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स्त्री, आस्था और धर्म

सविता खान 


इस आधुनिक राष्ट्र-राज्य में आधुनिकता और आधुनिक परम्पाओं, (परम्पराओं नहीं) के बीच जंग का एक बेहतरीन नमूना अभी हाल ही में  स्त्रियों  के शनि मंदिर प्रवेश सम्बन्धी विवाद के तौर पर सामने आया।  वेदांत दर्शन में किसी भी वैचारिक टकराव के निपटारे के लिए तीन तरीके सुझाये गए: वाद, विवाद और वितंडा। इस टकराहट में विवाद हुआ, वितंडा हुआ पर वाद की सम्भावना ही नहीं बनी और यह हमारे नव-न्याय की परंपरा को रचने वाले देश, अमर्त्य सेन की आर्ग्यूमेंटीटिव इंडियंस की साँचे में नहीं दिखी। मसले कुछ और भी रोचक बनेंगे जब कुछ मूल प्रश्नों की तरफ गौर किया जाए, मसलन शनि देव कौन हैं, क्या वह सचमुच न्याय के देव हैं जैसा कि पुराणों में वर्णित है और यदि वे हैं तो फिर न्याय की परंपरा क्या है? दूसरा की क्या आस्था और धर्म किसी मंदिर से बंध सकते हैं भले ही वह मंदिर न्याय के देव का क्यों न हो? तीसरा कि क्या स्त्रियों  का शनि- मंदिर प्रवेश व निषेध भारत के हर प्रदेश का एक सार्वभौमिक सत्य है तो फिर भारत के अन्य क्षेत्रों में स्त्रियां उन्हें कैसे  पूजतीं हैं, देश की राजधानी  दिल्ली  के हर चौक-चौराहे पर भगवान शनि, चंद सिक्कों के व्ययवसाय के लिए क्यों धडल्ले  से इस्तेमाल किये जाते हैं उन्हीं महिलाओं द्वारा, बच्चों द्वारा जो रोटी को हर रोज तरसते हैं, क्या यही धर्म है इस नए राष्ट्र-राज्य का कि मंदिर प्रवेश तो हो पर महिलायें और बच्चे आज़ादी के सत्तर साल बाद भी भीख की रोटी खाएं ? धिक्कार है ऐसे रैशनल पर जो न तो भूख की चुनौती से निपट पायी और ना ही आस्था को संदर्भित कर सकी।

मुद्दे और भी हैं कि जिस प्रदेश में यह ‘क्रांति‘ किसी भूमाता ब्रिगेड( जो मंदिर प्रवेश करते-करते ही तीन टुकड़ों में बंट गयी, इसके तीन कोर सदस्यों ने अपने प्रेजिडेंट तृप्ति देसाई के ‘ऑटोक्रॅटिक’ व्यवहार के विरोध में भूमाता स्वाभिमानी संगठन की घोषणा कर दी) द्वारा शुरू की गयी उसका बैकग्राउंड क्या था? क्या इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध रेशनलिस्ट दाभोलकर द्वारा सं 2000 ई में शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा था, क्या हमारा आधुनिकता से जन्मा ‘रैशनल’ महिलाओं के लिए यही रोडमैप तैयार किये बैठा है,  जिसमें राज्य को इस ‘आंदोलन’ को ट्वीट द्वारा समर्थन (मुख्यमंत्री फडणवीस की समर्थन ट्वीट) और कानून और व्यवस्था के तहत उन्हीं महिलाओं को पुलिस द्वारा जबरन रोके जाने के मायाजाल में फंसा रहेगा? और भी रोचक सन्दर्भ हैं इसके, कमोबेश इसी समय एक शक्तिशाली दलित महिला नेता जब मंदिर प्रवेश को लेकर भीषण मानवाधिकार हनन का रोना संसद में रो रही थीं तो दूसरी दलित/पिछड़ा महिला नेता जो उसी प्रदेश से सम्बन्ध रखतीं हैं जहाँ यह वितंडा खड़ा किया जा रहा था, खुलेआम परंपरा को बचाने की आपाधापी में महिला मंदिर प्रवेश के खिलाफत में उतर  आयीं, यहाँ महिला, मंदिर और सत्ता का एक ऐसा कॉकटेल बना जिसमें अधिकार, आस्था और सशक्तिकरण अपने वैलिडिटी की नयी परंपरा चुनते नज़र आये जो अब लोक नहीं राज्य तय करेगा।

 क्या लोक की सत्ता जिसका जन-आंदोलन से काफी गहरा और सत्यापित रिश्ता है इस नौटंकी के बीच कहीं बहुत बुरी तरह से मात खा गयी? क्या यह प्रकरण ओरवेल लिखित एनिमल फार्म के आखिरी दृश्य की तरह प्रतीत हुई , जहाँ चेहरों को पहचानना मुश्किल हो गया कि आखिर स्त्री के मुद्दे क्या और उसके संरक्षक कौन।  इस सबके बीच द हिन्दू अखबार के अनुसार आंध्र प्रदेश के एरदानुर गाँव में. २०१३ ई में  सबसे बड़े शनि मूर्ति (गिनीज़ वर्ल्ड बुक) की  स्थापना करते वक़्त उसके संस्थापक ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह का शनि के इर्द-गिर्द ‘बैड ओमेन’ की भ्रान्ति को ख़ारिज करते हुए उनका आधुनिक न्याय व्यवस्था से सम्बन्ध का पैरेलल रचना( वकीलों के काले कोट और शनि के काले रंग में) भी कम आशंकित नहीं करता कि क्या जिस तरह शनि के किसी छोटे से चबूतरे पर जहाँ तेल के फिसलन के सिवा कोई मानवीय मूल्य  निवास नहीं करता, जहाँ स्त्रियों  का प्रवेश वर्जित है (अब पुरुषों का भी), क्या वैसी ही विडम्बना न्याय के मठों में भी पलता  है जहाँ कानूनी धाराएं तो बसतीं हैं पर न्याय की आस्था, सामान्य लोक का प्रवेश  दिन ब दिन जर्जर होकर, क्रूर अ-न्याय बनतीं जा रहीं हैं।  स्त्रियों  के आस्था के द्वार और मठ जो लोकायत की विशाल परंपरा ने सदियों पहले इसी भूभाग पर मजबूती से स्थापित किया था, जिसमें न्याय का सेक्रेड स्त्री व्यक्तिगत तौर पर तय कर सकती थी, मोक्ष या मुक्ति का रास्ता तंत्र के विशाल प्रसार ने सद्यः खोल रखा था, उसका आखिर इन मंदिर-प्रवेश जैसे तुक्ष मुद्दों से क्या मुकाबला?

यदि पश्चिमी विद्वान ह्यूघ बी अर्बन को माना जाए तो वो तंत्र को यूरोपियन कोलोनाइज़र्स, ओरिएंटलिस्ट्स और विक्टोरियन माइंडसेट के क्रिस्चियन मिशनरीज के एक्सोटिक चोंचले से निकालकर उसके मात्र  सेक्सुअ लिटी एंगल  से परे, स्त्रियों  के दैवी, अन्तर्निहित विशाल शक्तिपुंज, मानवीय शरीर, कॉसमॉस और राजनीतिक समाज के बीच एक सतत धारा के तौर पर देखते हैं। इस कॉसमॉस की शक्तिपुंज को, तंत्र की मुक्तिदायिनी को, टैगोर की चण्डालिका को आनंद से, बौद्ध धर्म से, शनि हिन्दू मंदिर से किस याचना की जरूरत पड़  गयी? थोड़ी  और विशालता की तलाश में,  वेंडी डोनिगर इस लोक के संसार को एक विशाल सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर देखतीं हैं जो कर्मकांड की दुनिया से कहीं आगे की चीज़ थी, परिष्कृत और परिमार्जित थी, आखिर हमने उन्नीसवीं शताब्दी के उपरान्त समाज सुधार के नाम पर सिर्फ धार्मिक धाराओं को सनिटाइज़ ही तो किया वर्ना क्या मजाल थी इन मंदिर रूपी क्लबों की कि वे उस विशाल लोक की अधिकारी से उसका काया प्रवेश अधिकार छीन लें?  यह नए परम्पराओं की मायाजाल है जिसमें उलझ कर कम से कम स्त्रियों  को तो निषेध के सिवा कुछ और  नहीं मिलेगा।

लेखिका ‘इतिहास’ की विदुषी हैं . संपर्क : savita.khan@gmail.com

सोनी सोरी पर हमला क्रूर दमन का प्रतीक

सोनी सोरी पर फिर हमला हुआ है . स्टेट की क्रूरता की शिकार रही सोनी सोरी पर यह ताजा हमला मानवाधिकार के लिए आवाज उठा रहे लोगों के लिए एक चेतावनी सी है . उन्होंने अपने ऊपर किसी ज्वलनशील पदार्थ के फेके जाने पर आँखों में जलन की शिकायत की  है . जामिया मीलिया इस्लामिया की प्रोफ़ेसर हेमलता महिश्वर की सोनी सोरी को समर्पित कविता और पूरी खबर 


छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत  सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी पर अज्ञात लोगों ने हमला कर दिया है। सोरी को बेहतर इलाज के लिए जगदलपुर भेजा गया है।

दंतेवाड़ा जिले में हुई वारदात


दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधिकारियों ने बताया कि जिले के गीदम थाना क्षेत्र के अंतर्गत जवांगा गांव के करीब अज्ञात लोगों ने आम आदमी पार्टी की नेता सोनी सोरी पर हमला कर दिया है तथा उनके चेहरे पर ग्रीस जैसा कोई पदार्थ पोत दिया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

मोटरसाइकल पर आए हमलावर
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि सोरी शनिवार को अपने दो अन्य साथियों के साथ जगदलपुर से अपने गृहग्राम गीदम के लिए मोटरसाइकल से रवाना हुई थी। सोरी बस्तानार घाट पार करने के बाद जब जवांगा गांव के करीब पहुंची तब कुछ मोटरसाइकल सवार लोगों ने उन्हें घेर लिया और उनके साथ धक्कामुक्की करते हुए उनके चेहरे पर ग्रीस जैसा पदार्थ लगा दिया। घटना को अंजाम देने के बाद हमलावर वहां से भाग गए। उन्होंने बताया कि घटना के बाद जब सोरी के चेहरे में जलन होने लगी तब वह सीधे गीदम के अस्पताल गईं तथा पुलिस को भी मामले की जानकारी दी गई।

चेहरे पर हुई जलन
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि गीदम को अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि हमलावरों ने सोरी के चेहरे पर ग्रीस या बाम जैसा कछ पदार्थ लगा दिया है जिससे चेहरे में जलन हो रही है। सोरी को बेहतर इलाज के लिए बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर के लिए रवाना कर दिया गया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

मानवाधिकार के मामलों को उठाने के कारण हमला
इधर राज्य में आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक संकेत ठाकुर ने आरोप लगाया है कि बस्तर में मानवाधिकार उलंघन के मामलों को उठाने के कारण सोरी पर हमला किया गया है। ठाकुर ने कहा कि अज्ञात लोगों द्वारा कुछ दिनों पहले सोरी को जान से मारने की धमकी दी गई थी। इसकी शिकायत पुलिस से की गई थी, लेकिन पुलिस ने सोरी को सुरक्षा प्रदान नहीं की।

सोनी सोरी को समर्पित हेमलता महिश्वर की कविता 



तुम्हारे
स्खलित वीर्य बूँद को
चंद्र बिंदु की तरह
सहेज लिया था
और दी थी पनाह
अपनी कोख में
तो जना था शिशु
मेरी रचनात्मकता ने

अब तुमने
ठूँस दिए जो
टुकड़े पत्थर के
मेरी योनि में
तो भी पैदा होगा
मानस मनुज
तुम्हारे रोपे
और
मेरे पोसे गए पत्थर
मत घबराना
कहेंगे सच तुम्हारा

‘नील, नीले रंग के’ से

खबर  एन डी टी  वी  से साभार 

शरियत कानून, स्त्री -शोषण, और नासिरा शर्मा की कहानियां

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 हनीफ मदार

समकालीन हिन्दी कहानी को बिना किसी चीख चिल्लाहट के गढ़ा जाना एक नये परिवर्तन की ओर इशारा कहा जा सकता है। क्यों कि ये बदलाव इस मायने में ज्यादा सार्थक और असरदार माना जा सकता है कि, रचनाकार अपनी संस्कृति, परिवेश और वातावरण को पहचान कर उससे संघर्ष करते हुए अपना सामंजस्य बिठा आगे बढ़ रहा है। तब यह सृजनशीलता अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ उत्पन्न परिस्थितियों के मूल कारणों को पुर्नः मूल्यांकन और खोजबीन में समाहित और संल्गन है। इधर समकालीन कहानी ने अपने वर्ग-बोध और वर्ग दायित्व को खोजकर अपनी सामाजिक परम्पराओं के विश्लेषण की वैज्ञानिक दृष्टि के अगले उत्थान को सूचित किया है नासिरा शर्मा के कहानी संग्रह ‘खुदा की वापसी’ की कहानियां कुछ इसी परम्परा की हैं।

नासिरा शर्मा के संग्रह ‘खुदा की वापसी’ में संग्रहित कहानियों में स्त्रीवर्ग के शोषित युवा मन की कराहटें हैं,  जो शिक्षित अशिक्षित स्त्री ही है। जिसका मन संभावनाओं से भरा है। उमंगें हैं। वह जिन्दगी को जिन्दगी की तरह जीना चाहती है। खुले आकाश में पंख लगा कर उड़ना चाहती है। परन्तु पुरानी पीढ़ी की टकराहट और अनेक समस्यायें, उसके संस्कार, धर्म, समाज उसे बार-बार मथ देते हैं। उसकी परेशानी निरंतर बढ़ती  जाती है। उसके सारे खूबसूरत सपने रेत की चट्टान की तरह बिखर जाते हैं। तब कितने ही अनसुलझे वैचारिक सवाल उथल-पुथल मचाने लगते हैं। वे पुरुष निर्मित सामाजिक ढांचे के बीच, निहत्थी खड़ी स्त्री की चेतना और उसके वर्चस्व पर लटकती स्वार्थ पूर्ण धार्मिक परिभाषाओं की पैनी तलवार के रूप में नजर आते हैं। संग्रह की संग्रहित कहानियां स्त्री के जन्म से मृत्यु तक, लड़की होने के अभिशाप के रूप में, पग-पग पर शरियत के नाम पर बताई जाने वाली पाबंदियों के बीच, स्त्रियों को कुंठित जीवन जीने को विवश करने की सामाजिक मंशा को भी उद्घाटित करने से नहीं चूकती हैं। लेखिका के अन्तःकरण में पनपी स्त्री वेदना के ये सवाल धार्मिक कठमुल्लओं, पुरुष समाज को तो कटघरे में लाते ही हैं, साथ ही, आदिम जाति में स्त्रियों के उस बड़े वर्ग समूह को भी घेरे में लेती हैं जो अशिक्षित या शिक्षित होने के वावजूद भी धार्मिक अज्ञानताओं के कारण, धार्मिक कानूनी बेडि़यों में जकड़ी स्त्री विरोधी मानसिकता के साथ जी तो रही ही है साथ ही ‘‘स्त्रियों की यही नीयति है’’ को मनवाने पर भी अड़ी है।

हालांकि तसलीमा नसरीन, मैत्रेयी पुष्पा, स्मत चुगतई आदि की लेखनी से निकली कहानियां या उपन्यास स्त्री  पीड़ा की मर्मान्तक त्रासदी से भरे दिखाई देते हैं। मगर जहां इन लेखिकाओं का साहित्यक सृजन धार्मिक आडम्बरों के खिलाफ उग्र तेवरों के साथ नजर आता है वहीं नासिरा शर्मा की कहानियों के स्त्री पात्र धार्मिक कट्टरवाद की संकीर्णता और औघड़पन के विरोध में सहज संघर्ष कर एक स्वतंत्र जीवन जीने का रास्ता चुन रहे हैं। लेखिका की कहानियां केवल धार्मिक ही नहीं सामाजिक, आर्थिक विद्रूपताओं की गहरी चोटों से टूटे स्त्री मन के कारणों को भी खोजती हैं। आखिर क्या कारण हैं कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी के आर्थिक अधिकारों को छीन कर उसे मायके भेजने का फैसला किया जाता है ? वे कौन से कारण हैं कि पारिवारिक कलह में स्त्री जब किसी से भी नहीं जीतती और बच्चों की भूख के उपरान्त उन्हें पीटती है तो बैठकर देर तक रोती है ? वह मानसिक रूप से शून्यता में चली जाती है। स्त्री वर्ग के इन तमाम मनोवैज्ञानिक तथ्यों को गहराई में जाकर समझने की आवश्यकता है। क्योंकि इन समस्याओं के मूल में भी नारी पराधीनता का इतिहास मौजूद है। नासिरा शर्मा की कहानियां इन विषयों पर भी चुप नहीं हैं।

नासिरा शर्मा की कहानियों में स्त्री पुरुष संबधों की प्रमुखता है। यह संबध पति-पत्नी  के अधिक हैं। यहां संबधों के बीच मर्द समाज के तथाकथित धार्मिक कानूनों की विसंगतियों से पैदा अनुगूंज है। और उनके मध्य छटपटाती नारी यंत्रणा की भयानक त्रासदियां जो स्त्री को जड़ कर रही हैं, उनमें एक आक्रोश भर रही हैं। उनकी कहानियां महज एक कथा ही नहीं अपितु तर्क पूर्ण विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करती हैं। संग्रह की कहानी ‘खुदा की वापसी’, ‘दिलआरा’, ‘पुराना कानून’ इन विसंगतियों को शिद्दत से प्रस्तुत कर उनके खिलाफ तर्क सम्मत आवाज बुलंद करती हैं। इन आवाजों में कहीं भी लेखिका का स्वर सुनाई नहीं देता बल्कि प्रेमचंद के पात्रों की तरह नासिरा शर्मा की कहानियों के पात्रों के ही सम्वेत स्वर सुनाई पड़ते हैं। इस्लामिक कानूनों के तहत शादी में तय होने वाली महर या मर्दों को चार शादियों की इजाजत एवं तीन बार तलाक-तलाक-तलाक के परिणाम स्वरूप टूटते विघटित होते पारिवार एवं दाम्पत्य जीवन की भावनात्मकता भी धर्म से भोथरी होती जाती है। भले ही तलाक के कारण में महज महर की रकम को धार्मिक कानून की दुहाई देकर मर्द द्वारा स्त्री से माफ करवाना रहा हो या अन्य कोई वजह मगर एक बार तलाक हो जाने के बाद, स्त्री और पुरुष दोनों की भावनात्मक एकता में धर्म ही सबसे बड़ी बाधा बन सामने खड़ा होता है। मर्दों को मिला चार शादियों का हक भोगवादी संस्कृति के लिए भले ही माफिक हो लेकिन सामान्य जन की बर्बादी और पारिवारिक विघटन का यह मुख्य कारण भी है। क्योंकि तलाक हो जाने पर आपसी प्रेम समाप्त हो जाय ये जरूरी नहीं। कानूनी बंधन टूटने से दिल का बंधन तो नहीं टूट जाता। निम्न और मध्य वर्ग में यह समस्याऐं बेहद विकराल रूप में सामने आती हैं। जब ऐसी स्थिति में लड़की का अपना कोई मत नहीं होता। सब कुछ ‘‘अल्लाह की मर्जी  से हो रहा है’’  कह कर पल्ला झाड़ा जाता है। यही समसामायिक वैज्ञानिक दृष्टिहीनता एवं अज्ञानता आध्यात्म से लगाव पैदा करती है। तब यही आध्यात्मिक लगाव जीवन को और पलायन की ओर ले जाता है। जहां लड़की निर्विकल्प हो कष्टमय जीवन जीने को विवश होती है। किन्तु खुशफहमी है कि नासिरा शर्मा की कहानियों की वह युवा लड़की पात्राऐं चाहे वे निम्न वर्ग की हों मध्यम या उच्च वर्ग की इन कारणों और समस्याओं के खिलाफ लड़ती और समाज में स्त्रियों की आदर्श बन दिशा देती नजर आती है।

जब लड़कियों को जिंदा दफनाया जाता था तब से, आज उत्तर आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकि के समय में हालात और बदतर हो गये, जब लड़की को पैदा होने से पहले ही उसकी हत्या होने लगी। मजेदार तथ्य यह है कि इन हत्याओं में भी औरत की रजामंदी होती है। अगर लड़की पैदा हो भी गयी तो लड़की जनित औरत की कोख को औरत द्वारा ही कलंकित करना। खुद ही पीडि़त स्त्री के खिलाफ पुरुष को दूसरी शादी करने को प्रेरित करती है। पुरुष के द्वारा पहली पत्नी के होते दूसरी शादी के लिए मना करने पर औरत ही उसे उस शरियत कानून को बताती है कि, मर्दों को चार शादी करने का अधिकार है। और स्वंय औरत ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम करती है। संग्रह की कहानी ‘चार बहनें शीशमहल की’ समाज में गहरी पैठ बना चुकी इसी सामाजिक बुराई का पूरा सटीक और मार्मिक चित्रण करती है। लेखिका की कलम यहां पूरे पुरुष वर्ग को स्त्री विरोधी एक ही तराजू में नहीं तोलती बल्कि उस वर्ग के साथ सामंजस्य बिठा कर आगे बड़ती है। और एक पुरुष के द्वारा ही चार शादियों के अधिकार वाले कठमुल्लावादी कानून के खिलाफ तर्क प्रस्तुत करती है जब ‘चार बहनें शीशमहल की’ कहानी का शरीफ ‘मां के द्वारा दूसरी शादी के लिए जोर-दबाव डालने पर परेशान होकर पीढि़त पत्नी के दुःख में उसे हौसला देते हुए कहता है- ‘‘मैं फिरोज शाही मस्जिद के मौलवी साहब से मिला था। उन्होंने मुझे सही जानकारी दी है कि, बिना किसी माकूल वजह के दूसरी शादी की इजाजत नहीं है। फिर बिना वीवी की रजामंदी लिए शौहर को दूसरे निकाह का हक भी नहीं है।’’ (पृष्ठ-52)

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘खुदा की वापसी’ सोचने पर मजबूर करती है कहानी में फरजाना के द्वारा कही गयी यह बात बेहद तर्क संगत है जो उसने अपने पति जुबैर से तब कही है जब उसे शरियत कानूनों की तमाम किताबों के अध्ययन के बाद पता चलता है क जुबैर ने धर्म कानून का सहारा लेकर उससे महर माफ कराकर उसके साथ धोखा किया है- ’’यदि तुम्हें रस्में तोड़नी थीं तो बगावत करनी थी। एक नई जिंदगी की बुनियाद डालते, जिसके नियम नये होते। धर्म के बनाए कानून को नकारना था तो, नास्तिक बन क्रांति करते, मगर वे खतरे तुम मोल नहीं ले सकते थे। नियम और कानून से बंधी जिंदगी को कबूल करके उसमें से उन नियमों को छांटना जो तुम्हारे लाभ में जाते हैं और उनको रद्द कर देना जो दूसरों के फायदे में जाते हैं क्या यह गुनाह नहीं है ?’’ (पृष्ठ-31) ऐसे अनेक तर्क लेखिका ने बड़ी रोचकता से कहानी में पिरोये  हैं।

नासिरा शर्मा की कहानी ‘दहलीज’ किस्सागो शैली में स्त्री जीवन की तमाम मानवीय त्रासद पूर्ण घटनाओं से उठने वाली स्त्री मन की वेदना को अपने में समेटे है। कहानी ‘दहलीज’ धीरे से औरतों को यह याद दिलाना भी नहीं भूलती कि खुद पैगम्बर ने स्त्रियों को तालीम की हिदायत दी थी।‘दिलआरा’ कहानी इस संग्रह की सबसे रोचक कहानी है। रोचक इस लिए कि यह संग्रह की सबसे तार्किक कहानी है। कहानी में वर्तमान कठमुल्लेपन के साथ स्त्री संघर्ष और उसकी बुलंद आवाजों की सीधी मुठभेड़ है। कहानी के उत्तर्राध मंे टूटकर बिखरती कठमुल्लावादी सोच और उन्हीं के बनाए तथाकथित कानूनों के धाराशाई होते महलों से उठते बवंडर हैं। कहानी में लेखिका द्वारा धार्मिक कानूनों की वे दलीलें जो स्त्री हक की वकालात करती हैं पेश की हैं। ‘दिलआरा’ के सोसियोलाॅजी के प्रोफेसर वर्मा जब मुस्लिम औरतों पर एक लेख लिखने में मदद या शरियत कानून की सही जानकारी लेने, साजदा बेगम से मिलने आते हैं जो विधवा होकर लड़कियों का मदरसा चलाती है। प्रोफेसर वर्मा लड़की को अपनी मर्जी से शादी करने की आजादी को इस्लामी सबूतों में जानना चाहते हैं तब साजदा बेगम बताती हैं- ‘‘जैसी कि रवायत है कि हजरत खदीजा ने खुद अपनी पसंद का इजहार करते हुए पैगम्बर से शादी की बात कही थी। इससे बड़कर और कौन सा सबूत होगा। इसलिए औरत को पूरा हक है कि वह अपने साथ की जा रही ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाए। वह निकाह के वक्त बाकायदा शादी से इनकार कर सकती हैं अगर शौहर उसको पसंद नहीं है या फिर शादी जोर-जबरदस्ती या लालच, से हो रही है। (पृष्ठ-85) प्रोफेसर वर्मा के कहने पर साजदा बेगम एक ऐसा हादसा बयान करती हैं जो उक्त रवायत को और अधिक मजबूत बनाता है। ‘‘रवायत है कि पैगम्बर साहब की एक बीवी असमा थीं। निकाह के बाद हुजूर अकरम उनके पास जाते इससे पहले असमा ने तलाक की ख्वाहिश जाहिर की और उनकी मर्जी का लिहाज कर हजूर ने उन्हें तलाक की आजादी देदी। (पृष्ठ-85)

कहानी तमाम धर्म कानूनों और स्त्री अधिकारों की अनसुलझी गुत्थियों को अपने तर्कों से सुलझाती अंत तक पहुंचती है जहां साजदा बेगम का यह कथन- ‘‘बात औरत को बाहर निकलने या मरद के मुकाबिल खड़ा करने भर की नहीं है बल्कि उसे एक इंसान समझकर उसकी पूरी शख्सियत की है। उसको वो सारे हक मिलने चाहिए जिससे वो अपने दिमागी और जज्बाती जरूरतों को पूरा कर सके और एक सेहतमंद नजरिए के साथ वह इस दुनिया के हर फैसले में शामिल हो सके। मगर आप लोग तो वह हक भी नहीं देना चाहते हैं जो उसे चैदह सौ साल पहले मिल चुके हैं। मगर उसके लिए बस रूहानी तौर पर तहखाने-दर-तहखाने तैयार किये जाते हैं।’’ (पृष्ठ-93) साजदा बेगम के कथन की यही टीस इस संपूर्ण संग्रह की टीस है जो नासिरा शर्मा की कलम से निकली है। कहानी को पढ़कर लगता है संग्रह का शीर्षक ‘दिलआरा’ होना चाहिए था मगर ‘खुदा की वापसी शीर्षक’ लेखिका का निजत्व है।

वर्तमान बाजारवाद और ग्लैमर के पीछे की भोगवादी संस्कृति में डूबी युवा पीढ़ी के लिए धार्मिक कानून में तीन बार तलाक एक कारगार हथियार ही है। इस धार्मिक कानून की धार तब और ज्यादा तेज हो जाती है जब सामाजिक व्यवस्था इन शरियत कानूनों की सच्चाई से बिल्कुल अनजान है। वह केवल इतना भर ही जान पाई है कि तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहने से वैवाहिक  संबन्ध विच्छेद हो जाएगा। और वह दूसरी शादी करने के लिए आजाद हो जाएगा। पुरुष वर्ग में स्त्री को भोग्या समझने की शैतानी साजिश भी अधिकांशतः इसी कानून के मूल से पनपती है। इंसान अपनी आर्थिक हैसियत, वीवी की रजामंदी को दरकिनार कर अपनी योनिच्छाओं की पूर्ति के लिए वीवी को तलाक दे दूसरी शादी कर लेता है। क्योंकि उसे ऐसा करने का सामाजिक अधिकार खुद इस्लामी कानून ने दे रखा है। कहना न होगा ऐसे धार्मिक कानूनों के प्रति सामाजिक अज्ञानता समाज में इंसानी संवेदनात्मक चेतना एवं उससे भावनात्मक पतन का मूल कारण बनने लगी है। ‘पुराना कानून’ ‘दूसरा कबूतर’ कहानियां इन तथ्यों पर गम्भीर मंथन करती हैं। ‘पुराना कानून’ का शमीम रुबीना के लिए जब अपनी वीवी अफसाना को चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे देता है, तब अफसाना की अम्मा का यह कहना- ‘‘ सुनी सुनाई कहती हूं बीवी कि, तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहने से तलाक नहीं होता, मगर हमारे मौहल्ले के मौलवी साहब कह रहे थे कि, तलाक हो गया है, असलियत क्या है कुछ समझ में नहीं आता। ’’ (पृष्ठ-106) समाज की धार्मिक कानूनी अज्ञानता और इनके समक्ष इंसानी लाचारी स्पष्ट रूप में देखने को मिलती है। सीरिया और मिश्र से लड़ाई के चलते  बहुत सी कैदी औरतें मदीना आयी थीं। उन्हें देखकर मर्दों ने उनसे शादी करनी चाही और अपनी बीवियों को धड़ाधड़ तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह कर उनसे आजादी हासिल कर ली। (पृष्ठ-107) लेखिका द्वारा खासतौर पर ‘पुराना कानून’ कहानी में प्रयुक्त यह प्रसंग इस कानून के पीछे पुरुषों की भोगवादी मानसिकता को पूर्ण परिलक्षित करता है। कहानी के अंत में, समाज के सामाजिक सरोकारों एवं व्यावहारिक दबाव में इस धार्मिक कानून एवं शमीम का टूटना और अफसाना को उसकी जिंदगी का वापस मिलना लेखिका की वैज्ञानिक दृष्टि एवं इंसानी रिश्तों के बीच की भावनात्मकता को तमाम धार्मिक कानूनों से ऊपर रखने की मंशा रही है। जो कहानी की विशेषता भी है। ‘दूसरा कबूतर’ के बरकत द्वारा नाम बदलकर धोखे से एक साथ दो निकाह करने एवं उसका भेद खुलने पर अपनी दोनों वीवियों सादियां एवं रुकइया से यह कहना- ‘‘यह कुछ अनहोनी नहीं हैं यही हमारा समाज है, रिवाज है और जरूरत है।’’ वहीं उसी के द्वारा औरतों को तंग नजर कहकर यह कहना- ‘‘औरत एक मर्द से मुतमईन हो सकती है मगर, मर्द नहीं।’’  यह भोगवाद की खुली चुनौती है, सादिया का बरकत से यह कहना- ‘‘मर्द के इस कारनामेे पर कोई भी खुदगर्ज औरत मर्द को तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहकर उससे अलग हो सकती है।’’ इसके जबाव में बरकत कहता है- ‘‘यह न शरियत है न इंडियन पैनल काॅर्ट न ही किसी मुल्क में रायज कानून यह सब फितूर है लिवरैटेड औरतों के एवनार्मल बर्ताव का’’ (पृष्ठ-130) कहानी धार्मिक कानूनों पर हावी पुरुष सत्तावाद की स्वार्थ पूर्ण दास्तान बयान करती है। हालांकि कहानी का अंत सादिया और रुकइया द्वारा बरकत को इसी शरियत कानून से मिले अधिकार के प्रयोग से तलाक देकर होता है। परंतु इस स्थिति में भी यह कानून इंसानी रिश्तों के बीच एक कांटा तो है।

कहानी ‘मेरा घर कहां’ की सोना आधुनिक समाज में उन खदबदाते मानकांे से निरंतर लड़ती है, जो इस व्यवस्था में स्त्रियों के लिए ही खास कर गढ़े गये हैं। जिन्हें परोसने वाला भी पुरुष है और मापने वाला भी। जिन्हें पुरानी पीढ़ी ने पूरी तरह आत्मसात कर रखा है। इन कायदे कानूनों को समाज में सीधे स्त्री के चरित्र से जोड़ा गया है। कहानी शिद्दत से समाज के उस पहलू से जद्दो जहद करती है जो समाज सोना जैसी स्वाभिमानी लड़कियों का चरित्रहंता होकर भी उसके चरित्रहीन होने का फैसला सुनाता है। वह अपनी योन पिपाशा के लिए कथित प्रेम कर सकता है, बलात्कार कर सकता है मगर उससे शादी कर पत्नी का दर्जा दे एक सम्मान से भरा जीवन नहीं दे सकता। नासिरा शर्मा की इस कहानी का सुखद पहलू है जो महज अट्ठारह वर्षीय अशिक्षित सोना को समाज की कूपमंडूप व्यवस्था से केवल लड़ने की हिम्मत ही नहीं देती बल्कि अनेक कठिनाइयों के बाद भी स्वाबलम्बी होकर जीना सिखाती है। संग्रह की अंतिम कहानी ‘नयी हुकूमत’ की हाजरा का अपने पति अलताफ को उसकी बिना रजामंदी के दूसरा निकाह कर लाने पर खुद तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहकर तलाक देना नारी जाति का वह रूप प्रस्तुत करता है, जहां वह इस दुनिया को यह बता पाती है कि शरियत ने यह अधिकार सिर्फ मर्दों को ही नहीं दिया बल्कि इसका इस्तेमाल स्त्री भी कर सकती है और लड़ सकती है अपने हकों के लिए।

संग्रह की सभी कहानियां पढ़ते समय कहानियों में प्रयुक्त कथानुकूलित परिवेश, सम-विषम परिस्थितियों एवं पात्रों का सजीव हो जाना लेखिका की उत्कृष्ट कला-कौशलता का नतीजा है। मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों एवं तार्किक होने के बावजूद भी कहानी बोझिल नहीं होतीं। अपितु एक जिज्ञासा जगातीं हैं। पात्रों के चयन उनकी भाषा, जीवनयापन पर लेखिका की पैनी नजर रही है इसीलिए शिक्षित-अशिक्षित स्त्री की सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीढ़ाओं, कुंठाओं को अपने शब्दों में उकेरने में लेखिका पूर्ण सफल दिखी है। सभी कहानियां एक बेहतर उद्देश्य के साथ पूरी होती हैं। जैसे वे सामाजिक, धार्मिक पाबंदियों के मकड़जाल से बाहर आने को वर्तमान नारी को आवाज दे रही हैं। हालांकि कहा जा सकता है कि कहानियां बहुत ज्यादा नया नहीं कहतीं मगर नासिरा शर्मा की कलम की बुनाई और उनकी कहानी तकनीकि इन्हें नयापन प्रदान करती है।

समीक्षक हनीफ मदार कहानियां लिखते हैं . सामाजिक -सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय, ऑनलाइन मैगजीन हमरंग के संपादक. संपर्क:  08439244335, ईमेल- hanifmadar@gmail.com

इस राष्ट्रवाद की भाषा में स्त्रियाँ ‘ रंडी’, ‘रखैल’ और बलात्कार से ठीक की जाने वाली बिगडैलें हैं

संजीव चंदन


भारतीय जनता पार्टी देश भर में ‘ राष्ट्रभक्ति’ का जोश भरने के लिए आंदोलन करने जा रही है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे एन यू ) प्रकरण में दुनिया भर में अपना ही उपहास बनाने वाली सरकार अब भले ही कन्हैया कुमार की रिहाई के साथ डैमेज कंट्रोल में लगी है , लेकिन उसकी पार्टी आक्रामक हिंदुत्व से भी आगे जाकर आक्रामक राष्ट्रवाद की रणनीति को अमली जामा पहनाने वाली है . निश्चित तौर पर देश भर के उसके अभियान में उसके स्त्री कार्यकर्ताओं की बढ़ –चढ़ कर भागीदारी होगी . मानव संसाधन विकामंत्री स्मृति इरानी खुद राष्ट्रवाद के इस आक्रामक अभियान को संरक्षण और तर्क दे रही हैं .

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ

लेकिन स्त्रियों, जरा ठहरो जिस राष्ट्रवाद की ‘यज्ञ –बेदी’ बनाने में आपका सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है, उसका लक्ष्य पूरा होने के बाद आपकी क्या हैसियत होगी उसे सोचा है आपने ! यदि नहीं तो भी और यदि यह सोचती होंगी कि आपको ‘देवी’ जैसी कोई गरिमा और सम्मान दिया जायेगा तो भी,  ज़रा ठहरकर सोचो. कुछ बानगियाँ देख लेते हैं , इस राष्ट्रवाद के भीतर तुम्हारी ‘ अवस्थिति’ की. 

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ

आज भारत माँ के इमेज को ही सारे ज्ञान, सारी संवेदनाओं पर वरीयता मिल गई है, जिसकी आड़ में कोई भी गुंडा , हुल्लड़बाज या तो हाथ में तिरंगा लिए हुए या फिर अपने फेसबुक बुक ट्विटर प्रोफाइल को तीन कलर का रंग दिये हुए सारी बौद्धिकता और सारी संवेदनशीलता पर हावी हुआ जा रहा है, ज्ञान केन्द्रों के लिए खतरा बना हुआ है , न्याय के संस्थानों और ढांचों के लिए खतरा बना हुआ है .

भारत ‘ मां’ का इमेज स्त्रियों से अनिवार्य रूप से जुड़ा है, क्योंकि वह मां है , वह स्त्री है – इसके लिए वाल्मीकि रामायण के जमाने से या उसके पहले से ही ‘ जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी’ की भावनाएं व्यक्त की जाती रही हैं.  श्री अरविंद की देवी ‘भारत मां’ है और बंकिम चन्द्र चटर्जी की आराध्या भी भारत माँ है , जिसके लिए वे वंदे मातरम् गीत रचते हैं . स्वंत्रता आन्दोलन के दौरान भारत मां का यह इमेज देश की आजादी की चाह रखने वालों , उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ने वालों के लिए उद्दीपक का काम करता था. मां चूकी स्त्री है , इसलिए उसके अपमान की भाषा उसकी इज्जत से जा जुडती है और स्त्रियों के इज्जत का सन्दर्भ उसकी यौनिकता से . यही कारण रहा है कि भारत की दुर्दशा की सबसे पावरफुल इमेजरी बनती है ‘बलात्कार की भाषा में.’ पश्चिम से पढ़े –लिखे जवाहर लाल नेहरू हों या समुद्र न लांघने वाले स्वतंत्रता आन्दोलन के दूसरे दीवाने, अपने भाषणों में ‘ भारत माँ’ के बलात्कार और इस तरह उसकी संतानों के अपमान के इमेजरी का खूब इस्तेमाल किया जाता था. आजादी के दीवानों के लिए भारत या तो मां थी या प्रेमिका – ‘मदर इंडिया’ की नरगिस (मां ) और ‘क्रान्ति’ की हेमामालिनी( प्रेमिका) भारतवासियों ,आजादी के दीवानों ( स्पष्ट है कि अधिकांश मामलों में वह पुरुष है – सुनील दत्त, राजेन्द्र कुमार या मनोज कुमार है ) के प्रिय रूपक हैं , उद्दीपक हैं देश भक्ति के लिए .

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ

यहाँ तक तो सुकून है स्त्रियों के लिए दोयम ही सही , पुरुष के बाद ही सही , उससे संरक्षित होकर ही सही, उसका अस्तित्व है – जिसका भाव देवी का भी हो सकता है , प्रेयसी का भी या धोखेबाज फितरत वाली नायिका –खलनायिका का भी. सुविधाअनुसार नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता या फिर सुविधा अनुसार पुरुषस्य भाग्यम , त्रिया चरित्रं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः.

लेकिन ठहरिये ,  आज के राष्ट्रवादी अभियान में अपने लिए नियत की जा रही भूमिका को भी देखिये. तिरंगा झंडा लिए न्यायालय परिसर में हंगामा करने वाले वकीलों से लेकर सोशल मीडिया में सक्रिय राष्ट्रवादी सेनानियों पर गौर करिये. वे सब आपको ठीक करने में लगे हैं . लोकतंत्र के सामान्य उसूलों समता , बंधुत्व की बात करने वाले लोगों,  न्याय की चाहना रखने वाले लोगों के लिए ये राष्ट्रवादी सेनानी उनकी माँ, बहनों के बलात्कार से अपनी राष्ट्रभक्ति सिद्ध करना चाहते हैं.

राष्ट्रवादियों के द्वारा दी जा रही गालियाँ

राष्ट्र के लिए उनकी परिकल्पना से अलग सोच रखने वाले लोगों, खासकर स्त्रियों के लिए उनकी भाषा के नमूने हैं , ‘ रंडी , रखैल , या बलात्कार करके ठीक कर देना, गैंग रेप का शिकार बना देना आदि. ये आक्रामक राष्ट्रवादी सेनानी क्या तालिबानियों या इस्लामिक स्टेट के वीर बांकुरों से तनिक भी अलग हैं , जो अपनी स्त्रियों को धार्मिक और राष्ट्रवादी बनाने के लिए अपने पौरुष का इस्तेमाल कर रहे हैं , उन्हें बलात्कार या सामूहिक बलात्कार का शिकार बना रहे हैं. यह भाषा और यह सोच राष्ट्रवाद के किस रूप में अनूदित होती है , उससे क्या इमेजरी बनती है . यह इमेजरी है – राष्ट्र का ‘ पितृभूमि , पुण्यभूमि में तब्दील हो जाना , जहां स्त्रियाँ शिक्षा के अधिकार से वंचित होंगी , जहां उनकी भूमिका पुरुष संरक्षित पत्नी, पुत्री , मां तक सीमित होगी, जहां उनकी भूमिका अच्छी गृहिणी, देवदासी या गणिका की होगी. और यदि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज बनाती हैं तो उनके खिलाफ, उन्हें ठीक करने के लिए पुरुष का बंदूक और लिंग एक साथ सक्रिय होंगे . इस  तथ्य को समझने के लिए सोशल मीडिया में सक्रिय समतावादी स्त्रियों के लिए राष्ट्रवादी सेनानियों की उग्र स्त्रीविरोधी भाषा की बानगियाँ देखें या उस भाषा की बानगियाँ भी जो समतावादी पुरुषों की मां, बहनों के लिए दी जाती हैं. राष्ट्रवाद के इन सेनानियों के राष्ट्र का आदर्श होंगे – ‘चातुर्वर्ण मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः’ , और स्त्री को यौनदासी के रूप में मिलने वाला मान सम्मान , दुलार या फटकार.

तय आपको करना है कि आप इस आक्रामक राष्ट्रवाद का हिस्सा बनेंगी , जहां आपसे ज्यादा ‘ गौ माता’ सुरक्षित है , या उस राष्ट्र का जो समता, स्वतन्त्रता में यकीन रखता है . जिन लड़के –लड़कियों को ये राष्ट्रवादी जेलों में ठूस देना चाहते हैं , वे लड़के नारे जरूर लगा रहे थे , आजादी के नारे लगा रहे थे, लेकिन वे नारे थे , पितृसत्ता से आजादी के , जातिवाद से आजादी के , सामंतवाद से आजादी के. आजादी के इन दीवानों की कब्र पर ज्ञान और सोच –विचार के संस्थानों को नालंदा विश्वविद्यालय का हस्र देकर राष्ट्रवाद के ये सेनानी जिस राष्ट्र को गढ़ना चाहते हैं , वहां आप अपने लिए थोड़ा सा भी हक़ मांगेंगी तो वे आपको ठीक करने के लिए सामूहिक बलात्कार की सजा का इजाद कर चुके है. उनके राष्ट्र में स्त्रियाँ ‘ रंडियां , रखैलें या फिर बलात्कार से ठीक की जाने वाली बिगडैलें होंगी. 


आज़ादी के नारे लगाते विद्यार्थियों और जे एन यू स्टूडेंट असोसिएशन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार का वीडियो लिंक



नोट : ‘रंडी’ और ‘ रखैल’ शब्दावली से लेखक का कोई इत्तेफाक नहीं है. यह शब्दावली  स्त्री यौनिकता पर पुरुष नियंत्रण की शब्दावली है . इस लेख में इसका इस्तेमाल सांस्कृतिक ( आक्रामक ) राष्ट्रवादियों की मनोवृत्ति और उनकी भाषा को स्पष्ट करने के लिए उनकी ही भाषा से लेकर किया गया है, ताकि स्त्रियाँ इस राष्ट्रवाद के भीतर अपनी नियत स्थिति को देख सकें . 

क्या ऐसे ही होगी ‘थियेटर ओलम्पिक 2018’ की तैयारी ?

कविता 


भारतीय रंग महोत्सव के शेष दो दिन बचे हैं . कथाकार और सांस्कृतिक पत्रकार कविता नाट्य प्रेमियों का ध्यान खीच रही हैं इस ओर

मंडी हाउस हमेशा से कला,संगीत, और नाटक प्रेमियों की पसंदीदा जगह रही है.पर आजकल यह (भारंगम) की सुगंध से महक रहा है.दीवारों को ढकते हुए नाटकों के चित्र और पोस्टर ,वातावरण में गीतों-आवाजों की गूँज बताते हैं कि कुछ ख़ास जरुर है. जो यहाँ चल रहा हैं. सोंधी धूप, ताजी हवा हर तरफ रंगीनी और चहकते चेहरे यदि ये सब आपको पसंद है तो एक दिन जरुर होकर आयें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से. यहाँ की फिजां आपके भीतर ख़ुशी और मुस्कान घोल देगी.जिन्दगी में रंगों, और भावनाओं का महत्व बताएगी.

यहां जाने के लिए आपका नाटक प्रेमी होना भी जरुरी नहीं,यदि आप गीतों, गजलों, कव्वाली,लोकगीत और लोक-नृत्य और सूफी संगीत के शौक़ीन हैं. जादू देखना अगर पसंद है आपको.तो एक दिन जरुर होकर आयें इधर से.दिन भर अलग-अलग जगह बने खूबसूरत मंचों पर यहाँ कोई–न–कोई कार्यक्रम होता मिल जाएगा. यहाँ ‘थियेटर-बाजार’ नामक एक रंग-बिरंगा बाजार भी है,जहाँ ब्यूटी –पार्लर से लेकर दैनिक जीवन में इस्तेमाल होनेवाली बहुत सारी वस्तुएं मिल जायेंगी.लोगों की भीड़ जहाँ- तहां बैठकर इन वस्तुओं का,संगीत का आनद लेती मिल जायेगी. इस सबमें भी अगर मन न रमे तो आप फिल्मों और नाटक से एक साथ जुड़े हुए बड़ी-बड़ी हस्तियों से मिल सकते हैं.नाटक और अभिनय से जुड़े अलग-अलग मुद्दों परउन्हें सुन सकते हैं-बहुमुख में रोज चलटी हुई श्रृंखला –लिविंग लीजेंड, मास्टर क्लास, वर्ल्ड थियेटर फोरम और राष्ट्रीय सेमीनार के तहत.विशिष्ट पकवानों की एक लम्बी सूची यहाँ उपलब्ध है,जहां ब्रांडेड खाध्य सामग्री से ज्यादा लिट्टी-चोखा,  परांठे,चायनीज,साउथइन्डियन, जलेबियाँ-पकौड़ियाँबिक रही हैं. अगर इनकी गंध आपके मुंह में पानी न ला दें तो आप कह सकते हैं,स्वाद का आपके जीवन में उतना महत्व नहीं.

किताबों ,पोस्टरों, आयुर्वेदिक् सौन्दर्य प्रसाधनों, कशीदाकारी वाले और राजस्थानी-गुजराती दुपट्टे-कुरते, लाख की चूड़ियां-बूंदे बहुत कुछ मिलेगा एक साथ यहां,जिसके लिए आप अलग -अलग जगह भटकते फिरेंगे.
और किताबों-पत्रिकाओं के लिए बहुत सारे प्रकाशन- गृहों के स्टाल भी.जाहिर है यह सबकुछ नाटक के लिए इस्तेमाल होनेवाली चीजें हैं, उससे सम्बंधित क्रॉप्स पर इनका उदेदेश्य यहाँ के बच्चों के लिए  पहले भले ही उनकी जरुरत की चीजें कैम्पस में ही उपलब्ध करना रहा हो , पर अब यह आम लोगों के लिए भी खरीद-बिक्री और ध्यान आकर्षित करने के लिए ,उन्हें यहाँ बांधकर लाने के लिए है.

नाटक प्रेमियों लिए तो यूं भी  यह जगह काबा जैसा ही है हमेशा से, पर अभी 1 फ़रवरी से 21 फ़रवरी तक यानी तीन सप्ताह तक चलनेवाला यह नाट्य-समारोह अभी आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है., जिसमें देश-विदेश और हर भाषा और प्रदेश के नाटक सम्मिलित हैं .यह खासा दिलचस्प  आयोजन रहता आया है,हमेशा से. पर इसकी इस बार की विशेषता यह है कि यह हर बार की तरह अंग्रेजी नाटकों और आभिजात्य वर्ग को केंद्र में रखकर नहीं रचा गया. यह यहाँ प्रदार्शित 80 बहुभाषिक नाटकों को देखकर भी कहा जा सकता है,और यहाँ की अभूतपूर्व  साज-सज्जा देखकर भी.सजावट में लालटेनों,परान्दों ,कागजी रंगीन झंडियों, नाटककारों की रंगीन लाईटों के साथ लटकती और क्ले((मिटटी) से बनी आदमकद  जानवरों की सजावटी मूर्तियों को देखकर भी कहा जा सकता  है. और बैठने के लिये खुले में रखे गए मूढे. कैम्पस दीवारें नाटकों के चित्रों-तस्वीरों से भरी हुई,खुशबू  देते रंगबिरंगे फूल.कुल मिलाकर कहें तो एक ग्रामीण या लोक-कलाओं वाला अंदाज  यह विशेष अंदाज इसे एक अनोखा रंग-रूप प्रदान करता है.

पर इसके विपरीत दुखी करनेवाली बात यह कि इन नाटकों के प्रचार-प्रसार में इस बार कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं जताई गई.हर बार के उलट इस बार नाटकों से ज्यादा अहमियत सेलिब्रेटीज (शख्सियतों) को दी गई.शायद इसलिए भी की नाना पाटेकर,अनुपम खेर,पंकज कपूर,नीना गुप्ता,,सौरभ शुक्ला, एम .के.रैना, सुषमा सेठ और इन जैसे तमाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से कभी के जुड़े नाम भीड़ खुद जुटा लेंगे, यह भरोसा इस विश्वास की वजह हो. और तो और नाना पाटेकर को बुलाये जाने की वजह मुझे कुछ ख़ास समझ में नहीं आई.जबकि उनका कोई नाटक नहीं था इस महोत्सव में. क्या सिर्फ इसलिए कि वे नाटकों से ही फिल्म में आये थे.या इसलिए की हाल-फिलहल उन्होंने ‘नटसम्राट’जैसी रंगकर्म पर आधारित फिल्म की है.जबकि नाना ने खुद ही कहा कि पिछले 15 सालों से उन्होंने कोई नाटक नहीं किया.अपने फिल्म को प्रमोट करते हुए नाना पाटेकर ने कहा –इस फिल्म ने मेरे भीतर का सबकुछ ले लिया, अब फिर से जमा होने में वक़्त लगेगा.

नाना का जादू लोगों पर अभी भी चलता है,उनके स्वागत में जुटी जनता और उनके बोलने को मंत्रमुग्ध सुनते दर्शकों को देखकर कहा जा सकताथा.अनुपम खेर ने अपनी बातचीत में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पुरानी यादों को ताजा करते हुए अपने संघर्ष के दिनों की बातें की.पंकज कपूर की ‘दोपहरी’ को सुनते हुए लोग निराश हो रहे थे.कारण यह कि वे अपना पाठ भूल रहे थे, और बार-बार दर्शकों ने उन्हें इस कहानी का पाठ करते हुए सुना है. यह दुखद है कि पंकज कपूर जैसा समरथ अभिनेता अपने पहले प्रेम नाटक के लिए वर्षों से एक नई कहानी,या फिर कोई नया पीस तैयार नहीं कर सका.

अंततः सबसे दुखद पक्ष यह कि पत्रकारों और आम लोगों के समूह को मांगने पर भी टिकट या पास नहीं मिलना. यह वही रंगमंच है जो साल भर दर्शक न होने, खासकर टिकट खरीदकर नाटक न देखने वाले दर्शकों का रोना आये दिन रोया रहता है. उन्हीं दर्शकों की ऐसी अवमानना सचमुच एक  दुखद स्थिति है.जिस नाटक में भीड़ उमड़ने की संभावना पहले से ही हो, उस नाटक के लिए बड़े मंच को उपलब्ध न करा पाना अफसोसजनक है. शायद भविष्य में मिल पाने वाले180 करोड़ रुपये के प्रस्तावित बजट से इस दिशा में कुछ बेहतर हो सके. शायद  फिर आधुनिक तकनीकों से युक्त उस बड़े प्रेक्षागृह को उपलब्बध कराया जा  सके जो अभी तक सिर्फ प्रस्तावों में है. उम्मीद यह है कि प्रस्तावित ‘थियेटर ओलम्पिक 2018 ’  तक ये सारी योजनाएं अपना प्रारूप ले सकेंगी.

लोकगायक और नाटककार संभाजी भगत पूछते हैं कि क्या वजह है कि हिन्दी क्षेत्र में नाटकों का अपना दर्शक वर्ग तैयार नहीं है , जिसके बीच प्रोफेशनली नाटकों की प्रस्तुति हो सके . वही एन एस डी के निदेशक वामन केंद्रे इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अपने कार्यकाल में वे बहुत कुछ बेहतर कर सकेंगे. 

लेखिका हिन्दी की चर्चित कथाकार हैं . इन दिनों ऑनलाइन हिन्दी पोर्टल ‘सत्याग्रह’ के लिए काम कर रही हैं . सम्पर्क : kavitasonsi@gmail.com

स्त्री के अकेलेपन का दर्द है दोपहरी

रेणु अरोड़ा 


दोपहर का समय स्त्री के जीवन का ऐसा समय होता है जब अपनी दिनचर्या से थोड़ी फुर्सत पा वह अपनी सखी-सहेलियों और पड़ोसिनों के साथ अपना दुख-सुख बांटती है,हँसी-ठिठोली करती है। ये सब करते हुए समय कब बीत जाता है-पता ही नहीं चलता। लेकिन अकेले में यही दोपहरी खाने दौड़ती है और अगर इस अकेलेपन में बुढ़ापा भी मिल जाए तो स्थिति और भी मारक और दयनीय हो जाती है। अवस्था,परिस्थिति और स्थिति की इसी विडम्बना,मार्मिकता को उभारा पंकज कपूर द्वारा लिखित,निर्देशित नाटक दोपहरी ने। इस नाटक का मंचन 18वें भारत रंग महोत्सव में 5फरवरी को हुआ था। मूलतः यह एक कहानी है जिसका भावपूर्ण वाचन बड़े ही सहज ढंग से किया गया।

पंकज कपूर दोपहरी को प्रस्तुत करते हुए

यह कहानी लखनऊ की गलियों में बसी एक बड़ी हवेली में रहने वाली एक अकेली बूढ़ी अम्मा बी की कहानी बताता है यह नाटक। अम्मा बी के शौहर नवाब साहब की मृत्यु हो चुकी है। इकलौता बेटा जावेद अमरीका अपने परिवार के साथ रहता है। कभी-कभी कुछ दिनों के लिए घर आता है। माँ को जल्दी वापस आने का भरोसा और दिलासा देकर लौट जाता है न आने के लिए। उनके अकेलेपन का साथी है उनका नौकर,जो सुबह आकर काम करके दोपहर को चला जाता है फ़िर शाम को वापस आता है। दोपहर के इस अकेलेपन में अम्मा बी को छत पर किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई देती है। एक दिन कदमों की आवाज़ के साथ पायल की आवाज़ भी सुनाई देती है और फ़िर एक दिन कागज़ का एक पुर्जे पर आज रात दस बजे—ये संदेश मिलता है। अम्मा बी की हालत ऐसी कि काटो तो ख़ून नहीं। उन्हें ये आवाज़ें इतवार को नहीं सुनाई देती क्योंकि हर इतवार को नवाब साहब के दोस्त डॉक्टर साहब घर आते,अनके साथ ही दोपहर का खाना खाते और गप-शप में ही सारा दिन बीत जाता। डॉक्टर साहब अम्मा बी को कोई काम करने या किरायेदार रखने की सलाह देते है मगर वे तैयार ही न होतीं ।

 एक दिन जुम्मन के कहने पर वे वृद्धाश्रम भी जाती हैं  ऊपर से तो सब ठीक ही लगता है लेकिन वहाँ रहने वाले परिचित उन्हें अपनी ही हवेली में रहने की हिदायत देते हैं। इस घटना के बाद डॉक्टर साहब अधिकारपूर्वक किरायेदार रखने को कहते हैं और अम्मा बी को तैयार होना पड़ता है। काफ़ी जद्दोज़हद के बाद एक लड़की सबीहा को वे चुनती हैं क्योंकि वह उनके मायके जौनपुर की रहने वाली है साथ ही दोपहर एक बजे से शाम चार बजे तक तथा रात आठ बजे घर लौटने की शर्त उसे मंज़ूर थी। सबीहा के आने से अम्मा बी का अकेलापन ही दूर नहीं होता बल्कि औलाद की दूरी का ग़म भी नहीं अख़रता और सबसे बढ़कर छत से आने वाली आवाज़े भी अब उन्हें परेशान न करती। एक दिन सबीहा बिना बताए चली जाती है और बाद में बी को एक आदमी के फोन से पता चलता है कि वह काम से बाहर गई है दो दिन में लौटेगी। अम्मा बी के मन में तमाम अच्छे-बुरे ख्याल आते हैं , अपनी बेचैनी में वे उसके कमरे का ताला तुड़वाकर कमरे में दाख़िल होती है तो बिस्तर पर अधसिली गिलहरी को प्यार से पुचकारकर सिल देती हैं।

पंकज कपूर दोपहरी को प्रस्तुत करते हुए

सबीहा के वापस आने पर उन्हें सच्चाई का पता चलता है साथ ही सबीहा को भी बी के हुनर का पता चलता है। वह बताती है कि उसे पाँच सौ खिलौनों का आर्डर पूरा करना है मगर अकेले काम पूरा करना संभव नहीं। जिस सहेली ने भरोसा दिया था वह अब मुकर गई। बी के हुनर को देखकर वह उनसे खिलौने बनाने का इसरार करती है। बी थोड़ी न-नुकुर के बाद काम में लग जाती है और इन सब में उनका अकेलापन, बुढ़ापे के सारे दर्द औ ग़म गायब ही हो जाते हैं। वे पूरे उत्साह से काम में जुट जाती है। समय पर आर्डर पूरा हो जाता है। कंपनी के मालिक को खिलौने पहले से भी ज्यादा पसंद आते हैं और वह और खिलौनों का आर्डर दे जाता है। बी को सबीहा उनकी मेहनत की कमाई का पहला चैक देती है जिसे वे ख़ासी मशक्कत के बाद स्वीकारती हैं। और उन्हें पहली बार यह एहसास होता है कि यह उनकी कमाई है और वे केवल अम्मा बी नहीं मुमताज़ सिद्दकी हैं—उनका अपना वजूद है। इस तरह कहानी केवल स्त्री-सरोकारों की ही बात नहीं करती बल्कि परिवारों में वृद्धों के साथ जो दुर्व्यवहार और अत्याचार होता है—उसकी भी बानगी कहती है—यह कहानी। हम बेटे की चाहना करते हैं लेकिन अनचाही बेटी कैसे हमारे जीवन के भाव-कोष को भर देती हैं—इससे हम अनजान नहीं—फ़िर भी अपनी चाहत से मजबूर हैं। सबीहा के किरदार के माध्यम से हम इसी सच्चाई से दो-चार होते हैं। लड़की का बचपन से लेकर बुढ़ापे तक का सफ़र पिता,पति और पुत्र की छाया में बीत जाता हैं उसका ख़ुद का व्यक्तित्व घर-गृहस्थी के बोझ तले ओझल ही हो जाता है। मगर पहचान की चाह राख में दबी चिंगारी की तरह मन के किसी कोने में रहती है।  अम्मा बी का चाँद को संबोधित करते हुए अपने शौहर को बताना कि—यह मुमताज सिद्दकी की अपनी कमाई—इसी सत्य को प्रमाणित करता है।

पंकज कपूर के कहानी कहने के अंदाज़ के कारण हम कहानी सुनते नहीं बल्कि देखते हैं । ध्वनि-प्रकाश और आवाज़ के ताने-बाने से ऐसा लगता है कि कहानी हमारे सामने घटित हो रही है। कहानी का घटनाक्रम तीन स्थलों पर घटित होता है। इन तीन अलग स्पेसों का आभास मंच पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रखे सामान या व्यवस्था से आसानी से हो जाता है। दाहिनी ओर एक टेबल-कुर्सी और उस पर रखा लैंप कमरे का एहसास देता है तो बीच में रखी आरामकुर्सी और साथ ही रखी साइड-टेबल तथा थोड़ी दूरी पर रखा कपड़े टँगा हैंगर-रैक कभी आँगन तो कभी अम्मा बी का कमरा बन जाता है। बाईं ओर दो सीढ़ी का रेलिंग लगा चबूतरा छत बन जाता है। वाचक का इन स्पेसों में घूमते हुए आवाज़ के उतार-चढ़ाव के साथ कहानी पढ़ना पात्रों के आपसी संबंधों को और स्थान एवं समय के साथ उनके जुड़ाव को बाख़ूबी उजागर करता है। वाचक कभी सीधे दर्शकों से सीधे संवाद स्थापित करके भी कहानी कहता चलता है। अंतिम दृश्य में साइक्लोरामा पर उभरा चाँद और छत पर खड़ी अम्मा बी का उससे अपने मन की बात कहना दर्शकों के मर्म को ही नहीं छूता बल्कि उसे ये भुला भी देता है कि वह वाचक है अम्मा बी नहीं। बड़ी सादगी से किया गया यह अंदाज़े बयां मन को मोह लेता है।

रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com 

महावारी से क्यों होती है परेशानी

आरती रानी प्रजापति 

महावारी हर स्त्री के 10-14 की आयु में शुरू होने वाला नियमित चक्र है| जिसमें स्त्री की योनि से रक्त का स्त्राव होता है| यह वह समय है जब स्त्री के शरीर में कई परिवर्तन होते हैं| महावारी सिर्फ शरीर में घट रही एक घटना नहीं है,  बल्कि इसका सम्बन्ध दिमाग से भी है| महावारी के समय स्त्री थकान महसूस करती है| लगातार ३-४ दिन का रक्त स्त्राव उसे कमजोर करता है| कई महिलाओं को इस समय हाथ-पैरों में सूजन, पेट-पैर में दर्द, कमर दर्द, बुखार, भूख न लगना, कब्ज जैसी अन्य समस्याएँ भी होती हैं| कुल मिलाकर महावारी के समय स्त्री का स्वास्थ्य  देखभाल की मांग करता है उसे आराम की जरूरत होती है,  जिसे अति संवेदनशील पितृसत्तात्मक समाज नहीं समझता| स्त्री के इस प्राकृतिक नियम को समाज उसकी कमजोरी मानता है|

साभार  गूगल (इन्स्टाग्राम )

दलित और स्त्री दोनों को भारतीय समाज समान नजर से आंकता है| स्त्री मासिक धर्म के दौरान अछूत बन जाती है| वे सभी काम जिन्हें शुभ माना जाता है उनसे उस स्त्री को दूर रखा जाता है| यहाँ तक कि जिन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में स्त्रियाँ अपना आधे से ज्यादा वक्त लगाती है वह भी स्त्री के लिए के लिए अस्पृश्य हो जाते हैं| महावारी के समय स्त्रियाँ मनुष्य द्वारा निर्मित ईश्वर की मूर्ति को छू नहीं सकती| उसे पूजा-पाठ की सभी चीजों से दूर रखा जाता है| तथाकथित भगवान के बर्तन,कपड़ें, खाना वह महीने के तीन-चार दिन अपने से दूर ही रखती है| लेकिन मजे की बात यह है कि वह खाना जो उस ईश्वर को रखा जा रहा है बनाती वही स्त्री है| खाना बनाते समय वह अछूत नहीं होती पर बाद में वह अछूत हो जाती है उस भगवान के लिए जिसके अस्तित्व पर आज लाखों सवाल हैं|

 आज भी कई घरों में माहवरी के समय महिलाओं से काफी भेद भाव किया जाता है| कहने को तो हम आधुनिक समाज में हैं पर स्त्री शब्द के सामने यह आधुनिकता जाने कहाँ चली जाती है| आज भी ऐसे कई घर हैं जो माहवरी के समय स्त्री के शरीर से दूर रखते हैं अपनी घर की सभी चीजों को| माहवारी वाली स्त्री को घर की रसोई में कोई काम नहीं करने दिया जाता उसे अपने कमरे में रहना होता है| तीन दिन बाद जब उसे पवित्र की कोटि में रखा जाता है तब पूरे घर की साफ सफाई वही औरत करती है| रसोई साफ करती है| जितने कपड़ें वह उपयोग में लाती है पहनने-ओड़ने वाले सभी को वह धोती है| एक थकान भरा काम हर महीने उसके जिम्मे होता है क्योंकि वह स्त्री है|

साभार गूगल

महावारी में ऐसा क्या है जो इसे इतना घृणित माना जाता है| क्या रक्त का निकलना वास्तव में एक अपराध है? नहीं माहवारी में पवित्रता की यह जो धारणा  है उसका सीधा सम्बन्ध स्त्री की योनि से है| रक्त का स्राव योनि से होता है इसलिये माहवारी के रक्त को अपवित्र माना गया है| वरना शरीर के किसी अन्य अंग से निकले रक्त की तरह यह रक्त भी है| भारतीय समाज में स्त्री दोयम दर्जें पर रखी गई है जिसका कारण भारतीय पितृसत्ता है जो पुरुष को महत्त्व देती है| स्त्री की योनि को पवित्र रखने के लिए यहाँ खाप-पंचायत, राष्ट्रवाद, धार्मिक ग्रन्थ, अलग-अलग नियम क़ानून है|

स्त्री से जुड़े इस नियम को छुपा कर रखा जता है| लड़कियों को महावारी की कोई जानकारी पहले से नहीं दी जाती फलत: उनके साथ जब यह प्रक्रिया शुरू होती है तो जानकारी के अभाव में वे इसे एक घिनौना काम मानती हैं| किशोरावस्था के इस परिवर्तन को स्वीकार करने में उन्हें काफी वक्त लगता है| घर परिवार से दूर यदि वह अपने प्रथम महावारी से अवगत होती तो उस समय उसे बेहद शर्मिन्दगी महसूस होती है कारण कि यह रक्त योनि से निकलता है| जिसे वह लड़की खुद क्योंकि पितृसत्ता से गर्सित है एक गलत चीज मानती है| कई लड़कियां ऐसे में रोने लगती है क्योंकि वह नहीं समझ पाती कि क्या किया जाए|

अजीब बात यह है कि महिलाओं को इस चक्र के बारे में उनके अध्यापक भी नहीं बताती| 10 कक्षा के कोर्स में स्त्री शरीर व शरीर की उत्पत्ति के विषय में जानकारी दी गई है| कई अध्यापक इस विषय को खुद से पढ़ने को कह कर टाल देती हैं जिससे घर, परिवार में जो शिक्षा लड़की को नहीं मिल पाती उससे वह स्कूल में भी वंचित हो जाती है| महावारी में एक समस्या उसमें इस्तेमाल होने वाले कपडे की भी आती है| भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपना पेट ठीक से भर पाए| गरीब, आदिवासी, दलित, मजदूर तबके की औरतें महावारी के समय कपड़ा इस्तेमाल करने को मजबूर है| उनके पास इतना पैसा नहीं है की अपने बच्चे के पैरों में चप्पल तो पहनावा सके ऐसे में सिर्फ कपड़ा ही उनके पास एक मात्र विकल्प बचता है| जाहिर सी बात है कि यह कपड़ा कोई नया धुला नहीं हो सकता| ये समुदाय ऐसे हैं जिनके पास संसाधन बिलकुल नहीं हैं| ऐसे में फेकने के लिए वे नया कपड़ा इस्तेमाल नहीं कर सकती इसलिए गंदे-फटे कपड़ों को इस वक्त इस्तेमाल में लिया जाता है| जिस कारण गरीब महिलाएं कई संक्रामक रोगों का शिकार हो जाती हैं और इलाज के न मिल पाने और वक्त की कमी (क्योंकि ये वो महिलाएं हैं जो रोज काम करती और खाती हैं) मौत का शिकार बनती हैं|

भारतीय समाज में स्त्रीलिंग के साथ किया गया भेद-भाव उसे महावारी में भी परेशान करता है| हमारे समाज में आज भी लड़कों को वरीयता दी जाती है| सभी काम स्त्रियों से करवाएं जाते हैं और उनके खानपान की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता| ऐसे में स्त्री के शरीर में लगातार कमजोरी आती है| वह देखने में भले ही सुन्दर या गौर-वर्ण हो पर उसका शरीर भीतर से कमजोर हो जाता है| कमजोरी की इस दशा में कई स्त्रियों को महावारी एक महीने में कई बार भी आती है या इसका समय 3-4 दिन न होकर 7-12 दिन तक बढ़ जाता है| ऐसी स्थिति किसी भी स्त्री के लिए घातक हो जाती है समय पर उचित इलाज न मिल पाने के कारण कई स्त्रियाँ मृत्यु को भी प्राप्त हो जाती है|

भारतीय समाज स्त्री को देवी मानने का दावा करता है पर क्या वास्तव में ऐसा है| यह समाज स्त्री को कभी मनुष्य रूप में भी नहीं स्वीकार करता देवी तो क्या मानेगा| इस समाज ने स्त्री को मात्र भोग की वस्तु बना दिया है| महावारी के कष्टकर समय में जब महिला को आराम की जरुरत होती है कई पुरुष उस वक्त भी सम्भोग करते है| जिसमें पुरुष का आनंद ही प्रमुख होता है| स्त्री की पीड़ा की अनुभूति करना समाज को उसके उच्च आसन से नीचे गिरा देता है इसलिए स्त्री को हर संभव कष्ट देना समाज अपना कर्तव्य समझता है| आज हम ‘हैप्पी टू ब्लीड’ जैसी धारणाओं पर विचार कर रहे हैं पर क्या वास्तव में इस समाज की जड़ मानसिकता पर ऐसी बातों से खास फर्क पड़ेगा? यह मुहीम किस तबके की स्त्रियों की है यह भी जानने की जरुरत है| विज्ञापन में दिखाए जाने वाले रक्त को प्रतीकात्मक न दिखाकर लाल भी दिखा देंगे तो क्या इससे उस महिला के जीवन पर कोई ख़ास प्रभाव पडेगा जो कामगार तबके की है? महीने के इन दिनों में भी जो औरतें ढेर बोझ ढो रही हैं क्या उनकी स्थिति इससे सुधरेगी? इस देश में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो पोषण के अभाव में मर जाती हैं क्या उनके लिए भी मासिक धर्म ‘हैप्पी टू ब्लीड’ हो सकता है?

हाँ यह सच है कि भारतीय समाज सड़ी हुई मानसिकता में जी रहा है जिसे बदलने की जरुरत है पर यह परिवर्तन किस तबके लिए हो रहा है यह सोचना चाहिए| क्या उस परिवर्तन से समाज बदल जायगा? लोग महिला को अछूत मानना छोड़ देंगे? कामगार महिला अपनी मुश्किलों को सुलझा पाएगी?

लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं. संपर्क: aar.prajapati@gmail.com 

आज़ादी मेरा ब्रांड उर्फ कोई वक्त गलत नहीं होता

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विजेन्द्र सिंह चौहान 


क्या कभी चाय की दुकान पर, नुक्कड़ पर , कचौड़ी के ठेले पर किसी स्त्री को अकेले चाय , कचौड़ी और नुक्कड़ के गप्प का आनंद लेते देखा है, नहीं, क्योंकि पब्लिक स्पेस पर अकेली महिला हमारे समाज के लिए कल्पनातीत है , या फिर घर के चौखटे को लांघने और दुश्चरित्र होने की प्रमाण ! अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘ आजादी मेरा ब्रांड’ की समीक्षा से गुजरते हुए विजेंद्र सिंह चौहान स्त्री के पब्लिक स्पेस में भागीदारी के सुख का जायजा ले रहे हैं. यह अच्छा है कि अपनी छोटी बेटी को किताब पढने के लिए प्रेरित करते हुए वे नई पीढी के लिए पिता के रूप में ‘खाप के खौफ से मुक्ति’ का सन्देश देते हैं.

इस बार  सबलोग के स्त्रीकाल कॉलम के लिए ‘ आजादी मेरा ब्रांड’ के बहाने नई पीढी के पिता का तैयार –मानस. 



किसी भी स्त्री की कहानी पढ़ते हुए मुझे डर लगता है खासकर अगर कहानी में कोई सच्चाई हो, पुरुषों को स्त्रियों की कहानी से डरना ही चाहिए क्यों कि स्त्री  की हर कहानी एक आरोपपत्र होती है, मुझे तो लगती है अपने पर।  यायावारी आवारगी भी मैं तीन बार में कोशिश करके खरीद सका पहले दो बार राजकमल जाकर वापस आ गया, हिम्मआत नहीं हुई…तीसरी बार बिटिया (तेरह साल) को साथ ले गया उसीसे खरीदवा ली… अनुराधा के बारे में जितना पता था यानि एक आज़ाद ख्याल लड़की जिसने फार्मल स्कूल जाने के बजाए शतरंज खेलने को चुना और फिर एक दिन अकेले घूमने निकल पड़ी यही सब उसे बताया और उसने – वॉउ… से अनुराधा का स्वागत किया..मैं भी ऐसा ही ट्रैवल करुंगी का घोष भी। दावे से नहीं कह सकता पर शायद मुझे अच्छा लगा।
अभी किताब को पढ़ना शुरू करना बाकी था और मुझे पता था ये मुश्किल होने वाला था…औरत की  आज़ादी से हम सब डरते हैं। फिर से अपनी बिटिया मिष्टी का ही सहारा लिया…मिष्टी तुमने किताब पढ़नी शुरू की ? इसका शुरुआती हिस्सा- आजा़दी मेरा ब्रांड, फेवरेट,  खोलकर दी… इतनी हिंदी की उसे आदत नहीं पर उसने कोशिश की..लेकिन ‘पेट में तितलियॉं उड़ने’ पर आकर अटक गई… अब हिम्मत का मौका मेरा था…लाओ मैं पढ़कर सुनाता हूँ…फिर मैं पढ़ने लगा… लड़को के साथ सोने के प्रकरण को कब डरपोक बाप ‘लड़कों के साथ होना’ पढ़ गया मुझे पता ही नहीं चला.. मिष्टी  अब दूसरे कमरे में चली गई  और मुझे मालूम है कि आजादी का हर लफ्ज मुझ पर एक सवाल है पर मिष्टी के लिए जो दुनिया चाहिए उसके लिए जरूरी है कि सवालों से मुँह न मोड़ा जाए… इसलिए किताब पढ़ी तो पूरी गई ही,  अलबत्ता विद पेट में तितलियॉं

दरअसल आजादी मेरा ब्रांड हिन्दी में अपनी किस्म की पहली किताब होने के कारण इसे पढ़ने के लिए अपने कई सहज इलाकों से बाहर आना जरूरी है। मसलन रोहतक के गॉंव से निकलकर यूरोप के शहरों की सोलो बैकपैकर्स यात्रा पर निकलने के बीच की यात्रा में जो कुछ अनुराधा की जिंदगी में होता है वह सब ही हिन्दीर के पाठकों के लिए पर्याप्त झटके देने के लिए काफी है। यायावरी हिन्दी जगत के लिए एक पूरी तरह मर्दाना स्पेस है तिसपर एक लड़की सो भी अकेले न केवल इस स्पेस में अतिक्रमण करती है वरन बाकायदा इस घोषणापत्र के साथ के साथ करती है कि ये बाहर जान बेकाम का है, आवारगी है, किसी और की हो न हो मेरी आज़ादी है। इस किताब को सीधा साधा यात्रा वृत्तांत भी तो नही कहा जा सकता न। प्रस्तावना में स्वानद किरकिरे अनुराधा को भाव भिवोर शब्दों में नए जमाने की भारतीय फकीरन करार दे देते हैं जो इस मायने में सही है कि बिना फकीरन हुए पैरों में यात्राएं मचलती ही कहॉं हैं।  अनुराधा  भारतीय महिलाओं की मोबिलिटी पर लगी बेड़ियों पर जिस किस्म के सवाल उठाती हैं उनसे साफ होता है कि आज़ादी मेरा ब्रांड यूरोप की सड़कें नापना भर नहीं है यह भारतीय मानस की गांठे खोलने की जद्दोजहद है। हमारे समाज में लड़कियॉं यूँ ही बिना काम के नहीं टहलतीं, लड़की का बाहर जाना बिना किसी काम के अकल्पनीय है, क्योंक जाएगी लड़की बाहर ? क़्या करने ? लड़के अक्सोर कह देते हैं मैं जरा टहल के आता हूँ, ‘’बाहर होके आता हूँ’’ लेकिन ये शब्दो कभी लड़कियों के मुँह से नहीं सुने जाते- मैं जरा टहलकर आती हूँ। स्वाभाविक है जो समाज स्त्री  के टहलने, बाहर जाने को लेकर इतना अधिक आशंकित है,  वो भला उसके बाहर घूमने के लिए सुविधाएं भी क्योंकर जुटाने लगा ?  नतीजतन हमारे समाज की औरतें धुमक्कड़ होती ही नहीं। उनमें घुमक्ड़ी के संस्कार ही नहीं पनपते, आश्चर्य नहीं कि अनुराधा विदेश में बस गई जिन भारतीय स्त्रियों का वर्णन अपनी यात्रा में करती हैं वे भी इस आजा़दी की छाया से वैसे ही दूर दिखाई देती हैं जैसी भारत में बसी औरतें।

किताब के बारे में खुद अनुराधा बेनीवाल से सुनें

आज़ादी मेरा ब्रांड (यायावरी आवारगी का पहला पड़ाव) लिखना अनुराधा बेनीवाल के लिए आसान था या मुश्किल कहना कठिन है लेकिन मुझे इसे पढ़ते लगातार लगा कि अनुराधा की यह यात्रा कहानियॉं एक ऐसा दस्तावेज है कि बिना खुद को भीतर टटोले इसे पढ़ पाना आसान नहीं। यद्यपि अनुराधा कोई आरोप नहीं लगातीं, लगभग कहीं भी फैसलाकुन नहीं होती। किसी व्यक्ति, शहर, वक्त को एकबारगी अच्छा या बुरा करार नहीं दे देंतीं लेकिन सच तो यही है कि किसी भी स्त्री , खासकर भारतीय स्त्री  की सच्ची कहानी होती एक आरोपपत्र ही है। हालांकि एक फेसबुक संवाद में उन्होंने इसे लिखने को भी आसान काम नहीं माना है – ”ऐसा नहीं है के लिखते हुए घबराहट मुझे नहीं हो रही थी। लेकिन फिर पापा के वो शब्द याद आये, “अनु अपने से ऊपर उठ के लिखना, तुम्हारी नहीं एक लड़की की कहानी है, साक्षी भाव से लिखना। जब लिखोगी तब तुम अनु नहीं एक लेखिका हो जो अनु की यात्रा के बारे में लिख रही है।” जाने कहाँ तक सफल हुई हूँ अनु को कह पाने में, लेकिन कोशिश पूरी की है।”

लेखिका ग्रामीण चौकड़ी में 

बाहर-भीतर का यह आज़ाद आख्यान उन्हें आरोप पत्र नहीं लगता– ”मेरी किताब आरोपपत्र नहीं बस एक पत्र है समाज के नाम, के आज़ादी नहीं है और होनी चाहिए। स्त्री पुरुष दोनो ही जकड़े लगते हैं कोई किसी तरह तो कोई किसी।”  इसके बावजूद मेरा डर कायम था। । मेरे डर लंदन, पेरिस, एम्ट् नहर्डम, बर्लिन, प्राग, बुडापेस्टा आदि शहरों से नहीं हैं इन शहरों से हासिल अनुराधा की आज़ादी से हैं, अच्छा चलो हासिल नहीं कहते सिर्फ आज़ादी की खोज से कह लेते हैं पर है ये खतरनाक ही, कम से कम उन सभी ढॉंचों के लिए तो निश्चित खतरनाक है जो इन यूरोपीय देशों से दूर बहुत दूर यहॉं सहारनपुर, भरतपुर या खुद अनुराधा के शहर रोहतक या भिवानी में औरत को ठीक उसी कैद में बनाए रखना चाहते हैं जिसमें वह है।  हमारे समाज के मानस में काबिज पुरुष स्त्री की सहजता से बहुत डरता है, स्त्री के मन में अगर यूँ अकेले बेकाम टहलने की इच्छा जागने लगे तो यह यकीनन उस जकड़ के कमजोर हो जाने की निशानी मानी जाएगी जिसके बल पर औरत को अब तक कैद रखा जा सका है। स्त्री अगर अपनी छोटी बड़ी इच्छाओं की इज्जत करना शुरू करती है तथा उनके त्याग के महिमामंडन से आज़ाद होती है तो ये उसकी ऐसी आजादी होगी जिसे उससे छीनना संभव नहीं रह जाएगा। पुस्तक में एक-एक सबसे प्रभावशाली वाकया अनुराधा की इतालवी मित्र रमोना से जुड़ा है, जो अनराधा को घुमंतु बनाने और अपनी इच्छाओं की इज्जत करना सिखाने में अहम भूमिका अदा करता है। रमोना जिस सहजता से दोस्तों के साथ चलने की जि़द के सामने झुकने की बजाए अपनी स्नान करने की इच्छा  को तरजीह देती है फिर लेखिका और उनके एक पुरुष मित्र के सामने बेहद सहजता से कपड़े बदलती है, इसका प्रभाव लेखिका की जिंदगी के फलसफे पर गहरे पड़ता है। एक पाठक के रूप में भी हम इस प्रकरण पर ठिठके बिना आगे नहीं बढ़ पाते।  

लेखक अपनी बिटिया के साथ 

यूँ आज़ादी मेरा ब्रांड हिन्दी का पहला बैकपेकर ट्रेवलॉग (महिला), है जो लंदन में बसी अनुराधा का महीने भर में यूरोप के कुछ शहरों की यात्रा की कहानी भर है। जैसा प्रस्ताकवना में स्वानंन्द किरकिरे कहते हैं- “किसी का यात्रा वृत्तांरत ही तो है”, किंतु हम जानते हैं ये इससे कुछ ज्यांदा है। बहुत ज्यादा है। इसमें आज़ादी की जो खोज है, स्त्रीं की आज़ादी की खोज वही इसका कुल हासिल है । लेकिन ये यात्राएं बाहर की उतना शायद नहीं है जितनी भीतर की, दरअसल भीतर की ही हैं, पूर्वग्रहों से आज़ादी की, फैसलाकुन होने से आज़ादी की, सही या गलत करार देने के सुख से आजादी की – लेखिका एक ही निष्क,र्ष पर पहुँचती है कि कोई फैसला आखिरी नहीं- ज्यों ज्यों दुनिया घूमती हूँ एक ख्यािल पक्का होता जाता है कि जैसे धरती पर कोई भी समय गलत नहीं होता है। हर घड़ी कहीं न कहीं का सही वक्त‍ बता रही है ऐसे ही न कोई शहर गलत है, न कोई गली गलत है, न ही कोई इंसान गलत है: कहीं न कहीं सब एकदम फिट हैं।

आज़ादी का अनुराधा ब्रांड भी अंतिम नहीं है न ही ये दुनिया या देश की तमाम लड़कियों के आज़ादी का ‘हाउ टू’ कोटि का प्राईमर ही है,  किंतु अनुराधा की आज़ादी के मैप का एक खाका जरूर है जो सच्चा है जिससे कोई कुछ सीखे न सीखे लेकिन औरत की आजादी के खिलाफ तबके को सिहरन इससे जरूर होगी।

ब्‍लॉगर व स्‍तंभकार (डा) विजेंद्र सिंह चौहान हिन्‍दी के शुरूआती ब्‍लॉगरों में से हैं। यूनीकोड-पूर्व युग में उनके संपादन में ‘इत्रिका’ हिन्‍दी की आरंभिक इंटरनेट पत्रिका थी। इनकी पुस्‍तक ‘मीडिया व स्‍त्री:एक उत्‍तर विमर्श’  भारतेंदु हरिश्‍चंद्र राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार (भारत सरकार) से सम्‍मानित कृति है। इसके अतिरिक्त एक पुस्‍तक, कई लेख, शोध आलेख, ईप्रकाशन। डाक्‍टरेट शोध साहित्‍येतिहास पर है तथा पोस्‍ट-डाक्‍टरेट स्‍वतंत्र शोध दिल्‍ली के सिटीस्‍केप में दिक् व काल (टाईम व स्‍पेस) पर है।  हिन्‍दी ब्‍लॉग संबंधित उनके शोधकार्य “Vernacularly Yours: A Look at the question of complex linguistic identity on Hindi Blogosphere”  , डीजी तांत्रिक तेवर : हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत की संरचना व सरोकारों का अध्‍ययन”,  Hermeneutics of Hypertext सराहे गए हैं।
विजेंद्र ब्‍लॉगजगत में अपने ब्‍लॉगों मसिजीवी व हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर  के लिए जाने जाते हैं। जबकि आफलाइन जीवों के लिए दैनिक जनसत्‍ता में ब्‍लॉगजगत की चर्चा का उनका स्‍तंभ ‘चिट्ठाचर्चा’ भी वे लिखते थे।
  संप्रति: दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्‍ली कॉलेज में हिन्‍दी विभाग में असिस्‍टेंट प्रोफेसर ।

मालिनी अवस्थी से बातचीत

लोकगायिका मालिनी अवस्थी से संजीव चंदन की बातचीत. मालिनी ने लोक गीतों की विधा , अपने करियर
विवाह , परिवार , स्त्री -अधिकार पर बात की – गीतों और बातचीत के जरिये अपनी बात कही .

Women and peace

CNDP, along with Nfiw and Streekal, had organised a seminar on 25th January in JNU. CNDP activist Kumar Sundram talked with the renowned and senior American feminist and civil rights activist Vinie Burrows, and Mehdi Fatma Hassan.

Women and peace : Confronting Militarism and Masculanities