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दुनिया के मजदूर-मजदूरनें एक हों…

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

मार्क्स  की सौंवीं बरसी पर अमेरिका में हुए सेमिनार में, कैथराइन ए. मैकनिनन ने मार्क्सवाद और नारीवादी चेतना के वैचारिक पक्षों का सकारात्मक विश्लेषण करते हुए कहा- ‘कोई भी वास्तविक नारीवाद प्रकृति के रूप में उत्तर मार्क्सवादी नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ यह भी सचाई है कि दैनंदिनी जीवन के बारे में लैंगिक विभाजन को समझे बिना चर्चा नहीं कर सकते। वर्चस्व का मर्म समझने के लिए हमें उसके मुख्य रूप, पुरुष प्रभुत्व को समझना होगा। यौनिकता का नारीवाद के लिए वही महत्व है जो श्रम का  मार्क्सवाद के लिए। (पूँजीवाद श्रम का मूल्य हड़प लेता है, इसलिए  मार्क्सवाद उसकी आलोचना करता है। यौनिकता को स्त्री से छीने जाने के खिलाफ नारीवाद विचारक आवाज उठाता है)…. वर्ग श्रम की सामाजिक संरचना होती है, उत्पादनकारी प्रक्रिया होती है और पूँजी उसका संक्रेद्रित रूप है। नियंत्रण इस पूरे कार्यव्यापार का केन्द्रीय मुद्दा है जिसके लिए संघर्ष होता है।…नारीवाद में इसी का समानांतर तर्क निहित है।… यौनिकता समाज को दो भागों में बाँटकर संगठित करती है। एक भाग स्त्रियों का दूसरा भाग पुरुष का।… यौन विभाजन उसकी सामाजिक प्रक्रिया का नाम है। परिवर्तन उसका जमा हुआ संक्रेद्रित रूप है। यौन भूमिका इसका गुण है जो दो सामाजिक व्यक्तियों में सामान्यीकृत हो जाती है और अंत में प्रजनन या पुनरुत्पादन उसके परिणाम के रूप में सामने आता है।’


मैकनिनन का यह वक्तव्य एक ऐसा बिन्दु है जहाँ से मार्क्सवाद  और नारीवाद के संबंधों को एक नया आयाम मिलता है। नारीवाद पर देहवादी विमर्श का आरोप लगाते हुए सिद्धांतशास्त्री (और मार्क्सवादी) अक्सर यह भूल जाते हैं कि प्रजनन से पूर्व पुरुष को स्त्री के साथ सहवास करना पड़ता है यहाँ स्त्री और पुरुष के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा बन जाता है जिस प्रकार पूँजी और श्रम के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा होता है। मार्क्सवादी सिद्धांतों में ‘मूल्य’ का जो स्थान है वही नारीवाद में ‘कामना’ का है। जिस प्रकार श्रम समाज की रचना में भूमिका निभाता है उसी प्रकार कामना यौनिकता की रचना करते हुए समाज की संरचना करती है। इस प्रकार यौनिकता के प्रश्नों, संशयों को उठाए बिना नारीवाद पर चर्चा नहीं हो सकती। मार्क्स ने स्त्री प्रश्नों को यथासमय उठाया किन्तु उन्हें कोई नई दिशा देने का माहौल मार्क्सवाद  के भीतर नहीं मिला। यहाँ हमें मार्क्सवाद  और नारीवादी प्रश्नों की सही पड़ताल करने के लिए अतीत में जाकर झाँकने और विश्लेषण की जरूरत है।

श्रम और वर्ग चेतना जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों के साथ ही  मार्क्सवादी स्त्रियों द्वारा लिंगभेद के प्रश्नों को उठाया गया। यहाँ नारी मुक्ति के प्रति संवेदनात्मक दृष्टिकोण रखनेवाले पुरुषों ने भी उनका साथ दिया। वर्षों आंदोलनों के भीतर आंदोलन सक्रिय होने के कारण उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में मार्क्सवादी पार्टियों और उनके सिद्धांतकारों ने यौन विभाजन को मान्यता देना शुरू किया। यहाँ यौन विभाजन को केवल मान्यता मिली। उसका कोई विकास नहीं हुआ। मार्क्सवाद  ने नारी प्रश्नों को लेकर अपने सिद्धांतों को उलटने- पलटने का, उन्हें पुनव्र्यवस्थित करने का काम नहीं किया। स्त्री प्रश्नों पर मार्क्सवाद  यहीं रुका रहा। हाँ बल्कि स्त्री आंदोलन की संभावना को बेहद गुपचुप तरीके से रोक दिया गया। यहाँ कामरेडों के भीतर सहस्त्राब्दियों से जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता स्त्री प्रश्नों को कई दशकों तक हाशिए पर धकेलती रही।  मार्क्सवादी  आंदोलनों में, धरना-प्रदर्शनों, जुलूसों में साथ दे रही स्त्री घर की दहलीज पर कदम रखते ही कामरेड पुरुष को पूँजीपति में बदला पाती। घर के भीतर स्त्री एक श्रमिक थी। यौन विभाजन को झेलने के लिए मजबूर क्योंकि मार्क्सवाद के सिद्धांतों में घर के भीतर क्रांति की सैद्धांतिकी का अभाव था।

स्त्री को लेकर मार्क्स की इच्छा थी कि वह श्रम करे। यदि वह श्रम (घर से बाहर) करेंगी तो नियंत्रित होने वाली शक्ति से बदलकर नियंत्रणकारी शक्ति बन जाएगी। परिवार संस्था का पुनर्निमाण भी होगा और स्त्री संबंधों को भी एक नया धरातल मिलेगा। मार्क्स के विचारों से प्रभावित होकर कई महिलाएँ क्रांति के मैदान में उतरीं। नए संबंधों की व्याख्या करनी चाही। यहाँ क्या महसूस किया? इस संदर्भ में फ्रांसीसी महिला ज्याँ डेरियन का प्रसंग जरूरी है- डेरियन अपने पुरुष साथियों के साथ बिखरी हुई मजदूर यूनियनों को इक_ाकर महासंघ बनाने की योजना पर काम कर रही थीं। वे ‘द ओलीनियम डेम फेम्मे’ नारीवाद पत्र में नियमित स्तंभ भी लिखा करती थीं। एक दिन पुलिस ने यूनियन के अन्य साथियों समेत उन्हें पकड़ लिया। मुकदमे से पहले वकील जो, उनसे मिलने आया ने जो कहा, वह चौका देनेवाला था। वकील के अनुसार- ‘वे महासंघ बनाने में अपनी भूमिका का उल्लेख न करे अन्यथा यूनियनों को एकसूत्र में पिरोने की योजना को अधिकारियों की स्वीकृति नहीं मिल पाएगी, क्योंकि वे एक नारीवादी हैं।’ यहाँ व्यवहार में मार्क्सवाद के भीतर, नारीवाद होना अश्पृश्य होने जैसा था। पुरुष के मुकाबले स्त्री के सामाजिक, वर्गीय योगदान पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह। यह घटना मजदूर, क्रांति के भीतर स्त्री को अपनी असली जगह दिखा देने के लिए पर्याप्त थी। डेरियन ने सच के साथ समझौता इसलिए किया कि मजदूर महासंघ की योजना साकार हो सके। इस घटना के बाद पेरिस कम्यून में महिला योद्धाओं के अनुभव भी आंदोलनों के भीतर लैंगिक भेदभाव से भरेपूरे रहे। इन महिला योद्धाओं के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा स्वयं कार्लमार्क्स ने की थी। कम्यून में करीब आठ सौ स्त्रियाँ हथियार बंद होकर घर से निकलीं। इन्होंने क्रांति के लिए ही जीवित रहने का संकल्प लिया। और तमाम रोड़ों को पारकर, शत्रुओं का निडरता के साथ सामना किया। तत्कालीन क्रांतिकारी और पत्रकार आंद्रेलुई लिखती हैं कि- इन महिलाओं का संघर्ष दोतरफा था। एक ओर वे वर्साई के शत्रुओं से लड़ रही थीं दूसरी ओर अपनी ही कतारों के पुरुषों की मानसिकता से। इस आंदोलन के बाद भी वही हुआ। जिस क्रांति ने उन्हें निष्क्रियता के बाहर निकाला, उद्देश्य पूरा हो जाने पर क्रांतिकारी कतारों का यौन विभाजन, उनकी अधीनस्थ भूमिका पर शब्दाघात करता रहा। ये प्रहार उनकी उभरती भूमिका के लिए हमेशा घातक सिद्ध हुए हैं। इसीलिए क्रांतियाँ सार्विक मुक्ति का दावा करने के बाद भी पुरुष केन्द्रित रह जाती हैं और आधे-अधूरे प्रयास की बाहक भी। तेलंगाना में पेरिस कम्यून के लगभग 175 वर्ष बाद चंद्र राजेश्वर राव ने एक स्त्री संगठन की आधारशिला रखी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं निजाम के रजाकारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का ऐलान कर दिया। तेलंगाना की इस क्रांति में मल्लू स्वराजमन और ब्रजरानी जेसी महिलाओं ने मिशाल कायम की थी। लेकिन इसके बाद भी लिंगभेद की शिकार हुईं और पुरुषों की बराबरी का दर्जा पाने में असमर्थ रहीं। राजेश्वर राव ने स्वयं स्वीकार किया कि- ‘जब स्त्रियाँ आईं तो हमने उन्हें हाथोंहाथ लिया लेकिन हमने उन्हें आगे बढऩे हेतु प्रेरित करने के लिए कुछ नहीं किया। इन महिलाओं के साथ यदि सहयोग किया जाता, पार्टी के दरवाजे उनके लिए खोले जाते तो निश्चित उनके कार्यों का फायदा पार्टी और विचारधारा दोनों को मिलता। इसके करीब पचास साल बाद शायद 1994-95 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की सदस्य वृंदा करात ने अचानक अध्यक्ष मंडल को कमेटी से अपना इस्तीफा सौंप दिया। वे पार्टी के भीतर लगातार स्त्रियों की उपेक्षा, विशेषकर पार्टी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने से असंतोष में थीं। हालाँकि इस घटना को तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने सँभाल लिया।’

ये घटनाएँ चाहे, ज्यां डेरियन की हों या पेरिस कम्यून या तेलंगाना संघर्ष या वृंदा करात के इस्तीफे की इनमें समानता है। ये वे क्रांतिकारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने समाज के हित, कमजोर वर्ग के शोषण के खिलाफ लडऩे का साहस दिखाया। इन्होंने ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के साथ ही ‘दुनिया की मजदूरिनें एक हो’ का नारा दिया और संगठनों के सामने प्रस्ताव रखा कि मार्क्सवाद, शोषण और दमन की वर्गीय परिभाषा में लैंगिक दमन को भी शामिल करे। स्वयं मार्क्स ने सर्वहारा स्त्री के शोषण के प्रश्नों को उठाया। उन्हें क्रांति में सम्मिलित किया। फिर प्रश्न उठता है कि नारीवाद की जरूरत क्या है? या क्यों पड़ी? कि स्त्री के उठाए गए प्रश्नों को अलग -थलग कर दिया गया। मार्क्सवाद स्त्री को किस वर्ग में रखेगा? शोषक या शोषित, तो क्या कोख के भीतर मार दी जानेवाली कन्या शिशु, दहेज के लिए जला देनेवाली सामंत परिवारों की स्त्रियाँ, खाप पंचायतों द्वारा खुलेआम कत्ल हो रही प्रेम करनेवाली सवर्ण स्त्री, मार्क्सवाद के अध्ययन का विषय नहीं हैं?

इन जैसे प्रश्नों से जूझती, मार्क्स के शोषण नियामक विचारों से प्रभावित स्त्रियों जैसे ज्यां डेरियन, मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट, सीमोन, एलक्जेंडा कोलंताई, क्लारा जेटकिन, ओलाइव श्राइनर, (ये स्त्रियाँ वैचारिक व सांगठनिक रूप से मार्क्सवादी क्रांतिकारी हैं) ने एक लंबी लड़ाई, संगठनों के भीतर लड़ते रहने के बाद अंतत: खुद को स्त्री हितों के लिए नारीवादी स्वीकार किया। सीमोन ने एक लंबे समय बाद अंतत: स्वीकार किया कि वे नारीवादी हैं।

इसका एक दूसरा पहलू कि इन स्त्रियों के साथ और हजारों स्त्रियों ने मार्क्सवाद के भीतर कि वह लैंगिक संघर्ष के प्रति संवेदनशील बने, क्रांति पुरुषकेन्द्रित होकर ना रह जाए, लंबे समय तक संघर्ष किया। इस प्रयास में पुरुष मार्क्सवादी सिद्धांतकारों बेबेल, एडवर्ड कारपेंटर, विलियम मारिस, हैवलॉक और स्वयं मार्क्स व लेनिन ने भी वैचारिक संरचना प्रस्तुत करने में मदद की। इनके वैचारिक प्रयासों ने मार्क्सवाद के भीतर एकता और संघर्ष को जीवित रखा। सर्वहारा के प्रश्नों को लेकर लड़ी गई लड़ाईयों में स्त्रियों ने बार-बार अपनी भूमिका निभाई, किन्तु उनके सहयोग को भुना लेने के बाद पुरुषकेन्द्रित नेतृत्व ने उन्हें खारिज किया और वापस दहलीज के भीतर लौट जाने का निर्देश दिया। यदि मार्क्सवाद का सर्तक अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट होगा कि उसके बुनियादी अस्तित्व में ही समाजवाद और नारीवाद के परस्पर संबंध की संभावनाएँ निहित हैं। यद्यपि ध्यान देने की बात है कि मार्क्सवाद स्त्री शोषण खत्म होने के लिए साम्यवाद का इंतजार करने को कहता है। दूसरी तरफ उसका संकेत क्रांति की ओर जाता है कि बगैर क्रांति बदलाव संभव नहीं।। तो क्या साम्यवाद आने पर मुक्ति स्त्रियों को उपहार की तरह मिल जाएगी? लगभग यही धारणा उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक चरण तक प्रसिद्ध नारीवादियों विलियम थाम्पसन, मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, फ्लोरा टिस्टन, अन्ना विलहर आदि ने बना रखी थी। इस धारणा को तोडऩे में बेवेल की पुस्तक ‘वूमेन एण्ड सोशलिज्म’ ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। एंगेल्स और बेवेल के विचारों ने नारीवाद की मृत देह में हिम्मत जगाई। इस पुस्तक का ही प्रभाव था कि 1891 में जर्मनी की राजनैतिक पार्टियों में स्त्रियों की समानता को स्वीकृति मिली। बेवेल ने स्त्रियों को आगाह किया कि- ‘जिस तरह मजदूरों को पूँजीपतियों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए उसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की तरफ कोई आशा नहीं बाँधनी चाहिए।’ बेवेल का कथन स्पष्ट करता है कि पूँजीपतियों की भाँति पुरुष (कामरेड पुरुष भी) स्त्री के दमन और शोषण की अनुभूति के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि माक्र्सवाद सिद्धांतकार यौनिकता, प्रजाति और वर्गभेद के अंतर्विरोधों को हल करने के बजाय उन्हें छिपा देते हैं। यह प्रक्रिया नए समाज की रचना में अवरोधक की भूमिका निभाती है। जबकि माक्र्स ने स्त्री की प्रगति को सामाजिक प्रगति का सूचकांक माना है। स्त्री की प्रगति को समूचे समाज की प्रगति मानते हुए भी उन्होंने यौन उत्पीडऩ को अपने अध्ययन का विषय नहीं बनाया। माक्र्स का पूरा ध्यान श्रम और पूँजी पर ही केन्द्रित रहा। उत्पीडऩ के प्रश्नों को हल किए बिना स्त्री विषय पर आगे नहीं जाया जा सकता। स्त्री वर्गसीमा से परे केवल श्रमिक है, शोषित है, उत्पादनकर्ता है और यौन शोषण उसका अहम पहलू। वह दोतरफा शोषण की शिकार है-पहला कि, उसके श्रम का, घरेलू श्रम का कोई मूल्य निश्चित नहीं। दूसरा, यौनिक विभाजन और शोषण उसकी उत्पीडऩा का कारण है। माक्र्सवाद ने इन प्रश्नों को टटोला, सुलझाया नहीं बल्कि आगे जाकर दरकिनार किया जिसका परिणाम नारीवाद का जन्म है।

नारीवाद भी प्राण वायु मार्क्सवाद में निहित है, यह सत्य है कि वह मार्क्स के चिंतन से पल्लवित, फलित है कि, मार्क्स के चिंतन ने मानव इतिहास और समाज के सभी पहलुओं का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया जिस आधारशिला ने आगे बढक़र श्रम, शोषण, लिंगभेद, वर्णभेद से जुड़ी क्रांति की अवधारणाओं को स्पष्ट परिभाषाएँ दीं। बेवेल के विचारों को और खोलने का काम एंगेल्स की पुस्तक ‘परिवार, निजी-संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ करती है। इस पुस्तक में उन्होंने रोजगार को स्त्रियों की मुक्ति का प्रस्थान बिन्दु बताया। एंगेल्स ने कहा कि वे (स्त्रियाँ) सार्वजनिक उद्यम में आएं। इसके पूर्व 1845 में ‘इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा’ पुस्तक में एंगेल्स ने स्त्री मजदूरों की दयनीय स्थिति से संवेदित होकर रोजगार को औरतों से, उनके औरतपन के छीने जाने का कारण बताया था। जिसे सुधारकर उन्होंने माना कि श्रम (घरेलू श्रम के अलावा) की दुनिया में कूदकर ही स्त्री अपने आपको और अपने शोषणों को पहचान करेगी। आज नारीवाद की अवधारणा को देहवाद कहकर नाक-भौं सिकोडऩे वाले, वर्गीय क्रांति में स्त्री यौनिकता के प्रश्नों को आड़े मानने वाले, मार्क्स की प्रतिस्थापनाओं पर ध्यान दे। मार्क्स ने अपने अध्ययनों में, जैसे ‘इकोनोमिक एण्ड फिलोसोफिकल मैन्यूस्क्रिप्ट’, ‘जर्मन आइडियोलाजी’, ‘हॉली फैमिली’ से लेकर ‘दास कैपिटल’ तक लगातार स्त्री मुक्ति को श्रम से जोड़ा और कहा कि उत्पादन में स्त्री के जुडऩे से तीन बड़े परिवर्तन होंगे। पहला, पुरुष और स्त्री के संबंध उच्चतर स्तर पर पहुँचेंगे, दूसरा-एक नए तरीके से परिवार का जन्म होगा और तीसरा- श्रमिक स्त्री का अपने बाह्य जगत पर नियंत्रण स्थापित होगा। साथ ही मार्क्स की स्थापनाओं से स्पष्ट होता है कि वे उत्पादन के सामाजिक संबंधों के साथ ही प्रजनन के सामाजिक संबंधों के बदलने से उत्पन्न शोषणमुक्त समाज की तस्वीर पेश करना चाहते हैं। मार्क्स और एंगेल्स के साथ ही स्त्री अधिकारों के प्रश्नों के संदर्भ में अगस्त बेवेल की वैचारिकी, कार्यप्रणाली और उनके लेखन का विशेष योगदान है। उनकी पुस्तक नारी और समाजवाद ने फर्दीनांद लॉसाल के प्रतिगामी विचारों को पनपने से रोका। उन्होंने स्वयं भी सामने आकर लॉसाल पंथियों के पूर्वाग्रहों का विरोध किया। वे (लासालपंथियों) रूसो-अरस्तु और उनके समर्थकों की तरह औरतों को जन्मजात ही पुरुषों से हीन मानते थे। वे उनके किन्हीं भी राजनैतिक-सामाजिक अधिकारों के विरुद्ध थे। जिसका बेवेल, बेल्हेम और उनके समर्थकों ने पार्टी के भीतर ही संघर्ष करके पराजित किया। आज नारीवादियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए भी पार्टी और यूनियनों के भीतर ऐसे विरोधों की जरूरत है। बेवल के समय में जो स्थिति जर्मनी में अत: वैचारिक टकराव की थी वही स्थिति उसी समय में यूरोप और अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टियों में भी थी। यह समय रूस में समाजवादी क्रांति का था जिसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा। लेनिन ने इसी समय तीसरे कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की घोषणा के साथ ही ‘अंतरराष्ट्रीय महिला आयोग’ के कार्यों का प्रारूप भी पेश किया। इस प्रारूप के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि, लेनिन ने महिलाओं की गुलामी को समाप्त करने के लिए, कम्युनिस्टों को नारी आंदोलन को सर्वहारा के वर्ग-संघर्ष और क्रांति के साथ जोडऩे की जरूरत पर बल दिया था।

लेनिन ने यह भी कहा कि-‘हमारी विचारधारात्मक अवधारणाओं से ही हमारे सांगठनिक विचार पैदा होते हैं। हम कम्युनिस्ट महिलाओं का कोई अलग संगठन नहीं चाहते, महिला कम्यूनिस्ट को पुरुष कम्यूनिस्ट की तरह ही पार्टी के अधिकार व कर्तव्य हासिल है।’ साथ ही लेनिन ने वर्किंग ग्रुप, आयोगों, समूहों, कमेटियों के रूप में पार्टी के अलग अंग बनाने की जरूरत पर भी जोर डाला था ताकि वे स्वतंत्र रूप से स्त्री सर्वहारा के हितों पर ध्यान दे सकें। जिस समय लेनिन अपने विचार रख रहे थे उस समय रूस में भी पार्टी और यूनियनों में महिलाओं की संस्था बहुत कम थी। साथ ही उनके विचारों का पार्टी के भीतर के शुद्धतावादी पुरुषों ने विरोध किया। ध्यान देने की बात है कि लेनिन ने यहाँ कामगार, किसान महिलाओं के साथ ही वे महिलाएँ जो संपत्ति रखती हैं यानी उच्चवर्ग की महिलाओं को भी शामिल किया। मेरी एलाइस की पुस्तक ‘फेमीनिज्म एण्ड द मार्कसिस्ट मूवमेन्ट’ में लेनिन के कार्यों की सराहना की गई है। उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में कामगार महिलाओं के जन आंदोलन को सक्रिय करने की जरूरत पर बल दिया। साथ ही सारी दुनिया में समाजवादी नारी आंदोलन को विकसित किया जाय इस हक में क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कांगे्रस को बुलाने के प्रस्ताव को भी समर्थन दिया। तीसरी कांग्रेस में महिलाओं के विषय में एक प्रस्ताव, पास किया गया- ‘महिलाओं के बीच प्रचार कार्य की थिसिस’ जिसमें कहा गया कि यदि कम्यूनिस्ट क्रांति के पक्ष में महिलाओं  को लामबंद नहीं कर पाते तो प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ उन्हें क्रांति के विरुद्ध संगठित करने की कोशिश करेगी। यहाँ महिलाओं को इक_ा करने के कई प्रस्ताव भी पेश किए गए थे। चौथी कांग्रेस अधिवेशन 1922 में, तीसरी कांग्रेस के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। लेनिन से पूर्व मार्क्स ने भी ‘अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ’ की स्थापना के समय स्त्री प्रश्नों के समाधान की जरूरतों को समझते हुए उसकी महिला शाखा की स्थापना की पेशकश की थीं और ब्रिटेन की मजदूर नेता हेनरिश लॉ को संघ का सदस्य बनाया था।

इन प्रयासों में एक नाम एंलेक्जेन्द्रा कोलोन्ताई का और आता है जिसने अपने नारीवादी विचारों को मार्क्सवादी विचारधारा और क्रांति से जोडक़र हमेशा देखा। वे पहली महिला थी जो 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत सरकार में समाज कल्याण मंत्री बनी। उन्होंने स्त्रियों के पक्ष में विवाह के भीतर के भीतर कानूनी स्वतंत्रता व समानता, गर्भपात का कानूनी अधिकार एवं समान वेतन के सिद्धांत को सोवियत सरकार में लागू करवाया। उन्होंने मातृत्व के प्रश्न को स्त्री की इच्छा पर निर्भर होने एवं मातृत्व की जिम्मेदारी समाज की जिम्मेदारी है, जैसे प्रश्नों और परिवर्तनों की बात उठाई। मार्क्सवादी नारीवाद दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर देते हुए कोलोन्ताई ने कहा कि सिर्फ आर्थिक ढाँचा बदल जाने से सांस्कृतिक अधिकार में स्वत: कोई परिवर्तन नहीं आएगा।

इस प्रकार देखा जाय तो मार्क्सवाद के पास नारीवादी प्रश्नों को उठाने और क्रांति में सहयोग देने की पूरी विरासत मौजूद है। इसका सकारात्मक पक्ष था कि रूस में पृथक साम्यवादी सत्ता स्थापित होने पर लेनिन ने इन प्रश्नों को सुलझाने की पहल की जो, पूर्व नारीवादियों ने उठाए थे जिन्हें माक्र्स का भी समर्थन प्राप्त था। यह सच है कि माक्र्सवादी विचारधारा के पास ही ऐसी अंतर्दृष्टि है जो स्त्री प्रश्नों पर सुनियोजित काम करने में सहयोगी होगी। क्योंकि स्त्री के उत्पीडऩ का मामला इतना विसंगतियों से भरपूर है कि उसका उपाय सरल और तात्कालिक नहीं हो सकता। अन्य सामाजिक समस्याओं के साथ-साथ, विशेषकर, मजदूर, किसानों, दलितों, आदिवासियों के प्रश्नों के साथ-साथ वैचारिक प्रतिबद्धताओं के आइने में शनै: शनै: प्रश्नों से जूझने की आवश्यकता महसूस करता है। केवल मार्क्सवाद ही वह धरातल हो सकता है जो क्रांति (सामाजिक एवं ऐतिहासिक) के बीज को पनपने का अनुकूल माहौल बनाता है। यह मानव इतिहास और समाज का व्यापक विश्लेषण करनेवाली विचारधारा है। लेकिन, जैसा कि पूरे विश्लेषण में जरूरत महसूस की गई कि आज के मार्क्सवाद के भीतर वह माहौल बनाने की आवश्यकता है जहाँ, क्रांति के बीज फलफूल सके। पुनर्विचार की आवश्यकता है यहाँ ताकि संगठन शक्तियाँ और सुदृढ़ हों।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद मिश्र के बारे में जनसत्ता में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें खास बात थी कि वे मृत्यु से पहले, अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के बदलते चरित्र के बरक्स नई ‘दास कैपिटल’ लिखने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। यह जरूरत वाजिब भी है किन्तु यही नेतागण विचारधारा में स्त्री प्रश्नों को शामिल करने, पुनर्विचार करने, का आहवान कभी नहीं करते बल्कि ठोस जमीन पर टिके स्त्री प्रश्नों को हाशिए में धकेलने के लिए उस पर प्रति वैचारिकी का आरोप मढ़ देते हैं। स्त्री प्रश्नों को विचारधारा और क्रांति की संभावनाओं के लिए साजिश के रूप में देखते हैं, ऐसी परिस्थितियों में क्या आश्चर्य कि नारीवादियों ने अपनी ढपली अपने राग अलापे। प्रारंभ में ही मैकनिन के वक्तव्य को उठाया गया था जो, स्वस्थ प्रयासों और नारीवाद को समझने की संभावनाओं का वाहक हो सकता है। विनोद मिश्र की तरह ही आज दास कैपिटल के साथ ही मार्क्सवाद के भीतर स्त्री प्रश्नों के लिए पर्याप्त स्पेस और ‘नए घोषणा पत्र’ की भी जरूरत है जो बदलती पूँजी के छल-छद्म, उपनिवेशवादी चरित्र के साथ-साथ यौन विभाजन की तमाम विसंगतियों को अपने खाके में शामिल करे जिसने दुनिया की आधी आबादी को दरकिनार किया है। प्रतिक्रांति की आशंका स्त्री प्रश्नों को हासिए पर धकेले जाने से उभरती है ना कि उन्हें शामिल कर पुनर्विचार की संभावनाओं को खुला आसमान मुहैया कराने से।

उग्रतारा: प्रेम-क्षेत्र में वैध -अवैध की निरर्थकता

मनीषा झा  

शोध छात्रा,
हिंदी एवं भारतीय भाषा विभाग,हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, संपर्क :manisha2012cuh@gmail.com

प्रेम का सवाल उठते ही समाज के कान खड़े हो जाते हैं और दृष्टि चैकन्नी। समाज में लाखों तरह के अनैतिक कार्यों की बैधता-अबैधता पर प्रश्नचिह्न लगे या न लगे, सामाजिक रूप से अनैतिक से अनैतिक व्यक्ति भी आपको प्रेम की वैधता- अवैधता पर घंटों प्रवचन देता मिल जाएगा। प्रेम के प्रति समाज के मठाधीशों का यह घृणित रवैया प्रेम को पल्लवित-पुष्पित ही नहीं होने देता। फलस्वरूप अधिकांश प्रेम की भ्रूण हत्या हो जाती है और इस तरह प्रेम विहीन समाज में मार-काट और हिंसा का होना लाजिमी है।प्रेम तो प्रकृति प्रदत्त और मनुष्य अर्जित अद्भुत विलक्षणताओं में एक है और प्रत्येक वयक्ति का नैसर्गिक-मौलिक अधिकार भी। जो समाज जितना प्रेम विरोधी होगा वह उतना ही अविकसित, क्रूर, और भयानक होगा। प्रेम के मामले में साहित्य और संस्कृतिकर्मियों के द्वारा जो जो राह बताए हैं, उसका अनुसरण कर हम एक स्वस्थ और प्रेमिल समाज का निर्माण कर सकते हैं।

हिंदी साहित्य में नागार्जुन की पहचान यद्यपि एक कवि के रूप में प्रख्यात है किंतु उनके उपन्यास उनकी कविता से थोड़ा भी कमतर नहीं हैं। कठिनाई यह हुई कि हिंदी में चूंकि अधिकांश आलोचक कविता के आलोचक हुए इसलिए नागार्जुन ही नहीं कई अच्छे उपन्यासों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। नागार्जुन का प्रत्येक उपन्यास अपने समय और समाज की चुनौतियों से बेखौफ मुठभेड़ करतास्त्री विरोधी तमाम संहिताओं, आस्थाओं, मान्यताआ,ें और परंपराओं पर बज्र की तरह गिरता है।  स्त्रियों के लिए थोड़ी सी ही सही किंतु निर्विघ्न और सर्वथा निश्चिंत जगह की तलाश करता, अपनी मर्जी और अपनी ईच्छा से प्रेम पाने और प्रेम देने की अकुलाहट से लैस।उनका एक उपन्यास है उग्रतारा,जो हिंदी साहित्य में सर्वथा अचर्चित ही रह गया। रचनाकाल को देखते हुएकथावस्तु की नवीनता तथा स्त्री विमर्श की दृष्टि से यह उपन्यास हिंदी उपन्यास परंपरा में सर्वथा एक नया अध्याय जोड़ता है। उग्रतारा में नागार्जुन की प्रेम दृष्टि अद्भुत ही नहीं थी बल्कि समय से बहुत आगे और क्रांतिकारी थी। उनके एक उपन्यास ‘उग्रतारा’के हवाले हम उनकी अद्भुत प्रेम दृष्टि को समझने का प्रयास करेंगे। नागार्जुन ने स्वीकार किया है कि उग्रतारा की आरंभिक कहानी समाज से ली गई सच्ची कहानी है और आधी कहानी कल्पना के सहारे लिखी गई है।

उग्रतारा की कहानी कुछ इस प्रकार है। एक ब्राह्मण विधवा थी- उगनी। वह खूबसूरत भी बला की थी। एक नौजवान था राजपूत, वह भी सुंदर था, अविवाहित था।गांव में उन लोगों में आपस में स्नेह हो गया। यह पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गया। लोगों ने कहा कि ‘साला बड़ा रंगबाज है, इसकी टांग तोड़ दो।’ उपन्यास में भाभी नाम की एक पा़त्र है। बहुत निर्भीक और बोल्ड। इस मामले में वह बहुत साहसिक कदम उठाती है। उसने दोनों को समझाया और कहा कि ‘देखो हम तुमको सौ रूपये देते हैं, तुम गांव छोड़ दो। यहां तो कभी तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा नहीं। ज्यादा नहीं पांच-सात साल के लिए गांव छोड़ दो। जो लोग तत्काल विरोध कर रहे हैं, वो भी ठंडा पड़ जायेंगे।’ तो वे गांव छोड़कर निकल पड़े। पुलिसवाले गांव वाले से कौन कम थे। देखा एक लड़का और एक लड़की स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं, यहां से वहां। उनकी लाड़़ टपकने लगी। लगे उसे पाकिस्तानी सिद्ध करने। गिरफ्तारी के लिए कोई प्रबल कारण चाहिए। जिस धर्मशाला में वह रहता है, सोते समय उसकी चादर के नीचे उर्दू का एक अखबार डाल दिया जाता है और शोर मचाया जाता  है कि पाकिस्तानी है। अंततः वह गिरफ्तार हो जाता है। लड़का चिल्लाकर कहे किवह कामेश्वर सिंह है, कोई मानने को तैयार ही नहीं। लड़की को बदजनी में कि इसके साथ भागी हंै ये बदचलन है। इस तरह दोनों को गिरफ्तार कर लिया।  और अलग अलग जेल में डाल दिया। जेल में  एक हवलदार हैं भभीखन सिंह, उसकी शादी नहीं हुई थी। पचपन साल उम्र थी उनकी। जेल से निकलने के बाद कथा नायिका उगनी के पास कोई विकल्प नहीं था। अपने को दरिदों से बचाने के लिए उसने भभीखन सिंह से शादी कर लीं। कुछ वर्ष बाद एक मेले में अचानक उसकी मुलाकात कामेश्वर सिंह से हो जाती है। लेकिन वह कामेश्वर सिंह के साथ जाना नहीं चाहती है। उगनी रोती हुई कहती है, ‘‘कि अब मैं तुम्हारे काम की नहीं रही। पेट में गर्भ आ गया है। अब तुम हमको भूल जाओ। यह कहकर सिर झुका लेती है वो।

इस पर कामेश्वर सिंह जो स्टैंड लेता है, वह प्रेम का अद्भुत अर्जिस्वित रूप है। वगैर समय गंवाए फौरन कामेश्वर बोलता है, ‘‘ तुम तो हमारे काम की हमेशा रहोगी। जिस मतलब से तुम काम की बात कर रही हो वही काम काम नहीं होता। शरीर सुख पहुंचाने वाली बात सकेंडरी होती है। काम की तो बराबर रहोगी तुम। अपने मन से यह बात निकाल दो। साहस का संचार हुआ उगनी में। कामेश्वर ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘तुमको हम निकालेंगे यहां से , चाहे जैसे भी हो।महीना साल जो भी लगे, फिर अपना नए ढंग से जीवन शुरु करेंगे और तुम्हारे अंदर जो जीव आ गया है, जिसका भी है, समय पर उसी का नाम हम दर्ज करवायेंगे, समय पाकर हम उसको बुलवायेंगे।’’ प्रेम के इस रूप के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए ।

जहां समाज मेें दुर्भाग्यवश बलत्कृत होते ही स्त्री की जिंदगी को समाप्त माना जाता है। और इस विषाक्त मानसिकता की वजह से या तो वह आत्महत्या कर लेती है या पूरी जिंदगी अपराध बोध में गुजारती है, इस उपन्यास  में प्रेम के आगे इसका मूल्य दो कौड़ी का भी नहीं माना गया  है। जिस समाज में किसी स्त्री का किसी के साथ संबंध का पता चलते ही भूचाल मच जाता है। संबंध की बैधता-अबैधता पर चर्चा होने लगती है। उसे परित्यक्ता की जिंदगी बिताने के लिए विवश  किया जाता है। यह उपन्यास इस बात की वकालत करता है कि संबंध संबंध होता है, वह बैध या  अबैध नहीं होता। इस उपन्यास में आप देखें कि किस तरह प्रेम के आगे देह को कितना अनावश्यक माना गया है।

यात्री ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां केवल प्रेम हो,घृणा नहीं।  वैध -अवैध  का अनावश्यक विवाद नहीं। इस संदर्भ में नागार्जुन अपने एक साक्षात्कार में एक अत्यंत रोचक किंतु मार्मिक घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं, ‘‘मुझे जापान का संदर्भ याद आता है। जापान में जब लड़कियां नौकरी करने लगीं तो इस प्रकार के कांड संभावित हुए। जापान सरकार ने तब गर्भपात को वैध कर दिया। अब अपने यहां करे सरकार?ये सब घोंचू लोग बैठै हैं, सरकार में। एक ही बहादुर मिला। बड़े दिल का आदमी है। फौज से रिटायर होकर आया था। हमको कहा कि कल हमारी नाती जो है उसका एक वर्ष पूरा होता है, खुशी में चाय पिलायेंगे। ये नाती अबैध है। उसने आगे बतलाया कि जिसने वायदा किया था शादी का वो भाग गया अमेरिका, तब पांच महीने का गर्भ था। उस समय वो स्कूल में पढ़ाती थी। स्कूल वालों ने निकाल दिया। मां बनने के लिए मर्टिनिटी में यह होता है कि पिता की जगह किसी का नाम होता है तो उसके नाना जो होते थे, उन्होंने इंकार कर दिया तो इस रिटायर फौजी चतुर्वेदी ने कहा- मैं नाना हूं। मैं जिम्मा लेता हूं इसका मैं इसका नाना हूं। नाम नोट करो मेरा। अब वह लड़का साल भर का हो गया है। हमको कुल लिखित-अलिखित साहित्य में यह अनोखी घटना लगी।’’

आलोचक सुरेश सलिल के अनुसार, ‘‘उग्रतारा मंे नागार्जुन ने स्त्री के अंतर्द्वंद्व  को अत्यंत सजग कवि-चेतना से उभारा है। एक तरफ है कामेश्वर, उगनी के सपनों का साकार रूप और दूसरी तरफ है उसके बाप की उम्र का एक सीधा-साधा पुलिस हवलदार, जिसका गर्भ, नियति की विडंबना से, उसके पेट में पल रहा है।‘‘ उपन्यास के अंत में उगनी भभीखन सिंह के नाम एक मार्मिक पत्र लिखती हैं। और वस्तुतः यह पत्र ही उग्रतारा का ‘क्लाइमेक्स’ है, जिससे नागार्जुन के रचनाकार के सामाजिक धरातल का पता चलता है। उस पत्र में उगनी भभीखन को ‘आदरणीय सिपाही जी’ के रूप में संबोधित करके  लिखती है, ‘‘ मेरे अपराधों को आप कभी माफ नहीं करेंगे, यह मैं अच्छी तरह जानती हूं…आपकी संतान समय पर बाहर आएगी। असाढ़ में उसका जन्म जरूर होगा। आप रत्ती भर चिंता न करें। मैं उसको कहीं फेंक नहीं आऊंगी। पाल पोसकर उसे सयाना बनाऊंगी। …बड़ा होगा, तो मैं खुद ही उसे आपके पास भेजूंगी। अपने पिता से मिल आएगा। आप विश्वास रखें सिपाही जी। आपकी छाया में आठ महीने रही हूं। मन ही मन आपको पिता और चाचा मानती रही हूं और आगे भी मानती रहूंगी। मैं मजबूर थी, इसी से आपको धोखा दिया। सिपाही जी, आप मुझे सारा जीवन याद रहेंगे।’’ यह है नागार्जुन की स्त्री दृष्टि जहां धोखा भी निष्पाप हो जाता है और तथाकथित अवैध संबंध भी निष्कलुष और वैध ।
अगर प्रेम में वैध -अवैध को नागार्जुन के प्रतिमान पर आंके तो भारत की अनेक स्त्रियां गर्भपात करवाने से बच जायेंगी साथ ही उन्हें आत्महत्या करने की नौबत भी नहीं आयेगी। यदि ऐसा संभव होता तो नागार्जुन के अन्य उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ की नायिका गौरी को अपनी जान जोखिम में डालकर न तो गर्भपात करवाना पड़ता और न ही ‘पारो’ उपन्यास  की पारो की असमय मृत्यु होती।

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

सुजाता पारमिता

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) के संघर्षो पर आज भारतीय स्त्री संगठनों में चर्चा की जा रही है। लगभग डेढ़ सौ साल पहले सावित्री बाई फुले ने सभी पितृसत्ता और स्त्री विरोधी मान्यताओं को ध्वस्त कर स्त्री मुक्ति की जो परिभाषा रची वह सदियों तक सम्मानित की जाती रहेगी। तमाम भारतीय दलित महिला आंदोलन के साथ-साथ डाॅ0 अम्बेडकर के लिए भी सावित्री बाई का संघर्ष उनका मार्गदर्शक  रहा है।
अपने खेत में आम के पेड़ तले जब ज्योतिबा ने उसी पेड़ की एक टहनी से दो कलम बनाकर सावित्रीबाई और अपनी मौसेरी बहन सगुणा बाई को देकर उसी जमीन पर पहला अक्षर लिखने को कहा तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि वे भारत में स्त्री शिक्षा की नींव रख रहे है। जब सावित्रीबाई ने उसी आम की टहनी से बनी कलम से जमीन पर पहला अक्षर लिखा तब वे भी कहा जान पायी होंगी कि वे एक अक्षर नहीं बल्कि नया इतिहास लिख रही है।

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सावित्रीबाई ने स्वयं अपनी शिक्षा  भी तमाम संघर्षो के बाद पूरी की। उस समय पुणे जैसे ब्राहमणवादी मान्यताओं में पूरी तरह जकड़े  शहर में एक पिछड़े वर्ग की स्त्री का शिक्षा हासिल करना लगभग असंभव ही था। 1940 में पुणे में छबीलदास हवेली स्थित ब्रिटिश  महिला मिसेज मिशेल द्वारा विशेष रूप से लड़कियों के लिए खोले गये नार्मल स्कूल में उन दोनों ने पढ़ाई शुरू की। सावित्रीबाई को पढ़ने का बहुत शौक था। उन्होंने उसी दौरान प्रसिद्ध अफ्रीकी अमेरिकन की लेखक टार्मस क्लार्कसन की जीवनी को पढ़ा, जिसका उनपर गहरा प्रभाव पड़ा। इसी किताब से उन्हें अमेरिका में बसे अफ्रीकी गुलामों के जीवन और संघर्षो की जानकारी मिली, जो भारत में दलितों और स्त्रियों  के गुलाम जीवन को समझने में सहायक साबित हुई। यह जानते सावित्रीबाई को देर नहीं लगी कि शिक्षा ही गुलामी की जंजीरे तोड़ सकती है। टामर्स क्लार्कसन भी दुनिया भर में अपनी बात प्रभावी रूप से इसी लिए पहुंचा पाये क्योंकि वे शिक्षित थे।

फुले दंपत्ति ने एक जनवरी 1848 में पुणे की भिड़ेवाडी में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल से सावित्री बाई और सगुणाबाई ने अध्यापन का काम शुरू कर भारत की पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव हासिल किया। फुले दंपत्ति यह अच्छी तरह से जानते थे कि शिक्षा ही विकास के रास्ते खोल न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  शिक्षित स्त्री पुरूष ही संघर्ष को दिशा  दे सकते है। स्त्री के साथ ही दलितों के लिए भी  शिक्षा जरूरी है। इसी को ध्यान में रखकर 15 मई 1848 को उन्होंने पुणे की एक दलित बस्ती में स्कूल खोला, जहां दलित लड़के लड़कियां पढ़ने लगे। इस स्कूल में पढ़ाने के लिए जब कोई अध्यापक नहीं मिला तब सावित्री बाई और सगुणा बाई ने वहां भी पढ़ाना शुरू किया। गरीब , दलित और स्त्री की मुफ्त शिक्षा के लिए फुले दम्पति की प्रतिबद्धता इतनी अधिक थी कि  एक जनवरी १८४८ से १५ मार्च १८५२ तक मात्र चार वर्षों में उन्होंने  पुणे और उसके आस -पास १८ स्कूल खोले।  सामाजिक और आर्थिक , सभी मुश्किल हालात से लड़ते हुए उन्होंने अपने इस मिशन को जीवन भर जारी रखा।

सावित्री बाई और ज्योतिबा ने शूद्रो अति शूद्रो के अलावा अल्प संख्यक वर्ग के स्त्री पुरूषों की शिक्षा को भी जरूरी माना और फातिमा शेख जो उनके ही स्कूल की छात्रा थी, उसे अपने एक स्कूल मंे अध्यापिका बनाकर देश  की पहली मुसलमान अध्यापिका होने का गौरव प्रदान किया। फातिमा शेख फुले दंपत्ति के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण स्त्री नेतृत्व के रूप में जानी जाती है। परिवर्तन और सामाजिक न्याय में धर्मनिरपेक्ष सोच का भी शामिल होना जरूरी है यह लड़ाई तभी सफल होगी जब सभी जाति और धर्म की स्त्री शिक्षित होगी। जब तक जिंदा रही सावित्री बाई इसी विचार के साथ मजबूती से जुड़ी रही और इसके लिए बराबर स्त्री विरोधी ताकतों से लड़ती रही।

आजादी के 68 सालों बाद और शिक्षा के अधिकार को सभी भारतीयों के बुनियादी हक के रूप में स्वीकारे जाने के बावजूद भी दलित, आदिवासी, पिछड़ी और अल्पसंख्यक वर्गो की महिलाओं की शिक्षा में भारी कमी है। आज लगभग 68 प्रतिशत दलित महिला अशिक्षित है, जो हर क्षेत्र में पिछड़ी है। दलित आदिवासी पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिला की पंचायत से संसद तक में भागीदारी की जरूरत है, जो बड़े संघर्ष के बगैर संभव नहीं। महिला आरक्षण बिल पर विवाद अभी भी जारी है। अभी हाल ही भाजपा शासित राजस्थान और हरियाणा सरकार ने एक प्रस्ताव पारित कर केवल मैट्रिक पास स्त्री पुरूषों को ही चुनाव लड़ने की इजाजत दी है। अशिक्षित इस प्रक्रिया में चुनाव लड़ने से वंचित हो गये है। न केवल राजस्थान और हरियाणा सरकार बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी जमीनी सच्चाई को अनदेखा कर देश  के करोड़ों नागरिक वर्ग के साथ अन्याय किया है।
देश भर में तेजी से उभरते उग्र हिन्दुत्ववादी विचारधारा का दायरा आज निस्संदेह बढ़ा है, लेकिन फुले अम्बेडकरवादी चिंतन भारतीय प्रगतिशील दलित और महिला आंदोलन में सभी जगह प्रमुखता से मौजूद है, उसका नेतृत्व कर रहा है. इस पर  गंभीर चर्चा भी हो रही है और उसका विस्तार मुख्य धारा के संघर्ष और विमर्श में हो रहा है।  सावित्रीबाई के संघर्ष , उनका स्त्रीवादी चिंतन स्त्री संघर्षों के लिए अब और आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
( सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक तथा साहित्यकार हैं . संपर्क : sujataparmita@yahoo.com )

स्त्री मुक्ति की नेत्री सावित्रीबाई फुले

रजनी तिलक 
साल का पहला सप्ताह पूरे देश में धूमधाम से उत्साह के साथ मनाया जाता  रहा है. नये साल के साथ नये सकल्प लिए जाते है पुराने संकल्पों का मूल्यांकन किया जाता है . महिलाओ की जिन्दगी और उनके संघर्षो का बिगुल बजानेवाली अनेक विदूषी महिलाओ में सावित्रीबाई फुले नाम अग्रणीय  है. सावित्रीबाई का जन्म महराष्ट्र के पिछड़े समाज में ऐसे समय में हुआ जब स्त्रियों एवं अछूतों के लिए शिक्षा और सम्पति सवर्था वर्जित थी सत्ता सभी स्त्रोतों से उन्हें  बाहर रखा गया था. पुरोहितों और ब्राह्मण  धर्म की दुहाई दे कर पवित्रता के नाम पर अंधविश्वास फैला रहे थे. बाल विवाह प्राय हर समाज की परम्परा थी. पांच छः वर्ष की उम्रमें लड़की की शादी कर दी जाती थी.

3 जनवरी 1831 को महारष्ट्र के नायगाव में पैदा हुई सावित्रीबाई फुले की शादी 1840में, 9 वर्ष की छोटी उम्र में 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुई.सावित्रीबाई जब ससुराल आई तब वे अशिक्षित थी और ज्योतिबा फुले मिशनरीज स्कूल में शिक्षा पाए हुए थे. सावित्रीबाई ने  अपने पति  के सहयोग से 1841 में  मराठी और अंग्रेजी पढना लिखना सिखा और अभ्यास किया. पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी मिसेज मिचेल जो स्त्री शिक्षा की हिमायती थी , के सानिध्य में सावित्रीबाई फुले 1846-47 में नार्मल स्कूल से शिक्षिका का प्रशिक्षण ले कर वे ब्रिटिश भारत में पहली प्रशिक्षित शिक्षिका बनी. अपने अदम्य साहस से अपने पति के साथ कंधे से कन्धा मिला कर  उन्होंने पुरोहितो और धर्मशास्त्रों  के विरुद्ध जा कर स्त्रियों और शूद्रों के लिए शिक्षा की ज्योति जलाई. फुले दम्पति ने  बालिकाओ के लिए पहला स्कूल 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवारपेठ में खोला जिसकी वे प्राचार्य बनी.  चारो तरफ तहलका मच गया सावित्रीबाई फुले का राह  में चलना दूभर कर दिया. सावित्री पर राह चलते लोग कीचड़ – पत्थरों की बौछार करते क्योंकि  तत्कालीन समय में स्त्री शिक्षा धर्माचरण के विरुद्ध थी. 15 मार्च 1848 उन्होंने महारवाडा में जा कर सहशिक्षा विद्यालय शुरू किया.

स्त्री शिक्षा और शूद्रो की शिक्षा के साथ साथ उन्होंने महिलाओ के दमन प्रताड़ना बहिष्करण की जड़ो को तलाश कर उसका खुलासा किया. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर ब्राह्मणवाद और उनके अस्त्र धर्मशास्त्रों को इसका कारण माना अत: उन्होंने न केवल ब्राह्मणवाद का प्रतिकार किया बल्कि उसमे व्याप्त पितृसत्ता की घोर आलोचना की.  महिलाओं के मान को बरक़रार रखने के लिये महिलाओ और शूद्र  के बीच जन चेंतना व जन- आंदोलनों का सूत्रपात किया. उनके विद्यालय में पढ  कर निकली एक छात्रा मुक्ताबाई जो मांग समाज की थी ने शूद्र और शूद्र स्त्रियों के दमन पर बहुत ही मार्मिक लेख लिखा जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज है. वे अछूत और उनकी महिलाओ पर  ढाए गये जुल्मो की दास्तान का साक्ष्य है.

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री सिक्षा की माग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस  में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष चल रहा था , भारत में शूद्रों – अतिशूद्रों  और स्त्रियों के लिए शिक्षा की नीव रख कर सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने  नए युग का सूत्रपात किया. समाज में दबे कुचले  लोगो को शिक्षा देने व उनके अधिकारों की पैरवी करने के कारण 1849 उनेह अपना घर छोड़ना पड़ा. उसी समय उन्होंने  पुना, सतारा, अहमदनगर जिले में 18 पाठशाला खोली. 1 मई 1852 शुद्रो के लिए वेतालपेठ में  विद्यालय खोला जिसकी भूरी भूरी प्रशंसा 29 मई 1852 के समाचार पुणे ऑब्जर्वर में की गयी

13 जनवरी 1852  को उन्होंने  सभी समाज की महिलाओ के साथ मीटिग रख कर मकरसंक्राति बनाने की पेशकश की और साथ में यह बात भी रखी की सभी स्त्रियों को एक तरह का आसन  मुहैया कार्य जाएगा बिना किसी जाति या पक्ष भेदभाव रहित.  तिल गुड कार्यक्रम में सैकड़ो महिलाए आई. महिलाओ को सावर्जनिक जीवन में जाति भेदभाव के बावजूद उनेह एकसाथ लाने का उनका प्रयास अतुलनीय था. 28 जनवरी 1863 से उन्होंने बाल विधवाओ हेतु शेल्टर खोलने प्राम्भ किये . बाल विधवाओ के रिश्तेदारों द्वारा  उन्हें  को फुसला कर उनके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाकर उन पर अनचाहे गर्भ से लाद दिया, जिसके परिणामस्वरूप शरम से वे आत्म हत्या करने हेतु मजबूर होती या प्रसव बाद बच्चे की हत्या करवा दी जाती. ठीक उसी तरह उन्होंने विधवाओं के मुंडन का विरोध किया. नाई समाज के पुरुषो के साथ बैठक करके इस कृत्य को न करने का अनुरोध किया व आन्दोलन चलाया.

सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर सत्यशोधक समाज की स्थपना की. जिसका उद्देश्य था सांस्कृतिक  कार्यक्रमों द्वारा समाज में बदलाव लाना.  सत्यशोधक के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पाखंडवाद की  पोल खोली, सादा समारोह करके सामूहिक विवाह भी कराये. फुले दम्पति  ने अपने मित्रो के साथ मिल कर स्त्रियों की सुरक्षा आर्थिक सामाजिक , राजनीतिक  व  जीवन के सभी क्षत्रो में बराबरी दिलाने के किये शिक्षा से ले कर समाज के धरातल पर खड़े हो कर उनके लिए अनुकूल वातावरण बनाने हेतु सभ्य समाज से गुजारिश की. सती-पुरुष समानता हेतु स्त्रीवादी विचारों को महत्व दिया . छुआछूत की भयावह बीमारी ने शूद्रों  और अतिशूद्रों  के जीवन कष्टमय बना दिया था सन 1868 में  पीने  के पानी के लिए सवर्ण स्त्रियों से चिरोरी करती अछूत औरतो हेतु उन्होंने अपने घर का तालाब खोल दिया जिसके लिए  उसके ससुर  ने उन्हें   खूब डाटा. 1873 में विधवा के पुत्र को गोद ले लिया और उसका पालन-पोषण स्वयं किया.

1876-77 महाराष्ट्र में अकाल पड़ा भुखमरी के इस आलम में बच्चे बूढ़े हजारो की संख्या में मर रहे थे, सत्यशोधक समाज के माध्यम से  पुणे के भीतरी गांवो में वे स्वयं  देखभाल कर रही थी. 2000 से भी ज्यादा निराश्रित बच्चो के खाने पीने की व्यवस्था,  52 भोजन केंद्र व अन्य सुविधा केन्द्रों की स्थापना की. 20  अप्रैल 1877 को ज्योतिबा को पत्र लिख कर उन्होंने गावो की अन्दुरुनी स्थिति की जानकारी दी. 1890 में अपने पति ज्योतिबा के देहांत के बाद किर्या कर्म  पर उठे विवाद के पश्चात उन्होंने स्वयं अपने पति को मुखाग्नि दी. तत्पश्चात 1891 -1897 सत्यशोधक समाज का बखूबी नेतृत्व सम्भाला .. 1885 में  ब्लैकआन्दोलन के नेता टामसन क्लर्क की जीवनी अंग्रेजी में पढ़ी जिससे उनको अछूत और महिलाओ की मुक्ति हेतु  आन्दोलनरत होने की प्रेरणा मिली. 1897 , अभी महाराष्ट्र की जनता अकाल से उबरी भी नहीं थी कि  प्लेग की महामारी ने आ घेरा. गावं के गाव खली होने लगे. सावित्रीबाई ने इस महामारी से निबटने के लिए खुद को झोक दिया. अपने डाक्टर पुर यशवंत की मदद से प्लेग पीडितो की जान बचाने हेतु दूर दराज गावों से मरीजो को निकाल कर लाती. जीवन के अंत में एक अछूत बच्चे को गावं से निकाल कर लाते हुए  ही वो भी प्लेग की  चपेट में आ गयी. 10 मार्च 1897 तक वे जीवन अविराम समाज बदलाव हेतु संघर्षरत रही. सावित्रीबाई फुले से प्रेरणा  ले कर दलित व पिछड़ी महिलाओ ने अपने आन्दोलन को पितृसत्ता और जातिवाद , ब्राह्मणवाद के मूल्य को नकारा है. इसी चश्मे से हम अपने देश के महिला आन्दोलन को देखना चाहेंगे.

बीसवी सदी का 7 वे  दशक में  भारत में महिला आन्दोलन अपनी सुध लेने लगा था. महिलाओ के साथ भेदभाव, दहेजलोभियों द्वारा बहु को जला कर मार देना, या छोड़ देने जैसे कृत्य उभर कर आ रहे थे. प्रतिबंधित घरेलू जीवन ही उसका पर्याय था. पढी-लिखी औरतो ने संघठित हो कर सार्वजानिक रूप से इसका विरोध करना शुरु किया. औरत भी एक इंसान है उसकी भी अपनी एक पहचान है. दहेज़ हत्या, भ्रूण- हत्या, बलात्कार , भरण पोषण, स्वास्थ्य , योंन हिंसा मुद्दों पर जन चेतना अभियान चलाए गये और कानून बनवाये गये.

स्त्रीमुक्ति आन्दोलन के बिन्दुओ को छूते हुए हम वापस 19 वी सदी में लोटते है तो पाएँगे आज हम उन्ही मुद्दों पर लड़ रहे है जिन पर सावित्रीबाई फुले लड़ रही थी जबकि  तत्कालीन समाज आज से ज्यादा  भयंकर व  रुढ़िवादी जातिवादी था, ऐसे विपरीत समय  में वो तूफान बन कर उठ खड़ी हुई थी और निर्भीकता से बाल विधवाओं की, अछूत  महिलाओ की मदद कर रही थी. किसी बाहरी वित्तीय  सहायता से नहीं बल्कि अपने ही संसाधनों और अपनी राजनीति  के सरोकारों के दम पर प्रतिकियावादियों  लोहा ले रही थी. शिशु और महिलाओ को मान देने हेतु प्रसूतिगृह खोला ताकि वे अपने बच्चे को जन्म दे कर वापस अपनी जिन्दगी में  लौट सके.  इस काम के लिए उन्होंने अत्यधिक आलोचना का सामना किया

महिला आन्दोलन ने अपने संघर्षो की लम्बी यात्रा में अनेक पड़ावों को पार किया है. अपने संघर्षो से अनेक कानून पारित कराये है मसलन दहेज विरोधी कानून, भूर्ण हत्या, कार्यस्थल पर योन शोषण, घरेलू हिंसा इत्यादि . महिलाओ को न्याय दिलाने के लिए अनेक संस्थानों की अनुशंसा की जैसे फैमिली कोर्ट, वुमेन सेल, राष्ट्रिय महिला आयोग,  इत्यादी. अपने नारे में कि पर्सनल और पालिटिक्स एक है, बहनापा के छत्र के नीचे सब एक है समान है यंहा तक सामाजिक जिन्दगी और राजनीति एकनिष्ठ है… आदि

35 -40 वर्ष के लम्बे इतिहास में भारतीय स्त्री-मुक्ति महिला आन्दोलन के संघर्ष मध्यम-वर्गीय मुद्दों और वैश्विक सरोकारों को अभिव्यक्त  करते रहे है, जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर एका  तो जाहिर करते है परन्तु देश की बहुसंख्यक आबादी की  दलित आदिवासी,  डीनाटीफाईड, अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओ की  रोजमर्रा की समस्याओं को समझ कर उनके साथ खड़े होने की ललक नहीं देखि गयी.  न ही उस ओर  प्रयास ही हुए है. महिला आन्दोलन की नेत्रियोऔर दलित आन्दोलन के नेताओ और नेत्रियो से इस ओर  ध्यान दिलाते हुए हम उनसे अनुरोध कर रहे है कि अपने बीच सावित्रीबाई फुले जैसे सरल व्यक्तिव  के नाम के  माध्यम से अपने देश और समाज के मुद्दों को उठाने के लिए सावित्रीबाई फुले का जन्मदिनांक  को स्त्री मुक्ति दिवस  की जरुरत को  तर्कसंगत समझते हुए जमीनी स्तर और सांगठनिक स्तर पर मानना शुरू करे  इसी आशय से राष्ट्रिय महिला आन्दोलन दलित अपनी पहल पर, दलित राईट, भारतीय महिला जाग्रति परिषद्, महिला मैत्री, जन विकास महिला फाउंडेशन, सावित्रीबाई फुले महिला संस्था ,युविडीएमाआर, यशोधरा महिला उद्यम ट्रस्ट , संभव नेकडोर एवं अन्य   संस्थाओं ने  मिल कर दिल्ली और अन्य राज्यों में दूसरी बार A.P. Bhavan , Gurajada Conference Hall  में 3 जनवरी  2016   समय 3 बजे मनाया  इस अवसर पर महिलाओ के लिए आरक्षण में आरक्षण और जयपुर में मनु महाराज की मूर्ति हटाने  के अभियान की  शुरुआत की.
राष्ट्रीय  दलित महिला आन्दोलन: KH 107 , गली न. 14 /4  वजीराबाद गांव,
दिल्ली -1100 84. फोन न . 9871115382  ईमेल आईडी : rdmaindia@gmail.com

पढ़ी -लिखी उम्मीदवार के लिए अजीबोगरीब शादियां

 मुजतबा मन्नान


हरियाणा में पंचायत चुनाव के लिए शिक्षा की अनिवार्यता के बाद इस सामंती , पितृसत्ताक समाज में उसकी प्रतिक्रिया भी ऐसी ही होनी थी – कोई ४५ की पत्नी ४७ के अपने पति को   उससे १४ साल छोटी लड़की से शादी की सहमति दे रही है , ताकि  घर की सरपंची घर में बची रहे , तो कोई आनन -फानन में बेटे की शादी करके क्राइटेरिया में फिट न बैठने पर साले की तलाक दिलवाकर उसकी पत्नी से खुद ही शादी कर रहा है।  वयस्क मताधिकार वाले देश में शिक्षा की असंवैधनिक अनिवार्यता का प्रतिफल है यह – हम लोकतंत्र को १०० साल पहले ले जा रहे हैं , समाज तो वहीं अभी भी ठहरा हुआ है ही।  हरियाणा से मुजतबा मन्नान की रिपोर्ट। 


हरियाणा में पंचायत चुनावों को लेकर कई महीनों से चुनावी प्रक्रिया चल रही है। पंचायत चुनाव के इस माहौल में अगर गांवों में जाकर वहाँ हाल जानने की कोशिश करे तो गाँव के हर चौराहे पर इन चुनावों को लेकर चर्चा मिलेगी। हर सीट को गुना-भाग करते गाँव के लोग मिलेंगे।सीटों को सामान्य या आरक्षित रखने को लेकर लोगों में जिज्ञासा है और प्रत्येक स्थिति के लिए न केवल संभावित उम्मीदवार, बल्कि गाँव के मतदाताओं के पास भी अपनी एक योजना है कि किसके पाले में रहना है और किसे जिताना है। चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार के पास अपनी योजना है।

मगर विडंबना है कि यह योजनबद्धता स्थानीय मुद्दों या गाँव की समस्याओं के आधार पर कतई नहीं है। इसका आधार जाति और लोगों के अपने-अपने व्यकीगत स्वार्थ हैं। हर किसी का गणित है कि किस प्रत्याशी को जिताने पर उसे क्या और कितना फायदा मिल सकता है। अगर किसी गाँव में एक ही जाति के दो-तीन लोग चुनाव में उतर रहे है तो वहाँ व्यक्तिगत हितों के आधार पर मतदाताओं के कई खेमे बन रहे है, जैसे फलां उम्मीदवार से फलां व्यक्ति के संबंध अच्छे है। तो परिवार समेत उसका वोट उसी उम्मीदवार को जाएगा। अब कौन कैसा है, किस छवि का है और उसका क्या ऐजेंडा है आदि सब बातें बेकार है।

1. आठ बच्चों के बाप नें सरपंच बनने के लिए की दूसरी शादी (पूरा समाचार पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें )

कई महीनों से चल रही पंचायत चुनावों की इस भागदौड़ में हरियाणा सरकार ने विधानसभा में पंचायत चुनाव प्रक्रिया में संशोधनके बाद बिल पास कर नया कानून बना दिया। नए कानून के अनुसार ‘केवल दसवीं पास पुरुष व आठवीं पास महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते  है।’ सरकार के इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने पक्ष-विपक्ष की बहस, आंकड़ो तथा तर्को के आधार पर सरकार के पक्ष में फैसला दिया।कोर्ट के इस फैसले ने उम्मीदवारों को मुश्किल में डाल दिया, क्योंकि चुनाव लड़ने वाले ज़्यादातर उम्मीदवार दसवीं पास नही है और कई गांवों में तो महिला आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार ही नहीं मिल रही है ,  है क्योंकि पढ़ा-लिखा नहीं होने के कारण ज़्यादातर उम्मीदवार चुनाव के लिए हो गई हैं। लेकिन कुछ उम्मीदवारों के बच्चे पढ-लिख रहे है, उनके सामने समस्या यह है कि उनके बच्चे दसवीं पास तो है लेकिन चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार उनकी उम्र 21 वर्ष से कम है। इसलिए वो चुनाव नहीं लड़ सकते।समस्या यह है कि ऐसी संकट की घड़ी में उम्मीदवार क्या करे?क्योंकि ऐसी स्थिति में गाँव में उनकी राजनीतिक विरासत पर खतरा मंडराने लगा है।

काफी विचार-विमर्श के बाद उम्मीदवारों को एक सुझाव तर्कसंगत लगा। उसी सुझाव पर अमल करते हुए पंचायत चुनाव में सरपंच पद के एक उम्मीदवार ने मुझे फोन किया। हालचाल पूछने के बाद अपनी समस्या पर आते हुए उन्होने कहा “बेटा आपसे एक छोटा सा काम है।” मैंने हैरानी जताते हुए पूछा ‘सरपंच जी,भलाआपको मुझसे क्या काम पड़ सकता है?’ फिर उन्होने मुद्दे पर आते हुए कहा “मुझे अपने बेटे की शादी करनी है और उसके लिए आठ पढ़ी लड़की चाहिए, लेकिन उसकी उम्र 21 साल से कम नहीं होनी चाहिए और हाँ शादी एक हफ्ते के अंदर करनी है।” उनकी बात समझकर में असमंजस में पड़ गया कि ऐसा क्या हो गया जो सरपंच जी को एक हफ्ते के अंदर बेटे की शादी करनी है और सरपंच जी का बेटा तो अनपढ़ है तो फिर उन्हे पढ़ी- लिखी बहू क्यूँ चाहिए? थोड़ी देर दिमाग घुमाने के बाद पता चला आने पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए उन्हे पढ़ी-लिखी बहू चाहिए क्योंकि वो खुद तो पढे-लिखे नहीं है और ना ही उनका बेटा पढ़ा लिखा तो वह अपने बेटे की शादी करके होने वाली बहू के सहारे अपनी गाँव की राजनीतिक विरासत को बचाना चाहते है।

पति की सरपंची बचाने के लिए पत्नी लाई सौतन (पूरा समाचार पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें )

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद गाँवोंमें पंचायत चुनाव में संभावित उम्मीदवारों के यहाँ अनेक शादियाँ हो चुकी है और दिन-प्रतिदिन यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है।लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि ज़्यादातर शादियाँ बिना किसी दहेज और बारात के हो रही है। आमतौर पर गाँव के इन राजनीतिक घरानों में भारी भरकम दहेज और बड़ी बारात के साथ ही बेटे का ब्याह करना साख माना जाता है। चाहे इसके लिए लड़की वालों को अपने जीवन भर की पूंजी ही दांव पर क्यूँ ना लगानी पड़े। लेकिन संकट की इस घड़ी में वो अपनी साख भूल चुके है और उनकी नज़र केवल पंचायत चुनाव में पदों पर टिकी है।

हरियाणा के ज़िला मेवात के गाँव झिमरावट के शख्स कंवर खाँ चुनाव में सरपंच के पद पर अपनी किस्मत आज़माना चाहते है लेकिन उनके गाँव की सीट महिला आरक्षित होने तथा पंचायत चुनाव प्रक्रिया में संशोधन के बाद दसवीं पास नहीं होने की वजह से वह खुद चुनाव नहीं लड़ सकते है और ना ही उनके घर में कोई पढ़ी-लिखी महिला है। इसलिए उन्होने अपने 19 वर्षीय बेटे की शादी 23 वर्षीय दसवीं पास महिला अनीशा से करवा दी ताकि नए नियमों के मुताबिक चुनाव में पुत्र वधु को उम्मीदवार बनाया जा सके और दहेज के नाम पर कार रूपये, गहने नहीं बल्कि केवल एक गाय ली। बिना दहेज की शादी के बाद अनीशा बहुत खुश है और अब वो चुनाव में पंचायत समिति के पद पर अपनी किस्मत आजमाएँगी।

इस तरह के अनेक उदाहरण हरियाणा के गांवों में भी देखने को मिल रहे है। मेवात ज़िले के पुन्हाना खंड के सबसे बड़े गाँव सिंगार में अलग तरह का उदाहरण देखने को मिला है। सिंगार गाँव के मौजूदा पैंतालिस वर्षीय सरपंच हनीफ की पहली पत्नी ने ही उनकी दूसरी शादी करवा दी ताकि  गाँव में उनका सरपंच जी वाला रुतबा बना रहे। क्योंकि पढ़ा-लिखा ना होने के कारण हनीफ चुनाव नहीं लड़ सकते थे। इसलिए उनकी पत्नी ज़ाहिरा ने कुछ दिनों पहले ही उनसे उम्र में 14 साल छोटी आठवीं पास महिला से शादी करवा दी। अब गाँव में सरपंच के पद पर वो अपनी दावेदारी पेश करेंगी।

गांवों में महिलाओं की गंभीर स्थिति दर्शाने वाले कुछ और उदाहरण देखने को मिल रहे है। मेवात ज़िले के नगीना खंड के सैतालीस वर्षीय सरपंच व आठ बच्चों के पिता दीन मोहम्मद ने अपनी सरपंची बचाने के खातिर दूसरी शादी की है। कुछ महीने पहले ही दीन मोहम्मद ने 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने बड़े बेटे की आठवीं पास लड़की से शादी करवा दी ताकि उनकी पुत्र वधु चुनाव लड़ सके। लेकिनपुत्र वधु की आयु 21 वर्ष से कम निकली। इसलिए उन्होने अपने साले की आठवीं पास पत्नी को तलाक दिलवाकर खुद शादी कर चुनाव के मैदान में ताल ठोक दी है। दीन मोहम्मद के इस कदम उसके परिवार वाले खुश नज़र आ रहे है। वहीं उनकी दूसरी पत्नी सजिया का कहना है कि वो इस शादी से खुश है क्योंकि बच्चा ना होने के कारण उसके ससुराल वाले उससे खुश नहीं थे।

यह उन असंख्य उदाहरणों में से कुछ ही है जो दिन-प्रतिदिन सामने निकल कर आ रहे है। इस तरह के अनेक उदाहरण आपको गांवों में आसानी से देखने को मिल जाएँगे, जो साफतौर पर महिला उपभोक्तावाद को दर्शाते है। सबसे दुखद बात तो यह है कि इस प्रकार की हो रही घटनाओं को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं है और गाँव वाले हर्ष के साथ स्वीकार कर रहे है।हालात यह कि अगर आप चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के पोस्टरों पर नज़र डाले तो चौकने वाली चीज़ें नज़र आएंगी जैसे चुनाव में उम्मीदवार तो महिला है लेकिन प्रचार वाले पोस्टर पर फोटो उनके पति या ससुर का है। महिला उम्मीदवार का तो केवल नाम ही लिखा गया है।

सत्ता के लिए सौतन भी मंजूर (पूरा समाचार पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें )

मेवात जिले के नुह खंड के गाँव घासेड़ा में सरपंच पद की पढ़ी-लिखी उम्मीदवार और समाजसेविका नसीम जी बताती है कि पंचायत चुनाव में महिला आरक्षण की वजह से महिलाओं की संख्या तो बढ़ी है लेकिनी महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। आज भी महिला आरक्षित सीट पर चुनाव तो महिला ही लड़ती है लेकिन सरपंच तक का सारा काम-काज पुरुष ही करता है और गाँव वाले पुरुष को ही सरपंच मानते है। महिला सरपंच को केवल हस्ताक्षर करने के लिए ही बुलाया जाता है और इसमें गाँव वालों को भी कोई बुराई नज़र नही आती है। चुनाव में पर्चा दाखिल करने से लेकर जीतने तक का सारा काम पुरुष ही करता है। क्योंकि महिला को चुनाव के मैदान में उतारने के पीछे भी उनके अपना स्वार्थ होता है और वह अपनी योजना में आसानी से कामयाब भी हो जाते है।

इस प्रकार की घटनाओं को देखकर मन में कई प्रकार के सवाल उठते है। हम लोकतन्त्र की जिस सबसे छोटी इकाई यानि पंचायत को मजबूत करना चाहते है वो किस ओर जा रही है? आज भी गाँव में महिलाओं की क्या स्थिति है? नंबर वन हरियाणा का नारा देने वाले और भारत के सबसे विकसित राज्यों में गिने जाने वाले हरियाणा में आज भी पुरुष-महिला अनुपात सबसे कम है। समाज में आज भी महिला उपभोक्तावाद और पितृसत्तात्मक नज़रिया साफतौर से उभर कर आता है। जहा पुरुष अपने राजनीतिक हितों की एवज में महिलाओं का मनमाफिक इस्तेमाल कर रहे है। अपने राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए बिना मर्ज़ी के लड़की की शादी कर दी जाती है तथा शादी में खुश होने के नाम पर भरी-भरकम दहेज दे दिया जाता है। पुरुषवादी विचारधारा इसको महिलाओं के प्रति अपनी शान और कर्तव्य समझती है लेकिन यह आज के दौर में व्याप्त महिला उपभोक्तवाद की तस्वीर पेश कर रहा है कि किस प्रकार महिलाओं को अपने स्वार्थ के लिए वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जोकि भारत जैसे लोकतान्त्रिक व संवैधानिक देश के लिए चिंता का विषय है।सरकार चुनाव में महिलाओं को आरक्षण देने को ही अपनी उपलब्धि मानकर चल रही है जबकि उसका दुरुपयोग कर रहे लोगों खिलाफ कोई योजना नहीं है। इसलिए आज महिलाओं को आरक्षण देने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है जोकि एक बहुत ही दुखद पहलू है। हालांकि इस बार पंचायत चुनाव प्रक्रिया में संशोधन के बाद लोगों का लड़कियों को पढ़ाने की तरफ ध्यान गया है जोकि सुधार की ओर एक अच्छा कदम साबित हो सकता है। बशर्ते लोग पढ़ाई की अहमियत को समझ पाये।

अल्टो छोड़ दहेज में लाई गाय, ससुराल वाले फूलों न समाय (पूरा समाचार पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें )

अब देखना यह है कि अगर गाँव में इन पढ़ी-लिखी महिलाओं को चुनाव लड़ने का मौका मिलता है और अगर वह चुनाव जीतकर आती है तो गाँव के पुराने राजनीतिक लोगों का क्या होगा? उनकी राजनीतिक सोच में महिलाओं को लेकर कोई बदलाव आएगा? या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक दांव-पेंच बनकर ही सिमट जाएगा? अगर बदलाव आता है तो किस प्रकार का बदलाव आएगा? क्योंकि इस बार पूरे राज्य में पढे-लिखे उम्मीदवर ही चुनाव लड़ रहे है। तो कहीं ना कहीं पूरे राज्य में पढे-लिखे सरपंच होंगे।

लेखक जामियामिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से स्नातकोत्तर हैं और हरियाणा के जिला मेवात में रहते । आजकल शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है। लेखन में रुचि रखते है और सामाजिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. संपर्क ; 9891022472, 7073777713 

जेंडर और पितृसत्ता पर क्रांतिकारी आंदोलन के नजरिए की एक आलोचना

महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं और क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं
1.
सन 2004 में महिला संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा क्रांतिकारी एजेंडे में महिलाओं के लिए जगह को लेकर क्रांतिकारी आंदोलन की बढ़ती हुई आलोचनाके मद्देनजर क्रांतिकारी आंदोलन की ओर से इस मुद्दे पर एक बातचीत की पहल की गई (इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 6 नवंबर, 2004). यह बातचीत जहां रखी गई, वहां दो बैनर लगाए गए थे, जिन पर यह नारा लिखा हुआ था:“मजदूर वर्ग की मुक्ति के बिना औरतों की आजादी नहीं हो सकती.” इसका मतलब यह है कि क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं होगी. दूसरे बैनर पर लिखा था “औरतों के बिना क्रांति नहीं”. इन नारों को सरसरी नजर से देखने परशायद शब्दों में बारीक बदलाव पर नजर न जाए, लेकिन असल में ये नारे ऐसे होने चाहिए थे:  “महिलाओं की मुक्ति के बिना क्रांति मुमकिन नहीं” और “क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं”. इनमें से कोई भी एक नारा, दूसरे के बिना बेमानी है. क्रांति एक प्रक्रिया है जिसमें पितृसत्ता और उत्पीड़नकारी लैंगिक रिश्तों के खिलाफ लड़ाई समाज के क्रांतिकारी बदलाव का ऐसा हिस्सा है,  जिसको अलग नहीं किया जा सकता है. लेकिन हम पाते हैं कि इस सवाल पर क्रांतिकारी आंदोलन का रवैया इस तरह है कि इसने ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी को ही पलट दिया है.

यहां क्रांति अपने आप में ही एक मकसद हो गई है, जिसको अगर एकबार हासिल कर लिया गया तो इसके नतीजे में अपने आप ही महिलाओं की मुक्ति हो जाएगी. जबकि इसके उलट, असल में पितृसत्ता, या जाति व्यवस्था, के खिलाफ लड़ाई क्रांति की प्रक्रिया के दौरानहमेशा चलती रहती है और ऐसे संघर्षों के जरिए ही यह बात तय होती है कि क्रांति और उसके बाद आने वाले समाज की शक्ल क्या होगी. लेकिन जब कोई यह कहे कि “क्रांति के बिना महिलाओं की मुक्ति नहीं” और “औरतों के बिना क्रांति नहीं”, तो उसका मतलब यह होता है कि पितृसत्ता एक ऐसा सवाल है जिसपरसिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाएगी. और जब तक ऐसा नहीं हो जाता, महिला कैडरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे एक औरत के रूप में जिस उत्पीड़न का सामना करती हैं, उसके बारे में सवाल उठाने के बजाए इस क्रांति को कामयाब बनाने के लिए अहम भूमिका अदा करें. मानो, उनके द्वारा अपने उत्पीड़न के बारे में सवाल उठाना, सिर्फ ध्यान बंटाने वाली एक चीज हो. मानो यह क्रांति की मौजूदा जरूरतों से सिर्फ एक भटकाव हो. क्रांति के बारे में ऐसी समझदारी इन दोनों संघर्षों को अलग अलग करके देखती है, मानो पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष सामाजिक बदलाव के क्रांतिकारी संघर्ष का हिस्सा न हो.

रोजाना के संघर्ष और क्रांति के व्यापक सवाल के बीच इस गलत और झूठे अलगाव ने जो स्थिति पैदा कर दी है, उसमें ऐसा दिखता है कि दशकों से महिला आंदोलन और कार्यकर्ता द्वारा हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता (सेक्सुअलिटी) वगैरह के बारे में जो सवाल उठाते रहे हैं, उन पर सिर्फ तभी गौर किया जाएगा, जब एक बार क्रांति हासिल कर ली जाए. पिछले तीन बरसों से हम क्रांति के व्यापक सवाल से महिलाओं के सवालों को अलगा कर उन्हें परदे के पीछे धकेले जाने की ठीक इसी समझदारी पर सवाल करते रहे हैं. हमारा संघर्ष एक सामंती-नैतिकतावादी पितृसत्तात्मक समझदारी से है, जो दशकों से महिलाआंदोलनों द्वारा उठाए गए विभिन्न सवालों पर गौर करने के बजाए सिर्फ औरतों पर नियंत्रण और संरक्षण (पैट्रनाइज) करने के काम आती है. हम पाते हैं कि यहां क्रांति को एक प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाए और इतिहास को इस तरह समझने के बजाए कि विभिन्न संघर्ष इस इतिहास को गढ़ते हैं,इस सवाल को लेकर एक तरह का कामचलाऊ रवैया है, जो मुख्यत:आम समझ (कॉमन सेंस)पर टिका हुआ है. हमारे समाज के संदर्भ में यह आम समझ मुख्यत:सामंती नैतिकता की पैदाइश है. इस समझदारी को लेकरहमारी जो असहमतियां हैं, उनके अहम पहलुओं का एक खाका हमने अपने इस्तीफे में दिया था. इसलिए हम यहां उनमें से कुछ पहलुओं पर विस्तार में चर्चा करने की कोशिश करेंगे और यह बताएंगे कि हमारे ऐसा कहने के पीछे क्या आधार था.

दुनिया के किसी भी समाज की तरह भारतीय उपमहाद्वीप में भी पितृसत्ता का चरित्र इसकी अपनी ऐतिहासिक खासियतों और उत्पादन के तरीके (मोड ऑफ प्रोडक्शन) के जरिए तय होता है.इस समाज में पितृसत्ता की बुनियाद अभी भी मजबूती से ब्राह्मणवादी सामंतवाद पर टिकी हुई है, और इसका साम्राज्यवादी बड़ी पूंजी के साथ गंठजोड़पितृसत्ता को और मजबूती देता है. यहां तक कि जाति व्यवस्था को कायम रखने में महिलाओं तथा उनकी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर एक सरसरी समझदारी भी इसको उजागर करती है कि कैसे पितृसत्ता के सवाल कोप्रभुत्वशाली अर्ध-औपनिवेशिक सामाजिक संबंधों के दायरे से बाहर रख कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यही संबंध अलग अलग लिंगों के बीच में गैर बराबर शक्ति संबंधों को तय करते हैं. और इसलिए, जिस तरह अर्ध औपनिवेशिक भूमि संबंधों को ठीक ही वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना जाता है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का ही हिस्सा मानना जरूरी है. इतिहास गवाह है कि जाति या पितृसत्ता के ढांचों को हमेशा ही चुनौतीमिलती रही है. मार्क्सवाद हमें समाज को गति में देखना सिखाता है. अपनी अंतिम अवस्था से गुजर रहा पूंजीवाद, यानी साम्राज्यवाद के दौर का पूंजीवाद, बाजार के जरिए आजादी या चुनाव के जिन विचारों और मूल्यों को बढ़ावा देता है, उनका असली मतलब कभी भी आजादी या चुनाव की आजादी नहीं होता. इस दशा में आते आते, पूंजी अपना प्रगतिशील और लोकतांत्रिक चरित्र खो चुकी है और सामंतवाद के साथ गठबंधन करके वजूद में है. लेकिन, एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते हमारे लिए यह अहम है कि हमअंतिम अवस्था वाले पूंजीवाद द्वारा परोसे जा रहे बुर्जुआ मूल्य/नैतिकता और जाति तथा पितृसत्ता के ढांचों के खिलाफ संघर्षों से जन्म ले रहे लोकतांत्रिक मूल्यों/नैतिकता के बीच फर्क को अलग अलग करके देखें और समझें. हमारे लिए यह पहचानना जरूरी है कि हमारे समाज के संदर्भ में, हमारी चेतना अकेले सामंती और बुर्जुआ मूल्यों/नैतिकताओंके मेल से ही नहीं बनती है, बल्कि यह विभिन्न संघर्षों के और उनके जरिए पैदा होने वाले जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों से भी बनती और विकसित होती है – जैसे कि तेभागा व तेलंगाना के संघर्ष, नक्सलवादी आंदोलन, मजदूर वर्ग के विभिन्न संघर्ष, महिला आंदोलन, दलित आंदोलन, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन, राष्ट्रीयताओं के संघर्ष या फिर विभिन्न व्यक्तियों के संघर्ष आदि. ऐसी अनगिनत मांगें, जिनके बारे में कुछ दशकों पहले तक सोचा तक नहीं जा सकता था, वे आज पैदा हो रहे हैं तो सिर्फ इसी वजह से कि उनके लिए इन आंदोलनों ने जगह बनाई. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन में इतिहास के दरमियान लैंगिकता और पितृसत्ता के सवालों पर हुए इस विकास को कबूल करने और उनके साथ एक संवाद बनाने में लगातार एक हिचक दिखाई दे रही है, जो दिखाता है कि इस मुद्दे पर इतिहास से आंख मूंद ली गई है और दोतरफा तरीके से संवाद करने के बजाए चीजों को सिर्फ ऊपर से लाकर लागू करने का रुझान दिखाई दे रहा है.

लेनिन ने कहा था कि ‘एक क्रांतिकारी सिद्धांत के बगैर क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता.’ लेकिन लैंगिक पहलू को समझने के लिए इतिहास और सामाजिक संबंधों को लेकर समझ की कमी का नतीजा यह है कि क्रांतिकारी आंदोलन यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक उत्पीड़न से निबटने के मामलों में तथा इस लड़ाई में दखल देने और अपनी एक जगह बनाने के लिहाज से गलत तरीकों से काम ले रहा है. इसकी मिसाल के लिए हम अलग अलग ऐसे संगठनों के लिखे हुए दस्तावेजों, बयानों या फिर दर्ज किए गए विचारों को पेश करेंगे, जो एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को मानते और क्रांतिकारी राजनीति पर अमल करते हैं. नारी मुक्ति संघ ऐसा ही एक संगठन है, जिसके राजनीतिक अनुभवों, काम-काज और महिलाओं की विभिन्न समस्याओं को लेकर उनके संघर्षों का एक छोटा सा इतिहासरिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया नाम की एक किताब में दिया हुआ है.झारखंड में आदिवासी महिलाओं के संघर्षों और विभिन्न मुद्दों पर नारी मुक्ति संघ के हस्तक्षेप का एक छोटा सा ब्योरेवार इतिहास देने के बाद, यौन हिंसा के सवाल पर इसका विश्लेषण इस तरह शुरू होता है:“एनएमएस के इलाकों में यौन उत्पीड़न और बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है. जब भी एक बलात्कार की घटना होती है, एनएमएस जन अदालत बुलाती है. वह जांच करती है और अगर वह पाती है कि लड़का एक गरीब परिवार से है और टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी सांस्कृतिक के प्रभाव में आ गया है और अगर वह अपना अपराध कबूल कर लेता है, तो उसे कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है.” (रिवॉल्यूशनरी वुमन्स मूवमेंट इन इंडिया, न्यू विस्टास पब्लिकेशंस, पृ.31) यहां भी, यौन हिंसा की वजहें ‘चेतना के दायरे’ में देखी गई हैं, जिसको ‘टीवी, सिनेमा की साम्राज्यवादी संस्कृति’ तय करती है (यह एक ऐसी बात है जो विभिन्न लेखों में आजिज कर देने की हद तक दोहराई गई है). इसके नतीजे में न सिर्फ बलात्कार के अपराधियों को ‘कड़ी चेतावनी’ देकर छोड़ दिया जाता है, बल्कि यह दिखाता है कि यौन हिंसा की वजहों को कितने गलत तरीके से समझा गया है. इस संदर्भ में, साम्राज्यवादी संस्कृति कीइतने जोर-शोर से की गई आलोचना खतरनाक तरीके से उस प्रतिक्रियावादी समझदारी के बेहद करीब आ गई है, जो कहती है कि एक बाहरी बुराई (इस मामले में साम्राज्यवादी संस्कृति) हमारे एकसार और आदर्श समाज को भ्रष्ट कर रही है और यौन हिंसा को बढ़ावा दे रही है.

जब मामला शहरों से जुड़ा हो, तब तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन्म देने वाली ‘साम्राज्यवादी संस्कृति’ का यह विचार और जोर पकड़ लेता है, क्योंकि ऐसा माना गया है कि इस संस्कृति का असर निम्न-पूंजीपति तबके पर कहीं ज्यादा है. मिसाल के लिए रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट द्वारा अक्तूबर 2013 में लाए गए एक हिंदी बयान को देखें, जो तरुण तेजपाल द्वारा एक पत्रकार पर किए गए यौन हमले के बारे में है. शुरू में इसकी निंदा करने के बाद यह बयान निम्नलिखित विश्लेषण पर उतरता है:“वैश्वीकरण और नवउदारवादी संस्कृति का जिस तेजीसे हमारे सामने एक मॉडल खड़ा हुआ है उसे हम कारपोरेट, संसद व विधायिका, मीडिया और साम्राज्यवादी गिरोहों के गठजोड़ में देख सकते हैं। इस गठजोड़ मेंअहम हिस्सा है महिला को बाजार में ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’के रूप में उतारना। यहसाम्राज्यवादी संस्कृति है जिसका गठजोड़ अपने देश में सामंतवादी ब्राह्मणवादी संस्कृति के साथ हुआ है। मीडिया संस्थानों के मालिकों, प्रबंधकों,संपादकों…में मुनाफे की होड़, संपदा निर्माण और सत्ताशाली होनेका लोभ-लालच पत्रकारिता, लोकतंत्र, संस्कृति, आधुनिकता, जीवनशैली आदि आवरणमें खतरनाक रूप से ऐसी संस्कृति को पेश कर रहा है जो पूरे समाज और महिलाके लिए भयावह स्थिति बना रहा है।” (http://hashiya.blogspot.in/2013/11/blog-post_5127.html)

इस समझदारी ने यौन हिंसा को ताकत और सत्ता के अपराध के रूप में देखने की  बजाए, इसे महज सेक्स और लालसा तक सीमित कर दिया है. यौन हिंसा कोगैर बराबर सामाजिक रिश्ते में निहित ताकत के अपराध के रूप में देखने वाले यह मांग करेंगे कि घर से लेकर काम की जगहों तक सभी जगहों का जनवादीकरण किया जाए, जबकि ऊपर दिया गया आरडीएफ का विश्लेषण आखिर में औरतों के ऊपर मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण को बढ़ावा देता है और अपने ऊपर होने वाले हमलों के लिए खुद औरतों को ही दोष देनेकी हद तक चला जाता है. इस तरह आरडीएफ के विश्लेषण ने, उन औरतों को एक तरह से खुद अपने पर होने वाली हिंसा के लिए जिम्मेदार बना दिया है, जो अपनी ‘झूठी चेतना’ के कारण ‘जीवन शैली/संस्कृति/आधुनिकता/लोकतंत्र’ के नाम पर परोसी जाने वाली चीजों को अपनाती हैं और ‘कॉरपोरेट मीडिया घरानों’ में काम कर रही हैं. हालांकि हम यहां ये भी जोड़ना चाहेंगे, कि यह आलोचना पेश करते हुए हम साम्राज्यवाद द्वारा परोसी जा रही संस्कृति या उपभोक्तावाद की हिमायत करने के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि हम इस बात की तरफ ध्यान दिला रहे हैं कि जब साम्राज्यवादी संस्कृति या उपभोक्तावाद को अधकचरे तरीके से यौन हिंसा के मामलों की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो यह समस्याजनक हो जाता है.

यह समझदारी कॉमरेड अनुराधा गांधी जैसी वरिष्ठ क्रांतिकारी नेता के लेखन में भी चली आई है. जब उनसे एक इंटरव्यू में शहरी महिलाओं द्वारा झेले जा रहे उत्पीड़न की प्रकृति के बारे में पूछा गया, तो वे जवाब देती हैं कि दूसरी समस्याओं के साथ साथ, “शहरी महिलाओं पर साम्राज्यवादी संस्कृति का असर बहुत ज्यादा है. शहरी जनता  न सिर्फ उपभोक्तावाद से प्रेरित हैं, बल्कि इसकी शिकार भी है, जो इंसानी मूल्यों की  बजाय  फैशन और सौंदर्य उत्पादों को ज्यादा अहमियत देती हैं. इस साम्राज्यवादी संस्कृति के नतीजे में, शहरी इलाकों में अत्याचारों और यौन दुर्व्यवहारों की वजह से असुरक्षा का माहौल है.” (स्क्रिप्टिंग द चेंज, पृ.276). दक्षिणपंथी विचारकों और सभी रंगों के संसदीय दलों के नेता यौन हिंसा में इजाफे के लिए टीवी, सिनेमा, फैशन, सौंदर्य उत्पादनों वगैरह पर इल्जाम लगाते हैं, लेकिन जब मौजूदा सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बदलने के लिए लड़ने वाले आंदोलन भी उनसे मिलता जुलता विश्लेषण करे, तब यह भारी चिंता और खतरे का विषय है. इसलिए हमने इस पर सवाल उठाए, और जब भी हमने ऐसे सवाल उठाए, तो यह सुनने में आया कि हमें अनुराधा गांधी जैसी हैसियत वाले किसी पर सवाल करने या आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है. सवाल है कि यह अधिकार क्यों नहीं है? आखिर वह कौन सी बात है, जो हमें कुछ सवालों और चिंताओं को उठाने से रोकती है, यहां तक कि उन्हें अंदरूनी तौर पर भी नहीं उठाया जा सकता? ऐसे सवालउठाने पर अगर कोई नाराज होता है, तो यह और कुछ भी नहीं बल्कि मतांधता और पोंगापंथ है. मार्क्सवादी व्यवहार हमेशा ही आलोचनाओं और उन आलोचनाओं के जवाबों से होकर विकसित हुआ है. खुद अनुराधा गांधी भी उन मुट्ठी भर लोगों में से थीं, जिन्होंने जाति के सवाल पर जड़ समझदारी के ऊपर  सवाल करना शुरू किया. आखिरकार उनके सवालों ने इस मुद्दे पर मा-ले-मा की समझ को और धारदार ही बनाया. लेकिन यह विडंबना ही है कि जब हमने जेंडर और पितृसत्ता पर उनके कुछ विचारों पर सवाल उठाए तो कुछ लोगों ने कहा कि हमारी ‘सफाई’ होना जरूरी है.
पिछले तीन बरसों में हमने बस इस समस्याग्रस्त समझदारी पर एक बहस की मांग की है. लेकिन इसके बदले में हमने बार-बार सिर्फ और सिर्फ यही देखा कि हमारे द्वारा उठाए गए सवालों को अवैधघोषित करने के लिए हमें बेईमान करार देने की बार-बार कोशिशें की कईं. लगातार इस बेशर्म निरंकुशता का सामना करते हुए, आखिर में हम 21 नवंबर को अपना इस्तीफा सौंपने पर मजबूर हुए, हालांकि विडंबना यह थी कि हम संगठन की एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) और जेनेरल बॉडी दोनों जगहों पर बहुमत में थे. हमारे इस्तीफे के बाद डीएसयू की तथाकथित ईसी एक जवाब लेकर आई. हमारे द्वारा उठाए गए राजनीतिक सवालों और आलोचनाओं पर गौर करने के बजाए, उम्मीद के मुताबिक इस जवाब में भारी लफ्फाजी औरझूठीतोहमतों(स्लैंडरिंग) की भरमार है. अगर हमारा इरादा किसी को बचाने का था, जैसा कि इस बयान में दावा किया गया है, तो हमारे लिए भारी बहुमत के साथ संगठन में बने रह कर ऐसा करना कहीं आसान था. हमने इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि हमने यह महसूस किया कि इस संगठन में रहते हुए इस बहस को रचनात्मक रूप से आगे बढ़ाने की कोई जगह और गुंजाइश नहीं बची थी. हमने यह पूरी तरह जानते हुए इस्तीफा दिया कि ऐसा करने के बाद हम पर घिनौना पलटवारहोगे और उससे भी घिनौनी झूठी तोहमतोंका हमला होगा. और अगर पिछले महीने भर में डीएसयू के कथित ईसी और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के रवैए को आधार माना जाए, तो इन्होंने असल में हमें सही साबित किया है. जेंडर और पितृसत्ता पर कोई भी बहस, जो मौजूदा हालात और ढांचे को जस का तस बनाए रखने वाली किसी भी पिछड़ी हुई समझदारी पर सवाल करे और उसे चुनौती दे,उसको हमेशा ही घसीट कर व्यक्तियों पर हमलों मेंबदल दिया जाता है. और फिर झूठी तोहमतें, हमेशा ही इस पितृसत्तात्मक समाज की प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथ का ऐसा हथियार रही हैं, जिसे वे खुद को चुनौती देने और सवाल उठाने वाले लोगों केखिलाफ इस्तेमाल करते हैं. और इस मामले में यह रवैया जेंडर और पितृसत्ता पर आंदोलन की सामंती-नैतिकतावादी समझदारी के साथ साफ-साफमेल भी खाता है. लेकिन यह शोरशराबा, हवा-हवाई लफ्फाजी, कानाफूसियों के अभियान, झूठी तोहमतें और अलग-अलग लोगों के चरित्र के बारे में कही जा रही बातें उन सवालों को दफना नहीं सकतीं, जो हमने उठाए हैं. और हम अभी भी यह उम्मीद करते हैं कि आखिर में क्रांतिकारी आंदोलन इन अहम सवालों पर गौर करेगा, जो इस समाज के क्रांतिकारी बदलाव और समाज के जनवादीकरण के मकसद के साथ इतनी करीबी रूप से जुड़े हुए हैं कि उसका हिस्सा हैं.

2.
मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की पहचान इतिहास को आगे बढ़ाने वाली ताकत के रूप में की थी. उत्पादन के पूंजीवादी तौर-तरीके केअपने विस्तृत अध्ययन के नतीजे में उन्होंने यह भरोसा जाहिर किया था कि इतिहास की दूसरी क्रांतियों (जैसे बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति) के उलट सर्वहारा के नेतृत्व में, जिनके पास खोने के लिए सिर्फ जंजीरें हैं, समाजवादी क्रांति न सिर्फ सर्वहारा को बल्कि पूरी मानवता को ही मुक्ति दिलाएगी. लेकिन मार्क्स ने यह भी दिखाया था कि वर्ग संघर्ष एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जो इतिहास के दौरान अलग अलग सामाजिक व्यवस्था में अलग अलग शक्ल में सामने आता है. इसलिए हर ठोस स्थिति, वर्ग संघर्ष के ठोस विश्लेषण की मांग करती है. पश्चिमी यूरोप में पूंजीवाद ने सामंती सामाजिक संबंधों को खत्म करने में और बुर्जुआ लोकतंत्र को कायम करने में एक प्रगतिशील भूमिका निभाई, जो औपचारिक बराबरी और आजादी के उसूलों पर आधारित था. मार्क्स ने जहां इसके प्रगतिशील चरित्र को कबूल किया, वहीं बुर्जुआ आजादी और बराबरी की सीमाओं को भी उजागर किया था. उन्होंने बताया कि कैसे व्यवस्था की बुनियाद में ही निहित अंतर्विरोध ऐसे हालात को पैदा करेंगे, जिनके बूते पर सर्वहारा एक सामाजिक क्रांति की रहनुमाई करेगा और हर तरह के शोषण को खत्म करके सच्ची आजादी और लोकतंत्र को कायम करेगा. लेकिन जब उपनिवेशवाद के दौरान पूंजी ने भारतीय उपमहाद्वीप में कदम रखा, इसने वही प्रगतिशील भूमिका नहीं निभाई जो इसने पश्चिमी यूरोप में निभाई थी. सामंतवाद को खत्म करने के बजाए, पूंजीवाद ने उसके साथ गठबंधन कर लिया और उसको सहारा देते हुए एक अर्ध-सामंती संबंध विकसित किया. हालांकि उपनिवेशवाद आखिरकार 1947 में औपचारिक रूप से खत्म हो गया, लेकिन सामंती ताकतों, साम्राज्यवाद और अंबानी, टाटा व बिड़ला जैसे दलाल बड़े पूंजीपतियों द्वारा जन समुदाय का शोषण जारी रहा.

ऐसे जटिल अर्ध-सामंती अर्ध औपनिवेशिक संदर्भ में वर्ग संघर्ष की किसी भी मशीनी समझदारी और उसके इस्तेमाल को नाकाम ही होना है, जैसा कि संशोधनवादी संसदीय वाम की दुर्गति ने बहुत साफ साफ साबित किया है. संशोधनवादी वामपंथ जिस वर्ग संघर्ष की मशीनी और अनगढ़ समझदारी की पैरवी करता रहा है, बरसों सेभारत का क्रांतिकारी आंदोलन उसको चुनौती देता आया है. चाहे वह मजदूर वर्ग के संघर्षों, नव जनवादी क्रांति में किसानों की भूमिका, जाति-विरोधी संघर्षों, अल्पसंख्यक सवाल या फिर राष्ट्रीयताओं के आत्म निर्णय के संघर्षों की बात हो, इन सभी पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में इस चुनौती की झलक मिलती है. लेकिन जब पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के उतने ही अहम सवाल की बात आती है, तब हम देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी पर एक कामचलाऊ और अनगढ़ सा वर्ग विश्लेषण हावी है. यह समझदारी पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ ‘बड़े’ क्रांतिकारी कार्यभार में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित कर देती है. जहां क्रांतिकारी आंदोलन की सैद्धांतिक समझ शराबबंदी आंदोलन, विस्थापन विरोधी आंदोलन, सलवा-जुडूम विरोधी आंदोलन या अफ्स्पा विरोधी संघर्षों में महिलाओं की भूमिका की तारीफ करती है, वहींवो लैंगिक सवाल को परदे के पीछे धकेल देती है. और बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. असल में यह दशकों से महिला आंदोलनों द्वाराउठाए गए विभिन्न सवालों को‘असली’ क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष से भटकाने वाला मानता है.
भारतीय उपमहाद्वीप में पितृसत्ता और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा है. बड़ी पूंजी के साथ मिल कर जनता की व्यापक बहुसंख्या का उत्पीड़न और शोषण करने वाले ये अर्ध-सामंती सामाजिक संबंध जाति व्यवस्था और पितृसत्ता से मिल कर बने भी हैं और इसी के साथ उन्हें बनाते भी हैं. एंगेल्स ने यह देखने की कोशिश की कि इतिहास में परिवार और शादी जैसे संस्थान किस तरह विकसित हुए. इस क्रम में उन्होंने यह दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति से होने वाली शादी (मोनोगेमस मैरिज), एक महिला को महज एक यौन शरीर (सेक्सुअल बॉडी) मानते हुए उस पर नियंत्रण का औजार है और इसने ऐतिहासिक रूप से किस तरह निजी संपत्ति और मर्दों के प्रभुत्व को स्थापित करने में एक निर्णायक भूमिका अदा की थी. लेकिन हमारे संदर्भ में, महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण सिर्फ संसाधनों पर नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए ही अहम नहीं रहा है, बल्कि यह जाति व्यवस्था को कायम रखने और उसे चलाते जाने के लिए भी अहम रहा है. दूसरे शब्दों में अगर आज जाति व्यवस्था बनी हुई है और साथ ही जमीन और श्रम पर अर्ध सामंती नियंत्रण भी बना हुआ है तो इसकी वजह यही है कि वे अभी भी अपने अस्तित्व के लिए महिलाओं और उनकी यौनिकता के ऊपर पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर बड़े पैमाने पर निर्भर हैं, जिसको जाति के भीतर शादियों की सामाजिक बंदोबस्त के जरिए मुमकिन बनाया जाता है. इस तरह महिलाओं और उत्पीड़ित जातियों के श्रम पर गैर आर्थिक जोर जबरदस्ती और महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण भारतीय उपमहाद्वीप के अर्ध-सामंती संबंधों को कायम रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. और इसलिए जिस तरह अर्धसामंती भूमि संबंधों के खिलाफ लड़ाई को वर्ग संघर्ष का हिस्सा माना गया है, उसी तरह महिलाओं की मुक्ति के लिए लड़ाई और जाति के खात्मे की लड़ाई को भी वर्ग संघर्ष का अंदरूनी हिस्सा मानना होगा. लेकिन महिला आंदोलन से पैदा होने वाले मुद्दों मसलन यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता के मुद्दों पर गौर करने, उनके साथ बहस करने और उनकी गहराई में जाने के बजाए क्रांतिकारी आंदोलन इन सवालों को साम्राज्यवादी संस्कृति के असर में जन्म ले रहे ‘एलीट’ (अभिजात) महिलाओं के सरोकार कह कर खारिज कर देता है.

यह व्यवहार अपनी सबसे बदतरीन शक्ल के रूप में इस तरह सामने आता है कि यौन हिंसा, शादी, तलाक और अंतरंगता से जुड़े सरोकारों को उठाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं को ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ के पैरोकार कह कर प्रचारित किया जाता है. आंदोलन नारीवादियों पर साम्राज्यवादी हमले के एक हिस्से के रूप में ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाता है. ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इसको बिना किसी व्याख्या के, एक तथ्य के रूप में पेश किया गया. हम पूछना चाहेंगे- क्रांतिकारी आंदोलनजिसे ‘फ्री सेक्स थ्योरी’ कहता है, आखिर उसका मतलब क्या है?हम देखते हैं कि किस तरह प्रतिक्रियावादी ताकतें यौन हिंसा और पितृसत्तात्मक नियंत्रण पर सवाल उठाने वाली और परिवार और शादी जैसे संस्थानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाने वाली नारीवादियों और महिला कार्यकर्ताओं पर इसी भाषा में हमला करती हैं (मिसाल के लिए सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा जेएनयू को ‘फ्री सेक्स नक्सलाइटों और जिहादियों’ का गढ़ बताने वाली टिप्पणी देखें). फिर ऐसेकल्पित शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या क्रांतिकारी आंदोलन भी उन्हीं प्रतिक्रियावादी ताकतों जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है? बेशक, ऊपर बताए गए अनेक सरोकारों को दशकों से अलग अलग धाराओं के महिला आंदोलन और नारीवादी उठाती रही हैं. यह भी सच है कि उनमें से अनेक का बहुत सीमित एजेंडा है और नारीवाद खुद अलग अलग धाराओं में बंटा हुआ है. लेकिन एक अर्ध-सामंती अर्ध-औपनिवेशिक संदर्भ में जहां क्रांति की अवस्था अभी नव जनवादी ही है, हर उस संघर्ष को अपना सहयोगी मानना चाहिए जो उत्पीड़नकारी सामाजिक संबंधों और संस्थानों को निशाने पर लेता हो या उसे चुनौती देता हो, न कि उसके साथ अपने दुश्मन के रूप में व्यवहार करना चाहिए. एक क्रांतिकारी पार्टी या क्रांतिकारी आंदोलन की भूमिका इन सवालों को समग्रता में उठाने और उन्हें दूसरे सामंतवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों के साथ जोड़ कर अपने मोर्चे को और व्यापक बनाने की होनी चाहिए. हालांकि इस मामले में, हम यह पाते हैं कि पेश किया गया नजरिया और व्यवहार दोनों ही यह है कि ये सवाल अपने आप में ही भटकाने वाले हैं और उनमें ऐसे एलीट सरोकारों की झलक मिलती है, जिनको खास वर्गीय नजरिए जन्म देते हैं. इससे भी बढ़कर वे एक ‘साम्राज्यवादी साजिश’ का हिस्सा हैं. खारिज कर देने और बदनाम करने का ऐसा रवैया और कुछ नहीं बल्कि घमंड और अहंकार है. यह सही है कि शासक वर्ग हमेशा ही सभी किस्म के लोकतांत्रिक आंदोलनों और उनके नेताओं को अपने में मिला लेने की कोशिश करते हैं. यह भी सच हो सकता है कि महिला आंदोलन आंशिक रूप से शासक वर्गों से जाकर मिल गए हों. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आंदोलनों द्वारा उठाए गए मुद्दे और सरोकार अप्रासंगिक या कम महत्वपूर्ण हो गए हैं?तब तो हमारे पास कम्युनिस्ट आंदोलनों/पार्टियों के शासक वर्ग के साथ मिल जाने की भी अनेक मिसालें हैं – चाहे वह सोवियत संघ हो या चीन या फिर नेपाल में हाल में माओवादी पार्टी की मिसाल. लेकिन इन पार्टियों या आंदोलनों के शासक वर्ग का हिस्सा बन जाने से यह नतीजा निकालना एक विडंबना ही होगी कि समाजवादी क्रांति या नव जनवादी क्रांति के लिए संघर्ष अब अप्रासंगिक हो गए हैं. इसलिए, मुद्दा यह है कि चाहे वो शासक वर्ग का हिस्सा बन गए हों या नहीं, क्रांतिकारी आंदोलन को महिला आंदोलनों या फिर जाति-विरोधी संघर्षों द्वारा उठाए गए मुद्दों और सरोकारों को जरूर ही गंभीरता से उठाना चाहिए, क्योंकि वे हमारे समाज के क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव का हिस्सा हैं.

आइए, यह देखते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन ने शादी, तलाक और अंतरंगता के सवालों पर क्या  नजरिया पेश किया है. हमारे समाज का प्रगतिशील तबका, जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन भी शामिल है, व्यक्तियों द्वारा आजादी से शादी के लिए अपना पार्टनर चुनने के लोकतांत्रिक अधिकार का समर्थन करता है. यह अधिकार और साथ में तलाक का अधिकार विभिन्न प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संघर्षों के नतीजे में मंजूर और कबूल किए गए. खास कर इसमें महिला अंदोलनों और जाति-विरोधी संघर्षों की अहम भूमिका रही है. लेकिन जैसे ही दो व्यक्ति बिना शादी किए साथ में रहने का एक सचेत फैसला करते हैं, क्रांतिकारी आंदोलन फौरन उसे अपराध ठहरा देता है. क्रांतिकारी आंदोलन का यह लिखित नजरिया है: “जब शादी की उनकी इच्छा हो तब साथ में रहना और जब महसूस हो कि उसकी जरूरत नहीं रह गई है तब अलग हो जाना और कुछ नहीं बल्कि गैरजिम्मेदारी और अराजकता है….इसलिए जब एक दूसरे को पसंद करने वाले सदस्य साथ में रहना चाहते हैं तो उन्हें संबद्ध यूनिट को सूचित करना होगा और शादी के लिए इजाजत हासिल करनी होगी. शादी के पहले सेक्स संबंधों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.” और वे इस मामले में ‘गंभीर’ हैं. इस मोर्चे पर गंभीरता इतनी भारी है कि इससे किसी भी भटकाव को, यानी मिसाल के लिए शादी के पहले सेक्स या फिर लिव इन संबंधों को एक ‘पराई वर्ग प्रवृत्ति’, ‘गैर सर्वहारा रुझान’ और एक ‘गंभीर उल्लंघन’ माना जाता है. जहां तक व्यापक समाज का मामला है, यह इन दोनों तरह के रिश्तों का ही विरोध करता है और उन्हें अपराध ठहराता है, क्योंकि उनमें अर्ध-सामंती सामाजिक संबंधों और नैतिकता में गड़बड़ी पैदा करने की क्षमता होती है. लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन इतिहास के गलत पाले में क्यों है? जब एक व्यक्ति आजादी के साथ अपना साथी चुनता है, तो क्रांतिकारी आंदोलन इसे उस इंसान का जनवादी अधिकार मानता है, लेकिन जब एक इंसान बिना शादी किए साथ रहने का फैसला करता है, तो यह इस रिश्ते को ऐसा अराजक व्यवहार कह कर उसे अपराध घोषित कर देता है, जो ‘जहरीली साम्राज्यवादी संस्कृति’ और पराए वर्ग व्यवहार से प्रभावित है. इस रवैए में सिर्फ इतिहास की अनदेखी ही नहीं की गई है, बल्कि यह सेक्स और यौनिकता के बारे में सामंती नैतिकता से सराबोर है. इससे बसऔरतों को मर्दों के संरक्षण में रखने और औरतों पर नियंत्रणकी इच्छाकी ही झलक मिलती है और यह विचार इस समझ पर आधारित है कि सेक्स और सेक्सुअलिटी को लेकर सारे फैसले और पहलकदमी मर्द करते हैं, जबकि औरतें तो निष्क्रिय होती हैंऔर हमेशा ही शिकार बनती हैं. यह समझ यौनिकता (खास कर महिलाओं की यौनिकता) और यौन अंतरंगता के बारे मेंजड़ें जमाए गहरी बेचैनी से पैदा होती है, जो इन्हें किसी तरह की एक ऐसी प्राकृतिक इच्छा के रूप में देखती है, जिसे अगर काबू में नहीं किया गया तो इसका अंजाम ‘यौन अराजकता’, अफरा-तफरी और ‘यौन कमजोरी’ के रूप में सामने आएगा. सेक्स को, बस ‘धर्म, नशे और जहरीले मादक द्रव्यों’ की तरह एक औजार के रूप देखा गया, जिसका इस्तेमाल शोषक वर्ग नौजवानों को क्रांति से ‘भटकाने’ के लिए करते हैं.

क्रांतिकारी आंदोलन के यहां हालांकि तलाक को स्वीकार किया गया है, लेकिन यह इसको पसंद नहीं करता. क्रांतिकारी आंदोलन को इस जनवादी अधिकार को स्वीकार करने तक से इतनी हिकारत है इसने औरतों को ऐसी चेतावनी तक दे दी है कि अगर वो कई बार अलग हुईं और कई बार शादी की तो वे ‘वेश्या के रूप में पतित’ हो जाएंगी. ऐसा करते हुए, यह नजरिया शादी को महज सेक्स तक सीमित कर देता है, और उसमें भी मान लिया गया है कि महिलाओं की कोई चाहत, अहसास या इच्छा नहीं होती. एक दूसरी जगह पर, सबसे आमफहम तरीके से यह दलील दी गई है कि सेक्स पर बहुत ज्यादा जोर पश्चिम में यौन हिंसा और तलाक की दरों में इजाफा कर रहा है! एक बार फिर से यह बात भुला दी गई है कि शोषणकारी रिश्तों और शादियों से अलग होने और तलाक के अधिकारों को महिलाओं ने एक मुश्किल लड़ाई लड़कर और जीतकर हासिल किया है. ऐसा लगता है कि क्रांतिकारी आंदोलन के लिए सारी समस्याओं की जड़ सेक्स में है, जिसकी ‘उन्मुक्तता’ के खिलाफ अगर एक बार लड़ाई लड़ ली गई तो समाज एक ‘सेहतमंद’ समाज बन जाएगा (मार्क्स अपनी कब्र में कसमसा रहे होंगे और गांधी को यकीनन फख्र हो रहा होगा).इसी तरह, क्रांतिकारी आंदोलन, शहीदों की पत्नियों को फिर से शादी करने की इजाजत देता है, लेकिन यहां भी उन्हें मातम से उबरने के नाम पर एक साल की मुद्दत अकेले और बिना किसी के साथ गुजारने के बाद ही इसकी इजाजत मिलती है. और दलील दी गई है कि ऐसा न करने पर वे ‘लोगों और साथी कॉमरेडों के बीच मजाक का विषय बन जाएंगी’. तो अगर उस महिला ने, मान लीजिए एक साल पूरा होने से पहले किसी को पसंद करना शुरू कर दिया तो क्या आप इसको एक मुद्दा बना कर उसके बारे में फैसलेलेंगे? चाहे यह मुद्दत अवधि छह महीने की हो या चार साल की, इसका फैसला महिला के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. अगर कोई ऐसा कहता है कि यह पाबंदी महिला की खातिर ही लगाई गई है, ताकि उसे मर्दों से बचाया जा सके, तब भी ऐसी नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी पक्के तौर पर मर्दों के ही प्रभुत्व को जाहिर करती है, क्योंकि महिला की भावनाओं और अहसासों को इस पूरी बहस में रत्ती भर भी जगह नहीं दी गई है. अगर उस महिला को अनुचित तरीकों से परेशान किया जा रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार मर्दों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन औरत पर पाबंदी लगाना आखिर में और कुछ नहीं बल्कि उसको नियंत्रित करना है और अगर वह इस पाबंदी को नहीं मानती है तो जाहिर है कि उसके बारे में नैतिकता के आधार पर राय कायम की जाएगी. क्या हम प्रगतिशीलता की ओट में असल में औरतों को नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, ताकि सदस्यों और व्यापक समाज के बीच में एक निश्चित ‘व्यवस्था’को कायम रखा जा सके जबकि जरूरत उनको राजनीतिक रूप से अधिक संजीदा, परिपक्व और समझदार बनाने तथा किसी उल्लंघन को गंभीरता से लेने की है?
जब क्रांतिकारी आंदोलन, संभवत:बिना शादी किए साथ रह रहे लोगों पर चुन चुन कर हमले करने, बदनाम करने या झूठी तोहमतें लगाने को अपनी जिम्मेदारी बना लेता है, तो इस रवैए की जड़ और कहीं नहीं बल्कि सामंती नैतिकतावादी नजरिए में है, जिनको यह आंदोलन ‘कम्युनिस्ट मूल्य’ कह कर प्रचारित कर रहा है. हम यहां भविष्य में शादी के रूपों, या उनको बनाए रखने या खत्म करने पर चर्चा (या ‘गर्मागरम बहस’) नहीं कर रहे हैं. कोई भी इस स्थिति में नहीं हो सकता है कि वह इस पर राय दे सके या भविष्यवाणी कर सके कि भविष्य में आने वाले बदलावों का स्वरूप क्या होगा या संपूर्ण बदलाव कैसे होंगे जिनकी अनदेखी संभावनाओं को वर्ग संघर्ष (जिसमें भौतिक और विचारधारा दोनों स्तरों पर पितृसत्ता और जाति के खिलाफ संघर्ष अनिवार्य रूप से शामिल है) लाजिमी तौर पर मुमकिन बनाता है. लेकिन जब हम आज की किसी संस्था के पक्ष में या उसको बनाए रखने की दलील देते हैं, तो इसका मतलब यही होता है कि हम भविष्य के बदलावों के स्वरूप की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जिसमें हम इतिहास को मद्देनजर रखने के बजाए आज की नैतिकता और नैतिक तेवर के आधार पर फैसले ले रहे हैं. इसलिए क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए का नैतिक चश्मा पहनने कीजगह, हमें एक मार्क्सवादी की तरह इस पर यकीन करना चाहिए कि इतिहास में हमेशा बनी रहने वाली अकेली चीज बदलाव है. एक सचेत राजनीतिक कर्ता के रूप में हमसे यही उम्मीद की जाती है कि हम आज हर जगह पर ज्यादा से ज्यादा जनवादी बनें, और इसमें लैंगिक संबंध भी शामिल हैं. ऐसा मुमकिन है कि एक कम्युनिस्ट पार्टी जिन इलाकों में काम कर रही है, वहां जनवादीकरण की प्रक्रिया उतनी आगे नहीं बढ़ पाई है, जिसकी वजह से पार्टी को इन सवालों पर ऐसे कार्यनीतिक नजरिए अपनाने पड़ते हैं (मिसाल के लिए जो कैडर लिव इन में रह रहे हों, उन्हेंखुद को शादीशुदा के रूप में पेश करने जैसी सलाह). लेकिन जब हमारा कार्यनीतिकनजरिया ही हमारा रणनीतिक नजरिया बन जाए और हमारी राजनीतिक समझदारी की बुनियाद के रूप में काम करने लगे, तब यह दिखाता है कि हमने उन्हीं सामंती मूल्यों को अपने भीतर उतार लिया है, जिनके खिलाफ लड़ने का हम दावा कर रहे हैं.

जब हम कम्युनिस्ट मूल्यों की बात करते हैं तो यह समझना जरूरी है कि यह ऐसी कोई आध्यात्मिक अवधारणा नहीं हो सकती, जो इतिहास से ऊपर और परे हो. ऐसे मूल्य आसमान से नहीं टपकते और यकीनन पिछली दो सदियों के दौरान वे जस के तस नहीं बने रहे हैं. वे विभिन्न संघर्षों के जरिए विकसित हुए हैं और मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझदारी से लैस एक क्रांतिकारी पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि उसमें समाज में सबसे आगे बढ़ी हुई चेतना का प्रतिनिधित्व होगा. वह जन समुदाय से पीछे रहने का जोखिम नहीं मोल ले सकती और न ही उसे जन समुदाय के आगे बढ़ जाना चाहिए. कम्युनिस्ट पार्टी मेहनत करने वाले वर्ग को संगठित करती है और सबसे उत्पीड़ित अवाम के बीच काम करती है और समाज के क्रांतिकारी बदलाव के संघर्ष के दौरान उनकी चेतना को विकसित करने की कोशिश करती है. लेकिन यह एकतरफा प्रक्रिया नहीं है, जिसमें चीजें ऊपर से नीचे की तरफ आती हैं, बल्कि आंदोलन अवाम से भी सीखता है. यह संघर्ष के दौरान हासिल किए गए अपने अनुभवों का मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के उसूलों की रोशनी में विश्लेषण करता है और एक बेहतर समझदारी तक पहुंचता है. यह जनता से लेकर जनता को सौंपने की हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है. जिस दिन यह प्रक्रिया रुक जाती है, समझदारी के नाकारा बन जाने का जोखिम पैदा हो जाता है. साम्राज्यवाद के दौर में मरणासन्न पूंजीवाद आजादी और चुनाव की जो झूठी और लुभानेवाली अवधारणाएं फैला रहा है, उनके बारे में जनता और कैडरों को राजनीतिक शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के लिए यह उतना ही जरूरी है कि वह अपने विस्तृत विश्लेषण के जरिए इसको दिखाए कि कैसे सामंतवाद के साथ सांठ-गांठ में मरणासन्न पूंजी पितृसत्तात्मक उत्पीड़न को बढ़ावा दे रही है. लेकिन ऐसे जटिल सवाल के प्रति कोई भी चोर गली या कामचलाऊ तरीके का अंजाम सिर्फ यह होगा कि आंदोलन ऐसे सरल नतीजों पर पहुंचेगा, जिसमें पितृसत्ता के खिलाफ जनवादी संघर्षों से पैदा होने वाली उपलब्धियों, उम्मीदों या मांगों को एक ही झटके में ‘जहरीली’ ‘फूहड़’ ‘साम्राज्यवादी संस्कृति’ की उपज बता कर खारिज कर दिया जाएगा. और ऐसा करते हुए, हम वापस हर जगह पर हावी सामंती-नैतिकतावादी सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के फंदे में जा गिरेंगे, और इसी आम समझ को ‘कम्युनिस्ट मूल्यों’ के रूप में पेश करने लगेंगे, जैसा कि क्रांतिकारी आंदोलन द्वारा पेश किए गए नजरिए में जाहिर होता है.

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हैदराबाद में महिला संगठनों और क्रांतिकारी आंदोलन के प्रतिनिधियों के बीच 2004 में आयोजित बातचीत में अनेक कार्यकर्ताओं ने क्रांतिकारी आंदोलन के राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी का मुद्दा उठाया (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). उनका कहना था कि हालांकि आदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों मेंभारी इजाफा हुआ है, लेकिन नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व खतरनाक ढंग से कम है. जवाब में आंदोलन के प्रतिनिधियों ने पार्टी में‘पितृसत्तात्मक नजरिए’ की मौजूदगी को खुल कर कबूल किया.उनके मुताबिक इसकी बड़ी वजह यह है कि सदस्य ऐसी चेतना लेकर आते हैं, जिस परउनकीपृष्ठभूमि का भारी असर होता है. उन्होंने इस संदर्भ में एक दूसरी समस्या की पहचान करते हुए यह बताया कि औरतें‘पारिवारिक विचारधारा’ से पार पाने के नाकाबिल होती हैं, जो उन्हें राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व की भूमिकाएं अपनाने से रोकती है. उन्होंने यह भी कहा कि ‘साम्राज्यवाद और सामंतवाद को मिटाना, पितृसत्ता को मिटाने से आसान है.’ (ईपीडब्ल्यू, 6 नवंबर, 2004). लेकिन ऐसा क्यों है? क्या पितृसत्ता हमारे दिमाग पर हावी वह भूत है, जिसको झाड़ कर उतारा तो जा सकता है, लेकिन जिससे लड़ा और हराया नहीं जा सकता? क्या असल में पितृसत्ता इतिहास की उपज नहीं है, जिसको हमारे मौजूदा समय और संदर्भ में सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों ने गढ़ा है और साथ ही साथ जिसने सामंती और साम्राज्यवादी ताकतों को भी गढ़ा है? यहां यह मान लिया गया है कि औरतें क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने के काबिल राजनीतिक कर्ता (पोलिटिकल एजेंट) नहींहो सकतींक्योंकि पितृसत्तात्मक विचारधारा उन्हें अपनेआसपास के माहौल से बाहर आने की इजाजत नहीं देती. इसलिए आइए, नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर आने से पहले इंसानी एजेंसी और खास कर महिलाओं की एजेंसी के विवादास्पद और जटिल सवाल पर बात करते हैं.
लुई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर में मार्क्स ने लिखा है, ‘जनता अपना इतिहास खुद बनाती है, लेकिन वह इसे अपने मनचाहे तरीके से नहीं बनाती; वह इसे अपने चुने हुए हालात के तहत नहीं बनाती बल्कि वह यह इतिहास उन हालात के तहत बनाती है, जिनसे वे सीधे-सीधे मुठभेड़ करती हैं, जो उसे सौंपे गए हैं, जिन्हें अतीत ने उसके हवाले किया है. मरी हुई सब पीढ़ियों की परंपराएं जिंदा लोगों के दिमाग पर बुरे सपने की तरह लदी रहती हैं.’(https://www.marxists.org/archive/marx/works/1852/18th-brumaire/ch01.htm). इतिहास ने तरक्की नहीं की होती अगर जनता के पास एजेंसी नहीं होती. लेकिन जनता की एजेंसी हमेशा ही उन विचारधाराओं, राजनीतिक और भौतिक हालात के दायरे में और उनसे होकर बनती है, जिसमें वह जीती है. इतिहास के दौरान, जनता ने सामूहिक रूप से और अलग-अलग भी, शासक वर्गों के शोषण और उत्पीड़न का हमेशा ही विरोध किया है और उसके खिलाफ लड़ती आई है.लेकिन ये संघर्ष हमेशा ही जटिल रहे हैं और अनेक स्तरों पर चलते हैं, क्योंकि हरेक दौर में शासक वर्गों का न सिर्फ भौतिक उत्पादन के साधनों पर बल्कि वैचारिक उत्पादन के साधनों पर भी कब्जा रहा है. इस तरह हरेक सामाजिक बनावट मेंप्रभुत्वशाली विचार, मूल्य और नैतिकता,अपने समय में मौजूद उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों को ऐसे पेश करती है कि वे प्राकृतिक हैं और उनका होना लाजिमी है. इस तरह वे उन्हें जायज ठहराते हुए शासक वर्गों के हितों की सेवा करती है. हालांकि हिंसा या हिंसा की धमकी शासक वर्ग के हाथों में नियंत्रण और प्रभुत्व को बनाए रखने का सबसे बड़ा जरिया होती है, लेकिन किसी भी सामाजिक व्यवस्था की मजबूती और उसका जारी रहना इस बात पर भी निर्भर करता है कि उत्पीड़ित वर्गों ने प्रभुत्वशाली विचारों, मूल्यों और नैतिकताओं को कितना अपने भीतर उतारा है. वर्ग संघर्ष हमेशा ही भौतिक और विचारधारात्मक स्तरों पर लड़े जाते हैं जो मूल्यों और नैतिकताओं के एक नए ढांचे को आगे बढ़ाते हैं, जिसका शासक वर्ग की विचारधारा से टकराव होता है. इंसानी एजेंसी सिर्फ मौजूदा भौतिक हालात से ही तय नहीं होती, बल्कि उसको आपस में लड़नेवाले वर्गों के परस्पर विरोधी विचार, मूल्य और नैतिकताएं भी तय करती हैं. इसलिए इंसानी एजेंसी हमेशा ही वर्ग संघर्ष की या दूसरे शब्दों में कहें तो इतिहास की उपज होती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में जनता की चेतना न सिर्फ सामंती और साम्राज्यवादी मूल्यों की खिचड़ी से बनती है, बल्कि तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी आंदोलन, मजदूर वर्ग के संघर्ष, दलित आंदोलन, महिलाओं के आंदोलन, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष, एलजीबीटीआईक्यू आंदोलन और रोजमर्रा के अनगिनत संघर्ष और आंदोलन भी इसको गढ़ते हैं. लेकिन असल में आपस में विरोधी इन मूल्यों और नैतिकताओं के अलग अलग ढांचे जनता में एक साथ पाए जाते हैं और उसकी कार्रवाइयों और व्यवहार को अहम तरीकों से प्रभावित करते हैं. इसके अलावा, प्रभुत्वशाली मूल्य और नैतिकता उत्पीड़ित जनता की चेतना पर भारी असर डालती है, जो कहीं न कहीं अपने शोषण और उत्पीड़न के ही तर्क को कबूल कर लेती है. भारत में ब्राह्मणवादी सामंती पितृसत्ता की व्यवस्था भी इससे अलग नहीं है, जो बड़ी पूंजी के साथ सहयोग करते हुए अस्तित्व में है. फिर अपने समाज के संदर्भ में हम महिलाओं की एजेंसी को कैसे देखते हैं?क्या सचमुच उनकी कोई एजेंसी है? हां, महिलाओं की एजेंसी है. उनमें अलग अलग तरह की एजेंसियां होती हैं, जिनको वे विचारधारात्मक, राजनीतिक और भौतिक हालात तय करते हैं, जिनमें वे रहती हैं. यहां, इस मुद्दे पर बात को आगे बढ़ाने के लिए, हम महिलाओं की एजेंसियों को दो अलग अलग श्रेणियों में बांटते हैं, हालांकि असलियत में वे कभी भी अलग अलग वजूद में नहीं होतीं. पहली तरह की एजेंसी ‘यथास्थितिवादी एजेंसी’ होती है, जिसमें सचेत रूप से या अनजाने में प्रभुत्वशाली सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे को कबूल करने का रुझान होता है. हालांकि इस तरह की एजेंसी उत्पीड़ित और शोषित बनी रहती है, लेकिन इसको पितृसत्तात्मक ढांचे से कई तरह के दिखावटी ‘इनाम’ भी हासिल होते हैं और इसको एकसीमित ताकत और ‘शरीफ या गुणवान महिला’, ‘त्याग करने वाली मां’ ‘समर्पित पत्नी’ वगैरह जैसे रुतबे भी हासिल होते हैं. दूसरी, ‘प्रगतिशील एजेंसी’ है, जो सचेत रूप से गैरबराबर लैंगिक रिश्तों और पितृसत्ता पर सवाल करती है और उसके खिलाफ लड़ती है. हमेशा ही इसको प्रभुत्वशाली सामंती और पितृसत्तात्मक ताकतों की ओर से पलटवार का सामना करना पड़ता है. इस तरह की एजेंसी के खिलाफ हिंसा या हिंसा की धमकी इस पलटवार का सबसे आम चेहरा है. हालांकि इस पलटवार के उतने ही हिंसक, दूसरे छुपे हुए और बारीक चेहरे भी होते हैं जिनकी जानबूझ कर अनदेखी कर दी जाती है या उन्हें वाम जनवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों में गंभीरता से नहीं लिया जाता. जो महिलाएं पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाती हैं और अपना अधिकार जताने के लिए बराबरी और आजादी की मांग करती हैं, उनको अक्सर ही ‘बदचलन’ और ‘अनैतिक’ कहकर प्रचारित किया जाता है. इन महिलाओं को सबसे बदतरीन किस्म की तोहमतों और अफवाहों का सामना करना पड़ता है. इसलिए महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ होने वाले प्रचार, उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों और अफवाहों को समझना जरूरी है, जो उनकी सामाजिक जगहों (स्पेस) को खत्म करते हैं और उनकी तरक्की और मन:स्थिति पर असर डालते हैं और जो अपने आप में ही यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूप हैं. लेकिन सबसे परेशान करनेवाली बात यह है कि हिंसा के इन रूपों पर सिर्फ दक्षिणपंथी ताकतों का ही कब्जा नहीं है, बल्कि वाम जनवादी और क्रांतिकारी हलकों में भी इनकी उतनी ही भरमार है.

क्रांतिकारी आंदोलन में, उन महिलाओं को ‘फ्री सेक्स सिद्धांतकार’ या ‘बुर्जुआ नारीवादी’ कह बदनाम करने का रुझान है, जो पितृसत्ता, गैरबराबर लैंगिक संबंधों, यौन हिंसा, शादी और परिवार के संस्थानों के खिलाफ सवाल खड़े करती हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वे साम्राज्यवादी संस्कृति को बढ़ावा देकर जानबूझ कर वर्ग संघर्ष को भोथरा कर रही हैं. क्रांतिकारी आंदोलनजिसे ‘फ्री सेक्स सिद्धांत’ कहता है,उसका झूठा औरघिनौना इस्तेमाल, नेताओं (जो हमेशा ही मर्द होते हैं) और कैडरों को इसमें सक्षम बनाता है कि वे मुश्किल सवाल खड़े करनेवाली महिलाओं के खिलाफ तोहमतें लगाएं (स्लैंडर करें) और उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलाएं. अब तक हमारे इस्तीफे पर जो जवाब आए हैं (डीएसयू-बिहार, इन्कलाबी छात्र मोर्चा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भगत सिंह छात्र मोर्चा-बीएचयू) वे इसको बखूबी जाहिर करते हैं. इन जवाबों में, हमारे द्वारा उठाए गए सवालों पर ठीक से गौर करने की कोशिश किए बगैर, हमें‘स्वच्छंद प्रेम’ और ‘स्वच्छंद यौन सम्बन्ध’ को बढ़ावा देने वाला कह कर प्रचारित किया गया है और कहा गया है कि हमने जो सवाल उठाए हैं उनसे ‘यौन अराजकता’ फैलेगी. हमारे कैंपस में, छात्रों के आंदोलनों से होने वाले एक तुलनात्मक जनवादीकरण को पचा पाने में नाकाम दक्षिणपंथी संगठन अक्सर ही प्रगतिशील-जनवादी संगठनों और खासकर महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐसे ही प्रचार, तोहमतों और अफवाहों का सहारा लेते हैं. लेकिनडीएसयू-बिहार, आईसीएम और बीसीएम भी ठीक उसी सामंती-नैतिकतावादी बेचैनियों के शिकार कैसे बने हुए हैं? जैसे मिसाल के लिए आईसीएम-बीसीएम के जवाब की निम्नलिखित पंक्तियों पर गौर करें:‘गांवों से शहरों में पढ़ने आये या कॉलेज में पहुंच चुके लड़के-लड़कियां अपने सामंती और पितृसत्तात्मक मूल्यों को लेकर जब यहां पहुंचते हैं तो वहां वे नये तरह के मूल्यों से टकराते हैं ये हैं साम्राज्यवादी उपभोक्तावादी मूल्य। वे पहले को न तो पूरी तरह छोड़ पाते हैं और नये को अपनाने लगते हैं। दोनों का मेल उनके व्यक्तित्व को विकसित होने से रोक देता है और वे अजीब से मूल्यों के साथ अपनी इस आजादी का इस्तेमाल करना शुरू करते हैं। लड़के-लड़कियां को उनके घरों में जहां देखने की भी मनाही होती है यहां वे साथ में घूम सकते हैं, रह भी सकते हैं। इसका परिणाम अन्य बातों के अलावा स्वच्छंद यौन सम्बन्धों के रूप में सामने आ रहा है, और कई जगहों पर ये संगठनों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। इन जगहों पर संगठन में जुडने वाले लड़के -लड़कियां अपने कामों से ज्यादा आपसी संबन्ध बनाने में या साथ में नशा करने में लगे रहते हैं।’
(https://web.facebook.com/inqalabichhatra.morchaicm/posts/1701916596760293) इसमें और इस जैसे अनेक बयानों और नजरियों में दो कॉमरेडों के साथ रहने की संभावना को बार-बार खारिज किया गया है, कहा गया है कि ऐसे रिश्तों को कबूल नहीं किया जा सकता!

हमने विभिन्न जेंडरों के बीच यौन हिंसा को शादी के पहले या शादी के बाद के गलत और झूठे बंटवारे के भीतर देखने के बजाए उन गैरबराबर शक्ति संबंधों के भीतर देखने की कोशिश की है, जिनकी जड़ें सामंती पितृसत्तात्मक ढांचे में हैं. हमारी इन कोशिशों पर उन्होंने यह आरोप लगाया है कि हम‘पूंजीवादी वेश्यालयों’ (यानी लिव इन संबंधों) को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमें, उनका कहना है कि, औरतों का शोषणहर हालत में लाजिमीहै. वे कहते हैं कि ‘एलीट’ महिलाएं अपनी भ्रमितचेतना की शिकार हैं, क्योंकि आईसीएम-बीसीएम के मुताबिक मध्यवर्ग और मेहनतकश वर्ग की महिलाओं के उलट ‘एलीट औरतें’ शादी के पहले सहमति से बनाए गए संबंधों को ‘पुरुषों की प्राकृतिक यौन आकांक्षा’ द्वारा अपने शोषण के रूप में नहीं देखतीं!हिंसा, नियंत्रण, मोरल पुलिसिंग और प्रभुत्व के इन सारे सवालों को‘चंद मुट्ठी भर लोगों के जीवन में आए बदलाव से उपजा हुआ एक वर्गीय सवाल’ (https://www.facebook.com/dawa.sherpa.7543653/posts/1261264183899787) और ‘निजी संबंधों की समस्याएं’ बता दिया गया है, जिनका ‘मेहनतकश महिलाओं की व्यापक आबादी से कोई लेना देना नहीं’ है (जबकि वे मर्दों के नियंत्रण की तरफदारी करने वाले अपने नजरिए को औरतों के हित में बताते हैं). अक्सर ऐसा होता है कि गहराई तक धंसी पितृसत्ता और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे के शक्तिसंबंधों पर सवाल करने की किसी भी कोशिश पर रूढ़िवादी ताकतें ‘यौन अराजकता’ के ऐसे ही डर से कांपने लगती हैं. नारीवादियों को हिंसा, शादी, तलाक, यौनिकता वगैरह से जुड़े सवालों को उठाने के लिए अक्सर ही प्रतिक्रियावादी ताकतों की तरफ से ऐसे हमलों और दुष्प्रचारों का सामना करना पड़ता है. लेकिन जब खुद को प्रगतिशील और यहां तक कि क्रांतिकारी कहनेवाली ताकतें भी वही तरकीबें अपनानें लगती हैं, तब विडंबना और भी गहरीहो जाती है. डीएसयू-बिहार, आईसीएम, बीसीएम ने जो कहा है, उस तरह के आक्षेपों और महिलाओं से नफरत तथा पितृसत्तात्मक प्रचार का असर यह पड़ता है कि न सिर्फ इससे मुश्किल सवाल किनारे कर दिए जाते हैं, बल्कि साथ ही साथ यह सवाल उठाने वालों को भी अलग थलग कर देता है. खास कर ऐसा महिला कार्यकर्ताओं के साथ होता है, जिनको बिगड़े चरित्र की, पतित, बदचलन और ‘फ्री सेक्स के सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली बुर्जुआ नारीवादी’ के रूप में चित्रित किया जाता है! यह एक आम बात है कि किसी भी संगठन में आनेवाले कार्यकर्ता अपने साथ अपने समाज की अवधारणाएं और नजरिए लेकर आते हैं, लेकिन एक क्रांतिकारी आंदोलन से यह उम्मीद की जाती है वह उन्हें इन समस्याग्रस्त बातों को छोड़ना सिखाएगा. लेकिन इस सवाल पर, आंदोलन न सिर्फ सामान्य बुद्धि (कॉमन सेंस) के विचारों को ही मजबूत करता है, बल्कि सक्रिय रूप से उन नेताओं और कैडरों को इसका साहस भी देता है कि वेसवाल उठाने वालों के खिलाफ तोहमतें लगाकर, बदनाम करके, अफवाहें फैलाकर और उनका चरित्र हनन करके या फिर मोरल पुलिसिंग का सहारा लेकरउनको अलग-थलग कर दें. सिद्धांत में जब ऐसी पितृसत्तात्मक और अलोकतांत्रिक समझदारी हो तो व्यवहार मेंइसका नतीजा एक ऐसे रवैए के रूप में सामने आएगा, जो मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाला और महिला विरोधीहो. और खास कर जब यह समझदारी खुद को मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के मुखौटे में मार्क्सवादी लफ्फाजी औरशब्दजाल के साथ खुद को पेश करे, तब तो दुष्प्रचार और तोहमतों (स्लैंडर) की एक ऐसी जबरदस्त और घिनौनी मिसाल बनती है कि उसको महिला विरोधी के रूप में पहचानने की बात कौन कहे, उसको ज्यादातर बढ़ावा ही दिया जाता है.

2004 में क्रांतिकारी आंदोलन के नेतृत्व ने यह कबूल किया कि आंदोलन में पितृसत्तात्मक नजरिया भी है. हालांकि क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद कम बना हुआ है. ऐसा है, तो फिर क्या यह मुमकिन नहीं है कि जिस तरह व्यापक समाज महिलाओं पर नियंत्रण और प्रभुत्व बनाने की कोशिश करता है, वैसा क्रांतिकारी आंदोलन में भी पाया जाता हो? क्या यह मुमकिन नहीं है कि क्रांतिकारी आंदोलन पितृसत्ता के बारे में अपनी सामान्य बुद्धि/सामंती नैतिकतावादी समझदारी की वजह से सिर्फ उन्हीं महिलाओं को जगह देता हो जो उसके अपने नजरिए के साथ सहमत हों और दोयम दर्जे की मातहत जगहों को कबूल कर लेती हों? क्या यह मुमकिन नहीं है कि मध्यवर्ती कतारों में या कुछ अहम जगहों पर एकाध महिलाओंका होना सिर्फ गहराई तक धंसी पितृसत्ता के साथ लड़ाई की कीमत पर मुमकिन हो पाया हो?कम्युनिस्ट आंदोलनों में नेतृत्व में अपने शुरुआती दौर हमेशा ही निम्न-पूंजीपति तबके से आता है. और हम इसकी ऐतिहासिक जरूरत को समझते हैं. हमने देखा है कि किस तरह पिछले कुछ दशकों में निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आई हजारों महिलाओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी की है. तब एकाध अपवादों को छोड़ कर वे नेतृत्व के पदों तक पहुंचने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई हैं? क्या ऐसा है कि निम्न-पूंजीपति पृष्ठभूमि से आने वाले मर्द तो फौरन खुद को ‘डी-क्लास’ कर लेते हैं और सच्चे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन जाते हैं, जबकि महिलाएं अपनी ‘पारिवारिक विचारधारा’ से पार पाने में नाकाम रहती हैं? या ऐसा इसलिए है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं ‘फ्री सेक्स सिद्धांतकार’ और इसलिए ‘साम्राज्यवादी एजेंट’बन जाती हैं? या फिर इसकी वजह आंदोलन के भीतर के महिलाओं से नफरत करने वाले, सामंती, पितृसत्तात्मक तत्व हैं, जो दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों की मदद से उन महिलाओं के लिए जगहों को खत्म कर देते हैं, जो पितृसत्ता और मर्दों के प्रभुत्व के खिलाफ सवाल करती हैं? वे कोई भी तरीका अपनाएं, चाहे सवाल करने वालों की ‘सफाई’ करें या फिर अपना मुंह बंद रखने वालों को बढ़ावा दें, इससे आखिरकार नुकसान तो पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई को ही होता है.
असली जनवादीकरण की प्रक्रिया में न्याय अहम मुद्दा है. नियंत्रण और संरक्षण कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों की सचमुच में राजनीतिक भागीदारी को यकीनी नहीं बना सकता. आंदोलन को यह कबूल करना होगा और इस पर अमल भी करना होगा कि महिलाएं और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर भी राजनीतिक कर्ता हैं. क्रांतिकारी आंदोलन का जनवादीकरण भी एक प्रक्रिया है, जो समाज के जनवादीकरण के व्यापक संघर्ष के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है. और यह जनवादीकरण अपने आप नहीं होता. इस दिशा में सचेत कदम उठाने पड़ते हैं. व्यापक समाज की और अपने भीतर की पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई के संदर्भ में, क्रांतिकारी आंदोलन को सबसे पहले महिलाओं तथा दूसरे उत्पीड़ित जेंडरों के खिलाफ दुष्प्रचारों, तोहमतों और अफवाहों को यौन हिंसा/उत्पीड़न के गंभीर रूपों के रूप में पहचानना होगा और जो लोग इसके जिम्मेदार हों, उनके खिलाफ कार्रवाई करनी होगी. क्रांतिकारी आंदोलन का असली जनवादीकरण, अकेले राजनीति शिक्षा के जरिए ही हासिल नहीं किया जा सकता;न्याय भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. जब औरतें और दूसरे उत्पीड़ित जेंडर यौन उत्पीड़न/हिंसा का सामना करते हैं, तो इसका इल्जाम सिर्फ साम्राज्यवादी संस्कृति पर थोप कर और यह कह कर छुट्टी नहीं पाई जा सकती कि इसको राजनीतिक (यानी नैतिक) शिक्षा से ठीक किया जा सकता है. यौन उत्पीड़न/हिंसा,सत्ता और ताकतके अपराध होते हैं, जो उत्पीड़नकारी और शोषणकारी सामाजिक संबंधों से जुड़े हुए हैं और न्याय को यकीनी बनाने के लिए उनपर इसी रोशनी में गौर किया जाना चाहिए.

तब पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई और जेंडर संबंधों के जनवादीकरण की दिशा में बढ़ने का सही तरीका क्या हो सकता है? हमने अब तक इस मुद्दे पर क्रांतिकारी आंदोलन की समझदारी में गंभीरकमियों की आलोचना की है. दूसरे शब्दों में हमने अब तक इसी पर गौर किया है कि इस सही तरीके के दायरे में कौन कौन सी चीजें नहीं हो सकती हैं. और हमने इसकी वजह भी बताई है. हमने किसी भी सार्थक संवाद पर जोर दिया है, और यह अहम बात है कि हम पितृसत्ता की लड़ाई को एक अलग-थलग लड़ाई नहीं मानते बल्कि हम मानते हैं कि यह वर्ग संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है. हमने एक विस्तृत वैकल्पिक नजरिए को पेश नहीं किया और न ही हमारे लिए यह मुमकिन है कि एक विश्वविद्यालय में बैठ कर हम ऐसा एक नजरिया पेश करें. बल्कि इस दिशा में एक अच्छी शुरुआत इस तरह हो सकती है कि राजनीतिक मतभेदों को मंजूर किया जाए और राजनीति पर आधारित बहस के लिए एक जनवादी स्पेस बनाया जाए. लेकिन ऐसी किसी बहस में शामिल होना तो दूर, विचारों के मतभेदोंको जगह देना तो दूर, हमने अब तक बस यही देखा है कि किस तरह तोहमतों, दुष्प्रचारों और हमलों की एक आक्रामक लहर ने जो जगह थी, उसको भी तेजी से खत्म किया है.इसी ने आखिरकार डीएसयू से इस्तीफा देने के लिए हमें मजबूर किया. यहां तक कि अब तक हमारे सवालों का जो भी जवाब देने की कोशिश की गई है, उनमें न सिर्फ उसी सामंती-नैतिकतावादी नजरिए को मजबूती से पेश किया गया है, बल्कि इन सवालों और उन्हें उठाने वालों के खिलाफ दुष्प्रचार भी घिनौने रूप में जारी है. इन सबके बावजूद हमनेअब तक अपने राजनीतिक मतभेदों को इस यकीन के साथ पेश किया है और आगे भी इसे जारी रखेंगे कि ये बहुत अहम सवाल हैं, जिन पर क्रांतिकारी आंदोलन को ईमानदारी से विचार करना चाहिए. उसे इन पर विचार करना ही चाहिए, क्योंकि पितृसत्ता और जेंडर के अहम सवाल पर ऐसी एक पितृसत्तात्मक, सामंती-नैतिकतावादी, मर्दों के नियंत्रण और संरक्षण वाली समझदारी के साथ न तो समाज का जनवादीकरण हो सकता है और न ही उसका क्रांतिकारी रूपांतरण हो सकता है.
संयुक्त रूप से 
अनिर्बाण, अनुभव, आश्वथी, उफक, उमर, गोगोल, प्रिय धर्शिनी, बनो ज्योत्सना, रेयाज, रुबीना, स्रीरूपा

बच्चों को रोटी, कपड़ा, दवा और पढाई नहीं दे पाने वाला समाज सिर्फ सजा देने के लिए उतावला है

स्त्रीवादी अधिवक्ता अरविन्द जैन किशोर न्याय अधिनियम,1986 की विशेषज्ञ समिति के सदस्य रहे हैं. किशोर न्याय अधिनियम में परिवर्तन के कदम पर उनसे राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप) के लिए राजीव मंडल की बातचीत . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए साभार . 


अरविन्द जी, आप किशोर न्याय अधिनियम,1986 की विशेषज्ञ समिति के सदस्य रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि निर्भया कांड जैसी घटनाओं को देखते हुए नाबालिग़ अपराधियों/किशोरों की उम्र घटाना ज़रूरी था,जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि किसी एक घटना के आधार पर क़ानून में इतना अहम फैसला काफ़ी सोच-विचार कर ही होना/करना चाहिए था.



मेरा मानना है कि इस संदर्भ में बच्चों के प्रति राष्ट्र और समाज की जो जिम्मेदारी है, उसे किसी एक ख़ासमामले पर उभरी जन-भावनाओं या मीडिया के दबाव-तनाव में नहीं बदला जाना चाहिए था. विशेषकर जब राष्ट्रीय स्तर पर कोई अध्ययन उपलब्ध ना हो. पन्द्रह साल पहले सन 2000 में ही तो संशोधन करके अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में (मंत्री मेनका गांधी ने) किशोरों की उम्र16 से बढ़ाकर 18 साल की थी. इस बीच ऐसा क्या हो गया कि उम्र घटाने की जरूरत आन पड़ी! यह जन-भावना का सम्मान है या शहरी-शिक्षित माध्यम वर्ग का दबाव या मीडिया या तनाव? देश जब अपने करोड़ों बच्चों कोशिक्षा, रोटी, कपड़ा, दवा, छत या रोज़गार नहीं दे सकता, तो उन्हें सचमुच अपराधी बनने पर विवश करता है और सिर्फ सज़ा देता हैं। इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय  समझौते, संविधान और बाल अधिकारों को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सरकार का तर्क है इस दौरान किशोर अपराधों में काफी बढ़ोतरी हुई है?
किशोर अपराधों में बढ़ोतरी हुई दिखती है, तो राष्ट्रीय स्तर पर तमाम तरह के अपराधों में हुई है. भारत में जितने अपराध हुए हैं, उसमें से किशोरों से जुड़े अपराधों का हिस्सा तो सिर्फ 1.2 प्रतिशत ही है. फिर भी इतना शोर या हो-हल्ला क्यों मचाया जा रहा है.हमें नहीं भूलना चाहिए कि सन 2000 में उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 साल की गई थी, सो 16-18 साल के लड़कों द्वारा किये अपराध भी किशोर अपराध की श्रेणी में शामिल हो गए. वास्तव में यह यह आंकड़ों की जादूगरी भी है और छलावा भी. मान लो कि पिछले कुछ सालों में 16-18 साल के किशोरों से जुड़े जघन्य अपराध भी बढ़ रहे हैं,तो क्या इनकी उम्र घटाकर बालिगोंकी तरह सजा देने से समस्या का समाधान हो जाएगा. अगर अपराध बढ़े भी हैं तो उसके कारणों की जांच-पड़ताल की जानी चाहिए, ना कि सज़ा बढ़ाने कर अपराध कम करने का प्रयास. बच्चों को जेल में ख़तरनाक अपराधियों के साथ रखेंगे, तो जब बाहर निकलकर आएंगे तो निश्चित तौर पर पक्के अपराधी बनकर ही बाहर निकलेंगे. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार  2010 में 26629, 2011 में 29990, 2012 में 35346, 2013 में 39361 और 2014 में 45621 किशोर अपराध के मामले दर्ज किए गए थे. 55.6% किशोर अपराधियों के परिवार की आर्थिक हालात का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनकी सालाना आमदनी 25000 रूपये तक और 22.4% की आय 50000 रूपये तक ही थी. किशोर अपराधियों में 21% एकदम अनपढ़, 31% प्राथमिक शिक्षा, 37% दसवीं पास थे और 10% दस से अधिक पढ़े हुए थे.

स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा के अपराध बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
ना जाने कब से, यौन हिंसा की शिकार स्त्री की ‘प्रेतात्मा’, सड़क से संसद तक मंडरा रही है और शायद तब तक मंडराती रहेगी, जब तक उसे ‘इन्साफ’ नहीं मिलता। ‘प्रेतात्मा’ के भय, दबाव और तनाव में रातों-रात ‘आपात कालीन’ आयोग बने, ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से अध्यादेश जारी किये गए, ‘विंडोड्रेसिंग’ से कानूनी संशोधन करने पड़े और आंसू पोछने के आधे-अधूरे प्रयास किए, परिणाम स्वरूप यौन हिंसा के ‘आंकड़े’ लगातार बढ़ते गए और निरंतर बढ़ रहे है। क्या करें-सरकार की समझ से बाहर है।

क्या मौजूदा कानूनों से बाल अपराधियों को नहीं सुधारा जा सकता था?
हालाँकि तीन साल बाल सुधार गृहों से संबंधित अभी तक कोई ऐसा अध्ययन सामने नहीं आया है कि तीन साल के बाद सुधार गृहों से निकलने वालों में से ऐसे कितने हैं, जो वाकई में सुधर गए और कितने अपराध की दुनिया में खो गए.सच बात तो यह है कि क़ानून और नीतियां बनने के बावजूद, नाबालिग़ अपराधियों की शिक्षा, पुनर्वास और सुधार पर अपेक्षित काम नहीं किया गया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इन्हें भी बालिग़ शातिर अपराधियों की तरह, सुधारने का अवसर दिए बिना ही सज़ा दी जाए या फ़ांसी पर लटका दिया जाए. अधिकांश किशोर अपराधी अनपढ़ और गरीब परिवारों के बच्चे हैं. इनके प्रति देश-समाज इतना असंवेदनशील, विवेकहीन या बेरहम कैसे हो सकता है! बाल सुधार गृहों में इन नाबालिग़ अपराधियों की समुचित ‘काउंसलिंग’ की जानी चाहिए. मुझे तो इन सब के सुधार की हर संभावना, तलाशना-तराशना लाज़िमी लगता है. संभावना का गर्भ में ही गला घोंटना तो आत्मघाती भी है और जघन्य अपराध भी, जिसके लिए भावी पीढियां हमें कभी माफ नहीं कर पाएंगी!

इस बारे में आंकड़े क्या और किस तरफ इशारा करते दिखाई देते हैं? 
जहाँ तक नाबालिग़ों के रिकॉर्ड की बात है, तो सभी सुधार गृहों में इस तरह के आंकड़े तो हैं कि उनके पास कितने नाबालिग़ आए, कितने समय तक रहे और उन्हें कब छोड़ा गया. लेकिन सुधार गृह से छोड़े जाने के बाद का ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ शायद उनके पास नहीं होता.जघन्य अपराधों के मामले में भी यही स्थिति है. आंकड़ों या अपराधियों का कोई वर्गीकृत रिकॉर्ड रखा जाता है, कहना मुश्किल है. नया अधिनियम जो अभी राज्यसभा ने पारित किया है, संभवत उसमें ऐसे प्रावधान किए गए हैं, जिसमें किशोर अपराधियों का सम्पूर्ण रिकॉर्ड रखा जाएगा.

‘निर्भयाकाण्ड’ के बाद, 2013 में भी तो कानूनी संशोधन करके कड़ी सज़ा के प्रावधान किये गए थे, फिर अपराध क्यों बढ़ रहे हैं?
दरअसल ‘निर्भयाकाण्ड’(दिसम्बर, 2012) के बाद, भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में किए/हुए संशोधन (2013) के बाद ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र, 16 साल से बढ़ा कर 18 साल कर दी गई, मतलब यह कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से यौन सम्बन्ध, भले ही उसकी सहमती हो या ना हो- ‘बलात्कार’ का अपराध माना जाने लगा, सो जाहिर है कि 16-18 साल की लड़कियों के साथ हुए अपराध इस वजह से भी अपराध के आंकड़े बढ़ेंगे ही. दूसरा कारण यह कि ‘बलात्कार’ की परिभाषा भी पहले से कहीं अधिक व्यापक कर दी गई, उसकी वजह से भी अपराध बढ़े हुए दिखाई देते हैं. इस तरफ किसी ने नज़र घूमा कर देखा तक नहीं, सोचने-विचारने का तो सवाल ही नहीं उठता.

ऐसे कानूनी संशोधन से क्या कोई लाभ हो पाया या नहीं?
आप देखे कि 2013 संशोधन में ‘सहमति से सम्भोग’ की उम्र 16 साल से बढा कर 18 की गई, लेकिन 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी से कानूनी ‘बलात्कार का अधिकार’ पहले जैसा ही बना रहा. इस संदर्भ में विधि आयोग और वर्मा कमीशन की एक भी सिफारिश सरकार ने नहीं मानी. मुझे लगता है कि मूल मंशा ‘देश की बेटियों’ को ‘यौन हिंसा’ से भी बचाना था और ‘कानूनी विसंगतियों और अंतर्विरोधों’ को भी समाप्त करना था। पर सच यह भी है कि हमें अपनी ‘बेटियों’ को तो यौन सम्बंधों से सुरक्षित रखना है,पर नाबालिग पत्नी (बहुओं) से सहवास (बलात्कार) करने का कानूनी अधिकार (हथियार) और ‘बलात्कार की संस्कृति’ को भी बनाये-बचाये रखना है। अभी भी तमाम ‘कानूनी विसंगतियां और अंतर्विरोध’ बने-बचे है, जिनकी वजह से वरना विवाह संस्था या परिवार चलेगा कैसे!

बढ़ते किशोर अपराधों को रोकने, अपराधियों को सुधारने और अपराध-मुक्त समाज बनाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
किशोर अपराधों को रोकने, अपराधियों को सुधारने और अपराध-मुक्त समाज बनाने के लिए ‘राजनीतिक इच्छा शक्ति’ होना जरूरी है. यह नहीं कि कहीं आग लगे तो ‘फायर ब्रिगेड’ बुलाओ, आगबुझवाओऔर भूल जाओ. किशोर अधिनियम में अभी जो संशोधन किए गए हैं, वह मूल रूप से ‘अमेरिकनसिस्टम’ की नक़ल ही है, जबकि भारत और अमेरिका की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति में बहुत अंतर है. मुख्य रूप से अशिक्षा और निर्धनता या पारिवारिक हालत ही किशोर लड़के-लड़कियों को अपराध की अंधेरी गलियों तक पहुंचाते है. अपराधों के आंकड़े आईने की तरह साफ़ है, बशर्ते हम पढ़ना चाहें. पिछले कई सालों से बच्चियों से बलात्कार और किशोर अपराधों के मामले में मध्य प्रदेश सबसे आगे रहता रहा है और महाराष्ट्र और बिहार पीछे-पीछे. क्या कभी इन राज्य सरकारों या किसी विद्वान-समाज-शास्त्री ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर इसके पीछे कौन से सामाजिक-आर्थिक कारण हैं. सामन्ती सोच, निर्धनता, अशिक्षा या कुछ और!मुझे लगता है कि कानून का ‘छकड़ा’ वापिस लौट रहा है. 2015 से 1860 तक का उल्टा सफ़र, शायद अगले कुछ सालों में पूरा हो जाए. अब और क्या कहूं? क्या लिखूं? क्या बताऊं?

स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने महत्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब ‘औरत होने की सजा’ हिन्दी में स्त्रीवादी न्याय सिद्धांत की पहली और महत्वपूर्ण किताब है. संपर्क : 9810201120, bakeelsab@gmail.com

ब्राह्मणवाद ने की बाजीराव-मस्तानी की हत्या

चंद्र सेन
संजय लीला भंसाली की एक और दुखान्त प्रेम-कहानी- बाजीराव-मस्तानी। हर फिल्म निर्देशक की अपनी एक खासियत होती है। भंसाली  को भव्य-सेट और प्रेम की  पराकाष्ठा को पर्दे मे बखूबी चित्रित करने की महारात हासिल है। इसे उनकी सभी फिल्मो‌ में देखा जा सकता है। मसलन, देवदास, साँवरिया, खमोशी, गुजारिश, हम दिल दे चुके सनम सहित राम-लीला और मैरीकॉम।

दर्शक उपर्युक्त विशेषताओं को ‘बाजीराव-मस्तानी’ में भी असानी से नोटिस कर सकते हैं। दूसरी बात, भंसाली साहब ने एक हद तक महिलाओं के इर्द-गिर्द अपनी कहानियों को बुना है। या यूँ कहें कि हीरो यानी पुरुषों के स्टेज हाई-जैक करने की प्रथा पर लगाम लगाया है। प्रेम एक ऐसा कृत्य है,  जिसे ये सामंती-रूढ़िवादी और जाति-धर्म तथा वर्ग आधारित समाज कभी नहीं बर्दाश्त करता है। साथ ही साथ मधुर संगीत, डांस, रोना-धोना, त्याग, इज्जत-मर्यादा और भारतीय रूढ़िवादी संस्कारों से  संघर्ष भंसाली की  फिल्मों की अन्य विशेषतायें हैं।
राजनीतिक इतिहास को लेकर विद्वानों ने अपनी कई दिक्कतें ज़ाहिर की हैं, जो कई मायनें में जायज़ भी हैं। ये इतिहास महलों और राजा-रानियों तक सिमटा है जो कूटनीतिक-चालबाजियों और युद्धों का एक पुलिंदा है। मतलब एक ख़ास वर्ग अर्थात कुलीनों का लेखा-जोखा। पूरा का पूरा राजनीतिक इतिहास शासक तबके की विचारधारा और उनकी नीतियों का दस्तावेज है। तब सवाल उठता है कि आम जनमानस और उसके सरोकार क्या रहे हैं? इतिहास में उनका नमोनिशान क्यों नहीं है? उसके जीवन की समस्याएं तथा देश और समाज को बनाने में उनकी क्या भूमिका रही है? और इन्ही सवालों ने जन्म दिया एक नये इतिहास लेखन को जिसे हम प्राय: सामाजिक इतिहास कहते हैं। या यूँ कहें कि एक नये इतिहास लेखन का दौर चालू हुआ जिसे ‘हिस्ट्री फ्राम बिलो’ कहा जाता है। राजाओं की स्तुतियाँ करने वाले और उनकी कारगुजारियों पर पर्दा डालने वाले कवियों और इतिहासकारों को दरबारी या भांड कहा जाता रहा है।

अब सवाल उठता है कि ऐसे इतिहासकारों की पोथियों को कट-पेस्ट कर यदि कोई फ़िल्मकार फ़िल्म बनाता है, तो उसे किस कटेगरी मे रखा जाये? वो भी तब जब फ़िल्मकार का दावा है कि ये पटकथा ‘वेल रिसर्च्ड’ है!
ऐतिहासिक विषयों पर आधारित पटकथा में हमेशा यह  संभावना रहती है कि उसके तथ्य और संवादों को कलाकार अपने तरीके से पेश करे, यह एक कलाकार का अपना अधिकार है। निर्देशक कोई इतिहासकार तो नहीं होता, वह एक कमर्शियल मूवी बनाता है और उसका मक़सद जनता का मनोरंजन और धन वसूलना होता है, ये तर्क हमेशा दिए जाते रहें हैं।

क्या इनके मनोरंजन परोसने के पीछे कोई और मक़सद नही होता है? इस मनोरंजन की भी तो राजनीति होती होगी? क्या यही मनोरंजन हमारे संस्कारो‌‌‌ और मूल्यों को नहीं गढ़ रहे हैं?  अगर ऐसा नहीं है तो ‘वाटर’, ‘बैंडिट क़्वीन’, ‘कोर्ट’ या अन्य फिल्मों पर सेंसर बोर्ड अटक -अटक कर फैसले क्यों करता है ? रोजाना थोक में बन रही मसालेदार फ़िल्में हिट हो रही हैं, जो घोर महिला विरोधी होने के साथ-साथ सेक्सिस्ट तथा अल्पसंख्यकों और मार्जिन के लोगों  को गलत प्रोजेक्ट कर रही हैं।

अन्य पटकथाओं की भांति ‘बाजीराव-मस्तानी’ की भी एक राजनीति है। ये उसी वर्चस्ववादी राजनीति की एक कड़ी है, जो ऊपर से वक़ालत करती है कि आज जातिवाद की कोई समस्या नहीं है। लेकिन, आज भी पूरा समाज टोलो-बाड़ों मे (गावं से लेकर शहर तक) बंटा है। रोज हो रही दलितों की हत्याएं, बलात्कार और ऑनर-किलिंग के साथ-साथ जातिवादी इश्तहार कुछ इसके सतही प्रमाण हैं।

कहानी (‘बाजीराव-मस्तानी’) एक सनातनी राजा की है,  जो हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करने के लिये वचनबद्ध है। हिंदू धर्म की रक्षा और मनुस्मृति के विधानों को लागू करना ही उसका राजधर्म है। इस पूरी मुहिम में मुग़ल रोड़ा हैं,  इसलिए नायक मुग़लों के ख़ात्मे के लिए निकल चुका है। बुंदेलखंड के हिंदू-राज्य को बचाने के लिए पूना से एक हिंदू (पेशवा) राजा बिना शर्त उसकी मदद के लिये ख़ुद जाता है। ये कथा उस इतिहास से प्रेरित है, जब हिंदू समाज मनु के दंड-विधान से चलता था। हमें याद रखना होगा कि ये वही पेशवा और उनकी पेशवायी थी,  जो  शूद्रों के गले मे हांडी और पीछे झाड़ू बंधा ना अपनी शान समझते थी|

उन्हें हाथ में घंटी या फिर कोई आवाज़ करने वाली चीज़ लेकर चलना पड़ता था ताक़ि उसके रास्ते में चलने की सूचना ब्राह्मणों  के कानों में सुनाई दे और ब्राह्मण  उसके रास्ते से हट जाएं। शूद्रों को दिन में बाहर निकलने की आजादी तक नही थी,  क्योंकि उनकी छाया से सवर्ण अपवित्र हो जाते थे। शूद्रों की दशा अफ्रीका और अमेरिका के अश्वेत लोगों से भी बद्तर थी क्योंकी गोरो ने अश्वेतो के साथ कभी भी छुआछूत नही किया। जहाँ एक तरफ शूद्रों की छाया अपवित्र थी,  वही अश्वेत लोगों कि पहुंच गोरों के किचेन और डायनिंग टेबल तक थी।

डॉ आंबेडकर ने ‘द अनटचेबल्स एंड द पेक्स ब्रिटेनिका’ में विस्तार से लिखा है कि किस तरह से महार सैनिकों ने पेशवा के इस अत्याचार को 1 जनवरी 1818 ई॰ को कोरेगांव के युद्ध में समाप्त कर दिया था। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा राव के 28 हजार घुड़सवारों और पैदल सैनिकों की फ़ौज को धूल चटाकर देश से पेशवाई का अंत किया था। ये तथ्य भंसाली जी के पूरे सिनेमाई प्रदत्त-इतिहास और पेशवाओं की बहादुरी की पोल खोल देतें हैं| आगे चलकर इसका प्रतिकार डॉ. अम्बेडकर ने 1927 मे मनुस्मृति जलाकर किया है। वेदों और स्मृतियों की सत्ता को नकार कर बराबरी और स्वतंत्रता पर आधारित सविंधान को प्रमुखता प्रदान की गयी।

एक कहानीकार या इतिहासकार जो लिखता है उसमेँ उसकी सोच और राजनीति होती है। लेकिन वो क्या छुपाता है, क्या क्या नहीं लिखता है, इससे भी हम उसके बौद्धिक षड्यंत्र का पता लगा सकते हैं। फिल्म ‘बाजीराव-मस्तानी’ कहानी मे भंसाली और उनकी पूरी टीम ने इस काम को बखूबी निभाया है। पेशवाओं के इतिहास को शूद्रों और महिलाओं के प्रति क्रूरता घृणा और अमानवीयता के रूप मे दिखाने की  बजाय भंसाली जी ने उसे सेक्युलर  और महिलाओं की कद्र करने वाले दस्तावेज के रूप में महिमा मंडित करने की एक शातिर कोशिश की है। ये महिमा मंडन निश्चय ही नायक और नायिका के प्रेम वियोग मे मृत्यु के रूप मे दिखाया गया है। ऐसा इतिहास मे हुआ ही हो, इसमे संदेह है।

मजेदार तो ये है कि निर्देशक साहब  तो इस पट्कथा को महिला सशक्तीकरण के रूप में भी पेश करने की भरपूर कोशिश करते हुए वाह्वाही लूटने की फिराक मे भी दिखते  हैं। इनका नारीवाद ब्राहमंवादी पितृसत्तात्मक विचार से आगे नहीं निकल सका। एक वीरांगना (मस्तानी) को भी अपनी सुरक्षा के लिए भी अपने मर्द की ही जरूरत पड़ती है। शादी के बाद उसके भी वही सपनें होते है जो एक आम भारतीय नारी की होती है, वही संस्कार वह  निभाने को आतुर होती है। प्रेमी के चयन में भी भंसाली की वीरांगना स्टीरिओटाइप की शिकार हो जाती है।
सेकुलरिज़म को अधूरे और विकृत रूप में पेश करने की हिंदी पटकथाओ की एक कोशिश हमेशा रही है। भंसाली जी ने भी इसे एक प्रोजेक्ट के रूप मे लिया है। राष्ट्रवाद को गढ़ने के लिये किसी एक मुसलमान को पाकिस्तानियों या आतंकवादियों से लड़ते हुये दिखाते हैं या किसी हिंदू को या सिक्ख को दूसरे मजहबी दंगों में बचाना इनका प्रिय शग़ल रहा है।  इस कहानी में भी निर्देशक ने यही काम नायिका और नायक के कुछ घिसे-पिटे सवांदो से पूरा कर दिया है। हरे रंग को मुसलमानों और केसरिया या भगवा को हिन्दुवों के रंग पर बहस फिल्म का एक ऐसा ही हिस्सा है। इस दृश्य में कथाकार रंगो को धर्म और मज़हब के चश्मे से ना देखने की सलाह देते नजर आये हैं। ये है इनका सेकुलरिज़म। आजादी के बाद से यही नज़रिया आज तक चला आ रहा है जिसे भंसाली जी ने भी बखूबी पर्दे पर दर्शाया है।

जब देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अल्पसंखयकों को पकिस्तान भेज देना चाहिये, सरकार की गलत नीतियों पर सवाल खड़ा करने वाले देशद्रोही और आतंकवादी है। देश की मौज़ूदा सरकार के मंत्रियो और नेताओं की मुहिम हिंदू-राष्ट्र बनाने की है। सविंधान के स्थान पर वेदों और स्मृतियों  को तवज्जो दी जा रही है। पड़ोसी  देश नेपाल पर हस्तक्षेप आर्थिक नाकेबंदी तक हो गया है। ये सिर्फ इसलिए कि वहां कि जनता ने हिंदू-राष्ट्र के स्थान पर धर्मनिरपेक्ष-लोकतंत्र   को चुन लिया है। इस माहौल में ऐसी पटकथा का आना निश्चय ही कई शंकाये और सवाल खड़े करता है। ये सवाल बाजीराव-मस्तानी, भंसाली एंड कम्पनी की विचारधारा तथा बालीवुड की मंशा पर हैं।

चंद्र सेन  अंतरराष्ट्रीय  अध्ययन संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं
संपर्क :  9013472504

ताकि बोलें वे भी, जो हैं सदियों से चुप

अनिल अनलहातु 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेजी की कविताएं प्रकाशित. “प्रतिलिपि” कविता सम्मान’2015. संपर्क :analhatukavita@gmail.com, 08986878504

(आज मनु स्मृति दहन  दिवस  के  दिन , भारतीय  महिला  मुक्ति  दिवस  के  दिन, आयें  हम सबके प्रिय  साहित्यकार  उदय प्रकाश  की  कविता  ‘ औरतें ‘ पर  बनी  छोटी  फिल्म  देखें  और  अनिल  अनलहातु के  द्वारा फिल्म  एवं  कविता  की  समीक्षा  भी  पढ़ें .)  


“बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि
उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में”|


ये औरतें ही हैं जिन्हें नहीं पता होता कि उन्हें कहाँ जाना है इस संसार में, क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि उनका पता क्या है।  क्या उनका कोई पता होता है और क्या होता भी है ? पूरे विश्व मे औरतें ही हैं जिनका  कोई पता नहीं होता, कोई बता सकता है कि उनका क्या पता है? सच्चाई तो यह है कि यही सच्चाई है, कि उनका कोई पता नही होता, उनका कोई घर नहीं होता,  इसीलिए उनका कोई पता नही होता , वे बेघर होती हैं,उनका अपने नाम से अपना कोई घर नहीं होता , वह घर जिसमे उन्हें  रहने दिया जाता है वह कभी उनके पिता का होता है , कभी भाई का होता है , कभी पति का होता है, तो कभी पुत्र का होता है। वे बेघर होती हैं क्योंकि उनकी कोई ज़मीन नहीं होती है, न धरती के क्षेत्रफल मे , न व्यक्ति के रूप मे,  न उनका कोई आकाश होता है।  वे ताउम्र किसी और के घर में, किसी और के रहमो-करम  पे रहती हैं और इसीलिए हारकर कहती हैं –
‘एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ
बस मुझे किसी तरह जी लेने दो”
उदय प्रकाश की कविता ‘ औरतें ‘ पर  आधारित  छोटी  फिल्म  



उपर्युक्त पंक्तियाँ दयनीयता की पराकाष्ठा हैं,जहां इस पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने स्त्रियों को शुरू से रखा है, इस देश में एकमात्र  स्त्रियाँ हीं  भूमिहीन हैं।  सवर्णों , अवर्णों, पिछड़े वर्गों ही नहीं दलितों के पास भी भूमि है , भूमि है तो  उनका घर भी है , घर है तो उनके लिए एक स्पेस है, एक देश है , एक देश है तो उनकी एक पहचान है , एक पहचान है तो उनकी अपनी अस्मिता है । और अस्मिता है तो हजारो वर्षों के बाद भी इस निकृष्ट  ब्राह्मणवादी व्यवस्था से लड़कर दलितों ने अपनी  पहचान , अपनी ज़मीन वापस ले  ली  है या ले लेंगे। यह अकारण नहीं है कि स्त्रियों को माहवारी के समय में अस्पृश्य समझा जाता है और उनका उन दिनों मंदिरों मे प्रवेश वर्जित होता है, जिस तरह से दलित अस्पृश्य समझे जाते थे और उनकी छाया तक से ब्राह्मण दूषित हो जाते थे और उनका भी  मंदिरों मे प्रवेश वर्जित था । इसीलिए इस पितृसत्ता ने स्त्रियों को भूमि में, घर  में कोई हिस्सेदारी नहीं दी ,उसे भूमिहीन और बेघर बनाए रखा । यही कारण है कि उनका कोई  अपना घर नही होता, अपना स्पेस नहीं होता,  अपना कोई देश नही होता और इसीलिए उनकी न कोई पहचान होती है, न अस्मिता । पहचान और अस्मिता रहित वे महज शरीर होकर रह  जाती हैं,  जिस पर  भिन्न-भिन्न  समयों मे भिन्न-भिन्न पुरुषों का कब्जा होता है।  उनके इंसान होने के अधिकार को इस पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा  छिन लिया गया है और उन्हें एक पण्य मे तब्दील कर उनका एक सामान,माल के रूप मे उपयोग और उपभोग करने की  निर्बाध स्वतंत्रता पुरुषों को सौंप दी है। तभी हमारे पुराण और ग्रंथ उद्घोषणा करते हैं – ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ कहना  न होगा कि यहाँ वीर कौन है और वसुंधरा से तात्पर्य किसका है.

अपनी पहचान और अस्मिता से रहित एक स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता, वह हमेशा किसी पुरुष के अस्तित्व के साये में जीती है , तभी वह लगातार सुहागन बने  रहना चाहती है, ताकि पति के अस्तित्व के तले उसका भी अस्तित्व सुरक्षित रह सके। किन्तु वहाँ भी वह सुरक्षित नहीं है, इसीलिए ”सोती -सोती अचानक चिल्लाती है,
” क्योंकि
“वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई”
“यद्यपि वह औरत  सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत”।
कभी वह बालकनी में खड़ी आधी –आधी रात इंतज़ार करती रहती है अपने शराबी पति का,
जो उसी की  तरह असुरक्षित और बेबस एक दूसरी औरत के घर से लौटने वाला है ।

एक गहन असुरक्षा, संदेह और डर  के घेरे मे जीती स्त्री अपनी छोटी छोटी जरूरतों के लिए भी पति के ऊपर आश्रित होती है क्योंकि उसके पास कोई रोजगार नहीं, न कोई कमाई। इसीलिए पति की तनख्वाह और ख़र्चे के बारे मे दरयाफ्त करने के पहले  वह पिटने को तैयार रहती है-
“संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले
बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से –
कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से
ज़्यादा रुपये ?”
स्त्री जीवन की कैसी ट्रेजडी है कि अपनी यौवनावस्था मे पति की असुरक्षित सुरक्षा मे जीती स्त्री, अपनी वृद्धावस्था को महफूज़ रखने के लिए, अपने बच्चो के भविष्य मे अपने लिए शरणस्थली खोजती हुई फूट-फ़ूट कर रोने लगती है –
“एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर
और चूमती है उसे पागल जैसी बार-बार,
उसके भविष्य में अपने लिए कोई गुफ़ा या शरण खोज़ती हुई”

यह वास्तव मे निंदनीय और चिंतनीय है कि मनुस्मृति मे लिखा हुआ स्त्रियों की गुलामी का वह मंत्र इस इक्कीसवीं सदी मे भी अमोघ बना हुआ है – “पिता  रक्षति कौमारे, भर्ता च यौवने । रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्रा: ,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति ।“

दरअसल यह पूरी कविता ही एक elegy है, एक शोक गीति है, एक मरसिया है। कवि पूरी स्त्री जाति की मृत्यु का शोक मना रहा है। लेकिन शोक गीति के परंपरागत अर्थों और विन्यास को तोड़ती हुई यह कविता एक बड़े वितान और कनवास पर, औरतों की पीड़ा, यातना और संत्रास को समानान्तर सहती  और भोगती सोक मना रही है। इन्हीं अर्थों मे यह  W. H. Auden द्वारा डब्ल्यू॰ बी॰ यीट्स की मृत्यु पर  लिखित कलासिक “In Memory of W. B. Yeats,” की तरह शोक गीति नहीं है और न वाल्ट व्हीटमैन द्वारा अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन पर लिखी शोक गीति “O Captain! My Captain!” ही, क्योंकि  ये दोनों शोक-गीति एक व्यक्ति की मृत्यु से उत्पन्न शोक, दुख और पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति हैं, जबकि ‘औरतें’ कविता स्त्रियों की सामूहिक नियति की दर्दनाक और हौलनाक आख्यान है।कविता की शुरुआती पंक्तियाँ ही पाठक को अपने गिरफ्त मे ले लेती है, जब कवि बगैर लाउड हुए,बिना चीखे चिल्लाए बड़ी निस्पृहता से कह देता है कि –
‘उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है’ 
और  टूटे मन और तन लिए हुए टूटी हुई 
‘वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर
जाने का टिकट ले रही है’
एक बलात्कार को भोगकर वह जा रही है फिर उस घर के लिए जहां उसके हाथ जल गये हैं तवे में और 
उसके ऊपर ‘तेल गिर गया है कड़ाही में खौलता हुआ’। 
उस घर के लिए जा रही है वह बस मे बैठ कर  जहां “ग़लती से उसके ही हाथों फूट गयी थी किस्मत // और फट गया था स्टोव” 

और इसीलिए 
“अस्पताल में हज़ार प्रतिशत जली हुई औरत का कोयला दर्ज कराता है
अपना मृत्यु-पूर्व बयान कि उसे नहीं जलाया किसी ने,
उसके अलावा बाक़ी हर कोई है निर्दोष।”

औरत के हिस्से मे है सिर्फ धिक्कार,संदेह और शताब्दियों लंबा अंतहीन सन्नाटा और सीमाहीन यंत्रणा का मुसलसल दौर, जहां कोई प्यार नहीं है , कोई प्रेम नहीं है क्योंकि प्यार के पहले और प्यार के बाद दोनों ही ज़मीन पर उसके लिए एक ही विकल्प बचता है जहां –
“एक सीलिंग की कड़ी में बांध रही है अपना दुपट्टा” 
क्योंकि
“उसके प्रेमी ने सार्वजनिक कर दिये हैं उसके फोटो और प्रेमपत्र”
या फिर
“वहऔरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है –
कसम खाती हूं,  मेरे अतीत में कहीं नहीं था कोई प्यार,
वहां था एक पवित्र, शताब्दियों लंबा, आग जैसा धधकता सन्नाटा,
जिसमें सिंक-पक रही थी सिर्फ़ आपकी खातिर मेरी देह।”

यह कविता नहीं सभ्यता समीक्षा है। इतिहास मे कोई  सभ्यता कितनी उन्नत  और विकसित है, इसे जानने का एक मानदंड यह है कि उस समाज में स्त्रियों की क्या अवस्था है? इस  लिहाज से देखें तो उदय प्रकाश  जी ने अपने समय और समाज की सभ्यता समीक्षा ही की  है। इस हत्यारी सभ्यता के चेहरे पर पड़े नकाब को नोंच डाला है और उसका वीभत्स और विद्रूप चेहरा अपनी पूरी नंगई में नंगा हो गया है, जहां एक औरत सिर्फ इसलिए खुश है कि तेज़ाब से जलाए जाने के बाद भी उसकी दायीं आँख बच गई है और एक औरत बाहर के अंधेरे को टटोलने के लिए तंदूर में जलती हुई अपनी उंगलियां धीरे से हिलाती है। कवि चीखते हुए कह रहा है कि यह सभ्यता एक हत्यारी तलवार मे बदल चुकी है, जो गर्भ के अंधेरे मे छुपती हुई, जन्म लेने से इंकार करती हुई, कन्या भ्रूणो की ह्त्या के लिए तत्पर खड़ी है ।

यह एक ऐसा वीभत्स बिम्ब है जो कलेजा दहला देता है। उदय जी के पास एक अद्भुत भाषा है और कविताई का एक सर्वथा अलग और नायाब शिल्प । कहते हैं सबसे कठिन होता है सहज होना, क्योंकि भाषा मे वही सरल और सहज होगा जो चीजों को आर–पार देखने की दृष्टि विकसित कर चुका होगा , जिसके पास पीड़ित  और दमित मानवता से जुड़ने की अपार करुणा हो यह कविता उन उत्पीड़ित और दमित स्त्रियों के पक्ष मे एक चीत्कार है, जो
“राजधानी के पुलिस थाने के गेट पर एक-दूसरे को छूती हुईं , 
ज़मीन पर बैठी हैं बिल्कुल चुपचाप,
लेकिन समूचे ब्रह्मांड में गूंजता है उनका हाहाकार।”


तो यह कविता उसी हाहाकार को वाणी देने का एक जबर्दस्त और सफल प्रयास है, ताकि बोलें वे भी, जो हैं सदियों से चुप।

लूसर

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कलावंती सिंह  

कविता और कहानी लेखन .विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क :kalawanti2@gmail.com

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लूसर – अपने नाम के अनुसार ही धूसर सी थी । एक मैली सी साड़ी पहने वह मेरे ससुराल वाले घर के आँगन मेँ आकर खड़ी हो गई । मेरी पहली जचगी के बाद मेरी सास ने मुझे गाँव बुला लिया था और उसे नव प्रसूता व बच्चे की मालिश के लिए कहा  गया था। उसकी एक आँख पत्थर की तरह जड़ थी । शायद उससे देख भी नहीं पाती थी। यूँ वह दूसरे आँगन की दाई थी पर पैसों के लिए अलग अलग तरह के काम भी कर लेती थी। इतनी गंदी लगी उसकी साड़ी मुझे, कि उसे बच्ची को गोद देते हुए हिचक सी हुई । जाते हुए मैंने उसे ताकीद की कि थोड़ी साफ सुथरी होकर आया करे। पहली नज़र मेँ मुझे वह विधवा लगी । न सिंदूर , न चूड़ी, सुहाग का कोई चिन्ह उसकी देह पर न था।

उसके जाने के बाद आँगन की औरतों ने  अपने दोपहर की बैठक मेँ उसकी कहानी सुनाई — उसका पति उसे नहीं पूछता । उसने दूसरी रख ली है। कचहरी मेँ कोई काम करता है । ठीक ठाक कमाई है, पर सब दूसरकी पर उड़ाता है। इसके चार बच्चे हैं। सब यही पाल रही है, दुयारे दुयारे काम करती है । सुबह से रात तक । उसी गुस्से मेँ वह विधवा सी रहती है। इस बात से लूसर का पति खेलावन बहुत चिढ़ता है। वह जिस काम से चिढ़े, वही करने मेँ लूसर का आनंद है।

वह आती रही । एक दिन मैंने उससे पूछा, तुम ऐसे क्यों रहती हो । ठीक से रहा करो। अपने लिए सजो । तुम्हारे बाल-बच्चों को अच्छा लगेगा। आदमी ठीक नहीं तो क्या अपनी जिंदगी नहीं। लूसर मुझे थोड़ी देर देखती रही फिर जबाब दिया “सजूँगी तो लोग पीछे पड़ने लगेंगे । सब जानते हैं कि छोड़ी हुई औरत है ।” मतलब यह सिर्फ प्रतिशोध नहीं था ,एक कवच था उसके लिए। मैं चुप हो गई। महीने भर कि मालिश के बदले सास ने उसे एक साड़ी और रोज सेर भर अनाज देना तय किया था । पर मैं चुपके से उसे रोज़ दस बीस रुपए पकड़ा देती। कहती- लूसर इस पैसे से मिठाई ले लेना । वह बहुत आभार मानती । अपना अधिक से अधिक समय मुझपर लुटाती।

धीरे धीरे वह मुझसे हिल मिल गई। उसके पास गाँव घर की ढेरों कहानियाँ हुआ करती थी। ढहते सामंतवाद के घरों के दर्दनाक किस्से! किसकी औरत बिना दवा के मर गई। पत्नी की दवा मेँ खर्च करने से क्या फ़ायदा, मर गई तो नई पत्नी मिल जाएगी, ऊपर से दान दहेज। किसकी बेटी 32 वर्ष की हो गई पर पिछ्ले 10 वर्षों से लड़केवालों को 22 वर्ष ही बताया जा रहा है। बिना जमीन बेचे विवाह का खर्च कहाँ से आए ? और जमीन बेच दें तो खाएं क्या? कैसे बरसात के दिनों मेँ अपने घर मेँ निकले करैत को उसने अकेले ही मार गिराया था। कैसे बच्चा बंद होने वाले आपरेशन के बाद दूसरे ही दिन उसने कुएं से पानी भर भर अकेले घर का काम किया था। खाना पकाया था। वैसे समय मेँ भी खेलावन ने उसे नहीं देखा- भाला। बल्कि वह तो आपरेशन करवाने के खिलाफ था। पर भला हो उस बंगाली डॉक्टरनी का ,जिसने लूसर की बात मानकर उसका आपरेशन  करना मंजूर किया। उसकी कहानियाँ सुनते मुझे बहुत अचरज और आनंद होता था। दलित जाति की स्त्रियों के अपने कष्ट थे तो सवर्ण  स्त्रियों  के अपने

साभार गूगल
                   (2)
ढंग के कष्ट थे। उसकी जीवन दृष्टि अद्भुत थी। बतकही का स्वाद मुँह मेँ घुला रहता। वह  देर तक मेरे कमरे मेँ रहती थी। यह बात नोटिस मेँ ली जाने लगी। जिठानी ने कह दिया ” नौकर चाकर से काम भर बात करना चाहिए। जूता पैर मेँ पहनने की चीज है ,सर मेँ रखने की नहीं। यह लूसरिया आजकल बहुत ढीठा गई है। मेरा कहा एक भी काम नहीं करती।” मैं महसूस कर रही थी कि उसपर मेरे अतिरिक्त स्नेह के कारण वह कइयों कि ईर्ष्या का केंद्र बनती जा रही थी। जिठानी ने उसे एक दिन तेल लगाने को कहा। बहुत बिगड़ी कि उन्हें तो पंद्रह मिनट मेँ निबटा दिया, छोटी के यहाँ दो-दो घंटे घुसी रहती है। मैंने लूसर से पूछा तो वह हंस दी।  “आपके पीछे तो कभी मालिस के लिए नहीं बुलातीं। आपके आने पर शौक चढ़ जाता है। मुझसे तो घिनाती रहती है। पलंग पर बैठने नहीं देतीं। अब खड़ी खड़ी कितनी देर लगाऊँ।”

मेरी दिक्कत यह थी कि मैं उसे पैसों के अतिरिक्त और कोई मदद नहीं कर पाती थी। रसोई और भंडार सास और जिठानी के जिम्मे था। जबकि लूसर को खाना मिलने पर सुविधा होती । एक दिन मैंने थोड़ा सा बचा दूध, जिसे बिल्ली ने जूठा दिया था ,लूसर से फेंक आने को कहा। मैं आँगन मेँ कपड़े उठाने गई ,लौटकर देखा तो लूसर ढ़क ढ़क दूध पी रही थी। मैं नाराज़ होने लगी कि “बिल्ली का जूठा दूध है , तुम्हें कुछ हो जाएगा तो ?” उसने कहा कि उसे कल से बुखार है । उसके पास दवा के भी पैसे नहीं । कल से कुछ खाने कि भी इच्छा नहीं । पर ज़ोर से भूख लगी थी और दूध पीने का बहुत मन कर रहा था। सो पी लिया । कल पति को खबर भी भिजवाया बड़े बेटे से, पर वह देखने भी नहीं आया। रात भर बुखार मेँ पड़ी रही । आप तो रांची चली जाएंगी सो जब तक आप  हैं, आए बिना मन नहीं मानता । आप मुझे आदमीन समझती हैं।

“मुझे कुछ नहीं होगा छोटी मालकिन , आप चिंता न करें।” पर मुझे बहुत चिंता होती रही। इसे कुछ हो गया तो इसके बच्चों को कौन देखेगा? अगले दिन सुबह वह मेरे सामने खड़ी थी साबूत, हँसती हुई । मैंने गुस्से से कहा “बड़ा हंस रही हो, बिल्ली ,कुत्ते का जूठा नहीं खाना चाहिए ।  इनका जहर बहुत दिन बाद असर करता है।” मैं उसकी स्थिति से बड़ी खिन्न थी। वहाँ एक सीमा से अधिक उसकी मदद भी नहीं कर  सकती थी। मैंने उससे कहा कि “चलो मेरे साथ शहर , मैं कुछ इंतजाम कर दूँगी।” उसने कहा “वह जाने नहीं देगा।” मैंने कहा “अच्छा ! वह तुम्हारा अब भी मालिक है।”

मैंने उससे कहा कि उसे कल बुला कर लाना तो मैं बात करूंगी । लूसर मुँह पर कपड़ा रख हंसने लगी, जैसे मैंने कोई बेवकूफ़ों वाली बात कही हो। वह बड़ा घमंडी है, कभी नहीं आएगा। उसने आगे कहा कि उसकी बहुत बूढ़ी, बीमार सास भी है और उसे गाँव छोड़कर कहीं जाना मंजूर नहीं और लूसर बूढ़ी सास को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती ।  बुढ़िया ने बुरे वक़्त मेँ उसका साथ दिया है । आखिर बुढ़िया बेटे के बार बार कहने पर भी उसके साथ नहीं गई। आज तक नयकी को नहीं अपनाया । उसने लूसर का मान रखा है। उसे ही अपनी बहू मानती है। लूसर उसे छोड़कर कहीं नहीं जाएगी, स्वर्ग में भी नहीं। एक दिन घर मेँ किसी आयोजन के बाद मैंने एक प्लास्टिक के थैले मेँ छिपा कर उसे  पूरी और मिठाइयाँ दीं।

(3)
वह पिछवारे से निकली । शाम का वक़्त था । बहुत सुंदर हवा बह रही थी। मैं उसे बहुत देर तक खेतों की  मेड़ पर जाती हुई देखती रही। शाम का वक़्त था, वह उड़ी जा रही थी । उसके बच्चे ,सास सब कितने खुश होंगे ,यह सोचकर वह आनंदित थी । मैं उसकी खुशी देखकर खुश थी । उसने बहुत दुआएं दीं मुझे। मुझे शर्म महसूस हुई। यह कोई बड़ा काम नहीं था पर शायद वह जानती थी कि अपने मन से काढ़कर उसे कुछ देने मेँ कितना रिस्क था। मैं अंदर जाने को मुड़ी , मेरे पीछे मेरी जेठानी खड़ी थी। उसकी दृष्टि भी पीछा कर रही थी– लूसर के हाथ मेँ हिलते थैले का। हमारी आँखें मिली तो मैंने आँख नीचे कर ली। मैं वापस अपने कमरे कि तरफ आई। आधी  पलंग पर और आधी नीचे झूलती हुई नीली बनारसी साड़ी पड़ी थी । पति खड़े थे “यह साड़ी यहाँ ऐसे क्यों पड़ी है , इसकी कवर वाली प्लास्टिक कहाँ गई ?”
” प्लास्टिक तो लड्डू ,पूरी भरकर लूसर को मिल गई ।” जिठानी ने जबाब दिया।
यह बहुत छोटी सी बात थी पर उसे बहुत बड़ा बनाया गया । मैं दाई-नौकरों को बिगाड़ दूँगी । नौकरी की छुट्टियों पर चार दिन के लिए आती हूँ, तो घर का कायदा कानून न बिगाड़ूँ। अपने आँगन मेँ काम करनेवाली दाइयों को जब पता चलेगा तो वे कितना हल्ला मचाएंगी कि बाहर वालों को ज्यादा मजूरी मिल रही है। मैंने धीमे स्वर मेँ कहना चाहा “सबके तो घरवाले साथ हैं, यह अकेली ।” मैं जानती थी यह षड्यंत्र, लूसर के लिए कम, मेरे लिए ज्यादा है। वरना खुले हाथ की छोटी मालकिन को और कोई और चाहे या न चाहे, दाई- नौकर बहुत चाहते थे।

रात मेँ सास ने आकर कहा सब कह रहे हैं “बेटी होने पर भी कोई मालिश करवाता है क्या ? मैंने लूसर को क्यों तुम्हें लगवा दिया । तुमने लूसर को अपने हाथ से खाना दे दिया, बड़की बहुत नाराज़ है।” सास डर रही थीं कि कल से किसी घरेलू राजनीति के तहत घर की दाइयों को कोई भड़का न दे। फिर इतने बड़े घर आँगन का काम कैसे होगा। मैंने कहा -“माई! बड़की दीदी को समझा दीजिये उनका राज-पाट कोई नहीं छिनेगा, मैं तो यहाँ हमेशा पहुना बनकर ही आऊंगी।” माईं का मलिकांव अब डगमग था। स्वयं माई को भी यहाँ घुटन होने लगी थी। जब जिसे जो चाहें, वे भी नहीं दे सकतीं थीं। पर शहर में भी उनका बहुत जी नहीं लगता था। दो कमरों का घर, उसपर से हम चारों जने, अपने अपने काम काज में सुबह के निकले, शाम को घर आते थे। पड़ोस में एक ओर उड़िया भाषी तो दूसरी ओर दक्षिण भारतीय परिवार । हमारे पीछे माई का ख्याल तो वे बहुत रखते, पर भाषा समझ नहीं पाते । माई को भोजपुरी छोडकर और कोई भाषा आती नहीं थी।

साभार गूगल

एक दिन दोपहर मेँ मेरी घर की दाई ने मुझे घर के पीछे खलियान की तरफ आने का इशारा किया । वहाँ एक गोरी, सुंदर सी औरत काम कर रही थी । उस सुंदर चेहरे पर एक काली सी छाया थी। सर पर आँचल था और सूप फटकने के साथ साथ उसकी नकबेसर हिलती थी। उसने बताया-” वह है लूसर की सौत, सरोज।” आगे उसने यह भी बताया कि खेलावन इसे भी आजकल बहुत पीटता है। इसे भी ठीक से खोराकी नहीं देता। इसके भी तीन बच्चे हैं।
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आजकल यह भी रोजाना काम पर आती है। एक बार मर्द का हाथ औरत पर छूटना शुरू हो जाए तो फिर रुकता  नहीं। उसका हाथ रोकने वाला है भी कौन ?मैंने लूसर से उस दिन पूछा तुम्हारी सौत के क्या हाल हैं ? उसने कहा कि “बहुत खराब , वह  रिसते मेँ हमलोगों की भगनी लगती है ,इसकी शादी अच्छे घर मेँ हुई थी । दूल्हा सूरत मेँ रहता था । मैंने इसे बहुत समझाया कि अपना घर मत छोड़, बहुत पछताएगी । पर यह अंधी हो गई थी ।  उसको भी समझाया कि भगनी ब्राह्मण होती है इसे गलत नज़र से छूएगा, तो कोढ़ी हो जाएगा । पर उसने सुना नहीं। इसके पीछे मुझे  इतना मारा, यह आँख–!” कहकर वह चुप हो गई, जैसे कोई गलत बात कह गई हो। ओह ! मैं कह उठी, मैं तो समझती थी कि  बचपन से ही–। उसकी आँखें पनिया गई , उसने मुँह फेर लिया।

उसी ने बताया, एकबार उसकी सौत कुएं पर नहा रही थी ,रास्ते पर का कुआं, खेलवान पानी खींच- खींच उसपर डालता जाता था। अपने में मगन दोनों हो हो कर हंस रहे थे। ठीक उसी वक़्त उसका पति ढेरों सामान कपड़ा -लत्ता, मर -मिठाई लिए ससुराल आ रहा था। उसने यह दृश्य देख लिया। सारा समान वहीं फेंक, उल्टे पैरों लौट गया। उस दिन लूसर बहुत रोई । जान गई कि अब उसकी कोई राह नहीं, वह उसकी छाती पर ही मूंग दलेगी।

मेरे मन मेँ इन दो पतिव्रता स्त्रियॉं के एकलौते पति को देखने की इच्छा ज़ोर मारने लगी । एक दिन मैंने उसे देखा। काला , भारी बदन वाला खेलावन, झक्क सफ़ेद कुर्ते पाजामे मेँ कचहरी के रास्ते मेँ था। हम मंदिर जाने को निकले थे। मेरी चचेरी जिठानी ने दिखाया – यह है खेलावन, तुम्हारी लूसर का पति। वह तेजी से चला जा रहा था। मैं संकोचवश उसे टोक न सकी। मैंने बाद मेँ अपने पति से कहा कि “खेलावन मिले तो उसे डांटिएगा तो। अब लूसर अपना कमा खा रही है, तब उसे क्यों बीच- बीच मेँ जाकर मार पीट करता है ? जिस कचहरी मेँ वह काम करता है वहीं उसे ले जाकर चढ़ा दूँगी, तब पता चलेगा उसे।” उन्होने कहा -“तुम मेरा बहुत सिर खाती हो। यह कौन नई बात है?”

उसके थोड़े दिनों बाद मैं वापस नौकरी पर आ गई । घर ,बच्चे ,नौकरी इन के सिवा मैं खुद को भी याद नहीं रहती थी। पर लूसर को मैं कभी नहीं भूली। गाँव से जब भी कोई आता ,मैं लूसर कि कुशल खेम जरूर पूछती। जब जाती उसे बुलवा कर मिलती । मैं जरूर उसे जबर्दस्ती चूड़ी पहन लेना या मिठाई खा लेना के नाम पर पैसे देती। जबकि मैं जानती थी कि वह इन पैसों से यह दोनों मेँ से कोई काम नहीं करेगी। वह  मेरा बिना कोई काम किए पैसे लेना नहीं चाहती थी। बड़ी स्वाभिमानी स्त्री थी । मैं उससे कहती, “तुम मेरी सखी हो न लूसर,रख लो। जब तुम्हारा बेटा कमाने लगेगा, तब मैं तुमसे चूड़ी पहनूँगी, मिठाई खाऊँगी।” वह मुस्कुरा देती- “आप सब के आशीर्वाद से वह दिन आए छोटी मालकिन।”

एक बार भतीजा गाँव से रांची आया तो उसने बताया कि लूसर पागल हो गई है। कई बार तो कपड़ा उतार नंगे ही गाँव में निकल जाती है। उसके बच्चे कपड़ा लेकर उसके पीछे पीछे दौड़ते हैं। 12 साल का बेटा होटल में काम कर किसी तरह घर चला रहा है। उसकी यह हालत सुनकर, उस दृश्य की कल्पना कर मैं रोने लगी। मैंने सबसे विनती की – कहा, उसे रांची ले आओ। यहाँ पागलखाने में मैं इलाज करवा दूँगी। पर किसी को फुर्सत नहीं थी। एक दिन सुना कि ओझा बुलवाकर उसकी झाड़-फूँक हुई । ओझा ने बहुत मारा लूसर को। वह पीटती रही और चिल्लाती रही “अब ना, अब ना…छोड़ दो मुझे।” उसके बच्चे रो रहे थे। खेलावन देखता रहा। ओझा उसी ने बुलाया था। लूसर ठीक रहती थी, तो कम से कम वह उसके बच्चों की जिम्मेवारी से बचा रहता था। थोड़े दवा दारू होने के बाद वह ठीक हुई।

समय अपनी गति से चलता रहा। ससुर की मौत के बाद उनके क्रिया-कर्म में गाँव जाना हुआ, बहुत दिन बाद । बेटी दसवीं में थी। सास जो अब विधवा थीं, के लिए आई नेवता की सस्ती साड़ियाँ जब दाइयों के नाम पर रखाने लगी तो एक साड़ी लूसर के नाम पर भी रखी गई। मैंने कहा- लूसर को जरा बढ़िया साड़ी रख दीजिये । “जिंदगी भर नहीं पहनी बढ़िया साड़ी, तो अब क्या पहनेगी। अब तो विधवा हो गई है।” अरे कब ? मुझे किसी ने खबर भी नहीं दी।
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लूसर का सधवा रहना  और विधवा होना क्या जैसे दोनों बातें एक जैसी ही थी उनकी नजर में। पर मैं जानती थी यह एक ही बात नहीं थी । चाहे वह लाख सरापति थी खेलावन को, पर प्यार भी करती थी। अपने पति के कचहरी में काम करने का गुमान भी था उसे। उसकी जाति में स्त्रियॉं को भी दूसरा विवाह करने की छूट थी,पर वह कहीं नहीं गई। मार खा खा कर उसकी देह टूट गई थी । पर उसने अपने बच्चे नहीं छोड़े। मैंने उससे गुस्से में एक बार कहा था कि “इसके बच्चों को इसके सिर छोड़ कर चली जा। अकेली देह कहीं भी कमा खा लेगी। वाह रे , पैदा कर तुझे थमा दिये। पाँच छह पेट पालना कितना मुसकिल काम है इतनी मंहगाई में।” उसने मुझसे कहा था कि-” किस मर्द का कलेजा है दीदी, जो मेरे बच्चों को मेरे साथ रख सके। सिर्फ किसी की सेज सजाने के लिए एक नई गृहस्थी मैं नहीं करूंगी।”

मैं उससे तत्काल  मिलने को बेचैन हो उठी।मैंने खबर भिजवाई । अगले ही दिन सुबह लूसर हाजिर थी। चेहरा जस का तस। बस थोड़ी दुबला गई थी। आकर एक कोने में खड़ी हो गई। मैंने उससे पूछा ऐसा कैसे हो गया अचानक ? उसने कहा “हार्ट फ़ेल हो गया छोटी मालकिन। तुरत छटपटाया और तुरत खतम। अस्पताल ले जाने का भी मौका नहीं मिल पाया।” उसके जगह पर बेटे को अस्थायी नौकरी लग गई है। बेटे की शादी भी हो गई है ।एक गो छुनूर मुनूर नतनी भी है। सब ठीक है। कुछ पैसे मिले थे । बेटी की शादी कर दी । बेटे ने दो ठो पक्का का कमरा भी बनवा लिया है, पखानाघर  सहित। छोटका बेटा दिल्ली चला गया कमाने। मुझे थोड़ी राहत हुई। अच्छा लगा देखकर की चलो जीवन के उत्तरार्द्ध में ही सही, उसकी बहुत सी मनोकामनाएँ पूरी हो गई हैं । उसकी कितनी इच्छा थी पक्के कमरे वाले घर की।  जब वह जाने लगी तो मैंने उसे खाना दिया। थोड़ा और दे दीजिये उसके चेहरे पर कातरता पसरी थी। मैंने और निकालकर दिया । सोचने लगी अब तो सब ठीक है ऐसी कातर  क्यों हो रही है? ऐसा तो पहले भी नहीं थी। मैं उसे छोड़ने निकली । वह मेड़ों पर तेज तेज जा रही थी। जैसे कहीं पहुँचने की बड़ी जल्दी हो। आँगन में  पहुचते ही जिठानी ने बताया लूसरिया बड़ी बेवकूफ है । आजकल बेटा बहू छोडकर सरोज और उसके बच्चों के साथ उसकी झोपड़ी में रह रही है । सरोज कमाने नहीं जा पाती, सब दिन बीमार रहती है। उसके बच्चे छोटे हैं, सो देख रेख यही करती है। लूसर का बेटा चाहता है कि वह अपने बेटे बहू के साथ रहे। इस बात से बेटा उससे बड़ा नाराज़ रहता है। बुढ़ापा में पता नहीं लूसर को कौन देखेगा।
“ उसके कर्म उसे देखेंगे ”। यह माई की  आवाज़ थी, जो इस बार मेरे साथ बोरिया बिस्तर लेकर रांची आने को
तैयार थी.

मंतव्य चार में प्रकाशित