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12वीं लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस ( 8 मार्च )

राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति  दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया , परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप रहे. बल्कि उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिर्फ महिला सांसदों के बोलने का प्रतीकात्मक आहवान जरूर किया , लेकिन उनकी रुचि महिला प्रतिनिधित्व के ठोस उपायों में नहीं दिख रही है . आज अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर स्त्रीकाल के  पाठकों के लिए 8 मार्च 1999 को लोकसभा में हुई बहस का एक अंश : महिला आरक्षण के लिए अडचनों का अंदाजा इस पहली ही बहस से लगाया जा सकता है . 

मुलायम सिंह यादव (सम्भल) : हम भी इस पर बोलेंगे। यह हमारा मामला है।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं चान्स दूंगा पर ऐसे नहीं बोलिये।
श्री मुलायम सिंह यादव : आप मुझे नहीं बोलने देते तो मुझे निकाल दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम जी, मैं आपको कह रहा हूं कि श्रीमती कृष्णा बोस ने नोटिस दिया है और उनका नाम लिस्ट में है,  इसलिए वह पहले बोलेंगी।
श्री मुलायम सिंह यादव : हमारी लड़ाई है इस पर ।
उपाध्यक्ष महोदय : आप सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको कभी चान्स नहीं दिया?
उपाध्यक्ष महोदय : श्री मुलायम सिंह जी, यह आप कया कर रहे हैं। कया मैंने कहा कि आपको बोलने का चान्स नहीं देंगे।आप कम्पैल नहीं कर सकते हैं। आपको बिहेव करना आना चाहिए, आप एक सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको चान्स नहीं दिया, मैं आपको भी चान्स दूंगा। आप इस तरह से मत करिये
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : यह राबड़ी देवी की गरदन काटने वाले लोग हैं। ये महिलाओं को क्या  प्रधानता देंगे। बैकवर्ड कलासेज और माइनोरिटीज सोसाइटीज को जब तक प्रधानता नहीं मिलेगी तब तक इस पर हमारी सहमति नहीं है।
श्री बूटा सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, इस पर सदन को ऑब्जेक्शन है
श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, आप इनकी कया सुनेंगे, यह गला काटने वाले लोग हैं
श्री मुलायम सिंह यादव : हम बहुत सुन चुके हैं
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात भी सुनी जायेगी, पहले उनकी बात खत्म होने दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इतने सीनियर लीडर हैं, आप बीच में कयों खड़े होते हैं, यह कोई तरीका नहीं है।
श्री लालू प्रसाद : सर, जब आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं …  यहाँ दंगाई खड़े हैं
यह एंटी दलित हैं, एंटी माइनोरिटीज हैं
उपाध्यक्ष महोदय : ऑर्डर प्लीज।
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : सर, आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप कया करते हैं?
श्रीमती  भावना देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज 8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और जिस तरीके से हाउस में, खासतौर से लालू जी और मुलायम सिंह जी ने व्यवहार किया है, वह बिलकुल सराहनीय नहीं है। आप कहते हैं कि श्रीमती राबड़ी देवी जी भी महिला हैं, हम इस बात को मानते हैं और अगर कोई महिला अच्छा शासन करती है, तो सारा देश उसकी सराहना करता है और उसे स्वीकार करता है, लेकिन जिस महिला के राज में अच्छा शासन नहीं हुआ, उसकी हम सराहना नहीं कर सकते और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपाध्यक्ष महोदय, आज के दिन महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर मैं सभी महिलाओं की तरफ से देश  के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अभिनन्दन करती हूं कयोंकि महिलाओं के लिए अटल जी ने अपने नेतृत्व में बहुत सारे ऐसे निर्णय किए हैं और करने जा रहे हैं,  जिनके कारण सम्मान जनक रूप से इस देश में महिलाएं जी सकती हैं। मैं आपके माध्यम से स्पष्ट कहना चाहती हूं कि आज के दिन महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से समर्थ बनाने के लिए महिला विकास बैंक की स्थापना, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन की योजना और महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम जॉब के लिए सकारात्मक रूप से विचार करने की बात अटल जी ने कही है। इसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल पूर्व में ही प्रस्तुत किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पास नहीं किया गया है। इसलिए मैं आज महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर अपने सभी सांसद भाइयों से अपील करती हूं कि उसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए। धन्यवाद।
श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपसे एक प्रार्थना है कि आप कभी गुस्सा न करें। कभी टेंशन  मत रखिये।
उपाध्यक्ष महोदय : जीरो ऑवर में थोड़ी टेंशन तो होनी चाहिए।

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): उपाध्यक्ष महोदय, जहां तक महिला दिवस का सवाल है तो मैं सारे हिन्दुस्तान और सारी दुनिया की महिलाओं को इसकी शुभकामनायें देता हूं। वे तरककी करें, आगे बढ़ें और उनको उनका हक मिले। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो मेरी राय यह है कि आज हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। जब महिला दिवस मनाया जा रहा है तो हमारी भी उनको शुभकामनायें हैं। इसको विवाद में नहीं डालना चाहिए। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो शुरू से लेकर आज तक हम प्रधान मंत्री जी से दो बार मिले और उनको चिट्ठी भी लिखी। हमारी स्पष्ट राय है कि इस विधेयक का जो वर्तमान स्वरूप है, उसको उसी तरह से पास करने से हमारे देश के अंदर जो अल्पसंख्यक हैं विशेषकर मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, उनके साथ गैरबराबरी होगी। उनका और अधिक शोषण व अपमानजनक जीवन होगा इसलिए हमारी शुरू से यही राय है कि वर्तमान विधेयक तब तक नहीं आना चाहिए जब तक अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े विशेषकर मुसलमानों की जनसंख्या के अनुसार उनकी महिलाओं को आरक्षण मिले।
दूसरा हमारा यह कहना है कि जहां से लोकतंत्र आया है, हम महिलाओं के आगे बढ़ने के विशेष अवसर की नीति को इस सदन में कहना चाहते हैं कि हमारी समाजवादी पार्टी ने आज से नहीं बल्कि 1954 से ही अमेरिका और इंग्लैंड की महिला आरक्षण की नीति का अनुसरण किया है। अमेरिका और इंग्लैंड की पार्लियामैंट में अभी तक नौ फीसदी से ज्यादा निरक्षर महिलायें नहीं आ सकी हैं। हमारे यहां जो निरक्षर महिलायें हैं, दलित हैं, गरीब हैं, दबी-कुचली हैं, वे इस सदन में वर्तमान विधेयक के चलते नहीं आ सकती हैं। मैं महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं। इसे कम किया जाये। इसे ज्यादा से ज्यादा 10 फीसदी किया जाये। श्री गुजराल साहब अभी खड़े हुए थे। जब वे प्रधान मंत्री थे तब भी हमने इसका डटकर विरोध किया था।आप जानते हैं कयोंकि आप उस समय यहां थे। हमारी संयुकत मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा थे,  तब भी हमने इस हाउस के अंदर अपने साथियों को खड़ा करके जो नहीं करना चाहिए था, उस वकत भी कराने की कोशिश करवाई थी। इसलिए हम चाहते हैं कि इस विधेयक को तब तक नहीं आना चाहिए जब तक मुसलमान, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों, चाहे ईसाई ही कयों न हो , उनका आरक्षण न हो। अभी तक जो अध्ययन किया गया है कि बाद में संशोधन किया जायेगा, वह संशोधन नहीं हो सकता है। वह धोखा है, चतुराई है। पिछड़े और अल्पसंख्यकों के बारे में संविधान के अंदर कोई प्रवाधान नहीं है। हम संशोधन दे भी देंगे तो वह संशोधन अमल होगा, इसमें शक है। आप बताइये कयोंकि आप खुद भुकतभोगी हैं। आज आधे हिन्दुस्तान में से कोई भी मुसलमान लोक सभा का सदस्य नहीं है।
आज गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश , पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि आधे हिन्दुस्तान में से एक भी मुसलमान लोक सभा में नहीं है। हमारी राय है कि इस विधेयक को पेश  नहीं किया जाना चाहिए।
वर्तमान नौकरशाही के चलते दूसरे दल की सरकार बनने पर, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सीट आरक्षित कर दी जाएगी। हमारी राय है कि इसका अधिकार पार्टी को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को अधिकार नहीं देना चाहिए। पार्टी को अधिकार देना चाहिए कि कितना आरक्षण है और महिलाओं को कहां आरक्षण देना है। यदि कोई पार्टी उसका पालन न करे तो उस पार्टी की मान्यता खत्म कर दी जाए, इसमें ऐसा प्रावधान कीजिए। इलेक्शन कमीशन को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, यह हमारी राय है। जब तक इस विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक हम इसका हर तरह से विरोध करेंगे।

श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, हमारा भी नाम है। यदि इस प्रकार बहस होगी
मैं दस दिन से शून्य में नोटिस दे रहा हूं।
श्री गौरी शंकर चतुर्भुज बिसेन (बालाघाट) : उपाध्यक्ष महोदय, एक सप्ताह से शून्य काल में मेरा नाम नहीं आया है।
आप व्यवस्था दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मैंने उनको बुलाया है, आपको भी बुलाऊंगा, आप बैठिए।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : आज महिला दिवस पर महिलाओं के साथ मजाक हो रहा है। इस विषय पर इस तरह से ये लोग बोलते हैं।
श्रीमती भावना देवराजभाई चिखलिया : आप बैठिये, महिलाएं बोल रही हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कुछ तो महिलाओं का सम्मान करो, आज के दिन तो सम्मान करो।

श्रीमती सुमित्रा महाजन : माननीय उपाध्यक्ष जी, मुझे थोड़ा दुख हो रहा है। सोमनाथ दादा जैसे जिन लोगों से हम रूल सीखते हैं, मुझे ऐसा लगा था कि वे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर गीता दीदी की बात का और समर्थन करने के लिए खड़े हैं, लेकिन बीच में जिस तरीके से बात हुई, उससे मुझे थोड़ा सा दुख हुआ, कयोंकि हम इन्हीं लोगों से सीखते हैं। उन्होंने एक प्रकार से मंत्री की बात पर आज जो चर्चा छेड़ी, वह नहीं छेड़नी चाहिए थी, ऐसा मुझे लगता है।आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, मेरा यह मानना है कि ऐसा नहीं है आज महिला दिवस है, इसलिए महिलाओं के सम्मान की कुछ बात कहें। वास्तव में अच्छी तरह से इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन उसमें भी जिस प्रकार से खलल डाला जा रहा है, वह एक दुखदायक बात है।उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस महिला दिवस के उपलक्षय में प्रधान मंत्री जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी कि उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान है। जिस दिन उन्होंने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तुरंत बाद उन्होंने सम्पूर्ण देश की महिलाएं शिक्षित  बनें, समझदार बनें, इस बात को दृष्टि में रखते हुए महिलाओं को सभी प्रकार की शिक्षा फ्री देने का, उच्च शिक्षा तक फ्री दिए जाने का ऐलान किया था। इतना ही नहीं उनको व्यावसायिक शिक्षा देने के बारे में भी सोचने की बात जो कही थी, मैं चाहूंगी कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ योजना लाए। इसी प्रकार महिलाओं के आत्मसम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से जो भाव हमारे प्रधान मंत्री जी के मन में है, इस सदन में भी कई बार इस बात की चर्चा हो चुकी है। जब-जब भी दो जातियों में या कहीं भी झगड़े होते हैं तो वास्तव में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है, अत्याचार होता है तो उस जाति की महिलाओं पर ही होता है, मातृत्व पर आघात होता है, इस बात को दृष्टि में रखना चाहिए। इसीलिए प्रधान मंत्री जी ने और गृह मंत्री जी ने जो यह बात बार-बार कही है कि बलात्कारियों को फांसी तक की सजा दी जानी चाहिए, मैं उनका इस बात के लिए अभिनन्दन करना चाहती हूं। मैं चाहूंगी कि महिलाओं के हित में जो कानून हैं, उनके बारे में सोचा जाए और आवश्यक  संशोधन किए जाएं तथा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाला जो बिल है उसके बारे में भी सोचा जाए।

श्रीमती सुमित्रा महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही निवेदन करना चाहूंगी कि 33 प्रतिशत आरक्षण देकर हम इतना ही चाहते हैं कि निर्णय की प्रक़िया में महिलाओं का भी ज्यादा से ज्यादा सहभाग हो। हो सकता है इस पर किसी के विचार अलग हों, लेकिन बिल पर चर्चा के समय वे उसमें संशोधन  दे सकते हैं। अगर मित्रता के नाते, सर्वानुमति से यह बात हो जाती है तो महिलाओं का सम्मान रखने के लिए जो हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं, उसको मनाने में ज्यादा खुशी होगी।मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि महिलाओं को कृपया जाति में न बांटे। स्त्री की एक ही जाति होती है और वह मातृत्व की जाति होती है। वैसे भी स्त्री देश में पिछड़ी हुई है, उस पर अत्याचार हो रहे हैं, वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसलिए निर्णय की प्रक़िया में अधिकार दिलाने की दृष्टि से अगर कोई महिला बात करती है तो वह पूरे महिला समाज की बात करेगी। इस सदन में भी अगर वह बोलने के लिए खड़ी होगी तो मुस्लिम, दलित या अगड़े-पिछड़े की बात न करके पूरे स्त्री समाज की बात करेगी। इसलिए जब वह प्रतिनिधित्व करेगी तो पूरे महिला समाज का करेगी। मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि इस दृष्टि से इस पर सोचें और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाले बिल पर भी सर्वानुमति होनी चाहिए।

श्री  चंद्रशेखर (बलिया) (उ.प्र.): उपाध्यक्ष जी, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। महिलाओं के लिए जितना भी किया जाए, वह कम है। मैं बधाई दूंगा सरकार को कि इन्होंने बहुत अच्छी इच्छा व्यकत की है महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और उनके उत्थान के लिए। मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि यह कितनी क़ियान्वित होगी, यह तो अगले एक साल में देखा जाएगा। उसके लिए जो श्रीमती महाजन ने बधाई दी है प्रधान मंत्री जी को, मैं भी देता हूं। लेकिन दो बातें मैं और कहना चाहता हूं। अभी मुलायम सिंह जी ने जो बातें कहीं, उनका अपना महत्व है। उनकी भावनाओं को भी समझना चाहिए। यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हम लोग एक राष्ट्रीय कार्यक़म, जो अपने में अनोखा है, लागू करना चाहते हैं। मैं अपने मित्र गुजराल जी से पूछ रहा था कि जिस दिन आप यह बिल यहां लाए थे, उस दिन आपने कया सोचकर ऐसा किया था, कयोंकि थोड़ा बहुत दुनिया के बारे में मुझे भी ज्ञान है, मैं दुनिया के देशों में ज्यादा नहीं गया हूं, लेकिन भारत निराला देश होगा।
जहां इस तरह का बिल पार्लियामेंट में लाया जाएगा और कयों लाया जा रहा है, इसका कारण हमारे मित्र गुजराल साहब को भी नहीं मालूम है। उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उस समय कोई कोर कमेटी थी, उसने कहा कि यह बिल ले आओ और उसी दिन उसको सर्वसम्मति से पास कर दो। उमा भारती जी आज यहां हैं या नहीं, उन्होंने भी उस दिन यही सवाल उठाया था जो आज मुलायम सिंह जी उठा रहे हैंमैं कहना चाहता हूं लोगों के मन में शंका है। जो गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पमत के लोग हैं, उनकी महिलाएं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं। चुनाव आज जिस तरह से हो रहे हैं, उनका भी हमें रूप मालूम है, इसलिए हम समझते हैं कि उनका इतना प्रतिनिधित्व इस सदन में कम हो जाएगा, इसलिए यह भेद मत पैदा करें। यह सही है कि पिछड़े और अगड़ों में इस सदन में अंतर नहीं करना चाहिए। मैं सुमित्रा महाजन जी से यह कहूंगा कि पुरुषों और औरतों में अंतर करना भी उतना ही बुरा है जितना इस तरह की बातें करना बुरा है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो बिल लाया गया, बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे और केवल भावनाओं, जज़बातों में बहकर लाया गया। इसके कया परिणाम होंगे, उसके बारे में कभी नहीं सोचा गया। अगर कोई माननीय सदस्य यह बता दे कि दुनिया के किसी देश में क्या एक तिहाई रिजर्वेशन महिलाओं के लिए किया गया है?

श्रीमती सुमित्रा महाजन : हम अपने देश में तो आरक्षण की बात करते हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कया हम दूसरे देशों का अनुकरण ही करते रहेंगे या फिर अपनी प्रतिभा को सम्पन्न करेंगे?
श्री दादा बाबूराव परांजपे (जबलपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, पूरा सत्र हो गया। एक कागज देता हूं।
आज तक मौका नहीं मिला, नए सदस्यों के साथ आम तौरपर यही हो रहा है। इस सदन में कुछ लोग ही बोलते रहते हैं, इसके बारे में भी विचार होना चाहिए।
श्री दादा बाबूराव परांजपे : बाकी लोग बोल भी नहीं पाते हैं।
इस पर आपको विचार करना पड़ेगा। जितने लोगों की यहां पर बोलने की ठेकेदारी हो गई है, वे ही बोलते हैं। बाकी लोग नहीं बोल पाते हैं, यह मेरा कहना है।
श्री एच.पी.सिंह (आरा): सेशन चलाने वाले दोनों मंत्री जी यहां बैठे हैं और वहां सारे भारते के लोगों को महिला दिवस पर बधाई दी जा रही हैं और महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं।

श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): उपाध्यक्ष महोदय, आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं अपनी बहिनों को मुबारकबाद देता हूं। दुनिया में सारी महिलाएं संगठित होकर रहें, आज इस अवसर पर मैं कहूंगा कि महिलाओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए। जो महिलाएं अत्याचार से पीड़ित हैं, उनके ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार होते हैं, उसके लिए हमें देश के अंदर इस प्रकार का कानून बनाना चाहिए कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।माननीय मंत्री जी और आडवाणी जी ने हाल ही में इस बात को कहा है कि जो महिलाओं के साथ दुर्वयवहार करते हैं या बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए। उन्होंने जो कुछ कहा है मैं समझता हूं कि जब तक वह कानून के रूप में नहीं आएगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं बढ़ती जाएंगी और सब लोग कहते ही रहेंगे। धन्यवाद।

श्री  शिवराज वी.पाटील (लाटूर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम संसार की आधी मानव संख्या के प्रति अपना आदर व्यकत करने के लिए यह दिन मना रहे हैं। हमारे देश  में और संसार में भी महिलाओं का आदर किया जाता है, महिलाओं के प्रति प्रेम की भावनाएं व्यकत की जाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं। मगर हमारे देश  में और संसार में भी जब महिलाओं को अधिकार देने की बात की जाती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं। यहां तक कि कुछ महिलाओं का भी उनको समर्थन नहीं मिलता है। कुछ पुरुष आगे जरूर आते हैं लेकिन बहुत सारे ऐसे कारण दे देते हैं जिनका एक ही उद्देश्य होता है कि आदर मिले, प्रेम मिले लेकिन उनको अधिकार न मिलें – इस बात को भी हमें इस दिन ध्यान में रखना पड़ेगा। यह शताब्दी अधिकार देने वाली शताब्दी है। जो सर्वसाधारण लोग हैं, समाज के अंदर कमजोर लोग हैं, उनको अधिकार देने वाली यह शताब्दी है। यह शताब्दी हमारी माताओं, बहनों और बेटियों को अधिकार देने वाली शताब्दी है। इसलिए हमारे भाई लोग कुछ ऐसे कारण बताकर पीछे न हटें जिसकी वजह से लोग यह न कहें कि दिल में बात एक है और दूसरी तरह से यहां पर रखने की यह कोशिश कर रहे हैं। मैं बड़े आदर से यहां पर कहना चाहता हूं कि बहुत ही सोच-समझकर कहने वाले, दूरदृष्टि रखने वाले नेता हैं, उनकी बातों को काटना बड़ा मुश्किल  है। उनकी बात काटते समय या उनके खिलाफ कहते समय मन में दुख होता है। इसलिए पहले ही हम क्षमा-याचना करना चाहते हैं।मगर यहां पर कहा गया कि संसार में ऐसी कोई चीज नहीं हुई है, इसलिए यहां पर कयों होना चाहिए?कया हम दूसरों के पीछे ही चलते रहेंगे?कया हम दूसरों को कोई रास्ता नहीं बताएंगे? अगर संसार में कहीं नहीं हुआ है तो कया हमारे देश में वह बात नहीं होनी चाहिए? हमारे देश की कोई बात हो और दूसरे लोगों ने अगर उसे अपनाया तो उसमें कौन सी बुरी बात है? दक्षिण एशिया ने बताया कि सबसे पहले हिन्दुस्तान में महिला प्राइम मिनिस्टर हुई और वह श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी हुई। यहां महिला पार्टी अध्यक्ष और प्राइम मिनिस्टर हुई हैं। यहां महिला प्रधान मंत्री और अध्यक्ष दूसरी जगहों के मुकाबले कहीं ज्यादा संख्या में हुई हैं। कया हमें यह चीज नहीं अपनानी चाहिए?हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री भी महिलाएं हैं। महिला मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने अपने-अपने तरीके से यहां काम किया। एक सवाल यह पूछा और उठाया जा रहा है कि कया ऐसा होने पर पिछड़ी जाति की महिलाओं को हिस्सा मिलने वाला है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जो पिछड़ी सो-कॉल्ड बैकवर्ड कलासेज की महिलाओं की बात की जा रही है तो सो-कॉल्ड मैन के बारे में भी कहा जाए। कितने फारवर्ड कलास के लोग और जैंटलमैन यहां चुन कर आते हैं? फारवर्ड कलास की महिला हो या जैंटलमैन हो, वे टिकट मांग सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फारवर्ड कलास के वोट देने वाले लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की ज्यादा संख्या है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की संख्या ज्यादा होने से बैकवर्ड कलास के लोग ही चुन कर आ जाएंगे और फारवर्ड कलास के चुन कर नहीं आएंगे। हमें यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी।इसका हिसाब होना चाहिए। हम यह बात बर्दाश्त नहीं करेंगे।

श्री शिवराज वी. पाटील : पूछा जाता है कि इसके पीछे कया लॉजिक है? लॉजिक यह है कि जो सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वे अपनी बहनों, बेटियों, मां और अर्दधांगिनी को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं। ऐसे में वे किस सामाजिक न्याय की बात करते हैं। वे अपने घर वालों को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं और बाहर के लोगों को सामाजिक न्याय देने की बात करते हैं। ऐसी चीजों पर कौन भरोसा करने वाला है? अगर आपको नहीं करना है तो मत करिए लेकिन समाज और देश  को बांटने की कोशिश मत कीजिए। अगर आपने महिलाओं को बांट कर इस प्रकार से टिकट दिए तो जैंटलमैन को किस आधार पर नहीं कहने वाले हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद किस आधार पर नहीं देने वाले हैं। कया आपका संविधान सैकुलर रहने वाला है? आप कह दें कि हमें यह नहीं करना है। यहां आप कह दीजिए कि आपको यही डर है कि महिलाओं को अधिक संख्या में सीटें देने के बाद हमारी सीटें चली जाएंगी। अगर ऐसा डर है तो वह डर खत्म करने की दवा लोगों और सोचने वालों के पास है। वे उसे देंगे और इसे करेंगे। आप इस डर को छुपाने के लिए सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि से ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं और दूसरों को धोखा दे रहे हैं।

मैं अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाज के आधे हिस्से के लोगों को अगर न्याय देने के लिए आगे नहीं आए तो दूसरों को न्याय देने की बात पर लोग बहुत कम भरोसा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है। …

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, हम लोगों को भी यह मामला उठाने की इजाजत दी जाए।
श्री गंगा चरण राजपूत (हमीरपुर) (उ.प्र.) : उपाध्यक्ष महोदय, हमने भी नोटिस दिया है। हमे बोलने दीजिये।
श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, आप सब को बोलने दे रहे हैं, कया हम लोगों को नही बोलने देंगे?
श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी (दरभंगा): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको जल्दी समाप्त करना है कयोंकि

श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी : उपाध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में खत्म कर दूंगा। आज इंटरनेश्नल वुमैन डे पर महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये जो कदम उठाये जायेंगे, उसमें हम और हमारी पार्टी पूरा पूरा समर्थन देने का काम करेंगी। आज इंटरनेशनल वुमैन डे की अलग बात है और हिन्दुस्तान की महिलाओं का चैप्टर अलग है। जब इस सदन के अंदर महिलाओं के लिये रिजर्वेशन की बात होती है, उस समय बहुत सारी सामाजिक चीजों को पीछे छोड़ दिया जाता है। हमारा और हमारी पार्टी के लोगों का सीधा मानना है कि जब भी इस पर विचार हो तो इसमें शेडयूल्ड कास्टस एंड शेडयूल्ड ट्राइब्स और अदर बैकवर्ड कलासेज का प्रावधान हो। उस वक्त  निश्चित रूप से जो हिन्दुस्तान के अंदर 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक लोग बसते हैं, पहले उनके बारे में सोचा जाना चाहिए। इसलिए कि आज अगर आज़ादी के बाद से आज तक के आंकड़े उठाकर देखें तो जो मुसलमानों की 12 परसेंट आबादी है, उस हिसाब से आप देखिये कि कम से कम 65 सांसद चुनकर इस लोक सभा में आने चाहिए लेकिन आज इस सदन के अंदर सिर्फ 27-28 मेम्बर हैं। न जाने कितने राज्य ऐसे हैं जहां पर एक भी विधायक नहीं है। आप अगर रिजर्वेशन विमेन्स का करते हैं तो हमारी मांग है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण किया जाए, 50 परसेंट रिजर्वेशन किया जाए। हम पाटिल जी से ऐग्री करते हैं कि उनको 50 परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए जितनी उनकी आबादी है, लेकिन उसके अंदर जो 43 प्रतिशत बैकवर्ड कलासेज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए, जो 25 प्रतिश त शेडयूल्ड कास्टस और ट्राइब्ज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और खास तौर से 12 प्रतिशत मुसलमान हैं, उस 50 प्रतिशत में उनकी महिलाओं को उतना हिस्सा मिलना चाहिए। तभी इस मुल्क के अंदर समान न्याय मुमकिन होगा और समाज के हर तबके के लोग इस सदन के अंदर पहुंच पाएंगे।

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण-मध्य) : हमें बोलने का मौका नहीं मिला है। हम शिव  सेना की तरफ से राय रखना चाहते हैं। हमें भी बोलने दीजिए।

महिला आरक्षण विधेयक को पारित करो [अपील पर हस्ताक्षर करें ]

इस लिंक पर जाकर अपील पर हस्ताक्षर करें 

महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पहली बार १२ सितम्बर, १९९६ को प्रस्त्तुत किया गया था. उसके बाद से इसे कई बार संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है परन्तु न तो इस पर विचार हुआ और ना ही मतदान. सन १९९५ में ७३वें व ७४वें संवैधानिक संशोधनों द्वारा पंचायतों व स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण दिया गया दिया था, जिसके नतीजे में लाखों महिलाओं ने राजनीति के क्षेत्र में पदार्पण किया. कुछ राज्यों ने इस आरक्षण को बढ़ाकर ५० प्रतिशत कर दिया है. विरोध और समस्याओं का दृढ़ता से मुकाबला करते हुए, समाज के संभी वर्गों की महिलाओं ने पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं के सञ्चालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इससे दुनिया में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी. परन्तु संसद व राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति १० प्रतिशत से भी कम बनी हुयी है. इस कारण संसद में होने वाली चर्चाओं और बहसों और वहां बनाई जाने वाली नीतियों में लैंगिक परिप्रेक्ष्य का अभाव स्पष्ट दिखलाई देता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और अवांछनीय है.

इस विधेयक पर दो संसदीय समितियां गहन विचार कर चुकी हैं. दूसरी समिति ने दिसंबर २००९ में प्रस्तुत अपनी रपट में इसे जस का तस पारित करने की सिफारिश की थी. राज्यसभा द्वारा ९ मार्च २०१० को महिला आरक्षण विधेयक को स्वीकृति दिए जाने से देश की महिलाओं को यह आशा बंधी थी कि इसे जल्द ही लोकसभा की स्वीकृति प्राप्त हो जाएगी और यह विधेयक, कानून बन जायेगा. परन्तु दुर्भाग्यवश, १५वीं लोकसभा के २०१४ में विघटन के साथ ही यह विधेयक लैप्स हो गया.

संसद में विधि निर्माण और बजट प्रावधानों में लैंगिक परिप्रेक्ष्य को नज़रंदाज़ किया जाता रहा है. हम इस बात पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं कि वर्तमान एनडीए सरकार के एजेंडे से ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण विधेयक पूरी तरह से गायब हो गया है. यह इसके बावजूद कि एनडीए ने चुनाव अभियान के दौरान यह वादा किया था कि सरकार में आने पर वह महिलाओं को ३३ नहीं बल्कि ५० प्रतिशत आरक्षण देगा. सरकार ने “सर्वसम्मति के अभाव” के नाम पर इस विधेयक को ठन्डे बस्ते में डाल दिया.

संसद द्वारा महिला आरक्षण को मंज़ूरी दिए जाने की मांग को मजबूती देने कि लिए यह आवश्यक है कि सभी राज्यों में ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठन इस मुद्दे पर एक स्वर से आवाज़ उठायें. विभिन्न संगठनों व आम जनता, विशेषकर महिलाओं, के संयुक्त प्रयासों से ही वर्षों से संसद में लटका यह विधेयक पारित हो सकेगा. हम देश के सभी राज्यों में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे संगठनों से यह अनुरोध करते हैं कि वे इस मांग को आगे बढ़ाने और संसद के अगले सत्र में इस विधेयक को पारित करवाने में हमारा साथ दें. हम सभी संगठनों से अपील करते हैं कि वे इस सिलसिले में भविष्य में की जाने वाली कार्यवाहियों में सक्रिय भागीदारी करें.

केंद्रीय विधि मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने 7 अगस्त, २०१५ को संसद में स्वीकार किया कि सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पर “किसी राजनैतिक दल या अन्यों से विचार-विमर्श प्रारंभ नहीं किया है”. उन्होंने कहा कि “संसद के समक्ष संविधान में संशोधन के लिए विधेयक प्रस्तुत करने से पहले सभी राजनैतिक दलों के बीच इस विधेयक पर सघन विचार-विमर्श और सर्वसम्मति का निर्माण आवश्यक होगा”. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने संसद में १४ सितम्बर २०१५ को कहा कि उन्हें “निकट भविष्य में संसद द्वारा इस पर विचार किये जाने की कोई सम्भावना नहीं दिखती”

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया, परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप रहे. बल्कि उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिर्फ महिला सांसदों के बोलने का प्रतीकात्मक आहवान जरूर किया , लेकिन उनकी रुचि महिला प्रतिनिधित्व के ठोस उपायों में नहीं दिख रही है.

ऐसा कोई नियम नहीं है कि संसद किसी विधेयक को तभी अपनी मंज़ूरी दे सकती है जब उस पर सर्वसम्मति बन जाये. हमें तो ऐसा प्रतीत होता है सभी राजनैतिक दलों में इस आशय की सर्वसम्मति बन गयी है कि इस विधेयक को किसी भी हालत में कानून न बनने दिया जाये.

हम एक बार फिर समान प्रतिनिधित्व की अपनी मांग को दोहराते हैं और यह मांग करते हैं कि संसद इस विधेयक को अगले सत्र में पारित करे.

हमारी मांग है कि देश के संसदीय इतिहास में एक युग कि शुरुआत के लिए, लोकसभा के अगले सत्र में महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तुत किया जाये और बहस तथा मतदान के बाद उसे पारित किया जाये .

इस लिंक पर जाकर अपील पर हस्ताक्षर करें

‘‘….एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( पहली क़िस्त)

डा. अनुपमा गुप्ता


बचपन में बाजार से गुजरते हुए दुकानों पर लगे ‘मुरारीलाल एण्ड सन्स’ जैसे नामों पर जब भी नजर पड़ी तो हर एक नई चीज को देख कर उत्सुकता से भर जाता बालमन इसका मतलब यही निकालता था कि ‘एण्ड सन्स’ कोई गहन पारिभाषिक शब्द है और आवश्यक कम्पनी नियमों में शामिल रहता होगा- क्योंकि वयस्क दुनिया में हर काम समझदारी और अनुशासन से होता है, कुछ ऐसा विश्वास हर बच्चे की तरह मेरे मन में भी था। धीरे-धीरे जब यह नजर में आना शुरू  हुआ कि ‘एण्ड सन्स’ दरअसल बेटियों को पारिवारिक सम्पत्ति से बेदखल कर देने की ‘सामाजिक मान्यता प्राप्त घोषणा है तो इसकी इतनी सरल और खुली क्रूरता पर हैरत से भर गई थी मैं! आधुनिक सभ्य राष्ट्र -समाज में किसी भी तरह के पक्षपात को हेय दृष्टि से देखा जाता है, यहाँ तक कि अपराध की श्रेणी में रखा जाता है; फिर यह पक्षपात स्वतंत्र भारत में कानूनी-सामाजिक रूप से इस तरह मान्य कैसे हो सका?

यह समझ समय के साथ बाद में आ ही सकी कि मानव जाति ने अपनी समृद्धि यात्रा के लिये जो पथ चुना है, उसमें सामूहिक शारीरिक श्रम की अनिवार्य आवश्यकता के कारण समाज के कुछ घटक दासत्व को प्राप्त होने ही थे, उन्हें समर्थों की चल-अचल सम्पत्ति में गिना ही जाना था। और उन्हें इस स्थिति से उबारने के लिये सभ्यता चाहे जितना जतन कर ले, वे तब तक दास बने रहेंगे, जब तक किसी विज्ञान-गल्प की भांति हमारे साइंसदान श्रमिक रोबोट दासों की एक फौज इस अनिवार्य सामूहिक श्रम के लिये तैयार न कर लें;
अथवा हम विकास की अपनी परिभाषा न बदल लें!

चूँकि तथाकथित विकास के इस पथ पर इस वास्तविकता से हम हमेशा परिचित थे, और हैं, कि ये दास भी तभी तक दास बने रहेंगे जब तक वे सम्पत्तिहीन रहें, जब तक धन के असीमित निजी संग्रह को ही समृद्धि और विकास का नाम दिया जाता रहे। तो इस स्थिति में श्रमिक वर्ग को सम्पत्ति की संभावना से हर हाल में वंचित रखना ही इस असमताकारी विकास को जारी रखने की सबसे बड़ी षर्त थी। विश्व  के कई अन्य देषों की तरह भारतीय स्त्री जाति भी आज अपनी इसी अनिवार्य श्रमिक सेवा से निकलने की कोशिश कर रही है। सच यही है कि वह अब तक अपने किसी परिधान में एक जेब लगवाने की जरूरत महसूस नहीं कर पाई है- किसी व्यक्ति की वेशभूषा में जेब तभी तो होती है जब उसे अपने पास किसी मूल्यवान वस्तु को रखने की जरूरत हो। मैं समझती हूँ कि वंचित पुरुषों को भी इसी नजर से देखने का तर्क तब कमअसर हो जाता है जब हम उनके घर में प्रवेश करें और पायें कि उनके परिवार की स्त्रियाँ हर हाल में अधिक वंचित हैं।

सम्पदा पर अधिकार की बात करते हुए पहले हम यह समझ लें कि सम्पदा से हमारा आशय क्या है तो इस विशय पर हम आसानी से आगे बढ़ सकेंगे। यदि सम्पदा/सम्पत्ति को जीवन का लक्ष्य न मान कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन मानें जो कि उसका सच्चा स्वरूप है, तो सम्पदा का अर्थ ऐसे हर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संसाधन से लिया जा सकता है ‘जिस पर प्रभावपूर्ण अधिकार से व्यक्ति स्वयं के, अपने परिवार तथा समुदाय के भौतिक जीवन को बेहतर बना सके तथा समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके ’। इस परिभाषा के अन्तर्गत मैं निम्न सभी संसाधनों को रखती हूँः
1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा- जिसे आम तौर पर सम्पदा/सम्पत्ति/दौलत के अकेले अर्थ के रूप में लिया जाता है। इसमें चल-अचल एवं निजी/सामुदायिक सम्पत्ति के सभी प्रकार आते हैं जिनमें नियमित आय तथा घर के अलावा उपभोक्ता वस्तुयें व भूमि, जल, वन जैसे प्राकृतिक संसाधन मुख्य हैं।
2. अप्रत्यक्ष सम्पदा- जिसमें वे सभी संसाधन शामिल हैं जो प्रत्यक्ष सम्पदा को अर्जित करने में सहायक हों, जैसे स्वतंत्रता, ज्ञान, अवसर, गरिमा, स्वास्थ्य व सुरक्षा। इन संसाधनों के मुफ्त व समतापूर्ण वितरण के संकल्प कभी हमारे संविधान में किये गये थे, लेकिन आज सम्बन्ध उलट-पुलट गये हैं और अब स्वयं सम्पदा का रूप ले चुके इन संसाधनों को पाने के लिये प्रत्यक्ष सम्पदा भी एक माध्यम बन गई है न कि मात्र उनका सुफल। यह दुष्चक्र प्रतिदिन सुरसा के मुँह के समान बढ़ रहा है और वंचित मानवता बेहतर जीवन से प्रतिदिन और दूर हो रही है।

यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि सम्पत्ति पर अधिकार का सवाल मात्र कानून से हल नहीं हो सकता। हमारे सम्पत्ति विषयक व निजी अन्य कानूनों का समय के साथ बदलता स्वरूप इंगित करता है कि दायित्व का व्यापक सामाजिक बोध ही जहाँ एक ओर न्याय की दिशा-दशा व स्वरूप को निर्धारित करता आया है वहीं दूसरी ओर यदि यह बोध न हो तो कितना भी बुद्धिमत्तापूर्ण कानून स्त्री को (या अन्य वंचितों को) उसका हक नहीं दिला पायेगा। और अब वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भी फिर एक बार यह सिद्ध कर दिया है कि वंचितों के हक यदि आगे बढ़ कर प्राथमिकता से तय नहीं किये गये हैं तो उन्हें इस विकास की दौड़ में आसानी से भुला दिया जा सकता है, चाहे नीतिनिर्धारकों की मंषा प्रारंभ में ठीक यही न भी रही हो। इसलिये इस दिशा में युद्ध स्तर पर काम करने की अत्यंत आवश्यकता है जो आज का स्त्री आंदोलन स्थानीय-राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं कर पा रहा है।

स्त्री के आर्थिक अधिकार इस वैश्वीकरणकरण के दौर में अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं क्योंकि न सिर्फ शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष स्त्रियाँ बल्कि वंचित वर्गों की स्त्रियाँ भी विश्व के आर्थिक परिदृष्य पर अब अधिकाधिक सक्रिय दिखाई देने लगी हैं। जहाँ एक ओर उनके पारम्परिक कार्य जैसे खाद्यान्न उत्पादन (लगभग 60 प्रतिषत कृशि श्रम)1, जल व ईधन के एकत्रीकरण, परिवार निर्माण एवं प्रबन्धन जैसे कार्यों का आर्थिक महत्व पहली बार प्रकाश में लाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वे अब संगठित श्रमिक दलों (अधिकांश क्षेत्रों में लगभग एक तिहाई श्रमिक)2, सामूहिक कृधि कर्मियों व परिवारों की मुखिया के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। स्त्री आंदोलन ने विश्व  में स्त्री की देह, शिक्षा व कार्य को महत्व दिलाने के लिये अथक परिश्रम किया है किन्तु भौतिक सम्पदा अब तक उनके संकल्पों में पूर्णरूपेण नहीं जुड़ सकी है। स्त्री के सम्पत्ति अधिकारों के विषय  में राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक-सांस्कृतिक अनिच्छा उनके आर्थिक रूप से सबल होने की दिशा में अब भी बड़ी बाधायें हैं और इस अनिच्छाओं के मूल में एक ही कारण है- स्वयं सम्पत्ति के एक रूप की तरह भोगी जाती रही स्त्री आज यदि इस भौतिक सम्पदा में हिस्सा बंटाने की बात करने लगे तो यह तर्कपूर्ण कैसे लगेगा? स्त्री आज भी पारिवारिक व सामाजिक सम्पत्ति मानी जाती है- परिवार की ओर से उसके श्रम, देह एवं प्रजनन क्षमता को वधू-मूल्य ले कर बेचा जा सकता है, दान किया जा सकता है, दहेज के साथ मुफ्त उपहार के रूप में पाया जा सकता है अथवा राजनीतिक/सामाजिक/आर्थिक सौदों में व्यक्तिगत बढ़त हासिल करने के लिये उसका निवेष किया जा सकता है, प्रतिष्ठा के नाम पर घर के बाहर काम करने की चाहे मनाही हो लेकिन घर में बेगार करवाई जा सकती है। भ्रूण हत्या से ले कर त्याग की छांव में पलते कुपोषण , दहेज, वैधव्य की सादगी, चादर ओढ़ाना, सती दहन, डायन के इलजामों और अंत्येष्टि व विरासत की सभी परम्पराओं तक, अत्यंत सावधानी और क्रूरता से गढ़ी गई प्रत्येक पारिवारिक व सामाजिक स्त्री-छवि के पीछे सम्पत्ति को स्त्री के हाथों में सौंपने से इनकार ही तो है।

यही नहीं स्त्री सामाजिक सार्वजनिक सम्पत्ति भी है जिससे सरेआम छेड़खानी करके न सिर्फ अपने पुरुषत्व को सिद्ध किया जा सकता है बल्कि घर के बाहर आने से रोका भी जा सकता है, जिसे वेश्यावृत्ति  के द्वारा खरीदा जा सकता है, बराबर श्रम के बदले कम मेहनताना दे कर संतुष्ट किया जा सकता है। यही नहीं, उसे पुरुषों द्वारा थोपे गये युद्धों के दौरान घर-समाज को संभालने के लिये मजबूर किया जा सकता है, सेना के हमलों के वक्त रिश्वत अथवा कृतज्ञता ज्ञापन के तौर पर पेश किया जा सकता है अथवा साम्प्रदायिक दंगों के समय दूसरी कौम के वर्तमान व भविष्य के मानव संसाधनों को नष्ट करने के लिये कुचला जा सकता है। आर्थिक स्वतंत्रता पाने की अपनी धुन के कारण वह पहले ही घर-रोजगार के बीच पिस रही है और अब, ‘स्त्री सशक्तीकरण अर्थात स्थाई सामाजिक विकास’ जैसे नये सरकारी नारों के उदय के बाद गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुधारों का बोझ भी उसी के ‘निर्बल’ कहे जाने वाले कंधों पर आन पड़ा है।

उसे सम्पत्ति की तरह निरंतर उपयोग करने का आदी हो चुका यह समाज अपनी समृद्धि में उससे हिस्सा बांटने की बात सोच भी कैसे सकता है? आज कुछ सम्पत्ति अधिकार राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधे अधूरे कानून बन कर जरूर आ गये हैं लेकिन समाज में उनके सक्रिय अस्तित्व को स्थापित व सिद्ध करना अब भी बहुत विशाल चुनौती है। और जैसे ये रुकावटें ही पर्याप्त नहीं थीं तो अब भूमण्डलीकरण का नया खुला बाजार तथा उग्र पूंजीवाद इन अधिकारों के अभाव में उस पर कहर बन कर टूट पड़े हैं।

वैश्वीकरण के दौर में जब समता के लोकतांत्रिक मूल्यों का मन्थन एक बार फिर नये सिरे से किया जा रहा है, जब संगठित श्रम में स्त्री की हिस्सेदारी हर क्षण बढ़ रही है, जब सामाजिक जीवन में निजी सम्पत्ति का महत्व बढ़ता जा रहा है, तब संसाधनों पर स्त्रियों का नगण्य अधिकार (जैसे कि विश्व की कुल नामित भूमि में 1-2 प्रतिशत)2 और भी असहनीय लगने लगता है। यह न सिर्फ स्त्री के बल्कि परिवारों, देश और अंततः मानव जाति की तरक्की के रास्ते में रुकावट है यह बात हमें समझनी ही होगी। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में हुए कुछ मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों के अनुसार गैरपूंजीवादी परम्परावादी समुदायों में संसाधन-वितरण के समय उसके अर्जन में व्यक्ति की भागेदारी को नजरअंदाज कर संसाधन को सभी में समान रूप से बांटे जाने की प्रवृत्ति अधिक देखी गई है। इसीलिये सामाजिक रूप से अधिक संगठित-सुगठित संस्कृतियों, जैसे चीन व भारत में खुली अर्थव्यवस्था के प्रवेश के पहले परिवारों के भीतर जहाँ यह वितरण सभी सदस्यों की समानता पर आधारित था3 वहीं समाज में वितरण भी परिवारों की न्यूनतम आवश्यकताओं से जुड़ा होता था जिसमें वंचितों के लिये भी, हाशिये पर ही सही लेकिन जीविका के कुछ अधिकार अवश्य होते थे। इन परम्परागत कृषि आधारित समुदायों में पारिवारिक आय अथवा भूमि मूल रूप से भोजन व वस्त्र प्राप्ति का साधन हुआ करती थी, भौतिक समृद्धि सबका ध्येय नहीं थी और इसलिये भूमि व अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार अक्सर परिवार व गाँव में व्यक्ति की भूमिका पर निर्भर करता था न कि कागज पर मालिकाना हक पर, और इस तरह समाज के हर स्त्री-पुरुष को इनके इस्तेमाल का हक हुआ करता था।4 लेकिन उग्र पूँजीवाद के चैतरफा पैर पसारने से प्राकृतिक न्याय की ये कुछ परम्परायें भी अब छीज रही हैं। पहले उपनिवेशी काल और फिर औद्योगीकरण व वैश्वीकरण की आर्थिक प्रक्रियाओं ने धीरे-धीरे आय आधारित रोजगारों का महत्व बढ़ा दिया है जिससे भूमि व अन्य संसाधन अब नकदी फसलों, इमारतों के निर्माण और व्यवसायिक कार्यों के लिये प्रयोग किये जाने लगे हैं तथा कई तरीकों से समृद्धि व रुतबा बढ़ाने का जरिया बन गये हैं। हालांकि वैश्वीकरण की शुरुआत में माना गया था कि खुली अर्थव्यवस्था से होने वाला आर्थिक विकास समाज में पितृसत्ता के प्रभाव को धीरे -धीरे घटा कर समृद्धि को जेण्डर के स्तर पर संतुलित कर पायेगा, किन्तु पिछले 25 वर्शों में गरीब-अमीर तथा स्त्री-पुरुष के बीच आर्थिक खाई और भी गहरी होती गई है। और विडम्बना यह कि इस खुले सच को आंकड़ों द्वारा सिद्ध करने के लिये हमारे पास कोई अंतरराष्ट्रीय  स्तर के ठोस अध्ययन व साक्ष्य नहीं हैं।5
विश्व के इतिहास से स्पष्ट है कि स्त्रियों के श्रम का भरपूर निवेश करती आई इस सभ्यता ने आर्थिक विकास की प्रक्रिया में उन्हें अपने लाभांश में हिस्सेदारी देने की कोशिश कभी नहीं की और इसीलिये आज आर्थिक या कृषि आपदाओं की पहली शिकार वे ही हो रही हैं। समाज की आर्थिक संरचना में इक्कीसवीं सदी में हुये वैश्विक व स्थानीय परिवर्तनों का कहर खासकर स्त्रियों पर इसलिये अधिक टूटा कि धन व निजी सम्पत्ति की अवधारणा पर आधारित नई अर्थव्यवस्थाओं में एक ओर उनके भूमि/पारिवारिक सम्पत्ति पर अनौपचारिक अधिकार समाप्त हो गये हैं और विरासत के औपचारिक अधिकार अब तक उनके पास नहीं पहुँचे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार के बच्चों/बुजुर्गों के भोजन व रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी अब भी उन्हीं पर है और ये जरूरतें खुले बाजारों के बढ़ने व आवश्यक वस्तुओं पर सरकारी अनुदान कम होने के कारण प्रतिदिन मंहगी होती जा रही हैं। विश्व के अधिकांश गरीब देशों में किये गये अध्ययन दिखाते हैं कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष जहाँ हर वर्ष कृषि से इतर अन्य आय आधारित रोजगारों के लिये शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, क्योंकि वे विभिन्न तकनीकी प्रशिक्षण पा कर अन्य रोजगारों में अपना भाग्य तलाश सकते हैं, वहीं स्त्री पहले तो घर और बच्चों से बंधी होने के कारण, और फिर कम शिक्षित, अप्रषिक्षित /अल्पप्रषिक्षित होने के कारण तथा सम्पत्ति पर अनाधिकार के कारण कृषि अथवा असंगठित घरेलू श्रम पर ही निर्भर रह जाती है।

दूसरे, कुछ देशों  में ऐसा इसलिये और भी अधिक हुआ है कि वे वर्षों से युद्धरत हैं या फिर वहाँ एड्स की चपेट में आये पुरुषों की संख्या अधिक है।6 इस प्रकार स्त्रियों द्वारा सम्भाली जाने वाली कृषि सम्पत्तियों और परिवारों की संख्या (भारत में 20-35 प्रतिशत)7 प्रतिवर्ष अधिक होती जा रही है।तीसरे, क्योंकि जैविक व कई जेण्डरीकृत कारणों से स्त्रियों का जीवनकाल पुरुषों से सामान्यतः अधिक होता है तो वरिष्ठ नागरिकों में स्त्रियों की संख्या उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती है और इनमंस अधिकांश  निराधार विधवायें होती हैं जो कुल मिला कर स्त्रियों में गरीबी अधिक पाये जाने का एक और कारण हो सकता है।फिर पुरुषों की आमदनी से चलने वाले घरों में भी परिवार की आर्थिक स्थिति भी इसी से तय होती है कि स्त्री को उस आय को खर्चने में स्वतंत्र निर्णय लेने का हक कितना है, चाहे परिवार को उस आमदनी के कारण गरीब न माना जा रहा हो। वैश्विक स्तर पर देखा जाये तो आज 41 प्रतिशत स्त्री-संचालित परिवार स्थानीय गरीबी की रेखा से नीचे हैं तथा एक तिहाई स्त्रियाँ बेघर हैं।9 बावजूद इसके कि विश्व के 50 प्रतिशत अन्न का उत्पादन स्त्रियाँ करती हैं, 47 प्रतिषत शारीरिक श्रम वाले कृषि कार्य वे ही करती हैं और कई विकासशील देशों में तो 80 प्रतिशत तक कृषि कार्य स्त्रियों पर थोपे जा रहे हैं।4 अब ऐसी स्त्रियों के लिये चल व अचल सम्पत्ति में कानूनी अधिकार न होने से समूचे परिवार के लिये रिहाइश, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीविका के साधनों का संचालन व प्रबन्धन और बहुत बार जीवन की रक्षा तक करना बड़ी चुनौती बन जाता है। वैश्विक संदर्भों में इसे ‘निर्धनता का स्त्रीकरण8 नाम दिया गया है,स्त्रियों तथा बड़े परिप्रेक्ष्य में समाज के लिये स्त्री-सम्पत्ति अधिकारों का प्रभावी होना आज इसलिये महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सम्पत्ति पर अधिकार जहाँ उन्हें अन्य कई जरूरी संसाधनों जैसे भोजन, स्वास्थ्य व शिक्षा पर भी हक़ दिलाता है वहीं सम्पत्ति का न होना उनके लिये अधिक विडम्बनापूर्ण हो जाता है क्योंकि बच्चों/बुजुर्गों के पालन पोषण की सारी जिम्मेदारी उन पर अकेले ही आ जाती है यदि पति इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले।

गरीबी की स्थिति आने पर पुरुषों और स्त्रियों के इस चुनौती को स्वीकारने के तरीके में बड़ा अन्तर देखा गया है। स्त्रियाँ सामान्यतः सिर्फ अपने लिये संघर्श नहीं करतीं, उनकी नजर में हमेशा पूरा परिवार होता है और परिवार का भार उन पर बढ़ते जाने के बावजूद, वे हार कर बैठने की अपेक्षा आमदनी का कोई न कोई जरिया ढूँढ़ लेती हैं, चाहे वह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप न भी हो। इस क्षेत्र में हुये सभी अध्ययन दर्शाते हैं कि स्त्रियाँ अपनी कमाई का अधिकांश घर की आवश्यकताओं में खर्च करती हैं इसलिये सम्पत्ति व संसाधनों पर उनका सीमित अधिकार भी परिवार के आश्रितों को भुखमरी से बचाने में अधिक कारगर सिद्ध हुआ है।7
हालाँकि आर्थिक जगत के सामान्य नियमों के उलट, जिम्मेदारी को अधिक सम्भालने या ज्यादा घंटे काम करने के कारण उन्हें कोई विशेष निजी पुरस्कार, प्रतिष्ठा या आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता और न ही उनकी अथक चेष्टाओं का कोई सामाजिक मूल्य आंका जाता है।5 अधिक श्रम स्त्रियों की निजी आर्थिक स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला पा रहा है, मेहनत का फल उनके लिये मीठा नहीं है। जिम्मेदारियों को किसी भी प्रकार निभा ले जाने और मुसीबतों से पलायन न करने के गुण ने अब उन्हें व्यक्तिगत तौर पर और भी नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया है क्योंकि अब सरकारें भी अपने गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता के लिये उन्हीं पर अधिकाधिक निर्भर हो रही हैं और इस तरह उनके झुके हुये कंधों पर और भी बोझ डाला जा रहा है। सिल्वििया चेंट5 इसे निर्धनता का नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारियों व मजबूरियों का स्त्रीकरण’कहती हैं। लाभ से श्रम-निवेश का यह सम्बन्ध-विच्छेद मूल व सार्वभौमिक आर्थिक सिद्धांतों का भयावह क्षरण है और बहुत बड़ी चिंता का विषय।

वहीं दूसरी ओर पुरुष न केवल परिवार को सिर्फ अपनी आमदनी से चलाने में अक्सर असमर्थ हैं बल्कि गृहकार्य तथा बाकी गैर कमाऊ कामों में उनकी हठीली गैरहिस्सेदारी भी पहले की ही तरह बनी हुई है। वे अपनी काहिली के चलते स्वयं को गरीबी हटाने की मुहिम से भी बचा ले रहे हैं, वह भी बिना कोई अधिकार खोये। सम्पत्ति पर पुरुष का परम्परागत अधिकार उसे वैश्वीकरण तथा भूमि आधिग्रहण की प्रक्रिया में सम्पत्ति बढ़ाने और उसे खर्चने की जो ताकत दे रहा है अधिकांश स्त्रियाँ उससे वंचित हैं।10 किशोर11 द्वारा सुझाये गये स्त्री-सशक्तीकरण के 32 सूचकांकों की सूची में से कुछ को ग्रामीण नेपाल में किये गये एक शोध में परखा गया और परिणाम बताते हैं कि स्त्री के परिवार में रुतबे को यदि छोड़ दें जो इनमें पहले स्थान पर है तो दूसरे स्थान पर शिक्षा व रोजगार के साथ सम्पत्ति में अधिकार भी स्त्री-सशक्तीकरण में बराबर की भूमिका निभाता है।12
संयुक्त राष्ट्र द्वारा समय समय पर की गई विभिन्न अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं और प्रपत्रों की समीक्षा में स्त्रियों के सम्पत्ति व उत्तराधिकार से सम्बन्धित निम्न अधिकारों की पहचान की गई हैः13
-असमानता से मुक्ति
-जीविका एवं आवास की पर्याप्त स्तरीय सुविधा
-आर्थिक स्वाधीनता
-रोजगार का अधिकार
-सम्पत्ति रखने/उस पर दखल, प्रबन्धन व विक्रय का अधिकार
स्त्रियों के लिये संघर्षरत हर व्यक्ति को इन सार्वभौम अधिकारों का बोध होना चाहिये ताकि देश की नीतियों व कानूनों की पुनर्समीक्षा करते वक्त इन्हें चर्चा के केन्द्र में रखा जा सके। आज जब अधिकांश  जनतांत्रिक सरकारें अपने कानूनों व जनकल्याण कार्यक्रमों को स्त्री-पुरुष समानता की कसौटी पर कस रही हैं, अब भी निम्न बाधायें इस राह में खड़ी हैंः
-कई बार राष्ट्र सरकारों के हित इन मार्गदर्शक मानकों से मतभेद रखते हैं
-मात्र कानून बना देने से ही उन पर अमल होना अवश्यम्भावी नहीं होता जब तक कि प्रशासनिक-न्यायिक तंत्र उनके अनुकूल न हो
-सम्पत्ति के लिये वास्तविक संघर्ष सरकार से इतर यानि परिवारों और समुदायों के स्तर पर होते हैं जहाँ परम्परा व रीतिरिवाज संविधान व कानून से अधिक प्रभावी होते हैं। अधिकांश समाजों में स्त्रियों का अपने कानूनी हक जानना तक गवारा नहीं किया जाता, जताना तो दूर की बात है। यह बाधा सभी गरीब देशों में कमोबेष एक जैसी है और जहाँ भी न्यायपालिका ने सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाये हैं, कानूनों में मौजूद अस्पष्टता अथवा विरोधाभास अब भी इस स्वप्न के साकार होने पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं कि विश्व की सभी स्त्रियों को सम्पत्ति के बराबर के अधिकार मिलें।

अब अर्थशास्त्री फिर एक बार यह दावा करने लगे हैं कि ‘गरीबी को रचने वाले व उस पर निर्भर व स्थायी बनते जा रहे आर्थिक ढांचों के विनाश  से ही गरीबी का स्थायी उपचार संभव है न कि गरीबों के लिये अस्थायी कल्याणकारी योजनाओं से।14  लेकिन यह सच तो हम हमेशा से जानते थे। हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद समृद्धि के नये मानकों को हासिल करने की धुन में इस सच को कुछ समय के लिये भुला दिया गया था क्योंकि हमें यह विश्वास दिला दिया गया था कि यह अर्थव्यवस्था अंततः गरीबी को नेस्तनाबूद कर देगी।

दरअसल हमें इस पुराने ‘घिसे पिटे तर्क की ओर बार-बार तब तक लौटना होगा जब तक हम उसे सार्वभौमिक सत्य मान कर उस पर काम शुरू नहीं करते। कार्य व सम्पत्ति का लोकतांत्रिक पुनर्वितरण ही समाज में पांव पसारे बैठी असमता को सदा सर्वदा के लिये हटा सकता है और इसके लिये कोई ‘शाॅर्ट कट नहीं है।

लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in

‘हंडेर’ हरियाणवी छोरी और आधी आबादी की आज़ादी

नवीन रमण 

अनुराधा बेनीवाल की ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ पढ़ी, पढ़ते ही अनुराधा के लिए जो पहला शब्द  ख़्याल में आया वो है ‘हंडेर’। जिसका अर्थ है बिना किसी ख़ास मकसद के घूमना, बल्कि जहाँ घूमना ही मकसद हो। हिंदी के आवारा शब्द के नजदीक। यह शब्द बचपन से आजतक किसी लड़की के लिए इस्तेमाल होते हुए नहीं सुना। बल्कि लड़कों के लिए ही सुना और खुद के लिए भी। बिना मकसद, बिना काम यूं ही जब मन किया, जिधर मन किया। निकल लिए। बिना किसी डर के। बिना किसी से पूछे-बताए। फिर इसके उलट ख़्याल आया कि मेरी बहन ने तो ऐसा कभी नहीं किया। दरअसल किया नहीं कहना चाहिए करने नहीं दिया गया। करने तो दूर की बात है, ऐसा उसे सोचने भी नहीं दिया गया। सोचने से पहले उसे खूब डरा दिया गया। और वह डरा कर कैद कर दी गई एक ऐसी दुनिया में जो पुरुषों ने बनाई नहीं गढ़ी थी। डर की दुनिया। गुलामी की दुनिया। जिसे किसी लड़की ने चुना नहीं हैं। यह उन पर थोप दी गई दुनिया है।‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ पर बात करने से पहले रू-ब-रू कराते हैं आपको अनुराधा बेनीवाल से। जो सोशल मीडिया पर अनुराधा सरोज के नाम से लिखती हैं और अपनी तल्ख़ और बेबाक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं।

अनुराधा बेनीवाल का जन्म हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी गाँव में 1986 में हुआ। इनकी 12वीं तक की अनौपचारिक पढ़ाई घर में हुई। 15 वर्ष की आयु में ये राष्ट्रीय शतरंज प्रतियोगिता की विजेता रहीं। 16 वर्ष की आयु में विश्व शतरंज प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद इन्होंने प्रतिस्पर्धी शतरंज खेल की दुनिया से ख़ुद को अलग कर लिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से अंग्रेजी विषय में बी.ए. (ऑनर्स) करने के बाद एलएलबी की पढ़ाई की, फिर अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. भी किया। इस दौरान ये तमाम खेल-गतिविधियों से कई भूमिकाओं में जुड़ी रहीं। फ़िलहाल ये लंदन में एक जानी-मानी शतरंज कोच हैं और वहाँ कैम्ब्रिज के लिए ख़ुद भी शतरंज खेलती हैं। मिज़ाज से बैक-पैकर अनुराधा अपनी धुमक्कड़ी का आख्यान ‘यायावरी आवारगी’ नामक पुस्तक-श्रृंख्ला में लिख रही हैं। ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ श्रृंख्ला की पहली किताब है।

अनुराधा की यह किताब है मूलतः यात्रा-संस्मरण। पर स्त्री के जीवन में आज़ादी के क्या मायने है,  इस नज़रिए से यह किताब अपने पहले पड़ाव से आगे निकलकर आधी आबादी का जीवंत दस्तावेज बन जाती हैं। अनुराधा अपने जीवन के सफ़र और यात्राओं के ज़रिए बाहर-भीतर की दुनिया से तो रू-ब-रू कराती ही हैं, साथ में हरियाणवी समाज में स्त्री की जकड़बंदियों को कुरेद-कुरेद कर हमें सोचने पर मज़बूर भी करती हैं। वह स्त्री की कंडीशनिंग से लेकर स्त्री की आज़ादी के बहुस्तरीय पाठ भी रचती चलती हैं। स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, देह मुक्ति का विमर्श, सेक्स-एजुकेशन और अरेंज मैरिज आदि विषयों पर अपनी बेबाक राय रखते हुए हमें सोचने पर मजबूर भी करती हैं, ताकि एक गैर-बराबरी के समाज का निर्माण संभव हो सकें। यात्राओं की पाठशाला में हम( पुरुष-समाज) पन्ने-दर-पन्ने सवालों के कटघरे में खड़े होते चले जाते हैं।“दरअसल आजादी मेरा ब्रांड हिन्दी में अपनी किस्म की पहली किताब होने के कारण इसे पढ़ने के लिए अपने कई सहज इलाकों से बाहर आना जरूरी है। मसलन रोहतक के गाँव से निकलकर यूरोप के शहरों की ‘सोलो बैकपैकर्स’ यात्रा पर निकलने के बीच की यात्रा में जो कुछ अनुराधा की जिंदगी में होता है वह सब ही हिन्दी के पाठकों के लिए पर्याप्त झटके देने के लिए काफी है। यायावरी हिन्दी जगत के लिए एक पूरी तरह मर्दाना ‘स्पेस’ है तिसपर एक लड़की सो भी अकेले न केवल इस ‘स्पेस’ में अतिक्रमण करती है वरन बाकायदा इस घोषणापत्र के साथ के साथ करती है कि ये बाहर जाना बेकाम का है, आवारगी है, किसी और की हो न हो मेरी आज़ादी है।”  इस आज़ादी की यात्रा के लिए सबसे अहम् अनुराधा स्त्री का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना मानती हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना स्त्री आज़ाद होने की सोच भी नहीं सकती। ‘अपने पहले कमाए पौंड से मैंने बाजार से इन चीज़ों के अलावा भी कुछ खरीदा-ढेर सारा आत्मविश्वास। आत्मविश्वास। वह पैसों से ख़रीदा या सामाजिक रुतबे पर पला-बढ़ा आत्मविश्वास नहीं था। वह खुद को जानने से आया था। वो कहते हैं न, आजादी ना लेने की चीज़ हैं, ना देने की। छीनी भी तो क्या-आज़ादी, यह तो जीने की चीज़ है।’अनुराधा ने हरियाणवी समाज और यूरोपीय समाज के बीच अकेले घूमते हुए इस आज़ादी को अलग-अलग ढंग से जीया हैं। यह जीया और भोगा हुआ जीवन उन्हें अपने भीतर और बाहर की दुनिया को समझने का मौका देता है और स्त्री आज़ादी में सबसे बड़ी बाधाओं का बोध कराती हैं। अनुराधा के लिए हर यात्रा जीवन-बोध का अभिन्न अंग बन जाती है और स्त्री आज़ादी के आयाम को लगातार  विकसित करती हैं। आर्थिक रूप से स्वतंत्रता स्त्री मुक्ति के लिए सबसे जरूरी माना गया है। सिमोन द बोउवार से लेकर अनुराधा तक ने इस पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। सिमोन द बोउवार अपनी डायरी में लिखती हैं: ‘मैं ब्रह्मांड में भटकने और तैरने की अपेक्षा सीमित किंतु ठोस पकड़ को महत्त्व देती हूं।’  जबकि अनुराधा गतिशील मूल्यों के ग्रहण की प्रक्रिया को अपनी यात्राओं के द्वारा मज़बूती प्रदान करती हैं और यह मानती है कि आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री में ही आत्मविश्वास पैदा हो सकता हैं।

आत्मनिर्भर- हमारी प्रथामिकता नौकरी थोड़े ही होती है, वह तो शादी होती है


प्रभा खेतान का मानना है कि-“मैं दुनिया के जिस किसी कोने में गई हूं, मैंने स्त्री को खोजा है। उसे जानने की चेष्टा की है। उस देश की स्त्री कैसी है? वह कैसे कपड़े पहनती है? उसकी सामाजिक भूमिका का कितना महत्त्व है? क्या स्त्री अधिकारों के प्रति वह सजग है?”  इसी सजग प्रक्रिया में अनुराधा भी स्त्री की प्राथमिकता का भारतीय संदर्भ में मूल्यांकन करती हैं। भारतीय स्त्रियों का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित करने के बज़ाय शादी में भविष्य तलाश करती हैं। बचपन से ही भारतीय समाज में लड़कियों की कंडीशनिंग कर दी जाती है। उन्हें आत्मनिर्भर होना नहीं सीखाया जाता बल्कि परिवार में रहते हुए अच्छी बहन, बेटी और पत्नी धर्म का निर्वाह करना सीखाया जाता है। उनकी प्राथमिकता नौकरी नहीं होती बल्कि शादी और बच्चे होते हैं, उसके बाद समय मिले तो नौकरी होती है। अनुराधा बताती है कि “आज़ादी बड़ी अनोखी-सी चिड़िया है, यह है तो आपकी, लेकिन समय-समय पर इसको दाना डालना होता है। अगर आपने दाना उधार लिया तो चिड़िया भी उधार की हो जाती है। आत्मनिर्भरता के दाने पर पलती है यह, और इसे किसी महंगे या ख़ास दाने की ज़रूरत भी नहीं होती। बस अपना हो, अपने ख़ुद के पसीने से कमाया हुआ कैसा भी दाना। उसी में मस्त रहती है।” हरियाणवी समाज में स्त्रियां अभी भी पुराने ढर्रे पर जीने के लिए मजबूर है। स्कूल और कॉलेज का जब भी रिजल्ट आता है, अख़बारों की हैडलाइन यही होती हैं कि लड़कियों ने इस बार भी बाजी मारी। और जब नौकरियों में देखते हैं तो उनका प्रतिशत बहुत कम होता है और होता भी है तो बहुत सीमित नौकरियों में होता हैं। आज भी स्त्रियों के लिए स्कूल और बैंक की ही नौकरी अच्छी मानी जाती हैं। स्कूल की नौकरी सबसे ज्यादा। आम धारणा यह है कि स्कूल में पढ़ाते हुए स्त्री घर का काम और बच्चों की देखभाल भी अच्छे से कर लेती है। यानी स्त्री काम करते हुए भी अपनी घरेलू भूमिकाओं में पुरुष को सहयोगी के रूप में नहीं पाती बल्कि पुरुष तब भी घर से बाहर के काम के लिए ही होता है और स्त्री घर के काम के लिए। घर और बाहर का यह विभाजन ही स्त्री के शोषण और दमन का बड़ा कारण बनता हैं.


स्वतंत्र कार्य शैली के लिए एक स्वतंत्र माहौल की जरूरत होती है।
जिसमें भारतीय समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। घर और घर से बाहर स्त्री को स्वस्थ माहौल उपलब्ध हो सकें, इसके लिए स्त्री-पुरुष की बराबरी की मानसिकता का होना जरूरी है।शायद ही कोई लड़की ऐसी होगी, जिसके साथ ये सब ना घटा हो। जिसका ज़िक्र अनुराधा बेबाकी से कर रही हैं- “मैं उस चीज के बिना वापस नहीं जाऊंगी! मुझे इस आजादी को अपने खेतों, अपने गाँवों, अपने शहरों में महसूस करना है। मुझे यूं ही निश्चिंत बेफ़िक्र घूमना हैं, रोहतक की गलियों में। मुझे वह चीज विकास नगर की उस गली में छोड़ देनी है, जहाँ वह लड़का मेरी छाती पर हाथ मारकर भाग गया था। सोनीपत बस स्टैंड के उस मोड़ पर छोड़ देनी हैं, जहाँ से गुज़रते वक़्त मुझे गंदे इशारों,टिप्पणियों से नवाज़ा जाता था। दिल्ली की उन बसों में छोड़ देनी है, जहाँ वह आदमी जिप खोलकर मेरे पीछे रगड़ने की कोशिश कर रहा था। उस घर में छोड़ देनी हैं, जहाँ मेरी दोस्त के पिता ने मेरा क़द और वजन नापने के बहाने मेरे पूरे शरीर पर अपना लिजलिजा हाथ फिराया था। उस ट्रेन के स्लीपर कोच में छोड़ देनी है, जहाँ वह आदमी रात को मेरी चादर के नीचे कुछ ढूंढने आ गया था।” और पुरुष समाज की कारस्तानी देखिए कि इतना सब झेलते हुए अगर कोई लड़की इसका विरोध करती है, तो उसे ही चुप करा दिया जाता है या घर की चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है। जिसका परिणाम यह निकलता है कि इस तरह की अमानवीयता और शोषण को चुपचाप सहना उनकी मज़बूरी हो जाती हैं। जो धीरे-धीरे आगे चलकर डर में भी तब्दील होने लगती है।

अनुराधा ने आत्मविश्वास आर्थिक रूप से मज़बूत होकर पाया और साहस की सीख उसने मार्लुस की मां के जरिए पाई । जिन्होंने अपनी बेटी को बलात्कार होने के बाद क्या एतिहात रखे जाने चाहिए इसकी सलाह दी। मार्लुस जब अकेली घर से घूमने निकली तो उनकी मां कहती है-“अपना खूब ख्याल रखना। पागल कुत्ते तो कहीं भी हो सकते हैं, तो अगर रेप हो जाए तो प्रेगनेंसी से बचने के लिए पिल्स अपने साथ रखना। मैंने पहली बार किसी मां को रेप होने के सिलसिले में सलाह देते हुए जाना था। मैंने या तो माँओ को इस बारे में बात करते ही नहीं सुना, या सुना था कि यहां/ वहाँ इस वक़्त सेफ़ नहीं है, बाहर मत जाओ! लेकिन अपनी बेटी को रोकने के बजाय, हादसा होने पर क्या किया जाए- इस बारे में सलाह देना पहली बार सुना था! मार्लुस की माँ कहती है कि, ‘रेप भी एक एक्सीडेंट है जो नहीं होना चाहिए, लेकिन होने पर शर्म की बजाय उस बारे में क्या किया जाए, यह पता होना चाहिए। ऐसी माँ की बेटी कैसे निडर नहीं होगी? यहाँ से मैंने साहस सीखा।” जबकि भारत में उलटा रेप पीड़ित लड़की को गलत नज़रों से देखा जाता है और उसे ही दोषी करार कर दिया जाता है। भारतीय विचार-विमर्श के केंद्र में यह मुद्दा कभी प्रमुखता से नहीं उठाया जाता कि क्यों हम एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं कर पाए है, जिसमें लड़की जब मन चाहे और जहाँ चाहे आ-जा सकें। बल्कि किया हमने इसका उलट है। हमने यहाँ-वहाँ लड़कियों को आने-जाने से रोक दिया है। जबकि इस रोकने से न तो छेड़खानी कम हुई और न बलात्कार कम हुए। परिवार और समाज दोनों  स्त्री के भक्षक होते हुए रक्षक की भूमिका में नज़र आते है, जो कि समझ से परे है।

दरअसल हर समाज ने लड़कियों के लिए अच्छे-बुरे के पैमाने तैयार किए हुए हैं और वो सारे पैमाने पुरुष समाज ने अपनी सुविधा के अनुसार रचे हुए है। जिसमें सबसे बड़ा पैमाना ‘अच्छी’ लड़की और ‘बुरी’ लड़की के भेद का है और यह भेद टिका है उसकी सेक्स इच्छाओं पर। स्त्री यौनिकता पर कंट्रोल के जरिए पितृसत्ता को मजबूत किया जाता है। पितृसत्ता ने पुरुष यौनिकता को सक्रिय और प्रभावी माना है, इसीलिए स्त्री को वस्तु या चीज के रूप में देखा है। फलस्वरूप स्त्री की यौनिकता एक सांस्कृतिक घटना हो गई। जबकि हकीकत में स्त्री-पुरुष के जैविक विभाजन का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह पितृसत्ता की राजनीति थी ताकि कुछ विशिष्ट पुरुषों को स्त्री सुलभ होती रहे। इसका परिणाम यह निकला कि एक ऐसी समाज व्यवस्था निर्मित हुई जिसमें बलात्कार, यौन शोषण और यौन उत्पीड़न एवं आक्रामकता एक आम बात हो। फूको के अनुसार-“अनुशासित देह समर्पित देह है,आधारहीन है। और यह समर्पण केवल पुरुष के प्रति नहीं, बल्कि विशिष्ट संस्थागत नियमों द्वारा स्त्री की देह को यौन संतुष्टि के लिए ‘उत्पादन’ एवं ‘काम’ लायक बनाया जाता है।”  अनुराधा का मानना है कि-“मेरी निजता सिर्फ़ मेरी देह के मुक्त होने भर में नहीं-यह मैंने बहुत जल्द समझ लिया था। वह भी जरूरी हैं, आज भी मानती हूं। लेकिन असली आजादी का बोध उतने भर में सीमित नहीं। देह की आजादी को पाना आसान है। इस लड़ाई से पार पाना अपने वश में हैं; बशर्ते बिगड़ी हुई, ज्यादा-ही-फॉरवर्ड,बदचलन. चरित्रहीन, लूज कैरेक्टर, होर, रंडी- जैसे विशेषणों को हँसकर उड़ाने भर की मानसिक मजबूती हो। आर्थिक आजादी ने काफी हद तक देह को आजाद कर दिया। लेकिन उसको पूरी आजादी अच्छे-बुरे की कंडीशनिंग टूटने से मिली। सिर्फ किसी के साथ सो सकने की आजादी ही नहीं, किसी के साथ नहीं सो सकने की आजादी भी। किसी भी तरह की हिचक और परवाह से आजादी।” और अच्छी लड़की की पूरी अवधारणा उसकी यौन इच्छाओं के दमन के आस-पास रची जाती है। इस विचार के अनुसार- “अच्छी लड़कियां एसेक्सुअल होती हैं, उन्हें न किसी के साथ हमबिस्तर होने का मन करता हैं; ना किसी का हाथ पकड़ने का, न वे किसी के होंठ चूमना चाहती हैं, ना किसी की बाँहों में खो जाना चाहती हैं… ना ही उनके पेट में तितलियाँ उड़ती हैं…और उड़ती भी हैं तो पहले कुल-गोत्र, अच्छी नौकरी, यहाँ तक कि घर-परिवार जैसी चीजें देखकर ही पंख खोलती हैं!” यह भारतीय समाज की आदर्श लड़की के लक्षण निर्धारित कर दिए गए हैं। जो इन्हें लांघती हैं, उसके लिए हर समाज में अलग-अलग विशेषणों की भरमार हैं।“हमें अपने शरीर की भूख को सुलाए रखना बहुत कम उम्र से ही सिखा दिया जाता है, इसलिए इस हद से बाहर निकलना इतना भी आसान नहीं। लेकिन हाँ, उस भूख को पहचानना जरूर सीखा मैंने। उस भूख की इज्जत करना भी मैंने सीखा।” ऐय्याशी सिर्फ़ देह की नहीं होती। उसका संबंध किसी भी तरह के उपभोग की अधिकता या उसके मनमानेपन से है।

लूसी इरिगारे इस संदर्भ में सवाल उठाती है कि- “पितृसत्ता पुरुष-जननेंद्रिय की आक्रामकता को सक्रिय एवं स्वाभाविक मानती है। स्त्री योनि को निष्क्रिय माना जाता हैं। यह वही पुरुषलिंग-केंद्रित यौन विचार व्यवस्था है, जिसके कारण प्रेम के चरम क्षणों में भी पुरुष का स्खलन स्त्री सुख के लिए नहीं, बल्कि पुरुष के अपने आत्म में वापस लौटने की तरह ही माना जाता है। पुरुष का यह आत्म-आलिंगन है। परंतु यौनिकता के प्रसंग में ऐसा दृष्टिकोण स्त्री द्वारा भी यौन-जीवन में सुख एवं आनंद का अधिकार प्राप्त करने पर चर्चा नहीं करता। पुरुष ‘संभोग से समाधि की ओर’ जाता है, मगर स्त्री को तो केवल माध्यम ही बने रहना है।” दरअसल इतरलिंगी यौन व्यवस्था पर आधारित सत्ता के खेल में स्त्री को मुक्ति हासिल करनी होगी। न केवल पुरुष की परपीड़न की वृत्ति से बल्कि स्त्री की स्वयं के प्रति हीनता और दया भाव से भी मुक्ति की जरूरत है। पुरुष की प्रधानता स्त्री की हीनता पर फलती-फूलती है। यौन आक्रामकता को सत्ता की आक्रामकता से मुक्त करना होगा। यौन जीवन में आनंद की प्रधानता होनी चाहिए, सत्ता का खेल नहीं।

दूसरी तरफ हरियाणवी समाज में स्त्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अनुराधा ने अपने अनुभव बताते हुए लिखा है-“मैं जिस समाज में पैदा हुई, पली-बढ़ी, उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी कोई च़ीज नहीं थी। वहाँ किसी घर में कोई संतान पैदा हुई नहीं कि उसे ‘संस्कारी’ और ‘लायक’ बनाने की हर कोशिश उसके माता-पिता,परिवार और रिश्तेदार- सबकी तरफ़ से शुरू हो जाती थी। उसके कोरे दिमाग़ में समाज के क़ायदे-क़ानून और रिवाजों-परंपराओं को पूरा का पूरा उतार देने के सभी जाने-पहचाने तरीक़े आजमाए जाते।” हरियाणवी समाज लड़का-लड़की की बराबरी की कितनी भी दुहाई देता हो, पर सच आज भी गैर-बराबरी का ही है। अनपढ़ और शिक्षित समाज दोनों की सोच और व्यवहार में आज भी भेदभाव उसी तरह मौजूद हैं। आज भी लड़के के होने पर नीम की टहनी टांगी जाती है, थाली बजाई जाती है और लड़की के होने पर यह सब नहीं किया जाता। मैंने इस संदर्भ में अपने कई परिचित शिक्षकों से इस पर सवाल किया तो उन्होंने इस भेदभाव को संस्कार और संस्कृति के नाम पर बस फोलो करना स्वीकार किया। जबकि ‘सच’ उन्हें भी पता है। वह है संपत्ति का वारिस। दूसरी तरफ स्कूल और कॉलेज में आज भी लड़के और लड़कियाँ अलग बैठते हैं। बात करना, प्यार करना आज भी गुनाह माना जाता हैं। ऑनर कीलिंग और भ्रूण हत्या के लिए हरियाणा सबसे ऊपर है।  हरियाणा केवल बदनाम नहीं है हालात आज भी लगभग वैसे ही है। इन सवालों से टकराये बगैर आप गैर-बराबरी के समाज को बदल नहीं सकते। स्कूल और कॉलेज के स्तर पर लिंग समानता और सेक्स एजुकेशन को जब तक शिक्षा का हिस्सा नहीं बनाया जाता, तब तक स्त्री-पुरुष के भेदभाव को खत्म करना संभव नहीं हो सकता।

सेक्स एजुकेशन का नाम सुनते ही भारतीय समाज में उसके विरोध के स्वर तेजी से उभरने लगते हैं। कभी पश्चिमी संस्कृति के नाम पर विरोध होता हैं, कभी संस्कारों के नाम पर। जबकि इनके मूल में छिपा है स्त्री की यौनिकता को कंट्रोल करने का विचार। जिसके ज़रिए स्त्री की गुलामी को पुख्ता किया जाता है। अनुराधा डच देश की शिक्षा में सेक्स एजुकेशन के महत्व को बताते हुए बराबरी के समाज में लड़के-लड़की दोनों की भूमिका को मुख्य रूप से रेखाकिंत करती हैं- “डच स्कूलों में पहली क्लास से बच्चियों और बच्चों को सेक्स एजुकेशन दी जाती है। क्या होता है जब आप किसी को पसंद करते हैं या जब वह आपको गले लगाता है, हग्ग करता है? क्या उन्हें कभी प्यार हुआ है? क्या होता है प्यार?  प्यार में होते हैं तो कैसा लगता है? कब किसी को छू लेने का मन करता है? स्कूल में जीवन के इन सब जरूरी सवालों पर स्वस्थ बातचीत होती है। उम्र के साथ शरीर के बदलावों के बारे में बताया जाता है। क्यों ख़ुद को छू लेने का मन करता है? सेक्स क्या होता है, किस उम्र में किया जाना चाहिए? क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?  किसी का छुआ आपको अच्छा न लगे तो क्या करना चाहिए?  किससे बात करनी चाहिए? कोई अच्छा लगना बंद हो जाए तो उसको कैसे बताया जाए?  एक-दूसरे के ब्रेक-अप के समय कैसे मदद करनी चाहिए। इन सबके बारे में क्लास टीचर अपने स्टुडेंट के साथ बात करती हैं। दुनिया को कामसूत्र देने वाला समाज आज इस सब सवालों से डरने लगा हैं। सेक्स को दबाने की बजाय अगर उसे कायदे से पढ़ाया जाए, बताया  और सिखाया जाए तो निश्चित रूप से समाज की मानसिकता बदलेगी। स्वस्थ होगी। जानकर ही किसी चीज से ऊपर उठा जा सकता है।” हम सभी को इन सवालों पर गंभीरता से विचार-विमर्श की जरूरत है। संवाद के जरिए ही गैर-बराबरी का समाज निर्मित किया जा सकता है।

जातीयकरण,लैंगिकीकरण एवं यौनिकता, स्त्री को दमन की इन तीनों प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इस दमन से मुक्ति के बिना स्त्री मुक्ति का सपना अधूरा है। भारतीय समाज में पितृसत्ता को मजबूत करने वाली संस्था विवाह संस्था है। इस अंरेज मैरिज पर अनुराधा अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखती है कि- “सोचिए, अगर इस अरेंज मैरिज का कोई कांसेप्ट ही नहीं हो, एकदम से खत्म हो जाए यह व्यवस्था तो ?  तब तो यह गांरटी ही नहीं होगी कि सबकी शादी होगी ही होगी। मतलब, आपको खुद शादी के लिए इस लायक बनना होगा कि कोई आपको पसंद करे। वे सभी गुण आपको अपने अंदर पैदा करने होंगे जिससे कि कोई आपको अपना जीवन-साथी बनाना चाहे। इससे क्या यह नहीं होगा कि लड़के-लड़कियाँ आपस में बातें करना सीखेंगे, एक-दूसरे को एक-दूसरे के लायक बनाना सीखेंगे? अभी जैसा नहीं तो नहीं ही हो सकेगा कि लड़के ने पूरी उम्र किसी लड़की से बात ही न की हो, या राह चलते सिर्फ़ कमेंट ही पास किए हों, किसी लड़की लड़की को दोस्त तक न बनाया हो, या किसी लड़की का हाथ पकड़ने तक का शऊर ना हो उसे, ना ही किसी से प्रेम करना सीखा हो उसने, फिर भी वह शादी को लेकर बेफ़िक्र रहे। क्योंकि उसे पता है कि वह जैसे ही कोई नौकरी पा लेगा या उसके घर में ठीक-ठाक इतनी ज़मीन है कि उसको बीवी कैसे भी मिल जाएगी। आखिर एक लड़के को एक लड़की के साथ बेहतर जीवन जीने की तैयारी पहले से क्यों नहीं करनी चाहिए? ठीक इसी तरह उसी समाज में एक लड़की भी है कहीं जिसने कभी किसी लड़के से बात ही नहीं की है, उसने न किसी को दोस्त बनाया है ना ही उसने घर बसाने का कोई ढंग-ढर्रा सीखा है, ना खुद घर के इंतज़ामात करने की कोई कोशिश की है, न अपने घर के सब बिल भरने का सलीका है। क्योंकि उसको भी पता है कि ठीक समय आने पर उसके माँ-बाप या रिश्तेदार उसको एक बसा-बसाया घर दिलवा ही देंगे। लेकिन अगर उसे इस बात की गारंटी नहीं दी गई होती, अगर उसको बना-बनाया घर या किसी घर बनाने वाले के साथ ब्याहने का प्रॉमिस नहीं किया गया होता तो शायद वह उस दिशा में ख़ुद मेहनत करती। आत्मनिर्भर होती और निर्णय लेने की क्षमता भी उसमें बेहतर होती।” यह एक बेहतर रास्ता हो सकता है, जिसे पारंपरिक और क्रांतिकारी रास्तों के बीच का सहज एवं स्वाभाविक रास्ता माना जा सकता है और अरेंज मैरिज के रूढ़ पक्ष से आगे बढ़ते हुए उसे प्रगतिशील बनाया जा सके। ताकि लड़का और लड़की दोनों एक-दूसरे के महत्त्व को समझते हुए अपनी-अपनी जिम्मेदारी का एहसास कर सकें। यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए भी फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत बराबरी की मानसिकता से लैस नागरिक ही कर सकते है।
ये तमाम सवाल केवल अनुराधा के नहीं है बल्कि पूरे भारत की आधी आबादी के हैं। और आज़ादी का सपना देखना और उसके लिए प्रयास करना आवश्यक है। जिस कड़ी में अनुराधा लिखती है- “मैं आजाद देश की आज़ाद नागरिक होकर भी खुद को आज़ाद महसूस क्यों नहीं कर रही थी?क्यों नहीं चलने देते तुम मुझे? क्यों मुझे रह-रहकर नज़रों से नंगा करते हो? क्या तुम्हें मैं अकेली चलती नहीं सुहाती? मेरे महान देश के महान नारी पूजको, जवाब दो। मेरी महान संस्कृति के रखवालों जवाब दो!क्यों इतना मुश्किल है एक लड़की का अकेले घर से निकलकर चल पाना?जो समाज एक लड़की को अकेले सड़क पर चलना बर्दाश्त नहीं कर सकता, वह समाज सड़ चुका है।वह कल्चर जो एक अकेली लड़की को सुरक्षित महसूस नहीं करा सकती, वह गोबर कल्चर है। उस पर तुम कितने ही सोने-चाँदी के वर्क चढ़ाओ, उसकी बास नहीं रोक आओगे, बल्कि और धँसोगे।” संस्कृति गतिशील विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। संस्कृति को लेकर भावुक होने से बचना चाहिए। परिपक्वता ही संस्कृति को सड़ने से बचाती है और विकसित करती है।

अनुराधा का संदेश तमाम उन लड़कियों के लिए जो आज़ादी का सपना देखती हैं और उसे पूरा करना चाहती हैं। “मेरी यात्रा अभी शुरू हुई है और  तुम्हारी भी। तुम चलना।… दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी।…यह दुनिया तेरे लिए बनी है, इसे देखना जरूर। इसे जानना, इसे जीना।…अपने गांव में नहीं चल पा रही हो तो अपने शहर में चलना। अपने शहर में नहीं चल चल पा रही हो तो अपने देश में चलना। अपना देश भी मुश्किल करता है चलना तो यह दुनिया भी तेरी ही है, अपनी दुनिया में चलना। लेकिन तुम चलना। तुम आज़ाद बेफ़िक्र,बेपरवाह,बेकाम,बेहया होकर चलना। तुम अपने दुपट्टे जलाकर, अपनी ब्रा साइड से निकाल कर, खुले फ्रॉक पहनकर चलना। तुम चलना जरूर!” मेरा दिल और दिमाग तो यह कहता है कि कम-से-कम हरियाणा की सभी लड़के-लड़कियों को यह किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ जरूर पढ़नी चाहिए, पढ़वाई जानी चाहिए। ख़ासकर लड़कियों को तो जरूर पढ़नी चाहिए। दरअसल पढ़नी तो यह दुनिया की सभी लड़कियों को चाहिए। यह किताब राजकमल प्रकाशन से इसी साल प्रकाशित हुई है।
सोशल मीडिया सक्रिय नवीन रमण लागातार अपनी संवेदनशील टिपण्णी से  एक  हस्तक्षेप करते हैं . हरियाणा की खाप पंचायती मनोवृत्ति पर इनके असरकारी पोस्ट ध्यान खींचते रहते हैं . खाप-मानसिकता  को बेचैन करने वाले इनके प्रेम -विषयक पोस्ट भी उल्लेखनीय होते हैं  संपर्क : naveen21.com@gmail.com

रमाशंकर विद्रोही की कविताएं

(  जे एन यू आजकल आंदोलित है , जे एन यू आजकल उद्द्वेलित है .  आइये इस माहौल में ही जे एन यू के प्रतीक से बन गये रमाशंकर विद्रोही की कविताएं पढ़ें , प्रस्तुति युवा आलोचक रामनरेश राम की . ) 

दमन के इतिहास और इतिहास के दमन की पहचान करने वाले कवि रमाशंकर विद्रोही की कवितायेँ गुलामों के दमन और दुःख का उदात्तीकरण नहीं करती हैं. सभ्यता समीक्षा का कार्यभार बिना द्वंद्वात्मक पद्धति के मुकम्मल नहीं हो सकता. इसके लिए इतिहासबोध का होना अनिवार्य है. और यह इतिहास बोध उनकी कविताओं में हर जगह मौजूद है. विद्रोही की कवितायेँ वर्तमान में पसरे स्त्रियों और गुलामों के दमन की ही शिनाख्त नहीं करती हैं बल्कि अतीत में हुए अन्याय और अन्याय की पीठ पर खड़ी हुई सभ्यताओं की जाँच करती हैं. इसीलिए ये सभ्यता समीक्षा की कवितायेँ हो जाती हैं. अतीत में हुए अन्याय का बदला चुकाए बिना उनके बदलाव का अभियान पूरा नहीं होता, उनके सपनों की क्रांति पूरी नहीं होती. अगर उनकी कविताओं को ध्यान से पढ़ा जाय तो यह मिलता है कि प्रायः हर कविता में स्त्री को एक खास जगह हाशिल है. इसलिए विद्रोही का प्रवक्ता न्याय के कटघरे में खड़ा होकर मोहन जोदड़ो के तालाब की उस आखिरी सीढ़ी से बोल रहा है जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है.- 


मैं साइमन
न्याय के कटघरे में खड़ा हूँ
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें!
मैं वहां से बोल रहा हूँ
जहाँ मोहन जोदड़ो के तालाब की आखिरी सीढ़ी है
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी है.
इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश
आप को बेबिलोनिया में भी मिल जाएगी
और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ
मेसोपोटामिया में भी.
मैं सोचता हूँ और बारहा सोचता हूँ
कि आखिर क्या बात है कि
प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर
एक औरत की जली हुई लाश मिलती है
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ मिलती हैं
जिनका सिलसिला
सिथिया की चट्टानों से लेकर बंगाल के मैंदानों तक
और सवाना के जंगलों से लेकर कान्हा के वनों तक चला जाता है.

विद्रोही की कविता में जो आग है जो बेचैनी है वह अपने पुरखों को भी मुक्ति दिलाने के उत्तरदायित्वबोध के कारण है. वह वर्तमान को सुन्दर बनाने के लिए अतीत को विस्मृत कर दिए जाने की पद्धति का निषेध करते हैं. अपने और अपने पुरखों के साथ हुए अन्याय की स्मृति की निरंतरता ही बदलाव के लिए अनिवार्य युद्ध की निरंतरता में बदल जाती है. वर्तमान का हाशिल उन्हें अराजक होने से बचा लेता है और और अधिक व्यवस्थित विद्रोह की तैयारी में बदल जाता है.-
एक औरत जो माँ हो सकती है
बहिन हो सकती है
बीवी हो सकती है
बेटी हो सकती है
मैं कहता हूँ
तुम हट जाओ मेरे सामने से
मेरा खून कलकला रहा है
मेरा कलेजा सुलग रहा है
मेरी देह जल रही है
मेरी माँ को, मेरी बहिन को, मेरी बीवी को
मेरी बेटी को मारा गया है
मेरी पुरखिने आसमान में आर्तनाद कर रही हैं.
मैं इस औरत की जली हुई लाश पर
सर पटक कर जान दे देता अगर
मेरे एक बेटी न होती तो…
और बेटी है
कि कहती है
कि पापा तुम बेवजह ही हम
लड़कियों के बारे में इतने भावुक होते हो!
हम लड़कियां तो लकड़ियाँ होती है
जो बड़ी होने पर चूल्हे में लगा दी जाती हैं.

उनकी एक कविता है- औरतें शीर्षक से. यह कविता सभ्ताओं में किये गए महिलाओं के खिलाफ हिंसा को चिन्हित करती है. यहाँ इस बात को देखा जा सकता है कि किस तरह उनकी वर्गीय दृष्टि महिलाओं के बहुस्तरीय दमन को रेखांकित करती है. स्थापित न्याय व्यवस्था के खिलाफ सच्ची न्याय व्यवस्था कायम कर अतीत में हुए हिंसक दमन का फैसला करने का साहस करती है. 

कुछ औरतों ने
अपनी इच्छा से
कुएं में कूदकर जान दी थीं,
ऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है.
और कुछ औरतें
चिता में जलकर मरी थीं,
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा है.
मैं कवि हूँ
कर्ता हूँ
क्या जल्दी है मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित
दोनों को एक ही साथ
औरतों की अदालत में तलब कर दूंगा
और बीच की सारी अदालतों को
मंसूख कर दूंगा.
मैं उन दावों को भी मंसूखकर दूंगा
जिन्हें श्रीमानों ने
औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किया है.
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं.
मैं उन वसीयतों को ख़ारिज कर दूंगा,
जिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम की होंगी.

मैं उन औरतों को
जो कुएं में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं,
फिर से जिन्दा करूँगा
और उनके बयानात को
दुबारा कलमबंद करूँगा
कि कहीं कुछ छुट तो नहीं गया!
कि कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया!
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई!
क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूँ
जो अपने एक बित्ते के आँगन में
अपनी सात बित्ते की देह को
ता-जिंदगी समोए रही और
कभी भूलकर बाहर की तरफ झाँका भी नहीं.
और जब वह बाहर निकली तो
औरत नहीं उसकी लाश निकली .
जो खुले में पसर गयी है,
माँ मेदिनी की तरह.
एक औरत की लाश धरती माता
की तरह होती है दोस्तों !
जो खुले में पसर जाती है,
थानों से लेकर अदालतों तक.
मैं देख रहा हूँ कि
जुल्म के सारे सुबूतों को मिटाया जा रहा है.
चन्दन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित,
और तमगों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक,
महाराज की जय बोल रहे हैं.
वे महाराज जो मर चुके हैं,
और महा रानियाँ सती होने की तैयारियां कर रही हैं.
और जब महारानियाँ नहीं रहेंगीं,
तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं.
मुझे महारानियों से ज्यादा चिंता
नौकरानियों की होती है,
जिनके पति जिन्दा हैं और
बेचारे रो रहे हैं.
कितना ख़राब लगता है एक औरत को
अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना,
जबकि मर्दों को
रोती हुई औरतों को मारना भी
ख़राब नहीं लगता.
औरतें रोती जाती हैं,
मरद मारते जाते हैं.
औरतें और जोर से रोती हैं,
मरद और जोर से मारते हैं.
औरतें खूब जोर से रोती हैं,
मरद इतने जोर से मारते हैं कि
वे मर जाती हैं.
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी,
जिसे सबसे पहले जलाया गया,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी रही होगी
मेरी माँ रही होगी.
लेकिन मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी औरत कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जायेगा,
मैं नहीं जानता,
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी,
और  मैं ये नहीं होने दूंगा.
सम्पर्क : naynishnaresh@gmail.com

पुष्पेन्द्र फाल्गुन की कवितायें

माँ

जो जानती है हमारे विषय में वह सब

जो हम नहीं जान पाते कभी

जो हमें दे सकती है वह सब

जिसके आभाव में स्वयम वह

कलपती रही है ता-उम्र

जो सदा हमें छिपाने को तैयार

हम चाहें तो भी, न चाहे तो भी

जिसकी उंगलियाँ जानती हैं बुनना

जिसकी आँखें जानती है डूब जाना

जिसके स्वर में शैली और गुनगुनाहट हो

जो हमेशा चादरों की बात करे

पिता

उन्हें नहीं मालूम

उनकी किस उत्तेजना में बीज था

वे घबराते हैं

यह जानकार कि काबिलियत

उनके ही अस्तबल का घोड़ा है

संतति को लायक बनाने के लिए

सारी तैयारियां कर चुके हैं वे

और यह सोचकर ही

खुश हो लेते हैं कि उनके बच्चे

नहीं बंधना चाहते हैं उस रस्सी से

कि जिससे बंधते आये हैं वे

और उनके पूर्वज

विरासत में लेकिन

बच्चों के लिए

वे छोड़ जाते हैं

कई-कई मन रस्सियाँ

स्त्री

अपने स्तन

और योनि की वजह

जिसे सहना पड़े

लांछन बार-बार

पुरुष

असमंजस का शिकार

बार-बार

फिर भी निर्णय के सूत्र पर

उसका ही अधिकार

पुत्री

जिसे देख

पिता की आँखें सिकुड़ती रहें

भय और चिंता से

प्रेमिका

जो कहानियों के लिए जरूरी है

जो हंसकर उद्घाटित करती है कविता

जो हमेशा चाहती है कि कोई उसे हमेशा चाहे

जो देना चाहती है आकुलता को एक नया अर्थ

प्रेमिका सिर्फ स्त्री ही हो सकती है

नदी

जो बहना जानती हो

जो बहाना जानती हो

जो डूबना जानती हो

जो डुबाना जानती हो

जिसमें इतनी सहिष्णुता हो कि

कोई भी उसके किनार बैठ कर फारिग हो सके

कवि

जो सूर्य से ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश के इतर भी कुछ पाता हो

जो चाहता हो कि पक्षी भी उड़े गगन में पंख हिलाए बिना

जो बिखरा पाता है खुद को अपने आस-पास

जो हमेशा पीना चाहता है गिलास की अंतिम बूँद

जो जानता है कि चाँद

दूज से पूर्णिमा तक और पूर्णिमा से अमावस का सफ़र

करता है नियमित

फिर भी हठ, आग्रह, आन्दोलन करे कि

चाँद की यात्रा

अनियमित की जाए

जो कविताएं लिखे ही नहीं

जिए भी

कवि और संपादक पुष्पेन्द्र फाल्गुन से संपर्क : pushpendrafalgoun@gmail.com

‘आपहुदरी’: ‘अपने शर्तों पर जीने की आत्मकथा’

कुमारी ज्योति गुप्ता


कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com

‘आपहुदरी’ रमणिका गुप्ता की आत्मकथा की दूसरी कड़ी है। पुस्तक का  शीर्षक ही  है, ‘आपहुदरी एक जिद्दी  लड़की की आत्मकथा।’ यानी यह एक ऐसी लड़की की आत्मकथा , है जिसमें उसकी अपनी इच्छा का महत्त्व है जो अपनी शर्तों पर जीना चाहती है या यूं कहे कि वह स्वेच्छाचारी है। आत्मकथा में वे इस बात को स्वीकार भी करती हैं और कहती हैं ‘‘मैं औरत के लिए स्वछंद शब्द को स्वतंत्र से बेहतर मानती हूँ, हालांकि भाषाविद् स्वच्छंदता को हेय मानते हैं। उनके ऐसा मानने से क्या? मैं स्वच्छंद होना श्रेयस्कर समझती हूँ चूँकि इसमें छद्म नहीं है, दम्भ भी नहीं है।’’1 अतः यह एक ऐसी स्त्री की आत्मकथा है जो अपनी इच्छानुसार आचरण करने का साहस रखती है। अपने निर्णय पर कायम रहने तथा उसका परिणाम भोगने को भी तैयार दिखती है।

रमणिका गुप्ता एक ऐसी लेखिका, सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकता हैं,  जो तयश शुदा मापदंड के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। हर उस चैखट को पार करती हैं जो स्त्रियों के लिए निर्धारित है तथा हर रुढ़ परंपरा के खिलाफ स्वयं को खड़ा करती हैं। सामंती परिवारों में स्त्रियों के लिए बड़े कायदे होते हैं। औरतें उन नियमों का पालन करने में ही अपना कर्तव्य समझती हैं। इतना ही नहीं पत्नियों द्वारा अपने पति का दूसरा ब्याह करके ले जाने की प्रथा सामंती परिवारों में आम थी, खासकर रियासतों में।

आत्मकथा में ऐसे कई प्रसंग का चित्रण है लेकिन रमणिका गुप्ता उन मान्यताओं के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं एक प्रसंग का ज़िक्र  इस प्रकार है ‘‘सिर ढ़क कर चलो।’’मां ने घर से बाहर कदम रखते ही कहा।‘‘नहीं ढ़कूंगी सिर! क्यों ढ़कूं ? क्या लड़के सिर ढ़ककर चलते हैं ? रवि को क्यों नहीं कहती सिर ढ़कने को ? मैं कोई उससे कम हूं क्या ? नाना जी की हवेली और क्लब में इतनी मेमें आती हैं, वे ‘चुन्नी’ (दुपट्टा) नहीं  ओढ़तीं। मैं क्यों न उनकी तरह बिना दुपट्टा ओढ़े चल सकती ?’’
यह अच्छे घर की लड़कियों का रिवाज़ नहीं है।’’मां मुझे समझाते हुए कहती। ‘‘मुझे नहीं चाहिए अच्छे घर के रिवाज़। मैं नहीं बनूंगी अच्छे घर की लड़की। यह सब पुरानी बातें हैं । मैं नहीं मानूंगी कोई पुरानी बात। मैं अपना ही रिवायत़ चलाउंगी खुद अपने आप।’’2 अतः यह जानते हुए भी कि सामंती परिवारों में लड़कियां जवाब नहीं देती,विरोध करना तो दूर की बात है। रमणिका गुप्ता अपनी बात भी कहती हैं और पुरानी रुढ़ि परंपरा के खिलाफ विद्रोह भी करती हैं।

इस आत्मकथा में कई पहलू खुल कर सामने आए हैं चूंकि आत्मकथा एक ऐसी विधा है जो सच की कसौटी पर कसी जाती है। सच कहने का अपना तरीका होता है। इस आत्मकथा का सच हिम्मत के साथ कहा गया सच है। रमणिका गुप्ता ने बिना किसी लाग लपेट के सब कुछ स्पष्ट  कह दिया है इसलिए हम कह सकते हैं कि इस आत्मकथा का जो सच है वह नितांत निजी है,  जिसे लेखिका सामाजिक बनाना चाहती हैं। रमणिका गुप्ता ने अपने बचपन की कुछ ऐसी घटनाओं का ज़िक्र किया है जो नितांत निजी है,  क्यांकि वह यौन-संबंधों से जुड़ी है और हमारे समाज में यौन संबंधों की बात करना वर्जित है। हालांकि सामंती परिवारों में लड़कियों का यौन शोषण  कोई नई बात नहीं लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में औरत की विडम्बना यह है कि यौन शोषण और बलात्कार की शिकार  तो वे होती हैं और चुप रहने की नसीहत भी उन्हें ही दी जाती है। किसी लड़की को जब कोई  बेपर्दा करता है तो उसके परिवार वाले उसे चुप रहने की सलाह देते हैं। भारतीय समाज में शुचिता शब्द का इतना महत्त्व है कि जन्म से ही लड़की के ज़हन में इसे कूट-कूट कर भर दिया जाता है इसलिए अपने साथ हुए बलात्कार को भी लड़की खुलकर बता नहीं पाती क्योंकि उसे अपनी नहीं अपने परिवार की चिंता होती है। शुचिता  से संबंधित जो डर है वह उसे कुछ भी कहने से रोकता है। लेखिका कहती हैं ‘ शुचिता भंग होने का दंश , अपराध बनकर जीवन भर कसकता है और इसी के कारण औरत जन्म-जन्मांतर तक अपरपधिनी, बेवफा, विश ्वासघातिनी और छिनाल कहलाती है। अगर औरत इसकी निर्रथकता पहले ही समझ जाए तो शायद हीन ग्रंथि से ग्रसित होने से बच सकती है।’’हमारे यहां तो विडम्बना यह है कि पीड़िता अपने को ही दोषी मान बैठती है। इसका कारण हमारी सामाजिक संरचना है। इस आत्मकथा की विशेषता  यह है कि यहां पीड़िता अपने को दोषी नहीं मानती और समय आने पर इसका खुलकर विरोध भी करती है। परिवार के डर से वह मास्टर की हरकतों का खुलासा पहले नहीं कर पाती लेकिन यही चीज जब लज्या  के साथ दुहराई  जाती है तोउसके सब्र का बांध टूट जाता है और वह कहती हैं ‘‘आप तो मुझपर विशवास  नहीं करते थे,पर आपकी आंख तले यह हमारा शोषण करता रहा और अब लज्या का कर रहा है। मुझे भी ब्लैकमेल कर रहा है अब या तो यह मास्टर घर में रहेगा या मैं रहूंगी।’’4 वर्तमान समाज में लड़कियों के साथ जो भी हो रहा है उसका कारण उनका चुप रहना ही हैइस आत्मकथा में लेखिका के संबंध बहुतों से हुए इसकी बेबाक स्वीकारोक्ति भी इसमें है। नई पीढी  को इससे यह सीखना चाहिए कि अपने खिलाफ हो रहे गलत आचरण का विराध किया जाए और हर लड़की को ऐसा करना भी चाहिए।

इस आत्मकथा में रमणिका गुप्ता ने हर जगह अपना पक्ष  बिल्कुल साफ-साफ प्रस्तुत किया है। अपनी श र्तों पर जीने की जिद्द उनकी है उसका परिणाम भी उन्होंने ही भोगा। श ादी के पहले ही अपने होने वाले पति के सामने अपना पक्ष  साफ रखते हुए वे कहती हैं ‘‘मैं न तो पर्दा करूंगी न किसी का जुल्म सहूंगी। मैं सबको आदर दूंगी,पर मेरा भी आदर हो। पर्दा या छूआ-छूत या घर वालों के सामने तुमसे अलग रहना, ये तो मुझसे न होगा।’’5 अतः अपने होने वाले पति के सामने न केवल अपनी बात रखती हैं बल्कि अपने अतीत का खुलासा भी कर देती हैं। इतनी शिद्दत  से सब कुछ कहने का साहस भी बहुत कम लोगों में होता है। यह आत्मकथा कहीं से अपना महिमामंडन नहीं करती बल्कि सबकी पोल खोलते हुए अपने को भी कटघरे में खड़ा करती हैं। कहीं कुछ भी छिपाने की प्रवृत्ति उनमें नहीं दिखती क्योंकि छिपाने को वे स्त्री की परतंत्रता मानती हैं और कहती हैं‘‘गोपनीयता ही स्त्री की परतंत्रता का सबस बड़़ा औज़ार है। यौन की गोपनीयता न सिर्फ स्त्री के लिए घातक है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। यही अपराधों को जन्म देती है। न रिश्तों  में छिपाव होंगे, न कोई ब्लैकमेल करेगा।’’6 एक आत्मकथाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है किवह अपने लेखन के प्रति ईमानदार रहे क्योंकि यहां कल्पना और झूठ की कोई गुंजाइश  नहीं होती। यह आत्मकथा इस बात पर खरी उतरती है। आपसी रिश्ता हो, सामाजिक या राजनीतिक मामला हो, हर जगह रमणिका जी ने अपना स्टैण्ड रखा है। रिश्ता  है तो स्वीकारा है नहीं है तो फटकारा भी है। यह स्वेच्छा से जीने वाली स्त्री की आत्मकथा है जिन्होंने परिणाम को ध्यान में रखकर कोई काम नहीं किया। सचमुच यह एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा है।

संदर्भ-सूची

1. गुप्ता रमणिका – आपहुदरी , संस्करण -2016 , सामयिक प्रकाश न, नई दिल्ली -110002 , पृ0 सं0 -448

2. वही  … पृ0 सं0 -33

3. वही  … पृ0 सं0 -19

4. वही  … पृ0 सं0 -300

5. वही  … पृ0 सं0 -210

6. वही  … पृ0 सं0-20

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस

बहुजन सांस्कृतिक आगाज : महिषासुर शहादत दिवस
( चिंतक और लेखक प्रेमकुमार मणि से बातचीत, जिन्होंने ‘ किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन’ लेख लिखा.’ यह लेख महिषासुर शहादत दिवस मनाने का प्रेरणास्रोत रहा, उत्तर भारत में सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रधार. महिषासुर शहादत, दुर्गा के अपमान, संसद में हंगामा आदि विषयों पर उनसे स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन की बातचीत
Cultural claims of Bahujans : Celebrating ‘Mahishasura martyrdom day’.
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मैं जनता के संघर्षों के गायक हूँ : संभाजी भगत

‘ओ हिटलर के  साथी’ जैसे मशहूर गीत के रचनाकार और गायक  तथा  ‘शिवाजी अंडरग्राउंड इन भीम नगर मोहल्ला ‘ के नाटककार संभाजी भगत से बातचीत. वे सत्ता के दमन , जनता के संघर्ष और जे एन यू पर दक्षिणपंथी हमले के साथ -साथ लोक और जनगीतों पर बात कर रहे हैं स्त्रीकाल के  संपादक संजीव चंदन के साथ
संभा जी ने  ‘नेशनल फिल्म अवार्ड’ विजेता फिल्म ‘कोर्ट ‘ में भी गीत संगीत दिये हैं .

महिलाओं दलितों के खिलाफ है इनका राष्ट्रवाद : अपराजिता राजा

जे एन यू पर सरकार और दक्षिणपंथी जमातों के हमले के दौरान बी जे पी के लोगों और हिंदूवादी जमातों के द्वरा सबसे ज्यादा जिन लोगों पर हमले किये गये उनमें से एक है अपराजिता राजा . सोशल मीडिया पर उसे और  उसके  परिवार  को  खूब  गालियाँ दी गई. अपराजिता इस वीडियो में राष्ट्रवाद , जेंडर  और जाति को स्पष्ट करते हुए रोहित वेमुला, सोनी सोरी और जे एन यू के लिए एकजूटता का  आह्वान कर रही है . जरूर देखें