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एक अंग्रेज़ी-भाषी बंगाली दलित महिला की कशमकश

दृशद्वती बार्गी  

जाधवपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्कोत्तर. स्त्री अध्ययन केंद्र से एमफिल . संपर्क drishadwatibargi@gmail.com

( यह आलेख हर किसी को पढ़ना चाहिए , ख़ास कर उन्हें जो डिकास्ट होने का दावा करते हैं , या होने की प्रक्रिया में हैं . उन्हें भी जो अनुभवजन्यता को खारिज करते हैं. संपादक)  


पहले से ही लंबा यह शीर्षक और भी लंबा होता, यदि वह इस लेखक के  संपूर्ण  व्यक्तित्व ( कर्तापन ) को अभिव्यक्त करता। उस स्थिति में यह शीर्षक होता, ‘‘कोलकता, पश्चिम बंगाल में कार्यरत, बुद्धिजीवी बनने की इच्छुक, उपभोक्तावादी  व सेक्स के संबंध में उभयभावी अभिमुखता (मैं जानबूझकर ‘समलैंगिक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रही हूं क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि इसका अर्थ क्या होता है) वाली, उन्नतिशील, अंग्रेज़ी-भाषी, दलित स्त्रीवादी व विचारक व्यक्ति की कशमकश’’।

भले ही ऐसा प्रतीत होता हो, परंतु यह लेख मेरी व्यक्तिपरकता के विच्छेदन, पहचान व उसे सूचीबद्ध करने का आत्ममुग्ध प्रयास नहीं है। मेरा फोकस एक ऐसे शहर और एक ऐसे विश्वविद्यालय में काम करने के अपने अनुभव को सांझा करने पर है जो देश का बौद्धिकता का अड्डा होने का दंभ भरता है। मैं एक ऐसे विद्यार्थी के रूप में अपनी बात रख रही हूं, जिसने इस विश्वविद्यालय में पांच साल पढ़ाई की है। मैं अन्य दलित विद्यार्थियों की ओर से बोलने का दावा नहीं करती और ना ही मैं उनके जातिगत भेदभाव के अनुभव को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने का दावा कर रही हूं। ऐसे दलित विद्यार्थी हो सकते हैं जो यह कहेंगे कि उन्हें किसी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें अपनी जाति के कारण विश्वविद्यालय में शारीरिक यंत्रणा तक भुगतनी पड़ी हो। मैं इन दोनों में से किसी शिविर में नहीं हूं। यह लेख मेरी जाति के साथ, कैम्पस में मेरी व्यक्तिगत जीवनयात्रा के बारे में है और इस बारे में भी, कि मैंने इस यात्रा को किस तरह पूरा किया और मैं उसे कैसे देखती हूं। इस दृष्टिपात की व्यक्तिगत प्रकृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मैं जाति के संबंध में अकादमिक उद्देश्य से भी लेखन, चिंतन और सिद्धातिकरण करती रही हंू।

बंगाली भद्रलोक व भद्र महिलाओं द्वारा आमतौर पर दावा किया जाता है कि बंगाल में जाति का अस्तित्व ही नहीं है। क्या हम कभी इस राज्य में जातिगत दंगों या बलात्कारों के बारे में सुनते हैं? यहां ऐसे ब्राह्मण हैं, जिन्होंने अपना यज्ञोपवीत त्याग दिया है, जो गौमांस के शौकीन हैं और जिन्हें एक ही सिगरेट, बीड़ी या चरस को अपने अनुसूचित जाति (दलित नहीं) के साथी के साथ पीने में कोई संकोच नहीं होता। यहां ऐसे आमूल परिवर्तनवादी हैं, जो सड़क किनारे चाय के ठेलों पर घंटों अड्डा जमाते हैं, किसी अनुसूचित जाति (दलित नहीं) के व्यक्ति द्वारा बनाए गए सड़कों पर बिकने वाले खाद्य पदार्थों का जमकर मज़ा लेते हैं और जो कब-जब अपने उस अनूसूचित जाति (दलित नहीं) के सहकर्मी को वर्गदंभी बताते हुए उसका मज़ाक उड़ाते हैं, जो अपने जीवन के पहले पीटर इंग्लैंड पेंट के गंदा हो जाने के डर से धूलभरे फुटपाथ पर बैठने से हिचकिचाता है।

अगर कोई उस असली आमूल परिवर्तनवादी को जानना चाहता है, जो भद्रलोक और भद्र महिलाओं के हृदय में हमेशा वास करता है और जिसकी आग कब-जब भड़क उठती है, तो उसे अड्डों में अवश्य जाना चाहिए। अड्डे, बंगालियों के हृदय, मस्तिष्क और हां, उनके पेट का भी, प्रवेश द्वार होते हैं। अड्डों में बंगाली भद्र समाज के रूमानी, बौद्धिक व चिड़चिड़े पहलू अपनी पूरी नग्नता में देखे जा सकते हैं। यहां क्यूबा की क्रांति पर चर्चा हो सकती है और किसी जानीमानी अंग्रेज़ी साहित्यिक पत्रिका का संपादक किसी पंजाबी (अर्थात गैर-बंगाली) के होने की विदू्रपता को अभिव्यक्त किया जा सकता है। अभी-अभी खरीदे गए चार शयनकक्ष वाले फ्लैट की कीमत से लेकर मायावती के ऐश्वर्यशाली बंगले, गरमा-गरम बहस का मुद्दा बन सकते हैं।

मैं एक ऐसी बंगाली दलित हूं जिसे लंबे समय तक भद्र समाज के सदस्यों के साथ समय बिताने और उनके व्यवहार का अवलोकन करने का सौभाग्य/दुर्भाग्य मिला है। मैं उनके स्वभाव की कुछ विचित्रताओं से वाकिफ हूं। शायद आप यह सोच रहे होंगे कि मैं अड्डों और भद्र समाज के बारे में अनावश्यक बातें कर रही हूं। परंतु इन्हीं ने मेरा जातिवाद के अत्यंत घिनौने चेहरे से परिचय करवाया है। यह घिनौना चेहरा तब सामने आता है जब आपके सहपाठी और प्रोफेसर, गैर-ब्राह्मण उपनामों वाले लोगों का मज़ाक उड़ाते हैं और फिर आपकी ओर मुस्कुराकर देखते हुए, दिखावटी क्षमायाचना करते हैं; जब आरक्षित वर्ग (दलित नहीं) के विद्यार्थियों की शैक्षणिक असफलताओं का इस्तेमाल, आरक्षण को विशुद्ध बुराई बताने के लिए किया जाता है और जब आरक्षित वर्ग (दलित नहीं) के विद्यार्थियों के अंग्रेज़ी ज्ञान में कमी को, उनके अंग्रेज़ी-भाषी शिक्षक की प्रज्ञा का अपमान बताया जाता है।

जाति ने अपना सिर तब उठाया जब मैंने ऊँची जाति के एक लड़के का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह लैंगिक भेदभाव में विश्वास रखता था। मुझसे कहा गया कि उसने मुझे आसानी से इसलिए जाने दिया क्योंकि जाति पदक्रम में मैं उससे तीन पायदान नीचे थी। जाति ने तब भी सर उठाया जब मेरे दलित मित्रों ने, ऊँची जाति के छात्रों के साथ मेरी दोस्ती को विश्वासघात निरूपित किया। जब मेरा एक प्रेमी मुझे प्रेम से सहला रहा था, तब जाति मेरे मस्तिष्क पर छा गई और मेरे बिस्तर में घुस आई। जब मैं अपना पहला ब्रांडेड बैग खरीदने की खुशी में सराबोर थी या जब मैं महानगर में दस साल रहने के बावजूद 24 साल की उम्र में अपने जीवन का पहला हाॅट चाकलेट कप पीने के अपने अनुभव को याद कर रही थी, उस समय मुझे अचानक यह ख्याल आया कि मनु ने दलितों का स्वर्णाभूषण व कीमती रत्न धारण करना प्रतिबंधित किया था।

कुछ समय पूर्व, मार्क्सवादियों के शब्दों में मैं ‘उपभोक्तावादी ’ बन गई। और तब यह कहा गया कि मैं दलितों के उद्धारक के भेष में एक पाखंडी हूं। यदि अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों द्वारा अटक-अटक कर अंग्रेज़ी बोलना, कथित रूप से हमारे शिक्षकों की बौद्धिकता का मखौल बनाता था तो इस भाषा पर मेरे तुलनात्मक रूप से बेहतर (चाहे वह कितना ही अधूरा व अपर्याप्त क्यों न हो) अधिकार ने मुझे आंग्लरागी कामरेडों की निगाह में वर्गशत्रु बना दिया।

इस सबका नतीजा था एक अजीब-सी कशमकश-एक तरह का बौद्धिक, भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक लकवा। क्या मुझे अपनी दलित पहचान जाहिर करनी चाहिए? क्या मुझे दलित साहित्य पर काम करने का अधिकार है? क्या दलित व गैर-दलित विद्यार्थियों की दृष्टि में मेरे क्रमशः कथित पाखंड और विश्वासघात के बावजूद मुझे यह अधिकार है? इस कशमकश ने मुझे काफी भयाक्रांत कर दिया है। इसके कारण मैं मानसिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अलग-थलग,  तनावग्रस्त और अकेली महसूस कर रही हूं।

एक बार एक साक्षात्कार के दौरान एक प्रोफेसर साहब ने मुझसे एक अजीब सी बात कही और वह यह कि बंगाल में कोई दलित नहीं है। मैं केवल व्यंग्यपूर्वक मुस्कुरा दी और मैंने कुछ भी नहीं कहा। मेरा यह कहना है कि पश्चिम बंगाल में दलित इसलिए नहीं हैं क्योंकि  वहां दलितों को अस्तित्व में रहने ही नहीं दिया जाता। आप जातिमुक्त ब्राह्मण, बैद्य या कायस्थ हो सकते हैं। दूसरी ओर, आप ऊँची जातियों के जातिमुक्त आमूल परिवर्तनवादियों के हाथों मुक्ति का इंतजार करने वाले अछूत हो सकते हैं या आप अनुसूचित जाति के ऐसे कर्मचारी हो सकते हैं, जो सकारात्मक कार्यवाही से प्राप्त ‘विशेषाधिकार’ का लाभ उठाने के लिए सतत शर्मिंदा रहे।

जहां तक मैं समझती हूं दलित शब्द का संबंध, संबंधित व्यक्ति की गरिमा से है और उस भेदभाव व पूर्वाग्रह के इतिहास से भी, जिसका सामना उसे आज भी ऐसे स्वरूपों में करना पड़ता है जिसका भद्रलोक का माक्र्सवाद कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। शनैः-शनैः जातिप्रथा के प्रतिरोध का लंबा इतिहास भी इस शब्द के अर्थ का हिस्सा बन गया है और एक अलग पहचान का हमारा दावा-जिसमें केवल हमारा निर्धन श्रमिक वर्ग से या अछूत होना काफी नहीं है-भी अब इसके अर्थ में शामिल हैं।

जब मैं दलित के रूप में अपनी पहचान बताती हूं तो मैं एक दावा करती हूं और उस  भेदभाव व पूर्वाग्रह और उनके विरोध, दोनों की मान्यता चाहती हूं। परंतु अपनी दलित पहचान को जाहिर कर मैं अनजाने में ही उस ‘श्रम विभाजन‘ को भी चुनौती देती हूं जो पश्चिम बंगाल की संस्कृति का अभिवाज्य हिस्सा बन गया है। यह विभाजन है मुक्तिदाताओं (जिनमें शामिल हैं लेखक, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, डाक्टर, अर्थशास्त्री, ट्रेड यूनियन नेता, नक्सल नेता आदि) और दूसरी श्रेणी है उन लोगों की जो अपनी मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं (जिनमें शामिल हैं किसान, घरों और फैक्ट्रियों के श्रमिक व टैक्सी व रिक्शा चालक आदि)।

किताबों की किसी भी दुकान में चले जाईए या प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों की शिक्षकों की सूची पर नज़र डाल लीजिए या सामाजिक बदलाव के प्रति समर्पित किसी भी छोटी-मोटी पत्रिका के लेखकों पर-हर जगह आपको भट्टाचार्यों, मुखर्जियों, बोसों और दासगुप्ताओं की भरमार दिखेगी। फिर, उन हज़ारों महिलाओं और पुरूषों के उपनाम जानने का प्रयास कीजिए, जो किसी भी राजनैतिक रैली या सभा की भीड़ होते हैं या उन पुरूषों के, जो हर सुबह सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं और हमारे कचरे को उठाते हैं या उन महिलाओं के, जो भद्रलोक के घरों को साफ रखने के लिए रोज़ दूर-दूर से आती हैं।

इस संदर्भ में एक ब्राह्मण टैक्सी चालक या एक दलित व्याख्याता या (विशेषकर) सामाजिक कार्यकर्ता, आंखों की किरकिरी और नैतिक व राजनैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य होता है। यह भद्रलोक का सामंतवाद है, जिसे तोड़-मरोड़कर उस पर उनकी आमूल परिवर्तनवादी सोच का कलेवर चढ़ा दिया गया है। भद्रलोक माक्र्सवाद को एक ऐसी जाति के लोगों/भद्रलोक की आवश्यकता रहती है, जो दूसरी जाति के लोगों, छोटोलोक के मुक्तिदायक बन सकें। अगर छोटोलोक अचानक स्वयं के दलित होने का दावा करने लगें और स्वयं ही अपने मुक्तिदायक बन जाएं तो वे छोटोलोक को मुक्त करने के भद्रलोक के विशेषाधिकार को चुनौती देते हैं और निर्भरता व सत्ता और वर्चस्व और अधीनता की व्यवस्था को भी। ऐसा करके वे उस आंदोलन के इतिहास पर अपना दावा प्रस्तुत करते हैं, जिसका फोकस दलितों के अभिकर्तृत्व पर था और जो सवर्णों की उदारता और उनके आमूल परिवर्तनवादिता को संदेह की निगाह से देखता था।

दलित यदि अपनी अलग पहचान स्थापित करते हैं तो इससे मुक्तिदाता और मुक्तिकामी का जाति पदक्रम छिन्न-भिन्न हो जाता है और मुक्तिदाता की कोई उपयोगिता ही नहीं बचती। इसलिए भद्रलोक हर उस व्यक्ति को बौद्धिक व मनोवैज्ञानिक तरीकों से निशाना बनाते हैं, जो इस श्रम-विभाजन को चुनौती देता है और उसकी अपनी अलग पहचान के दावे को झुठलाते हैं। सवाल यह नहीं है कि मुझे अपने आप को दलित पहचान देना चाहिए या नहीं या मुझे इसका अधिकार है या नहीं। प्रश्न यह है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति को बौद्धिक व भावनात्मक रूप से जिस तरह अलग-थलग कर दिया जाता है, उसके चलते क्या मैं वैसा करने की हिम्मत जुटा सकती हूं। मैं एक ऐसी कशमकश में फंसी हुई हूं, जिसकी जड़ें दुनिया में अकेले रह जाने के मानवीय भय में है। मुझे बहुत प्रसन्नता होगी अगर मुझे गलत सिद्ध कर दिया जाए। मुझे बहुत अच्छा लगेगा यदि कोई अन्य बंगाली दलित, मेरी इस स्थापना का विरोध करे और एक बेहतर चित्र प्रस्तुत कर सके।
फारवर्ड प्रेस  से साभार 

अठारह साल का हुआ भारत रंग महोत्सव

 राजेश चन्द्र


( तीन सप्ताह तक चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव का कल उदघाटन हुआ , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम के नाटक मैक्वेथ से. हमारी कोशिश होगी कि स्त्रीकाल के पाठकों को रंग महोत्सव के नाटकों  की समीक्षात्मक रिपोर्ट , समीक्षा आदि पढवाते रहें. शुरुआत समकालीन रंगमंच के संपादक राजेश चंद्र की रिपोर्ट से . नाट्य महोत्सव में स्त्री निदेशकों के नाटकों अथवा नाटकों के स्त्रीवादी पाठ के साथ रपट , समीक्षाएं आमंत्रित हैं .) 

मैक्वेथ का एक दृश्य

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा प्रति वर्ष आयोजित किये जाने वाले अन्तररार्ष्ट्रीय नाट्योत्सव “भारत रंग महोत्सव” के अठारहवें संस्करण की आज विधिवत शुरुआत हो गयी. ज्ञात हो कि यह महोत्सव इस वर्ष 01 फरवरी से 21 फरवरी के बीच आयोजित हो रहा है, जिसमें भारत के अलावा लगभग 10 अन्य देशों की 80 नाट्य-प्रस्तुतियां दिखायी जायेंगी. इन प्रस्तुतियों के अलावा विभिन्न विषयों पर केद्रित सेमिनार, गोष्ठी, थियेटर बाज़ार, रंगकला से सम्बंधित वस्तुओं की प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों को भी समारोह का हिस्सा बनाया गया है.

कमानी सभागार, मंडी हाउस में 01 फरवरी की शाम के 6 बजे आयोजित भव्य उद्घाटन समारोह में सुप्रसिद्ध रंग एवं सिने अभिनेता नाना पाटेकर, अभिनेता अनुपम खेर, सुप्रसिद्ध रंग निर्देशक तथा रानावि सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम, नाट्य विद्यालय के निदेशक वामन केन्द्रे और भारत सरकार के संस्कृति सचिव एन.के. सिन्हा ने दीप जला कर समारोह का उद्घाटन किया और अपने विचार भी व्यक्त किये. आज के समारोह का मुख्य आकर्षण रहा शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक “मैकबेथ” का मणिपुरी में मंचन, जिसे रतन थियाम के निर्देशन में कोरस रेपर्टरी थियेटर, मणिपुर द्वारा प्रस्तुत किया गया.

मध्यकालीन स्कॉटलैंड के सामंती समाज के अंतर्विरोधों को सामने लाने के लिए ही शेक्सपियर ने “मैकबेथ” की रचना की है. इस नाटक में आरम्भ से लेकर अंत तक जीवन और मृत्यु का रोमांचक संघर्ष वर्णित है. भयानक अमानुषीय घात-प्रतिघातों से दर्शक द्रवित एवं उद्वेलित हो उठते हैं. इसमें जीवन के प्रति व्यंग्य भी प्रभूत मात्रा में मुखरित हुआ है.

शेक्सपियर ने अपनी असाधारण और रहस्यपूर्ण मनःस्थिति को संतुष्ट करने के लिए दो हत्यारों की अवतारणा की है और जैसा कि  साधारणतया उनकी सभी कृतियों में होता है, इन दोनों हत्यारों में विवेकपूर्ण स्पष्ट अंतर भी दर्शाया है. हत्यारा होते हुए भी एक के प्रति दर्शक की सहानुभूति उमड़ पड़ती है और दूसरे के प्रति घृणा का उद्रेक. प्रत्येक मनुष्य में जब दानवता जागृत होती है, उसकी मनुष्यता लुप्त हो जाती है, किन्तु जीवन में ऐसे भी स्थल आते हैं जहां परम क्रूर होते हुए भी वह अपनी मानवीय भावनाओं से संचालित होता है. मानव मन की गहराइयों का व्यंग्यपूर्ण अंकन “मैकबेथ” की विशेषता है.

रतन थियाम का “मैकबेथ” चरित्र-चित्रण की नवीनता, वस्त्र-भूषा तथा दृश्य-रचना के अभिनव प्रयोगों, मुद्राओं एवं अंग-संचालन के चमत्कारों, अद्भुत संगीत तथा अन्धकार और प्रकाश के जादुई उपयोग के कारण एक अति विशिष्ट प्रस्तुति का दर्ज़ा हासिल कर चुका है. अपनी इस प्रस्तुति में रतन थियाम ने मूल नाटक को यथासंभव बरक़रार रखने का प्रयास किया है, जहां मैकबेथ केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं रह जाता, बल्कि वह एक ऐसी रुग्णता का रूपक बन जाता है, जिसने आज समूची दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. उनके पात्र एक दूसरे से सीधे संबोधित होते हुए नहीं प्रतीत होते, बल्कि वे एक प्रतीक चरित्र की भांति व्यवहार करते हैं. निस्संदेह यह प्रस्तुति हर बार दर्शकों को एक सम्पूर्ण और चिरस्थायी रंग-अनुभव देने में समर्थ सिद्ध होती रही है. भारत रंग महोत्सव की इससे यादगार शुरुआत और क्या हो सकती थी?

इससे पहले उद्घाटन समारोह में अपने संबोधन में विद्यालय के निदेशक वामन केन्द्रे ने बताया कि विगत तीन वर्षों में इस महोत्सव का काफी विस्तार हुआ है और अब यह सही मायनों में एक विश्वस्तरीय महोत्सव का स्वरूप ले चुका है. इस वर्ष से यह महोत्सव भारत के चार अन्य प्रमुख शहरों- जम्मू, अहमदाबाद, भुवनेश्वर और तिरुअनंतपुरम में भी समानांतर रूप से आयोजित किया जा रहा है. उनके मुताबिक यह महोत्सव आज एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नाट्य महोत्सव बन चुका है, जो इस देश के नाट्य-प्रेमियों के लिए एक गर्व का विषय है. प्रोफ़ेसर केन्द्रे ने इस मौके पर यह भी बताया कि विद्यालय की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए सरकार शीघ्र ही इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर मान्यता देने जा रही है.

रंगकर्मियों और कला-प्रेमी दर्शकों के लिए इस समारोह में शामिल कुछ कार्यक्रम विशेष रूप से आकर्षण के केन्द्र होंगे जैसे- मास्टर क्लासेज़, लिविंग लीजेंड सीरीज और विश्व थियेटर फ़ोरम. मास्टर क्लासेज़ में जहां सर्वश्री सामिक बंदोपाध्याय, बालन नाम्बियार, चंद्रशेखर कम्बार और सुश्री जॉय माइकल रंगकला की बारीकियों पर रोशनी डालेंगी, वहीँ लिविंग लीजेंड सीरीज़ के अंतर्गत डॉ. कपिला वात्स्यायन, श्री अडूर गोपालाकृष्णन, श्रीमती सोनल मान सिंह, श्री इंदिरा पार्थसारथी, श्री जब्बार पटेल और श्री नाना पाटेकर अपने-अपने क्षेत्र से सम्बंधित अनुभव बांटेंगे.
समकालीन रंगमंच के संपदाक राजेश चन्द्र  थियेटर एक्टिविस्ट , कवि, नाट्य समीक्षक हैं . संपर्क : 9560124579

रश्मिरेखा की कविताएँ

रश्मिरेखा

एक कविता संग्रह ‘सीढ़ियों का दुःख’, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित. संपर्क : rashmirekhakavi@gmail.com

समय

एक समय वह होता है जो घड़ी बताती है
दूसरा वह जिसे  शब्दों में पकड़ लेते है
इस दुनिया के कुछ खास कवि
स्थिर हो जाता है वह समय इतिहास के बहाव में
घड़ी की टिक टिक की तरह घड़कता है लगातार
हमारी धमनियों के रक्त में
पीढ़ी दर पीढ़ी

इनसे अलग एक समय वह भी है
जो हमारे सपनो में शामिल होता है
जिसके आगोश में रहता है सारा जीवन
हमारी स्मृतियों में भी बचा रहता है वह समय
एक नमी,एक तिनका,एक शाम की उदासी
एक पगडण्डी,एक कुलाँचे भरते हिरन की तरह
स्मृतियों के आकाश में पर फैलाये उड़ते हैं
सपनों के परिन्दे तमाम उम्र

आज जब सूचनाओं को बदला जा रहा है
हमारी स्मृतियों में
शब्दों के घोसले में दुबक रहे हैं सपने
इच्छाएँ अपनी जगह तलाश रही है
अफ़रा तफ़री के इस माहौल में।
बड़ी मुश्किल से सुनाई देती है
समय की फुसफुसाहट
वे कुछ जो देख पा रहे हैं फिर भी
समय के आईने में उसका चेहरा
वे हैरान परेशांन है इस खबर से
सपने और स्मृतियाँ भी
खरीद फ़रोख़्त की वस्तुऍ हैं
और
जज़्बात बाज़ार की एक पसंदीदा चीज़

रचना का सफ़र 

समय पंख समेत उतर गया था
समुन्द्र किनारे
डूबकर हो रही थी उससे बातचीत
जहाँ पानी पर थी लगातार हवा की कारीगरी

ख़ामोशी में भीतर की दबी आवाजें
घोल रही थी खाने में नमक का स्वाद

आसमान में भरा था डब डब पानी
नम हवा के असर में थी पत्तियाँ
पक्षियों की आवाजाही के बीच
कूँची में खास रंग लिए सूरज आ गया था
बहुत पास चाँद के घर में
जहाँ बह रही थी नदी
नींद में पानी का संगीत लिए
गुफाओं में बन रहे थे गीले भीत्ति चित्र
परछाइयां भी डूबने लगी थी साथ साथ
इस जीवंत और साँस लेते संसार में
नहला रही थी तरह तरह की आवाजें
इबादत की तरह दीख रहे थे
सफ़ेद पंखों पर मचलते नीले अक्षर
शाम के रंग भींगने लगे थे
नाव रह रह कर थरथरा रही थी अथाह जल मे
मानो अपनी कविता की कुछ पंक्तियां

साभार गूगल

लुकाठी

छह सौ साल बाद
अचानक जगह जगह
सेमिनारों में मौसम कबीर हो रहा है
मेरी आँखों के आगे और स्याह होता जा रहा है अँधेरा

बुनकर बस्तियों में बेकार पड़ा है कबीर का करघा
और भारत के बाजारों में,दुकानों में
सज गए है विदेशी कपड़ों के थान
ठीक मस्जिद की बग़ल में है
मेरा किराये का मकान
लेकिन मेरे कान नहीं सुन पाते है अज़ान
मंदिर की ईमारत मैं दूर से ही  देख लेती हूँ

मुझमें नहीं बची है
बहुरिया की बेचैनी
अपने राम को पाने की

इस मौसमी बारिश की टप टप में
मुझे याद आ रही है
छह सौ साल पुरानी कबीर की वह लुकाठी
वह न होती तो शायद कबीर न होते कबीर

जैसे सभ्यता की शुरुआत हुई होगी
आग के आविष्कार से
कुछ वैसे हो मेरे लिए कविता
कबीर की लुकाठी से

वे जो दंगा फ़साद करते है
अपने पड़ोसियों का घर जलाते है
अक्सर राख के ढेर  में तब्दील कर देते है
वर्णहीन बस्तियाँ
उन्हें कैसा मालूम हो सकता है
कबीर की लुकाठी का मतलब

दूसरों का नहीं
सिर्फ अपना घर जलाने के लिए
किया था कबीर ने
जिस लुकाठी का आविष्कार

पहरुए

पहरे की सबसे ज्यादा जरुरत होती हैं
पहरुए को लोकतंत्र में

पहरुए अपने चेहरों की हिफाज़त में
इस्तेमाल करते हैं कई कई मुखौटे
प्रान्त के पहरुए से अधिक जादुई है
देश के पहरुए का नकाब

पहरे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है
पहरुए को
जब वह पिकनिक मनाता है
झरने के पास शिलाखंड पर पर बैठकर
खेलता है शतरंज
पहरुए की रखवाली करते है पहरुए
पहरे पर पहरा
लोकतंत्र मे पहरुए की हकीक़त

बचे रहें पहरुए
बिगड़ जाय भले देश का नक्शा
सभी दिशाओं में फैला है
उनके भीतर का भय
लोकतंत्र के पहरुए तेज रफ़तार से
दौड़ा रहे है कागज़ी  घोड़े
धरती पर खुले आम चल रही है ज़ंग

बाँधते हुए हवाई पुल
पहरुए फ़तह करते रहे हैं हवाई किले

छत

किराये के मकान से भी आँखें देख लेती है आकाश
देखते हुए आकाश आँखें बन जाती हैं आकाश
कई तरह की छतों के साये में एक के बाद एक
कई तरह की छतों में अपने को बदलती
अपने लिए एक अलग छत की तलाश में
जुटी रही ज़िन्दगी तमाम उम्र

एक ऐसा दरवाज़ा होता जहाँ सिर्फ़ अपनी दस्तक होती

आज कितना मुश्क़िल होता जा रहा है
इतने बड़े भूमंडल में
बचाये रखना एक कोना
जहाँ सर पर अपनी छत हो और
उस छत से उड़ान के लिए एक आसमान

याद आती है बचपन की वह छत
जहाँ ढेर सारे सपनें देखे
मीलो लंबी चहलकदमी की
चाँद से की जी भर बातें
आँगन की कैद से ली मुक्ति
जुलूस में हुए शामिल

आज अदृश्य होते जा रहे हैं वे माथे
जिसपर कई बार त्योरियाँ पड़ जाया करती थीं

क्या कभी संभव है
स्मृतियों की बस्ती में मिल पाना
बचपन का वह खोया रास्ता
जिसपर चलते हुए
सिर पर महसूस करती थी छत

धारावी

राजकुमार राकेश  

चर्चित कथाकार . चार उपन्यास और चार कहानी संग्रह . दो कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन – ‘ आपातकाल डायरी ‘ और ‘अश्वमेध’ संपर्क :7087799025

राजकुमार राकेश की यह कहानी थाने की केस डायरी में बिखरा मुम्बई के सबसे बड़े स्लम ‘ धारावी’ का जीवन  है- वह जीवन, जो नायिका समीरा की कहानी बन जाता है, जब वह ब्याह कर ‘मंडी’ की सुकून भरी जिंदगी से धारावी की एक खोली में आ बसती है . महानगरों के चकाचौंध में कुछ जिंदगियां यूं रेंगती भी हैं. 


इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने कुर्सी पर बैठे -बैठे, जरा सा पहलू बदलकर कहा, ‘हे समीरा, मला तुशचा विषयी पूर्ण सहानुभूति आहे…देखो, मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है। मगर पोलीस-फ़ोर्स में हम लोगों को कुछ कायदे-क़ानून में रहकर काम करना होता है। सो केस के हर पहलू पर पूछताछ करना हमारी ड्यूटी बनती है। और शुभा म्हात्रे की मौत का ये मामला गंभीर भी है। या तो ये आत्महत्या है या फिर सीधा सीधा क़त्ल का मामला है। इसलिए तुमसे पूछताछ करना जरुरी है। पूछताछ का मतलब किसी को दोषी करार देना नहीं होता।’

समीरा की जीभ सूख रही थी। पानी का गिलास उसके सामने था जरुर, पर जितना बार वह पानी पीने की कोशिश करने लगती उसे पानी पीने के प्रति नफरत के भाव उमड़ आने लगते। इन्स्पेक्टर की बात सुन लेने के बाद उसने गिलास को उठाया और होंठों से लगाकर जबरन दो घूँट पीने के बाद वापस इसे मेज़ पर रख दिया। ‘समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल ने कहा। ‘भ्याम्चे काही कारण नाहीं…डरने की कोई बात नहीं है। बस ये समझ लो कि बतौर इन्क़ुएरी-अफसर मुझे सच तक पहुंचना है। इसमें तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। इससे ज्यादा कुछ नहीं।’
मीरा ने जवाब दिया, ‘जो जानती हूं, वो सब मैं बता देगी। आपको जो पूछना है पूछ लो।’
‘धन्यबाद,’ इन्स्पेक्टर ने कहा। ‘समीरा, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। सबसे पहले तो तुम अपने बारे में तफसील से बताओ। ये मत सोचना मुझे तुम्हारी निजी ज़िन्दगी में कोई दिलचस्पी है, मगर उतना तो जरुर है, जितना इस केस में मुझे जानना चाहिए।

 समीरा ने जबरन सा मुस्कुराने की कोशिश की और इसमें असफल रह जाने के चलते, बिना मुस्कुराए बोलने लगी, ‘मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नहीं है जिसे छिपाया जाना जरुरी हो या जिसे बताकर ही आपको ऐसा कुछ लगे कि वाहजी, ये भी क्या ज़िन्दगी थी। ऐसा वैसा कुछ नहीं। पर अगर शुभाजी के उस ख़राब तरीके से मर जाने की तफ्तीश में इससे आपको मदद मिलती है तो मैं जरुर बताऊँगी।’ आगे वह पूरी सपाटता से बयान करने लगी और इन्स्पेक्टर शीतल ने अपने कान उसके मुंह से निकलते कथनों पर केन्द्रित किये। समीरा ने शुभा म्हात्रे की मौत से अगले दिन से शुरू किया था, जब वह काम पर चली आ रही थी और सोसाईटी के अहाते में लोगों की भीड़ थी, पर उसे रत्तीभर भी अहसास नहीं हुआ था कि यहां किसी की लाश पडी है। जब वह गेट के अन्दर आई तब दोपहर के दो बजने में अभी पांच मिनट बाकी थे। जब वह गेट से आगे निकली, तो उस भीड़ की तरफ उसका सरसरी तौर पर ध्यान जरुर गया था। आसपास पोलिस के कुछ लोग असावधान सी मुद्राओं में हलकी चहलकदमी कर रहे थे। पर उसी सरसरी सी नज़र से ये देखकर वह आगे बढ़ गई थी। किसी ने उसकी तरफ ध्यान तो नहीं दिया, पर पता नहीं क्यों अनायास उसके दिल में एक धडाका सा बैठ गया था। खुद को संयत बनाए रखने के लिए उसने इस तर्क के साथ अपने आपको तसल्ली दी कि क्योंकि आज इतवार है, तो लोगबाग जरा फुर्सत में हैं। वैसे भी उसे ऐसी कोई गरज नहीं थी कि वह संसार की गति पर ध्यान दे। उसे रोजाना की तर्ज़ पर डाक्टर म्हात्रे के घर में अपना काम निपटाना था और ठीक वक़्त पर अपने घर धारावी को लौट जाने से ज्यादा कुछ देखने सुनने की उसे जरुरत या फुर्सत नहीं थी।

वह लिफ्ट में चढ़कर आठवीं मंजिल पर आ उतरी। पर ज्यों ही उसने डाक्टर म्हात्रे के घर के द्वार की तरफ कदम बढ़ाया तो सामने महाराष्ट्र पोलिस के दो सिपाही खड़े दिखे थे। उसने पास जाकर उनसे एक ओर हटने का इशारा किया तो फीतीवाले सिपाही ने पूछा, ‘तु कोण आहेच?’ समीरा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘मैं बाई! डाक्टर म्हात्रे के इस घर में काम करती।’
फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘आज घर उघडणार नाहीं। म्हात्रेच्या बाथको हत्या केली आहे। म्हात्रे की जोरू की हत्या…तुला माहिनी नाही? तुझे पता होना चाहिये था, तू इस घर में काम करती है।’
समीरा की जीभ गले में अटक कर रह गई और होंठ अचानक सूख गए। जब तक वह खुद को संभाल पाती, उस फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘या घराला सील केले गेले आहे। पर्यंन आन मध्ये कोणी ही जाऊ वाकल नाहीं…ऐसेइच अन्दर नाहीं जाने का। सुना क्या? कोई अन्दर नहीं जा सकता है। इस घर को सील कर दिया गया है।’
कुछ पलों तक विमूढ़ सा खड़े रहने के बाद, समीरा के सिर पर जैसे अचानक कोई गाज गिर आई थी। विश्वास नहीं हो रहा था कि शुभा म्हात्रे नहीं रहीं, पर तत्काल ये ख्याल भी चला आया कि इन पोलीस वालों ने इस घर को कोई यूं ही तो सील नहीं किया होगा। जरुर कोई बड़ा कारण रहा होगा। वह भीतर तक कांप गई थी। कुछ लम्हों के बाद उसने खुद को जरा संभाला और कहा, ‘मेरे पास इस घर की चाबी है।’ पोलीस वाले ने कुछ देर तक चलने वाली सोच की अपनी मुद्रा में दिख सकने वाला व्यवधान डालते हुए, अपने हाथ में पकडे वाकी-टाकी सिस्टम पर किसी के साथ बात करना शुरू कर दिया। उधर से दूसरे आदमी की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। वह मराठी में बोल रहा था कि इस औरत से चाबी अपने कब्ज़े में लेकर फर्द बना लो और इसे फरमान दो कि जब जरुरत होगी तुम्हें बुला लिया जाएगा। याचा पता-ठिकाणा लिहून ध्या। ठीक से लिख लो इसका पूरा पता ठिकाना…जरुरत पड सकती है ! फीती-वाला द्वार से पीछे की ओर मुडा और खुले बरांडे को लांघकर, पीछे की तरफ बनी चपड़ी के पास आ गया। उसने अपने एक हाथ में पकडे वाईरलेस हैंडसेट और दूसरे में पकडे फाईल के पुलिंदे को इस चपड़ी पर रखा और अपनी छाती पर बनी जेब में से पैन निकालकर आधी गर्दन पीछे की ओर घुमाकर अपने साथी पोलीस से बोला, ‘आप्टे, वा बाईला माश्या जवळ पाठवुन दया।’ समीरा को उसके बोलने का ये अंदाज़ अच्छा नहीं लगा, आखिर क्या मतलब ये कहना ‘आप्टे, उस औरत को मेरे पास भेज,’ ये बोलने का कौन सा तरीका हुआ पर इससे पहले कि उससे कुछ कहा जाता, वह खुद ही चपड़ी के पास तक चली आई।

फीतीवाले ने चाबी उसके हाथ से लेकर चपड़ी पर रख दी और उससे उसका खुद का नाम, पति का नाम, पूरा पता बगैरह पूछा और अपने कोरे कागज़ पर चेप लिया। ‘धारावी मध्ये तुला ओल थणान्य दोन प्रौढ़ माणसांचे नाव पते लिहून ध्या…धारावी में तुम्हें जानने वाले दो व्यस्क व्यक्तियों के नाम और पते लिखवाओ।’ उसने एकदम जैसे शाही से अंदाज़ में आदेश दिया। समीरा को तत्काल कुछ नहीं सूझा कि आखिर वह किसका नाम और पता लिखवाये। ‘तिकडे तुला कोणी ओलखन नाहीं…उधर तुम्हें कोई नहीं जानता?’ जरा सी देर में उसने वापस पूछा था। एक बार फिर को समीरा असमंजस की हालत में बनी रही। लेकिन उसे समझ आ गया था कि कोई दो नाम बताये बगैर जान छूटने वाली नहीं है। उसने दिमाग पर ज़रा जोर डाला, ऐसे दो नाम कौन हो सकते हैं, तो अनायास पहला नाम जो उसे सूझा वह इशु का था। वही अपने पडौसियों का लड़का जो अक्सर अपने घर के झगड़ों से तंग आकर उसके यहां अपना रोना धोना करता रहता है और इधर ही कुछ कौर खाकर बाहर गली में पड़ा रहता है। कल शाम आया ही था। उसने उसका नाम लिया तो फीतीवाले ने कहा, ‘पूरा नाम बोलो…पूरा नाव सामा आणि याचा एड्रेस भी दया… और उसका एड्रेस भी दो।’ समीरा तो उसे ईश्वा ही बोलती थी, पूरा नाम उसे मालूम नहीं था, कभी जानने की जरुरत ही महसूस नहीं हुई थी। पर पता तो वह दे ही सकती थी। फिर उसे याद आया उस इशु के दोस्तों को उसने अक्सर कटारी-कटारी पुकारते सुना है। उसने उसका नाम इशु कटारी लिखवा दिया। पर इसके बाद दूसरे नाम पर उसे खासी मुश्किल पेश आई। एक बार को मन में आया कि उस लडकी अर्चना त्रिपाठी का नाम दे दूँ, जो कल शाम उसे धारावी कालेज के गेट के पास मिली थी, पर मन में झिझक पैदा हुई कि आखिर वह उसे जानती कहाँ है। पर दूसरा कोई नाम तत्काल याद नहीं आया तो उसने साहस बटोरकर अर्चना त्रिपाठी का ही नाम लिखवा दिया। पता अनुमान से लिखवाया। पास ही तो उसका घर था, ऐसे में अनुमान करना ज्यादा मुश्किल हुआ नहीं।

इस कारवाई के पूरा हो जाने के बाद फीतीवाले ने उसे जाने की इजाजत दे दी। वह जाने के लिए सामने लिफ्ट की तरफ मुडी तब उसके दिमाग में एक सवाल जरुर घूम रहा था कि आखिर इस पोलीसवाले ने किसी कागज पर उसके दस्खत काहे न लिए होंगे? और उसका मोबाईल नंबर भी नहीं पूछा। पर उसे ये दोनों बातें अच्छा ही लगीं। वह दस्खत लेना भूल गया, वर्ना क्या मालूम किस सांसत में जान जा फंसती। उसने एक लम्बी सी चैन की सांस ली और लिफ्ट के अन्दर चली आई। लिफ्ट जब नीचे खिसकने लगी तब उसे जैसे अनायास शुभा म्हात्रे के इस संसार में न रहने की याद वापस लौट आई, मानो अभी तक उस पुलिसिया कारवाई के दौरान उसे यह तथ्य याद ही नहीं रहा था कि वे इस संसार से जा चुकी हैं। उफ़्फ़! उसकी अगली सांस में अब बेचैनी थी। बहुत हौले क़दमों से वह सड़क के किनारे पर चलने लगी। पिछले तीन साल में मालाड के इस इलाके में ये उसके लिए पहला मौका था जब वह फुर्सत में थी। वापस घर पहुँचने की उसे कोई जल्दी नहीं थी बल्कि मुंबई की ज़िन्दगी के इन तीस सालों में ये फुर्सत शायद उसे पहली बार को मिली थी। उसने ऑटो किराए पर लेने की बजाये रेल-स्टेशन तक पैदल चल देने का मन बनाया ताकि शुभा म्हात्रे के न रहने की याद को भुलाए रखा जा सके, पर चलती बार उसे यही कौंच परेशान करने लगी कि आखिर उस औरत को इस तरह अचानक मर जाने की ऐसी क्या जरुरत आन पडी थी। पल भर के लिए उसे उसके पति डाक्टर आशाकिरण म्हात्रे पर भी शक हुआ, लेकिन इससे पहले ही कि ये शक उसके अन्दर पुख्ता हो पाता, उसने इसे जबरन बाहर झटक दिया। बाहर निकल आने के बाद उसके ज़हन में पिछले कल का दिन चला आने लगा। उसने इसे रोकने की जरुरत नहीं जानी। आखिर सिर्फ इस एक दिन में ऐसा क्या हो गया है कि शुभा महात्रे को अपनी जिन्दगी होम कर डालनी पडी।

ज्यों ही काम खत्म हुआ था, वह हाथ पोंछती हुई ड्राइंग रूम में चली आई थी, फिर इधर एक किनारे पड़ा अपना खाली झोला उठाया और घर की मालकिन शुभा महात्रे के पास आकर बोली, ‘मेम साहेब! अब मैं जाती!’ दोपहर-बाद जब समीरा इधर काम पर आई थी, तब भी शुभा यहीं सोफे पर लुढकी-सी गटकती चल रही थी| उसने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली। सात बजने में दस मिनट बाकी थे। मतलब शुभा म्हात्रे इसी हालत में पांच घंटे से ज्यादा वक़्त से थी। बीच बीच में वह कभी बडबडाने भी लगती थी, पर समीरा ने उस तरफ ज्यादा ध्यान दिया नहीं। ये मालिक लोग अपनी निजी ज़िन्दगी में क्या करते हैं, इससे उसने कभी मतलब रखा नहीं। हमेशा की तरह उसे अपना काम निपटाने की जल्दी थी। इन साहिब लोगों की ज़िन्दगी में दखल देने की उसे कोई जरुरत नहीं थी। अलबत्ता, सौजन्यवश, आज उसने अपना काम निपटाते हुए और अपने हाथ रोके-टोके बगैर उसके साथ उसकी मनपसंद किस्म की चंदेक अन्तरंग बातें जरुर की थीं। शुभा का स्वभाव अजीब अंतर्विरोधी किस्म का था। कभी वह एकदम हल्की-फुल्की होकर बहुत नज़दीकी से बातें करने लगती तो कभी एकदम रूखी होकर अचानक फट पड़ती थी। मानो उससे ज्यादा खूंखार व्यक्ति संसार में दूसरा कोई न हो| पर आज ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ था। जैसे वह खुद ही से खासी नाराज़ हो। बीच में कभी अपने दुखों को लेकर रोने लगती तो कभी अपने पति डाक्टर म्हात्रे को कोसने-धिकारने लगती, मानो वह समीरा से संवेदना पाने की दरकार कर रही हो। बीच में समीरा ने उसे दोएक बार को इतना भर जरुर टोका था कि आज आप कुछ ज्यादा पी ले रही हैं, मगर उसे मालूम था कि उसकी ऐसे किसी परामर्श का कोई फायदा होने वाला नहीं है, तो उसने ज्यादा जोर नहीं डाला। पर उसने इन पांच घंटों में अपना ये कार्यक्रम अपलक जारी रखा था। और बीच बीच में रोते चलना भी।

 यूँ समीरा के लिए यह पीना पिलवाना देखते चलना कोई ऐसा अजब गजब काम भी नहीं था, कि इसे वह पहली बार को देख रही हो। रोज़ ब रोज़, जब समीरा इधर आती है तो वे दोनों बहुधा घर पर नहीं होते। उसके पास द्वार की चाबी रहती है, आई, द्वार खोला, पांच घंटे में अपना काम निपटाया और वापस चल दी। इतवार के दिन जब आशाकिरण म्हात्रे घर पर होते हैं तब दोनों जने अक्सर इस पीने के काम में मज़े लेते और मस्त रहते हैं। आशाकिरण म्हात्रे हड्डियों के जाने-माने डाक्टर है और पवाई के हीरानंदानी स्थित एक बड़े हस्पताल में काम करते हैं। पर आज का ये दिन बहुत कुछ अलग किस्म का था। गुजरे पांच घंटों में शुभा ने एक से ज्यादा बार समीरा को अपने पास बुलाकर इस शिकायत को तूल देने की भरसक कोशिश की थी कि ‘वह’ मेरा ख्याल नहीं रखता और इतना कमीना और विश्वासघाती आदमी है, कि उसने मेरे हिस्से में सिर्फ दुःख दिए हैं। बीच में दो बार वह मुखर जुबान में ये शिकायत कर चुकी थी कि इसके साथ काम करने वाली एक डाक्टर किसी सुधा श्रीवास्तव के साथ इसके मुन्ह्काले वाले रिश्ते ‘भी’ हैं! ऐसी हर शिकायत के बाद उसकी सुबकियों का लम्बा सिलसिला चलता और फिर वापस अपनी उसी दुःख-गाथा का टेप। तो समीरा के ‘मैं अब जाती’ कहने भर की देर थी कि शुभा ने एक कडियल व भैंगी सी नजर से उसकी तरफ देखा। कुछ पलों के लिए खामोश रहने के बाद वह लडखडाती हुई रुआंसी जुबान में बोलने लगी: ‘जा! तू भी जा, लेट दैट बास्टर्ड गो! अब देखना कैसे मैं इसका घटस्पोट कर देती है! हरामी कहीं का! खुद को समझता क्या है। डुकरा कहीं का। पूरे का पूरा सूअर। इसको माफी न देने का!’
‘मेम साहेब, ऐसा खोटा न बोलने का,’ समीरा ने कहा! ‘अपने आदमी को इस माफिक बुरा क्यों बोलने का। और अब बस पीना बंद करने का। चलो मैं आपको बेडरूम में छोड़ देती।’
‘मैं इससे ज्यादा दुःख बर्दाश्त नहीं कर सकती,’ शुभा ने कहा! ‘इस बास्टर्ड को मैं ठिकाने लगाऊंगी जरुर। इसको मैं माफी नहीं दे सकती! घटस्पोट करके रहेगी! डाइवोर्स! नो अदर वे!’

समीरा ने उसे सहारा देकर उठाया और बेडरूम में लेजाकर बिस्तर पर लिटा दिया! जब वह वापस मुड़ने को थी तो शुभा ने उसे जैसे किसी करुणाजनक पुकार से वापस बुलाया और ऐसी याचना में दिखी मानो उससे न जाने का आग्रह कर रही हो! समीरा रुक गई! शुभा अब बिस्तर में पडी रुआंसे और अस्पष्ट स्वर में बोलने की कोशिश कर रही थी, ऐसा कुछ जो बहुत साफ़ सुनाई भी नहीं दे रहा था, बल्कि असल में सुनाई भी दे रहा था! ‘ब्रिंग में अ लार्ज पेग। समीरा प्लीज़। एक भरकर ला।’ वह ऐसा ही कुछ कह रही थी! समीरा ने उसे टोकना चाहा कि अब आगे पीते चले जाना ठीक नहीं रहेगा, पर वह रोने लगी थी। समीरा ने बाहर आकर गिलास भरा और उसके सिरहाने रखकर वापस मुडी। ‘मेम साहेब, मैं जाती अब, अपना ख्याल रखने का,’ उसने कहा और बाहर कदम बढाते हुए, उस वक़्त की लम्बाई के बारे में सोचने लगी जो उसे हर रोज़ धारावी तक पहुँच पाने में लगता था। वह द्वार से बाहर निकल आई और इसके जालीदार किवाड़ को बंद कर दिया। वह एक निश्चित आवाज करने के बाद औटोमैटिक ढंग से लॉक हो गया। समीरा ने एक बार को वापस इसके बंद हो जाने की तसल्ली की और सामने बेजान सी पडी लिफ्ट के द्वार पर आ गई।

पिछले तीन साल से उसके लिए मालाड़ के इस आकाश छूते भवन के इस आठ सौ दो नंबर फ्लैट से धारावी तक का ये सफर हालांकि अब एकदम अपनत्व से भरी रूटीन की तरह लगने लगा था, पर घर पहुँचने की समय-सीमा बेहद जरुरी थी। लेकिन बीच में वह खुद को जैसे तसल्ली भी देती चलती थी कि सात हजार रूपए माहवार की ये नौकरी यूं ही को नहीं मिल जाती। घर-दर-घर भटकने से तो यही अच्छी नौकरी है कि सिर्फ इसी एक घर में निभानी है! ज़िन्दगी के बहुत सारे करतब निभाने को कुछ तो खटना ही पड़ता है। बस इस घर से वापस बाहर कदम धरते ही खटाई की यह जद्दोजहद शुरु हो जाती थी। उसने दाहिने हाथ की तर्जनी से लिफट का बटन दबाया। जैसे ही उसका द्वार खुला कि वापस धारावी पहुँचने का सफर शुरू। लिफ्ट ने चंद मिनटों के बाद समीरा को धरती पर ला उतारा!

वह तेज चाल से चलती मालाड़ के इस हिस्से की मुख्य सड़क पर आ गयी, जिस तरफ चमाचम ओबरॉय माल था। बहुत सारे बेफिक्र लोग उसके अन्दर बाहर आ जा रहे थे। उसने उधर से ध्यान हटाया और ट्रैफिक की भारी भरकम चहलपहल और रेलमपेल को नजरअंदाज सा करते हुए सड़क के एक किनारे आकर, सामने जो ऑटोवाला खड़ा दिखा उसीमें चढ़कर गोरेगांव स्टेशन के लिए चल दी| पर स्टेशन के ठीक पास पहुंचकर, सीधे लोकल पकड़ने को दौड़ पड़ने की बजाए वह एक किनारे इस तरफ सजी सब्जी मार्किट के पास आकर उतर गयी और अपनी रोजाना की इस रुटीन में सब्जी-भाजी की खरीदारी के लिए चुराया जाने वाला वक़्त चुरा लिया। आज उसने एक लौकी, एक पौवाकिलो भिंडी, एक पौवा बैंगन, पांच का हरा धनिया और तीन हरी मिरच खरीदकर अपने थैले में भर ली। मोलभाव करते दो चार मिनट का वक्त ज्यादा ही लग गया होगा। पर अपने गणकों के इस्तेमाल के दौरान उसे अहसास हुआ कि आज के इस सौदे में उसने यही कोई ढाई रूपया तो जरूर ही बचा लिया होगा। इस काम को निपटाने के बाद वह तेज कदमों से लोकल की तरफ दौड़ पड़ी।

स्काईवाक के पहले पुल का जीना उसने अपने कदमों की मशीनी गति से चढ़ दिया था और स्कालईवाक पर आकर अचेतन सी भागती भीड़ को चीरती हुई खुद भी बदहवास भागने लगी। जैसे ही उसने प्लेटफार्म की तरफ उतरने वाले जीने पर कदम धरा तो याद आया कि आज के सफ़र के लिए कूपन तो पंच करना वह भूल गई है| वह उलटे पाँव उपर की तरफ लौटी, और वापस स्कातईवाक पर भागी। सामने का अगला जीना उतरकर दौडती हुई वह पंचिग मशीन तक गई, क्यू में खड़े होकर बेचैनी से अपनी बारी का इंतज़ार किया और फिर बारी आ जाने पर जितना तेजी से हो सकता था कूपन पर पंच लगाया और वापस दौड़कर, प्लेटफार्म को उतराने वाले जीने को कुछ सकिंटों में निपटाकर, सीधे प्लेटफार्म की उस जगह पर आ खड़ी हुई, जहां जनाना डिब्बे को आ रूकना था। चालीस पचास सैकिडों के बाद ट्रेन आ गई थी। हमेशा की तरह आदमियों के रेले उसके द्वारों की तरफ अचेतन से भाग खड़े हुए थे। जनाना डिब्बे में भी हाल अलग नहीं था। समीरा ने इसके साथ जुड़े सामान के डिब्बे में घुसने की कोशिश की, पर उधर भी वही अफरातफरी का आलम था। जितने लोग भीतर घुसने की हफडादफ्डी में थे, उससे ज्यादा इस रेले को अन्दर से बाहर की तरफ धकेले चले जा रहे था। कहने भर को ही सामान की ये जगह जनाना थी, जबकि उसमें से भी मर्द लोग ही ज्यादा से ज्यादा बाहर निकल रहे थे। पर गनीमत थी कि असल जनानी सवारी-डिब्बे में मर्दों ने अभी घुसने की आदत बनाई नहीं थी। पर उसमें भी सम्भ्रांत औरतों का ऐसा रेला बिल्कुल उन्हीं जाने पहचाने तौर तरीकों में, अंदर बाहर होने की कोशिशों में लगा था। सामान के केबिन में घुस लेना भी उतना आसान नहीं था। पर अपनी रोजाना की ट्रेनिंग से भीड़ के उस रेले के साथ वह अंदर आ गई। आरपार देखा तो तत्काल पता चल गया कि कहीं जरा सा पैर टिकाने की जगह मिलना भी मुश्किल है। दिन में इसमें ढोकर ले जाई गई मच्छियों के टोकरों की सुवास अभी तक बेहूदे तरीके से पसरी पड़ी थी। पर समीरा को मालूम था कि कुछ ही देर की बात है, उसके बाद ये वास ऐसी परिचित हो जाएगी कि नाक इसे सूंघना बंद कर देगा। जब तक किसी जादुई से तरीके से वह इसमें जरा सी जगह की ईजाद कर पाती तब तक गाड़ी अगले स्टेशन पर जा रूकी थी। गनीमत कि एक पोलीसवाले ने इस सामान डिब्बे में चढ़ आए मर्द यात्रियों को बाहर निकाल दिया और सवारियों का अगला रेला भीतर आने तक समीरा को दो औरतों के बीच बैठ लेने की करीब छः इंच जगह मिल गई। उसने कुछ लंबी सांसे लीं और खुद को तनिक स्थिर करके, झोले के अंदर हाथ डालकर ताजा खरीदी भाजी-तरकरी को अपनी गोद में रख लिया। फिर झोले में स्थाई रूप से वास करने वाले अपनी धार तकरीबन खो चुके खुंडे चाकू को निकाला और तरकारी को टुकड़ा टुकड़ा काटने लगी। गाड़ी और आदमियों का शोर यथावत कानों के भीतर आने की कोशिशों में जुटा था, पर कुछ सुनने की बजाये वह अपने काम में डूब गई थी। अब तक इतना तो वह जान ही चुकी थी कि ये बहरों का संसार है, जितना मर्जी शोर हो ले, किसी को किसी के बारे में सुनने या जान पाने की कतई गरज नहीं थी। जिसको जो करना हो करे। अपनी सब्जी काटे या किसी दूसरे का सिर मूंड दे, या चाहे तो गला रेत दे, कोई सरोकार नहीं। जैसे इनसे उलट सारी भलमानसहतें मण्डी  जैसे उसके छुटपन के उस छोटे से नगर के लिए सुरक्षित थीं।

समीरा को अपने मायके के उस शहर की याद आते ही भीतर मीठी छुरी जैसा कुछ खनखनाने का अहसास जैसा हुआ। वह अब जैसे कोई लौकिक शहर न होकर महज़ एक जिन्दा याद भर थी, जो जितना तेज़ी से आती थी, उतना ही अकस्मात चली भी जाती थी। ऊई, उसके मुंह से अनायास निकला। चाकू हाथ के अंगूठे में हल्का सा चीरा लगाकर गया था। ज्यादा पैना होता तो जरुर खून की तेज़ धार देकर लौटता! उसने अंगूठे को मुंह में डालकर सोखा और एक बार इसपर नज़र दौड़ाकर, वापस तरकारी को काटने लगी। अब उसके हाथ ये सोचते हुए ज्यादा तेजी से चलने लगे थे कि जब तक अंधेरी स्टेशन आये, तब तक उसे तरकारी कटकटाकर झोले में बंद कर देनी होगी। जब तक उसने अपनी कटी तरकारी समेटी तो साक्षात अंधेरी स्टेशन आ गया था। गाडी के रूकते ही वह आदमियों के तमाम रेलों को चीरती हुई, कई चढ़ाईयां-उतराईयां लांघकर बाहर की तरफ लपकी, और बस स्टॉ प की दिशा में दौड पडी थी। बस-स्टॉप पर हमेशा की तरह बहुत से लोग खड़े थे। इनमें कुछ चेहरे जाने पहचाने भी थे, जिन्हें वह रोज़ धारावी की तरफ जाते देखती थी। इंतज़ार ज़रा ज्यादा लम्बा खींचने लगा था। उसने अपने मोबाईल हैंडसैट पर टाईम देखा। धारावी जाने वाली उसकी सीधी बस तकरीबन पंद्रह बीस मिनट लेट हो गई थी। पर बेचैनी की जगह उसने अपने भीतर सांत्वना और उसके पार संयम के भाव पैदा करने की कोशिश की, पर शाम ढलने पर घर पहुँचने की जल्दी में यही कोशिश काफी मुश्किल भी लगती थी। हालांकि इतने बरसों से मुम्बई की जिंदगी में घुलमिल जाने के बाद, अब तक ऐसी किसी बात पर कम से कम बाकी कुछ हो न हो, पर बेचैनी होना बंद हो ही गया था, और इंतजार जिंदगी का स्थाई भाव बन गया था। आगे लारी किसी भी वक्त आ सकती है। पर मुम्बई की सार्वजनिक रेल और इस लारी जैसी इन तमाम सवारियों की खासियत उनका आना या जाना नहीं था, बल्कि ये थी, कि वे भले ही अपने नियत समय पर आ पहुंचें या नहीं, पर उनमें अंदर घुसने की कवायद बेहद मुश्किल होती है। इसके तईं एक खास किस्म की ट्रेनिंग की जरूरत थी। जब वह अपने पति रामसजीवन के साथ पहली बार को इधर आई थी, तब उसे इस महानगर की ये हफड़ादफड़ी अपने उस छोटे से शहर मंडी के बीचोंबीच बहती ब्यास नदी की धारा के उपर स्काईवाक करते आते उन कऊओं के किसी झुंड की तरह लगती थी, जो धरती पर खाने को दिखती किसी चीज पर जा टूट पड़ते और देखते ही देखते वापस कां कां करते उसी धारा के उपर पसरे असमान में उड़ लेते थे।

मुंबई आ चुकने के बाद उसके दिमाग में सवालों का जो जाल था, उसे साफ करने को वह रामसजीवन से एक-एक कर पूछना चाहती थी, पर कभी कुछ पूछ पाने का वक्त  मिल ही नहीं पाया था। असल में इधर आ पहुंचने के बाद उसे एक जबरदस्त मानसिक धक्का लगा था, उससे उबर पाने में ही इतना वक्त लग गया था, कि जिन्दगी के पूरे गणित को समझ पाने और थैणे-थमने का मौका मिला ही नहीं। बहुत अजीब सा भी लगता है कि ऐसे दो चार पल कभी एक बार को भी नहीं मिल सके, जिनके साये में बैठकर वह अपने इत्मीसनान में रामसजीवन से कुछ पूछ पाती। जैसे इधर आ पहुंचते ही वह खुद भी एक अपिरिचत अंधी दौड में जा शामिल हुई थी।

मुम्बई में जाकर काम करने वाले रामसजीवन की छवि मण्डी नगर में किसी फिल्मी हीरो से कमतर न थी। मुंबई चले जाने का मतलब ही हीरो हो जाना था। पूरा नगर अपने इस विश्वाीस में जी रहा था, कि किसी भी वक्त अपना रामसजीवन किसी खूबसूरत हीरोईन के साथ बारिश में नाचता गाता, उनके कृष्णा टाकीज़ या इधर कुसुम थिएटर के परदे पर दिखना शुरू हो जाएगा। जब साल में एक बार को वह इधर अपने उस शहर में आता तो लोग गर्दनें उचका उचकाकर उसे देखते रहने की कसरत किया करते थे। किसी को नहीं मालूम था और कोई मालूम करने की जरूरत भी नहीं समझता था, कि वह उधर कपड़ा बनाने वाली किसी फैक्टरी में काम करता है,  और तब के एशिया भर में सबसे बडी झोपडपटटी होने के लिए कुख्या त हो चुकी धारावी की एक दडबेनुमा पटटी में रहता है! समीरा के लिए इस धारावी की खासियत यह निकलकर आई थी कि इधर ऑटोरिक्शा  वाला कोई भी सज्जन बता देगा कि इस झोपड़पट्टी, जिसे अब तक संसार कि अपनी तरह कि सबसे बड़ी पट्टी होने के लिए कुख्यात हो जाना था, इसके अंदर अगर तीन साल को भी पैदल टहलते रहे, तब भी इसको पूरा घूम लेने का दावा नहीं किया जा सकता था। पर ऐसे तथ्यों में भी फिल्मी रोमांस की सम्भाावनाएं तलाश लेने वाले अपने मण्डीै नगर में तब तहलका मच गया था, जब ये खबर फैली कि रामसजीवन ने अपने ही मुहल्ले  के नंदू नम्बाड की बेटी समीरा से ब्यारह रचा लेना पक्का कर लिया है। इस खबर के सार्वजानिक हो जाने के बाद प्रत्येक नगरवासी ने समीरा के भाग्य को भरसक सराहा था। यही नहीं वे हसरतभरी सी निगाह से देख, सोचते थे कि क्या तो इस समीरा ने किस्मत कनैक्शन पाया है, और बस रामसजीवन से उसका ब्याेह हुआ नहीं कि सीधे फिल्मी महानगरी का उसका टिकट कटा ही जानो! क्याे मालूम कि आने वाले किसी कल में वह भी पर्दे पर सजी सजाई हीरोईन बनकर दिखने लगे। ऐसे में कौन जरा सी भी अशंका मानता कि अपना रामसजीवन उधर कपडा बनाने वाली किसी मिलसिल में चपरासगिरी या सेवादारी जैसा कुछ करता है। बल्कि ऐसा कुछ सुनकर पूरे नगर को गहरा सदमा लग जाने की पूरी पूरी सम्भाकवना थी। बहरहाल, ऐसे में समीरा को भी मुम्बई पहुंचकर धक्का लगना ही लगना था। रामसजीवन कोई फिल्मी हीरो नहीं निकला था और उससे भी बड़ा धक्का था कि वह धारावी की इस झोपड़-पट्टी का बाशिंदा था।

उस वक्त् ये पट्टी भी किराए की कोख जैसी थी। बाद में ये उनके मालिकाना हक में आ गई है जरूर, पर चार फुट की चौड़ाई वाली इस गली में तब की तुलना में आज तीन गुणा ज्यादा लोग रहने लगे हैं। पर अब तक समीरा के तईं वो सारी अजनिबयत खत्म हो गई है। तब तो यहां इतना अजनबी माहौल लगा था कि मन होता अगली गाड़ी से टिकट कटाकर वापस अपने उसी ऊंघते शहर को लौट ले। इस धारावी की तुलना में उधर अपना वह सूहड़ा मुहल्ला भी इतना साफ और मानवीय लगने लगा था, कि अगर उसे चुनने का अधिकार दिया जाता तो वह तब के बम्बई की किसी फिल्म में हीरोईन बनने की बजाए वापस अपने मंडी को लौट लेती और वहीं किसी सिलाई कढाई केंद्र बगैरह में लड़कियों को काम सिखाते हुए अपनी जिंदगी गुजार देती। पर रामसजीवन के बम्बई का जो क्रेज उसके अपने माता पिता और नाते रिश्तों , खासकर युवा तबके के लोगों में ही नहीं, बल्कि खुद उसके खोपड़े के अंदर ऐसा जा विराजा था कि धारावी की इस खोली में कदम धरते हुए जितना धक्का अन्यथा लगना चाहिए था,  उससे बहुत बहुत ज्यादा लगा था। फिर बहुत आहिस्ता चाल से एक नए किस्म की सामान्य होती जिंदगी ने उसके अन्दर आकर ग्रहण किया था। वह अपने शुरूआती सदमे से उबर आई थी और रामसजीवन की इस जिन्दगी को स्वीकार कर लिया था। धीरे- धीरे जिन्दगी ने उन्हीं शर्तों पर जीना मान लिया था।

हैरानी कि बात यह रही कि इस स्वीेकार में उसकी अपनी मंडियाली मां-बोली का काफी गहरा योगदान रहा था,  जो इधर आने से पहले तक उसे अपने आगे बढ पाने और दुनिया की भीड में कुछ अच्छा  कर गुजरने में, सबसे बड़े व्यवधान की तरह लगती थी। उसे तब ठीक से हिन्दी बोलना भी नहीं आता था, पर उसे धीरे -धीरे एक निश्चित किस्म का इत्मीनान मिलने लगा, जब उसने पाया कि उसकी वही मां-बोली एकदम मराठी के आसपास बैठती थी। हालांकि अचानक ये विश्वास मान पाना एकदम नामुमकिन भी लगता रहा था। दो ढाई हजार मील दूर उसके मंडी नगर की बोली इस मराठी से कैसे मिल सकती थी! मंडी में तो जब कृष्णा टाकीज या कुसुम थियेटर में वह अपनी सखी सहेलियों के साथ फिल्म देखने को जाया करती थी तो बम्बई के बारे में जिन मायाबी अहसासों से वह भर जाती थी, वे ही अपनी मां-बोली के इस मराठी से मिलता जुलता होने के बाद ऐसे दर्दीले तरीके से टूटे थे, कि अनायास बम्बई का ऐसा होना उसे अविश्सानीय लगने लगा था, या शायद वह खुद ही इसे ऐसा बनाए रखने में सहज महसूस कर सकती थी।

पर एक बार ‘बेस्ट’ की लाल रंग की बस में बैठे -बैठे जब वह इन दोनों बोलियों पर विचार करने लगी तो इस अहसास को बल मिला था कि मराठी उसके तईं एकदम अजनबी बोली नहीं है। मसलन उस रोज लारी की चिरंतन भारी भरकम भीड़ के बीच कंडक्टर कह रहा थाः ‘गरजू प्रवाशाला जागा द्यावी!’ उसने इस वाक्य को गौर से सुना और मन ही मन समझने का प्रयास किया था। मने असहाय यात्री को बैठने के लिए जगह दें। पहले तो उसे यही विश्वास नहीं जमा कि ये मराठी में कहा गया होगा, क्योंकि अचानक उसे लगा था,  मानो यह उसकी मंडियाली बोली में कहे गए शब्द रहे हों। वह इन्हें मुंह जुबानी दोहराने की कोशिश करने लगी। फिर उसने इन्हें उस तरीके से बोलना चाहा जिसमें इन्हें अपनी उस बोली में बोला जा सकता था। और चंद मिनटों के बाद वह हैरान रह गई कि ये तो सचमुच उसकी मंडियाली बोली में बोला गए वाक्य जैसा कुछ थाः ‘गरजू जात्रुआं जो जाघा द्योआ!’  वह इन दोनों कथनों को अपने मुंह में बारी बारी उच्चारते हुए इनमें मौजूद शब्दों की समता पर चमत्कृत होने लगी। इसी के आसपास दूसरा वाकया, जिसने उसके इस बनते विश्वाास को पुख्ता किया था, वह भी उसने उतनी ही रोचकता से सुना और समझा थाः ‘कान उघड़े आहेत का तुमचे?’  इस वाक्य का मंडियाली अनुवाद भी वैसा ही रोमांचक निकला थाः ‘कान उघड़ी रे तेरे?’ महज इन दो वाक्यों के सुनने समझने के बाद उसने मान लिया था कि उसके पूर्वज जरूर ही आक्रमणकारियों के भय से इधर मुम्बई से भागकर मंडी में जा बसे होंगे और एक दूसरे से लड़ने के लिए ब्यास नदी के किनारे अपनी मुट्ठियाँ उछालते रहे थे।

धारावी आन पहुंचने के बाद उसे कुछ रोज तक अपनी उस बोली को मराठी में आत्मसात होते देख, इस असीमित बस्ती में अपनत्व का अहसास होने लगा था। आस पड़ौस में यूपी और बिहार के भी खूब सारे भैईयों और उस सारी भीड़ के बीच मुसलमानों की घनी आबादी की संगत में रहते हुए उसने हिन्दोस्तानी बोलने का शऊर सीखा! वे सब के सब जैसे अपने अपने मुलकों की वंचनाओं से ऊबे और पशेमान होकर इधर जीविका की तलाश में चले आए लोग थे और अब तक भलीभांति जानने लगे थे कि इधर ऐसे ही रहकर जीविका चलानी होगी। तब उसे यकीन हुआ था कि हर कोई कदम धरते ही बम्बई में फिल्मी  हीरो नहीं बन सकता। नतीजन उन्हें इस जनजीवन में ही खपना था। सबसे पहले, अपना काम धंधा सीखने से भी पहले, समीरा उन्हीं में से कुछ लोगों की संगत में मुम्बामदेवी मत्थाक टेकने गई थी। और उसी दौरान बुर्का पहने औरतों की एक टोली के साथ वह हाजीअली की दरगाह पर जाकर ये भी महसूस कर चुकी है, कि असल में भगवान को मानने की विधियों में एक से दूसरे धर्म में ज्यादा फर्क नहीं है। बाद में तो कई बार ये हुआ है कि जब मन घणा उदास हो जाता और जिंदगी के संघर्ष तोड़ डालने की कगार पर आ खड़े होते, तब वह अकेले ही सुकून की तलाश में हाजीअली तक जा पहुंचती थी और अपने अंदर की पूरी श्रद्धा से मत्था टेककर लौटती। जिंदगी को परेशान कर रहे उन अनेक पलों में, उसे सचमुच वैसा ही सुकून मिलता, जितना उस छोटी काशी कहे जाने वाले अपने शहर मण्डीू के भूतनाथ मंदिर या मगवाईं मुहल्ले के गुरूद्वारा सिंह-सभा में मिला करता था।

पर जल्दीं ही उसे ये भी समझ आ गया था कि जिंदगी में घुलने मिलने का असल जरिया महज गप-गपियाना भर नहीं हो सकता था। इस नई जिंदगी में काम करने से ज्यादा उर्जा और सम्ब-ल मिल सकता था। वह भरसक समझ गई थी कि इस नये घर में सुबह से शाम तक नकारा होकर बैठे रहने से खालीपन के सिवाय कुछ नसीब होने वाला नहीं था। रामसजीवन तो सुबह रोटी से भरा टिफिन लेकर अपने काम पर निकल जाया करता था और देर रात गए टूटा बदन और खाली हुआ वही टिफिन लिए वापस आता था। ऐसे में वह अकेली इधर किस इंतजार में बैठी रहती। अपने इन भईयों की पत्नियों को उसने जब खुद को दिनरात काम में खपाते महसूस किया तो खुद का घर में ठल्ल बैठे रहना उसे और भी ज्याादा खराब लगने लगा था। उसने उन्हीं की संगत में काम ढूंढना सीखा था। शुरू में भले ही वह ये देखकर हैरान रह जाती हो कि इस मुंबई में कभी रात ही न होती थी, पर धीरे धीरे इस रात न होने में उसे कुछ भी असामान्या लगने वाली स्थिीति नहीं रही थी। काम करने की तरकीब सिर्फ टैमपास का ही जरिया नहीं थी, बल्कि अपनी नई बसी गृहस्थी की आमदनी बढ़ाने के लिए बेहद सार्थक पहल साबित हुई थी। आने वाले एकरोज जब अपनी किस्म के एकदम बेरहम तरीकों से इस महानगर की तमाम कपड़ा मिलें बंद हो गई थीं और दूसरे झटके में उन्हें दूर किसी दूसरे गुजरात नाम के प्रदेश में स्थापित करने का फरमान सुनाया गया था, तब रामसजीवन अचानक बेरोजगार हो गया था। आमची मुम्बई के उस बेहद मुश्किल दौर में समीरा को काम की इसी ट्रेनिंग ने उसके पति, एक बेटे और एक बेटी के इस परिवार की जिंदगी को अपनी रीढ पर खडे रह सकने काबिल बनाए रखा था। इतने लंबे अरसे में उसने रामसजीवन के साथ अब तक इतना कुछ इधर जी भोग लिया था,  कि अब मण्डी नगर कभी कभार को सिर्फ किसी अच्छी याद की तरह याद भर आता है। आज अगर इस मुम्बई को छोड़कर वापस मण्डीन को चले भी जाएं तो एक विकराल समस्या सामने आ खड़ी होगी। वे वहां करेंगे क्या। तमाम रिश्तेी नाते अब इतना बदल चुके हैं कि सबसे पहले वे ही उनकी किसी भी सम्भावित वापसी को ही स्वीकार नहीं करेंगे।

समीरा अपने अंदर के ऐसे तमाम निष्कर्षों तक पंहुचकर अब हैरान नहीं होती। किसी बड़े दार्शनिक के अंदाज में तो शायद नहीं,  मगर एक बेहद आम आदमी की तरह वह इसे जिंदगी के सामान्य मगर जरूरी बदलावों की तरह जरूर लेती चलती है। अपनी ही सोच में अचानक खो जाने की यह जो शैली विकसित हुई थी, ये असल में बड़े काम की थी, और अगर मुम्बई की भीड़ में उसने इसे न सीखा होता, तब तो इस महानगर की जिंदगी का हिस्सा हो पाना ही जैसे नामुमकिन बना रहा होता।

सामने से बेस्ट की बस अपने अगले मुहाने की लहरीली और लपटदार रौशनियाँ छोड़ती आती हुई दिखी। उसने अपनी ऑंखों के उपर छतरी की मुद्रा में हथेली टिकाकर बस का नम्बर पढने कि कोशिश जरुर की मगर वह उसके सही होने को लेकर किसी किस्म के संशय में नहीं थी। अपनी गति सीमा कम करती हुई ये ठीक उसके सामने आकर रुक गई थी। वह हर दूसरे रोज़ मिलने वाले इसके कंडक्टर को जानती थी। बस आ रुकी तो कंडक्टर की आवाजें पुकारने लगीं थीं…‘धारावी…धारावी…चाला धारावी…’

समीरा ने दाहिने हाथ में पकड़ा थैला अपने कंधे पर लटका लिया और लारी के प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ती भीड़ का ऐसा हिस्सा हो गई जो अपने ही धक्कों से आगे बढ़ती चलती है। वह एकदम मशीनी तरीके से खोई उसमें चढ़ी चली जा रही थी। उसके साथ यही होता था। पता ही नहीं चलता कि कब वह लारी या लोकल ट्रेन की तरफ बढ़ी और कब किसी ढलान पर बहते पानी की गति से ज्यादा तेजी से आदमियों की भीड़ का हिस्सा होकर उसके अंदर जा चढ़ी। हमेशा की तरह भीतर कदम धरने को भी जगह न थी। उसने किसी तरह पैर टिकाए और बाएं हाथ से लारी के छत के डंडे का सहारा लेकर खुद को टिकाकर जरा इत्मीनान की सांस भरी। अब कुछ ही मिनटों वक्फे के बाद वह धारावी पहुंचने वाली थी। यह वक्फा तीस पैंतीस मिनट से लेकर पचास साठ तक कुछ भी हो सकता था। पूरी निर्भरता अब आगे सड़क पर मिलने वाले टैफिक पर थी। ‘पुढी चाला, पुढी चाला,’ कंडक्टर कदम दर कदम आगे सरकता बोले चला जा रहा था। मानो कोई राबोट बोलता चल रहा हो। या जैसे कोई रिकार्ड बजता चलता है…‘तिकीट…तिकीट…बाला साहेब रुग्णालय। न बाबू, रुग्णालय के बाजू से निकल जाने का…तिकीट मावशी, तिकीट…योग्य तिकीटा शिवाय प्रवास करू नये…बोल मावशी…धारावी को जाने का…’ समीरा को टिकट पकड़ाते हुए उसने कहा, ‘बसा मावशी…’ फिर पास की एक सीट पर बैठी औरत से बोला, ‘ओ आत्या, इस मावशी को अपने बाजू में बिठा ले…रोज की सवारी है। आत्या, ई मावशी गरजू आहे…जागा द्यावी…’ पर उस औरत की स्थिति पर कोई फर्क पड़ा नहीं। जैसे उसने सुना ही न हो।

‘कोणाला फिकर आहे,’ कहते हुए समीरा ने उससे छुट्टे पैसे वापस लेते हुए, जरा सा एक ओर हटकर अपने पैरों को टिकाने के लिए छः ईंच जगह बना ली। अब वह आराम से थी। कोई बेचैनी नहीं। किसी घने जंगल में फैले उस परिचित से लगने वाले एक अज्ञात शोर के बीच पूरे का पूरा इत्मीनान आ पसरा था, जिसमें खोए रहकर समीरा अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचती चल सकती थी। पर बार बार वह अपने गुजरे हुए पर ही जा अटकती थी। अब तक तो उस पूरे वक़्त की तमाम मुसीबतों की याद भी उसे अच्छी लगने लगती थी।
अचानक झटका लगा था। कंधे पर लटका झोला सीट पर विराजे किसी सज्जकन के खोपडे से जा टकराया था और वह खुद एक तरफ आ लुढकते बची थी।

कंडक्टर का वही स्थाई टेप लगातार बजता चल रहा था…आगे चलो, पुढी चाला, चलो…गाड़ी बिंदास चल रही है…ठीक टैम पर पहुंच जाएगी…आज ट्रैफिक कम है…बसा मावशी, बसा…समीरा को हंसी आ गई। तेरे सिर पर बसूं…? पर उसने इस सवाल और हंसी दोनों को ही अपने होठों पर ही रोक लिया और अपने पैरों के तईं खड़े रहने को बनाए गए उस कोने में खामोश बनी रही। क्या इस भांजू को दिख नहीं रहा कि उसके हर आग्रह के बाबजूद न तो सामने की सीट पर बिराजी उसकी उस आत्या मने बुआ ने उसकी इस मावशी के तईं बैठ पाने को जगह बनाने की कोशिश की थी और न ही उसकी इस मावशी ने बैठ जाने का इरादा बनाया था। पुढी चाला…
ठीक आधे घंटे बाद भांजू की अगली आवाज धारावी ही थी।पुढील स्थाआनक…धारावी…धारावी…चाला मावशी। सवा आठ बज रहे थे। समीरा ने मन ही मन संतोष की सांस ली कि शुक्र है अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। कई बार तो घर पहुँचने में साढे नौ दस तक बज जाते हैं। वह भीड़ को चीरती हुई, लारी से उतरी और सड़क के आरपार नजर दौड़ा चुकने के बाद तेज कदमों से इसे लांघती, इधर कॉलेज के गेट के बाहर से उसी आवेग से निकल चली थी। गेट की बगल में गुलमोहर का एक बड़ा सा पेड़ था। वह आते जाते इसके तने के गिर्द बने सुडौल टियाले पर कुछ लड़कों को धुंआ घोटते देखती थी। बल्कि दिन की अपेक्षा शाम को ये ज्यादा इत्मीनान में दिखते थे। हालांकि उसके लिए ये देखना कोई एकदम नया अनुभव भी नहीं था, मगर कुछ दिनों से वह इन लड़कों की हरकतों के बारे में जानकर परेशान जरूर थी। उसने इतना सुना भी था कि ये लोग आती -जाती लड़कियों पर गंदी फब्तियां कसने लगे हैं। बाजवक्त तो जवान और अधेड़ तक का फर्क न करने से भी गुरेज न करते थे। पिछले कल जब ठीक इसी वक्त वह काम से लौटकर आई थी तो उनमें से किसी ने उसकी तरफ जरूर वैसा ही कोई संबोधन फैंका था, जो उसके कामकाज पर खराब टिप्पणी जैसा कुछ था। पर उसने ज्यादा गौर किया नहीं। उसे घर पहुंचने की जल्दी  थी। कौन इनसे मुंह लगाके अपना टैम खराब करता। यूं भी वय के गणित से वह उनकी मांओं के करीब बैठती थी, और उनसे ये आशा रखना कि वे अपनी मांओं पर फब्तियां कसेंगे, उसे ज्यादा अर्थवान नहीं लगा था। ये ऐसे भी शोहदे नहीं थे कि इन फब्तियों से आगे कहीं बढ़ लेते। समीरा को इनकी हरकतों से लगता था, जैसे ये नये नये सुल्फई बने हैं, और फिल्मों में दिखने वाले भाईयों जैसी हरकतें करने में मजा लेना चाहते हैं। वह तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी, जब अचानक उसके कानों में कुछ बेढब से शब्दों ने आकार लिया। अब तक खूब जोर से फैल रही उनकी हॅंसी के बीच, उसने गौर किया तो जैसे उन्होंने उसी के उपर ताना कसा थाः ‘मुम्बई आमची, बान्डी घसी तुमची’। समीरा को ये सुनना बहुत खराब लगा। अगर वह अपने घर परिवार की जीविका चलाने के तईं भांडे मांजने का काम करती भी है तो इसमें आखिर वे बुराई किस बात की ढूंढ रहे हैं, जो उनको राह चलती एक औरत पर इस तरह की सस्ती फिब्तकयां कसने की नौबत चली आई है। दूसरा कोई मौका होता तब शायद वह मन मारकर निकल भी ले सकती थी, पर आज उसने जरा कदम थामे और उनके अगले बोल के आने को सुनने का इंतजार करने लगी। सचमुच में उन्होंने बस नहीं की थी, ‘वृद्ध असो किवां जवान’…इसके साथ ही एकबार को हॅंसी का सामूहिक ठहाका गूंजा और आगे फिर को कोई नया संवाद चला आया था, ‘आलटे! अक्खा स्पेशल गावठी हन्डी आहे। बोले तो इसको जरा स्वाद लेके चखने का।’

अब समीरा खुद को रोक नहीं पाई। उसने अपने ठहरे कदमों को उधर मोडकर तेजी कर  दी और मवालियों जैसी दिखती उस महिफल की तरफ दौड पडी। पहले तो लगा कि वे सब हक्के-बक्के  हुए उसे अपनी तरफ उस वेग से आते देख तत्काल कोई फैसला न ले सकने की सी मुद्रा में बने रहे और एक दूसरे की तरफ डरी बहकी ऑंखों से ताकने लगे। तब बीच में से किसी एक ने चेताया, ’भागो’ और देखते ही देखते आने वाले अगले एक पल में वे सब अपनी एड़ियों के बल भागे। खुद को समेटते-समेंटते एकाध जरा पीछे छूट गया था। समीरा ने तेजी से दौड़ते हुए उसे ही उसकी कमीज के कॉलर से पकड लिया। उसे फंसता महसूस कर भी उसके साथियों में से किसी एक ने भी उसकी मदद पर लौट आने की कोशिश नहीं करी। जो लडका पकडा गया था, उसने वक्त  की नजाकत को भांपते हुए अपने भीतर की सारी समझदारी को बाहर निकाल लिया और घिघयाती सी आवाज में बोलने लगा, ‘मावशी, मला क्षमा करने का। बोले तो गलती हो गई। ये लडका लोग समझलेला धाकटा तरूणी जा रई है।’
‘मने जवान लडकी दिखी भर कि उसको छेडोगे,’ समीरा ने उसका कॉलर छोड दिया। ‘पौंगडे किधर के। ढपोरशंख मुए। जादे टशन न मारने का इधर आके। समझे। मी खोटे बोलत नाहीं, पण इतना तो याद रखने का जो ये ज्यादा भाईगीरी सिर पर सवार हुई पडी है, मैं निकालके रख देगी। इधर धारावी में आके ज्या‍दे मस्कारी नहीं करने का। समझे। अब फूट लो। उन सबको भी जाके येईच समझाने का।’
लड़के ने उससे गुहार लगाई, ‘मावशी, माफी देने का। भोत थकलेला।’

वह छूटते ही बेतहाशा दौड पडा। समीरा उन सबको सिर पर पांव रखे सडक किनारे भागते देखती रही, पर उसके मन में उनके तईं नफरत के बजाए सहानुभूति ही ज्यारदा पैदा होने लगी। उसे अहसास हुआ कि ये लोग अपनी उगती जवानी का बोझ उठाने को मजबूर बिचारे हैं। आने वाले कुछ क्षणों तक वह उसी जगह पर अपने कदम रोके विमूढ सी खडी रहकर उन्हेंच दूर ओझल होते देखती रही, और जब वापस चलने लगी तो उसे लगा कि उसकी चाल पहले से काफी मंद पड गई थी। मानो अचानक किसी अपिरिचत थकान ने आ घेरा हो। अभी चार कदम ही लांघे थे, कि सामने से सडक पार कर आती हुई एक जवान सी लडकी दिखी। वह उसके पास आकर बोली, ‘क्या हुआ आंटी। आज फिर से इन पोंगडों ने कोई लफडा कर दिया क्या ।’
समीरा ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, ‘खाक लफडा करने काबिल नहीं हैं ये मुअे बेबडे। एकदम डरपोक मुलगे हैं।’
लडकी भी मुस्कुराने लगी थी। कुछ कदम चल देने के बाद वह बोली, ‘आंटी, इन बेवकूफों से क्या मुंह लगाना। इधर बैठे आती -जाती लडिकयों को देख लार टपकाते रहते हैं। इनको क्या  मालूम लडकी का दिल कैसे जीता जाता है।’
समीरा ने उसकी समझदारी भरी ये बात सुनकर गर्दन घुमाई और नजर के एक कोण से उसके चेहरे का जायजा लिया। ‘अरे,’ उसने कहा। ‘तुम तो घणी शहाणी हो भई।’ आगे एकदम मजाक की मुद्रा बनाते हुए बोली, ‘कहीं धोका तो न खा चुकी हो।’
‘अरे, नहीं आंटी,’ लडकी ने जवाब दिया। ‘ऐसा वैसा कुछ नहीं। बस यूं ही बात कर रही थी। वैसे भी आप देखो जिसको प्यार करने का शऊर आता हो वह भला इस तरह किसी लडकी को परेशान करने की कोशिश करेगा। ये तो सचमुच के पोंगडे हैं। कुछ समझते नहीं।’
लडकी अपने धारावी की ही थी। अर्चना त्रिपाठी नाम था। चर्नी रोड पर किसी होटल में कौंटर गर्ल की नौकरी करती थी। आधे दिन के बाद से डियूटी शुरू होती थी तो जाहिर हुआ शाम को आने में देर होनी ही थी। पर दस बजे तक हर हाल में वह घर लौट आया करती थी। आज यही कोई आध घंटा पहले निकल आई थी। नवरातरों में इतनी सुविधा रहती थी। गेट से अंदर आकर वे दोनों चौडी गली में तकरीबन पौन मील तक साथ साथ चलती रहीं। आगे जहां से ये गली एक तीखा मोड लेती थी, लडकी ने जरा सा रूकते हुए कहा, ‘आंटी, अब विदा करते हैं, मेरा घर इधर है।’
‘एकदम पास है,’ समीरा ने कहा। ‘मेरा घर भी बस आने ही वाला है। दो मोड आगे। इतना पास रहते हुए भी कभी मिलना न हुआ था।’ कायदे से बात यहीं खत्मद हो जाती थी, पर उसने लडकी से पूछा, कि तुम्हारे घर में कौन- कौन लोग हैं और जवाब में पता चला मां है, पिता हैं, एक भाई है। मूलत तो बिहार के नालंदा जिले से हैं, पर वह और उसका छोटा भाई दोनों इधर पैदा हुए हैं। क्या हुआ कभी एकाध दो बार को उधर गांव गए हों। लडकी का घर का नाम माही निकला। समीरा को ये भी उतना ही सुंदर लगा जितना अर्चना था। उसने ऐसा कहा भी, और लडकी सुनकर मुस्कुंरा दी थी। उसके चले जाने के बाद समीरा ने अपने कदमों को एक बार फिर तेजी दी और चौडी गली के रास्ते  को पूराकर उस मुहाने पर आ गई, जिधर से अंदर जाना होता था। आगे के इस रास्ते को गली कहना तो किसी गली के होने के साथ ज्यादती थी, बल्कि ये तो किसी भलीचंगी गली को गाली देने जैसा भी हो सकता था, पर अपनी गली की तो शायरों ने भी तफसील से तारीफें की बताते हैं और समीरा ने तो जिन्दगी के तीस साल इसी तंग गली में गुजारे हैं। ये उसे क्यों कर खराब लगती भला। कदम अंदर की तरफ मोडते हुए वह सोच रही थी कि हर बार पता नहीं यही क्योंकर होता चलता है कि जिस भी चीज के बारे में उसे कम से कम सोचना चाहिए, वह असल में उसी पर ज्यादा से ज्यादा सोचती चलती है। मसलन ये गली….
दोनों तरफ एक दूसरे से सटी और होड लेती झुग्गियां थीं। उसने भी सुन रखा है कि धारावी पूरे संसार में सबसे बडी झुग्गीी कॉलोनी है। होगी। संसार भर के लोगों के लिए ये टूरिस्ट-स्पॉट जैसा कुछ भी बन गया था, पर जिस गली को वह इस वक्त  लांघ रही थी, वह दुनिया की सबसे तंग गली जरूर होगी। यही कोई चारेक फुट चौडा रास्ता , अगर गली जैसा कुछ कहलवाया जा सकने की योग्यगता रखता हो तो यही समीरा की अपनी गली थी। इसमें कितने पिरवार और कितने व्यक्ति आज तक रह लिए होंगे, इसकी मर्दमशुमारी शायद ही कभी मुमिकन हो सकी होगी। जरूरत भी क्या है। कदमों को चलाते हुए इधर आरपार लोगबाग अपने कामों में व्य स्त महसूस किये जा सकते थे। औरतें खाना पका रही होंगी, बच्चे आपस में अटखेली कर रहे होंगे, और मर्दलोग घर में निपटाने को लाए, अपने कामों के निपटान में लगे होंगे। कुछ लोग तो काम के वास्ते घर से बाहर जाते भी नहीं थे। जैसे सिलाई का काम ऐसा कुछ पेशा था कि अपनी मशीन घर के अंदर खोलके दिनरात काम चलाया जा सकता था। कितने ही घरों से अभी तक सिलाई मशीनों के चलने की आवाजें गली में आती चल रही थीं। पर समीरा के लिए तो ये रोजाना का समाज-शास्त्र था, जिसे अपने आवेग से कोई रोक न सकता था।
वह अपने घर के द्वार पर आन पहुंची, तो पलभर को उसके दिल के अंदर कम्पपन का एक जरा सा पिरिचत झोंका आया पर अगले पल वह चला भी गया। द्वार के ठीक पास पहुंचकर उसने भीतर की तरफ आवाज दी, ‘रमा! मैं आ गई हूँ।’

भीतर से लडखडाती हुई सी कोई आवाज आई। ऐसा कुछ महसूस हुआ मानो किसी एक व्यक्ति के आ जाने से किसी दूसरे को व्यक्ति को भारी हौसला मिला हो। लेकिन उस आवाज को साफ सुन पाना मुमिकन नहीं था। वह सधे कदमों से अंदर आ गई। कमरा, अगर इसे कमरा ही कहने की मजबूरी हो तो, यह बारह फुट लम्बा और दस फुट चौड़ा था। अपने बीचोंबीच बनी एक तंग गली से यह दो भागों में कटा था। बाईं तरफ एक किनारे पर एक पुरानी मेज पडी थी, जिसपर किचन का सामान धरा पडा था। उसके आगे दो ट्रंक, एक के उपर दूसरा रखे हुए थे। मेज और इन इन ट्रंकों के बीच की जगह में ऐसी चीजें मौजूद दिख रही थीं, जिनका बरसों से प्रयोग किए जाने की जैसे कभी सम्भावना बनी ही न थी। घर के अन्दर की इस गली के दांई तरफ एक उंचा सा तख्त पडा था। इसपर रामसजीवन दांए कंधें के बल लेटा था। समीरा को सामने पाकर अनायास उसकी ऑंखें चमक उठी थीं।
समीरा ने सब्जी के झोले को किचन सा कुछ लगती उस मेज के एक उपलब्ध खाली कोने में रखा और तख्त पर आ बैठ चुकने के बाद रामसजीवन के माथे पर हाथ रखकर कहा, ‘आज जरा देर हो गई। तुम्हें बुरा तो न लगा।’

रामसजीवन ने अपने दाहिने हाथ से समीरा का हाथ पकडा और अपने होठों के पास लेजाकर इसे चूमने लगा। उसे तीन साल पहले अधरंग का हमला हुआ था। बदन का बायां पक्ष बेकार हो गया था| चेहरा टेढ़ा पड गया था और जुबान जैसे हमेशा के लिए चली गयी थी। समीरा तब भी गृहस्थी चलाने के लिए काम तो करती थी, पर इस झटके के बाद उसके सिर के ऊपर जो जिम्मेवारी आ पडी थी उसे अगर भयानक न भी कहा जाए तब भी वह किसी भी व्यक्ति को तोड़कर रख देने का माद्दा तो रखती ही थी। ये वह समय था जब वे दोनों मिलकर अपने दोनों बच्चों के भविष्य को बनाने के लिए दिन रात खटते चलने से बस फारिग हुए ही थे। उन दोनों का भविष्य साथ साथ बना था। एक बेटी थी चंचला, वह ब्याह करवाकर अपने पति के साथ चली गई थी और एक बेटा था, रमेश, वो एक मुस्लिम लडकी को भगा लाया था और कुछ ही दिन बाद वे दोनों अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। बेरहम क़त्ल! मारना तो उन्हें रमेश को ही था पर लडकी उसके आगे आ खाडी हुयी थी और उससे भी पहले मारी गई थी। समीरा को उस बहू का वह मासूम चेहरा बहुत याद आता था, जिसने भरसक उसके बेटे की जिन्दगी बचाना चाही थी। आगे रामसजीवन को इस हालत में जा पडने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा था। बहुत मुमकिन है कि इससे अपने उस जवान बेटे और बहु की मौत का गम सहन न हुआ हो। लेकिन समीरा के लिए ये सिर्फ अंदाज़ भर है। ठीक – ठीक पता तो तब चलेगा जब ये पूरी तरह से ठीक हो लेगा और खुद बतायेगा कि आखिर उसे आधी जान ले चुकने वाला ये दौरा पड़ा था तो कैसे। जबकि इन वारदात से ठीक पहले वह इतना खुश दिखता था कि बात बात पर ‘अब तो आराम करूंगा’ कहते न थकता था। तब यह अधरंग आया था और उसे अपंग करके पूरी तरह से इस बिस्तसर पर आराम करने को छोड गया था।

समीरा को हैरानी होती थी कि इस आदमी ने तो उस वकत भी हार नहीं मानी थी, जब वह कपडा मिल बंद होकर गुजरात की तरफ कहीं ले जाई गई थी, जिसकी नौकरी के हौसले पर वह इधर मुम्बई आया था, और फिर समीरा को भी साथ ले आया। अपने इन दो बच्चों की आगे की जिंदगी को अच्छी दिशा देने की अपनी अंदरूनी इच्छाशिक्ती के चलते उसने गुजरात जाने से मना कर दिया था और काम में ऐसे जा जुटा कि अपनी जिंदगी की उसने कभी कोई तमीज मुकर्रर नहीं की थी। किसी काम से उसने कभी मुंह नहीं मोडा और न कभी किसी काम के बढ़िया या घटिया होने की ही शिकायत की थी। समीरा ये देखकर हैरान रह जाती थी, कि उसने हर वक्त हर काम को प्रार्थना की तरह स्वीकार किया था। उसी के बगलगीर उसने भी अपना बदन और मन झोंककर इस ग़हस्थी को एक निश्चित आधार देने में भरसक योगदान दिया था। पर रामसजीवन के रहते कभी यह नहीं बूझा कि जिन्दगी किसी आने वाले वक्तो में इस कदर कठिन भी हो सकती है। इस विपति में समीरा के इलावा दूसरा कोई मौजूद नहीं था। वह जिन अनिगनत बाधाओं से पार पाकर अपने इस आज तक आई थी, और जिनमें वह असंख्य बार टूटते -टूटते बची थी, उन्हीं से खुद को अब बेदखलकर कैसे कर लेती। यही क्या कम गनीमत थी कि वह इन तीन बरसों में न केवल खुद जिन्दा बनी रही थी बल्कि रामसजीवन को भी वापस जिंदगी में ले आई थी। वह भले ही बोल न पाता हो, पर अब तक महज किसी जिन्दा लाश की तरह भी तो नहीं था, जिसमें उसने उसे जाते हुए और फिर वापस आते हुए देखा था।

‘मैं तुमको कितना बार समझाई,’ उसने उसके माथे पर अपना हाथ टिकाये रखकर कहा। ‘ये रोने- धोने का बिल्कुल नईं। रोने का सिर्फ तब जब मैं नहीं रहेगी।’
रामसजीवन की नाक बहने लगी थी। वह सुडक-सुडक करता हुआ, इस बहाव पर काबू पाने की कोशिश करने लगा। समीरा ने आगे बढकर अपने दुप्पटे से इसे पोंछ दिया और उठ खडी हुई। पर रामसजीवन ने उसका हाथ कसकर पकड लिया। वह वापस उसके नजदीक आकर बोली, ‘भूक नईं लगी क्या । तरकारी कटी पडी है। छः मिनट में छौंक देगी। चार रोटी सेंक के फिर सोना ही है। मैं तुमको बोली न इस तरह मेरे कू दिक नईं करने का। समझा।’
रामसजीवन जब सहमति में सिर हिलाने लगा तो समीरा उठकर आई और तरकारी का झोला खोलकर इसे प्लेाट में उंडेल दिया। मेज के नीचे बर्तन-भांडों का एक खास खान्ना  था। उसे खोलकर उसने एक बदरंग सा फ्राईपैन निकाला और गैस जलाने के बाद इसे उसपर धर दिया। सामने रखी तेल की बोतल में से चंद बूंद इसमें उंडेल दीं| जब आंच पर रखा तेल तिडकने लगा तो उसने इसमें दो लंबी सूखी लाल मिर्च छोड दी! इनके काला पडते ही उसने इसमें साबुत धनिये के चंद दाने डाले। जब तक ये भूजकर काला पड जाते, वह जीरे के दानों को अपनी हथेलियों के बीच रगडती रही। धनिये के दानों के काला पड जाने के बाद उसने जीरा छोड दिया और कटी सब्जीड को तत्काेल इसमें डालकर कर्छुल से हिलाने लगी। बीच में हाथ रोककर उसने पहले चमच से हलद-बस्वार का पौडर डाला और इसके आगे अंदाज से जरा सा नमक बरूर दिया। इसे ढककर पकने के लिए छोड वह मेज के उसी निचले खान्ने  में पडे पीपे में हाथ डालकर आटा निकालने लगी, तभी अचानक बाजू वाली झुग्गी से चीखने चिल्लामने और भांडे ठलकने की आवाजें आने लगी। पर ये तो रोज का काम था। ऐसे मे इसपर समीरा की पहली प्रितिक्रया इतनी सहज थी मानो ये अगर न होता तो ज्ररूर उसे हैरानी होती। मसलन ये ऐसा ही कुछ था, ज्योंा हर शाम रोटी पकाना और खाने जैसा कुछ। उसने जैसे खुद से ही कहा था, ‘लगी गये मुअे भांडणे।’
सामने तख्तक पर रामसजीवन भी कुनमुनाया।

‘अब एकदम से भूक लग आई,’ समीरा ने उसकी तरफ नजर उठाए बगैर कहा। ‘पहले तो बांह छोडने को तैयार न था। मालूम न है रोटी पका के त्यार होती है।’ वह अस्फु‘ट सी आवाज में बोलने की असफल सी कोशिश करने लगा था। इस बीच उधर से आने वाली आवाजें ज्या दा से ज्या दा प्रखर होने लगी थीं। चाहकर भी अब वह इनसे निरपेक्ष बनी नहीं रह सकती थी। मानो ये लडाई बगल के इस परिवार का शगल जैसा कुछ था। अभी अभी जो आवाज सुनाई दी थी वह मां की आवाज थी। वह अपने बेटे को डांट रही थी। और उसका जवान बेटा चीख रहा था, ‘मला तुझी गरज नाहीं।’ जवाब में मां ने उसे गिरयाया था, ‘तुझे हमारी गरजेलेला न है, तब हमको कौन तुम्हाेरी गरज आहे। निधूण जाणे का। बाहर का रास्ता नापणे का।’
बेटा बडबडाता हुआ बाहर निकलकर गली में आ गया था। वह इशु था। जवान-साधन लडका। मां बाप को शिकायत थी कमाता धमाता कुछ है नहीं, सारा दिन अवारागर्दी करता फिरता है, चरस घोंटता है और शाम को रोटी मांग खाणे और जान परतेचणे को इधर को चला आता है। घणा जीम के फिर बापू के तख्त  पर कब्जा  करके घोडे बेचके सो लेता है। उसके बाद बूडढा बाप फिर चाहे बाहर चार फुट की गली में सोए या पूरी रात जागता रहे, उसे काहे की गरज थी। सही कह रहा है।

अब वह बाहर गली में निकलकर चीखने लगा था। उसे बिल्कुल परवाह नहीं थी कि उसकी आवाज से डरे हुए कितने सारे कुत्ते  जोर-जोर से ऐसे भौंकने लगे हैं और कि उसकी आवाज उसी में खोए चली जा रही है। पर बाकी हर ओर झुग्गियों की इस बस्तीस में सन्नाआटा पसरा रहा था या सब के सब अपने में मस्त थे! किसी को क्या पडी थी कि कोई मदद को आता। कुछ देर की चीखो-चिलाहट के बाद वह खुद ही चुप हो गया और गली में जैसे यकायक खामोशी का आलम पसर गया था। कुत्ते भी धीरे धीरे भौंकना बंद हो गए|

समीरा ने आटा गूंथ लेने के बाद गैस पर से तरकारी का पैन उतारा और तवा धर दिया। इधर से रामसजीवन ने कुछ कहा, जिसे समीरा के सिवाए संसार का कोई प्राणी समझ नहीं सकता था। ‘अरे,’ समीरा ने उसकी तरफ देखे बिना मुस्कुरा दिया और कपडे के एक साफ से पोणे से तवे को पोंछती हुई बोली, ‘मालूम है, भूक का टैम है, पण होगा तो पका के ही न।’ रामसजीवन वापस कुछ बोला, पर जब तक वह जवाब देती, इधर झुककर अंदर आ देने वाले द्वार का परदा जरा सा उठा और पहले अंदर इशु की गर्दन झांकी, फिर उसकी याचना से भरी हुई आवाज आई, ‘मावशी।’
समीरा ने मुडकर उधर देखा। ‘क्या  रे ईश्वा,’ उसने कहा। ‘काहे मस्करी करने का।’
‘मावशी।’ उसने जवाब दिया। ‘मला दो कच्चा बटाटा उधार दे दो!’
‘क्यों। रे,’ समीरा ने कहा। ‘आज की रात कच्चे आलू खाने का है।’ उसने वापस गर्दन घुमाई। ‘काहे ऐसा मस्करी को करता रे।’
इशु ने कदम अंदर धरे और कमरे की तंग गली के एक कोने में आ बैठा। ‘मावशी, मेरी गलती क्या । बोले तो नौकरी मिलती नहीं। घर आता हॅूं तो इनकी बकझक बकझक सुनने को मजबूर। जी करता है मर लेवूं।’
‘जादे हल्लाम नई न करणे का,’ समीरा ने कहा। ‘भूक लगी है तो बैठके इधरेइच ई खा लेने का है। दो रोटी जादे दे सेंक देगी मैं। पण बोला न मां बाप को क्षमा करणे का।’
‘मावशी,’ इशु ने कहा। ‘तुम मुझको इतना बार रोटी खिला दिया जो अब शर्म लगती है। पर एक रोज मैं तुमारी पूरी उधारी जरुर चुका के रख देगा, मावशी। खाली नहीं बैठा रहेगा मैं। बरोबर। पण इन लोगों को जरा देखो कैसे मुझे घर से बाहर फैंकने को बैठे हैं। ऊ ठल्लम बेधर्मी ऊंचा मुलगा इनकी जवान मुलगी को सरेआम भगाके ले गया। बरोबर क्या । उससे पाहिले वो बडे वाली उस मनालीकूल गांजे वाले के बगल में भाग ली थी। क्याक। अब बोले तो दोनों जने मला सिर पर सवारईच रहते हैं। अभी उधर ऊ बुडढी बोलती, मैं सूअर है। सूअर! डुकरा सारखा लटठ। बोले तो, इस लट्ठ को घर से बाहर ढकेलणे का। क्या मावशी, अपुन किधर से सूअर दिखने का है| एक रोज मैं भी भाग जाएगा इस घर से। अपुन की भी कोई ईज्जअत हैईचिक कि नईं। बरोबर क्याी। दो रोटी खाने का। कहींईच जाके खा लेगा। बरोबर खा लेगा।’ फिर जैसे उसे याद आ गया कि वह इधर किसलिए आया था। ‘मावशी,’ उसने कहा। ‘दो बटाटा।’

समीरा हंस दी, ‘ठहर पकड, देती मैं तेरे को दो कच्चा  पटाका। खोपडा भून के खाएगा,’ उसने फुल्का पकाकर तवे पर ठेला और कर्छुल से तरकारी को हिलाते हुए कहा।  आलू कोई फल तरकरी है जो कच्चा् चबा लेगा।’ वह जरा सा रुकी और आगे जरा गम्भीोर होकर बोली। ‘भलेमाणुस रहके काम आने का, कि बस यूं ही अपनी ये रमैण पुढे चालू ठेवणे का। कोई सुने चाहे न सुने। तुमचा कोई गरज नाहीं। बस अपनी रौ में बोले चलो। पर पेट तो भरा चाहिए न बे, ईश्वा। तभी तो न लडने का। बरोबर!’ वह वापस हंसने लगी थी।
उसकी बात सुनकर, तख्ता पर सोया पडा रामसजीवन हंसी से हिलने लगा। समीरा ने मुडकर देखा। उसकी ऑंखों में मानो कोई खुशी आकार ले रही थी और होठों पर हँसी फूट पड्ने को आतुर थी। ‘मला तुझी गरज नाहीं,’ समीरा ने तीसरे फुलके को उतारकर प्ले ट में धरते हुए कहा। ‘काहे गरज नाहीं रे। जिस मांबाप को बुढापे में तुमारी जरूरत है उसी को कहने का मुझे तुमारी जरूरत नईं है। समझकारी से काम लेने का बे ईश्वा। जांगला माणस बणने का।’
बोलते बोलते समीरा ने गैस बंद कर दी और फ्राईपैन में कडछी डालकर तरकारी निकाल फुलकों के बाजू में परोस दी। प्लेनट उठाते वक़्त उसने ईशु से कहा, ‘जरा ठहर पकड़ वे, ईश्वा, रमा को खिलाके तेरे को देती मैं रोटी। मेरे साथ बैठके खा लेना।’ प्लेट हाथ में लिए वह तख्त  के एक किनारे आ बैठी और रोटी के छोटे -छोटे कौर तोड़कर रामसजीवन को खिलाने लगी। रामसजीवन बार-बार नाक सुडकता सा लग रहा था। समीरा ने उसे डांटने के से लहजे में कहा, ‘रमा, तेरे को मैं कितना बार बोली जो रोने का नहीं, मन से खाने का है। उसके बाद मैं तेरे से खूब बात करेगी।’ रामसजीवन ने अपनी गर्दन हिलाने की भरपूर कोशिश की। तकरीबन दसेक मिनट लगे होंगे इसे निपटाने में। समीरा ने उसे वापस लिटाया और हाथ धोकर मेज़ के पास आ खडी हुई। उसने छः रोटियां बनाईं और दो प्लेटों में तरकारी परोसकर तीन तीन रोटियां उनमें रख दीं। दोनों हाथों में प्लेटें उठाये वह नीचे आ बैठी, एक प्लेट इशू के सामने धर दी और दूसरी अपने सामने रख ली। ‘शांति से खा ले वे ईश्वा,’ उसने कहा और खुद भी खाने लगी। बीच में इशू बोला, ‘मावशी, तेरे कर्जे को मैं कैसे निपटायेगा।’ समीरा ने तत्काल कुछ नहीं कहा। कुछ देर के बाद जब रमा के हिलाने का अहसास आया तो उसकी तरफ देखकर वह बोली, ‘रमा, तू इस ईश्वा की बात पर काहे हंस रहा है। ये पूरा समझकार बच्चा है। किसी का उधार खाने वाला थोड़े ही न है। क्या पता कब हमें इसकी जरुरत पड जाए।’ वह सोच रही थी कि उसकी इस बात पर वह जरुर कोई प्रतिक्रिया देगा मगर वह खामोश बना खाता रहा। कुछ नहीं बोला। थाली साफ़ हो गई तब वह बोला, ‘मावशी, दिन बदलते कोई देर थोड़े न लगती है।’ उसने दो गिलास पानी पिया और कुछ देर किसी ससोपंज में फंसा सा वहीं बैठा रहा फिर उठकर बाहर गली में चला आया। समीरा ने बर्तन समेटे, बाहर आकर उन्हें धोया और साफ़ हुए इन बर्तनों को उठाये भीतर चली आई। इन्हें एक ओर धरकर वह रमा की बगल में आ बैठी और उसके माथे को अपनी उँगलियों से सहलाने लगी। रमा शायद कुछ बोल रहा था। समीरा ने उसी का जवाब दिया, ‘बोला न फिक्र नईं करने का। सब ठीक हो जाएगा।’ वह बोलते बोलते ही लेट गई और अधनींदी हालत में बोलने की कोशिश भी करती रही। कब नींद आ गई इसका उसे कोई अंदाज़ हुआ नहीं। लेकिन जब अचानक नींद खुल गई तो उसने मोबाईल हैंडसेट में टाईम देखा। साढ़े तीन बज़ रहे थे। उसने रमा का जायजा लिया। शायद वह भी जाग रहा था, पर समीरा ने उससे बात नहीं की। कुछ देर करवटें बदलते चलने के बाद वह गाने लगी: पहर सवेला रिये$$$$$$ गईरी नी बहुए, अड़िये; ओ गईरी नी बहुए$$$$$$$$$; दिन ढलने जो आया, दिलोजान अड़िये$$$$$$$…(शाम ढलने के साथ ही चली गई थी रे बहू तू, अब सुबह होने को आ गई है पर अभी तक तू लौटकर नहीं आई, कुछ तो इस दिल पर रहम कर!) बीच में रमा का हाथ उसे टटोल रहा था। उसने इसे अपने दोनों हाथों में ले लिया और बिना खुद को रोके गाती रही।

 हर रोज़ की तरह आने वाली सुबह भी जरा इत्मीनान से गुजरी थी। काम पर उसे दोपहर बारह बजे के आसपास निकलना था और तब तक वह रमा के साथ बातें करती रही थी। बीच में उसने गली में निकलकर कपडे भी धोये थे और भीतर वापस लौटकर जब वह खाना पका रही थी, तब ईशू आया था और रुआंसी सी हालत में, जैसे अपना कोई आख़िरी फैसला सुना गया था, ‘मावशी, आज के बाद इधर नहीं आने का है। जा रहा मैं। मेरे को डुकरा सारखा लट्ठ बोलते हैं। मैं नहीं सुनने का।’ समीरा ने उसकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि हँसते हुए कहा, ‘जा अभी तो, शाम को बात करती में तेरे से।’

रमा को खाना खिलवा चुकने के बाद, वह धारावी के अपने इस घर से बारह बजकर दस मिनट पर निकली थी। लेकिन तब तक उसे किसी खराब से भी खराब सपने में गुमान नहीं रहा था कि आज का दिन इतना ख़राब गुजरेगा कि जिस घर में वह पिछले तीन साल से बिलानागा काम करती चली आ रही है उसी की मालकिन शुभा म्हात्रे की लाश वह सोसाईटी के प्रांगण में देखेगी। फ्लैट के गेट पर पोलिस को अपना नाम, पता और दो परिचित व्यक्तियों के पते नोट करवा चुकने के बाद वह चुपचाप सोसाईटी के उसी गेट से बाहर निकल आई थी। मालाड के रेल-स्टेशन तक आने में उसके भीतर ऐसी गुजरी कितनी ही बातें याद आती रहीं। कई विचार आते और वापस चले जाते। बीच में शुभा महात्रे का चेहरा याद जाता। एकाध बार को तो उसका मन रो आने का भी हुआ था। जब वह सब्जी मार्किट से गुजर रही थी तो उसने तय कर लिया कि आज वह भाजी नहीं खरीदेगी, बल्कि घर जाकर सेपू-बड़ी का मधरा तैयार कर रमा को खिलायेगी। उसे अपने शहर मंडी की ये खास डिश बहुत पसंद थी, लेकिन इसे तैयार करने के लिए जितनी फुर्सत की जरुरत रहती है, वह उसे जैसे आज ही मिल पाई थी। पिछली बार जब उसने इसे बनाया था, तो इशु बार-बार इसी बात को दोहराता रहा था कि मावशी आज तुमने उँगलियाँ चाटने को मजबूर कर दिया है। ‘ऐसी तरकारी तो मैंने आज तक चखी नहीं थी।’ समीरा के पैर के अंगूठे में जरा सी ठोकर लगी, तब उसे अहसास हुआ कि कितना जल्दी वह स्काईवाक के जीने के पास आ पहुँची थी। जबकि पहले वह वक्त को पकडे रहने की कोशिशों में बेतहाशा दौडती रहती थी और इसी अहसास में डूबी रहती कि ये उसकी पकड़ से बाहर होता चल रहा है, वहीं आज उसे इसके एकदम उल्ट अहसास हो रहा था कि इसने अपनी गति कुछ ज्यादा ही धीमी कर ली है और इससे ठीक उल्ट उसकी चाल ज्यादा तेज हो गई है। वह सीधे पंचिंग मशीन के पास गई और ये देखकर हैरान रह गई कि आज क्यू ज्यादा लम्बा नहीं था। महज तीन चार मिनट गुजरे होंगे कि उसकी बारी आ गई। इससे फारिग होकर वह अपने प्लेटफार्म पर चली आई और ज्यों ही वहां कदम धरे तो सामने से गाडी आती दिखी। आज उसने तय कर लिया था कि वह मेन जनाना डिब्बे के भीतर बैठेगी। उसे लग रहा था कि आज उसके भीतर इतनी सामर्थ्य नहीं बची है कि वह सामान रखने के उस केबिन में बैठकर सड़ी हुई मछियों की वास सूंघती रहे। और तो और आज उसे तरकारी भी नहीं काटनी थी। गाडी रुक आई तो वह उसके अन्दर चढने के इरादे से गाडी के द्वार के पास आ गई, लेकिन ये देखकर हैरान रह गई कि आज भीड़ का रेला उतना सघन नहीं था कि उसे उसके धक्के खाते हुए भीतर जाने की नौबत आती। वह इत्मीनान से चढी और सामने मौजूद एक खाली सीट पर जा बैठी। डिब्बे में कुछ कामकाजी औरतों के इलावा कॉलेज जाने वाली लड़कियां ज्यादा थीं। समीरा को हैरानी ये हुई कि जब इन लड़कियों के चहकने और महकने की उम्र है, तब ये सब एकदम गुरु-गंभीर मुद्रा में क्यों बनी हुई हैं? वे सब एक-दूसरी के बगलगीर होकर भी आपस में बात नहीं कर रही थीं। उसने इसपर अपना दिमाग लड़ाने की भरसक कोशिश की, पर उसे इस गाम्भीर्य का कोई जवाब या तर्क नहीं सूझा। अगले स्टेशन पर जितने लोग उतरे उनसे काफी कम लोग डिब्बे में चढ़े। कितना अच्छा लग रहा था कि हर किसी को सीट मिल रही थी। बस तीनेक लड़कियां सामने खड़ी दिखी थीं। समीरा ने उनमें से एक को अपने पास बैठ जाने के लिए कहा। वह जरा सा मुस्कुराकर आई और सटकर उसके पास आ बैठी।

अंधेरी स्टेशन में गाडी के रुकने पर वह हौले क़दमों से बाहर निकली। यहां भी वैसी धक्कामुक्की नहीं थी, जिसकी वह आदी थी। उसे ये देखकर कोई सुखकर अहसास नहीं हुआ। ये उसके जीवन की सामान्य गतिविधि से अलग था। वह बोझिलता से भरे हौले क़दमों से बाहर चली आई और सीधे बस-स्टॉप पर जा खडी हुई, तब ये देखकर हैरान रह गई कि तत्काल बस उसके सामने थी और वही कंडक्टर जिसे वह भान्जू कहा करती थी, धारावी…धारावी…चाला धारावी…पुकार रहा था। समीरा को देखकर उसकी नजर जरा सा खिल उठी थी, चाला मावशी, चाला…आज तो आप दिन में ही धारावी लौट चलीं हैं! समीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप बस के अन्दर आई और सामने खाली पडी सीट पर जा बैठी। थोड़ी देर बाद कंडक्टर उसके पास आया। ‘तिकत मावशी, तिकत,’ उसने कहा तो समीरा ने छुट्टे पैसे उसके हाथ में धर दिए। उसे लगा आज बस की गति सामान्य से ज्यादा तेज़ है। शायद सड़क पर ट्रैफिक कम था। ये बस ही नहीं जैसे हर चीज़ आज तेज़ चल रही थी।

‘अरे समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने जैसे अपने अन्दर की बहुत सारी खीज खुद पर ही निकालते हुए कहा। ‘रुको रुको…बहुत हो गया। इलक्या दीर्घ कथे मध्ये काही रोमांचक नाहीं…तुम्हारी इस पूरी कथा में कहीं एक बार को भी ऐसा कोई सूत्र नहीं सूझा कि आखिर शुभा म्हात्रे की मौत हुई तो कैसे और आठवीं मंजिल से गिरकर क्यों हुई। लगता है तुम बहुत भोली हो। या फिर बहुत चालाक भी हो सकती हो। ये दोनों बातें सही भी हो सकती हैं और दोनों गलत भी। पर फिलहाल इतना काफी है। बाकी जरुरत होगी तो तुमसे संपर्क कर लिया जाएगा। अब तुम जाओ। मेरा मन सोने का कर रहा है। इतनी लम्बी कथा में कहीं कोई रोमांच नहीं। ओ माय गॉड! हैव सम मर्सी ओन मी।’

 जब समीरा मालाड के पोलिस स्टेशन से बाहर निकलकर रेल-स्टेशन की तरफ़ बढ़ रही थी, तब उसे किसी हद तक ये सन्तुष्टि हो रही थी, कि पहली बार को उसे अपनी पूरी कथा बयान करने का मौका मिला था और उसने इतने कम वक़्त में इस मौके का अच्छा भला सदुपयोग कर लिया था। रोमांच बगैरह से उसका ज्यादा कुछ लेना देना नहीं था। वह इन्स्पेक्टर की अपनी समस्या थी, मगर समीरा की समस्या दूसरी थी। उसे आगे नई नौकरी तलाश करने में जुट लेना था। बल्कि आज ही इधर मालाड के इस पोलिस थाणे में तफ्तीश में शामिल होने को चलते वक़्त उसने इशु कटारी से कोई नौकरी ढूंढ निकलने के लिए कहा था। उसके इस सवाल में कोई रोमांच नहीं था और उससे ज्यादा इशु के ठन्डे जवाब में किसी रोमांच के होने की संभावना नहीं के बराबर थी। उसने ऐसा कुछ जरुर कहा था कि जब आप ही को नौकरी नहीं मिल रही तो आपके बाप को कहाँ से मिल जायेगी। पर रोमांच उसके इस जवाब में भी नहीं था। इसे आना हुआ था इस तफ्तीश के बाद के चौथे दिन में। चौथे दिन मतलब उन तमाम बयानात की दर्ज़ा-दर्जी के बाद ठीक चौथे दिन की सुबह सवा दस बजे। जब समीरा काम की तलाश में धारावी के अपने इस घर से तैयार होकर निकलने ही वाली थी। पूर्वी अंधेरी के एक फ्लैट में दो लड़के किराए पर रहते हैं, दोनों जैट एयरवेज में पायलट हैं, उन्हें खाना पकाने वाली बाई की जरुरत है, ये खबर पिछली शाम को इशु लाया था। वही स्वघोषित ‘डुकरा सारखा लट्ठ’, जो अभी तक अपने तईं नौकरी तलाश नहीं कर पाया था और एक सुबह तो कभी न लौटने की घोषणा करके गया था, मगर उसी रात वापस लौट आया था। जरा देर से ही सही। ‘मावशी, तुम्हारा मुंह देखे बिना रह नहीं सकता न इसलिए लौट आया हूं!’ उसकी ये बात सुनकर इधर रमा भी हंसने लगा था। उसीने नए संभावित रोज़गार की ये खबर समीरा को दी थी कि उन लड़कों को खाना पकाने के लिए बाई…

समीरा बस कुछ पलों में निकलने ही वाली थी। उसने हमेशा की तरह रमा का मुंह चूमा और जल्दी लौट आने का वायदा कर द्वार की तरफ कदम बढाए ही थे कि बाहर से इशु की मरिअल सी आवाज़ आई, ‘ओ मावशी, पोलीस…’
समीरा के पांव जरा सा ठिठके पर तत्काल संभल जाने के बाद वह बाहर निकल आई। इशु के पीछे कुछ बाबर्दी पोलिस वालों के बीच इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर खडी थी। ‘मावशी…,’ इशु ने कहा, लेकिन उसकी इस मंद सी निकलती आवाज़ को शीतल बर्नेकर की रौबीली पुलिसिया आवाज़ ने तत्काल दबा दिया, ‘समीरा, पोलिस को तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है। वारंट है हमारे पास।’ समीरा की जीभ यकायक सूख गई। उसे अपना ज़हन एकदम बंजर रेगिस्तान होता हुआ सा लगा, जिसमें से सोच की नमी गायब थी और सवाल उगना अचानक बंद हो गये थे। कुछ पलों की खामोशी के बाद दो कदम आगे बढ़ते हुए, शीतल बर्नेकर ने कहा, ‘पूरा मामला तुम्हें पता है। शुभा म्हात्रे की मौत की तफ्तीश इस मुकाम पर आ पहुँची है। इससे पहले कि तुमसे अगली पूछताछ की जाए हमें उसकी लाश के पैर की एक उंगली से गायब जोडवा ढूंढ निकालना है। जोडवा बोले तो बिछवा। उसके दोनों पैरों में दो जोड़ी बिछ्वे थे। डेढ़ जोड़ी उँगलियों में पाए गए। बस, आधा जोड़ी गायब है। मने एक बिछवा गायब है। उसके मिलने की देरी है कि तफ्तीश पूरी हुई जानो। इसी से उसकी मौत का राज़ खुल जाएगा। तुम यह भी जान लो कि उसके बदन पर बहुत सारे गहने थे। सिर से लेके पाँव तक। पर बाकी हर चीज महफूज पाई गई सिर्फ वह बिछवा गायब है। अगर तुम उसे हमारे हवाले कर दो तो फिर तुम्हारे घर की तलाशी की जरुरत नहीं रहेगी।’

 इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर के इस एक कथन के बाद, जो काफी हद तक धमकी जैसा कुछ होने का अहसास दे रहा था, कहानी की अपनी विधागत जरूरतों के आगे समीरा की यह कथा कभी न खत्म होने के लिए चल निकलती है और बहुत संभव है कि इसका अंत उसकी ज़िन्दगी के निपट चुकने के बाद ही हो पाये। लेकिन उसका इंतज़ार करने की हिम्मत किस कथाकार में होगी? आखिर किसी व्यक्ति की पूरी जिन्दगी को कोई कथाकार कैसे किसी एक विधा की सीमाओं में समेट सकता है? कम से कम मेरी अपनी हिम्मत तो बिल्कुल नहीं है जिसकी आप दाद दे सकें। अलबता कुछ फन्तासियां जरुर हैं जिन्हें उधृत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं और अगर उन्हें आपके साथ शेयर न करूँ तो कहानी की बात तो खैर जाने दीजिये, ये आप सबके साथ ज्यादती होगी, जिन्होंने इतना देर तक इस कहानी को सुनने में अपने कीमती वक़्त को बर्बाद किया है। उस रोज़ समीरा के घर की तलाशी में पूरे घर के धुर्रे बिखर चुकने के बाद और अंतत उसके गिरफ्तार हो चुकने पर रमा अपने तख़्त पर पड़ा रोता रहा था। बाहर जो भीड़ लगी थी, उसमें बहुत सारे लोग थे, लेकिन जो दो व्यक्ति सर्वाधिक सक्रिय थे उनमें एक तो इशु कटारी ही था और दूसरी थी वह लडकी अर्चना त्रिपाठी, जिससे समीरा की दोएक मुलाकातें हुई थीं, और वह भी उसके लिए नौकरी तलाश करने में मदद कर रही थी। अर्चना त्रिपाठी ने शीतल बर्नेकर से कुछ तीखे सवाल पूछे थे लेकिन जवाब में उसे धमकी जैसा कुछ मिला था कि अगर कानून के काम में अड़चन डालोगी तो भुगतान भी बहुत खराब करना पड़ेगा। पर अर्चना त्रिपाठी ने डरने के बजाये अपना वकील लेकर उनसे अदालत में मिलने का इरादा ज़ाहिर किया था। जब पोलीस समीरा को लेकर चली गई और कुछ देर की चेहमेगोईयों के बाद वापस धारावी की इस गली में सन्नाटा पसर आया तो इशु कटारी जैसे नींद से जागा था। वह समीरा के घर के अन्दर गया और रामसजीवन के पास जा बैठा और उसके सिर पर हाथ रखकर सहलाने लगा। अगले तीन दिन तक टीवी पर शुभा म्हात्रे के क़त्ल के समाचार अनवरत प्रसारित होते रहे थे। हर चैनल पर जो एक बात सांझा थी, उसमें कहा जा रहा था कि पोलीस द्वारा इस हत्याकांड की गुथी सुलझा ली गई है, तथा पोलिस को क़त्ल की गई महिला के दाहिने पैर से गायब एक बिछ्वे की तलाश है। चौथे दिन जब समीरा का पोलीस रिमांड ख़त्म होना था, तब टीवी चैनलों पर खबर आई थी कि समीरा नाम की कातिल महिला ने शुभा म्हात्रे का क़त्ल करने का जुर्म स्वीकार कर लिया है।
पक्षधर से साभार 

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट 


‘रेमो’  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा ‘अन्ना केरेनिना’ अपना प्यार ढूंढने आई है…

पुराना घर, ढेर सारी पुरानी परम्पराओं  (गोवा  और पुर्तगीज)  को अपने आप मे समेटे हुए. बड़े-बड़े कमरे, ऊँची-ऊँची दीवारें, खुला आँगन….आँगन क्या जैसे एक बड़ा सा बागीचा. जिसमे आम, चीकू, केले और नारियल के पेड़ जिसमे बैठने के लिये लकड़ी की बेंच…..

2004 में पहली बार गोवा जाना हुआ. पहली बार दिल्ली की बजाय गोवा में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल शुरू हुआ. गीता (गीताश्री) और मैं गोवा गये. पूरा प्लान गीता का ही था.  (हालांकि राजेंद्र यादव ने तंज किया था – ‘साली तुमदोनों लेस्बियन हो क्या? कोई दो लड़कियाँ साथ में गोवा जाती है????)

रेमो फर्नांडिस और असीमा भट्ट

मुझे समंदर बहुत आकर्षित करता रहा है… गोवा का नाम सुनते ही खुला समुन्द्र, नावें,नाविक, मछुयारे….घने नारियल के झुरमुट….काजू और बादाम के पेड़ कितना कुछ… हालाँकि जैसे ही गीता ने बताया की हम गोवा चलेंगे…. मेरे अंदर से  वो गाना गूंजने लगा- ‘समन्दर , समन्दर! यहाँ से वहां तक, यह मौजो की चादर बीछी आस्मा तक……..’ बच्चे की तरह उत्सुकता थी मेरे भीतर. बहुत सी कल्पनाएं मेरे मन में खेल, खेल रही थी.
दिल्ली निजामुद्दीन से गोवा जाने वाली ‘राजधानी’ में हम जैसे ही बैठे की सामने की सीट पर बहुत प्यारी सी महिला अपने दो बच्चों के साथ सफर कर रही थी. वो  गोवन थी. पूछने पर बताया कि वो  देहरादून अपनी बहन के पास आई थी. उनका नाम था मारिया (गीता आज भी मारिया के लिये गाती है- (ओ मारिया, ओ मारिया..)और बच्चे वरुण और वियोला.  हम एक पल में इतने अच्छे दोस्त बन गए कि लगा हम सब एक परिवार हों और एक ही साथ यात्रा कर रहे हों. मारिया के पहचान के एक और दोस्त हमारे साथ थे-  एडवोकेट प्रसाद. पति-पत्नी दोनों गोवा के जाने माने एडवोकेट हैं.

इतने प्यार से हँसते-खेलते दिल्ली से गोवा तक का लम्बा सफर कब कट गया पता ही नहीं चला. गोवा स्टेशन पंहुचते ही मारिया और उनके बच्चे जिद्द करने लगे कि आपलोग हमारे साथ घर चलो. लेकिन हमारी होटल की बुकिंग दिल्ली से ही हो रखी थी.. इसलिए हम होटल गये… होटल भी हमें मारिया ने हो छोड़ा और रस्ते में एक बड़े खूबसूरत से बीच रेस्टोरेंट पर हमें ‘गोवन सी’ फ़ूड खिलाया. होटल छोडते वक्त तय हुआ कि शाम को हम सब क्रूज (वोट) पर मिलेंगे जहाँ संध्याकालीन संगीत का आयोजन होता है..सेलानियो को क्रूज बेहद पसंद है. हलके-फुल्के स्नेक्स के साथ थोड़ी शराब, नाच-गाना और मस्ती. बीच समन्दर में तैरते जहाज़ पर बड़ा ही मज़ा आता है…

रेमो फर्नांडिस

अगले दिन से फिल्म फेस्टिवल शुरू हो गया. गीता-मै उसी में व्यस्त हो गये.…मेरे लिये यह सब बड़ा ही अनोखा था क्यूंकि मेरा पहला अनुभव था… गीता को आफिस (आउटलुक) के काम से वापस जल्दी दिल्ली लौटना पड़ा और मै जबतक फेस्टिवल था,  तब तक  मारिया के घर पर ठहर गई… इतने कम जान-पहचान में शायाद ही कोई मित्र इतना करीबी होता है. लेकिन मै बता दूं कि मारिया आज भी हमारी मित्र हैं. और उनके प्यार और अपनेपन की वजह से गोवा हमेशा अपना घर  लगता है.. मारिया, खासकर मुझे हसेशा कहती है- ‘Sweetheart, this is your house. you can come any time.  Door will be open for you always.’

एक दिन मारिया से कुछ बातें हो रही थी कि अचानक ना जाने कहाँ से ‘रेमो’ की चर्चा आ गई…(वही रेमो फर्नांडिस जो-  ‘प्यार तो होना ही था और  हम्मा, हम्मा! हम्मा-हम्मा, हम्मा…’  गाने के लिये मशहुर रह चुके हैं) जैसे मेरी  नसें फडक उठी… मैंने उत्साह से  चिल्लाते हुए मारिया से पुछा- ‘ तुम रेमो को जानती हो? क्या रेमो यहाँ रहते हैं ? मुझे लगा था की सारे singer की तरह वो भी मुम्बई रहते होंगे. ‘ वो बोली-  ‘Yes,  He is my neighbour  only.
क्या? मुझे उससे मिलना है.
बात वहीँ खत्म हो गई.  शाम को मारिया अचानक गाड़ी में बिठा कर एक घर में ले आई. मैंने पूछा – किसका घर है. वो बोली -रेमो का.
क्या?
हाँ!
हम अंदर गये. एक बुजुर्ग महिला बाहर निकली. महिला ने बड़े प्यार से अभीवादन किया.
मारिया ने  मुझे बताया कि वो रेमो कि माँ है और उनसे  गोवन में पूछा- ‘रेमो घर में है? यह मेरी फ्रेंड दिल्ली से आयी है, रेमो की फैन है.’
उनकी माँ ने कहा कि – ‘रेमो तो आजकल गाँव (सियोल्म, गोवा से सटे गांव)  में रहता है.’
यह सुन कर मेरा दिल बैठ गया.
वहाँ से बाहर निकले और मारिया की गाड़ी दौड़ पड़ी सियोल्म की तरफ… मैंने पूछा – बहुत दूर होगा…
मारिया बोली – So what? you are my dear friend.
रस्ते भर एक अजीब सा रोमांच था… गोवा की पतली सड़के, दोनों तरफ नारियल के पेड़ और समुन्द्र का किनारा…और ऊपर से शाम का समय…..चिड़ियों का कलरव….
मारिया बार-बार गाडी रोक कर गांव वालों से पूछती- ‘रेमो च घर? यानी रेमो का घर’
लोग बताये बस थोड़ा सा आगे… इस तरह जब हम रेमो के  घर के करीब पंहुचे तो मारिया एकदम से बोली- ‘Asmi (यह नाम उसी का दिया हुआ है), Have some gift for Remo and put some lipstick . you will look beautiful and Remo wil like it.’

घर पंहुचे तो एक नौकरानी ने आकर हमारा स्वागत किया और बड़े से बरामदे से होते हुए वो हमें आंगन में बिठाकर यह कहके चली गई कि सर रिहर्सल कर रहे हैं. दरअसल रेमो को गोवा फिल्म फेस्टिवल के समापन पर एक खास संगीत परफॉर्म  करना था जिसके लिये वो खास धुन तैयार कर रहे थे.

बगीचा बहुत ही रूमानी था… किसी प्रेमी जोड़े के लिये तो परफेक्ट. थोड़ी देर बाद रेमो आये… ‘हाथ मिलते हुए कहा– मै किसी से मिलना पसंद नहीं करता इसीलिये शहर और शोर-शराबे से दूर यहाँ गांव में रहता हूँ,… लेकिन माँ का फोन आया कि आप मुझसे मिलना चाहती है इसलिए मना नहीं कर सका….’   अजीब लगा. मै क्या कह्ती समझ नही पा रही थी. अचानक मेरे मुंह से निकल गया – ‘मै जर्नलिस्ट हूँ, और मैंने सुना कि आप गोवा फिल्म फेस्टिवल कोलोसिंग सेरेमनी के लिये खास धुन तैयार कर रहे हैं इसलिए हम आपसे बात करने आ गये.’

असीमा भट्ट

बेरुखी के साथ कहा- ‘मै जर्नलिस्ट से नहीं मिलता. वो कुछ का कुछ छाप देते हैं.  they are edits they do gossip only.”
मै तो डर ही गई… बोलने को कुछ बाकी नहीं रहा.
फिर रेमो मारिया से बातें करने लगे. नौकरानी से चाय लाने को कहा…
बड़े सलीके से नौकरानी एक सुंदर से ट्रे में चाय ले आई.. साथ ही कुछ बिस्किट और नमकीन.
बड़े आदर के साथ रेमो हमारी चाय बनाने लगे.  चाय बनाते हुए पूछा – ‘शूगर या हनी… मै तो हनी लेता हूँ….’
मैंने पूछा – हनी क्यूँ?
मुस्कुराकर बोले- ‘Because its honey… Honey is Honey.

चाय पीते हुए वो थोड़े सहज हो गये या कह सकती हूँ कि मै सहज हो गई… मैंने बताया कि मै कल ही जा रही हूँ क्यूंकि मेरे वापसी का रिजर्वेशन कल का ही है. क्लोसिंग सेरेमनी तक नहीं रुक पाऊँगी.
रेमो बोले- ‘So sad, my bad luck. you are pretty woman, I could sing for you.
जब हम चलने लगे तो रेमो ने कहा – ‘Take my email id and send me your questions, I will answer your question… and please remember do not change in my answer.’
मैंने उन्हें भरोसा दिलाते हुए कहा – इत्मीनान रहें.

मै दिल्ली आ गई.  उन दिनों एक ओल्ड ऐज होम के लिये कांसिलिंग का काम करती थी. मिस्टर आर.कुमार (विद्द्वान डॉ धीरेन्द्र वर्मा के बेटे और रिटायार  उच्य लेखा अधिकारी).  और डॉ नरेन की मदद से.  आर . कुमार को मै दादा बुलाती थी.. उनसे मिले काफी दिन हो गये थे, इसलिए गोवा से आते ही उनका फोन आया कि कहाँ हो और तुम्हारा गोवा ट्रिप कैसा रहा, शाम को मिलो तो पूरा डीटेल्स सुनेगे.

नोयडा के जिमखाना (फेमस क्लब) में मिले.. गोवा की एक-एक  बातें  बच्चे की तरह उत्साहित होकर दादा को सुना रही थी कि अचानक मेरा फोन बजा देखा तो मारिया का फोन था… फोन उठाते ही उत्तेजना में डूबी मारिया की आवाज़ ज़ोर-ज़ोर से मुझसे कह रही थी- “Asmi, Asmi,   ‘Dear, can you hear this, I’m so happy and excited for you, Remo is singing for you. He said in front of all crowds – this song is for that lovely girl who came all the way from Delhi to Goa to see me. I’m dedicating this song to that beautiful lady.’

फोन पे शोर के अलावा मुझे कुछ भी सुनाई नहीं दे पा रहा था लेकिन मारिया की चहकती खुशी बहुत कुछ बयान कर रही थी…उसी रात को लौट कर मैंने रेमो को अपने प्रश्न इमेल किये… अगले ही दिन उनका जवाब आ गया…मेरी मुश्किल और बढ़ गई. क्यूंकि मैंने तो झूठ बोला था कि मै प्रेस से हूँ और आपका इंटरभिउ छापूंगी… क्योंकि  मै तब किसी भी पेपर या मैगजिन से नहीं जुडी थी…खैर! मेरे मित्र अभिजीत सिन्हा तब “सहारा टाइम्स” में काम करते थे. उन्हें बाताया तो   उन्होंने फ़ौरन मुझे वह इंटरव्यू ईमेल करने को कहा. मैंने  ईमेल कर दिया और एक जनवरी 2005 को  वो छपी… ऐसा नहीं कि इससे पहले मेरे आर्टिकल नहीं छपे लेकिन ‘रेमो’ के आर्टिकल  से जो खुशी मुझे मिली … उसके लिये शब्द नहीं हैं..वो आर्टिकल मैंने मारिया और रेमो दोनों को भेजा….

गोविंदा के साथ असीमा

एक शाम अचानक मेरे पास फोन आया कि “तुम कहाँ हो, मै दिल्ली में हूँ.”  मैंने पूछा- कौन? वो बोले – ‘रेमो’.
मुझे यकीन नहीं हुआ. वो बोले- ‘दिल्ली में कोई जिमखाना क्लब (वही जगह , जहाँ मै दादा के साथ बैठी थी और मारिया ने मुझे रेमो के गीत सुनाने की कोशिश की थी) है,,, वहाँ मेरा ‘शो’ है… तुम आओगी.?
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था.

उस शाम मै उनकी खास मेहमान थी... रेमो गा रहे थे… नाच रहे थे… और वो सब जैसे मेरे लिये….मै उस रात दुनिया की सबसे खूबसूरत और खुबनसीब औरत थी… खुले आसमान के नीचे,,, तारों  भरी रातों में हवा में एक मदहोशी भरी महक  थी… उस रात जैसे मुझे और कुछ नहीं चाहिए था..

रात के दो बजे तक शो चला. शो के बाद हमने साथ डिनर किया … एक बहुत अच्छे मेजवान की तरह रेमो ने  मेरा का ख्याल रखा… कितनी-कितनी बातें…. उनकी बातों से लग रहा रहा था कि  वो अपनी माँ से सबसे ज्यादा करीब हैं, बात-बात पर माँ का ज़िक्र ले आते, अचानक मैंने उनसे पूछा being a singer which is your favourite song?   He smiled and said- ” I always like romantic song, my favourite song is – ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा… ‘  बातों -बातों में  कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला.. सुबह ८ बजे की उनकी flight थी. उन्हें एअरपोर्ट छोड़ा और घर आ गई. कुछ ही देर में उनका मैसेज आया- ‘I’m about to fly. take care.’
मेरे लिये सबकुछ एक सुंदर सपने जैसा था. इनता बड़ा कलाकार और इतना सहज…

कुछ दिनों बाद जो आर्टिकल छपा था उसका एक हज़ार का चेक आया… उन्ही दिनों ‘वेलेंटाईन डे 14 फेब” आने वाला था… मै उन पैसों से अपने लिये कुछ ऐसा खरीदना चाहती थी,  जो मेरे लिये हमेशा के लिये यादगार रहे. मेरी तमन्ना थी की मेरा ‘बॉय फ्रेंड’ मुझे साडी गिफ्ट करे,  क्यूंकि कभी किसी ने नहीं किया… तो मैंने नल्ली (साडी की मशहूर दुकान) वहाँ से लाल बाडर की साडी खरीदी…..
आज भी वो साडी मेरे पास है और जब मै वो साडी पहनती हूँ तो लगता है- लाल, लाल, लाल, जग दिखे है मोहे लाल, लाल….

‘कुछ हवादिस पे निस्बते इश्क की नहीं मौकूफ, उम्र भर इक मुलाक़ात  चली जाती है’. – मीर*

अगर सांवली रात खूबसूरत है तो सांवला चेहरा कैसे बुरा हो सकता हैं ?

इति शरण 
( मेरी दो बहनें हैं , एक गोरी है और एक सांवली. मैं दोनो से क्रमशः 10 और 12 साल बड़ा  हूँ.  टी. वी  पर जब कभी फेयर एंड लवली का भोंडा , नस्लवादी विज्ञापन आता था तो छोटी उसे गौर से देखती , तब भी मैं चिढ़ता था , कभी -कभी डांट भी देता . लेकिन उसका समाज तो वही है -गोरेपन का आग्रही समाज. आज वह खुद को रेखा , शाबाना आजमी और नंदिता दास के साथ खुद को जोडती है , गर्व से . कल इति शरण ने , जब यह छोटी टिप्पणी स्त्रीकाल के लिए भेजी , तो मेसेज भी किया कि गुस्से से भरकर लिख रही हूँ , ठीक लगे तभी लीजिएगा. मैं सभी शेड्यूल्ड आलेख / रचनाओं को ड्राप कर आज इसे प्रकाशित कर रहा हूँ. काश कि समाज अपनी कुछ जड़ताओं से निकल पाता! 
                                                    संजीव चंदन)

काफी समय पहले नंदिता दास का यह पोस्टर फेसबुक में दिखा था। ‘Stay Unfair, Stay Beautiful’ बहुत खूबसूरत लगता है यह शब्द। गोरेपन की चाहत के भ्रम को तोड़ता और सांवलेपन से प्यार करना सिखाता है यह शब्द। अपने सांवलेपन को लेकर अफ़सोस करने वाली तमाम लड़कियों में आत्मविश्वास भरता हुआ दिखता है यह शब्द।

कभी मुझे भी मेरे इस सांवले रंग से चिढ़ होती थी, इसका कारण था सांवले रंग पर बचपन से लेकर आजतक लोगों से सुनी बातें। लोग सांवले रंग को लेकर हमारे ऊपर बेचारगी प्रकट करने में भी पीछे नहीं रहते। हमें गोरे होने के लिए ऐसी सलाह देते जैसे वे हमारे सबसे बड़े हितैषी हो।

छोटी थी उस वक़्त अक्ल भी नहीं थी। समाज में गोरे और सांवले रंग के बीच के दोहरे व्यवहार का मेरे दिमाग में भी असर पड़ता था। कई बार मैं माँ से बोलती भी थी  ‘माँ तुम तो गोरी हो पर मुझे सांवला क्यों जन्म दिया।’ कई बार आईने में अपना चेहरा देखकर उदास भी हो जाती थी।
कुछ वैसे लोग जो मेरी माँ से मिले थे,  मगर मेरे पिता जी से नहीं, मुझसे कहते थे ‘तुम काली कैसे हो गई जबकि आंटी तो गोरी हैं’। मुझे बुरा लगता और मैं अपने बचाव में बस इतना ही कहती ‘क्या है कि मैं अपने पापा पर गई हूँ।’

बाद में जब अक्ल आई तब अपनी ही सोच पर हंसी आने लगी। एक गोरे रंग को ही खूबसूरती का पैमाना बना बैठी थी मैं। जबसे उस गोरे रंग के भ्रम से निकली हूँ मुझे अपने सांवले रंग से प्यार हो गया है। अब अगर कोई फेयरनेस क्रीम लगाने की सलाह देता है, तो मुझे बहुत हंसी आती है।

अभी हाल में भी एक सज्जन मेरे सांवले रंग का मज़ाक बना रहे थे। उनका कहना था कि काले कपड़े की जगह मुझे ही खड़ा कर देना चाहिये फिर उस काले कपड़े की जरूरत ही नहीं होगी। छोटे में यह बात सुनी होती तो शायद उस वक़्त खुद को बहुत अपमानित महसूस करती, क्या पता मेरी आँखों में आंसू भी आ जाते। पर अब नहीं, अब आंसू की जगह हंसी आती है। हंसी क्यों, यह बताने की जरूरत नहीं समझती, इतना तो आप समझ ही चूके होंगे।

खैर, गोरे रंग को खूबसूरती का पैमाना मानने वाले आज भी सांवले रंग को नीचा बताने में पीछे नहीं रहते। इसका परिणाम, कई सांवली लड़कियां अपना पूरा आत्मविश्वास खो देती हैं, अपने अंदर के तमाम गुणों को भूल कर सांवलेपन के अफ़सोस और शर्म में जीने लगती हैं और लग जाती है खुद को गोरे बनाने की जुगत में। लेकिन शायद वे यह नहीं समझती कि ऐसा करके वे खुद उस तथाकथित समाज के भ्रम में फंसकर सांवलेपन का मज़ाक उड़ाने में लग जाती है।

फिल्म दिलवाले में काजोल की वापसी के साथ उनका एक नया रूप भी देखने को मिला। सांवली सी काजोल अब गोरेपन के आवरण के साथ दिखी। जाहिर ही बात है, उन्होंने सांवले से गोरे होने के लिए तमाम महंगे ट्रीटमेंट का सहारा लिया होगा। खैर, यह उनका व्यक्तिगत चुनाव होगा, मगर उनके इस चुनाव के बाद आज वह हम सांवली लड़कियों के लिए सिर्फ एक कलाकर और एक अभिनेत्री भर ही रह सकीं, जबकि नंदिता दास आज तमाम सांवली लड़कियों की प्यार हैं। काजोल गोरेपन की चाहत के साथ तो आपने खुद ही सांवलेपन का मज़ाक उड़ाया है।

इति शरण

बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि समाज से सांवलेपन के दोयम दर्जे के व्यवहार को ख़त्म करने के लिए सबसे पहले हमें खुद अपने सांवले रंग से प्यार करना सीखना होगा।

अगर सांवली रात खूबसूरत है तो सांवला चेहरा कैसे बुरा हो सकता हैं ?


सांवली लड़कियों कभी अपने सांवले रंग को लेकर उदास मत होना। बहुत खूबसूरत है यह सांवला रंग। कहने दो दुनिया को जो कहना है। तुम्हारे सांवले रंग के कारण तुमसे कोई शादी करने से मना करता है तो खुश हो, क्योंकि ऐसे इंसान की हमें जरुरत भी नहीं। अगर तुम्हारे सावले रंग के लिए तुम्हारे प्रति कोई बेचारगी प्रकट करता है तो करने दो, क्योंकि तुम्हारा रंग नहीं बल्कि उसकी सोच बदसूरत है। उन तमाम फेयरनेस क्रीम को कह दो नहीं जरूरत हैं हमें तुम्हारी।

और अंत में बहुत-बहुत शुक्रिया नंदिता दास तुम्हारे इस शब्द के लिए stay unfair, stay beautiful and Dark is beautiful.

थोडा तुम बदलो , थोडा हम बदलें ……………!

नाइश हसन  

सामाजिक कार्यकर्ता,विभिन्न देशों में सेमिनारों में पेपर प्रस्तुति. ‘ एक किताब , स्वतंत्रता आंदोलन का एक विस्मृत सेनानी’ प्रकाशित. संपर्क :naish_hasan@yahoo.com>

एक दिन मुझे अमेरिकन एम्बेसी से एक पत्र के माध्यम से ये खबरमिली कि International visitors leadership program के तहत मेरा चुनाव अमेरिका जाने के लिए हुआ है,  जहाॅ मुझे उद्यमिता विकास व अन्य सामाजिक बदलाव , महिला अधिकार की लडाई लडने वाले लोगों से बहुत कुछ सीखने व उनके साथ अपना अनुभव बाॅंटने का मौका मिलेगा। अमेरिका के बारे में बहुत अच्छी और बुरी राय मन में पहले से ही मौजूद थी अपनी हर एक राय को  परखना चाहती थी मैं वहाॅं जाकर। काफी समय मिला मुझे 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान चीजों को देखने सीखने और समझने का। मैं वाशिंगटन, फिलाडेल्फिया, शिकागो, अटलांटा, पोर्टलैंण्ड , विस्काॅंसिन, ओकलाहोमा, व टेक्सस गई । इतनी जगह घूमने के बाद मैने बहुत सी बातों को अनुभव किया। हिन्दुस्तानी व अमरीकियों के सोंचने का नजरिया बिल्कुल जुदा है। बहुत सी बातें जो हमारे लिए बहुत प्राथमिक है उनके लिए उसका महत्व नही है। जैसे कि परम्परायें जिस तरह हमारे जीवन का प्राथमिक हिस्सा है उनके जीवन का नही है। मैंने अपने प्रवास के दौरान हर तरह के लोगों से मुलाकात की उनके साथ वक्त बिताया इस लिए मैं अपने कुछ अनुभवों को आप के सामने रख रही हूॅं।

एक दिन मैं फैमिली काउन्सिलिंग सेन्टर और कोर्ट देखने गई । इजाजत लेकर पीछे बैठ गई बस कोर्ट की कार्यवाही देखना चाहती थी, उस समय कोर्ट में दो केस सुने जा रहे थे एक पत्नी के साथ घरेलू हिंसा , व दूसरा शराब पी कर गाडी चलाना । मै करीब 40 मिनट कोर्ट में बैठी। पहले केस में महिला ने केवल पुलिस में एक शिकायत दर्ज की थी कि उसके पति ने उसका गला दबाया है लेकिन वह कोर्ट आना नही चाहती थी स्टेट ने महिला की ओर से एक्शन लिया,  पति कोर्ट में बुलाया गया , उसने अपनी गलती स्वीकारी, कोर्ट से माफी माॅंगी.  परन्तु कोर्ट ने उसे सजा दी और कहा कि उसे 6 माह तक एक मावनाधिकार संगठन में काम करना होगा , जहाॅं उसके बिहेवियर में सुधार के लिए भी काम हेागा,  चॅूॅंकि वह उसका पहला अपराध था इस लिए कोर्ट ने कहा कि यदि दोबारा ऐसा अपराध हुआ तो उसे 6 माह की सख्त सजा सुनाई जाएगी।

दूसरे केस में शराब पीकर गाडी चलाने की गलती पर कोर्ट से मुल्जिम ने माफी भी माॅंगी और ऐसा देेाबारा न करने का आश्वासन भी दिया परन्तु जज ने बहुत विनम्रता से ये कहा कि वो नियमों में बन्धे है और कुछ नही कर सकते और 6 माह की सजा सुना दी गई। फौरन पुलिस मुल्जिम को लिफ्ट से लेकर नीचे उतर गई और जेल पहुॅंचा दिया। इतना त्वरित न्याय देखकर बहुत अच्छा लगा।  मैं जिस कतार में बैठी कोर्ट की कार्यवाही देख रही थी उसी कतार में मेरे ठीक पीछे एक वकील साहब बैठे थे , उनको जब ये पता चला कि मैं हिन्दुस्तान से आई हूॅं , एक एक्टिविस्ट हूॅं, कोर्ट प्रक्रिया देखने आई हूॅं , तो उन्होने केस समाप्त होने के बाद सीट पर बैठे जज साहब से कहा कि आज हमारे बीच इण्डिया से एक खास मेहमान मौजूद है, जज ने मेरा स्वागत किया और कहा कि आप का यदि कोई सवाल हो तो हमसे जरूर पूछें.  दोबारा मेरे आने का शुक्रिया अदा किया , मेरे इसरार पर उन्होने कोर्ट में फोटो खीचने की इजाजत भी दी । मै उनके इस व्यवहार को देखकर मन ही मन बहुत खुश और हैरान थी क्योंकि मैने हिन्दुस्तान में बहुत कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाए हैं,  पर ऐसा कभी नही देखा था। एक बार तो लखनऊ फैमिली कोर्ट के एक जज ने हद कर दी थी -वह पीडित लडकियाॅं,  जो अपने केस की पैरवी के लिए आती थी,  उनके गालों को छूता , छाती को छूता और अपने चैंबर तथा अपने घर में बुलाता. जब हम महिला संगठनों ने काफी हल्ला मचाया तब कही जाकर वह हटाया गया.

मैं मिल्वाकी शहर , जो विस्कान्सिन राज्य का एक बडा शहर है,  के एक पुलिस स्टेशन भी गई ये देखने कि पुलिस किस प्रकार कार्य करती है। चूॅंकि हिन्दुस्तान में एक एक्टिविस्ट होने के नाते मैं जिन लोगों के साथ डील करती हॅंू उन सभी महकमों  को मैं वहाॅं भी देखना चाहती थी , मेरा पुलिस ने बहुत अच्छी तरह स्वागत किया। मुझे अपना पूरा सिस्टम समझाया , उनकी कार्यकुशलता देख का मैं हैरान थी। मैने एक महिला पुलिस से बहनापे वाला सवाल पूछा कि आप लोगों को दूसरे पुरूष सहकर्मियों से हिंसा का सामना तो नही करना पडता, तो उसने बहुत तपाक से जवाब दिया नही ऐसा कभी नही होता । मैने ये भी देखा कि हिन्दुस्तानियों को अमरीकी बहुत इज्जत की निगाह से देखते है, हमारी डेमोक्रेसी की बहुत कद्र करते है, हिन्दुस्तानियों को बहुत बुद्धिमान  और मेहनती मानते है, ये बुद्धिमानी  और कडी मेहनत हम दूसरे देश  में जाकर क्यों करते है अपने देश में क्यों  नही ये मेरी समझ में ठीक से नही आता।

पुलिस महकमें  की बहुत इज्जत है , सडक के नियमों का पालन न करने पर आप पुलिस को 10 , 20 या 50 डालर देकर अपना काम नही बना सकते गलती पर फाइन देना ही होगा, पुलिस पैसों में नही बिकती, नियमों का पालन करवाती है, लोग नियमों का पालन करते भी है , आमतौर पर ईमानदारी है,  दुकानों में ठगी भी नही है। पुलिस और कानून दोनो के आदेशों का ही त्वरित और सख्ती से पालन होता है।

मैं एक तजरबा आप के साथ और शेयर करना चाहती हूॅं । एक दिन मैं विस्कान्सिन स्टेट की कैपिटल मैडिसन में कैपिटल बिल्डिंग देखने गई । मुझे से नही मालूम था कि वो मुझे अन्दर भी जाने देंगे क्योंकि मैं आजतक कभी लखनऊ विधानसभा के अन्दर दाखिल नही हो पाई हूॅं वहाॅं जाने की इजाजत आम लोगों को नही है ।  वहाॅं अन्दर जाकर बहुत अच्छा लगा। एक गाइड ने हम लोगों को पूरी कैपिटल बिल्डिंग की सैर कराई.  बहुत से अमरीकी लोग अपने छोटे छोटे बच्चों को कैपिटल बिल्डिंग दिखाने लाए थे । उनसे बातचीत होने लगी उनका कहना था कि बच्चा अपने संविधान, पार्लियामेन्ट सीनेट आउस, सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर कार्यालय को यदि नही देखेगा , उसके बारे में जानकारी नही रखेगा तो उसमेे अपने नेशन के लिए रिस्पेक्ट कैसे डेवलप होगा , वहाॅं मौजूद गाइड , जो सरकार की तरफ से तैनात था,  उसका  सिर्फ यही काम था कि आने वाले लोगों को उसके विकास का इतिहास बताए सब जानकारियाॅं मुफ्त प्रदान करे । ये भी देखा कि डेमोक्रेट व रिपब्लिकन पार्टियाॅं कहाँ  बैठ कर बहस करती है और वहाॅं एक तरफ ऊपर के हिस्से में बैठकर आम जनता को ये देखने का हक है कि वो लोग क्या चर्चा कर रहे है। ये सब अनुभव हमारे सीखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे शायद कभी हम भी इन बातों को अपना पाएॅं।

कैपिटल बिल्डिंग के अन्दर जाकर भी आम लोगों को सरकार के किसी भी कृत्य  के खिलाफ धरना प्रदर्शन  करने का हक है । मैं एक महिला के साथ,  जो वहाॅं गवर्नर के खिलाफ धरने पर बैठी थी उन्हें समर्थन देने के लिए धरने में शामिल हुई । वहाॅं लोगों की इज्जत बहुत है पोजीशन होल्ड करने वालों के पीछे लोग नही भागते, अपना काम कराने के लिए किसी नेता को अपना सरपरस्त बताना फख्र की बात नही है आप का काम अपने आप ही सिस्टम में हो जाएगा बगैर किसी बडे नाम का हवाला दिए। क्लास और कास्ट सिस्टम से समाज मुक्त है।

मेरे नजरिए में अमेरिका के बारे में एक बडा बदलाव तब आया जब मैने वहाॅं के आम लोगों को,  जिनका राजनीति से कोई लेना देना नही है ये कहते सुना कि जार्ज बुश  की विदेश नीति बहुत गलत थी , विशेष तौर पर अफगानिस्तान के मामले में । लोगों ने कहा कि बुश ने राष्ट्रपति बनने से पहले कभी अफगानिस्तान की यात्रा तक नही की थी,  लेकिन अफगानिस्तान के खिलाफ इतना बडा मोर्चा खोल दिया। उन्होने ये भी कहा कि देश भक्ति के नाम पर चन्द पैसों के लिए कम पढे लिखे गाॅंव के गोरे अमरीकियों को ईरान, ईराक, अफगानिस्तान या अन्य देशों में युद्व के लिए झोक दिया जाता है और लौटने पर उन्हें उनकी उचित कीमत भी नही दी जाती , तमाम ऐसे लोग जो युद्धों  से लौट कर आए , है वो आज भी अपने एक अदद आशियाने के लिए तरस रहे है सरकारी शेल्टर होम में जिन्दगी गुजार रहे है। सरकार उनकी कोई मदद नही कर रही है। मौजूदा सरकार के काम काज से भी असन्तुष्ट लोग सवाल खडे कर रहे है।  नीतियों की खुलकर आलोचना करना और किसी प्रकार की ओछी राजनीति किए बगैर अपनी बात खुल कर कहना,  ये एक अच्छे नागरिक की मिसाल देखने को मिली ।

जहाॅं तक महिलाओं की आजादी का सवाल है.  वो हर जगह नजर आई,  औरत की इज्जत नजर आई,ऐसा नही लगा कि कोई महिला किसी काम के लिए इनीशिएटिव ले रही हो,  तो वो मखौल बनाई जाए या उसे खराब औरत की श्रेणी में डाल दिया जाए, या यूॅं ही उसे कमतर समझकर उसकी बात ही न सुनी जाए, या उसे इस काबिल ही न समझा जाए कि उससे किसी मसले पर राय बात की जा सके। जैसा कि रोजमर्रा की जिन्दगी में हम औरतें यहाॅं अनुभव करती है। मैने 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान एक भी बार सडक पर हिंसा का सामना नही किया मेरे कानों ने एक भी बार कोई भद्द्ी टिप्पणी नही सुनी , किसी ने मेरे शरीर को छूने,  चुटकी काटने , अश्लील हरकत करने जैसा कृत्य नही किया, न ही किसी ने अश्लील इशारा ही किया। कुल मिलाकर मैने अपने आप को बहुत ही सुरक्षित महसूस किया,  सडक पर।  जो कि दुर्भाग्य से हम अपनी माटी में नही देखते। किसी भी उम्र की लडकी, जवान व बुजुर्ग महिला भी सडक पर हिंसा का शिकार होती ही है।

एक आम लडकी को सडक पर चलते समय वो डर नही सताता कि कोई उसका दुपट्टा खीच कर चला जाएगा, उसको धक्का देकर उसी लडकी को गलत साबित करके चला जाएगा, चार शोहदे हल्का अन्ध्ेारा होते ही अकेली जा रही लडकी को घेर लेंगे और यौन हिंसा करेंगे। ये डर हिन्दुस्तान में जरूर सताता है हर लडकी को जो घर से बाहर कदम रखती है। इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि अमेरिका में महिला हिंसा नही है.  वहाॅं भी महिलाओं ने काफी संघर्ष किया है, पितृसत्ता  की जडें वहाॅं भी जमी रही है। रेप की घटनाएॅं भी घटित होती हैं . लेकिन उन जडों को हिलाने में सरकार व महिला आन्दोलनों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। इसी लिए उसका असर नजर आता है। महिला हिंसा का रूप इतना भयावह नही है जितना कि हिन्दुस्तान व अन्य पडोसी देशों  में देखने को मिलता है।

शिकागों के महिला शेल्टर होम ‘अपना घर’ जो 20 बरस पहले हिन्दुस्तानी औरतों ने प्रारम्भ किया था और ‘ हमदर्द  सेन्टर’,  जो महिलाओं के संरक्षण का काम करता है में बहुतेरी अमरीकी और दक्षिण एशियाई महिलाए नजर आई जो अपने शौहर द्वारा जबर्दस्त मार पिटीई की शिकार हुई थी।

एक और अनुभव आप के साथ बाॅंटूगी । सच कहूॅं तो मैने अपने देश  में पहले कभी इतनी बुर्कापोश औरतें नही देखी,  जितनी अमेरिका में देखी । ज्यादातर मुसलमान औरत बुरके में थी । 9/11 के बाद शायद आइडेन्टिटी क्राइसिस का सवाल इतना बडा हो गया है। ये वाजिब भी है कि जिस देश में अपनी पहचान खतरे में पड जाए वहाॅं पहचान को बहुत मजबूती से बयाॅं करने की कोशिश की जाती है, लेकिन एक सवाल और यहाॅं खडा हो जाता है कि क्या आइडेन्टिटी क्राइसिस या पहचान को पुख्ता बना कर सामने रखने की जिम्मेदारी भी औरत पर ही है  ? मर्दो ने तो कोई अरबी लिबास नही पहना हुआ था,  वो तो अपनी पहचान एक आम अंग्रेज मर्द की तरह ही दिखा रहे है , हाॅं कुछ के दाढी थी लेकिन बुर्के के अनुपात में बहुत ही कम। अगर एक कौम की पहचान उसकी औरतों से है तो फिर औरतों को एक खास दर्जा भी मिलना चाहिए,  वो कही नही दिखा। मजहब के नाम पर औरत को नियन्त्रित करने की घटिया सियायत भी काफी नजर आई , जिसमें अमरीकी मुसलमान औरत वहाॅं के ऐश  आराम तो उठाए लेकिन रौशन खयाल न बन पाए। इसकी मिसाल देना चाहूॅंगी मैं एक मुस्लिम वुमेन सेन्टर देखने गई वाकई बहुत अच्छा लगा उनका काम देखकर । वही की एक साहिबा जो मेेरे काम से बहुत खुश  हुई और मेरे लिए दुआ करते हुए मुझे एक बुर्का तोहफे के तौर पर दिया और ये कहा कि इन्शाअल्लाह आप जल्दी की कौम की खिदमत करते हुए पर्दा भी करने लगेंगी।

ये सवाल औरतों को भी समझना पडेगा कि बुर्के की वकालत कुरान नही पितृसत्ता कर रही है और औरत को हथियार बनाकर इस्तेमाल कर रही है। इस्लाम को सही तरह से समझना होगा वो हक जो अल्लाह ने हमें दिया और पित्रसत्ता ने उसे छीन लिया हमे वो हक वापस लेना होगा, गलत और भेदभाव पूर्ण नीतियों के प्रति सवाल भी खडा करना होगा।

अन्त में मैं इतना कहना चाहती हूॅं कि इतने नियमों,  सख्त कानूनों के बाद भी प्रतिवर्ष अमेरिका में औसतन 250 लोगों को सजाए मौत दी जाती है । ड्रग्स और गन उनकी समस्या की जड में मौजूद है। कोई भी व्यक्ति बन्दूक रख सकता है । चॅूकि अमेरिका की आजादी (4 जुलाई 1776) के बाद उनके संविधान में सुरक्षा के अधिकार को अधिक महत्व दिया गया और संविधान में अपनी सुरक्षा हेतु हथियार के प्रयोग को मना नही किया गया। इसी कारण आज तक जब कि गन अमेरिका में एक मुसीबत का रूप लेती जा रही है राजनीतिक पार्टियाॅं गन के नाम पर सियायत कर रही है। आए दिन ऐसी घटनाएॅं सामने आ रही है जब कोई बच्चा/युवा गन लेकर किसी सार्वजनिक स्थल पर पहुॅंचता है और एक साथ कई लोगों को मौत के घाट उतार देता है । चूॅंकि अमेरिका में 50 प्रतिशत परिवार,  टूटे परिवार है,  इसलिए बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं । हर 5 अमरीकी बच्चों पर एक पिता होता है,  देखभाल करने के लिए। इससे बच्चों की परवरिश  ठीक से नही हो पाती, उनमें अकेला पन और कुंठा पनप जाती है, उन्हें माॅं बाप दोनो का प्यार व देखभाल नही मिल पाती , बच्चे असुरक्षा में बडे होते है। परिवार टूटने के बाद अधिकतर बच्चे माॅंओं के साथ ही रहते है, पिता अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नही निभाता। बच्चे अपनी भावनाओं को शेयर नही कर पाते और कभी -कभी  स्थिति हिंसक बन जाती है।

एक और बात जो अमरीकियों को सीखनी जरूरी है वो ये कि पहले हम ऊर्जा को बर्बाद करते है उसके बाद ग्रीन इम्पावरमेन्ट की बात करते है, प्रतिवर्ष 6 बिलियन डालर सिर्फ टायलट पेपर बनाने में खर्च हो जाता है , शौचालयों  में इतना पानी बर्बाद होता है , सीट से उठते ही फ्लश टैंक से पानी अपने आप आने लगता है , लेकिन शौच के लिए पानी कही नही होता। दूकानों में लाइट हमेशा आन रहती है, शटर गिरने के बाद भी बत्ती नही बुझती संसाधनों का अधाधुन्ध गलत इस्तेमाल होता है ,अधिकतर चीजें रिपेयर नही होती,  खराब होने पर फेंक दी जाती है। इस मामले में काश अमेरिका हमारी तमाम खूबियाॅं सीख पाता, हालाकी हम भी संाधनों का बेजा इस्तेमाल करते है,  लेकिन उतना अधिक नहीं। इसके अलावा परिवार को जोडे रखने , रिश्ते निभाने की कला, रिश्तों के मायने सीख पाता, उसके मर्म को समझ पाता, और हम उनसे एक बेहतरीन वर्क कल्चर, लोगों को सम्मान देना सीख पाते, हमारी शिक्षा  का स्तर भी उनके जैसा ऊॅंचा हो पाता और हम दोनो देशो  को मोकम्मल पुरखुलूस और खूबसूरत बना पाते , उम्मीद है वो दिन जरूर आएगा। थोडा वो बदलेंगे थोडा हम बदलेंगे और हम मिलकर एक बेहतर दुनिया बनाने की अगुवाई करेंगे।

कई अमरीकी परिवारों ने हमें अपने घर दावत पर बुलाया कभी गाॅंधी का जिक्र किया,  तो कभी भारत पाकिस्तान बटवारे का दर्द हमारे साथ साझा किया । मार्टिन लूथर किंग के घर जाना , उनके मेमोरियल को देखना , हमारे अन्दर एक हिम्मत और जोश को भर देता है।  जहाॅं रंग भेद अपने चरम पर था,  ऐसे में एक लम्बी लडाई लडना अपनी जान गवां कर,  इस भेद को मिटाना एक हौसला देता है कि हम भी औरत के अधिकार की लडाई हिन्दुस्तान सहित पूरी दुनिया में हिम्मत से लडेंगे . एक दिन हम भी मार्टिन लूथर किंग के मशहूर भाषण  ‘ आई हैव ए ड्रीम टुडे’ की तर्ज पर अपने ड्रीम को साकार करेंगे।

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

संजीव चंदन

दूसरे देशों की तुलना में भारतीय महिलायें कम से कम एक मामले में भाग्यशाली रहीं हैं और वह यह कि उन्हें आजादी के बाद ही पुरुषों की तरह मत देने और चुनाव में खडे होने का अधिकार प्राप्त हो गया. मतदाता के रूप में पुरुषों के समान सीमित अधिकार तो उन्हें 1935 में ही हासिल हो गए थे. दुनिया के दूसरे देशों की तरह, उन्हें इसके लिए लम्बा संघर्ष नहीं करना पड़ा. पश्चिमी देशों में मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट द्वारा 1792 में स्त्रियों के लिए मताधिकार की मांग सबसे पहले उठाई गयी थी. तब से इस अधिकार के लिए जो कठिन और व्यापक संघर्ष शुरू हुआ,  उसे 20वीं शताब्दी में सफलता हासिल हो सकी. कई देशों में तो आज भी महिलायें इस अधिकार से वंचित हैं.

ऐसा भी नहीं है कि समान मताधिकार, भारतीय महिलाओं को थाली में सजा कर दे दिया गया हो. भारत का शासन चलाने के लिए नए अधिनियम को लागू करने की पूर्व संध्या पर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन भारत मंत्री ईएस मांटेग्यु 1917 में भारत आये. उस दौरान, 1 दिसंबर, 1917 को पांच महिलाओं का एक शिष्टमंडल उनसे मद्रास में मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग रखी. मांटेग्यु–चेम्सफोर्ड सुझावों में यद्यपि मताधिकार को और विस्तृत करने का सुझाव भी शामिल था लेकिन इसमें महिलाओं का कोई उल्लेख नहीं था. १९१८ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने महिलाओं के मताधिकार का समर्थन किया. १९९१ में जब ‘द गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया बिल’ पेश हुआ तब एनी बेसेंट, सरोजिनी नायडू और हिराबाई ने महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिए जाने की वकालत की. लेकिन इस मसले को चुनी हुई सरकारों पर छोड दिया गया. त्रावणकोर और मद्रास पहले और दूसरे ऐसे राज्य थे, जिन्होंने क्रमशः 1920 और 1921 में महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया. यह अधिकार केवल पढ़ी-लिखी महिलाओं को दिया गया था. इसके बाद दूसरे राज्यों में भी यह सिलसिला शुरु हुआ. 1931-32 में लार्ड लोथियन समिति ने महिलाओं को मताधिकार देने के लिए जो दो शर्तें निर्धारित कीं, वे बहुत भेदमूलक थीं. एक तो किसी भी भाषा में पढ़–लिख सकने वाली महिलाओं को मताधिकार देना प्रस्तावित किया गया. इसके अलावा, उन्हें किसी की पत्नी होना भी अनिवार्य कर दिया गया. यानी, विधवायें या किसी कारण से विवाह न करने वाली महिलायें मताधिकार से वंचित रखीं गयीं.

प्रतिनिधित्व की कठिन डगर
परन्तु मताधिकार प्राप्त हो जाने मात्र से महिलाओं का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. उसका दूसरा चरण था राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संघर्ष. राजनीतिक पार्टियों द्वारा टिकट देने से लेकर उनके जिताकर लाने तक में पितृसत्तात्मक समाज और सत्ता की अरूचि स्पष्ट दिखती है. यही कारण है कि आजादी के बाद पहली  लोकसभा (1952) से लेकर अब तक संसद में महिलाओं का  प्रतिनिधित्व बढा तो है लेकिन अत्यंत धीमी गति से और यह आज भी बहुत कम है. 1952 में जहां संसद में 4.50 प्रतिशत महिलाएं थीं वहीं 2014 में यह प्रतिशत 12.15 प्रतिशत ही हो सका. हालांकि इस बीच विभिन्न कारकों के चलते, सार्वजनिक जीवन  में महिलओं की सक्रियता गुणात्मक रूप से बढ़ी.

इस सक्रियता का ही नतीजा था  कि  महिलाओं के प्रतिनिधित्व को संसद में कम से कम 33 प्रतिशत करने के लिए महिला आरक्षण बिल की योजना बनी. इस बिल का नाम लेते ही आज एक तस्वीर सबसे पहले जेहन में आती है – भाजपा नेता सुषमा स्वराज और सीपीएम की कद्दावर नेता वृंदा करात की प्रसन्न मुद्रा में हाथों में हाथ डाले हुए तस्वीर.

सुषमा स्वराज की पार्टी आज सता में है. नई संसद के कई सत्र आये और चले गए लेकिन महिला आरक्षण बिल की कोई चर्चा नहीं हुई, यद्यपि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इस बिल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई थी और इस सरकार के बनते ही सुषमा स्वराज ने महिला आरक्षण बिल को सरकार की प्राथमिकता बताया था. यह सुखद है कि १६वीं लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व, 15वीं लोकसभा के 10.86 प्रतिशत से बढकर 12.15 प्रतिशत हो गया है. और पहली बार सरकार में छह महिलायें महत्वपूर्ण मंत्रालय सम्हाल रहीं हैं. फिर क्या कारण है कि  नई सरकार के दो साल बीत जाने के बाद भी इस बिल की सुध लेने वाला कोई नहीं है? जबकि लोकसभा में सरकार को बहुमत प्राप्त है और विपक्षी दल भी इसके प्रति प्रतिबद्धता जता चुके हैं.

क्या मुलायम सिंह यादव या लालू यादव इस बिल को लटकाए रखे जाने का कारण है? नहीं.  यह उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रतिशत के हिसाब से मुलायम सिंह यादव के दल ने ममता बनर्जी के दल के बाद, दूसरे नम्बर पर सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार उतारे थे जबकि संख्या के हिसाब से आम आदमी पार्टी ने 39  महिला उम्मीदवार उतार कर दोनों बड़ी पार्टियों को पीछे छोड दिया था. सत्ताधारी भाजपा ने केवल 20 महिला उम्मीदवार उतारे थे. इन आंकडों से महिला आरक्षण के प्रति मुख्यतः पुरुष वर्चस्व वाले भारतीय राजनीतिक  दलों की नियत का अन्दाजा लगाया जा सकता है. चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन का विश्लेषण करते हुए सीपीएम ने जिन कारणों को चिह्नित किया उनमें से एक था कम महिला उम्मीदवारों को अवसर देना और इस मामले में उसने  ‘बुर्जुआ पार्टियों’  को अपने से बेह्तर पाया.

यूं टलता गया महिला आरक्षण बिल 
1993 में 73वें संवैधानिक संशोधन के जरिये पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद हुए 1996 के लोकसभा चुनाव में सभी प्रमुख पार्टियों ने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को अपने चुनावी घोषणापत्रों में रखा. तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट की प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने सबसे पहले महिला आरक्षण बिल को ४ सितम्बर, १९९६ को लोकसभा में पेश किया. इसे गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया, जिसने 9 दिसंबर, 1996 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी. हालांकि राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसे 11वीं लोकसभा में दुबारा पेश नहीं किया जा सका. इसे दुबारा पेश किया अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 12वीं लोकसभा में. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे चार बार लोकसभा में पेश किया और हर बार हंगामे के बाद ‘सर्वसम्मति निर्मित’ करने के नाम पर इसे टाल दिया गया. कांग्रेस की नेतृत्व वाली
यूपीए सरकार ने भी इसे दो बार संसद में पेश किया. मार्च 2010 में राज्यसभा ने इस बिल को पारित भी कर दिया लेकिन उसके बाद चार साल  (15वीं लोकसभा के भंग होने तक) तक यह बिल लोकसभा में नहीं लाया जा सका.

आरक्षण के भीतर आरक्षण  
लगभग सभी पार्टियों की सैद्धांतिक सहमति के बावजूद उनका पुरुष नेतृत्व महिलाओं के लिए जगह खाली करने  को तैयार नहीं है. अन्यथा, पिछले 20 सालों से यह बिल सर्वसम्मति की तलाश में लटका नहीं रहता. जहां सीपीएम जैसी पार्टीयां महिलाओं को टिकट देने के मामले में ‘बुर्जुआ पार्टियों’ को अपने से बेहतर पा रही है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढाँचे में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित कर दी है.  इस बिल के न पास होने का ठीकरा अस्मितावादी पार्टियों और राजनेताओं पर फोड़ा जा रहा है. यह सच है कि जब–जब बिल संसद में लाया गया, तब–तब अस्मितावादी पार्टियों और उनके नेताओं ने अलग-अलग राग अलापा. फिर भी, शरद यादव के ‘परकटी महिलाओं’  वाले पुरुषवादी मानसिकता से लबरेज जुमले को नजरअंदाज करते हुए देखना यह चाहिए कि क्या इन नेताओं द्वारा पिछड़े वर्ग की महिलाओं की ‘जायज प्रतिनिधित्व’ के मुद्दे पर वर्तमान महिला बिल का विरोध, क्या सर्वथा ‘महिला-विरोधी’ स्टैंड है? ये पार्टियां और नेता सामाजिक–सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी महिलाओं के लिए महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग करते रहे हैं. ‘गत  12 दिसंबर , 2015 को नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन वीमेन और स्त्रीकाल द्वारा महिला आरक्षण पर आयोजित राउंड टेबल में दलित स्त्रीवादी विचारक और ‘राष्ट्रीय दलित आन्दोलन’ की संयोजक  रजनीतिलक आदि ने स्पष्ट किया कि ‘ उनका एक प्रतिनिधिमंडल लालू प्रसाद आदि नेताओं से ‘महिला आरक्षण बिल में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के आरक्षण  के लिए मिलने गया और इस तरह इन नेताओं की आवाज दलित -बहुजन स्त्रियों की आवाज है .’  उन्होंने दावा किया कि बहुजन नेताओं द्वारा  कोटा के भीतर कोटा की मांग वास्तव में दलित -बहुजन स्त्रियों द्वारा उठाई गई मांग का ही विस्तार है. ‘

अलग–अलग फ़ॉर्मूले 
पिछले 20 सालों की राजनीतिक कवायद के दौरान महिला आरक्षण को लेकर कई फ़ॉर्मूले भी सामने आये. इनमें एक फ़ॉर्मूला है पार्टियों के द्वारा टिकट बंटवारे में 33 प्रतिशत आरक्षण का, जिसे अनुपयोगी मानने वालों का तर्क है कि ऐसे में पुरुष-प्रधान पार्टियां न जीती जा सकने वाली सीटें महिलाओं को दे देंगी. एक वर्ग पार्टियों के संगठनात्मक ढांचें में आरक्षण की मांग कर रहा है, जो कि पार्टियों के अपने संविधान में परिवर्तन के जरिये सुनिश्चित किया जा सकता है. भारतीय जनता पार्टी ने इसकी पहल भी की है लेकिन प्रतिनधित्व का इस तरीके की सफलता प्रायः पुरुष वर्चस्व वाली पार्टियों की सदिच्छा पर निर्भर करेगा.महिला आरक्षण के सिलसिले में अब तक लोकसभा और विधानसभाओं में ही आरक्षण की बात की जाती है जबकि विधेयकों के पारित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिला आरक्षण के लिए  कोई पहल नहीं की जा रही है. इसके लिए मेधा नांदिवादेकर ने एक फ़ॉर्मूला सुझाया था कि चूँकि प्रत्येक राज्य हर दो वर्ष वर्षों में राज्यसभा के अपने एक-तिहाई कोटे का चुनाव करता है और बड़े राज्यों के मामले में यह एक-तिहाई, तीन सीटों से अधिक होता है इसलिए एक सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती है. जहां एक-तिहाई सीटें तीन से कम हैं, वहां पहले दो चुनावों में तो एक–एक सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती हैं और तीसरे चुनाव में सारी सीटें अनारक्षित रखी जा सकतीं हैं. यही फ़ॉर्मूला विधानपरिषदों और अन्य समितियों के लिए भी अपनाया जा सकता है.

आरक्षण का असर 
महिलाओं के आरक्षण के प्रसंग में अक्सर यह सवाल किया जाता है कि उनके प्रतिनिधित्व में इजाफे से महिलाओं को क्या लाभ होगा? पहली बात तो यह है कि अधिक  प्रतिनधित्व अपने-आप में एक लाभ है. जब ग्राम पंचायतों में पहली बार 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया तब पंचायतों में ४३ प्रतिशत महिलाएं चुन कर आईं थीं. दरअसल, महिलाओं की क्षमता और योग्यता को पुरुष वर्चस्व हमेशा से सन्देह की निगाहों से देखता रहा है और महिलाओं ने जब–जब मौका हासिल किया है (कभी पुरुष उदारता ने उन्हें यह मौका नहीं दिया; या तो उन्होंने यह लड़कर हासिल किया या पितृसत्तात्मक समाज की कमजोरियों ने उन्हें यह अवसर दिया ), तब-तब उन्होंने अपने को साबित ही किया है. सन १००५ में जब बिहार में देश में पहली बार स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला तो समाज इसके लिए तैयार नहीं था. व्यावहारिक तौर पर महिला जनप्रतिनिधियों के पुरुष अभिभावक ही सत्ता संचालन  करने लगे. ‘मुखियापति’ जैसे शब्दों का आविर्भाव हुआ और महिला मुखिया के लिए अश्लील गीत प्रचलन में आये. मेरा भी बिहार में स्वतंत्र  पत्रकारिता के दौर में ऐसे दर्जनों मुखियापतियों से साबका पड़ा. लेकिन अवसर ने जल्द ही अपना रंग दिखाना  शुरु कर दिया. बिहार के तुरंत बाद 50 प्रतिशत आरक्षण महाराष्ट्र में भी लागू हुआ और मैं इन दो राज्यों के अपने अनुभव और खबरों के आधार पर कह सकता हूं कि महिला जनप्रतिनिधियों ने शुरुआती हिचक के बाद धीरे–धीरे पुरुष अभिभावकों से मुक्ति पानी शुरु कर दी है. महाराष्ट्र के एक जिले की लगभग तीन दर्जन पंचायतों के अध्ययन के आधार पर एक शोध निष्कर्ष सामने आया कि महिला सरपंच (मुखिया) वाले गाँव में महिलाओं की राजनैतिक जागरूकता बढ़ी है और वे पंचायतों में ज्यादा सक्रिय हुई हैं.

बिहार, 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों द्वारा दिये जा रहे मताधिकार के प्रति अडियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल किये जाने के बाद, बिहार विधानसभा ने महिलाओं को यह हक़ दिया. वहीं इन दिनों महिला सशक्तिकरण के लिए बिहार सबसे अव्वल पहल लेता हुआ राज्य दिख रहा है. 2005 में देश में यह पहला राज्य बना, जिसने स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत  आरक्षण दिया. शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस सेवा सहित विभिन्न नौकरियों में भी यह राज्य महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दे रहा है.

कहाँ हैं रुकावटें 
गेंद अब पूर्णतः भाजपा के पाले में है. वह अब मुलायम सिंह यादव या लालू यादव के नाम पर इस बिल को और नहीं टाल सकती. इस लोकसभा में उनकी शक्ति नगण्य है. सवाल यह भी है कि ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’, क्या मुलायम सिंह द्वारा इस बिल को टालने का हथियार भर है. ऐसा नहीं माना जा सकता. मैं मुलायम सिंह और उनकी पार्टी के नेताओं की स्त्री विरोधी करतूतों और वक्तव्यों का संज्ञान लेते  हुए भी ऐसा नहीं न मानने का कारण देख रहा हूँ. यह सही है कि आज भारत में संख्याबल और भागीदारी के अनुपात में ही चुनावों में टिकट बांटे जाते हैं. जाति विशेष की आबादी देखते हुए उम्मीदवार तय होते हैं. इस प्रवृत्ति ने कम से कम इतना सुनिश्चित तो जरूर किया है कि राष्ट्रीय और राज्य चुनावों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान न होने के बावजूद, इन जातियों के प्रतिनिधि लोकसभा में बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं, जो आज से दो दशक पहले तक नहीं होता था. लेकिन सवाल यह है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण से कौन सा वर्ग भयभीत है और इसके प्रावधान से हर्ज ही क्या है. ‘परकटी और बालकटी’ जैसे जुमलों की निंदा करते हुए इस विडम्बना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि महिला आरक्षण लागू करवाने में असफलता के लिए स्त्रीवादी आंदोलनों पर पुरुष वर्चस्व के अलावा सवर्ण वर्चस्व भी सामान रूप से जिम्मेवार है.यह भी एक बड़ी विडम्बना ही है कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व के सवाल पर सक्रिय महिलायें, जाति-प्रतिनिधित्व के मसले पर एक राय नहीं हो पाती वहीं जाति-प्रतिनिधित्व के सवाल पर सहमत लोग महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मसले पर ईमानदार पहल नहीं करते. जबकि प्रतिनिधित्व का मूल लक्ष्य सामाजिक–सांस्कृतिक रूप से पीछे छूट गए लोगों को प्रतिनिधित्व देना है. बीपी मंडल की सिफारिशें लागू होने के बाद दिल्ली के संभ्रांत गार्गी महिला कालेज की सवर्ण छात्राओं ने उसके विरोधियों का साथ जमकर निभाया. उनके हाथों में एक तख्ती होती थी, जिसपर लिखा होता था ‘हमारे पतियों की नौकरी नहीं छीनो.’ इस तख्ती के मायने आरक्षण-विरोधी तो थे ही, स्त्री-विरोधी भी थे. इन छात्राओं को शायद लैंगिक भेदभाव और  जातिगत भेदभाव के अंतर्संबंध की ठीक–ठीक समझ नहीं थी. एक अध्ययन के अनुसार, इस आन्दोलन के तुरन्त बाद,  छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के साथ जब भेदभाव किया गया तो उनके सवर्ण साथियों की जगह दलित साथियों ने ही उनका साथ दिया.

यह विडम्बना ही है कि आरक्षण और प्रतिनधित्व के सबसे बड़े सिद्धांतकारों महात्मा फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार और डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के प्रति महिला संगठनों में न तो आदर भाव है और ना ही कृतज्ञता भाव, जबकि इन सभी ने महिलाओं के लिए अभूतपूर्व पहल कीं थीं. डा. आम्बेडकर ने तो महिलाओं के अधिकार के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ पर संघर्ष करते हुए आजाद भारत के पहले मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया था. समानता के सिद्धांत में किन्तु–परन्तु के साथ आस्था के कारण ही शायद महिला आरक्षण बिल के मामले में महिला नेताओं और आन्दोलनकारियों ने पिछले 20 सालों में भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं की है. और इन्हीं रास्तों से पुरुष–वर्चस्व अपने लिए मार्ग तलाश लेता है. यही कारण है कि राज्यसभा में महिला प्रतिनधित्व का विषय बिल में शामिल नहीं होता है या ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ के समर्थकों को खलनायक बना कर पुरुष तंत्र इस महत्वपूर्ण बिल को टालता रहता है.

1996 से जारी है लंबा संघर्ष

सितंबर 1996 महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत और संसद की संयुक्त संसदीय समिति के सुपुर्द
नवंबर 1996 महिला संगठनों द्वारा संयुक्त संसदीय समिति को संयुक्त ज्ञापन
मई 1997 महिला संगठनों द्वारा राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को संयुक्त ज्ञापन
जुलाई 1998 विधेयक को पारित कराने की मांग को लेकर संसद के समक्ष महिलाओं का संयुक्त विरोध प्रदर्शन
जुलाई 1998 राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुव्र्यवहार की निंदा व यह मांग कि विधेयक के प्रावधानों में कोई परिवर्तन न किया जाए
अगस्त 1998 महिला संगठनों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री वाजपेयी से मिला
अगस्त 1998 विधेयक को चर्चा व पारित करने हेतु सूचिबद्ध किए जाने की मांग को लेकर संसद तक संयुक्त मार्च और धरना
नवंबर 1998 बारहवीं लोकसभा चुनाव में महिलाओं का संयुक्त घोषणापत्र जिसमें राजनैतिक दलों से इस विधेयक को पारित कराने की मांग की गई
दिसंबर 1998 ‘‘वाईसेस आॅफ आॅल कम्युनिटीज़ फाॅर 33 पर्सेन्ट रिजर्वेशन फाॅर विमेन’’ का दिल्ली में संयुक्त अधिवेशन
मार्च 1999 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के संयुक्त आयोजन में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई
अप्रैल 2000 मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संयुक्त ज्ञापन जिसमें यह मांग की गई कि विधेयक के विकल्प के रूप में महिलाओं को पार्टियांे द्वारा टिकिट वितरण में आरक्षण दिए जाने के प्रस्ताव को वापस लिए जाने की मांग की गई थी
दिसंबर 2000 लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी से महिलाओं के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात जिसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर राजनैतिक पार्टियों की उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व दिए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए उनके द्वारा राजनैतिक दलों की बैठक बुलाए जाने पर विरोध व्यक्त किया गया
मार्च 2003 केन्द्रीय संसदीय कार्यमंत्री सुषमा स्वराज को संयुक्त ज्ञापन सौंपकर यह मांग की गई कि सर्वदलीय बैठक में वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार करने की बजाए विधेयक पर मतदान कराया जाए
अप्रैल 2003 स्थानीय स्व-शासी संस्थाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले 73वें व 74वें संविधान संशोधन की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से बिल का समर्थन करने की अपील
अप्रैल 2004 एनडीए सरकार को संसद में पराजित करने की अपील करते हुए संयुक्त वक्तव्य जारी। इसमें सरकार द्वारा आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर महिलाओं के साथ विश्वासघात को एक कारण बताया गया था।
मई २००४   कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से संयुक्त अपील कि वे न्यूनतम साँझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना शामिल करें।
मई २००५   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिल कर विधेयक को चर्चा के लिए प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एक बार फिल मिल कर विधेयक को प्रस्तुत किये जाने की मांग की।
मई २००६   संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से मिल कर उनसे यह अनुरोध किया कि विधेयक के सम्बन्ध में सकारात्मक पहल करें।

मई , २००८ में सरकार ने विधेयक को राज्य सभा में प्रस्तुत किया ताकि वह निरस्त न हो जाये.

दिसंबर 2009, संसद की विधि एवं न्याय एवं कार्मिक विभागों की स्थाई समिति ने  विधेयक को पारित करने की अनुशंसा की.
फरवरी, २०१० , विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिल गयी.
मार्च  2010, राज्यसभा में विधेयक पारित हुआ.

फॉरवर्ड प्रेस के फरवरी अंक का कवर स्टोरी. साभार

एक सपने की मौत/अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में प्रतिभावान दलितों की आत्महत्या

सुधा अरोड़ा

सुधा अरोड़ा सुप्रसिद्ध कथाकार और विचारक हैं. सम्पर्क : 1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई – 400 076
फोन – 022 4005 7872 / 097574 94505 / 090043 87272.

(समय बहुत बदला नहीं है. दलित विद्यार्थियों की सांस्थानिक ह्त्या अकादमिक जगत पर ह्रदयहीन क्रूर वर्चस्व के परिणाम हैं – द्रोणाचार्य की अमरता के परिणाम . इसका सिलसिला अकादमिक जगत में दलित -पिछड़े विद्यार्थियों की पहली पीढी के आने के साथ ही शुरू हो गया था , जब ऊंची जातियों और  उच्च वर्ग के लिए ‘ आरक्षित स्पेस’ में उनकी इंट्री हुई थी . रोहित वेमुला की ‘आत्महत्या’ उसकी ही नवीनतम कड़ी है . यद्यपि सुधा अरोड़ा के 23 साल पुराने इस लेख में आई .आई टी की छात्रा की आत्महत्या की स्थितियां वही नहीं हैं, जो रोहित की आत्महत्या की हैं. लेकिन यह आलेख यह बताता जरूर है कि अकादमिक संस्थान अपने ठस्स पोजीशन से एक कदम आगे चलने के लिए तैयार नहीं . वंचित तबके से आने वाले विद्यार्थियों ने जब अपनी काबिलियत के बल पर द्रोणाचार्यों के ‘अंगूठा -अभियान’ से जूझते हुए,  विपरीत परिस्थितियों में भी अपने को सिद्ध करना शुरू किया तो यह ह्रदयहीन व्यवस्था उनके प्रति और क्रूर होती गई.  चंद्राणी हालदार  से लेकर रोहित वेमुला की आत्महत्या का निरंतर सिलसिला यही बयान करता है .)


यह पहली बार नहीं है और न आखिरी बार कि किसी अनुसूचित जाति के तबके की पहली पीढ़ी, अपनी मेहनत और लगन से, इन अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षा संस्थानों में, तकनीकी विज्ञान की स्नातक पढ़ाई तक प्रवेश पाने में सफल होने की ऊंचाई पर पहुंची, लेकिन सहपाठियों के एलीट वर्ग ने और व्यवस्था के तयशुदा हथकंडों ने उनकी विलक्षण प्रतिभा और कला का गला घोट कर उन्हें अपने सुनहरे भविष्य का अंत करने पर मजबूर किया.

इस तरह की आत्महत्या के मामले हर साल इस संस्थान में घटित होते हैं, पर न व्यवस्था का शिकंजा ढीला होता है, न आरक्षित सीट के तहत प्रवेश परीक्षा के नियम बदलते हैं, न सहपाठियों का उपेक्षा का नज़रिया बदलता है, न माता-पिता समय रहते चेतते हैं. हर साल एक नये दलित परिवार का होनहार, प्रतिभावान छात्र इस मकड़जाल में फंसकर अपने सपनों का मोहभंग होते देख अपनी ज़िन्दगी से हाथ घो बैठता है और शैक्षणिक संस्थान के आकाओं के कानों पर जूं नहीं रेंगती.

6 फरवरी 1993 को भारत के अग्रणी तकनीकी शिक्षा संस्थान आई. आई. टी. पवई, बम्बई के छात्रावास नं 10 में द्वितीय वर्ष की उन्नीस वर्षीय छात्रा चंद्राणी हालदार ने शाम साढ़े आठ बजे अपने कमरे में भीतर से सांकल चढ़ाकर आत्महत्या कर ली.

उस वक्त पहले माले के उस विंग में कोई अन्य लड़की उपस्थित नहीं थी. कुछ लड़कियां कैन्टीन में थी और अधिकांश छुट्टी का दिन होने के कारण अपने स्थानीय अभिभावकों के घर थीं. आग की लपटें और धुंआ देखकर छात्रावास में खलबली मची. बंद दरवाजे में से किसी के चिंघाड़ने की आवाज़ें आ रही थीं. दरवाज़ा तोड़कर आग बुझाई गई लेकिन तबतक चंद्राणी का शरीर बुरी तरह झुलस चुका था. घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल में उसे मृत घोषित किया गया.

चंद्राणी हालदार विशेष इंजीनियरिंग फ़िजिक्स की छात्रा थी. यह विषय अच्छे प्रतिशत से प्रवेश परीक्षा पास करनेवाले,सभी क्षेत्रों से आनेवाले मेधावी छात्रों में से भी, सिर्फ 2 या 3 प्रतिशत छात्रों को ही मिलता है.

आई. आई. टी. में प्रवेश का समान अवसर देने के लिये एस सी, एस टी की दो चार सीटों के आरक्षण में पिछले दो वर्षों से प्रादेशिक भाषा में भी प्रवेश परीक्षा देने का प्रावधान रखा गया है. चंद्राणी हालदार ने शुरु से बांग्ला माध्यम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी, इसलिए आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा भी बांग्ला माध्यम से लिखकर पास करना उसके लिए टेढ़ा काम नहीं था. बचपन से ही वह बहुत मेधावी और प्रतिभावान छात्रा थी. लेकिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना उसके लिये एक बड़ी बाधा थी जिसके कारण छात्रावास की अपनी दूसरी सहपाठिनों से वह बातचीत नहीं कर पाती थी. इसी के तहत पहले साल में उसके अच्छे अंक नहीं आये थे और दूसरे साल भी वह पिछले साल के कुछ पेपर दुबारा दे रही थी.

दो दिन पहले ही उसे पता चला था कि संभवत: इस बार भी उसके अंक अच्छे नहीं आये हैं. संस्थान के नियमों के मुताबिक दो वर्ष लगातार औसत अंक न आने से छात्र को संस्थान छोड़ना पड़ता है, चंद्राणी को इस आशय का ‘चेतावनी पत्र’ मिल चुका था.

शनिवार (6 फरवरी 1993) के दिन शाम को, चंद्राणी ने दूरदर्शन की फ़िल्म ‘आसपास’ शुरू से आखिर तक देखी. इस फ़िल्म में हेमामालिनी अंत में खुदकुशी कर लेती है. साढ़े आठ बजे फ़िल्म ख़त्म होने पर वह सीधी अपने कमरे में गयी और निराशा और कुंठा की चरम आत्महंता मन:स्थिति में अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया.

चंद्राणी हालदार अपनी मातृभाषा बांग्ला में कविताएं लिखती थी, एक बहुत अच्छी चित्रकार भी थी और पेन्टिंग के ब्रश धोने के लिये अपने कमरे में डालडा के टिन में केरोसिन तेल रखती थी, जिसका इस्तेमाल उसने अपने जीवन का अन्त करने के लिये किया.

देश के नामी प्रतिष्ठित संस्थानों में आत्महत्या की यह घटना पहली नहीं है. अहमदाबाद के मैनेजमेंट के सुप्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट में भी इस तरह के मामले सुनने में आये है. आत्महत्या करनेवाले छात्रों के मानसिक असंतुलन या व्यक्तिगत समस्याओं (पारिवारिक कलह, तनाव, असुरक्षा या असफल प्रेमप्रकरण) को जिम्मेदार ठहराकर इन मामलों को खारिज कर दिया जाता है और इस तरह की ख़बरें अख़बार के तीसरे या पांचवे पन्ने के एक छोटे से कॉलम तक सीमित रहकर ख़त्म हो जाती हैं.

चंद्राणी हालदार निम्न मध्यवर्ग की अनुसूचित जाति से थी. उसके पिता, जो रेलवे स्टाफ में हैं, खडगपुर से सोमवार को बम्बई पहुंचे. चंद्राणी की मां, जो ट्रेन से आ रही थी और ट्रेन अठारह- बीस घंटे लेट थी, मंगलवार की रात को ही बम्बई पहुंच पाई. बुधवार की दुपहर को ही चंद्राणी का दाह – संस्कार किया जा सका. इलेक्ट्रिक क्रेमोटरियम में चंद्राणी की मां की चीखों और आख़िरी विनती ”आमी ऐकबार आमार मेयेर मुख देखबो” से वहां एकत्र हुई छात्राओं के दिल दहल गये.

सोमवार 8 फरवरी को आई. आई. टी के लेक्चर थियेटर और मेन बिल्डिंग के सामने सभी छात्रों ने रजिस्ट्रार और डीन के सामने प्रदर्शन किया और अपनी कुछ मांगे रखीं जिनमें प्रमुख यह थी कि आई. आई. टी. परिसर के भीतर स्थित अस्पताल में कुछ आवश्यक उपकरण और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधायें उपलब्ध करवायी जायें और अस्पताल को एमरजेंसी की हालत में उपयोग करने लायक स्थिति में रखा जाये.

तीन वर्ष पहले कानपुर के आई. आई. टी. में केमिकल इंजीनियरिंग के एक छात्र ने प्रयोगशाला में रासायनिक परीक्षण करते समय एक जहरीला रसायन गलती से भीतर खींच लिया था जिससे उसके फेफड़े और अंतड़ियों को गंभीर नुकसान पहुंचा. तुरन्त उसे अस्पताल की सहायता और डॉक्टरों की मुस्तैदी से बचाया जा सका. उसके इलाज में छह महीने से भी अधिक समय लगा पर इस तरह के मामले में डॉक्टर या अस्पताली सहायता की ज़रा सी असावधानी या ढील छात्र को मौत के मुंह में लें जा सकती थी.

यह सही है कि अस्पताल में प्राथमिक चिकित्सा के अनिवार्य उपकरणों और सुविधाओं का समय पड़ने पर तत्काल उपलब्ध करवाया जाना बहुत ज़रूरी है लेकिन यह आत्महत्या जैसी घटनाओं का हल नहीं है. इस तरह के हादसों के बाद की अनिवार्य चिकित्सा से अधिक आवश्यक है, ऐसे हादसों तक पहुंचाने की मन:स्थिति और माहौल के कारणों का निदान ढूंढना.

आई. आई. टी. जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाना कितना मुश्किल और प्रतिस्पर्धात्मक है, यह सभी जानते हैं. यह एक ऐसी संस्था है जहां चुनाव सिर्फ योग्यता और प्रतिभा के बल पर होता है, जहां कोई पहुंच, साधन, रिश्वत या जोड़ – तोड़ नहीं चलती.

कई बार आई. आई. टी. के प्राध्यापकों के अपने बच्चे भी पूरी कोशिश के बावजूद प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं होते. इन प्रवेश परीक्षाओं की विशेष ट्रेनिंग के लिये अग्रवाल क्लासेज़ और ब्रिलिएन्ट क्लासेज़ जैसे महंगे कोर्स हैं जिनमें प्रवेश लेने के लिये 85 प्रतिशत अंक आने आवश्यक है. इन पत्राचार पाठयक्रमों में प्रवेश लेकर, दो – तीन सालों की कड़ी मेहनत के बाद भारत के कोने -कोने से लाखों छात्र आई. आई. टी. की प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से कुल दो-ढ़ाई हजार के लगभग छात्रों का चुनाव हर वर्ष इस शिक्षण संस्थान के लिये किया जाता है. इसमें कुछ सीटें अनुसूचित जाति के लिये भी आरक्षित रहती हैं, जिसके तहत पिछले दो वर्षो से प्रादेशिक भाषाओं में भी प्रवेश – परीक्षा लिखने का प्रावधान किया गया है.

सवाल यह उठता है कि वर्षों की मेहनत और अपनी योग्यता के प्रति किंचित आश्वस्त छात्र की समस्या क्या इस संस्थान में प्रवेश पा लेने पर ही समाप्त हो जाती है ?

आई. आई. टी. (बम्बई, मद्रास, दिल्ली, कानपुर और खडगपुर) या आई. आई. एम (अहमदाबाद) जैसे संस्थानों में छात्रावास में रहना विद्यार्थियों के लिये अनिवार्य है. छोटे शहरों या कस्बों से आये छात्र – छात्राओं को भी कुछ अपनी सुविधा और कुछ प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों की गुणवत्ता के अनुसार शहर के चुनाव की सुविधा दी जाती है. प्रवेश के समय सलाहकार, प्राध्यापक इसके लिये मौजूद रहते हैं.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की कुछ ‘बनने’ के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह ‘ब्रिलियन्स शॉक’ है. छात्रावास में आये अधिकांश छात्र ऐसे होते हैं जो पहली बार पढ़ाई के लिये अपने घर से दूर होते हैं. शुरु शुरु में सभी छात्र ‘होमसिक’ महसूस करते है पर धीरे धीरे वे हॉस्टल और इंस्टीटयूट के व्यस्त कार्यक्रमों और अनुशासन के ढांचे में रच-खप जाते हैं. छात्रावास के इस माहौल और शैक्षणिक पध्दति में जो अपने को सम्मिलित नहीं कर पाते, वह एक या दो प्रतिशत ही होते हैं.

क्या अपनी महत्वाकांक्षा को साकार करने की अपनी योग्यता के प्रति आश्वस्त छात्र अपना मोहभंग होते देख आत्महत्या पर मजबूर हो जाते हैं ? हो सकता है, एक या दो मामले असफल प्रेम या पारिवारिक उपेक्षा या दबाव के हो किन्तु अधिकांश आत्महत्याएं इस तरह के शैक्षणिक ढांचे के अभिजात्य और साथी छात्रों के सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक माहौल से अपना संतुलित तालमेल न बिठा पाने के कारण होती हैं. सवाल यह है कि इस तरह के तथाकथित ‘ मिसफिट ‘ छात्रों के लिये इंस्टीटयूट या छात्रावास के अन्य साथी अपनी ओर से उन्हें मुख्यधारा में मिलाने की कितनी कोशिश करते हैं ? और वे खप नहीं पाते तो क्यों ?

चंद्राणी हालदार का ही उदाहरण लें – एक औसत निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आयी एक मेधावी लड़की. उसके पिता बताते हैं कि उन्हें उस पर गर्व था, हर बार कक्षा में प्रथम आने की रिपोर्ट लाकर अपने माता पिता के पांव छूकर आशीर्वाद लेती थी, उसके स्कूल को उस पर नाज़ था- आई. आई. टी. की संयुक्त प्रवेश परीक्षा पास करनेवाली अपने स्कूल की वह एकमात्र छात्रा थी. बहुत अच्छी चित्रकार थी, गाने का भी उसे शौक था, बंगला में कुछ मौलिक रचनायें भी लिखा करती थी, अपनी भाषा पर उसका अच्छा अधिकार था. आख़िरी बार जब उसके पिता ने उससे बात की, उसने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था कि वह निराश या दुखी है.

चंद्राणी हालदार जैसी मेधावी लड़की अपनी आंखों में अपने परिवार, अपने बुज़ुर्गों की तमाम उम्मीदें और ज़िन्दगी में कुछ कर दिखाने, कुछ ‘बनने’ के सपने संजोये छात्रावास में आती हैं. कुछ महीनों बाद ही दूसरी छात्राओं के सम्पर्क में आते ही उसे अपनी प्रतिभा, अपनी ऊंचाई का दर्प धूल-धूसरित होता दिखाई देता है. यह ‘ ब्रिलियन्स शॉक ‘ है.

उसने पहली कक्षा से ही बंगला माध्यम से पढ़ाई की है. न वह हिन्दी जानती है, न अंग्रेजी. यहां फर्राटे से अंग्रेजी बोलनेवालों के बीच वह अपने आप को छोटा महसूस करती है. उसे लगता है उसका मखौल उड़ाया जा रहा है और वह, जो अपने आप को बहुत बुध्दिमान समझती आयी है, यहां के अंग्रेजी-दां छात्र-छात्राओं के बीच एक अव्वल दर्ज़े की मूर्ख साबित हो रही है. उसकी कस्बई योग्यता की अहमियत यहां कुछ नहीं है. अंग्रेजी की बाधा के कारण अपने जीवन में पहली बार इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में प्राप्त कम अंक उसे दहशत में डाल देते हैं.

संभवत: उसे लगा होगा कि द्वितीय वर्ष में भी यही स्थिति रहने पर उसे यदि संस्थान छोड़ना पड़ा तो वह कौन सा मुंह लेकर अपने अभिभावकों के पास जायेगी, जिनकी सारी उम्मीदों और सारे सपनों का अन्तिम छोर वह है. इसके अतिरिक्त उसका अपना वह आत्मीय, छोटा सा घरेलू माहौल यहां के पूरी तरह व्यावहारिक और प्रतियोगी, गला-काट प्रतिस्पर्धा के बीच खो जाता है.

यह ‘ कल्चर शॉक ‘ उसे और अकेला कर देता है. धीरे-धीरे वह अपनी सहपाठी छात्राओं से कटती चली जाती है. इस ‘ अकेलेपन ‘ के साथ पढ़ाई का भीषण दबाव उसे इस तरह के जानलेवा निर्णय के सामने खड़ा कर देता है. यूं भी अठारह से बाईस वर्ष तक के छात्र – छात्राएं इस संस्थान में आते हैं. यह उम्र वैसे भी बहुत नाज़ुक और अपरिपक्व होती है, जब किसी भी तरह का बाहरी झटका, छात्र के भीतर की दुनिया को ध्वस्त कर देता है. यह भी सही है कि इस तरह के निर्णय एक झटके से नहीं लिये जाते, इसके लिये मन में बहुत धीरे – धीरे ज़मीन तैयार होती रहती है.

द्वितीय वर्ष की इन्जीनियरिंग फ़िजिक्स की एक अन्य छात्रा ने बताया कि शुरु-शुरु में वह बिल्कुल बात नहीं करती थी क्योंकि उसका भाषाई माध्यम सिर्फ बांग्ला था. पर एक साल के बाद अपनी बात समझा पाना उसने सीख लिया था.फ़िजिक्स में उसे शुरु से दिलचस्पी थी और स्कूल के उसके अध्यापक ने उसे खडगपुर (जहां से वह आयी थी ) न ज्वायन कर बम्बई आई. आई. टी. चुनने की सलाह दी. उनका कहना था कि खडगपुर से मुंबई का स्टाफ बेहतर था. वह बहुत मजबूत व्यक्तित्व की लगती थी. जनवरी को हुए हॉस्टल के मेले में उसने खेल का एक स्टॉल संभाला था. शायद उस फ़िल्म ‘आसपास’ का उसके मन पर कुछ असर पड़ा हो और यह निर्णय तात्कालिक हो.

आई. आई. टी. कैम्पस के एक बंगाली संगीत शिक्षक के परिवार से पीयूल मुखर्जी ने कहा, ” हमें इस खबर से बहुत धक्का पहुंचा है, पिछले साल जब वह नयी-नयी बम्बई आयी थी, उसे अकेले देखते हुए और वह होमसिक महसूस न करे, हम उसे दादर दुर्गापूजा दिखाने ले गये, फिर घर का बंगाली खाना भी उसे खिलाया. दो-एक बार वह आयी भी, फिर उसने खुद ही आना बन्द कर दिया. हमने सोचा, शायद पढ़ाई के दबाव में वक्त नहीं मिलता होगा लेकिन इस दुर्घटना ने हमारे मन में बड़ा अपराध भाव पैदा कर दिया है. हम सब वक्त की रफ़्तार में भागे चले जा रहे हैं. बम्बई की मशीनी ज़िन्दगी तो आपको मालूम ही है. काश, हम उसकी खोज खबर लेते रहते.”

एक अन्य सीनियर छात्रा ने बताया, ” एक दिन तेज़ बारिश में हम एक छाते में दो लड़कियां भीगने से बचते हुए तेज़ चल रहे थे तो दूर से एक लड़की आराम से भीगती हुई धीरे धीरे आ रही थी. पास आयी तो देखा, चंद्राणी थी. हमने उससे कहा, जल्दी कपड़े बदलो वर्ना बीमार हो जाओगी, इस तरह बारिश में भीग क्यों रही हो तो उसने इत्मीनान से मुस्कराकर जवाब दिया, ‘ भालो लागछे ‘ (अच्छा लग रहा है.) हमें वह बहुत डिप्रेस्ड लगी लेकिन कुछ दिनों के बाद देखा, उसने बाल कटवा लिये हैं और स्कर्ट ब्लाउज़ भी पहनने लगी है तो हमें लगा कि वह हॉस्टल में एडजस्ट हो गयी है. ”

संभवत: अपने बाल काटकर या अपना पहरावा बदलने की सायास कोशिश के बावजूद वह दूसरे छात्रों और अपने बीच की गहरी खाई पाट नहीं सकी और अन्तत: किसी कमज़ोर क्षण में उसने अपना सब कुछ होम कर देना ही उचित समझा.  सवाल यह उठता है कि इस तरह के अकेलेपन, निराशा या अवसाद की स्थिति में पहुंचाने के लिये क्या स्वयं छात्र और अभिभावकों सहित पूरा माहौल जिम्मेदार नहीं है ? क्या इन प्रतिष्ठित संस्थानों के प्राध्यापक और छात्र – छात्राएं इस तरह के छात्रों के लिये अपनी कोई जिम्मेदारी महसूस करते हैं? क्या हर छात्रावास के तथाकथित वॉर्डन प्रोफ़ेसर को यह मालूम रहता है कि देर रात तक पढ़ाई में व्यस्त इन टीन – एजर्स छात्र छात्राओं की सख्त रूटीन में एक-दो छात्र ऐसे भी हैं जो लगातार धीरे – धीरे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और अकेले पड़ते जा रहे हैं ? क्या अपनी नियमित कक्षाओं से अलग इन संस्थानों के प्राध्यापक अपेक्षाकृत कमजोर छात्रों के लिये कुछ अतिरिक्त कक्षाओं का वक्त निकाल पाते हैं ?

और इससे भी ज़रूरी सवाल कि क्या इन उच्च मध्यवर्ग के अंग्रेजी-दां छात्रों के बीच निम्न मध्य वर्ग या निम्न वर्ग या अनुसूचित जातियों के एक-दो छात्रों के लिये (जो पूरी तरह अपने आप को इस नये अजनबी माहौल में मिसफिट पाते हैं) किसी तरह की काउन्सिलिंग की व्यवस्था है जो छात्र को अपने विश्वास में लेकर स्नेह का, अपनत्व का माहौल दे सकें ?

कानपुर के आई. आई. टी. में हिन्दी के प्रमुख वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर के नेतृत्व में एक रचनात्मक कक्ष -क्रिएटिव विंग शुरु किया गया था, जहां विज्ञान के छात्र भी रचनाओं के सृजन में, नये नये लेखकों से मिलने में बेहद दिलचस्पी लेते थे. इस क्रिएटिव विंग की सबसे बड़ी सफलता थी कि 1979 से 1993 के बीच उस संस्थान में आत्महत्या के इक्का दुक्का मामले ही सामने आए. इस तरह की ब्रीदिंग स्पेस तैयार की जानी चाहिए.

क्या इस तरह की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए जहां एक कच्ची उम्र का प्रतिभावान छात्र अपने संजोकर रखे हुए सपनों को बांट सके ? यदि ऐसा हो सकता है, तो उस मशीनरी को अधिक तत्परता से कारगर करने की आवश्यकता है, क्योकि पूरे देश में से चुने गये इन विलक्षण छात्रों में से एक को भी खोना न सिर्फ उसकी महत्वाकांक्षा और उसके माता-पिता के सपनों की मौत है बल्कि इन संस्थानों के सांस्कृतिक अभिजात्य के मुंह पर एक ज़बरदस्त तमाचा है.

मातृवंशात्मक समाज में स्त्री

आकांक्षा 

महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

आमतौर पर कुछ माता –प्रधान समाजों को मातृसत्तात्मक समाज कह दिया जाता है. ऐसा पितृसत्ता के विलोम के तौर पर किया जाता है. हालांकि पितृसत्ता एक सैद्धांतिक शब्दवाली है , जो पुरुष की सत्ता और स्त्रियों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन को अभिव्यक्त करती है. समाज में इसके विलोम की सत्ता कभी नहीं रही, अर्थात स्त्रियों की सत्ता और पुरुषों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन की स्थिति और न यह कोई स्त्रीवादी लक्ष्य है. स्त्री –अध्ययन की शोध-छात्रा आकांक्षा का यह लेख बताता है कि भारत के कुछ समाजों में मातृवंशात्मक व्यवस्था रही है, इस व्यवस्था में स्त्री की स्थिति को विश्लेषित करता यह आलेख. आलेख से यह भी स्पष्ट होगा कि मातृवंशात्मक व्यवस्था मातृसत्ता  नहीं है.

सबलोग के  कॉलम ‘स्त्रीकाल’ के लिए स्त्रीवादी दृष्टि से लिखे आलोचनात्मक विचार –आलेख और रचनायें आमंत्रित हैं. जनवरी अंक में आकांक्षा का  लेख
संजीव चंदन  

        
सभ्यता के आरंभिक इतिहास से यह ज्ञात होता है कि मानव समाज गुफाओं और कंदराओं में रहा करता था। उस समय न तो निजी संपत्ति की अवधारणा थी और न ही परिवार तथा राज्य की। मनुष्य (स्त्री-पुरुष) आखेट/शिकार करके अपना जीवन यापन किया करते थे। धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष छोटे-छोटे समूह बनाकर रहने लगे और यही समूह आगे चलकर कबीले में रुपांतरित हो गया। यह युग इतिहास में कबीलाई युग के नाम से जाना जाता है। इस समय तक एक तरह से स्त्री-पुरुष के बीच काम का बंटवारा हो गया था। आमतौर पर कबीले के पुरुष शिकार करते थे और महिलाएं कंद-मूल इकट्ठा करने का काम किया करती थीं। इस युग में पुरुष वर्ग का महिलाओं के जीवन, रहन-सहन आदि पर पूर्णरुप से वर्चस्व नहीं हो पाया था और महिलाओं की यौनिकता पर भी किसी का नियंत्रण नहीं था। यह इस युग की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। महिलाएं अपनी इच्छानुसार कबीले के अंदर किसी भी पुरुष के साथ संबंध बना सकती थीं। अत:, बच्चों की मां का तो पता रहता था पर, पिता कौन है, यह जान पाना मुश्किल होता था।

महिलाओं पर सिर्फ एक ही पुरुष के साथ संबंध बनाने की बाध्यता न होने की वजह से बच्चों की पहचान मां के आधार पर ही होता था। अत:, इस समाज में पैदा होने वाले बच्चों को मां की वंश व्यवस्था की तरफ से स्थायी सदस्यता मिलती थी तथा वंश भी माता के माध्यम से ही चलता था। पर, अधिकांश मामलों में निर्णय संबंधी कार्य, प्रबंधन का कार्य आदि पुरुषों के हाथ में ही होता था। इस समाज में संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता था क्योंकि कबीलों की संपत्ति एक समूह की सामुदायिक संपत्ति मानी जाती थी। सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य संग्राहक की भूमिका भी निभाने लगा था। अब तक मनुष्य जीवन-यापन के लिए जो भी उपक्रम करता था जैसे- शिकार करना, जंगलों से कंद-मूल इकट्ठा करना आदि, उसे तुरंत ही खाकर खत्म कर देता था और दूसरे दिन पुन: वही उपक्रम करता था। पर, धीरे-धीरे इन सामग्रियों का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया था ताकि, दूसरे दिन भी इनका उपयोग किया जा सके। धीरे-धीरे कृषि का भी विकास हुआ। वस्तुओं के संग्रहण ने निजी संपत्ति की अवधारणा को जन्म दिया। निजी संपत्ति की अवधारणा के उदय से इस बात की जरूरत महसूस हुई कि संग्रह की गई चीजों अर्थात संपत्ति को उनके ही समूह के किसी सदस्य को हस्तांतरित किया जाए।
ऐसी स्थिति में मातृवंशात्मक समूह की संपत्ति का कुछ हिस्सा जो कि किसी व्यक्ति के लिए ज्यादा उपयोगी था उसे दे दिया जाता था। पर, संपत्ति भी हस्तांतरित करने में यह अनिवार्य था कि जो संपत्ति माता के वंश की है उसे ही हस्तांतरित किया जाए न कि पिता के वंश की संपत्ति को। इस समाज व्यवस्था को ही मातृवंशात्मक व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। इस व्यवस्था को ही अधिकाशत: लोग मातृसत्तामक व्यवस्था के रुप में व्याख्यायित करते हैं जबकि यह गलत है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था का अर्थ यह है कि सत्ता पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में हो और महिलाएं अपनी इच्छानुसार उस सत्ता का उपयोग करें जबकि, मातृवंशात्मक व्यवस्था में सिर्फ व्यक्ति की पहचान माता के वंश के आधार पर होता है। सत्ता पूर्णरुप से महिलाओं के पास नहीं होती है। विश्व के कई देशों में भी यह परंपरा रही है। भारतीय संदर्भ में हम मेघालय की खासी और गारो जनजातियों को देख सकते हैं। केरल के नायर जातियों की ‘तारवाड़ व्यवस्था’ को भी हम इसी के अंतर्गत रख सकते हैं।

उत्तर-पूर्व में मातृवंशीयता

गारों जनजाति में परिवार मातृवंशीय होता है। इस जनजाति के लोग अपना मूल पूर्वज  महिला को ही मानते हैं। संपत्ति की अधिकारी भी बेटियां ही होती हैं। इस व्यवस्था के अनुसार परिवार की किसी भी बेटी को संपत्ति का उत्तराधिकारी चुना जा सकता है पर आमतौर पर व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। संपत्ति की उत्तराधिकारी परिवार की सबसे छोटी बेटी होती है। इसी तरह खासी जनजाति नें भी वंश परंपरा स्त्री-पूर्वज के आधार पर ही चलता है। खासी समुदाय के अंतर्गत एक परिवार में माता, अविवाहित बच्चे, विवाहित बेटियां और उसका पति रहता है। परिवार में किसी महिला सदस्य न होने की स्थिति में लड़कियों को गोद लेने की परंपरा है ताकि, वंश प्रक्रिया की निरंतरता बनी रहे। समाज में हो रहे धार्मिक गतिविधियों में भी महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस जनजाति में परिवार की छोटी बेटी को ज्यादा सम्मान मिलता है और इसीलिए संपत्ति की उत्तराधिकारिणी भी वही होती है। इस जनजाति जो कुछ भी उनके पुरुष सदस्य कमाते हैं उस पर उस परिवार की बुजुर्ग महिला सदस्य का नियंत्रण होता है। पुरुष को अपनी सारी कमाई उस शादी से पहले अपनी माता को तथा शादी के बाद अपनी पत्नी को देना होता है। सतही तौर पर देखने में तो यह स्पष्ट होता है कि इस समाज की महिलाओं की स्थिति बहुत ही सम्मानजनक है, सत्ता भी महिलाओं के ही हाथ में है पर, वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इस समाज में रह रही महिलाएं भी उसी तरह अपने परिवार/समाज के पुरुषों के शोषण का शिकार हैं जैसा कि अन्य समाज की महिलाएं।  हां, इनके शोषण का स्वरुप थोड़ा अलग है। खासी महिलाओं के बीच इस तरह की समस्याओं का सबसे महत्वपूर्ण कारण उसके परिवार के पुरुष सदस्यों का अत्याधिक शराब पीना है। शराब के नशे में वह असंयमित हो जाते हैं और कई बार संबंधों को बचा पाना भी असंभव हो जाता है और स्थिति तलाक तक पहुंच जाती है। इसके अलावा खासी समाज एक और महत्वपूर्ण समस्या से जूझ रहा है और वह है वहां की छोटी बेटी के नाम जायदाद का आना। उस समाज के लोगों के अनुसार, अकसर जायदाद के लालच में लड़के, जिसमें से ज्यादातर मैदानी क्षेत्र से आए हुए होते हैं वे खासी समाज की छोटी लड़कियों से प्रेम का नाटक करके शादी करते हैं। और बाद में बेहतर जिंदगी का लालच देकर सारा जायदाद अपने कब्जे में कर लेते हैं। बेहतर जिंदगी का स्वप्न देखती ये लड़कियां उनके झांसे में आ जाती है और जब सारा अधिकार उसे दे देती हैं तो वह पुरुष दूसरा विवाह कर लेता है या फिर तलाक देकर उसे दोयम दर्जे पर ला देता है। ऐसी स्थिति में अकसर मां-बाप छोटी बेटी को कहीं ऐसे सुरक्षित स्थान पर तब तक छिपाए रखते हैं जब तक उनकी पसंद और अच्छे परिवार का लड़का दामाद के रुप में उनको नजर नहीं आता है। एक तरह से वह सोने की चिड़िया जैसी हो जाती है। यह स्थिति उस लड़की के लिए भी अमानवीय होती है। वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकती। न कहीं अकेले जा सकती है, न किसी से दोस्ती कर सकती है जब तक कि उसके मां-बाप पूरे विश्वास के साथ ’अच्छे परिवार’ के लड़के से उसकी शादी नहीं कर देते।

दक्षिण में मातृवंशीयता
केरल की नायर जाति में भी मातृंवशात्मक व्यवस्था है। यहां भी संपत्ति की उत्तराधिकारी बेटी ही होती है। लेकिन तमाम निर्णय प्रक्रिया में पुरुषों, खासकर मामा का वर्चस्व होता है। यहां इस व्यवस्था को ‘तारवाड़ व्यव्स्था’ कहा जाता है। ‘तारवाड़ व्यवस्था’ में वैवाहिक आवास का पारंपरिक स्वरुप द्विस्थानिक होता है। पुरुष की ही तरह स्त्री को भी विवाह के समय अपना मायका छोड़कर नहीं जाना होता था। पुरुष अपनी पत्नी के घर में रात बिताकर सुबह अपने घर लौट जाता था। इस तरह से स्त्री अपने मायके से अलग नहीं की जाती थी तथा वह अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ ही रहती थी। बच्चे भी अपनी माता के साथ अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ रहते थे। गृहस्थियों में रहने वाले पति या पिता को स्थायी सदस्य नहीं माना जाता था। उनकी पहचान उनके अपने ‘तारवाड़’ (वंश) से होती थी।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष किसी को भी समूह की संपत्ति में अपने हिस्से का निजी तौर पर अलग से निपटारा करने का अधिकार नहीं है। इस सामुदायिक संपत्ति को बेचने या किसी को देने के लिए समूह के वयस्क लोगों की सहमति अनिवार्य है। कहा जा सकता है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार प्राप्त है। पति अपनी जरूरत के लिए मिले मातृवंश के हिस्से को, पत्नी की जरूरत के लिए मिले उसके मातृवंश के हिस्से को मिलाकर संयुक्त रुप से उसकी देखभाल कर सकता है पर, उसकी मृत्यु के साथ ही यह व्यवस्था खत्म हो जाती है। पुरुष अपने ‘तारवाड़’ का हिस्सा अपने बच्चों को नहीं दे सकता क्योंकि, बच्चा अपनी माता के ‘तारवाड़’ का स्थायी सदस्य माना जाता है।

आमतौर पर माना जाता है कि इस समाज व्यवस्था में बड़ी बेटी को ज्यादा महत्व दिया गया है। निर्णय लेने तथा सम्मान पाने की अधिकारिणी वही होती है यानी सत्ता उसी के हाथ में होती है। वही किसी को भी संपत्ति हस्तांतरित कर सकती है। जिन संपत्तियों को वह हस्तांतरित कर सकती थी उनमें मुख्य रुप से वृक्ष, गृह अथवा रहने के लिए तैयार किया गया कोई भी ढ़ांचा, नौकाएं, मछली पकड़ने की जगह, नारियल की जटाएं तथा कुछ अन्य  तरह की चल संपत्तियां आदि आते थे। सभी तरह की संपत्तियों पर और उसके हस्तांतरण का अधिकार तो बेटी को था पर व्यावहारिक रूप से इन संपत्तियों का प्रबंधन पुरुष सदस्यों जैसे, नानी के भाई, मां का भाई आदि के हाथ में होता है। प्रत्येक संपत्ति समूह को नियंत्रित करने वाला एक पुरुष होता है जिसे ‘कार्णवर’ कहा जाता है। ‘कार्णवर’ संपत्ति का प्रबंधन भी देखता था, उत्पादन का काम नियोजित करता था तथा गृहस्थी में रह रहे पुरुषों के बीच काम का बंटवारा भी करता था। प्रशासन से काम पड़ने की स्थिति में वह अपने समूह का प्रतिनिधित्व भी करता था। किसी भी समारोह तथा धार्मिक आयोजन में उसे विशेष आदर दिया जाता था और इस पर मुखिया की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। लेकिन ‘कार्णवर’ को यह अधिकार नहीं प्राप्त था कि वह अपनी इच्छा से किसी को कोई जमीन पट्टे पर दे दे या किसी संपत्ति को बेच सके। संपत्ति बेचने का अधिकार भले ही उसको न रहा हो पर व्यवहारिकता में निर्णय लेने का अधिकांश काम पुरुषों द्वारा ही किया जाता था जो कि सिद्धांतत: महिलाओं का काम होना चाहिए था।

विवाह-व्यवस्था में बुजुर्ग महिलाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं। प्रथम विवाह (स्पष्ट होता है कि इस समय बहुविवाह का भी प्रचलन था) में समूह की हर महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर, अन्य वैवाहिक संबंध प्राय: व्यक्ति अपनी इच्छा से बना सकता था। माता को यह अधिकार प्राप्त था कि वह अपनी बेटियों और उसके पतियों पर पर्याप्त दबाब डाल सकती थी। इस मातृवंशीय समूह की महिलाएं खासकर बुजुर्ग महिलाएं बच्चे के जन्म, मृत्यु, कर्णछेदन इत्यादि से संबंधित सारे कर्मकांडों और समारोहों के संपादन और निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कोई महिला कितनी शक्तिशाली हो सकती है यह उसकी उम्र तथा कार्णवर से उसकी नातेदारी से तय होता था। वैवाहिक विवादों में प्राय: पुरुष से यह सवाल पूछे जाते थे कि क्या अपनी पत्नी के घर उसे शाम के समय संतोषजनक मात्रा में अच्छा खाना मिलता है? यहाँ के सामाज में इस तरह के तमाम संकेत मिलते हैं जिससे एक भ्रम की स्थिति बनती है कि यहाँ के समाज में महिलाओं का ही वर्चस्व है या सत्ता उन्हीं के हाथ में है पर, वास्तविकता कुछ और ही है.

विभिन्न समाजों में मातृवंशीय परंपरा की विद्यमानता से तो सैद्धांतिक रूप से यह कहा जा सकता है कि मातृवंशीय समाज में महिलाओं का स्थान श्रेष्ठ था लेकिन व्यावहारिक स्थिति का आंकलन करने से यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि अंतत: निर्णय और प्रबंधन के सारे अधिकार पुरुषों के ही हाथ में रहते हैं। चूंकि मातृवंशीयता समाज एक तरह से परंपरा की देन है और परंपरावादी समाज में किसी भी परंपरा को आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। समाज अगर परंपराओं की जड़ता से मुक्त होने में शीघ्रता बरतने लगता तो शायद सैद्धांतिक रूप से मिले महिलाओं के यह अधिकार भी कभी के छीन लिए जाते।

संदर्भ सूची-
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