलकी को देखा वह मात्र तेरह वर्षीय बच्ची थी। जिसका अभी तक शरीर भी विकसित नहीं हो पाया था। एक ऐसा पौधा जो खिलने का मतलब भी नहीं जानता था। उसने कातर आंखों से मुझे देखा था। वह मुझ से बहुत कुछ कहना चाहती थी परंतु मेरे पास समय की उपलब्धता बहुत कम थी। उस महिला ने कहा कि इसे काम पर रख लो मेरे पास पहले से ही दो घरेलू नौकर थी इसलिए मुझे जरूरत नहीं थी परन्तु उसे मेरी जरूरत थी, मैंने रखने की इजाजत दे दी। वह मेरे सुबह उठने से पहले ही मेरे घर पहुंच जाती थी। तीनों वक्त का भरपेट खाना उसे अरसे बाद नसीब हो रहा था मैंने उसे उसके पति के लिए खाना भी मेरे घर से ही ले जाने की इजाजत दे दी थी।

वह जब भी मेरे सामने  पड़ती बहुत कुछ कहने की कोशिश  करती थी परन्तु मुझे समय नहीं मिलता था चुनाव नजदीक आते जा रहे थे। लोगों की गहमा-गहमी भीड़ बढऩे लगी थी। मैं सुबह 6 बजे से रात 12 एक बजे तक जन सभाओं को स बोधित करती। रात को आकर सारे दिन का आंकलन करती रात दो बजे सो जाती और वह दिन भर मेरी तलाश में रहती। एक दिन सुबह घर से निकलते ही उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने पूछा क्या चाहिए बोली आप मेरी मां बन जाओ मेरी बात सुन लो। उस सुबह की वह  मेरी पहली याचक थी मैंने उसकी बात सुनने का अगले दिन का समय दे दिया। अगले दिन की मेरी सारी जन सभाएं कैन्सिल कर दी गई मेरी गर्दन व कमर में बेहद पीड़ा थी मैं उठने से भी लाचार थी। मैंने झट से मोलकी की बुलाया और अपनी बात कहने का मौका दिया। मैंने पूछा क्या नाम है वह बोली मोलकी, मैंने पूछा क्या तु हारे पिता ने यही नाम रखा था, बोली नहीं,  यह नाम तो ससुराल का है मेरा नाम तो रिन्की है। पिता का नाम- बोली सईद, गांव का नाम- पता नहीं, जिला- पता नहीं, प्रदेश- पता नहीं, बस देस का पता है वह बांग्ला है, मैंने पूछा नदी पार वाला या इधर वाला वह बोली हिन्दुस्तान वाला। मैंने पूछा चिट्ठी  कैसे जाएगी- बोली पता नहीं बस टेलीफोन नंबर है, बाबा ने कहा है जब बच्चा हो जाए तो ही फोन करना। मैंने न बर मिलाया तो जवाब में न बर उपलब्ध नहीं था।
वह मेरे पैरों  में गिर कर रो रही थी आप मुझे  रख लो हमेशा के लिए बस मुझे रोटी देना मेरे पति को दवाई देना और कुछ नहीं। उसने  जो कुछ घटा मुझे सब बताया। मैंने बहुत तेज दवाईयां ली और अगले ही दिन फिर से अभियान में जुट गई। वह रोज मेरी ओर देखती जैसे  अभी भी कुछ बताना रह गया। उसकी आंखें अभी भी कहती थी मेरी सुनो। एक दिन भीड़ में से वह मुझे ाींच कर अन्दर ले गई और कहने लगी तुम मेरी मां हो सुनो- मेरा जे पति है रामेहर मुझै उसे घिन्न आती है। उसके पास आते ही मेरा जी मिचलाता है, मैं उसकी गन्दगी व बलगम साफ नहीं कर पाती हूं। वह बहुत गन्दा दिखता है। उसके दांत मुंह से बदबू आती है। मैं क्या करूं बताओ मां मैं क्या करूं। मैं मच्छी खाना चाहती हूं। मैं अपने छोटे भाई बहन के पास जाना चाहती हूं पर बाबा ने कहा बिना बच्चे के नहीं आना। बताओ मां मैं क्या करूं। मैं निरन्तर थी। शाश्वत सत्य यह था कि एक बेटी ही अपनी मां से कह सकती थी यह सब।

मेरे पास कोई जवाब नहीं था उसके पास घर का पता नहीं था वह बालिग नहीं थी। सामाजिक रुप से स्वीकार्य भी नहीं थी। मेरे कानूनन हस्त्क्षेप का मतलब उसका बालिग होने तक नारी निकेतन में रहना था। मेरी मसरुनफियत ने उसके फैसले को कुछ समय के लिए टाल दिया था। चुनाव के थमने पर मैंने रिन्की के बारे में घरेलू नौकरों से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह तो पिछले 20 दिनों से नहीं आ रही। अपना वेतन ले गई है और आपसे मिलना चाहती थी उसे उसका पति जबरदस्ती अपने साथ ले गया है। नई जगह जिसका किसी को पता नहीं। आज भी मरे जहन में उसके प्रश्न हैं जिनका उत्तर मुझे केवल रिन्की को ही नहीं बल्कि सभी मोल की बहुओं को देना है। कम से कम महिला प्रतिनिधि होने के नाते हमारी जवाबदेही इस उपजते वर्ग के प्रति ाी उतनी ही बनती है जितनी अन्य मुद्दों के प्रति कन्या भु्रण हत्या से उपजी इस समस्या का सामना ाी समाज को करना है। ऐसी महिलाओं का सर्वेक्षण करना उनकी सामाजिक स्थापना हेतू उचित माहौल व सुरक्षा प्रदान करना उनके शिक्षा, संपत्ति  का हक सुनिश्चित करना जैसे मुद्दों पर ध्यान देना ही होगा और खासतौर पर मेरा आहवान है कि या तो कन्या भ्रुण हत्या बन्द करें अनयथा सांस्कृतिक विविधताओं भरे समाज के लिए तैयार रहें क्योंकि हर गरीब का देश, समाज, जात-पात नहीं केवल मोल होता है और मोलकी किसी ाी प्रदेश की हो सकती है मिल एक दिन जाएगी आपके अपने ही परिवार में!  आपके ही आस पास। विभिन्न भाषाओं को बोलती हुई हास्यपद हरियाणवी या पंजाबी भाषा का प्रयास करती हुई एक और मोलकी।

बेबस मालकिन मोहिनी कुछ न कर सकी। वही भली औरत शहर की लोकप्रिय समाज सेवी महिला नेता प्रियवंदा को जानती थी जो अकसर महिलाओं के बीच उनकी मदद के लिए चली जाती थी। प्रियवंदा स्वयं भी राजनीतिक संघर्षों से जूझ रही थी फिर भी वह आने वाली हर महिला का स मान करना जानती थी।
अगली सुबह मकान मालकिन मोहिनी मोलकी को साथ लेकर प्रियवंदा के घर पहुंच गई। प्रियवंदा ने मोहिनी को देख आवाज दी और अपने दफ्तर  में बुलाया। मोहिनी के साथ एक अबोध लडक़ी को देख प्रियबंदा ने उस लडक़ी के बारे में पूछा तो मोहिनी ने बताया कि आप इसे घरेलू काम के लिए रख लो इसका नाम मोलकी है और यह यहां पर सुरक्षित रहेगी। प्रियवंदा ने मोलकी को एक बारगी सिर से पांव तक देखा यह पक्के काले वर्ण की मात्र 13 वर्षीय बालिका थी जिसका शरीर भी अभी तक विकसित नहीं हुआ था। मोलकी ने भी बड़ी कातर नजरों से प्रियवंदा की ओर देखा था। उसकी आंखे प्रियवंदा से बहुत कुछ कहना चाहती थी, आंखों के इस क्षणिक संवाद से एक अनजाना रिश्ता जन्म ले गया था मोलकी और प्रियवंदा के बीच। प्रियवंदा के पास समय का अधिक आभाव था इत्मिनान से बात करने के लिए वह तो बस दौड़ रही थी उड़ रही थी तुफान के पत्तों की तरह। सियासत के दलदल से बेदाग निकलन चाहती थी कामयाबी के छोर तक। हाथ काट कर शक्ति की कलम पकड़ा देना ही उसके दल की सच्चाई थी, जिसे प्रियवंदा ने त्याग दिया था। वह हवाओं के विपरीत बह रही थी। इसलिए दिन रात एक किए हुए थी। दिनभर जन स पर्क और रात देर तक जरूरी फाईलें व कागजात लिखने व डाक देखने व जवाब बनाने, प्रैस नोट बनाने में और कार्यक्रम बनाने में लग जाती। सुबह जल्दी उठ जनता से मिलना शुरू करती फिर हलके के गांवों गलियों को नापती। जन स पर्क बढ़ाती।

साभार गूगल

प्रियवंदा ने आवश्यकता न होते हुए भी मोलकी को काम पर रख लिया। मोलकी सभी नौकरों से पहले सुबह ही काम पर आ जाती उसने कई महीनों बाद भरपेट खाना खाया था। उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था। वह जाते वक्त अपने पति रामेहर के लिए रोटी छुपा कर ले जाती। सभी नौकर ऐतराज करते मैडम जी यह औरत ठीक नहीं है, इसका चाल चलन ठीक नहीं है यह तो बेशर्म मरदों की आंखों में झाकती है और हंसती है। प्रियवंदा मोलकी का सच जानती थी कि उसे हरियाणवी या हिन्दी कुछ भी सपष्ट बोलना नहीं आता था। प्रियवंदा स्वयं भी उसके टूटे-फूटे बिना सिर पैर के बंगाली उच्चारण वाले हरियाणवी शब्दों को मुश्किल ही समझ पाती थी। मोलकी को तो आंखों की भाषा सरल लगती थी। वह तो बस आंखों से कहने और जानने का प्रयास करती थी। कुछ न समझ आए तो हंस दिया करती थी। दिन बीतते रहे मोलकी यूं ही अपनी हर बात प्रियवंदा को बताने के अवसर तलाशती रहती।

प्रियवंदा के सामने हर दिन नई-नई चुनौतियां आ खड़ी होगी। कभी राजनैतिक कभी सामाजिक कभी पारिवारिक। जिनका प्रियवंदा डट कर सामना करती। दुर्भाङ्गय से प्रियवंदा चुनावी समर में एक अपरिपक्व सेना की कमांडर थी जिसे भर्ती होते ही युद्ध के मोर्चे पर खड़ा कर दिया गया था। जब राजनैतिक दल को छोड़ा तो अपना संगठन बनाना पड़ा। अभी संगठन में कार्यकर्ताओं को जोड़ा ही था कि समय से पहले चुनावों का बिगुल बज गया। कम समय में जितना भी क्षमता वर्घन प्रशिक्षण दे सकी। उतने से ही सन्तोष करना पड़ा। वह जानती थी जो बल और छल कपट अनुभवी संगठनों में होता है उसके संगठन में कही नहीं था। उसका आत्मबल दे िाए वह अपरिवक्त सेना से ही वह समर में अपने योद्धा होने का प्रमाण देना चाहती थी दुनिया को। खासकर उन स्थपित दलों के नेताओं को यह सन्देश देना तो चाहती थी कि उसका वजूद मिटा नहीं है। प्रियवंदा दिन रात एक किए हुए थे, उसे किसी भी चीज की फुरसत नहीं थी न खाने-पीने की न बच्चों की न घर की। बस उसकी धुन में देश धर्म छाया रहता था।

प्रियवंदा एक जरूरी जलसे में जाने के लिए अभी गाड़ी में बैठने ही वाली थी कि मोलकी ने कसकर प्रियवंदा का हाथ पकड़ लिया और कहा कि अभी मेरी बात सुनो। मोलकी उसे दिन की पहली याचक थी इसलिए प्रियवंदा भीतर लौट आई और मोलकी से कहा जल्दी से बताओ मोलकी ने कहा तुम मेरी मां हो तो सुनो यह जो मेरा आदमी है न रामेहर मुझे उस से घिन्न आती है उसके पास आते ही मेरा जी मिचलाता है और मूंह से दांतों से बदबू आती है वह बहुत गन्दा दिखता है। मैं उसकी बलगम व गन्दगी साफ नहीं कर पाती मुझे उबकाई और उल्टी आती है। बताओं मां मैं क्या करूं, कहां जाऊं मोलकी एक सांस में सब बोल गई और रोने लगी मुझे अपनी मां के पास जाना है अपने छोटे भाई बहनों के पास जाना है और वह जोर-जोर से रोने लगी। प्रियवंदा उसकी बात सुनकर जड़ सी हो गई। शास्वत सत्य तो यही था कि एक बेटी ही अपनी मां से कह सकती यह सब जो मोलकी ने प्रियवंदा से कहा था। प्रियवंदा के पास कोई जवाब नहीं था। प्रियवंदा ने उसे ढाढस बंधाया चुप करवाया और उसकी मां के घर भेजने का वादा कर उससे उसका विवरण जानने लगी।
तुम्हारा  नाम – मोलकी, यही है ससुराल का नाम। मेरे बाबा ने तो मेरा नाम रिंकी  रखा था।
मां का नाम – असरफी
पिता का नाम – सईद अली
गांव का नाम – पता नहीं
तालुका तहसील कोई – पता नहीं
फिर क्या पता है- बस देस का नाम पता है बांगला। प्रियवंदा ने फिर पूछा क्या हिन्दुस्तान वाला, मोलकी ने कहा नहीं नदी पार वाला। तो चिट्ठी  कैसे पहुंचेगी-पता नहीं मेरे पास तो बस बाबा का टोलीफोन न बर है। मोलकी ने अपनी मुठ्ठियों में मिंचे मुझे-तुड़े कागज को प्रियवंदा की ओर कर दिया। प्रियवंदा ने तुरन्त फोन मिलाया जिसके जवाब में वह न बर उपलब्ध नहीं था और मोलकी ने आप बीती सारी घटनाएं प्रियवंदा को बता दी थी। मोलकी प्रियवंदा के पैरों में गिर कर रो रही थी और उसके मां-बाप को ढूंढने की गुहार लगा रही थी। प्रियवंदा ने मोलकी से एक ह ते की मोल्लत मांगी कि वह कोशिश जरूर करेगी। प्रियवंदा बेशक दिन भर व्यस्त रहती परन्तु रात को उसे नींद न आती। मोलकी का चेहरा दिन-रात उसके आगे रहता। प्रियवंदा को रास्ता नहीं सूझ रहा था। पुलिस की मदद लेने का मतलब मोलकी को नारी निकेतन में भेज देना था क्योंकि वह अभी नाबालिग थी और वह रामेहर को भी छोडऩा नहीं चाहती थी, क्योंकि वह बीमार था और उसकी सेवा कर रही थी कितनी भी गलानि होती फिर भी वह उसे स्वास्थ करना चाहती थी और बच्चा चाहती थी, क्योंकि उसके बाबा की शर्त थी कि वह बिना बच्चा जने कभी वापिस नहीं आएगी। उसका बाबा यह जानता था कि बच्चा होने पर मोलकी को रामेहर के घर और जमीन की हकदारी मिल जी जाएगी और उसकी बेटी का गुजारा हो जाएगा।

चुनाव में विरोधी प्रत्याशियों द्वारा इस्तेमाल घटिया हथकंडों  ने प्रियवंदा को दिन रात काम करते रहने पर मजबूर कर दिया और प्रियवंदा ने मोलकी के फैसले को कुछ दिन के लिए टाल दिया था। कुटिल व आधारहीन अफवाहों ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया था। अश्लील अफसानों की अफवाहों ने कार्यकर्ताओं को उपहास का केन्द्र बना दिया और एक-एक करके सब घर बैठ गए। प्रियवंदा अकेले ही मोर्चे पर डटी रही। अफवाहों का सामना करती व जवाब देती। स्थितियां हाथ में से रेत की तरह फिसलती चली जा रही थी। बस अब गिनती के चार लोग ही रह गए थे प्रियवंदा के साथ। चुनाव हाथ से निकल चुका था प्रियवंदा के लिए कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। प्रियवंदा आशानुरुप बुरी तरह से पराजित हुई थी। जब वह वापिस घर जाने को मुड़ी तो विजयी प्रत्याशी का विजयी जुलूस  उसके आगे से गुजरा अट्टाहस करते हुए। कुछ मनचले बेहुदा ईशारे कर निकल गए।

प्रियवंदा अपने पुतले को जुलुस में देखकर चौक गई। कुछ गैर जि मेदार लोग प्रियवंदा का पुतला बनाकर जलील कर रहे थे। कभी अलिंगन कर रहे थे कभी उस पुतले को किसी की गोद में कभी किसी की गोद में बैठाकर अश्लीलता की हदें पार कर रहे थे। उसी जुलुस में एक महिला सांसद भी जीप पर सवार थी। उसे महिला होने के नाते यह सब नागवार गुजरा तो उसने इस बेहुदगी को बन्द करने का आग्रह किया परन्तु विजयी नेता नहीं माने। उन्होंने उक्त महिला सांसद से कहा कि यदी उसे नागवार है यह सब तो वह घर चली जाए। वह सांसद जीप से उतरकर घर जाने की ओर मुड़ी और उसके नजरें गाड़ी में बैठी प्रियवंदा की नजरों से मिल गई। प्रियवंदा की आंखे शून्य थी तो उस सांसद की करूणा शून्य कुल मिलाकर शून्य जमा शून्य कुल शून्य ही था। बिना बात किए दोनों अपनी राह चल दी थी। उसे हार का कतई दुख नहीं था क्योंकि उसे तो बस एक योद्धा होना था और योद्धा तो वह हो ही चुकी थी। जिसने अन्तिम सांस तक प्रयास किए थे।

घर पहुंची तो पता चला कि रामेहर मोलकी को एक सप्ताह पहले ही यहां से किसी अनजान शहर ले गया था। उसे भनक लग गई थी कि प्रियवंदा उसे वापिस बंगाल भेज देगी। परन्तु प्रियवंदा का मन नहीं माना उसने मोलकी को खोजने की कोशिश की, पर नाकाम रही। अचानक छह महीने बाद प्रियवंदा को खबर मिली कि मोलकी का पति रामेहर दो दिन पहले ही मर गया है और जलबेहड़ा गांव में उसकी अन्त्येष्टी  की गई है। प्रियवंदा फौरन गांव के लिए निकल पड़ी। रामेहर के घर पहुंचते ही फुलमा बुआ मिली उसी ने बताया कि मोलकी तो काली चुड़ैल थी। छोरे नै खा गी यह तो भला हुआ ग्राम आलैया ने गाम मै न बडऩ देई नहीं तो बैरा न कितने छौरे खा जांदी। रामेहर की मां तो पाछले ह ते ही रामेहर नै गाम मै उठा ल्यायी थी मरणासन्न पडय़ा था रान्ड के धौरे।
मोलकी को रामेहर की मां वहीं शहर में बिलखता छोड़ आई थी जहां वह किसी बनिए के गोदाम के पीछे बने झोंपड़े में रहती थी रामेहर के साथ। प्रियवंदा तुरन्त उस पास के शहर की ओर चल दी। पहुंचकर पता चला कि बनिए ने कुछ दिन अपने घर रोटी दी और फिर एक दिन कुरूक्षेत्र के मेले में उसने फाजिल्का शहर के कश्मीरा सिंह नाम के ट्रक ड्राईवर के हाथ मोलकी को ३० हजार रुपए में बेच दिया। रामेहर के इलाज के लिए मोलकी ने बनिए से पैसे ले लिए थे थोड़े-थोड़े करके। दस हजार की रकम अब ब्याज से तीस हजार बन गई थी। प्रियवंदा कश्मीरा सिंह का पता लगाते-लगाते फाजिल्का ट्रक यूनियन पहुंच गई। पन्द्रह दिनों तक कश्मीरा सिंह के ट्रक का इन्तजार करती रही। आखिकर कश्मीरा सिंह से भेंट हुई तो प्रियवंदा ने मोलकी के बारे में पूछताछ की तो कश्मीरा सिंह बोला बीबी जी किन्हू-किन्हू लबोगे जी ऐत्थे ता दर्जनों मोलकीयां ने जिना दी जवानी ट्रकां ते बीत जांदी है जी, ते बुढापा सडक़ किनारे रूल जांदा है। प्रियवंदा ने याद दिलाया कि वह उस लडक़ी को ढूंढ रही है,  जिसे वह कुरूक्षेत्र मेले से खरीद कर लाया था। कश्मीरा सिंह जोर से हंसा और बोला कि बीबी ओह काली कुड़ी ता अपणे अमली यार बिन्दर वास्ते लै के आया सी सौरे नूं जनानी दा बड़ा चाव सी। मेरे मगर पिया रैंहदा सी। ऊंहनूं तां मैं मुकसर कोल पिन्ड बाजीगरां दे डेरे विच छॅड आया सी। प्रियवंदा को आस बन्धी की मोलकी अब मिल जाएगी।

प्रियवंदा को अंजाम से पहले किसी भी काम को छोडऩा नहीं आता था वह मुक्तसर के रास्ते चल दी और उस बिन्दर अमली के गांव में पहुंच गई। बिन्दर के घर पूछ-पूछ कर पहुंची तो बिन्दर की मां ने बताया कि ओह काली कुड़ी तो पिछले हफ्ते ही न_ गई सारे गहणे ते पैसे लै के। असी ता ओहदी रिपोर्ट वी लिखवाई है। बीबी जी तुहानूं किते मिले ता सानू जरूर दस दैयो असीं उस चुडैल दा मूंह भन्न के और नंगा करके पिन्ड विच घुमा दियांगे। इहो जेही चोरी ठगी करण वालीयां जनानियां तों ता रब ब शे जी। उस दिन पहली बार प्रियवंदा जाने क्यों फूट-फूट कर रोई थी और पांच वर्ष बाद भी प्रियवंदा की आंखे उसी को ढूंढ रही होती हैं, क्योंकि उसे मोलकी के सवालों का जवाब देना है और शायद उन सभी मोलकीयों का , जिन्हें कन्या भ्रूण हत्या जैसे जुर्म ने जन्म दिया है।

जी , ये महिला किसान हैं , हल और ट्रैक्टर चलाती हैं .

रूपा झा

तपती धूप, बरसात में घंटों खेत में काम करती औरतें भारत के किसी भी कोने में दिख जाती हैं. भारत में 80 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं खेतीबाड़ी से जुड़ी हैं लेकिन किसान कहते ही जेहन में पुरुष की ही छवि उभरती है.
पर तस्वीर की पहचान अब बदल रही है. वैशाली जयवंत भालेराव, रिंपी कुमारी और करमजीत अपने गांव में अनोखी हैं,  क्योंकि ये अपने गांव की इकलौती महिला किसान हैं.

[बी बी  सी  हिन्दी  की  पत्रकार रूपा झा मिलीं कुछ उन महिलाओं से जिन्होंने अब खेती किसानी का काम अपनाया है. उनके लिए आसान नहीं रही ये राह. मिलिए तीन महिलाओं से जिनकी परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं, वे ख़ुद भी देश के अलग-अलग हिस्सों में रहती हैं मगर उन्होंने अब खेती-किसानी को अपना लिया है.रूपा झा की रिपोर्ट का विडियो लिंक  और पूरी रिपोर्ट 
कैमरा और एडिटिंग- नेहा शर्मा ]

वैशाली 40 साल की विधवा हैं- दो नौजवान बच्चे हैं. वर्धा के पेठ गांव में पांच एकड़ खेत हैं,  जिसमें वे कपास दलहन और सोयाबीन उगाती हैं.दोपहर की धूप में- खेतों की मेड़ पर खामोशी से चलते हुए वे पत्तों को प्यार से सहलाती हैं, मिट्टी का मुआयना करती हैं.मैं हैरान हूं उनके आत्मविश्वास और खेती के बारे में उनकी समझ देखकर. खेती की बारीकियां वे ऐसे समझाती हैं जैसे शुरू से बस यही किया हो.पर ये सब कुछ नया है- 20 साल की उम्र में जब ब्याह कर वैशाली आई थीं तो ऐसी भूमिका की कल्पना भी नहीं की थी.लेकिन छह साल पहले उनके पति ने फसल बर्बादी और बढ़ते क़र्ज़ के कारण आत्महत्या कर ली.

वैशाली भालेराव अपने बच्चों के साथ

भारत में 18 प्रतिशत ग्रामीण परिवार की मुखिया अब औरतें हैं- वैशाली का परिवार भी उनमें से एक है.
ये ज़्यादातर समय तब होता है जब या तो पुरुष पलायन कर जाते हैं या फिर क़र्ज़ के बोझ से अपनी जान दे देते हैं.अपने बच्चों के साथ वैशालीवैशाली ने तय किया पति की आत्महत्या उनके बच्चों के भविष्य की हत्या नहीं कर सकती- वे जिएंगे, लड़ेंगे और जीतेंगे.वैशाली कहती हैं, “मैं 33-34 साल की थी जब ये दुर्घटना हुई. कोई नहीं चाहता- ज़िंदगी की सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना- खेती का ख्याल करो- घर देखो- लेकिन मुश्किल समय था. मुझे करना ही पड़ा. मैंने खुद से कहा- जो मुझे करना चाहिए वह मुझे करना ही होगा.”

जनगणना के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो दशकों में क़र्ज़ के बोझ और बर्बाद फसल की मार के कारण कम से कम तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है.कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संख्या कम करके आंकी गई है क्योंकि हर मामला पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता है.वैशाली के पति के गुज़रने के बाद उसे ज़मीन का मालिकाना हक़ मिला.क़ानून की नज़र में ज़मीन पर औरतों का बराबर का हक़ है, लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है.

वैशाली भालेराव

वैशाली ने उस एक मौक़े को हाथ से नहीं गंवाया. उसके पास मातम मनाने का भी वक़्त नहीं था.कैसा लगता है इकलौती महिला किसान होना – मेरे इस सवाल पर चेहरा दमक उठता है वैशाली का. वह कहती हैं, “बहुत अच्छा. वीरांगना की तरह ..पहले तो मेरे खेत के मज़दूर ही मुझे किसी क़ाबिल नहीं समझते थे कि ये औरत है क्या खेती करेगी- कैसे बीज का चुनाव करेगी लेकिन फिर धीरे-धीरे मुझे काम आ गया और उनको मुझ पर भरोसा.”गांव में वैशाली की हिम्मत और सूझबूझ की तारीफ़ करते कई मिल जाते हैं. और ये कहते भी कि भई औरतों को खेत का हक़ मिलना चाहिए- वैशाली ने तो अपने पति से बेहतर किसानी की है!वैशाली के पास खेती के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन सैंकड़ों मील दूर राजस्थान के कोटा ज़िले के एक गांव में दो ग़ैर शादीशुदा बहनों ने अपनी इच्छा से खेती शुरू की है.

32 साल की रिंपी और 26 साल की करमजीत जब मोटरसाइकिल पर सवार मेन रोड पर मुझे लेने आईं तो मैं थोड़ा हैरान हुई. छोटी बहन करमजीत चुहल कर कहती हैं, “आप अकेले हमारे घर तो पहुँच नहीं पातीं तो हम आ गए आपको लेने.” ड्राइवर की सीट पर वही बैठी हैं. रिंपी बड़ी हैं, पूरे घर की ज़िम्मेदारी उनके ही कंधों पर है. वे आईटी सेक्टर में काम करती थीं, जिसे छोड़ खेती करना उन्होंने तय किया. छोटी बहन करमजीत उनके साथ लगी रहती हैं.रिंपी कहती हैं, “सात साल पहले जब मेरे पिताजी गुज़र गए तो मैंने तय किया मैं खेती करूंगी. वैसे तो मेरे पास अच्छी नौकरी थी, लेकिन हमारे पास काफ़ी ज़मीन है. मेरे बड़े भाई हैं, लेकिन उन्हें इस काम में उतनी रुचि नहीं है. मेरे फ़ैसले में मेरे भाई औरे मेरी मां ने साथ दिया. बाकियों पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा पर मुझे उसकी परवाह नहीं है.”

ट्रैक्टर चलातीं दो किसान बहनें : रिम्पी और करमजीत

32 एकड़ खेत में खुद ट्रैक्टर चलाती, मज़दूरों को काम बताती, हिसाब-किताब करती, एक-एक फ़ैसले को सूझबूझ से लेती रिंपी को देखकर अच्छा लगा.उनकी उम्र की गांव की बाकी लड़कियां कब का घर बसा चुकी हैं. अपने आंवले, गेहूं और सोयाबीन के खेतों में टलहते हुए रिंपी ने मुझसे कहा, “लड़कियों से और क्या उम्मीद करते हैं लोग- शादी करो, बच्चे करो, घर में रहो. मैं कुछ अलग करना चाहती हूं. शादी मेरे लिए बंधन है. मैं सचमुच अपनी खेती को आगे बढ़ाना चाहती हूं- बहुत आज़ादी से उड़ना चाहती हूं.”

रिंपी की आज़ादी की ख़्वाहिश उस गांव में बहुत पसंद नहीं की जाती.80 साल के सरदार सिंह कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि ये दो बहनें जो कर रही हैं वह ठीक है. उन्हें सही समय में शादी कर अपना घर बसाना चाहिए. खेती भाई करें और बाकी ज़मीन बयाने पर लगा दें. हम अपनी औरतों को बाहर नहीं जाने देते- खेती तो दूर की बात है.”रिंपी को ऐसी नाराज़गी की आदत हो गई है. उन्हें इससे लड़ने की ताक़त अपनी मां सुखदेव कौर से मिलती है.सुखदेव कौरगुलाबी सलवार कमीज और दुपट्टे से सर को ढके सुखदेव कौर बेटियों के नाम पर हुमस कर कहती हैं, “लड़कियों को आज़ादी चाहिए- उड़ना तो वो सीख ही लेती हैं. बस हम उनके पंख न कुतरें. मेरी बेटियों ने दिखा दिया वे बेटों से बढ़कर हैं. मुझे समाज की परवाह नहीं है.”रिंपी अपने पिता से बेहतर कमाई कर रही है- नए खेत खरीद रही हैं और आधुनिक तरीक़े से खेती करने में विश्वास रखती हैं.खेती के तौर-तरीक़े की अब उनको आदत हो गई है पर एक जगह जाना उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता- शहर की मंडी जहां वे अपना अनाज बेचती हैं.हज़ारों टन बोरियों के बीच रिंपी के साथ खड़े होने पर मुझे इसकी वजह का अंदाज़ा हो गया.

रिंपी कहती हैं, ”अब देखिए यहां मेरे अलावा कोई औरत नहीं है. इसीलिए शायद वे इतना घूरते हैं कि मैं यहां क्या कर रही हूं. मैं इसीलिए लड़कियों के कपड़े पहनकर नहीं आती हूं- पैंट कमीज़ में आती हूं ताकि लोग मुझे ज़्यादा न घूरें. लड़कों के कपड़े में लोग मुझे गंभीरता से लेते हैं.”मुझे पता है रिंपी, वैशाली, करमजीत और इनकी तरह की दूसरी औरतों का सफ़र आसान नहीं है, लेकिन इन्होंने तय किया है कि अपने रास्ते तो ये खुद तय करेंगी और हारेंगी नहीं.आज़ाद सशक्त और फ़ैसले लेने का हौसला रखने वाली ये हैं ज़मीन की औरतें- रिंपी और करमजीत ने खेती करने का फैसला लिया – वे धनी परिवार से हैं – पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन वैशाली के पास ऐसे अवसर नहीं थे. पर वो चाहती हैं अपनी बेटी को ये सब कुछ मुहैया कराना ताकि वे अपने फ़ैसले खुद ले. अधिकार के साथ जिए.ये सभी औरतें अपने अंदाज़ में उस परिभाषा का विस्तार कर रही हैं जो गढ़ रही है आधुनिक भारत में ज़मीन से जुड़ी औरतों के नए मायने.

बी बी सी हिन्दी से साभार

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश


( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी आहट  बहुत कम समय में देश की वर्चस्वशाली सांस्कृतिक जमात को सुनाई पड़ रही है और वे बेचैन हैं -अपनी पांचजन्य जैसी पत्रिकाओं में इस घटित हो रही इस सांस्कृतिक क्रान्ति के खिलाफ मुनादी कर रहे हैं. यह सांस्कृतिक आन्दोलन कभी घटित दो सभ्यताओं के टकराव की नीव पर पनप रहा है . इस देश में बड़े पैमाने पर  दुर्गा पूजा का आयोजन होता है  -दुर्गा के लगभग सारे नैरेटिव विजेताओं के द्वारा पराजितों के खिलाफ नैरेटिव है . इस मिथक का काउंटर नैरेटिव एक बड़ा समूह लेकर सामने आया है .  प्रमोद रंजन और रवि प्रकाश महिषासुर शहादत दिवस के रूप में हो रहे देशव्यापी आयोजनों की पड़ताल कर रहे हैं. )


दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने जब 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह दावनल की आग सिद्ध होगा। महज चार सालों में ही  इन आयोजनों ने न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोडऩ पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं। इस साल (2015) देश भर में 300 से ज्यादा स्थानों पर महिषासुर शहादत अथवा महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। यह आयोजन देश की सीमा पार कर नेपाल भी पहुंच गया।  मुख्ययधारा के मी‍डिया की नजरों से दूर, कहीं इसे10-15 उत्साही युवक सांकेतिक रूप से हाथ में तख्तियां लेकर कर रहे हैं, तो कहीं एक से 20 हजार लोगों की भीड़ वाली सभाएं हो रही हैं। इन आयोजनों को देखते हुए यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि भारत की दमित अस्मिताएं इस बहाने अपना अभिनव सांस्कृतिक इतिहास लिख रही हैं।

भारत में जिस दुर्गा पूजा को देवताओं और राक्षसों की लड़ाई बताकर उसे निर्विवाद माना जाता था, वह आज इन आयोजनों के कारण संकट में है। महिषासुर दिवस मनाने वालों का कहना कि वह तो आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी और महिषासुर हम अनार्यों के पुरखा और नायक हैं। आदिवासियों के मिथकीय नायक और देवता रहे महिषासुर को शहीद बताने वाले लोगों में आज ज्यादा संख्या यादव, कुशवाहा, कुम्हार, कुर्मी, निषाद, मांझी, रजक, रविदास आदि वंचित बहुजनों की है।

इन आयोजनों के एक अध्येता के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर दिवस के आयोजकों से बात करना हमारे लिए एक अनूठा अनुभव रहा। इनके पास कहने के लिए ढेर सारी बातें हैं। लेकिन कुछ साझा बातें अनायास ध्यान खींचती हैं। ये सभी आयोजक बताते हैं कि हम ”बचपन से इस विषय में सोचते थे कि दुर्गा की मूर्तियों में जो असुर है, उसका रंग-रूप क्यों हम लोगों जैसा है और क्यों उसे मारने वालों की कद-काठी पहनावा आदि सब उनके जैसा है, जो आज के द्विज हैं’’! बाद में जब उन्होंने अपने स्तर पर विचार किया और खोजबीन की तो आश्चर्यचकित रह गये। उनके आसपास, यहां तक कि कई मामलों में तो अपने घरों में ही मनुज देवा, दैत्येरा, मैकासुर, कारसदेव आदि से संबंधित असुर परंपराएं पहले से ही मौजूद थीं। कुछ आयोजक मानते हैं कि महिषासुर व उनकेगण कोई मिथकीय पात्र नहीं, बल्कि एतिहासिक पात्र हैं, जो उनके कुनबे के रक्षक, प्रतापी राजा अथवा जननायक थे।

सभी आयोजक महिषासुर की ‘पूजा’ का विरोध करते हैं तथा ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का निषेध करते हैं। शायद यही इन आयोजनों की असली ताकत भी है।इन चार सालों में यह एक प्रकार की सांस्कृतिक राजनीति का आयोजन भी बन चुका है। यह न सिर्फ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में हो रहा है बल्कि दूर-दराज के गांव-कस्बों में भी इसकी जबरदस्त चर्चा है। बात सरकारी अमले तक पहुंची है और कई जगहों पर इस उत्सव के दिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाने लगी है।

महिषासुर का एक संबंध भारत की आदिम जनजाति ‘असुर’ की प्राचीन संस्कृति से जुड़ता है, जिनकी कुल संख्या अब देश भर में बमुश्किल 9 हजार बची है। असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं। गुमला के विशुनपुर प्रखंड के सामाजिक कार्यकर्ता अनिल असुर कहते हैं कि ”मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया था। वह हमारे प्रतापी पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं थीं।’’रांची से प्रकाशित ‘जोहार दिशुम खबर’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि, ”महिषासुर को खलनायक बताने वाले लोगों को आदिवासी, पिछडा वर्ग व अन्य वंचित तबकों के बीच उनके नायकत्व को समझना चाहिए।’’पंकज बताते हैं कि ”इस साल (वर्ष 2015 में) देश भर में लगभग 350 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया।’’

महिषासुर दिवस मनाने वाले लोग बताते हैं कि दुर्गा व उनके सहयोगी देवताओं द्वारा महिषासुर की हत्या कर दिये जाने के बाद आश्विन पूर्णिमा को उनके अनुयायियों ने विशाल जनसभा का आयेाजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी समतामूलक संस्कृति को जीवित रखने तथा अपनी खोई संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि विभिन्न स्थानों पर जो आयोजन हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश आश्विन पूर्णिमा वाले दिन ही होते हैं। यह पूर्णिमा दशहरा की दसवीं के ठीक पांच दिन बाद आती है। हालांकि कई जगहों पर यह आयोजन ठीक दुर्गा पूजा के दिन भी होता है तथा कहीं-कहीं आयोजक अपनी सुविधानुसार अन्य तारीखें भी तय कर लेते हैं। कहीं इसे ‘महिषासुर शहादत दिवस’ कहा जाता है तो कहीं ‘महिषासुर स्मरण दिवस’।
आइए, बानगी के तौर पर कुछ चुनिंदा जगहों पर नजर डालते हुए हम इन आयोजनों की तासीर समझने की कोशिश करें। हलांकि रिपोर्ट पूरी करने की समय सीमा के कारण हम इस सूची में क्षेत्रीय विविधता की जरूरत को पूरा नहीं कर पाए हैं। लेकिन यह एक बानगी तो है ही।

1. पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला केकाशीपुर प्रखंड के झालागौडा में महिषासुर शहादत दिवस पर विशाल आयोजन होता है। इस वर्ष यहां इस आयोजन के लिए लगभग 20 हजार लोग जुटे, जिनमें मुख्य रूप से संताल, बावरी, राजहड, महाली आदि आदिवासी जातियों व पिछड़े-दलित तबकों के लोग थे। यहां यह आयोजन चरियन महतो के नेतृत्व में होता है। कुर्मी जाति से आने वाले महतो यह आयोजन न सिर्फ यहां करते हैं, बल्कि उन्होंने कई अन्य स्थानों पर भी इस आयोजन के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया है। वे कहते हैं कि कुर्मी व इस तरह की अन्य अन्न व पशुपालक जातियों की जडें आदिवासी समाज में ही रही हैं, यह कारण है कि हम महिषासुर से गहरा अपनापा महसूस करते हैं। चरियन बताते हैं कि ”हम लोगों ने पहली बार यह आयोजन वर्ष 2011 में दिल्ली के जेएनयू में महिषासुर दिवस मानये जाने की खबर सुनने के बाद किया, लेकिन मेरे मन में यह बात बहुत पहले से थी। वर्ष 1997 में ही मैंने अपने बांग्ला साप्ताहिक नया सूरज में इस संबंध में एक संपादकीय लेख लिखा था।’’वे बताते हैं कि उसका शीर्षक था, ‘मानवता और राष्ट्रीयता विरोधी है दुर्गोत्सव।’इसमें उन्होंने लिखा था कि महिषासुर इस देश के मूल निवासी थे। दुर्गापूजा विदेशी आर्योंद्वारा उनकी हत्या के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। इस प्रकार यह विदेशी आक्रांताओं का गुणगाणन करने का उत्सव है, जो अपने मूल रूप में हमारी राष्ट्रीयता के विरूद्ध है। वर्ष 2010 में उन्होंने अपने इसी विचार को और विस्तार से लिखा, जो पुरूलिया से प्रकाशित जाति संगठन ‘कुर्मी मिलन संगम’के बांग्ला  मुखपत्र ‘अखड़ा’में प्रकाशित हुआ, जिसकी काफी चर्चा हुई। इसे पढ़कर उनके पास स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अजित प्रसाद हेम्ब्रम और शत्रुध्न मुर्मू आए। उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि दुर्गापूजा का विरोध किया जाए। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था। इन लोगों ने तय किया कि वे अपने पूर्वज महिषासुर की याद में कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए दुर्गापूजा के दिन ही महिषासुर शहादत दिवस मनाना शुरू कर दिया। आयोजन के पहले साल भारत सरकार के ज्वाईंट रजिस्ट्रार जनरल स्वप्न विश्वास कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने थे, उसके बाद से बहुजन समाज से आने वाले अनेक बड़े अधिकारी, टेक्नोक्रेट व अन्य प्रभावशाली लोग इस आयोजन में मौजूद रहते हैं।

2. राज्य में विभिन्न जगहों पर हो रहे इन आयोजनों की सारी जानकारियां चरियन की जुबान पर रहती हैं। वे बताते हैं ”वर्ष 2011 में हमारे आयोजन के बाद 2012 में मालदह में भी यह आयोजन शुरू हुआ। 2013 में पश्चिम बंगाल के 24 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया। 2014 में इन आयोजनों की संख्या 74 हो गयी। यह बहुत तेजी से फैल रहा है। इस साल राज्य के 182 स्थानों पर महिषासुर दिवस मनाया गया है।’’

3. पश्चिम बंगाल के 24 परगना (नार्थ) जिला के अशोक नगर थाना क्षेत्र के बीराबांदोपल्ली में इस साल पहली बार महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। यहां आयोजन 20 अक्टूबर को हुआ। आयोजन में लगभग 400 लोग शामिल हुए। इसके आयोजकों में से एक सुरसेनजीत वैरागी बताते हैं कि इस क्षेत्र में दलित अबादी बहुसंख्यक है, जिन्होंने इस आयोजन से काफी उत्साह दिखाया। आयोजन में क्षेत्र के अन्य पिछड़ा वर्ग लोग और मुसलमान भी शामिल हुए। उन्होंने बताया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें आयोजन नहीं करने के लिए एक नोटिस थमा दिया था, लेकिन वे झुके नहीं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के समक्ष सवाल उठाया कि ”किसी को जन्मदिन की पार्टी करने या प्रियजन की मृत्यु पर शोक सभा आयोजित करने के लिए आपसे अनुमति लेने पड़ती है क्या?’’ हार कर पुलिस ने कार्यक्रम में विध्न उत्पन्न नहीं किया। वैरागी कहते हैं कि यह न सिर्फ  हमारे पूर्वजों की हत्या का उत्सव है बल्कि दुर्गापूजा के दौरान जो मूर्तियां बनायी जाती हैं, उनमें मनुष्य की हत्या को दर्शाया जाता है, जिसका बहुत बुरा प्रभाव समाज पर पड़ता है। कोलकाता के सरदिंद बिस्वास के नेतृत्व में भी इस साल महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि इस साल चैबीस परगना नार्थ तथा साउथ, मिदनापुर ईस्ट तथा वेस्ट, बर्धमान, बाकुरा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुडी, कोच्छ विहार, मालदह समेत राज्य के 15 जिलों में दर्जनों जगहों पर शहदत दिवस का आयोजन किया गया है।

4. कोलकाता के शहरी क्षेत्र व कई उपनगरों में भी कई जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन पिछले दो सालों से हो रहा है। इन क्षेत्रों में इसका वाहक बना है समुद्र बिस्वास के संपादन में निकलने वाला बांग्ला पाक्षिक ‘निर्भीक संवाद’। समुद्र बताते हैं कि वे अपने अखबार में इन आयोजनों की तैयारी, इस दौरान होने वाले संभाषण आदि की रिपोर्ट को निरंतर प्रकाशित करते हैं। आयोजन की अवधारणा के पक्ष में कई लेख भी इसमें छपे हैं, जिससे वंचित तबकों में इसके प्रति तेजी से जागरूकता आयी है। समुद्र बिस्वास एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘जनमन’ भी निकालते हैं तथा उन्होंने ‘दुर्गा पूजा आंतरू’ (दुर्गा पूजा की अंदरूनी कथा) शीर्षक से बांग्ला में एक किताब भी लिखी है, जिसमें दुर्गा और महिषासुर की कथा की बहुजन व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस किताब का विमोचन वर्ष 2014 में कोलकता पुस्तक मेला में किया गया था। बिस्वास बताते हैं कि बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला के कालचीनी में 1985 से ही असुर दिवस मनाया जाता रहा है। वर्ष 2011 में दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद से इसने ऐसा बंगालव्यापी स्वरूप ग्रहण कर लिया है कि इस बार आनंद बाजार जैसे दुर्गा पूजा के घनघोर समर्थक अखबार को भी इसके सामने झुकना पड़ा। उसने इस साल इस आयोजन के संबंध में सकरात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।

5.उत्तर प्रदेश के देवरिया के निकट डुमरी में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका के प्रधान संपादक चंद्रभूषण सिंह यादव व लखनऊ में इसी पत्रिका के संपादक राजवीर सिंह के निर्देशन में महिषासुर शहादत दिवस का अयोजन किया जाता है। ‘यादव शक्ति’ ने इस साल 26 अक्टूबर को यह दिवस मनाया, जिसमें वंचित समुदायों के बुद्धिजीवियों ने सांस्कृतिक आजादी की जरूरत पर बल देते हुए अपनी बातें रखीं। इन आयोजनों में शामिल होने वाले लोग बताते हैं कि प्रदेश में कई अन्य जगहों पर भी पिछले दो सालों से यह आयोजन निरंतर हो रहा है।
6. झारखंड के धनबाद जिले के निरसा प्रखंड के मुगमा में भी 2012 के बाद से हर साल महिषासुर को स्मरण किया जा रहा है। इस साल यहां एक नवंबर को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए बहुजन समाज पार्टी के नेता डा रामाशीष राम ने कहा कि ”महिषासुर बहुजनों के महानायक थे। बहुजनों की एकजुटता जरूरी है ताकि हम अपने इतिहास का पुनर्पाठ कर सकें । मनुवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास पर हमारा भरोसा नहीं है।’’संगोष्ठी में करीब 100 लोग शामिल हुए। इनमें ज्यादातर संख्या अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों की थी।

7. झारखंड के गिरिडीह जिला में भी अनेक जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। जिला में इन आयोजनों को वरिष्ठ अधिवक्ता दामोदर गोप का नेतृत्व प्राप्त है। गोप बताते हैं कि वे वर्षों तक सीपीआई (एमएल) के सदस्य रहे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि ”उच्च जातियों के दवाब में कम्युनिस्ट पार्टियां बहुजनों को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाए रखना चाहती हैं।’’वे सवाल उठाते हैं कि ”क्या एक मनुष्य के रूप में सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान हमारे लिए काफी है? सांस्कृतिक गौरव के सारे सुख क्यों सिर्फ उच्च जातियों के लिए हैं?’’गोप का मानना है कि ”सांस्कृतिक और सामाजिक आजादी के बिना सिर्फ आर्थिक लड़ाईयों की बात करना एक छलावा मात्र है। आर्थिक रूप से भी वही समाज समृद्ध हो पाता है, तथा अपनी समृद्धि को लंबे समय तक बरकार रख सकता है, जिसकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक जडें हों।’’इसी जिला के धनवार प्रखंडमें महिषासुर दिवस का आयोजन अरविंद पासवान करते हैं। धनवार में इस साल 24 अक्टूबर को इसका आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि अगले साल से आश्विन पूर्णिमा को गिरीडीह और आसपास के जिलों में और बडे पैमाने पर महिषासुर स्मरण दिवस मनाया जाएगा। झारखंड प्रदेश असुर संघ बनाकर राज्य स्तरीय असुर सम्मेलन करने की भी तैयारी चल रही है।

8. बिहार के मुजफ्फरपुर के सिंकंदरपुर कुंडल में इस साल 26 अक्टूबर (आश्विन पूर्णिमा) को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न कॉलेजों के लगभग 100 छात्र मौजूद थे। यहां एकलव्य सेना के कार्यकर्ताओं ने इस आयोजन का संचालन किया, जिसके कर्ताधर्ता नरेश कुमार सहनी हैं। इस आयोजन से पहले एकलव्य सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने दशहरा के दिन जिलाधिकारी के आवास के सामने खुदीराम स्मारक पर ‘काला दिवस’ मनाकर दलित-पिछड़े लोगों से अपील की कि वे अपने पूर्वज की हत्या के जश्न में शामिल न हों। नरेश कुमार सहनी बताते हैं कि ”मैं बचपन से ही सोचता था कि अगर कथित देवताओं की वंशावलियां हैं तो जरूर असुरों की भी तो वंशावली होगी। आखिर उनके वंशज आज कौन हैं? बाद में दिल्ली  से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस में छपे लेख की जानकारी मुझे हुई तो लगा कि और भी लोग मेरी तरह ही सोच रहे हैं। उस लेख ने मुझे अपनी बात कहने की ताकत दी।’’वे  बताते हैं कि ”हम निषादों (मल्लाहों) की एक उपजाति है – महिषी। यह निषादों की वह उपजाति है जो पशुपालन करती है। महिषासुर हम मल्लाहों के पूर्वज थे।”साथ ही, वे स्वयं ही जोड़ते हैं कि ”महिषासुर जिस काल में रहे होंगे, उस समय जाति व्यवस्था इस रूप में नहीं रही होगी, इसलिए उनकी जाति नहीं निर्धारित की जा सकती। यादव व अन्य जातियां भी उन्हें अपना पूर्वज मानती हैं। सभी अपने जगह सही हैं।’’

9. मुजफ्फपुर के भगवानपुर में भी महिषासुर महोत्सव मनाया। इसके संचालन का जिम्मा उठाया हीरा यादव ने। यह पूछने पर कि क्या विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, वे बताते हैं कि ”पहले विरोध होता था। 2011 में जब यह आयोजन शुरू हुआ तो घर के लोगों ने ही विरोध किया। उनका मानना था कि दुर्गा हिंदुओं की देवी हैं। उनके खिलाफ  आयोजन क्यों? लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि वह कोई धर्मयुद्ध नहीं था। वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी। इसलिए, यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसका हिन्दू धर्म से कोई वास्ता या सरोकार नहीं। ब्राह्मण जाति सभी हिंदुओं का पर्याय नहीं है।’’

10. मुजफ्फपुर जिला के ही मीनापुर प्रखंड के छितरा गांव में वर्ष 2014 में महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी। लेकिन इस वर्ष बिना मूर्ति के ही महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। दरअसल, जैसे-जैसे इस संबंध में मूर्ति पूजा की विरोधी रही आदिवासी मूल की परंपराओं की जानकारी सामने आ रही है, लोग महिषासुर की मूर्ति बनाने को गलत मानने लगे हैं। इसकी जगह इन कार्यक्रमों में प्राय: अपने पूर्वज के रूप में महिषासुर का सिर्फ चित्र लगाया जाता है तथा संभाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। छितरा गांव में हुए आयोजन में आसपास के गांवों के लगभग 1500 लोगों ने भाग लिया। आयोजन में बहुजन जातियों द्वारा पारंपरिक तौर पर गाये जाने वाले गीतों का गायन किया गया तथा जनपक्षधर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये।

11. बिहार के मधेपुरा निवासी, पेशे से शिक्षक हरेराम मूलत: एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी टीम के निर्देशन में एक स्कूल के मैदान में 26 अक्टूबर, 2015को महिषासुर महोत्सव मनाया। इस आयोजन में करीब 150 लोग शामिल हुए। विचार गोष्ठी हुई लेकिन किसी अखबार ने इस खबर को छापना मुनासिब नहीं समझा। हरेराम बताते हैं कि उन्होंने आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति और तस्वीरें सभी अखबारों को दी थीं। लेकिन, न तो कोइ पत्रकार इसे कवर करने आया और न कहीं यह खबर छप सकी। बकौल हरेराम भगत, बिहार विधानसभा के चुनाव की गहमागहमी कारण उनके यहां ज्यादा भीड़ नहीं हो सकी। उन्हें करीब 1000 लोगों के आने की उम्मीद थी। वे कहते हैं कि ”इस क्षेत्र में पहले बामसेफ  के संस्थापक कांशीराम जी का आंदोलन चलता था। इस कारण महिषासुर महोत्सव के लिए लोगों को कनविंश करने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।’’

12. बिहार के नवादा में भी 2012 से महिषासुर शहादत दिवस मनाया जा रहा है। वर्ष 2014 यहां भी महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी, तथा भारी जन जुटान हुआ था। कार्यक्रम के आयोजक रामफल पंडित, एडवोकेट जयराम प्रसाद, उमेश सिंह, सुमन सौरभ और रामस्वरूप मांझी बताते हैं कि इस क्षेत्र में इस आयोजन ने व्यापक समाजिक आलोडऩ पैदा किया है। लोग महसूस करने लगे हैं कि हमें आर्थिक और सामाजिक आजादी तभी मिल सकती है, जब हम अपने ऊपर लादी गयी ब्राह्मणवादी संस्कृति के जुए को उतार फेंके। उनका मानना है कि ”इन आयोजनों के कारण राजनीतिक जागृति भी आयी है।’’

13. बिहार के गंगा पार शहर हाजीपुर से लगभग 16 किलोमीटर दूर भगवानपुर अट्टा में एक नवंबर को महिषासुर के स्मरण के लिए एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1000 लोगों ने शिरकत की, जिसमें बडी संख्या महिलाओं की थी। आयोजक थे – राष्ट्रीय मूल निवासी संघ तथा सत्यशोधक विचार मंच। दो सत्रों में विभाजित यह आयोजन दिन के 12 बजे से रात के 2 बजे तक चला। पहले सत्र का विषय था, ‘महिषासुर कौन, हत्या क्यों, हत्या की जानकारी वंशजों को है या नहीं, और हत्या की जानकारी नहीं होने का परिणाम’, दूसरे सत्र का विषय था, ‘हमारे देश के शास्त्ऱों में में आर्य-अनार्य, देव-दानव, सुर-असुर, सवर्ण-अवर्ण, आदि संघर्षों का विवरण है, तत्कालीन अनार्य, दानव, असुर, अवर्ण कौन थे, तथा उनका संघर्ष तथा छल-कपट से उनकी पराजय के बाद उनके वंशजों की किस रूप में पहचान।’ इन लंबे-चौड़े विषयों पर देश भर से आये सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी राय खूब विस्तार से रखी, जिसका स्वागत वहां मौजूद लोग तालियों की गडग़ड़ाहट से करते रहे। इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में, यादव जाति से आने वाले राष्ट्रीय सत्यशोधक मंच के संयोजक शिवाजी राय, भील आदिवासी समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय मूल निवासी संघ के अध्यक्ष ताराराम मेहना तथा दलित समुदाय से आने वाले बामसेफ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. देशराज ने विस्तार से अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुशवाहा जाति से आने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कुशवाहा ने कहा कि ”मनुवादी व्यवस्था ने देवियों के रूप महिलाओं का दुरूपयोग किया है, इसलिए इन देवियों को अपना आदर्श बनाया जाना गलत है। महिलाओं के सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि उसे पुरूषों के तेज से उत्पन्न बताया जाए। उन्होंने कहा कि आज की महिलाओं को सच्चे सशक्तिकरण और अपमानजनक प्रलोभनों के बीच फर्क करना चाहिए तथा उन सामाजिक शक्तियों के साथ खड़ा होना चाहिए, जो न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।” उदयन राय ने इस अवसर पर कहा कि ”संसद और अदालत के माध्यम से हमें अपने पूर्वजों हत्याओं के विभिन्न जश्नों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए।” आयोजन को दिलीप पाल, महावीर दास सिसोदिया, राजनारायण गुप्ता, विनोद कुमार, कुमारी बेबी, कुमारी प्रार्थना, तनीषा, महेंद्र राय, हास्य कवि गया प्रसाद, सत्येंद्र पासवान, पारसनाथ रजक आदि ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय नेता सुबोध राय ने की तथा संचालन जिवलेश्वर प्रसाद ने किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार के पटना में अधिवक्ता मनीष रंजन, पत्रकार नवल किशोर कुमार, राकेश यादव, सुपौल में अभिनंदन कुमार, सीवान में रामनरेश राम, प्रदीप यादव, पूर्वी चंपारण में बिरेंद्र गुप्ता, पश्चिमी चंपारण में रघुनाथ महतो, शिवहर में चंद्रिका साहू, सीतमाढ़ी में रामश्रेष्ठ राय और गोपाल गंज के थावे मंदिर के महंथ राधाकृष्ण दास महिषासुर की गाथा को शहादत/स्मरण दिवस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कोशांबी के जुगवा में एनबी सिंह पटेल और अशोक वर्धन हर साल एक बडा आयोजन करते हैं। पिछले वर्ष इन लोगों ने अपने गांव का नाम बदलकर ‘जुगवा महिषासुर’ करने व वहां इस आशय का बोर्ड लगाने की घोषणा की थी। मिर्जापुर में कमल पटेल और सुरेंद्र यादव, इलाहाबाद में लड्डू सिंह व राममनोहर प्रजापति, बांदा में मोहित वर्मा, बनारस में कृष्ण पाल, अरविंद गौड और रिपुसूदन साहू इस आयोजन के कर्ताधर्ता हैं। कर्नाटक के मैसूर, तेलांगना के हैदराबाद, मध्यप्रदेश के बालाघाट के मोरारी मोहल्ला और उड़ीसा के कई शहरों में भी महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। बंगाल के पुरूलिया में स्वप्न कुमार घोष तथा उड़ीसा के कालाहांडी में नारायण बागार्थी के नेतृत्व में इस आयोजन पिछले साल मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं थीं। भारत के अतिरिक्त नेपाल में भी कुछ जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने की सूचनाएं हैं, लेकिन वहां के आयोजकों से हम समयाभाव के कारण संपर्क नहीं कर सके।

प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। रविप्रकाशमल्टीमीडिया पत्रकार हैं। फिलहाल बीबीसी हिंदी और दूरदर्शन के लिए नियमित असाइनमेंट । वे प्रभात खबर, देवघर के स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, कोलकाता के संपादकीय प्रभारी, दैनिक भास्कर, रांची के डिप्टी एडिटर और आई नेक्सट के रांची, पटना, आगरा और जमशेदपुर संस्करणों के संपादक रह चुके हैं . संपर्क : janvikalp@gmail.com 


फारवर्ड प्रेस के दिसंबर, 2015 अंक में प्रकाशित