Home Blog Page 138

थोडा तुम बदलो , थोडा हम बदलें ……………!

नाइश हसन  

सामाजिक कार्यकर्ता,विभिन्न देशों में सेमिनारों में पेपर प्रस्तुति. ‘ एक किताब , स्वतंत्रता आंदोलन का एक विस्मृत सेनानी’ प्रकाशित. संपर्क :naish_hasan@yahoo.com>

एक दिन मुझे अमेरिकन एम्बेसी से एक पत्र के माध्यम से ये खबरमिली कि International visitors leadership program के तहत मेरा चुनाव अमेरिका जाने के लिए हुआ है,  जहाॅ मुझे उद्यमिता विकास व अन्य सामाजिक बदलाव , महिला अधिकार की लडाई लडने वाले लोगों से बहुत कुछ सीखने व उनके साथ अपना अनुभव बाॅंटने का मौका मिलेगा। अमेरिका के बारे में बहुत अच्छी और बुरी राय मन में पहले से ही मौजूद थी अपनी हर एक राय को  परखना चाहती थी मैं वहाॅं जाकर। काफी समय मिला मुझे 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान चीजों को देखने सीखने और समझने का। मैं वाशिंगटन, फिलाडेल्फिया, शिकागो, अटलांटा, पोर्टलैंण्ड , विस्काॅंसिन, ओकलाहोमा, व टेक्सस गई । इतनी जगह घूमने के बाद मैने बहुत सी बातों को अनुभव किया। हिन्दुस्तानी व अमरीकियों के सोंचने का नजरिया बिल्कुल जुदा है। बहुत सी बातें जो हमारे लिए बहुत प्राथमिक है उनके लिए उसका महत्व नही है। जैसे कि परम्परायें जिस तरह हमारे जीवन का प्राथमिक हिस्सा है उनके जीवन का नही है। मैंने अपने प्रवास के दौरान हर तरह के लोगों से मुलाकात की उनके साथ वक्त बिताया इस लिए मैं अपने कुछ अनुभवों को आप के सामने रख रही हूॅं।

एक दिन मैं फैमिली काउन्सिलिंग सेन्टर और कोर्ट देखने गई । इजाजत लेकर पीछे बैठ गई बस कोर्ट की कार्यवाही देखना चाहती थी, उस समय कोर्ट में दो केस सुने जा रहे थे एक पत्नी के साथ घरेलू हिंसा , व दूसरा शराब पी कर गाडी चलाना । मै करीब 40 मिनट कोर्ट में बैठी। पहले केस में महिला ने केवल पुलिस में एक शिकायत दर्ज की थी कि उसके पति ने उसका गला दबाया है लेकिन वह कोर्ट आना नही चाहती थी स्टेट ने महिला की ओर से एक्शन लिया,  पति कोर्ट में बुलाया गया , उसने अपनी गलती स्वीकारी, कोर्ट से माफी माॅंगी.  परन्तु कोर्ट ने उसे सजा दी और कहा कि उसे 6 माह तक एक मावनाधिकार संगठन में काम करना होगा , जहाॅं उसके बिहेवियर में सुधार के लिए भी काम हेागा,  चॅूॅंकि वह उसका पहला अपराध था इस लिए कोर्ट ने कहा कि यदि दोबारा ऐसा अपराध हुआ तो उसे 6 माह की सख्त सजा सुनाई जाएगी।

दूसरे केस में शराब पीकर गाडी चलाने की गलती पर कोर्ट से मुल्जिम ने माफी भी माॅंगी और ऐसा देेाबारा न करने का आश्वासन भी दिया परन्तु जज ने बहुत विनम्रता से ये कहा कि वो नियमों में बन्धे है और कुछ नही कर सकते और 6 माह की सजा सुना दी गई। फौरन पुलिस मुल्जिम को लिफ्ट से लेकर नीचे उतर गई और जेल पहुॅंचा दिया। इतना त्वरित न्याय देखकर बहुत अच्छा लगा।  मैं जिस कतार में बैठी कोर्ट की कार्यवाही देख रही थी उसी कतार में मेरे ठीक पीछे एक वकील साहब बैठे थे , उनको जब ये पता चला कि मैं हिन्दुस्तान से आई हूॅं , एक एक्टिविस्ट हूॅं, कोर्ट प्रक्रिया देखने आई हूॅं , तो उन्होने केस समाप्त होने के बाद सीट पर बैठे जज साहब से कहा कि आज हमारे बीच इण्डिया से एक खास मेहमान मौजूद है, जज ने मेरा स्वागत किया और कहा कि आप का यदि कोई सवाल हो तो हमसे जरूर पूछें.  दोबारा मेरे आने का शुक्रिया अदा किया , मेरे इसरार पर उन्होने कोर्ट में फोटो खीचने की इजाजत भी दी । मै उनके इस व्यवहार को देखकर मन ही मन बहुत खुश और हैरान थी क्योंकि मैने हिन्दुस्तान में बहुत कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाए हैं,  पर ऐसा कभी नही देखा था। एक बार तो लखनऊ फैमिली कोर्ट के एक जज ने हद कर दी थी -वह पीडित लडकियाॅं,  जो अपने केस की पैरवी के लिए आती थी,  उनके गालों को छूता , छाती को छूता और अपने चैंबर तथा अपने घर में बुलाता. जब हम महिला संगठनों ने काफी हल्ला मचाया तब कही जाकर वह हटाया गया.

मैं मिल्वाकी शहर , जो विस्कान्सिन राज्य का एक बडा शहर है,  के एक पुलिस स्टेशन भी गई ये देखने कि पुलिस किस प्रकार कार्य करती है। चूॅंकि हिन्दुस्तान में एक एक्टिविस्ट होने के नाते मैं जिन लोगों के साथ डील करती हॅंू उन सभी महकमों  को मैं वहाॅं भी देखना चाहती थी , मेरा पुलिस ने बहुत अच्छी तरह स्वागत किया। मुझे अपना पूरा सिस्टम समझाया , उनकी कार्यकुशलता देख का मैं हैरान थी। मैने एक महिला पुलिस से बहनापे वाला सवाल पूछा कि आप लोगों को दूसरे पुरूष सहकर्मियों से हिंसा का सामना तो नही करना पडता, तो उसने बहुत तपाक से जवाब दिया नही ऐसा कभी नही होता । मैने ये भी देखा कि हिन्दुस्तानियों को अमरीकी बहुत इज्जत की निगाह से देखते है, हमारी डेमोक्रेसी की बहुत कद्र करते है, हिन्दुस्तानियों को बहुत बुद्धिमान  और मेहनती मानते है, ये बुद्धिमानी  और कडी मेहनत हम दूसरे देश  में जाकर क्यों करते है अपने देश में क्यों  नही ये मेरी समझ में ठीक से नही आता।

पुलिस महकमें  की बहुत इज्जत है , सडक के नियमों का पालन न करने पर आप पुलिस को 10 , 20 या 50 डालर देकर अपना काम नही बना सकते गलती पर फाइन देना ही होगा, पुलिस पैसों में नही बिकती, नियमों का पालन करवाती है, लोग नियमों का पालन करते भी है , आमतौर पर ईमानदारी है,  दुकानों में ठगी भी नही है। पुलिस और कानून दोनो के आदेशों का ही त्वरित और सख्ती से पालन होता है।

मैं एक तजरबा आप के साथ और शेयर करना चाहती हूॅं । एक दिन मैं विस्कान्सिन स्टेट की कैपिटल मैडिसन में कैपिटल बिल्डिंग देखने गई । मुझे से नही मालूम था कि वो मुझे अन्दर भी जाने देंगे क्योंकि मैं आजतक कभी लखनऊ विधानसभा के अन्दर दाखिल नही हो पाई हूॅं वहाॅं जाने की इजाजत आम लोगों को नही है ।  वहाॅं अन्दर जाकर बहुत अच्छा लगा। एक गाइड ने हम लोगों को पूरी कैपिटल बिल्डिंग की सैर कराई.  बहुत से अमरीकी लोग अपने छोटे छोटे बच्चों को कैपिटल बिल्डिंग दिखाने लाए थे । उनसे बातचीत होने लगी उनका कहना था कि बच्चा अपने संविधान, पार्लियामेन्ट सीनेट आउस, सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर कार्यालय को यदि नही देखेगा , उसके बारे में जानकारी नही रखेगा तो उसमेे अपने नेशन के लिए रिस्पेक्ट कैसे डेवलप होगा , वहाॅं मौजूद गाइड , जो सरकार की तरफ से तैनात था,  उसका  सिर्फ यही काम था कि आने वाले लोगों को उसके विकास का इतिहास बताए सब जानकारियाॅं मुफ्त प्रदान करे । ये भी देखा कि डेमोक्रेट व रिपब्लिकन पार्टियाॅं कहाँ  बैठ कर बहस करती है और वहाॅं एक तरफ ऊपर के हिस्से में बैठकर आम जनता को ये देखने का हक है कि वो लोग क्या चर्चा कर रहे है। ये सब अनुभव हमारे सीखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे शायद कभी हम भी इन बातों को अपना पाएॅं।

कैपिटल बिल्डिंग के अन्दर जाकर भी आम लोगों को सरकार के किसी भी कृत्य  के खिलाफ धरना प्रदर्शन  करने का हक है । मैं एक महिला के साथ,  जो वहाॅं गवर्नर के खिलाफ धरने पर बैठी थी उन्हें समर्थन देने के लिए धरने में शामिल हुई । वहाॅं लोगों की इज्जत बहुत है पोजीशन होल्ड करने वालों के पीछे लोग नही भागते, अपना काम कराने के लिए किसी नेता को अपना सरपरस्त बताना फख्र की बात नही है आप का काम अपने आप ही सिस्टम में हो जाएगा बगैर किसी बडे नाम का हवाला दिए। क्लास और कास्ट सिस्टम से समाज मुक्त है।

मेरे नजरिए में अमेरिका के बारे में एक बडा बदलाव तब आया जब मैने वहाॅं के आम लोगों को,  जिनका राजनीति से कोई लेना देना नही है ये कहते सुना कि जार्ज बुश  की विदेश नीति बहुत गलत थी , विशेष तौर पर अफगानिस्तान के मामले में । लोगों ने कहा कि बुश ने राष्ट्रपति बनने से पहले कभी अफगानिस्तान की यात्रा तक नही की थी,  लेकिन अफगानिस्तान के खिलाफ इतना बडा मोर्चा खोल दिया। उन्होने ये भी कहा कि देश भक्ति के नाम पर चन्द पैसों के लिए कम पढे लिखे गाॅंव के गोरे अमरीकियों को ईरान, ईराक, अफगानिस्तान या अन्य देशों में युद्व के लिए झोक दिया जाता है और लौटने पर उन्हें उनकी उचित कीमत भी नही दी जाती , तमाम ऐसे लोग जो युद्धों  से लौट कर आए , है वो आज भी अपने एक अदद आशियाने के लिए तरस रहे है सरकारी शेल्टर होम में जिन्दगी गुजार रहे है। सरकार उनकी कोई मदद नही कर रही है। मौजूदा सरकार के काम काज से भी असन्तुष्ट लोग सवाल खडे कर रहे है।  नीतियों की खुलकर आलोचना करना और किसी प्रकार की ओछी राजनीति किए बगैर अपनी बात खुल कर कहना,  ये एक अच्छे नागरिक की मिसाल देखने को मिली ।

जहाॅं तक महिलाओं की आजादी का सवाल है.  वो हर जगह नजर आई,  औरत की इज्जत नजर आई,ऐसा नही लगा कि कोई महिला किसी काम के लिए इनीशिएटिव ले रही हो,  तो वो मखौल बनाई जाए या उसे खराब औरत की श्रेणी में डाल दिया जाए, या यूॅं ही उसे कमतर समझकर उसकी बात ही न सुनी जाए, या उसे इस काबिल ही न समझा जाए कि उससे किसी मसले पर राय बात की जा सके। जैसा कि रोजमर्रा की जिन्दगी में हम औरतें यहाॅं अनुभव करती है। मैने 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान एक भी बार सडक पर हिंसा का सामना नही किया मेरे कानों ने एक भी बार कोई भद्द्ी टिप्पणी नही सुनी , किसी ने मेरे शरीर को छूने,  चुटकी काटने , अश्लील हरकत करने जैसा कृत्य नही किया, न ही किसी ने अश्लील इशारा ही किया। कुल मिलाकर मैने अपने आप को बहुत ही सुरक्षित महसूस किया,  सडक पर।  जो कि दुर्भाग्य से हम अपनी माटी में नही देखते। किसी भी उम्र की लडकी, जवान व बुजुर्ग महिला भी सडक पर हिंसा का शिकार होती ही है।

एक आम लडकी को सडक पर चलते समय वो डर नही सताता कि कोई उसका दुपट्टा खीच कर चला जाएगा, उसको धक्का देकर उसी लडकी को गलत साबित करके चला जाएगा, चार शोहदे हल्का अन्ध्ेारा होते ही अकेली जा रही लडकी को घेर लेंगे और यौन हिंसा करेंगे। ये डर हिन्दुस्तान में जरूर सताता है हर लडकी को जो घर से बाहर कदम रखती है। इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि अमेरिका में महिला हिंसा नही है.  वहाॅं भी महिलाओं ने काफी संघर्ष किया है, पितृसत्ता  की जडें वहाॅं भी जमी रही है। रेप की घटनाएॅं भी घटित होती हैं . लेकिन उन जडों को हिलाने में सरकार व महिला आन्दोलनों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। इसी लिए उसका असर नजर आता है। महिला हिंसा का रूप इतना भयावह नही है जितना कि हिन्दुस्तान व अन्य पडोसी देशों  में देखने को मिलता है।

शिकागों के महिला शेल्टर होम ‘अपना घर’ जो 20 बरस पहले हिन्दुस्तानी औरतों ने प्रारम्भ किया था और ‘ हमदर्द  सेन्टर’,  जो महिलाओं के संरक्षण का काम करता है में बहुतेरी अमरीकी और दक्षिण एशियाई महिलाए नजर आई जो अपने शौहर द्वारा जबर्दस्त मार पिटीई की शिकार हुई थी।

एक और अनुभव आप के साथ बाॅंटूगी । सच कहूॅं तो मैने अपने देश  में पहले कभी इतनी बुर्कापोश औरतें नही देखी,  जितनी अमेरिका में देखी । ज्यादातर मुसलमान औरत बुरके में थी । 9/11 के बाद शायद आइडेन्टिटी क्राइसिस का सवाल इतना बडा हो गया है। ये वाजिब भी है कि जिस देश में अपनी पहचान खतरे में पड जाए वहाॅं पहचान को बहुत मजबूती से बयाॅं करने की कोशिश की जाती है, लेकिन एक सवाल और यहाॅं खडा हो जाता है कि क्या आइडेन्टिटी क्राइसिस या पहचान को पुख्ता बना कर सामने रखने की जिम्मेदारी भी औरत पर ही है  ? मर्दो ने तो कोई अरबी लिबास नही पहना हुआ था,  वो तो अपनी पहचान एक आम अंग्रेज मर्द की तरह ही दिखा रहे है , हाॅं कुछ के दाढी थी लेकिन बुर्के के अनुपात में बहुत ही कम। अगर एक कौम की पहचान उसकी औरतों से है तो फिर औरतों को एक खास दर्जा भी मिलना चाहिए,  वो कही नही दिखा। मजहब के नाम पर औरत को नियन्त्रित करने की घटिया सियायत भी काफी नजर आई , जिसमें अमरीकी मुसलमान औरत वहाॅं के ऐश  आराम तो उठाए लेकिन रौशन खयाल न बन पाए। इसकी मिसाल देना चाहूॅंगी मैं एक मुस्लिम वुमेन सेन्टर देखने गई वाकई बहुत अच्छा लगा उनका काम देखकर । वही की एक साहिबा जो मेेरे काम से बहुत खुश  हुई और मेरे लिए दुआ करते हुए मुझे एक बुर्का तोहफे के तौर पर दिया और ये कहा कि इन्शाअल्लाह आप जल्दी की कौम की खिदमत करते हुए पर्दा भी करने लगेंगी।

ये सवाल औरतों को भी समझना पडेगा कि बुर्के की वकालत कुरान नही पितृसत्ता कर रही है और औरत को हथियार बनाकर इस्तेमाल कर रही है। इस्लाम को सही तरह से समझना होगा वो हक जो अल्लाह ने हमें दिया और पित्रसत्ता ने उसे छीन लिया हमे वो हक वापस लेना होगा, गलत और भेदभाव पूर्ण नीतियों के प्रति सवाल भी खडा करना होगा।

अन्त में मैं इतना कहना चाहती हूॅं कि इतने नियमों,  सख्त कानूनों के बाद भी प्रतिवर्ष अमेरिका में औसतन 250 लोगों को सजाए मौत दी जाती है । ड्रग्स और गन उनकी समस्या की जड में मौजूद है। कोई भी व्यक्ति बन्दूक रख सकता है । चॅूकि अमेरिका की आजादी (4 जुलाई 1776) के बाद उनके संविधान में सुरक्षा के अधिकार को अधिक महत्व दिया गया और संविधान में अपनी सुरक्षा हेतु हथियार के प्रयोग को मना नही किया गया। इसी कारण आज तक जब कि गन अमेरिका में एक मुसीबत का रूप लेती जा रही है राजनीतिक पार्टियाॅं गन के नाम पर सियायत कर रही है। आए दिन ऐसी घटनाएॅं सामने आ रही है जब कोई बच्चा/युवा गन लेकर किसी सार्वजनिक स्थल पर पहुॅंचता है और एक साथ कई लोगों को मौत के घाट उतार देता है । चूॅंकि अमेरिका में 50 प्रतिशत परिवार,  टूटे परिवार है,  इसलिए बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं । हर 5 अमरीकी बच्चों पर एक पिता होता है,  देखभाल करने के लिए। इससे बच्चों की परवरिश  ठीक से नही हो पाती, उनमें अकेला पन और कुंठा पनप जाती है, उन्हें माॅं बाप दोनो का प्यार व देखभाल नही मिल पाती , बच्चे असुरक्षा में बडे होते है। परिवार टूटने के बाद अधिकतर बच्चे माॅंओं के साथ ही रहते है, पिता अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नही निभाता। बच्चे अपनी भावनाओं को शेयर नही कर पाते और कभी -कभी  स्थिति हिंसक बन जाती है।

एक और बात जो अमरीकियों को सीखनी जरूरी है वो ये कि पहले हम ऊर्जा को बर्बाद करते है उसके बाद ग्रीन इम्पावरमेन्ट की बात करते है, प्रतिवर्ष 6 बिलियन डालर सिर्फ टायलट पेपर बनाने में खर्च हो जाता है , शौचालयों  में इतना पानी बर्बाद होता है , सीट से उठते ही फ्लश टैंक से पानी अपने आप आने लगता है , लेकिन शौच के लिए पानी कही नही होता। दूकानों में लाइट हमेशा आन रहती है, शटर गिरने के बाद भी बत्ती नही बुझती संसाधनों का अधाधुन्ध गलत इस्तेमाल होता है ,अधिकतर चीजें रिपेयर नही होती,  खराब होने पर फेंक दी जाती है। इस मामले में काश अमेरिका हमारी तमाम खूबियाॅं सीख पाता, हालाकी हम भी संाधनों का बेजा इस्तेमाल करते है,  लेकिन उतना अधिक नहीं। इसके अलावा परिवार को जोडे रखने , रिश्ते निभाने की कला, रिश्तों के मायने सीख पाता, उसके मर्म को समझ पाता, और हम उनसे एक बेहतरीन वर्क कल्चर, लोगों को सम्मान देना सीख पाते, हमारी शिक्षा  का स्तर भी उनके जैसा ऊॅंचा हो पाता और हम दोनो देशो  को मोकम्मल पुरखुलूस और खूबसूरत बना पाते , उम्मीद है वो दिन जरूर आएगा। थोडा वो बदलेंगे थोडा हम बदलेंगे और हम मिलकर एक बेहतर दुनिया बनाने की अगुवाई करेंगे।

कई अमरीकी परिवारों ने हमें अपने घर दावत पर बुलाया कभी गाॅंधी का जिक्र किया,  तो कभी भारत पाकिस्तान बटवारे का दर्द हमारे साथ साझा किया । मार्टिन लूथर किंग के घर जाना , उनके मेमोरियल को देखना , हमारे अन्दर एक हिम्मत और जोश को भर देता है।  जहाॅं रंग भेद अपने चरम पर था,  ऐसे में एक लम्बी लडाई लडना अपनी जान गवां कर,  इस भेद को मिटाना एक हौसला देता है कि हम भी औरत के अधिकार की लडाई हिन्दुस्तान सहित पूरी दुनिया में हिम्मत से लडेंगे . एक दिन हम भी मार्टिन लूथर किंग के मशहूर भाषण  ‘ आई हैव ए ड्रीम टुडे’ की तर्ज पर अपने ड्रीम को साकार करेंगे।

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

संजीव चंदन

दूसरे देशों की तुलना में भारतीय महिलायें कम से कम एक मामले में भाग्यशाली रहीं हैं और वह यह कि उन्हें आजादी के बाद ही पुरुषों की तरह मत देने और चुनाव में खडे होने का अधिकार प्राप्त हो गया. मतदाता के रूप में पुरुषों के समान सीमित अधिकार तो उन्हें 1935 में ही हासिल हो गए थे. दुनिया के दूसरे देशों की तरह, उन्हें इसके लिए लम्बा संघर्ष नहीं करना पड़ा. पश्चिमी देशों में मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट द्वारा 1792 में स्त्रियों के लिए मताधिकार की मांग सबसे पहले उठाई गयी थी. तब से इस अधिकार के लिए जो कठिन और व्यापक संघर्ष शुरू हुआ,  उसे 20वीं शताब्दी में सफलता हासिल हो सकी. कई देशों में तो आज भी महिलायें इस अधिकार से वंचित हैं.

ऐसा भी नहीं है कि समान मताधिकार, भारतीय महिलाओं को थाली में सजा कर दे दिया गया हो. भारत का शासन चलाने के लिए नए अधिनियम को लागू करने की पूर्व संध्या पर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन भारत मंत्री ईएस मांटेग्यु 1917 में भारत आये. उस दौरान, 1 दिसंबर, 1917 को पांच महिलाओं का एक शिष्टमंडल उनसे मद्रास में मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग रखी. मांटेग्यु–चेम्सफोर्ड सुझावों में यद्यपि मताधिकार को और विस्तृत करने का सुझाव भी शामिल था लेकिन इसमें महिलाओं का कोई उल्लेख नहीं था. १९१८ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने महिलाओं के मताधिकार का समर्थन किया. १९९१ में जब ‘द गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया बिल’ पेश हुआ तब एनी बेसेंट, सरोजिनी नायडू और हिराबाई ने महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिए जाने की वकालत की. लेकिन इस मसले को चुनी हुई सरकारों पर छोड दिया गया. त्रावणकोर और मद्रास पहले और दूसरे ऐसे राज्य थे, जिन्होंने क्रमशः 1920 और 1921 में महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया. यह अधिकार केवल पढ़ी-लिखी महिलाओं को दिया गया था. इसके बाद दूसरे राज्यों में भी यह सिलसिला शुरु हुआ. 1931-32 में लार्ड लोथियन समिति ने महिलाओं को मताधिकार देने के लिए जो दो शर्तें निर्धारित कीं, वे बहुत भेदमूलक थीं. एक तो किसी भी भाषा में पढ़–लिख सकने वाली महिलाओं को मताधिकार देना प्रस्तावित किया गया. इसके अलावा, उन्हें किसी की पत्नी होना भी अनिवार्य कर दिया गया. यानी, विधवायें या किसी कारण से विवाह न करने वाली महिलायें मताधिकार से वंचित रखीं गयीं.

प्रतिनिधित्व की कठिन डगर
परन्तु मताधिकार प्राप्त हो जाने मात्र से महिलाओं का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. उसका दूसरा चरण था राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संघर्ष. राजनीतिक पार्टियों द्वारा टिकट देने से लेकर उनके जिताकर लाने तक में पितृसत्तात्मक समाज और सत्ता की अरूचि स्पष्ट दिखती है. यही कारण है कि आजादी के बाद पहली  लोकसभा (1952) से लेकर अब तक संसद में महिलाओं का  प्रतिनिधित्व बढा तो है लेकिन अत्यंत धीमी गति से और यह आज भी बहुत कम है. 1952 में जहां संसद में 4.50 प्रतिशत महिलाएं थीं वहीं 2014 में यह प्रतिशत 12.15 प्रतिशत ही हो सका. हालांकि इस बीच विभिन्न कारकों के चलते, सार्वजनिक जीवन  में महिलओं की सक्रियता गुणात्मक रूप से बढ़ी.

इस सक्रियता का ही नतीजा था  कि  महिलाओं के प्रतिनिधित्व को संसद में कम से कम 33 प्रतिशत करने के लिए महिला आरक्षण बिल की योजना बनी. इस बिल का नाम लेते ही आज एक तस्वीर सबसे पहले जेहन में आती है – भाजपा नेता सुषमा स्वराज और सीपीएम की कद्दावर नेता वृंदा करात की प्रसन्न मुद्रा में हाथों में हाथ डाले हुए तस्वीर.

सुषमा स्वराज की पार्टी आज सता में है. नई संसद के कई सत्र आये और चले गए लेकिन महिला आरक्षण बिल की कोई चर्चा नहीं हुई, यद्यपि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इस बिल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई थी और इस सरकार के बनते ही सुषमा स्वराज ने महिला आरक्षण बिल को सरकार की प्राथमिकता बताया था. यह सुखद है कि १६वीं लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व, 15वीं लोकसभा के 10.86 प्रतिशत से बढकर 12.15 प्रतिशत हो गया है. और पहली बार सरकार में छह महिलायें महत्वपूर्ण मंत्रालय सम्हाल रहीं हैं. फिर क्या कारण है कि  नई सरकार के दो साल बीत जाने के बाद भी इस बिल की सुध लेने वाला कोई नहीं है? जबकि लोकसभा में सरकार को बहुमत प्राप्त है और विपक्षी दल भी इसके प्रति प्रतिबद्धता जता चुके हैं.

क्या मुलायम सिंह यादव या लालू यादव इस बिल को लटकाए रखे जाने का कारण है? नहीं.  यह उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रतिशत के हिसाब से मुलायम सिंह यादव के दल ने ममता बनर्जी के दल के बाद, दूसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार उतारे थे जबकि संख्या के हिसाब से आम आदमी पार्टी ने 39  महिला उम्मीदवार उतार कर दोनों बड़ी पार्टियों को पीछे छोड दिया था. सत्ताधारी भाजपा ने केवल 20 महिला उम्मीदवार उतारे थे. इन आंकडों से महिला आरक्षण के प्रति मुख्यतः पुरुष वर्चस्व वाले भारतीय राजनीतिक  दलों की नियत का अन्दाजा लगाया जा सकता है. चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन का विश्लेषण करते हुए सीपीएम ने जिन कारणों को चिह्नित किया उनमें से एक था कम महिला उम्मीदवारों को अवसर देना और इस मामले में उसने  ‘बुर्जुआ पार्टियों’  को अपने से बेह्तर पाया.

यूं टलता गया महिला आरक्षण बिल 
1993 में 73वें संवैधानिक संशोधन के जरिये पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद हुए 1996 के लोकसभा चुनाव में सभी प्रमुख पार्टियों ने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को अपने चुनावी घोषणापत्रों में रखा. तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट की प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने सबसे पहले महिला आरक्षण बिल को ४ सितम्बर, १९९६ को लोकसभा में पेश किया. इसे गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया, जिसने 9 दिसंबर, 1996 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी. हालांकि राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसे 11वीं लोकसभा में दुबारा पेश नहीं किया जा सका. इसे दुबारा पेश किया अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 12वीं लोकसभा में. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे चार बार लोकसभा में पेश किया और हर बार हंगामे के बाद ‘सर्वसम्मति निर्मित’ करने के नाम पर इसे टाल दिया गया. कांग्रेस की नेतृत्व वाली
यूपीए सरकार ने भी इसे दो बार संसद में पेश किया. मार्च 2010 में राज्यसभा ने इस बिल को पारित भी कर दिया लेकिन उसके बाद चार साल  (15वीं लोकसभा के भंग होने तक) तक यह बिल लोकसभा में नहीं लाया जा सका.

आरक्षण के भीतर आरक्षण  
लगभग सभी पार्टियों की सैद्धांतिक सहमति के बावजूद उनका पुरुष नेतृत्व महिलाओं के लिए जगह खाली करने  को तैयार नहीं है. अन्यथा, पिछले 20 सालों से यह बिल सर्वसम्मति की तलाश में लटका नहीं रहता. जहां सीपीएम जैसी पार्टीयां महिलाओं को टिकट देने के मामले में ‘बुर्जुआ पार्टियों’ को अपने से बेहतर पा रही है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढाँचे में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित कर दी है.  इस बिल के न पास होने का ठीकरा अस्मितावादी पार्टियों और राजनेताओं पर फोड़ा जा रहा है. यह सच है कि जब–जब बिल संसद में लाया गया, तब–तब अस्मितावादी पार्टियों और उनके नेताओं ने अलग-अलग राग अलापा. फिर भी, शरद यादव के ‘परकटी महिलाओं’  वाले पुरुषवादी मानसिकता से लबरेज जुमले को नजरअंदाज करते हुए देखना यह चाहिए कि क्या इन नेताओं द्वारा पिछड़े वर्ग की महिलाओं की ‘जायज प्रतिनिधित्व’ के मुद्दे पर वर्तमान महिला बिल का विरोध, क्या सर्वथा ‘महिला-विरोधी’ स्टैंड है? ये पार्टियां और नेता सामाजिक–सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी महिलाओं के लिए महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग करते रहे हैं. ‘गत  12 दिसंबर , 2015 को नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन और स्त्रीकाल द्वारा महिला आरक्षण पर आयोजित राउंड टेबल में दलित स्त्रीवादी विचारक और ‘राष्ट्रीय दलित आन्दोलन’ की संयोजक  रजनीतिलक आदि ने स्पष्ट किया कि ‘ उनका एक प्रतिनिधिमंडल लालू प्रसाद आदि नेताओं से ‘महिला आरक्षण बिल में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण  के लिए मिलने गया और इस तरह इन नेताओं की आवाज दलित -बहुजन स्त्रियों की आवाज है .’  उन्होंने दावा किया कि बहुजन नेताओं द्वारा  कोटा के भीतर कोटा की मांग वास्तव में दलित -बहुजन स्त्रियों द्वारा उठाई गई मांग का ही विस्तार है. ‘

अलग–अलग फ़ॉर्मूले 
पिछले 20 सालों की राजनीतिक कवायद के दौरान महिला आरक्षण को लेकर कई फ़ॉर्मूले भी सामने आये. इनमें एक फ़ॉर्मूला है पार्टियों के द्वारा टिकट बंटवारे में 33 प्रतिशत आरक्षण का, जिसे अनुपयोगी मानने वालों का तर्क है कि ऐसे में पुरुष-प्रधान पार्टियां न जीती जा सकने वाली सीटें महिलाओं को दे देंगी. एक वर्ग पार्टियों के संगठनात्मक ढांचें में आरक्षण की मांग कर रहा है, जो कि पार्टियों के अपने संविधान में परिवर्तन के जरिये सुनिश्चित किया जा सकता है. भारतीय जनता पार्टी ने इसकी पहल भी की है लेकिन प्रतिनधित्व का इस तरीके की सफलता प्रायः पुरुष वर्चस्व वाली पार्टियों की सदिच्छा पर निर्भर करेगा.महिला आरक्षण के सिलसिले में अब तक लोकसभा और विधानसभाओं में ही आरक्षण की बात की जाती है जबकि विधेयकों के पारित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिला आरक्षण के लिए  कोई पहल नहीं की जा रही है. इसके लिए मेधा नांदिवादेकर ने एक फ़ॉर्मूला सुझाया था कि चूँकि प्रत्येक राज्य हर दो वर्ष वर्षों में राज्यसभा के अपने एक-तिहाई कोटे का चुनाव करता है और बड़े राज्यों के मामले में यह एक-तिहाई, तीन सीटों से अधिक होता है इसलिए एक सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती है. जहां एक-तिहाई सीटें तीन से कम हैं, वहां पहले दो चुनावों में तो एक–एक सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं और तीसरे चुनाव में सारी सीटें अनारक्षित रखी जा सकतीं हैं. यही फ़ॉर्मूला विधानपरिषदों और अन्य समितियों के लिए भी अपनाया जा सकता है.

आरक्षण का असर 
महिलाओं के आरक्षण के प्रसंग में अक्सर यह सवाल किया जाता है कि उनके प्रतिनिधित्व में इजाफे से महिलाओं को क्या लाभ होगा? पहली बात तो यह है कि अधिक  प्रतिनधित्व अपने-आप में एक लाभ है. जब ग्राम पंचायतों में पहली बार 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया तब पंचायतों में ४३ प्रतिशत महिलाएं चुन कर आईं थीं. दरअसल, महिलाओं की क्षमता और योग्यता को पुरुष वर्चस्व हमेशा से सन्देह की निगाहों से देखता रहा है और महिलाओं ने जब–जब मौका हासिल किया है (कभी पुरुष उदारता ने उन्हें यह मौका नहीं दिया; या तो उन्होंने यह लड़कर हासिल किया या पितृसत्तात्मक समाज की कमजोरियों ने उन्हें यह अवसर दिया ), तब-तब उन्होंने अपने को साबित ही किया है. सन १००५ में जब बिहार में देश में पहली बार स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला तो समाज इसके लिए तैयार नहीं था. व्यावहारिक तौर पर महिला जनप्रतिनिधियों के पुरुष अभिभावक ही सत्ता संचालन  करने लगे. ‘मुखियापति’ जैसे शब्दों का आविर्भाव हुआ और महिला मुखिया के लिए अश्लील गीत प्रचलन में आये. मेरा भी बिहार में स्वतंत्र  पत्रकारिता के दौर में ऐसे दर्जनों मुखियापतियों से साबका पड़ा. लेकिन अवसर ने जल्द ही अपना रंग दिखाना  शुरु कर दिया. बिहार के तुरंत बाद 50 प्रतिशत आरक्षण महाराष्ट्र में भी लागू हुआ और मैं इन दो राज्यों के अपने अनुभव और खबरों के आधार पर कह सकता हूं कि महिला जनप्रतिनिधियों ने शुरुआती हिचक के बाद धीरे–धीरे पुरुष अभिभावकों से मुक्ति पानी शुरु कर दी है. महाराष्ट्र के एक जिले की लगभग तीन दर्जन पंचायतों के अध्ययन के आधार पर एक शोध निष्कर्ष सामने आया कि महिला सरपंच (मुखिया) वाले गाँव में महिलाओं की राजनैतिक जागरूकता बढ़ी है और वे पंचायतों में ज्यादा सक्रिय हुई हैं.

बिहार, 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों द्वारा दिये जा रहे मताधिकार के प्रति अडियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल किये जाने के बाद, बिहार विधानसभा ने महिलाओं को यह हक़ दिया. वहीं इन दिनों महिला सशक्तिकरण के लिए बिहार सबसे अव्वल पहल लेता हुआ राज्य दिख रहा है. 2005 में देश में यह पहला राज्य बना, जिसने स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत  आरक्षण दिया. शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस सेवा सहित विभिन्न नौकरियों में भी यह राज्य महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दे रहा है.

कहाँ हैं रुकावटें 
गेंद अब पूर्णतः भाजपा के पाले में है. वह अब मुलायम सिंह यादव या लालू यादव के नाम पर इस बिल को और नहीं टाल सकती. इस लोकसभा में उनकी शक्ति नगण्य है. सवाल यह भी है कि ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’, क्या मुलायम सिंह द्वारा इस बिल को टालने का हथियार भर है. ऐसा नहीं माना जा सकता. मैं मुलायम सिंह और उनकी पार्टी के नेताओं की स्त्री विरोधी करतूतों और वक्तव्यों का संज्ञान लेते  हुए भी ऐसा नहीं न मानने का कारण देख रहा हूँ. यह सही है कि आज भारत में संख्याबल और भागीदारी के अनुपात में ही चुनावों में टिकट बांटे जाते हैं. जाति विशेष की आबादी देखते हुए उम्मीदवार तय होते हैं. इस प्रवृत्ति ने कम से कम इतना सुनिश्चित तो जरूर किया है कि राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान न होने के बावजूद, इन जातियों के प्रतिनिधि लोकसभा में बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं, जो आज से दो दशक पहले तक नहीं होता था. लेकिन सवाल यह है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण से कौन सा वर्ग भयभीत है और इसके प्रावधान से हर्ज ही क्या है. ‘परकटी और बालकटी’ जैसे जुमलों की निंदा करते हुए इस विडम्बना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि महिला आरक्षण लागू करवाने में असफलता के लिए स्त्रीवादी आंदोलनों पर पुरुष वर्चस्व के अलावा सवर्ण वर्चस्व भी सामान रूप से जिम्मेवार है.यह भी एक बड़ी विडम्बना ही है कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व के सवाल पर सक्रिय महिलायें, जाति-प्रतिनिधित्व के मसले पर एक राय नहीं हो पाती वहीं जाति-प्रतिनिधित्व के सवाल पर सहमत लोग महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मसले पर ईमानदार पहल नहीं करते. जबकि प्रतिनिधित्व का मूल लक्ष्य सामाजिक–सांस्कृतिक रूप से पीछे छूट गए लोगों को प्रतिनिधित्व देना है. बीपी मंडल की सिफारिशें लागू होने के बाद दिल्ली के संभ्रांत गार्गी महिला कालेज की सवर्ण छात्राओं ने उसके विरोधियों का साथ जमकर निभाया. उनके हाथों में एक तख्ती होती थी, जिसपर लिखा होता था ‘हमारे पतियों की नौकरी नहीं छीनो.’ इस तख्ती के मायने आरक्षण-विरोधी तो थे ही, स्त्री-विरोधी भी थे. इन छात्राओं को शायद लैंगिक भेदभाव और  जातिगत भेदभाव के अंतर्संबंध की ठीक–ठीक समझ नहीं थी. एक अध्ययन के अनुसार, इस आन्दोलन के तुरन्त बाद,  छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के साथ जब भेदभाव किया गया तो उनके सवर्ण साथियों की जगह दलित साथियों ने ही उनका साथ दिया.

यह विडम्बना ही है कि आरक्षण और प्रतिनधित्व के सबसे बड़े सिद्धांतकारों महात्मा फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार और डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के प्रति महिला संगठनों में न तो आदर भाव है और ना ही कृतज्ञता भाव, जबकि इन सभी ने महिलाओं के लिए अभूतपूर्व पहल कीं थीं. डा. आम्बेडकर ने तो महिलाओं के अधिकार के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ पर संघर्ष करते हुए आजाद भारत के पहले मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया था. समानता के सिद्धांत में किन्तु–परन्तु के साथ आस्था के कारण ही शायद महिला आरक्षण बिल के मामले में महिला नेताओं और आन्दोलनकारियों ने पिछले 20 सालों में भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं की है. और इन्हीं रास्तों से पुरुष–वर्चस्व अपने लिए मार्ग तलाश लेता है. यही कारण है कि राज्यसभा में महिला प्रतिनधित्व का विषय बिल में शामिल नहीं होता है या ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ के समर्थकों को खलनायक बना कर पुरुष तंत्र इस महत्वपूर्ण बिल को टालता रहता है.

1996 से जारी है लंबा संघर्ष

सितंबर 1996 महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत और संसद की संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द
नवंबर 1996 महिला संगठनों द्वारा संयुक्त संसदीय समिति को संयुक्त ज्ञापन
मई 1997 महिला संगठनों द्वारा राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को संयुक्त ज्ञापन
जुलाई 1998 विधेयक को पारित कराने की मांग को लेकर संसद के समक्ष महिलाओं का संयुक्त विरोध प्रदर्शन
जुलाई 1998 राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुव्र्यवहार की निंदा व यह मांग कि विधेयक के प्रावधानों में कोई परिवर्तन न किया जाए
अगस्त 1998 महिला संगठनों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिला
अगस्त 1998 विधेयक को चर्चा व पारित करने हेतु सूचिबद्ध किए जाने की मांग को लेकर संसद तक संयुक्त मार्च और धरना
नवंबर 1998 बारहवीं लोकसभा चुनाव में महिलाओं का संयुक्त घोषणापत्र जिसमें राजनैतिक दलों से इस विधेयक को पारित कराने की मांग की गई
दिसंबर 1998 ‘‘वाईसेस आॅफ आॅल कम्युनिटीज़ फाॅर 33 पर्सेन्ट रिजर्वेशन फाॅर विमेन’’ का दिल्ली में संयुक्त अधिवेशन
मार्च 1999 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के संयुक्त आयोजन में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई
अप्रैल 2000 मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संयुक्त ज्ञापन जिसमें यह मांग की गई कि विधेयक के विकल्प के रूप में महिलाओं को पार्टियांे द्वारा टिकिट वितरण में आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव को वापस लिए जाने की मांग की गई थी
दिसंबर 2000 लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी से महिलाओं के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात जिसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर राजनैतिक पार्टियों की उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए उनके द्वारा राजनैतिक दलों की बैठक बुलाए जाने पर विरोध व्यक्त किया गया
मार्च 2003 केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री सुषमा स्वराज को संयुक्त ज्ञापन सौंपकर यह मांग की गई कि सर्वदलीय बैठक में वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार करने की बजाए विधेयक पर मतदान कराया जाए
अप्रैल 2003 स्थानीय स्व-शासी संस्थाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले 73वें व 74वें संविधान संशोधन की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से बिल का समर्थन करने की अपील
अप्रैल 2004 एनडीए सरकार को संसद में पराजित करने की अपील करते हुए संयुक्त वक्तव्य जारी। इसमें सरकार द्वारा आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर महिलाओं के साथ विश्वासघात को एक कारण बताया गया था।
मई २००४   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से संयुक्त अपील कि वे न्यूनतम साँझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना शामिल करें।
मई २००५   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिल कर विधेयक को चर्चा के लिए प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एक बार फिल मिल कर विधेयक को प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिल कर उनसे यह अनुरोध किया कि विधेयक के सम्बन्ध में सकारात्मक पहल करें।

मई , २००८ में सरकार ने विधेयक को राज्य सभा में प्रस्तुत किया ताकि वह निरस्त न हो जाये.

दिसंबर 2009, संसद की विधि एवं न्याय एवं कार्मिक विभागों की स्थाई समिति ने  विधेयक को पारित करने की अनुशंसा की.
फरवरी, २०१० , विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिल गयी.
मार्च  2010, राज्यसभा में विधेयक पारित हुआ.

फॉरवर्ड प्रेस के फरवरी अंक का कवर स्टोरी. साभार

एक सपने की मौत/अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में प्रतिभावान दलितों की आत्महत्या

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

(समय बहुत बदला नहीं है. दलित विद्यार्थियों की सांस्थानिक ह्त्या अकादमिक जगत पर ह्रदयहीन क्रूर वर्चस्व के परिणाम हैं – द्रोणाचार्य की अमरता के परिणाम . इसका सिलसिला अकादमिक जगत में दलित -पिछड़े विद्यार्थियों की पहली पीढी के आने के साथ ही शुरू हो गया था , जब ऊंची जातियों और  उच्च वर्ग के लिए ‘ आरक्षित स्पेस’ में उनकी इंट्री हुई थी . रोहित वेमुला की ‘आत्महत्या’ उसकी ही नवीनतम कड़ी है . यद्यपि सुधा अरोड़ा के 23 साल पुराने इस लेख में आई .आई टी की छात्रा की आत्महत्या की स्थितियां वही नहीं हैं, जो रोहित की आत्महत्या की हैं. लेकिन यह आलेख यह बताता जरूर है कि अकादमिक संस्थान अपने ठस्स पोजीशन से एक कदम आगे चलने के लिए तैयार नहीं . वंचित तबके से आने वाले विद्यार्थियों ने जब अपनी काबिलियत के बल पर द्रोणाचार्यों के ‘अंगूठा -अभियान’ से जूझते हुए,  विपरीत परिस्थितियों में भी अपने को सिद्ध करना शुरू किया तो यह ह्रदयहीन व्यवस्था उनके प्रति और क्रूर होती गई.  चंद्राणी हालदार  से लेकर रोहित वेमुला की आत्महत्या का निरंतर सिलसिला यही बयान करता है .)


यह पहली बार नहीं है और न आखिरी बार कि किसी अनुसूचित जाति के तबके की पहली पीढ़ी, अपनी मेहनत और लगन से, इन अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में, तकनीकी विज्ञान की स्नातक पढ़ाई तक प्रवेश पाने में सफल होने की ऊंचाई पर पहुंची, लेकिन सहपाठियों के एलीट वर्ग ने और व्यवस्था के तयशुदा हथकंडों ने उनकी विलक्षण प्रतिभा और कला का गला घोट कर उन्हें अपने सुनहरे भविष्य का अंत करने पर मजबूर किया.

इस तरह की आत्महत्या के मामले हर साल इस संस्थान में घटित होते हैं, पर न व्यवस्था का शिकंजा ढीला होता है, न आरक्षित सीट के तहत प्रवेश परीक्षा के नियम बदलते हैं, न सहपाठियों का उपेक्षा का नज़रिया बदलता है, न माता-पिता समय रहते चेतते हैं. हर साल एक नये दलित परिवार का होनहार, प्रतिभावान छात्र इस मकड़जाल में फंसकर अपने सपनों का मोहभंग होते देख अपनी ज़िन्दगी से हाथ घो बैठता है और शैक्षणिक संस्थान के आकाओं के कानों पर जूं नहीं रेंगती.

6 फरवरी 1993 को भारत के अग्रणी तकनीकी शिक्षा संस्थान आई. आई. टी. पवई, बम्बई के छात्रावास नं 10 में द्वितीय वर्ष की उन्नीस वर्षीय छात्रा चंद्राणी हालदार ने शाम साढ़े आठ बजे अपने कमरे में भीतर से सांकल चढ़ाकर आत्महत्या कर ली.

उस वक्त पहले माले के उस विंग में कोई अन्य लड़की उपस्थित नहीं थी. कुछ लड़कियां कैन्टीन में थी और अधिकांश छुट्टी का दिन होने के कारण अपने स्थानीय अभिभावकों के घर थीं. आग की लपटें और धुंआ देखकर छात्रावास में खलबली मची. बंद दरवाजे में से किसी के चिंघाड़ने की आवाज़ें आ रही थीं. दरवाज़ा तोड़कर आग बुझाई गई लेकिन तबतक चंद्राणी का शरीर बुरी तरह झुलस चुका था. घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में उसे मृत घोषित किया गया.

चंद्राणी हालदार विशेष इंजीनियरिंग फ़िजिक्स की छात्रा थी. यह विषय अच्छे प्रतिशत से प्रवेश परीक्षा पास करनेवाले,सभी क्षेत्रों से आनेवाले मेधावी छात्रों में से भी, सिर्फ 2 या 3 प्रतिशत छात्रों को ही मिलता है.

आई. आई. टी. में प्रवेश का समान अवसर देने के लिये एस सी, एस टी की दो चार सीटों के आरक्षण में पिछले दो वर्षों से प्रादेशिक भाषा में भी प्रवेश परीक्षा देने का प्रावधान रखा गया है. चंद्राणी हालदार ने शुरु से बांग्ला माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी, इसलिए आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा भी बांग्ला माध्यम से लिखकर पास करना उसके लिए टेढ़ा काम नहीं था. बचपन से ही वह बहुत मेधावी और प्रतिभावान छात्रा थी. लेकिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना उसके लिये एक बड़ी बाधा थी जिसके कारण छात्रावास की अपनी दूसरी सहपाठिनों से वह बातचीत नहीं कर पाती थी. इसी के तहत पहले साल में उसके अच्छे अंक नहीं आये थे और दूसरे साल भी वह पिछले साल के कुछ पेपर दुबारा दे रही थी.

दो दिन पहले ही उसे पता चला था कि संभवत: इस बार भी उसके अंक अच्छे नहीं आये हैं. संस्थान के नियमों के मुताबिक दो वर्ष लगातार औसत अंक न आने से छात्र को संस्थान छोड़ना पड़ता है, चंद्राणी को इस आशय का ‘चेतावनी पत्र’ मिल चुका था.

शनिवार (6 फरवरी 1993) के दिन शाम को, चंद्राणी ने दूरदर्शन की फ़िल्म ‘आसपास’ शुरू से आखिर तक देखी. इस फ़िल्म में हेमामालिनी अंत में खुदकुशी कर लेती है. साढ़े आठ बजे फ़िल्म ख़त्म होने पर वह सीधी अपने कमरे में गयी और निराशा और कुंठा की चरम आत्महंता मन:स्थिति में अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया.

चंद्राणी हालदार अपनी मातृभाषा बांग्ला में कविताएं लिखती थी, एक बहुत अच्छी चित्रकार भी थी और पेन्टिंग के ब्रश धोने के लिये अपने कमरे में डालडा के टिन में केरोसिन तेल रखती थी, जिसका इस्तेमाल उसने अपने जीवन का अन्त करने के लिये किया.

देश के नामी प्रतिष्ठित संस्थानों में आत्महत्या की यह घटना पहली नहीं है. अहमदाबाद के मैनेजमेंट के सुप्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट में भी इस तरह के मामले सुनने में आये है. आत्महत्या करनेवाले छात्रों के मानसिक असंतुलन या व्यक्तिगत समस्याओं (पारिवारिक कलह, तनाव, असुरक्षा या असफल प्रेमप्रकरण) को जिम्मेदार ठहराकर इन मामलों को खारिज कर दिया जाता है और इस तरह की ख़बरें अख़बार के तीसरे या पांचवे पन्ने के एक छोटे से कॉलम तक सीमित रहकर ख़त्म हो जाती हैं.

चंद्राणी हालदार निम्न मध्यवर्ग की अनुसूचित जाति से थी. उसके पिता, जो रेलवे स्टाफ में हैं, खडगपुर से सोमवार को बम्बई पहुंचे. चंद्राणी की मां, जो ट्रेन से आ रही थी और ट्रेन अठारह- बीस घंटे लेट थी, मंगलवार की रात को ही बम्बई पहुंच पाई. बुधवार की दुपहर को ही चंद्राणी का दाह – संस्कार किया जा सका. इलेक्ट्रिक क्रेमोटरियम में चंद्राणी की मां की चीखों और आख़िरी विनती ”आमी ऐकबार आमार मेयेर मुख देखबो” से वहां एकत्र हुई छात्राओं के दिल दहल गये.

सोमवार 8 फरवरी को आई. आई. टी के लेक्चर थियेटर और मेन बिल्डिंग के सामने सभी छात्रों ने रजिस्ट्रार और डीन के सामने प्रदर्शन किया और अपनी कुछ मांगे रखीं जिनमें प्रमुख यह थी कि आई. आई. टी. परिसर के भीतर स्थित अस्पताल में कुछ आवश्यक उपकरण और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधायें उपलब्ध करवायी जायें और अस्पताल को एमरजेंसी की हालत में उपयोग करने लायक स्थिति में रखा जाये.

तीन वर्ष पहले कानपुर के आई. आई. टी. में केमिकल इंजीनियरिंग के एक छात्र ने प्रयोगशाला में रासायनिक परीक्षण करते समय एक जहरीला रसायन गलती से भीतर खींच लिया था जिससे उसके फेफड़े और अंतड़ियों को गंभीर नुकसान पहुंचा. तुरन्त उसे अस्पताल की सहायता और डॉक्टरों की मुस्तैदी से बचाया जा सका. उसके इलाज में छह महीने से भी अधिक समय लगा पर इस तरह के मामले में डॉक्टर या अस्पताली सहायता की ज़रा सी असावधानी या ढील छात्र को मौत के मुंह में लें जा सकती थी.

यह सही है कि अस्पताल में प्राथमिक चिकित्सा के अनिवार्य उपकरणों और सुविधाओं का समय पड़ने पर तत्काल उपलब्ध करवाया जाना बहुत ज़रूरी है लेकिन यह आत्महत्या जैसी घटनाओं का हल नहीं है. इस तरह के हादसों के बाद की अनिवार्य चिकित्सा से अधिक आवश्यक है, ऐसे हादसों तक पहुंचाने की मन:स्थिति और माहौल के कारणों का निदान ढूंढना.

आई. आई. टी. जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाना कितना मुश्किल और प्रतिस्पर्धात्मक है, यह सभी जानते हैं. यह एक ऐसी संस्था है जहां चुनाव सिर्फ योग्यता और प्रतिभा के बल पर होता है, जहां कोई पहुंच, साधन, रिश्वत या जोड़ – तोड़ नहीं चलती.

कई बार आई. आई. टी. के प्राध्यापकों के अपने बच्चे भी पूरी कोशिश के बावजूद प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं होते. इन प्रवेश परीक्षाओं की विशेष ट्रेनिंग के लिये अग्रवाल क्लासेज़ और ब्रिलिएन्ट क्लासेज़ जैसे महंगे कोर्स हैं जिनमें प्रवेश लेने के लिये 85 प्रतिशत अंक आने आवश्यक है. इन पत्राचार पाठयक्रमों में प्रवेश लेकर, दो – तीन सालों की कड़ी मेहनत के बाद भारत के कोने -कोने से लाखों छात्र आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से कुल दो-ढ़ाई हजार के लगभग छात्रों का चुनाव हर वर्ष इस शिक्षण संस्थान के लिये किया जाता है. इसमें कुछ सीटें अनुसूचित जाति के लिये भी आरक्षित रहती हैं, जिसके तहत पिछले दो वर्षो से प्रादेशिक भाषाओं में भी प्रवेश – परीक्षा लिखने का प्रावधान किया गया है.

सवाल यह उठता है कि वर्षों की मेहनत और अपनी योग्यता के प्रति किंचित आश्वस्त छात्र की समस्या क्या इस संस्थान में प्रवेश पा लेने पर ही समाप्त हो जाती है ?

आई. आई. टी. (बम्बई, मद्रास, दिल्ली, कानपुर और खडगपुर) या आई. आई. एम (अहमदाबाद) जैसे संस्थानों में छात्रावास में रहना विद्यार्थियों के लिये अनिवार्य है. छोटे शहरों या कस्बों से आये छात्र – छात्राओं को भी कुछ अपनी सुविधा और कुछ प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों की गुणवत्ता के अनुसार शहर के चुनाव की सुविधा दी जाती है. प्रवेश के समय सलाहकार, प्राध्यापक इसके लिये मौजूद रहते हैं.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की कुछ ‘बनने’ के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह ‘ब्रिलियन्स शॉक’ है. छात्रावास में आये अधिकांश छात्र ऐसे होते हैं जो पहली बार पढ़ाई के लिये अपने घर से दूर होते हैं. शुरु शुरु में सभी छात्र ‘होमसिक’ महसूस करते है पर धीरे धीरे वे हॉस्टल और इंस्टीटयूट के व्यस्त कार्यक्रमों और अनुशासन के ढांचे में रच-खप जाते हैं. छात्रावास के इस माहौल और शैक्षणिक पध्दति में जो अपने को सम्मिलित नहीं कर पाते, वह एक या दो प्रतिशत ही होते हैं.

क्या अपनी महत्वाकांक्षा को साकार करने की अपनी योग्यता के प्रति आश्वस्त छात्र अपना मोहभंग होते देख आत्महत्या पर मजबूर हो जाते हैं ? हो सकता है, एक या दो मामले असफल प्रेम या पारिवारिक उपेक्षा या दबाव के हो किन्तु अधिकांश आत्महत्याएं इस तरह के शैक्षणिक ढांचे के अभिजात्य और साथी छात्रों के सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक माहौल से अपना संतुलित तालमेल न बिठा पाने के कारण होती हैं. सवाल यह है कि इस तरह के तथाकथित ‘ मिसफिट ‘ छात्रों के लिये इंस्टीटयूट या छात्रावास के अन्य साथी अपनी ओर से उन्हें मुख्यधारा में मिलाने की कितनी कोशिश करते हैं ? और वे खप नहीं पाते तो क्यों ?

चंद्राणी हालदार का ही उदाहरण लें – एक औसत निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आयी एक मेधावी लड़की. उसके पिता बताते हैं कि उन्हें उस पर गर्व था, हर बार कक्षा में प्रथम आने की रिपोर्ट लाकर अपने माता पिता के पांव छूकर आशीर्वाद लेती थी, उसके स्कूल को उस पर नाज़ था- आई. आई. टी. की संयुक्त प्रवेश परीक्षा पास करनेवाली अपने स्कूल की वह एकमात्र छात्रा थी. बहुत अच्छी चित्रकार थी, गाने का भी उसे शौक था, बंगला में कुछ मौलिक रचनायें भी लिखा करती थी, अपनी भाषा पर उसका अच्छा अधिकार था. आख़िरी बार जब उसके पिता ने उससे बात की, उसने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था कि वह निराश या दुखी है.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की अपनी आंखों में अपने परिवार, अपने बुज़ुर्गों की तमाम उम्मीदें और ज़िन्दगी में कुछ कर दिखाने, कुछ ‘बनने’ के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह ‘ ब्रिलियन्स शॉक ‘ है.

उसने पहली कक्षा से ही बंगला माध्यम से पढ़ाई की है. न वह हिन्दी जानती है, न अंग्रेजी. यहां फर्राटे से अंग्रेजी बोलनेवालों के बीच वह अपने आप को छोटा महसूस करती है. उसे लगता है उसका मखौल उड़ाया जा रहा है और वह, जो अपने आप को बहुत बुध्दिमान समझती आयी है, यहां के अंग्रेजी-दां छात्र-छात्राओं के बीच एक अव्वल दर्ज़े की मूर्ख साबित हो रही है. उसकी कस्बई योग्यता की अहमियत यहां कुछ नहीं है. अंग्रेजी की बाधा के कारण अपने जीवन में पहली बार इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में प्राप्त कम अंक उसे दहशत में डाल देते हैं.

संभवत: उसे लगा होगा कि द्वितीय वर्ष में भी यही स्थिति रहने पर उसे यदि संस्थान छोड़ना पड़ा तो वह कौन सा मुंह लेकर अपने अभिभावकों के पास जायेगी, जिनकी सारी उम्मीदों और सारे सपनों का अन्तिम छोर वह है. इसके अतिरिक्त उसका अपना वह आत्मीय, छोटा सा घरेलू माहौल यहां के पूरी तरह व्यावहारिक और प्रतियोगी, गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच खो जाता है.

यह ‘ कल्चर शॉक ‘ उसे और अकेला कर देता है. धीरे-धीरे वह अपनी सहपाठी छात्राओं से कटती चली जाती है. इस ‘ अकेलेपन ‘ के साथ पढ़ाई का भीषण दबाव उसे इस तरह के जानलेवा निर्णय के सामने खड़ा कर देता है. यूं भी अठारह से बाईस वर्ष तक के छात्र – छात्राएं इस संस्थान में आते हैं. यह उम्र वैसे भी बहुत नाज़ुक और अपरिपक्व होती है, जब किसी भी तरह का बाहरी झटका, छात्र के भीतर की दुनिया को ध्वस्त कर देता है. यह भी सही है कि इस तरह के निर्णय एक झटके से नहीं लिये जाते, इसके लिये मन में बहुत धीरे – धीरे ज़मीन तैयार होती रहती है.

द्वितीय वर्ष की इन्जीनियरिंग फ़िजिक्स की एक अन्य छात्रा ने बताया कि शुरु-शुरु में वह बिल्कुल बात नहीं करती थी क्योंकि उसका भाषाई माध्यम सिर्फ बांग्ला था. पर एक साल के बाद अपनी बात समझा पाना उसने सीख लिया था.फ़िजिक्स में उसे शुरु से दिलचस्पी थी और स्कूल के उसके अध्यापक ने उसे खडगपुर (जहां से वह आयी थी ) न ज्वायन कर बम्बई आई. आई. टी. चुनने की सलाह दी. उनका कहना था कि खडगपुर से मुंबई का स्टाफ बेहतर था. वह बहुत मजबूत व्यक्तित्व की लगती थी. जनवरी को हुए हॉस्टल के मेले में उसने खेल का एक स्टॉल संभाला था. शायद उस फ़िल्म ‘आसपास’ का उसके मन पर कुछ असर पड़ा हो और यह निर्णय तात्कालिक हो.

आई. आई. टी. कैम्पस के एक बंगाली संगीत शिक्षक के परिवार से पीयूल मुखर्जी ने कहा, ” हमें इस खबर से बहुत धक्का पहुंचा है, पिछले साल जब वह नयी-नयी बम्बई आयी थी, उसे अकेले देखते हुए और वह होमसिक महसूस न करे, हम उसे दादर दुर्गापूजा दिखाने ले गये, फिर घर का बंगाली खाना भी उसे खिलाया. दो-एक बार वह आयी भी, फिर उसने खुद ही आना बन्द कर दिया. हमने सोचा, शायद पढ़ाई के दबाव में वक्त नहीं मिलता होगा लेकिन इस दुर्घटना ने हमारे मन में बड़ा अपराध भाव पैदा कर दिया है. हम सब वक्त की रफ़्तार में भागे चले जा रहे हैं. बम्बई की मशीनी ज़िन्दगी तो आपको मालूम ही है. काश, हम उसकी खोज खबर लेते रहते.”

एक अन्य सीनियर छात्रा ने बताया, ” एक दिन तेज़ बारिश में हम एक छाते में दो लड़कियां भीगने से बचते हुए तेज़ चल रहे थे तो दूर से एक लड़की आराम से भीगती हुई धीरे धीरे आ रही थी. पास आयी तो देखा, चंद्राणी थी. हमने उससे कहा, जल्दी कपड़े बदलो वर्ना बीमार हो जाओगी, इस तरह बारिश में भीग क्यों रही हो तो उसने इत्मीनान से मुस्कराकर जवाब दिया, ‘ भालो लागछे ‘ (अच्छा लग रहा है.) हमें वह बहुत डिप्रेस्ड लगी लेकिन कुछ दिनों के बाद देखा, उसने बाल कटवा लिये हैं और स्कर्ट ब्लाउज़ भी पहनने लगी है तो हमें लगा कि वह हॉस्टल में एडजस्ट हो गयी है. ”

संभवत: अपने बाल काटकर या अपना पहरावा बदलने की सायास कोशिश के बावजूद वह दूसरे छात्रों और अपने बीच की गहरी खाई पाट नहीं सकी और अन्तत: किसी कमज़ोर क्षण में उसने अपना सब कुछ होम कर देना ही उचित समझा.  सवाल यह उठता है कि इस तरह के अकेलेपन, निराशा या अवसाद की स्थिति में पहुंचाने के लिये क्या स्वयं छात्र और अभिभावकों सहित पूरा माहौल जिम्मेदार नहीं है ? क्या इन प्रतिष्ठित संस्थानों के प्राध्यापक और छात्र – छात्राएं इस तरह के छात्रों के लिये अपनी कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं? क्या हर छात्रावास के तथाकथित वॉर्डन प्रोफ़ेसर को यह मालूम रहता है कि देर रात तक पढ़ाई में व्यस्त इन टीन – एजर्स छात्र छात्राओं की सख्त रूटीन में एक-दो छात्र ऐसे भी हैं जो लगातार धीरे – धीरे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और अकेले पड़ते जा रहे हैं ? क्या अपनी नियमित कक्षाओं से अलग इन संस्थानों के प्राध्यापक अपेक्षाकृत कमजोर छात्रों के लिये कुछ अतिरिक्त कक्षाओं का वक्त निकाल पाते हैं ?

और इससे भी ज़रूरी सवाल कि क्या इन उच्च मध्यवर्ग के अंग्रेजी-दां छात्रों के बीच निम्न मध्य वर्ग या निम्न वर्ग या अनुसूचित जातियों के एक-दो छात्रों के लिये (जो पूरी तरह अपने आप को इस नये अजनबी माहौल में मिसफिट पाते हैं) किसी तरह की काउन्सिलिंग की व्यवस्था है जो छात्र को अपने विश्वास में लेकर स्नेह का, अपनत्व का माहौल दे सकें ?

कानपुर के आई. आई. टी. में हिन्दी के प्रमुख वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर के नेतृत्व में एक रचनात्मक कक्ष -क्रिएटिव विंग शुरु किया गया था, जहां विज्ञान के छात्र भी रचनाओं के सृजन में, नये नये लेखकों से मिलने में बेहद दिलचस्पी लेते थे. इस क्रिएटिव विंग की सबसे बड़ी सफलता थी कि 1979 से 1993 के बीच उस संस्थान में आत्महत्या के इक्का दुक्का मामले ही सामने आए. इस तरह की ब्रीदिंग स्पेस तैयार की जानी चाहिए.

क्या इस तरह की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए जहां एक कच्ची उम्र का प्रतिभावान छात्र अपने संजोकर रखे हुए सपनों को बांट सके ? यदि ऐसा हो सकता है, तो उस मशीनरी को अधिक तत्परता से कारगर करने की आवश्यकता है, क्योकि पूरे देश में से चुने गये इन विलक्षण छात्रों में से एक को भी खोना न सिर्फ उसकी महत्वाकांक्षा और उसके माता-पिता के सपनों की मौत है बल्कि इन संस्थानों के सांस्कृतिक अभिजात्य के मुंह पर एक ज़बरदस्त तमाचा है.

मातृवंशात्मक समाज में स्त्री

आकांक्षा 

महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

आमतौर पर कुछ माता –प्रधान समाजों को मातृसत्तात्मक समाज कह दिया जाता है. ऐसा पितृसत्ता के विलोम के तौर पर किया जाता है. हालांकि पितृसत्ता एक सैद्धांतिक शब्दवाली है , जो पुरुष की सत्ता और स्त्रियों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन को अभिव्यक्त करती है. समाज में इसके विलोम की सत्ता कभी नहीं रही, अर्थात स्त्रियों की सत्ता और पुरुषों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन की स्थिति और न यह कोई स्त्रीवादी लक्ष्य है. स्त्री –अध्ययन की शोध-छात्रा आकांक्षा का यह लेख बताता है कि भारत के कुछ समाजों में मातृवंशात्मक व्यवस्था रही है, इस व्यवस्था में स्त्री की स्थिति को विश्लेषित करता यह आलेख. आलेख से यह भी स्पष्ट होगा कि मातृवंशात्मक व्यवस्था मातृसत्ता  नहीं है.

सबलोग के  कॉलम ‘स्त्रीकाल’ के लिए स्त्रीवादी दृष्टि से लिखे आलोचनात्मक विचार –आलेख और रचनायें आमंत्रित हैं. जनवरी अंक में आकांक्षा का  लेख
संजीव चंदन  

        
सभ्यता के आरंभिक इतिहास से यह ज्ञात होता है कि मानव समाज गुफाओं और कंदराओं में रहा करता था। उस समय न तो निजी संपत्ति की अवधारणा थी और न ही परिवार तथा राज्य की। मनुष्य (स्त्री-पुरुष) आखेट/शिकार करके अपना जीवन यापन किया करते थे। धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष छोटे-छोटे समूह बनाकर रहने लगे और यही समूह आगे चलकर कबीले में रुपांतरित हो गया। यह युग इतिहास में कबीलाई युग के नाम से जाना जाता है। इस समय तक एक तरह से स्त्री-पुरुष के बीच काम का बंटवारा हो गया था। आमतौर पर कबीले के पुरुष शिकार करते थे और महिलाएं कंद-मूल इकट्ठा करने का काम किया करती थीं। इस युग में पुरुष वर्ग का महिलाओं के जीवन, रहन-सहन आदि पर पूर्णरुप से वर्चस्व नहीं हो पाया था और महिलाओं की यौनिकता पर भी किसी का नियंत्रण नहीं था। यह इस युग की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। महिलाएं अपनी इच्छानुसार कबीले के अंदर किसी भी पुरुष के साथ संबंध बना सकती थीं। अत:, बच्चों की मां का तो पता रहता था पर, पिता कौन है, यह जान पाना मुश्किल होता था।

महिलाओं पर सिर्फ एक ही पुरुष के साथ संबंध बनाने की बाध्यता न होने की वजह से बच्चों की पहचान मां के आधार पर ही होता था। अत:, इस समाज में पैदा होने वाले बच्चों को मां की वंश व्यवस्था की तरफ से स्थायी सदस्यता मिलती थी तथा वंश भी माता के माध्यम से ही चलता था। पर, अधिकांश मामलों में निर्णय संबंधी कार्य, प्रबंधन का कार्य आदि पुरुषों के हाथ में ही होता था। इस समाज में संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता था क्योंकि कबीलों की संपत्ति एक समूह की सामुदायिक संपत्ति मानी जाती थी। सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य संग्राहक की भूमिका भी निभाने लगा था। अब तक मनुष्य जीवन-यापन के लिए जो भी उपक्रम करता था जैसे- शिकार करना, जंगलों से कंद-मूल इकट्ठा करना आदि, उसे तुरंत ही खाकर खत्म कर देता था और दूसरे दिन पुन: वही उपक्रम करता था। पर, धीरे-धीरे इन सामग्रियों का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया था ताकि, दूसरे दिन भी इनका उपयोग किया जा सके। धीरे-धीरे कृषि का भी विकास हुआ। वस्तुओं के संग्रहण ने निजी संपत्ति की अवधारणा को जन्म दिया। निजी संपत्ति की अवधारणा के उदय से इस बात की जरूरत महसूस हुई कि संग्रह की गई चीजों अर्थात संपत्ति को उनके ही समूह के किसी सदस्य को हस्तांतरित किया जाए।
ऐसी स्थिति में मातृवंशात्मक समूह की संपत्ति का कुछ हिस्सा जो कि किसी व्यक्ति के लिए ज्यादा उपयोगी था उसे दे दिया जाता था। पर, संपत्ति भी हस्तांतरित करने में यह अनिवार्य था कि जो संपत्ति माता के वंश की है उसे ही हस्तांतरित किया जाए न कि पिता के वंश की संपत्ति को। इस समाज व्यवस्था को ही मातृवंशात्मक व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। इस व्यवस्था को ही अधिकाशत: लोग मातृसत्तामक व्यवस्था के रुप में व्याख्यायित करते हैं जबकि यह गलत है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था का अर्थ यह है कि सत्ता पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में हो और महिलाएं अपनी इच्छानुसार उस सत्ता का उपयोग करें जबकि, मातृवंशात्मक व्यवस्था में सिर्फ व्यक्ति की पहचान माता के वंश के आधार पर होता है। सत्ता पूर्णरुप से महिलाओं के पास नहीं होती है। विश्व के कई देशों में भी यह परंपरा रही है। भारतीय संदर्भ में हम मेघालय की खासी और गारो जनजातियों को देख सकते हैं। केरल के नायर जातियों की ‘तारवाड़ व्यवस्था’ को भी हम इसी के अंतर्गत रख सकते हैं।

उत्तर-पूर्व में मातृवंशीयता

गारों जनजाति में परिवार मातृवंशीय होता है। इस जनजाति के लोग अपना मूल पूर्वज  महिला को ही मानते हैं। संपत्ति की अधिकारी भी बेटियां ही होती हैं। इस व्यवस्था के अनुसार परिवार की किसी भी बेटी को संपत्ति का उत्तराधिकारी चुना जा सकता है पर आमतौर पर व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। संपत्ति की उत्तराधिकारी परिवार की सबसे छोटी बेटी होती है। इसी तरह खासी जनजाति नें भी वंश परंपरा स्त्री-पूर्वज के आधार पर ही चलता है। खासी समुदाय के अंतर्गत एक परिवार में माता, अविवाहित बच्चे, विवाहित बेटियां और उसका पति रहता है। परिवार में किसी महिला सदस्य न होने की स्थिति में लड़कियों को गोद लेने की परंपरा है ताकि, वंश प्रक्रिया की निरंतरता बनी रहे। समाज में हो रहे धार्मिक गतिविधियों में भी महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस जनजाति में परिवार की छोटी बेटी को ज्यादा सम्मान मिलता है और इसीलिए संपत्ति की उत्तराधिकारिणी भी वही होती है। इस जनजाति जो कुछ भी उनके पुरुष सदस्य कमाते हैं उस पर उस परिवार की बुजुर्ग महिला सदस्य का नियंत्रण होता है। पुरुष को अपनी सारी कमाई उस शादी से पहले अपनी माता को तथा शादी के बाद अपनी पत्नी को देना होता है। सतही तौर पर देखने में तो यह स्पष्ट होता है कि इस समाज की महिलाओं की स्थिति बहुत ही सम्मानजनक है, सत्ता भी महिलाओं के ही हाथ में है पर, वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इस समाज में रह रही महिलाएं भी उसी तरह अपने परिवार/समाज के पुरुषों के शोषण का शिकार हैं जैसा कि अन्य समाज की महिलाएं।  हां, इनके शोषण का स्वरुप थोड़ा अलग है। खासी महिलाओं के बीच इस तरह की समस्याओं का सबसे महत्वपूर्ण कारण उसके परिवार के पुरुष सदस्यों का अत्याधिक शराब पीना है। शराब के नशे में वह असंयमित हो जाते हैं और कई बार संबंधों को बचा पाना भी असंभव हो जाता है और स्थिति तलाक तक पहुंच जाती है। इसके अलावा खासी समाज एक और महत्वपूर्ण समस्या से जूझ रहा है और वह है वहां की छोटी बेटी के नाम जायदाद का आना। उस समाज के लोगों के अनुसार, अकसर जायदाद के लालच में लड़के, जिसमें से ज्यादातर मैदानी क्षेत्र से आए हुए होते हैं वे खासी समाज की छोटी लड़कियों से प्रेम का नाटक करके शादी करते हैं। और बाद में बेहतर जिंदगी का लालच देकर सारा जायदाद अपने कब्जे में कर लेते हैं। बेहतर जिंदगी का स्वप्न देखती ये लड़कियां उनके झांसे में आ जाती है और जब सारा अधिकार उसे दे देती हैं तो वह पुरुष दूसरा विवाह कर लेता है या फिर तलाक देकर उसे दोयम दर्जे पर ला देता है। ऐसी स्थिति में अकसर मां-बाप छोटी बेटी को कहीं ऐसे सुरक्षित स्थान पर तब तक छिपाए रखते हैं जब तक उनकी पसंद और अच्छे परिवार का लड़का दामाद के रुप में उनको नजर नहीं आता है। एक तरह से वह सोने की चिड़िया जैसी हो जाती है। यह स्थिति उस लड़की के लिए भी अमानवीय होती है। वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकती। न कहीं अकेले जा सकती है, न किसी से दोस्ती कर सकती है जब तक कि उसके मां-बाप पूरे विश्वास के साथ ’अच्छे परिवार’ के लड़के से उसकी शादी नहीं कर देते।

दक्षिण में मातृवंशीयता
केरल की नायर जाति में भी मातृंवशात्मक व्यवस्था है। यहां भी संपत्ति की उत्तराधिकारी बेटी ही होती है। लेकिन तमाम निर्णय प्रक्रिया में पुरुषों, खासकर मामा का वर्चस्व होता है। यहां इस व्यवस्था को ‘तारवाड़ व्यव्स्था’ कहा जाता है। ‘तारवाड़ व्यवस्था’ में वैवाहिक आवास का पारंपरिक स्वरुप द्विस्थानिक होता है। पुरुष की ही तरह स्त्री को भी विवाह के समय अपना मायका छोड़कर नहीं जाना होता था। पुरुष अपनी पत्नी के घर में रात बिताकर सुबह अपने घर लौट जाता था। इस तरह से स्त्री अपने मायके से अलग नहीं की जाती थी तथा वह अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ ही रहती थी। बच्चे भी अपनी माता के साथ अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ रहते थे। गृहस्थियों में रहने वाले पति या पिता को स्थायी सदस्य नहीं माना जाता था। उनकी पहचान उनके अपने ‘तारवाड़’ (वंश) से होती थी।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष किसी को भी समूह की संपत्ति में अपने हिस्से का निजी तौर पर अलग से निपटारा करने का अधिकार नहीं है। इस सामुदायिक संपत्ति को बेचने या किसी को देने के लिए समूह के वयस्क लोगों की सहमति अनिवार्य है। कहा जा सकता है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार प्राप्त है। पति अपनी जरूरत के लिए मिले मातृवंश के हिस्से को, पत्नी की जरूरत के लिए मिले उसके मातृवंश के हिस्से को मिलाकर संयुक्त रुप से उसकी देखभाल कर सकता है पर, उसकी मृत्यु के साथ ही यह व्यवस्था खत्म हो जाती है। पुरुष अपने ‘तारवाड़’ का हिस्सा अपने बच्चों को नहीं दे सकता क्योंकि, बच्चा अपनी माता के ‘तारवाड़’ का स्थायी सदस्य माना जाता है।

आमतौर पर माना जाता है कि इस समाज व्यवस्था में बड़ी बेटी को ज्यादा महत्व दिया गया है। निर्णय लेने तथा सम्मान पाने की अधिकारिणी वही होती है यानी सत्ता उसी के हाथ में होती है। वही किसी को भी संपत्ति हस्तांतरित कर सकती है। जिन संपत्तियों को वह हस्तांतरित कर सकती थी उनमें मुख्य रुप से वृक्ष, गृह अथवा रहने के लिए तैयार किया गया कोई भी ढ़ांचा, नौकाएं, मछली पकड़ने की जगह, नारियल की जटाएं तथा कुछ अन्य  तरह की चल संपत्तियां आदि आते थे। सभी तरह की संपत्तियों पर और उसके हस्तांतरण का अधिकार तो बेटी को था पर व्यावहारिक रूप से इन संपत्तियों का प्रबंधन पुरुष सदस्यों जैसे, नानी के भाई, मां का भाई आदि के हाथ में होता है। प्रत्येक संपत्ति समूह को नियंत्रित करने वाला एक पुरुष होता है जिसे ‘कार्णवर’ कहा जाता है। ‘कार्णवर’ संपत्ति का प्रबंधन भी देखता था, उत्पादन का काम नियोजित करता था तथा गृहस्थी में रह रहे पुरुषों के बीच काम का बंटवारा भी करता था। प्रशासन से काम पड़ने की स्थिति में वह अपने समूह का प्रतिनिधित्व भी करता था। किसी भी समारोह तथा धार्मिक आयोजन में उसे विशेष आदर दिया जाता था और इस पर मुखिया की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। लेकिन ‘कार्णवर’ को यह अधिकार नहीं प्राप्त था कि वह अपनी इच्छा से किसी को कोई जमीन पट्टे पर दे दे या किसी संपत्ति को बेच सके। संपत्ति बेचने का अधिकार भले ही उसको न रहा हो पर व्यवहारिकता में निर्णय लेने का अधिकांश काम पुरुषों द्वारा ही किया जाता था जो कि सिद्धांतत: महिलाओं का काम होना चाहिए था।

विवाह-व्यवस्था में बुजुर्ग महिलाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं। प्रथम विवाह (स्पष्ट होता है कि इस समय बहुविवाह का भी प्रचलन था) में समूह की हर महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर, अन्य वैवाहिक संबंध प्राय: व्यक्ति अपनी इच्छा से बना सकता था। माता को यह अधिकार प्राप्त था कि वह अपनी बेटियों और उसके पतियों पर पर्याप्त दबाब डाल सकती थी। इस मातृवंशीय समूह की महिलाएं खासकर बुजुर्ग महिलाएं बच्चे के जन्म, मृत्यु, कर्णछेदन इत्यादि से संबंधित सारे कर्मकांडों और समारोहों के संपादन और निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कोई महिला कितनी शक्तिशाली हो सकती है यह उसकी उम्र तथा कार्णवर से उसकी नातेदारी से तय होता था। वैवाहिक विवादों में प्राय: पुरुष से यह सवाल पूछे जाते थे कि क्या अपनी पत्नी के घर उसे शाम के समय संतोषजनक मात्रा में अच्छा खाना मिलता है? यहाँ के सामाज में इस तरह के तमाम संकेत मिलते हैं जिससे एक भ्रम की स्थिति बनती है कि यहाँ के समाज में महिलाओं का ही वर्चस्व है या सत्ता उन्हीं के हाथ में है पर, वास्तविकता कुछ और ही है.

विभिन्न समाजों में मातृवंशीय परंपरा की विद्यमानता से तो सैद्धांतिक रूप से यह कहा जा सकता है कि मातृवंशीय समाज में महिलाओं का स्थान श्रेष्ठ था लेकिन व्यावहारिक स्थिति का आंकलन करने से यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि अंतत: निर्णय और प्रबंधन के सारे अधिकार पुरुषों के ही हाथ में रहते हैं। चूंकि मातृवंशीयता समाज एक तरह से परंपरा की देन है और परंपरावादी समाज में किसी भी परंपरा को आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। समाज अगर परंपराओं की जड़ता से मुक्त होने में शीघ्रता बरतने लगता तो शायद सैद्धांतिक रूप से मिले महिलाओं के यह अधिकार भी कभी के छीन लिए जाते।

संदर्भ सूची-
पुस्तक,प्राचीन भारत का इतिहास, संपा.-द्विजेन्द्रनारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली, प्रकाशक, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय, १९८१
पुस्तक, मानव समाज, लेखक, राहुल सांकृत्यायन, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४
पुस्तक, परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, लेखक, फ्रेडरिक एंगेल्स, संपा.- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, प्रकाशन, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, २००८
पुस्तक, भारतीय समाज में महिलाएं, लेखक, नीरा देसाई, ऊषा ठक्कर, अनु.-डॉ. सुभी धुसिया, प्रकाशक, नेशनल बुक ट्र्स्ट, इंडिया, २००९
पुस्तक, स्त्री अस्मिता के सौ साल, लेखक, कुसुम त्रिपाठी, प्रकाशक, संस्कार साहित्य माला, मुंबई, २२१०
पुस्तक, लिंगभाव का मानववैज्ञानिक अन्वेषण: प्रतिच्छेदी क्षेत्र, लेखक, लीला दुबे, अनु.- वंदना मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २००४
पुस्तक, लिंग एवं समाज, लेखक, प्रकाश नारायण नाटाणी एवं ज्योति गौतम, प्रकाशक, रिसर्च पब्लिकेशन्स, जयपुर

आधुनिक गुरुकुलों में आंबेडकर के वंशजों की हत्या

चंद्र सेन

( रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारणों की अकादमिक जगत में व्याप्तता की पड़ताल कर रहे हैं , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी ‘चन्द्रसेन’. स्त्रीकाल ने वेमुला की आत्महत्या ( ह्त्या ) के दोषी लोगों पर राष्ट्रपति से कार्रवाई के अनुरोध के साथ हस्ताक्षर अभियान चलाया था. हम फरवरी के पहले सप्ताह में सारे नामों और हस्ताक्षरों के साथ राष्ट्रपति को अनुरोध पत्र भेजेंगे. राष्ट्रपति केन्द्रीय  विश्वविद्यालयों के विजिटर होते हैं . उनकी इस मसले पर चुप्पी दुखद है . )

‘सामाजिक और आर्थिक बराबरी के बिना राजनीतिक समानता का कोई मोल नहीं रह जाता है।’ डॉ. अंबेडकर ने यह वाक्य भारतीय सविंधान देश को भेंट करते समय चेतावनी के साथ बोला था कि ‘यदि हम आर्थिक और सामाजिक खाई को नहीं पाट पाए तो देश का शोषित तबका इस पूरी व्यवस्था को जला देगा (ब्लो अप)।’  अपने सबसे महत्वपूर्ण लेख ‘एनहिलेशन ऑफ कास्ट’ में उन्होंने हिन्दू धर्म को जाति का मूल आधार माना है जो शूद्रों, महिलाओं के लिए एक ‘वेरिटेबल चैंबर आफ हॉरर’ है।

डॉ. तुलसी राम भारत को दुनिया का सबसे पुराना ‘थेओक्रेटिक स्टेट’ मानते हैं। उनके अनुसार यह देश हिन्दू धर्म, उसकी स्मृतियों द्वारा वैदिक काल से ही शासित है। बाद में आकर आरएसएस के पुरोधाओं ने इसे हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के रूप में व्यख्यायित किया। समकालीन सरकार इसी हिन्दू राज को स्थापित करने के लिए कमर कस चुकी है। ‘अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल’ को अवैध घोषित करना, अफजलगुरू, याकूब मेमन, को राष्ट्र-भावना पर फाँसी, अख़लाक की हत्या, प्रो. साँईं पर देशद्रोह का मुक़दमा, और रोहित की मौत ये सब इसके कुछ उदाहरण हैं।

रोहित वेमुला,  हैदराबाद विश्वविद्यालय का एक मेधावी शोध-छात्र था। उसने ‘म्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन’ के बैनर तले, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के खिलाफ  मुहिम छेड़ी थी। भारतीय व्यवस्था में अछूत माने गए वर्ण से रोहित और उसके साथी आते हैं। एक दलित की सामाजिक हैसियत उसके जन्म से तय की जाती है और यही उसकी पहचान बना दी जाती है। यह पहचान उसके हर शोषण का कारण बनती है। भारतीय समाज जाति के आधार पर ही शाषित होता है। दुनिया की यह एक मात्र व्यवस्था है जहाँ व्यक्तिगत गुण का कोई मूल्य नहीं है और इसीलिए डॉ. तुलसी राम कहते हैं कि यहां व्यक्ति नहीं बल्कि जातियाँ अमीर-गरीब होती हैं वे ही (जातियाँ) शासन करती हैं। आज़ादी मिले हुए छह दशक हो गए है तब भी यह व्यवस्था जस-की-तस बनी हुई है और इसी तंत्र के तहत अनगिनत रोहित जान गंवा चुके हैं।

बुद्ध, फुले, पेरिया और आंबेडकर ने वर्ण-आधारित भारतीय समाजिक संरचना
को बदलने की शुरुआत की थी। रोहित वेमुला जैसे छात्र भी इसी अमानवीय व्ववस्था को ख़त्म करना चाहते थे। लेकिन वे शम्बूक, एकलव्य और अनगिनत क्रांतिकारियों की तरह ब्राह्मणवादी व्यवस्था का शिकार हो गए। रोहित वेमुला की ही यदि बात करें तो, यह घटना को देखने में तो आत्म-हत्या लगती है, किंतु यह आधुनिक भारतीय राज्य द्वारा की गई हत्या है और इस हत्याकांड में सारा तंत्र साजिशन जुटा हुआ था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पांच-पांच चिठ्ठियाँ, वाइस-चांसलर और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा रोहित और उसके साथियों का सामाजिक बहिष्कार, उनका फेलोशिप रोकना,लोकल बीजेपी और केंद्रीय मंत्रियों का हस्तक्षेप ही ऐसे कारण थे,  जिन्होंने रोहित को मानसिक रूप से इतना परेशान किया कि उसने आत्महत्या कर ली।

भारतीय राज्य की यह विडम्बना ही है कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में की जा रही दलित-हत्या और सामूहिक बहिष्कार को नहीं रोक पाया। लेकिन यह स्थिति सिर्फ गाँवों मे हो ऐसा भी नहीं है। देश के प्रतिष्ठित और आधुनिक संस्थानों में भी यही खेल खेला जा रहा है, रोहित की हत्या इसका ज्वलंत उदाहरण है। जातिवादी लोग यह कहते हुए नहीं अघाते हैं कि जाति की समस्या सिर्फ गांवों की है। कुछ महानुभाव तो यहां तक अपना ज्ञान उड़ेलते हैं कि आज जाति कोई समस्या नहीं रह गयी है। यह सब पुरानी बाते हैं| पिछले १० वर्षों से लगभग हर वर्ष इसी विश्वविद्यालय (हैदराबाद) का छात्र  आत्म-हत्या कर रहा है। जो इस सवर्णवादी मानसिकता की पोल खोल देती है। साथ-ही-साथ पिछले एक दशक में AIIMS और IITS में २३ छात्रों ने अपने को मारा है और इन सबकी सामाजिक पृष्ठभूमि एक ही है|

यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि किताबी ज्ञान और आर्थिक-तकनीकी परिवर्तन से सामाजिक मानसिकता नहीं बदल सकती। देश के विज्ञान और तकनीकी संस्थान एम्स में ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ जैसे जातिवादी संगठन का जन्म हुआ, जो आरक्षण, दलित और पिछड़ा विरोधी है। इन संस्थानों में दलितों द्वारा की जा रही आत्म-हत्याओं के मद्देनजर जो कमेटी बनायी गई थी उसके प्रावधानों और सुझावों को डस्टबिन में डाल दिया गया। प्रो. सुखदेव थोराट के नेतृत्व में २००७ में इस कमेटी का गठन हुआ। इसने पाया (५ मई २००७) कि इन महान संस्थाओं  में पढ़ने वाले दलित/आदिवासी छात्रों का हर स्तर पर शोषण और सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। लगभग 88 प्रतिशत छात्रों ने शिकायत थी कि यहां के प्रोफेसर उन्हें उतने मार्क्स नहीं दे रहे हैं जितनी उनकी योग्यता है। ८४ प्रतिशत छात्रों ने कहा कि प्रोफेसर ने उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि पूछी। जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उनके अकादमिक कैरियर पर असर पड़ा। जातिवादी रवैया और दृष्टिकोण छात्रों के मानसिक तनाव का कारण तो रहता ही है।

लगभग हर संस्थान से यह शिकायत होती है कि सवर्ण प्रोफेसर और प्रशासन दलितों के प्रति हमेशा बायस्ड रहता है। प्रैक्टिकल में कम नम्बर, फेलोशिप रोकना या न देना, रिसर्च टॉपिक चुनने में सुपरवाइजर की मनमानी हमेशा से दलितों के लिए एक बड़ी बाधा बनती है| शायद, इन्हीं सब अनियमितताओं को देखकर गांधीवादी विद्वान अशीष नंदी ने तर्क दिया होगा कि इस देश के सवर्ण प्रोफेसर अकादामिक करप्शन करते हैं। इसमें वे अपने लोगों को फेलोशिप, प्रोजेक्ट दिलवाते हैं, और विदेश भ्रमण करने-कराने में एक दूसरे की मदद करते हैं।
देश के सबसे लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय के लिए विख्यात दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भी इससे अछूता नही है। मामला चाहे डायरेक्ट पी.एच.डी. प्रवेश या एम.फिल. के साक्षात्कार में दिए गए नम्बरो का हो वहां जातिगत और साम्प्रदायिक भेदभाव किया जाता है। फैकल्टी और विद्यार्थी आरक्षण, दोनों ही स्तरों पर विश्वविद्यालय प्रशासन संविधान की अवहेलना करता है। इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि देश के अन्य विश्वविद्यालयों का क्या हाल होगा?

राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग  ( लिंक पर क्लिक कर अपना हस्ताक्षर दें )

राजनीतिशास्त्र-विद्वान, गोपाल गुरू का मानना है कि दलित शोध-छात्रों को अधिकांश दलित सुपरवाइजर दिए जाते हैं जिससे शोधार्थी और प्राध्यापक का उतना अकादमिक लाभ नहीं हो पाता है जो वो दूसरे बैकग्राउंड के होने से ले सकते थे। समाजशास्त्री विवेक कुमार का मानना है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम वंचित समाज के यथार्थ और इतिहास से नहीं जुड़ता। यह पाठ्यक्रम इन तबकों के समाज, संस्कृति और इतिहास के खिलाफ भी है। यही कारण है कि इन समाजों से आने वाले छात्र इस पाठ्यक्रम विशेष में रूचि नहीं लेते हैं।
दलित साहित्यकारों द्वारा लिखे गए लेख, कहानी, आत्मकथा इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि किस तरह से दलितों को विद्यालय में प्रवेश मुश्किल से मिलता था। उनके लिए कक्षा में बैठने का स्थान अंतिम पंक्ति या दरवाजे के बाहर नियुक्त था। इन मेधावी छात्रों को जाति के नाम पर फेल तक किया गया। सवर्ण छात्र और अध्यापक इन्हें मारते-पीटते थे, जातिगत सम्बोधन आम बात थी। किताबें पानी में फेंकना, पीने का पानी दूर रखना जातिगत भेदभाव को दर्शाते हैं। उनसे स्कूलों की सफाई करवाई जाती थी। इन छात्रों के नाम स्कूल में दर्ज तो होते थे पर वह वास्तव में किताबी शिक्षा से दूर रखे जाते थे।

उपर्युक्त सब कारणों से दलित और आरक्षित तबके के विद्यार्थी अवसाद और अकेलेपन का शिकार बनते हैं। मानसिक तनाव उनके कैरियर और जिंदगी के लिए घातक होता है। अगर कोई छात्र रोहित जैसा है जो इस व्यवस्था की सडांध को समझ जाता है तो वह प्रशासन, पुलिस, और शासक-वर्ग का टारगेट बनता है। रोहित और उस जैसे अनेक एकलव्य रोज इसी सड़ी हुई, जातिवादी व्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध-छात्र हैं

रूपाली सिन्हा की कविताएं

रूपाली सिन्हा

त्रिलोचन की कविता पर पी एच डी । स्त्री मुक्ति संगठन के साथ जुडी हैं। अध्यापन और स्वतंत्र लेखन । कविताएँ और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित।
संपर्क : ई मेल-rssinharoopali@gmail.com

प्रतीक्षा
चलना होगा कितना और
कितनी यात्रा बची है अभी
न जाने कितने मोड़ पार करने हैं अभी
कितनी चढ़ाइयां चढ़नी होंगीं
कितने ढलानों से उतरना होगा
संभल-संभल कर
कितनी धाराएं करनी होंगी पार
बस तैरकर ही
नहीं होगी कोई डोंगी भी
कितनी घाटियों से गुजरना होगा चुपचाप
कितनी शामें बितानी होंगीं उदास
कितनी रातें अँधेरी और दिन उजले
बिना किसी रंग के
करुँगी मैं यात्रा कर रही हूँ
भटकूंगी नहीं रुकूँगी नहीं
क्योकि इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर
खड़ी है मेरी ज़िन्दगी
मेरी प्रतीक्षा में।

परिचय 

एक 


मैं पेड़ नहीं
जो खड़ी रहूँ एक ही जगह
आज्ञाकारी बनकर
तुम जब-तब डाल दो पानी खाद
अपनी मर्ज़ी से
जड़ों से बंधी हुई निःशब्द
छाया और फल देती रहूँ
सहती रहूँ मौसम की मार
और जब ढल जाऊँ
हो जाऊँ चुपचाप निढाल।

साभार गूगल

दो
मैं दीवार नहीं
जिसके सिर्फ कान हों
जो अभिशप्त हो मौन रहने को
ताउम्र
मेरे पास भी हैं सभी इन्द्रियाँ
और जानती हूँ
इनका इस्तेमाल भी।

तीन
मैं चौखट नहीं दरवाज़े की
जिसे जब चाहो लाँघकर
आ जाओ अंदर और
निकल जाओ बाहर
मैं मौन खड़ी रहूँ
मान-मर्यादा की प्रतीक बनकर।

अस्वीकार 

मैं देना चाहती थी चाँदनी
ढेर सारी उपहार में
अँधेरे के आदी तुम
ले ही न सके
कैसे सहते इतनी रौशनी इतना उजाला
तुमने सबकुछ पाया-चाहा
अँधेरे में रखकर मुझे
मैं चाहती रही सबकुछ धवल
पारदर्शी कांच सा
तुम ढकते रहे अपना सच
फरेब की काली चादर के नीचे
जब-जब तुम्हारे अँधेरे पर
मेरे सच का प्रश्नचिन्ह लगा
तुम हो उठे बेकल,असहज और
कभी-कभी हिंसक भी
मैंने तो देनी चाही थी
अपने जीवन भर की रौशनी
पर जैसा कि अक्सर होता है
अँधेरा बहुत कुछ आसान कर देता है
जबकि रौशनी में रहना
हमेशा ही चुनौतियों भरा होता है
अँधेरे में रहने के फायदे और भी बहुत हैं
रौशनी में कहाँ है मुमकिन ऐसा
तुम्हे मुबारक हो तुम्हारा अँधेरा
मैं अपनी रौशनी के साथ
बेफिक्र और मुक्त हूँ।

प्रतीक्षा 

तुम्हारा प्यार
समुद्र की उफनती वेगवती लहर है
तेज़ी से आकर कर देती है मुझे सराबोर
सर से पाँव तक
विस्मित-चकित मैं जब तक कुछ सोचूँ
लौट चुकी होती है उसी गति से
तट पर नहीं छोड़ती कोई भी निशान
हर बार
छोड़ती है मेरे दिल पर पहले से गहरा
कई बार सोचा बह चलूँ
मैं भी उसके साथ
खो जाऊँ उसके अंतस्थल में
लेकिन मेरा वजूद
मिटने से इनकार कर देता है
वैसे क्या बुरा है तट पर खड़े-खड़े ही सराबोर होना?
मैं खड़ी हूँ प्रतीक्षा में
अगली लहर के आने की।

राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग

आइये रोहित वेमुला के लिए न्याय की मांग करते हुए राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग करें . आपके हस्ताक्षर के लिए अपना नाम कमेन्ट में लिखें , अपना समर्थन दें.
प्रति,
राष्ट्रपति
और विजिटर केन्द्रीय विश्वविद्यालय

मान्यवर 
हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय का  शोध छात्र रोहित वेमुला ‘ सायंस टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी स्टडीज’ में पी एच डी कर रहा था. उसने रविवार 17 जनवरी , 2016 को विश्वविद्यालय के जातिवादी बर्ताव से तंग आकर आत्महत्या कर ली .

बाबा साहेब डा. आम्बेडकर की तस्वीर लिए रोहित वेमुला

आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर के रहने वाले इस छात्र के साथ -साथ 5 विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय ने 12 दिन पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता के साथ मारपीट के आरोप में निकाल दिया . इसके पहले एक केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के एक पत्र की सिफारिश के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबीन इरानी  ने इन विद्यार्थियों पर कारवाई के लिए विश्वविद्यालय को चार बार पत्र लिखे. सिफारिश पत्र में विद्यार्थियों पर जातिवादी , देशद्रोही गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था. अपनी राजनीतिक विचारधारा के छात्र संगठन के समर्थन में और अपने मंत्री के सिफारिशी पत्र पर मानव संसाधन विकास मंत्री ने अतिरिक्त रुचि दिखलाई और विश्वविद्यालय को इन विद्यार्थियों पर कारवाई के लिए बार -बार पत्र लिखे.

शैक्षणिक संस्थाओं में जातिवाद और द्वेष भावनाओं का पूरा वातवरण है , जिसकी वजह से  दलित – मुस्लिम , आदिवासी , ओ बी सी आदि बहुजन विद्यार्थियों का जीवन मुश्किलों से भर जाता है. इन दिनों यह स्थिति और भी बढ़ी है . केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में दलित – पिछड़े आदि बहुजन विद्यार्थियों  की अपनी  सांस्कृतिक विरासत की गतिविधियों को ‘जातिवाद’ मानने और सिद्ध करने का चलन बढ़ा है . आई आई टी चेन्नई से लेकर हैदराबाद तक की घटनाएँ इसी चलन के नतीजे हैं .

एक ओर सरकारें बाबा साहब डा. आम्बेडकर की विरासत को लेकर संवेदनशील होने का दिखावा कर रही हैं , दूसरी ओर उनके विचारों पर सोचने -समझने वाले विद्यार्थियों पर प्रशासन और शासक समूहों की राजनीतिक जमातों का कहर टूट रहा है .

वह चिट्ठी जिसने रोहित और अन्य विद्यार्थियों
के खिलाफ कारवाई के लिए उकसाया

रोहित वेमुला पर की गई कारवाई जातीय विद्वेष की कारवाई थी, जिससे हताश रोहित ने आत्महत्या कर ली.
सवाल है कि फुले, आम्बेडकर , पेरियार  से जुड़े विद्यार्थी इस समय  सुरक्षित क्यों नहीं है?रोहित वेमुला का लिखा पहला और अंतिम पत्र आपसे न्याय की मॉंग करता है, हम सब आपसे निष्पक्ष और तटस्थ जॉंच की मांग करते है।

हम रोहित वेमुला को  आत्म हत्या के लिए बाध्य होने पर मजबूर करने वाली परिस्थिति निर्मित करने वालों के नाम उजागर करते हुए उन्हें दंड देने की मॉंग करते हैं, और उसके जिम्मेवार लोगों पर अनुसूचित -जाति , जनजाति एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा के तहत मुकदमा दर्ज करने के निर्देश की मांग करते हैं, जिसके लिए  मानव संसाधन विकास मंत्री की भूमिका को भी जांच के दायरे में लाया जाये.
निवेदन है कि उच्च  शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के साथ जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए सुझाव देने हेतु  एक समिति बनाने का निर्देश दिया जाय .

केन्द्रीय विश्वविद्यालय के विजिटर होने के  नाते आप से अनुरोध है कि दोषी कुलपति को तत्काल बर्खास्त कर उसपर मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दें .
निवेदक :
हेमलता माहिश्वर, लेखिका
नूतन मालवी , सत्यशोधक महिला प्रबोधिनी
अमरदीप भरने, विद्यार्थी
आश्विनी जुमड़े,विद्यार्थी
नीरज ताक्शांडे, सामाजिक कार्यकर्ता
सुनील कालोकार , सामाजिक कार्यकर्ता
अविनाश काकडे , सामाजिक कार्यकर्ता
प्रशील मेश्राम , सामाजिक कार्यकर्ता
अशोक काम्बले , सामाजिक कार्यकर्ता
नंदकुमार धाबार्डे, सामाजिक कार्यकर्ता
राजीव कुमार सुमन , सम्पादक स्त्रीकाल
संजीव चंदन, सम्पादक स्त्रीकाल
एडवोकेट नीलिमा ताक्शांडे, सामाजिक कार्यकर्ता
उत्कर्ष खोब्रागडे , सामाजिक कार्यकर्ता
संदीप भगत, सामाजिक कार्यकर्ता
डाक्टर बुटले, अंधश्रद्धा निर्मूलन
मयूर डफड़े, सामाजिक कार्यकर्ता
एडवोकेट कपिल गोडघाटे, सामाजिक कार्यकर्ता
प्रवीण वानखेड़े , पत्रकार
अनिल रामटेके , सामाजिक कार्यकर्ता
गजानन नेहारे , सामाजिक कार्यकर्ता
फहीम खान
शशिभूषण द्विवेदी
कौशल कुमार
उमेश मीणा
सुरेंद्र कुमार
संध्या सिंह
पूनम कुमारी
अटल तिवारी
विजेंद्र
बृजेशकुमार यादव
सपना सिंह
प्रदीप कुमार सिंह
सिद्धार्थ कलहंस
अनूप आकाश वर्मा
राहुल पवार
फरहत दुर्रानी
गुलजार हुसैन
प्रवीण परिमल
मोहम्मद अनस
ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस
मृत्युंजय प्रभाकर
मंजू शर्मा
दिनेश राय द्विवेदी
नरेन्द्र भारती
नीरज कुमार सिंह
जनविजय
सत्यवीर सिंह
सूर्य नारायण
विक्रम कुमार
पलाश विश्वास
मंतोष कुमार
स्मिता मुग्धा
राजू वानखेड़े
कुमार पियूष
राम सागर
सौरव कुमार आयुष डी वी
जितेन्द्र नारायण
धर्मेन्द्र वर्मा
डा .अल्पना सिंह
राजेश उत्साही
योगेश योगेश्वर
मोहन श्रोत्रीय
शुभा शुभा
रविभूषण पाठक
वसीम अहमद
लालिमा करनजीत
नजमुल हुडा सैनी
मिथिलेश शरण चौबे
संज्ञा उपाध्याय
साकेत बिहारी
नरेन्द्र शर्मा
मुकेश तिवारी
दिलीप दुबे
यशराज धनवंतरी
मधु कांकरिया
मुकेश कुमार वरके
अरविन्द कुमार रावत
नीलाम्बुज
कृष्ण कुमार मणि
आमोद शास्त्री
कुलतार पुनिया
अनिश कुमार
शेषनाथ पाण्डेय
मासूम खान
गीता कुमारी
काशिफ नून सिद्दकी
कुंवर प्रतीक
संजय चौधरी
कैलाश चन्द्र चौहान
पुष्कर थर्मत
क्रान्ति कटके
जय प्रकाश
अभिमन्यु
अरुण माहेश्वरी
सरला माहेश्वरी
रविकांत
उर्मिलेश
मनोज कुमार
संतोष यादव

रंगभेदी और स्त्री-विरोधी सोच

नवीन रमण 


(फेसबुक पर सक्रिय नवीन रमण लागातार अपनी संवेदनशील टिपण्णी से  एक  हस्तक्षेप करते हैं . हरियाणा की खाप पंचायती मनोवृत्ति पर इनके असरकारी पोस्ट ध्यान खींचते रहते हैं . खाप-मानसिकता  को बेचैन करने वाले इनके प्रेम -विषयक पोस्ट भी उल्लेखनीय होते हैं . फेसबुक पर वायरल एक जोड़े की तस्वीर के बहाने नवीन बहुत जरूरी सवाल उठा रहे हैं . )


फोटो ने आपको भी डंस लिया क्या ? इस शीर्षक से मैंने यह पोस्ट फेसबुक पर लिखी और खूब सारे लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं शेयर की ।

आग की तरह फैला देने वाले गिरोह की तर्ज पर यह फोटो अजीबो-गरीब कैप्सन के साथ फेसबुक पर वायरल हो रही है । पता नहीं फोटो असली फोटो है या फोटोशॉप ।अलग-अलग कैप्सन पर वायरल होती हुई फोटो को देखकर मन में कईं सवाल सिर उठाने लगें। एक-से-एक स्त्री पक्षधर को लाइक करते देखा तो सवाल के साथ चिंता भी गहराने लगी। जिस पुरुष-मानसिकता और पितृसत्तावादी ब्राह्मणवाद से हम लगातार जूझ रहे हैं। वह अथक प्रयासों के बावजूद किसी न किसी रास्ते से बाहर निकल ही जाता है। इस पर लगातार संवाद की जरूरत है,इस संवाद के तहत ही यह पोस्ट लिखी गई है । ताकि एक बराबरी के समाज के सपने की तरफ कदम बढ़ाया जा सके:

इस फोटो को देखकर क्या आपके शरीर पर सांप लोट-पोट होने लगे है ? किसी को क्यों और क्या दिक्कत हो सकती है इस फोटो से ?यह मेरी जिज्ञासा का कारण है ।कारण कुंठा तो है ही । दूसरा रंगभेद भी है । तीसरा कारण क्या हो सकता है ?यह अरेंज मैरिज है या लव मैरिज ? यह जोड़ा दक्षिण भारतीय भी तो हो सकता है ?अगर लड़की को अपना हमसफ़र पसन्द है तो हम सब कौन होते है बकवास करने वाले ? दूसरा लड़की ने मजबूरी में यह शादी की है, तो उसकी क्या मजबूरियां रही होंगी ? इस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है ?अपनी कुंठाओं को यूँ सरेआम पब्लिक मत कीजिये । क्या पता कौन आपको अच्छा समझता हो ?आपकी हरकत किसी को बुरी भी लग सकती है ।ज्यादातर ने इस फोटो के साथ वाह रे किस्मत लगाया है । आपकी हरकत आपकी स्त्री के प्रति उपभोग की नजर को उजागर करती है । बचना चाहिए इस तरह की स्त्री-विरोधी और रंगभेदी  टिप्पणियों से । ( इस पोस्ट पर यह फोटो लगाने के लिए माफ़ी । बगैर फोटो के न तो संवाद संभव था और न ही बात को समझाया जा सकता था।)


मेरे अंदर के पुरुष और रंगभेद ने भी पहली नज़र में सिर उठाया था। फोटो को देखते ही जो पहला विचार हमारे मन में कौंधता है,जिसे हम सहज और स्वाभाविक मानते हैं, दरअसल वही है असल बीमारी की जड़। हम सब का पालन-पोषण जिस परिवेश में हुआ है, उसने हमारी इतनी बेहतरीन कंडीशनिंग की है कि हमें स्त्री और रंगभेदी विचार सच जैसा लगने लगता है। और हम उस से टकराने के बजाय आगे बढ़ते चले जाते है।फेसबुक पर जब यह पोस्ट लिखी गई तो अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आईं । जिन्होंने इस विषय को विमर्श का हिस्सा बना दिया । इस तरह की रंगभेदी और स्त्री-विरोधी मानसिकता का विरोध होने के साथ-साथ संवाद भी अपना महत्व रखता है ।
अरविंद शेष के अनुसार-“ सामंती मर्दाना कुंठा और ग़लीज़ रंगभेद के सिवा कोई और बात नहीं है..!”
रीना कोसर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा- “रंगभेद है…मुझे भी(किसी को भी) निसंदेह किसी ‘डार्क स्किन’ वाले से प्रेम हो सकता है  । ‘स्किन’ काली होना सोच और दिल काला होने से बेहतर है  । क्योंकि स्किन का रंग आप ने खुद नहीं तय किया, लेकिन दिल-दिमाग का रंग आप खुद तय करते हैं  ।”
जसवंत ने तंज कसते हुए लिखा- “गर्व करने वाली बात है कि देखो ‘सोसाइटी’ के ‘सोकाल्ड’ उलटे नोर्म तोड़कर, जो सही है वो किया । इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ।”
मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा-“ आपकी बातों से सहमती, पर घुमा फिरा कर वो फोटो तो शेयर हो ही गयी………” उनकी बात का जवाब देते हुए मैंने लिखा-“ फोटो शेयर से ज्यादा दिक्कत उस मंशा से है, जिसके तहत की जाती है और जिस तरह के कैप्सन के साथ की जाती है ।”
विजय कुमार के अनुसार-“ बिलकुल फोटोशॉप है भाई. तथाकथित ‘दूल्हे’ के चेहरे से नहीं लगता की उसकी शादी हो रही है । जिसने फोटोशॉप किया उसकी कुंठा कितनी बड़ी रही होगी..??” पर यहां बात दूसरी हो रही है । लोगों के विचार तो फोटो शॉप नहीं है। बात उनके उन विचारों की हो रही है।

प्रीति सिंह-“ मैं कहती हूँ असली नहीं हो फ़ोटोशोपड हो फिर भी ना जाने कितने लोग असल जीवन में इसे जी रहे होंगे और ख़ुश होंगे! इसका visa – versa भी होता है,ये अपनी choice है ! मैंने भी इसे Fb पे घूमते टहलते देखा और बड़ी हैरानी हुई लोगों के कामेंट्स देखकर, कितने कुंठित समाज में जी रहें हैं हम!”
जितेंद्र पुनिया-“जो भी हो पर मुझे ये दिन में 2 -3 देखनी पड़ रही है आजकल । बोलते है ” अब तो मानता है ना किस्मत को “”
मिनाक्षी शर्मा-“मेरी एक मित्र है जो डॉ है और पति उसका इंजिनियर सेम यही जोड़ी जेसी है मतलब रंग से है मगर लव मेरिज है उनकी और बहुत खुश है वो ।”
मिर्जा फैसल बेग- यार, इन्सान की फितरत में जलन होती है। और इस मामले में तो……peak point।
विक्रम गोहर राणा–COMPLEXION के नज़रिये से बेमेल जोडा हो सकता है पर , सफल वैवाहिक जीवन के लिये किसी शंका का कारण नहीं बनता |
मनीषा सिंह जादौन’निर्गुण’ -इस तरह के टुच्चे मजाक सिर्फ और सिर्फ आपका कमजोर दिमाग दिखाते हैं !
प्योली स्वातिजा- यहाँ हुए कमेंट्स से भी यही लग रहा है कि लोग उपनिवेशवादी सौंदर्यशास्त्र से पीड़ित हैं। “तन काला हो तो चलेगा, मन काला नहीं होना चाहिए”। ‘चलेगा’ का क्या मतलब है भाई! हम भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी मूलतः साँवले ही होते हैं और उसी में हमारी सुंदरता है। ब्लैक इस ब्यूटीफुल! ये मन काला होना, काले कानून, काला दिन आदि नकारात्मकता दर्शाने के लिए कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे?
कुमार निर्वेश- काला मन शायद सिर्फ एक नेगेटिविटी दर्शाने मात्र इस्तेमाल किया गया शब्द है
ना की काले रंग को ही प्रकृति से बाहर बताने की कोशिश है…
विक्रम दहिया- मेरे पास भी आया था ये फोटो। नीचे लिखा था कि
‘घोड़े को नही मिल रही घास और गधा खाये चयवनप्राश’
गौरव वर्मा- माफ़ करना दोस्त इस रोग से हम भी ग्रस्त हैं।
लक्ष्य रोहिला-रंग से कुछ पता नहीं चलता की कौन क्या है ?
निर्भय अतुल-प्यार करने के लिए सुरत नहीं मुहरत अच्छी होनी चाहिए ।
संदीप तोमर -सामान्य बात है। इसमें क्या अजूबा है?
निष्ठा -मैंने भी देखा इसे। हमारे देश में रंग को लेकर एकदम पागलपन है। बहुत बुरा लगता है फ़ोटो पर घटिया कैप्शन। लेकिन अधिकतर लोगों के लिए रंग को लेकर घटिया कमेंट करना मजाक उड़ाना बेहद सामान्य है।
सुनील पागल- जब कोई सामान्य रंग भारतीय का व्यक्ति किसी गोरी मेम से विवाह करता है तो क्या विदेशों में भी इसी तरह के घटिया कमेंट होते हैं क्या । ओह! हमारी मानसिकता ।
जगमोहन नेगी- ठीक “तारक मेहता का उलटा चश्मा,” बबीता और अय्यर जैसे।
दिनेशराय द्विवेदी -बरसों पहले की बात है। जयपुर रेलवे स्टेशन पर मैं एक मित्र के साथ था। मित्र का रंग ऐसा ही था जैसा कि इस दूल्हे का है। तभी एक जोड़ा निकला। लड़की नीग्रो थी, बला की सुंदर और सुगठित बदन वाली, बस चमड़ी का रंग एक दम कोयले की माफिक। उस का साथी बिलकुल जर्मन गोरे…
जगमोहन नेगी- इंसान की पहिचान सूरत से नहीं सीरत से होनी चाहिए।

जैसा कैप्सन,वैसा कमेंट्स यह हर तरह की पोस्टों के साथ होने वाला आमचलन है।मैं इस संवाद को विमर्श के केंद्र में ले जाकर छोड़ रहा हूं,ताकि इसके विभिन्न पहलुओं पर बेहतर तरीके संवाद संभव हो सकें।मंजिल पर पहुंचने से पहले रास्तों पर भी आपसी मुलाकात और मुठभेड़ जरूरी है।

एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

विश्व के महान व्यक्तित्वों (ख़लील जिब्रान, ग़ालिब, मीर, रूमी, इक़बाल, पाब्लो नेरुदा, इज़ाडोरा) के जीवन और विचारों को भारत के समकालीन परिप्रेक्ष्य में स्थापित करते हुए लिखी गई कविताओं की वज़ह से २००९ में चर्चा में आईं युवा कवयित्री मंजरी को उनकी इस कविता ने हिंदी साहित्य के ऐसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में स्थापित कर दिया जिसके पास पूरे विश्व साहित्य, संगीत, थिएटर और अन्य कलाओं की सूक्ष्म और महीन समझ है . 



इस कविता में मंजरी इज़ाडोरा के जीवन से तथ्यों को उठाती हैं, उनके समय से समकालीन भारत को संबद्ध करती हैं और अपनी बात कहती हैं जिसमें वे पूरा विश्व समेट लेती हैं. इस एक कविता के बाद  मंजरी लिखना बंद कर दें तो भी साहित्य जगत उन्हें  अनदेखा नहीं कर सकता है. 


यह बहुचर्चित लम्बी कविता तब लिखी गई थी जब भारत में दिल्ली से लेकर मुंबई के ताज तक में आतंकी हमले हो रहे थे और हैदराबाद और बेंगलुरु में बम विस्फ़ोट हुआ था. सबसे पहले २०१० में इस कविता को ‘अनभै साँचा’ पत्रिका में वरिष्ठ लेखक चंचल चौहान की विस्तृत टिप्पणी के साथ जगह मिली. फिर २०११ में यह एक पुस्तिका के रूप में आई, जिसका साहित्यिक जगत में व्यापक स्वागत हुआ. 



कवयित्री के नोट्स 

यह मेरे लिए सिर्फ़ कविता नहीं, सिर्फ़ प्रोडक्शन भी नहीं...विश्व शान्ति की स्थापना का मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है. अगर मेरे जीते जी मेरा यह ख्व़ाब पूरा न भी हुआ तो ग़म नहीं, मेरी इज़ाडोरा नाचेगी, मेरे मरने के बाद भी….और तब तक नाचती रहेगी जबतक विश्व में शांति क़ायम करने की ज़रूरत महसूस होती रहेगी.
यह कविता प्यारी बेटी आरोही (जिया) को उसके पहले जन्मदिन पर


एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

इस कविता की प्रस्तुति तैयार कर रही पंखुड़ी श्रीवास्तव


मैं सोच ही रही थी कि

इस पेचीदा वक़्त में गुज़ारिश करूं तुमसे
एक बार फिर धरती पर आने की
पर इसके पहले ही न जाने कब
तुम समा गयी मेरे भीतर
विशुद्ध कायनात की पैदाइश बनकर
तुम्हारे साथ चला आया पूरा समंदर मेरे अन्दर
एफ्रोदिती (एक तारे का नाम) बनकर चमक उठी मैं तुम्हारी ही तरह
समंदर की मौजें बनकर नाच उठा
तुम्हारा स्वतंत्र निरंकुश बचपन मुझमें, मेरे गीतों, मेरी शायरी में
मेरे हर नृत्य और अंग संचालन में आ गया खुद ही
अंगड़ाई लेता
एक उमड़ता-घुमड़ता समंदर

तुम्हारी ज़िंदगी और कला
जो दोनों निकली थीं समंदर से रत्न बनकर
चली आयी है धीरे-धीरे मेरे भीतर
और मैंने भी सबसे ज़्यादा रोमांटिक समंदर अपने अंदर समेटकर
दरकिनार कर दिया है भावुकता जैसी बकवास चीज़ को तुम्हारी ही तरह
और थिरक उठी हूँ
आँखों में आग-से सुलगते एक हसीन जज़्बे के साथ
बीथोवेन, शुमाँ, शुबर्ट, मोज़ार्ट, शोपेन के गीत-संगीत पर
और शेक्सपियर, शेली, कीट्स या बर्न्स से लेकर
उमर ख़य्याम और महमूद दरवेश तक की कविताओं पर.

तुम्हारी ही तरह
मेरे जितने रिश्ते दिल के बने हैं
उतने ही दिमाग़ के भी
प्रेम-भूमि की सरहदों पर ये मेरे कुछ युवा अनुभव हैं
जहाँ कभी मैं अपने पहले एकतरफा प्रेम की बांहों में
वैसे ही तैरती-सी चली जा रही हूँ
जैसे कभी बहती रही थी तुम अपने पहले एकतरफा प्रेम
वर्नोन (इज़ाडोरा का प्रेमी) की बाहों में
फिर न जाने कब तुम खिंची चली गयी एथलबर्ट नेबिन (इज़ाडोरा का प्रेमी)
के संगीत की तरफ
उसकी धुन, उसका ख़याल, उसकी कल्पना बनकर
उन्हीं दिनों तुमने उतारा अपने आप को
अपने नृत्य को
एक नयी मार्मिक जागृति में
आज फिर ज़रुरत पड़ गई है उसी जागृति की
जब जेहाद के नाम पर, धर्म के नाम पर
लोगों में ज़हर भरा जा रहा है
मिसाइल की सौग़ातें आनेवाली पीढ़ियों को दी जा रही हैं
तुम मुझमें पैदा कर दो न वही अंग-संचालन
वही नयी मार्मिक जागृति.

तुमने कभी नहीं किया किसी म्यूजिक हॉल में भरी
बुर्जुआ भीड़ का सस्ता मनोरंजन
तुमने उजागर किया शरीर की अभिव्यक्तियों और गतियों द्वारा
मानवीय शरीर के सौंदर्य और महानता को
और उस मुक्ति आकांक्षा को जो
तुम्हारे लिए थी ज़िन्दगी,
एक विशुद्ध संगीतात्मक और रोमानी चीज़
तुम्हारे लिए कभी महत्व नहीं रहा
प्रेम की शारीरिक प्रतिक्रियाओं का
यूज़ी केरी (इज़ाडोरा का प्रेमी) ने दिया तुम्हें तुम्हारा
अलौकिक अनुपम आध्यात्मिक चित्र
तुमने तैयार किया ‘डांस ऑफ़ द फ़्यूचर’
बोतिसिली की ‘प्रिमाविरा’ पर
जो भरा था जीवन की महानता और चरम आनंद से
मानवता के लिए प्रेम के सन्देश से
फिर से करो न तैयार
कोई नया ‘डांस ऑफ़ द फ़्यूचर’
जो सराबोर हो सिर्फ़ प्रेम से
उसमें कोई जगह न हो युद्ध के लिए
फिर से छुओ न तुम अपने नृत्य से
ज़िन्दगी के एक बहुत ख़ूबसूरत अद्भुत आनंद भरे क्षण को
अलौकिक अनिर्वचनीय प्रेम के साथ.

हेनरिख थोड (इज़ाडोरा का प्रेमी)
जिसकी आँखों में डूबकर आसमान से भी परे
न जाने किस दुनिया में पहुँच जाती थी तुम
उसके प्रेम के अलौकिक हर्ष की प्रबल अनुभूति के साथ
घूमती रहती थी तुम उसी में
अपनी मदहोशी, आहों, सिसकियों और
आनंद के उस चरम बिंदु से घिरी
जिसकी अनुभूति शारीरिक सुख की क्षणिक घड़ियों में होती है.
भावनाओं का यह चरम आनंद कब तुम्हें
निष्प्राण-सा कर डालता और कब
नज़रें तुम्हें जिंदा कर डालतीं
तुम्हें पता ही न चल पाता था
तुम्हारी आत्मा पर उसने कर डाला था इतना अधिकार
कि उसकी आँखों में डूबकर मर जाने का जी होता था तुम्हारा
यह प्रेम कभी भी तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पाया
बनी रही हमेशा एक मीठी, नशीली प्यास
जिसे सिर्फ़ संगीत ही बुझा पाता था.
प्रेम का यह गहरा नशा तोड़ डालता था संगीत
और देता था तुम्हें असीम राहत
पर कुछ देर बाद फिर तुम डूब जाती थी
थोड के विनाशकारी मगर अतिमानवीय प्रेम में
तुम्हारी आत्मा बन गई थी एक युद्धक्षेत्र
जहाँ युद्ध छिड़ा रहता था अपोला, डायोनिसस, क्राइस्ट, नीत्शे और रिचर्ड वाग्नर के बीच
पर, एक लयात्मक आनंद बनकर संगीत
बहाकर ले जाता था अनिर्वचनीय आनंद की ओर तुम्हें
इसके पहले एथेंस बनकर आया था तुम्हारी ज़िन्दगी का सौंदर्य
और उतार डाला था तुमने पुराने जीवन को
एक लिबास की तरह
अब तुम्हारे लिए गौण हो गया
किसी नए प्रेमी की बांहों में समाना
और दिलचस्प और ज़रूरी हो गया था बौद्धिक प्रश्नों के गलियारे में
हर्मन बोहर (इज़ाडोरा का प्रेमी) के साथ घूम आना
पर जल्द ही तुम्हारा यह अलौकिक प्रेम
बदल गया पीड़ा में
और तुम्हारे दिन तब्दील हो गए
ज़हर-सी डंसती प्रेम-पीड़ा के दिनों में
अर्नेस्ट हेकल (इज़ाडोरा का प्रेमी) के साथ
पर तुम ज़रा भी नहीं बदली
यह तुम ही तो थी
एक भविष्य की स्त्री
सभ्य और विद्वान पुरुषों से लड़ती हुई, थकी हुई.
मैं भी हूँ तुम्हारा ही प्रतिरूप
मैं भी हूँ एक आधुनिक भविष्य की स्त्री
लड़ रही हूँ इस पुरुषसत्तात्मक समाज से
तुम्हारी ही दी हुई शक्ति और हिम्मत के साथ.

तुम वापस लौटने के सपने देखने लगी
हेनरिख की ठंढी बांहों में
कूद पड़ी उसके बर्फ़ीले अस्तित्व में
जम गया तुम्हारा नग्न शरीर
और उतर गई तुम्हारी पूरी थकन
जा पहुँची तुम पीटर्सबर्ग की सर्द हवाओं में
पर घिर गई एक काले लम्बे कफ़न के जुलूस में
तुम्हारी आँखों ने देखा दहला देनेवाला मंज़र
दौड़ गई तुम्हारी आँखों में उदासी और रगों में सिहरन
जीने के लिए, रोटी के लिए, मारे गए मज़दूरों के बीच
मौन सिसक रही थी तुम
पर कोई नहीं था वहां तुम्हारी सिसकियों का मूक गीत सुननेवाला
तुम गा रही थी क्रांति का मौन गीत भीगी पलकों से
देखते हुए उस उदास और अनंत लम्बे जुलूस को
लेकिन उसी समय तुम्हारे अन्दर का एक और जीवन
दे रहा था जीवन के संगीत को लयात्मकता
थिरकने लगी थी तुम अचानक
एक असीम अनंत आनंद के साथ
रोज़ नोर्डविक से केडविक तक समंदर किनारे
करने लगी थी अठखेलियाँ रेत पर
और उचककर छू लेना चाहती थी आसमान
पर यहाँ भी थी तुम बिल्कुल अकेली
समंदर, रेत के टीलों और अपने आनेवाले अधीर बच्चे के साथ
पर समंदर हमेशा से देता आया था तुम्हें
असीम शक्ति, ऊर्जा और
कभी-कभी समुद्री तूफ़ानी हवा
स्याह आकाश के साथ
विचलित भी करते रहे थे तुम्हें वे
समुद्री तूफ़ानी थपेड़े
समुद्री सुनामी
पर इस तूफ़ान में भी तुम
कोशिश करती रहती थी अपने बच्चे को
अपना संदेश देने की
हर रात
अपने पेट के उभार को हाथ से छूकर.

मैं भी जब घूमने निकलती हूँ
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
तो न तो पैर टिक पाते हैं
कश्मीर की बर्फ़ीली हसीन वादियों में
न ही आँखें देख पाती हैं
पानी से निकलते और डूबते सूरज को
अपनी जींस मोड़कर नंगे पाँव किसी का हाथ थामे
समंदर के रेत मिले पानी के छींटों और फ़ुहारों के रूमानी स्पर्श से पहले ही
न जाने कौन-सी अदृश्य शक्ति ला पटकती है मुझे
हैदराबाद, बैंगलोर, दिल्ली और मुंबई के ताज के पास
जहाँ मैं चारों तरफ़ घिर जाती हूँ लाशों से
चीथड़ों से, ख़ून के फ़व्वारों से
आँखें अचानक देखने लगती हैं एक ख़ूनी मंज़र
ग्लेशियर पिघल-पिघलकर
एक ख़ूनी लाल नदी में बदलने लगते हैं
और अपनी पूरी रवानी के साथ समंदर को भी
करने लगते हैं लाल
ताज के किनारे, समंदर के पास
पत्थरों पर वासु-सपना और न जाने
मोहब्बत की लिखी कितनी सारी इबारतें
शामिल हो उठती हैं मेरी रूमानियत में
मौन सिसकियाँ बनकर
पर कोई नहीं है वहां मेरी सिसकियाँ, मेरा मौन सुननेवाला
सिवाय पत्थरों और पानी के.
मेरी सिसकियाँ लौट जाती हैं मुझसे ही टकराकर
मेरी पलकें भींगती रहती हैं क्रांति के लिए
किसी गीत की खोज करती हुई
समंदर की लहरों में से
उनके गर्जन से
मैं पा भी चुकी हूँ एकाध क्रांति-गीत
असीम अनंत आनंद से
जीवन की लयात्मकता से जुड़ा
पर इसी बीच मेरी भीगी पलकें ले आती हैं एक सुनामी
और मैं वापस रह जाती हूँ अकेली
सुनामी के बाद की तबाही को देखने के लिए.
ताज में मारे गए किसी विदेशी माँ-बाप के बच्चे की चीत्कार को सुनती हूँ
तो लगता है कि तूफ़ान के बाद की तबाही के बाद
नए जीवन के संचार के लिए बजाई है किसी ने
देसी तुरही पर विदेशी सिम्फ़नी
किसी ने बजाए हैं फ्यूज़न इस सिम्फ़नी के नोट्स पर
पर इस नवगीत के आगाज़ के बावजूद
नहीं हट पाते हैं सुनामी के बाद कराहते, बिलखते लोग
मेरी निगाहों से
भूखे, नंगे बच्चे दौड़े-भागे चले आ रहे होते हैं मेरी बांहों में
और मैं कोशिश कर रही हूँ हर बच्चे को
प्यार, प्यार का सन्देश देने की
अपने वर्जिन मातृत्व से
अपनी गोद में
मुझमें जाग उठता है वर्जिन मदर मेरी और मदर टेरेसा का मिला-जुला रूप
और यह एक सुखद लम्हा भारी पड़ जाता है
मेरे पूरे दु:खी जीवन पर
और
मैं और ज़्यादा आनंद के साथ
थिरक उठती हूँ इज़ाडोरा
तुम्हारे ही विशुद्ध आनंदमय नृत्य
‘मोमेंट म्यूज़िकल’ पर
जिसे रचा था तुमने ही
एक क्षण के
एक संगीतमय क्षण के आनंद के लिए
यह संगीत पैदा करता था एक नीली-पीली चमकती आभा
जैसे हजारों बच्चियां नीले लिबासों में संतरे के पेड़ों के नीचे
थिरक उठीं हों
एक साथ.

तुम्हारे नृत्यों का एक ही अर्थ था-
एक ही माध्यम था अभिव्यक्ति का
सब कुछ एक नए जीवन को जन्म देता हुआ
प्रेम, स्त्री, सृजन, फलदायिनी पृथ्वी द्वारा.

तुम नाचती रही हमेशा
एक संतरी सूर्योदय व नारंगी सूर्यास्त के साथ
समंदर से लेकर मिस्र के मरुस्थल की सुनहरी रेत पर
होता था तुम्हारे नृत्य का उत्तरार्ध
एक मंदिर के प्रांगण में बीती धूपिया दोपहरिया की तरह
जो कल अपने आनेवाले बच्चे के सपने में खोई हुई हो.
तुम्हारे नृत्य के पूर्वार्द्ध में होती थी
नील के किनारे सरों पर पानी के मटके उठाए
कैटवॉक करती किसान स्त्रियों के कमर की लचक
नाचते हुए तुम बन जाती थी कभी आयरलैंड की प्रेयसी ‘द्रेद्रे’ (इज़ाडोरा की बेटी का नाम भी द्रेद्रे था)
और कभी-कभी ‘दहाबा’
(दहाबा – मिस्र में चलनेवाली एक ऐसी नाव जो यात्री को युग से बहुत पहले या बहुत बाद ले जाने का एहसास कराती है जहाँ बेहद सुकून हो)
जिसमें यात्रा करते हुए दर्शक पहुँच जाते थे
हज़ार दो हज़ार साल किसी बहुत पुराने युग में
सदियों पुराने स्थलों, मंदिरों और खंडहरों में घिरकर
हो जाते थे शक्ति और सुकून से लबरेज़
या हज़ार दो हज़ार साल आगे मुक्त भविष्य में.

तुम्हारे नृत्य के अंत में
एक मद्धिम रोशनी के बीच मंच से वापस जाती
तुम्हारी धूमिल आकृति
लगती थी पुराने मंदिर की धूमिल मूर्तियों की गुड़िया-सी प्यारी
पौ फटने के साथ ही थिरकने लगती थी
तुम्हारी नस-नस यों
जैसे आ रही हो नदी से पानी खींचने की आवाज़ें लगातार
ठहर जाती थी मंत्रमुग्ध-सी सुबह यों
जैसे रुक गए हों…
ठहर गए हों…
नदी तट पर मज़दूरों के क़ाफ़िले
पानी ढोते हुए
खेत सींचते हुए
ऊँट दौडाते हुए
और ये क़ाफ़िले एक-एक कर मंत्रमुग्ध-से देखते रहते थे
तुम्हारी मुद्राएँ शाम ढलने तक.

तुम्हारा नृत्य शुरू होता था सूरज के साथ
रोज़मर्रे की ज़िन्दगी की तरह
और ख़त्म भी हो जाता था वैसे
जैसे रोज़ शाम को ढल जाता है सूरज
और हो जाती है शाम
ख़ूबसूरत चांदनी रातों में पानी पर
जब थिरकती थी तुम ‘दहाबा’ बनी
थिरक उठते थे और फिर गिरते थे
पतवारें चलाते नाविकों के तांबई शरीर
उनके होंठों से निकलते गीतों की धुनों के साथ-साथ
और बज उठते थे असंख्य जलतरंग
सुरमई नदियों में
और मिला जाते थे नदियों के दोनों किनारों को
बड़ा ही महीन करके
मैं भी सोच रही हूँ कि ‘दहाबा’ बन जाऊं
और लोगों को ले जाऊं उस दुनिया में
जहाँ कोई जानता भी न हो नाम
असलहों, मिसाइलों और बमों का.

तुम नाचते-नाचते न जाने कब पहुँच जाती थी
सपनों के उस देश में
जो गरीबों के लिए मेहनत-मज़दूरी का देश होता था
पर यही एक ऐसा अकेला देश था जहाँ मेहनत-मज़दूरी भी ख़ूबसूरत हो सकती थी.
दो वक़्त का सादा भोजन खानेवाला मज़दूर भी
दिखता था यहाँ
हृष्ट-पुष्ट और ख़ूबसूरत
वह खेतों में काम कर रहा हो या
नदी से पानी खींच रहा हो
उसका तांबई, सुडौल शरीर
बन सकता था आनंद का स्रोत
किसी भी मूर्तिकार या चित्रकार के लिए.

तुम उतरती थी मंच पर ऐसे
जैसे किसी शानदार विला की तिरछी छतें
उतरती हों सीधे समंदर पर जाकर
यौवन और आनंद के हिलोरों में झूमती सारी प्रकृति के साथ
जब जल रहा होता था सूरज
तुम उतरती थी नीले समंदर में अपनी पूरी नरमी के साथ
अपनी बाहों में भरे नन्हीं जिंदगियों को लिए
अपने चेहरे पर नन्हे मातृत्व के भाव लिए
तुम उतरती रही बार-बार नीले मेडिटेरेनियन में
समझ नहीं पाई मैं आजतक कि क्या थी तुम…
एक सफल कलाकार,
एक मादक, उत्तेजक, उद्दाम, कामुक प्रेमिका
या वात्सल्य से लबरेज़ एक माँ…?

तुमने कभी तो दिया कला को निरंतर श्रम
और अपना सम्पूर्ण समर्पण
पर कभी अचानक इतना ज़्यादा समर्पित कर दिया
तुमने अपने आप को ज़िन्दगी को
कि हो गई गतिहीन
और बनकर रह गई एक आम औरत
जो प्रेमिका होती है
पत्नी होती है
माँ होती है
पर, वह कलाकार हो ही नहीं सकती
क्योंकि कलाकार होने के लिए पैदा करना होता है
कुछ न कुछ ख़ास अपने आप में
तुम्हें तो पैदा भी नहीं करना पड़ा था
तुम्हें तो यह नैसर्गिक रूप से मिला था
पर, तुम इसकी देख-रेख, इसके पोषण में
कभी-कभार कर देती थी
कहीं-न-कहीं थोड़ी-सी चूक
और बन जाती थी एक सफल कलाकार से
एक आम औरत
औंधे मुंह गिरकर धड़ाम से ज़मीन पर
पर आख़िरकार समझ गई तुम कि
कला मनुष्यों से कहीं ज़्यादा कृतज्ञ साबित होती है
और तब सचमुच तुमने ठाना
अपना पूरा जीवन कला को समर्पित करने का
तुमने समझा कि आम लोगों के लिए भी कला उतनी ही ज़रूरी है
जितनी हवा और रोटी
और तुमने प्राणवायु की तरह लोगों में घोल दी अपनी कला
कला कि इस अलौकिक मदिरा को पीकर
उन्मत्त होकर नाच उठे लोग
मैं भी कोशिश कर रही हूँ प्रेम-मदिरा को प्राणवायु में घोलने की
ताकि इसे पीकर ‘मस्त कबीरा’ बन जाएँ लोग.

अपनी आत्मकथा में एक अध्याय लिखा तुमने
‘आदिम प्रेम के लिए क्षमायाचना सहित’
जिसमें तुमने खोज लिया था कि
‘प्रेम सिर्फ़ त्रासदी ही नहीं, मन बहलाव का माध्यम भी हो सकता है’
इसलिए तुम बढ़ती चली गई इस तरफ
आदिम सहजता के साथ
अब लद गए थे दिन तुम्हारे एक गिलास गर्म दूध के
और ‘क्रिटीक ऑफ़ प्योर रीज़न’ के
अब तुम्हें भाने लगी थी शैम्पेन
मोहक पुरुषों से अपने सौन्दर्य की तारीफ़
चाहत भरे होंठ
लिपटती बाँहें
किसी प्रिय के कंधे पर मीठी आराम देती नींद
अब शरीर बन गया तुम्हारे लिए आनंद प्राप्त करने का एक माध्यम मात्र
अब तुम बांटने लगी
सुन्दर बाँहें और दिमाग़ी पीड़ा भुला देने वाले
गुदगुदे शरीर का स्पर्श
जहाँ एक ओर जिया तुमने ज़िन्दगी को पूरे आनंद से
दी हजारों लोगों को हजारों सुरीली संगीतमय शामें
पर तुम भूली भी नहीं
रूस में
भोर के अधनींदी आँखों से देखे
अपने उस सपने को जिसमें सड़क के दोनों ओर कफ़नों की एक श्रृंखला लिए
दो शवयात्राएं जा रही थीं.
वे साधारण कफ़न न थे, बल्कि बच्चों के कफ़न थे
पर टूटते ही सपना पता चला कि
तुम्हारी आँखों में दूर-दूर तक बर्फ़ थी
बर्फ़ के सिवा कुछ भी नहीं था
चारों ओर बर्फ़ के ऊंचे-नीचे ढेर थे.
बस…उसी शाम तुमने पेश किया
शोपेन की शवयात्रा वाली धुन पर
अपना अलौकिक नृत्य
सफ़ेद फूलों की सुगंध में लिपटकर
फिर तुमने प्रस्तुत किया
घायल विश्व के ज़ख्मों पर मरहम लगाता एक नृत्य
मैं भी सोच रही हूँ कि कुछ ऐसा करूं
कि धमाकों से ध्वस्त होते घायल विश्व के ज़ख्मों पर
रिसते ख़ून पर मरहम लगा सकूं.

सर पर स्कार्फ़ बांधकर जब भी बाहर निकलती थी तुम चांदनी में
तो दिखती थी उस उदास प्रेतनी-सी
जो हाथों में महानतम प्रेम की विशुद्ध अखंड लौ जलाए
चली जा रही होती थी
किसी अनंत यात्रा पर
और त्रासदी का नृत्य टहल रहा होता था
त्रासदी की देवी के साथ ‘सी-बीच’ पर चांदनी रात में
अब तुम उस लौ के साथ समा गई हो मुझमें
और मैं प्रेम की प्रेतनी बनी
हाथों में मोहब्बत की शमां लेकर
निकल पड़ी हूँ दुनिया के तमाम मुल्कों को रोशन करने की ज़िद के साथ
पर फिर भी तुम्हारी ही तरह
ज़िन्दा रखा है मैंने अपने आपको अपनी युवा देह में
पतझड़ की उदास शामों में
पत्तियों की तरह अपने सारे ग़मों को गिराकर ज़मीन पर
नग्न हो उठती हूँ मैं तुम्हारी छाया बनी पेड़ की तरह
अपने नैसर्गिक, आदिम सौन्दर्य के साथ
और सूर्य के समंदर में डूबने और आकाश में चाँद के निकलने तक
जब पहाड़ के संगमरमरी हिस्से पर
पसरती चली जाती थी चांदनी
और तुम सिमटी जाती थी एंजेलो (इज़ाडोरा का प्रेमी) की बांहों में
उसकी सम्पूर्ण इतालवी चाहत के बीच
उसने दी तुम्हें अपनी मित्रता, अपनी प्रशंसा और अपना संगीत
मैं भी थक चुकी हूँ इन धमाकों से, इस विनाश से, इस तबाही से
और इंतज़ार है मुझे अपने ‘एंजेलो’ की बांहों का
ताकि सिमट जाऊं मैं उसके सीने में
अपनी मुक़म्मल हिन्दुस्तानी चाहत और सुकून के साथ.

एथेंस की सड़कों पर दुबारा जी उठती थी
तुम्हारे अन्दर की हजारों साल पुरानी प्रेतात्मा
जब ‘एपियन वे’ पर अपनी बांहें उठाकर
ऊपर फैले विशाल आकाश की ओर
क़ब्र की क़तारों के बीच करती थी तुम एक त्रासद नृत्य
त्रासद आकृति की तरह
जहाँ क़ब्रों की लम्बी क़तारों के बीच फ्रासक्ती से आनेवाली
शराब से लड़ी बैलगाड़ियों और उनके ऊंघते गाड़ीवानों का मंज़र होता था
और लगता था जैसे समय का अस्तित्व समाप्त हो गया है.

पर…अचानक तुम्हें दिखाई पड़ता
रंग-बिरंगी टोपियाँ पहने
चहचहाते परिंदों-से बच्चों का झुण्ड
फिर पतझड़ आता था
अपने सितम्बरी तूफ़ान के साथ
और अचानक तैर जाती थी तुम्हारी आँखों में
एक अजीब-सी दहशत
पहली नवम्बर को
‘डे ऑफ़ द डेड’ के दिन
दो काले और सफ़ेद पत्थरों की वज़ह से बनते
क़ब्रों के अस्तित्व के आभास से
बदल जाती थीं तुम्हारी चाहत की हिलोरें पीड़ा में
और तुम तैर जाती थी अचानक एक गहरे गोते के साथ
मृत्यु के एहसास के बीच
मैं भी जब भी गुज़रती हूँ दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु की सड़कों पर से
देखती हूँ संवेदनशून्य मृतात्माएं
उनकी क़तारों के बीच से गुज़रते हुए
जाग उठती है मेरे अन्दर की प्रेतनी
और ख़ुद-ब-ख़ुद रोशन हो उठती है मोहब्बत की मशाल मेरी आँखों में.
नाच उठती हूँ मैं त्रासदी और चाहत के फ्यूज़न पर
फिर मेरे साथ नाच उठती हैं
मरे हुए प्यारे-प्यारे छोटे बच्चों की आत्माएं
चहकती हुई परिंदों-सी
पर यह क्षण भर की ख़ुशी होती है
दरअसल मेरे लिए तो हर दिन होता है ‘डे ऑफ़ द डेड’
हर पल होता है ‘पहली नवम्बर’
और हर पल क़ब्रों, लाशों, ताबूतों पर चलती
मृत्यु के एहसास से गुज़रती हूँ
हर पल कोशिश करती हूँ उन्हें रौंदकर
बदल डालूँ पीड़ा के तूफ़ान को
चाहत की हिलोरों में
आँखों में अजीब से धमाके
एक अपूर्व दहशत लिए
मौत को रौंदने की करती रहती हूँ हर पल एक नाक़ाम कोशिश
फिर न जाने कब उठ जाते हैं वापस मेरे क़दम
हौले-हौले समंदर किनारे
समुद्र तट पर चलती जा रही हूँ मैं
चलती जा रही हूँ, चलती चली जा रही हूँ…
रेत पर अपने क़दमों के निशान बनाती
मुड़कर देखती हूँ अपने क़दमों के निशान
इस कचोटती इच्छा के साथ कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगी
उस मृत्यु जैसे प्रेम के आलिंगन में
ढलती शामों और रातों से बेपरवाह
मैं आगे बढ़ती जा रही हूँ लहरों को चीरकर
और मन-ही-मन समाती जा रही हूँ समुद्र की गोद में
उन शीतल लहरों का आलिंगन करती हुई
कंपकंपाती ठंढ के बावजूद मुझे भा रही है
बर्फ़ीली ठंढी हवाओं की छुअन
और उड़कर आते हुए मुझे छूते बर्फ़ के बुरादे
पर यह ज़िन्दगी से पलायन की मेरी नाक़ाम कोशिश है
जो हर बार जाकर ख़त्म होती है
तबाही, छटपटाहट और मृत्यु पर
हर बार यह सोचकर मैं वापस लौट आती हूँ कि
शायद मुझे ऐसे कुछ लोग कभी मिल जाएँ
जिनकी आत्मा ही संगीत, काव्य और प्रेम के लिए बनी है
तो मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारी तरह उन लोगों के लिए
प्रेम धुनों पर नाचती रहती.

तुम्हारे लिए हमेशा ज़िन्दगी और कला रही
एक-दूसरे से बिलकुल अलग दो दुनियाएं
और यह कला तुम्हारी इच्छा या इरादे की परवाह न कर
पनपती रही अपने बलबूते
और परवान चढ़ती रही
अपने आप में एक अलग ईकाई-सी
तुम्हारे अन्दर सचमुच जीता था एक ऐसा कलाकार
जो तुम्हारे अन्दर के तमाम इंसानों से अलग था.
नीत्शे के ‘स्त्री एक दर्पण है’ को सार्थक करते हुए
तुमने भी प्रतिबिंबित किया उन तमाम लोगों और शक्तियों को
जो छाये रहे तुम्हारी ज़िन्दगी पर
तुमने भी बदला स्वरूप और चरित्र
ओविड के ‘मेटामॉर्फ़ोसिस’ की नायिकाओं की तरह
देवताओं के आदेशानुसार.

वॉल्ट व्हिटमैन के प्रजातंत्र के गीत में तुमने महसूस की
रॉकी पर्वतों की घुमावदार महानता
अमरीकी आत्मा का संवेग, जो श्रम के माध्यम से
एक सुविधाजनक जीवन पाने में संघर्षरत है
तुम्हारी नज़रों में यह नृत्य, यह संगीत था
एक नन्हे बच्चे के मासूम क़दमों की तरह
जो अपने पांवों पर उचक-उचककर
भविष्य की ऊंचाइयों को, उपलब्धियों को छू लेना चाहता है
जीवन की उस नई दृष्टि को छू लेना चाहता है
जिसे ‘स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी’ अभिव्यक्त करती है.
यह संगीत था एक ऐसा संगीत
जो आत्मा के स्वर्ग से निकलकर
आसमानों में घुमड़ता हुआ
प्रशांत पर लहराता हुआ
मैदानों में विचरता हुआ
रॉकी पर्वतों की चढ़ाइयों पार तक
अपने पंख फैला सके.
अब्राहम लिंकन के
वॉल्ट व्हिटमैन के गाते हुए अमरीका को
सुन सकने, अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम
तुम्हें इंतज़ार था उस संगीतज्ञ का जो निकाल सके
वॉल्ट व्हिटमैन के उस संगीत को
ज्वालामुखी की तरह ज़मीन की तहों से बाहर
या तूफ़ानी बारिश की तरह टपका सके आसमानों से
और नाच उठने को उज्ज्वल लड़के-लड़कियों के इस संगीत पर
जिनके नृत्य में किसी मोहिनी का फूहड़ श्रृंगार-रस नहीं होता
होता शारीरिक का ऐसा जादू और उत्थान
जो किसी सभ्यता ने पहले कभी नहीं देखा होता.
तुम देखने लगी थी व्हिटमैन के गीत को सुनने के बाद से ही
उस अमरीका को नाचते हुए
एक विराट मानव आकृति के रूप में
जिसमें न तो बैले की नज़ाकत भरी अदाएं थीं और
न ही नीग्रो नृत्य की कामुकता.
यह होता बिल्कुल साफ़-सुथरा
आसमानों को छूती एक भव्य अमरीकी नृत्य आकृति
समुद्र, मैदानों, पर्वतों को अपने दायरे में समेटे
एक फुर्तीली लचकता के साथ मस्तक ऊंचा उठाए
बाँहें फैलाए दुनिया को नेतृत्व देता अमरीका.
अमरीकी उद्यमियों की पहल को
अमरीकी बहादुरों के साहस को
अमरीकी माँओं की प्रेरक ममता और विनम्रता को
नाचते हुए अमरीकी प्रजातंत्र को
नाचते हुए अमरीका को
देख लिया था बहुत पहले तुमने
पर क्या तब तुम देख पाई थी
आज का अमरीका …?

तब तुम्हें लगने लगी थी ज़िन्दगी
बहुमूल्य जवाहरात भरा एक ताज
खिले-खिले फूलों भरा एक भरा-पूरा उद्यान
हर पल खुशियों की नई पौध पैदा करती एक सुहानी भोर
तुम्हें मिल ही नहीं रहे थे तब
अपने उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति के लिए शब्द
तुम्हें दिख रहा था अतीत बरबादियों के एक सिलसिले-सा
और भविष्य एक निश्चित प्रलय-सा
उन कल्पनाशील दिनों में तुम्हारा मन बन जाता था
किसी खिड़की का साफ़-सुथरा शीशा
जिसमें से नज़र आती थी तुम्हें
सौन्दर्य और रंगों की शानदार आकृतियाँ
पर उन्हीं कुछ दिनों में तत्क्षण
ज़िन्दगी दिखती थी तुम्हें गन्दगी के एक ढेर की तरह
पर मुझे कहीं भी नज़र नहीं आती है गन्दगी या
गन्दगी का ढेर भी नहीं दिखता.
अतीत की बरबादियों के श्मशान में खड़ी मैं
देख रही हूँ नाचता-मुस्कुराता विश्व
प्रलय के बाद का भविष्य
जहाँ ख़ूनी समंदर की लहरें
अचानक सराबोर होती जा रही हैं लाल गुलाब के रंग में
और विश्व के हर कोने में मुस्कुरा उठा है
लाल-गुलाबी गुलाबों से चहकता एक मुग़ल गार्डन
जो अब हमेशा खुला रहेगा
आम जनता के लिए
प्रेमी जोड़ियों के लिए.

हर बार दुःख के समंदर में जितनी गहरी डुबकी लगाती हूँ मैं
उतनी ही ऊंची होती है ख़ुशी के आसमान में मेरी हर उछाल

इज़ाडोरा बनी मैं
छू रही हूँ संगीत और नृत्य के अलौकिक आनंद की ऐसी ऊंचाइयां
जो यक़ीनन एक नई खोज है
एक नई चेतना है
विनष्ट होती जा रही मानवता के लिए.
हर पल होती जा रही हूँ और युवा
क्योंकि अभी तब तक नहीं मरना है मुझे
जब तक विनाशोन्मुख विश्व को वह अलौकिक संगीत न दे दूं
जिसका सपना हरपल मेरी आँखों में नाचता रहता है.
रहने लगी हूँ अपनी ही देह में ऐसे
जैसे बादलों में बूँद
गुलाबी आग और मादकता भरी प्रतिक्रिया का बादल
एक डरी-डरी सी, सहमी-सी, दुबली-पतली
हलकी देह वाली कमसिन लड़की से
बदल गई हूँ अचानक एक सख्त जान जांबाज़ औरत में
फिर देखती हूँ कि बदल गई हूँ एक भरी-पूरी
लताओं जड़ी मदिरा में नहाई मस्तानी देह में
जो एक प्रेमी का स्पर्श पाते ही हो जाती है
बेःद नम्र और सुरक्षाहीन
पहले थी मैं एक सहमी हुई शिकार
फिर एक जोशीली प्रेयसी
पर अब मैं छाने लगी हूँ दुनिया पर ऐसे एक प्रेमिका बनी
जैसे समुद्र पर एक साहसी तैराक
इस पूरे जहान को
बादलों और आग की लहरों में बांधते, भींचते और आलिंगित करते हुए
मैंने गाए हैं प्रेम और बहारों के साथ-साथ
पतझड़ के भी रंग भरे भव्य और विविध गीत

इज़ाडोरा…!
तुम्हारे बाद
पहली बार शायद मैंने ही महसूसा है
कि पतझड़ का आनंद भी
बहुत शक्तिशाली, गहरा और मोहक होता है.
और कभी-कभी मैं बनी हूँ एक निर्मोही आत्मा-सी भी
जो मृत्यु के बाद जा रही हो किसी दूसरे लोक में
मैं देना चाहती हूँ दुनिया को एक ऐसा नया धर्म
जिसमें कहीं भी जगह न हो नफ़रत और युद्ध के लिए
ख़ून-ख़राबे के लिए
असलहों, मिसाइलों के लिए
देना चाहती हूँ इस दुनिया को शैम्पेन और शहतूत
वोदका और कोगनाक की ख़ुमारी.

असीमा भट्ट की कविताएँ

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

जलाटा डायरी *

(बोस्निया युद्ध पर लिखी एक मासूम बच्ची जलाटा की डायरी पढ़कर )

“युद्ध का मानवता से कोई लेना-देना नहीं!
मानवता के साथ कोई संबध नहीं …”
कह्ती है छोटी-सी बच्ची ‘जलाटा’ .
वह युद्ध का मलतब तक नहीं समझती
सिर्फ इतना जानती है कि-
युद्ध एक बुरी चीज है.
झूठ बोलने की तरह .
युद्ध मतलब परस्त लोगों की साजिश है
जो आदमी को आदमी से
इंसान को इंसान से
धर्म, नस्ल और देश के नाम पर लङवा रहें हैं
इसमें सबसे अधिक नुकसान
बच्चों को होता है
जलाटा जैसी कितने ही मासूम बच्चे हो जाते हैं बेघर और बेपनाह
जलाटा लिखती है-
“हमारे शहर, हमारे घर,  हमारे विचारों में और हमारे जीवन में युद्ध घुस चुका है .
युद्ध के ऊपर पानी की तरह पैसे बहाने वालों
तुम बच्चों के खून में भय का बीज ‘बो’ रहे हो .
बच्चों की खुशी और उसके सपनों का सौदा करने वालों
युद्ध तुम्हारी खुराक बन चुका है …
युद्ध कराये बगैर तुम जिंदा नहीं रह सकते!
जो देश, दुनिया में सबसे अधिक भयभीत हैं!
वही भय का कारोबार कर रहें है.
ऐसे कायर और डरपोक लोंगो को समाज से बाहर उठाकर कूड़े में फेंक देना चाहिए…
जलाटा, तुम सही कह्ती हो कि-
“राजनीति बडों के हाथ में है.
लेकिन मुझे लगता है बच्चे उनसे बेहतर निर्णय ले पाते.”
यह दुनिया बेहतर और खूबसूरत होती ….
काश! कि सचमुच ऐसा हो पता जलाटा !
और तुम्हारा सपना कि एक दिन तुम्हे तुम्हारा बचपन वापिस मिलेगा.
तुम्हारी उम्मीद उस बच्चे की तरह है , जो माँ की गर्भ में आँखे बंद किये सो रहा है …

जलाटा,
देख लेना
एक दिन तुम्हारा और दुनिया के
तमाम बच्चों का सपना पूरा होगा
एक दिन सब ठीक हो जायेगा !
बच्चे खेलेंगे बेख़ौफ़
दोडेंगे, भागेंगे चारों दिशाओं में
पूरी हिम्मत के साथ
गायेंगे ख़ुशी के सबसे सुंदर संगीत
सबसे सुंदर दिन के लिए
क्योंकि
बच्चे
मासूम होते हैं
छल-कपट,  धोखा और  लालच से दूर
और सुना है सच्चे दिल से निकली दुआंऍ
कभी खाली नहीं जाती.
आमीन …

*(‘जलाटा की डायरी’ 94 में पढ़ी थी. यह मासूम बच्ची बोस्निया युद्ध के दौरान लम्बे समय तक भूखी-प्यासी तलघर में बंद थी. पता नहीं अब वो ज़िन्दा है भी या नहीं)

पिता
शाम काफी हो चुकी है
पर अँधेरा नहीं हुआ है अभी
हमारे शहर में तो इस वक़्त
रात का सा माहौल हो  जाता  है
छोटे शहर में शाम जल्दी घिर  आती है
बड़े शहरों के बनिस्पत लोग घरों में जल्दी लौट आते हैं
जैसे पक्षी अपने घोसले में

यह क्या है
जो मैं लिख रही हूँ
शाम या रात के बारे में
जबकि पढ़ने बैठी थी नाज़िम हिक़मत* को
कि अचानक याद आए मुझे मेरे पिता
आज, वर्षों बाद
कुछ समय उनका साथ
मिला अक्सर हम इतने बड़े हो जाते हैं कि
पिता कहीं दूर/पीछे छूट जाते हैं
पिता के मेरे साथ होने से ही
वह क्षण मेरे लिए महान हो जाता है
याद आता है मुझे मेरा बचपन
मैक्सिम गोर्की के मेरा बचपन’ की तरह
याद आते हैं मेरे पिता
और उनके साथ जिए/बिताये हुए लम्हें
हालाँकि उनका साथ उतना ही मिला
जितना कि सपने में मिलते हैं
कभी कभार उतने खूबसूरत पल
उन्हें मैंने ज्यादातर जेल में ही देखा
अन्य क्रान्तिकारियों की तरह
मेरे पिता ने भी मुझसे सलाखों के उस पार से ही किया प्यार
उनसे मिलते हुए पहले याद आती है जेल
फिर उसके पीछे लोहे की दीवार
उसके पीछे से पिता का मुस्कुराता हुआ चेहरा

वे दिन- मैं बच्ची थी उनके पीछे लगभग दौड़ती
जब मैं थक जाती
थाम लेती थी पिता की उँगलियाँ
उनके व्यक्तित्व में मैं ढली
उनसे मैंने चलना सीखा चीते सी तेज़ चाल
आज वे मेरे साथ चल रहे हैं
साठ  पार कर चुके मेरे पिता
कई बार मुझसे पीछे छूट जाते हैं
क्या यह वही पिता हैं मेरे
साहसी और फुर्तीला
सोचते हुए मैं एकदम रुक जाती हूँ
क्या मेरे पिता बूढ़े हो रहे हैं ?
आखिर पिता बूढ़े क्यों हो जाते हैं ?

पिता तुम्हें बूढ़ा नहीं होना चाहिए
ताकि दुनिया भर की सारी बेटियां
उनके पिता के साथ दौड़ना सीख सके
दुनिया भर में बेफिक्र और निर्भय…

(*नाज़िम हिकमत तुर्की के महान क्रान्तिकारी थे और उन्होंने लगभग एक दशक जेल में बिताए)

असफल प्रेमिकाएँ

वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार  .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हव्वा  की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार -बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर -फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके  लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न  किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी – ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती हैं  उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों  के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ  में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’  कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं  दिन, महीने और  तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली  में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते –  कमली  है तू
और वो खुद  पर ज़ोर ज़ोर  से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा  था
क्या  करती, ठीक से  दिखा  ही नहीं

असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए  रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली  घबरा जाती हैं, रोती हैं  तकिये
में मुंह रख  कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती  होगी उनके प्रेमी के कानों में

वो अच्छा हो,  वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ

असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों  में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी  द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और  अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या  तो  पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर

वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली  कलाई
किसी  से  न बर्दाश्त हुआ सदमा और  रुक गयी  दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे  प्यार  का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने  लगे – प्यार का  कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं – एक झलक देखना  चाहती हूँ
छूना  चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी  मजबूत बाहों में  पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस  किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते  – ‘क्या  बचपना है,  यह सब बकवास है.’

ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं –  खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं – यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर  मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें  नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस -नहस करके रख दी उनकी जिंदगी

तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं  और  तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो  प्रेमिकाएँ  हैं
प्रेतात्माएं  नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र  में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर  से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब  तक वो  करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार . ..

दीदारगंज की यक्षिणी 

“दीदारगंज की यक्षिणी की तरह तुम्हारा वक्ष
उन्नत और सुन्दर
मेरे लिये वह स्थान जहाँ सर रख कर सुस्ताने भर से
मिलती है जीवन संग्राम के लिए नयी ऊर्जा
हर समस्या का समाधान ….
तुम्हारे वक्ष पर जब जब सर रख कर सोया
ऐसा महसूस हुआ लेटा हो मासूम बच्चा जैसे माँ की गोद में
तुम ऐसे ही तान देती हो अपने श्वेत आंचल सी पतवार
जैसे कि मुझे बचा लोगी जीवन के हर समुन्द्री तूफान से…
तुम्हारे आंचल की पतवार के सहारे फिर से झेल लूँगा हर ज्वारभाटा
अनगिन रातें जब जब थका हूँ…
हारा हूँ …
पराजित और असहाय महसूस किया है …..
तुम्हारे ही वक्ष से लगकर
रोना चाहा
जार जार
हालाँकि तुमने रोने नहीं दिया कभी
पता नहीं
हर बार कैसे भांप लेती हो
मेरी चिंता
और सोख लेती हो मेरे आंसू का एक एक बूँद
अपने होठों से
तुम्हारे वक्ष से ऐसे खेलता हूँ, जैसे खेलता है बच्चा
अपने सबसे प्यारे खिलौने से ….
तुम्हारा उन्नत वक्ष
उत्थान और विजय का ऐसा समागम जैसे
फहरा रहा हो विजय ध्वज कोई पर्वतारोही हिमालय की सबसे ऊँची चोटी पर

जब भी लौटा हूँ उदास या फिर कुछ खोकर
तुमने वक्ष से लगाकर कहा
कोई बात नहीं, “आओ मेरे बच्चे! मैं हूँ ना’
एक पल में तुम कैसे बन जाती हो प्रेमिका से माँ
कभी कभी तो बहन सरीखी भी
एक साथ की पली बढ़ी
हमजोली … सहेली ….
‘Ohh My love ! you are the most lovable lady on this earth”
सचमुच तुम्हारा नाम महान प्रेमिकायों की सूचि में
सबसे पहले लिखा जाना चाहिए
खुद को तुम्हारे पास कितना छोटा पाता हूँ, जब- जब तुम्हारे पास आता हूँ
कहाँ दे पाता हूँ, बदले में तुम्हे कुछ भी
कितना कितना कुछ पाया है तुमसे
कि अब तो तुमसे जन्म लेना चाहता हूँ
तुममें, तुमसे सृष्टि की समस्त यात्रा करके निकलूं
तभी तुम्हारा कर्ज़ चुका सकता हूँ
मेरी प्रेमिका ….”

आईने में कबसे खुद को निहारती
शून्य में खड़ी हूँ
दीदारगंज की यक्षिणी सी मूर्तिवत
तुम्हारे शब्द गूंज रहे हैं, मेरे कानों में प्रेमसंगीत की तरह
कहाँ गए वो सारे शब्द ?
मेरे एक फोन ने कि –
डॉक्टर कहता है – मुझे वक्ष कैंसर है, हो सकता है, वक्ष काटना पड़े.
तुम्हारी तरफ से कोई आवाज़ न सुनकर लगा जैसे फोन के तार कट गए हों
स्तब्ध खड़ी हूँ
कि आज तुम मुझे अपने वक्ष से लगाकर कहोगे
-“कुछ नहीं होगा तुम्हें! ”
चीखती हुई सी पूछती हूँ
तुम सुन रहे हो ना ?
तुम हो ना वहां ?
क्या मेरी आवाज़ पंहुंच रही है तुम तक ….
हाँ, ना कुछ तो बोलो….”

लम्बी  चुप्पी के बाद बोले
-“हाँ, ठीक है, ठीक है
तुम इलाज करायो
समय मिला तो, आऊंगा….”

समय मिला तो ? ? ?
समझ गई थी सब कुछ
अब कुछ भी जो नहीं बचा था मेरे पास
तुम अब कैसे कह सकोगे
सौन्दर्य की देवी ….
प्रेम की देवी…..

सबकुछ तभी तक था
जब तक मैं सुन्दर थी
मेरे वक्ष थे
एक पल में लगा जैसे
खुदाई में मेरा विध्वंस हो गया है
खंड खंड होकर बिखर चुकी हूँ, “दीदारगंज की यक्षिणी’ की तरह
क्षत-विक्षत खड़ी हूँ,
अंग भंग …
खंडित प्रतिमा …
जिसकी पूजा नहीं होती

सौन्दर्य की देवी अब अपना वजूद खो चुकी है….

लेकिन मैं अपना वजूद कभी नहीं खो सकती
मैं सिर्फ प्रेमिका नहीं!

सृष्टि हूँ
आदि शक्ति हूँ

और जब तक शिव भी शक्ति में समाहित नहीं होते
शिव नहीं होते ….
मैं वैसे ही सदा सदा रहूँगी
सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी,
शिव, सत्य और सुन्दर की तरह ….

(*दीदारगंज की यक्षिणी को सौन्दर्य की देवी कहा जाता हैं)

“This Poem is dedicated to cancer surviving women!”