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महिला आयोग सदस्य से बातचीत

A talk with  Sushma Sahu, The member of NCW by ‘Streekaal’

यह सफर आजादी का है

वर्षा सिंह  

आईएमएस गजियाबाद कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर। 13 वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य-अनुभव. संपर्क :bareesh@gmail.com

महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी तमाम खबरों, आंकड़ों, हकीकत के बीच औरतों की आजादी से जुड़ी यह एक सुंदर तस्वीर है। दिल्ली की मेट्रो में सफर करती महिलाओं की तस्वीर। मेट्रो स्टेशन पर तेज कदम के साथ वे दाखिल होती हैं। उनकी चाल में उनका आत्मविश्वास झलकता है। उनकी आंखों में सफलता की चमक है। उन तमाम लड़कियों के चेहरे पढ़िए, कुछ एक को छोड़ दें तो ज्यादातर मजबूत-आत्मनिर्भर लगती हैं। अपने बैग कंधे पर डाले वे आगे बढ़ती हैं।

पहले बाजारों में लड़कियां-महिलाएं डरी-सहमी या चौकस सी ज्यादा दिखाई देती थीं। जैसे कभी भी कोई हादसा उनकी तरफ लपकता हुआ आ सकता है। उस सूरत में वह कुछ नहीं कर पाएंगी। उनकी मदद कोई नहीं करने आएगा। आजादी और बराबरी का संघर्ष पीढ़ियों से जारी है। एक बार फिर यह उल्लेख करते हुए कि महिला हिंसा और बलात्कार के बढ़ते मामलों के बावजूद, लड़कियों की स्थिति बेहतर हुई है। मेट्रो के लेडीज कोच में यह तस्वीर ज्यादा साफ दिखाई देती है। यहां हर वर्ग, जाति, उम्र की लड़कियां-महिलाएं आती हैं। स्कूल-कॉलेज जा रही लड़कियों से लेकर रिटायरमेंट की उम्र को पहुंच रही महिलाओं तक। शॉपिंग करने, फैशनेबल कपड़े, बिंदास छवि से लेकर सीधी सादी घरेलू महिला तक।

मेट्रो के इस सफर के दौरान मेरी सीट के बगल में, कॉलेज जा रही दो लड़कियां खड़ी थीं। पहनावे, बोली से जाहिर था कि वे निम्न मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक ने कहा, मुझे कपड़ों पर किसी भी किस्म की पाबंदी बर्दाश्त नहीं है, अगर कोई मुझे मेरी पसंद का कुछ पहनने से रोकता है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, वे कौन होते हैं ये बताने वाले कि हमें क्या पहनना है। हमारी जिंदगी है, हम चुनेंगे क्या पहनें-क्या नहीं। इस लड़की ने लेगिंग और टॉप पहना हुआ था। इसकी दूसरी साथी ने जवाब दिया- मेरे घर में तो अब कोई रोक टोक नहीं होती। मैं तो जींस ही पहनती हूं। पहले बुआ लोगों को जींस पहनने से मना करते थे। पर अब मेरे परिवार के लोग बदल गए हैं।

महिलाओं के पहनावे को लेकर अब भी खूब सवाल जवाब होते हैं। कभी कॉलेज में जींस पर पाबंदी लगायी जाती है तो कभी पंचायतें ऐसा करती हैं। यहां तक कि नेतागण भी बलात्कार और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर बड़ी आसानी से पहनावे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। यही लोग इस सवाल का जवाब नहीं दे पाते कि तीन साल की बच्ची से बलात्कार क्यों होता है, क्या पहनावे के कारण।

मेट्रो में सवार होते ही ज्यादातर यात्री अपने चार-छह इंच के मोबाइल के मार्फत आभासी दुनिया में डुबकी लगा लेते हैं। एक लड़की बोलती है-यार फेसबुक पर जब भी मैं पॉलीटिक्स पर कुछ लिखती हूं, कोई कमेंट नहीं करता, दो चार लाइक ही आते हैं। लेकिन प्यार मोहब्बत पर एक दो लाइन लिख दो, फिर देखो, लाइक्स-कमेंट्स की बरसात हो जाती है। दूसरी बोलती है, हां यार हमारे देश में आशिकी खूब चलती है। अब आप खुद ही इस बात के मायने निकालिए।

मेट्रो में सफर कर रहे लोगों की मानसिकता क्या बदल जाती है। यहां छेड़छाड़ या पहनावे को लेकर किसी तरह के फिकरे सुनने को नहीं मिलेंगे। हां सब अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी में होते हैं। लेकिन मेट्रो में सुरक्षा और तमाम वजहों से छेड़छाड़ जैसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। यहां जींस-स्कर्ट, मिडी, मिनी, सब तरह की पोशाक में लड़कियां सफर करती हैं और बड़ी बिंदास होकर रहती हैं। मेट्रो चल पड़ती है और वह अपने बैग में से कोई किताब निकालती है, कोई अंग्रेजी बेस्ट सेलर है। पूरे सफर के दौरान यहां तक कि ट्रेन से निकलने और प्लेटफॉर्म पर चलने के दौरान भी किताब में उसकी निगाहें धंसी हुई है और वो बेधड़क चली जा रही है। कोई डर नहीं। कोई रोक टोक नहीं। यहां वो जैसे चाहे वैसे रह रही है। लेकिन मेट्रो और इसका सफर तो कुछ ही देर के लिए है। इसके प्लेटफॉर्म से बाहर की दुनिया कहीं ज्यादा बड़ी है, यहां से बाहर का सफर ज्यादा लंबा है।

अब इन दो लड़कियों को देखिए। अभी-अभी कॉलेज में दाखिला लिया होगा। एक आम से परिवार की सामान्य सी लड़कियां लग रही हैं। मोबाइल में चल रहे गाने को इयर फोन से सुनते हुए, उस पर थिरक रही हैं, मेट्रो में, वे अपनी धुन में मस्त हैं। कोई परवाह नहीं बगल खड़ा व्यक्ति क्या सोचेगा। क्योंकि दरअसल बगल में खड़े व्यक्ति को इससे ज्यादा फर्क पड़ना ही नहीं है। सबकी अपनी दुनिया है। वे मेट्रो में थिरक रही हैं। सुंदर दृश्य है यह। आजादी का नृत्य।

हालांकि कुछ धुर विरोधाभासी दृश्य भी दिखाई देते हैं। जैसे मेरे सामने सीट पर बैठी यह महिला। दफ्तर जा रही होगी। बाल गीले और खुले हुए हैं। जींस-शर्ट पहने हुए। अंतर्राष्ट्रीय कंपनी गूची का बैग लिए हुए। हाथ में बड़ा सा मोबाइल, जाहिर है इसकी कीमत ज्यादा होगी। मेट्रो में सीट मिलते ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और होठ कुछ फुसफुसाने लगे। किसी मंत्र का पाठ, या हनुमान चालीसा, कुछ ऐसा ही। मैं यहां आधुनिकता और आस्था को दो विपरीत छोर पर खड़ा करने का प्रयत्न नहीं कर रही। बस यह तस्वीर जरा हटकर है। उसके ठीक बगल में बैठी एक लड़की ने बैग में से एक रजिस्टर निकाल लिया है। रजिस्टर में झांकर मैंने पता कर लिया कि यह गणित की छात्रा है। मेट्रो में सफर करती हुई ऐसी तमाम लड़कियां मिल जाएंगी जो अपने नोट्स पढ़ रही होंगी। कुछ चालीसा पढ़ती हुई भी दिख जाती हैं।

जैसे सुबह आसमान परिंदों की चहचहाहट से भर जाता है। वैसे ही सुबह के समय की मेट्रो अपने यात्रियों के उत्साह से भरी होती है। लड़कियां कॉलेज जा रही होती हैं, दफ्तर जा रही होती हैं। वे अपनी दोस्तों का स्वागत करती हैं। वे पाबंदियों से मुक्त नजर आती हैं। इयरफोन कान में ठूंसे, किसी की निगाहें उपन्यास में उलझी, कोई अपनी नोटबुक के पन्ने पलटती है, कोई फोन पर अपने दफ्तर के साथी को आगे के लिए दिशा निर्देश देती है। शाम को घर लौटने के सफर में उनके चेहरों पर कुछ थकान होती है। सुबह से अलग, शाम की मेट्रो में थोड़ा आलस उमड़ता है, थोड़ी थकान फैली होती है, उनकी चहचहाहट कुछ कम होती है, घर में उनके हिस्से का कार्य अभी बाकी होगा, ऐसा माना जा सकता है।

मेट्रो के इस सफ़र की खूबसूरती को समझने के लिए हमें दिल्ली की सड़कों पर उतरना होगा। क्या दिल्ली की सड़कें भी अपने यात्रियों को ऐसी सहूलियतों से बख्शती हैं। क्या यहां पर आप इसी तरह अपनी दुनिया में लीन सफर कर सकते हैं। नहीं। यहां आपके लिबास पर फब्तियां कसनेवाले मिल जाएंगे। बस स्टैंड पर आपके बगल में खड़े लोग आपको घूरते मिल जाएंगे। पैदल चलते हुए कोई जानबूझकर टक्कर मारता निकल जाएगा। सड़क किनारे खड़ी कार डराती है, दरवाजा खोलकर कोई अंदर खींच लेगा।

यह डर दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के आंकड़ों की वजह से है। 2013 की तुलना में 2014 में महिलाओं से अपराध के मामले 18.3 प्रतिशत तक बढ़ गए, जिसमें बलात्कार के मामले 31.6 प्रतिशत बढ़े। दिल्ली पुलिस रिकॉर्ड में 2014 में बलात्कार के कुल 2,069 मामले दर्ज किए गए जबकि 2013 में  1,571 मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली पुलिस के ही वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि यहां हर रोज महिलाओं के खिलाफ हिंसा के करीब 40 केस दर्ज किए जाते हैं, इनमें बलात्कार और छेड़खानी की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

बलात्कार सामाजिक समस्या है। इसका हल भी समाज में बदलाव के जरिये ही निकल सकता है। मेट्रो के अंदर प्रवेश करते ही ज्यादातर लोगों का बरताव बदल जाता है। मेट्रो के बाहर वही लोग भरोसे लायक नहीं रह जाते। मेट्रो के अंदर की लकदक, सुरक्षा, शालीनता, यहां से बाहर निकलते ही बिखर जाती है। मेट्रो अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंच गई है। यह सफर यहीं पूरा हुआ। लोगों का रेला बाहर की ओर उमड़ता है। मेट्रो के अंदर बिंदास सफर कर रही लड़कियां वापस उन्हीं रास्तों पर पहुंच गई हैं, जो उनके लिए अबतक सुरक्षित नहीं बन पाए हैं। तमाम दुर्घटनाओं-आशंकाओं, विपरीत हालातों को परे ढकेलते हुए वो तेज चाल से आगे बढ़ रही हैं। यह सफर आजादी का है।

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

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12 दिसंबर को एन एफ आई डवल्यू और स्त्रीकाल के संयुक्त तत्वावधान में ‘ महिला आरक्षण : कहाँ हैं रूकावटे’ विषय पर एक सार्थक राउंड टेबल, अंसल भवन (कस्तूरबा मार्ग ) स्थित एन एफ आई डवल्यू के कार्यालय में हुआ . बातचीत में विभिन्न महिला संगठनों के कार्यकर्ताओं , सामाजिक चिंतकों , क़ानूनविदों , पत्रकारों , आदि भाग लिया. एन एफ आई डवल्यू, आयडवा, राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोँलंन , आल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस, भारतीय महिला मोर्चा , जे. डवल्यू .पी , ए आई एस एफ, सत्यशोधक महिला समाज, सम्बुद्ध महिला संगठन, सी डवल्यू . एस. डी, दलित लेखक संघ, सहित अन्य संगठनों के प्रतिनिधि, दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू के शोधार्थी तथा अन्य बुद्धिजीवी शामिल हुए.

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन


स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की रचनाओं से भी अभिव्यक्त होती रही है. लोक कथाओं और लोकमिथों में अन्य केन्द्रीय विषयों में से एक विषय स्त्री की यौनिकता भी हुआ करती है. इस विषय पर कहन के ढंग और कहने के उद्देश्य से ही रचनाकार की स्त्री के प्रति अपनी संवेदनशीलता का भी पता चलता है .

7 फरवरी को भारतीय रंग महोत्सव में भिखारी ठाकुर लिखित नाटक (गबरघिचोर- मूल नाटक ,पुत्रवध )  का युवा निर्देशक प्रवीण गुंजन के निर्देशन में मंचन हुआ . भिखारी ठाकुर,  यानी भोजपुरी लोक के महान रचनाकार,  के क्लासिक की मंच –प्रस्तुति इसलिए एक चुनौती है कि बिना उसके मूल स्वभाव को ज्यादा छेड़े उसे समसामयिक कैसे बनाया जाये और इसलिए भी कि उसकी कई प्रस्तुतियां अनेक बार हो चुकी हैं, तो नई प्रस्तुति को अलग और जरूरी कैसे बनाया जाये

कहानी के केंद्र में स्त्री की यौनिकता और उसके मातृत्व का अधिकार है. काम के लिए महानगर गया गलीज जब बरसों बाद लौट कर गाँव आता है , तो वह अपने बेटे ‘ गबरघिचोर’ को अपने साथ ले जाना चाहता है. यह उसके लिए इतना आसान नहीं रह जाता, जब गाँव का ही एक व्यक्ति ‘ गड़बड़ी’ उसे अपना बेटा बताता है, गलीज की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी से उत्पन्न गड़बड़ी का बेटा . गलीज की पत्नी भी अपने बेटे को शहर भेजने के खिलाफ है . मामला पंचायत के पास जाता है और अंततः पंचायत उसे तीन टुकड़े में काटकर बराबर –बराबर तीनों दावेदारों के बीच बांटने का निर्णय देती है. नाटक के कथानक में कई विषय प्रत्यक्ष –परोक्ष रूप से व्याख्यायित होते हैं. पलायन, स्त्री के प्रजनन और श्रम पर पुरुष का अधिकार. बेटे के रूप में सम्पत्ति का उतराधिकार के अलावा श्रम के रूप में उसकी उपयोगिता पर पुरुष का अधिकार आदि विषय नाटक के कथानक से उभर कर आते हैं , और पुरुष नियंत्रित व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है, जो  स्त्री की ‘ नियति’ तय करती रही है.

भोजपुरी के इस नाटक में लोक संवाद और संवेदना का मिठास है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ग्राम समाज किन भोले तर्कों के साथ ढोती है, इसमें इसकी झलक भी मिलती है. हालांकि इस व्यवस्था को प्रश्नांकित करती, अपने हक़ के लिए तर्क उपस्थित करती स्त्री की भाषा में भी ग्राम समाज की भोली तर्क पद्धति ही उपस्थित होती है. भिखारी ठाकुर स्त्री संवेदना के रचनाकार रहे हैं, लोक का यह हिस्सा उनके रचनाकर्म की कालजयिता के एक कारणों में है. यह नाटक निर्देशक के लिए भी इसलिए चुनौती की तरह है कि सवाल उसके सामने होगा कि भिखारी ठाकुर की इस संवेदना के साथ वह कितना न्याय कर पाया है. क्या उसका मंचन टेक्स्ट  की  तरह अंततः स्त्री के साथ संवेदनशीलता के साथ न्याय कर पाता है ? यह सवाल इसलिए भी  कि नाटक का विषय है विवाहेत्तर पुरुष से प्राप्त बेटे पर अधिकार प्रश्न और इस तरह स्त्री की यौनिकता- जो रचनाकारों से लेकर नीतिकारों तक का विषय रही है – जिसके कारण कुछ समझदार पुरुष वैराग्य लेते हुए दिखाए जाते रहे हैं,कामुकता को कोसते नजर आते हैं. ज़रा सी चूक नाटक में स्त्री को उपहास का पात्र बना सकती थी . लेकिन युवा निदेशक इसके मंचन और इसके साथ प्रयोगों में सफल रहे हैं, जिससे  मंचन की संवेदना स्त्री के प्रतिऔर सशक्तता से जुडती है .

एक चर्चित क्लासिक में प्रयोगों की संभावनाएं बहुत कम होती हैं, मंचन की सफलता इस तथ्य में भी है कि वह कथानक के टाइम और स्पेस में रचकर उसे समकालीन भी बनाये. मूल टेक्स्ट में कुछ नये गीतों को जोड़कर यद्यपि प्रयोग भी किये गये हैं . मंचन के क्राफ्ट में हर पात्र एक अलग चरित्र है,  तो समाज की एक समवेत सोच का प्रतिनिधि भी. वह खुद को जीता है और पात्रों के साथ सामाजिक हर्ष  -विषाद –तर्क और प्रतिवाद को भी-परकाया प्रवेश का क्राफ्ट.

नाटककार और निदेशक की संवेदना स्त्री के साथ होने के कारण ही पुत्र पर अधिकार के हास्यास्पद बंटवारे के बावजूद स्त्री का पक्ष न सिर्फ उसके ममत्व के कारण मजबूत दिखता है , बल्कि उसकी अपनी यौनिकता पर उसके खुद के निर्णय से उसका पक्ष मजबूत होता है – वह दृढ़ता के साथ न सिर्फ विवाहेत्तर पुरुष के साथ अपने जाने की स्थितियां बताती है बल्कि अपने इस निर्णय के पक्ष में भी खाडी होती है और अपनी कोख पर अपने अधिकार के प्रबल पक्ष के साथ पंचों को निरूतर भी कर देती है – इस मायने में यह स्त्रीवादी कथ्य के रूप में है- आधुनिक स्त्री की चेतना से संपन्न. नाटक का संवाद ही स्पष्ट करता है कि  ‘ तथाकथित पर पुरुष –गमन ’ को जब सीता नहीं बचा पाई तो साधारण स्त्री क्या – इस मामले में यह समसामयिक कथन सा है और समसामयिक हस्तक्षेप भी- अतिवादी सांस्कृतिक चेतना पर एक चोट.

मंचन के अंतिम आधे घंटों में एक प्रायः स्पष्ट कहानी के साथ दर्शकों को बांधे रखना भी निदेशक की सफलता ही है, क्योंकि हर दर्शक को यह स्पष्ट था कि क्या घटित होगा, लेकिन इस आधे घंटे की करुणा के साथ दर्शक बंधा रहता है – उद्दीपन का काम करता है निदेशक की परिकल्पना के साथ जोड़ा गया एक सोहर – जो न सिर्फ मातृत्व का कारुणिक प्रसंग उपस्थित करता है, बल्कि अट्टालिकाओं की हृदयहीनता को भी- महाकाव्य की आदर्श मां’ कौशल्या’ की लोकछवि इस सोहर में ह्रदयहीन रानी का है.  निस्संदेह भारतीय रंग महोत्सव की यह ख़ास प्रस्तुति थी.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. संपर्क: themarginalised@gmail.com

स्त्री और बौद्धिकता

अल्पना मिश्र
बौद्धिकता के साथ स्त्री को जोड़ कर देखने की कोई परम्परा हमारे देश में नहीं रही। इसकारण जन मानस का कोई अभ्यास भी बौद्धिक स्त्री की स्वीकार्यता को ले कर सहज भाव से तैयार नहीं हो सका। यहाॅ नवजागरण के समय उठाये गए तमाम स्त्री नाम याद आ सकते हैं और यह तर्क भी किया जा सकता है कि ‘फलां फलां तो थीं ही।’ लेकिन क्या वस्तुस्थिति ऐसी ही थी? सुदूर अतीत में विदुषी घोषा को अश्विनी कुमारों को संबोधित करके पहला वाक्य यही कहना पड़ा था कि ‘‘ हे अश्विनी कुमारों, मैं ज्ञान बुद्धिहीना नारी हॅू’’। अर्थात अपनी बौद्धिक क्षमता को स्वतः कमतर मान लेने पर ही आपको बौद्धिकों के समाज में शामिल होने की अनुमति मिलेगी। यदि स्त्रियाॅ ऐसा नहीं करतीं तो लगातार बौद्धिक कहा जाने वाला समाज उन्हें तरह तरह से बताता है कि वे बुद्धि के क्षेत्र में प्रवेश न करें और यदि प्रवेश करती हैं तो वहाॅ भी पितृसत्ता के द्वारा निर्धारित किए गए दायरे के भीतर ही रहें। दो बहुत प्रत्यक्ष स्थितियाॅ समाज ने बौद्धिक स्त्री के लिए बनाई हैं। एक तो – जब वह बौद्धिक क्षेत्र में समानता का दावा करती है और कई बार अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाती है, तब उसे छल बल से रोकने की हजार कोशिशें होती हैं। उसकी राह में सामंती मानसिकता के बहुतेरे कांटे बिछाए जाते हैं, उसे अपमानित और बहुधा दंडित किया जाता है। बुद्धि का प्रयोग करने और ज्ञानपिपासा की अभिव्यक्ति पर दंडित किए जाने की लम्बी परम्परा मौजूद रही है।


 यह आज मानसिकता आज भी हमारे समाज में बहुत गहरे जड़ जमाए बैठी है और लगातार स्त्री को अपनी बुद्धि का उपयोग करने के लिए अपमानित, उपेक्षित, प्रताड़ित और दंडित करती रहती है। यह अकादमिक जगत से लेकर लगभग सभी बौद्धिक क्षेत्रों में होता रहा है। दूसरा तरीका बेहद परम्परागत है, जहाॅ भारतीय मानस में स्त्री की दैवीय छवियाॅ बहुत मान्य और पूज्यनीय रही हैं और तब एक बौद्धिक स्त्री, विद्वान की श्रेणी में न आकर पूज्यनीया की श्रेणी में डाल दी जाती है। वह हाड़ मांस की मानवी होने की सहजता और जन जीवन में घुल मिल जाने की स्वाभाविकता से परे एक खास दुनिया की प्राणी मान ली जाती है, जो लगभग पराभौतिक छवि है। यह छवि कोई दिक्कत नहीं पैदा करती, कोई चुनौती नहीं रखती, उसका काम उसके दैवीय रूप से ढॅक दिया जाता है, इसलिए उसका नाम लेना आसान हो जाता है। अनुकूलन की ऐसी व्यवस्था एक तरफ स्त्री को उसके इतिहास से काट देती है, उसके रोल माॅडल से दूर कर देती है और दूसरी तरफ ज्ञान संधान के सब रास्ते बंद कर देती है। ज्ञान के लिए व्याकुलता और जिज्ञासा, स्त्री के लिए कुछ ऐसी बना दी जाती है, जैसे वह, उसकी विद्वता को कम कर देगी, रूप और लावण्य बिला जाएगा! सत्संगऔर बहसें उसके चरित्र को दूषित कर देगीं! तर्क करती, बहस करती स्त्री हमारे समाज की स्वीकृत स्त्री कभी नहीं रही है। जबकि यही व्याकुलता, जिज्ञासा, सत्संग, तर्क आदि ज्ञान के लिए आवश्यक शर्ते बताई गई हैं, पर किसके लिए? सिर्फ पुरूषों के लिए! नवजागरण के समय भी, नई शिक्षा के माध्यम से ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों की आवश्यकता पुरूषों के लिए मानी गई थी, स्त्रियों के लिए बड़ी हिम्मत करके स्त्री धर्म शिक्षा की ही बात की जा रही थी। लम्बे समय तक गृहविज्ञान लड़कियों केलिए अनिवार्य विषय हुआ करता था। प्रगति और संघर्ष के इतने वर्षों बाद, आज भी कहीं कहीं यह अनिवार्य विषय बना हुआ है।

इसी के बरक्स लेखन की बौद्धिक गतिविधियों के बीच स्त्री हस्तक्षेप को भी देख सकते हैं। यहाॅ भी एक पूरा दौर स्त्री विमर्श केा स्त्री की यौन आजादी तक सीमित कर देने का रहा। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, बुद्धि विवेक इससे दूर कर दिए गए। समाज में हो रहे अन्य स्त्री आन्दोलनों को नजरअंदाज किया गया। स्त्री के सामाजिक सरोकार परे ढकेल दिए गए। ऐसी यौन आजादी की बात की गई, जो कोई भविष्योन्मुखी रास्ता नहीं बनाती। यह पूरा पितृसत्तात्मक स्थितियों के अनुकूल और बाजार की आवश्यकतानुसार तैयार किया गया लगता है। जिसने नकली स्त्री विमर्शकार और सतही स्त्री विमर्श के लेखक तैयार किए। बिना पढ़े, बिना जाने स्त्री विमर्श पर खूब बात की गई। इसका विरोध करती एक कोशिश उसी दौर में स्त्रियों की तरफ से होती हुई भी दिखती है, जो स्त्री के सही यथार्थ की बात कर रही थी। उसके संघर्षेंा को और परिस्थितियों की आवाज बन रही थी। लेकिन ऐसी आवाजों को दबाया गया या उपेक्षित किया गया। प्रतिभाशाली की उपेक्षा करना लेखन तंत्र का भी एक बड़ा औजार है। जेंडर विभेद की स्थिति इतनी गहरी है कि जहाॅ जहाॅ स्त्रियों ने बड़ा काम किया या बड़ा दायरा बनाया, वहाॅ वहाॅ उनका नाम लेने का साहस ही प्रायः नहीं किया गया। साहस इतना भी नहीं दिखता कि यदि स्त्रियों ने साहित्य भाषा को नया आयाम दिया और उल्लेखनीय बदलाव किया तो उसे स्वीकार किया जाए। दरअसल इतने लम्बे समय तक स्त्री लेखन की उपेक्षा और साहित्येतिहास से उनकी जानबूझ कर बनाई गई अनुपस्थिति भी इसका एक आधार तैयार करती है।

सभी कलाओं में स्त्री के प्रवेश के साथ उसकी सरपरस्ती की स्थितियाॅ भी बनाई गई थीं। यह एक स्त्री आई है- गाने, अभिनय करने, लिखने आदि तो यह अकेले कैसे रह सकती है? इसका गाॅडफाॅदर कौन है? अकेले, अपने अस्तित्व के साथ खड़ी स्त्री हमारी समाज संरचना से गायब है। और यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है, अपनी जगह बनाना और वहाॅ मजबूती से खड़े होना। उसके अपने समाज यानी समाज के भीतर उसकी अपनी समाजिकता का प्रश्न, एक बड़ा प्रश्न है। लेकिन चूॅकि वह संरचना के भीतर नहीं है, इसलिए समस्यामूलक है और सबसे पहले इससे टकराना जरूरी हो जाता है। इसलिए ‘कब्जे की भूमि’ के सिंद्धांत केा कलाओं में भी लागू किया गया था। सरपरस्ती की कोशिशें और फिर उसके सरपरस्त के अनुसार उसका कद निर्धारित किया जाना भी इसी सिद्धांत से निकल कर आया था। इससे इंकार कर देने वाली स्त्रियों को पता है कि उनकी राह आसान नहीं रह जाती। जबकि स्त्री कला जगत में आती है कि उसे यहाॅ जेंडर बोध से उपर उठ कर दुनिया को जानने समझने का विकल्प दिखाई पड़ता है। वह यहाॅ आती है कि ज्ञान का संधान कर सके, वह अपने सहकर्मियों या बौद्धिकों से बतियाती है कि ज्ञान के नए आयाम से परिचित हो सके, लेकिन कहीं भी उसे बौद्धिक या विद्वान के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता।

 देह की सीमा से आगे स्त्री को बुद्धि के स्तर पर समानता का स्थान दे देने में अभी भी हिचकिचाहट बनी हुई है। हमारे पास साहित्य इतिहास में ऐसी स्त्रियाॅ भी रही हैं, जिन्होंने इस तरह की सरपरस्ती से इंकार किया है और जाहिर है कि इसके कारण उनका संघर्ष कई गुणा बढा। मीरा को संप्रदाय निरपेक्ष कवि माना गया। उन्हें प्रायः फुटकर खाते में डाल कर पढ़ा पढ़ाया गया। आखिर मीरा ने एक इतनी आसान राह ; किसी संप्रदाय की सदस्यता द्ध क्यों नहीं चुनी? इस अपने निर्णय और अपनी ‘अनूठी चाल’ चलने के एवज में उन्हें अपने समय में क्या क्या न सहना सुनना पड़ा? और बौद्धिक जगत ने भी लम्बे समय तक उनका कोई स्वागत न किया। बहुत बाद में जा कर मीरा पर नए सिरे से और नए संदर्भों में बात होनी शुरू हुई। आज के संदर्भ में यदि देखें तो स्त्रियों ने संघर्ष के बाद अपनी जो जगह बनाई थी, बौद्धिक भागीदारी की अपनी दावेदारी दिखाई थी, एक बार फिर उन्हें उसी संघर्ष को दुरहाना पड़ रहा है। आज बड़े सम्मेलनों, सेमिनारों आदि में अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता आदि के रूप में उनकी उपस्थिति कम होने लगी है। तमाम आयोजनों में उन्हें मुख्य भूमिकाओं से या तो हटा दिया जाता है या उनकी उपस्थिति को महत्व नहीं दिया जाता है। कभी कभी तो बड़े आयोजनों में एक भी स्त्री की भागीदारी नहीं दिखती। पत्र पत्रिकाओं के संपादक के रूप में भी स्त्रियों की संख्या नगण्य ही है। जब उसे विद्वान मानने में इतनी दिक्कत है तो भला पत्र पत्रिकाओं के संपादन की जिम्मेदारी जैसा काम उसे कैसे थमा दिया जाए! इसतरह बौद्धिक क्षेत्रों में उसकी गहरी भागीदारी भी लगातार उपेक्षित की जाती रही है।
जनसत्ता से साभार 
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 7
सम्पर्क :  alpana.mishra@yahoo.co.in 

ब्राह्मणवाद का प्रतीक है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय

 अरविन्द गौड़


(यह आलेख समकालीन रंगमंच पत्रिका के ‘‘रंगकर्म और प्रशिक्षण‘‘ पर केन्द्रित नये अंक में प्रकाशित होने जा रहे मूल आलेख का एक अंश है, जो अरविन्द गौड़ के साथ पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ रंगकर्मी राजेश चन्द्र द्वारा की गयी बातचीत पर आधारित है। पत्रिका का यह अंक फिलहाल प्रेस में है और इसी भारत रंग महोत्सव के दौरान पाठकों के समक्ष होगा। हमारे विशेष आग्रह पर संपादक ने यह आलेख स्त्रीकाल के पाठकों के लिये उपलब्ध कराया है. आलेख,  इस उम्मीद के साथ कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय वर्तमान व्यवस्था के तहत अपनी ब्राह्मणवादी जड़ता से मुक्त होने की ओर बढ़ेगा. )





भारत में नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी जो सबसे कड़वी सच्चाई है, वह यह कि यहां नाट्य प्रशिक्षण सिर्फ एक संस्थान की परिधि तक सीमित रह गया है। ऐसी धारणा स्थापित कर दी गयी है कि आप यदि एनएसडी से प्रशिक्षित हैं तो ही आप प्रशिक्षित हैं, अन्यथा आप प्रशिक्षित नहीं हैं, आप अमैच्योर हैं। एक साज़िश के तौर पर स्थापित की गयी इस धारणा से पूरे हिन्दुस्तान के थियेटर का सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है। निस्संदेह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसने थियेटर की समझ बनाने में, उसके तकनीकी विकास में एक बड़ी भूमिका निभायी है, लेकिन जो भी लोग वहां से निकल कर आये, उनका सिर्फ ट्रेनिंग से काम नहीं चला। उन अभिनेताओं ने, निर्देशकों ने बाहर जाकर काम किया, अपने आप को एक्सप्लोर किया तब कहीं जाकर वे अपनी पहचान बना पाये।

ऐसे प्रशिक्षण संस्थान की अलग-अलग भाषाओं में ज़रूरत थी, लेकिन हुआ उल्टा। एक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तो बनाया गया, लेकिन उसका विकेन्द्रीकरण नहीं किया गया। तो जिस प्रशिक्षण को लोगों तक भाषा के स्तर पर, बोलियों के स्तर पर पहुंचना चाहिये था, वह राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली तक सीमित हो कर रह गया। भारतीय रंगमंच में प्रशिक्षण की जो संभावनाएं थीं, वे सांस्कृतिक नीति और दृष्टि के अभाव में एक सीमित दायरे में क़ैद होकर रह गयीं। दूसरा यह कि आप किस तरह का प्रशिक्षण दे रहे हैं, किस तरह का प्रशिक्षण होना चाहिये, प्रशिक्षण क्यों होना चाहिये या भाषा और समाज और व्यक्ति का क्या सम्बन्ध है, इन बुनियादी सवालों को बिल्कुल नज़रअन्दाज़ कर दिया गया।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को लेकर यह परिकल्पना थी कि कुछ छात्र आयेंगे जिन्हें प्रशिक्षण देना है। आप किस भाषा में प्रशिक्षण देंगे इसका कोई मापदंड नहीं था। अब कोई केरल से आ रहा है, कोई आंध्र से आ रहा है, कोई असम से आया है, आप उन सब को दिल्ली में बुला कर हिन्दी के नाटक करा रहे हैं। मतलब उनकी मौलिकता को ख़त्म कर रहे हैं। हिन्दी में नाटक कराने का मतलब राष्ट्रीय हो जाना नहीं है। असम का लड़का अगर अपनी असमिया भाषा में प्रशिक्षण ले, केरल का लड़का वहीं पर ले, आंध्र का लड़का वहीं पर ले, यहां तक कि भागलपुर का लड़का अपनी भाषा में प्रशिक्षण ले तो वह ज़्यादा काम कर सकता है और अलग चीज़ें एक्सप्लोर कर सकता है।

प्रशिक्षण

तो यह जो प्रशिक्षण को कण्ट्रोल किया गया है, उसकी वजह से पिछले 50-60 सालों में जो भारतीय स्वरूप बनना चाहिए था रंगमंच का, वह नहीं बन पाया। बार-बार यह सवाल उठा है कि अगर एनएसडी का डिसेन्ट्रलाइजे़शन हो जाये तो शायद यह बंद न हो जाये। हम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय कहते हैं, लेकिन राष्ट्र का स्वरूप क्या है, नेशनैलिटी क्या होती है इसे बिना सोचे-विचारे इन सब को हमने केंद्र में लाकर रख दिया। कहने को हमारे पास राष्ट्रीय प्रशिक्षण संस्थान है, लेकिन उस संस्थान का पूरे देश के रंगमंच में क्या वाकई कोई योगदान है, इसको भी देखने की ज़रूरत है।

डिसेन्ट्रलाइजे़शन नहीं होने की वजह से ही आज यह हालत है कि अलग-अलग भाषाओं में नहीं, बल्कि भाषाओं को कण्ट्रोल करके जब तक आप सिर्फ़ हिन्दी में नाटक कर रहे हैं, तब तक तो आप नाटककर्मी या निर्देशक हैं, अन्यथा आपको कोई पूछने वाला नहीं है। अगर आप पर मुहर लग जाती है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तो आप हैं, वरना आप चाहे कितने ही बड़े एक्टर हो जाइये, लेकिन आपके पास एनएसडी की मुहर नहीं है तो आप बेकार हैं। यह जो नज़रिया पनपा है, इसका नुकसान काफी हुआ है। नतीज़ा यह हुआ कि रंगमंच से जहां भाषा का विकास होना चाहिये था, वह और भी गतिरुद्ध ही होता गया। हिन्दी में आज जो भी ख्यातिप्राप्त निर्देशक मौजूद हैं, उनमें से अधिकतर हिन्दी की पृष्ठभूमि से नहीं बल्कि अन्य भाषाओं से आये हैं। चूंूंकि शुरुआत से ही हमने उन्हें  हिन्दी तक सीमित कर दिया, इसलिये वे अक्सर मजबूरीवश हिन्दी में थियेटर कर रहे हैं।
तो प्रशिक्षण का यह जो एक संकीर्ण और नकारात्मक रवैया रहा, उसके कारण ट्रेनिंग की जो अहमियत थी और जो सिस्टमैटिक चेन्जेज़ आने चाहिये थे, उनका पूरा पूरा अभाव दिखा। 60 सालों के बाद भी हम बार-बार यह बात करते हैं कि डिसेन्ट्रलाइजे़शन होना चाहिये, यह होना चाहिये, वह होना चाहिये। इसी का दूसरा पहलू है कि पूरे देश भर में अभिनय प्रशिक्षण का व्यवसायीकरण हुआ और कुशल व्यापारियों ने प्रशिक्षण के नाम पर तीन-तीन महीने की दूकानें खोल लीं। ये दूकानें अभिनय के प्रशिक्षण को और ही दिशा में ले जाती हैं। आप एडमिशन लीजिये और अंततः आपका लक्ष्य मुंबई में है।

रंगमंच के प्रशिक्षण के बाद क्या करना है, किस तरह से रोज़गार की व्यवस्था होगी, किस तरह से समाज में जायेंगे, इसका कोई व्यापक ब्लूप्रिंट एनएसडी के पास नहीं था। नतीज़ा यह हुआ कि वहां से निकलने वाले अधिकांश अभिनेता सिनेमा में चले गये। जिनको पैसा और ख्याति प्राप्त हो गयी, उन्हें लगा कि यह तो बहुत बड़ा माध्यम है। किसी माध्यम में जाना ग़लत नहीं है, लेकिन रंगमंच का प्रशिक्षण लेने के बाद अभिनेता का एक मात्र लक्ष्य सिनेमा हो जाता है तो कहीं न कहीं प्रशिक्षण में कुछ ख़ामी है, कुछ गड़बड़ी है जिसकी छान-बीन करने की ज़रूरत थी, पर आज तक यह नहीं की गयी। नतीज़ा यह है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का कोई प्रोफेसर रिटायर होता है तो अपना भविष्य थियेटर में नहीं तलाश करता है, वह अपना भविष्य हिन्दी सीरियल में या सिनेमा में तलाश कर रहा होता है। इससे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है। यह अपने आप में एक त्रासद और हास्यास्पद स्थिति है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो ज़िन्दगी भर रंगमंच के प्रति प्रतिबद्धता की बात करते नहीं थकते, उनको आगे के विकास के रास्ते थियेटर में नहीं मिलते। आखि़र इनके अनुभव का लाभ अगली पीढ़ी को क्यों नहीं मिल पाता? उनको वैकल्पिक रास्ते तलाश करने पड़ते हैं, दिल्ली छोड़ कर मुम्बई में रहना पड़ता है।

रंगमंच के प्रशिक्षण के सन्दर्भ में जो सबसे बड़ी ख़ामी हमारे पूरे सिस्टम में है, वह यह कि वहां एक्टर को संभालते नहीं है। समाज में क्या हो रहा है, क्या अंतद्र्वद्व हंै, क्या चुनौतियां हैं, सोशल-पाॅलिटिकल इश्यूज़ क्या हैं, हमारे आसपास किस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं, जातिगत ढांचा क्या है, हमारी धार्मिक भावनाओं और उनके पीछे के आडम्बर के बीच में क्या है, हमारा समाज कहां जा रहा है- यानी जो सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल समाज में दिखाई देती है, वह थियेटर में नहीं आ रही है। प्रशिक्षण में तो निश्चित रूप से नहीं आ रही है।

नाटक में तो कभी-कभार मंच पर खड़ेे होकर आप किसी मुद्दे पर बातें कर लेते हैं, लेकिन हाॅल से बाहर आने के बाद आपका कोई कन्सर्न या जुड़ाव नहीं रहता। कहने को आप सामाजिक नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में समाज से एक्टर जुड़ेे यह काम प्रशिक्षण करता है। प्रशिक्षण के अभाव में समाज से आपका वास्तविक रिश्ता नहीं बनता, सिर्फ नाट्य रिश्ता बनता है, व्यावसायिक अथवा प्रोफेशनल रिश्ता बनता है। वहां से आप रिसोर्सेज़ को उठा कर ले आते हैं और इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन उस समाज के प्रति आपकी ज़िम्मेदारी कुछ नहीं है। समाज के साथ कोई गहरा जुड़ाव नहीं होने की वजह से ही प्रशिक्षण के बाद एक्टर इधर-उधर भाग जाते हैं। अवार्ड के लिये या किसी और चीज़ के लिये जुगाड़बाज़ी और बहुत ही निकृष्ट किस्म के समझौते करते हुए दिखाई देते हैं। अगर आप समाज से थियेटर को जोड़ते हैं, तो रीढ़ की हड्डी बनेगी एक अभिनेता की, उसको मालूम होगा कि क्या चल रहा है। तो मुझे लगता है एक चालू किस्म का प्रशिक्षण काफी नहीं है। प्रशिक्षण का जुड़ाव आगे व्यापक रूप में समाज के साथ होना ज़रूरी है।

प्रशिक्षण के बाद हम देखते हैं कि एक्टर के पास रोज़गार की बहुत ज़्यादा संभावनाएं नहीं हैं। आपने उसके लिये कोई ढांचा नहीं बनाया तो उसका भी एक प्रभाव पड़ता है। पिछले 60 साल में, मुझे लगता है संस्थागत प्रशिक्षण के मामले में समाज पीछे रह गया है। देश के अंदर क्या चल रहा है, इससे हमारे प्रशिक्षण का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता। दिल्ली के अंदर होते हुए भी, मात्र चार किलोमीटर दूर भ्रष्टाचार का आन्दोलन हो रहा है, लेकिन उसके प्रति उसकी कोई संवेदना नहीं है। दामिनी वाली घटना मंडी हाउस से पांच किलोमीटर दूर हो रही है, लेकिन संस्था का उससे कोई जुड़ाव नहीं होता। हमारे आसपास लगातार धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ता जा रहा है, असहिष्णुता बढ़ती जा रही है, एक दूसरे के प्रति भरोसा ख़त्म होता जा रहा है, लेकिन आपका उससे कोई जुड़ाव नहीं है, न आप कोई जुड़ाव रखना चाहते हैं। किसी भी समाज से कट कर मनुष्य का प्रशिक्षण नहीं हो सकता, विशेष कर संस्थागत प्रशिक्षण तो बिल्कुल भी नहीं।

अरविंद गौड़ विद्यार्थियों के बीच

जहां तक पाठ्यक्रम की बात है, तो वह भी 30-40 साल पुराना है। आज तक पाठ्यक्रम की समीक्षा तक नहीं हुई है। आप कब तक उधार की चीज़ों से प्रशिक्षण देते रहेंगे? एक्टर को जो संस्थागत प्रशिक्षण दिया जा रहा है वह भी काफी महंगा है। महंगा सेट, महंगे काॅस्ट्यूम, सब चीज़ महंगी, पूरा माहौल ही पैसा खर्च करके तमाशा देखने वाला। भारतीय ज़रूरतों के हिसाब से यह प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय रंगमंच को किफ़ायती बनाना ज़रूरी है। सेट, काॅस्ट्यूम वगैरह का कम खर्चीला होना बहुत ज़रूरी है। क्रियेटिव होकर साधारण चीज़ों से नाटक करना ज़रूरी है।

जब आप प्रशिक्षण देते हैं छात्र को, तो उसे वे सभी मनमाफिक साधन सौंप देते हैं जो उसे बाहर नहीं मिलेंगे। एक्टर को जब ये साधन बाहर नहीं मिलते तो प्रशिक्षण से उसने जो क्षमता हासिल की है, वह उसके अनुसार काम नहीं कर पाता। इससे पता चलता है कि आप छात्र के लिये दिक्कतें पैदा कर रहे हैं। आप क्यों उसे बाहर की ज़रूरतों के हिसाब से, हमारे समाज की ज़रूरतों के हिसाब से, भाषा के हिसाब से, राज्यों के हिसाब से, हमारे क्षेत्रीय और आसपास के जो जुड़ाव हैं, उन चीज़ों के हिसाब से प्रशिक्षण नहीं देते? यह सिर्फ तभी हो सकता है, जब आप छात्रों को प्रत्येक राज्य के पास जाने दीजिये, हर भाषा और बोली के पास जाने दीजिये। आप नियंत्रण मत कीजिये, शायद वह अपने आप समाज से टकराते टकराते चीज़ों को बदल दे। मुझे लगता है यह सबसे बड़ी दिक्कत है हमारे प्रशिक्षण की।

आप समाज से अलग नहीं हैं, आप उसका हिस्सा हैं। आप बाकी समाज को नीची नज़र से देखेंगे या कहेंगे कि आप ही का प्रशिक्षण प्रशिक्षण है, बाकी कोई काम नहीं कर रहा है, तो यह एक नकारात्मक पहलू है। दूसरी तरफ़ एक और परम्परा है, जो इप्टा की परम्परा है कि ग्रुप अपने लोगों को खुद ही प्रशिक्षित करता है। वह जो परम्परा है, वह आज सबसे ज़्यादा ताक़तवर दिखायी देती है। वह बंगाल के खेमे में दिखायी देती है- चाहे श्यामानन्द जालान हांे, उत्पल दत्त हों, शम्भू मित्र हों, वे स्वयं को और अपने अभिनेताओं को हर चीज़ में स्वयं प्रशिक्षित करते थे। यह एक कठिन प्रशिक्षण होता है, जिसमें कड़े अनुशासन की उपस्थिति होती है।

महाराष्ट्र में ही देखिये, वहां तो कोई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नहीं बैठा हुआ है, फिर एक से एक जो बढ़िया अभिनेता हमें दिखायी पड़ते हैं वहां पर, उनको किसने प्रशिक्षित किया है? एनएसडी ने तो नहीं किया। वे उन परम्परागत समूहों में रहते हुए प्रशिक्षित हुए हैं, जो सांस्कृतिक आन्दोलन के बीच से निकल कर आये थे। पूरे गुजरात में या आन्ध्र के अंदर जो बड़े-बड़े अभिनेेता पनपे, उनमें से कितने थे जिनका एनएसडी से कोई लेना-देना रहा है? तो कर्नाटक से लेकर विभिन्न राज्यों के समूहों के अंदर ट्रेनिंग की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसका एक स्पष्ट स्वरूप अब बनता दिखायी दे रहा है। उन सबकी भूमिका को नकार कर, एक दंभ के साथ जब आप कहते हैं कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने भारत के रंगमंच में सबसे बड़ी भूमिका अदा की तो यह एक बहुत बड़े झूठ से ज़्यादा कुछ नहीं है।

टीम कबीरा खडा बाजार में

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जब नहीं था, तब क्या पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, शम्भू मित्र और उत्पल दत्त नहीं थे? या हबीब तनवीर नहीं थे क्या ? औरों को छोड़िये, इब्राहिम अल्काज़ी खुद नहीं थे क्या? इब्राहिम अल्काज़ी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित छात्र नहीं हैं। तो यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम सिर्फ एक संस्थान का इतना आतंक फैला दें, कि सिर्फ उसने ही थियेटर में काम किया है, सिर्फ वही अंतिम संस्थान है, यह अपने आप में एक ऐतिहासिक झूठ है, भूल है। आपके पास सरकारी संसाधन हैं, तो आप उन संसाधनों के बल पर एक झूठ फैला चुके हैं कि आपने ही थियेटर के प्रशिक्षण में काम किया है, हालांकि इससे तथ्य नहीं बदल जायेंगे। उससे पहले अनगिनत लोगों ने बेहद महत्वपूर्ण काम किया है। बंगाल में तापस सेन ने प्रकाश से संबंधित जितने अनूठे प्रयोग किये, क्या आज तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में वैसा कुछ हो पाया?
ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। जब उत्पल दत्त कोलकाता के मैदान में नाटक करते थे, तो जो दर्शक उनको मिलते थे, कई बार 8 से 10 लाख तक, इतने दर्शक क्या इस संस्थान को 50 साल में भी मिले हैं? इसके भारत रंग महोत्सव जैसे आयोजन के अंदर कुल मिला कर जितने दर्शक आते हैं, उतने दर्शक हमारे एक दिन के नुक्कड़ नाटक में होते हैं। हम सुबह नुक्कड़ नाटक शुरू करते हैं, शाम तक अगर हम 20 नुक्कड़ नाटक करते हैं तो हमें उससे ज़्यादा दर्शक मिल जाते हैं। तो यह समझना बहुत ज़रूरी है कि प्रशिक्षण के लिये सिर्फ एनएसडी ही अंतिम जगह नहीं रही है। उसका योगदान है, योगदान को हम मना नहीं कर रहे हैं, लेकिन समानांतर रूप से दूसरे लोगों के योगदान को भी हम छोटा नहीं कर सकते।

यह एक महत्वपूर्ण बात है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों में आकर हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं। जहां से आप निकले हैं, जहां लौट कर आपको काम करना चाहिये, जिनके साथ आपको जुड़ना चाहिये, उस जगह और वहां के लोगों को आप हिकारत के साथ देखने के आदी बन जाते हैं। कहीं न कहीं इसकी जडें़ प्रशिक्षण के अंदर हैं, जहां पर उनको बाक़ी समाज से काट दिया जाता है, और काटने के बाद बताया जाता है कि आप विशिष्ट हैं। इस तरह कुछ-कुछ वैसी ही मानसिकता, वैसा ही बोध आपके अंदर भरा जाता है, जैसे एक ज़माने में कहा जाता था कि आप आर्यन रक्त हैं, शुद्ध रक्त वाले हैं, और बाक़ी यहूदी और आप उन पर राज करने के लिये निकल पड़तेे थे। तो यह जो एक आक्रामकता, या कहिये कि विशिष्टताबोध छात्रों में पनपता है, यह प्रशिक्षण की बहुत बड़ी खामी है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आज ब्राह्मणवाद का प्रतीक बन गया है। उसका मानना है कि हम जो कर रहे हैं वही श्रेष्ठ है, वही मानक है। हम जो बोल रहे हैं वही सच है। ब्राह्मणवाद के इसी गढ़ को बचाये रखने के लिये विगत साठ सालों में हिन्दुस्तान में और प्रशिक्षण संस्थान खुलने नहीं दिये गये। वे आज तक नहीं खुल पाये क्योंकि आप रेसिस्ट हैं। जैसे शूद्रों को गीत नहीं सुनना चाहिये, इसलिये उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल देते थे, बिल्कुल इसी प्रकार, आप जो प्रशिक्षण दे रहे हैं वही अंतिम है, और बाकी लोगों को उसे नहीं सुनना-सीखना चाहिये, इसके लिये आप जिनको प्रशिक्षण देते हैं, उनके अंदर एक ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताबोध उत्पन्न करते हैं। यह बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण है, यह सामंती दृष्टिकोण है कि हमारे पास जो है वह दूसरों के पास नहीं होना चाहिये। इसकी वजह से डिसेन्ट्रलाज़ेशन नहीं हो पाया है। अगर डिसेन्ट्रलाज़ेशन हुआ होता तो ये क़िले टूटते, क़िलेबंदी टूटती, वह आर्यवादी-सवर्णवादी व्यूह टूट जाता जो आज तक क़ायम है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ शो

हमारे संस्थानों में दिये जाने वाले तथाकथित प्रशिक्षण की यह बहुत बड़ी कमी है कि वह समाज और देश से नहीं जुड़ पाया। उन अनगिनत लोगों के अनुभव और योगदान को नकार कर, जिन्होंने हिन्दी और भारतीय रंगमंच के विकास के लिये अपना जीवन लगाया, क्या रंगमंच की कोई शिक्षा पूरी हो सकती है? आप सामाजिक-राजनीतिक रंगमंच की हमारी समृद्ध परंपरा को इसलिये नकारते हैं, क्योंकि आप सरकार से मदद लेते हैं। सरकार यदि अपना दायित्व समझ कर भी मदद देना चाहे, तब भी आप अतिरिक्त वफ़ादारी दिखाने के लिये सरकारी अफसरों, सचिवों-उपसचिवों की चमचागिरी में घुटनों के बल रेंगने लगते हैं। यह जो एक जुगाड़बाज़ी हमारे संस्थानों में आ गयी है, उसने प्रशिक्षण का बहुत नुकसान किया है। जब उनके अपने आदर्श नहीं होंगे, अपना दृष्टिकोण नहीं होगा तो छात्रों तक क्या पहुंचेगा। कोई भी संस्थान वहां के कर्मचारियों से, शिक्षकों से और अपने माहौल से बनता है। हम नाटकों में तो शोषण के खि़लाफ़, असमानता के खि़लाफ़ आवाज़ उठाते हैं, पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ही बात करें तो वहां पर पिछले 10-15 सालों से अस्थायी कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिनके बारे में आप ख़ामोश बने रहते हैं। नाटक में क्रांति कर देंगे, भ्रष्टाचार, जातिवाद और ग़रीबी जैसे तमाम मुद्दों पर बात कर लेंगे, लेकिन व्यवहार में सब उल्टा हो जाता है। संस्था के इस माहौल का प्रशिक्षण पर असर पड़ना लाज़िमी है।

अस्मिता थियेटर में हमारा जो प्रशिक्षण का तरीका है, उसमें हम अभिनेता को पहले इन्सान बनाते हैं, एक्टर बाद में बनाते हैं। अच्छा इन्सान बनेगा तो एक्टर अपने आप बन जायेगा। पहले अच्छा इन्सान बनाना हमारी प्राथमिकता में है, एक्टर बनाने की प्रक्रिया बाद में शुरू होती है। रंगकर्मी को पहले पता होना चाहिये कि समाज में क्या चल रहा है, आसपास क्या घटित हो रहा है, सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे क्या होते हैं, हमारे समाज के अंतर्विरोध क्या हैं, जातिगत सम्बन्ध किस तरह चीज़ों को प्रभावित करते हैं, शिक्षा में असमानता क्यों है, लैंगिक भेदभाव क्यों है या अमीरी-गरीबी और छोटा आदमी बड़ा आदमी क्यों है। शहर के अंदर स्लम की समस्या, सरकारी अस्पतालों की बदहाली, किसानों की समस्या, सरकार के वादों और उनके अमल में अंतर जैसे तमाम मुद्दे हमारे लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं, और इनसे रूबरू होते हुए हमारे एक्टर संवेदनशील बनते हैं।
हमारा तरीक़ा है कि एक्टर खुद को पढ़ने के साथ-साथ समाज को भी पढ़े और क़िताबों को भी। इस तरह उसके अंदर परिवर्तन की शुरुआत होती है। हम उनको क्लासरूम प्रशिक्षण नहीं देते, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं और एक ऐसी प्रक्रिया से गुज़ारते हैं, जिसमें उन्हें प्रेमचन्द, मंटो, यशपाल, भीष्म साहनी, कृष्णचंदर, इस्मत चुगतई, उदय प्रकाश, श्रीलाल शुक्ल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, सर्वेश्वर जैसे प्रमुख साहित्यकारों की लेखनी को भी जानने का मौक़ा मिलता है। समान रूप से उन्हें अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य से भी जुड़ने के लिये प्रेरित किया जाता है। हम उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर काम करने का व्यावहारिक अनुभव लेने देते हैं। इससे उनका अनुभव बढ़ता है, उनके अंदर सवाल पैदा होते हैं और उनका दृष्टिकोण बड़ा होता है।
हमारे पास लड़के उसी समाज से आते हैं, जिस समाज के अंदर समस्याएं हैं। वे उन समस्याओं को समझने से लेकर उससे निकलने का रास्ता खुद एक्सप्लोर करते हैं। हम उन्हें उपदेश नहीं देते कि आप जेन्डर से सम्बंधित भेदभाव मत करो। हम उन्हें एक बराबरी की भावना से युक्त माहौल में डालते हैं ताकि वे अपने अनुभव से सीखें। तो इस प्रकार जब बुनियादी मुद्दों से उनकी ट्रेनिंग शुरू होती है, तो अभिनेता स्वदेश दीपक के ‘कोर्ट मार्शल‘ जैसे नाटक को समझ के कर पाते हंै। वे ‘अ वूमैन एलोन‘ और ‘अम्बेडकर और गांधी’ जैसे नाटक को एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करके हज़ारों छात्रों के बीच लेकर जा सकते हंै, उन पर शिद्दत के साथ बात कर सकते हैं।

‘अम्बेडकर और गांधी’ सिर्फ वही अभिनेता कर सकता है, जो इस समाज के अंतर्द्वन्द्व  को समझ पा रहा हो। जो यह जानता हो कि जाति क्या होती है, वर्ण व्यवस्था क्या होती है, सवर्ण और अवर्ण के बीच के संघर्ष क्या हैं, किस तरह से दलित आन्दोलन खड़ा हुआ और आज वह कहां तक पहुंचा है। समाज में आज भी जाति ख़त्म क्यों नहीं हो रही, इलेक्शन के वक्त जाति कैसे मुद्दा बन जाती है, जब इन मुद्दों को वह समझ पायेगा तब ही ‘अम्बेडकर और गांधी‘ को कर पायेगा। यह हमारे लिये सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं है, हमारे प्रशिक्षण का आधार भी है। इसके माध्यम से हम आज़ादी के पूरे आन्दोलन को समझा पाते हैं, साथ ही आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक आज़ादी के मायनों को भी समझा पा रहे हैं।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का सबसे बड़ा दोष है कि वह उस तरफ़ देख ही नहीं पाता। वहां के छात्रों को इन आन्दोलनों के बारे में ख़बर भी नहीं होगी कि इनका अर्थ क्या है। हमें अभिनेता को अलग से ट्रेन्ड करने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि साम्प्रदायिकता क्या होती है। वह ‘अमृतसर आ गया‘ जैसा नाटक पढ़ रहा होता है, कर रहा होता है, उसकी स्क्रिप्ट बना रहा होता है, तो उसका प्रशिक्षण खुद ब खुद उसी के साथ-साथ चल रहा होता है। हम उन्हें क्राफ्टमैन नहीं बनाते, बल्कि समझदार और संवेदनशील बनाने का प्रयास करते हैं। उन्हें समकालीन आन्दोलनों के साथ जोड़ते हैं, खुद भी जुड़ते हैं। एक थियेटर की संस्था भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आन्दोलन की नींव बनती है, इससे बड़ी ताक़त प्रशिक्षण की क्या हो सकती है? हमारा अभिनेता हड़बड़ी में नहीं है कि प्रशिक्षण लिया और चले गये मुम्बई, या यहां-वहां ऑडिशन देते फिर रहे हैं। अस्मिता थियेटर ग्रुप ने अपना प्रशिक्षण हबीब तनवीर, शम्भू मित्र, उत्पल दत्त, बलराज साहनी, गुरुशरण सिंह, सफदर हाशमी और इप्टा आन्दोलन की पूरी परंपरा से विकसित किया है। हमारी प्रशिक्षण पद्धति में इस समूची विरासत से आयी हुई पूंजी है, जिसको हम युवाओं के साथ साझा करने की कोशिश कर रहे हैं।

हबीब तनवीर का प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर

इस समय अस्मिता जैसा प्रशिक्षण कई अन्य संस्थाएं भी अलग-अलग स्तरों पर दे रही हैं। वे अपने-अपने समूहों और इलाक़ों में काम करने की कोशिश कर रही हैं। यह प्रशिक्षण की एक समानान्तर और बहुव्यापी पद्धति है। ऐसा नहीं कह सकते कि यह सिर्फ एक क़बीले के अंदर मिलेगी। क़बीले में तो सरकारी पद्धति होती है। इस पद्धति के अन्तर्गत आज सैकड़ों विद्यार्थी काम कर रहे हैं, और ऐसा नहीं है कि उनके अभिनय में कोई कमी है। रंगमंच से लेकर व्यावसायिक माध्यमों एवं सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के मामलों में भी इस धारा के विद्यार्थियों ने हर बार खुद को श्रेष्ठ साबित किया है।

चूंूंकि हमें अभिनेता को तैयार करना है, सिर्फ मानसिक तौर पर ही नहीं बल्कि शारीरिक तौर पर भी करना है, इसलिये हम उन्हें शारीरिक प्रशिक्षण भी देते हैं। आवाज़ से लेकर तमाम जो अभिनय के पक्ष हैं, उन पर व्यावहारिक रूप में काम करने की कोशिश करते हैं। यह व्यावहारिक प्रशिक्षण रोज़ाना 8 से 10 घंटे तक चलता है, और एक तरफ वह संस्थागत प्रशिक्षण है जो एक चारदीवारी में बंद कमरों में चल रहा है। दोनों ही प्रशिक्षण के तरीकों को हमें देखना पड़ेेगा।

हम देखेंगे कि अस्मिता के स्कूल का जो प्रशिक्षण है, वह सीधे समाज से मुख़ातिब है। नुक्कड़ नाटक हो रहे हैं, पढ़ाई हो रही है, छोटे-छोटे संवाद हो रहे हैं, कॉलेज में छात्रों के बीच में यह सब हो रहा है। यह प्रशिक्षण व्यावहारिक है और हिन्दुस्तान में इसी तरह के प्रशिक्षण की ज़रूरत है। हिन्दुस्तान के थियेटर को इप्टा की, हबीब तनवीर की, उत्पल दत्त की, शंभू मित्र की ज़रूरत है, गुरुशरण सिंह की ज़रूरत है जो आतंकवाद के समय में भी गांव-गांव में जाकर नाटक कर रहे थे, धमकियों के बाद भी जिनको सुनने के लिये लाखों लोग खड़ेे हो जाते थे, या सफ़दर जैसे रंगकर्मी की, जिन्होंने जनता के तमाम मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक किया। ऐसे बहुत सारे समूह और लोग हैं जो पटना, भागलपुर, बेगूसराय, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, आज़मगढ़, कानपुर, भोपाल, उज्जैन, चंडीगढ़, कुरुक्षेत्र, हिसार, रायगढ़ आदि से लेकर देश के सुदूर इलाक़ों, गांवों-कस्बों में काम कर रहे हैं, जिन्होंने बिना किसी करियरवादी या पैसा कमाऊ मक़सद के, गुमनाम रह कर रंगकर्म के लिये अपनी ज़िन्दगी न्योछावर की है और कर रहे हैं। उन सबके त्याग और तप से भरे योगदान को नकार कर, उस पद्धति को नकार कर आप कहें कि हम ही श्रेष्ठ हैं, किसी को भी भला कैसे स्वीकार्य हो सकता है? हिन्दुस्तान के थियेटर में जो प्रशिक्षण की पद्धति विकसित हो रही है, वह जनता के बीच में सीधे-सीधे काम करने वाले समूहों में हो रही है, ऐसे समूह जो सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से सीधे-सीधे टकरा रहे हैं और यही उनकी ताक़त भी है।

अस्मिता के नाटकों में दर्शकों को भी हम ऑडिटोरियम में बातचीत करके ट्रेन्ड कर रहे होते हैं। समाज में नाटक की भूमिका सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं होती। सिर्फ व्यवसाय करना यदि उसका मक़सद हो तो वह और कुछ भले हो, नाटक नहीं हो सकता। आप सोशल-पाॅलिटिकल थियेटर करके भी प्रोफेशनल हो सकते हैं, अपने पैरों पर खड़ेे हो सकते हैं। आज अस्मिता थियेटर अपने पैरों पर खड़ा है, तो वह किसी ग्रांट के सहारे नहीं खड़ा है, बल्कि अपनी कार्य-पद्धति की वजह से ही खड़ा हुआ है। हमने समझौते नहीं किये इसलिये अपनी ठसक के साथ काम कर रहे होते हैं। तमाम ख़तरों को उठा कर काम कर रहे होते हैं।

तो यह जो ख़तरे उठाने वाली प्रशिक्षण पद्धति है अभिनेता को तैयार करने की, वह ऐसा अभिनेता तैयार करती है जो समाज को समझे, समाज के साथ जिसका एक सम्बन्ध हो, जो खुद को समझे, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में क्या-क्या बदलाव आ रहेे हैं, क्या चुनौतियां आ रही हैं, केवल भारत के स्तर पर ही नहीं, दुनिया के स्तर पर भी क्या बदलाव आ रहे हैं, मार्केट कैसे मनुष्य को कुचल कर आगे बढ़ रहा है, कॉरपोरेट कैसे सरकारें बना रहे हैं, कैसे सरकारों को अपने इशारे पर नचा रहे हैं- अगर अभिनेता की नज़र इन चीज़ों पर नहीं है, तो अभिनेता कभी भी जी.पी. देशपांडे जैसे लेखकों के नाटक नहीं कर सकता। वह राजेश कुमार के नाटक नहीं कर सकता, अगर वह समझ नहीं पा रहा कि सत्ता में बैठे कुछ लोग कैसे समाज में लोगों का शिकार करते हैं, कैसेेे राजनीति के शीर्ष स्तर पर धर्म के नाम पर उत्पीड़न किया जाता है, कैसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और धार्मिक उन्माद को वोट बैंक में बदला जाता है।

अगर प्रशिक्षण इन सवालों से बचने की कोशिश कर रहा है, तो आप वास्तविक अभिनेता को तैयार नहीं कर रहे। आप अभिनेता के नाम पर एक क्राफ्टमैन बना रहे हैं, पर इस तरह तो आप उसे एक आधा-अधूरा प्रशिक्षण देकर छोड़ देंगे। अस्मिता जैसे समूह इन मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत में यह पद्धति जो लोगों से जुड़ी हुई है, उसकी ज़रूरत है। आगे आने वाले समय में इसी पद्धति का बोलबाला देश में दिखाई देगा। आज प्रमुख भूमिका इसी प्रशिक्षण की है जो छोटे-बड़े समूहों के अंदर दिये जा रहे हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कौन से छात्र जा रहे हैं? वे इन्हीं समूहों से निकल कर, यहीं से ट्रेन्ड होकर तो जा रहे हैं। अगर आप कहते हैं कि आप तीन साल में अभिनेता बना देते हैं, तो आप एकदम नौसिखिया को लीजिये न। लेकिन नहीं, आप आवेदकों से यह अपेक्षा रखते हैं कि उसने पहले काम किया हो, तीन साल या पांच साल काम किया हो, पांच-छह नाटकों में काम किया हो। क्यों नहीं आप इन शर्तों को हटा देते हैं? एकदम नये को लीजिये जो थियेटर करना चाहता है।

वास्तविकता यही है कि आप उन्हीं समूहों से छात्र ले रहे हैं, आप उन्हीं समूहों पर निर्भर हैं जो ज़िन्दगी के साथ प्रशिक्षण को जोड़ रहे हैं, फिर यह अहंकारवादी दृष्टिकोण क्यो? जब तक यह समाप्त नहीं होगा, हमारे नाट्य विद्यालय की प्रशिक्षण पद्धति देश के काम नहीं आयेगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि थियेटर की ज़रूरत क्या है? वह समाज के लिये है या समाज थियेटर के लिए है? हमें नाटक करने समाज में ही जाना है, समाज हमारे पास नाटक देखने क्यों आयेगा? लोगों के पास जाने की ज़रूरत हमें है। आप प्रशिक्षण को समाज-निरपेक्ष बना देते हैं, थियेटर को इतना महंगा बना देते हैं कि बिना ग्रांट के, बिना सरकारी मदद के थियेटर नहीं हो सकता। छात्र को प्रारंभ से ही सरकारी संरक्षण, सरकारी ग्रांट पर आधारित काम करने का आदी दिया जाता है, चाहे ट्रेनिंग के दौरान उसे मिलने वाली छात्रवृत्ति हो, या उसके बाद मिलने वाली स्काॅलरशिप, परियोजना कार्य, इन्डीविजुअल ग्रांट अथवा प्रोडक्शन ग्रांट। कहीं न कहीं यह निर्भरता ट्रेन्ड एक्टर को भी कमज़ोर करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकलने वाला छात्र एक्टिंग के हथियारों से लैस है, लेकिन उस हथियार का इस्तेमाल संस्कृति मंत्रालय करेगा, मानव संसाधन मंत्रालय करेगा। जिस दर्शक के लिये आप नाटक कर रहे हैं उस पर आपको भरोसा होना चाहिये। इसके लिये साहस चाहिये, जो आपके अंदर नहीं है। आप डरते हैं।
रीढ़ की हड्डी होने का एहसास तभी होगा, जब आप अपने संसाधनों से चीज़ेें बनायेंगे। कमी सरकार की भी है क्योंकि उसके पास कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। सरकार क्यों ग्रांट देती है, इसलिये न कि उससे समाज को लाभ होगा? जब एक नाटक होता है, तो उससे समाज को डायरेक्ट लाभ क्या है? ठीक है कि कलाओं का संरक्षण हो रहा है, लेकिन उससे हासिल क्या हो रहा है? क्या नाटक वास्तव में समाज में जा रहा है? उसमें किस प्रकार के सवालात उठाये जा रहे हैं? दिक़्क़त यह है कि ग्रांट को हमने अपना हक़ मान लिया है। एक बार यह सिलसिला शुरू होते ही आपका नाटक की तरफ से ध्यान हट जाता है। आप ग्रांट से लेकर कमिटियों में जगह पानेे, अवार्ड लेने, फेस्टिवल का आमंत्रण पाने के लिये एक ऐसे चक्रव्यूह में दाखि़ल हो जाते हैं जो कहीं न कहीं आपको अंदर से भ्रष्ट बना देता है, समझौतावादी बना देता है। कलाकार स्वभाव से समझौतावादी और मौक़ापरस्त बन गया तो उसकी आवाज़ में दम कहां होगा? सामंत ने पैसा दिया और अपने आंगन में जो चाहा करवा लिया।
अगर हम इस कड़वे सत्य को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण देंगे, तभी उसकी गंभीरता को समझेंगे। जब श्रेष्ठता का दंभ समाप्त होगा तो शायद आप दूसरों से सीखेंगे, अभी आप दूसरों के अनुभव से नहीं सीख रहे। आप दूसरों से सीखना नहीं चाहते क्योंकि आपको लगता है आप अंतिम हैं। रंगमंच के प्रशिक्षण की प्रक्रिया बंद कमरों में कोरा ज्ञान बघारते हुए नहीं पूरी हो सकती। रोज़ाना हम सीख रहे होते हैं कि यह नहीं होना चाहिये, यह होना चाहिये। लगातार ग़लती करके सीखना, जो आपने किया उसको बार-बार दुहराना और अपने जैसे और ट्रेनर्स को ट्रेन्ड करना, स्कूल-कॉलेज के साथ काम करना, लगातार समाज के संपर्क में रहना- यह सब क्यों नहीं हमारी प्रशिक्षण पद्धति का हिस्सा बन सकता है? क्यों छात्र सिर्फ क्लासरूम में बैठ कर पढ़ें? और उसके बाद आप उसको जुगाड़बाज़ी सिखा देते हैं। रंगमंच के समूचे परिदृश्य को आपने कैसा बना दिया है? राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के फेस्टिवल में अगर कोई नहीं आये तो आपके लिये वह रंगकर्मी नहीं है, निर्देशक तो कतई नहीं है। शिक्षण संस्थान होने के बाद भी आपने अभिनेता और निर्देशक होने के प्रमाण पत्र जो बांटने शुरू कर दिये हैं, उससे बहुत बड़ा नुकसान हुआ है और इससे बचने की ज़रूरत है।
ये कड़वे सवाल हैं, शायद पसंद भी न आयें, लेकिन अगर हम बैठ कर बातचीत करें, वास्तव में कुछ परिवर्तन चाहें तो इन कड़वे सवालों से टकराने की ज़रूरत है। ऐसा किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। अपनी आलोचना बहुत ज़रूरी है। कोई भी समाज तब ही आगे बढ़ता है, जब वह आत्मालोचन करता है। यदि वह स्वयं अपना महिमामंडन करता है कि हम महान हैं, तो वह समाज अपने ही केन्द्र में, अपनी ही धुरी पर गिर रहा होता है, और अंततः धराशायी हो जाता है। यह न हो कि किसी ने आपके बारे में कुछ कह दिया तो वह आपका विरोधी हो गया। आपने उसको लक्ष्य कर लिया, दुश्मन करार दे दिया और अपने सारे परमाणु बम, सारी मिसाइलें उसकी तरफ तान दीं। यह जो कबाइली नज़रिया है, उससे बाहर निकलने की ज़रूरत है, क्योंकि यह हमारे थियेटर के विकास में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

लेखक परिचय
वरिष्ठ रंगकर्मी, निर्देशक एवं अस्मिता थियेटर ग्रुप के संस्थापक-संचालक बहुचर्चित रंगकर्मी अरविन्द गौड़ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर केन्द्रित नाटकों की प्रस्तुति के लिये जाने जाते हैं। रंगमंच को जनान्दोलनों के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास। जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों के साथ जुड़ाव रखने के साथ अरविन्द गौड़ ने नुक्कड़ नाटकों की एक नयी ज़मीन तैयार की है और उसे बदलते दौर के नये सवालों के साथ जोड़ा है। नुक्कड़ नाटक को आम लोगों और युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका। रंगमंच में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कार्य किया है। दिल्ली विश्यविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर योगदान देने के अलावा आपने स्टेनफोर्ट एवं हाॅवर्ड यूनिवर्सिटी में नाट्य कार्यशालाओं का संचालन भी किया है।

एक थी कविता

अनुपमा तिवाड़ी


कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com

पूरी गुआड़ी में आज ख़ुशी की लहर बसंती बयार की तरह फ़ैल रही है. पिछला दिन तो चुप था, लेकिन रात बड़ी जगमग थी. पिछली रात ग्यारह बजे हाइवे के किनारे सड़क से उतरे ट्रक के पीछे एक सफ़ेद कार के ब्रेक लगे और उसमें से एक बावन वर्षीय, फक्क सफ़ेद कुरता – पाजामा और चमचमाती घड़ीपहने, लम्बा – चौड़ा, चेहरे पर कुछ कट के निशान का सख्त चेहरा लिए पत्थर व्यवसायी उतरा. कुछ चोर की तरह उसने धीमे से कार का दरवाज़ा डाला, लॉक किया, सिगरेट बुझाई औरफिरएक लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ- सावह मिटटी की दीवारों वाले कच्चे मकान की ओर बढ़ने लगा. गुआडी के कुत्ते भों – भों कर के बता रहे थे कि गुआडी में कोई अजनबी आया है.पर वह उनकी भों – भों को तवज्जो न दे कर जल्दी से जल्दी कविता के घर में घुस जाना चाहता था.
बारह बरस की कविता के बाप ने दो दिन पहले ही कविता को उसे दिखा दिया था और इसके लिए उनके बीच नगद एक लाख में सौदा तय हुआ था. बाप से कुछ खुसुर – पुसुर के बाद वह उस कच्चे कमरे में दाखिल हुआ जहाँ कविता एक खाट के पास पतली स्टेप का झीनाकुरता और पीला चमकनी बूटियों का शरारा पहने खडी थी.
कमरे में घुसते पत्थर व्यवसायी को देख, वह थोड़ी हडबडा गई और जल्दी से खाट पर से उठकर खडी हो गई. एक अनहोनी – सी उसके दिल में घर करने लगी जैसे कोई कसाई चाकू ले कर बकरे की ओर बढ़ रहा हो.
बैठ जा, खडी क्यों है ? तेरे बाप ने तुझेकुछ बताया नहीं?

अब से पहले उसने किसी मर्द के साथ ऐसा एकांत नहीं महसूसा था.उसकेलिपस्टिक लगे पतले होठ लाल से नीले से होने लगे और बड़ी हथेलियों में आ जाने वाला सांवला चेहरा फ़क्क- सा हो गया.एकझुरझुरी सी शरीर में दौड़ गईऔर कान में बुआ के बोल,गूंजने लगे “आज की रात बड़े बाबू आएंगे, उनका कहना मानना, बहुत प्यार करेंगे तुझे,रोना मत, चिल्लाना मत”. बड़े बाबू के कमरे में घुसने के कुछ देर बाद परदे की ओट से बुआ के हाथ दो गिलास शरबत के पकड़ा गए.

सुबहघर की उठापटक से कविता की कुछ आँख खुली. पर अभी वो बिस्तर पर कुछ होश, कुछ बेहोश-  सी चित्त पड़ी है. उसे बस इतना ही ख्याल है कि उसके घर की मिट्टी से बनी दीवारों के चौखट पर पिछली रात बुआ और माँ ने एक चद्दर का पर्दा खींच दिया था और फिर रात के अँधेरे में वो बड़ा बाबू उसके जिस्म से खेलता रहा था. आज की सुबह उसे एक नई जिंदगी मिली थी. जिसकी तैयारी पिछले कुछ सालों से हो रही थी. वह पहली बार वो अपने को, अपने से अलग महसूस कर रही थी.

कल की रातउ सकी नथ उतरवाई की रस्म हुई है. नथ उतारने वाला बावन साल का पत्थर व्यवसायी है. सुबह से नथ उतरवाई की खबर कानों -कान लड्डुओं के साथ गुआड़ी भर में जा रही है. पूरे एक लाख में उतरी है नथ. समाचार के साथ – साथ गुआड़ी भर की आँखें कविता के अंग – अंग का मुआयना कर रही हैं और अपनी बेटियों के अंगों को उससे तोल रही हैं. पत्थर व्यवसायी की मुंह दिखाई को गुआड़ी भर की आँखे लालायित हैंपर वह जल्दी ही मुंह अँधेरे गाड़ी से उड़न छू हो गया है.

सुबह उसकी आँखों के सामने दोनों छोटी बुआएं आ गईं. वो कैसे मुंबई से सजी – धजी आती हैं. मुंह मोड़ – मोड़ करसबसे, ठसके से बात करती हैं, मुंह में गुटका दबा कर जगह – जगह बेपरवाह थूकती रहती हैं. उनके जालीदार कपडे उनके शरीर का ऐसा खाका खींचते हैं, कि मर्द आँखों से ही शरीर भोग लेते हैं. उनके पर्स सेंट की तीखी गंध से महकते हैं, उनके पर्स में दो – दो मोबाइल रात – दिन घनघनाते रहते हैं. चहकती गुआड़ी भर की छोटी लड़कियों पर क्या रौब पड़ता है, उनका. गुआड़ी की बड़ी लड़कियों को देख, वो सारी छोटी लड़कियों की भी बुआएँ होने का सम्मान पा गईं हैं.

दो साल पहले उसने भी बुआओं के पास जाने की जिद पकडी थी, तब घर में सबने यही कहा था
“तू अभी छोटी है, बड़ी हो जाएगी तब भेज देंगे”जब भी वह बुआओं के घर का ज़िक्र करती तो उसे यहाँ वाली बुआ और माँ यही बतातीं कि वे मौसी केगई हैं, उसकी मौसी कौन हैं ? किसकी क्या लगती हैं ? रिश्तों का यह जाल तब उसके पल्ले नहीं पड़ा था. बस उसके बाद धीरे – धीरे अनाम रिश्ते वो कब नाम से जानने लगी पता नहीं. उसने इधर – उधर से अधकचरा सुना था कि मुंबई के कांग्रेस  हाल के पीछे उनकी बहुत बड़ी बस्ती है, एक कमाठीपुरा में है. वहां बहुत बड़े – बड़े लोग आते हैं, लड़कियों को बड़े – बड़े होटलों में ले जाते हैं, उनके साथ नाचते हैं, जब वो नाचती हैं तो कोई – कोई उनकी ब्रा में नोट ठूंस देते हैं. उन्हें गोद में उठा कर चूम लेते हैं. रात भर होटल चमचमाते हैं. मुंबई की जिंदगी की झलक का अंदाज़ा वह टेलीविज़न पर दिखने वाली चकाचौंध से ही लगाती रही थी अभी तक.

उसने पिछले दिनों कई बार साथ रहने वाली बड़ी बुआ को माँ – बाप पर झल्लाते देखा है. “मैं कब तक खिलाऊँगी तुमको ? भाई का ब्याह करो, पूरे कुनबे को खवाओ, तमाम गंदगी झेलते – झेलते उमर हो गई, अब मेरे बस की नहीं है, तेरी बेटी की क्यों नहीं कर देता अब नथ उतरवाई”बाप ने सेसू छोड़ रखे हैं, “कोई सही ग्राहक तो मिले.कोई चालीस हज़ार दे रहा है, कोई पचास. इतने में तो घर छह महीने भी न चले.मुंबई में तो यूँ ही भर – भर नोट दे जाते हैं बड़े – बड़े आदमी. नथ उतरवाई ही तो बड़ी कमाई का मौका होता है फिर तो फुटकर कमाई है, रोज़ कुआ खोदो, रोज़ पीओ”
“श्यामा की लड़की को तो कोई दुबई भी ले गया था, उसकी लड़की गोरी भूरी जो है. दुबई से क्या मालामाल हो के आई थी वो. उस पैसे से ही तो माँ बस्ती में शानदार मंदिर बनवा कर जाति समाज से वाहवाही लूट रही है”. श्यामा की बेटी का गुणगान करता गुआड़ी भर थकता नहीं है. वह आदर्श है, गुआड़ी भर की. सारी गुआड़ी को दरकार है, श्यामा की बेटी जैसी अपनी बेटी बनाने की.

छुटपन से ही उन्हें पतली स्ट्रेप के सितारों वाले कपड़ों और लिपस्टिक से प्यार करना बुआएं सिखाती हैं.“पगली यूँ रीझते हैं, मरद जितना मन से भोगने दो उतनी ही जेब गर्म होती है, मेरे एक बार ना – नुकुर करने पर ग्राहक कमीना ऐसा गुस्सा हुआ हुआ कि फिर पैसे ही नहीं दे के गया”माँ ये सब सुनती -देखती रही है, घूँघट की ओट से.महीना भर पहले कोई लखटकिया बाबू बाहर खटिया पर बैठा बेफिक्र धुआं उड़ा रहा था.
माँ के पैरों को देखते हुए उसने बाप से पूछा कि “ये काम तुम्हारे घर की बहुएं नहीं करती क्या” बाप ने जवाब दिया “बहुएं करें तो हम काट डालें उन्हें” जैसे दुनिया का सबसे बड़ा इज्ज़तदार पति वही हो. इस जवाब को सुनकर बाहर चबूतरे पर रोटी थेप रही माँ ने अपने हाथ – पाँव घूँघट में कछुए की तरह सिकोड़ लिए थे. तब वह दिन भर घूंघट में पिस रही माँ को देख कर भी, माँ ही बनना चाहती थी, बुआ नहीं!

छोटी लडकियों के लिए बुआ बनने की पहली सीढ़ी नथ उतरवाई से नए जीवन में प्रवेश करने की है. अब वो बुआ ही बन सकती हैं, किसी कि पत्नी बन कर माँ नहीं. कविता के पास कुछ दिन पत्थर व्यवसायी के रोज़ चक्कर लगते रहे, धीरे – धीरे चक्कर कम हो गए. यूँ तो नथ उतरवाई की रस्म के बाद से जिसकी जेब गर्म है, उसे चक्कर लगाने के लिए पर्दा हटा कर पर्दा खींच देने की इज़ाज़त घर और पूरा गुआड़ी दे देता है.
हर दिन ऐसे काम से जब उबकाई आती तब ये गुटका, मीठी सुपारी ही साथ देते उबकाई न आने के लिए, पर उबकाई है कि, आती ही ! सड़ांध मारते मर्दों की देह, पसीने से लथपथ, तोंदू और बूढ़े हाड़ों को तृप्त करना कोई आसान बात है ?

परसों बाप ने मोटू को चार गालियाँ दीं “साले, चूतिया समझते हैं हमको, सौ का नोट कोई दे तो फाड़ देना उसके सामने ही. पांच सौ से कम मत लेना”. हाइवे के किनारे लगती अपनी बस्ती के बाहर खड़ी कविता बारह साल से बीस साल की उम्र तक बड़े – बड़े गले का थोडी ऊपर से थोड़ी नीचे से देह दिखाता ब्लाऊज़ पहने, होठों पर लिपस्टिक रगड़े बुलाती है हर उम्र के आदमी को. उसका सांवला रंग कभी – कभी कीमत में भांजी मार देता है पर फिर भी वो सात जनों के परिवार को पाल पा रही है, जिसमें मुर्गे, शराब के दौर भी शामिल हैं.
थोड़े दिनों पहले जब उसके घर का पर्दा खिंचा हुआ था. उस समय रुक्मा के घर पुलिस आई और उसके घर का परदा हटा कर, ग्राहक लड़के और उसकी बेटी को ले गई. पूरे दो महीने में छूट कर आई थी रुक्मा की बेटी. एक रजिस्टर्ड अड्डा थाने में भी था.“साली हमसे नखरे करती है, रोज़ दस – दस को अपने ऊपर से उतारती है, चल उतार” डर के मारे रुक्मा की बेटी हो जाती हर रात, नंग – धडंग ! ऐसे ही कई बेटियाँ  जा चुकी थी,सुरक्षा के नाम पर बने रजिस्टर्ड अड्डे पर. वहां से आ कर सारी बेटियाँ आपस में गले लग – लग कर रोतीं. रामदेवरा महाराज हमने गलत काम किया है और फिर वे रामदेवरा के मेले में पदयात्रा करते हुए ढोक देने जातीं. ये कैसा पाप मिला था उन्हें, जिसे वे खुद ही चढ़ाती, खुद ही उतार लेतीं.

अब तो बहुत हुआ मैं बुआ बन रही हूँ, पत्नी नहीं ! किसी की पत्नी न सही, माँ तो बन सकती हूँ अनजान बाप के बच्चे, की माँ ! तीन महीने के बाद बुआ और बाप ने गर्भपात करवा दिया. क्या खाएंगे हम ? तू तो माँ बन के बैठ जाएगी. ऐसा पहले भी दो बार हो चुका है…..कविता देखती है उसकी गुआड़ी में कितनी सारी उसकी जैसी कविता हैं, पर कोई बबिता नहीं………..

पिछले साल से एक मधु मैडम बस्ती के चबूतरे पर कुछ बच्चों को घेर कर पढाती है. पहले गुआड़ी के कुछ बच्चे पास के स्कूल में जाते थे. वहाँ दूसरे बच्चे उन पर पत्थर फेंकते थे. कहते हुए, ओ रंडी के. ये लड़के बड़े हो कर गुटका खा कर थूकेंगे, शादी करेंगे, उनकी बहनें कमाकर बेटी वालों को पैसा देंगी, घर बहू आएगी,फिर वो कविता पैदा करेगी. वो मधु मैडम गुआड़ी को बहुत खटकती है. कहीं ये मैडम हमारी बेटियों को कोई पट्टी न पढ़ा दे कि,ये काम गन्दा है. सो सारी गुआड़ी उसे कभी आँखों से तो कभी उसे मुंह से भगाती रहती है. गुआड़ी के बाप और बुआएं उसे उसकी भूमिका समझाते रहते हैं कि तुम्हारा काम है, बच्चों को पढाना, तुम पढाओ, हमारी लड़कियों से क्या मतलब है ? हमारे ऊपर बहुत कर्जा है इसलिए ये काम करवाते हैं.

घर का कोई काम नहीं था, इस कमाऊ पूत के पास ! सो जब भी वह बिना ग्राहक के होती तो उस चबूतरे के पास खाट डाल कर गुटका चबाते हुए मधु मैडम को आँख भर – भरदेखती. “ये कैसी मैडम है,सादा सी धोती पहनती है, पर कितनी आज़ाद ख्याल की लगती है”मेरे पास चमकने,सितारोंलगे और सुनहरीपट्टी केकपडे हैं, दो – दो तरह की लिपस्टिक है, आसमानी और लाल रंग की नाखुनी है पर….पर….मुझे अच्छा नहीं लगता…..उफ्फ,मुझे नहीं चाहिए ये सब !नहीं चाहिए मुझे नाखुनी ! हीक आती है मुझे !!मुझे तो इस मैडम के जैसेसफ़ेद नाखुन ही अच्छे लगते हैं. इस चमचम के पीछे कितना अँधेरा है…….कितना अँधेरा !इस मैडम की तरह मैं रहूँ तो ? पर, फिर कोई ग्राहक नहीं आएगा मेरे पास. नहींआए, मुझे नहीं चाहिए कोईग्राहक,भाड़ में जाएँ, कमीने होते हैं साले,सब के सब ! मधु मैडम से बिना बात किए हीवहआँखों ही आँखों में उसने मधु मैडम का समर्थन पा रही थी. पत्थर कायाओं के उसके पास आने से उसका शरीर तो पत्थर बनने लगा था पर दिल मोम बन पिघल – पिघल जाता था.
मैं भी मैडम की तरहबच्चों को पढाऊँ तो ? इस मैडम को तो हमारी तरह काम नहीं करना पड़ता होगा न ! शारदा की छोटी बेटी को एडस हो गया है पर उससे बात करो तो वह बताती है कि उसे मोतीझरा हुआ है, बम्बई की दवा लगती है उसे. उम्ह ! पता है मुझे, कैसा मोतीझरा हुआ है उसे !!

घर में तीसरी बार कविता के माँ बनने की जिद चल रही है….. सो बाप, एक डंडा उठा रहा है, एक रख रहा है, एक रख रहा है, एक उठा रहा है. ये तमाशा घर में दो दिन से चल रहा है “साली नशा करती है, नशा करेगी तो मारेंगे ही …..”कविता ने उन दिनों नशाकरनाचुन लिया था,  जिससे ग्राहकों से मुक्ति मिले. उस दिन डंडों और रोने की आवाज़ मधु मैडम को उसके दरवाजे खींच लाई. बाप गरजा “जाओ मैडम कर लो, जो करना है, नशा करेगी तो मारेंगे ही”

उस समय दादी, बुआ और बाप सब एक तरफ थे और माँ घूंघट में एक तरफ. मधु मैडम ने बड़ी दीदी को फोन किया “मैडम कविता को उसका बाप दो दिन से बुरी तरह मार रहा है. कह रहा है कि नशा करेगी तो मारूंगा. जबकि कविता इसलिए नशा कर रही है कि उसके पास कोई ग्राहक नहीं आए” कविता ने दाएं – बाएं देखकर कुछ दिन पहले मधु मैडम से कहा था दीदी, मैं ये काम नहीं करना चाहती, कोई और काम दिलवा दो.
मीटिंग के बहाने बड़ी दीदी आईं, कविता को बुलाया, उसे बताया कि “तुम हमारे बच्चों के होम में खाना बनाने का काम कर सकती हो इसके एवज़ में तुम्हें अठारह सौ रूपये मिलेंगे और रहना – खाना फ्री. मैं वहां जाती रहती हूँ, हमारे साथ लडकियां भी काम करती हैं, इसलिए सुरक्षा की तो तुम गारंटी समझो”. पर दीदी, बच्चे क्या सोचेंगे मेरे बारे में ? “देखो कविता, इस काम के साथ ही तुम पर लगा ये बिल्ला भीतो छूट जाएगा न ! बच्चे तुम्हें दीदी ही कहेंगे. मैं अपने ऑफिस में मैडम हूँ, अपने घर पर तो बच्चों की माँ ही हूँ न ! अपने बच्चों के लिए मैडम थोड़े ही हूँ.” तुमको भी बच्चे दीदी ही कहेंगे !
ये सबसुन कर कविता ख़ुशी – ख़ुशी घर गई और जा कर बड़ी दीदी और उनके बताए काम को बता कर  कहने लगी “मैं भी ये दीदी जैसा काम करूँ तो”
क्या पढी तू, जो ये दीदी जैसा काम करेगी बाप ने आँख निकाल कर धमकाने के लहजे में कहा !
सप्ताह भर से काम आ रहे तरह – तरह के डंडे और पाईप उसकी आँखों के सामने घूम गए!
घरवालों ने तो इस मैडम से कविता को खूब बचा – बचा कर रखा पर तेज धूप की छाया, आदमी के सारे नैन – नक्शबता देती है. कविता ने मैडम की छाया पहचान ली थी.

ये कमाऊ पूत हाथ से न निकल जाए सो बाप तुरंत हरकत में आया. वह तमतमाता हुआ अपने गुस्से को पीतामैडम के पास आया “मैडम आप तो सही कह रही हो, पर आप नहीं जानती, हमारा समाज हमें जात बाहर कर देगा ………….दीदी के पास समझाने के सारे शब्द ख़त्म हो गए बस उनके मुंह से हम्म ………की आवाज़ ही निकलती रही और अन्दर न जाने कितने सारे शब्द तूफ़ान की तरह पत्थर से भडबेड़े खाने लगे …….
ये क्या दस मिनिट बाद ही कविता आगे – आगे और माँ पीछे – पीछे आ रही हैं, दीदी मैं ये काम नहीं छोड़ सकती, दिसंबर में मेरे भाई विजय की शादी करनी है………..दीदी के होठ सिल गए, उनके मुंह से बस निकलता रहा हम्म ………

यह काम नहीं करूंगी, नहीं करुँगी, नहीं करुँगी……..और करना पड़ेगा, करना पड़ेगा, करना पड़ेगा……..दस दिन तक घर में गूंजता रहा.कई हाथ उसके बाल पकड़ घसीटते, तो कोई डंडे संभालता, घर पुलिस थाना बन गया.
उसकी जिद के आगे थक हार कर दादी और बुआ ने अड़ोसियों – पड़ोसियों से समर्थन जुटाना शुरू कर दिया. कैसे नहीं करेगी ? तुम्हारी बेटी नहीं कर रही है क्या ? ये बन रही है अंग्रेज की चोदी ! हमने नहीं किया क्या ? हाड तोड़ – तोड़ के इसके बाप को खवाया अब ये हमें नहीं खवाएगी तो हम कहाँ जाएँगे ? क्यों? आस – पड़ोस भीकविता से अपनी बेटियों को बचाने में ही अपनी भलाई समझने में लगा. आज इनकी बेटी सिर उठा रही है, कल हमारी उठाएगी ? घर में बड़े दिनों तक रस्साकसी चलती रही, पर रस्सा कब तक दोनो तरफखिंचता ? ग्यारहवें दिन की सुबह खटिया पर कविता नहीं लिखा, कागज़ मिला जिस पर लिखा था, मुझे मत ढूंढना!

रतन थियाम का रंगकर्म : कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन”

मंजरी श्रीवास्तव

इस समीक्षात्मक आलेख में  युवा नाट्य समीक्षक मंजरी श्रीवास्तव ने ‘मैकबेथ’ के बहाने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम  की पूरी नाट्य प्रक्रिया पर विस्तृत बात की है. मंजरी के शब्दों में  रतन थियाम का पूरा नाट्यकर्म “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.

18वें भारत रंग महोत्सव की शुरुआत किसी नाटक से नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भारतीय थिएटर को प्रतिष्ठित करनेवाले थिएटर के जादूगर रतन थियाम के जादू, उनके तिलिस्म  ‘मैकबेथ’ से हुई. वैसे भी इस बार के भारत रंग महोत्सव की थीम ही है – “थिएटर के जादू की फिर से खोज” और जब उद्घाटन ही अगर ऐसे बेजोड़ तिलिस्म से हो तो फिर क्या कहने !

रतन थियाम का यह नाटक किसी एक बिंदु या किसी एक चरित्र या किसी एक संवाद से शुरू नहीं होता बल्कि यह अपनी परिधि में पूरे उस माहौल को समाहित और व्याख्यायित करता हुआ चलता है जो किसी काले घने जंगल की जंगली पुकारों से परिपूर्ण है. वस्तुतः इस नाटक का मूल स्वर ही जीवंत वनस्पतियों की हरी-नीली रोशनी एवं विचित्र ध्वनियों का संगम है,  जो मैकबेथ के चरित्र को चुड़ैलों-सा जामा पहनाती है. यहाँ चुड़ैलें सिर्फ़ चुड़ैलें नहीं हैं वे वैश्विक स्तर पर हमारे उस देश-काल का प्रतिनिधित्व करती हैं,  जहाँ जीवन पर संकट है, हमारी वन-सम्पदा पर संकट है, हमारी प्रजातियों पर संकट है और यह संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है. चुड़ैलों की देह पर गिरती-उठती हरी-नीली रोशनियों और उनकी विचित्र और हृदय-विदारक ध्वनियों से नाटक की शुरुआत होती है जो प्रत्यक्षतः कहानी के कथ्य के हिसाब से तो मैकबेथ और उसके साथी बैंको के लिए शुभ सूचनादायी है पर अप्रत्यक्ष रूप से हमारी पारिस्थितिकी पर मंडरा रहे खतरे को भी इंगित करता है. कुछ भाववाचक संज्ञाएँ जैसे महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख एवं उससे उपजनेवाला खून-खराबा इस पूरे प्रोडक्शन के साथ-साथ चलता रहता है. जहाँ तक परिधान, ज्वेलरी एवं वेशभूषा का प्रश्न है तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कई सारे जनजातीय समाजों का मिश्रण-सम्मिश्रण है जो वास्तव में इस नाटक की आदिम पहचान और स्वरूप को चिन्हित और व्याख्यायित करता है.

पर इन सबसे ज़्यादा और सबसे हटकर जो सबसे ह्रदय विदारक और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है या यूँ कहें जो इसका क्लाइमेक्स है वह यह है कि जब मैकबेथ और उस जैसे ही दूसरे मृत या मृतप्राय मानवीय तत्व परिचारिकाओं की एक फ़ौज द्वारा व्हील चेयर पर मंच पर लाये जाते हैं. वस्तुतः यह नाटक निर्देशक की मैकबेथ की एक सामाजिक महामारी के रूप में व्याख्या का मंचीय प्रस्तुतीकरण है. मैकबेथ के इस प्रस्तुतीकरण से निर्देशक यह सन्देश देना चाहते हैं कि आदमी की अनंत आकांक्षाएं हमेशा विनाशकारी होती हैं जो सबसे पहले तो इंसान के दिमाग को भ्रष्ट करती हैं और फिर उसका विस्तार पूरे समाज तक हो जाता है. कहना पड़ेगा कि यह जो आख़िरी दृश्य है, चरमोत्कर्ष का दृश्य है वह किस तरह से १६०० ई. में लिखे गए एक महान साहित्यिक कृति का आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही सटीक रूपांतरण है और उतना ही सटीक उसका मंचीय प्रस्तुतीकरण है.

मंच पर किसी सेट का न होना सांकेतिक रूप से विश्व का ही एक मंच के रूप में प्रतिध्वनन है और इस प्रकार यह नाटक भौगोलिक दृष्टि से विश्व में कहीं भी किया जा सकता है. मंच का किसी वस्तु-विशेष या सेट से अवरुद्ध न होना इस नाटक और उसके पात्रों को एक ऐसी भव्यता प्रदान करता है , जिसका विश्लेषण शब्दों के परे है. विशेष रूप से प्रकाश परिकल्पना दर्शकों को स्तब्ध कर देती है , जो शेक्सपियर के इस मशहूर दुखांत नाटक की समकालीनता की व्याख्या करती है. हमेशा की तरह भारत के पुरातन, जनजातीय और पहाड़ी (विशेष रूप से भूटान, सिक्किम और लद्दाख के वाद्ययंत्र) सुषिर (भोंपू) वाद्यंत्रों से उत्पन्न ध्वनि संयोजन न सिर्फ रतन थियाम के चिर-परिचित हस्ताक्षर के रूप में हमारे सामने आता है बल्कि तरंगित ऊर्जाओं का वह झीना जाल का सा प्रभाव उत्पन करता है जो दर्शकों को दृश्य दर दृश्य संवेदनात्मक ऊंचाइयों तक ले जाता है और कलाकारों की यह दृश्य-श्रव्य यात्रा कलाकारों और दर्शकों के बीच एक अनकहा-सा मनोवैज्ञानिक संवाद भी स्थापित करती है जहाँ हम दर्शकों को कलाकारों के रूप में परिणत होते हुए देखते हैं. 





निर्देशक रतन थियाम जहाँ एक ओर इस नाटक के माध्यम से पथभ्रष्ट मानव की आतंरिक अतृप्त क्षुधाओं (महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख) और ऊर्जाओं के हस्तांतरण के इस खेल को दिखाने में पूर्णतः सफल हुए हैं वहीँ दूसरी ओर उनके कलाकारों की मौन और मुखर देह-भाषा, आवाज़ और स्वरोच्चारण, भाव-भंगिमाएं और आकांक्षाओं के प्रकटीकरण, प्रस्तुतीकरण और उनके चरमोत्कर्ष तक पहुँचने के क्रम में वे अपने कलाकारों से जिन रंग-युक्तियों का इस्तेमाल करवाते हैं वह निस्संदेह अतुलनीय है. विशेष रूप से चुड़ैलों के साथ वाले उस दृश्य में जहाँ संवादवाहक लेडी मैकबेथ के लिए एक बड़ी सी चिट्ठी को खोलने के लिए मंच पर लुढ़काता है और इस चिट्ठी के खुलने के साथ ही नाटक भी ओपन होता है. सारी समस्या की जड़ यह चिट्ठी ही है और पूरा नाटक इसी के इर्द-गिर्द घूमता है और ख़त्म भी इसके साथ ही होता है. यह दृश्य ‘लार्जर दैन लाइफ़’ है, डंकन की हत्या और मैकबेथ का उसकी पत्नी से संवाद न सिर्फ मनोरम है बल्कि हाथ से सरकती हुई रेत-से किसी तिलिस्म की उत्पत्ति करता है जिसे कोई भी अपनी अंतरात्मा में उठते आतंरिक कलह के मलबे और कोप के रूप में भी महसूस कर सकता है. इस चिट्ठी के इर्द-गिर्द घूमती पूरी कहानी और विशेष रूप से इस दृश्य में जो सुख और दुःख के बीच की एक महीन-सी रेखा है दरअसल वही इस नाटक का केन्द्रीय भाव भी है और ख़ूबसूरती भी. दरअसल एक मनोवैज्ञानिक हमले की संरचना और उसका प्रभावी नाटकीय प्रस्तुतीकरण है निर्देशक रतन थियाम का यह मैकबेथ.

रतन थियाम का यह मानना है कि मानवीय मन के द्वंद्व भी अनेक तरह के होते है. जो बाहर-बाहर दिख रहा है, वही द्वंद्व नहीं है. द्वंद्व और युद्ध कई स्तरों और कई सतहों पर चलता रहता है. अतियथार्थवादी सोच है उनकी द्वंद्व और युद्ध के बारे में. उनकी यही सोच इस पूरे नाटक में कमोबेश परिलक्षित होती है. मानवीय मन का द्वंद्व का सफ़ल रेखांकन करने में वे सिद्धहस्त हैं, इस बात को एक बार फिर उन्होंने साबित किया है. मानव मन के इस द्वंद्व को दिखाने के लिए थियाम ने प्रकाश का उम्दा इस्तेमाल किया है. उनकी प्रकाश परिकल्पना कमाल की है. उनका मानना है कि जैसे मौन संवाद से ज़्यादा मुखर होता है बिलकुल वैसे ही अन्धकार, प्रकाश से ज़्यादा मुखर और प्रभावशाली होता है. शायद इसीलिए अपनी इस प्रस्तुति में वे पात्रों को पूरी रौशनी में नहीं लाते. प्रकाश के आने जाने के साथ उनकी कुछ दिखती, कुछ छिपती परछाइयाँ दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता ज़्यादा जगाती हैं और यही वो नब्ज़ है दर्शकों की जिसे बख़ूबी पकड़ना रतन थियाम जानते हैं. अपनी कमाल की प्रकाश परिकल्पना से रतन थियाम न सिर्फ मानव मन के द्वंद्व को दिखाते हैं अपितु उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता को भी दिखाते हैं, विशेष रूप से उस दृश्य में जब मैकबेथ मंच पर अकेला है और वह रौशनी और अँधेरे के आवर्तों के बीच भटक-सा रहा है. दरअसल नाट्यधर्मी, एब्सर्ड और अतियथार्थवादी युक्तियों से परिपूर्ण इनके नाटक “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.

इस नाटक के माध्यम से एक बार फिर उन्होंने खुद को पुनः एक विशिष्ट रंग-विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित किया है. कभी रतन थियाम आपको रंगमंच के चित्रकार लगेंगे, कभी प्रकाशक, कभी संगीतकार तो कभी कुछ और लेकिन उनके नाटक चित्र, उच्चारण, संगीत, प्रकाश इन सब के इतने कुशल संयोजन से समृद्ध होते हैं कि आप टुकड़े-टुकड़े में उनके काम की व्याख्या नहीं कर सकते. आप यह नहीं कह सकते कि उनके नाटक  में प्रकाश उम्दा था या कुछ और उम्दा था या कोई पक्ष कमज़ोर था. दरअसल सबकुछ इतना उम्दा होता है कि आप सोच में पड़ जाते हैं कि नाटक के किस भाग को सर्वोत्तम कहा जाए और किसे छोड़ा जाए और यही बात उन्हें तमाम रंगकर्मियों से अलग करती है. यही पर वे रंगकर्म के चितेरे, रंग-विशेषज्ञ के रूप में खुद को प्रतिष्ठित करते हैं. दरअसल उनका नाटक एक आत्मा की तरह है. यह सर्वविदित तथ्य है कि आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है पर  थियाम का नाटक जो कि एक आत्मा है उसे नाटक के शरीर के विभिन्न अवयव समग्रता में धारण करते हैं और ये अवयव हैं – रंगचित्र, रंगस्थापत्य, रंगविचार प्रकाश, ध्वनि, संगीत, उच्चारण आदि-आदि. रतन थियाम का नाटक रंगों के संयोजन, मंच के कक्ष्या विभाजन, उच्चारण के सौंदर्य और संगीत की सूक्ष्म लयों के सहारे दर्शकों के भीतर छिपी लगभग अज्ञात भाव सम्पदा को इतने धीरे से जागृत करता है कि दर्शक रंगभूमि से मानसभूमि पर बिना किसी अवरोध के चले आते हैं.

 रतन थियाम का चीज़ों को देखने का नजरिया ही बिल्कुल अलग है. उनका मानना है कि – “हम जो चीज़ें प्रकृति में देख रहे हैं, उन्हें उसी रूप में रखने में कलात्मकता कहाँ हैं….उसे कुछ अलग तरह से व्याख्यायित करें तब बात बनती है, तब वह कलात्मक होता है.”वे यह भी मानते हैं कि कोई ऑब्जेक्ट दिखाने के लिए किसी ताम-झाम और उस ऑब्जेक्ट को दिखाने की ज़रुरत नहीं है. रंगयुक्तियों के सहारे आप उन्हें दर्शकों के दिमाग में उत्पन्न कर सकते हैं. और ऐसा करने से वहां वही ऑब्जेक्ट एक हज़ार प्रकार का उत्पन्न हो जाएगा. हर दर्शक अपनी कल्पनाशक्ति के हिसाब से उस ऑब्जेक्ट को विज़ुअलाइज़ करेगा अपने मस्तिष्क में, अपने मन में.    रतन थियाम का यह भी मानना है कि दर्शक उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं. वो दर्शकों से वो सब शेयर करना चाहते हैं जो वह महसूस करते हैं. इनका कहना है कि – “ मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ, मैं बस सोचता रहता हूँ कि नाटक के कथ्य का विभिन्न स्तरों पर उपयोग कैसे किया जाए. क्योंकि उस कथ्य का दर्शकों से साझा करना मेरे लिए बहुत महत्त्व का है. मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि – “मैं यह देख रहा हूँ और मुझे यह बहुत ख़ूबसूरत लग रहा है, ज़रा आप भी इसे देखिये ! मैं दर्शकों से यह नहीं कहता कि जो मैं देख रहा हूँ वह सही है और आप भी इसे जानिये. मैं शिक्षक नहीं हूँ, न ही सलाहकार. मैं अपनी रचना को साझा करना चाहता हूँ. जब मैं अपनी अभिव्यक्ति से किसी हद तक संतुष्ट होता हूँ, मैं चाहता हूँ उसको साझा करूं.”

मणिपुरी भाषा में प्रस्तुत यह नाटक या उनके अन्य नाटक भी इस बात की पुनर्प्रस्थापना करते  हैं कि रतन थियाम अपनी स्थानीयता, अपनी आंचलिकता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम और वैश्विक होते हैं. वे मणिपुरी संस्कृति को वैश्विक संस्कृति से काटकर देखने के स्थान पर उसे उसके बीच रखकर देखते हैं. इस प्रक्रिया में वे जो प्रश्न उठाते हैं वे सिर्फ मणिपुरी संस्कृति के लिए या भारतीय संस्कृति के लिए ही प्रासंगिक नहीं होते, वे वैश्विक संस्कृति के लिए भी अर्थपूर्ण होते हैं. वे इस तरह के प्रश्न इसलिए उठा पाते हैं क्योंकि वे अपने नाटकों की विशेषता को अपनी संस्कृति की विशेषता में अवस्थित करते हैं और फिर इस संस्कृति के उन तत्वों को आलोकित करने का प्रयास करते हैं जिनमें वैश्विक मूल्य झलक रहे हों. शायद यही कारण है कि उनके नाटक मणिपुरी भाषा में होते हुए भी, मणिपुरी संस्कृति से उत्पन्न होते हुए भी कभी भी आंचलिक नहीं जान पड़ते. वे अपने नाटकों में ध्वनित होती मणिपुरी भाषा और संस्कृति में मानो समूचे विश्व को बुलाते हों या कि यह कहें कि वे अपने नाटकों में इस भाषा और संस्कृति को वैश्विक स्पंदनों को सुनने योग्य बनाते हैं और ऐसा इसलिए है कि उन्होंने मणिपुरी और भारतीय संस्कृति में गुंथे हुए वैश्विक मूल्यों को अपने रंगकर्म की आभा में प्रकट करने की अनवरत चेष्टा की है. वे मणिपुरी और भारतीय संस्कृति के नागरिक होते हुए ही विश्व नागरिक हुए हैं. उनके नाटकों में हमारी सभ्यता पर छाए संकट की गहरी चेतना है. इस चेतना को वे मणिपुर से उठाकर विश्व स्तर पर स्थापित कर देते हैं और दुनिया के सामने तमाम अनसुलझे प्रश्न छोड़ देते हैं. उनके नाटकों ने वैश्विक संवाद की संभावना को निरंतर खोलने का वह यत्न किया है जिसे पिछले वर्षों के क्षुद्र राष्ट्रवाद ने निरंतर अवरुद्ध किया है.

रतन थियाम का कला-कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर कराता है. आज के संवेदनहीन होते समाज में उनकी कला मनुष्यता और मानवीय संवेदनाओं की उपस्थिति में हमारा विश्वास अटूट करती है वह भी अपने पूरे सौन्दर्यबोध के साथ. उनकी कला दृढ़ता से इस बात की प्रतिस्थापना करती है कि संसार की तमाम विसंगतियों, विद्रूपताओं, विभीषिकाओं के बावजूद इस संसार में सौन्दर्य है, प्रेम है, मानवीय संस्पर्श है और बचा रहेगा.

रतन थियाम का नाट्यकर्म मणिपुर और भारतीय परम्पराओं में डूबा हुआ है. वे अपनी स्थानीयता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम होते हैं. इतिहास की दारुण विडंबनाओं को उघाड़ता उनका रचना संसार हमें गहरी आध्यात्मिकता के सम्मुख लाता है. आज जब मनुष्यता की चिंताओं को आसान फ़ॉर्मूलों और छिछली बातों के सौन्दर्य को औसत अनुभव बना दिया है, तब रतन थियाम का कला कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर करता है. उनकी कला मनुष्य की पीडाओं की, उसके संघर्ष की और उसकी जिजीविषा की ऐसी छवियाँ गढ़ती है, जो हमें एक गहन अनुभव से साक्षात्कार कराती है.वे केवल एक नाट्यकर्मी नहीं वरन एक ऐसे कला साधक हैं जो अपने रचनाकर्म से गढ़ी हुई कोटियों के परे जाते हैं. वे शास्त्रीयता की दीर्घ परंपरा में डूबकर नया सृजन करनेवाले अनूठे कलाकार और मनीषी हैं.

रतन थियाम नित बदलते मुहावरों का पीछा करने के स्थान पर अपनी नई दृष्टि का स्वयं संथान करते हैं.. वे सच्चे अर्थों में एक ‘मार्गी’ कलाकार हैं. रंगकर्म के क्षेत्र में  थियाम ने सृजन-सक्रियता, पारम्परिकता, वैश्विक प्रतिष्ठा, नाट्य विधा और संबद्ध कला माध्यमों के विकास तथा संस्कृत नाटकों को आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है. रतन थियाम केवल रंगकर्म में रचे-बसे हैं.  पूरी दुनिया में भारतीय रंगकर्म की विजय पताका फहराने और लहराने वाले श्री थियाम अपनी तरह के अनूठे रंगकर्मी हैं. वे संस्कृत नाटकों और हिंदी नाटकों को तो मणिपुरी में लेकर आते ही हैं, विश्व के मशहूर नाटकों को भी वे मणिपुर से जोड़ते हुए उसे ग्लोबल बनाते हैं.   रंगकर्म में पूर्णतः रत और रंगकर्म को ही पूर्णतः समर्पित रंगनिर्देशक और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष आदरणीय रतन थियाम ने अपनी अद्वितीय सृजनात्मक क्षमता द्वारा भारत के रंगकर्म को विश्व स्तर पर प्रतिस्थापित किया है. उनकी ख़ास बात यह है कि इस प्रतिस्थापना के लिए उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और कलाओं की ओर रुख तो किया लेकिन वहां से कला-तत्वों को लेकर पूर्णतः देशज और पारंपरिक रूप में भारतीय समाज के अनुरूप प्रस्तुत करने की भरसक कोशिश की जिसमें वो पूर्णतः सफल भी हुए हैं. संस्कृत नाटकों को उन्होंने आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी किया है.

रतन थियाम अपने रंगकर्म में वाचिक अभिनय के धागे में आंगिक अभिनय के मोतियों को पिरोते हैं. पर ये मोती मंच पर फैले रंगों के संयोजन से ऐसे आलोकित होते हैं जैसे सूर्य के उगते उजाले में किसी वृक्ष के शिखर पर हिलते पत्तों के समूह. एक ऐसे समय में जब कलाओं के अनुभव चमकीली छवियों और उत्तर आधुनिक वाग्जाल में घटाए जा रहे हैं, रतन थियाम जैसे व्यक्तित्व का होना एक गहरी आश्वस्ति देता है. रतन थियाम न सिर्फ भारतीय कला जगत में अपितु विश्व कला जगत में एक ऐसी उपस्थिति हैं जो अपनी जड़ों से जुड़कर वर्तमान समय को प्रश्नांकित करते चलते हैं. हम सबने जिन्होंने उनका सृजन देखा है अपने पर रश्क कर सकते हैं कि हमने  रतन थियाम को देखा है.

आभार
इस लेख को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है श्री उदयन वाजपेयी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रतन थियाम से भेंट’ का जिसका प्रकाशन संस्कृति संचालनालय, भोपाल (मध्य प्रदेश) ने किया है. इस लेख के अंतिम कुछ अंश (जिनमें श्री रतन थियाम के रंगकर्म का विस्तृत विवेचन है) तो ज्यों के त्यों इस पुस्तक से लिए गए हैं. दरअसल वे मेरे नहीं श्री उदयन वाजपेयी और मध्यप्रदेश के तत्कालीन संस्कृति एवं जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा के शब्द हैं जिनके लिए मैं इन दोनों महानुभावों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ.  

संपर्क : manj.sriv@gmail.com

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिया गया सुझाव जनसंहार की दिशा में

भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन  महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के द्वारा दिये  गये बयान की भर्त्सना करती है , जिसमें उन्होंने कहा है कि गर्भ में बच्चे की लिंग पहचान करने को अनिवार्य बनाया जाय . यह एक बहुत ही प्रतिगामी स्टैंड है और यह देश में कन्या-भ्रूणहत्या को और बढ़ावा देगा . भारतीय महिलाओं और उनसे जुड़े संस्थाओं के लम्बे संघर्ष के बाद पितृसत्तात्मक मानसिकता/सोच के कारण होने वाले लिंग-निर्धारण को रोकने के लिए पीसीपीनडीटी लागू हुआ. मंत्री महोदया को इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए हरसंभव प्रयास/कोशिश करनी चाहिए. जो महिलाएं आशा कार्यकर्त्ता के रूप में काम कर रही हैं उन्हें कार्यकर्ता की तरह न मानकर, श्रमिकों की मान्यता दी जाये और इससे जुड़े सभी फायदे दिये जायें.

लिंग निर्धारण को मान्यता देने की बात में कुछ खास लोंगों का इसमें स्वार्थ निहित है. अस्पताल में प्रसव बढ़ाने के नाम पर यह कदम महिलाओं के लिये जनसंहार साबित होगा.

इसलिए भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन इस बयान को और इस तरह का कोई भी कदम को तुरंत वापस लेने की मांग करती है.

एनी राजा
महासचिव

The National Federation of Indian Women (NFIW) strongly condemn the statement of Women and Child Development Minister Smt. Maneka Gandhi on making sex determination mandatory.

This is a very retrograde position and will lead to increase in female foeticide in the country.. The PC PNDT has been brought through numerous struggles by Indian women and their organisations to stop sex determination due to a patriarchal mind set. The Minister must make all effort to see that the implementation of this Act is done properly.  The women who work as ASHA must be given worker status and all the benefits as workers, not as volunteers

The move to make sex determination is nothing but a ploy to serve vested interest in the country. In the name of increasing hospital deliveries, this move  will result in genocide of women.

NFIW therefore demand immediate withdrawal of this statement and any such move by the government in this regard.

Annie Raja
General Secretary