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महावारी से क्यों होती है परेशानी

आरती रानी प्रजापति 

महावारी हर स्त्री के 10-14 की आयु में शुरू होने वाला नियमित चक्र है| जिसमें स्त्री की योनि से रक्त का स्त्राव होता है| यह वह समय है जब स्त्री के शरीर में कई परिवर्तन होते हैं| महावारी सिर्फ शरीर में घट रही एक घटना नहीं है,  बल्कि इसका सम्बन्ध दिमाग से भी है| महावारी के समय स्त्री थकान महसूस करती है| लगातार ३-४ दिन का रक्त स्त्राव उसे कमजोर करता है| कई महिलाओं को इस समय हाथ-पैरों में सूजन, पेट-पैर में दर्द, कमर दर्द, बुखार, भूख न लगना, कब्ज जैसी अन्य समस्याएँ भी होती हैं| कुल मिलाकर महावारी के समय स्त्री का स्वास्थ्य  देखभाल की मांग करता है उसे आराम की जरूरत होती है,  जिसे अति संवेदनशील पितृसत्तात्मक समाज नहीं समझता| स्त्री के इस प्राकृतिक नियम को समाज उसकी कमजोरी मानता है|

साभार  गूगल (इन्स्टाग्राम )

दलित और स्त्री दोनों को भारतीय समाज समान नजर से आंकता है| स्त्री मासिक धर्म के दौरान अछूत बन जाती है| वे सभी काम जिन्हें शुभ माना जाता है उनसे उस स्त्री को दूर रखा जाता है| यहाँ तक कि जिन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में स्त्रियाँ अपना आधे से ज्यादा वक्त लगाती है वह भी स्त्री के लिए के लिए अस्पृश्य हो जाते हैं| महावारी के समय स्त्रियाँ मनुष्य द्वारा निर्मित ईश्वर की मूर्ति को छू नहीं सकती| उसे पूजा-पाठ की सभी चीजों से दूर रखा जाता है| तथाकथित भगवान के बर्तन,कपड़ें, खाना वह महीने के तीन-चार दिन अपने से दूर ही रखती है| लेकिन मजे की बात यह है कि वह खाना जो उस ईश्वर को रखा जा रहा है बनाती वही स्त्री है| खाना बनाते समय वह अछूत नहीं होती पर बाद में वह अछूत हो जाती है उस भगवान के लिए जिसके अस्तित्व पर आज लाखों सवाल हैं|

 आज भी कई घरों में माहवरी के समय महिलाओं से काफी भेद भाव किया जाता है| कहने को तो हम आधुनिक समाज में हैं पर स्त्री शब्द के सामने यह आधुनिकता जाने कहाँ चली जाती है| आज भी ऐसे कई घर हैं जो माहवरी के समय स्त्री के शरीर से दूर रखते हैं अपनी घर की सभी चीजों को| माहवारी वाली स्त्री को घर की रसोई में कोई काम नहीं करने दिया जाता उसे अपने कमरे में रहना होता है| तीन दिन बाद जब उसे पवित्र की कोटि में रखा जाता है तब पूरे घर की साफ सफाई वही औरत करती है| रसोई साफ करती है| जितने कपड़ें वह उपयोग में लाती है पहनने-ओड़ने वाले सभी को वह धोती है| एक थकान भरा काम हर महीने उसके जिम्मे होता है क्योंकि वह स्त्री है|

साभार गूगल

महावारी में ऐसा क्या है जो इसे इतना घृणित माना जाता है| क्या रक्त का निकलना वास्तव में एक अपराध है? नहीं माहवारी में पवित्रता की यह जो धारणा  है उसका सीधा सम्बन्ध स्त्री की योनि से है| रक्त का स्राव योनि से होता है इसलिये माहवारी के रक्त को अपवित्र माना गया है| वरना शरीर के किसी अन्य अंग से निकले रक्त की तरह यह रक्त भी है| भारतीय समाज में स्त्री दोयम दर्जें पर रखी गई है जिसका कारण भारतीय पितृसत्ता है जो पुरुष को महत्त्व देती है| स्त्री की योनि को पवित्र रखने के लिए यहाँ खाप-पंचायत, राष्ट्रवाद, धार्मिक ग्रन्थ, अलग-अलग नियम क़ानून है|

स्त्री से जुड़े इस नियम को छुपा कर रखा जता है| लड़कियों को महावारी की कोई जानकारी पहले से नहीं दी जाती फलत: उनके साथ जब यह प्रक्रिया शुरू होती है तो जानकारी के अभाव में वे इसे एक घिनौना काम मानती हैं| किशोरावस्था के इस परिवर्तन को स्वीकार करने में उन्हें काफी वक्त लगता है| घर परिवार से दूर यदि वह अपने प्रथम महावारी से अवगत होती तो उस समय उसे बेहद शर्मिन्दगी महसूस होती है कारण कि यह रक्त योनि से निकलता है| जिसे वह लड़की खुद क्योंकि पितृसत्ता से गर्सित है एक गलत चीज मानती है| कई लड़कियां ऐसे में रोने लगती है क्योंकि वह नहीं समझ पाती कि क्या किया जाए|

अजीब बात यह है कि महिलाओं को इस चक्र के बारे में उनके अध्यापक भी नहीं बताती| 10 कक्षा के कोर्स में स्त्री शरीर व शरीर की उत्पत्ति के विषय में जानकारी दी गई है| कई अध्यापक इस विषय को खुद से पढ़ने को कह कर टाल देती हैं जिससे घर, परिवार में जो शिक्षा लड़की को नहीं मिल पाती उससे वह स्कूल में भी वंचित हो जाती है| महावारी में एक समस्या उसमें इस्तेमाल होने वाले कपडे की भी आती है| भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपना पेट ठीक से भर पाए| गरीब, आदिवासी, दलित, मजदूर तबके की औरतें महावारी के समय कपड़ा इस्तेमाल करने को मजबूर है| उनके पास इतना पैसा नहीं है की अपने बच्चे के पैरों में चप्पल तो पहनावा सके ऐसे में सिर्फ कपड़ा ही उनके पास एक मात्र विकल्प बचता है| जाहिर सी बात है कि यह कपड़ा कोई नया धुला नहीं हो सकता| ये समुदाय ऐसे हैं जिनके पास संसाधन बिलकुल नहीं हैं| ऐसे में फेकने के लिए वे नया कपड़ा इस्तेमाल नहीं कर सकती इसलिए गंदे-फटे कपड़ों को इस वक्त इस्तेमाल में लिया जाता है| जिस कारण गरीब महिलाएं कई संक्रामक रोगों का शिकार हो जाती हैं और इलाज के न मिल पाने और वक्त की कमी (क्योंकि ये वो महिलाएं हैं जो रोज काम करती और खाती हैं) मौत का शिकार बनती हैं|

भारतीय समाज में स्त्रीलिंग के साथ किया गया भेद-भाव उसे महावारी में भी परेशान करता है| हमारे समाज में आज भी लड़कों को वरीयता दी जाती है| सभी काम स्त्रियों से करवाएं जाते हैं और उनके खानपान की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता| ऐसे में स्त्री के शरीर में लगातार कमजोरी आती है| वह देखने में भले ही सुन्दर या गौर-वर्ण हो पर उसका शरीर भीतर से कमजोर हो जाता है| कमजोरी की इस दशा में कई स्त्रियों को महावारी एक महीने में कई बार भी आती है या इसका समय 3-4 दिन न होकर 7-12 दिन तक बढ़ जाता है| ऐसी स्थिति किसी भी स्त्री के लिए घातक हो जाती है समय पर उचित इलाज न मिल पाने के कारण कई स्त्रियाँ मृत्यु को भी प्राप्त हो जाती है|

भारतीय समाज स्त्री को देवी मानने का दावा करता है पर क्या वास्तव में ऐसा है| यह समाज स्त्री को कभी मनुष्य रूप में भी नहीं स्वीकार करता देवी तो क्या मानेगा| इस समाज ने स्त्री को मात्र भोग की वस्तु बना दिया है| महावारी के कष्टकर समय में जब महिला को आराम की जरुरत होती है कई पुरुष उस वक्त भी सम्भोग करते है| जिसमें पुरुष का आनंद ही प्रमुख होता है| स्त्री की पीड़ा की अनुभूति करना समाज को उसके उच्च आसन से नीचे गिरा देता है इसलिए स्त्री को हर संभव कष्ट देना समाज अपना कर्तव्य समझता है| आज हम ‘हैप्पी टू ब्लीड’ जैसी धारणाओं पर विचार कर रहे हैं पर क्या वास्तव में इस समाज की जड़ मानसिकता पर ऐसी बातों से खास फर्क पड़ेगा? यह मुहीम किस तबके की स्त्रियों की है यह भी जानने की जरुरत है| विज्ञापन में दिखाए जाने वाले रक्त को प्रतीकात्मक न दिखाकर लाल भी दिखा देंगे तो क्या इससे उस महिला के जीवन पर कोई ख़ास प्रभाव पडेगा जो कामगार तबके की है? महीने के इन दिनों में भी जो औरतें ढेर बोझ ढो रही हैं क्या उनकी स्थिति इससे सुधरेगी? इस देश में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो पोषण के अभाव में मर जाती हैं क्या उनके लिए भी मासिक धर्म ‘हैप्पी टू ब्लीड’ हो सकता है?

हाँ यह सच है कि भारतीय समाज सड़ी हुई मानसिकता में जी रहा है जिसे बदलने की जरुरत है पर यह परिवर्तन किस तबके लिए हो रहा है यह सोचना चाहिए| क्या उस परिवर्तन से समाज बदल जायगा? लोग महिला को अछूत मानना छोड़ देंगे? कामगार महिला अपनी मुश्किलों को सुलझा पाएगी?

लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं. संपर्क: aar.prajapati@gmail.com 

आज़ादी मेरा ब्रांड उर्फ कोई वक्त गलत नहीं होता

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विजेन्द्र सिंह चौहान 


क्या कभी चाय की दुकान पर, नुक्कड़ पर , कचौड़ी के ठेले पर किसी स्त्री को अकेले चाय , कचौड़ी और नुक्कड़ के गप्प का आनंद लेते देखा है, नहीं, क्योंकि पब्लिक स्पेस पर अकेली महिला हमारे समाज के लिए कल्पनातीत है , या फिर घर के चौखटे को लांघने और दुश्चरित्र होने की प्रमाण ! अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘ आजादी मेरा ब्रांड’ की समीक्षा से गुजरते हुए विजेंद्र सिंह चौहान स्त्री के पब्लिक स्पेस में भागीदारी के सुख का जायजा ले रहे हैं. यह अच्छा है कि अपनी छोटी बेटी को किताब पढने के लिए प्रेरित करते हुए वे नई पीढी के लिए पिता के रूप में ‘खाप के खौफ से मुक्ति’ का सन्देश देते हैं.

इस बार  सबलोग के स्त्रीकाल कॉलम के लिए ‘ आजादी मेरा ब्रांड’ के बहाने नई पीढी के पिता का तैयार –मानस. 



किसी भी स्त्री की कहानी पढ़ते हुए मुझे डर लगता है खासकर अगर कहानी में कोई सच्चाई हो, पुरुषों को स्त्रियों की कहानी से डरना ही चाहिए क्यों कि स्त्री  की हर कहानी एक आरोपपत्र होती है, मुझे तो लगती है अपने पर।  यायावारी आवारगी भी मैं तीन बार में कोशिश करके खरीद सका पहले दो बार राजकमल जाकर वापस आ गया, हिम्मआत नहीं हुई…तीसरी बार बिटिया (तेरह साल) को साथ ले गया उसीसे खरीदवा ली… अनुराधा के बारे में जितना पता था यानि एक आज़ाद ख्याल लड़की जिसने फार्मल स्कूल जाने के बजाए शतरंज खेलने को चुना और फिर एक दिन अकेले घूमने निकल पड़ी यही सब उसे बताया और उसने – वॉउ… से अनुराधा का स्वागत किया..मैं भी ऐसा ही ट्रैवल करुंगी का घोष भी। दावे से नहीं कह सकता पर शायद मुझे अच्छा लगा।
अभी किताब को पढ़ना शुरू करना बाकी था और मुझे पता था ये मुश्किल होने वाला था…औरत की  आज़ादी से हम सब डरते हैं। फिर से अपनी बिटिया मिष्टी का ही सहारा लिया…मिष्टी तुमने किताब पढ़नी शुरू की ? इसका शुरुआती हिस्सा- आजा़दी मेरा ब्रांड, फेवरेट,  खोलकर दी… इतनी हिंदी की उसे आदत नहीं पर उसने कोशिश की..लेकिन ‘पेट में तितलियॉं उड़ने’ पर आकर अटक गई… अब हिम्मत का मौका मेरा था…लाओ मैं पढ़कर सुनाता हूँ…फिर मैं पढ़ने लगा… लड़को के साथ सोने के प्रकरण को कब डरपोक बाप ‘लड़कों के साथ होना’ पढ़ गया मुझे पता ही नहीं चला.. मिष्टी  अब दूसरे कमरे में चली गई  और मुझे मालूम है कि आजादी का हर लफ्ज मुझ पर एक सवाल है पर मिष्टी के लिए जो दुनिया चाहिए उसके लिए जरूरी है कि सवालों से मुँह न मोड़ा जाए… इसलिए किताब पढ़ी तो पूरी गई ही,  अलबत्ता विद पेट में तितलियॉं

दरअसल आजादी मेरा ब्रांड हिन्दी में अपनी किस्म की पहली किताब होने के कारण इसे पढ़ने के लिए अपने कई सहज इलाकों से बाहर आना जरूरी है। मसलन रोहतक के गॉंव से निकलकर यूरोप के शहरों की सोलो बैकपैकर्स यात्रा पर निकलने के बीच की यात्रा में जो कुछ अनुराधा की जिंदगी में होता है वह सब ही हिन्दीर के पाठकों के लिए पर्याप्त झटके देने के लिए काफी है। यायावरी हिन्दी जगत के लिए एक पूरी तरह मर्दाना स्पेस है तिसपर एक लड़की सो भी अकेले न केवल इस स्पेस में अतिक्रमण करती है वरन बाकायदा इस घोषणापत्र के साथ के साथ करती है कि ये बाहर जान बेकाम का है, आवारगी है, किसी और की हो न हो मेरी आज़ादी है। इस किताब को सीधा साधा यात्रा वृत्तांत भी तो नही कहा जा सकता न। प्रस्तावना में स्वानद किरकिरे अनुराधा को भाव भिवोर शब्दों में नए जमाने की भारतीय फकीरन करार दे देते हैं जो इस मायने में सही है कि बिना फकीरन हुए पैरों में यात्राएं मचलती ही कहॉं हैं।  अनुराधा  भारतीय महिलाओं की मोबिलिटी पर लगी बेड़ियों पर जिस किस्म के सवाल उठाती हैं उनसे साफ होता है कि आज़ादी मेरा ब्रांड यूरोप की सड़कें नापना भर नहीं है यह भारतीय मानस की गांठे खोलने की जद्दोजहद है। हमारे समाज में लड़कियॉं यूँ ही बिना काम के नहीं टहलतीं, लड़की का बाहर जाना बिना किसी काम के अकल्पनीय है, क्योंक जाएगी लड़की बाहर ? क़्या करने ? लड़के अक्सोर कह देते हैं मैं जरा टहल के आता हूँ, ‘’बाहर होके आता हूँ’’ लेकिन ये शब्दो कभी लड़कियों के मुँह से नहीं सुने जाते- मैं जरा टहलकर आती हूँ। स्वाभाविक है जो समाज स्त्री  के टहलने, बाहर जाने को लेकर इतना अधिक आशंकित है,  वो भला उसके बाहर घूमने के लिए सुविधाएं भी क्योंकर जुटाने लगा ?  नतीजतन हमारे समाज की औरतें धुमक्कड़ होती ही नहीं। उनमें घुमक्ड़ी के संस्कार ही नहीं पनपते, आश्चर्य नहीं कि अनुराधा विदेश में बस गई जिन भारतीय स्त्रियों का वर्णन अपनी यात्रा में करती हैं वे भी इस आजा़दी की छाया से वैसे ही दूर दिखाई देती हैं जैसी भारत में बसी औरतें।

किताब के बारे में खुद अनुराधा बेनीवाल से सुनें

आज़ादी मेरा ब्रांड (यायावरी आवारगी का पहला पड़ाव) लिखना अनुराधा बेनीवाल के लिए आसान था या मुश्किल कहना कठिन है लेकिन मुझे इसे पढ़ते लगातार लगा कि अनुराधा की यह यात्रा कहानियॉं एक ऐसा दस्तावेज है कि बिना खुद को भीतर टटोले इसे पढ़ पाना आसान नहीं। यद्यपि अनुराधा कोई आरोप नहीं लगातीं, लगभग कहीं भी फैसलाकुन नहीं होती। किसी व्यक्ति, शहर, वक्त को एकबारगी अच्छा या बुरा करार नहीं दे देंतीं लेकिन सच तो यही है कि किसी भी स्त्री , खासकर भारतीय स्त्री  की सच्ची कहानी होती एक आरोपपत्र ही है। हालांकि एक फेसबुक संवाद में उन्होंने इसे लिखने को भी आसान काम नहीं माना है – ”ऐसा नहीं है के लिखते हुए घबराहट मुझे नहीं हो रही थी। लेकिन फिर पापा के वो शब्द याद आये, “अनु अपने से ऊपर उठ के लिखना, तुम्हारी नहीं एक लड़की की कहानी है, साक्षी भाव से लिखना। जब लिखोगी तब तुम अनु नहीं एक लेखिका हो जो अनु की यात्रा के बारे में लिख रही है।” जाने कहाँ तक सफल हुई हूँ अनु को कह पाने में, लेकिन कोशिश पूरी की है।”

लेखिका ग्रामीण चौकड़ी में 

बाहर-भीतर का यह आज़ाद आख्यान उन्हें आरोप पत्र नहीं लगता– ”मेरी किताब आरोपपत्र नहीं बस एक पत्र है समाज के नाम, के आज़ादी नहीं है और होनी चाहिए। स्त्री पुरुष दोनो ही जकड़े लगते हैं कोई किसी तरह तो कोई किसी।”  इसके बावजूद मेरा डर कायम था। । मेरे डर लंदन, पेरिस, एम्ट् नहर्डम, बर्लिन, प्राग, बुडापेस्टा आदि शहरों से नहीं हैं इन शहरों से हासिल अनुराधा की आज़ादी से हैं, अच्छा चलो हासिल नहीं कहते सिर्फ आज़ादी की खोज से कह लेते हैं पर है ये खतरनाक ही, कम से कम उन सभी ढॉंचों के लिए तो निश्चित खतरनाक है जो इन यूरोपीय देशों से दूर बहुत दूर यहॉं सहारनपुर, भरतपुर या खुद अनुराधा के शहर रोहतक या भिवानी में औरत को ठीक उसी कैद में बनाए रखना चाहते हैं जिसमें वह है।  हमारे समाज के मानस में काबिज पुरुष स्त्री की सहजता से बहुत डरता है, स्त्री के मन में अगर यूँ अकेले बेकाम टहलने की इच्छा जागने लगे तो यह यकीनन उस जकड़ के कमजोर हो जाने की निशानी मानी जाएगी जिसके बल पर औरत को अब तक कैद रखा जा सका है। स्त्री अगर अपनी छोटी बड़ी इच्छाओं की इज्जत करना शुरू करती है तथा उनके त्याग के महिमामंडन से आज़ाद होती है तो ये उसकी ऐसी आजादी होगी जिसे उससे छीनना संभव नहीं रह जाएगा। पुस्तक में एक-एक सबसे प्रभावशाली वाकया अनुराधा की इतालवी मित्र रमोना से जुड़ा है, जो अनराधा को घुमंतु बनाने और अपनी इच्छाओं की इज्जत करना सिखाने में अहम भूमिका अदा करता है। रमोना जिस सहजता से दोस्तों के साथ चलने की जि़द के सामने झुकने की बजाए अपनी स्नान करने की इच्छा  को तरजीह देती है फिर लेखिका और उनके एक पुरुष मित्र के सामने बेहद सहजता से कपड़े बदलती है, इसका प्रभाव लेखिका की जिंदगी के फलसफे पर गहरे पड़ता है। एक पाठक के रूप में भी हम इस प्रकरण पर ठिठके बिना आगे नहीं बढ़ पाते।  

लेखक अपनी बिटिया के साथ 

यूँ आज़ादी मेरा ब्रांड हिन्दी का पहला बैकपेकर ट्रेवलॉग (महिला), है जो लंदन में बसी अनुराधा का महीने भर में यूरोप के कुछ शहरों की यात्रा की कहानी भर है। जैसा प्रस्ताकवना में स्वानंन्द किरकिरे कहते हैं- “किसी का यात्रा वृत्तांरत ही तो है”, किंतु हम जानते हैं ये इससे कुछ ज्यांदा है। बहुत ज्यादा है। इसमें आज़ादी की जो खोज है, स्त्रीं की आज़ादी की खोज वही इसका कुल हासिल है । लेकिन ये यात्राएं बाहर की उतना शायद नहीं है जितनी भीतर की, दरअसल भीतर की ही हैं, पूर्वग्रहों से आज़ादी की, फैसलाकुन होने से आज़ादी की, सही या गलत करार देने के सुख से आजादी की – लेखिका एक ही निष्क,र्ष पर पहुँचती है कि कोई फैसला आखिरी नहीं- ज्यों ज्यों दुनिया घूमती हूँ एक ख्यािल पक्का होता जाता है कि जैसे धरती पर कोई भी समय गलत नहीं होता है। हर घड़ी कहीं न कहीं का सही वक्त‍ बता रही है ऐसे ही न कोई शहर गलत है, न कोई गली गलत है, न ही कोई इंसान गलत है: कहीं न कहीं सब एकदम फिट हैं।

आज़ादी का अनुराधा ब्रांड भी अंतिम नहीं है न ही ये दुनिया या देश की तमाम लड़कियों के आज़ादी का ‘हाउ टू’ कोटि का प्राईमर ही है,  किंतु अनुराधा की आज़ादी के मैप का एक खाका जरूर है जो सच्चा है जिससे कोई कुछ सीखे न सीखे लेकिन औरत की आजादी के खिलाफ तबके को सिहरन इससे जरूर होगी।

ब्‍लॉगर व स्‍तंभकार (डा) विजेंद्र सिंह चौहान हिन्‍दी के शुरूआती ब्‍लॉगरों में से हैं। यूनीकोड-पूर्व युग में उनके संपादन में ‘इत्रिका’ हिन्‍दी की आरंभिक इंटरनेट पत्रिका थी। इनकी पुस्‍तक ‘मीडिया व स्‍त्री:एक उत्‍तर विमर्श’  भारतेंदु हरिश्‍चंद्र राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार (भारत सरकार) से सम्‍मानित कृति है। इसके अतिरिक्त एक पुस्‍तक, कई लेख, शोध आलेख, ईप्रकाशन। डाक्‍टरेट शोध साहित्‍येतिहास पर है तथा पोस्‍ट-डाक्‍टरेट स्‍वतंत्र शोध दिल्‍ली के सिटीस्‍केप में दिक् व काल (टाईम व स्‍पेस) पर है।  हिन्‍दी ब्‍लॉग संबंधित उनके शोधकार्य “Vernacularly Yours: A Look at the question of complex linguistic identity on Hindi Blogosphere”  , डीजी तांत्रिक तेवर : हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत की संरचना व सरोकारों का अध्‍ययन”,  Hermeneutics of Hypertext सराहे गए हैं।
विजेंद्र ब्‍लॉगजगत में अपने ब्‍लॉगों मसिजीवी व हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर  के लिए जाने जाते हैं। जबकि आफलाइन जीवों के लिए दैनिक जनसत्‍ता में ब्‍लॉगजगत की चर्चा का उनका स्‍तंभ ‘चिट्ठाचर्चा’ भी वे लिखते थे।
  संप्रति: दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्‍ली कॉलेज में हिन्‍दी विभाग में असिस्‍टेंट प्रोफेसर ।

मालिनी अवस्थी से बातचीत

लोकगायिका मालिनी अवस्थी से संजीव चंदन की बातचीत. मालिनी ने लोक गीतों की विधा , अपने करियर
विवाह , परिवार , स्त्री -अधिकार पर बात की – गीतों और बातचीत के जरिये अपनी बात कही .

Women and peace

CNDP, along with Nfiw and Streekal, had organised a seminar on 25th January in JNU. CNDP activist Kumar Sundram talked with the renowned and senior American feminist and civil rights activist Vinie Burrows, and Mehdi Fatma Hassan.

Women and peace : Confronting Militarism and Masculanities

महिला आयोग सदस्य से बातचीत

A talk with  Sushma Sahu, The member of NCW by ‘Streekaal’

यह सफर आजादी का है

वर्षा सिंह  

आईएमएस गजियाबाद कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर। 13 वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य-अनुभव. संपर्क :bareesh@gmail.com

महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी तमाम खबरों, आंकड़ों, हकीकत के बीच औरतों की आजादी से जुड़ी यह एक सुंदर तस्वीर है। दिल्ली की मेट्रो में सफर करती महिलाओं की तस्वीर। मेट्रो स्टेशन पर तेज कदम के साथ वे दाखिल होती हैं। उनकी चाल में उनका आत्मविश्वास झलकता है। उनकी आंखों में सफलता की चमक है। उन तमाम लड़कियों के चेहरे पढ़िए, कुछ एक को छोड़ दें तो ज्यादातर मजबूत-आत्मनिर्भर लगती हैं। अपने बैग कंधे पर डाले वे आगे बढ़ती हैं।

पहले बाजारों में लड़कियां-महिलाएं डरी-सहमी या चौकस सी ज्यादा दिखाई देती थीं। जैसे कभी भी कोई हादसा उनकी तरफ लपकता हुआ आ सकता है। उस सूरत में वह कुछ नहीं कर पाएंगी। उनकी मदद कोई नहीं करने आएगा। आजादी और बराबरी का संघर्ष पीढ़ियों से जारी है। एक बार फिर यह उल्लेख करते हुए कि महिला हिंसा और बलात्कार के बढ़ते मामलों के बावजूद, लड़कियों की स्थिति बेहतर हुई है। मेट्रो के लेडीज कोच में यह तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है। यहां हर वर्ग, जाति, उम्र की लड़कियां-महिलाएं आती हैं। स्कूल-कॉलेज जा रही लड़कियों से लेकर रिटायरमेंट की उम्र को पहुंच रही महिलाओं तक। शॉपिंग करने, फैशनेबल कपड़े, बिंदास छवि से लेकर सीधी सादी घरेलू महिला तक।

मेट्रो के इस सफर के दौरान मेरी सीट के बगल में, कॉलेज जा रही दो लड़कियां खड़ी थीं। पहनावे, बोली से जाहिर था कि वे निम्न मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक ने कहा, मुझे कपड़ों पर किसी भी किस्म की पाबंदी बर्दाश्त नहीं है, अगर कोई मुझे मेरी पसंद का कुछ पहनने से रोकता है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, वे कौन होते हैं ये बताने वाले कि हमें क्या पहनना है। हमारी जिंदगी है, हम चुनेंगे क्या पहनें-क्या नहीं। इस लड़की ने लेगिंग और टॉप पहना हुआ था। इसकी दूसरी साथी ने जवाब दिया- मेरे घर में तो अब कोई रोक टोक नहीं होती। मैं तो जींस ही पहनती हूं। पहले बुआ लोगों को जींस पहनने से मना करते थे। पर अब मेरे परिवार के लोग बदल गए हैं।

महिलाओं के पहनावे को लेकर अब भी खूब सवाल जवाब होते हैं। कभी कॉलेज में जींस पर पाबंदी लगायी जाती है तो कभी पंचायतें ऐसा करती हैं। यहां तक कि नेतागण भी बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर बड़ी आसानी से पहनावे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। यही लोग इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि तीन साल की बच्ची से बलात्कार क्यों होता है, क्या पहनावे के कारण।

मेट्रो में सवार होते ही ज्यादातर यात्री अपने चार-छह इंच के मोबाइल के मार्फत आभासी दुनिया में डुबकी लगा लेते हैं। एक लड़की बोलती है-यार फेसबुक पर जब भी मैं पॉलीटिक्स पर कुछ लिखती हूं, कोई कमेंट नहीं करता, दो चार लाइक ही आते हैं। लेकिन प्यार मोहब्बत पर एक दो लाइन लिख दो, फिर देखो, लाइक्स-कमेंट्स की बरसात हो जाती है। दूसरी बोलती है, हां यार हमारे देश में आशिकी खूब चलती है। अब आप खुद ही इस बात के मायने निकालिए।

मेट्रो में सफर कर रहे लोगों की मानसिकता क्या बदल जाती है। यहां छेड़छाड़ या पहनावे को लेकर किसी तरह के फिकरे सुनने को नहीं मिलेंगे। हां सब अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी में होते हैं। लेकिन मेट्रो में सुरक्षा और तमाम वजहों से छेड़छाड़ जैसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। यहां जींस-स्कर्ट, मिडी, मिनी, सब तरह की पोशाक में लड़कियां सफर करती हैं और बड़ी बिंदास होकर रहती हैं। मेट्रो चल पड़ती है और वह अपने बैग में से कोई किताब निकालती है, कोई अंग्रेजी बेस्ट सेलर है। पूरे सफर के दौरान यहां तक कि ट्रेन से निकलने और प्लेटफॉर्म पर चलने के दौरान भी किताब में उसकी निगाहें धंसी हुई है और वो बेधड़क चली जा रही है। कोई डर नहीं। कोई रोक टोक नहीं। यहां वो जैसे चाहे वैसे रह रही है। लेकिन मेट्रो और इसका सफर तो कुछ ही देर के लिए है। इसके प्लेटफॉर्म से बाहर की दुनिया कहीं ज्यादा बड़ी है, यहां से बाहर का सफर ज्यादा लंबा है।

अब इन दो लड़कियों को देखिए। अभी-अभी कॉलेज में दाखिला लिया होगा। एक आम से परिवार की सामान्य सी लड़कियां लग रही हैं। मोबाइल में चल रहे गाने को इयर फोन से सुनते हुए, उस पर थिरक रही हैं, मेट्रो में, वे अपनी धुन में मस्त हैं। कोई परवाह नहीं बगल खड़ा व्यक्ति क्या सोचेगा। क्योंकि दरअसल बगल में खड़े व्यक्ति को इससे ज्यादा फर्क पड़ना ही नहीं है। सबकी अपनी दुनिया है। वे मेट्रो में थिरक रही हैं। सुंदर दृश्य है यह। आजादी का नृत्य।

हालांकि कुछ धुर विरोधाभासी दृश्य भी दिखाई देते हैं। जैसे मेरे सामने सीट पर बैठी यह महिला। दफ्तर जा रही होगी। बाल गीले और खुले हुए हैं। जींस-शर्ट पहने हुए। अंतर्राष्ट्रीय कंपनी गूची का बैग लिए हुए। हाथ में बड़ा सा मोबाइल, जाहिर है इसकी कीमत ज्यादा होगी। मेट्रो में सीट मिलते ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और होठ कुछ फुसफुसाने लगे। किसी मंत्र का पाठ, या हनुमान चालीसा, कुछ ऐसा ही। मैं यहां आधुनिकता और आस्था को दो विपरीत छोर पर खड़ा करने का प्रयत्न नहीं कर रही। बस यह तस्वीर जरा हटकर है। उसके ठीक बगल में बैठी एक लड़की ने बैग में से एक रजिस्टर निकाल लिया है। रजिस्टर में झांकर मैंने पता कर लिया कि यह गणित की छात्रा है। मेट्रो में सफर करती हुई ऐसी तमाम लड़कियां मिल जाएंगी जो अपने नोट्स पढ़ रही होंगी। कुछ चालीसा पढ़ती हुई भी दिख जाती हैं।

जैसे सुबह आसमान परिंदों की चहचहाहट से भर जाता है। वैसे ही सुबह के समय की मेट्रो अपने यात्रियों के उत्साह से भरी होती है। लड़कियां कॉलेज जा रही होती हैं, दफ्तर जा रही होती हैं। वे अपनी दोस्तों का स्वागत करती हैं। वे पाबंदियों से मुक्त नजर आती हैं। इयरफोन कान में ठूंसे, किसी की निगाहें उपन्यास में उलझी, कोई अपनी नोटबुक के पन्ने पलटती है, कोई फोन पर अपने दफ्तर के साथी को आगे के लिए दिशा निर्देश देती है। शाम को घर लौटने के सफर में उनके चेहरों पर कुछ थकान होती है। सुबह से अलग, शाम की मेट्रो में थोड़ा आलस उमड़ता है, थोड़ी थकान फैली होती है, उनकी चहचहाहट कुछ कम होती है, घर में उनके हिस्से का कार्य अभी बाकी होगा, ऐसा माना जा सकता है।

मेट्रो के इस सफ़र की खूबसूरती को समझने के लिए हमें दिल्ली की सड़कों पर उतरना होगा। क्या दिल्ली की सड़कें भी अपने यात्रियों को ऐसी सहूलियतों से बख्शती हैं। क्या यहां पर आप इसी तरह अपनी दुनिया में लीन सफर कर सकते हैं। नहीं। यहां आपके लिबास पर फब्तियां कसनेवाले मिल जाएंगे। बस स्टैंड पर आपके बगल में खड़े लोग आपको घूरते मिल जाएंगे। पैदल चलते हुए कोई जानबूझकर टक्कर मारता निकल जाएगा। सड़क किनारे खड़ी कार डराती है, दरवाजा खोलकर कोई अंदर खींच लेगा।

यह डर दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के आंकड़ों की वजह से है। 2013 की तुलना में 2014 में महिलाओं से अपराध के मामले 18.3 प्रतिशत तक बढ़ गए, जिसमें बलात्कार के मामले 31.6 प्रतिशत बढ़े। दिल्ली पुलिस रिकॉर्ड में 2014 में बलात्कार के कुल 2,069 मामले दर्ज किए गए जबकि 2013 में  1,571 मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली पुलिस के ही वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि यहां हर रोज महिलाओं के खिलाफ हिंसा के करीब 40 केस दर्ज किए जाते हैं, इनमें बलात्कार और छेड़खानी की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

बलात्कार सामाजिक समस्या है। इसका हल भी समाज में बदलाव के जरिये ही निकल सकता है। मेट्रो के अंदर प्रवेश करते ही ज्यादातर लोगों का बरताव बदल जाता है। मेट्रो के बाहर वही लोग भरोसे लायक नहीं रह जाते। मेट्रो के अंदर की लकदक, सुरक्षा, शालीनता, यहां से बाहर निकलते ही बिखर जाती है। मेट्रो अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच गई है। यह सफर यहीं पूरा हुआ। लोगों का रेला बाहर की ओर उमड़ता है। मेट्रो के अंदर बिंदास सफर कर रही लड़कियां वापस उन्हीं रास्तों पर पहुंच गई हैं, जो उनके लिए अबतक सुरक्षित नहीं बन पाए हैं। तमाम दुर्घटनाओं-आशंकाओं, विपरीत हालातों को परे ढकेलते हुए वो तेज चाल से आगे बढ़ रही हैं। यह सफर आजादी का है।

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

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12 दिसंबर को एन एफ आई डवल्यू और स्त्रीकाल के संयुक्त तत्वावधान में ‘ महिला आरक्षण : कहाँ हैं रूकावटे’ विषय पर एक सार्थक राउंड टेबल, अंसल भवन (कस्तूरबा मार्ग ) स्थित एन एफ आई डवल्यू के कार्यालय में हुआ . बातचीत में विभिन्न महिला संगठनों के कार्यकर्ताओं , सामाजिक चिंतकों , क़ानूनविदों , पत्रकारों , आदि भाग लिया. एन एफ आई डवल्यू, आयडवा, राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोँलंन , आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस, भारतीय महिला मोर्चा , जे. डवल्यू .पी , ए आई एस एफ, सत्यशोधक महिला समाज, सम्बुद्ध महिला संगठन, सी डवल्यू . एस. डी, दलित लेखक संघ, सहित अन्य संगठनों के प्रतिनिधि, दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू के शोधार्थी तथा अन्य बुद्धिजीवी शामिल हुए.

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन


स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की रचनाओं से भी अभिव्यक्त होती रही है. लोक कथाओं और लोकमिथों में अन्य केन्द्रीय विषयों में से एक विषय स्त्री की यौनिकता भी हुआ करती है. इस विषय पर कहन के ढंग और कहने के उद्देश्य से ही रचनाकार की स्त्री के प्रति अपनी संवेदनशीलता का भी पता चलता है .

7 फरवरी को भारतीय रंग महोत्सव में भिखारी ठाकुर लिखित नाटक (गबरघिचोर- मूल नाटक ,पुत्रवध )  का युवा निर्देशक प्रवीण गुंजन के निर्देशन में मंचन हुआ . भिखारी ठाकुर,  यानी भोजपुरी लोक के महान रचनाकार,  के क्लासिक की मंच –प्रस्तुति इसलिए एक चुनौती है कि बिना उसके मूल स्वभाव को ज्यादा छेड़े उसे समसामयिक कैसे बनाया जाये और इसलिए भी कि उसकी कई प्रस्तुतियां अनेक बार हो चुकी हैं, तो नई प्रस्तुति को अलग और जरूरी कैसे बनाया जाये

कहानी के केंद्र में स्त्री की यौनिकता और उसके मातृत्व का अधिकार है. काम के लिए महानगर गया गलीज जब बरसों बाद लौट कर गाँव आता है , तो वह अपने बेटे ‘ गबरघिचोर’ को अपने साथ ले जाना चाहता है. यह उसके लिए इतना आसान नहीं रह जाता, जब गाँव का ही एक व्यक्ति ‘ गड़बड़ी’ उसे अपना बेटा बताता है, गलीज की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी से उत्पन्न गड़बड़ी का बेटा . गलीज की पत्नी भी अपने बेटे को शहर भेजने के खिलाफ है . मामला पंचायत के पास जाता है और अंततः पंचायत उसे तीन टुकड़े में काटकर बराबर –बराबर तीनों दावेदारों के बीच बांटने का निर्णय देती है. नाटक के कथानक में कई विषय प्रत्यक्ष –परोक्ष रूप से व्याख्यायित होते हैं. पलायन, स्त्री के प्रजनन और श्रम पर पुरुष का अधिकार. बेटे के रूप में सम्पत्ति का उतराधिकार के अलावा श्रम के रूप में उसकी उपयोगिता पर पुरुष का अधिकार आदि विषय नाटक के कथानक से उभर कर आते हैं , और पुरुष नियंत्रित व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है, जो  स्त्री की ‘ नियति’ तय करती रही है.

भोजपुरी के इस नाटक में लोक संवाद और संवेदना का मिठास है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ग्राम समाज किन भोले तर्कों के साथ ढोती है, इसमें इसकी झलक भी मिलती है. हालांकि इस व्यवस्था को प्रश्नांकित करती, अपने हक़ के लिए तर्क उपस्थित करती स्त्री की भाषा में भी ग्राम समाज की भोली तर्क पद्धति ही उपस्थित होती है. भिखारी ठाकुर स्त्री संवेदना के रचनाकार रहे हैं, लोक का यह हिस्सा उनके रचनाकर्म की कालजयिता के एक कारणों में है. यह नाटक निर्देशक के लिए भी इसलिए चुनौती की तरह है कि सवाल उसके सामने होगा कि भिखारी ठाकुर की इस संवेदना के साथ वह कितना न्याय कर पाया है. क्या उसका मंचन टेक्स्ट  की  तरह अंततः स्त्री के साथ संवेदनशीलता के साथ न्याय कर पाता है ? यह सवाल इसलिए भी  कि नाटक का विषय है विवाहेत्तर पुरुष से प्राप्त बेटे पर अधिकार प्रश्न और इस तरह स्त्री की यौनिकता- जो रचनाकारों से लेकर नीतिकारों तक का विषय रही है – जिसके कारण कुछ समझदार पुरुष वैराग्य लेते हुए दिखाए जाते रहे हैं,कामुकता को कोसते नजर आते हैं. ज़रा सी चूक नाटक में स्त्री को उपहास का पात्र बना सकती थी . लेकिन युवा निदेशक इसके मंचन और इसके साथ प्रयोगों में सफल रहे हैं, जिससे  मंचन की संवेदना स्त्री के प्रतिऔर सशक्तता से जुडती है .

एक चर्चित क्लासिक में प्रयोगों की संभावनाएं बहुत कम होती हैं, मंचन की सफलता इस तथ्य में भी है कि वह कथानक के टाइम और स्पेस में रचकर उसे समकालीन भी बनाये. मूल टेक्स्ट में कुछ नये गीतों को जोड़कर यद्यपि प्रयोग भी किये गये हैं . मंचन के क्राफ्ट में हर पात्र एक अलग चरित्र है,  तो समाज की एक समवेत सोच का प्रतिनिधि भी. वह खुद को जीता है और पात्रों के साथ सामाजिक हर्ष  -विषाद –तर्क और प्रतिवाद को भी-परकाया प्रवेश का क्राफ्ट.

नाटककार और निदेशक की संवेदना स्त्री के साथ होने के कारण ही पुत्र पर अधिकार के हास्यास्पद बंटवारे के बावजूद स्त्री का पक्ष न सिर्फ उसके ममत्व के कारण मजबूत दिखता है , बल्कि उसकी अपनी यौनिकता पर उसके खुद के निर्णय से उसका पक्ष मजबूत होता है – वह दृढ़ता के साथ न सिर्फ विवाहेत्तर पुरुष के साथ अपने जाने की स्थितियां बताती है बल्कि अपने इस निर्णय के पक्ष में भी खाडी होती है और अपनी कोख पर अपने अधिकार के प्रबल पक्ष के साथ पंचों को निरूतर भी कर देती है – इस मायने में यह स्त्रीवादी कथ्य के रूप में है- आधुनिक स्त्री की चेतना से संपन्न. नाटक का संवाद ही स्पष्ट करता है कि  ‘ तथाकथित पर पुरुष –गमन ’ को जब सीता नहीं बचा पाई तो साधारण स्त्री क्या – इस मामले में यह समसामयिक कथन सा है और समसामयिक हस्तक्षेप भी- अतिवादी सांस्कृतिक चेतना पर एक चोट.

मंचन के अंतिम आधे घंटों में एक प्रायः स्पष्ट कहानी के साथ दर्शकों को बांधे रखना भी निदेशक की सफलता ही है, क्योंकि हर दर्शक को यह स्पष्ट था कि क्या घटित होगा, लेकिन इस आधे घंटे की करुणा के साथ दर्शक बंधा रहता है – उद्दीपन का काम करता है निदेशक की परिकल्पना के साथ जोड़ा गया एक सोहर – जो न सिर्फ मातृत्व का कारुणिक प्रसंग उपस्थित करता है, बल्कि अट्टालिकाओं की हृदयहीनता को भी- महाकाव्य की आदर्श मां’ कौशल्या’ की लोकछवि इस सोहर में ह्रदयहीन रानी का है.  निस्संदेह भारतीय रंग महोत्सव की यह ख़ास प्रस्तुति थी.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. संपर्क: themarginalised@gmail.com

स्त्री और बौद्धिकता

अल्पना मिश्र
बौद्धिकता के साथ स्त्री को जोड़ कर देखने की कोई परम्परा हमारे देश में नहीं रही। इसकारण जन मानस का कोई अभ्यास भी बौद्धिक स्त्री की स्वीकार्यता को ले कर सहज भाव से तैयार नहीं हो सका। यहाॅ नवजागरण के समय उठाये गए तमाम स्त्री नाम याद आ सकते हैं और यह तर्क भी किया जा सकता है कि ‘फलां फलां तो थीं ही।’ लेकिन क्या वस्तुस्थिति ऐसी ही थी? सुदूर अतीत में विदुषी घोषा को अश्विनी कुमारों को संबोधित करके पहला वाक्य यही कहना पड़ा था कि ‘‘ हे अश्विनी कुमारों, मैं ज्ञान बुद्धिहीना नारी हॅू’’। अर्थात अपनी बौद्धिक क्षमता को स्वतः कमतर मान लेने पर ही आपको बौद्धिकों के समाज में शामिल होने की अनुमति मिलेगी। यदि स्त्रियाॅ ऐसा नहीं करतीं तो लगातार बौद्धिक कहा जाने वाला समाज उन्हें तरह तरह से बताता है कि वे बुद्धि के क्षेत्र में प्रवेश न करें और यदि प्रवेश करती हैं तो वहाॅ भी पितृसत्ता के द्वारा निर्धारित किए गए दायरे के भीतर ही रहें। दो बहुत प्रत्यक्ष स्थितियाॅ समाज ने बौद्धिक स्त्री के लिए बनाई हैं। एक तो – जब वह बौद्धिक क्षेत्र में समानता का दावा करती है और कई बार अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाती है, तब उसे छल बल से रोकने की हजार कोशिशें होती हैं। उसकी राह में सामंती मानसिकता के बहुतेरे कांटे बिछाए जाते हैं, उसे अपमानित और बहुधा दंडित किया जाता है। बुद्धि का प्रयोग करने और ज्ञानपिपासा की अभिव्यक्ति पर दंडित किए जाने की लम्बी परम्परा मौजूद रही है।


 यह आज मानसिकता आज भी हमारे समाज में बहुत गहरे जड़ जमाए बैठी है और लगातार स्त्री को अपनी बुद्धि का उपयोग करने के लिए अपमानित, उपेक्षित, प्रताड़ित और दंडित करती रहती है। यह अकादमिक जगत से लेकर लगभग सभी बौद्धिक क्षेत्रों में होता रहा है। दूसरा तरीका बेहद परम्परागत है, जहाॅ भारतीय मानस में स्त्री की दैवीय छवियाॅ बहुत मान्य और पूज्यनीय रही हैं और तब एक बौद्धिक स्त्री, विद्वान की श्रेणी में न आकर पूज्यनीया की श्रेणी में डाल दी जाती है। वह हाड़ मांस की मानवी होने की सहजता और जन जीवन में घुल मिल जाने की स्वाभाविकता से परे एक खास दुनिया की प्राणी मान ली जाती है, जो लगभग पराभौतिक छवि है। यह छवि कोई दिक्कत नहीं पैदा करती, कोई चुनौती नहीं रखती, उसका काम उसके दैवीय रूप से ढॅक दिया जाता है, इसलिए उसका नाम लेना आसान हो जाता है। अनुकूलन की ऐसी व्यवस्था एक तरफ स्त्री को उसके इतिहास से काट देती है, उसके रोल माॅडल से दूर कर देती है और दूसरी तरफ ज्ञान संधान के सब रास्ते बंद कर देती है। ज्ञान के लिए व्याकुलता और जिज्ञासा, स्त्री के लिए कुछ ऐसी बना दी जाती है, जैसे वह, उसकी विद्वता को कम कर देगी, रूप और लावण्य बिला जाएगा! सत्संगऔर बहसें उसके चरित्र को दूषित कर देगीं! तर्क करती, बहस करती स्त्री हमारे समाज की स्वीकृत स्त्री कभी नहीं रही है। जबकि यही व्याकुलता, जिज्ञासा, सत्संग, तर्क आदि ज्ञान के लिए आवश्यक शर्ते बताई गई हैं, पर किसके लिए? सिर्फ पुरूषों के लिए! नवजागरण के समय भी, नई शिक्षा के माध्यम से ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों की आवश्यकता पुरूषों के लिए मानी गई थी, स्त्रियों के लिए बड़ी हिम्मत करके स्त्री धर्म शिक्षा की ही बात की जा रही थी। लम्बे समय तक गृहविज्ञान लड़कियों केलिए अनिवार्य विषय हुआ करता था। प्रगति और संघर्ष के इतने वर्षों बाद, आज भी कहीं कहीं यह अनिवार्य विषय बना हुआ है।

इसी के बरक्स लेखन की बौद्धिक गतिविधियों के बीच स्त्री हस्तक्षेप को भी देख सकते हैं। यहाॅ भी एक पूरा दौर स्त्री विमर्श केा स्त्री की यौन आजादी तक सीमित कर देने का रहा। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, बुद्धि विवेक इससे दूर कर दिए गए। समाज में हो रहे अन्य स्त्री आन्दोलनों को नजरअंदाज किया गया। स्त्री के सामाजिक सरोकार परे ढकेल दिए गए। ऐसी यौन आजादी की बात की गई, जो कोई भविष्योन्मुखी रास्ता नहीं बनाती। यह पूरा पितृसत्तात्मक स्थितियों के अनुकूल और बाजार की आवश्यकतानुसार तैयार किया गया लगता है। जिसने नकली स्त्री विमर्शकार और सतही स्त्री विमर्श के लेखक तैयार किए। बिना पढ़े, बिना जाने स्त्री विमर्श पर खूब बात की गई। इसका विरोध करती एक कोशिश उसी दौर में स्त्रियों की तरफ से होती हुई भी दिखती है, जो स्त्री के सही यथार्थ की बात कर रही थी। उसके संघर्षेंा को और परिस्थितियों की आवाज बन रही थी। लेकिन ऐसी आवाजों को दबाया गया या उपेक्षित किया गया। प्रतिभाशाली की उपेक्षा करना लेखन तंत्र का भी एक बड़ा औजार है। जेंडर विभेद की स्थिति इतनी गहरी है कि जहाॅ जहाॅ स्त्रियों ने बड़ा काम किया या बड़ा दायरा बनाया, वहाॅ वहाॅ उनका नाम लेने का साहस ही प्रायः नहीं किया गया। साहस इतना भी नहीं दिखता कि यदि स्त्रियों ने साहित्य भाषा को नया आयाम दिया और उल्लेखनीय बदलाव किया तो उसे स्वीकार किया जाए। दरअसल इतने लम्बे समय तक स्त्री लेखन की उपेक्षा और साहित्येतिहास से उनकी जानबूझ कर बनाई गई अनुपस्थिति भी इसका एक आधार तैयार करती है।

सभी कलाओं में स्त्री के प्रवेश के साथ उसकी सरपरस्ती की स्थितियाॅ भी बनाई गई थीं। यह एक स्त्री आई है- गाने, अभिनय करने, लिखने आदि तो यह अकेले कैसे रह सकती है? इसका गाॅडफाॅदर कौन है? अकेले, अपने अस्तित्व के साथ खड़ी स्त्री हमारी समाज संरचना से गायब है। और यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है, अपनी जगह बनाना और वहाॅ मजबूती से खड़े होना। उसके अपने समाज यानी समाज के भीतर उसकी अपनी समाजिकता का प्रश्न, एक बड़ा प्रश्न है। लेकिन चूॅकि वह संरचना के भीतर नहीं है, इसलिए समस्यामूलक है और सबसे पहले इससे टकराना जरूरी हो जाता है। इसलिए ‘कब्जे की भूमि’ के सिंद्धांत केा कलाओं में भी लागू किया गया था। सरपरस्ती की कोशिशें और फिर उसके सरपरस्त के अनुसार उसका कद निर्धारित किया जाना भी इसी सिद्धांत से निकल कर आया था। इससे इंकार कर देने वाली स्त्रियों को पता है कि उनकी राह आसान नहीं रह जाती। जबकि स्त्री कला जगत में आती है कि उसे यहाॅ जेंडर बोध से उपर उठ कर दुनिया को जानने समझने का विकल्प दिखाई पड़ता है। वह यहाॅ आती है कि ज्ञान का संधान कर सके, वह अपने सहकर्मियों या बौद्धिकों से बतियाती है कि ज्ञान के नए आयाम से परिचित हो सके, लेकिन कहीं भी उसे बौद्धिक या विद्वान के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता।

 देह की सीमा से आगे स्त्री को बुद्धि के स्तर पर समानता का स्थान दे देने में अभी भी हिचकिचाहट बनी हुई है। हमारे पास साहित्य इतिहास में ऐसी स्त्रियाॅ भी रही हैं, जिन्होंने इस तरह की सरपरस्ती से इंकार किया है और जाहिर है कि इसके कारण उनका संघर्ष कई गुणा बढा। मीरा को संप्रदाय निरपेक्ष कवि माना गया। उन्हें प्रायः फुटकर खाते में डाल कर पढ़ा पढ़ाया गया। आखिर मीरा ने एक इतनी आसान राह ; किसी संप्रदाय की सदस्यता द्ध क्यों नहीं चुनी? इस अपने निर्णय और अपनी ‘अनूठी चाल’ चलने के एवज में उन्हें अपने समय में क्या क्या न सहना सुनना पड़ा? और बौद्धिक जगत ने भी लम्बे समय तक उनका कोई स्वागत न किया। बहुत बाद में जा कर मीरा पर नए सिरे से और नए संदर्भों में बात होनी शुरू हुई। आज के संदर्भ में यदि देखें तो स्त्रियों ने संघर्ष के बाद अपनी जो जगह बनाई थी, बौद्धिक भागीदारी की अपनी दावेदारी दिखाई थी, एक बार फिर उन्हें उसी संघर्ष को दुरहाना पड़ रहा है। आज बड़े सम्मेलनों, सेमिनारों आदि में अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता आदि के रूप में उनकी उपस्थिति कम होने लगी है। तमाम आयोजनों में उन्हें मुख्य भूमिकाओं से या तो हटा दिया जाता है या उनकी उपस्थिति को महत्व नहीं दिया जाता है। कभी कभी तो बड़े आयोजनों में एक भी स्त्री की भागीदारी नहीं दिखती। पत्र पत्रिकाओं के संपादक के रूप में भी स्त्रियों की संख्या नगण्य ही है। जब उसे विद्वान मानने में इतनी दिक्कत है तो भला पत्र पत्रिकाओं के संपादन की जिम्मेदारी जैसा काम उसे कैसे थमा दिया जाए! इसतरह बौद्धिक क्षेत्रों में उसकी गहरी भागीदारी भी लगातार उपेक्षित की जाती रही है।
जनसत्ता से साभार 
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 7
सम्पर्क :  alpana.mishra@yahoo.co.in