Home Blog Page 137

ब्राह्मणवाद का प्रतीक है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय

 अरविन्द गौड़


(यह आलेख समकालीन रंगमंच पत्रिका के ‘‘रंगकर्म और प्रशिक्षण‘‘ पर केन्द्रित नये अंक में प्रकाशित होने जा रहे मूल आलेख का एक अंश है, जो अरविन्द गौड़ के साथ पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ रंगकर्मी राजेश चन्द्र द्वारा की गयी बातचीत पर आधारित है। पत्रिका का यह अंक फिलहाल प्रेस में है और इसी भारत रंग महोत्सव के दौरान पाठकों के समक्ष होगा। हमारे विशेष आग्रह पर संपादक ने यह आलेख स्त्रीकाल के पाठकों के लिये उपलब्ध कराया है. आलेख,  इस उम्मीद के साथ कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय वर्तमान व्यवस्था के तहत अपनी ब्राह्मणवादी जड़ता से मुक्त होने की ओर बढ़ेगा. )





भारत में नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी जो सबसे कड़वी सच्चाई है, वह यह कि यहां नाट्य प्रशिक्षण सिर्फ एक संस्थान की परिधि तक सीमित रह गया है। ऐसी धारणा स्थापित कर दी गयी है कि आप यदि एनएसडी से प्रशिक्षित हैं तो ही आप प्रशिक्षित हैं, अन्यथा आप प्रशिक्षित नहीं हैं, आप अमैच्योर हैं। एक साज़िश के तौर पर स्थापित की गयी इस धारणा से पूरे हिन्दुस्तान के थियेटर का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है। निस्संदेह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसने थियेटर की समझ बनाने में, उसके तकनीकी विकास में एक बड़ी भूमिका निभायी है, लेकिन जो भी लोग वहां से निकल कर आये, उनका सिर्फ ट्रेनिंग से काम नहीं चला। उन अभिनेताओं ने, निर्देशकों ने बाहर जाकर काम किया, अपने आप को एक्सप्लोर किया तब कहीं जाकर वे अपनी पहचान बना पाये।

ऐसे प्रशिक्षण संस्थान की अलग-अलग भाषाओं में ज़रूरत थी, लेकिन हुआ उल्टा। एक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तो बनाया गया, लेकिन उसका विकेन्द्रीकरण नहीं किया गया। तो जिस प्रशिक्षण को लोगों तक भाषा के स्तर पर, बोलियों के स्तर पर पहुंचना चाहिये था, वह राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली तक सीमित हो कर रह गया। भारतीय रंगमंच में प्रशिक्षण की जो संभावनाएं थीं, वे सांस्कृतिक नीति और दृष्टि के अभाव में एक सीमित दायरे में क़ैद होकर रह गयीं। दूसरा यह कि आप किस तरह का प्रशिक्षण दे रहे हैं, किस तरह का प्रशिक्षण होना चाहिये, प्रशिक्षण क्यों होना चाहिये या भाषा और समाज और व्यक्ति का क्या सम्बन्ध है, इन बुनियादी सवालों को बिल्कुल नज़रअन्दाज़ कर दिया गया।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को लेकर यह परिकल्पना थी कि कुछ छात्र आयेंगे जिन्हें प्रशिक्षण देना है। आप किस भाषा में प्रशिक्षण देंगे इसका कोई मापदंड नहीं था। अब कोई केरल से आ रहा है, कोई आंध्र से आ रहा है, कोई असम से आया है, आप उन सब को दिल्ली में बुला कर हिन्दी के नाटक करा रहे हैं। मतलब उनकी मौलिकता को ख़त्म कर रहे हैं। हिन्दी में नाटक कराने का मतलब राष्ट्रीय हो जाना नहीं है। असम का लड़का अगर अपनी असमिया भाषा में प्रशिक्षण ले, केरल का लड़का वहीं पर ले, आंध्र का लड़का वहीं पर ले, यहां तक कि भागलपुर का लड़का अपनी भाषा में प्रशिक्षण ले तो वह ज़्यादा काम कर सकता है और अलग चीज़ें एक्सप्लोर कर सकता है।

प्रशिक्षण

तो यह जो प्रशिक्षण को कण्ट्रोल किया गया है, उसकी वजह से पिछले 50-60 सालों में जो भारतीय स्वरूप बनना चाहिए था रंगमंच का, वह नहीं बन पाया। बार-बार यह सवाल उठा है कि अगर एनएसडी का डिसेन्ट्रलाइजे़शन हो जाये तो शायद यह बंद न हो जाये। हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय कहते हैं, लेकिन राष्ट्र का स्वरूप क्या है, नेशनैलिटी क्या होती है इसे बिना सोचे-विचारे इन सब को हमने केंद्र में लाकर रख दिया। कहने को हमारे पास राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थान है, लेकिन उस संस्थान का पूरे देश के रंगमंच में क्या वाकई कोई योगदान है, इसको भी देखने की ज़रूरत है।

डिसेन्ट्रलाइजे़शन नहीं होने की वजह से ही आज यह हालत है कि अलग-अलग भाषाओं में नहीं, बल्कि भाषाओं को कण्ट्रोल करके जब तक आप सिर्फ़ हिन्दी में नाटक कर रहे हैं, तब तक तो आप नाटककर्मी या निर्देशक हैं, अन्यथा आपको कोई पूछने वाला नहीं है। अगर आप पर मुहर लग जाती है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तो आप हैं, वरना आप चाहे कितने ही बड़े एक्टर हो जाइये, लेकिन आपके पास एनएसडी की मुहर नहीं है तो आप बेकार हैं। यह जो नज़रिया पनपा है, इसका नुकसान काफी हुआ है। नतीज़ा यह हुआ कि रंगमंच से जहां भाषा का विकास होना चाहिये था, वह और भी गतिरुद्ध ही होता गया। हिन्दी में आज जो भी ख्यातिप्राप्त निर्देशक मौजूद हैं, उनमें से अधिकतर हिन्दी की पृष्ठभूमि से नहीं बल्कि अन्य भाषाओं से आये हैं। चूंूंकि शुरुआत से ही हमने उन्हें  हिन्दी तक सीमित कर दिया, इसलिये वे अक्सर मजबूरीवश हिन्दी में थियेटर कर रहे हैं।
तो प्रशिक्षण का यह जो एक संकीर्ण और नकारात्मक रवैया रहा, उसके कारण ट्रेनिंग की जो अहमियत थी और जो सिस्टमैटिक चेन्जेज़ आने चाहिये थे, उनका पूरा पूरा अभाव दिखा। 60 सालों के बाद भी हम बार-बार यह बात करते हैं कि डिसेन्ट्रलाइजे़शन होना चाहिये, यह होना चाहिये, वह होना चाहिये। इसी का दूसरा पहलू है कि पूरे देश भर में अभिनय प्रशिक्षण का व्यवसायीकरण हुआ और कुशल व्यापारियों ने प्रशिक्षण के नाम पर तीन-तीन महीने की दूकानें खोल लीं। ये दूकानें अभिनय के प्रशिक्षण को और ही दिशा में ले जाती हैं। आप एडमिशन लीजिये और अंततः आपका लक्ष्य मुंबई में है।

रंगमंच के प्रशिक्षण के बाद क्या करना है, किस तरह से रोज़गार की व्यवस्था होगी, किस तरह से समाज में जायेंगे, इसका कोई व्यापक ब्लूप्रिंट एनएसडी के पास नहीं था। नतीज़ा यह हुआ कि वहां से निकलने वाले अधिकांश अभिनेता सिनेमा में चले गये। जिनको पैसा और ख्याति प्राप्त हो गयी, उन्हें लगा कि यह तो बहुत बड़ा माध्यम है। किसी माध्यम में जाना ग़लत नहीं है, लेकिन रंगमंच का प्रशिक्षण लेने के बाद अभिनेता का एक मात्र लक्ष्य सिनेमा हो जाता है तो कहीं न कहीं प्रशिक्षण में कुछ ख़ामी है, कुछ गड़बड़ी है जिसकी छान-बीन करने की ज़रूरत थी, पर आज तक यह नहीं की गयी। नतीज़ा यह है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का कोई प्रोफेसर रिटायर होता है तो अपना भविष्य थियेटर में नहीं तलाश करता है, वह अपना भविष्य हिन्दी सीरियल में या सिनेमा में तलाश कर रहा होता है। इससे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है। यह अपने आप में एक त्रासद और हास्यास्पद स्थिति है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो ज़िन्दगी भर रंगमंच के प्रति प्रतिबद्धता की बात करते नहीं थकते, उनको आगे के विकास के रास्ते थियेटर में नहीं मिलते। आखि़र इनके अनुभव का लाभ अगली पीढ़ी को क्यों नहीं मिल पाता? उनको वैकल्पिक रास्ते तलाश करने पड़ते हैं, दिल्ली छोड़ कर मुम्बई में रहना पड़ता है।

रंगमंच के प्रशिक्षण के सन्दर्भ में जो सबसे बड़ी ख़ामी हमारे पूरे सिस्टम में है, वह यह कि वहां एक्टर को संभालते नहीं है। समाज में क्या हो रहा है, क्या अंतद्र्वद्व हंै, क्या चुनौतियां हैं, सोशल-पाॅलिटिकल इश्यूज़ क्या हैं, हमारे आसपास किस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं, जातिगत ढांचा क्या है, हमारी धार्मिक भावनाओं और उनके पीछे के आडम्बर के बीच में क्या है, हमारा समाज कहां जा रहा है- यानी जो सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल समाज में दिखाई देती है, वह थियेटर में नहीं आ रही है। प्रशिक्षण में तो निश्चित रूप से नहीं आ रही है।

नाटक में तो कभी-कभार मंच पर खड़ेे होकर आप किसी मुद्दे पर बातें कर लेते हैं, लेकिन हाॅल से बाहर आने के बाद आपका कोई कन्सर्न या जुड़ाव नहीं रहता। कहने को आप सामाजिक नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में समाज से एक्टर जुड़ेे यह काम प्रशिक्षण करता है। प्रशिक्षण के अभाव में समाज से आपका वास्तविक रिश्ता नहीं बनता, सिर्फ नाट्य रिश्ता बनता है, व्यावसायिक अथवा प्रोफेशनल रिश्ता बनता है। वहां से आप रिसोर्सेज़ को उठा कर ले आते हैं और इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन उस समाज के प्रति आपकी ज़िम्मेदारी कुछ नहीं है। समाज के साथ कोई गहरा जुड़ाव नहीं होने की वजह से ही प्रशिक्षण के बाद एक्टर इधर-उधर भाग जाते हैं। अवार्ड के लिये या किसी और चीज़ के लिये जुगाड़बाज़ी और बहुत ही निकृष्ट किस्म के समझौते करते हुए दिखाई देते हैं। अगर आप समाज से थियेटर को जोड़ते हैं, तो रीढ़ की हड्डी बनेगी एक अभिनेता की, उसको मालूम होगा कि क्या चल रहा है। तो मुझे लगता है एक चालू किस्म का प्रशिक्षण काफी नहीं है। प्रशिक्षण का जुड़ाव आगे व्यापक रूप में समाज के साथ होना ज़रूरी है।

प्रशिक्षण के बाद हम देखते हैं कि एक्टर के पास रोज़गार की बहुत ज़्यादा संभावनाएं नहीं हैं। आपने उसके लिये कोई ढांचा नहीं बनाया तो उसका भी एक प्रभाव पड़ता है। पिछले 60 साल में, मुझे लगता है संस्थागत प्रशिक्षण के मामले में समाज पीछे रह गया है। देश के अंदर क्या चल रहा है, इससे हमारे प्रशिक्षण का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता। दिल्ली के अंदर होते हुए भी, मात्र चार किलोमीटर दूर भ्रष्टाचार का आन्दोलन हो रहा है, लेकिन उसके प्रति उसकी कोई संवेदना नहीं है। दामिनी वाली घटना मंडी हाउस से पांच किलोमीटर दूर हो रही है, लेकिन संस्था का उससे कोई जुड़ाव नहीं होता। हमारे आसपास लगातार धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ता जा रहा है, असहिष्णुता बढ़ती जा रही है, एक दूसरे के प्रति भरोसा ख़त्म होता जा रहा है, लेकिन आपका उससे कोई जुड़ाव नहीं है, न आप कोई जुड़ाव रखना चाहते हैं। किसी भी समाज से कट कर मनुष्य का प्रशिक्षण नहीं हो सकता, विशेष कर संस्थागत प्रशिक्षण तो बिल्कुल भी नहीं।

अरविंद गौड़ विद्यार्थियों के बीच

जहां तक पाठ्यक्रम की बात है, तो वह भी 30-40 साल पुराना है। आज तक पाठ्यक्रम की समीक्षा तक नहीं हुई है। आप कब तक उधार की चीज़ों से प्रशिक्षण देते रहेंगे? एक्टर को जो संस्थागत प्रशिक्षण दिया जा रहा है वह भी काफी महंगा है। महंगा सेट, महंगे काॅस्ट्यूम, सब चीज़ महंगी, पूरा माहौल ही पैसा खर्च करके तमाशा देखने वाला। भारतीय ज़रूरतों के हिसाब से यह प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय रंगमंच को किफ़ायती बनाना ज़रूरी है। सेट, काॅस्ट्यूम वगैरह का कम खर्चीला होना बहुत ज़रूरी है। क्रियेटिव होकर साधारण चीज़ों से नाटक करना ज़रूरी है।

जब आप प्रशिक्षण देते हैं छात्र को, तो उसे वे सभी मनमाफिक साधन सौंप देते हैं जो उसे बाहर नहीं मिलेंगे। एक्टर को जब ये साधन बाहर नहीं मिलते तो प्रशिक्षण से उसने जो क्षमता हासिल की है, वह उसके अनुसार काम नहीं कर पाता। इससे पता चलता है कि आप छात्र के लिये दिक्कतें पैदा कर रहे हैं। आप क्यों उसे बाहर की ज़रूरतों के हिसाब से, हमारे समाज की ज़रूरतों के हिसाब से, भाषा के हिसाब से, राज्यों के हिसाब से, हमारे क्षेत्रीय और आसपास के जो जुड़ाव हैं, उन चीज़ों के हिसाब से प्रशिक्षण नहीं देते? यह सिर्फ तभी हो सकता है, जब आप छात्रों को प्रत्येक राज्य के पास जाने दीजिये, हर भाषा और बोली के पास जाने दीजिये। आप नियंत्रण मत कीजिये, शायद वह अपने आप समाज से टकराते टकराते चीज़ों को बदल दे। मुझे लगता है यह सबसे बड़ी दिक्कत है हमारे प्रशिक्षण की।

आप समाज से अलग नहीं हैं, आप उसका हिस्सा हैं। आप बाकी समाज को नीची नज़र से देखेंगे या कहेंगे कि आप ही का प्रशिक्षण प्रशिक्षण है, बाकी कोई काम नहीं कर रहा है, तो यह एक नकारात्मक पहलू है। दूसरी तरफ़ एक और परम्परा है, जो इप्टा की परम्परा है कि ग्रुप अपने लोगों को खुद ही प्रशिक्षित करता है। वह जो परम्परा है, वह आज सबसे ज़्यादा ताक़तवर दिखायी देती है। वह बंगाल के खेमे में दिखायी देती है- चाहे श्यामानन्द जालान हांे, उत्पल दत्त हों, शम्भू मित्र हों, वे स्वयं को और अपने अभिनेताओं को हर चीज़ में स्वयं प्रशिक्षित करते थे। यह एक कठिन प्रशिक्षण होता है, जिसमें कड़े अनुशासन की उपस्थिति होती है।

महाराष्ट्र में ही देखिये, वहां तो कोई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नहीं बैठा हुआ है, फिर एक से एक जो बढ़िया अभिनेता हमें दिखायी पड़ते हैं वहां पर, उनको किसने प्रशिक्षित किया है? एनएसडी ने तो नहीं किया। वे उन परम्परागत समूहों में रहते हुए प्रशिक्षित हुए हैं, जो सांस्कृतिक आन्दोलन के बीच से निकल कर आये थे। पूरे गुजरात में या आन्ध्र के अंदर जो बड़े-बड़े अभिनेेता पनपे, उनमें से कितने थे जिनका एनएसडी से कोई लेना-देना रहा है? तो कर्नाटक से लेकर विभिन्न राज्यों के समूहों के अंदर ट्रेनिंग की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसका एक स्पष्ट स्वरूप अब बनता दिखायी दे रहा है। उन सबकी भूमिका को नकार कर, एक दंभ के साथ जब आप कहते हैं कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने भारत के रंगमंच में सबसे बड़ी भूमिका अदा की तो यह एक बहुत बड़े झूठ से ज़्यादा कुछ नहीं है।

टीम कबीरा खडा बाजार में

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जब नहीं था, तब क्या पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, शम्भू मित्र और उत्पल दत्त नहीं थे? या हबीब तनवीर नहीं थे क्या ? औरों को छोड़िये, इब्राहिम अल्काज़ी खुद नहीं थे क्या? इब्राहिम अल्काज़ी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित छात्र नहीं हैं। तो यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम सिर्फ एक संस्थान का इतना आतंक फैला दें, कि सिर्फ उसने ही थियेटर में काम किया है, सिर्फ वही अंतिम संस्थान है, यह अपने आप में एक ऐतिहासिक झूठ है, भूल है। आपके पास सरकारी संसाधन हैं, तो आप उन संसाधनों के बल पर एक झूठ फैला चुके हैं कि आपने ही थियेटर के प्रशिक्षण में काम किया है, हालांकि इससे तथ्य नहीं बदल जायेंगे। उससे पहले अनगिनत लोगों ने बेहद महत्वपूर्ण काम किया है। बंगाल में तापस सेन ने प्रकाश से संबंधित जितने अनूठे प्रयोग किये, क्या आज तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में वैसा कुछ हो पाया?
ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। जब उत्पल दत्त कोलकाता के मैदान में नाटक करते थे, तो जो दर्शक उनको मिलते थे, कई बार 8 से 10 लाख तक, इतने दर्शक क्या इस संस्थान को 50 साल में भी मिले हैं? इसके भारत रंग महोत्सव जैसे आयोजन के अंदर कुल मिला कर जितने दर्शक आते हैं, उतने दर्शक हमारे एक दिन के नुक्कड़ नाटक में होते हैं। हम सुबह नुक्कड़ नाटक शुरू करते हैं, शाम तक अगर हम 20 नुक्कड़ नाटक करते हैं तो हमें उससे ज़्यादा दर्शक मिल जाते हैं। तो यह समझना बहुत ज़रूरी है कि प्रशिक्षण के लिये सिर्फ एनएसडी ही अंतिम जगह नहीं रही है। उसका योगदान है, योगदान को हम मना नहीं कर रहे हैं, लेकिन समानांतर रूप से दूसरे लोगों के योगदान को भी हम छोटा नहीं कर सकते।

यह एक महत्वपूर्ण बात है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों में आकर हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं। जहां से आप निकले हैं, जहां लौट कर आपको काम करना चाहिये, जिनके साथ आपको जुड़ना चाहिये, उस जगह और वहां के लोगों को आप हिकारत के साथ देखने के आदी बन जाते हैं। कहीं न कहीं इसकी जडें़ प्रशिक्षण के अंदर हैं, जहां पर उनको बाक़ी समाज से काट दिया जाता है, और काटने के बाद बताया जाता है कि आप विशिष्ट हैं। इस तरह कुछ-कुछ वैसी ही मानसिकता, वैसा ही बोध आपके अंदर भरा जाता है, जैसे एक ज़माने में कहा जाता था कि आप आर्यन रक्त हैं, शुद्ध रक्त वाले हैं, और बाक़ी यहूदी और आप उन पर राज करने के लिये निकल पड़तेे थे। तो यह जो एक आक्रामकता, या कहिये कि विशिष्टताबोध छात्रों में पनपता है, यह प्रशिक्षण की बहुत बड़ी खामी है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आज ब्राह्मणवाद का प्रतीक बन गया है। उसका मानना है कि हम जो कर रहे हैं वही श्रेष्ठ है, वही मानक है। हम जो बोल रहे हैं वही सच है। ब्राह्मणवाद के इसी गढ़ को बचाये रखने के लिये विगत साठ सालों में हिन्दुस्तान में और प्रशिक्षण संस्थान खुलने नहीं दिये गये। वे आज तक नहीं खुल पाये क्योंकि आप रेसिस्ट हैं। जैसे शूद्रों को गीत नहीं सुनना चाहिये, इसलिये उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल देते थे, बिल्कुल इसी प्रकार, आप जो प्रशिक्षण दे रहे हैं वही अंतिम है, और बाकी लोगों को उसे नहीं सुनना-सीखना चाहिये, इसके लिये आप जिनको प्रशिक्षण देते हैं, उनके अंदर एक ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताबोध उत्पन्न करते हैं। यह बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण है, यह सामंती दृष्टिकोण है कि हमारे पास जो है वह दूसरों के पास नहीं होना चाहिये। इसकी वजह से डिसेन्ट्रलाज़ेशन नहीं हो पाया है। अगर डिसेन्ट्रलाज़ेशन हुआ होता तो ये क़िले टूटते, क़िलेबंदी टूटती, वह आर्यवादी-सवर्णवादी व्यूह टूट जाता जो आज तक क़ायम है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ शो

हमारे संस्थानों में दिये जाने वाले तथाकथित प्रशिक्षण की यह बहुत बड़ी कमी है कि वह समाज और देश से नहीं जुड़ पाया। उन अनगिनत लोगों के अनुभव और योगदान को नकार कर, जिन्होंने हिन्दी और भारतीय रंगमंच के विकास के लिये अपना जीवन लगाया, क्या रंगमंच की कोई शिक्षा पूरी हो सकती है? आप सामाजिक-राजनीतिक रंगमंच की हमारी समृद्ध परंपरा को इसलिये नकारते हैं, क्योंकि आप सरकार से मदद लेते हैं। सरकार यदि अपना दायित्व समझ कर भी मदद देना चाहे, तब भी आप अतिरिक्त वफ़ादारी दिखाने के लिये सरकारी अफसरों, सचिवों-उपसचिवों की चमचागिरी में घुटनों के बल रेंगने लगते हैं। यह जो एक जुगाड़बाज़ी हमारे संस्थानों में आ गयी है, उसने प्रशिक्षण का बहुत नुकसान किया है। जब उनके अपने आदर्श नहीं होंगे, अपना दृष्टिकोण नहीं होगा तो छात्रों तक क्या पहुंचेगा। कोई भी संस्थान वहां के कर्मचारियों से, शिक्षकों से और अपने माहौल से बनता है। हम नाटकों में तो शोषण के खि़लाफ़, असमानता के खि़लाफ़ आवाज़ उठाते हैं, पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ही बात करें तो वहां पर पिछले 10-15 सालों से अस्थायी कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिनके बारे में आप ख़ामोश बने रहते हैं। नाटक में क्रांति कर देंगे, भ्रष्टाचार, जातिवाद और ग़रीबी जैसे तमाम मुद्दों पर बात कर लेंगे, लेकिन व्यवहार में सब उल्टा हो जाता है। संस्था के इस माहौल का प्रशिक्षण पर असर पड़ना लाज़िमी है।

अस्मिता थियेटर में हमारा जो प्रशिक्षण का तरीका है, उसमें हम अभिनेता को पहले इन्सान बनाते हैं, एक्टर बाद में बनाते हैं। अच्छा इन्सान बनेगा तो एक्टर अपने आप बन जायेगा। पहले अच्छा इन्सान बनाना हमारी प्राथमिकता में है, एक्टर बनाने की प्रक्रिया बाद में शुरू होती है। रंगकर्मी को पहले पता होना चाहिये कि समाज में क्या चल रहा है, आसपास क्या घटित हो रहा है, सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे क्या होते हैं, हमारे समाज के अंतर्विरोध क्या हैं, जातिगत सम्बन्ध किस तरह चीज़ों को प्रभावित करते हैं, शिक्षा में असमानता क्यों है, लैंगिक भेदभाव क्यों है या अमीरी-गरीबी और छोटा आदमी बड़ा आदमी क्यों है। शहर के अंदर स्लम की समस्या, सरकारी अस्पतालों की बदहाली, किसानों की समस्या, सरकार के वादों और उनके अमल में अंतर जैसे तमाम मुद्दे हमारे लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं, और इनसे रूबरू होते हुए हमारे एक्टर संवेदनशील बनते हैं।
हमारा तरीक़ा है कि एक्टर खुद को पढ़ने के साथ-साथ समाज को भी पढ़े और क़िताबों को भी। इस तरह उसके अंदर परिवर्तन की शुरुआत होती है। हम उनको क्लासरूम प्रशिक्षण नहीं देते, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं और एक ऐसी प्रक्रिया से गुज़ारते हैं, जिसमें उन्हें प्रेमचन्द, मंटो, यशपाल, भीष्म साहनी, कृष्णचंदर, इस्मत चुगतई, उदय प्रकाश, श्रीलाल शुक्ल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, सर्वेश्वर जैसे प्रमुख साहित्यकारों की लेखनी को भी जानने का मौक़ा मिलता है। समान रूप से उन्हें अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य से भी जुड़ने के लिये प्रेरित किया जाता है। हम उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर काम करने का व्यावहारिक अनुभव लेने देते हैं। इससे उनका अनुभव बढ़ता है, उनके अंदर सवाल पैदा होते हैं और उनका दृष्टिकोण बड़ा होता है।
हमारे पास लड़के उसी समाज से आते हैं, जिस समाज के अंदर समस्याएं हैं। वे उन समस्याओं को समझने से लेकर उससे निकलने का रास्ता खुद एक्सप्लोर करते हैं। हम उन्हें उपदेश नहीं देते कि आप जेन्डर से सम्बंधित भेदभाव मत करो। हम उन्हें एक बराबरी की भावना से युक्त माहौल में डालते हैं ताकि वे अपने अनुभव से सीखें। तो इस प्रकार जब बुनियादी मुद्दों से उनकी ट्रेनिंग शुरू होती है, तो अभिनेता स्वदेश दीपक के ‘कोर्ट मार्शल‘ जैसे नाटक को समझ के कर पाते हंै। वे ‘अ वूमैन एलोन‘ और ‘अम्बेडकर और गांधी’ जैसे नाटक को एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करके हज़ारों छात्रों के बीच लेकर जा सकते हंै, उन पर शिद्दत के साथ बात कर सकते हैं।

‘अम्बेडकर और गांधी’ सिर्फ वही अभिनेता कर सकता है, जो इस समाज के अंतर्द्वन्द्व  को समझ पा रहा हो। जो यह जानता हो कि जाति क्या होती है, वर्ण व्यवस्था क्या होती है, सवर्ण और अवर्ण के बीच के संघर्ष क्या हैं, किस तरह से दलित आन्दोलन खड़ा हुआ और आज वह कहां तक पहुंचा है। समाज में आज भी जाति ख़त्म क्यों नहीं हो रही, इलेक्शन के वक्त जाति कैसे मुद्दा बन जाती है, जब इन मुद्दों को वह समझ पायेगा तब ही ‘अम्बेडकर और गांधी‘ को कर पायेगा। यह हमारे लिये सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं है, हमारे प्रशिक्षण का आधार भी है। इसके माध्यम से हम आज़ादी के पूरे आन्दोलन को समझा पाते हैं, साथ ही आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक आज़ादी के मायनों को भी समझा पा रहे हैं।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का सबसे बड़ा दोष है कि वह उस तरफ़ देख ही नहीं पाता। वहां के छात्रों को इन आन्दोलनों के बारे में ख़बर भी नहीं होगी कि इनका अर्थ क्या है। हमें अभिनेता को अलग से ट्रेन्ड करने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि साम्प्रदायिकता क्या होती है। वह ‘अमृतसर आ गया‘ जैसा नाटक पढ़ रहा होता है, कर रहा होता है, उसकी स्क्रिप्ट बना रहा होता है, तो उसका प्रशिक्षण खुद ब खुद उसी के साथ-साथ चल रहा होता है। हम उन्हें क्राफ्टमैन नहीं बनाते, बल्कि समझदार और संवेदनशील बनाने का प्रयास करते हैं। उन्हें समकालीन आन्दोलनों के साथ जोड़ते हैं, खुद भी जुड़ते हैं। एक थियेटर की संस्था भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आन्दोलन की नींव बनती है, इससे बड़ी ताक़त प्रशिक्षण की क्या हो सकती है? हमारा अभिनेता हड़बड़ी में नहीं है कि प्रशिक्षण लिया और चले गये मुम्बई, या यहां-वहां ऑडिशन देते फिर रहे हैं। अस्मिता थियेटर ग्रुप ने अपना प्रशिक्षण हबीब तनवीर, शम्भू मित्र, उत्पल दत्त, बलराज साहनी, गुरुशरण सिंह, सफदर हाशमी और इप्टा आन्दोलन की पूरी परंपरा से विकसित किया है। हमारी प्रशिक्षण पद्धति में इस समूची विरासत से आयी हुई पूंजी है, जिसको हम युवाओं के साथ साझा करने की कोशिश कर रहे हैं।

हबीब तनवीर का प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर

इस समय अस्मिता जैसा प्रशिक्षण कई अन्य संस्थाएं भी अलग-अलग स्तरों पर दे रही हैं। वे अपने-अपने समूहों और इलाक़ों में काम करने की कोशिश कर रही हैं। यह प्रशिक्षण की एक समानान्तर और बहुव्यापी पद्धति है। ऐसा नहीं कह सकते कि यह सिर्फ एक क़बीले के अंदर मिलेगी। क़बीले में तो सरकारी पद्धति होती है। इस पद्धति के अन्तर्गत आज सैकड़ों विद्यार्थी काम कर रहे हैं, और ऐसा नहीं है कि उनके अभिनय में कोई कमी है। रंगमंच से लेकर व्यावसायिक माध्यमों एवं सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के मामलों में भी इस धारा के विद्यार्थियों ने हर बार खुद को श्रेष्ठ साबित किया है।

चूंूंकि हमें अभिनेता को तैयार करना है, सिर्फ मानसिक तौर पर ही नहीं बल्कि शारीरिक तौर पर भी करना है, इसलिये हम उन्हें शारीरिक प्रशिक्षण भी देते हैं। आवाज़ से लेकर तमाम जो अभिनय के पक्ष हैं, उन पर व्यावहारिक रूप में काम करने की कोशिश करते हैं। यह व्यावहारिक प्रशिक्षण रोज़ाना 8 से 10 घंटे तक चलता है, और एक तरफ वह संस्थागत प्रशिक्षण है जो एक चारदीवारी में बंद कमरों में चल रहा है। दोनों ही प्रशिक्षण के तरीकों को हमें देखना पड़ेेगा।

हम देखेंगे कि अस्मिता के स्कूल का जो प्रशिक्षण है, वह सीधे समाज से मुख़ातिब है। नुक्कड़ नाटक हो रहे हैं, पढ़ाई हो रही है, छोटे-छोटे संवाद हो रहे हैं, कॉलेज में छात्रों के बीच में यह सब हो रहा है। यह प्रशिक्षण व्यावहारिक है और हिन्दुस्तान में इसी तरह के प्रशिक्षण की ज़रूरत है। हिन्दुस्तान के थियेटर को इप्टा की, हबीब तनवीर की, उत्पल दत्त की, शंभू मित्र की ज़रूरत है, गुरुशरण सिंह की ज़रूरत है जो आतंकवाद के समय में भी गांव-गांव में जाकर नाटक कर रहे थे, धमकियों के बाद भी जिनको सुनने के लिये लाखों लोग खड़ेे हो जाते थे, या सफ़दर जैसे रंगकर्मी की, जिन्होंने जनता के तमाम मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक किया। ऐसे बहुत सारे समूह और लोग हैं जो पटना, भागलपुर, बेगूसराय, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, आज़मगढ़, कानपुर, भोपाल, उज्जैन, चंडीगढ़, कुरुक्षेत्र, हिसार, रायगढ़ आदि से लेकर देश के सुदूर इलाक़ों, गांवों-कस्बों में काम कर रहे हैं, जिन्होंने बिना किसी करियरवादी या पैसा कमाऊ मक़सद के, गुमनाम रह कर रंगकर्म के लिये अपनी ज़िन्दगी न्योछावर की है और कर रहे हैं। उन सबके त्याग और तप से भरे योगदान को नकार कर, उस पद्धति को नकार कर आप कहें कि हम ही श्रेष्ठ हैं, किसी को भी भला कैसे स्वीकार्य हो सकता है? हिन्दुस्तान के थियेटर में जो प्रशिक्षण की पद्धति विकसित हो रही है, वह जनता के बीच में सीधे-सीधे काम करने वाले समूहों में हो रही है, ऐसे समूह जो सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से सीधे-सीधे टकरा रहे हैं और यही उनकी ताक़त भी है।

अस्मिता के नाटकों में दर्शकों को भी हम ऑडिटोरियम में बातचीत करके ट्रेन्ड कर रहे होते हैं। समाज में नाटक की भूमिका सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं होती। सिर्फ व्यवसाय करना यदि उसका मक़सद हो तो वह और कुछ भले हो, नाटक नहीं हो सकता। आप सोशल-पाॅलिटिकल थियेटर करके भी प्रोफेशनल हो सकते हैं, अपने पैरों पर खड़ेे हो सकते हैं। आज अस्मिता थियेटर अपने पैरों पर खड़ा है, तो वह किसी ग्रांट के सहारे नहीं खड़ा है, बल्कि अपनी कार्य-पद्धति की वजह से ही खड़ा हुआ है। हमने समझौते नहीं किये इसलिये अपनी ठसक के साथ काम कर रहे होते हैं। तमाम ख़तरों को उठा कर काम कर रहे होते हैं।

तो यह जो ख़तरे उठाने वाली प्रशिक्षण पद्धति है अभिनेता को तैयार करने की, वह ऐसा अभिनेता तैयार करती है जो समाज को समझे, समाज के साथ जिसका एक सम्बन्ध हो, जो खुद को समझे, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में क्या-क्या बदलाव आ रहेे हैं, क्या चुनौतियां आ रही हैं, केवल भारत के स्तर पर ही नहीं, दुनिया के स्तर पर भी क्या बदलाव आ रहे हैं, मार्केट कैसे मनुष्य को कुचल कर आगे बढ़ रहा है, कॉरपोरेट कैसे सरकारें बना रहे हैं, कैसे सरकारों को अपने इशारे पर नचा रहे हैं- अगर अभिनेता की नज़र इन चीज़ों पर नहीं है, तो अभिनेता कभी भी जी.पी. देशपांडे जैसे लेखकों के नाटक नहीं कर सकता। वह राजेश कुमार के नाटक नहीं कर सकता, अगर वह समझ नहीं पा रहा कि सत्ता में बैठे कुछ लोग कैसे समाज में लोगों का शिकार करते हैं, कैसेेे राजनीति के शीर्ष स्तर पर धर्म के नाम पर उत्पीड़न किया जाता है, कैसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और धार्मिक उन्माद को वोट बैंक में बदला जाता है।

अगर प्रशिक्षण इन सवालों से बचने की कोशिश कर रहा है, तो आप वास्तविक अभिनेता को तैयार नहीं कर रहे। आप अभिनेता के नाम पर एक क्राफ्टमैन बना रहे हैं, पर इस तरह तो आप उसे एक आधा-अधूरा प्रशिक्षण देकर छोड़ देंगे। अस्मिता जैसे समूह इन मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत में यह पद्धति जो लोगों से जुड़ी हुई है, उसकी ज़रूरत है। आगे आने वाले समय में इसी पद्धति का बोलबाला देश में दिखाई देगा। आज प्रमुख भूमिका इसी प्रशिक्षण की है जो छोटे-बड़े समूहों के अंदर दिये जा रहे हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कौन से छात्र जा रहे हैं? वे इन्हीं समूहों से निकल कर, यहीं से ट्रेन्ड होकर तो जा रहे हैं। अगर आप कहते हैं कि आप तीन साल में अभिनेता बना देते हैं, तो आप एकदम नौसिखिया को लीजिये न। लेकिन नहीं, आप आवेदकों से यह अपेक्षा रखते हैं कि उसने पहले काम किया हो, तीन साल या पांच साल काम किया हो, पांच-छह नाटकों में काम किया हो। क्यों नहीं आप इन शर्तों को हटा देते हैं? एकदम नये को लीजिये जो थियेटर करना चाहता है।

वास्तविकता यही है कि आप उन्हीं समूहों से छात्र ले रहे हैं, आप उन्हीं समूहों पर निर्भर हैं जो ज़िन्दगी के साथ प्रशिक्षण को जोड़ रहे हैं, फिर यह अहंकारवादी दृष्टिकोण क्यो? जब तक यह समाप्त नहीं होगा, हमारे नाट्य विद्यालय की प्रशिक्षण पद्धति देश के काम नहीं आयेगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि थियेटर की ज़रूरत क्या है? वह समाज के लिये है या समाज थियेटर के लिए है? हमें नाटक करने समाज में ही जाना है, समाज हमारे पास नाटक देखने क्यों आयेगा? लोगों के पास जाने की ज़रूरत हमें है। आप प्रशिक्षण को समाज-निरपेक्ष बना देते हैं, थियेटर को इतना महंगा बना देते हैं कि बिना ग्रांट के, बिना सरकारी मदद के थियेटर नहीं हो सकता। छात्र को प्रारंभ से ही सरकारी संरक्षण, सरकारी ग्रांट पर आधारित काम करने का आदी दिया जाता है, चाहे ट्रेनिंग के दौरान उसे मिलने वाली छात्रवृत्ति हो, या उसके बाद मिलने वाली स्काॅलरशिप, परियोजना कार्य, इन्डीविजुअल ग्रांट अथवा प्रोडक्शन ग्रांट। कहीं न कहीं यह निर्भरता ट्रेन्ड एक्टर को भी कमज़ोर करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकलने वाला छात्र एक्टिंग के हथियारों से लैस है, लेकिन उस हथियार का इस्तेमाल संस्कृति मंत्रालय करेगा, मानव संसाधन मंत्रालय करेगा। जिस दर्शक के लिये आप नाटक कर रहे हैं उस पर आपको भरोसा होना चाहिये। इसके लिये साहस चाहिये, जो आपके अंदर नहीं है। आप डरते हैं।
रीढ़ की हड्डी होने का एहसास तभी होगा, जब आप अपने संसाधनों से चीज़ेें बनायेंगे। कमी सरकार की भी है क्योंकि उसके पास कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। सरकार क्यों ग्रांट देती है, इसलिये न कि उससे समाज को लाभ होगा? जब एक नाटक होता है, तो उससे समाज को डायरेक्ट लाभ क्या है? ठीक है कि कलाओं का संरक्षण हो रहा है, लेकिन उससे हासिल क्या हो रहा है? क्या नाटक वास्तव में समाज में जा रहा है? उसमें किस प्रकार के सवालात उठाये जा रहे हैं? दिक़्क़त यह है कि ग्रांट को हमने अपना हक़ मान लिया है। एक बार यह सिलसिला शुरू होते ही आपका नाटक की तरफ से ध्यान हट जाता है। आप ग्रांट से लेकर कमिटियों में जगह पानेे, अवार्ड लेने, फेस्टिवल का आमंत्रण पाने के लिये एक ऐसे चक्रव्यूह में दाखि़ल हो जाते हैं जो कहीं न कहीं आपको अंदर से भ्रष्ट बना देता है, समझौतावादी बना देता है। कलाकार स्वभाव से समझौतावादी और मौक़ापरस्त बन गया तो उसकी आवाज़ में दम कहां होगा? सामंत ने पैसा दिया और अपने आंगन में जो चाहा करवा लिया।
अगर हम इस कड़वे सत्य को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण देंगे, तभी उसकी गंभीरता को समझेंगे। जब श्रेष्ठता का दंभ समाप्त होगा तो शायद आप दूसरों से सीखेंगे, अभी आप दूसरों के अनुभव से नहीं सीख रहे। आप दूसरों से सीखना नहीं चाहते क्योंकि आपको लगता है आप अंतिम हैं। रंगमंच के प्रशिक्षण की प्रक्रिया बंद कमरों में कोरा ज्ञान बघारते हुए नहीं पूरी हो सकती। रोज़ाना हम सीख रहे होते हैं कि यह नहीं होना चाहिये, यह होना चाहिये। लगातार ग़लती करके सीखना, जो आपने किया उसको बार-बार दुहराना और अपने जैसे और ट्रेनर्स को ट्रेन्ड करना, स्कूल-कॉलेज के साथ काम करना, लगातार समाज के संपर्क में रहना- यह सब क्यों नहीं हमारी प्रशिक्षण पद्धति का हिस्सा बन सकता है? क्यों छात्र सिर्फ क्लासरूम में बैठ कर पढ़ें? और उसके बाद आप उसको जुगाड़बाज़ी सिखा देते हैं। रंगमंच के समूचे परिदृश्य को आपने कैसा बना दिया है? राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के फेस्टिवल में अगर कोई नहीं आये तो आपके लिये वह रंगकर्मी नहीं है, निर्देशक तो कतई नहीं है। शिक्षण संस्थान होने के बाद भी आपने अभिनेता और निर्देशक होने के प्रमाण पत्र जो बांटने शुरू कर दिये हैं, उससे बहुत बड़ा नुकसान हुआ है और इससे बचने की ज़रूरत है।
ये कड़वे सवाल हैं, शायद पसंद भी न आयें, लेकिन अगर हम बैठ कर बातचीत करें, वास्तव में कुछ परिवर्तन चाहें तो इन कड़वे सवालों से टकराने की ज़रूरत है। ऐसा किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। अपनी आलोचना बहुत ज़रूरी है। कोई भी समाज तब ही आगे बढ़ता है, जब वह आत्मालोचन करता है। यदि वह स्वयं अपना महिमामंडन करता है कि हम महान हैं, तो वह समाज अपने ही केन्द्र में, अपनी ही धुरी पर गिर रहा होता है, और अंततः धराशायी हो जाता है। यह न हो कि किसी ने आपके बारे में कुछ कह दिया तो वह आपका विरोधी हो गया। आपने उसको लक्ष्य कर लिया, दुश्मन करार दे दिया और अपने सारे परमाणु बम, सारी मिसाइलें उसकी तरफ तान दीं। यह जो कबाइली नज़रिया है, उससे बाहर निकलने की ज़रूरत है, क्योंकि यह हमारे थियेटर के विकास में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

लेखक परिचय
वरिष्ठ रंगकर्मी, निर्देशक एवं अस्मिता थियेटर ग्रुप के संस्थापक-संचालक बहुचर्चित रंगकर्मी अरविन्द गौड़ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर केन्द्रित नाटकों की प्रस्तुति के लिये जाने जाते हैं। रंगमंच को जनान्दोलनों के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास। जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों के साथ जुड़ाव रखने के साथ अरविन्द गौड़ ने नुक्कड़ नाटकों की एक नयी ज़मीन तैयार की है और उसे बदलते दौर के नये सवालों के साथ जोड़ा है। नुक्कड़ नाटक को आम लोगों और युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका। रंगमंच में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कार्य किया है। दिल्ली विश्यविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर योगदान देने के अलावा आपने स्टेनफोर्ट एवं हाॅवर्ड यूनिवर्सिटी में नाट्य कार्यशालाओं का संचालन भी किया है।

एक थी कविता

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

पूरी गुआड़ी में आज ख़ुशी की लहर बसंती बयार की तरह फ़ैल रही है. पिछला दिन तो चुप था, लेकिन रात बड़ी जगमग थी. पिछली रात ग्यारह बजे हाइवे के किनारे सड़क से उतरे ट्रक के पीछे एक सफ़ेद कार के ब्रेक लगे और उसमें से एक बावन वर्षीय, फक्क सफ़ेद कुरता – पाजामा और चमचमाती घड़ीपहने, लम्बा – चौड़ा, चेहरे पर कुछ कट के निशान का सख्त चेहरा लिए पत्थर व्यवसायी उतरा. कुछ चोर की तरह उसने धीमे से कार का दरवाज़ा डाला, लॉक किया, सिगरेट बुझाई औरफिरएक लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ- सावह मिटटी की दीवारों वाले कच्चे मकान की ओर बढ़ने लगा. गुआडी के कुत्ते भों – भों कर के बता रहे थे कि गुआडी में कोई अजनबी आया है.पर वह उनकी भों – भों को तवज्जो न दे कर जल्दी से जल्दी कविता के घर में घुस जाना चाहता था.
बारह बरस की कविता के बाप ने दो दिन पहले ही कविता को उसे दिखा दिया था और इसके लिए उनके बीच नगद एक लाख में सौदा तय हुआ था. बाप से कुछ खुसुर – पुसुर के बाद वह उस कच्चे कमरे में दाखिल हुआ जहाँ कविता एक खाट के पास पतली स्टेप का झीनाकुरता और पीला चमकनी बूटियों का शरारा पहने खडी थी.
कमरे में घुसते पत्थर व्यवसायी को देख, वह थोड़ी हडबडा गई और जल्दी से खाट पर से उठकर खडी हो गई. एक अनहोनी – सी उसके दिल में घर करने लगी जैसे कोई कसाई चाकू ले कर बकरे की ओर बढ़ रहा हो.
बैठ जा, खडी क्यों है ? तेरे बाप ने तुझेकुछ बताया नहीं?

अब से पहले उसने किसी मर्द के साथ ऐसा एकांत नहीं महसूसा था.उसकेलिपस्टिक लगे पतले होठ लाल से नीले से होने लगे और बड़ी हथेलियों में आ जाने वाला सांवला चेहरा फ़क्क- सा हो गया.एकझुरझुरी सी शरीर में दौड़ गईऔर कान में बुआ के बोल,गूंजने लगे “आज की रात बड़े बाबू आएंगे, उनका कहना मानना, बहुत प्यार करेंगे तुझे,रोना मत, चिल्लाना मत”. बड़े बाबू के कमरे में घुसने के कुछ देर बाद परदे की ओट से बुआ के हाथ दो गिलास शरबत के पकड़ा गए.

सुबहघर की उठापटक से कविता की कुछ आँख खुली. पर अभी वो बिस्तर पर कुछ होश, कुछ बेहोश-  सी चित्त पड़ी है. उसे बस इतना ही ख्याल है कि उसके घर की मिट्टी से बनी दीवारों के चौखट पर पिछली रात बुआ और माँ ने एक चद्दर का पर्दा खींच दिया था और फिर रात के अँधेरे में वो बड़ा बाबू उसके जिस्म से खेलता रहा था. आज की सुबह उसे एक नई जिंदगी मिली थी. जिसकी तैयारी पिछले कुछ सालों से हो रही थी. वह पहली बार वो अपने को, अपने से अलग महसूस कर रही थी.

कल की रातउ सकी नथ उतरवाई की रस्म हुई है. नथ उतारने वाला बावन साल का पत्थर व्यवसायी है. सुबह से नथ उतरवाई की खबर कानों -कान लड्डुओं के साथ गुआड़ी भर में जा रही है. पूरे एक लाख में उतरी है नथ. समाचार के साथ – साथ गुआड़ी भर की आँखें कविता के अंग – अंग का मुआयना कर रही हैं और अपनी बेटियों के अंगों को उससे तोल रही हैं. पत्थर व्यवसायी की मुंह दिखाई को गुआड़ी भर की आँखे लालायित हैंपर वह जल्दी ही मुंह अँधेरे गाड़ी से उड़न छू हो गया है.

सुबह उसकी आँखों के सामने दोनों छोटी बुआएं आ गईं. वो कैसे मुंबई से सजी – धजी आती हैं. मुंह मोड़ – मोड़ करसबसे, ठसके से बात करती हैं, मुंह में गुटका दबा कर जगह – जगह बेपरवाह थूकती रहती हैं. उनके जालीदार कपडे उनके शरीर का ऐसा खाका खींचते हैं, कि मर्द आँखों से ही शरीर भोग लेते हैं. उनके पर्स सेंट की तीखी गंध से महकते हैं, उनके पर्स में दो – दो मोबाइल रात – दिन घनघनाते रहते हैं. चहकती गुआड़ी भर की छोटी लड़कियों पर क्या रौब पड़ता है, उनका. गुआड़ी की बड़ी लड़कियों को देख, वो सारी छोटी लड़कियों की भी बुआएँ होने का सम्मान पा गईं हैं.

दो साल पहले उसने भी बुआओं के पास जाने की जिद पकडी थी, तब घर में सबने यही कहा था
“तू अभी छोटी है, बड़ी हो जाएगी तब भेज देंगे”जब भी वह बुआओं के घर का ज़िक्र करती तो उसे यहाँ वाली बुआ और माँ यही बतातीं कि वे मौसी केगई हैं, उसकी मौसी कौन हैं ? किसकी क्या लगती हैं ? रिश्तों का यह जाल तब उसके पल्ले नहीं पड़ा था. बस उसके बाद धीरे – धीरे अनाम रिश्ते वो कब नाम से जानने लगी पता नहीं. उसने इधर – उधर से अधकचरा सुना था कि मुंबई के कांग्रेस  हाल के पीछे उनकी बहुत बड़ी बस्ती है, एक कमाठीपुरा में है. वहां बहुत बड़े – बड़े लोग आते हैं, लड़कियों को बड़े – बड़े होटलों में ले जाते हैं, उनके साथ नाचते हैं, जब वो नाचती हैं तो कोई – कोई उनकी ब्रा में नोट ठूंस देते हैं. उन्हें गोद में उठा कर चूम लेते हैं. रात भर होटल चमचमाते हैं. मुंबई की जिंदगी की झलक का अंदाज़ा वह टेलीविज़न पर दिखने वाली चकाचौंध से ही लगाती रही थी अभी तक.

उसने पिछले दिनों कई बार साथ रहने वाली बड़ी बुआ को माँ – बाप पर झल्लाते देखा है. “मैं कब तक खिलाऊँगी तुमको ? भाई का ब्याह करो, पूरे कुनबे को खवाओ, तमाम गंदगी झेलते – झेलते उमर हो गई, अब मेरे बस की नहीं है, तेरी बेटी की क्यों नहीं कर देता अब नथ उतरवाई”बाप ने सेसू छोड़ रखे हैं, “कोई सही ग्राहक तो मिले.कोई चालीस हज़ार दे रहा है, कोई पचास. इतने में तो घर छह महीने भी न चले.मुंबई में तो यूँ ही भर – भर नोट दे जाते हैं बड़े – बड़े आदमी. नथ उतरवाई ही तो बड़ी कमाई का मौका होता है फिर तो फुटकर कमाई है, रोज़ कुआ खोदो, रोज़ पीओ”
“श्यामा की लड़की को तो कोई दुबई भी ले गया था, उसकी लड़की गोरी भूरी जो है. दुबई से क्या मालामाल हो के आई थी वो. उस पैसे से ही तो माँ बस्ती में शानदार मंदिर बनवा कर जाति समाज से वाहवाही लूट रही है”. श्यामा की बेटी का गुणगान करता गुआड़ी भर थकता नहीं है. वह आदर्श है, गुआड़ी भर की. सारी गुआड़ी को दरकार है, श्यामा की बेटी जैसी अपनी बेटी बनाने की.

छुटपन से ही उन्हें पतली स्ट्रेप के सितारों वाले कपड़ों और लिपस्टिक से प्यार करना बुआएं सिखाती हैं.“पगली यूँ रीझते हैं, मरद जितना मन से भोगने दो उतनी ही जेब गर्म होती है, मेरे एक बार ना – नुकुर करने पर ग्राहक कमीना ऐसा गुस्सा हुआ हुआ कि फिर पैसे ही नहीं दे के गया”माँ ये सब सुनती -देखती रही है, घूँघट की ओट से.महीना भर पहले कोई लखटकिया बाबू बाहर खटिया पर बैठा बेफिक्र धुआं उड़ा रहा था.
माँ के पैरों को देखते हुए उसने बाप से पूछा कि “ये काम तुम्हारे घर की बहुएं नहीं करती क्या” बाप ने जवाब दिया “बहुएं करें तो हम काट डालें उन्हें” जैसे दुनिया का सबसे बड़ा इज्ज़तदार पति वही हो. इस जवाब को सुनकर बाहर चबूतरे पर रोटी थेप रही माँ ने अपने हाथ – पाँव घूँघट में कछुए की तरह सिकोड़ लिए थे. तब वह दिन भर घूंघट में पिस रही माँ को देख कर भी, माँ ही बनना चाहती थी, बुआ नहीं!

छोटी लडकियों के लिए बुआ बनने की पहली सीढ़ी नथ उतरवाई से नए जीवन में प्रवेश करने की है. अब वो बुआ ही बन सकती हैं, किसी कि पत्नी बन कर माँ नहीं. कविता के पास कुछ दिन पत्थर व्यवसायी के रोज़ चक्कर लगते रहे, धीरे – धीरे चक्कर कम हो गए. यूँ तो नथ उतरवाई की रस्म के बाद से जिसकी जेब गर्म है, उसे चक्कर लगाने के लिए पर्दा हटा कर पर्दा खींच देने की इज़ाज़त घर और पूरा गुआड़ी दे देता है.
हर दिन ऐसे काम से जब उबकाई आती तब ये गुटका, मीठी सुपारी ही साथ देते उबकाई न आने के लिए, पर उबकाई है कि, आती ही ! सड़ांध मारते मर्दों की देह, पसीने से लथपथ, तोंदू और बूढ़े हाड़ों को तृप्त करना कोई आसान बात है ?

परसों बाप ने मोटू को चार गालियाँ दीं “साले, चूतिया समझते हैं हमको, सौ का नोट कोई दे तो फाड़ देना उसके सामने ही. पांच सौ से कम मत लेना”. हाइवे के किनारे लगती अपनी बस्ती के बाहर खड़ी कविता बारह साल से बीस साल की उम्र तक बड़े – बड़े गले का थोडी ऊपर से थोड़ी नीचे से देह दिखाता ब्लाऊज़ पहने, होठों पर लिपस्टिक रगड़े बुलाती है हर उम्र के आदमी को. उसका सांवला रंग कभी – कभी कीमत में भांजी मार देता है पर फिर भी वो सात जनों के परिवार को पाल पा रही है, जिसमें मुर्गे, शराब के दौर भी शामिल हैं.
थोड़े दिनों पहले जब उसके घर का पर्दा खिंचा हुआ था. उस समय रुक्मा के घर पुलिस आई और उसके घर का परदा हटा कर, ग्राहक लड़के और उसकी बेटी को ले गई. पूरे दो महीने में छूट कर आई थी रुक्मा की बेटी. एक रजिस्टर्ड अड्डा थाने में भी था.“साली हमसे नखरे करती है, रोज़ दस – दस को अपने ऊपर से उतारती है, चल उतार” डर के मारे रुक्मा की बेटी हो जाती हर रात, नंग – धडंग ! ऐसे ही कई बेटियाँ  जा चुकी थी,सुरक्षा के नाम पर बने रजिस्टर्ड अड्डे पर. वहां से आ कर सारी बेटियाँ आपस में गले लग – लग कर रोतीं. रामदेवरा महाराज हमने गलत काम किया है और फिर वे रामदेवरा के मेले में पदयात्रा करते हुए ढोक देने जातीं. ये कैसा पाप मिला था उन्हें, जिसे वे खुद ही चढ़ाती, खुद ही उतार लेतीं.

अब तो बहुत हुआ मैं बुआ बन रही हूँ, पत्नी नहीं ! किसी की पत्नी न सही, माँ तो बन सकती हूँ अनजान बाप के बच्चे, की माँ ! तीन महीने के बाद बुआ और बाप ने गर्भपात करवा दिया. क्या खाएंगे हम ? तू तो माँ बन के बैठ जाएगी. ऐसा पहले भी दो बार हो चुका है…..कविता देखती है उसकी गुआड़ी में कितनी सारी उसकी जैसी कविता हैं, पर कोई बबिता नहीं………..

पिछले साल से एक मधु मैडम बस्ती के चबूतरे पर कुछ बच्चों को घेर कर पढाती है. पहले गुआड़ी के कुछ बच्चे पास के स्कूल में जाते थे. वहाँ दूसरे बच्चे उन पर पत्थर फेंकते थे. कहते हुए, ओ रंडी के. ये लड़के बड़े हो कर गुटका खा कर थूकेंगे, शादी करेंगे, उनकी बहनें कमाकर बेटी वालों को पैसा देंगी, घर बहू आएगी,फिर वो कविता पैदा करेगी. वो मधु मैडम गुआड़ी को बहुत खटकती है. कहीं ये मैडम हमारी बेटियों को कोई पट्टी न पढ़ा दे कि,ये काम गन्दा है. सो सारी गुआड़ी उसे कभी आँखों से तो कभी उसे मुंह से भगाती रहती है. गुआड़ी के बाप और बुआएं उसे उसकी भूमिका समझाते रहते हैं कि तुम्हारा काम है, बच्चों को पढाना, तुम पढाओ, हमारी लड़कियों से क्या मतलब है ? हमारे ऊपर बहुत कर्जा है इसलिए ये काम करवाते हैं.

घर का कोई काम नहीं था, इस कमाऊ पूत के पास ! सो जब भी वह बिना ग्राहक के होती तो उस चबूतरे के पास खाट डाल कर गुटका चबाते हुए मधु मैडम को आँख भर – भरदेखती. “ये कैसी मैडम है,सादा सी धोती पहनती है, पर कितनी आज़ाद ख्याल की लगती है”मेरे पास चमकने,सितारोंलगे और सुनहरीपट्टी केकपडे हैं, दो – दो तरह की लिपस्टिक है, आसमानी और लाल रंग की नाखुनी है पर….पर….मुझे अच्छा नहीं लगता…..उफ्फ,मुझे नहीं चाहिए ये सब !नहीं चाहिए मुझे नाखुनी ! हीक आती है मुझे !!मुझे तो इस मैडम के जैसेसफ़ेद नाखुन ही अच्छे लगते हैं. इस चमचम के पीछे कितना अँधेरा है…….कितना अँधेरा !इस मैडम की तरह मैं रहूँ तो ? पर, फिर कोई ग्राहक नहीं आएगा मेरे पास. नहींआए, मुझे नहीं चाहिए कोईग्राहक,भाड़ में जाएँ, कमीने होते हैं साले,सब के सब ! मधु मैडम से बिना बात किए हीवहआँखों ही आँखों में उसने मधु मैडम का समर्थन पा रही थी. पत्थर कायाओं के उसके पास आने से उसका शरीर तो पत्थर बनने लगा था पर दिल मोम बन पिघल – पिघल जाता था.
मैं भी मैडम की तरहबच्चों को पढाऊँ तो ? इस मैडम को तो हमारी तरह काम नहीं करना पड़ता होगा न ! शारदा की छोटी बेटी को एडस हो गया है पर उससे बात करो तो वह बताती है कि उसे मोतीझरा हुआ है, बम्बई की दवा लगती है उसे. उम्ह ! पता है मुझे, कैसा मोतीझरा हुआ है उसे !!

घर में तीसरी बार कविता के माँ बनने की जिद चल रही है….. सो बाप, एक डंडा उठा रहा है, एक रख रहा है, एक रख रहा है, एक उठा रहा है. ये तमाशा घर में दो दिन से चल रहा है “साली नशा करती है, नशा करेगी तो मारेंगे ही …..”कविता ने उन दिनों नशाकरनाचुन लिया था,  जिससे ग्राहकों से मुक्ति मिले. उस दिन डंडों और रोने की आवाज़ मधु मैडम को उसके दरवाजे खींच लाई. बाप गरजा “जाओ मैडम कर लो, जो करना है, नशा करेगी तो मारेंगे ही”

उस समय दादी, बुआ और बाप सब एक तरफ थे और माँ घूंघट में एक तरफ. मधु मैडम ने बड़ी दीदी को फोन किया “मैडम कविता को उसका बाप दो दिन से बुरी तरह मार रहा है. कह रहा है कि नशा करेगी तो मारूंगा. जबकि कविता इसलिए नशा कर रही है कि उसके पास कोई ग्राहक नहीं आए” कविता ने दाएं – बाएं देखकर कुछ दिन पहले मधु मैडम से कहा था दीदी, मैं ये काम नहीं करना चाहती, कोई और काम दिलवा दो.
मीटिंग के बहाने बड़ी दीदी आईं, कविता को बुलाया, उसे बताया कि “तुम हमारे बच्चों के होम में खाना बनाने का काम कर सकती हो इसके एवज़ में तुम्हें अठारह सौ रूपये मिलेंगे और रहना – खाना फ्री. मैं वहां जाती रहती हूँ, हमारे साथ लडकियां भी काम करती हैं, इसलिए सुरक्षा की तो तुम गारंटी समझो”. पर दीदी, बच्चे क्या सोचेंगे मेरे बारे में ? “देखो कविता, इस काम के साथ ही तुम पर लगा ये बिल्ला भीतो छूट जाएगा न ! बच्चे तुम्हें दीदी ही कहेंगे. मैं अपने ऑफिस में मैडम हूँ, अपने घर पर तो बच्चों की माँ ही हूँ न ! अपने बच्चों के लिए मैडम थोड़े ही हूँ.” तुमको भी बच्चे दीदी ही कहेंगे !
ये सबसुन कर कविता ख़ुशी – ख़ुशी घर गई और जा कर बड़ी दीदी और उनके बताए काम को बता कर  कहने लगी “मैं भी ये दीदी जैसा काम करूँ तो”
क्या पढी तू, जो ये दीदी जैसा काम करेगी बाप ने आँख निकाल कर धमकाने के लहजे में कहा !
सप्ताह भर से काम आ रहे तरह – तरह के डंडे और पाईप उसकी आँखों के सामने घूम गए!
घरवालों ने तो इस मैडम से कविता को खूब बचा – बचा कर रखा पर तेज धूप की छाया, आदमी के सारे नैन – नक्शबता देती है. कविता ने मैडम की छाया पहचान ली थी.

ये कमाऊ पूत हाथ से न निकल जाए सो बाप तुरंत हरकत में आया. वह तमतमाता हुआ अपने गुस्से को पीतामैडम के पास आया “मैडम आप तो सही कह रही हो, पर आप नहीं जानती, हमारा समाज हमें जात बाहर कर देगा ………….दीदी के पास समझाने के सारे शब्द ख़त्म हो गए बस उनके मुंह से हम्म ………की आवाज़ ही निकलती रही और अन्दर न जाने कितने सारे शब्द तूफ़ान की तरह पत्थर से भडबेड़े खाने लगे …….
ये क्या दस मिनिट बाद ही कविता आगे – आगे और माँ पीछे – पीछे आ रही हैं, दीदी मैं ये काम नहीं छोड़ सकती, दिसंबर में मेरे भाई विजय की शादी करनी है………..दीदी के होठ सिल गए, उनके मुंह से बस निकलता रहा हम्म ………

यह काम नहीं करूंगी, नहीं करुँगी, नहीं करुँगी……..और करना पड़ेगा, करना पड़ेगा, करना पड़ेगा……..दस दिन तक घर में गूंजता रहा.कई हाथ उसके बाल पकड़ घसीटते, तो कोई डंडे संभालता, घर पुलिस थाना बन गया.
उसकी जिद के आगे थक हार कर दादी और बुआ ने अड़ोसियों – पड़ोसियों से समर्थन जुटाना शुरू कर दिया. कैसे नहीं करेगी ? तुम्हारी बेटी नहीं कर रही है क्या ? ये बन रही है अंग्रेज की चोदी ! हमने नहीं किया क्या ? हाड तोड़ – तोड़ के इसके बाप को खवाया अब ये हमें नहीं खवाएगी तो हम कहाँ जाएँगे ? क्यों? आस – पड़ोस भीकविता से अपनी बेटियों को बचाने में ही अपनी भलाई समझने में लगा. आज इनकी बेटी सिर उठा रही है, कल हमारी उठाएगी ? घर में बड़े दिनों तक रस्साकसी चलती रही, पर रस्सा कब तक दोनो तरफखिंचता ? ग्यारहवें दिन की सुबह खटिया पर कविता नहीं लिखा, कागज़ मिला जिस पर लिखा था, मुझे मत ढूंढना!

रतन थियाम का रंगकर्म : कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन”

मंजरी श्रीवास्तव

इस समीक्षात्मक आलेख में  युवा नाट्य समीक्षक मंजरी श्रीवास्तव ने ‘मैकबेथ’ के बहाने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम  की पूरी नाट्य प्रक्रिया पर विस्तृत बात की है. मंजरी के शब्दों में  रतन थियाम का पूरा नाट्यकर्म “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.

18वें भारत रंग महोत्सव की शुरुआत किसी नाटक से नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भारतीय थिएटर को प्रतिष्ठित करनेवाले थिएटर के जादूगर रतन थियाम के जादू, उनके तिलिस्म  ‘मैकबेथ’ से हुई. वैसे भी इस बार के भारत रंग महोत्सव की थीम ही है – “थिएटर के जादू की फिर से खोज” और जब उद्घाटन ही अगर ऐसे बेजोड़ तिलिस्म से हो तो फिर क्या कहने !

रतन थियाम का यह नाटक किसी एक बिंदु या किसी एक चरित्र या किसी एक संवाद से शुरू नहीं होता बल्कि यह अपनी परिधि में पूरे उस माहौल को समाहित और व्याख्यायित करता हुआ चलता है जो किसी काले घने जंगल की जंगली पुकारों से परिपूर्ण है. वस्तुतः इस नाटक का मूल स्वर ही जीवंत वनस्पतियों की हरी-नीली रोशनी एवं विचित्र ध्वनियों का संगम है,  जो मैकबेथ के चरित्र को चुड़ैलों-सा जामा पहनाती है. यहाँ चुड़ैलें सिर्फ़ चुड़ैलें नहीं हैं वे वैश्विक स्तर पर हमारे उस देश-काल का प्रतिनिधित्व करती हैं,  जहाँ जीवन पर संकट है, हमारी वन-सम्पदा पर संकट है, हमारी प्रजातियों पर संकट है और यह संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है. चुड़ैलों की देह पर गिरती-उठती हरी-नीली रोशनियों और उनकी विचित्र और हृदय-विदारक ध्वनियों से नाटक की शुरुआत होती है जो प्रत्यक्षतः कहानी के कथ्य के हिसाब से तो मैकबेथ और उसके साथी बैंको के लिए शुभ सूचनादायी है पर अप्रत्यक्ष रूप से हमारी पारिस्थितिकी पर मंडरा रहे खतरे को भी इंगित करता है. कुछ भाववाचक संज्ञाएँ जैसे महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख एवं उससे उपजनेवाला खून-खराबा इस पूरे प्रोडक्शन के साथ-साथ चलता रहता है. जहाँ तक परिधान, ज्वेलरी एवं वेशभूषा का प्रश्न है तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कई सारे जनजातीय समाजों का मिश्रण-सम्मिश्रण है जो वास्तव में इस नाटक की आदिम पहचान और स्वरूप को चिन्हित और व्याख्यायित करता है.

पर इन सबसे ज़्यादा और सबसे हटकर जो सबसे ह्रदय विदारक और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है या यूँ कहें जो इसका क्लाइमेक्स है वह यह है कि जब मैकबेथ और उस जैसे ही दूसरे मृत या मृतप्राय मानवीय तत्व परिचारिकाओं की एक फ़ौज द्वारा व्हील चेयर पर मंच पर लाये जाते हैं. वस्तुतः यह नाटक निर्देशक की मैकबेथ की एक सामाजिक महामारी के रूप में व्याख्या का मंचीय प्रस्तुतीकरण है. मैकबेथ के इस प्रस्तुतीकरण से निर्देशक यह सन्देश देना चाहते हैं कि आदमी की अनंत आकांक्षाएं हमेशा विनाशकारी होती हैं जो सबसे पहले तो इंसान के दिमाग को भ्रष्ट करती हैं और फिर उसका विस्तार पूरे समाज तक हो जाता है. कहना पड़ेगा कि यह जो आख़िरी दृश्य है, चरमोत्कर्ष का दृश्य है वह किस तरह से १६०० ई. में लिखे गए एक महान साहित्यिक कृति का आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही सटीक रूपांतरण है और उतना ही सटीक उसका मंचीय प्रस्तुतीकरण है.

मंच पर किसी सेट का न होना सांकेतिक रूप से विश्व का ही एक मंच के रूप में प्रतिध्वनन है और इस प्रकार यह नाटक भौगोलिक दृष्टि से विश्व में कहीं भी किया जा सकता है. मंच का किसी वस्तु-विशेष या सेट से अवरुद्ध न होना इस नाटक और उसके पात्रों को एक ऐसी भव्यता प्रदान करता है , जिसका विश्लेषण शब्दों के परे है. विशेष रूप से प्रकाश परिकल्पना दर्शकों को स्तब्ध कर देती है , जो शेक्सपियर के इस मशहूर दुखांत नाटक की समकालीनता की व्याख्या करती है. हमेशा की तरह भारत के पुरातन, जनजातीय और पहाड़ी (विशेष रूप से भूटान, सिक्किम और लद्दाख के वाद्ययंत्र) सुषिर (भोंपू) वाद्यंत्रों से उत्पन्न ध्वनि संयोजन न सिर्फ रतन थियाम के चिर-परिचित हस्ताक्षर के रूप में हमारे सामने आता है बल्कि तरंगित ऊर्जाओं का वह झीना जाल का सा प्रभाव उत्पन करता है जो दर्शकों को दृश्य दर दृश्य संवेदनात्मक ऊंचाइयों तक ले जाता है और कलाकारों की यह दृश्य-श्रव्य यात्रा कलाकारों और दर्शकों के बीच एक अनकहा-सा मनोवैज्ञानिक संवाद भी स्थापित करती है जहाँ हम दर्शकों को कलाकारों के रूप में परिणत होते हुए देखते हैं. 





निर्देशक रतन थियाम जहाँ एक ओर इस नाटक के माध्यम से पथभ्रष्ट मानव की आतंरिक अतृप्त क्षुधाओं (महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख) और ऊर्जाओं के हस्तांतरण के इस खेल को दिखाने में पूर्णतः सफल हुए हैं वहीँ दूसरी ओर उनके कलाकारों की मौन और मुखर देह-भाषा, आवाज़ और स्वरोच्चारण, भाव-भंगिमाएं और आकांक्षाओं के प्रकटीकरण, प्रस्तुतीकरण और उनके चरमोत्कर्ष तक पहुँचने के क्रम में वे अपने कलाकारों से जिन रंग-युक्तियों का इस्तेमाल करवाते हैं वह निस्संदेह अतुलनीय है. विशेष रूप से चुड़ैलों के साथ वाले उस दृश्य में जहाँ संवादवाहक लेडी मैकबेथ के लिए एक बड़ी सी चिट्ठी को खोलने के लिए मंच पर लुढ़काता है और इस चिट्ठी के खुलने के साथ ही नाटक भी ओपन होता है. सारी समस्या की जड़ यह चिट्ठी ही है और पूरा नाटक इसी के इर्द-गिर्द घूमता है और ख़त्म भी इसके साथ ही होता है. यह दृश्य ‘लार्जर दैन लाइफ़’ है, डंकन की हत्या और मैकबेथ का उसकी पत्नी से संवाद न सिर्फ मनोरम है बल्कि हाथ से सरकती हुई रेत-से किसी तिलिस्म की उत्पत्ति करता है जिसे कोई भी अपनी अंतरात्मा में उठते आतंरिक कलह के मलबे और कोप के रूप में भी महसूस कर सकता है. इस चिट्ठी के इर्द-गिर्द घूमती पूरी कहानी और विशेष रूप से इस दृश्य में जो सुख और दुःख के बीच की एक महीन-सी रेखा है दरअसल वही इस नाटक का केन्द्रीय भाव भी है और ख़ूबसूरती भी. दरअसल एक मनोवैज्ञानिक हमले की संरचना और उसका प्रभावी नाटकीय प्रस्तुतीकरण है निर्देशक रतन थियाम का यह मैकबेथ.

रतन थियाम का यह मानना है कि मानवीय मन के द्वंद्व भी अनेक तरह के होते है. जो बाहर-बाहर दिख रहा है, वही द्वंद्व नहीं है. द्वंद्व और युद्ध कई स्तरों और कई सतहों पर चलता रहता है. अतियथार्थवादी सोच है उनकी द्वंद्व और युद्ध के बारे में. उनकी यही सोच इस पूरे नाटक में कमोबेश परिलक्षित होती है. मानवीय मन का द्वंद्व का सफ़ल रेखांकन करने में वे सिद्धहस्त हैं, इस बात को एक बार फिर उन्होंने साबित किया है. मानव मन के इस द्वंद्व को दिखाने के लिए थियाम ने प्रकाश का उम्दा इस्तेमाल किया है. उनकी प्रकाश परिकल्पना कमाल की है. उनका मानना है कि जैसे मौन संवाद से ज़्यादा मुखर होता है बिलकुल वैसे ही अन्धकार, प्रकाश से ज़्यादा मुखर और प्रभावशाली होता है. शायद इसीलिए अपनी इस प्रस्तुति में वे पात्रों को पूरी रौशनी में नहीं लाते. प्रकाश के आने जाने के साथ उनकी कुछ दिखती, कुछ छिपती परछाइयाँ दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता ज़्यादा जगाती हैं और यही वो नब्ज़ है दर्शकों की जिसे बख़ूबी पकड़ना रतन थियाम जानते हैं. अपनी कमाल की प्रकाश परिकल्पना से रतन थियाम न सिर्फ मानव मन के द्वंद्व को दिखाते हैं अपितु उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता को भी दिखाते हैं, विशेष रूप से उस दृश्य में जब मैकबेथ मंच पर अकेला है और वह रौशनी और अँधेरे के आवर्तों के बीच भटक-सा रहा है. दरअसल नाट्यधर्मी, एब्सर्ड और अतियथार्थवादी युक्तियों से परिपूर्ण इनके नाटक “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.

इस नाटक के माध्यम से एक बार फिर उन्होंने खुद को पुनः एक विशिष्ट रंग-विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित किया है. कभी रतन थियाम आपको रंगमंच के चित्रकार लगेंगे, कभी प्रकाशक, कभी संगीतकार तो कभी कुछ और लेकिन उनके नाटक चित्र, उच्चारण, संगीत, प्रकाश इन सब के इतने कुशल संयोजन से समृद्ध होते हैं कि आप टुकड़े-टुकड़े में उनके काम की व्याख्या नहीं कर सकते. आप यह नहीं कह सकते कि उनके नाटक  में प्रकाश उम्दा था या कुछ और उम्दा था या कोई पक्ष कमज़ोर था. दरअसल सबकुछ इतना उम्दा होता है कि आप सोच में पड़ जाते हैं कि नाटक के किस भाग को सर्वोत्तम कहा जाए और किसे छोड़ा जाए और यही बात उन्हें तमाम रंगकर्मियों से अलग करती है. यही पर वे रंगकर्म के चितेरे, रंग-विशेषज्ञ के रूप में खुद को प्रतिष्ठित करते हैं. दरअसल उनका नाटक एक आत्मा की तरह है. यह सर्वविदित तथ्य है कि आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है पर  थियाम का नाटक जो कि एक आत्मा है उसे नाटक के शरीर के विभिन्न अवयव समग्रता में धारण करते हैं और ये अवयव हैं – रंगचित्र, रंगस्थापत्य, रंगविचार प्रकाश, ध्वनि, संगीत, उच्चारण आदि-आदि. रतन थियाम का नाटक रंगों के संयोजन, मंच के कक्ष्या विभाजन, उच्चारण के सौंदर्य और संगीत की सूक्ष्म लयों के सहारे दर्शकों के भीतर छिपी लगभग अज्ञात भाव सम्पदा को इतने धीरे से जागृत करता है कि दर्शक रंगभूमि से मानसभूमि पर बिना किसी अवरोध के चले आते हैं.

 रतन थियाम का चीज़ों को देखने का नजरिया ही बिल्कुल अलग है. उनका मानना है कि – “हम जो चीज़ें प्रकृति में देख रहे हैं, उन्हें उसी रूप में रखने में कलात्मकता कहाँ हैं….उसे कुछ अलग तरह से व्याख्यायित करें तब बात बनती है, तब वह कलात्मक होता है.”वे यह भी मानते हैं कि कोई ऑब्जेक्ट दिखाने के लिए किसी ताम-झाम और उस ऑब्जेक्ट को दिखाने की ज़रुरत नहीं है. रंगयुक्तियों के सहारे आप उन्हें दर्शकों के दिमाग में उत्पन्न कर सकते हैं. और ऐसा करने से वहां वही ऑब्जेक्ट एक हज़ार प्रकार का उत्पन्न हो जाएगा. हर दर्शक अपनी कल्पनाशक्ति के हिसाब से उस ऑब्जेक्ट को विज़ुअलाइज़ करेगा अपने मस्तिष्क में, अपने मन में.    रतन थियाम का यह भी मानना है कि दर्शक उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं. वो दर्शकों से वो सब शेयर करना चाहते हैं जो वह महसूस करते हैं. इनका कहना है कि – “ मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ, मैं बस सोचता रहता हूँ कि नाटक के कथ्य का विभिन्न स्तरों पर उपयोग कैसे किया जाए. क्योंकि उस कथ्य का दर्शकों से साझा करना मेरे लिए बहुत महत्त्व का है. मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि – “मैं यह देख रहा हूँ और मुझे यह बहुत ख़ूबसूरत लग रहा है, ज़रा आप भी इसे देखिये ! मैं दर्शकों से यह नहीं कहता कि जो मैं देख रहा हूँ वह सही है और आप भी इसे जानिये. मैं शिक्षक नहीं हूँ, न ही सलाहकार. मैं अपनी रचना को साझा करना चाहता हूँ. जब मैं अपनी अभिव्यक्ति से किसी हद तक संतुष्ट होता हूँ, मैं चाहता हूँ उसको साझा करूं.”

मणिपुरी भाषा में प्रस्तुत यह नाटक या उनके अन्य नाटक भी इस बात की पुनर्प्रस्थापना करते  हैं कि रतन थियाम अपनी स्थानीयता, अपनी आंचलिकता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम और वैश्विक होते हैं. वे मणिपुरी संस्कृति को वैश्विक संस्कृति से काटकर देखने के स्थान पर उसे उसके बीच रखकर देखते हैं. इस प्रक्रिया में वे जो प्रश्न उठाते हैं वे सिर्फ मणिपुरी संस्कृति के लिए या भारतीय संस्कृति के लिए ही प्रासंगिक नहीं होते, वे वैश्विक संस्कृति के लिए भी अर्थपूर्ण होते हैं. वे इस तरह के प्रश्न इसलिए उठा पाते हैं क्योंकि वे अपने नाटकों की विशेषता को अपनी संस्कृति की विशेषता में अवस्थित करते हैं और फिर इस संस्कृति के उन तत्वों को आलोकित करने का प्रयास करते हैं जिनमें वैश्विक मूल्य झलक रहे हों. शायद यही कारण है कि उनके नाटक मणिपुरी भाषा में होते हुए भी, मणिपुरी संस्कृति से उत्पन्न होते हुए भी कभी भी आंचलिक नहीं जान पड़ते. वे अपने नाटकों में ध्वनित होती मणिपुरी भाषा और संस्कृति में मानो समूचे विश्व को बुलाते हों या कि यह कहें कि वे अपने नाटकों में इस भाषा और संस्कृति को वैश्विक स्पंदनों को सुनने योग्य बनाते हैं और ऐसा इसलिए है कि उन्होंने मणिपुरी और भारतीय संस्कृति में गुंथे हुए वैश्विक मूल्यों को अपने रंगकर्म की आभा में प्रकट करने की अनवरत चेष्टा की है. वे मणिपुरी और भारतीय संस्कृति के नागरिक होते हुए ही विश्व नागरिक हुए हैं. उनके नाटकों में हमारी सभ्यता पर छाए संकट की गहरी चेतना है. इस चेतना को वे मणिपुर से उठाकर विश्व स्तर पर स्थापित कर देते हैं और दुनिया के सामने तमाम अनसुलझे प्रश्न छोड़ देते हैं. उनके नाटकों ने वैश्विक संवाद की संभावना को निरंतर खोलने का वह यत्न किया है जिसे पिछले वर्षों के क्षुद्र राष्ट्रवाद ने निरंतर अवरुद्ध किया है.

रतन थियाम का कला-कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर कराता है. आज के संवेदनहीन होते समाज में उनकी कला मनुष्यता और मानवीय संवेदनाओं की उपस्थिति में हमारा विश्वास अटूट करती है वह भी अपने पूरे सौन्दर्यबोध के साथ. उनकी कला दृढ़ता से इस बात की प्रतिस्थापना करती है कि संसार की तमाम विसंगतियों, विद्रूपताओं, विभीषिकाओं के बावजूद इस संसार में सौन्दर्य है, प्रेम है, मानवीय संस्पर्श है और बचा रहेगा.

रतन थियाम का नाट्यकर्म मणिपुर और भारतीय परम्पराओं में डूबा हुआ है. वे अपनी स्थानीयता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम होते हैं. इतिहास की दारुण विडंबनाओं को उघाड़ता उनका रचना संसार हमें गहरी आध्यात्मिकता के सम्मुख लाता है. आज जब मनुष्यता की चिंताओं को आसान फ़ॉर्मूलों और छिछली बातों के सौन्दर्य को औसत अनुभव बना दिया है, तब रतन थियाम का कला कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर करता है. उनकी कला मनुष्य की पीडाओं की, उसके संघर्ष की और उसकी जिजीविषा की ऐसी छवियाँ गढ़ती है, जो हमें एक गहन अनुभव से साक्षात्कार कराती है.वे केवल एक नाट्यकर्मी नहीं वरन एक ऐसे कला साधक हैं जो अपने रचनाकर्म से गढ़ी हुई कोटियों के परे जाते हैं. वे शास्त्रीयता की दीर्घ परंपरा में डूबकर नया सृजन करनेवाले अनूठे कलाकार और मनीषी हैं.

रतन थियाम नित बदलते मुहावरों का पीछा करने के स्थान पर अपनी नई दृष्टि का स्वयं संथान करते हैं.. वे सच्चे अर्थों में एक ‘मार्गी’ कलाकार हैं. रंगकर्म के क्षेत्र में  थियाम ने सृजन-सक्रियता, पारम्परिकता, वैश्विक प्रतिष्ठा, नाट्य विधा और संबद्ध कला माध्यमों के विकास तथा संस्कृत नाटकों को आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है. रतन थियाम केवल रंगकर्म में रचे-बसे हैं.  पूरी दुनिया में भारतीय रंगकर्म की विजय पताका फहराने और लहराने वाले श्री थियाम अपनी तरह के अनूठे रंगकर्मी हैं. वे संस्कृत नाटकों और हिंदी नाटकों को तो मणिपुरी में लेकर आते ही हैं, विश्व के मशहूर नाटकों को भी वे मणिपुर से जोड़ते हुए उसे ग्लोबल बनाते हैं.   रंगकर्म में पूर्णतः रत और रंगकर्म को ही पूर्णतः समर्पित रंगनिर्देशक और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष आदरणीय रतन थियाम ने अपनी अद्वितीय सृजनात्मक क्षमता द्वारा भारत के रंगकर्म को विश्व स्तर पर प्रतिस्थापित किया है. उनकी ख़ास बात यह है कि इस प्रतिस्थापना के लिए उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और कलाओं की ओर रुख तो किया लेकिन वहां से कला-तत्वों को लेकर पूर्णतः देशज और पारंपरिक रूप में भारतीय समाज के अनुरूप प्रस्तुत करने की भरसक कोशिश की जिसमें वो पूर्णतः सफल भी हुए हैं. संस्कृत नाटकों को उन्होंने आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी किया है.

रतन थियाम अपने रंगकर्म में वाचिक अभिनय के धागे में आंगिक अभिनय के मोतियों को पिरोते हैं. पर ये मोती मंच पर फैले रंगों के संयोजन से ऐसे आलोकित होते हैं जैसे सूर्य के उगते उजाले में किसी वृक्ष के शिखर पर हिलते पत्तों के समूह. एक ऐसे समय में जब कलाओं के अनुभव चमकीली छवियों और उत्तर आधुनिक वाग्जाल में घटाए जा रहे हैं, रतन थियाम जैसे व्यक्तित्व का होना एक गहरी आश्वस्ति देता है. रतन थियाम न सिर्फ भारतीय कला जगत में अपितु विश्व कला जगत में एक ऐसी उपस्थिति हैं जो अपनी जड़ों से जुड़कर वर्तमान समय को प्रश्नांकित करते चलते हैं. हम सबने जिन्होंने उनका सृजन देखा है अपने पर रश्क कर सकते हैं कि हमने  रतन थियाम को देखा है.

आभार
इस लेख को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है श्री उदयन वाजपेयी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रतन थियाम से भेंट’ का जिसका प्रकाशन संस्कृति संचालनालय, भोपाल (मध्य प्रदेश) ने किया है. इस लेख के अंतिम कुछ अंश (जिनमें श्री रतन थियाम के रंगकर्म का विस्तृत विवेचन है) तो ज्यों के त्यों इस पुस्तक से लिए गए हैं. दरअसल वे मेरे नहीं श्री उदयन वाजपेयी और मध्यप्रदेश के तत्कालीन संस्कृति एवं जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा के शब्द हैं जिनके लिए मैं इन दोनों महानुभावों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ.  

संपर्क : manj.sriv@gmail.com

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिया गया सुझाव जनसंहार की दिशा में

भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन  महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के द्वारा दिये  गये बयान की भर्त्सना करती है , जिसमें उन्होंने कहा है कि गर्भ में बच्चे की लिंग पहचान करने को अनिवार्य बनाया जाय . यह एक बहुत ही प्रतिगामी स्टैंड है और यह देश में कन्या-भ्रूणहत्या को और बढ़ावा देगा . भारतीय महिलाओं और उनसे जुड़े संस्थाओं के लम्बे संघर्ष के बाद पितृसत्तात्मक मानसिकता/सोच के कारण होने वाले लिंग-निर्धारण को रोकने के लिए पीसीपीनडीटी लागू हुआ. मंत्री महोदया को इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए हरसंभव प्रयास/कोशिश करनी चाहिए. जो महिलाएं आशा कार्यकर्त्ता के रूप में काम कर रही हैं उन्हें कार्यकर्ता की तरह न मानकर, श्रमिकों की मान्यता दी जाये और इससे जुड़े सभी फायदे दिये जायें.

लिंग निर्धारण को मान्यता देने की बात में कुछ खास लोंगों का इसमें स्वार्थ निहित है. अस्पताल में प्रसव बढ़ाने के नाम पर यह कदम महिलाओं के लिये जनसंहार साबित होगा.

इसलिए भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन इस बयान को और इस तरह का कोई भी कदम को तुरंत वापस लेने की मांग करती है.

एनी राजा
महासचिव

The National Federation of Indian Women (NFIW) strongly condemn the statement of Women and Child Development Minister Smt. Maneka Gandhi on making sex determination mandatory.

This is a very retrograde position and will lead to increase in female foeticide in the country.. The PC PNDT has been brought through numerous struggles by Indian women and their organisations to stop sex determination due to a patriarchal mind set. The Minister must make all effort to see that the implementation of this Act is done properly.  The women who work as ASHA must be given worker status and all the benefits as workers, not as volunteers

The move to make sex determination is nothing but a ploy to serve vested interest in the country. In the name of increasing hospital deliveries, this move  will result in genocide of women.

NFIW therefore demand immediate withdrawal of this statement and any such move by the government in this regard.

Annie Raja
General Secretary

एक अंग्रेज़ी-भाषी बंगाली दलित महिला की कशमकश

दृशद्वती बार्गी  

जाधवपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्कोत्तर. स्त्री अध्ययन केंद्र से एमफिल . संपर्क drishadwatibargi@gmail.com

( यह आलेख हर किसी को पढ़ना चाहिए , ख़ास कर उन्हें जो डिकास्ट होने का दावा करते हैं , या होने की प्रक्रिया में हैं . उन्हें भी जो अनुभवजन्यता को खारिज करते हैं. संपादक)  


पहले से ही लंबा यह शीर्षक और भी लंबा होता, यदि वह इस लेखक के  संपूर्ण  व्यक्तित्व ( कर्तापन ) को अभिव्यक्त करता। उस स्थिति में यह शीर्षक होता, ‘‘कोलकता, पश्चिम बंगाल में कार्यरत, बुद्धिजीवी बनने की इच्छुक, उपभोक्तावादी  व सेक्स के संबंध में उभयभावी अभिमुखता (मैं जानबूझकर ‘समलैंगिक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रही हूं क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि इसका अर्थ क्या होता है) वाली, उन्नतिशील, अंग्रेज़ी-भाषी, दलित स्त्रीवादी व विचारक व्यक्ति की कशमकश’’।

भले ही ऐसा प्रतीत होता हो, परंतु यह लेख मेरी व्यक्तिपरकता के विच्छेदन, पहचान व उसे सूचीबद्ध करने का आत्ममुग्ध प्रयास नहीं है। मेरा फोकस एक ऐसे शहर और एक ऐसे विश्वविद्यालय में काम करने के अपने अनुभव को सांझा करने पर है जो देश का बौद्धिकता का अड्डा होने का दंभ भरता है। मैं एक ऐसे विद्यार्थी के रूप में अपनी बात रख रही हूं, जिसने इस विश्वविद्यालय में पांच साल पढ़ाई की है। मैं अन्य दलित विद्यार्थियों की ओर से बोलने का दावा नहीं करती और ना ही मैं उनके जातिगत भेदभाव के अनुभव को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने का दावा कर रही हूं। ऐसे दलित विद्यार्थी हो सकते हैं जो यह कहेंगे कि उन्हें किसी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें अपनी जाति के कारण विश्वविद्यालय में शारीरिक यंत्रणा तक भुगतनी पड़ी हो। मैं इन दोनों में से किसी शिविर में नहीं हूं। यह लेख मेरी जाति के साथ, कैम्पस में मेरी व्यक्तिगत जीवनयात्रा के बारे में है और इस बारे में भी, कि मैंने इस यात्रा को किस तरह पूरा किया और मैं उसे कैसे देखती हूं। इस दृष्टिपात की व्यक्तिगत प्रकृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मैं जाति के संबंध में अकादमिक उद्देश्य से भी लेखन, चिंतन और सिद्धातिकरण करती रही हंू।

बंगाली भद्रलोक व भद्र महिलाओं द्वारा आमतौर पर दावा किया जाता है कि बंगाल में जाति का अस्तित्व ही नहीं है। क्या हम कभी इस राज्य में जातिगत दंगों या बलात्कारों के बारे में सुनते हैं? यहां ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने अपना यज्ञोपवीत त्याग दिया है, जो गौमांस के शौकीन हैं और जिन्हें एक ही सिगरेट, बीड़ी या चरस को अपने अनुसूचित जाति (दलित नहीं) के साथी के साथ पीने में कोई संकोच नहीं होता। यहां ऐसे आमूल परिवर्तनवादी हैं, जो सड़क किनारे चाय के ठेलों पर घंटों अड्डा जमाते हैं, किसी अनुसूचित जाति (दलित नहीं) के व्यक्ति द्वारा बनाए गए सड़कों पर बिकने वाले खाद्य पदार्थों का जमकर मज़ा लेते हैं और जो कब-जब अपने उस अनूसूचित जाति (दलित नहीं) के सहकर्मी को वर्गदंभी बताते हुए उसका मज़ाक उड़ाते हैं, जो अपने जीवन के पहले पीटर इंग्लैंड पेंट के गंदा हो जाने के डर से धूलभरे फुटपाथ पर बैठने से हिचकिचाता है।

अगर कोई उस असली आमूल परिवर्तनवादी को जानना चाहता है, जो भद्रलोक और भद्र महिलाओं के हृदय में हमेशा वास करता है और जिसकी आग कब-जब भड़क उठती है, तो उसे अड्डों में अवश्य जाना चाहिए। अड्डे, बंगालियों के हृदय, मस्तिष्क और हां, उनके पेट का भी, प्रवेश द्वार होते हैं। अड्डों में बंगाली भद्र समाज के रूमानी, बौद्धिक व चिड़चिड़े पहलू अपनी पूरी नग्नता में देखे जा सकते हैं। यहां क्यूबा की क्रांति पर चर्चा हो सकती है और किसी जानीमानी अंग्रेज़ी साहित्यिक पत्रिका का संपादक किसी पंजाबी (अर्थात गैर-बंगाली) के होने की विदू्रपता को अभिव्यक्त किया जा सकता है। अभी-अभी खरीदे गए चार शयनकक्ष वाले फ्लैट की कीमत से लेकर मायावती के ऐश्वर्यशाली बंगले, गरमा-गरम बहस का मुद्दा बन सकते हैं।

मैं एक ऐसी बंगाली दलित हूं जिसे लंबे समय तक भद्र समाज के सदस्यों के साथ समय बिताने और उनके व्यवहार का अवलोकन करने का सौभाग्य/दुर्भाग्य मिला है। मैं उनके स्वभाव की कुछ विचित्रताओं से वाकिफ हूं। शायद आप यह सोच रहे होंगे कि मैं अड्डों और भद्र समाज के बारे में अनावश्यक बातें कर रही हूं। परंतु इन्हीं ने मेरा जातिवाद के अत्यंत घिनौने चेहरे से परिचय करवाया है। यह घिनौना चेहरा तब सामने आता है जब आपके सहपाठी और प्रोफेसर, गैर-ब्राह्मण उपनामों वाले लोगों का मज़ाक उड़ाते हैं और फिर आपकी ओर मुस्कुराकर देखते हुए, दिखावटी क्षमायाचना करते हैं; जब आरक्षित वर्ग (दलित नहीं) के विद्यार्थियों की शैक्षणिक असफलताओं का इस्तेमाल, आरक्षण को विशुद्ध बुराई बताने के लिए किया जाता है और जब आरक्षित वर्ग (दलित नहीं) के विद्यार्थियों के अंग्रेज़ी ज्ञान में कमी को, उनके अंग्रेज़ी-भाषी शिक्षक की प्रज्ञा का अपमान बताया जाता है।

जाति ने अपना सिर तब उठाया जब मैंने ऊँची जाति के एक लड़के का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह लैंगिक भेदभाव में विश्वास रखता था। मुझसे कहा गया कि उसने मुझे आसानी से इसलिए जाने दिया क्योंकि जाति पदक्रम में मैं उससे तीन पायदान नीचे थी। जाति ने तब भी सर उठाया जब मेरे दलित मित्रों ने, ऊँची जाति के छात्रों के साथ मेरी दोस्ती को विश्वासघात निरूपित किया। जब मेरा एक प्रेमी मुझे प्रेम से सहला रहा था, तब जाति मेरे मस्तिष्क पर छा गई और मेरे बिस्तर में घुस आई। जब मैं अपना पहला ब्रांडेड बैग खरीदने की खुशी में सराबोर थी या जब मैं महानगर में दस साल रहने के बावजूद 24 साल की उम्र में अपने जीवन का पहला हाॅट चाकलेट कप पीने के अपने अनुभव को याद कर रही थी, उस समय मुझे अचानक यह ख्याल आया कि मनु ने दलितों का स्वर्णाभूषण व कीमती रत्न धारण करना प्रतिबंधित किया था।

कुछ समय पूर्व, मार्क्सवादियों के शब्दों में मैं ‘उपभोक्तावादी ’ बन गई। और तब यह कहा गया कि मैं दलितों के उद्धारक के भेष में एक पाखंडी हूं। यदि अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों द्वारा अटक-अटक कर अंग्रेज़ी बोलना, कथित रूप से हमारे शिक्षकों की बौद्धिकता का मखौल बनाता था तो इस भाषा पर मेरे तुलनात्मक रूप से बेहतर (चाहे वह कितना ही अधूरा व अपर्याप्त क्यों न हो) अधिकार ने मुझे आंग्लरागी कामरेडों की निगाह में वर्गशत्रु बना दिया।

इस सबका नतीजा था एक अजीब-सी कशमकश-एक तरह का बौद्धिक, भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक लकवा। क्या मुझे अपनी दलित पहचान जाहिर करनी चाहिए? क्या मुझे दलित साहित्य पर काम करने का अधिकार है? क्या दलित व गैर-दलित विद्यार्थियों की दृष्टि में मेरे क्रमशः कथित पाखंड और विश्वासघात के बावजूद मुझे यह अधिकार है? इस कशमकश ने मुझे काफी भयाक्रांत कर दिया है। इसके कारण मैं मानसिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अलग-थलग,  तनावग्रस्त और अकेली महसूस कर रही हूं।

एक बार एक साक्षात्कार के दौरान एक प्रोफेसर साहब ने मुझसे एक अजीब सी बात कही और वह यह कि बंगाल में कोई दलित नहीं है। मैं केवल व्यंग्यपूर्वक मुस्कुरा दी और मैंने कुछ भी नहीं कहा। मेरा यह कहना है कि पश्चिम बंगाल में दलित इसलिए नहीं हैं क्योंकि  वहां दलितों को अस्तित्व में रहने ही नहीं दिया जाता। आप जातिमुक्त ब्राह्मण, बैद्य या कायस्थ हो सकते हैं। दूसरी ओर, आप ऊँची जातियों के जातिमुक्त आमूल परिवर्तनवादियों के हाथों मुक्ति का इंतजार करने वाले अछूत हो सकते हैं या आप अनुसूचित जाति के ऐसे कर्मचारी हो सकते हैं, जो सकारात्मक कार्यवाही से प्राप्त ‘विशेषाधिकार’ का लाभ उठाने के लिए सतत शर्मिंदा रहे।

जहां तक मैं समझती हूं दलित शब्द का संबंध, संबंधित व्यक्ति की गरिमा से है और उस भेदभाव व पूर्वाग्रह के इतिहास से भी, जिसका सामना उसे आज भी ऐसे स्वरूपों में करना पड़ता है जिसका भद्रलोक का माक्र्सवाद कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। शनैः-शनैः जातिप्रथा के प्रतिरोध का लंबा इतिहास भी इस शब्द के अर्थ का हिस्सा बन गया है और एक अलग पहचान का हमारा दावा-जिसमें केवल हमारा निर्धन श्रमिक वर्ग से या अछूत होना काफी नहीं है-भी अब इसके अर्थ में शामिल हैं।

जब मैं दलित के रूप में अपनी पहचान बताती हूं तो मैं एक दावा करती हूं और उस  भेदभाव व पूर्वाग्रह और उनके विरोध, दोनों की मान्यता चाहती हूं। परंतु अपनी दलित पहचान को जाहिर कर मैं अनजाने में ही उस ‘श्रम विभाजन‘ को भी चुनौती देती हूं जो पश्चिम बंगाल की संस्कृति का अभिवाज्य हिस्सा बन गया है। यह विभाजन है मुक्तिदाताओं (जिनमें शामिल हैं लेखक, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, डाक्टर, अर्थशास्त्री, ट्रेड यूनियन नेता, नक्सल नेता आदि) और दूसरी श्रेणी है उन लोगों की जो अपनी मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं (जिनमें शामिल हैं किसान, घरों और फैक्ट्रियों के श्रमिक व टैक्सी व रिक्शा चालक आदि)।

किताबों की किसी भी दुकान में चले जाईए या प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों की शिक्षकों की सूची पर नज़र डाल लीजिए या सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित किसी भी छोटी-मोटी पत्रिका के लेखकों पर-हर जगह आपको भट्टाचार्यों, मुखर्जियों, बोसों और दासगुप्ताओं की भरमार दिखेगी। फिर, उन हज़ारों महिलाओं और पुरूषों के उपनाम जानने का प्रयास कीजिए, जो किसी भी राजनैतिक रैली या सभा की भीड़ होते हैं या उन पुरूषों के, जो हर सुबह सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं और हमारे कचरे को उठाते हैं या उन महिलाओं के, जो भद्रलोक के घरों को साफ रखने के लिए रोज़ दूर-दूर से आती हैं।

इस संदर्भ में एक ब्राह्मण टैक्सी चालक या एक दलित व्याख्याता या (विशेषकर) सामाजिक कार्यकर्ता, आंखों की किरकिरी और नैतिक व राजनैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य होता है। यह भद्रलोक का सामंतवाद है, जिसे तोड़-मरोड़कर उस पर उनकी आमूल परिवर्तनवादी सोच का कलेवर चढ़ा दिया गया है। भद्रलोक माक्र्सवाद को एक ऐसी जाति के लोगों/भद्रलोक की आवश्यकता रहती है, जो दूसरी जाति के लोगों, छोटोलोक के मुक्तिदायक बन सकें। अगर छोटोलोक अचानक स्वयं के दलित होने का दावा करने लगें और स्वयं ही अपने मुक्तिदायक बन जाएं तो वे छोटोलोक को मुक्त करने के भद्रलोक के विशेषाधिकार को चुनौती देते हैं और निर्भरता व सत्ता और वर्चस्व और अधीनता की व्यवस्था को भी। ऐसा करके वे उस आंदोलन के इतिहास पर अपना दावा प्रस्तुत करते हैं, जिसका फोकस दलितों के अभिकर्तृत्व पर था और जो सवर्णों की उदारता और उनके आमूल परिवर्तनवादिता को संदेह की निगाह से देखता था।

दलित यदि अपनी अलग पहचान स्थापित करते हैं तो इससे मुक्तिदाता और मुक्तिकामी का जाति पदक्रम छिन्न-भिन्न हो जाता है और मुक्तिदाता की कोई उपयोगिता ही नहीं बचती। इसलिए भद्रलोक हर उस व्यक्ति को बौद्धिक व मनोवैज्ञानिक तरीकों से निशाना बनाते हैं, जो इस श्रम-विभाजन को चुनौती देता है और उसकी अपनी अलग पहचान के दावे को झुठलाते हैं। सवाल यह नहीं है कि मुझे अपने आप को दलित पहचान देना चाहिए या नहीं या मुझे इसका अधिकार है या नहीं। प्रश्न यह है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति को बौद्धिक व भावनात्मक रूप से जिस तरह अलग-थलग कर दिया जाता है, उसके चलते क्या मैं वैसा करने की हिम्मत जुटा सकती हूं। मैं एक ऐसी कशमकश में फंसी हुई हूं, जिसकी जड़ें दुनिया में अकेले रह जाने के मानवीय भय में है। मुझे बहुत प्रसन्नता होगी अगर मुझे गलत सिद्ध कर दिया जाए। मुझे बहुत अच्छा लगेगा यदि कोई अन्य बंगाली दलित, मेरी इस स्थापना का विरोध करे और एक बेहतर चित्र प्रस्तुत कर सके।
फारवर्ड प्रेस  से साभार 

अठारह साल का हुआ भारत रंग महोत्सव

 राजेश चन्द्र


( तीन सप्ताह तक चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव का कल उदघाटन हुआ , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम के नाटक मैक्वेथ से. हमारी कोशिश होगी कि स्त्रीकाल के पाठकों को रंग महोत्सव के नाटकों  की समीक्षात्मक रिपोर्ट , समीक्षा आदि पढवाते रहें. शुरुआत समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चंद्र की रिपोर्ट से . नाट्य महोत्सव में स्त्री निदेशकों के नाटकों अथवा नाटकों के स्त्रीवादी पाठ के साथ रपट , समीक्षाएं आमंत्रित हैं .) 

मैक्वेथ का एक दृश्य

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा प्रति वर्ष आयोजित किये जाने वाले अन्तररार्ष्ट्रीय नाट्योत्सव “भारत रंग महोत्सव” के अठारहवें संस्करण की आज विधिवत शुरुआत हो गयी. ज्ञात हो कि यह महोत्सव इस वर्ष 01 फरवरी से 21 फरवरी के बीच आयोजित हो रहा है, जिसमें भारत के अलावा लगभग 10 अन्य देशों की 80 नाट्य-प्रस्तुतियां दिखायी जायेंगी. इन प्रस्तुतियों के अलावा विभिन्न विषयों पर केद्रित सेमिनार, गोष्ठी, थियेटर बाज़ार, रंगकला से सम्बंधित वस्तुओं की प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों को भी समारोह का हिस्सा बनाया गया है.

कमानी सभागार, मंडी हाउस में 01 फरवरी की शाम के 6 बजे आयोजित भव्य उद्घाटन समारोह में सुप्रसिद्ध रंग एवं सिने अभिनेता नाना पाटेकर, अभिनेता अनुपम खेर, सुप्रसिद्ध रंग निर्देशक तथा रानावि सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम, नाट्य विद्यालय के निदेशक वामन केन्द्रे और भारत सरकार के संस्कृति सचिव एन.के. सिन्हा ने दीप जला कर समारोह का उद्घाटन किया और अपने विचार भी व्यक्त किये. आज के समारोह का मुख्य आकर्षण रहा शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक “मैकबेथ” का मणिपुरी में मंचन, जिसे रतन थियाम के निर्देशन में कोरस रेपर्टरी थियेटर, मणिपुर द्वारा प्रस्तुत किया गया.

मध्यकालीन स्कॉटलैंड के सामंती समाज के अंतर्विरोधों को सामने लाने के लिए ही शेक्सपियर ने “मैकबेथ” की रचना की है. इस नाटक में आरम्भ से लेकर अंत तक जीवन और मृत्यु का रोमांचक संघर्ष वर्णित है. भयानक अमानुषीय घात-प्रतिघातों से दर्शक द्रवित एवं उद्वेलित हो उठते हैं. इसमें जीवन के प्रति व्यंग्य भी प्रभूत मात्रा में मुखरित हुआ है.

शेक्सपियर ने अपनी असाधारण और रहस्यपूर्ण मनःस्थिति को संतुष्ट करने के लिए दो हत्यारों की अवतारणा की है और जैसा कि  साधारणतया उनकी सभी कृतियों में होता है, इन दोनों हत्यारों में विवेकपूर्ण स्पष्ट अंतर भी दर्शाया है. हत्यारा होते हुए भी एक के प्रति दर्शक की सहानुभूति उमड़ पड़ती है और दूसरे के प्रति घृणा का उद्रेक. प्रत्येक मनुष्य में जब दानवता जागृत होती है, उसकी मनुष्यता लुप्त हो जाती है, किन्तु जीवन में ऐसे भी स्थल आते हैं जहां परम क्रूर होते हुए भी वह अपनी मानवीय भावनाओं से संचालित होता है. मानव मन की गहराइयों का व्यंग्यपूर्ण अंकन “मैकबेथ” की विशेषता है.

रतन थियाम का “मैकबेथ” चरित्र-चित्रण की नवीनता, वस्त्र-भूषा तथा दृश्य-रचना के अभिनव प्रयोगों, मुद्राओं एवं अंग-संचालन के चमत्कारों, अद्भुत संगीत तथा अन्धकार और प्रकाश के जादुई उपयोग के कारण एक अति विशिष्ट प्रस्तुति का दर्ज़ा हासिल कर चुका है. अपनी इस प्रस्तुति में रतन थियाम ने मूल नाटक को यथासंभव बरक़रार रखने का प्रयास किया है, जहां मैकबेथ केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं रह जाता, बल्कि वह एक ऐसी रुग्णता का रूपक बन जाता है, जिसने आज समूची दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. उनके पात्र एक दूसरे से सीधे संबोधित होते हुए नहीं प्रतीत होते, बल्कि वे एक प्रतीक चरित्र की भांति व्यवहार करते हैं. निस्संदेह यह प्रस्तुति हर बार दर्शकों को एक सम्पूर्ण और चिरस्थायी रंग-अनुभव देने में समर्थ सिद्ध होती रही है. भारत रंग महोत्सव की इससे यादगार शुरुआत और क्या हो सकती थी?

इससे पहले उद्घाटन समारोह में अपने संबोधन में विद्यालय के निदेशक वामन केन्द्रे ने बताया कि विगत तीन वर्षों में इस महोत्सव का काफी विस्तार हुआ है और अब यह सही मायनों में एक विश्वस्तरीय महोत्सव का स्वरूप ले चुका है. इस वर्ष से यह महोत्सव भारत के चार अन्य प्रमुख शहरों- जम्मू, अहमदाबाद, भुवनेश्वर और तिरुअनंतपुरम में भी समानांतर रूप से आयोजित किया जा रहा है. उनके मुताबिक यह महोत्सव आज एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नाट्य महोत्सव बन चुका है, जो इस देश के नाट्य-प्रेमियों के लिए एक गर्व का विषय है. प्रोफ़ेसर केन्द्रे ने इस मौके पर यह भी बताया कि विद्यालय की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए सरकार शीघ्र ही इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर मान्यता देने जा रही है.

रंगकर्मियों और कला-प्रेमी दर्शकों के लिए इस समारोह में शामिल कुछ कार्यक्रम विशेष रूप से आकर्षण के केन्द्र होंगे जैसे- मास्टर क्लासेज़, लिविंग लीजेंड सीरीज और विश्व थियेटर फ़ोरम. मास्टर क्लासेज़ में जहां सर्वश्री सामिक बंदोपाध्याय, बालन नाम्बियार, चंद्रशेखर कम्बार और सुश्री जॉय माइकल रंगकला की बारीकियों पर रोशनी डालेंगी, वहीँ लिविंग लीजेंड सीरीज़ के अंतर्गत डॉ. कपिला वात्स्यायन, श्री अडूर गोपालाकृष्णन, श्रीमती सोनल मान सिंह, श्री इंदिरा पार्थसारथी, श्री जब्बार पटेल और श्री नाना पाटेकर अपने-अपने क्षेत्र से सम्बंधित अनुभव बांटेंगे.
समकालीन रंगमंच के संपदाक राजेश चन्द्र  थियेटर एक्टिविस्ट , कवि, नाट्य समीक्षक हैं . संपर्क : 9560124579

रश्मिरेखा की कविताएँ

रश्मिरेखा

एक कविता संग्रह ‘सीढ़ियों का दुःख’, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित. संपर्क : rashmirekhakavi@gmail.com

समय

एक समय वह होता है जो घड़ी बताती है
दूसरा वह जिसे  शब्दों में पकड़ लेते है
इस दुनिया के कुछ खास कवि
स्थिर हो जाता है वह समय इतिहास के बहाव में
घड़ी की टिक टिक की तरह घड़कता है लगातार
हमारी धमनियों के रक्त में
पीढ़ी दर पीढ़ी

इनसे अलग एक समय वह भी है
जो हमारे सपनो में शामिल होता है
जिसके आगोश में रहता है सारा जीवन
हमारी स्मृतियों में भी बचा रहता है वह समय
एक नमी,एक तिनका,एक शाम की उदासी
एक पगडण्डी,एक कुलाँचे भरते हिरन की तरह
स्मृतियों के आकाश में पर फैलाये उड़ते हैं
सपनों के परिन्दे तमाम उम्र

आज जब सूचनाओं को बदला जा रहा है
हमारी स्मृतियों में
शब्दों के घोसले में दुबक रहे हैं सपने
इच्छाएँ अपनी जगह तलाश रही है
अफ़रा तफ़री के इस माहौल में।
बड़ी मुश्किल से सुनाई देती है
समय की फुसफुसाहट
वे कुछ जो देख पा रहे हैं फिर भी
समय के आईने में उसका चेहरा
वे हैरान परेशांन है इस खबर से
सपने और स्मृतियाँ भी
खरीद फ़रोख़्त की वस्तुऍ हैं
और
जज़्बात बाज़ार की एक पसंदीदा चीज़

रचना का सफ़र 

समय पंख समेत उतर गया था
समुन्द्र किनारे
डूबकर हो रही थी उससे बातचीत
जहाँ पानी पर थी लगातार हवा की कारीगरी

ख़ामोशी में भीतर की दबी आवाजें
घोल रही थी खाने में नमक का स्वाद

आसमान में भरा था डब डब पानी
नम हवा के असर में थी पत्तियाँ
पक्षियों की आवाजाही के बीच
कूँची में खास रंग लिए सूरज आ गया था
बहुत पास चाँद के घर में
जहाँ बह रही थी नदी
नींद में पानी का संगीत लिए
गुफाओं में बन रहे थे गीले भीत्ति चित्र
परछाइयां भी डूबने लगी थी साथ साथ
इस जीवंत और साँस लेते संसार में
नहला रही थी तरह तरह की आवाजें
इबादत की तरह दीख रहे थे
सफ़ेद पंखों पर मचलते नीले अक्षर
शाम के रंग भींगने लगे थे
नाव रह रह कर थरथरा रही थी अथाह जल मे
मानो अपनी कविता की कुछ पंक्तियां

साभार गूगल

लुकाठी

छह सौ साल बाद
अचानक जगह जगह
सेमिनारों में मौसम कबीर हो रहा है
मेरी आँखों के आगे और स्याह होता जा रहा है अँधेरा

बुनकर बस्तियों में बेकार पड़ा है कबीर का करघा
और भारत के बाजारों में,दुकानों में
सज गए है विदेशी कपड़ों के थान
ठीक मस्जिद की बग़ल में है
मेरा किराये का मकान
लेकिन मेरे कान नहीं सुन पाते है अज़ान
मंदिर की ईमारत मैं दूर से ही  देख लेती हूँ

मुझमें नहीं बची है
बहुरिया की बेचैनी
अपने राम को पाने की

इस मौसमी बारिश की टप टप में
मुझे याद आ रही है
छह सौ साल पुरानी कबीर की वह लुकाठी
वह न होती तो शायद कबीर न होते कबीर

जैसे सभ्यता की शुरुआत हुई होगी
आग के आविष्कार से
कुछ वैसे हो मेरे लिए कविता
कबीर की लुकाठी से

वे जो दंगा फ़साद करते है
अपने पड़ोसियों का घर जलाते है
अक्सर राख के ढेर  में तब्दील कर देते है
वर्णहीन बस्तियाँ
उन्हें कैसा मालूम हो सकता है
कबीर की लुकाठी का मतलब

दूसरों का नहीं
सिर्फ अपना घर जलाने के लिए
किया था कबीर ने
जिस लुकाठी का आविष्कार

पहरुए

पहरे की सबसे ज्यादा जरुरत होती हैं
पहरुए को लोकतंत्र में

पहरुए अपने चेहरों की हिफाज़त में
इस्तेमाल करते हैं कई कई मुखौटे
प्रान्त के पहरुए से अधिक जादुई है
देश के पहरुए का नकाब

पहरे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है
पहरुए को
जब वह पिकनिक मनाता है
झरने के पास शिलाखंड पर पर बैठकर
खेलता है शतरंज
पहरुए की रखवाली करते है पहरुए
पहरे पर पहरा
लोकतंत्र मे पहरुए की हकीक़त

बचे रहें पहरुए
बिगड़ जाय भले देश का नक्शा
सभी दिशाओं में फैला है
उनके भीतर का भय
लोकतंत्र के पहरुए तेज रफ़तार से
दौड़ा रहे है कागज़ी  घोड़े
धरती पर खुले आम चल रही है ज़ंग

बाँधते हुए हवाई पुल
पहरुए फ़तह करते रहे हैं हवाई किले

छत

किराये के मकान से भी आँखें देख लेती है आकाश
देखते हुए आकाश आँखें बन जाती हैं आकाश
कई तरह की छतों के साये में एक के बाद एक
कई तरह की छतों में अपने को बदलती
अपने लिए एक अलग छत की तलाश में
जुटी रही ज़िन्दगी तमाम उम्र

एक ऐसा दरवाज़ा होता जहाँ सिर्फ़ अपनी दस्तक होती

आज कितना मुश्क़िल होता जा रहा है
इतने बड़े भूमंडल में
बचाये रखना एक कोना
जहाँ सर पर अपनी छत हो और
उस छत से उड़ान के लिए एक आसमान

याद आती है बचपन की वह छत
जहाँ ढेर सारे सपनें देखे
मीलो लंबी चहलकदमी की
चाँद से की जी भर बातें
आँगन की कैद से ली मुक्ति
जुलूस में हुए शामिल

आज अदृश्य होते जा रहे हैं वे माथे
जिसपर कई बार त्योरियाँ पड़ जाया करती थीं

क्या कभी संभव है
स्मृतियों की बस्ती में मिल पाना
बचपन का वह खोया रास्ता
जिसपर चलते हुए
सिर पर महसूस करती थी छत

धारावी

राजकुमार राकेश  

चर्चित कथाकार . चार उपन्यास और चार कहानी संग्रह . दो कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन – ‘ आपातकाल डायरी ‘ और ‘अश्वमेध’ संपर्क :7087799025

राजकुमार राकेश की यह कहानी थाने की केस डायरी में बिखरा मुम्बई के सबसे बड़े स्लम ‘ धारावी’ का जीवन  है- वह जीवन, जो नायिका समीरा की कहानी बन जाता है, जब वह ब्याह कर ‘मंडी’ की सुकून भरी जिंदगी से धारावी की एक खोली में आ बसती है . महानगरों के चकाचौंध में कुछ जिंदगियां यूं रेंगती भी हैं. 


इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने कुर्सी पर बैठे -बैठे, जरा सा पहलू बदलकर कहा, ‘हे समीरा, मला तुशचा विषयी पूर्ण सहानुभूति आहे…देखो, मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है। मगर पोलीस-फ़ोर्स में हम लोगों को कुछ कायदे-क़ानून में रहकर काम करना होता है। सो केस के हर पहलू पर पूछताछ करना हमारी ड्यूटी बनती है। और शुभा म्हात्रे की मौत का ये मामला गंभीर भी है। या तो ये आत्महत्या है या फिर सीधा सीधा क़त्ल का मामला है। इसलिए तुमसे पूछताछ करना जरुरी है। पूछताछ का मतलब किसी को दोषी करार देना नहीं होता।’

समीरा की जीभ सूख रही थी। पानी का गिलास उसके सामने था जरुर, पर जितना बार वह पानी पीने की कोशिश करने लगती उसे पानी पीने के प्रति नफरत के भाव उमड़ आने लगते। इन्स्पेक्टर की बात सुन लेने के बाद उसने गिलास को उठाया और होंठों से लगाकर जबरन दो घूँट पीने के बाद वापस इसे मेज़ पर रख दिया। ‘समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल ने कहा। ‘भ्याम्चे काही कारण नाहीं…डरने की कोई बात नहीं है। बस ये समझ लो कि बतौर इन्क़ुएरी-अफसर मुझे सच तक पहुंचना है। इसमें तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। इससे ज्यादा कुछ नहीं।’
मीरा ने जवाब दिया, ‘जो जानती हूं, वो सब मैं बता देगी। आपको जो पूछना है पूछ लो।’
‘धन्यबाद,’ इन्स्पेक्टर ने कहा। ‘समीरा, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। सबसे पहले तो तुम अपने बारे में तफसील से बताओ। ये मत सोचना मुझे तुम्हारी निजी ज़िन्दगी में कोई दिलचस्पी है, मगर उतना तो जरुर है, जितना इस केस में मुझे जानना चाहिए।

 समीरा ने जबरन सा मुस्कुराने की कोशिश की और इसमें असफल रह जाने के चलते, बिना मुस्कुराए बोलने लगी, ‘मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नहीं है जिसे छिपाया जाना जरुरी हो या जिसे बताकर ही आपको ऐसा कुछ लगे कि वाहजी, ये भी क्या ज़िन्दगी थी। ऐसा वैसा कुछ नहीं। पर अगर शुभाजी के उस ख़राब तरीके से मर जाने की तफ्तीश में इससे आपको मदद मिलती है तो मैं जरुर बताऊँगी।’ आगे वह पूरी सपाटता से बयान करने लगी और इन्स्पेक्टर शीतल ने अपने कान उसके मुंह से निकलते कथनों पर केन्द्रित किये। समीरा ने शुभा म्हात्रे की मौत से अगले दिन से शुरू किया था, जब वह काम पर चली आ रही थी और सोसाईटी के अहाते में लोगों की भीड़ थी, पर उसे रत्तीभर भी अहसास नहीं हुआ था कि यहां किसी की लाश पडी है। जब वह गेट के अन्दर आई तब दोपहर के दो बजने में अभी पांच मिनट बाकी थे। जब वह गेट से आगे निकली, तो उस भीड़ की तरफ उसका सरसरी तौर पर ध्यान जरुर गया था। आसपास पोलिस के कुछ लोग असावधान सी मुद्राओं में हलकी चहलकदमी कर रहे थे। पर उसी सरसरी सी नज़र से ये देखकर वह आगे बढ़ गई थी। किसी ने उसकी तरफ ध्यान तो नहीं दिया, पर पता नहीं क्यों अनायास उसके दिल में एक धडाका सा बैठ गया था। खुद को संयत बनाए रखने के लिए उसने इस तर्क के साथ अपने आपको तसल्ली दी कि क्योंकि आज इतवार है, तो लोगबाग जरा फुर्सत में हैं। वैसे भी उसे ऐसी कोई गरज नहीं थी कि वह संसार की गति पर ध्यान दे। उसे रोजाना की तर्ज़ पर डाक्टर म्हात्रे के घर में अपना काम निपटाना था और ठीक वक़्त पर अपने घर धारावी को लौट जाने से ज्यादा कुछ देखने सुनने की उसे जरुरत या फुर्सत नहीं थी।

वह लिफ्ट में चढ़कर आठवीं मंजिल पर आ उतरी। पर ज्यों ही उसने डाक्टर म्हात्रे के घर के द्वार की तरफ कदम बढ़ाया तो सामने महाराष्ट्र पोलिस के दो सिपाही खड़े दिखे थे। उसने पास जाकर उनसे एक ओर हटने का इशारा किया तो फीतीवाले सिपाही ने पूछा, ‘तु कोण आहेच?’ समीरा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘मैं बाई! डाक्टर म्हात्रे के इस घर में काम करती।’
फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘आज घर उघडणार नाहीं। म्हात्रेच्या बाथको हत्या केली आहे। म्हात्रे की जोरू की हत्या…तुला माहिनी नाही? तुझे पता होना चाहिये था, तू इस घर में काम करती है।’
समीरा की जीभ गले में अटक कर रह गई और होंठ अचानक सूख गए। जब तक वह खुद को संभाल पाती, उस फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘या घराला सील केले गेले आहे। पर्यंन आन मध्ये कोणी ही जाऊ वाकल नाहीं…ऐसेइच अन्दर नाहीं जाने का। सुना क्या? कोई अन्दर नहीं जा सकता है। इस घर को सील कर दिया गया है।’
कुछ पलों तक विमूढ़ सा खड़े रहने के बाद, समीरा के सिर पर जैसे अचानक कोई गाज गिर आई थी। विश्वास नहीं हो रहा था कि शुभा म्हात्रे नहीं रहीं, पर तत्काल ये ख्याल भी चला आया कि इन पोलीस वालों ने इस घर को कोई यूं ही तो सील नहीं किया होगा। जरुर कोई बड़ा कारण रहा होगा। वह भीतर तक कांप गई थी। कुछ लम्हों के बाद उसने खुद को जरा संभाला और कहा, ‘मेरे पास इस घर की चाबी है।’ पोलीस वाले ने कुछ देर तक चलने वाली सोच की अपनी मुद्रा में दिख सकने वाला व्यवधान डालते हुए, अपने हाथ में पकडे वाकी-टाकी सिस्टम पर किसी के साथ बात करना शुरू कर दिया। उधर से दूसरे आदमी की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। वह मराठी में बोल रहा था कि इस औरत से चाबी अपने कब्ज़े में लेकर फर्द बना लो और इसे फरमान दो कि जब जरुरत होगी तुम्हें बुला लिया जाएगा। याचा पता-ठिकाणा लिहून ध्या। ठीक से लिख लो इसका पूरा पता ठिकाना…जरुरत पड सकती है ! फीती-वाला द्वार से पीछे की ओर मुडा और खुले बरांडे को लांघकर, पीछे की तरफ बनी चपड़ी के पास आ गया। उसने अपने एक हाथ में पकडे वाईरलेस हैंडसेट और दूसरे में पकडे फाईल के पुलिंदे को इस चपड़ी पर रखा और अपनी छाती पर बनी जेब में से पैन निकालकर आधी गर्दन पीछे की ओर घुमाकर अपने साथी पोलीस से बोला, ‘आप्टे, वा बाईला माश्या जवळ पाठवुन दया।’ समीरा को उसके बोलने का ये अंदाज़ अच्छा नहीं लगा, आखिर क्या मतलब ये कहना ‘आप्टे, उस औरत को मेरे पास भेज,’ ये बोलने का कौन सा तरीका हुआ पर इससे पहले कि उससे कुछ कहा जाता, वह खुद ही चपड़ी के पास तक चली आई।

फीतीवाले ने चाबी उसके हाथ से लेकर चपड़ी पर रख दी और उससे उसका खुद का नाम, पति का नाम, पूरा पता बगैरह पूछा और अपने कोरे कागज़ पर चेप लिया। ‘धारावी मध्ये तुला ओल थणान्य दोन प्रौढ़ माणसांचे नाव पते लिहून ध्या…धारावी में तुम्हें जानने वाले दो व्यस्क व्यक्तियों के नाम और पते लिखवाओ।’ उसने एकदम जैसे शाही से अंदाज़ में आदेश दिया। समीरा को तत्काल कुछ नहीं सूझा कि आखिर वह किसका नाम और पता लिखवाये। ‘तिकडे तुला कोणी ओलखन नाहीं…उधर तुम्हें कोई नहीं जानता?’ जरा सी देर में उसने वापस पूछा था। एक बार फिर को समीरा असमंजस की हालत में बनी रही। लेकिन उसे समझ आ गया था कि कोई दो नाम बताये बगैर जान छूटने वाली नहीं है। उसने दिमाग पर ज़रा जोर डाला, ऐसे दो नाम कौन हो सकते हैं, तो अनायास पहला नाम जो उसे सूझा वह इशु का था। वही अपने पडौसियों का लड़का जो अक्सर अपने घर के झगड़ों से तंग आकर उसके यहां अपना रोना धोना करता रहता है और इधर ही कुछ कौर खाकर बाहर गली में पड़ा रहता है। कल शाम आया ही था। उसने उसका नाम लिया तो फीतीवाले ने कहा, ‘पूरा नाम बोलो…पूरा नाव सामा आणि याचा एड्रेस भी दया… और उसका एड्रेस भी दो।’ समीरा तो उसे ईश्वा ही बोलती थी, पूरा नाम उसे मालूम नहीं था, कभी जानने की जरुरत ही महसूस नहीं हुई थी। पर पता तो वह दे ही सकती थी। फिर उसे याद आया उस इशु के दोस्तों को उसने अक्सर कटारी-कटारी पुकारते सुना है। उसने उसका नाम इशु कटारी लिखवा दिया। पर इसके बाद दूसरे नाम पर उसे खासी मुश्किल पेश आई। एक बार को मन में आया कि उस लडकी अर्चना त्रिपाठी का नाम दे दूँ, जो कल शाम उसे धारावी कालेज के गेट के पास मिली थी, पर मन में झिझक पैदा हुई कि आखिर वह उसे जानती कहाँ है। पर दूसरा कोई नाम तत्काल याद नहीं आया तो उसने साहस बटोरकर अर्चना त्रिपाठी का ही नाम लिखवा दिया। पता अनुमान से लिखवाया। पास ही तो उसका घर था, ऐसे में अनुमान करना ज्यादा मुश्किल हुआ नहीं।

इस कारवाई के पूरा हो जाने के बाद फीतीवाले ने उसे जाने की इजाजत दे दी। वह जाने के लिए सामने लिफ्ट की तरफ मुडी तब उसके दिमाग में एक सवाल जरुर घूम रहा था कि आखिर इस पोलीसवाले ने किसी कागज पर उसके दस्खत काहे न लिए होंगे? और उसका मोबाईल नंबर भी नहीं पूछा। पर उसे ये दोनों बातें अच्छा ही लगीं। वह दस्खत लेना भूल गया, वर्ना क्या मालूम किस सांसत में जान जा फंसती। उसने एक लम्बी सी चैन की सांस ली और लिफ्ट के अन्दर चली आई। लिफ्ट जब नीचे खिसकने लगी तब उसे जैसे अनायास शुभा म्हात्रे के इस संसार में न रहने की याद वापस लौट आई, मानो अभी तक उस पुलिसिया कारवाई के दौरान उसे यह तथ्य याद ही नहीं रहा था कि वे इस संसार से जा चुकी हैं। उफ़्फ़! उसकी अगली सांस में अब बेचैनी थी। बहुत हौले क़दमों से वह सड़क के किनारे पर चलने लगी। पिछले तीन साल में मालाड के इस इलाके में ये उसके लिए पहला मौका था जब वह फुर्सत में थी। वापस घर पहुँचने की उसे कोई जल्दी नहीं थी बल्कि मुंबई की ज़िन्दगी के इन तीस सालों में ये फुर्सत शायद उसे पहली बार को मिली थी। उसने ऑटो किराए पर लेने की बजाये रेल-स्टेशन तक पैदल चल देने का मन बनाया ताकि शुभा म्हात्रे के न रहने की याद को भुलाए रखा जा सके, पर चलती बार उसे यही कौंच परेशान करने लगी कि आखिर उस औरत को इस तरह अचानक मर जाने की ऐसी क्या जरुरत आन पडी थी। पल भर के लिए उसे उसके पति डाक्टर आशाकिरण म्हात्रे पर भी शक हुआ, लेकिन इससे पहले ही कि ये शक उसके अन्दर पुख्ता हो पाता, उसने इसे जबरन बाहर झटक दिया। बाहर निकल आने के बाद उसके ज़हन में पिछले कल का दिन चला आने लगा। उसने इसे रोकने की जरुरत नहीं जानी। आखिर सिर्फ इस एक दिन में ऐसा क्या हो गया है कि शुभा महात्रे को अपनी जिन्दगी होम कर डालनी पडी।

ज्यों ही काम खत्म हुआ था, वह हाथ पोंछती हुई ड्राइंग रूम में चली आई थी, फिर इधर एक किनारे पड़ा अपना खाली झोला उठाया और घर की मालकिन शुभा महात्रे के पास आकर बोली, ‘मेम साहेब! अब मैं जाती!’ दोपहर-बाद जब समीरा इधर काम पर आई थी, तब भी शुभा यहीं सोफे पर लुढकी-सी गटकती चल रही थी| उसने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली। सात बजने में दस मिनट बाकी थे। मतलब शुभा म्हात्रे इसी हालत में पांच घंटे से ज्यादा वक़्त से थी। बीच बीच में वह कभी बडबडाने भी लगती थी, पर समीरा ने उस तरफ ज्यादा ध्यान दिया नहीं। ये मालिक लोग अपनी निजी ज़िन्दगी में क्या करते हैं, इससे उसने कभी मतलब रखा नहीं। हमेशा की तरह उसे अपना काम निपटाने की जल्दी थी। इन साहिब लोगों की ज़िन्दगी में दखल देने की उसे कोई जरुरत नहीं थी। अलबत्ता, सौजन्यवश, आज उसने अपना काम निपटाते हुए और अपने हाथ रोके-टोके बगैर उसके साथ उसकी मनपसंद किस्म की चंदेक अन्तरंग बातें जरुर की थीं। शुभा का स्वभाव अजीब अंतर्विरोधी किस्म का था। कभी वह एकदम हल्की-फुल्की होकर बहुत नज़दीकी से बातें करने लगती तो कभी एकदम रूखी होकर अचानक फट पड़ती थी। मानो उससे ज्यादा खूंखार व्यक्ति संसार में दूसरा कोई न हो| पर आज ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ था। जैसे वह खुद ही से खासी नाराज़ हो। बीच में कभी अपने दुखों को लेकर रोने लगती तो कभी अपने पति डाक्टर म्हात्रे को कोसने-धिकारने लगती, मानो वह समीरा से संवेदना पाने की दरकार कर रही हो। बीच में समीरा ने उसे दोएक बार को इतना भर जरुर टोका था कि आज आप कुछ ज्यादा पी ले रही हैं, मगर उसे मालूम था कि उसकी ऐसे किसी परामर्श का कोई फायदा होने वाला नहीं है, तो उसने ज्यादा जोर नहीं डाला। पर उसने इन पांच घंटों में अपना ये कार्यक्रम अपलक जारी रखा था। और बीच बीच में रोते चलना भी।

 यूँ समीरा के लिए यह पीना पिलवाना देखते चलना कोई ऐसा अजब गजब काम भी नहीं था, कि इसे वह पहली बार को देख रही हो। रोज़ ब रोज़, जब समीरा इधर आती है तो वे दोनों बहुधा घर पर नहीं होते। उसके पास द्वार की चाबी रहती है, आई, द्वार खोला, पांच घंटे में अपना काम निपटाया और वापस चल दी। इतवार के दिन जब आशाकिरण म्हात्रे घर पर होते हैं तब दोनों जने अक्सर इस पीने के काम में मज़े लेते और मस्त रहते हैं। आशाकिरण म्हात्रे हड्डियों के जाने-माने डाक्टर है और पवाई के हीरानंदानी स्थित एक बड़े हस्पताल में काम करते हैं। पर आज का ये दिन बहुत कुछ अलग किस्म का था। गुजरे पांच घंटों में शुभा ने एक से ज्यादा बार समीरा को अपने पास बुलाकर इस शिकायत को तूल देने की भरसक कोशिश की थी कि ‘वह’ मेरा ख्याल नहीं रखता और इतना कमीना और विश्वासघाती आदमी है, कि उसने मेरे हिस्से में सिर्फ दुःख दिए हैं। बीच में दो बार वह मुखर जुबान में ये शिकायत कर चुकी थी कि इसके साथ काम करने वाली एक डाक्टर किसी सुधा श्रीवास्तव के साथ इसके मुन्ह्काले वाले रिश्ते ‘भी’ हैं! ऐसी हर शिकायत के बाद उसकी सुबकियों का लम्बा सिलसिला चलता और फिर वापस अपनी उसी दुःख-गाथा का टेप। तो समीरा के ‘मैं अब जाती’ कहने भर की देर थी कि शुभा ने एक कडियल व भैंगी सी नजर से उसकी तरफ देखा। कुछ पलों के लिए खामोश रहने के बाद वह लडखडाती हुई रुआंसी जुबान में बोलने लगी: ‘जा! तू भी जा, लेट दैट बास्टर्ड गो! अब देखना कैसे मैं इसका घटस्पोट कर देती है! हरामी कहीं का! खुद को समझता क्या है। डुकरा कहीं का। पूरे का पूरा सूअर। इसको माफी न देने का!’
‘मेम साहेब, ऐसा खोटा न बोलने का,’ समीरा ने कहा! ‘अपने आदमी को इस माफिक बुरा क्यों बोलने का। और अब बस पीना बंद करने का। चलो मैं आपको बेडरूम में छोड़ देती।’
‘मैं इससे ज्यादा दुःख बर्दाश्त नहीं कर सकती,’ शुभा ने कहा! ‘इस बास्टर्ड को मैं ठिकाने लगाऊंगी जरुर। इसको मैं माफी नहीं दे सकती! घटस्पोट करके रहेगी! डाइवोर्स! नो अदर वे!’

समीरा ने उसे सहारा देकर उठाया और बेडरूम में लेजाकर बिस्तर पर लिटा दिया! जब वह वापस मुड़ने को थी तो शुभा ने उसे जैसे किसी करुणाजनक पुकार से वापस बुलाया और ऐसी याचना में दिखी मानो उससे न जाने का आग्रह कर रही हो! समीरा रुक गई! शुभा अब बिस्तर में पडी रुआंसे और अस्पष्ट स्वर में बोलने की कोशिश कर रही थी, ऐसा कुछ जो बहुत साफ़ सुनाई भी नहीं दे रहा था, बल्कि असल में सुनाई भी दे रहा था! ‘ब्रिंग में अ लार्ज पेग। समीरा प्लीज़। एक भरकर ला।’ वह ऐसा ही कुछ कह रही थी! समीरा ने उसे टोकना चाहा कि अब आगे पीते चले जाना ठीक नहीं रहेगा, पर वह रोने लगी थी। समीरा ने बाहर आकर गिलास भरा और उसके सिरहाने रखकर वापस मुडी। ‘मेम साहेब, मैं जाती अब, अपना ख्याल रखने का,’ उसने कहा और बाहर कदम बढाते हुए, उस वक़्त की लम्बाई के बारे में सोचने लगी जो उसे हर रोज़ धारावी तक पहुँच पाने में लगता था। वह द्वार से बाहर निकल आई और इसके जालीदार किवाड़ को बंद कर दिया। वह एक निश्चित आवाज करने के बाद औटोमैटिक ढंग से लॉक हो गया। समीरा ने एक बार को वापस इसके बंद हो जाने की तसल्ली की और सामने बेजान सी पडी लिफ्ट के द्वार पर आ गई।

पिछले तीन साल से उसके लिए मालाड़ के इस आकाश छूते भवन के इस आठ सौ दो नंबर फ्लैट से धारावी तक का ये सफर हालांकि अब एकदम अपनत्व से भरी रूटीन की तरह लगने लगा था, पर घर पहुँचने की समय-सीमा बेहद जरुरी थी। लेकिन बीच में वह खुद को जैसे तसल्ली भी देती चलती थी कि सात हजार रूपए माहवार की ये नौकरी यूं ही को नहीं मिल जाती। घर-दर-घर भटकने से तो यही अच्छी नौकरी है कि सिर्फ इसी एक घर में निभानी है! ज़िन्दगी के बहुत सारे करतब निभाने को कुछ तो खटना ही पड़ता है। बस इस घर से वापस बाहर कदम धरते ही खटाई की यह जद्दोजहद शुरु हो जाती थी। उसने दाहिने हाथ की तर्जनी से लिफट का बटन दबाया। जैसे ही उसका द्वार खुला कि वापस धारावी पहुँचने का सफर शुरू। लिफ्ट ने चंद मिनटों के बाद समीरा को धरती पर ला उतारा!

वह तेज चाल से चलती मालाड़ के इस हिस्से की मुख्य सड़क पर आ गयी, जिस तरफ चमाचम ओबरॉय माल था। बहुत सारे बेफिक्र लोग उसके अन्दर बाहर आ जा रहे थे। उसने उधर से ध्यान हटाया और ट्रैफिक की भारी भरकम चहलपहल और रेलमपेल को नजरअंदाज सा करते हुए सड़क के एक किनारे आकर, सामने जो ऑटोवाला खड़ा दिखा उसीमें चढ़कर गोरेगांव स्टेशन के लिए चल दी| पर स्टेशन के ठीक पास पहुंचकर, सीधे लोकल पकड़ने को दौड़ पड़ने की बजाए वह एक किनारे इस तरफ सजी सब्जी मार्किट के पास आकर उतर गयी और अपनी रोजाना की इस रुटीन में सब्जी-भाजी की खरीदारी के लिए चुराया जाने वाला वक़्त चुरा लिया। आज उसने एक लौकी, एक पौवाकिलो भिंडी, एक पौवा बैंगन, पांच का हरा धनिया और तीन हरी मिरच खरीदकर अपने थैले में भर ली। मोलभाव करते दो चार मिनट का वक्त ज्यादा ही लग गया होगा। पर अपने गणकों के इस्तेमाल के दौरान उसे अहसास हुआ कि आज के इस सौदे में उसने यही कोई ढाई रूपया तो जरूर ही बचा लिया होगा। इस काम को निपटाने के बाद वह तेज कदमों से लोकल की तरफ दौड़ पड़ी।

स्काईवाक के पहले पुल का जीना उसने अपने कदमों की मशीनी गति से चढ़ दिया था और स्कालईवाक पर आकर अचेतन सी भागती भीड़ को चीरती हुई खुद भी बदहवास भागने लगी। जैसे ही उसने प्लेटफार्म की तरफ उतरने वाले जीने पर कदम धरा तो याद आया कि आज के सफ़र के लिए कूपन तो पंच करना वह भूल गई है| वह उलटे पाँव उपर की तरफ लौटी, और वापस स्कातईवाक पर भागी। सामने का अगला जीना उतरकर दौडती हुई वह पंचिग मशीन तक गई, क्यू में खड़े होकर बेचैनी से अपनी बारी का इंतज़ार किया और फिर बारी आ जाने पर जितना तेजी से हो सकता था कूपन पर पंच लगाया और वापस दौड़कर, प्लेटफार्म को उतराने वाले जीने को कुछ सकिंटों में निपटाकर, सीधे प्लेटफार्म की उस जगह पर आ खड़ी हुई, जहां जनाना डिब्बे को आ रूकना था। चालीस पचास सैकिडों के बाद ट्रेन आ गई थी। हमेशा की तरह आदमियों के रेले उसके द्वारों की तरफ अचेतन से भाग खड़े हुए थे। जनाना डिब्बे में भी हाल अलग नहीं था। समीरा ने इसके साथ जुड़े सामान के डिब्बे में घुसने की कोशिश की, पर उधर भी वही अफरातफरी का आलम था। जितने लोग भीतर घुसने की हफडादफ्डी में थे, उससे ज्यादा इस रेले को अन्दर से बाहर की तरफ धकेले चले जा रहे था। कहने भर को ही सामान की ये जगह जनाना थी, जबकि उसमें से भी मर्द लोग ही ज्यादा से ज्यादा बाहर निकल रहे थे। पर गनीमत थी कि असल जनानी सवारी-डिब्बे में मर्दों ने अभी घुसने की आदत बनाई नहीं थी। पर उसमें भी सम्भ्रांत औरतों का ऐसा रेला बिल्कुल उन्हीं जाने पहचाने तौर तरीकों में, अंदर बाहर होने की कोशिशों में लगा था। सामान के केबिन में घुस लेना भी उतना आसान नहीं था। पर अपनी रोजाना की ट्रेनिंग से भीड़ के उस रेले के साथ वह अंदर आ गई। आरपार देखा तो तत्काल पता चल गया कि कहीं जरा सा पैर टिकाने की जगह मिलना भी मुश्किल है। दिन में इसमें ढोकर ले जाई गई मच्छियों के टोकरों की सुवास अभी तक बेहूदे तरीके से पसरी पड़ी थी। पर समीरा को मालूम था कि कुछ ही देर की बात है, उसके बाद ये वास ऐसी परिचित हो जाएगी कि नाक इसे सूंघना बंद कर देगा। जब तक किसी जादुई से तरीके से वह इसमें जरा सी जगह की ईजाद कर पाती तब तक गाड़ी अगले स्टेशन पर जा रूकी थी। गनीमत कि एक पोलीसवाले ने इस सामान डिब्बे में चढ़ आए मर्द यात्रियों को बाहर निकाल दिया और सवारियों का अगला रेला भीतर आने तक समीरा को दो औरतों के बीच बैठ लेने की करीब छः इंच जगह मिल गई। उसने कुछ लंबी सांसे लीं और खुद को तनिक स्थिर करके, झोले के अंदर हाथ डालकर ताजा खरीदी भाजी-तरकरी को अपनी गोद में रख लिया। फिर झोले में स्थाई रूप से वास करने वाले अपनी धार तकरीबन खो चुके खुंडे चाकू को निकाला और तरकारी को टुकड़ा टुकड़ा काटने लगी। गाड़ी और आदमियों का शोर यथावत कानों के भीतर आने की कोशिशों में जुटा था, पर कुछ सुनने की बजाये वह अपने काम में डूब गई थी। अब तक इतना तो वह जान ही चुकी थी कि ये बहरों का संसार है, जितना मर्जी शोर हो ले, किसी को किसी के बारे में सुनने या जान पाने की कतई गरज नहीं थी। जिसको जो करना हो करे। अपनी सब्जी काटे या किसी दूसरे का सिर मूंड दे, या चाहे तो गला रेत दे, कोई सरोकार नहीं। जैसे इनसे उलट सारी भलमानसहतें मण्डी  जैसे उसके छुटपन के उस छोटे से नगर के लिए सुरक्षित थीं।

समीरा को अपने मायके के उस शहर की याद आते ही भीतर मीठी छुरी जैसा कुछ खनखनाने का अहसास जैसा हुआ। वह अब जैसे कोई लौकिक शहर न होकर महज़ एक जिन्दा याद भर थी, जो जितना तेज़ी से आती थी, उतना ही अकस्मात चली भी जाती थी। ऊई, उसके मुंह से अनायास निकला। चाकू हाथ के अंगूठे में हल्का सा चीरा लगाकर गया था। ज्यादा पैना होता तो जरुर खून की तेज़ धार देकर लौटता! उसने अंगूठे को मुंह में डालकर सोखा और एक बार इसपर नज़र दौड़ाकर, वापस तरकारी को काटने लगी। अब उसके हाथ ये सोचते हुए ज्यादा तेजी से चलने लगे थे कि जब तक अंधेरी स्टेशन आये, तब तक उसे तरकारी कटकटाकर झोले में बंद कर देनी होगी। जब तक उसने अपनी कटी तरकारी समेटी तो साक्षात अंधेरी स्टेशन आ गया था। गाडी के रूकते ही वह आदमियों के तमाम रेलों को चीरती हुई, कई चढ़ाईयां-उतराईयां लांघकर बाहर की तरफ लपकी, और बस स्टॉ प की दिशा में दौड पडी थी। बस-स्टॉप पर हमेशा की तरह बहुत से लोग खड़े थे। इनमें कुछ चेहरे जाने पहचाने भी थे, जिन्हें वह रोज़ धारावी की तरफ जाते देखती थी। इंतज़ार ज़रा ज्यादा लम्बा खींचने लगा था। उसने अपने मोबाईल हैंडसैट पर टाईम देखा। धारावी जाने वाली उसकी सीधी बस तकरीबन पंद्रह बीस मिनट लेट हो गई थी। पर बेचैनी की जगह उसने अपने भीतर सांत्वना और उसके पार संयम के भाव पैदा करने की कोशिश की, पर शाम ढलने पर घर पहुँचने की जल्दी में यही कोशिश काफी मुश्किल भी लगती थी। हालांकि इतने बरसों से मुम्बई की जिंदगी में घुलमिल जाने के बाद, अब तक ऐसी किसी बात पर कम से कम बाकी कुछ हो न हो, पर बेचैनी होना बंद हो ही गया था, और इंतजार जिंदगी का स्थाई भाव बन गया था। आगे लारी किसी भी वक्त आ सकती है। पर मुम्बई की सार्वजनिक रेल और इस लारी जैसी इन तमाम सवारियों की खासियत उनका आना या जाना नहीं था, बल्कि ये थी, कि वे भले ही अपने नियत समय पर आ पहुंचें या नहीं, पर उनमें अंदर घुसने की कवायद बेहद मुश्किल होती है। इसके तईं एक खास किस्म की ट्रेनिंग की जरूरत थी। जब वह अपने पति रामसजीवन के साथ पहली बार को इधर आई थी, तब उसे इस महानगर की ये हफड़ादफड़ी अपने उस छोटे से शहर मंडी के बीचोंबीच बहती ब्यास नदी की धारा के उपर स्काईवाक करते आते उन कऊओं के किसी झुंड की तरह लगती थी, जो धरती पर खाने को दिखती किसी चीज पर जा टूट पड़ते और देखते ही देखते वापस कां कां करते उसी धारा के उपर पसरे असमान में उड़ लेते थे।

मुंबई आ चुकने के बाद उसके दिमाग में सवालों का जो जाल था, उसे साफ करने को वह रामसजीवन से एक-एक कर पूछना चाहती थी, पर कभी कुछ पूछ पाने का वक्त  मिल ही नहीं पाया था। असल में इधर आ पहुंचने के बाद उसे एक जबरदस्त मानसिक धक्का लगा था, उससे उबर पाने में ही इतना वक्त लग गया था, कि जिन्दगी के पूरे गणित को समझ पाने और थैणे-थमने का मौका मिला ही नहीं। बहुत अजीब सा भी लगता है कि ऐसे दो चार पल कभी एक बार को भी नहीं मिल सके, जिनके साये में बैठकर वह अपने इत्मीसनान में रामसजीवन से कुछ पूछ पाती। जैसे इधर आ पहुंचते ही वह खुद भी एक अपिरिचत अंधी दौड में जा शामिल हुई थी।

मुम्बई में जाकर काम करने वाले रामसजीवन की छवि मण्डी नगर में किसी फिल्मी हीरो से कमतर न थी। मुंबई चले जाने का मतलब ही हीरो हो जाना था। पूरा नगर अपने इस विश्वाीस में जी रहा था, कि किसी भी वक्त अपना रामसजीवन किसी खूबसूरत हीरोईन के साथ बारिश में नाचता गाता, उनके कृष्णा टाकीज़ या इधर कुसुम थिएटर के परदे पर दिखना शुरू हो जाएगा। जब साल में एक बार को वह इधर अपने उस शहर में आता तो लोग गर्दनें उचका उचकाकर उसे देखते रहने की कसरत किया करते थे। किसी को नहीं मालूम था और कोई मालूम करने की जरूरत भी नहीं समझता था, कि वह उधर कपड़ा बनाने वाली किसी फैक्टरी में काम करता है,  और तब के एशिया भर में सबसे बडी झोपडपटटी होने के लिए कुख्या त हो चुकी धारावी की एक दडबेनुमा पटटी में रहता है! समीरा के लिए इस धारावी की खासियत यह निकलकर आई थी कि इधर ऑटोरिक्शा  वाला कोई भी सज्जन बता देगा कि इस झोपड़पट्टी, जिसे अब तक संसार कि अपनी तरह कि सबसे बड़ी पट्टी होने के लिए कुख्यात हो जाना था, इसके अंदर अगर तीन साल को भी पैदल टहलते रहे, तब भी इसको पूरा घूम लेने का दावा नहीं किया जा सकता था। पर ऐसे तथ्यों में भी फिल्मी रोमांस की सम्भाावनाएं तलाश लेने वाले अपने मण्डीै नगर में तब तहलका मच गया था, जब ये खबर फैली कि रामसजीवन ने अपने ही मुहल्ले  के नंदू नम्बाड की बेटी समीरा से ब्यारह रचा लेना पक्का कर लिया है। इस खबर के सार्वजानिक हो जाने के बाद प्रत्येक नगरवासी ने समीरा के भाग्य को भरसक सराहा था। यही नहीं वे हसरतभरी सी निगाह से देख, सोचते थे कि क्या तो इस समीरा ने किस्मत कनैक्शन पाया है, और बस रामसजीवन से उसका ब्याेह हुआ नहीं कि सीधे फिल्मी महानगरी का उसका टिकट कटा ही जानो! क्याे मालूम कि आने वाले किसी कल में वह भी पर्दे पर सजी सजाई हीरोईन बनकर दिखने लगे। ऐसे में कौन जरा सी भी अशंका मानता कि अपना रामसजीवन उधर कपडा बनाने वाली किसी मिलसिल में चपरासगिरी या सेवादारी जैसा कुछ करता है। बल्कि ऐसा कुछ सुनकर पूरे नगर को गहरा सदमा लग जाने की पूरी पूरी सम्भाकवना थी। बहरहाल, ऐसे में समीरा को भी मुम्बई पहुंचकर धक्का लगना ही लगना था। रामसजीवन कोई फिल्मी हीरो नहीं निकला था और उससे भी बड़ा धक्का था कि वह धारावी की इस झोपड़-पट्टी का बाशिंदा था।

उस वक्त् ये पट्टी भी किराए की कोख जैसी थी। बाद में ये उनके मालिकाना हक में आ गई है जरूर, पर चार फुट की चौड़ाई वाली इस गली में तब की तुलना में आज तीन गुणा ज्यादा लोग रहने लगे हैं। पर अब तक समीरा के तईं वो सारी अजनिबयत खत्म हो गई है। तब तो यहां इतना अजनबी माहौल लगा था कि मन होता अगली गाड़ी से टिकट कटाकर वापस अपने उसी ऊंघते शहर को लौट ले। इस धारावी की तुलना में उधर अपना वह सूहड़ा मुहल्ला भी इतना साफ और मानवीय लगने लगा था, कि अगर उसे चुनने का अधिकार दिया जाता तो वह तब के बम्बई की किसी फिल्म में हीरोईन बनने की बजाए वापस अपने मंडी को लौट लेती और वहीं किसी सिलाई कढाई केंद्र बगैरह में लड़कियों को काम सिखाते हुए अपनी जिंदगी गुजार देती। पर रामसजीवन के बम्बई का जो क्रेज उसके अपने माता पिता और नाते रिश्तों , खासकर युवा तबके के लोगों में ही नहीं, बल्कि खुद उसके खोपड़े के अंदर ऐसा जा विराजा था कि धारावी की इस खोली में कदम धरते हुए जितना धक्का अन्यथा लगना चाहिए था,  उससे बहुत बहुत ज्यादा लगा था। फिर बहुत आहिस्ता चाल से एक नए किस्म की सामान्य होती जिंदगी ने उसके अन्दर आकर ग्रहण किया था। वह अपने शुरूआती सदमे से उबर आई थी और रामसजीवन की इस जिन्दगी को स्वीकार कर लिया था। धीरे- धीरे जिन्दगी ने उन्हीं शर्तों पर जीना मान लिया था।

हैरानी कि बात यह रही कि इस स्वीेकार में उसकी अपनी मंडियाली मां-बोली का काफी गहरा योगदान रहा था,  जो इधर आने से पहले तक उसे अपने आगे बढ पाने और दुनिया की भीड में कुछ अच्छा  कर गुजरने में, सबसे बड़े व्यवधान की तरह लगती थी। उसे तब ठीक से हिन्दी बोलना भी नहीं आता था, पर उसे धीरे -धीरे एक निश्चित किस्म का इत्मीनान मिलने लगा, जब उसने पाया कि उसकी वही मां-बोली एकदम मराठी के आसपास बैठती थी। हालांकि अचानक ये विश्वास मान पाना एकदम नामुमकिन भी लगता रहा था। दो ढाई हजार मील दूर उसके मंडी नगर की बोली इस मराठी से कैसे मिल सकती थी! मंडी में तो जब कृष्णा टाकीज या कुसुम थियेटर में वह अपनी सखी सहेलियों के साथ फिल्म देखने को जाया करती थी तो बम्बई के बारे में जिन मायाबी अहसासों से वह भर जाती थी, वे ही अपनी मां-बोली के इस मराठी से मिलता जुलता होने के बाद ऐसे दर्दीले तरीके से टूटे थे, कि अनायास बम्बई का ऐसा होना उसे अविश्सानीय लगने लगा था, या शायद वह खुद ही इसे ऐसा बनाए रखने में सहज महसूस कर सकती थी।

पर एक बार ‘बेस्ट’ की लाल रंग की बस में बैठे -बैठे जब वह इन दोनों बोलियों पर विचार करने लगी तो इस अहसास को बल मिला था कि मराठी उसके तईं एकदम अजनबी बोली नहीं है। मसलन उस रोज लारी की चिरंतन भारी भरकम भीड़ के बीच कंडक्टर कह रहा थाः ‘गरजू प्रवाशाला जागा द्यावी!’ उसने इस वाक्य को गौर से सुना और मन ही मन समझने का प्रयास किया था। मने असहाय यात्री को बैठने के लिए जगह दें। पहले तो उसे यही विश्वास नहीं जमा कि ये मराठी में कहा गया होगा, क्योंकि अचानक उसे लगा था,  मानो यह उसकी मंडियाली बोली में कहे गए शब्द रहे हों। वह इन्हें मुंह जुबानी दोहराने की कोशिश करने लगी। फिर उसने इन्हें उस तरीके से बोलना चाहा जिसमें इन्हें अपनी उस बोली में बोला जा सकता था। और चंद मिनटों के बाद वह हैरान रह गई कि ये तो सचमुच उसकी मंडियाली बोली में बोला गए वाक्य जैसा कुछ थाः ‘गरजू जात्रुआं जो जाघा द्योआ!’  वह इन दोनों कथनों को अपने मुंह में बारी बारी उच्चारते हुए इनमें मौजूद शब्दों की समता पर चमत्कृत होने लगी। इसी के आसपास दूसरा वाकया, जिसने उसके इस बनते विश्वाास को पुख्ता किया था, वह भी उसने उतनी ही रोचकता से सुना और समझा थाः ‘कान उघड़े आहेत का तुमचे?’  इस वाक्य का मंडियाली अनुवाद भी वैसा ही रोमांचक निकला थाः ‘कान उघड़ी रे तेरे?’ महज इन दो वाक्यों के सुनने समझने के बाद उसने मान लिया था कि उसके पूर्वज जरूर ही आक्रमणकारियों के भय से इधर मुम्बई से भागकर मंडी में जा बसे होंगे और एक दूसरे से लड़ने के लिए ब्यास नदी के किनारे अपनी मुट्ठियाँ उछालते रहे थे।

धारावी आन पहुंचने के बाद उसे कुछ रोज तक अपनी उस बोली को मराठी में आत्मसात होते देख, इस असीमित बस्ती में अपनत्व का अहसास होने लगा था। आस पड़ौस में यूपी और बिहार के भी खूब सारे भैईयों और उस सारी भीड़ के बीच मुसलमानों की घनी आबादी की संगत में रहते हुए उसने हिन्दोस्तानी बोलने का शऊर सीखा! वे सब के सब जैसे अपने अपने मुलकों की वंचनाओं से ऊबे और पशेमान होकर इधर जीविका की तलाश में चले आए लोग थे और अब तक भलीभांति जानने लगे थे कि इधर ऐसे ही रहकर जीविका चलानी होगी। तब उसे यकीन हुआ था कि हर कोई कदम धरते ही बम्बई में फिल्मी  हीरो नहीं बन सकता। नतीजन उन्हें इस जनजीवन में ही खपना था। सबसे पहले, अपना काम धंधा सीखने से भी पहले, समीरा उन्हीं में से कुछ लोगों की संगत में मुम्बामदेवी मत्थाक टेकने गई थी। और उसी दौरान बुर्का पहने औरतों की एक टोली के साथ वह हाजीअली की दरगाह पर जाकर ये भी महसूस कर चुकी है, कि असल में भगवान को मानने की विधियों में एक से दूसरे धर्म में ज्यादा फर्क नहीं है। बाद में तो कई बार ये हुआ है कि जब मन घणा उदास हो जाता और जिंदगी के संघर्ष तोड़ डालने की कगार पर आ खड़े होते, तब वह अकेले ही सुकून की तलाश में हाजीअली तक जा पहुंचती थी और अपने अंदर की पूरी श्रद्धा से मत्था टेककर लौटती। जिंदगी को परेशान कर रहे उन अनेक पलों में, उसे सचमुच वैसा ही सुकून मिलता, जितना उस छोटी काशी कहे जाने वाले अपने शहर मण्डीू के भूतनाथ मंदिर या मगवाईं मुहल्ले के गुरूद्वारा सिंह-सभा में मिला करता था।

पर जल्दीं ही उसे ये भी समझ आ गया था कि जिंदगी में घुलने मिलने का असल जरिया महज गप-गपियाना भर नहीं हो सकता था। इस नई जिंदगी में काम करने से ज्यादा उर्जा और सम्ब-ल मिल सकता था। वह भरसक समझ गई थी कि इस नये घर में सुबह से शाम तक नकारा होकर बैठे रहने से खालीपन के सिवाय कुछ नसीब होने वाला नहीं था। रामसजीवन तो सुबह रोटी से भरा टिफिन लेकर अपने काम पर निकल जाया करता था और देर रात गए टूटा बदन और खाली हुआ वही टिफिन लिए वापस आता था। ऐसे में वह अकेली इधर किस इंतजार में बैठी रहती। अपने इन भईयों की पत्नियों को उसने जब खुद को दिनरात काम में खपाते महसूस किया तो खुद का घर में ठल्ल बैठे रहना उसे और भी ज्याादा खराब लगने लगा था। उसने उन्हीं की संगत में काम ढूंढना सीखा था। शुरू में भले ही वह ये देखकर हैरान रह जाती हो कि इस मुंबई में कभी रात ही न होती थी, पर धीरे धीरे इस रात न होने में उसे कुछ भी असामान्या लगने वाली स्थिीति नहीं रही थी। काम करने की तरकीब सिर्फ टैमपास का ही जरिया नहीं थी, बल्कि अपनी नई बसी गृहस्थी की आमदनी बढ़ाने के लिए बेहद सार्थक पहल साबित हुई थी। आने वाले एकरोज जब अपनी किस्म के एकदम बेरहम तरीकों से इस महानगर की तमाम कपड़ा मिलें बंद हो गई थीं और दूसरे झटके में उन्हें दूर किसी दूसरे गुजरात नाम के प्रदेश में स्थापित करने का फरमान सुनाया गया था, तब रामसजीवन अचानक बेरोजगार हो गया था। आमची मुम्बई के उस बेहद मुश्किल दौर में समीरा को काम की इसी ट्रेनिंग ने उसके पति, एक बेटे और एक बेटी के इस परिवार की जिंदगी को अपनी रीढ पर खडे रह सकने काबिल बनाए रखा था। इतने लंबे अरसे में उसने रामसजीवन के साथ अब तक इतना कुछ इधर जी भोग लिया था,  कि अब मण्डी नगर कभी कभार को सिर्फ किसी अच्छी याद की तरह याद भर आता है। आज अगर इस मुम्बई को छोड़कर वापस मण्डीन को चले भी जाएं तो एक विकराल समस्या सामने आ खड़ी होगी। वे वहां करेंगे क्या। तमाम रिश्तेी नाते अब इतना बदल चुके हैं कि सबसे पहले वे ही उनकी किसी भी सम्भावित वापसी को ही स्वीकार नहीं करेंगे।

समीरा अपने अंदर के ऐसे तमाम निष्कर्षों तक पंहुचकर अब हैरान नहीं होती। किसी बड़े दार्शनिक के अंदाज में तो शायद नहीं,  मगर एक बेहद आम आदमी की तरह वह इसे जिंदगी के सामान्य मगर जरूरी बदलावों की तरह जरूर लेती चलती है। अपनी ही सोच में अचानक खो जाने की यह जो शैली विकसित हुई थी, ये असल में बड़े काम की थी, और अगर मुम्बई की भीड़ में उसने इसे न सीखा होता, तब तो इस महानगर की जिंदगी का हिस्सा हो पाना ही जैसे नामुमकिन बना रहा होता।

सामने से बेस्ट की बस अपने अगले मुहाने की लहरीली और लपटदार रौशनियाँ छोड़ती आती हुई दिखी। उसने अपनी ऑंखों के उपर छतरी की मुद्रा में हथेली टिकाकर बस का नम्बर पढने कि कोशिश जरुर की मगर वह उसके सही होने को लेकर किसी किस्म के संशय में नहीं थी। अपनी गति सीमा कम करती हुई ये ठीक उसके सामने आकर रुक गई थी। वह हर दूसरे रोज़ मिलने वाले इसके कंडक्टर को जानती थी। बस आ रुकी तो कंडक्टर की आवाजें पुकारने लगीं थीं…‘धारावी…धारावी…चाला धारावी…’

समीरा ने दाहिने हाथ में पकड़ा थैला अपने कंधे पर लटका लिया और लारी के प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ती भीड़ का ऐसा हिस्सा हो गई जो अपने ही धक्कों से आगे बढ़ती चलती है। वह एकदम मशीनी तरीके से खोई उसमें चढ़ी चली जा रही थी। उसके साथ यही होता था। पता ही नहीं चलता कि कब वह लारी या लोकल ट्रेन की तरफ बढ़ी और कब किसी ढलान पर बहते पानी की गति से ज्यादा तेजी से आदमियों की भीड़ का हिस्सा होकर उसके अंदर जा चढ़ी। हमेशा की तरह भीतर कदम धरने को भी जगह न थी। उसने किसी तरह पैर टिकाए और बाएं हाथ से लारी के छत के डंडे का सहारा लेकर खुद को टिकाकर जरा इत्मीनान की सांस भरी। अब कुछ ही मिनटों वक्फे के बाद वह धारावी पहुंचने वाली थी। यह वक्फा तीस पैंतीस मिनट से लेकर पचास साठ तक कुछ भी हो सकता था। पूरी निर्भरता अब आगे सड़क पर मिलने वाले टैफिक पर थी। ‘पुढी चाला, पुढी चाला,’ कंडक्टर कदम दर कदम आगे सरकता बोले चला जा रहा था। मानो कोई राबोट बोलता चल रहा हो। या जैसे कोई रिकार्ड बजता चलता है…‘तिकीट…तिकीट…बाला साहेब रुग्णालय। न बाबू, रुग्णालय के बाजू से निकल जाने का…तिकीट मावशी, तिकीट…योग्य तिकीटा शिवाय प्रवास करू नये…बोल मावशी…धारावी को जाने का…’ समीरा को टिकट पकड़ाते हुए उसने कहा, ‘बसा मावशी…’ फिर पास की एक सीट पर बैठी औरत से बोला, ‘ओ आत्या, इस मावशी को अपने बाजू में बिठा ले…रोज की सवारी है। आत्या, ई मावशी गरजू आहे…जागा द्यावी…’ पर उस औरत की स्थिति पर कोई फर्क पड़ा नहीं। जैसे उसने सुना ही न हो।

‘कोणाला फिकर आहे,’ कहते हुए समीरा ने उससे छुट्टे पैसे वापस लेते हुए, जरा सा एक ओर हटकर अपने पैरों को टिकाने के लिए छः ईंच जगह बना ली। अब वह आराम से थी। कोई बेचैनी नहीं। किसी घने जंगल में फैले उस परिचित से लगने वाले एक अज्ञात शोर के बीच पूरे का पूरा इत्मीनान आ पसरा था, जिसमें खोए रहकर समीरा अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचती चल सकती थी। पर बार बार वह अपने गुजरे हुए पर ही जा अटकती थी। अब तक तो उस पूरे वक़्त की तमाम मुसीबतों की याद भी उसे अच्छी लगने लगती थी।
अचानक झटका लगा था। कंधे पर लटका झोला सीट पर विराजे किसी सज्जकन के खोपडे से जा टकराया था और वह खुद एक तरफ आ लुढकते बची थी।

कंडक्टर का वही स्थाई टेप लगातार बजता चल रहा था…आगे चलो, पुढी चाला, चलो…गाड़ी बिंदास चल रही है…ठीक टैम पर पहुंच जाएगी…आज ट्रैफिक कम है…बसा मावशी, बसा…समीरा को हंसी आ गई। तेरे सिर पर बसूं…? पर उसने इस सवाल और हंसी दोनों को ही अपने होठों पर ही रोक लिया और अपने पैरों के तईं खड़े रहने को बनाए गए उस कोने में खामोश बनी रही। क्या इस भांजू को दिख नहीं रहा कि उसके हर आग्रह के बाबजूद न तो सामने की सीट पर बिराजी उसकी उस आत्या मने बुआ ने उसकी इस मावशी के तईं बैठ पाने को जगह बनाने की कोशिश की थी और न ही उसकी इस मावशी ने बैठ जाने का इरादा बनाया था। पुढी चाला…
ठीक आधे घंटे बाद भांजू की अगली आवाज धारावी ही थी।पुढील स्थाआनक…धारावी…धारावी…चाला मावशी। सवा आठ बज रहे थे। समीरा ने मन ही मन संतोष की सांस ली कि शुक्र है अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। कई बार तो घर पहुँचने में साढे नौ दस तक बज जाते हैं। वह भीड़ को चीरती हुई, लारी से उतरी और सड़क के आरपार नजर दौड़ा चुकने के बाद तेज कदमों से इसे लांघती, इधर कॉलेज के गेट के बाहर से उसी आवेग से निकल चली थी। गेट की बगल में गुलमोहर का एक बड़ा सा पेड़ था। वह आते जाते इसके तने के गिर्द बने सुडौल टियाले पर कुछ लड़कों को धुंआ घोटते देखती थी। बल्कि दिन की अपेक्षा शाम को ये ज्यादा इत्मीनान में दिखते थे। हालांकि उसके लिए ये देखना कोई एकदम नया अनुभव भी नहीं था, मगर कुछ दिनों से वह इन लड़कों की हरकतों के बारे में जानकर परेशान जरूर थी। उसने इतना सुना भी था कि ये लोग आती -जाती लड़कियों पर गंदी फब्तियां कसने लगे हैं। बाजवक्त तो जवान और अधेड़ तक का फर्क न करने से भी गुरेज न करते थे। पिछले कल जब ठीक इसी वक्त वह काम से लौटकर आई थी तो उनमें से किसी ने उसकी तरफ जरूर वैसा ही कोई संबोधन फैंका था, जो उसके कामकाज पर खराब टिप्पणी जैसा कुछ था। पर उसने ज्यादा गौर किया नहीं। उसे घर पहुंचने की जल्दी  थी। कौन इनसे मुंह लगाके अपना टैम खराब करता। यूं भी वय के गणित से वह उनकी मांओं के करीब बैठती थी, और उनसे ये आशा रखना कि वे अपनी मांओं पर फब्तियां कसेंगे, उसे ज्यादा अर्थवान नहीं लगा था। ये ऐसे भी शोहदे नहीं थे कि इन फब्तियों से आगे कहीं बढ़ लेते। समीरा को इनकी हरकतों से लगता था, जैसे ये नये नये सुल्फई बने हैं, और फिल्मों में दिखने वाले भाईयों जैसी हरकतें करने में मजा लेना चाहते हैं। वह तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी, जब अचानक उसके कानों में कुछ बेढब से शब्दों ने आकार लिया। अब तक खूब जोर से फैल रही उनकी हॅंसी के बीच, उसने गौर किया तो जैसे उन्होंने उसी के उपर ताना कसा थाः ‘मुम्बई आमची, बान्डी घसी तुमची’। समीरा को ये सुनना बहुत खराब लगा। अगर वह अपने घर परिवार की जीविका चलाने के तईं भांडे मांजने का काम करती भी है तो इसमें आखिर वे बुराई किस बात की ढूंढ रहे हैं, जो उनको राह चलती एक औरत पर इस तरह की सस्ती फिब्तकयां कसने की नौबत चली आई है। दूसरा कोई मौका होता तब शायद वह मन मारकर निकल भी ले सकती थी, पर आज उसने जरा कदम थामे और उनके अगले बोल के आने को सुनने का इंतजार करने लगी। सचमुच में उन्होंने बस नहीं की थी, ‘वृद्ध असो किवां जवान’…इसके साथ ही एकबार को हॅंसी का सामूहिक ठहाका गूंजा और आगे फिर को कोई नया संवाद चला आया था, ‘आलटे! अक्खा स्पेशल गावठी हन्डी आहे। बोले तो इसको जरा स्वाद लेके चखने का।’

अब समीरा खुद को रोक नहीं पाई। उसने अपने ठहरे कदमों को उधर मोडकर तेजी कर  दी और मवालियों जैसी दिखती उस महिफल की तरफ दौड पडी। पहले तो लगा कि वे सब हक्के-बक्के  हुए उसे अपनी तरफ उस वेग से आते देख तत्काल कोई फैसला न ले सकने की सी मुद्रा में बने रहे और एक दूसरे की तरफ डरी बहकी ऑंखों से ताकने लगे। तब बीच में से किसी एक ने चेताया, ’भागो’ और देखते ही देखते आने वाले अगले एक पल में वे सब अपनी एड़ियों के बल भागे। खुद को समेटते-समेंटते एकाध जरा पीछे छूट गया था। समीरा ने तेजी से दौड़ते हुए उसे ही उसकी कमीज के कॉलर से पकड लिया। उसे फंसता महसूस कर भी उसके साथियों में से किसी एक ने भी उसकी मदद पर लौट आने की कोशिश नहीं करी। जो लडका पकडा गया था, उसने वक्त  की नजाकत को भांपते हुए अपने भीतर की सारी समझदारी को बाहर निकाल लिया और घिघयाती सी आवाज में बोलने लगा, ‘मावशी, मला क्षमा करने का। बोले तो गलती हो गई। ये लडका लोग समझलेला धाकटा तरूणी जा रई है।’
‘मने जवान लडकी दिखी भर कि उसको छेडोगे,’ समीरा ने उसका कॉलर छोड दिया। ‘पौंगडे किधर के। ढपोरशंख मुए। जादे टशन न मारने का इधर आके। समझे। मी खोटे बोलत नाहीं, पण इतना तो याद रखने का जो ये ज्यादा भाईगीरी सिर पर सवार हुई पडी है, मैं निकालके रख देगी। इधर धारावी में आके ज्या‍दे मस्कारी नहीं करने का। समझे। अब फूट लो। उन सबको भी जाके येईच समझाने का।’
लड़के ने उससे गुहार लगाई, ‘मावशी, माफी देने का। भोत थकलेला।’

वह छूटते ही बेतहाशा दौड पडा। समीरा उन सबको सिर पर पांव रखे सडक किनारे भागते देखती रही, पर उसके मन में उनके तईं नफरत के बजाए सहानुभूति ही ज्यारदा पैदा होने लगी। उसे अहसास हुआ कि ये लोग अपनी उगती जवानी का बोझ उठाने को मजबूर बिचारे हैं। आने वाले कुछ क्षणों तक वह उसी जगह पर अपने कदम रोके विमूढ सी खडी रहकर उन्हेंच दूर ओझल होते देखती रही, और जब वापस चलने लगी तो उसे लगा कि उसकी चाल पहले से काफी मंद पड गई थी। मानो अचानक किसी अपिरिचत थकान ने आ घेरा हो। अभी चार कदम ही लांघे थे, कि सामने से सडक पार कर आती हुई एक जवान सी लडकी दिखी। वह उसके पास आकर बोली, ‘क्या हुआ आंटी। आज फिर से इन पोंगडों ने कोई लफडा कर दिया क्या ।’
समीरा ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, ‘खाक लफडा करने काबिल नहीं हैं ये मुअे बेबडे। एकदम डरपोक मुलगे हैं।’
लडकी भी मुस्कुराने लगी थी। कुछ कदम चल देने के बाद वह बोली, ‘आंटी, इन बेवकूफों से क्या मुंह लगाना। इधर बैठे आती -जाती लडिकयों को देख लार टपकाते रहते हैं। इनको क्या  मालूम लडकी का दिल कैसे जीता जाता है।’
समीरा ने उसकी समझदारी भरी ये बात सुनकर गर्दन घुमाई और नजर के एक कोण से उसके चेहरे का जायजा लिया। ‘अरे,’ उसने कहा। ‘तुम तो घणी शहाणी हो भई।’ आगे एकदम मजाक की मुद्रा बनाते हुए बोली, ‘कहीं धोका तो न खा चुकी हो।’
‘अरे, नहीं आंटी,’ लडकी ने जवाब दिया। ‘ऐसा वैसा कुछ नहीं। बस यूं ही बात कर रही थी। वैसे भी आप देखो जिसको प्यार करने का शऊर आता हो वह भला इस तरह किसी लडकी को परेशान करने की कोशिश करेगा। ये तो सचमुच के पोंगडे हैं। कुछ समझते नहीं।’
लडकी अपने धारावी की ही थी। अर्चना त्रिपाठी नाम था। चर्नी रोड पर किसी होटल में कौंटर गर्ल की नौकरी करती थी। आधे दिन के बाद से डियूटी शुरू होती थी तो जाहिर हुआ शाम को आने में देर होनी ही थी। पर दस बजे तक हर हाल में वह घर लौट आया करती थी। आज यही कोई आध घंटा पहले निकल आई थी। नवरातरों में इतनी सुविधा रहती थी। गेट से अंदर आकर वे दोनों चौडी गली में तकरीबन पौन मील तक साथ साथ चलती रहीं। आगे जहां से ये गली एक तीखा मोड लेती थी, लडकी ने जरा सा रूकते हुए कहा, ‘आंटी, अब विदा करते हैं, मेरा घर इधर है।’
‘एकदम पास है,’ समीरा ने कहा। ‘मेरा घर भी बस आने ही वाला है। दो मोड आगे। इतना पास रहते हुए भी कभी मिलना न हुआ था।’ कायदे से बात यहीं खत्मद हो जाती थी, पर उसने लडकी से पूछा, कि तुम्हारे घर में कौन- कौन लोग हैं और जवाब में पता चला मां है, पिता हैं, एक भाई है। मूलत तो बिहार के नालंदा जिले से हैं, पर वह और उसका छोटा भाई दोनों इधर पैदा हुए हैं। क्या हुआ कभी एकाध दो बार को उधर गांव गए हों। लडकी का घर का नाम माही निकला। समीरा को ये भी उतना ही सुंदर लगा जितना अर्चना था। उसने ऐसा कहा भी, और लडकी सुनकर मुस्कुंरा दी थी। उसके चले जाने के बाद समीरा ने अपने कदमों को एक बार फिर तेजी दी और चौडी गली के रास्ते  को पूराकर उस मुहाने पर आ गई, जिधर से अंदर जाना होता था। आगे के इस रास्ते को गली कहना तो किसी गली के होने के साथ ज्यादती थी, बल्कि ये तो किसी भलीचंगी गली को गाली देने जैसा भी हो सकता था, पर अपनी गली की तो शायरों ने भी तफसील से तारीफें की बताते हैं और समीरा ने तो जिन्दगी के तीस साल इसी तंग गली में गुजारे हैं। ये उसे क्यों कर खराब लगती भला। कदम अंदर की तरफ मोडते हुए वह सोच रही थी कि हर बार पता नहीं यही क्योंकर होता चलता है कि जिस भी चीज के बारे में उसे कम से कम सोचना चाहिए, वह असल में उसी पर ज्यादा से ज्यादा सोचती चलती है। मसलन ये गली….
दोनों तरफ एक दूसरे से सटी और होड लेती झुग्गियां थीं। उसने भी सुन रखा है कि धारावी पूरे संसार में सबसे बडी झुग्गीी कॉलोनी है। होगी। संसार भर के लोगों के लिए ये टूरिस्ट-स्पॉट जैसा कुछ भी बन गया था, पर जिस गली को वह इस वक्त  लांघ रही थी, वह दुनिया की सबसे तंग गली जरूर होगी। यही कोई चारेक फुट चौडा रास्ता , अगर गली जैसा कुछ कहलवाया जा सकने की योग्यगता रखता हो तो यही समीरा की अपनी गली थी। इसमें कितने पिरवार और कितने व्यक्ति आज तक रह लिए होंगे, इसकी मर्दमशुमारी शायद ही कभी मुमिकन हो सकी होगी। जरूरत भी क्या है। कदमों को चलाते हुए इधर आरपार लोगबाग अपने कामों में व्य स्त महसूस किये जा सकते थे। औरतें खाना पका रही होंगी, बच्चे आपस में अटखेली कर रहे होंगे, और मर्दलोग घर में निपटाने को लाए, अपने कामों के निपटान में लगे होंगे। कुछ लोग तो काम के वास्ते घर से बाहर जाते भी नहीं थे। जैसे सिलाई का काम ऐसा कुछ पेशा था कि अपनी मशीन घर के अंदर खोलके दिनरात काम चलाया जा सकता था। कितने ही घरों से अभी तक सिलाई मशीनों के चलने की आवाजें गली में आती चल रही थीं। पर समीरा के लिए तो ये रोजाना का समाज-शास्त्र था, जिसे अपने आवेग से कोई रोक न सकता था।
वह अपने घर के द्वार पर आन पहुंची, तो पलभर को उसके दिल के अंदर कम्पपन का एक जरा सा पिरिचत झोंका आया पर अगले पल वह चला भी गया। द्वार के ठीक पास पहुंचकर उसने भीतर की तरफ आवाज दी, ‘रमा! मैं आ गई हूँ।’

भीतर से लडखडाती हुई सी कोई आवाज आई। ऐसा कुछ महसूस हुआ मानो किसी एक व्यक्ति के आ जाने से किसी दूसरे को व्यक्ति को भारी हौसला मिला हो। लेकिन उस आवाज को साफ सुन पाना मुमिकन नहीं था। वह सधे कदमों से अंदर आ गई। कमरा, अगर इसे कमरा ही कहने की मजबूरी हो तो, यह बारह फुट लम्बा और दस फुट चौड़ा था। अपने बीचोंबीच बनी एक तंग गली से यह दो भागों में कटा था। बाईं तरफ एक किनारे पर एक पुरानी मेज पडी थी, जिसपर किचन का सामान धरा पडा था। उसके आगे दो ट्रंक, एक के उपर दूसरा रखे हुए थे। मेज और इन इन ट्रंकों के बीच की जगह में ऐसी चीजें मौजूद दिख रही थीं, जिनका बरसों से प्रयोग किए जाने की जैसे कभी सम्भावना बनी ही न थी। घर के अन्दर की इस गली के दांई तरफ एक उंचा सा तख्त पडा था। इसपर रामसजीवन दांए कंधें के बल लेटा था। समीरा को सामने पाकर अनायास उसकी ऑंखें चमक उठी थीं।
समीरा ने सब्जी के झोले को किचन सा कुछ लगती उस मेज के एक उपलब्ध खाली कोने में रखा और तख्त पर आ बैठ चुकने के बाद रामसजीवन के माथे पर हाथ रखकर कहा, ‘आज जरा देर हो गई। तुम्हें बुरा तो न लगा।’

रामसजीवन ने अपने दाहिने हाथ से समीरा का हाथ पकडा और अपने होठों के पास लेजाकर इसे चूमने लगा। उसे तीन साल पहले अधरंग का हमला हुआ था। बदन का बायां पक्ष बेकार हो गया था| चेहरा टेढ़ा पड गया था और जुबान जैसे हमेशा के लिए चली गयी थी। समीरा तब भी गृहस्थी चलाने के लिए काम तो करती थी, पर इस झटके के बाद उसके सिर के ऊपर जो जिम्मेवारी आ पडी थी उसे अगर भयानक न भी कहा जाए तब भी वह किसी भी व्यक्ति को तोड़कर रख देने का माद्दा तो रखती ही थी। ये वह समय था जब वे दोनों मिलकर अपने दोनों बच्चों के भविष्य को बनाने के लिए दिन रात खटते चलने से बस फारिग हुए ही थे। उन दोनों का भविष्य साथ साथ बना था। एक बेटी थी चंचला, वह ब्याह करवाकर अपने पति के साथ चली गई थी और एक बेटा था, रमेश, वो एक मुस्लिम लडकी को भगा लाया था और कुछ ही दिन बाद वे दोनों अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। बेरहम क़त्ल! मारना तो उन्हें रमेश को ही था पर लडकी उसके आगे आ खाडी हुयी थी और उससे भी पहले मारी गई थी। समीरा को उस बहू का वह मासूम चेहरा बहुत याद आता था, जिसने भरसक उसके बेटे की जिन्दगी बचाना चाही थी। आगे रामसजीवन को इस हालत में जा पडने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा था। बहुत मुमकिन है कि इससे अपने उस जवान बेटे और बहु की मौत का गम सहन न हुआ हो। लेकिन समीरा के लिए ये सिर्फ अंदाज़ भर है। ठीक – ठीक पता तो तब चलेगा जब ये पूरी तरह से ठीक हो लेगा और खुद बतायेगा कि आखिर उसे आधी जान ले चुकने वाला ये दौरा पड़ा था तो कैसे। जबकि इन वारदात से ठीक पहले वह इतना खुश दिखता था कि बात बात पर ‘अब तो आराम करूंगा’ कहते न थकता था। तब यह अधरंग आया था और उसे अपंग करके पूरी तरह से इस बिस्तसर पर आराम करने को छोड गया था।

समीरा को हैरानी होती थी कि इस आदमी ने तो उस वकत भी हार नहीं मानी थी, जब वह कपडा मिल बंद होकर गुजरात की तरफ कहीं ले जाई गई थी, जिसकी नौकरी के हौसले पर वह इधर मुम्बई आया था, और फिर समीरा को भी साथ ले आया। अपने इन दो बच्चों की आगे की जिंदगी को अच्छी दिशा देने की अपनी अंदरूनी इच्छाशिक्ती के चलते उसने गुजरात जाने से मना कर दिया था और काम में ऐसे जा जुटा कि अपनी जिंदगी की उसने कभी कोई तमीज मुकर्रर नहीं की थी। किसी काम से उसने कभी मुंह नहीं मोडा और न कभी किसी काम के बढ़िया या घटिया होने की ही शिकायत की थी। समीरा ये देखकर हैरान रह जाती थी, कि उसने हर वक्त हर काम को प्रार्थना की तरह स्वीकार किया था। उसी के बगलगीर उसने भी अपना बदन और मन झोंककर इस ग़हस्थी को एक निश्चित आधार देने में भरसक योगदान दिया था। पर रामसजीवन के रहते कभी यह नहीं बूझा कि जिन्दगी किसी आने वाले वक्तो में इस कदर कठिन भी हो सकती है। इस विपति में समीरा के इलावा दूसरा कोई मौजूद नहीं था। वह जिन अनिगनत बाधाओं से पार पाकर अपने इस आज तक आई थी, और जिनमें वह असंख्य बार टूटते -टूटते बची थी, उन्हीं से खुद को अब बेदखलकर कैसे कर लेती। यही क्या कम गनीमत थी कि वह इन तीन बरसों में न केवल खुद जिन्दा बनी रही थी बल्कि रामसजीवन को भी वापस जिंदगी में ले आई थी। वह भले ही बोल न पाता हो, पर अब तक महज किसी जिन्दा लाश की तरह भी तो नहीं था, जिसमें उसने उसे जाते हुए और फिर वापस आते हुए देखा था।

‘मैं तुमको कितना बार समझाई,’ उसने उसके माथे पर अपना हाथ टिकाये रखकर कहा। ‘ये रोने- धोने का बिल्कुल नईं। रोने का सिर्फ तब जब मैं नहीं रहेगी।’
रामसजीवन की नाक बहने लगी थी। वह सुडक-सुडक करता हुआ, इस बहाव पर काबू पाने की कोशिश करने लगा। समीरा ने आगे बढकर अपने दुप्पटे से इसे पोंछ दिया और उठ खडी हुई। पर रामसजीवन ने उसका हाथ कसकर पकड लिया। वह वापस उसके नजदीक आकर बोली, ‘भूक नईं लगी क्या । तरकारी कटी पडी है। छः मिनट में छौंक देगी। चार रोटी सेंक के फिर सोना ही है। मैं तुमको बोली न इस तरह मेरे कू दिक नईं करने का। समझा।’
रामसजीवन जब सहमति में सिर हिलाने लगा तो समीरा उठकर आई और तरकारी का झोला खोलकर इसे प्लेाट में उंडेल दिया। मेज के नीचे बर्तन-भांडों का एक खास खान्ना  था। उसे खोलकर उसने एक बदरंग सा फ्राईपैन निकाला और गैस जलाने के बाद इसे उसपर धर दिया। सामने रखी तेल की बोतल में से चंद बूंद इसमें उंडेल दीं| जब आंच पर रखा तेल तिडकने लगा तो उसने इसमें दो लंबी सूखी लाल मिर्च छोड दी! इनके काला पडते ही उसने इसमें साबुत धनिये के चंद दाने डाले। जब तक ये भूजकर काला पड जाते, वह जीरे के दानों को अपनी हथेलियों के बीच रगडती रही। धनिये के दानों के काला पड जाने के बाद उसने जीरा छोड दिया और कटी सब्जीड को तत्काेल इसमें डालकर कर्छुल से हिलाने लगी। बीच में हाथ रोककर उसने पहले चमच से हलद-बस्वार का पौडर डाला और इसके आगे अंदाज से जरा सा नमक बरूर दिया। इसे ढककर पकने के लिए छोड वह मेज के उसी निचले खान्ने  में पडे पीपे में हाथ डालकर आटा निकालने लगी, तभी अचानक बाजू वाली झुग्गी से चीखने चिल्लामने और भांडे ठलकने की आवाजें आने लगी। पर ये तो रोज का काम था। ऐसे मे इसपर समीरा की पहली प्रितिक्रया इतनी सहज थी मानो ये अगर न होता तो ज्ररूर उसे हैरानी होती। मसलन ये ऐसा ही कुछ था, ज्योंा हर शाम रोटी पकाना और खाने जैसा कुछ। उसने जैसे खुद से ही कहा था, ‘लगी गये मुअे भांडणे।’
सामने तख्तक पर रामसजीवन भी कुनमुनाया।

‘अब एकदम से भूक लग आई,’ समीरा ने उसकी तरफ नजर उठाए बगैर कहा। ‘पहले तो बांह छोडने को तैयार न था। मालूम न है रोटी पका के त्यार होती है।’ वह अस्फु‘ट सी आवाज में बोलने की असफल सी कोशिश करने लगा था। इस बीच उधर से आने वाली आवाजें ज्या दा से ज्या दा प्रखर होने लगी थीं। चाहकर भी अब वह इनसे निरपेक्ष बनी नहीं रह सकती थी। मानो ये लडाई बगल के इस परिवार का शगल जैसा कुछ था। अभी अभी जो आवाज सुनाई दी थी वह मां की आवाज थी। वह अपने बेटे को डांट रही थी। और उसका जवान बेटा चीख रहा था, ‘मला तुझी गरज नाहीं।’ जवाब में मां ने उसे गिरयाया था, ‘तुझे हमारी गरजेलेला न है, तब हमको कौन तुम्हाेरी गरज आहे। निधूण जाणे का। बाहर का रास्ता नापणे का।’
बेटा बडबडाता हुआ बाहर निकलकर गली में आ गया था। वह इशु था। जवान-साधन लडका। मां बाप को शिकायत थी कमाता धमाता कुछ है नहीं, सारा दिन अवारागर्दी करता फिरता है, चरस घोंटता है और शाम को रोटी मांग खाणे और जान परतेचणे को इधर को चला आता है। घणा जीम के फिर बापू के तख्त  पर कब्जा  करके घोडे बेचके सो लेता है। उसके बाद बूडढा बाप फिर चाहे बाहर चार फुट की गली में सोए या पूरी रात जागता रहे, उसे काहे की गरज थी। सही कह रहा है।

अब वह बाहर गली में निकलकर चीखने लगा था। उसे बिल्कुल परवाह नहीं थी कि उसकी आवाज से डरे हुए कितने सारे कुत्ते  जोर-जोर से ऐसे भौंकने लगे हैं और कि उसकी आवाज उसी में खोए चली जा रही है। पर बाकी हर ओर झुग्गियों की इस बस्तीस में सन्नाआटा पसरा रहा था या सब के सब अपने में मस्त थे! किसी को क्या पडी थी कि कोई मदद को आता। कुछ देर की चीखो-चिलाहट के बाद वह खुद ही चुप हो गया और गली में जैसे यकायक खामोशी का आलम पसर गया था। कुत्ते भी धीरे धीरे भौंकना बंद हो गए|

समीरा ने आटा गूंथ लेने के बाद गैस पर से तरकारी का पैन उतारा और तवा धर दिया। इधर से रामसजीवन ने कुछ कहा, जिसे समीरा के सिवाए संसार का कोई प्राणी समझ नहीं सकता था। ‘अरे,’ समीरा ने उसकी तरफ देखे बिना मुस्कुरा दिया और कपडे के एक साफ से पोणे से तवे को पोंछती हुई बोली, ‘मालूम है, भूक का टैम है, पण होगा तो पका के ही न।’ रामसजीवन वापस कुछ बोला, पर जब तक वह जवाब देती, इधर झुककर अंदर आ देने वाले द्वार का परदा जरा सा उठा और पहले अंदर इशु की गर्दन झांकी, फिर उसकी याचना से भरी हुई आवाज आई, ‘मावशी।’
समीरा ने मुडकर उधर देखा। ‘क्या  रे ईश्वा,’ उसने कहा। ‘काहे मस्करी करने का।’
‘मावशी।’ उसने जवाब दिया। ‘मला दो कच्चा बटाटा उधार दे दो!’
‘क्यों। रे,’ समीरा ने कहा। ‘आज की रात कच्चे आलू खाने का है।’ उसने वापस गर्दन घुमाई। ‘काहे ऐसा मस्करी को करता रे।’
इशु ने कदम अंदर धरे और कमरे की तंग गली के एक कोने में आ बैठा। ‘मावशी, मेरी गलती क्या । बोले तो नौकरी मिलती नहीं। घर आता हॅूं तो इनकी बकझक बकझक सुनने को मजबूर। जी करता है मर लेवूं।’
‘जादे हल्लाम नई न करणे का,’ समीरा ने कहा। ‘भूक लगी है तो बैठके इधरेइच ई खा लेने का है। दो रोटी जादे दे सेंक देगी मैं। पण बोला न मां बाप को क्षमा करणे का।’
‘मावशी,’ इशु ने कहा। ‘तुम मुझको इतना बार रोटी खिला दिया जो अब शर्म लगती है। पर एक रोज मैं तुमारी पूरी उधारी जरुर चुका के रख देगा, मावशी। खाली नहीं बैठा रहेगा मैं। बरोबर। पण इन लोगों को जरा देखो कैसे मुझे घर से बाहर फैंकने को बैठे हैं। ऊ ठल्लम बेधर्मी ऊंचा मुलगा इनकी जवान मुलगी को सरेआम भगाके ले गया। बरोबर क्या । उससे पाहिले वो बडे वाली उस मनालीकूल गांजे वाले के बगल में भाग ली थी। क्याक। अब बोले तो दोनों जने मला सिर पर सवारईच रहते हैं। अभी उधर ऊ बुडढी बोलती, मैं सूअर है। सूअर! डुकरा सारखा लटठ। बोले तो, इस लट्ठ को घर से बाहर ढकेलणे का। क्या मावशी, अपुन किधर से सूअर दिखने का है| एक रोज मैं भी भाग जाएगा इस घर से। अपुन की भी कोई ईज्जअत हैईचिक कि नईं। बरोबर क्याी। दो रोटी खाने का। कहींईच जाके खा लेगा। बरोबर खा लेगा।’ फिर जैसे उसे याद आ गया कि वह इधर किसलिए आया था। ‘मावशी,’ उसने कहा। ‘दो बटाटा।’

समीरा हंस दी, ‘ठहर पकड, देती मैं तेरे को दो कच्चा  पटाका। खोपडा भून के खाएगा,’ उसने फुल्का पकाकर तवे पर ठेला और कर्छुल से तरकारी को हिलाते हुए कहा।  आलू कोई फल तरकरी है जो कच्चा् चबा लेगा।’ वह जरा सा रुकी और आगे जरा गम्भीोर होकर बोली। ‘भलेमाणुस रहके काम आने का, कि बस यूं ही अपनी ये रमैण पुढे चालू ठेवणे का। कोई सुने चाहे न सुने। तुमचा कोई गरज नाहीं। बस अपनी रौ में बोले चलो। पर पेट तो भरा चाहिए न बे, ईश्वा। तभी तो न लडने का। बरोबर!’ वह वापस हंसने लगी थी।
उसकी बात सुनकर, तख्ता पर सोया पडा रामसजीवन हंसी से हिलने लगा। समीरा ने मुडकर देखा। उसकी ऑंखों में मानो कोई खुशी आकार ले रही थी और होठों पर हँसी फूट पड्ने को आतुर थी। ‘मला तुझी गरज नाहीं,’ समीरा ने तीसरे फुलके को उतारकर प्ले ट में धरते हुए कहा। ‘काहे गरज नाहीं रे। जिस मांबाप को बुढापे में तुमारी जरूरत है उसी को कहने का मुझे तुमारी जरूरत नईं है। समझकारी से काम लेने का बे ईश्वा। जांगला माणस बणने का।’
बोलते बोलते समीरा ने गैस बंद कर दी और फ्राईपैन में कडछी डालकर तरकारी निकाल फुलकों के बाजू में परोस दी। प्लेनट उठाते वक़्त उसने ईशु से कहा, ‘जरा ठहर पकड़ वे, ईश्वा, रमा को खिलाके तेरे को देती मैं रोटी। मेरे साथ बैठके खा लेना।’ प्लेट हाथ में लिए वह तख्त  के एक किनारे आ बैठी और रोटी के छोटे -छोटे कौर तोड़कर रामसजीवन को खिलाने लगी। रामसजीवन बार-बार नाक सुडकता सा लग रहा था। समीरा ने उसे डांटने के से लहजे में कहा, ‘रमा, तेरे को मैं कितना बार बोली जो रोने का नहीं, मन से खाने का है। उसके बाद मैं तेरे से खूब बात करेगी।’ रामसजीवन ने अपनी गर्दन हिलाने की भरपूर कोशिश की। तकरीबन दसेक मिनट लगे होंगे इसे निपटाने में। समीरा ने उसे वापस लिटाया और हाथ धोकर मेज़ के पास आ खडी हुई। उसने छः रोटियां बनाईं और दो प्लेटों में तरकारी परोसकर तीन तीन रोटियां उनमें रख दीं। दोनों हाथों में प्लेटें उठाये वह नीचे आ बैठी, एक प्लेट इशू के सामने धर दी और दूसरी अपने सामने रख ली। ‘शांति से खा ले वे ईश्वा,’ उसने कहा और खुद भी खाने लगी। बीच में इशू बोला, ‘मावशी, तेरे कर्जे को मैं कैसे निपटायेगा।’ समीरा ने तत्काल कुछ नहीं कहा। कुछ देर के बाद जब रमा के हिलाने का अहसास आया तो उसकी तरफ देखकर वह बोली, ‘रमा, तू इस ईश्वा की बात पर काहे हंस रहा है। ये पूरा समझकार बच्चा है। किसी का उधार खाने वाला थोड़े ही न है। क्या पता कब हमें इसकी जरुरत पड जाए।’ वह सोच रही थी कि उसकी इस बात पर वह जरुर कोई प्रतिक्रिया देगा मगर वह खामोश बना खाता रहा। कुछ नहीं बोला। थाली साफ़ हो गई तब वह बोला, ‘मावशी, दिन बदलते कोई देर थोड़े न लगती है।’ उसने दो गिलास पानी पिया और कुछ देर किसी ससोपंज में फंसा सा वहीं बैठा रहा फिर उठकर बाहर गली में चला आया। समीरा ने बर्तन समेटे, बाहर आकर उन्हें धोया और साफ़ हुए इन बर्तनों को उठाये भीतर चली आई। इन्हें एक ओर धरकर वह रमा की बगल में आ बैठी और उसके माथे को अपनी उँगलियों से सहलाने लगी। रमा शायद कुछ बोल रहा था। समीरा ने उसी का जवाब दिया, ‘बोला न फिक्र नईं करने का। सब ठीक हो जाएगा।’ वह बोलते बोलते ही लेट गई और अधनींदी हालत में बोलने की कोशिश भी करती रही। कब नींद आ गई इसका उसे कोई अंदाज़ हुआ नहीं। लेकिन जब अचानक नींद खुल गई तो उसने मोबाईल हैंडसेट में टाईम देखा। साढ़े तीन बज़ रहे थे। उसने रमा का जायजा लिया। शायद वह भी जाग रहा था, पर समीरा ने उससे बात नहीं की। कुछ देर करवटें बदलते चलने के बाद वह गाने लगी: पहर सवेला रिये$$$$$$ गईरी नी बहुए, अड़िये; ओ गईरी नी बहुए$$$$$$$$$; दिन ढलने जो आया, दिलोजान अड़िये$$$$$$$…(शाम ढलने के साथ ही चली गई थी रे बहू तू, अब सुबह होने को आ गई है पर अभी तक तू लौटकर नहीं आई, कुछ तो इस दिल पर रहम कर!) बीच में रमा का हाथ उसे टटोल रहा था। उसने इसे अपने दोनों हाथों में ले लिया और बिना खुद को रोके गाती रही।

 हर रोज़ की तरह आने वाली सुबह भी जरा इत्मीनान से गुजरी थी। काम पर उसे दोपहर बारह बजे के आसपास निकलना था और तब तक वह रमा के साथ बातें करती रही थी। बीच में उसने गली में निकलकर कपडे भी धोये थे और भीतर वापस लौटकर जब वह खाना पका रही थी, तब ईशू आया था और रुआंसी सी हालत में, जैसे अपना कोई आख़िरी फैसला सुना गया था, ‘मावशी, आज के बाद इधर नहीं आने का है। जा रहा मैं। मेरे को डुकरा सारखा लट्ठ बोलते हैं। मैं नहीं सुनने का।’ समीरा ने उसकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि हँसते हुए कहा, ‘जा अभी तो, शाम को बात करती में तेरे से।’

रमा को खाना खिलवा चुकने के बाद, वह धारावी के अपने इस घर से बारह बजकर दस मिनट पर निकली थी। लेकिन तब तक उसे किसी खराब से भी खराब सपने में गुमान नहीं रहा था कि आज का दिन इतना ख़राब गुजरेगा कि जिस घर में वह पिछले तीन साल से बिलानागा काम करती चली आ रही है उसी की मालकिन शुभा म्हात्रे की लाश वह सोसाईटी के प्रांगण में देखेगी। फ्लैट के गेट पर पोलिस को अपना नाम, पता और दो परिचित व्यक्तियों के पते नोट करवा चुकने के बाद वह चुपचाप सोसाईटी के उसी गेट से बाहर निकल आई थी। मालाड के रेल-स्टेशन तक आने में उसके भीतर ऐसी गुजरी कितनी ही बातें याद आती रहीं। कई विचार आते और वापस चले जाते। बीच में शुभा महात्रे का चेहरा याद जाता। एकाध बार को तो उसका मन रो आने का भी हुआ था। जब वह सब्जी मार्किट से गुजर रही थी तो उसने तय कर लिया कि आज वह भाजी नहीं खरीदेगी, बल्कि घर जाकर सेपू-बड़ी का मधरा तैयार कर रमा को खिलायेगी। उसे अपने शहर मंडी की ये खास डिश बहुत पसंद थी, लेकिन इसे तैयार करने के लिए जितनी फुर्सत की जरुरत रहती है, वह उसे जैसे आज ही मिल पाई थी। पिछली बार जब उसने इसे बनाया था, तो इशु बार-बार इसी बात को दोहराता रहा था कि मावशी आज तुमने उँगलियाँ चाटने को मजबूर कर दिया है। ‘ऐसी तरकारी तो मैंने आज तक चखी नहीं थी।’ समीरा के पैर के अंगूठे में जरा सी ठोकर लगी, तब उसे अहसास हुआ कि कितना जल्दी वह स्काईवाक के जीने के पास आ पहुँची थी। जबकि पहले वह वक्त को पकडे रहने की कोशिशों में बेतहाशा दौडती रहती थी और इसी अहसास में डूबी रहती कि ये उसकी पकड़ से बाहर होता चल रहा है, वहीं आज उसे इसके एकदम उल्ट अहसास हो रहा था कि इसने अपनी गति कुछ ज्यादा ही धीमी कर ली है और इससे ठीक उल्ट उसकी चाल ज्यादा तेज हो गई है। वह सीधे पंचिंग मशीन के पास गई और ये देखकर हैरान रह गई कि आज क्यू ज्यादा लम्बा नहीं था। महज तीन चार मिनट गुजरे होंगे कि उसकी बारी आ गई। इससे फारिग होकर वह अपने प्लेटफार्म पर चली आई और ज्यों ही वहां कदम धरे तो सामने से गाडी आती दिखी। आज उसने तय कर लिया था कि वह मेन जनाना डिब्बे के भीतर बैठेगी। उसे लग रहा था कि आज उसके भीतर इतनी सामर्थ्य नहीं बची है कि वह सामान रखने के उस केबिन में बैठकर सड़ी हुई मछियों की वास सूंघती रहे। और तो और आज उसे तरकारी भी नहीं काटनी थी। गाडी रुक आई तो वह उसके अन्दर चढने के इरादे से गाडी के द्वार के पास आ गई, लेकिन ये देखकर हैरान रह गई कि आज भीड़ का रेला उतना सघन नहीं था कि उसे उसके धक्के खाते हुए भीतर जाने की नौबत आती। वह इत्मीनान से चढी और सामने मौजूद एक खाली सीट पर जा बैठी। डिब्बे में कुछ कामकाजी औरतों के इलावा कॉलेज जाने वाली लड़कियां ज्यादा थीं। समीरा को हैरानी ये हुई कि जब इन लड़कियों के चहकने और महकने की उम्र है, तब ये सब एकदम गुरु-गंभीर मुद्रा में क्यों बनी हुई हैं? वे सब एक-दूसरी के बगलगीर होकर भी आपस में बात नहीं कर रही थीं। उसने इसपर अपना दिमाग लड़ाने की भरसक कोशिश की, पर उसे इस गाम्भीर्य का कोई जवाब या तर्क नहीं सूझा। अगले स्टेशन पर जितने लोग उतरे उनसे काफी कम लोग डिब्बे में चढ़े। कितना अच्छा लग रहा था कि हर किसी को सीट मिल रही थी। बस तीनेक लड़कियां सामने खड़ी दिखी थीं। समीरा ने उनमें से एक को अपने पास बैठ जाने के लिए कहा। वह जरा सा मुस्कुराकर आई और सटकर उसके पास आ बैठी।

अंधेरी स्टेशन में गाडी के रुकने पर वह हौले क़दमों से बाहर निकली। यहां भी वैसी धक्कामुक्की नहीं थी, जिसकी वह आदी थी। उसे ये देखकर कोई सुखकर अहसास नहीं हुआ। ये उसके जीवन की सामान्य गतिविधि से अलग था। वह बोझिलता से भरे हौले क़दमों से बाहर चली आई और सीधे बस-स्टॉप पर जा खडी हुई, तब ये देखकर हैरान रह गई कि तत्काल बस उसके सामने थी और वही कंडक्टर जिसे वह भान्जू कहा करती थी, धारावी…धारावी…चाला धारावी…पुकार रहा था। समीरा को देखकर उसकी नजर जरा सा खिल उठी थी, चाला मावशी, चाला…आज तो आप दिन में ही धारावी लौट चलीं हैं! समीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप बस के अन्दर आई और सामने खाली पडी सीट पर जा बैठी। थोड़ी देर बाद कंडक्टर उसके पास आया। ‘तिकत मावशी, तिकत,’ उसने कहा तो समीरा ने छुट्टे पैसे उसके हाथ में धर दिए। उसे लगा आज बस की गति सामान्य से ज्यादा तेज़ है। शायद सड़क पर ट्रैफिक कम था। ये बस ही नहीं जैसे हर चीज़ आज तेज़ चल रही थी।

‘अरे समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने जैसे अपने अन्दर की बहुत सारी खीज खुद पर ही निकालते हुए कहा। ‘रुको रुको…बहुत हो गया। इलक्या दीर्घ कथे मध्ये काही रोमांचक नाहीं…तुम्हारी इस पूरी कथा में कहीं एक बार को भी ऐसा कोई सूत्र नहीं सूझा कि आखिर शुभा म्हात्रे की मौत हुई तो कैसे और आठवीं मंजिल से गिरकर क्यों हुई। लगता है तुम बहुत भोली हो। या फिर बहुत चालाक भी हो सकती हो। ये दोनों बातें सही भी हो सकती हैं और दोनों गलत भी। पर फिलहाल इतना काफी है। बाकी जरुरत होगी तो तुमसे संपर्क कर लिया जाएगा। अब तुम जाओ। मेरा मन सोने का कर रहा है। इतनी लम्बी कथा में कहीं कोई रोमांच नहीं। ओ माय गॉड! हैव सम मर्सी ओन मी।’

 जब समीरा मालाड के पोलिस स्टेशन से बाहर निकलकर रेल-स्टेशन की तरफ़ बढ़ रही थी, तब उसे किसी हद तक ये सन्तुष्टि हो रही थी, कि पहली बार को उसे अपनी पूरी कथा बयान करने का मौका मिला था और उसने इतने कम वक़्त में इस मौके का अच्छा भला सदुपयोग कर लिया था। रोमांच बगैरह से उसका ज्यादा कुछ लेना देना नहीं था। वह इन्स्पेक्टर की अपनी समस्या थी, मगर समीरा की समस्या दूसरी थी। उसे आगे नई नौकरी तलाश करने में जुट लेना था। बल्कि आज ही इधर मालाड के इस पोलिस थाणे में तफ्तीश में शामिल होने को चलते वक़्त उसने इशु कटारी से कोई नौकरी ढूंढ निकलने के लिए कहा था। उसके इस सवाल में कोई रोमांच नहीं था और उससे ज्यादा इशु के ठन्डे जवाब में किसी रोमांच के होने की संभावना नहीं के बराबर थी। उसने ऐसा कुछ जरुर कहा था कि जब आप ही को नौकरी नहीं मिल रही तो आपके बाप को कहाँ से मिल जायेगी। पर रोमांच उसके इस जवाब में भी नहीं था। इसे आना हुआ था इस तफ्तीश के बाद के चौथे दिन में। चौथे दिन मतलब उन तमाम बयानात की दर्ज़ा-दर्जी के बाद ठीक चौथे दिन की सुबह सवा दस बजे। जब समीरा काम की तलाश में धारावी के अपने इस घर से तैयार होकर निकलने ही वाली थी। पूर्वी अंधेरी के एक फ्लैट में दो लड़के किराए पर रहते हैं, दोनों जैट एयरवेज में पायलट हैं, उन्हें खाना पकाने वाली बाई की जरुरत है, ये खबर पिछली शाम को इशु लाया था। वही स्वघोषित ‘डुकरा सारखा लट्ठ’, जो अभी तक अपने तईं नौकरी तलाश नहीं कर पाया था और एक सुबह तो कभी न लौटने की घोषणा करके गया था, मगर उसी रात वापस लौट आया था। जरा देर से ही सही। ‘मावशी, तुम्हारा मुंह देखे बिना रह नहीं सकता न इसलिए लौट आया हूं!’ उसकी ये बात सुनकर इधर रमा भी हंसने लगा था। उसीने नए संभावित रोज़गार की ये खबर समीरा को दी थी कि उन लड़कों को खाना पकाने के लिए बाई…

समीरा बस कुछ पलों में निकलने ही वाली थी। उसने हमेशा की तरह रमा का मुंह चूमा और जल्दी लौट आने का वायदा कर द्वार की तरफ कदम बढाए ही थे कि बाहर से इशु की मरिअल सी आवाज़ आई, ‘ओ मावशी, पोलीस…’
समीरा के पांव जरा सा ठिठके पर तत्काल संभल जाने के बाद वह बाहर निकल आई। इशु के पीछे कुछ बाबर्दी पोलिस वालों के बीच इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर खडी थी। ‘मावशी…,’ इशु ने कहा, लेकिन उसकी इस मंद सी निकलती आवाज़ को शीतल बर्नेकर की रौबीली पुलिसिया आवाज़ ने तत्काल दबा दिया, ‘समीरा, पोलिस को तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है। वारंट है हमारे पास।’ समीरा की जीभ यकायक सूख गई। उसे अपना ज़हन एकदम बंजर रेगिस्तान होता हुआ सा लगा, जिसमें से सोच की नमी गायब थी और सवाल उगना अचानक बंद हो गये थे। कुछ पलों की खामोशी के बाद दो कदम आगे बढ़ते हुए, शीतल बर्नेकर ने कहा, ‘पूरा मामला तुम्हें पता है। शुभा म्हात्रे की मौत की तफ्तीश इस मुकाम पर आ पहुँची है। इससे पहले कि तुमसे अगली पूछताछ की जाए हमें उसकी लाश के पैर की एक उंगली से गायब जोडवा ढूंढ निकालना है। जोडवा बोले तो बिछवा। उसके दोनों पैरों में दो जोड़ी बिछ्वे थे। डेढ़ जोड़ी उँगलियों में पाए गए। बस, आधा जोड़ी गायब है। मने एक बिछवा गायब है। उसके मिलने की देरी है कि तफ्तीश पूरी हुई जानो। इसी से उसकी मौत का राज़ खुल जाएगा। तुम यह भी जान लो कि उसके बदन पर बहुत सारे गहने थे। सिर से लेके पाँव तक। पर बाकी हर चीज महफूज पाई गई सिर्फ वह बिछवा गायब है। अगर तुम उसे हमारे हवाले कर दो तो फिर तुम्हारे घर की तलाशी की जरुरत नहीं रहेगी।’

 इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर के इस एक कथन के बाद, जो काफी हद तक धमकी जैसा कुछ होने का अहसास दे रहा था, कहानी की अपनी विधागत जरूरतों के आगे समीरा की यह कथा कभी न खत्म होने के लिए चल निकलती है और बहुत संभव है कि इसका अंत उसकी ज़िन्दगी के निपट चुकने के बाद ही हो पाये। लेकिन उसका इंतज़ार करने की हिम्मत किस कथाकार में होगी? आखिर किसी व्यक्ति की पूरी जिन्दगी को कोई कथाकार कैसे किसी एक विधा की सीमाओं में समेट सकता है? कम से कम मेरी अपनी हिम्मत तो बिल्कुल नहीं है जिसकी आप दाद दे सकें। अलबता कुछ फन्तासियां जरुर हैं जिन्हें उधृत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं और अगर उन्हें आपके साथ शेयर न करूँ तो कहानी की बात तो खैर जाने दीजिये, ये आप सबके साथ ज्यादती होगी, जिन्होंने इतना देर तक इस कहानी को सुनने में अपने कीमती वक़्त को बर्बाद किया है। उस रोज़ समीरा के घर की तलाशी में पूरे घर के धुर्रे बिखर चुकने के बाद और अंतत उसके गिरफ्तार हो चुकने पर रमा अपने तख़्त पर पड़ा रोता रहा था। बाहर जो भीड़ लगी थी, उसमें बहुत सारे लोग थे, लेकिन जो दो व्यक्ति सर्वाधिक सक्रिय थे उनमें एक तो इशु कटारी ही था और दूसरी थी वह लडकी अर्चना त्रिपाठी, जिससे समीरा की दोएक मुलाकातें हुई थीं, और वह भी उसके लिए नौकरी तलाश करने में मदद कर रही थी। अर्चना त्रिपाठी ने शीतल बर्नेकर से कुछ तीखे सवाल पूछे थे लेकिन जवाब में उसे धमकी जैसा कुछ मिला था कि अगर कानून के काम में अड़चन डालोगी तो भुगतान भी बहुत खराब करना पड़ेगा। पर अर्चना त्रिपाठी ने डरने के बजाये अपना वकील लेकर उनसे अदालत में मिलने का इरादा ज़ाहिर किया था। जब पोलीस समीरा को लेकर चली गई और कुछ देर की चेहमेगोईयों के बाद वापस धारावी की इस गली में सन्नाटा पसर आया तो इशु कटारी जैसे नींद से जागा था। वह समीरा के घर के अन्दर गया और रामसजीवन के पास जा बैठा और उसके सिर पर हाथ रखकर सहलाने लगा। अगले तीन दिन तक टीवी पर शुभा म्हात्रे के क़त्ल के समाचार अनवरत प्रसारित होते रहे थे। हर चैनल पर जो एक बात सांझा थी, उसमें कहा जा रहा था कि पोलीस द्वारा इस हत्याकांड की गुथी सुलझा ली गई है, तथा पोलिस को क़त्ल की गई महिला के दाहिने पैर से गायब एक बिछ्वे की तलाश है। चौथे दिन जब समीरा का पोलीस रिमांड ख़त्म होना था, तब टीवी चैनलों पर खबर आई थी कि समीरा नाम की कातिल महिला ने शुभा म्हात्रे का क़त्ल करने का जुर्म स्वीकार कर लिया है।
पक्षधर से साभार 

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट 


‘रेमो’  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा ‘अन्ना केरेनिना’ अपना प्यार ढूंढने आई है…

पुराना घर, ढेर सारी पुरानी परम्पराओं  (गोवा  और पुर्तगीज)  को अपने आप मे समेटे हुए. बड़े-बड़े कमरे, ऊँची-ऊँची दीवारें, खुला आँगन….आँगन क्या जैसे एक बड़ा सा बागीचा. जिसमे आम, चीकू, केले और नारियल के पेड़ जिसमे बैठने के लिये लकड़ी की बेंच…..

2004 में पहली बार गोवा जाना हुआ. पहली बार दिल्ली की बजाय गोवा में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ. गीता (गीताश्री) और मैं गोवा गये. पूरा प्लान गीता का ही था.  (हालांकि राजेंद्र यादव ने तंज किया था – ‘साली तुमदोनों लेस्बियन हो क्या? कोई दो लड़कियाँ साथ में गोवा जाती है????)

रेमो फर्नांडिस और असीमा भट्ट

मुझे समंदर बहुत आकर्षित करता रहा है… गोवा का नाम सुनते ही खुला समुन्द्र, नावें,नाविक, मछुयारे….घने नारियल के झुरमुट….काजू और बादाम के पेड़ कितना कुछ… हालाँकि जैसे ही गीता ने बताया की हम गोवा चलेंगे…. मेरे अंदर से  वो गाना गूंजने लगा- ‘समन्दर , समन्दर! यहाँ से वहां तक, यह मौजो की चादर बीछी आस्मा तक……..’ बच्चे की तरह उत्सुकता थी मेरे भीतर. बहुत सी कल्पनाएं मेरे मन में खेल, खेल रही थी.
दिल्ली निजामुद्दीन से गोवा जाने वाली ‘राजधानी’ में हम जैसे ही बैठे की सामने की सीट पर बहुत प्यारी सी महिला अपने दो बच्चों के साथ सफर कर रही थी. वो  गोवन थी. पूछने पर बताया कि वो  देहरादून अपनी बहन के पास आई थी. उनका नाम था मारिया (गीता आज भी मारिया के लिये गाती है- (ओ मारिया, ओ मारिया..)और बच्चे वरुण और वियोला.  हम एक पल में इतने अच्छे दोस्त बन गए कि लगा हम सब एक परिवार हों और एक ही साथ यात्रा कर रहे हों. मारिया के पहचान के एक और दोस्त हमारे साथ थे-  एडवोकेट प्रसाद. पति-पत्नी दोनों गोवा के जाने माने एडवोकेट हैं.

इतने प्यार से हँसते-खेलते दिल्ली से गोवा तक का लम्बा सफर कब कट गया पता ही नहीं चला. गोवा स्टेशन पंहुचते ही मारिया और उनके बच्चे जिद्द करने लगे कि आपलोग हमारे साथ घर चलो. लेकिन हमारी होटल की बुकिंग दिल्ली से ही हो रखी थी.. इसलिए हम होटल गये… होटल भी हमें मारिया ने हो छोड़ा और रस्ते में एक बड़े खूबसूरत से बीच रेस्टोरेंट पर हमें ‘गोवन सी’ फ़ूड खिलाया. होटल छोडते वक्त तय हुआ कि शाम को हम सब क्रूज (वोट) पर मिलेंगे जहाँ संध्याकालीन संगीत का आयोजन होता है..सेलानियो को क्रूज बेहद पसंद है. हलके-फुल्के स्नेक्स के साथ थोड़ी शराब, नाच-गाना और मस्ती. बीच समन्दर में तैरते जहाज़ पर बड़ा ही मज़ा आता है…

रेमो फर्नांडिस

अगले दिन से फिल्म फेस्टिवल शुरू हो गया. गीता-मै उसी में व्यस्त हो गये.…मेरे लिये यह सब बड़ा ही अनोखा था क्यूंकि मेरा पहला अनुभव था… गीता को आफिस (आउटलुक) के काम से वापस जल्दी दिल्ली लौटना पड़ा और मै जबतक फेस्टिवल था,  तब तक  मारिया के घर पर ठहर गई… इतने कम जान-पहचान में शायाद ही कोई मित्र इतना करीबी होता है. लेकिन मै बता दूं कि मारिया आज भी हमारी मित्र हैं. और उनके प्यार और अपनेपन की वजह से गोवा हमेशा अपना घर  लगता है.. मारिया, खासकर मुझे हसेशा कहती है- ‘Sweetheart, this is your house. you can come any time.  Door will be open for you always.’

एक दिन मारिया से कुछ बातें हो रही थी कि अचानक ना जाने कहाँ से ‘रेमो’ की चर्चा आ गई…(वही रेमो फर्नांडिस जो-  ‘प्यार तो होना ही था और  हम्मा, हम्मा! हम्मा-हम्मा, हम्मा…’  गाने के लिये मशहुर रह चुके हैं) जैसे मेरी  नसें फडक उठी… मैंने उत्साह से  चिल्लाते हुए मारिया से पुछा- ‘ तुम रेमो को जानती हो? क्या रेमो यहाँ रहते हैं ? मुझे लगा था की सारे singer की तरह वो भी मुम्बई रहते होंगे. ‘ वो बोली-  ‘Yes,  He is my neighbour  only.
क्या? मुझे उससे मिलना है.
बात वहीँ खत्म हो गई.  शाम को मारिया अचानक गाड़ी में बिठा कर एक घर में ले आई. मैंने पूछा – किसका घर है. वो बोली -रेमो का.
क्या?
हाँ!
हम अंदर गये. एक बुजुर्ग महिला बाहर निकली. महिला ने बड़े प्यार से अभीवादन किया.
मारिया ने  मुझे बताया कि वो रेमो कि माँ है और उनसे  गोवन में पूछा- ‘रेमो घर में है? यह मेरी फ्रेंड दिल्ली से आयी है, रेमो की फैन है.’
उनकी माँ ने कहा कि – ‘रेमो तो आजकल गाँव (सियोल्म, गोवा से सटे गांव)  में रहता है.’
यह सुन कर मेरा दिल बैठ गया.
वहाँ से बाहर निकले और मारिया की गाड़ी दौड़ पड़ी सियोल्म की तरफ… मैंने पूछा – बहुत दूर होगा…
मारिया बोली – So what? you are my dear friend.
रस्ते भर एक अजीब सा रोमांच था… गोवा की पतली सड़के, दोनों तरफ नारियल के पेड़ और समुन्द्र का किनारा…और ऊपर से शाम का समय…..चिड़ियों का कलरव….
मारिया बार-बार गाडी रोक कर गांव वालों से पूछती- ‘रेमो च घर? यानी रेमो का घर’
लोग बताये बस थोड़ा सा आगे… इस तरह जब हम रेमो के  घर के करीब पंहुचे तो मारिया एकदम से बोली- ‘Asmi (यह नाम उसी का दिया हुआ है), Have some gift for Remo and put some lipstick . you will look beautiful and Remo wil like it.’

घर पंहुचे तो एक नौकरानी ने आकर हमारा स्वागत किया और बड़े से बरामदे से होते हुए वो हमें आंगन में बिठाकर यह कहके चली गई कि सर रिहर्सल कर रहे हैं. दरअसल रेमो को गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन पर एक खास संगीत परफॉर्म  करना था जिसके लिये वो खास धुन तैयार कर रहे थे.

बगीचा बहुत ही रूमानी था… किसी प्रेमी जोड़े के लिये तो परफेक्ट. थोड़ी देर बाद रेमो आये… ‘हाथ मिलते हुए कहा– मै किसी से मिलना पसंद नहीं करता इसीलिये शहर और शोर-शराबे से दूर यहाँ गांव में रहता हूँ,… लेकिन माँ का फोन आया कि आप मुझसे मिलना चाहती है इसलिए मना नहीं कर सका….’   अजीब लगा. मै क्या कह्ती समझ नही पा रही थी. अचानक मेरे मुंह से निकल गया – ‘मै जर्नलिस्ट हूँ, और मैंने सुना कि आप गोवा फिल्म फेस्टिवल कोलोसिंग सेरेमनी के लिये खास धुन तैयार कर रहे हैं इसलिए हम आपसे बात करने आ गये.’

असीमा भट्ट

बेरुखी के साथ कहा- ‘मै जर्नलिस्ट से नहीं मिलता. वो कुछ का कुछ छाप देते हैं.  they are edits they do gossip only.”
मै तो डर ही गई… बोलने को कुछ बाकी नहीं रहा.
फिर रेमो मारिया से बातें करने लगे. नौकरानी से चाय लाने को कहा…
बड़े सलीके से नौकरानी एक सुंदर से ट्रे में चाय ले आई.. साथ ही कुछ बिस्किट और नमकीन.
बड़े आदर के साथ रेमो हमारी चाय बनाने लगे.  चाय बनाते हुए पूछा – ‘शूगर या हनी… मै तो हनी लेता हूँ….’
मैंने पूछा – हनी क्यूँ?
मुस्कुराकर बोले- ‘Because its honey… Honey is Honey.

चाय पीते हुए वो थोड़े सहज हो गये या कह सकती हूँ कि मै सहज हो गई… मैंने बताया कि मै कल ही जा रही हूँ क्यूंकि मेरे वापसी का रिजर्वेशन कल का ही है. क्लोसिंग सेरेमनी तक नहीं रुक पाऊँगी.
रेमो बोले- ‘So sad, my bad luck. you are pretty woman, I could sing for you.
जब हम चलने लगे तो रेमो ने कहा – ‘Take my email id and send me your questions, I will answer your question… and please remember do not change in my answer.’
मैंने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा – इत्मीनान रहें.

मै दिल्ली आ गई.  उन दिनों एक ओल्ड ऐज होम के लिये कांसिलिंग का काम करती थी. मिस्टर आर.कुमार (विद्द्वान डॉ धीरेन्द्र वर्मा के बेटे और रिटायार  उच्य लेखा अधिकारी).  और डॉ नरेन की मदद से.  आर . कुमार को मै दादा बुलाती थी.. उनसे मिले काफी दिन हो गये थे, इसलिए गोवा से आते ही उनका फोन आया कि कहाँ हो और तुम्हारा गोवा ट्रिप कैसा रहा, शाम को मिलो तो पूरा डीटेल्स सुनेगे.

नोयडा के जिमखाना (फेमस क्लब) में मिले.. गोवा की एक-एक  बातें  बच्चे की तरह उत्साहित होकर दादा को सुना रही थी कि अचानक मेरा फोन बजा देखा तो मारिया का फोन था… फोन उठाते ही उत्तेजना में डूबी मारिया की आवाज़ ज़ोर-ज़ोर से मुझसे कह रही थी- “Asmi, Asmi,   ‘Dear, can you hear this, I’m so happy and excited for you, Remo is singing for you. He said in front of all crowds – this song is for that lovely girl who came all the way from Delhi to Goa to see me. I’m dedicating this song to that beautiful lady.’

फोन पे शोर के अलावा मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दे पा रहा था लेकिन मारिया की चहकती खुशी बहुत कुछ बयान कर रही थी…उसी रात को लौट कर मैंने रेमो को अपने प्रश्न इमेल किये… अगले ही दिन उनका जवाब आ गया…मेरी मुश्किल और बढ़ गई. क्यूंकि मैंने तो झूठ बोला था कि मै प्रेस से हूँ और आपका इंटरभिउ छापूंगी… क्योंकि  मै तब किसी भी पेपर या मैगजिन से नहीं जुडी थी…खैर! मेरे मित्र अभिजीत सिन्हा तब “सहारा टाइम्स” में काम करते थे. उन्हें बाताया तो   उन्होंने फ़ौरन मुझे वह इंटरव्यू ईमेल करने को कहा. मैंने  ईमेल कर दिया और एक जनवरी 2005 को  वो छपी… ऐसा नहीं कि इससे पहले मेरे आर्टिकल नहीं छपे लेकिन ‘रेमो’ के आर्टिकल  से जो खुशी मुझे मिली … उसके लिये शब्द नहीं हैं..वो आर्टिकल मैंने मारिया और रेमो दोनों को भेजा….

गोविंदा के साथ असीमा

एक शाम अचानक मेरे पास फोन आया कि “तुम कहाँ हो, मै दिल्ली में हूँ.”  मैंने पूछा- कौन? वो बोले – ‘रेमो’.
मुझे यकीन नहीं हुआ. वो बोले- ‘दिल्ली में कोई जिमखाना क्लब (वही जगह , जहाँ मै दादा के साथ बैठी थी और मारिया ने मुझे रेमो के गीत सुनाने की कोशिश की थी) है,,, वहाँ मेरा ‘शो’ है… तुम आओगी.?
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.

उस शाम मै उनकी खास मेहमान थी... रेमो गा रहे थे… नाच रहे थे… और वो सब जैसे मेरे लिये….मै उस रात दुनिया की सबसे खूबसूरत और खुबनसीब औरत थी… खुले आसमान के नीचे,,, तारों  भरी रातों में हवा में एक मदहोशी भरी महक  थी… उस रात जैसे मुझे और कुछ नहीं चाहिए था..

रात के दो बजे तक शो चला. शो के बाद हमने साथ डिनर किया … एक बहुत अच्छे मेजवान की तरह रेमो ने  मेरा का ख्याल रखा… कितनी-कितनी बातें…. उनकी बातों से लग रहा रहा था कि  वो अपनी माँ से सबसे ज्यादा करीब हैं, बात-बात पर माँ का ज़िक्र ले आते, अचानक मैंने उनसे पूछा being a singer which is your favourite song?   He smiled and said- ” I always like romantic song, my favourite song is – ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा… ‘  बातों -बातों में  कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला.. सुबह ८ बजे की उनकी flight थी. उन्हें एअरपोर्ट छोड़ा और घर आ गई. कुछ ही देर में उनका मैसेज आया- ‘I’m about to fly. take care.’
मेरे लिये सबकुछ एक सुंदर सपने जैसा था. इनता बड़ा कलाकार और इतना सहज…

कुछ दिनों बाद जो आर्टिकल छपा था उसका एक हज़ार का चेक आया… उन्ही दिनों ‘वेलेंटाईन डे 14 फेब” आने वाला था… मै उन पैसों से अपने लिये कुछ ऐसा खरीदना चाहती थी,  जो मेरे लिये हमेशा के लिये यादगार रहे. मेरी तमन्ना थी की मेरा ‘बॉय फ्रेंड’ मुझे साडी गिफ्ट करे,  क्यूंकि कभी किसी ने नहीं किया… तो मैंने नल्ली (साडी की मशहूर दुकान) वहाँ से लाल बाडर की साडी खरीदी…..
आज भी वो साडी मेरे पास है और जब मै वो साडी पहनती हूँ तो लगता है- लाल, लाल, लाल, जग दिखे है मोहे लाल, लाल….

‘कुछ हवादिस पे निस्बते इश्क की नहीं मौकूफ, उम्र भर इक मुलाक़ात  चली जाती है’. – मीर*

अगर सांवली रात खूबसूरत है तो सांवला चेहरा कैसे बुरा हो सकता हैं ?

इति शरण 
( मेरी दो बहनें हैं , एक गोरी है और एक सांवली. मैं दोनो से क्रमशः 10 और 12 साल बड़ा  हूँ.  टी. वी  पर जब कभी फेयर एंड लवली का भोंडा , नस्लवादी विज्ञापन आता था तो छोटी उसे गौर से देखती , तब भी मैं चिढ़ता था , कभी -कभी डांट भी देता . लेकिन उसका समाज तो वही है -गोरेपन का आग्रही समाज. आज वह खुद को रेखा , शाबाना आजमी और नंदिता दास के साथ खुद को जोडती है , गर्व से . कल इति शरण ने , जब यह छोटी टिप्पणी स्त्रीकाल के लिए भेजी , तो मेसेज भी किया कि गुस्से से भरकर लिख रही हूँ , ठीक लगे तभी लीजिएगा. मैं सभी शेड्यूल्ड आलेख / रचनाओं को ड्राप कर आज इसे प्रकाशित कर रहा हूँ. काश कि समाज अपनी कुछ जड़ताओं से निकल पाता! 
                                                    संजीव चंदन)

काफी समय पहले नंदिता दास का यह पोस्टर फेसबुक में दिखा था। ‘Stay Unfair, Stay Beautiful’ बहुत खूबसूरत लगता है यह शब्द। गोरेपन की चाहत के भ्रम को तोड़ता और सांवलेपन से प्यार करना सिखाता है यह शब्द। अपने सांवलेपन को लेकर अफ़सोस करने वाली तमाम लड़कियों में आत्मविश्वास भरता हुआ दिखता है यह शब्द।

कभी मुझे भी मेरे इस सांवले रंग से चिढ़ होती थी, इसका कारण था सांवले रंग पर बचपन से लेकर आजतक लोगों से सुनी बातें। लोग सांवले रंग को लेकर हमारे ऊपर बेचारगी प्रकट करने में भी पीछे नहीं रहते। हमें गोरे होने के लिए ऐसी सलाह देते जैसे वे हमारे सबसे बड़े हितैषी हो।

छोटी थी उस वक़्त अक्ल भी नहीं थी। समाज में गोरे और सांवले रंग के बीच के दोहरे व्यवहार का मेरे दिमाग में भी असर पड़ता था। कई बार मैं माँ से बोलती भी थी  ‘माँ तुम तो गोरी हो पर मुझे सांवला क्यों जन्म दिया।’ कई बार आईने में अपना चेहरा देखकर उदास भी हो जाती थी।
कुछ वैसे लोग जो मेरी माँ से मिले थे,  मगर मेरे पिता जी से नहीं, मुझसे कहते थे ‘तुम काली कैसे हो गई जबकि आंटी तो गोरी हैं’। मुझे बुरा लगता और मैं अपने बचाव में बस इतना ही कहती ‘क्या है कि मैं अपने पापा पर गई हूँ।’

बाद में जब अक्ल आई तब अपनी ही सोच पर हंसी आने लगी। एक गोरे रंग को ही खूबसूरती का पैमाना बना बैठी थी मैं। जबसे उस गोरे रंग के भ्रम से निकली हूँ मुझे अपने सांवले रंग से प्यार हो गया है। अब अगर कोई फेयरनेस क्रीम लगाने की सलाह देता है, तो मुझे बहुत हंसी आती है।

अभी हाल में भी एक सज्जन मेरे सांवले रंग का मज़ाक बना रहे थे। उनका कहना था कि काले कपड़े की जगह मुझे ही खड़ा कर देना चाहिये फिर उस काले कपड़े की जरूरत ही नहीं होगी। छोटे में यह बात सुनी होती तो शायद उस वक़्त खुद को बहुत अपमानित महसूस करती, क्या पता मेरी आँखों में आंसू भी आ जाते। पर अब नहीं, अब आंसू की जगह हंसी आती है। हंसी क्यों, यह बताने की जरूरत नहीं समझती, इतना तो आप समझ ही चूके होंगे।

खैर, गोरे रंग को खूबसूरती का पैमाना मानने वाले आज भी सांवले रंग को नीचा बताने में पीछे नहीं रहते। इसका परिणाम, कई सांवली लड़कियां अपना पूरा आत्मविश्वास खो देती हैं, अपने अंदर के तमाम गुणों को भूल कर सांवलेपन के अफ़सोस और शर्म में जीने लगती हैं और लग जाती है खुद को गोरे बनाने की जुगत में। लेकिन शायद वे यह नहीं समझती कि ऐसा करके वे खुद उस तथाकथित समाज के भ्रम में फंसकर सांवलेपन का मज़ाक उड़ाने में लग जाती है।

फिल्म दिलवाले में काजोल की वापसी के साथ उनका एक नया रूप भी देखने को मिला। सांवली सी काजोल अब गोरेपन के आवरण के साथ दिखी। जाहिर ही बात है, उन्होंने सांवले से गोरे होने के लिए तमाम महंगे ट्रीटमेंट का सहारा लिया होगा। खैर, यह उनका व्यक्तिगत चुनाव होगा, मगर उनके इस चुनाव के बाद आज वह हम सांवली लड़कियों के लिए सिर्फ एक कलाकर और एक अभिनेत्री भर ही रह सकीं, जबकि नंदिता दास आज तमाम सांवली लड़कियों की प्यार हैं। काजोल गोरेपन की चाहत के साथ तो आपने खुद ही सांवलेपन का मज़ाक उड़ाया है।

इति शरण

बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि समाज से सांवलेपन के दोयम दर्जे के व्यवहार को ख़त्म करने के लिए सबसे पहले हमें खुद अपने सांवले रंग से प्यार करना सीखना होगा।

अगर सांवली रात खूबसूरत है तो सांवला चेहरा कैसे बुरा हो सकता हैं ?


सांवली लड़कियों कभी अपने सांवले रंग को लेकर उदास मत होना। बहुत खूबसूरत है यह सांवला रंग। कहने दो दुनिया को जो कहना है। तुम्हारे सांवले रंग के कारण तुमसे कोई शादी करने से मना करता है तो खुश हो, क्योंकि ऐसे इंसान की हमें जरुरत भी नहीं। अगर तुम्हारे सावले रंग के लिए तुम्हारे प्रति कोई बेचारगी प्रकट करता है तो करने दो, क्योंकि तुम्हारा रंग नहीं बल्कि उसकी सोच बदसूरत है। उन तमाम फेयरनेस क्रीम को कह दो नहीं जरूरत हैं हमें तुम्हारी।

और अंत में बहुत-बहुत शुक्रिया नंदिता दास तुम्हारे इस शब्द के लिए stay unfair, stay beautiful and Dark is beautiful.