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आधुनिक गुरुकुलों में आंबेडकर के वंशजों की हत्या

चंद्र सेन

( रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारणों की अकादमिक जगत में व्याप्तता की पड़ताल कर रहे हैं , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी ‘चन्द्रसेन’. स्त्रीकाल ने वेमुला की आत्महत्या ( ह्त्या ) के दोषी लोगों पर राष्ट्रपति से कार्रवाई के अनुरोध के साथ हस्ताक्षर अभियान चलाया था. हम फरवरी के पहले सप्ताह में सारे नामों और हस्ताक्षरों के साथ राष्ट्रपति को अनुरोध पत्र भेजेंगे. राष्ट्रपति केन्द्रीय  विश्वविद्यालयों के विजिटर होते हैं . उनकी इस मसले पर चुप्पी दुखद है . )

‘सामाजिक और आर्थिक बराबरी के बिना राजनीतिक समानता का कोई मोल नहीं रह जाता है।’ डॉ. अंबेडकर ने यह वाक्य भारतीय सविंधान देश को भेंट करते समय चेतावनी के साथ बोला था कि ‘यदि हम आर्थिक और सामाजिक खाई को नहीं पाट पाए तो देश का शोषित तबका इस पूरी व्यवस्था को जला देगा (ब्लो अप)।’  अपने सबसे महत्वपूर्ण लेख ‘एनहिलेशन ऑफ कास्ट’ में उन्होंने हिन्दू धर्म को जाति का मूल आधार माना है जो शूद्रों, महिलाओं के लिए एक ‘वेरिटेबल चैंबर आफ हॉरर’ है।

डॉ. तुलसी राम भारत को दुनिया का सबसे पुराना ‘थेओक्रेटिक स्टेट’ मानते हैं। उनके अनुसार यह देश हिन्दू धर्म, उसकी स्मृतियों द्वारा वैदिक काल से ही शासित है। बाद में आकर आरएसएस के पुरोधाओं ने इसे हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के रूप में व्यख्यायित किया। समकालीन सरकार इसी हिन्दू राज को स्थापित करने के लिए कमर कस चुकी है। ‘अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल’ को अवैध घोषित करना, अफजलगुरू, याकूब मेमन, को राष्ट्र-भावना पर फाँसी, अख़लाक की हत्या, प्रो. साँईं पर देशद्रोह का मुक़दमा, और रोहित की मौत ये सब इसके कुछ उदाहरण हैं।

रोहित वेमुला,  हैदराबाद विश्वविद्यालय का एक मेधावी शोध-छात्र था। उसने ‘म्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन’ के बैनर तले, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के खिलाफ  मुहिम छेड़ी थी। भारतीय व्यवस्था में अछूत माने गए वर्ण से रोहित और उसके साथी आते हैं। एक दलित की सामाजिक हैसियत उसके जन्म से तय की जाती है और यही उसकी पहचान बना दी जाती है। यह पहचान उसके हर शोषण का कारण बनती है। भारतीय समाज जाति के आधार पर ही शाषित होता है। दुनिया की यह एक मात्र व्यवस्था है जहाँ व्यक्तिगत गुण का कोई मूल्य नहीं है और इसीलिए डॉ. तुलसी राम कहते हैं कि यहां व्यक्ति नहीं बल्कि जातियाँ अमीर-गरीब होती हैं वे ही (जातियाँ) शासन करती हैं। आज़ादी मिले हुए छह दशक हो गए है तब भी यह व्यवस्था जस-की-तस बनी हुई है और इसी तंत्र के तहत अनगिनत रोहित जान गंवा चुके हैं।

बुद्ध, फुले, पेरिया और आंबेडकर ने वर्ण-आधारित भारतीय समाजिक संरचना
को बदलने की शुरुआत की थी। रोहित वेमुला जैसे छात्र भी इसी अमानवीय व्ववस्था को ख़त्म करना चाहते थे। लेकिन वे शम्बूक, एकलव्य और अनगिनत क्रांतिकारियों की तरह ब्राह्मणवादी व्यवस्था का शिकार हो गए। रोहित वेमुला की ही यदि बात करें तो, यह घटना को देखने में तो आत्म-हत्या लगती है, किंतु यह आधुनिक भारतीय राज्य द्वारा की गई हत्या है और इस हत्याकांड में सारा तंत्र साजिशन जुटा हुआ था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पांच-पांच चिठ्ठियाँ, वाइस-चांसलर और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा रोहित और उसके साथियों का सामाजिक बहिष्कार, उनका फेलोशिप रोकना,लोकल बीजेपी और केंद्रीय मंत्रियों का हस्तक्षेप ही ऐसे कारण थे,  जिन्होंने रोहित को मानसिक रूप से इतना परेशान किया कि उसने आत्महत्या कर ली।

भारतीय राज्य की यह विडम्बना ही है कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में की जा रही दलित-हत्या और सामूहिक बहिष्कार को नहीं रोक पाया। लेकिन यह स्थिति सिर्फ गाँवों मे हो ऐसा भी नहीं है। देश के प्रतिष्ठित और आधुनिक संस्थानों में भी यही खेल खेला जा रहा है, रोहित की हत्या इसका ज्वलंत उदाहरण है। जातिवादी लोग यह कहते हुए नहीं अघाते हैं कि जाति की समस्या सिर्फ गांवों की है। कुछ महानुभाव तो यहां तक अपना ज्ञान उड़ेलते हैं कि आज जाति कोई समस्या नहीं रह गयी है। यह सब पुरानी बाते हैं| पिछले १० वर्षों से लगभग हर वर्ष इसी विश्वविद्यालय (हैदराबाद) का छात्र  आत्म-हत्या कर रहा है। जो इस सवर्णवादी मानसिकता की पोल खोल देती है। साथ-ही-साथ पिछले एक दशक में AIIMS और IITS में २३ छात्रों ने अपने को मारा है और इन सबकी सामाजिक पृष्ठभूमि एक ही है|

यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि किताबी ज्ञान और आर्थिक-तकनीकी परिवर्तन से सामाजिक मानसिकता नहीं बदल सकती। देश के विज्ञान और तकनीकी संस्थान एम्स में ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ जैसे जातिवादी संगठन का जन्म हुआ, जो आरक्षण, दलित और पिछड़ा विरोधी है। इन संस्थानों में दलितों द्वारा की जा रही आत्म-हत्याओं के मद्देनजर जो कमेटी बनायी गई थी उसके प्रावधानों और सुझावों को डस्टबिन में डाल दिया गया। प्रो. सुखदेव थोराट के नेतृत्व में २००७ में इस कमेटी का गठन हुआ। इसने पाया (५ मई २००७) कि इन महान संस्थाओं  में पढ़ने वाले दलित/आदिवासी छात्रों का हर स्तर पर शोषण और सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। लगभग 88 प्रतिशत छात्रों ने शिकायत थी कि यहां के प्रोफेसर उन्हें उतने मार्क्स नहीं दे रहे हैं जितनी उनकी योग्यता है। ८४ प्रतिशत छात्रों ने कहा कि प्रोफेसर ने उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि पूछी। जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उनके अकादमिक कैरियर पर असर पड़ा। जातिवादी रवैया और दृष्टिकोण छात्रों के मानसिक तनाव का कारण तो रहता ही है।

लगभग हर संस्थान से यह शिकायत होती है कि सवर्ण प्रोफेसर और प्रशासन दलितों के प्रति हमेशा बायस्ड रहता है। प्रैक्टिकल में कम नम्बर, फेलोशिप रोकना या न देना, रिसर्च टॉपिक चुनने में सुपरवाइजर की मनमानी हमेशा से दलितों के लिए एक बड़ी बाधा बनती है| शायद, इन्हीं सब अनियमितताओं को देखकर गांधीवादी विद्वान अशीष नंदी ने तर्क दिया होगा कि इस देश के सवर्ण प्रोफेसर अकादामिक करप्शन करते हैं। इसमें वे अपने लोगों को फेलोशिप, प्रोजेक्ट दिलवाते हैं, और विदेश भ्रमण करने-कराने में एक दूसरे की मदद करते हैं।
देश के सबसे लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय के लिए विख्यात दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भी इससे अछूता नही है। मामला चाहे डायरेक्ट पी.एच.डी. प्रवेश या एम.फिल. के साक्षात्कार में दिए गए नम्बरो का हो वहां जातिगत और साम्प्रदायिक भेदभाव किया जाता है। फैकल्टी और विद्यार्थी आरक्षण, दोनों ही स्तरों पर विश्वविद्यालय प्रशासन संविधान की अवहेलना करता है। इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि देश के अन्य विश्वविद्यालयों का क्या हाल होगा?

राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग  ( लिंक पर क्लिक कर अपना हस्ताक्षर दें )

राजनीतिशास्त्र-विद्वान, गोपाल गुरू का मानना है कि दलित शोध-छात्रों को अधिकांश दलित सुपरवाइजर दिए जाते हैं जिससे शोधार्थी और प्राध्यापक का उतना अकादमिक लाभ नहीं हो पाता है जो वो दूसरे बैकग्राउंड के होने से ले सकते थे। समाजशास्त्री विवेक कुमार का मानना है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम वंचित समाज के यथार्थ और इतिहास से नहीं जुड़ता। यह पाठ्यक्रम इन तबकों के समाज, संस्कृति और इतिहास के खिलाफ भी है। यही कारण है कि इन समाजों से आने वाले छात्र इस पाठ्यक्रम विशेष में रूचि नहीं लेते हैं।
दलित साहित्यकारों द्वारा लिखे गए लेख, कहानी, आत्मकथा इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि किस तरह से दलितों को विद्यालय में प्रवेश मुश्किल से मिलता था। उनके लिए कक्षा में बैठने का स्थान अंतिम पंक्ति या दरवाजे के बाहर नियुक्त था। इन मेधावी छात्रों को जाति के नाम पर फेल तक किया गया। सवर्ण छात्र और अध्यापक इन्हें मारते-पीटते थे, जातिगत सम्बोधन आम बात थी। किताबें पानी में फेंकना, पीने का पानी दूर रखना जातिगत भेदभाव को दर्शाते हैं। उनसे स्कूलों की सफाई करवाई जाती थी। इन छात्रों के नाम स्कूल में दर्ज तो होते थे पर वह वास्तव में किताबी शिक्षा से दूर रखे जाते थे।

उपर्युक्त सब कारणों से दलित और आरक्षित तबके के विद्यार्थी अवसाद और अकेलेपन का शिकार बनते हैं। मानसिक तनाव उनके कैरियर और जिंदगी के लिए घातक होता है। अगर कोई छात्र रोहित जैसा है जो इस व्यवस्था की सडांध को समझ जाता है तो वह प्रशासन, पुलिस, और शासक-वर्ग का टारगेट बनता है। रोहित और उस जैसे अनेक एकलव्य रोज इसी सड़ी हुई, जातिवादी व्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।

लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध-छात्र हैं

रूपाली सिन्हा की कविताएं

रूपाली सिन्हा

त्रिलोचन की कविता पर पी एच डी । स्त्री मुक्ति संगठन के साथ जुडी हैं। अध्यापन और स्वतंत्र लेखन । कविताएँ और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित।
संपर्क : ई मेल-rssinharoopali@gmail.com

प्रतीक्षा
चलना होगा कितना और
कितनी यात्रा बची है अभी
न जाने कितने मोड़ पार करने हैं अभी
कितनी चढ़ाइयां चढ़नी होंगीं
कितने ढलानों से उतरना होगा
संभल-संभल कर
कितनी धाराएं करनी होंगी पार
बस तैरकर ही
नहीं होगी कोई डोंगी भी
कितनी घाटियों से गुजरना होगा चुपचाप
कितनी शामें बितानी होंगीं उदास
कितनी रातें अँधेरी और दिन उजले
बिना किसी रंग के
करुँगी मैं यात्रा कर रही हूँ
भटकूंगी नहीं रुकूँगी नहीं
क्योकि इस यात्रा के अंतिम पड़ाव पर
खड़ी है मेरी ज़िन्दगी
मेरी प्रतीक्षा में।

परिचय 

एक 


मैं पेड़ नहीं
जो खड़ी रहूँ एक ही जगह
आज्ञाकारी बनकर
तुम जब-तब डाल दो पानी खाद
अपनी मर्ज़ी से
जड़ों से बंधी हुई निःशब्द
छाया और फल देती रहूँ
सहती रहूँ मौसम की मार
और जब ढल जाऊँ
हो जाऊँ चुपचाप निढाल।

साभार गूगल

दो
मैं दीवार नहीं
जिसके सिर्फ कान हों
जो अभिशप्त हो मौन रहने को
ताउम्र
मेरे पास भी हैं सभी इन्द्रियाँ
और जानती हूँ
इनका इस्तेमाल भी।

तीन
मैं चौखट नहीं दरवाज़े की
जिसे जब चाहो लाँघकर
आ जाओ अंदर और
निकल जाओ बाहर
मैं मौन खड़ी रहूँ
मान-मर्यादा की प्रतीक बनकर।

अस्वीकार 

मैं देना चाहती थी चाँदनी
ढेर सारी उपहार में
अँधेरे के आदी तुम
ले ही न सके
कैसे सहते इतनी रौशनी इतना उजाला
तुमने सबकुछ पाया-चाहा
अँधेरे में रखकर मुझे
मैं चाहती रही सबकुछ धवल
पारदर्शी कांच सा
तुम ढकते रहे अपना सच
फरेब की काली चादर के नीचे
जब-जब तुम्हारे अँधेरे पर
मेरे सच का प्रश्नचिन्ह लगा
तुम हो उठे बेकल,असहज और
कभी-कभी हिंसक भी
मैंने तो देनी चाही थी
अपने जीवन भर की रौशनी
पर जैसा कि अक्सर होता है
अँधेरा बहुत कुछ आसान कर देता है
जबकि रौशनी में रहना
हमेशा ही चुनौतियों भरा होता है
अँधेरे में रहने के फायदे और भी बहुत हैं
रौशनी में कहाँ है मुमकिन ऐसा
तुम्हे मुबारक हो तुम्हारा अँधेरा
मैं अपनी रौशनी के साथ
बेफिक्र और मुक्त हूँ।

प्रतीक्षा 

तुम्हारा प्यार
समुद्र की उफनती वेगवती लहर है
तेज़ी से आकर कर देती है मुझे सराबोर
सर से पाँव तक
विस्मित-चकित मैं जब तक कुछ सोचूँ
लौट चुकी होती है उसी गति से
तट पर नहीं छोड़ती कोई भी निशान
हर बार
छोड़ती है मेरे दिल पर पहले से गहरा
कई बार सोचा बह चलूँ
मैं भी उसके साथ
खो जाऊँ उसके अंतस्थल में
लेकिन मेरा वजूद
मिटने से इनकार कर देता है
वैसे क्या बुरा है तट पर खड़े-खड़े ही सराबोर होना?
मैं खड़ी हूँ प्रतीक्षा में
अगली लहर के आने की।

राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग

आइये रोहित वेमुला के लिए न्याय की मांग करते हुए राष्ट्रपति से जातिवादी हत्यारों के खिलाफ कारवाई की मांग करें . आपके हस्ताक्षर के लिए अपना नाम कमेन्ट में लिखें , अपना समर्थन दें.
प्रति,
राष्ट्रपति
और विजिटर केन्द्रीय विश्वविद्यालय

मान्यवर 
हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय का  शोध छात्र रोहित वेमुला ‘ सायंस टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी स्टडीज’ में पी एच डी कर रहा था. उसने रविवार 17 जनवरी , 2016 को विश्वविद्यालय के जातिवादी बर्ताव से तंग आकर आत्महत्या कर ली .

बाबा साहेब डा. आम्बेडकर की तस्वीर लिए रोहित वेमुला

आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर के रहने वाले इस छात्र के साथ -साथ 5 विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय ने 12 दिन पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता के साथ मारपीट के आरोप में निकाल दिया . इसके पहले एक केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के एक पत्र की सिफारिश के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबीन इरानी  ने इन विद्यार्थियों पर कारवाई के लिए विश्वविद्यालय को चार बार पत्र लिखे. सिफारिश पत्र में विद्यार्थियों पर जातिवादी , देशद्रोही गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था. अपनी राजनीतिक विचारधारा के छात्र संगठन के समर्थन में और अपने मंत्री के सिफारिशी पत्र पर मानव संसाधन विकास मंत्री ने अतिरिक्त रुचि दिखलाई और विश्वविद्यालय को इन विद्यार्थियों पर कारवाई के लिए बार -बार पत्र लिखे.

शैक्षणिक संस्थाओं में जातिवाद और द्वेष भावनाओं का पूरा वातवरण है , जिसकी वजह से  दलित – मुस्लिम , आदिवासी , ओ बी सी आदि बहुजन विद्यार्थियों का जीवन मुश्किलों से भर जाता है. इन दिनों यह स्थिति और भी बढ़ी है . केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में दलित – पिछड़े आदि बहुजन विद्यार्थियों  की अपनी  सांस्कृतिक विरासत की गतिविधियों को ‘जातिवाद’ मानने और सिद्ध करने का चलन बढ़ा है . आई आई टी चेन्नई से लेकर हैदराबाद तक की घटनाएँ इसी चलन के नतीजे हैं .

एक ओर सरकारें बाबा साहब डा. आम्बेडकर की विरासत को लेकर संवेदनशील होने का दिखावा कर रही हैं , दूसरी ओर उनके विचारों पर सोचने -समझने वाले विद्यार्थियों पर प्रशासन और शासक समूहों की राजनीतिक जमातों का कहर टूट रहा है .

वह चिट्ठी जिसने रोहित और अन्य विद्यार्थियों
के खिलाफ कारवाई के लिए उकसाया

रोहित वेमुला पर की गई कारवाई जातीय विद्वेष की कारवाई थी, जिससे हताश रोहित ने आत्महत्या कर ली.
सवाल है कि फुले, आम्बेडकर , पेरियार  से जुड़े विद्यार्थी इस समय  सुरक्षित क्यों नहीं है?रोहित वेमुला का लिखा पहला और अंतिम पत्र आपसे न्याय की मॉंग करता है, हम सब आपसे निष्पक्ष और तटस्थ जॉंच की मांग करते है।

हम रोहित वेमुला को  आत्म हत्या के लिए बाध्य होने पर मजबूर करने वाली परिस्थिति निर्मित करने वालों के नाम उजागर करते हुए उन्हें दंड देने की मॉंग करते हैं, और उसके जिम्मेवार लोगों पर अनुसूचित -जाति , जनजाति एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा के तहत मुकदमा दर्ज करने के निर्देश की मांग करते हैं, जिसके लिए  मानव संसाधन विकास मंत्री की भूमिका को भी जांच के दायरे में लाया जाये.
निवेदन है कि उच्च  शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के साथ जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए सुझाव देने हेतु  एक समिति बनाने का निर्देश दिया जाय .

केन्द्रीय विश्वविद्यालय के विजिटर होने के  नाते आप से अनुरोध है कि दोषी कुलपति को तत्काल बर्खास्त कर उसपर मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दें .
निवेदक :
हेमलता माहिश्वर, लेखिका
नूतन मालवी , सत्यशोधक महिला प्रबोधिनी
अमरदीप भरने, विद्यार्थी
आश्विनी जुमड़े,विद्यार्थी
नीरज ताक्शांडे, सामाजिक कार्यकर्ता
सुनील कालोकार , सामाजिक कार्यकर्ता
अविनाश काकडे , सामाजिक कार्यकर्ता
प्रशील मेश्राम , सामाजिक कार्यकर्ता
अशोक काम्बले , सामाजिक कार्यकर्ता
नंदकुमार धाबार्डे, सामाजिक कार्यकर्ता
राजीव कुमार सुमन , सम्पादक स्त्रीकाल
संजीव चंदन, सम्पादक स्त्रीकाल
एडवोकेट नीलिमा ताक्शांडे, सामाजिक कार्यकर्ता
उत्कर्ष खोब्रागडे , सामाजिक कार्यकर्ता
संदीप भगत, सामाजिक कार्यकर्ता
डाक्टर बुटले, अंधश्रद्धा निर्मूलन
मयूर डफड़े, सामाजिक कार्यकर्ता
एडवोकेट कपिल गोडघाटे, सामाजिक कार्यकर्ता
प्रवीण वानखेड़े , पत्रकार
अनिल रामटेके , सामाजिक कार्यकर्ता
गजानन नेहारे , सामाजिक कार्यकर्ता
फहीम खान
शशिभूषण द्विवेदी
कौशल कुमार
उमेश मीणा
सुरेंद्र कुमार
संध्या सिंह
पूनम कुमारी
अटल तिवारी
विजेंद्र
बृजेशकुमार यादव
सपना सिंह
प्रदीप कुमार सिंह
सिद्धार्थ कलहंस
अनूप आकाश वर्मा
राहुल पवार
फरहत दुर्रानी
गुलजार हुसैन
प्रवीण परिमल
मोहम्मद अनस
ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस
मृत्युंजय प्रभाकर
मंजू शर्मा
दिनेश राय द्विवेदी
नरेन्द्र भारती
नीरज कुमार सिंह
जनविजय
सत्यवीर सिंह
सूर्य नारायण
विक्रम कुमार
पलाश विश्वास
मंतोष कुमार
स्मिता मुग्धा
राजू वानखेड़े
कुमार पियूष
राम सागर
सौरव कुमार आयुष डी वी
जितेन्द्र नारायण
धर्मेन्द्र वर्मा
डा .अल्पना सिंह
राजेश उत्साही
योगेश योगेश्वर
मोहन श्रोत्रीय
शुभा शुभा
रविभूषण पाठक
वसीम अहमद
लालिमा करनजीत
नजमुल हुडा सैनी
मिथिलेश शरण चौबे
संज्ञा उपाध्याय
साकेत बिहारी
नरेन्द्र शर्मा
मुकेश तिवारी
दिलीप दुबे
यशराज धनवंतरी
मधु कांकरिया
मुकेश कुमार वरके
अरविन्द कुमार रावत
नीलाम्बुज
कृष्ण कुमार मणि
आमोद शास्त्री
कुलतार पुनिया
अनिश कुमार
शेषनाथ पाण्डेय
मासूम खान
गीता कुमारी
काशिफ नून सिद्दकी
कुंवर प्रतीक
संजय चौधरी
कैलाश चन्द्र चौहान
पुष्कर थर्मत
क्रान्ति कटके
जय प्रकाश
अभिमन्यु
अरुण माहेश्वरी
सरला माहेश्वरी
रविकांत
उर्मिलेश
मनोज कुमार
संतोष यादव

रंगभेदी और स्त्री-विरोधी सोच

नवीन रमण 


(फेसबुक पर सक्रिय नवीन रमण लागातार अपनी संवेदनशील टिपण्णी से  एक  हस्तक्षेप करते हैं . हरियाणा की खाप पंचायती मनोवृत्ति पर इनके असरकारी पोस्ट ध्यान खींचते रहते हैं . खाप-मानसिकता  को बेचैन करने वाले इनके प्रेम -विषयक पोस्ट भी उल्लेखनीय होते हैं . फेसबुक पर वायरल एक जोड़े की तस्वीर के बहाने नवीन बहुत जरूरी सवाल उठा रहे हैं . )


फोटो ने आपको भी डंस लिया क्या ? इस शीर्षक से मैंने यह पोस्ट फेसबुक पर लिखी और खूब सारे लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं शेयर की ।

आग की तरह फैला देने वाले गिरोह की तर्ज पर यह फोटो अजीबो-गरीब कैप्सन के साथ फेसबुक पर वायरल हो रही है । पता नहीं फोटो असली फोटो है या फोटोशॉप ।अलग-अलग कैप्सन पर वायरल होती हुई फोटो को देखकर मन में कईं सवाल सिर उठाने लगें। एक-से-एक स्त्री पक्षधर को लाइक करते देखा तो सवाल के साथ चिंता भी गहराने लगी। जिस पुरुष-मानसिकता और पितृसत्तावादी ब्राह्मणवाद से हम लगातार जूझ रहे हैं। वह अथक प्रयासों के बावजूद किसी न किसी रास्ते से बाहर निकल ही जाता है। इस पर लगातार संवाद की जरूरत है,इस संवाद के तहत ही यह पोस्ट लिखी गई है । ताकि एक बराबरी के समाज के सपने की तरफ कदम बढ़ाया जा सके:

इस फोटो को देखकर क्या आपके शरीर पर सांप लोट-पोट होने लगे है ? किसी को क्यों और क्या दिक्कत हो सकती है इस फोटो से ?यह मेरी जिज्ञासा का कारण है ।कारण कुंठा तो है ही । दूसरा रंगभेद भी है । तीसरा कारण क्या हो सकता है ?यह अरेंज मैरिज है या लव मैरिज ? यह जोड़ा दक्षिण भारतीय भी तो हो सकता है ?अगर लड़की को अपना हमसफ़र पसन्द है तो हम सब कौन होते है बकवास करने वाले ? दूसरा लड़की ने मजबूरी में यह शादी की है, तो उसकी क्या मजबूरियां रही होंगी ? इस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है ?अपनी कुंठाओं को यूँ सरेआम पब्लिक मत कीजिये । क्या पता कौन आपको अच्छा समझता हो ?आपकी हरकत किसी को बुरी भी लग सकती है ।ज्यादातर ने इस फोटो के साथ वाह रे किस्मत लगाया है । आपकी हरकत आपकी स्त्री के प्रति उपभोग की नजर को उजागर करती है । बचना चाहिए इस तरह की स्त्री-विरोधी और रंगभेदी  टिप्पणियों से । ( इस पोस्ट पर यह फोटो लगाने के लिए माफ़ी । बगैर फोटो के न तो संवाद संभव था और न ही बात को समझाया जा सकता था।)


मेरे अंदर के पुरुष और रंगभेद ने भी पहली नज़र में सिर उठाया था। फोटो को देखते ही जो पहला विचार हमारे मन में कौंधता है,जिसे हम सहज और स्वाभाविक मानते हैं, दरअसल वही है असल बीमारी की जड़। हम सब का पालन-पोषण जिस परिवेश में हुआ है, उसने हमारी इतनी बेहतरीन कंडीशनिंग की है कि हमें स्त्री और रंगभेदी विचार सच जैसा लगने लगता है। और हम उस से टकराने के बजाय आगे बढ़ते चले जाते है।फेसबुक पर जब यह पोस्ट लिखी गई तो अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आईं । जिन्होंने इस विषय को विमर्श का हिस्सा बना दिया । इस तरह की रंगभेदी और स्त्री-विरोधी मानसिकता का विरोध होने के साथ-साथ संवाद भी अपना महत्व रखता है ।
अरविंद शेष के अनुसार-“ सामंती मर्दाना कुंठा और ग़लीज़ रंगभेद के सिवा कोई और बात नहीं है..!”
रीना कोसर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा- “रंगभेद है…मुझे भी(किसी को भी) निसंदेह किसी ‘डार्क स्किन’ वाले से प्रेम हो सकता है  । ‘स्किन’ काली होना सोच और दिल काला होने से बेहतर है  । क्योंकि स्किन का रंग आप ने खुद नहीं तय किया, लेकिन दिल-दिमाग का रंग आप खुद तय करते हैं  ।”
जसवंत ने तंज कसते हुए लिखा- “गर्व करने वाली बात है कि देखो ‘सोसाइटी’ के ‘सोकाल्ड’ उलटे नोर्म तोड़कर, जो सही है वो किया । इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ।”
मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा-“ आपकी बातों से सहमती, पर घुमा फिरा कर वो फोटो तो शेयर हो ही गयी………” उनकी बात का जवाब देते हुए मैंने लिखा-“ फोटो शेयर से ज्यादा दिक्कत उस मंशा से है, जिसके तहत की जाती है और जिस तरह के कैप्सन के साथ की जाती है ।”
विजय कुमार के अनुसार-“ बिलकुल फोटोशॉप है भाई. तथाकथित ‘दूल्हे’ के चेहरे से नहीं लगता की उसकी शादी हो रही है । जिसने फोटोशॉप किया उसकी कुंठा कितनी बड़ी रही होगी..??” पर यहां बात दूसरी हो रही है । लोगों के विचार तो फोटो शॉप नहीं है। बात उनके उन विचारों की हो रही है।

प्रीति सिंह-“ मैं कहती हूँ असली नहीं हो फ़ोटोशोपड हो फिर भी ना जाने कितने लोग असल जीवन में इसे जी रहे होंगे और ख़ुश होंगे! इसका visa – versa भी होता है,ये अपनी choice है ! मैंने भी इसे Fb पे घूमते टहलते देखा और बड़ी हैरानी हुई लोगों के कामेंट्स देखकर, कितने कुंठित समाज में जी रहें हैं हम!”
जितेंद्र पुनिया-“जो भी हो पर मुझे ये दिन में 2 -3 देखनी पड़ रही है आजकल । बोलते है ” अब तो मानता है ना किस्मत को “”
मिनाक्षी शर्मा-“मेरी एक मित्र है जो डॉ है और पति उसका इंजिनियर सेम यही जोड़ी जेसी है मतलब रंग से है मगर लव मेरिज है उनकी और बहुत खुश है वो ।”
मिर्जा फैसल बेग- यार, इन्सान की फितरत में जलन होती है। और इस मामले में तो……peak point।
विक्रम गोहर राणा–COMPLEXION के नज़रिये से बेमेल जोडा हो सकता है पर , सफल वैवाहिक जीवन के लिये किसी शंका का कारण नहीं बनता |
मनीषा सिंह जादौन’निर्गुण’ -इस तरह के टुच्चे मजाक सिर्फ और सिर्फ आपका कमजोर दिमाग दिखाते हैं !
प्योली स्वातिजा- यहाँ हुए कमेंट्स से भी यही लग रहा है कि लोग उपनिवेशवादी सौंदर्यशास्त्र से पीड़ित हैं। “तन काला हो तो चलेगा, मन काला नहीं होना चाहिए”। ‘चलेगा’ का क्या मतलब है भाई! हम भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी मूलतः साँवले ही होते हैं और उसी में हमारी सुंदरता है। ब्लैक इस ब्यूटीफुल! ये मन काला होना, काले कानून, काला दिन आदि नकारात्मकता दर्शाने के लिए कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे?
कुमार निर्वेश- काला मन शायद सिर्फ एक नेगेटिविटी दर्शाने मात्र इस्तेमाल किया गया शब्द है
ना की काले रंग को ही प्रकृति से बाहर बताने की कोशिश है…
विक्रम दहिया- मेरे पास भी आया था ये फोटो। नीचे लिखा था कि
‘घोड़े को नही मिल रही घास और गधा खाये चयवनप्राश’
गौरव वर्मा- माफ़ करना दोस्त इस रोग से हम भी ग्रस्त हैं।
लक्ष्य रोहिला-रंग से कुछ पता नहीं चलता की कौन क्या है ?
निर्भय अतुल-प्यार करने के लिए सुरत नहीं मुहरत अच्छी होनी चाहिए ।
संदीप तोमर -सामान्य बात है। इसमें क्या अजूबा है?
निष्ठा -मैंने भी देखा इसे। हमारे देश में रंग को लेकर एकदम पागलपन है। बहुत बुरा लगता है फ़ोटो पर घटिया कैप्शन। लेकिन अधिकतर लोगों के लिए रंग को लेकर घटिया कमेंट करना मजाक उड़ाना बेहद सामान्य है।
सुनील पागल- जब कोई सामान्य रंग भारतीय का व्यक्ति किसी गोरी मेम से विवाह करता है तो क्या विदेशों में भी इसी तरह के घटिया कमेंट होते हैं क्या । ओह! हमारी मानसिकता ।
जगमोहन नेगी- ठीक “तारक मेहता का उलटा चश्मा,” बबीता और अय्यर जैसे।
दिनेशराय द्विवेदी -बरसों पहले की बात है। जयपुर रेलवे स्टेशन पर मैं एक मित्र के साथ था। मित्र का रंग ऐसा ही था जैसा कि इस दूल्हे का है। तभी एक जोड़ा निकला। लड़की नीग्रो थी, बला की सुंदर और सुगठित बदन वाली, बस चमड़ी का रंग एक दम कोयले की माफिक। उस का साथी बिलकुल जर्मन गोरे…
जगमोहन नेगी- इंसान की पहिचान सूरत से नहीं सीरत से होनी चाहिए।

जैसा कैप्सन,वैसा कमेंट्स यह हर तरह की पोस्टों के साथ होने वाला आमचलन है।मैं इस संवाद को विमर्श के केंद्र में ले जाकर छोड़ रहा हूं,ताकि इसके विभिन्न पहलुओं पर बेहतर तरीके संवाद संभव हो सकें।मंजिल पर पहुंचने से पहले रास्तों पर भी आपसी मुलाकात और मुठभेड़ जरूरी है।

एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

मंजरी श्रीवास्तव

युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ‘ एक बार फिर नाचो न इजाडोरा’ बहुचर्चित रही है
संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com

विश्व के महान व्यक्तित्वों (ख़लील जिब्रान, ग़ालिब, मीर, रूमी, इक़बाल, पाब्लो नेरुदा, इज़ाडोरा) के जीवन और विचारों को भारत के समकालीन परिप्रेक्ष्य में स्थापित करते हुए लिखी गई कविताओं की वज़ह से २००९ में चर्चा में आईं युवा कवयित्री मंजरी को उनकी इस कविता ने हिंदी साहित्य के ऐसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में स्थापित कर दिया जिसके पास पूरे विश्व साहित्य, संगीत, थिएटर और अन्य कलाओं की सूक्ष्म और महीन समझ है . 



इस कविता में मंजरी इज़ाडोरा के जीवन से तथ्यों को उठाती हैं, उनके समय से समकालीन भारत को संबद्ध करती हैं और अपनी बात कहती हैं जिसमें वे पूरा विश्व समेट लेती हैं. इस एक कविता के बाद  मंजरी लिखना बंद कर दें तो भी साहित्य जगत उन्हें  अनदेखा नहीं कर सकता है. 


यह बहुचर्चित लम्बी कविता तब लिखी गई थी जब भारत में दिल्ली से लेकर मुंबई के ताज तक में आतंकी हमले हो रहे थे और हैदराबाद और बेंगलुरु में बम विस्फ़ोट हुआ था. सबसे पहले २०१० में इस कविता को ‘अनभै साँचा’ पत्रिका में वरिष्ठ लेखक चंचल चौहान की विस्तृत टिप्पणी के साथ जगह मिली. फिर २०११ में यह एक पुस्तिका के रूप में आई, जिसका साहित्यिक जगत में व्यापक स्वागत हुआ. 



कवयित्री के नोट्स 

यह मेरे लिए सिर्फ़ कविता नहीं, सिर्फ़ प्रोडक्शन भी नहीं...विश्व शान्ति की स्थापना का मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है. अगर मेरे जीते जी मेरा यह ख्व़ाब पूरा न भी हुआ तो ग़म नहीं, मेरी इज़ाडोरा नाचेगी, मेरे मरने के बाद भी….और तब तक नाचती रहेगी जबतक विश्व में शांति क़ायम करने की ज़रूरत महसूस होती रहेगी.
यह कविता प्यारी बेटी आरोही (जिया) को उसके पहले जन्मदिन पर


एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा

इस कविता की प्रस्तुति तैयार कर रही पंखुड़ी श्रीवास्तव


मैं सोच ही रही थी कि

इस पेचीदा वक़्त में गुज़ारिश करूं तुमसे
एक बार फिर धरती पर आने की
पर इसके पहले ही न जाने कब
तुम समा गयी मेरे भीतर
विशुद्ध कायनात की पैदाइश बनकर
तुम्हारे साथ चला आया पूरा समंदर मेरे अन्दर
एफ्रोदिती (एक तारे का नाम) बनकर चमक उठी मैं तुम्हारी ही तरह
समंदर की मौजें बनकर नाच उठा
तुम्हारा स्वतंत्र निरंकुश बचपन मुझमें, मेरे गीतों, मेरी शायरी में
मेरे हर नृत्य और अंग संचालन में आ गया खुद ही
अंगड़ाई लेता
एक उमड़ता-घुमड़ता समंदर

तुम्हारी ज़िंदगी और कला
जो दोनों निकली थीं समंदर से रत्न बनकर
चली आयी है धीरे-धीरे मेरे भीतर
और मैंने भी सबसे ज़्यादा रोमांटिक समंदर अपने अंदर समेटकर
दरकिनार कर दिया है भावुकता जैसी बकवास चीज़ को तुम्हारी ही तरह
और थिरक उठी हूँ
आँखों में आग-से सुलगते एक हसीन जज़्बे के साथ
बीथोवेन, शुमाँ, शुबर्ट, मोज़ार्ट, शोपेन के गीत-संगीत पर
और शेक्सपियर, शेली, कीट्स या बर्न्स से लेकर
उमर ख़य्याम और महमूद दरवेश तक की कविताओं पर.

तुम्हारी ही तरह
मेरे जितने रिश्ते दिल के बने हैं
उतने ही दिमाग़ के भी
प्रेम-भूमि की सरहदों पर ये मेरे कुछ युवा अनुभव हैं
जहाँ कभी मैं अपने पहले एकतरफा प्रेम की बांहों में
वैसे ही तैरती-सी चली जा रही हूँ
जैसे कभी बहती रही थी तुम अपने पहले एकतरफा प्रेम
वर्नोन (इज़ाडोरा का प्रेमी) की बाहों में
फिर न जाने कब तुम खिंची चली गयी एथलबर्ट नेबिन (इज़ाडोरा का प्रेमी)
के संगीत की तरफ
उसकी धुन, उसका ख़याल, उसकी कल्पना बनकर
उन्हीं दिनों तुमने उतारा अपने आप को
अपने नृत्य को
एक नयी मार्मिक जागृति में
आज फिर ज़रुरत पड़ गई है उसी जागृति की
जब जेहाद के नाम पर, धर्म के नाम पर
लोगों में ज़हर भरा जा रहा है
मिसाइल की सौग़ातें आनेवाली पीढ़ियों को दी जा रही हैं
तुम मुझमें पैदा कर दो न वही अंग-संचालन
वही नयी मार्मिक जागृति.

तुमने कभी नहीं किया किसी म्यूजिक हॉल में भरी
बुर्जुआ भीड़ का सस्ता मनोरंजन
तुमने उजागर किया शरीर की अभिव्यक्तियों और गतियों द्वारा
मानवीय शरीर के सौंदर्य और महानता को
और उस मुक्ति आकांक्षा को जो
तुम्हारे लिए थी ज़िन्दगी,
एक विशुद्ध संगीतात्मक और रोमानी चीज़
तुम्हारे लिए कभी महत्व नहीं रहा
प्रेम की शारीरिक प्रतिक्रियाओं का
यूज़ी केरी (इज़ाडोरा का प्रेमी) ने दिया तुम्हें तुम्हारा
अलौकिक अनुपम आध्यात्मिक चित्र
तुमने तैयार किया ‘डांस ऑफ़ द फ़्यूचर’
बोतिसिली की ‘प्रिमाविरा’ पर
जो भरा था जीवन की महानता और चरम आनंद से
मानवता के लिए प्रेम के सन्देश से
फिर से करो न तैयार
कोई नया ‘डांस ऑफ़ द फ़्यूचर’
जो सराबोर हो सिर्फ़ प्रेम से
उसमें कोई जगह न हो युद्ध के लिए
फिर से छुओ न तुम अपने नृत्य से
ज़िन्दगी के एक बहुत ख़ूबसूरत अद्भुत आनंद भरे क्षण को
अलौकिक अनिर्वचनीय प्रेम के साथ.

हेनरिख थोड (इज़ाडोरा का प्रेमी)
जिसकी आँखों में डूबकर आसमान से भी परे
न जाने किस दुनिया में पहुँच जाती थी तुम
उसके प्रेम के अलौकिक हर्ष की प्रबल अनुभूति के साथ
घूमती रहती थी तुम उसी में
अपनी मदहोशी, आहों, सिसकियों और
आनंद के उस चरम बिंदु से घिरी
जिसकी अनुभूति शारीरिक सुख की क्षणिक घड़ियों में होती है.
भावनाओं का यह चरम आनंद कब तुम्हें
निष्प्राण-सा कर डालता और कब
नज़रें तुम्हें जिंदा कर डालतीं
तुम्हें पता ही न चल पाता था
तुम्हारी आत्मा पर उसने कर डाला था इतना अधिकार
कि उसकी आँखों में डूबकर मर जाने का जी होता था तुम्हारा
यह प्रेम कभी भी तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पाया
बनी रही हमेशा एक मीठी, नशीली प्यास
जिसे सिर्फ़ संगीत ही बुझा पाता था.
प्रेम का यह गहरा नशा तोड़ डालता था संगीत
और देता था तुम्हें असीम राहत
पर कुछ देर बाद फिर तुम डूब जाती थी
थोड के विनाशकारी मगर अतिमानवीय प्रेम में
तुम्हारी आत्मा बन गई थी एक युद्धक्षेत्र
जहाँ युद्ध छिड़ा रहता था अपोला, डायोनिसस, क्राइस्ट, नीत्शे और रिचर्ड वाग्नर के बीच
पर, एक लयात्मक आनंद बनकर संगीत
बहाकर ले जाता था अनिर्वचनीय आनंद की ओर तुम्हें
इसके पहले एथेंस बनकर आया था तुम्हारी ज़िन्दगी का सौंदर्य
और उतार डाला था तुमने पुराने जीवन को
एक लिबास की तरह
अब तुम्हारे लिए गौण हो गया
किसी नए प्रेमी की बांहों में समाना
और दिलचस्प और ज़रूरी हो गया था बौद्धिक प्रश्नों के गलियारे में
हर्मन बोहर (इज़ाडोरा का प्रेमी) के साथ घूम आना
पर जल्द ही तुम्हारा यह अलौकिक प्रेम
बदल गया पीड़ा में
और तुम्हारे दिन तब्दील हो गए
ज़हर-सी डंसती प्रेम-पीड़ा के दिनों में
अर्नेस्ट हेकल (इज़ाडोरा का प्रेमी) के साथ
पर तुम ज़रा भी नहीं बदली
यह तुम ही तो थी
एक भविष्य की स्त्री
सभ्य और विद्वान पुरुषों से लड़ती हुई, थकी हुई.
मैं भी हूँ तुम्हारा ही प्रतिरूप
मैं भी हूँ एक आधुनिक भविष्य की स्त्री
लड़ रही हूँ इस पुरुषसत्तात्मक समाज से
तुम्हारी ही दी हुई शक्ति और हिम्मत के साथ.

तुम वापस लौटने के सपने देखने लगी
हेनरिख की ठंढी बांहों में
कूद पड़ी उसके बर्फ़ीले अस्तित्व में
जम गया तुम्हारा नग्न शरीर
और उतर गई तुम्हारी पूरी थकन
जा पहुँची तुम पीटर्सबर्ग की सर्द हवाओं में
पर घिर गई एक काले लम्बे कफ़न के जुलूस में
तुम्हारी आँखों ने देखा दहला देनेवाला मंज़र
दौड़ गई तुम्हारी आँखों में उदासी और रगों में सिहरन
जीने के लिए, रोटी के लिए, मारे गए मज़दूरों के बीच
मौन सिसक रही थी तुम
पर कोई नहीं था वहां तुम्हारी सिसकियों का मूक गीत सुननेवाला
तुम गा रही थी क्रांति का मौन गीत भीगी पलकों से
देखते हुए उस उदास और अनंत लम्बे जुलूस को
लेकिन उसी समय तुम्हारे अन्दर का एक और जीवन
दे रहा था जीवन के संगीत को लयात्मकता
थिरकने लगी थी तुम अचानक
एक असीम अनंत आनंद के साथ
रोज़ नोर्डविक से केडविक तक समंदर किनारे
करने लगी थी अठखेलियाँ रेत पर
और उचककर छू लेना चाहती थी आसमान
पर यहाँ भी थी तुम बिल्कुल अकेली
समंदर, रेत के टीलों और अपने आनेवाले अधीर बच्चे के साथ
पर समंदर हमेशा से देता आया था तुम्हें
असीम शक्ति, ऊर्जा और
कभी-कभी समुद्री तूफ़ानी हवा
स्याह आकाश के साथ
विचलित भी करते रहे थे तुम्हें वे
समुद्री तूफ़ानी थपेड़े
समुद्री सुनामी
पर इस तूफ़ान में भी तुम
कोशिश करती रहती थी अपने बच्चे को
अपना संदेश देने की
हर रात
अपने पेट के उभार को हाथ से छूकर.

मैं भी जब घूमने निकलती हूँ
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
तो न तो पैर टिक पाते हैं
कश्मीर की बर्फ़ीली हसीन वादियों में
न ही आँखें देख पाती हैं
पानी से निकलते और डूबते सूरज को
अपनी जींस मोड़कर नंगे पाँव किसी का हाथ थामे
समंदर के रेत मिले पानी के छींटों और फ़ुहारों के रूमानी स्पर्श से पहले ही
न जाने कौन-सी अदृश्य शक्ति ला पटकती है मुझे
हैदराबाद, बैंगलोर, दिल्ली और मुंबई के ताज के पास
जहाँ मैं चारों तरफ़ घिर जाती हूँ लाशों से
चीथड़ों से, ख़ून के फ़व्वारों से
आँखें अचानक देखने लगती हैं एक ख़ूनी मंज़र
ग्लेशियर पिघल-पिघलकर
एक ख़ूनी लाल नदी में बदलने लगते हैं
और अपनी पूरी रवानी के साथ समंदर को भी
करने लगते हैं लाल
ताज के किनारे, समंदर के पास
पत्थरों पर वासु-सपना और न जाने
मोहब्बत की लिखी कितनी सारी इबारतें
शामिल हो उठती हैं मेरी रूमानियत में
मौन सिसकियाँ बनकर
पर कोई नहीं है वहां मेरी सिसकियाँ, मेरा मौन सुननेवाला
सिवाय पत्थरों और पानी के.
मेरी सिसकियाँ लौट जाती हैं मुझसे ही टकराकर
मेरी पलकें भींगती रहती हैं क्रांति के लिए
किसी गीत की खोज करती हुई
समंदर की लहरों में से
उनके गर्जन से
मैं पा भी चुकी हूँ एकाध क्रांति-गीत
असीम अनंत आनंद से
जीवन की लयात्मकता से जुड़ा
पर इसी बीच मेरी भीगी पलकें ले आती हैं एक सुनामी
और मैं वापस रह जाती हूँ अकेली
सुनामी के बाद की तबाही को देखने के लिए.
ताज में मारे गए किसी विदेशी माँ-बाप के बच्चे की चीत्कार को सुनती हूँ
तो लगता है कि तूफ़ान के बाद की तबाही के बाद
नए जीवन के संचार के लिए बजाई है किसी ने
देसी तुरही पर विदेशी सिम्फ़नी
किसी ने बजाए हैं फ्यूज़न इस सिम्फ़नी के नोट्स पर
पर इस नवगीत के आगाज़ के बावजूद
नहीं हट पाते हैं सुनामी के बाद कराहते, बिलखते लोग
मेरी निगाहों से
भूखे, नंगे बच्चे दौड़े-भागे चले आ रहे होते हैं मेरी बांहों में
और मैं कोशिश कर रही हूँ हर बच्चे को
प्यार, प्यार का सन्देश देने की
अपने वर्जिन मातृत्व से
अपनी गोद में
मुझमें जाग उठता है वर्जिन मदर मेरी और मदर टेरेसा का मिला-जुला रूप
और यह एक सुखद लम्हा भारी पड़ जाता है
मेरे पूरे दु:खी जीवन पर
और
मैं और ज़्यादा आनंद के साथ
थिरक उठती हूँ इज़ाडोरा
तुम्हारे ही विशुद्ध आनंदमय नृत्य
‘मोमेंट म्यूज़िकल’ पर
जिसे रचा था तुमने ही
एक क्षण के
एक संगीतमय क्षण के आनंद के लिए
यह संगीत पैदा करता था एक नीली-पीली चमकती आभा
जैसे हजारों बच्चियां नीले लिबासों में संतरे के पेड़ों के नीचे
थिरक उठीं हों
एक साथ.

तुम्हारे नृत्यों का एक ही अर्थ था-
एक ही माध्यम था अभिव्यक्ति का
सब कुछ एक नए जीवन को जन्म देता हुआ
प्रेम, स्त्री, सृजन, फलदायिनी पृथ्वी द्वारा.

तुम नाचती रही हमेशा
एक संतरी सूर्योदय व नारंगी सूर्यास्त के साथ
समंदर से लेकर मिस्र के मरुस्थल की सुनहरी रेत पर
होता था तुम्हारे नृत्य का उत्तरार्ध
एक मंदिर के प्रांगण में बीती धूपिया दोपहरिया की तरह
जो कल अपने आनेवाले बच्चे के सपने में खोई हुई हो.
तुम्हारे नृत्य के पूर्वार्द्ध में होती थी
नील के किनारे सरों पर पानी के मटके उठाए
कैटवॉक करती किसान स्त्रियों के कमर की लचक
नाचते हुए तुम बन जाती थी कभी आयरलैंड की प्रेयसी ‘द्रेद्रे’ (इज़ाडोरा की बेटी का नाम भी द्रेद्रे था)
और कभी-कभी ‘दहाबा’
(दहाबा – मिस्र में चलनेवाली एक ऐसी नाव जो यात्री को युग से बहुत पहले या बहुत बाद ले जाने का एहसास कराती है जहाँ बेहद सुकून हो)
जिसमें यात्रा करते हुए दर्शक पहुँच जाते थे
हज़ार दो हज़ार साल किसी बहुत पुराने युग में
सदियों पुराने स्थलों, मंदिरों और खंडहरों में घिरकर
हो जाते थे शक्ति और सुकून से लबरेज़
या हज़ार दो हज़ार साल आगे मुक्त भविष्य में.

तुम्हारे नृत्य के अंत में
एक मद्धिम रोशनी के बीच मंच से वापस जाती
तुम्हारी धूमिल आकृति
लगती थी पुराने मंदिर की धूमिल मूर्तियों की गुड़िया-सी प्यारी
पौ फटने के साथ ही थिरकने लगती थी
तुम्हारी नस-नस यों
जैसे आ रही हो नदी से पानी खींचने की आवाज़ें लगातार
ठहर जाती थी मंत्रमुग्ध-सी सुबह यों
जैसे रुक गए हों…
ठहर गए हों…
नदी तट पर मज़दूरों के क़ाफ़िले
पानी ढोते हुए
खेत सींचते हुए
ऊँट दौडाते हुए
और ये क़ाफ़िले एक-एक कर मंत्रमुग्ध-से देखते रहते थे
तुम्हारी मुद्राएँ शाम ढलने तक.

तुम्हारा नृत्य शुरू होता था सूरज के साथ
रोज़मर्रे की ज़िन्दगी की तरह
और ख़त्म भी हो जाता था वैसे
जैसे रोज़ शाम को ढल जाता है सूरज
और हो जाती है शाम
ख़ूबसूरत चांदनी रातों में पानी पर
जब थिरकती थी तुम ‘दहाबा’ बनी
थिरक उठते थे और फिर गिरते थे
पतवारें चलाते नाविकों के तांबई शरीर
उनके होंठों से निकलते गीतों की धुनों के साथ-साथ
और बज उठते थे असंख्य जलतरंग
सुरमई नदियों में
और मिला जाते थे नदियों के दोनों किनारों को
बड़ा ही महीन करके
मैं भी सोच रही हूँ कि ‘दहाबा’ बन जाऊं
और लोगों को ले जाऊं उस दुनिया में
जहाँ कोई जानता भी न हो नाम
असलहों, मिसाइलों और बमों का.

तुम नाचते-नाचते न जाने कब पहुँच जाती थी
सपनों के उस देश में
जो गरीबों के लिए मेहनत-मज़दूरी का देश होता था
पर यही एक ऐसा अकेला देश था जहाँ मेहनत-मज़दूरी भी ख़ूबसूरत हो सकती थी.
दो वक़्त का सादा भोजन खानेवाला मज़दूर भी
दिखता था यहाँ
हृष्ट-पुष्ट और ख़ूबसूरत
वह खेतों में काम कर रहा हो या
नदी से पानी खींच रहा हो
उसका तांबई, सुडौल शरीर
बन सकता था आनंद का स्रोत
किसी भी मूर्तिकार या चित्रकार के लिए.

तुम उतरती थी मंच पर ऐसे
जैसे किसी शानदार विला की तिरछी छतें
उतरती हों सीधे समंदर पर जाकर
यौवन और आनंद के हिलोरों में झूमती सारी प्रकृति के साथ
जब जल रहा होता था सूरज
तुम उतरती थी नीले समंदर में अपनी पूरी नरमी के साथ
अपनी बाहों में भरे नन्हीं जिंदगियों को लिए
अपने चेहरे पर नन्हे मातृत्व के भाव लिए
तुम उतरती रही बार-बार नीले मेडिटेरेनियन में
समझ नहीं पाई मैं आजतक कि क्या थी तुम…
एक सफल कलाकार,
एक मादक, उत्तेजक, उद्दाम, कामुक प्रेमिका
या वात्सल्य से लबरेज़ एक माँ…?

तुमने कभी तो दिया कला को निरंतर श्रम
और अपना सम्पूर्ण समर्पण
पर कभी अचानक इतना ज़्यादा समर्पित कर दिया
तुमने अपने आप को ज़िन्दगी को
कि हो गई गतिहीन
और बनकर रह गई एक आम औरत
जो प्रेमिका होती है
पत्नी होती है
माँ होती है
पर, वह कलाकार हो ही नहीं सकती
क्योंकि कलाकार होने के लिए पैदा करना होता है
कुछ न कुछ ख़ास अपने आप में
तुम्हें तो पैदा भी नहीं करना पड़ा था
तुम्हें तो यह नैसर्गिक रूप से मिला था
पर, तुम इसकी देख-रेख, इसके पोषण में
कभी-कभार कर देती थी
कहीं-न-कहीं थोड़ी-सी चूक
और बन जाती थी एक सफल कलाकार से
एक आम औरत
औंधे मुंह गिरकर धड़ाम से ज़मीन पर
पर आख़िरकार समझ गई तुम कि
कला मनुष्यों से कहीं ज़्यादा कृतज्ञ साबित होती है
और तब सचमुच तुमने ठाना
अपना पूरा जीवन कला को समर्पित करने का
तुमने समझा कि आम लोगों के लिए भी कला उतनी ही ज़रूरी है
जितनी हवा और रोटी
और तुमने प्राणवायु की तरह लोगों में घोल दी अपनी कला
कला कि इस अलौकिक मदिरा को पीकर
उन्मत्त होकर नाच उठे लोग
मैं भी कोशिश कर रही हूँ प्रेम-मदिरा को प्राणवायु में घोलने की
ताकि इसे पीकर ‘मस्त कबीरा’ बन जाएँ लोग.

अपनी आत्मकथा में एक अध्याय लिखा तुमने
‘आदिम प्रेम के लिए क्षमायाचना सहित’
जिसमें तुमने खोज लिया था कि
‘प्रेम सिर्फ़ त्रासदी ही नहीं, मन बहलाव का माध्यम भी हो सकता है’
इसलिए तुम बढ़ती चली गई इस तरफ
आदिम सहजता के साथ
अब लद गए थे दिन तुम्हारे एक गिलास गर्म दूध के
और ‘क्रिटीक ऑफ़ प्योर रीज़न’ के
अब तुम्हें भाने लगी थी शैम्पेन
मोहक पुरुषों से अपने सौन्दर्य की तारीफ़
चाहत भरे होंठ
लिपटती बाँहें
किसी प्रिय के कंधे पर मीठी आराम देती नींद
अब शरीर बन गया तुम्हारे लिए आनंद प्राप्त करने का एक माध्यम मात्र
अब तुम बांटने लगी
सुन्दर बाँहें और दिमाग़ी पीड़ा भुला देने वाले
गुदगुदे शरीर का स्पर्श
जहाँ एक ओर जिया तुमने ज़िन्दगी को पूरे आनंद से
दी हजारों लोगों को हजारों सुरीली संगीतमय शामें
पर तुम भूली भी नहीं
रूस में
भोर के अधनींदी आँखों से देखे
अपने उस सपने को जिसमें सड़क के दोनों ओर कफ़नों की एक श्रृंखला लिए
दो शवयात्राएं जा रही थीं.
वे साधारण कफ़न न थे, बल्कि बच्चों के कफ़न थे
पर टूटते ही सपना पता चला कि
तुम्हारी आँखों में दूर-दूर तक बर्फ़ थी
बर्फ़ के सिवा कुछ भी नहीं था
चारों ओर बर्फ़ के ऊंचे-नीचे ढेर थे.
बस…उसी शाम तुमने पेश किया
शोपेन की शवयात्रा वाली धुन पर
अपना अलौकिक नृत्य
सफ़ेद फूलों की सुगंध में लिपटकर
फिर तुमने प्रस्तुत किया
घायल विश्व के ज़ख्मों पर मरहम लगाता एक नृत्य
मैं भी सोच रही हूँ कि कुछ ऐसा करूं
कि धमाकों से ध्वस्त होते घायल विश्व के ज़ख्मों पर
रिसते ख़ून पर मरहम लगा सकूं.

सर पर स्कार्फ़ बांधकर जब भी बाहर निकलती थी तुम चांदनी में
तो दिखती थी उस उदास प्रेतनी-सी
जो हाथों में महानतम प्रेम की विशुद्ध अखंड लौ जलाए
चली जा रही होती थी
किसी अनंत यात्रा पर
और त्रासदी का नृत्य टहल रहा होता था
त्रासदी की देवी के साथ ‘सी-बीच’ पर चांदनी रात में
अब तुम उस लौ के साथ समा गई हो मुझमें
और मैं प्रेम की प्रेतनी बनी
हाथों में मोहब्बत की शमां लेकर
निकल पड़ी हूँ दुनिया के तमाम मुल्कों को रोशन करने की ज़िद के साथ
पर फिर भी तुम्हारी ही तरह
ज़िन्दा रखा है मैंने अपने आपको अपनी युवा देह में
पतझड़ की उदास शामों में
पत्तियों की तरह अपने सारे ग़मों को गिराकर ज़मीन पर
नग्न हो उठती हूँ मैं तुम्हारी छाया बनी पेड़ की तरह
अपने नैसर्गिक, आदिम सौन्दर्य के साथ
और सूर्य के समंदर में डूबने और आकाश में चाँद के निकलने तक
जब पहाड़ के संगमरमरी हिस्से पर
पसरती चली जाती थी चांदनी
और तुम सिमटी जाती थी एंजेलो (इज़ाडोरा का प्रेमी) की बांहों में
उसकी सम्पूर्ण इतालवी चाहत के बीच
उसने दी तुम्हें अपनी मित्रता, अपनी प्रशंसा और अपना संगीत
मैं भी थक चुकी हूँ इन धमाकों से, इस विनाश से, इस तबाही से
और इंतज़ार है मुझे अपने ‘एंजेलो’ की बांहों का
ताकि सिमट जाऊं मैं उसके सीने में
अपनी मुक़म्मल हिन्दुस्तानी चाहत और सुकून के साथ.

एथेंस की सड़कों पर दुबारा जी उठती थी
तुम्हारे अन्दर की हजारों साल पुरानी प्रेतात्मा
जब ‘एपियन वे’ पर अपनी बांहें उठाकर
ऊपर फैले विशाल आकाश की ओर
क़ब्र की क़तारों के बीच करती थी तुम एक त्रासद नृत्य
त्रासद आकृति की तरह
जहाँ क़ब्रों की लम्बी क़तारों के बीच फ्रासक्ती से आनेवाली
शराब से लड़ी बैलगाड़ियों और उनके ऊंघते गाड़ीवानों का मंज़र होता था
और लगता था जैसे समय का अस्तित्व समाप्त हो गया है.

पर…अचानक तुम्हें दिखाई पड़ता
रंग-बिरंगी टोपियाँ पहने
चहचहाते परिंदों-से बच्चों का झुण्ड
फिर पतझड़ आता था
अपने सितम्बरी तूफ़ान के साथ
और अचानक तैर जाती थी तुम्हारी आँखों में
एक अजीब-सी दहशत
पहली नवम्बर को
‘डे ऑफ़ द डेड’ के दिन
दो काले और सफ़ेद पत्थरों की वज़ह से बनते
क़ब्रों के अस्तित्व के आभास से
बदल जाती थीं तुम्हारी चाहत की हिलोरें पीड़ा में
और तुम तैर जाती थी अचानक एक गहरे गोते के साथ
मृत्यु के एहसास के बीच
मैं भी जब भी गुज़रती हूँ दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु की सड़कों पर से
देखती हूँ संवेदनशून्य मृतात्माएं
उनकी क़तारों के बीच से गुज़रते हुए
जाग उठती है मेरे अन्दर की प्रेतनी
और ख़ुद-ब-ख़ुद रोशन हो उठती है मोहब्बत की मशाल मेरी आँखों में.
नाच उठती हूँ मैं त्रासदी और चाहत के फ्यूज़न पर
फिर मेरे साथ नाच उठती हैं
मरे हुए प्यारे-प्यारे छोटे बच्चों की आत्माएं
चहकती हुई परिंदों-सी
पर यह क्षण भर की ख़ुशी होती है
दरअसल मेरे लिए तो हर दिन होता है ‘डे ऑफ़ द डेड’
हर पल होता है ‘पहली नवम्बर’
और हर पल क़ब्रों, लाशों, ताबूतों पर चलती
मृत्यु के एहसास से गुज़रती हूँ
हर पल कोशिश करती हूँ उन्हें रौंदकर
बदल डालूँ पीड़ा के तूफ़ान को
चाहत की हिलोरों में
आँखों में अजीब से धमाके
एक अपूर्व दहशत लिए
मौत को रौंदने की करती रहती हूँ हर पल एक नाक़ाम कोशिश
फिर न जाने कब उठ जाते हैं वापस मेरे क़दम
हौले-हौले समंदर किनारे
समुद्र तट पर चलती जा रही हूँ मैं
चलती जा रही हूँ, चलती चली जा रही हूँ…
रेत पर अपने क़दमों के निशान बनाती
मुड़कर देखती हूँ अपने क़दमों के निशान
इस कचोटती इच्छा के साथ कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगी
उस मृत्यु जैसे प्रेम के आलिंगन में
ढलती शामों और रातों से बेपरवाह
मैं आगे बढ़ती जा रही हूँ लहरों को चीरकर
और मन-ही-मन समाती जा रही हूँ समुद्र की गोद में
उन शीतल लहरों का आलिंगन करती हुई
कंपकंपाती ठंढ के बावजूद मुझे भा रही है
बर्फ़ीली ठंढी हवाओं की छुअन
और उड़कर आते हुए मुझे छूते बर्फ़ के बुरादे
पर यह ज़िन्दगी से पलायन की मेरी नाक़ाम कोशिश है
जो हर बार जाकर ख़त्म होती है
तबाही, छटपटाहट और मृत्यु पर
हर बार यह सोचकर मैं वापस लौट आती हूँ कि
शायद मुझे ऐसे कुछ लोग कभी मिल जाएँ
जिनकी आत्मा ही संगीत, काव्य और प्रेम के लिए बनी है
तो मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारी तरह उन लोगों के लिए
प्रेम धुनों पर नाचती रहती.

तुम्हारे लिए हमेशा ज़िन्दगी और कला रही
एक-दूसरे से बिलकुल अलग दो दुनियाएं
और यह कला तुम्हारी इच्छा या इरादे की परवाह न कर
पनपती रही अपने बलबूते
और परवान चढ़ती रही
अपने आप में एक अलग ईकाई-सी
तुम्हारे अन्दर सचमुच जीता था एक ऐसा कलाकार
जो तुम्हारे अन्दर के तमाम इंसानों से अलग था.
नीत्शे के ‘स्त्री एक दर्पण है’ को सार्थक करते हुए
तुमने भी प्रतिबिंबित किया उन तमाम लोगों और शक्तियों को
जो छाये रहे तुम्हारी ज़िन्दगी पर
तुमने भी बदला स्वरूप और चरित्र
ओविड के ‘मेटामॉर्फ़ोसिस’ की नायिकाओं की तरह
देवताओं के आदेशानुसार.

वॉल्ट व्हिटमैन के प्रजातंत्र के गीत में तुमने महसूस की
रॉकी पर्वतों की घुमावदार महानता
अमरीकी आत्मा का संवेग, जो श्रम के माध्यम से
एक सुविधाजनक जीवन पाने में संघर्षरत है
तुम्हारी नज़रों में यह नृत्य, यह संगीत था
एक नन्हे बच्चे के मासूम क़दमों की तरह
जो अपने पांवों पर उचक-उचककर
भविष्य की ऊंचाइयों को, उपलब्धियों को छू लेना चाहता है
जीवन की उस नई दृष्टि को छू लेना चाहता है
जिसे ‘स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी’ अभिव्यक्त करती है.
यह संगीत था एक ऐसा संगीत
जो आत्मा के स्वर्ग से निकलकर
आसमानों में घुमड़ता हुआ
प्रशांत पर लहराता हुआ
मैदानों में विचरता हुआ
रॉकी पर्वतों की चढ़ाइयों पार तक
अपने पंख फैला सके.
अब्राहम लिंकन के
वॉल्ट व्हिटमैन के गाते हुए अमरीका को
सुन सकने, अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम
तुम्हें इंतज़ार था उस संगीतज्ञ का जो निकाल सके
वॉल्ट व्हिटमैन के उस संगीत को
ज्वालामुखी की तरह ज़मीन की तहों से बाहर
या तूफ़ानी बारिश की तरह टपका सके आसमानों से
और नाच उठने को उज्ज्वल लड़के-लड़कियों के इस संगीत पर
जिनके नृत्य में किसी मोहिनी का फूहड़ श्रृंगार-रस नहीं होता
होता शारीरिक का ऐसा जादू और उत्थान
जो किसी सभ्यता ने पहले कभी नहीं देखा होता.
तुम देखने लगी थी व्हिटमैन के गीत को सुनने के बाद से ही
उस अमरीका को नाचते हुए
एक विराट मानव आकृति के रूप में
जिसमें न तो बैले की नज़ाकत भरी अदाएं थीं और
न ही नीग्रो नृत्य की कामुकता.
यह होता बिल्कुल साफ़-सुथरा
आसमानों को छूती एक भव्य अमरीकी नृत्य आकृति
समुद्र, मैदानों, पर्वतों को अपने दायरे में समेटे
एक फुर्तीली लचकता के साथ मस्तक ऊंचा उठाए
बाँहें फैलाए दुनिया को नेतृत्व देता अमरीका.
अमरीकी उद्यमियों की पहल को
अमरीकी बहादुरों के साहस को
अमरीकी माँओं की प्रेरक ममता और विनम्रता को
नाचते हुए अमरीकी प्रजातंत्र को
नाचते हुए अमरीका को
देख लिया था बहुत पहले तुमने
पर क्या तब तुम देख पाई थी
आज का अमरीका …?

तब तुम्हें लगने लगी थी ज़िन्दगी
बहुमूल्य जवाहरात भरा एक ताज
खिले-खिले फूलों भरा एक भरा-पूरा उद्यान
हर पल खुशियों की नई पौध पैदा करती एक सुहानी भोर
तुम्हें मिल ही नहीं रहे थे तब
अपने उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति के लिए शब्द
तुम्हें दिख रहा था अतीत बरबादियों के एक सिलसिले-सा
और भविष्य एक निश्चित प्रलय-सा
उन कल्पनाशील दिनों में तुम्हारा मन बन जाता था
किसी खिड़की का साफ़-सुथरा शीशा
जिसमें से नज़र आती थी तुम्हें
सौन्दर्य और रंगों की शानदार आकृतियाँ
पर उन्हीं कुछ दिनों में तत्क्षण
ज़िन्दगी दिखती थी तुम्हें गन्दगी के एक ढेर की तरह
पर मुझे कहीं भी नज़र नहीं आती है गन्दगी या
गन्दगी का ढेर भी नहीं दिखता.
अतीत की बरबादियों के श्मशान में खड़ी मैं
देख रही हूँ नाचता-मुस्कुराता विश्व
प्रलय के बाद का भविष्य
जहाँ ख़ूनी समंदर की लहरें
अचानक सराबोर होती जा रही हैं लाल गुलाब के रंग में
और विश्व के हर कोने में मुस्कुरा उठा है
लाल-गुलाबी गुलाबों से चहकता एक मुग़ल गार्डन
जो अब हमेशा खुला रहेगा
आम जनता के लिए
प्रेमी जोड़ियों के लिए.

हर बार दुःख के समंदर में जितनी गहरी डुबकी लगाती हूँ मैं
उतनी ही ऊंची होती है ख़ुशी के आसमान में मेरी हर उछाल

इज़ाडोरा बनी मैं
छू रही हूँ संगीत और नृत्य के अलौकिक आनंद की ऐसी ऊंचाइयां
जो यक़ीनन एक नई खोज है
एक नई चेतना है
विनष्ट होती जा रही मानवता के लिए.
हर पल होती जा रही हूँ और युवा
क्योंकि अभी तब तक नहीं मरना है मुझे
जब तक विनाशोन्मुख विश्व को वह अलौकिक संगीत न दे दूं
जिसका सपना हरपल मेरी आँखों में नाचता रहता है.
रहने लगी हूँ अपनी ही देह में ऐसे
जैसे बादलों में बूँद
गुलाबी आग और मादकता भरी प्रतिक्रिया का बादल
एक डरी-डरी सी, सहमी-सी, दुबली-पतली
हलकी देह वाली कमसिन लड़की से
बदल गई हूँ अचानक एक सख्त जान जांबाज़ औरत में
फिर देखती हूँ कि बदल गई हूँ एक भरी-पूरी
लताओं जड़ी मदिरा में नहाई मस्तानी देह में
जो एक प्रेमी का स्पर्श पाते ही हो जाती है
बेःद नम्र और सुरक्षाहीन
पहले थी मैं एक सहमी हुई शिकार
फिर एक जोशीली प्रेयसी
पर अब मैं छाने लगी हूँ दुनिया पर ऐसे एक प्रेमिका बनी
जैसे समुद्र पर एक साहसी तैराक
इस पूरे जहान को
बादलों और आग की लहरों में बांधते, भींचते और आलिंगित करते हुए
मैंने गाए हैं प्रेम और बहारों के साथ-साथ
पतझड़ के भी रंग भरे भव्य और विविध गीत

इज़ाडोरा…!
तुम्हारे बाद
पहली बार शायद मैंने ही महसूसा है
कि पतझड़ का आनंद भी
बहुत शक्तिशाली, गहरा और मोहक होता है.
और कभी-कभी मैं बनी हूँ एक निर्मोही आत्मा-सी भी
जो मृत्यु के बाद जा रही हो किसी दूसरे लोक में
मैं देना चाहती हूँ दुनिया को एक ऐसा नया धर्म
जिसमें कहीं भी जगह न हो नफ़रत और युद्ध के लिए
ख़ून-ख़राबे के लिए
असलहों, मिसाइलों के लिए
देना चाहती हूँ इस दुनिया को शैम्पेन और शहतूत
वोदका और कोगनाक की ख़ुमारी.

असीमा भट्ट की कविताएँ

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

जलाटा डायरी *

(बोस्निया युद्ध पर लिखी एक मासूम बच्ची जलाटा की डायरी पढ़कर )

“युद्ध का मानवता से कोई लेना-देना नहीं!
मानवता के साथ कोई संबध नहीं …”
कह्ती है छोटी-सी बच्ची ‘जलाटा’ .
वह युद्ध का मलतब तक नहीं समझती
सिर्फ इतना जानती है कि-
युद्ध एक बुरी चीज है.
झूठ बोलने की तरह .
युद्ध मतलब परस्त लोगों की साजिश है
जो आदमी को आदमी से
इंसान को इंसान से
धर्म, नस्ल और देश के नाम पर लङवा रहें हैं
इसमें सबसे अधिक नुकसान
बच्चों को होता है
जलाटा जैसी कितने ही मासूम बच्चे हो जाते हैं बेघर और बेपनाह
जलाटा लिखती है-
“हमारे शहर, हमारे घर,  हमारे विचारों में और हमारे जीवन में युद्ध घुस चुका है .
युद्ध के ऊपर पानी की तरह पैसे बहाने वालों
तुम बच्चों के खून में भय का बीज ‘बो’ रहे हो .
बच्चों की खुशी और उसके सपनों का सौदा करने वालों
युद्ध तुम्हारी खुराक बन चुका है …
युद्ध कराये बगैर तुम जिंदा नहीं रह सकते!
जो देश, दुनिया में सबसे अधिक भयभीत हैं!
वही भय का कारोबार कर रहें है.
ऐसे कायर और डरपोक लोंगो को समाज से बाहर उठाकर कूड़े में फेंक देना चाहिए…
जलाटा, तुम सही कह्ती हो कि-
“राजनीति बडों के हाथ में है.
लेकिन मुझे लगता है बच्चे उनसे बेहतर निर्णय ले पाते.”
यह दुनिया बेहतर और खूबसूरत होती ….
काश! कि सचमुच ऐसा हो पता जलाटा !
और तुम्हारा सपना कि एक दिन तुम्हे तुम्हारा बचपन वापिस मिलेगा.
तुम्हारी उम्मीद उस बच्चे की तरह है , जो माँ की गर्भ में आँखे बंद किये सो रहा है …

जलाटा,
देख लेना
एक दिन तुम्हारा और दुनिया के
तमाम बच्चों का सपना पूरा होगा
एक दिन सब ठीक हो जायेगा !
बच्चे खेलेंगे बेख़ौफ़
दोडेंगे, भागेंगे चारों दिशाओं में
पूरी हिम्मत के साथ
गायेंगे ख़ुशी के सबसे सुंदर संगीत
सबसे सुंदर दिन के लिए
क्योंकि
बच्चे
मासूम होते हैं
छल-कपट,  धोखा और  लालच से दूर
और सुना है सच्चे दिल से निकली दुआंऍ
कभी खाली नहीं जाती.
आमीन …

*(‘जलाटा की डायरी’ 94 में पढ़ी थी. यह मासूम बच्ची बोस्निया युद्ध के दौरान लम्बे समय तक भूखी-प्यासी तलघर में बंद थी. पता नहीं अब वो ज़िन्दा है भी या नहीं)

पिता
शाम काफी हो चुकी है
पर अँधेरा नहीं हुआ है अभी
हमारे शहर में तो इस वक़्त
रात का सा माहौल हो  जाता  है
छोटे शहर में शाम जल्दी घिर  आती है
बड़े शहरों के बनिस्पत लोग घरों में जल्दी लौट आते हैं
जैसे पक्षी अपने घोसले में

यह क्या है
जो मैं लिख रही हूँ
शाम या रात के बारे में
जबकि पढ़ने बैठी थी नाज़िम हिक़मत* को
कि अचानक याद आए मुझे मेरे पिता
आज, वर्षों बाद
कुछ समय उनका साथ
मिला अक्सर हम इतने बड़े हो जाते हैं कि
पिता कहीं दूर/पीछे छूट जाते हैं
पिता के मेरे साथ होने से ही
वह क्षण मेरे लिए महान हो जाता है
याद आता है मुझे मेरा बचपन
मैक्सिम गोर्की के मेरा बचपन’ की तरह
याद आते हैं मेरे पिता
और उनके साथ जिए/बिताये हुए लम्हें
हालाँकि उनका साथ उतना ही मिला
जितना कि सपने में मिलते हैं
कभी कभार उतने खूबसूरत पल
उन्हें मैंने ज्यादातर जेल में ही देखा
अन्य क्रान्तिकारियों की तरह
मेरे पिता ने भी मुझसे सलाखों के उस पार से ही किया प्यार
उनसे मिलते हुए पहले याद आती है जेल
फिर उसके पीछे लोहे की दीवार
उसके पीछे से पिता का मुस्कुराता हुआ चेहरा

वे दिन- मैं बच्ची थी उनके पीछे लगभग दौड़ती
जब मैं थक जाती
थाम लेती थी पिता की उँगलियाँ
उनके व्यक्तित्व में मैं ढली
उनसे मैंने चलना सीखा चीते सी तेज़ चाल
आज वे मेरे साथ चल रहे हैं
साठ  पार कर चुके मेरे पिता
कई बार मुझसे पीछे छूट जाते हैं
क्या यह वही पिता हैं मेरे
साहसी और फुर्तीला
सोचते हुए मैं एकदम रुक जाती हूँ
क्या मेरे पिता बूढ़े हो रहे हैं ?
आखिर पिता बूढ़े क्यों हो जाते हैं ?

पिता तुम्हें बूढ़ा नहीं होना चाहिए
ताकि दुनिया भर की सारी बेटियां
उनके पिता के साथ दौड़ना सीख सके
दुनिया भर में बेफिक्र और निर्भय…

(*नाज़िम हिकमत तुर्की के महान क्रान्तिकारी थे और उन्होंने लगभग एक दशक जेल में बिताए)

असफल प्रेमिकाएँ

वो प्रेतात्माएं नहीं थीं
वो प्रेमिकाएँ थीं
वो खिलना जानती थीं फूलों की तरह
महकना जानती थीं खुशबू की तरह
बिखरना जानती थीं हवाओं की तरह
बहना जानती थीं झरनो की तरह
उनमें भी सात रंग थे इंद्रधनुषी
उनमें सात सुर थे
उनकी पाज़ेब में थी झंकार  .
वो थीं धरती पर भेजी गयी हव्वा  की पाकीज़ा बेटियां
जिन्हें और कुछ नहीं आता था सिवाय प्यार करने के
वो बार -बार करती थीं प्यार
असफल होती थीं.
टूटती थीं
बिखरती थीं
फिर सम्हलती थीं
जैसे कुकनूस पक्षी अपनी ही राख से फिर -फिर जी उठता है
फिर प्यार करती थीं
उसी शिद्दत से और उसी जुनून से
दिल ओ जान लुटाना जानती थीं अपने प्रेमियों पर
दे देना चाहती थीं उन्हें दुनिया भर की खुशियाँ
बचा लेना चाहती थीं दुनिया की हर बुरी नज़र से
कोई भी बला आये तो पहले हमसे होकर गुज़रे
अपने रेशमी आंचल को बना देती थीं अपने प्रेमियों का सुरक्षा कवच
बन जाती थीं उनके लिए नज़रबट्टू लगा कर आँखों में मोटे मोटे काजल
उनके  लिए बुनती थीं स्वेटर और सपने दोनों
गुनगुनाती रहती थीं हर वक़्त अपने अपने प्रेमी की याद में
खोयी खोयी अनमनी
अपनी ही धुन में
न  किसी का डर
न दुनिया की परवाह
करती थीं रात रात भर रतजगा
और
ऊपर से कहती थी – ख्वाब में आके मिल
उनींदी आँखें लाल होती हैं असफल प्रेमिकाओं की
जैसे रात भर किसी जोगी ने रमाई हो धुनी

असफल प्रेमिकाएँ करती हैं व्रत, रखती हैं  उपवास
बांधती हैं मन्नत का धागा
लगाती हैं मंदिरों और मज़ारों  के चक्कर
देती हैं भिखारियों को भीख और मांगती हैं दुआँ  में अपने प्यार की भीख
‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए’  कहते हुए गाती थी
‘हम इंतजार करेंगे तेरा क़यामत तक’
वो भूल जातीं  दिन, महीने और  तारीख
भूल जातीं खाना खाना
बेख्याली  में कई बार पहन लेतीं उलटे कपड़े
लोग कहते –  कमली  है तू
और वो खुद  पर ज़ोर ज़ोर  से हँसतीं
बहाने बनातीं
जल्दी में थी
कमरे में अन्धेरा  था
क्या  करती, ठीक से  दिखा  ही नहीं

असफल प्रेमिकाएँ बचाये रखती हैं हर हाल में अपना विश्वास
बचाए  रखती हैं अपने प्रेमी के प्रेमपत्र और उनकी तस्वीरें
गीता और कुरआन की तरह .

असफल प्रेमिकाएँ जब जब रातों को अकेली  घबरा जाती हैं, रोती हैं  तकिये
में मुंह रख  कर
सोचती
नितांत एकांत रात में
सन्नाटे को चीरती हुई
उनकी चीत्कार ज़रूर पंहुचती  होगी उनके प्रेमी के कानों में

वो अच्छा हो,  वो भला हो
सब ठीक हो उनके साथ
कोई आफत न आयी हो उनके पास
जहाँ भी हो सुखी हो
मन ही मन बस यही कामना करती हैं असफल प्रेमिकाएँ

असफल प्रेमिकाएँ लगने लगती हैं असमय बूढ़ी
आ जाती है बालों  में समय से पहले सफ़ेदी
और गालों पर झुर्रियां
वो झेल जाती हैं सबकुछ
नहीं झेल पातीं तो अपने प्रेमी  द्वारा दी गयी पीड़ा, यातना, उपेक्षा और  अपमान
लम्बी फेहरिश्त है असफल प्रेमिकाओं की
जो या  तो  पागल हुईं
या कुछ ने अपना लिया अध्यात्म
आश्रम या मेंटल एसालम बना उनका घर

वो जिसने खा ली नींद की गोलियां
या काट ली  कलाई
किसी  से  न बर्दाश्त हुआ सदमा और  रुक गयी  दिल की धड्कन
बहुत उदास और अपमानित हो कर गयीं दुनिया से
वो मरी नहीं
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
हत्या हुई उनकी
वो लोग जो उनसे  प्यार  का नाता जोड़ कर देने लगे समझदारी भरा बौद्धिक तर्क
कहने  लगे – प्यार का  कतई यह मतलब नहीं कि हमेशा साथ रहें.
हम दूर रह कर भी साथ रह सकते हैं
खुश रह सकते हैं
दूर हैं, दूर नहीं
वो कहती रहीं – एक झलक देखना  चाहती हूँ
छूना  चाहती हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारी साँसें
तुम्हारी  मजबूत बाहों में  पहली बार जो गरमाहट और सुरक्षा महसूस  किया
था फिर से करना चाहती हूँ वैसा ही मह्सूस
और तुम ज़ोर से हँसते हुए कहते  – ‘क्या  बचपना है,  यह सब बकवास है.’

ले ली उनकी जान इस बकवास ने
तुम्हारे आपराधिक प्रवृति ने
तुम्हारी कुटिल हंसी ने
तुम उड़ाने लगे उनका मज़ाक
खेलने लगे मासूम भावनाओं से
खेलने लगे उनके दिल से
कहती रहीं –  खेलो न मेरे दिल से
पूछती रहीं – यह तुम्हीं थे
कौन था वो जो पहरों पहर  मुझसे फोन पर करता था बातें
हरेक छोटी छोटी बातें पूछता
अभी कैसी लग रही हो
क्या पहना है
क्या रंग है
बताओ

बताओ ओ प्रेमी !
क्या तुम्हें  नहीं लगता
वो बनी ही थीं प्यार करने के लिए
और तहस -नहस करके रख दी उनकी जिंदगी

तुमने ले ली उनकी जान
अब डर लगता है तुम्हें
वो कहीं से प्रेतात्माएं बन कर आयेगीं  और  तुम्हें डरायेंगी
डरो मत
वो  प्रेमिकाएँ  हैं
प्रेतात्माएं  नहीं
वो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ती
वो तो क़ब्र  में भी गाती हैं अपने प्रेमी के लिए शगुनों भरी कविता
देखना वो अगले बसंत फिर  से निकलेंगी अपनी अपनी कब्र से बाहर
और करेंगी प्यार
और यह धरती जब तक अपनी धूरी पर घूमती रहेगी
तब  तक वो  करती रहेंगी प्यार
और पूरी दुनिया को सिखाती रहेंगी प्यार . ..

दीदारगंज की यक्षिणी 

“दीदारगंज की यक्षिणी की तरह तुम्हारा वक्ष
उन्नत और सुन्दर
मेरे लिये वह स्थान जहाँ सर रख कर सुस्ताने भर से
मिलती है जीवन संग्राम के लिए नयी ऊर्जा
हर समस्या का समाधान ….
तुम्हारे वक्ष पर जब जब सर रख कर सोया
ऐसा महसूस हुआ लेटा हो मासूम बच्चा जैसे माँ की गोद में
तुम ऐसे ही तान देती हो अपने श्वेत आंचल सी पतवार
जैसे कि मुझे बचा लोगी जीवन के हर समुन्द्री तूफान से…
तुम्हारे आंचल की पतवार के सहारे फिर से झेल लूँगा हर ज्वारभाटा
अनगिन रातें जब जब थका हूँ…
हारा हूँ …
पराजित और असहाय महसूस किया है …..
तुम्हारे ही वक्ष से लगकर
रोना चाहा
जार जार
हालाँकि तुमने रोने नहीं दिया कभी
पता नहीं
हर बार कैसे भांप लेती हो
मेरी चिंता
और सोख लेती हो मेरे आंसू का एक एक बूँद
अपने होठों से
तुम्हारे वक्ष से ऐसे खेलता हूँ, जैसे खेलता है बच्चा
अपने सबसे प्यारे खिलौने से ….
तुम्हारा उन्नत वक्ष
उत्थान और विजय का ऐसा समागम जैसे
फहरा रहा हो विजय ध्वज कोई पर्वतारोही हिमालय की सबसे ऊँची चोटी पर

जब भी लौटा हूँ उदास या फिर कुछ खोकर
तुमने वक्ष से लगाकर कहा
कोई बात नहीं, “आओ मेरे बच्चे! मैं हूँ ना’
एक पल में तुम कैसे बन जाती हो प्रेमिका से माँ
कभी कभी तो बहन सरीखी भी
एक साथ की पली बढ़ी
हमजोली … सहेली ….
‘Ohh My love ! you are the most lovable lady on this earth”
सचमुच तुम्हारा नाम महान प्रेमिकायों की सूचि में
सबसे पहले लिखा जाना चाहिए
खुद को तुम्हारे पास कितना छोटा पाता हूँ, जब- जब तुम्हारे पास आता हूँ
कहाँ दे पाता हूँ, बदले में तुम्हे कुछ भी
कितना कितना कुछ पाया है तुमसे
कि अब तो तुमसे जन्म लेना चाहता हूँ
तुममें, तुमसे सृष्टि की समस्त यात्रा करके निकलूं
तभी तुम्हारा कर्ज़ चुका सकता हूँ
मेरी प्रेमिका ….”

आईने में कबसे खुद को निहारती
शून्य में खड़ी हूँ
दीदारगंज की यक्षिणी सी मूर्तिवत
तुम्हारे शब्द गूंज रहे हैं, मेरे कानों में प्रेमसंगीत की तरह
कहाँ गए वो सारे शब्द ?
मेरे एक फोन ने कि –
डॉक्टर कहता है – मुझे वक्ष कैंसर है, हो सकता है, वक्ष काटना पड़े.
तुम्हारी तरफ से कोई आवाज़ न सुनकर लगा जैसे फोन के तार कट गए हों
स्तब्ध खड़ी हूँ
कि आज तुम मुझे अपने वक्ष से लगाकर कहोगे
-“कुछ नहीं होगा तुम्हें! ”
चीखती हुई सी पूछती हूँ
तुम सुन रहे हो ना ?
तुम हो ना वहां ?
क्या मेरी आवाज़ पंहुंच रही है तुम तक ….
हाँ, ना कुछ तो बोलो….”

लम्बी  चुप्पी के बाद बोले
-“हाँ, ठीक है, ठीक है
तुम इलाज करायो
समय मिला तो, आऊंगा….”

समय मिला तो ? ? ?
समझ गई थी सब कुछ
अब कुछ भी जो नहीं बचा था मेरे पास
तुम अब कैसे कह सकोगे
सौन्दर्य की देवी ….
प्रेम की देवी…..

सबकुछ तभी तक था
जब तक मैं सुन्दर थी
मेरे वक्ष थे
एक पल में लगा जैसे
खुदाई में मेरा विध्वंस हो गया है
खंड खंड होकर बिखर चुकी हूँ, “दीदारगंज की यक्षिणी’ की तरह
क्षत-विक्षत खड़ी हूँ,
अंग भंग …
खंडित प्रतिमा …
जिसकी पूजा नहीं होती

सौन्दर्य की देवी अब अपना वजूद खो चुकी है….

लेकिन मैं अपना वजूद कभी नहीं खो सकती
मैं सिर्फ प्रेमिका नहीं!

सृष्टि हूँ
आदि शक्ति हूँ

और जब तक शिव भी शक्ति में समाहित नहीं होते
शिव नहीं होते ….
मैं वैसे ही सदा सदा रहूँगी
सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी,
शिव, सत्य और सुन्दर की तरह ….

(*दीदारगंज की यक्षिणी को सौन्दर्य की देवी कहा जाता हैं)

“This Poem is dedicated to cancer surviving women!”

दुनिया के मजदूर-मजदूरनें एक हों…

डॉ. आरती  

संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com

मार्क्स  की सौंवीं बरसी पर अमेरिका में हुए सेमिनार में, कैथराइन ए. मैकनिनन ने मार्क्सवाद और नारीवादी चेतना के वैचारिक पक्षों का सकारात्मक विश्लेषण करते हुए कहा- ‘कोई भी वास्तविक नारीवाद प्रकृति के रूप में उत्तर मार्क्सवादी नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ यह भी सचाई है कि दैनंदिनी जीवन के बारे में लैंगिक विभाजन को समझे बिना चर्चा नहीं कर सकते। वर्चस्व का मर्म समझने के लिए हमें उसके मुख्य रूप, पुरुष प्रभुत्व को समझना होगा। यौनिकता का नारीवाद के लिए वही महत्व है जो श्रम का  मार्क्सवाद के लिए। (पूँजीवाद श्रम का मूल्य हड़प लेता है, इसलिए  मार्क्सवाद उसकी आलोचना करता है। यौनिकता को स्त्री से छीने जाने के खिलाफ नारीवाद विचारक आवाज उठाता है)…. वर्ग श्रम की सामाजिक संरचना होती है, उत्पादनकारी प्रक्रिया होती है और पूँजी उसका संक्रेद्रित रूप है। नियंत्रण इस पूरे कार्यव्यापार का केन्द्रीय मुद्दा है जिसके लिए संघर्ष होता है।…नारीवाद में इसी का समानांतर तर्क निहित है।… यौनिकता समाज को दो भागों में बाँटकर संगठित करती है। एक भाग स्त्रियों का दूसरा भाग पुरुष का।… यौन विभाजन उसकी सामाजिक प्रक्रिया का नाम है। परिवर्तन उसका जमा हुआ संक्रेद्रित रूप है। यौन भूमिका इसका गुण है जो दो सामाजिक व्यक्तियों में सामान्यीकृत हो जाती है और अंत में प्रजनन या पुनरुत्पादन उसके परिणाम के रूप में सामने आता है।’


मैकनिनन का यह वक्तव्य एक ऐसा बिन्दु है जहाँ से मार्क्सवाद  और नारीवाद के संबंधों को एक नया आयाम मिलता है। नारीवाद पर देहवादी विमर्श का आरोप लगाते हुए सिद्धांतशास्त्री (और मार्क्सवादी) अक्सर यह भूल जाते हैं कि प्रजनन से पूर्व पुरुष को स्त्री के साथ सहवास करना पड़ता है यहाँ स्त्री और पुरुष के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा बन जाता है जिस प्रकार पूँजी और श्रम के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा होता है। मार्क्सवादी सिद्धांतों में ‘मूल्य’ का जो स्थान है वही नारीवाद में ‘कामना’ का है। जिस प्रकार श्रम समाज की रचना में भूमिका निभाता है उसी प्रकार कामना यौनिकता की रचना करते हुए समाज की संरचना करती है। इस प्रकार यौनिकता के प्रश्नों, संशयों को उठाए बिना नारीवाद पर चर्चा नहीं हो सकती। मार्क्स ने स्त्री प्रश्नों को यथासमय उठाया किन्तु उन्हें कोई नई दिशा देने का माहौल मार्क्सवाद  के भीतर नहीं मिला। यहाँ हमें मार्क्सवाद  और नारीवादी प्रश्नों की सही पड़ताल करने के लिए अतीत में जाकर झाँकने और विश्लेषण की जरूरत है।

श्रम और वर्ग चेतना जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों के साथ ही  मार्क्सवादी स्त्रियों द्वारा लिंगभेद के प्रश्नों को उठाया गया। यहाँ नारी मुक्ति के प्रति संवेदनात्मक दृष्टिकोण रखनेवाले पुरुषों ने भी उनका साथ दिया। वर्षों आंदोलनों के भीतर आंदोलन सक्रिय होने के कारण उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में मार्क्सवादी पार्टियों और उनके सिद्धांतकारों ने यौन विभाजन को मान्यता देना शुरू किया। यहाँ यौन विभाजन को केवल मान्यता मिली। उसका कोई विकास नहीं हुआ। मार्क्सवाद  ने नारी प्रश्नों को लेकर अपने सिद्धांतों को उलटने- पलटने का, उन्हें पुनव्र्यवस्थित करने का काम नहीं किया। स्त्री प्रश्नों पर मार्क्सवाद  यहीं रुका रहा। हाँ बल्कि स्त्री आंदोलन की संभावना को बेहद गुपचुप तरीके से रोक दिया गया। यहाँ कामरेडों के भीतर सहस्त्राब्दियों से जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता स्त्री प्रश्नों को कई दशकों तक हाशिए पर धकेलती रही।  मार्क्सवादी  आंदोलनों में, धरना-प्रदर्शनों, जुलूसों में साथ दे रही स्त्री घर की दहलीज पर कदम रखते ही कामरेड पुरुष को पूँजीपति में बदला पाती। घर के भीतर स्त्री एक श्रमिक थी। यौन विभाजन को झेलने के लिए मजबूर क्योंकि मार्क्सवाद के सिद्धांतों में घर के भीतर क्रांति की सैद्धांतिकी का अभाव था।

स्त्री को लेकर मार्क्स की इच्छा थी कि वह श्रम करे। यदि वह श्रम (घर से बाहर) करेंगी तो नियंत्रित होने वाली शक्ति से बदलकर नियंत्रणकारी शक्ति बन जाएगी। परिवार संस्था का पुनर्निमाण भी होगा और स्त्री संबंधों को भी एक नया धरातल मिलेगा। मार्क्स के विचारों से प्रभावित होकर कई महिलाएँ क्रांति के मैदान में उतरीं। नए संबंधों की व्याख्या करनी चाही। यहाँ क्या महसूस किया? इस संदर्भ में फ्रांसीसी महिला ज्याँ डेरियन का प्रसंग जरूरी है- डेरियन अपने पुरुष साथियों के साथ बिखरी हुई मजदूर यूनियनों को इक_ाकर महासंघ बनाने की योजना पर काम कर रही थीं। वे ‘द ओलीनियम डेम फेम्मे’ नारीवाद पत्र में नियमित स्तंभ भी लिखा करती थीं। एक दिन पुलिस ने यूनियन के अन्य साथियों समेत उन्हें पकड़ लिया। मुकदमे से पहले वकील जो, उनसे मिलने आया ने जो कहा, वह चौका देनेवाला था। वकील के अनुसार- ‘वे महासंघ बनाने में अपनी भूमिका का उल्लेख न करे अन्यथा यूनियनों को एकसूत्र में पिरोने की योजना को अधिकारियों की स्वीकृति नहीं मिल पाएगी, क्योंकि वे एक नारीवादी हैं।’ यहाँ व्यवहार में मार्क्सवाद के भीतर, नारीवाद होना अश्पृश्य होने जैसा था। पुरुष के मुकाबले स्त्री के सामाजिक, वर्गीय योगदान पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह। यह घटना मजदूर, क्रांति के भीतर स्त्री को अपनी असली जगह दिखा देने के लिए पर्याप्त थी। डेरियन ने सच के साथ समझौता इसलिए किया कि मजदूर महासंघ की योजना साकार हो सके। इस घटना के बाद पेरिस कम्यून में महिला योद्धाओं के अनुभव भी आंदोलनों के भीतर लैंगिक भेदभाव से भरेपूरे रहे। इन महिला योद्धाओं के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा स्वयं कार्लमार्क्स ने की थी। कम्यून में करीब आठ सौ स्त्रियाँ हथियार बंद होकर घर से निकलीं। इन्होंने क्रांति के लिए ही जीवित रहने का संकल्प लिया। और तमाम रोड़ों को पारकर, शत्रुओं का निडरता के साथ सामना किया। तत्कालीन क्रांतिकारी और पत्रकार आंद्रेलुई लिखती हैं कि- इन महिलाओं का संघर्ष दोतरफा था। एक ओर वे वर्साई के शत्रुओं से लड़ रही थीं दूसरी ओर अपनी ही कतारों के पुरुषों की मानसिकता से। इस आंदोलन के बाद भी वही हुआ। जिस क्रांति ने उन्हें निष्क्रियता के बाहर निकाला, उद्देश्य पूरा हो जाने पर क्रांतिकारी कतारों का यौन विभाजन, उनकी अधीनस्थ भूमिका पर शब्दाघात करता रहा। ये प्रहार उनकी उभरती भूमिका के लिए हमेशा घातक सिद्ध हुए हैं। इसीलिए क्रांतियाँ सार्विक मुक्ति का दावा करने के बाद भी पुरुष केन्द्रित रह जाती हैं और आधे-अधूरे प्रयास की बाहक भी। तेलंगाना में पेरिस कम्यून के लगभग 175 वर्ष बाद चंद्र राजेश्वर राव ने एक स्त्री संगठन की आधारशिला रखी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं निजाम के रजाकारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का ऐलान कर दिया। तेलंगाना की इस क्रांति में मल्लू स्वराजमन और ब्रजरानी जेसी महिलाओं ने मिशाल कायम की थी। लेकिन इसके बाद भी लिंगभेद की शिकार हुईं और पुरुषों की बराबरी का दर्जा पाने में असमर्थ रहीं। राजेश्वर राव ने स्वयं स्वीकार किया कि- ‘जब स्त्रियाँ आईं तो हमने उन्हें हाथोंहाथ लिया लेकिन हमने उन्हें आगे बढऩे हेतु प्रेरित करने के लिए कुछ नहीं किया। इन महिलाओं के साथ यदि सहयोग किया जाता, पार्टी के दरवाजे उनके लिए खोले जाते तो निश्चित उनके कार्यों का फायदा पार्टी और विचारधारा दोनों को मिलता। इसके करीब पचास साल बाद शायद 1994-95 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की सदस्य वृंदा करात ने अचानक अध्यक्ष मंडल को कमेटी से अपना इस्तीफा सौंप दिया। वे पार्टी के भीतर लगातार स्त्रियों की उपेक्षा, विशेषकर पार्टी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने से असंतोष में थीं। हालाँकि इस घटना को तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने सँभाल लिया।’

ये घटनाएँ चाहे, ज्यां डेरियन की हों या पेरिस कम्यून या तेलंगाना संघर्ष या वृंदा करात के इस्तीफे की इनमें समानता है। ये वे क्रांतिकारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने समाज के हित, कमजोर वर्ग के शोषण के खिलाफ लडऩे का साहस दिखाया। इन्होंने ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के साथ ही ‘दुनिया की मजदूरिनें एक हो’ का नारा दिया और संगठनों के सामने प्रस्ताव रखा कि मार्क्सवाद, शोषण और दमन की वर्गीय परिभाषा में लैंगिक दमन को भी शामिल करे। स्वयं मार्क्स ने सर्वहारा स्त्री के शोषण के प्रश्नों को उठाया। उन्हें क्रांति में सम्मिलित किया। फिर प्रश्न उठता है कि नारीवाद की जरूरत क्या है? या क्यों पड़ी? कि स्त्री के उठाए गए प्रश्नों को अलग -थलग कर दिया गया। मार्क्सवाद स्त्री को किस वर्ग में रखेगा? शोषक या शोषित, तो क्या कोख के भीतर मार दी जानेवाली कन्या शिशु, दहेज के लिए जला देनेवाली सामंत परिवारों की स्त्रियाँ, खाप पंचायतों द्वारा खुलेआम कत्ल हो रही प्रेम करनेवाली सवर्ण स्त्री, मार्क्सवाद के अध्ययन का विषय नहीं हैं?

इन जैसे प्रश्नों से जूझती, मार्क्स के शोषण नियामक विचारों से प्रभावित स्त्रियों जैसे ज्यां डेरियन, मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट, सीमोन, एलक्जेंडा कोलंताई, क्लारा जेटकिन, ओलाइव श्राइनर, (ये स्त्रियाँ वैचारिक व सांगठनिक रूप से मार्क्सवादी क्रांतिकारी हैं) ने एक लंबी लड़ाई, संगठनों के भीतर लड़ते रहने के बाद अंतत: खुद को स्त्री हितों के लिए नारीवादी स्वीकार किया। सीमोन ने एक लंबे समय बाद अंतत: स्वीकार किया कि वे नारीवादी हैं।

इसका एक दूसरा पहलू कि इन स्त्रियों के साथ और हजारों स्त्रियों ने मार्क्सवाद के भीतर कि वह लैंगिक संघर्ष के प्रति संवेदनशील बने, क्रांति पुरुषकेन्द्रित होकर ना रह जाए, लंबे समय तक संघर्ष किया। इस प्रयास में पुरुष मार्क्सवादी सिद्धांतकारों बेबेल, एडवर्ड कारपेंटर, विलियम मारिस, हैवलॉक और स्वयं मार्क्स व लेनिन ने भी वैचारिक संरचना प्रस्तुत करने में मदद की। इनके वैचारिक प्रयासों ने मार्क्सवाद के भीतर एकता और संघर्ष को जीवित रखा। सर्वहारा के प्रश्नों को लेकर लड़ी गई लड़ाईयों में स्त्रियों ने बार-बार अपनी भूमिका निभाई, किन्तु उनके सहयोग को भुना लेने के बाद पुरुषकेन्द्रित नेतृत्व ने उन्हें खारिज किया और वापस दहलीज के भीतर लौट जाने का निर्देश दिया। यदि मार्क्सवाद का सर्तक अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट होगा कि उसके बुनियादी अस्तित्व में ही समाजवाद और नारीवाद के परस्पर संबंध की संभावनाएँ निहित हैं। यद्यपि ध्यान देने की बात है कि मार्क्सवाद स्त्री शोषण खत्म होने के लिए साम्यवाद का इंतजार करने को कहता है। दूसरी तरफ उसका संकेत क्रांति की ओर जाता है कि बगैर क्रांति बदलाव संभव नहीं।। तो क्या साम्यवाद आने पर मुक्ति स्त्रियों को उपहार की तरह मिल जाएगी? लगभग यही धारणा उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक चरण तक प्रसिद्ध नारीवादियों विलियम थाम्पसन, मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, फ्लोरा टिस्टन, अन्ना विलहर आदि ने बना रखी थी। इस धारणा को तोडऩे में बेवेल की पुस्तक ‘वूमेन एण्ड सोशलिज्म’ ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। एंगेल्स और बेवेल के विचारों ने नारीवाद की मृत देह में हिम्मत जगाई। इस पुस्तक का ही प्रभाव था कि 1891 में जर्मनी की राजनैतिक पार्टियों में स्त्रियों की समानता को स्वीकृति मिली। बेवेल ने स्त्रियों को आगाह किया कि- ‘जिस तरह मजदूरों को पूँजीपतियों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए उसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की तरफ कोई आशा नहीं बाँधनी चाहिए।’ बेवेल का कथन स्पष्ट करता है कि पूँजीपतियों की भाँति पुरुष (कामरेड पुरुष भी) स्त्री के दमन और शोषण की अनुभूति के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि माक्र्सवाद सिद्धांतकार यौनिकता, प्रजाति और वर्गभेद के अंतर्विरोधों को हल करने के बजाय उन्हें छिपा देते हैं। यह प्रक्रिया नए समाज की रचना में अवरोधक की भूमिका निभाती है। जबकि माक्र्स ने स्त्री की प्रगति को सामाजिक प्रगति का सूचकांक माना है। स्त्री की प्रगति को समूचे समाज की प्रगति मानते हुए भी उन्होंने यौन उत्पीडऩ को अपने अध्ययन का विषय नहीं बनाया। माक्र्स का पूरा ध्यान श्रम और पूँजी पर ही केन्द्रित रहा। उत्पीडऩ के प्रश्नों को हल किए बिना स्त्री विषय पर आगे नहीं जाया जा सकता। स्त्री वर्गसीमा से परे केवल श्रमिक है, शोषित है, उत्पादनकर्ता है और यौन शोषण उसका अहम पहलू। वह दोतरफा शोषण की शिकार है-पहला कि, उसके श्रम का, घरेलू श्रम का कोई मूल्य निश्चित नहीं। दूसरा, यौनिक विभाजन और शोषण उसकी उत्पीडऩा का कारण है। माक्र्सवाद ने इन प्रश्नों को टटोला, सुलझाया नहीं बल्कि आगे जाकर दरकिनार किया जिसका परिणाम नारीवाद का जन्म है।

नारीवाद भी प्राण वायु मार्क्सवाद में निहित है, यह सत्य है कि वह मार्क्स के चिंतन से पल्लवित, फलित है कि, मार्क्स के चिंतन ने मानव इतिहास और समाज के सभी पहलुओं का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया जिस आधारशिला ने आगे बढक़र श्रम, शोषण, लिंगभेद, वर्णभेद से जुड़ी क्रांति की अवधारणाओं को स्पष्ट परिभाषाएँ दीं। बेवेल के विचारों को और खोलने का काम एंगेल्स की पुस्तक ‘परिवार, निजी-संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ करती है। इस पुस्तक में उन्होंने रोजगार को स्त्रियों की मुक्ति का प्रस्थान बिन्दु बताया। एंगेल्स ने कहा कि वे (स्त्रियाँ) सार्वजनिक उद्यम में आएं। इसके पूर्व 1845 में ‘इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा’ पुस्तक में एंगेल्स ने स्त्री मजदूरों की दयनीय स्थिति से संवेदित होकर रोजगार को औरतों से, उनके औरतपन के छीने जाने का कारण बताया था। जिसे सुधारकर उन्होंने माना कि श्रम (घरेलू श्रम के अलावा) की दुनिया में कूदकर ही स्त्री अपने आपको और अपने शोषणों को पहचान करेगी। आज नारीवाद की अवधारणा को देहवाद कहकर नाक-भौं सिकोडऩे वाले, वर्गीय क्रांति में स्त्री यौनिकता के प्रश्नों को आड़े मानने वाले, मार्क्स की प्रतिस्थापनाओं पर ध्यान दे। मार्क्स ने अपने अध्ययनों में, जैसे ‘इकोनोमिक एण्ड फिलोसोफिकल मैन्यूस्क्रिप्ट’, ‘जर्मन आइडियोलाजी’, ‘हॉली फैमिली’ से लेकर ‘दास कैपिटल’ तक लगातार स्त्री मुक्ति को श्रम से जोड़ा और कहा कि उत्पादन में स्त्री के जुडऩे से तीन बड़े परिवर्तन होंगे। पहला, पुरुष और स्त्री के संबंध उच्चतर स्तर पर पहुँचेंगे, दूसरा-एक नए तरीके से परिवार का जन्म होगा और तीसरा- श्रमिक स्त्री का अपने बाह्य जगत पर नियंत्रण स्थापित होगा। साथ ही मार्क्स की स्थापनाओं से स्पष्ट होता है कि वे उत्पादन के सामाजिक संबंधों के साथ ही प्रजनन के सामाजिक संबंधों के बदलने से उत्पन्न शोषणमुक्त समाज की तस्वीर पेश करना चाहते हैं। मार्क्स और एंगेल्स के साथ ही स्त्री अधिकारों के प्रश्नों के संदर्भ में अगस्त बेवेल की वैचारिकी, कार्यप्रणाली और उनके लेखन का विशेष योगदान है। उनकी पुस्तक नारी और समाजवाद ने फर्दीनांद लॉसाल के प्रतिगामी विचारों को पनपने से रोका। उन्होंने स्वयं भी सामने आकर लॉसाल पंथियों के पूर्वाग्रहों का विरोध किया। वे (लासालपंथियों) रूसो-अरस्तु और उनके समर्थकों की तरह औरतों को जन्मजात ही पुरुषों से हीन मानते थे। वे उनके किन्हीं भी राजनैतिक-सामाजिक अधिकारों के विरुद्ध थे। जिसका बेवेल, बेल्हेम और उनके समर्थकों ने पार्टी के भीतर ही संघर्ष करके पराजित किया। आज नारीवादियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए भी पार्टी और यूनियनों के भीतर ऐसे विरोधों की जरूरत है। बेवल के समय में जो स्थिति जर्मनी में अत: वैचारिक टकराव की थी वही स्थिति उसी समय में यूरोप और अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टियों में भी थी। यह समय रूस में समाजवादी क्रांति का था जिसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा। लेनिन ने इसी समय तीसरे कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की घोषणा के साथ ही ‘अंतरराष्ट्रीय महिला आयोग’ के कार्यों का प्रारूप भी पेश किया। इस प्रारूप के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि, लेनिन ने महिलाओं की गुलामी को समाप्त करने के लिए, कम्युनिस्टों को नारी आंदोलन को सर्वहारा के वर्ग-संघर्ष और क्रांति के साथ जोडऩे की जरूरत पर बल दिया था।

लेनिन ने यह भी कहा कि-‘हमारी विचारधारात्मक अवधारणाओं से ही हमारे सांगठनिक विचार पैदा होते हैं। हम कम्युनिस्ट महिलाओं का कोई अलग संगठन नहीं चाहते, महिला कम्यूनिस्ट को पुरुष कम्यूनिस्ट की तरह ही पार्टी के अधिकार व कर्तव्य हासिल है।’ साथ ही लेनिन ने वर्किंग ग्रुप, आयोगों, समूहों, कमेटियों के रूप में पार्टी के अलग अंग बनाने की जरूरत पर भी जोर डाला था ताकि वे स्वतंत्र रूप से स्त्री सर्वहारा के हितों पर ध्यान दे सकें। जिस समय लेनिन अपने विचार रख रहे थे उस समय रूस में भी पार्टी और यूनियनों में महिलाओं की संस्था बहुत कम थी। साथ ही उनके विचारों का पार्टी के भीतर के शुद्धतावादी पुरुषों ने विरोध किया। ध्यान देने की बात है कि लेनिन ने यहाँ कामगार, किसान महिलाओं के साथ ही वे महिलाएँ जो संपत्ति रखती हैं यानी उच्चवर्ग की महिलाओं को भी शामिल किया। मेरी एलाइस की पुस्तक ‘फेमीनिज्म एण्ड द मार्कसिस्ट मूवमेन्ट’ में लेनिन के कार्यों की सराहना की गई है। उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में कामगार महिलाओं के जन आंदोलन को सक्रिय करने की जरूरत पर बल दिया। साथ ही सारी दुनिया में समाजवादी नारी आंदोलन को विकसित किया जाय इस हक में क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कांगे्रस को बुलाने के प्रस्ताव को भी समर्थन दिया। तीसरी कांग्रेस में महिलाओं के विषय में एक प्रस्ताव, पास किया गया- ‘महिलाओं के बीच प्रचार कार्य की थिसिस’ जिसमें कहा गया कि यदि कम्यूनिस्ट क्रांति के पक्ष में महिलाओं  को लामबंद नहीं कर पाते तो प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ उन्हें क्रांति के विरुद्ध संगठित करने की कोशिश करेगी। यहाँ महिलाओं को इक_ा करने के कई प्रस्ताव भी पेश किए गए थे। चौथी कांग्रेस अधिवेशन 1922 में, तीसरी कांग्रेस के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। लेनिन से पूर्व मार्क्स ने भी ‘अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ’ की स्थापना के समय स्त्री प्रश्नों के समाधान की जरूरतों को समझते हुए उसकी महिला शाखा की स्थापना की पेशकश की थीं और ब्रिटेन की मजदूर नेता हेनरिश लॉ को संघ का सदस्य बनाया था।

इन प्रयासों में एक नाम एंलेक्जेन्द्रा कोलोन्ताई का और आता है जिसने अपने नारीवादी विचारों को मार्क्सवादी विचारधारा और क्रांति से जोडक़र हमेशा देखा। वे पहली महिला थी जो 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत सरकार में समाज कल्याण मंत्री बनी। उन्होंने स्त्रियों के पक्ष में विवाह के भीतर के भीतर कानूनी स्वतंत्रता व समानता, गर्भपात का कानूनी अधिकार एवं समान वेतन के सिद्धांत को सोवियत सरकार में लागू करवाया। उन्होंने मातृत्व के प्रश्न को स्त्री की इच्छा पर निर्भर होने एवं मातृत्व की जिम्मेदारी समाज की जिम्मेदारी है, जैसे प्रश्नों और परिवर्तनों की बात उठाई। मार्क्सवादी नारीवाद दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर देते हुए कोलोन्ताई ने कहा कि सिर्फ आर्थिक ढाँचा बदल जाने से सांस्कृतिक अधिकार में स्वत: कोई परिवर्तन नहीं आएगा।

इस प्रकार देखा जाय तो मार्क्सवाद के पास नारीवादी प्रश्नों को उठाने और क्रांति में सहयोग देने की पूरी विरासत मौजूद है। इसका सकारात्मक पक्ष था कि रूस में पृथक साम्यवादी सत्ता स्थापित होने पर लेनिन ने इन प्रश्नों को सुलझाने की पहल की जो, पूर्व नारीवादियों ने उठाए थे जिन्हें माक्र्स का भी समर्थन प्राप्त था। यह सच है कि माक्र्सवादी विचारधारा के पास ही ऐसी अंतर्दृष्टि है जो स्त्री प्रश्नों पर सुनियोजित काम करने में सहयोगी होगी। क्योंकि स्त्री के उत्पीडऩ का मामला इतना विसंगतियों से भरपूर है कि उसका उपाय सरल और तात्कालिक नहीं हो सकता। अन्य सामाजिक समस्याओं के साथ-साथ, विशेषकर, मजदूर, किसानों, दलितों, आदिवासियों के प्रश्नों के साथ-साथ वैचारिक प्रतिबद्धताओं के आइने में शनै: शनै: प्रश्नों से जूझने की आवश्यकता महसूस करता है। केवल मार्क्सवाद ही वह धरातल हो सकता है जो क्रांति (सामाजिक एवं ऐतिहासिक) के बीज को पनपने का अनुकूल माहौल बनाता है। यह मानव इतिहास और समाज का व्यापक विश्लेषण करनेवाली विचारधारा है। लेकिन, जैसा कि पूरे विश्लेषण में जरूरत महसूस की गई कि आज के मार्क्सवाद के भीतर वह माहौल बनाने की आवश्यकता है जहाँ, क्रांति के बीज फलफूल सके। पुनर्विचार की आवश्यकता है यहाँ ताकि संगठन शक्तियाँ और सुदृढ़ हों।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद मिश्र के बारे में जनसत्ता में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें खास बात थी कि वे मृत्यु से पहले, अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के बदलते चरित्र के बरक्स नई ‘दास कैपिटल’ लिखने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। यह जरूरत वाजिब भी है किन्तु यही नेतागण विचारधारा में स्त्री प्रश्नों को शामिल करने, पुनर्विचार करने, का आहवान कभी नहीं करते बल्कि ठोस जमीन पर टिके स्त्री प्रश्नों को हाशिए में धकेलने के लिए उस पर प्रति वैचारिकी का आरोप मढ़ देते हैं। स्त्री प्रश्नों को विचारधारा और क्रांति की संभावनाओं के लिए साजिश के रूप में देखते हैं, ऐसी परिस्थितियों में क्या आश्चर्य कि नारीवादियों ने अपनी ढपली अपने राग अलापे। प्रारंभ में ही मैकनिन के वक्तव्य को उठाया गया था जो, स्वस्थ प्रयासों और नारीवाद को समझने की संभावनाओं का वाहक हो सकता है। विनोद मिश्र की तरह ही आज दास कैपिटल के साथ ही मार्क्सवाद के भीतर स्त्री प्रश्नों के लिए पर्याप्त स्पेस और ‘नए घोषणा पत्र’ की भी जरूरत है जो बदलती पूँजी के छल-छद्म, उपनिवेशवादी चरित्र के साथ-साथ यौन विभाजन की तमाम विसंगतियों को अपने खाके में शामिल करे जिसने दुनिया की आधी आबादी को दरकिनार किया है। प्रतिक्रांति की आशंका स्त्री प्रश्नों को हासिए पर धकेले जाने से उभरती है ना कि उन्हें शामिल कर पुनर्विचार की संभावनाओं को खुला आसमान मुहैया कराने से।

उग्रतारा: प्रेम-क्षेत्र में वैध -अवैध की निरर्थकता

मनीषा झा  

शोध छात्रा,
हिंदी एवं भारतीय भाषा विभाग,हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, संपर्क :manisha2012cuh@gmail.com

प्रेम का सवाल उठते ही समाज के कान खड़े हो जाते हैं और दृष्टि चैकन्नी। समाज में लाखों तरह के अनैतिक कार्यों की बैधता-अबैधता पर प्रश्नचिह्न लगे या न लगे, सामाजिक रूप से अनैतिक से अनैतिक व्यक्ति भी आपको प्रेम की वैधता- अवैधता पर घंटों प्रवचन देता मिल जाएगा। प्रेम के प्रति समाज के मठाधीशों का यह घृणित रवैया प्रेम को पल्लवित-पुष्पित ही नहीं होने देता। फलस्वरूप अधिकांश प्रेम की भ्रूण हत्या हो जाती है और इस तरह प्रेम विहीन समाज में मार-काट और हिंसा का होना लाजिमी है।प्रेम तो प्रकृति प्रदत्त और मनुष्य अर्जित अद्भुत विलक्षणताओं में एक है और प्रत्येक वयक्ति का नैसर्गिक-मौलिक अधिकार भी। जो समाज जितना प्रेम विरोधी होगा वह उतना ही अविकसित, क्रूर, और भयानक होगा। प्रेम के मामले में साहित्य और संस्कृतिकर्मियों के द्वारा जो जो राह बताए हैं, उसका अनुसरण कर हम एक स्वस्थ और प्रेमिल समाज का निर्माण कर सकते हैं।

हिंदी साहित्य में नागार्जुन की पहचान यद्यपि एक कवि के रूप में प्रख्यात है किंतु उनके उपन्यास उनकी कविता से थोड़ा भी कमतर नहीं हैं। कठिनाई यह हुई कि हिंदी में चूंकि अधिकांश आलोचक कविता के आलोचक हुए इसलिए नागार्जुन ही नहीं कई अच्छे उपन्यासों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। नागार्जुन का प्रत्येक उपन्यास अपने समय और समाज की चुनौतियों से बेखौफ मुठभेड़ करतास्त्री विरोधी तमाम संहिताओं, आस्थाओं, मान्यताआ,ें और परंपराओं पर बज्र की तरह गिरता है।  स्त्रियों के लिए थोड़ी सी ही सही किंतु निर्विघ्न और सर्वथा निश्चिंत जगह की तलाश करता, अपनी मर्जी और अपनी ईच्छा से प्रेम पाने और प्रेम देने की अकुलाहट से लैस।उनका एक उपन्यास है उग्रतारा,जो हिंदी साहित्य में सर्वथा अचर्चित ही रह गया। रचनाकाल को देखते हुएकथावस्तु की नवीनता तथा स्त्री विमर्श की दृष्टि से यह उपन्यास हिंदी उपन्यास परंपरा में सर्वथा एक नया अध्याय जोड़ता है। उग्रतारा में नागार्जुन की प्रेम दृष्टि अद्भुत ही नहीं थी बल्कि समय से बहुत आगे और क्रांतिकारी थी। उनके एक उपन्यास ‘उग्रतारा’के हवाले हम उनकी अद्भुत प्रेम दृष्टि को समझने का प्रयास करेंगे। नागार्जुन ने स्वीकार किया है कि उग्रतारा की आरंभिक कहानी समाज से ली गई सच्ची कहानी है और आधी कहानी कल्पना के सहारे लिखी गई है।

उग्रतारा की कहानी कुछ इस प्रकार है। एक ब्राह्मण विधवा थी- उगनी। वह खूबसूरत भी बला की थी। एक नौजवान था राजपूत, वह भी सुंदर था, अविवाहित था।गांव में उन लोगों में आपस में स्नेह हो गया। यह पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गया। लोगों ने कहा कि ‘साला बड़ा रंगबाज है, इसकी टांग तोड़ दो।’ उपन्यास में भाभी नाम की एक पा़त्र है। बहुत निर्भीक और बोल्ड। इस मामले में वह बहुत साहसिक कदम उठाती है। उसने दोनों को समझाया और कहा कि ‘देखो हम तुमको सौ रूपये देते हैं, तुम गांव छोड़ दो। यहां तो कभी तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा नहीं। ज्यादा नहीं पांच-सात साल के लिए गांव छोड़ दो। जो लोग तत्काल विरोध कर रहे हैं, वो भी ठंडा पड़ जायेंगे।’ तो वे गांव छोड़कर निकल पड़े। पुलिसवाले गांव वाले से कौन कम थे। देखा एक लड़का और एक लड़की स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं, यहां से वहां। उनकी लाड़़ टपकने लगी। लगे उसे पाकिस्तानी सिद्ध करने। गिरफ्तारी के लिए कोई प्रबल कारण चाहिए। जिस धर्मशाला में वह रहता है, सोते समय उसकी चादर के नीचे उर्दू का एक अखबार डाल दिया जाता है और शोर मचाया जाता  है कि पाकिस्तानी है। अंततः वह गिरफ्तार हो जाता है। लड़का चिल्लाकर कहे किवह कामेश्वर सिंह है, कोई मानने को तैयार ही नहीं। लड़की को बदजनी में कि इसके साथ भागी हंै ये बदचलन है। इस तरह दोनों को गिरफ्तार कर लिया।  और अलग अलग जेल में डाल दिया। जेल में  एक हवलदार हैं भभीखन सिंह, उसकी शादी नहीं हुई थी। पचपन साल उम्र थी उनकी। जेल से निकलने के बाद कथा नायिका उगनी के पास कोई विकल्प नहीं था। अपने को दरिदों से बचाने के लिए उसने भभीखन सिंह से शादी कर लीं। कुछ वर्ष बाद एक मेले में अचानक उसकी मुलाकात कामेश्वर सिंह से हो जाती है। लेकिन वह कामेश्वर सिंह के साथ जाना नहीं चाहती है। उगनी रोती हुई कहती है, ‘‘कि अब मैं तुम्हारे काम की नहीं रही। पेट में गर्भ आ गया है। अब तुम हमको भूल जाओ। यह कहकर सिर झुका लेती है वो।

इस पर कामेश्वर सिंह जो स्टैंड लेता है, वह प्रेम का अद्भुत अर्जिस्वित रूप है। वगैर समय गंवाए फौरन कामेश्वर बोलता है, ‘‘ तुम तो हमारे काम की हमेशा रहोगी। जिस मतलब से तुम काम की बात कर रही हो वही काम काम नहीं होता। शरीर सुख पहुंचाने वाली बात सकेंडरी होती है। काम की तो बराबर रहोगी तुम। अपने मन से यह बात निकाल दो। साहस का संचार हुआ उगनी में। कामेश्वर ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘तुमको हम निकालेंगे यहां से , चाहे जैसे भी हो।महीना साल जो भी लगे, फिर अपना नए ढंग से जीवन शुरु करेंगे और तुम्हारे अंदर जो जीव आ गया है, जिसका भी है, समय पर उसी का नाम हम दर्ज करवायेंगे, समय पाकर हम उसको बुलवायेंगे।’’ प्रेम के इस रूप के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए ।

जहां समाज मेें दुर्भाग्यवश बलत्कृत होते ही स्त्री की जिंदगी को समाप्त माना जाता है। और इस विषाक्त मानसिकता की वजह से या तो वह आत्महत्या कर लेती है या पूरी जिंदगी अपराध बोध में गुजारती है, इस उपन्यास  में प्रेम के आगे इसका मूल्य दो कौड़ी का भी नहीं माना गया  है। जिस समाज में किसी स्त्री का किसी के साथ संबंध का पता चलते ही भूचाल मच जाता है। संबंध की बैधता-अबैधता पर चर्चा होने लगती है। उसे परित्यक्ता की जिंदगी बिताने के लिए विवश  किया जाता है। यह उपन्यास इस बात की वकालत करता है कि संबंध संबंध होता है, वह बैध या  अबैध नहीं होता। इस उपन्यास में आप देखें कि किस तरह प्रेम के आगे देह को कितना अनावश्यक माना गया है।

यात्री ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां केवल प्रेम हो,घृणा नहीं।  वैध -अवैध  का अनावश्यक विवाद नहीं। इस संदर्भ में नागार्जुन अपने एक साक्षात्कार में एक अत्यंत रोचक किंतु मार्मिक घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं, ‘‘मुझे जापान का संदर्भ याद आता है। जापान में जब लड़कियां नौकरी करने लगीं तो इस प्रकार के कांड संभावित हुए। जापान सरकार ने तब गर्भपात को वैध कर दिया। अब अपने यहां करे सरकार?ये सब घोंचू लोग बैठै हैं, सरकार में। एक ही बहादुर मिला। बड़े दिल का आदमी है। फौज से रिटायर होकर आया था। हमको कहा कि कल हमारी नाती जो है उसका एक वर्ष पूरा होता है, खुशी में चाय पिलायेंगे। ये नाती अबैध है। उसने आगे बतलाया कि जिसने वायदा किया था शादी का वो भाग गया अमेरिका, तब पांच महीने का गर्भ था। उस समय वो स्कूल में पढ़ाती थी। स्कूल वालों ने निकाल दिया। मां बनने के लिए मर्टिनिटी में यह होता है कि पिता की जगह किसी का नाम होता है तो उसके नाना जो होते थे, उन्होंने इंकार कर दिया तो इस रिटायर फौजी चतुर्वेदी ने कहा- मैं नाना हूं। मैं जिम्मा लेता हूं इसका मैं इसका नाना हूं। नाम नोट करो मेरा। अब वह लड़का साल भर का हो गया है। हमको कुल लिखित-अलिखित साहित्य में यह अनोखी घटना लगी।’’

आलोचक सुरेश सलिल के अनुसार, ‘‘उग्रतारा मंे नागार्जुन ने स्त्री के अंतर्द्वंद्व  को अत्यंत सजग कवि-चेतना से उभारा है। एक तरफ है कामेश्वर, उगनी के सपनों का साकार रूप और दूसरी तरफ है उसके बाप की उम्र का एक सीधा-साधा पुलिस हवलदार, जिसका गर्भ, नियति की विडंबना से, उसके पेट में पल रहा है।‘‘ उपन्यास के अंत में उगनी भभीखन सिंह के नाम एक मार्मिक पत्र लिखती हैं। और वस्तुतः यह पत्र ही उग्रतारा का ‘क्लाइमेक्स’ है, जिससे नागार्जुन के रचनाकार के सामाजिक धरातल का पता चलता है। उस पत्र में उगनी भभीखन को ‘आदरणीय सिपाही जी’ के रूप में संबोधित करके  लिखती है, ‘‘ मेरे अपराधों को आप कभी माफ नहीं करेंगे, यह मैं अच्छी तरह जानती हूं…आपकी संतान समय पर बाहर आएगी। असाढ़ में उसका जन्म जरूर होगा। आप रत्ती भर चिंता न करें। मैं उसको कहीं फेंक नहीं आऊंगी। पाल पोसकर उसे सयाना बनाऊंगी। …बड़ा होगा, तो मैं खुद ही उसे आपके पास भेजूंगी। अपने पिता से मिल आएगा। आप विश्वास रखें सिपाही जी। आपकी छाया में आठ महीने रही हूं। मन ही मन आपको पिता और चाचा मानती रही हूं और आगे भी मानती रहूंगी। मैं मजबूर थी, इसी से आपको धोखा दिया। सिपाही जी, आप मुझे सारा जीवन याद रहेंगे।’’ यह है नागार्जुन की स्त्री दृष्टि जहां धोखा भी निष्पाप हो जाता है और तथाकथित अवैध संबंध भी निष्कलुष और वैध ।
अगर प्रेम में वैध -अवैध को नागार्जुन के प्रतिमान पर आंके तो भारत की अनेक स्त्रियां गर्भपात करवाने से बच जायेंगी साथ ही उन्हें आत्महत्या करने की नौबत भी नहीं आयेगी। यदि ऐसा संभव होता तो नागार्जुन के अन्य उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ की नायिका गौरी को अपनी जान जोखिम में डालकर न तो गर्भपात करवाना पड़ता और न ही ‘पारो’ उपन्यास  की पारो की असमय मृत्यु होती।

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

सुजाता पारमिता

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) के संघर्षो पर आज भारतीय स्त्री संगठनों में चर्चा की जा रही है। लगभग डेढ़ सौ साल पहले सावित्री बाई फुले ने सभी पितृसत्ता और स्त्री विरोधी मान्यताओं को ध्वस्त कर स्त्री मुक्ति की जो परिभाषा रची वह सदियों तक सम्मानित की जाती रहेगी। तमाम भारतीय दलित महिला आंदोलन के साथ-साथ डाॅ0 अम्बेडकर के लिए भी सावित्री बाई का संघर्ष उनका मार्गदर्शक  रहा है।
अपने खेत में आम के पेड़ तले जब ज्योतिबा ने उसी पेड़ की एक टहनी से दो कलम बनाकर सावित्रीबाई और अपनी मौसेरी बहन सगुणा बाई को देकर उसी जमीन पर पहला अक्षर लिखने को कहा तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि वे भारत में स्त्री शिक्षा की नींव रख रहे है। जब सावित्रीबाई ने उसी आम की टहनी से बनी कलम से जमीन पर पहला अक्षर लिखा तब वे भी कहा जान पायी होंगी कि वे एक अक्षर नहीं बल्कि नया इतिहास लिख रही है।

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सावित्रीबाई ने स्वयं अपनी शिक्षा  भी तमाम संघर्षो के बाद पूरी की। उस समय पुणे जैसे ब्राहमणवादी मान्यताओं में पूरी तरह जकड़े  शहर में एक पिछड़े वर्ग की स्त्री का शिक्षा हासिल करना लगभग असंभव ही था। 1940 में पुणे में छबीलदास हवेली स्थित ब्रिटिश  महिला मिसेज मिशेल द्वारा विशेष रूप से लड़कियों के लिए खोले गये नार्मल स्कूल में उन दोनों ने पढ़ाई शुरू की। सावित्रीबाई को पढ़ने का बहुत शौक था। उन्होंने उसी दौरान प्रसिद्ध अफ्रीकी अमेरिकन की लेखक टार्मस क्लार्कसन की जीवनी को पढ़ा, जिसका उनपर गहरा प्रभाव पड़ा। इसी किताब से उन्हें अमेरिका में बसे अफ्रीकी गुलामों के जीवन और संघर्षो की जानकारी मिली, जो भारत में दलितों और स्त्रियों  के गुलाम जीवन को समझने में सहायक साबित हुई। यह जानते सावित्रीबाई को देर नहीं लगी कि शिक्षा ही गुलामी की जंजीरे तोड़ सकती है। टामर्स क्लार्कसन भी दुनिया भर में अपनी बात प्रभावी रूप से इसी लिए पहुंचा पाये क्योंकि वे शिक्षित थे।

फुले दंपत्ति ने एक जनवरी 1848 में पुणे की भिड़ेवाडी में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल से सावित्री बाई और सगुणाबाई ने अध्यापन का काम शुरू कर भारत की पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव हासिल किया। फुले दंपत्ति यह अच्छी तरह से जानते थे कि शिक्षा ही विकास के रास्ते खोल न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।  शिक्षित स्त्री पुरूष ही संघर्ष को दिशा  दे सकते है। स्त्री के साथ ही दलितों के लिए भी  शिक्षा जरूरी है। इसी को ध्यान में रखकर 15 मई 1848 को उन्होंने पुणे की एक दलित बस्ती में स्कूल खोला, जहां दलित लड़के लड़कियां पढ़ने लगे। इस स्कूल में पढ़ाने के लिए जब कोई अध्यापक नहीं मिला तब सावित्री बाई और सगुणा बाई ने वहां भी पढ़ाना शुरू किया। गरीब , दलित और स्त्री की मुफ्त शिक्षा के लिए फुले दम्पति की प्रतिबद्धता इतनी अधिक थी कि  एक जनवरी १८४८ से १५ मार्च १८५२ तक मात्र चार वर्षों में उन्होंने  पुणे और उसके आस -पास १८ स्कूल खोले।  सामाजिक और आर्थिक , सभी मुश्किल हालात से लड़ते हुए उन्होंने अपने इस मिशन को जीवन भर जारी रखा।

सावित्री बाई और ज्योतिबा ने शूद्रो अति शूद्रो के अलावा अल्प संख्यक वर्ग के स्त्री पुरूषों की शिक्षा को भी जरूरी माना और फातिमा शेख जो उनके ही स्कूल की छात्रा थी, उसे अपने एक स्कूल मंे अध्यापिका बनाकर देश  की पहली मुसलमान अध्यापिका होने का गौरव प्रदान किया। फातिमा शेख फुले दंपत्ति के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण स्त्री नेतृत्व के रूप में जानी जाती है। परिवर्तन और सामाजिक न्याय में धर्मनिरपेक्ष सोच का भी शामिल होना जरूरी है यह लड़ाई तभी सफल होगी जब सभी जाति और धर्म की स्त्री शिक्षित होगी। जब तक जिंदा रही सावित्री बाई इसी विचार के साथ मजबूती से जुड़ी रही और इसके लिए बराबर स्त्री विरोधी ताकतों से लड़ती रही।

आजादी के 68 सालों बाद और शिक्षा के अधिकार को सभी भारतीयों के बुनियादी हक के रूप में स्वीकारे जाने के बावजूद भी दलित, आदिवासी, पिछड़ी और अल्पसंख्यक वर्गो की महिलाओं की शिक्षा में भारी कमी है। आज लगभग 68 प्रतिशत दलित महिला अशिक्षित है, जो हर क्षेत्र में पिछड़ी है। दलित आदिवासी पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिला की पंचायत से संसद तक में भागीदारी की जरूरत है, जो बड़े संघर्ष के बगैर संभव नहीं। महिला आरक्षण बिल पर विवाद अभी भी जारी है। अभी हाल ही भाजपा शासित राजस्थान और हरियाणा सरकार ने एक प्रस्ताव पारित कर केवल मैट्रिक पास स्त्री पुरूषों को ही चुनाव लड़ने की इजाजत दी है। अशिक्षित इस प्रक्रिया में चुनाव लड़ने से वंचित हो गये है। न केवल राजस्थान और हरियाणा सरकार बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी जमीनी सच्चाई को अनदेखा कर देश  के करोड़ों नागरिक वर्ग के साथ अन्याय किया है।
देश भर में तेजी से उभरते उग्र हिन्दुत्ववादी विचारधारा का दायरा आज निस्संदेह बढ़ा है, लेकिन फुले अम्बेडकरवादी चिंतन भारतीय प्रगतिशील दलित और महिला आंदोलन में सभी जगह प्रमुखता से मौजूद है, उसका नेतृत्व कर रहा है. इस पर  गंभीर चर्चा भी हो रही है और उसका विस्तार मुख्य धारा के संघर्ष और विमर्श में हो रहा है।  सावित्रीबाई के संघर्ष , उनका स्त्रीवादी चिंतन स्त्री संघर्षों के लिए अब और आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
( सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक तथा साहित्यकार हैं . संपर्क : sujataparmita@yahoo.com )

स्त्री मुक्ति की नेत्री सावित्रीबाई फुले

रजनी तिलक 
साल का पहला सप्ताह पूरे देश में धूमधाम से उत्साह के साथ मनाया जाता  रहा है. नये साल के साथ नये सकल्प लिए जाते है पुराने संकल्पों का मूल्यांकन किया जाता है . महिलाओ की जिन्दगी और उनके संघर्षो का बिगुल बजानेवाली अनेक विदूषी महिलाओ में सावित्रीबाई फुले नाम अग्रणीय  है. सावित्रीबाई का जन्म महराष्ट्र के पिछड़े समाज में ऐसे समय में हुआ जब स्त्रियों एवं अछूतों के लिए शिक्षा और सम्पति सवर्था वर्जित थी सत्ता सभी स्त्रोतों से उन्हें  बाहर रखा गया था. पुरोहितों और ब्राह्मण  धर्म की दुहाई दे कर पवित्रता के नाम पर अंधविश्वास फैला रहे थे. बाल विवाह प्राय हर समाज की परम्परा थी. पांच छः वर्ष की उम्रमें लड़की की शादी कर दी जाती थी.

3 जनवरी 1831 को महारष्ट्र के नायगाव में पैदा हुई सावित्रीबाई फुले की शादी 1840में, 9 वर्ष की छोटी उम्र में 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुई.सावित्रीबाई जब ससुराल आई तब वे अशिक्षित थी और ज्योतिबा फुले मिशनरीज स्कूल में शिक्षा पाए हुए थे. सावित्रीबाई ने  अपने पति  के सहयोग से 1841 में  मराठी और अंग्रेजी पढना लिखना सिखा और अभ्यास किया. पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी मिसेज मिचेल जो स्त्री शिक्षा की हिमायती थी , के सानिध्य में सावित्रीबाई फुले 1846-47 में नार्मल स्कूल से शिक्षिका का प्रशिक्षण ले कर वे ब्रिटिश भारत में पहली प्रशिक्षित शिक्षिका बनी. अपने अदम्य साहस से अपने पति के साथ कंधे से कन्धा मिला कर  उन्होंने पुरोहितो और धर्मशास्त्रों  के विरुद्ध जा कर स्त्रियों और शूद्रों के लिए शिक्षा की ज्योति जलाई. फुले दम्पति ने  बालिकाओ के लिए पहला स्कूल 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवारपेठ में खोला जिसकी वे प्राचार्य बनी.  चारो तरफ तहलका मच गया सावित्रीबाई फुले का राह  में चलना दूभर कर दिया. सावित्री पर राह चलते लोग कीचड़ – पत्थरों की बौछार करते क्योंकि  तत्कालीन समय में स्त्री शिक्षा धर्माचरण के विरुद्ध थी. 15 मार्च 1848 उन्होंने महारवाडा में जा कर सहशिक्षा विद्यालय शुरू किया.

स्त्री शिक्षा और शूद्रो की शिक्षा के साथ साथ उन्होंने महिलाओ के दमन प्रताड़ना बहिष्करण की जड़ो को तलाश कर उसका खुलासा किया. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर ब्राह्मणवाद और उनके अस्त्र धर्मशास्त्रों को इसका कारण माना अत: उन्होंने न केवल ब्राह्मणवाद का प्रतिकार किया बल्कि उसमे व्याप्त पितृसत्ता की घोर आलोचना की.  महिलाओं के मान को बरक़रार रखने के लिये महिलाओ और शूद्र  के बीच जन चेंतना व जन- आंदोलनों का सूत्रपात किया. उनके विद्यालय में पढ  कर निकली एक छात्रा मुक्ताबाई जो मांग समाज की थी ने शूद्र और शूद्र स्त्रियों के दमन पर बहुत ही मार्मिक लेख लिखा जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज है. वे अछूत और उनकी महिलाओ पर  ढाए गये जुल्मो की दास्तान का साक्ष्य है.

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री सिक्षा की माग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस  में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष चल रहा था , भारत में शूद्रों – अतिशूद्रों  और स्त्रियों के लिए शिक्षा की नीव रख कर सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने  नए युग का सूत्रपात किया. समाज में दबे कुचले  लोगो को शिक्षा देने व उनके अधिकारों की पैरवी करने के कारण 1849 उनेह अपना घर छोड़ना पड़ा. उसी समय उन्होंने  पुना, सतारा, अहमदनगर जिले में 18 पाठशाला खोली. 1 मई 1852 शुद्रो के लिए वेतालपेठ में  विद्यालय खोला जिसकी भूरी भूरी प्रशंसा 29 मई 1852 के समाचार पुणे ऑब्जर्वर में की गयी

13 जनवरी 1852  को उन्होंने  सभी समाज की महिलाओ के साथ मीटिग रख कर मकरसंक्राति बनाने की पेशकश की और साथ में यह बात भी रखी की सभी स्त्रियों को एक तरह का आसन  मुहैया कार्य जाएगा बिना किसी जाति या पक्ष भेदभाव रहित.  तिल गुड कार्यक्रम में सैकड़ो महिलाए आई. महिलाओ को सावर्जनिक जीवन में जाति भेदभाव के बावजूद उनेह एकसाथ लाने का उनका प्रयास अतुलनीय था. 28 जनवरी 1863 से उन्होंने बाल विधवाओ हेतु शेल्टर खोलने प्राम्भ किये . बाल विधवाओ के रिश्तेदारों द्वारा  उन्हें  को फुसला कर उनके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाकर उन पर अनचाहे गर्भ से लाद दिया, जिसके परिणामस्वरूप शरम से वे आत्म हत्या करने हेतु मजबूर होती या प्रसव बाद बच्चे की हत्या करवा दी जाती. ठीक उसी तरह उन्होंने विधवाओं के मुंडन का विरोध किया. नाई समाज के पुरुषो के साथ बैठक करके इस कृत्य को न करने का अनुरोध किया व आन्दोलन चलाया.

सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर सत्यशोधक समाज की स्थपना की. जिसका उद्देश्य था सांस्कृतिक  कार्यक्रमों द्वारा समाज में बदलाव लाना.  सत्यशोधक के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पाखंडवाद की  पोल खोली, सादा समारोह करके सामूहिक विवाह भी कराये. फुले दम्पति  ने अपने मित्रो के साथ मिल कर स्त्रियों की सुरक्षा आर्थिक सामाजिक , राजनीतिक  व  जीवन के सभी क्षत्रो में बराबरी दिलाने के किये शिक्षा से ले कर समाज के धरातल पर खड़े हो कर उनके लिए अनुकूल वातावरण बनाने हेतु सभ्य समाज से गुजारिश की. सती-पुरुष समानता हेतु स्त्रीवादी विचारों को महत्व दिया . छुआछूत की भयावह बीमारी ने शूद्रों  और अतिशूद्रों  के जीवन कष्टमय बना दिया था सन 1868 में  पीने  के पानी के लिए सवर्ण स्त्रियों से चिरोरी करती अछूत औरतो हेतु उन्होंने अपने घर का तालाब खोल दिया जिसके लिए  उसके ससुर  ने उन्हें   खूब डाटा. 1873 में विधवा के पुत्र को गोद ले लिया और उसका पालन-पोषण स्वयं किया.

1876-77 महाराष्ट्र में अकाल पड़ा भुखमरी के इस आलम में बच्चे बूढ़े हजारो की संख्या में मर रहे थे, सत्यशोधक समाज के माध्यम से  पुणे के भीतरी गांवो में वे स्वयं  देखभाल कर रही थी. 2000 से भी ज्यादा निराश्रित बच्चो के खाने पीने की व्यवस्था,  52 भोजन केंद्र व अन्य सुविधा केन्द्रों की स्थापना की. 20  अप्रैल 1877 को ज्योतिबा को पत्र लिख कर उन्होंने गावो की अन्दुरुनी स्थिति की जानकारी दी. 1890 में अपने पति ज्योतिबा के देहांत के बाद किर्या कर्म  पर उठे विवाद के पश्चात उन्होंने स्वयं अपने पति को मुखाग्नि दी. तत्पश्चात 1891 -1897 सत्यशोधक समाज का बखूबी नेतृत्व सम्भाला .. 1885 में  ब्लैकआन्दोलन के नेता टामसन क्लर्क की जीवनी अंग्रेजी में पढ़ी जिससे उनको अछूत और महिलाओ की मुक्ति हेतु  आन्दोलनरत होने की प्रेरणा मिली. 1897 , अभी महाराष्ट्र की जनता अकाल से उबरी भी नहीं थी कि  प्लेग की महामारी ने आ घेरा. गावं के गाव खली होने लगे. सावित्रीबाई ने इस महामारी से निबटने के लिए खुद को झोक दिया. अपने डाक्टर पुर यशवंत की मदद से प्लेग पीडितो की जान बचाने हेतु दूर दराज गावों से मरीजो को निकाल कर लाती. जीवन के अंत में एक अछूत बच्चे को गावं से निकाल कर लाते हुए  ही वो भी प्लेग की  चपेट में आ गयी. 10 मार्च 1897 तक वे जीवन अविराम समाज बदलाव हेतु संघर्षरत रही. सावित्रीबाई फुले से प्रेरणा  ले कर दलित व पिछड़ी महिलाओ ने अपने आन्दोलन को पितृसत्ता और जातिवाद , ब्राह्मणवाद के मूल्य को नकारा है. इसी चश्मे से हम अपने देश के महिला आन्दोलन को देखना चाहेंगे.

बीसवी सदी का 7 वे  दशक में  भारत में महिला आन्दोलन अपनी सुध लेने लगा था. महिलाओ के साथ भेदभाव, दहेजलोभियों द्वारा बहु को जला कर मार देना, या छोड़ देने जैसे कृत्य उभर कर आ रहे थे. प्रतिबंधित घरेलू जीवन ही उसका पर्याय था. पढी-लिखी औरतो ने संघठित हो कर सार्वजानिक रूप से इसका विरोध करना शुरु किया. औरत भी एक इंसान है उसकी भी अपनी एक पहचान है. दहेज़ हत्या, भ्रूण- हत्या, बलात्कार , भरण पोषण, स्वास्थ्य , योंन हिंसा मुद्दों पर जन चेतना अभियान चलाए गये और कानून बनवाये गये.

स्त्रीमुक्ति आन्दोलन के बिन्दुओ को छूते हुए हम वापस 19 वी सदी में लोटते है तो पाएँगे आज हम उन्ही मुद्दों पर लड़ रहे है जिन पर सावित्रीबाई फुले लड़ रही थी जबकि  तत्कालीन समाज आज से ज्यादा  भयंकर व  रुढ़िवादी जातिवादी था, ऐसे विपरीत समय  में वो तूफान बन कर उठ खड़ी हुई थी और निर्भीकता से बाल विधवाओं की, अछूत  महिलाओ की मदद कर रही थी. किसी बाहरी वित्तीय  सहायता से नहीं बल्कि अपने ही संसाधनों और अपनी राजनीति  के सरोकारों के दम पर प्रतिकियावादियों  लोहा ले रही थी. शिशु और महिलाओ को मान देने हेतु प्रसूतिगृह खोला ताकि वे अपने बच्चे को जन्म दे कर वापस अपनी जिन्दगी में  लौट सके.  इस काम के लिए उन्होंने अत्यधिक आलोचना का सामना किया

महिला आन्दोलन ने अपने संघर्षो की लम्बी यात्रा में अनेक पड़ावों को पार किया है. अपने संघर्षो से अनेक कानून पारित कराये है मसलन दहेज विरोधी कानून, भूर्ण हत्या, कार्यस्थल पर योन शोषण, घरेलू हिंसा इत्यादि . महिलाओ को न्याय दिलाने के लिए अनेक संस्थानों की अनुशंसा की जैसे फैमिली कोर्ट, वुमेन सेल, राष्ट्रिय महिला आयोग,  इत्यादी. अपने नारे में कि पर्सनल और पालिटिक्स एक है, बहनापा के छत्र के नीचे सब एक है समान है यंहा तक सामाजिक जिन्दगी और राजनीति एकनिष्ठ है… आदि

35 -40 वर्ष के लम्बे इतिहास में भारतीय स्त्री-मुक्ति महिला आन्दोलन के संघर्ष मध्यम-वर्गीय मुद्दों और वैश्विक सरोकारों को अभिव्यक्त  करते रहे है, जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर एका  तो जाहिर करते है परन्तु देश की बहुसंख्यक आबादी की  दलित आदिवासी,  डीनाटीफाईड, अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओ की  रोजमर्रा की समस्याओं को समझ कर उनके साथ खड़े होने की ललक नहीं देखि गयी.  न ही उस ओर  प्रयास ही हुए है. महिला आन्दोलन की नेत्रियोऔर दलित आन्दोलन के नेताओ और नेत्रियो से इस ओर  ध्यान दिलाते हुए हम उनसे अनुरोध कर रहे है कि अपने बीच सावित्रीबाई फुले जैसे सरल व्यक्तिव  के नाम के  माध्यम से अपने देश और समाज के मुद्दों को उठाने के लिए सावित्रीबाई फुले का जन्मदिनांक  को स्त्री मुक्ति दिवस  की जरुरत को  तर्कसंगत समझते हुए जमीनी स्तर और सांगठनिक स्तर पर मानना शुरू करे  इसी आशय से राष्ट्रिय महिला आन्दोलन दलित अपनी पहल पर, दलित राईट, भारतीय महिला जाग्रति परिषद्, महिला मैत्री, जन विकास महिला फाउंडेशन, सावित्रीबाई फुले महिला संस्था ,युविडीएमाआर, यशोधरा महिला उद्यम ट्रस्ट , संभव नेकडोर एवं अन्य   संस्थाओं ने  मिल कर दिल्ली और अन्य राज्यों में दूसरी बार A.P. Bhavan , Gurajada Conference Hall  में 3 जनवरी  2016   समय 3 बजे मनाया  इस अवसर पर महिलाओ के लिए आरक्षण में आरक्षण और जयपुर में मनु महाराज की मूर्ति हटाने  के अभियान की  शुरुआत की.
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