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अनिता भारती की किताब को ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान, 2016’ की घोषणा

स्त्रीवादी पत्रिका , ‘ स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच’ के द्वारा वर्ष 2016 के लिए ‘ सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’  लेखिका अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद  और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ ( स्वराज प्रकाशन) को देने की घोषणा की गई है. अर्चना वर्मा , सुधा अरोड़ा , अरविंद जैन,  हेमलता माहिश्वर, सुजाता पारमिता, परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने यह निर्णय 3 अप्रैल को 2016 को बैठक के बाद लिया . 2015 में पहली बार यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीआर्की ‘ (नवयाना प्रकाशन ) के लिए दिया गया था.

इस सम्मान के लिए 2009 से 2015  तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने अंतिम तौर पर प्रमिला के पी, सुधा सिंह , रेखा कास्तवार, कृष्ण कुमार,  रोहिणी अग्रवाल और अनिता भारती की किताबों, क्रमशः ‘ यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता’ ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ ‘ ‘स्त्रीचिंतन की चुनौतियां’, ‘चूड़ी बाजार में लडकी”हिन्दी उपन्यास का स्त्रीवादी पाठ’ तथा ‘ समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ पर विचार किया.  निर्णय के लिए दो दर्जन से अधिक किताबों पर विचार किया गया.

निर्णायक मंडल ने अपने अंतरिम नोट में कहा कि: ‘ दलित स्त्रीवाद की किसी आंगिक (ऑर्गनिक) विदुषी  द्वारा दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी निर्मित करने की दिशा में हिन्दी की यह पहली किताब है . इस किताब में 7 खण्ड है’ : क्रमश: दलित लेखिकाओं का स्त्रीवादी स्तर, खुद से गुजरते हुए, साहित्यकार प्रेमचन्द और दलितस्त्री, संघर्ष के विविध आयाम, छूटे पन्ने, पितृसत्ता को चुनौती, अम्बेडकरवाद और दलित साहित्य। इस प्रकार- किताब मूलत: स्त्रीवादी लेखन के इतिहास- वर्तमान को केन्द्रित कर समकालीन स्त्रीवाद में दलित स्त्री के प्रतिरोध को चिहनित और स्थापित करती है।’

‘ यह सम्मान 20 जुलाई , 2016 को दिया जायेगा,’ यह जानकारी देते हुए स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि ‘ यह दिन ऐतिहासिक दिन है. इस दिन ही 1942 में डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के द्वारा प्रेरित महिलाओं का ऐतिहासिक सम्मलेन नागपुर में संपन्न हुआ था, जिसमें 25000 महिलाओं ने भाग लिया था.’ इस वर्ष देश बाबा साहेब आम्बेडकर का 125 वी जयंती भी मना रहा है. इस लिए भी दलित स्त्रीवाद की एक किताब के लिए दलित स्त्री लेखिका अनिता भारती को सम्मानित करने का निर्णायक मंडल का निर्णय महत्वपूर्ण है . इस सम्मान के लिए किताब की लेखिका / लेखक को स्त्रीवादी विचारक और अधिवक्ता अरविंद जैन के द्वारा 12 हजार रूपये की राशि दी जाती है .

क्या बिहारी फिल्मों की खोई प्रतिष्ठा वापस लायेगी ‘मिथिला मखान’ ?

इति शरण 


इन दिनों बिहारी फिल्मों का मतलब गंदे और भद्दे पोस्टर वाली भोजपुरी फिल्मों को ही समझ लिया गया है। जिनके पोस्टर और नाम पढ़कर ही प्रबुद्ध बिहारी तबका उससे अलगाव कर ले। इन सबके बीच एक मैथिलि भाषा की फ़िल्म ‘मिथिला मखान’ को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा जाता है, जबकि इस फ़िल्म को अभी तक बाज़ार में उतारा भी नहीं  जा सका है। यह फ़िल्म उन दूसरी बिहारी फिल्मों से अलग है जो बाज़ारवाद के दौर में बिहारी संस्कृति को पीछे छोड़ चुकी है, जहाँ असली बिहार दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

‘मिथिला मखान’ मिथिला क्षेत्र की कहानी है। फ़िल्म में स्थानीय राजनीति से विपन्न हुए गांव का संघर्ष दिखाया गया है। इन सबके बीच फ़िल्म में मिथिला संस्कृति का सौंदर्यदर्शन भी होता है। बॉलीवुड अभिनेत्री नीतू चंद्रा द्वारा निर्मित और उनके भाई नितिन चंद्रा द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म की पहली स्क्रीनिंग पटना में हुए बिहार फिल्मोत्सव में हुई थी।

इस युवा निर्माता को बॉलीवुड की चकचौंध ने कभी आकर्षित नहीं किया। नितिन का कहना है कि मैं बिहारी हूँ, इसलिए मैंने बिहारी भाषा में फ़िल्म बनाई। नितीन कहते हैं कि बॉलीवुड हमारा है ही नहीं। मैं भोजपुरी भाषी हूँ, बिहार का निवासी हूँ यहाँ मुझे ज्यादा अपनापना मिलता है।


इसके पहले भी नितिन भोजपुरी फ़िल्म ‘देसवा’ बना चुके हैं। फ़िल्म को अंतराष्ट्रीय ख्याति भी मिली मगर फ़िल्म रिलीज़ नहीं हो सकी। नितिन का कहना है कि फ़िल्म पूंजी का खेल है। फ़िल्म बनाने से लेकर उसके डिस्ट्रीब्यूशन तक में बड़ी पूंजी की जरूरत होती है।

नितिन की पूंजी संबंधी बात के साथ ही इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि बिहारी में भोजुपरी सिनेमाओं के एकाधिकार के आगे मिथिला मखान और देसवा जैसी सिनेमाओं को जगह नहीं मिल रही। आज बिहार की सिंगल थिएटर में भोजपुरी सिनेमाओं ने कब्ज़ा जमा लिया है। यह मान लिया गया है कि बिहार की जनता बिहारी फ़िल्म के रूप में भद्दे पोस्टर और भद्दे गानों वाली फ़िल्म ही देखना पसंद करेगी। देसवा और मिथिला मखान को दर्शक नहीं मिलेंगे।

भोजपुरी सिनेमा और मैथिलि सिनेमा की शुरुआत लगभग साथ-साथ ही हुई। 1963 में नाज़िर हुसैन ने पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ बनाई। जो आज भी भोजपुरी की क्लासिक फिल्मों में से एक मानी जाती है। वहीं 1965 में फनी मजूमदार ने पहली मैथली फ़िल्म ‘कन्यादान’ बनाई। भोजपुरी फिल्मों की शुरुआत के बाद लगातार कई फ़िल्में बनी, मगर मैथली फिल्मों का दौर चल नहीं सका। 70 के दशक में ‘ममता गावे गीत’ के बाद मिथिला भाषा की फ़िल्म का निर्माण जैसे थम ही गया। फिर 2002 में मैथली फ़िल्म ‘सस्ता जिंदगी मेहंगा सिंदूर’ आई। उसके बाद भी एक दो ही मैथली फिल्मों का ही निर्माण हुआ। जबकि भोजपुरी सिनेमा में एक समय ब्रेक आने के बाद भी वह वापस से पटरी पर आ गई। 2000 के बाद भोजपुरी सिनेमा का एक दौर आया। मगर व्यवसायीकरण के प्रवेश के बाद भोजपुरी फिल्मों का स्तर गिरना शुरू हो गया, जो कि हिंदी फिल्मों की दोयम दर्जे की फिल्मों की प्रतिछाया बनकर रह गई।  परिणामस्वरूप पढ़े लिखे बिहारी तबकों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी ।

इन सबके बीच नितिन और नीतू की भोजपुरी फ़िल्म देसवा आने पर उसे पर्दे पर जगह नहीं मिल सकी। नितीन बताते है कि देसवा को 16 देशों में दिखाया गया, इसे अंतराष्ट्रीय ख्याति भी मिली। मगर अपनी ही धरती पर उसे जगह नहीं मिल सकी।

नीतू कहती हैं कि हम भोजपुरी सिनेमा की खोई इज़्ज़त “छाप” रहे हैं, जिसे आज के तथाकथिक भोजपुरी सुपरस्टार्स ने गँवा दिया है। नितिन तो आज कल की भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरी सिनेमा मानने से भी इंकार करते है। उनका कहना है कि जब एक प्रबुद्ध  बिहारवासी खुद को उस फ़िल्म से जोड़ ही नहीं पाये तो वह उनका सिनेमा कैसे हुआ ?

बहरहाल, सवाल यह भी उठता है कि अगर इन फिल्मों को रिलीज़ मिले भी तो क्या यह फ़िल्में दर्शक जुटा पाएंगी। जिस तरह बंगला फिल्मों और साउथ की फिल्मों को वहां की जनता ने अपनाया हुआ है क्या प्रबुद्ध बिहारी जनता एक अच्छे विषय पर बनी बिहारी फ़िल्म को अपनाएगी ?

इस बात का निष्कर्ष निकालना थोड़ा मुश्किल है। बिहार की युवा पीढ़ी बिहारी भाषा से ही दूर होती जा रही। नितीन भी कहते है कि जिस तरह बंगला भाषी, मराठी भाषी, तेलगु या तमिल भाषी अपनी भाषा से प्यार करते हैं, क्या एक बिहारी अपनी भाषा से प्यार कर पाता है ? हम बिहारी अपनी भाषा में बात करने से भी कतराते हैं। लेकिन शायद बिहारी भाषा की अच्छी फ़िल्में बिहारियों को उनकी भाषा के करीब लाने का काम कर सकती है।

निदेशक नितिन चंद्रा

मैथिल साहित्यकार उषा किरण खान ‘मिथिला मखान’ जैसी फिल्मों का निर्माण एक अच्छा कदम मानती है। उनका कहना है कि आगे और भी मिथिला फ़िल्में बननी चाहिए। उषा खान मानती है कि जिस प्रकार बंगला साहित्य पर फिल्मों का निर्माण होता है उसी तरह अगर मिथिला साहित्य जिसकी अपनी अंतराष्ट्रीय ख्याति भी है उनपर भी फिल्मों का निर्माण होना चाहिए। इससे मिथिला फिल्मों को एक गंभीर स्वरूप मिल सकता है और शायद दर्शक भी।

रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट

असीमा भट्ट

रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com

प्रत्युषा मर गयी. वह क्यों मरी? क्या हुआ उसके साथ यह अटकलें लगायी जा रही है. ज़्यादातर लोग बार -बार प्रेम में असफलता पर ज़ोर दे रहे हैं. जबकि वह कोई पहली अभिनेत्री/मॉडल नहीं है,  जिसने आत्महत्या की. परवीन बॉबी, दिव्या भारती,नफीसा जोसेफ, सिल्क स्मिता, कुलजीत रन्धावा, जिया खान,., और भी कई नाम हैं,  जिन्होंने  आत्महत्या की या मारी गईं . कुछ रहस्य है,  कुछ से पर्दा उठना बाक़ी है, कुछ भुला दी गयीं या फिर यह  भी भुला दी जायेगीं.  स्मृतियाँ बहुत जल्द विस्मृत हो जाती हैं. विस्मृत की  जाती हैं.. सबकुछ वापस वैसे ही अपनी- अपनी पटरी पर.

प्रत्युषा भी भुला दी जाएगी. एक ऐसी अभिनेत्री जिसने बालिका वधु में ‘आनंदी’ की भूमिका  निभायी. यह सीरियल अब तक सबसे अधिक लम्बा चलने का  रिकॉर्ड बनाने वाला और सबसे हाई टीआर पी (टेलीविजन रेटिंग पॉपुलारिटी पॉइंट) वाला सीरियल माना जाता है. ऐसी लोकप्रियता के लिए कोई भी कलाकार सपना देखता है. उसे यह सब कुछ इतनी जल्दी और आसानी से मिला फिर क्या वजह रही , सिर्फ़ प्रेम प्रंसग …..?

आज इंडस्ट्री में एक्टिंग स्कूल से ज़्यादा मनोचिकित्सक की जरूरत है |

शायद कुछ लोग जानते हों या याद हो कि ‘बैंडिट क्वीन’ फ़िल्म में  सीमा बिस्वास ने फूलन देवी की भूमिका निभायी थी. यह बात पता नहीं कितने लोग जानते हैं कि सीमा बिस्वास को उस क़िरदार से बाहर निकलने में काफ़ी वक़्त लग गया था. फूलन देवी के साथ जो उसकी रीयल ज़िन्दगी में हुआ, उसे सीमा बिस्वास को फूलन बन कर रील (सिनेमा) जिंदगी में जीना पड़ा. उन सबसे वह वैसे ही गुज़री जैसे फूलन देवी – अपने जीवन में हर तरह की यातना झेलती हुई. और सच्चाई को सिनेमा में जीते- जीते कई बार अभिनेता उस तरह सोचने और जीवन को देखने लगता है,  जिससे कई बार किरदार से बाहर आने में वक़्त लग जाता है या बहुत मुश्किल होती है.

बल्लभ व्यास ने रामगोपाल बजाज के निर्देशन में सुरेन्द्र वर्मा का ‘क़ैद ए हयात’ में ग़ालिब की भूमिका निभायी थी. बल्लभ व्यास भी उसी तरह ग़ालिब के किरदार में लम्बे अर्से तक गिरफ़्त रहे. उनकी आँखें लगातार ग़ालिब जैसी  ही चढ़ी रहती. हमेशा उदास बेक़रार  … जैसे किसी चीज़ की तलाश… हर वक़्त कुछ ढूंढती आँखें…
यह हाल होता है एक प्रशिक्षित अभिनेता का,  जबकि उन्हें इस बात की ट्रेनिंग विधिवत दी जाती है कैसे वे किरदार में जाएँ और कैसे बाहर आयें. ‘How to switch on and switch off. How to attach and detach with character.’  किसी अभिनेता के लिए यह बुनियादी प्रशिक्षण है कि अभिनय में यह अभ्यास सीखें कि कैसे अपनी भूमिका में किसी खास वक़्त तक ही रहना और फ़िर उसके बाद उससे बिल्कुल बाहर निकल आना सीखना होता है.  मंच पर और कैमरे के सामने भी याद रखना बहुत ज़रुरी है कि वह एक दी गयी भूमिका निभा रहा/रही है न कि वह स्वयं वह है. एक बारीक रेखा हमेशा अभिनय और अभिनेता में रखनी पड़ती है और यह कला एक कलाकार को सीखनी बहुत ही ज़रूरी है, नहीं तो उसी में उलझा रहेगा/रहेगी. अगर ‘रोमियो जूलियट’ कर रहे हैं तब यही समझें कि सचमुच ‘रोमियो जूलियट’ हैं,  वैसे दूसरे के लिए मरेंगे. जबकि मरना तो है ही नहीं किरदार को जीना है.  ‘ऑथेलो’  करेंगे तो  डेस्डेमोना  की हत्या करेंगे. फिर क्या होगा? तुग़लक़ नाटक करेंगे तो क्या होगा ? कितनी लाशे बिछेंगी मंच पर? ‘लव मेकिंग’ सीन में यह लगते हुए भी कि आप डूब कर शिद्दत से  प्यार कर रहे हैं,  वहां भी बहुत सूक्ष्मता से ध्यान रखना होता है कि कैसे आप सिर्फ़ ‘Act’ कर रहे हैं. यह सबसे मुश्किल होता है एक अभिनेता अभिनेत्री के लिए. कैसे आप ऐसे सीन में अपने सह-कलाकार को कॉमफ़र्ट देते हैं जिससे वह सीन बेहतरीन भी हो, दर्शक कन्विंस हो ,  खूबसूरत भी हो और अभिनेत्री को भी लगे कि आप ऐसे सीन का कोई लाभ नहीं उठा रहे होते हैं. यह सब बहुत जरूरी है अभिनेताओं को सीखने और यही नहीं आता तो बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी होता है अभिनेता और अभिनेत्रियों पर. कई बार अभिनेत्रियाँ मना कर देती हैं ऐसे सह कलाकारों के साथ काम करने से.

हत्या, बलात्कार यहाँ तक कि माँ, पिता, पति आदि की मृत्यु के दृश्य में यह मुश्किल होता है,  अगर मान लिया कि वो सचमुच उनके अपने हैं तो गहरा मानसिक सदमा पंहुच सकता है.  इस तरह की  बातों  पर ध्यान  नहीं दिया गया तो खतरें होते हैं और होने की हमेशा सम्भावना बनी रहती है. यह दर्शक नहीं समझ सकते लेकिन अभिनेता और उनके साथ काम करने वाले अन्य कलाकारों के साथ साथ निर्देशकों को भी समझ आनी चाहिए.
एक बार जब ‘बैरी पिया’ के सीरियल में मैं विधवा की भूमिका कर रही थी. जिसमें न चाहते हुए मेरा मंगलसूत्र कैमरे में झांक रहा था. रणदीप महाडिक निर्देशक थे,  मेरे पास आये और धीरे से कान में कहा – अगर आप बुरा न मानें तो क्या सिर्फ़ सीन करने तक मंगलसूत्र निकाल सकती हैं? टेक के बाद आप पहन लीजियेगा. और वह व्यहार इतना आग्रहपूर्ण था,  और एक अभिनेता की संवेदना को ख्याल में रखकर किया गया कि तुरंत मैंने मंगलसूत्र गले से निकाल कर उन्हीं के हाथों में पकड़ा दिया. अगर इसी बात को  कहने का उनका तरीका कुछ और होता तो शायद बहस होती या मन ख़राब होता,  प्रोफस्लिज़म के साथ इमोशन का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी होता है. और अक्सर यह बात अभिनेता भी भूलते हैं और निर्देशक भी. एक दृश्य था ‘प्रथा’ सीरियल में,  जिसमें मेरे बेटे की भूमिका कर रहे अभिनेता का एक्सीडेंट हुआ है और शव मेरे सामने पड़ा होना था है. अभिनेता को मेकअप रूम से बुलाया गया. और कहा गया – ‘चल तू मर गया लेट जा अर्थी पर…’  यह इतना अमानवीय तरीके से कहा गया कि मुझे बहुत बुरा लगा. लेकिन यह बात सिखायी नहीं जाती जबकि सिखायी जानी चाहिए और सीखनी चाहिए.

भावनात्मक दृश्य का यानी रोने धोने वाले दृश्य का नाम ‘ग्लिसंरींन के आंसू’ रखा गया है. और सेटपर कहा जाता है – ‘लाओ TRP लाओ.’  रिसर्च के तहत ऐसे सीन लिखे जाते हैं कि अभिनेत्री को जितना सताया जायेगा और अभिनेत्री जितना रोयेगी , उतना ही दर्शक भावुक होंगे और ‘TRP’ उतनी ही बढ़ेगी. दर्शकों की भावनाओं के किस तरह खिलवाड़ किया जाता है यह दूर दराज़ की भोली–भाली दर्शक क्या समझे. वह तो इस बात पर भूखे प्यासे रह जाते  हैं कि आज उनकी अमुक पसंदीदा अभिनेत्री को उसके पति ने मारा या सास ने ताने दिये  और अभिनेत्री दुःखी होकर भूखी-प्यासी सो गयी. जबकि पैकअप के बाद अभिनेत्री देर रात किसी नाईट क्लब में नाचती उछलती पायी जायेगी.

रामानन्द सागर का रामायण कितने लोगों को याद है दीपिका ने उसमें सीता की भूमिका निभायी थी. अब कितने लोगों वो याद है? जबकि उस दौर में सीता की भूमिका में उसकी तस्वीर घर घर लगी पायी जाती थी और लोग उसकी पूजा आरती करते थे. अभिनेता भी अपने क़िरदार को निभाते निभाते कई बार खुद वही समझने लगता है जो भूमिका निभा रहा होता. जबकि होना यह चाहिए कि जैसे ही आपने अपना क़िरदार का ड्रेस बदला वैसे ही आप उससे बाहर आयें. यानी चोला बदलना आना चाहिए. ऐसा जो अभिनेता अभिनेत्री नहीं कर पाए इनमें उनलोगों की संख्या बहुतायत है,  जिन्होंने आत्महत्या तो नहीं की लेकिन भारी मात्रा में शराब या ड्रग्स की गिरफ्त में हैं , आज उनकी कोई पहचान नहीं. धीरे -धीरे लोग तब्बू और सीमा बिस्वास जैसी अभिनेत्रियों को भूलते जा रहे हैं. ग्रेसी सिंह जैसी अभिनेत्री , जो लगान’ और मुन्ना भाई एम्.बी.बी.एस. जैसी हिट फिल्मों की अभिनेत्री थी उसके बारे में लोग पूछने लगे थे कौन ग्रेसी सिंह ? दुबारा वे  संतोषी माता के रूप में छोटे पर्दे पर अवतरित हुई हैं.

महेश भट्ट की बहुत ही हिट फ़िल्म आयी थी आशिक़ी/ कितने लोगों को याद है उसकी अभिनेत्री अनु अग्रवाल ने जो  एक कार एक्सीडेंट में अपना चेहरा पूरी  तरह खो बैठी, किसी तरह मेडिकल और मेडिटेशन से अपना दुबारा जीवन पाया.  यह नियति है कलाकारों की और वो इस चमक दमक वाली खोखली दुनिया को जितनी समझ लें उतना ही उनके लिए अच्छा होगा. राजेश खन्ना , जिनके ज़माने में सडक पर निकलने पर लडकियाँ अपना दुपट्टा लहराती थी,  आख़री दिनों में बेहद अकेले पड़ गए थे.  सब चढाते सूरज को सलाम करते हैं
जब तक सितारा बुलदं है. फिल्म/टीवी शो चल रहा है. अभी आपके पीछे घूमते हैं. निर्देशक, प्रोडूसर और फैन. सबकी अभिनेताओं को आदत लग चुकी होती. पेज थ्री पर आने के लिए क्या क्या नहीं जुगत लगाते हैं,  लेकिन यह नहीं पता होता कि पेज थ्री की कितनी उम्र होती है. उन्हीं पेज थ्री से बच्चों की पॉटी साफ़ की जाती है.
मैंने यह किया. मैंने इतनी हिट फ़िल्में की. मेरा शो इतना पॉपुलर था,  यह सोच सोच कर एक झूठी शान में जीने की आदत बना लेने वाले कलाकार बहुत जल्दी टूटते हैं,  जब उनके घर सिर्फ़ फ़ोन आना कम हो जाता है. चाहने वालों से घिरे रहने वालों से अचानक जब लोग मुंह मोड़ लेते हैं,  तो यह सदमा उन्हें बर्दाश्त नहीं होता.  वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं. जबकि पिछले दो साल पहले की हिट फ़िल्में लोगों को बमुश्किल याद रहती है. एक साल पुराना सबसे हाई टीआरपी सीरियल बंद होने के बाद दर्शक उसे भूल जाते हैं. जिनके कलाकारों को रेड कारपेट पर चलने की आदत हो जाती है, फोटोग्राफ और ऑटोग्राफ देने की आदत हो जाती है,  अचानक जब कोई उन्हें पूछने नहीं लगता,  तो यह हीरो/हीरोइन वाले इमेज को झटका सा लगता है. सहन नहीं कर पाते. जिन्होंने समय पर शादी कर ली ,  बाल बच्चे हो गए. और अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम कर लिए. गाड़ी,मकान में इन्वेस्टमेंट कर लिया,  ठीक ठाक हैं,  वरना उनकी हालत है कि उनको भी मलाल रहता है अब वो दिन नहीं रहे जब वे स्टार हुआ करते थे.

सफ़लता की मुक़ाम पर क़ायम रहना भी कला है 


अपने सोचे से क्या होता है शाद 
खुदा की देन है मशहूर हो जाना 
सफलता एक तो सबको नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो सफ़लता की मुक़ाम पर कायम रहना उससे भी बड़ी कला है. क्या लगता है अमिताभ बच्चन को आसानी से सफ़लता मिली? और मिल गयी तो आसान है उन्हें आपनी जगह पर क़ायम रहना. सफ़लता की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है हर कलाकार को वरना हर वक़्त एक असुरक्षा की भावना से जीते हैं कि कब वो जिस पायदान पर हैं उससे नीचे आ गिरें या हटा दिए जाएँ. आज बॉलीवुड में शाहरुख खान भी असुरक्षित हैं कि कब कोई नया अभिनेता आकर उनकी जगह ले ले. अभिनेत्रियों का करियर तो और भी कम होता है फ़िल्मी दुनिया में. जूही चावला और काजोल जैसी अभिनेत्री की लोकप्रियता भी मिट गयी. तो जो एकाध फ़िल्मों में आयी और काम किया , वह कब आयी और कब गयी किसी को याद नहीं. याद रखने की ज़रूरत भी किसे हैं. सिनेमा है/टीवी है कोई जिंदगी थोड़े है. और जब जिंदगी की बड़ी से बड़ी घटना विस्मृत कर दी जाती है तो टीवी/सिनेमा कोई क्यों और कितनी देर याद रखेगा? सफलता और उसकी चमक दमक आज है कल नहीं होगी. यह बात अगर अभिनेता स्वीकार ले और सहजता से आम इन्सान की तरह जीये तो कोई  तकलीफ़ नहीं होगी. जिंदगी ने अवसर दिया आपने सफ़लता को जिया/भोगा.   सहज बने रहकर सहजता से जीना आना भी सीखना एक अभिनेता को आना चाहिए. और जीवन के हर अवस्था को गरिमापूर्ण जीना सीखना आना चाहिए. यह जब एक कलाकार नहीं सीख पाता तो अकेलापन और अवसाद से ग्रस्त हो जाता है.

सामाजिक/मनोवैगानिक कंडीशनिग़
ग्लैमर की चकाचौध दुनिया लोगों को बहुत मनभावन लगती है. रातों रात की लोकप्रियता एक ऐसे चाँद की तरह है जिसे देख हर कोई ललचाता है. इसकी झमता. प्रतिभा, गुणवत्ता आपमें है भी या नहीं. या सिर्फ बच्चे की तरह  चाँद देख कर मचल गए कि मुझे भी चाँद चाहिए. चाँद चाहिए तो चाँद को छूने के लिए अपनी कद को भी उतना ऊँचा बनायें. वरना तो मुंह की गिरेगे. समाज में भी टीवी/फ़िल्म के कलाकारों को अगल दुनिया से आये एलियन की तरह देखा जाता है. और वो क्या करता होगा? क्या खाता होगा?  वह भी आम इन्सान हैं. उन्हीं पांच तत्वों से बना है,  जिनसे आप. आप जो खाते हैं वो भी खाता है,  वो भी सोता है,  वो हंसते हैं,  रोते हैं. कालिदास के संस्कृत के नौ रस की तरह उनमें भी नौ रस हैं. और मनुष्य के भाव यूनिवर्सल होते हैं. चाहे वो राजा हो या रंक फिर अभिनेता हो या दर्शक . उनसे अलग इंसानों जैसा उम्मीद करना आम जनता की भूल है या जो सोचते हैं कि हीरो हमेशा दस पर भारी पड़ेगा और हिरोइन मक्खन जैसी होती है. उसके बाल और आंचल अस्वाभाविक तरीके से हवा में लहराते हैं. ऐसा कुछ नहीं होता. सारे कलाकार इंसान पहले हैं,  उनकी भावनाएं और दुःख- सुख भी सामान्य लोगों की तरह हैं. नहीं तो प्यार होने और प्यार में दिल टूटने पर रोते नहीं और जान नहीं देते. ‘ फेयरी  टेल’  वाले कांसेप्ट से बाहर निकलें. कालिदास ने नाटक कैसे देखें इस पर अलग से लिखा है. एफ़टीआईआई भी एक खास प्रशिक्षण देते हैं ‘HOW to watch cinema’

नाटक और सिनेमा देखना भी एक कला है और उसको वहीं  तक रहने दें. उसके बाद अभिनेता ने जो अभिनय सिनेमा/स्टेज/टीवी पर निभाया उससे उसके निज़ी जिंदगी में वैसा उम्मीद करना नासमझी है. फ़िल्म/टीवी/स्टेज़ पर बुरा चरित्र निभाने वाला बुरा नहीं होता और सब अच्छा चरित्र निभाने वाले महान इंसान नहीं होता.  अक्सर लड़के -लड़कियां हीरो- हीरोइन जैसे पति -पत्नी और जीवन साथी की कल्पना कर लेते हैं,  जबकि खुद अभिनेता और अभिनेत्रियों की ज़िन्दगी कितनी खोखली होती है. एक ऐसी रौशनी है,  जिसके पार मुश्किल से दिखायी देता है या उसके पार की सच्चाई को देखना चाहेंगे तो आँखें धुंधली हो जायेगी. इसलिए जो जैसा है रहने दें. कैमरे के पीछे देखने की कोशिश न करें. नहीं तो इतनी मायूसी होगी कि आपने सुना होगा कि शूटिंग देखने के बाद फ़िल्म देखने का मन नहीं करता. इतनी बार रिटेक देते हैं वो. हम तो एक बार में कर लें. ऐसा लगता है. ज़लेबी खाने जैसा आसान नहीं है.

अवतार सिंह ‘पाश’ की एक कविता की पंक्ति है . ‘मैं इन्सान हूँ. बहुत कुछ जोड़ -जोड़ कर बना हुआ’ 
कलाकार भी इन्सान होते हैं. आम इन्सान की तरह बहुत कुछ जोड़ कर बने होते हैं. उनके भी दुःख/सुख और सफलता और असफलता होती है. रील और रीयल जिंदगी के बीच भारी अंतर है और इस अंतर को बैलेंस करना सीखना पड़ेगा.  सपनों की दुनिया नहीं है. सच की सतह है और जिंदगी में सच की सतह  पर सब कुछ होता है , सुख भी,  दुःख भी.  धूप भी, छाँव भी.

‘प्रेमकथा एहि भांति बिचारहु’ दलित प्रेम कहानी का आशय

बजरंग बिहारी तिवारी

हिंदी के आलोचक ।  दलित मुद्दों पर प्रतिबद्ध आलोचक  सम्पर्क  .9868261895

प्रेम की सामर्थ्य देखनी हो तो संतों का स्मरण करना चाहिए| संतों में विशेषकर रविदास का| प्रेम की ऐसी बहुआयामी संकल्पना समय से बहुत आगे है| उनके समकालीनों में वैसा कोई नहीं दिखता| आधुनिक आलोचक भी उस प्रेम के समग्र स्वरूप को समझने में चूके| उसके मर्म तक पहुँच नहीं सके| प्रखर प्रेमाभा में आसानी से दृश्यमान एक-दो चीजों को देखकर उसे ही सब कुछ समझ लिया| आगे नहीं बढ़े| जो देखा उसी के दूसरे पहलू पर दृष्टि नहीं गई| मसलन रविदास की विनम्रता चर्चा में रही| इस विनम्रता को नख-दन्त-विहीन अबोध लचीलापन समझ लिया गया| जितनी विनम्रता उतनी दृढ़ता| मृदुभाषी मगर सत्याग्रही| मितभाषी किंतु एक-एक शब्द वजनदार| जिनकी बानी की मधुरता तिक्त औषधि पर मीठे लेपन की तरह है| ठीक बौद्ध महाकवि अश्वघोष के कथनानुरूप- “पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृदयं कथं स्यादिति|” ऐसी ही उदग्र ‘मधुवाणी’ वाला कवि डंके की चोट पर कह सकता है- ‘साधो का सास्त्रन सुनि कीजै|’ जो सभी धर्मग्रंथों को समान रूप से असहज पाता है- ‘बेद-कतेब, कुरान-पुराननि सहजि एक नहिं देखा|’ इसीलिए उसका सुझाव है- ‘थोथो जिनि पछोरो रे कोई| पछोरो जामे निज कन होई||’ ‘निज कन’ अर्थपूर्ण पद है| यह अन्न कण तो है ही, निजत्व का, आत्म का संकेतक भी है| जिस दर्पण में अपना चेहरा न दिखाई दे वह दर्पण किस काम का! जिस वाङ्मय में स्वानुभव (निज कन) न हो वह थोथा ही है| इस ‘निज कन’ की प्रतीति कैसे हो? ज्ञान से? ध्यान से? मगर ज्ञान-ध्यान तो अबूझ भी हो सकते हैं? किस पर भरोसा करें, किससे अबूझ का अर्थ बूझें? संत रैदास का समाधान है कि प्रेम ही वह माध्यम है जो इस उलझाव से निकाल सकता है| प्रेम रस ही ‘निज कन’ की प्रतीति करा सकता है-

ज्ञान ध्यान सबही हम जान्यो, बूझों कौन सों जाई|
       हम जान्यो प्रेम प्रेमरस जाने, नौ बिधि भगति कराई||

कबीर


वर्ण-जाति मनुष्य से उसका स्वत्व, निजत्व छीन लेते हैं| इसके बदले में वे जो पहचान देते हैं वह आत्महीनता को ढंकने का काम करती है| अपने ‘होने’ का बोध ही असंभव बनाती है| ऐसे मरुस्थल में लाके छोड़ती है जहां प्यासे ही मरना है| रैदास को मालूम है कि वर्ण-जाति के जंजाल से पार पाने की पद्धतियाँ उनके पूर्ववर्तियों ने अपने-अपने ढंग से खोजीं हैं| उनके समकालीन भी अपने-अपने तरीके से ऐसी पद्धति तलाश रहे हैं| वे इन पद्धतियों की सफलता और सीमा से परिचित भी हैं| वर्णवादी हिंसा से निपटने के लिए प्रतिहिंसा का सहारा लिया जाता है| जातिवादी मानसिकता जो ओछापन थोपती है उसकी प्रतिक्रिया में आक्रामकता को ढाल बनाया जाता है| यह प्रतिहिंसा और आक्रामकता मुख्यतः भाषा में अभिव्यक्त होती है| इसके व्यवहर्ता को एकबारगी ऐसा लग सकता है कि उसने जातिवादी प्रतिपक्षी को उसी के असलहों से परास्त कर दिया है| वस्तुतः होता इसके विपरीत है| प्रतिहिंसा और आक्रामकता जातिवाद की खुराक है| इसी खुराक के दम पर वह अपने को बनाए-बचाए रखती है| यह स्थिति उसके विरोधी को हताश उदास बनाती है| उसे अपना संघर्ष संदिग्ध लगने लगता है| ऐसे संघर्ष को उम्मीदभरी नज़रों से देखने वाला जनसमुदाय वर्ण-जाति की ‘सनातनता’ के दावे के समक्ष आत्मसमर्पण करने लगता है| इससे प्रभुत्व की संरचना को नवजीवन मिलता है| यह गुत्थी सबकी समझ में नहीं आती| समूचे मध्यकाल में संभवतः रविदास ही अकेले ऐसे चिंतक-रचनाकार हैं जो वर्ण-जाति के नैरन्तर्य की यह पहेली बूझते हैं| वही अकेले संत हैं जो इस संरचना के उन्मूलन में प्रेम की भूमिका समझते हैं| वे प्रत्याक्रमण से उपजी उदासी को, प्रतिहिंसा के विषण्ण उत्पाद को चीन्हते हैं| उनकी प्रेम में डूबी भक्ति भ्रम-पाश का उच्छेद इसीलिए कर पाती है-
अनेक जतन करि टारिये, टारे न टरै भ्रम पास|
       प्रेम भगति नहिं ऊपजै, ताते जन रैदास उदास ||

रविदास की साधना-पद्धति में प्रेम को उच्च स्थान मिला हुआ है| इसे अष्टांग साधन कहा जाता है| गुरु-परंपरा-क्रम से प्राप्त आठ अंगों वाली इस साधना में शुरू के तीन वाह्य अंग है, बाद के तीन भीतरी अंग हैं और अंतिम दो उच्चतम अवस्था या पूर्ण संतावस्था के- 1.गृह, 2.सेवा, 3.संत, 4.नाम, 5.ध्यान, 6.प्रणति, 7.प्रेम और 8.विलय| रविदास की बानियों में जो विनम्रता व्याप्त है वह प्रेम की इसी केन्द्रीयता के चलते| उनकी उदात्तता का यही हेतु है| प्रेम उनके यहाँ साधन से बढ़कर है| यह पूर्णता का पर्याय है| स्नेहपूरित भाषा का सिद्ध प्रयोक्ता कवि जानता है कि मनुष्य के अंतरतम तक कैसे पहुंचा जा सकता है| और, यह भी कि कैसे मूल्यवान कथ्य तिक्त भाषा की संगति पाकर उल्टा असर कर देता है-
मूरिख मुख कमान है, कटुक बचन भयो तीर|
       सांचरी मारे कान महि, साले सगल सरीर||
कबीर साहब अगर रविदास को सच्चे मार्ग का पता बताने वाला कहते हैं तो इस कथन के गूढ़ार्थ पर ध्यान जाना चाहिए| अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए कबीर ने उन्हें ‘संतनि में रविदास संत हैं’ कहा| ‘भक्तमाल’ में नाभादास ने लिखा है कि रविदास के चरणों की धूलि की वंदना लोग अपने वर्णाश्रमादि का अभिमान त्याग कर भी किया करते थे| रविदास की विमल वाणी संदेह की गुत्थियों को सुलझाने में परम सहायक है| स्वयं रविदास का साक्ष्य है- ‘अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति’ (-इस रविदास को अब मुखिया ब्राह्मण भी दंडवत करते हैं|)

संत रविदास के प्रेम का वैशिष्ट्य क्या है? इस प्रेम के अवधारणा में अन्तर्निहित तत्व कौन-से हैं? इस प्रेम की क्रियाशीलता कैसी है जिससे संदेह दूर होता है और मति निर्मल हो जाती है? रविदास के रचनाजगत में प्रेम एक विराट भाव है| उसके सभी अंगों-उपांगों को एक साथ देख पाना सरल नहीं है| जैसे जाति की जटिलता को समझ पाना मुश्किल है वैसे इस जटिलता को हटाने वाले प्रेम के तंतुओं को एक संश्लिष्ट इकाई के तौर पर अनुभूत करना कठिन है| जाति के रहते एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुड़ नहीं सकता- ‘रैदास न मानुष जुड़ सके जौ लौं जात न जात|’ अगर प्रेम को जोड़ने का दायित्व निभाना है तो उसकी कतिपय पूर्वशर्तें और पश्चात अपेक्षाएं होंगीं| रविदास की प्रेम संकल्पना का वितान फिर इस तरह बनता दिखाई देता है- प्रेम के लिए स्वाधीनता अनिवार्य पूर्वशर्त है| पराधीन पर दया की जा सकती है, प्रेम नहीं किया जा सकता| प्रेम दो (या दो से अधिक) स्वाधीन लोगों के बीच ही हो सकता है| प्रेम पाना है तो स्वाधीन होना पड़ेगा| प्रेम करना है तो पहले स्वतंत्रता का वरण करना होगा| जाति व्यवस्था पराधीन बनाने वाली व्यवस्था है| जाति से मुक्ति पराधीनता से मुक्ति है| पराधीनता से छुटकारा प्रेम का पथ प्रशस्त करता है| परतंत्र व्यक्ति अपने जाति-बाड़े में कैद होता है| न वह किसी से उन्मुक्त होकर मिल पाता है और न ही प्रेम करने या पाने की सोच पाता है| जिस समाज में दो व्यक्तियों का आपसी परिचय एक दूसरे की जाति जानने की बाध्यता से शुरू होता हो वहां खालिस मनुष्य-मनुष्य के रूप में पारस्परिक भरोसा कैसे पैदा होगा? इस भरोसे या प्रतीति के अभाव में प्रीति पनपेगी कैसे! पाप पुण्य जैसे पारंपरिक प्रत्ययों को अप्रत्याशित परंतु परम प्रभावशाली-गौरवपूर्ण अर्थ देते हुए संत रविदास कहते हैं-
पराधीनता पाप है जानि लेहु रे मीत|
       रैदास दास प्राधीन सों कौन करे है प्रीत||

अनिता भारती

मेरी सीमित जानकारी में समूचे आदिकाल और मध्यकाल में स्वाधीन पराधीन जैसे पदों का इस अर्थ में प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हुआ है| ‘मीत’ संबोधन में निहित व्यंजकता गौर करने लायक है| यह कवि के लैंगिक रूप से संवेदनशील होने का प्रमाण है| प्रीति और पराधीनता का सहभाव संभव नहीं| इस तथ्य को अधीनस्थ तबकों से बेहतर कौन समझ सकता है? दलित और स्त्री ऐसे ही तबके हैं| जाति के नियम गैर अधीनस्थ तबकों को ही कहाँ बख्शतें हैं! वे अपने से नीचे वालों का दोहन कर सकते हैं, उन पर अपनी इच्छा लाद सकते हैं मगर प्रेम नहीं कर सकते| गैर बराबरी यह संभव नहीं होने देगी| पराधीनता में प्रेम का अवकाश नहीं बनेगा| पराधीन व्यक्ति हीन समझा जाता है| हीनता में पड़े हुए को कोई प्रेम नहीं करता| धर्माचरण या सदाचरण स्वातंत्र्य का अनुगामी है| जिसे स्वतंत्रता ही नहीं हासिल है उसके लिए सदाचरण का प्रश्न बेमानी है-
पराधीन को दीन क्या, पराधीन बेदीन|
       रैदास दास प्राधीन को, सबहीं समझै हीन||
कबीर के यहाँ प्रेम पर पर्याप्त बल है लेकिन प्रेम और स्वाधीनता के अंतस्संबंध पर ख़ामोशी है| तुलसीदास के यहाँ पराधीनता की चर्चा है और ठीक उस अर्थ में जो रविदास को अभीष्ट है| पराधीन को सुख नहीं मिलता –ऐसा तुलसी अपने एक स्त्री पात्र से कहलवाते हैं| एक वर्ग के रूप में नारी इसीलिए सुख से वंचित है क्योंकि वह पराधीन है- “कत बिधि सृजी नारि जग मांहीं | पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं||” सुख का स्रोत है प्रेम –यह समझ उस समय के रचनाकारों में है| मंझन रचित प्रबंध ‘मधुमालती’ की पहली पंक्ति है- ‘प्रेम प्रीति सुखनिधि के दाता|’ पराधीनता-अप्रीति-असदाचरण-दुख की शृंखला का विवेक रविदास देते हैं| तुलसी अपने पराधीनता वाले प्रसंग के लिए रविदास के ऋणी हैं| स्त्री पराधीनता का मुद्दा रेखांकित करने के लिए तुलसी की उचित प्रसंसा करने वाले विद्वान इस विचार के स्रोत की तरफ ध्यान नहीं देते| वे कभी नहीं बताते कि पराधीनता का यह प्रश्न पहले रविदास ने उठाया था| लोक में यह समझदारी है| वह रविदास के प्रति तुलसी की श्रद्धा जाहिर करने के लिए कथा गढ़ लेती है| इस कथा के अनुसार गुरु की तलाश में मीरां ने तुलसीदास से संपर्क किया था| अपनी तजबीज के अनुरूप तुलसी ने रविदास को गुरु बनाने की सलाह दी थी| मीरां ने उनकी सलाह पर अमल भी किया था|

सुशीला टाकभौरे

दासता को जन्म देने वाले कारणों की आलोचना होनी चाहिए| जिसे दासता की जंजीरों में जकड़ दिया गया है, उसकी निंदा क्योंकर की जाए? रविदास में यह विरल विवेक है| वे इसीलिए नारी-निंदा में प्रवृत्त नहीं होते| मीरां के सामने और भी विकल्प थे मगर उन्होंने रविदास को ही अपना दीक्षा गुरु चुना| यह चुनाव अनायास नहीं है| भक्ति कविता के अध्येताओं को यह जांचना चाहिए कि सगुण (कृष्ण) भक्त मीरां जब अपने परवर्ती काल में रामभक्ति धारा से जुड़ती हैं तो उनकी कविता की अंतर्वस्तु में क्या फर्क आता है| मीरां की अंतर्मुखी आत्मकेंद्रित कविता यदि जीवन-जगत के सरोकारों से बाद के दिनों में थोड़ा जुड़ती है तो इसका कुछ श्रेय उनके दीक्षा गुरु को जाता है| मीरां ने खुले मन से गुरु के प्रति, उनका नाम लेकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है- “गुरु मिलिया रैदास जी दीन्हीं ज्ञान की गुटकी|” तथा “रैदास संत मिले मोहि सतगुरु दीन्हा सुरत सहदानी”| अगर रविदास स्त्री को कमतर मानने वाले कवि होते, उनके यहाँ स्त्री अवमानना की अभिव्यक्तियाँ होतीं तो मीरां जैसी स्वाधीनचेता स्त्री उनकी शिष्या हरगिज न बनती| उनकी शिष्याओं में एक ‘झालीरानी’ का भी उल्लेख मिलता है| इस तरह और भी बहुत-सी स्त्रियां संत रविदास को अपना गुरु, प्रेरणास्रोत मानती होंगी| साक्ष्य न होने से हम सिर्फ अनुमान कर सकते हैं| इस अनुमान को लोकमत का पुख्ता आधार प्राप्त है| रविदास के चिंतन का स्वरूप लोकमत का निर्माता है|

संत रविदास अगोचर रहस्य में ज्यादा नहीं रमते| कुण्डलिनी जागरण में उनकी रुचि नहीं प्रतीत होती| सहस्रार चक्र के वेधन में उनकी साधना नहीं लगती| इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना-अनहदनाद जैसी शब्दमाला उनके यहाँ बमुश्किल व्यवहृत होती है| शून्य शिखर पर विराजने की उनकी मंशा शायद नहीं थी| उनका चिंतन शास्त्रवाद से छुटकारा दिलाना चाहता है| एक शास्त्रवाद से निकलकर दूसरे शास्त्रवाद में चले जाने से वे बचते हैं| अमूर्त अगम में विचरने की बजाए वे ठेठ दुनियावी मसले उठाते हैं| वे भूख की समस्या से टकराते हैं| भूख और दरिद्रता स्वाधीनता के लिए संकट है| स्वाधीनता का अभाव प्रेम की गुंजाइश ख़तम करता है| प्रेम भाव की कविता लिखने वाला कवि उस भौतिक परिवेश की भी परवाह करता है जिसमें यह भाव मुमकिन है| वह इसीलिए राजनीति का भी स्पर्श करता है| प्रजा को अन्न उपलब्ध कराना राज्य का जिम्मा है, ऐसी मान्यता निम्न दोहे से ध्वनित होती है-
 ऐसा चाहूँ राज मैं मिले सबन को अन्न |
       छोट बड़ो सभ संग बसैं  रैदास रहें प्रसन्न||
बाद के दिनों में तुलसीदास ने भुखमरी को कर्मफलवाद से अलग रखकर उसे राजसत्ता का दायित्व बताया| उनके ‘पाइ सुराज सुदेस सुखारी’, ‘सुखी प्रजा जिमि पाइ सुनाजा’ जैसे कथनों में रविदास के उक्त सरोकार की अनुगूंज है| लेकिन एक महत्वपूर्ण बिंदु पर रविदास बहुत आगे दिखते हैं| यह है श्रम के महत्त्व का रेखांकन| स्वावलंबन स्वाधीनता के लिए अपरिहार्य है और और स्वावलंबन श्रम के बल पर निर्मित होता है| बेहद संवेदनशील स्वर में रविदास सलाह देते हैं- ‘रैदास स्रम करि खाइए जौ लौं पार बसाय|’ सुख-चैन ही स्वाधीनता है| यह श्रम के दम पर सुनिश्चित की जाती है| श्रम ही नेक कमाई का साधन है| बंगाल में दलितों के महानायक, मतुआ धर्म के संस्थापक श्री श्री हरिचांद ठाकुर ने नारा दिया था- ‘हाथे काम, मुखे नाम|’ श्रम करते हुए नाम स्मरण करना चाहिए| रविदास बहुत पहले कह चुके थे- ‘जिह्वा सों ओंकार जप, हत्थन सों कर वार|’ हाथ चलाते हुए ओंकार जपो| महात्मा गांधी सत्य को ईश्वर कहते थे| रविदास उनसे कहीं ज्यादा ठोस और क्रांतिकारी प्रस्ताव करते हैं| वे श्रम को ईश्वर बताते हैं| इसे संभवतः पूर्व-आधुनिक युग की कम्युनिस्ट वैचारिकी कहा जा सकता है-
स्रम को ईसर जानि कै जउ पूजहिं दिन रैन |
       रैदास तिनहिं संसार में सदा मिलहिं सुख चैन ||

हेमलता माहिश्वर

इस संक्षिप्त विवेचन से अंदाज लगाया जा सकता है कि रैदास की प्रेम परिकल्पना कितने व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित है| पराधीनता और दारिद्र्य निवारण पर बल देकर वे इसे समस्त मानवता के लिए मूल्यवान बना देते हैं| स्त्री की अवमानना करने वाली अभिव्यक्तियों से वे सचेत रूप से बचते हैं| इड़ा-पिंगला के शास्त्रवाद में नहीं उलझते| राजसत्ता के दायित्व का संज्ञान लेते हैं| श्रम और स्वावलंबन के रिश्ते पर रोशनी डालते हैं तथा श्रम की सर्वोपरिता रेखांकित करते हैं| सदाचार ही उनके यहाँ जीवनमूल्य है| नैतिकता को वे कर्मकांड का स्थानापन्न बनाते हैं| क्रोध और विनय के संतुलन पर उनकी दो-टूक असहमतियां प्रकट होती हैं| इसी का सुफल है कि ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण उनकी शरण में जाते हैं| तमाम आचार्यों और संतों को दरकिनार कर मीरां जैसी प्रबुद्ध स्त्रियां उनकी शिष्या बनती हैं|

इन तमाम तथ्यों और ब्योरों के समेकित परिप्रेक्ष्य में उनकी इस स्वीकारोक्ति को समझना चाहिए- ‘हम जानौ प्रेम, प्रेम रस जाने’| इस उद्घोषणा की प्रतिध्वनि विलक्षण रूप से मार्टिन लूथर किंग जूनियर (1929-1968) के इस कथन में सुनाई पड़ती है- “आइ हैव डिसाइडेड टू लव” –मैंने प्रेम करने का फैसला किया है| संयुक्त राज्य अमरीका में ब्लैक समुदाय के मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए शुरू हुए सिविल राइट्स मूवमेंट (1955-1967) के अग्रणी नेता किंग ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रेम के अतिरिक्त किसी अन्य आधार पर खड़ी क्रांति विफल होगी| किंग के इस अहिंसक आंदोलन में तमाम उदार मत वाले गैर ब्लैक/वाइट विचारक, कार्यकर्ता भी शामिल हुए| यह आंदोलन सफल रहा| इसने क़ानून से समान सुरक्षा का अधिकार दिलाया, ब्लैक पुरुषों को मताधिकार मिला और दास प्रथा उन्मूलन की प्रक्रिया संपन्न हुई| ब्लैक स्त्रीवादी विचारक बेल हूक्स (1951) का मानना है कि अमरीका का सिविल राइट्स मूवमेंट इसलिए समाज को बदल सका क्योंकि यह मूलतः प्रेम की नैतिकता पर टिका था| इस आंदोलन के अगुआ मानते थे कि प्रेम के जरिए ही अधिकतम भलाई हासिल की जा सकती है| प्रेमाधारित अहिंसक आंदोलन ने पूरे (अमरीकी) समाज की मनुष्यता जागृत करने का लक्ष्य अपने सामने रखा| आंदोलन की प्रकृति सुधारवादी रही| मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या और इस आंदोलन के अन्य नेताओं की मृत्यु के साथ एक गहमागहमी से भरे एक युग का अंत हुआ| उनके समानधर्मा, सहयोगी श्वेत लोग भी दिवंगत हुए| समूचे परिवेश में एक नैराश्य व्याप्त हो गया| इस दौरान ब्लैक आंदोलनकारियों, बुद्धिजीवियों की नई पीढ़ी तैयार हो चुकी थी| इस पीढ़ी ने सुधारवादी आंदोलन से अपने को अलगाया और नए आंदोलन की शुरुआत की| यह क्रांतिकारी आंदोलन था| इसका मकसद मानवता का जागरण नहीं, ब्लैक समुदाय को पुरजोर आक्रामक तरीके से खड़ा करना था| यह ‘शक्ति’ केंद्रित आंदोलन था| इसे ‘ब्लैक पॉवर मूवमेंट’ कहा जाता है| इस आंदोलन को चलाने वाली युवा पीढ़ी साध्य-वादी थी| साधन की परवाह न करने वाली| इसका अनुभव जगत श्वेत समाज की नृशंसताओं से भरा था| इसकी स्मृतियों की दुनिया श्वेत प्रभुओं की क्रूरताओं से लबालब थी| अहिंसक मार्ग में यह साठोत्तरी पीढ़ी यकीन नहीं करती थी| उसे इंकलाब चाहिए था| इसने पूरे अमरीकी समाज को झकझोर कर रख दिया| इसकी उपलब्धियां ऐतिहासिक रहीं- चेतना के स्तर पर और कानून निर्माण के स्तर पर| लगभग दो दशक इसकी सक्रियता के रहे| इसके उपरांत ब्लैक स्त्रीवाद का उभार हुआ| इस नए आंदोलन ने पूर्ववर्ती आंदोलन की समीक्षा की| इसने रेखांकित किया कि सुधारवादी होने के कारण सिविल राइट्स मूवमेंट भले ही कई मामलों में बहुत सीमित रहा हो फिर भी उसमें व्यापक जनसमुदाय को प्रेरित करने की क्षमता थी क्योंकि वह गहरे में प्रेम नैतिकता पर अवस्थित था| दूसरी तरफ ब्लैक पॉवर मूवमेंट ने मुक्ति संघर्ष को सुधार से क्रांति की तरफ ला दिया| यह एक उल्लेखनीय राजनीतिक विकास था| साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद विरोध का स्वरूप रेडिकल हुआ| इस विरोध का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य इसी दौर में निर्मित हुआ| इन ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ यह भी सच है कि इस आंदोलन के नेतृत्व में पुंसवादी लैंगिक पूर्वग्रह गहरे में व्याप्त थे| इन पूर्वग्रहों ने प्रेमभाव को कुचला| इस आंदोलन के सारे लीडर पुरुष थे| पुरुषवादी भी| वे रेसिज्म के सख्त खिलाफ थे लेकिन स्त्रियों की यौन दासता के समर्थक थे| मर्दवादी आक्रामकता प्रेम को दुर्बलता से समीकृत करती थी| यह प्रभुत्व के उन्हीं उपकरणों का इस्तेमाल कर रही थी जो परंपरा से उसके ऊपर व्यवहृत होते आए थे|

कैलाश चंद चौहान

भारतीय दलित आंदोलन के प्रसंग में यह प्रश्न विचारणीय है कि आंबेडकर के आंदोलन में स्त्रियों की जो बड़े पैमाने पर भागीदारी थी वह उनके बाद उभरे पैंथर आंदोलन में सिमट क्यों गई| क्या यहाँ भी पुरुषवादी मानसिकता ने आंदोलन को अपनी गिरफ्त में ले लिया? यह अनुमान निराधार नहीं है| पैंथर आंदोलन की उपलब्धियों को किसी भी तरह कमतर आंकने से बचकर यह तो कहा ही जा सकता है इसके नेतृत्व में स्त्री के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं थी| उसके लैंगिक पूर्वग्रह जगह-जगह देखे जा सकते हैं| इस आंदोलन के एक सर्वमान्य हस्ताक्षर नामदेव ढसाल की कुछ काव्य पंक्तियां उदाहरण के लिए उद्धृत की जा सकती हैं-
1) इस धमनी का रिद्म जरा सुनो तो,/ संभव है तुम्हारे बंध्या गर्भ से अंकुर फूटे| (‘जनरल वार्ड’)
2) इस विधवा मराठी भाषा को,/ फिर से सुहागिन होते हुए देखना है मुझे| (‘रमाबाई आंबेडकर’)
3) हम जिंदा हुए हैं/ तुम्हारे पापों का छिनाल घड़ा फोड़ने के लिए| (‘अँधेरे ने सूर्य देखा तब’)
आंबेडकर के बाद उभरी गुस्सैल युवा पीढ़ी की ऐसी अभिव्यक्तियों और पूर्वग्रहों ने दलित स्त्रियों को आंदोलन से विलग करने का काम किया| पैंथर आंदोलन के निर्माण के बाद दलित स्त्रियों की संगठित आवाज उभरने में लगभग तीन दशक लगे| दलित स्त्रीवाद अपने साथ कई छूटे हुए मुद्दे लेकर आया| प्रेमपरक नैतिकता की आंदोलन में वापसी हुई| मुक्ति आंदोलन सार्वजनीन, समावेशी, बहुकोणीय हुआ| कार्यसूची में प्रेम के प्रवेश से क्रांति की धार कतई कुंठित नहीं हुई| सुधार आंदोलन, जागृति युग और क्रांतिकाल के श्रेष्ठ तत्वों का सम्मिलन दलित स्त्री आंदोलन ने किया| संत रविदास और बाबासाहेब आंबेडकर के योगदान को नए सिरे से समझने का माहौल भी तभी बना|

रचना के एक विषय-वस्तु के रूप में प्रेम के चयन का क्या अर्थ है? यह विषय-वस्तु (थीम) कृति पर, कृतिकार पर, पाठक समुदाय पर, आंदोलन पर क्या असर डालती है? इन प्रश्नों के समुचित जवाब कुछ समय बाद ही दिए जा सकेंगे| जब प्रेम केंद्रित रचनाओं की संख्या में वृद्धि होगी, उनकी गुणवत्ता में परिष्कार के कई प्रयोग होंगे, ऐसी रचनाओं को जांचने के प्रतिमानों का निर्माण होगा, आलोचना में प्रेम की थीम पर कुछ कसौटीगत सहमतियाँ बनेंगी, दलित आंदोलन में इस विषय पर बहस का स्वरूप थोड़ा और निथरेगा तब कहीं जाकर मूल्य-निर्धारक टिप्पणियां की जा सकेंगी| अभी सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि आंदोलनधर्मी साहित्य में प्रेम का आगमन परिवर्तन की मंशा का पूरक बनने जा रहा है| प्रेम की उपस्थिति दलित आंदोलन को उसकी समृद्ध परंपरा से जोड़ने का काम करेगी| इस परंपरा में एक तरफ तो ‘भवतु सब्ब मंगलम’ का उद्घोष है तो दूसरी तरफ सबके मंगल में अवरोधक मानव विरोधी ताकतों की पहचान है और उनके विरुद्ध अनमनीय संघर्ष चेतना है| शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के प्रयास को मात्र भौतिक पक्ष तक सीमित रखने से उसकी पहुँच और सफलता संदिग्ध रहती है| इससे एक नैतिक खोखल का निर्माण होता है| धर्म (बेशक वह बौद्धधम्म क्यों न हो) इस खोखल को ढंकने का काम करता है| उसके रिचुअल्स खोखल का प्रकटीकरण स्थगित करते रहते हैं, उसे हावी होने से रोकते रहते हैं| जो रिचुअल्स के पार देखने की शक्ति अर्जित कर लेता है उसमें अनिवार्यतः एक छटपटाहट जन्म लेती है| मध्ययुग में भक्ति ने इस छटपटाहट से निपटने की चेष्टा की थी| लेकिन, बहुत जल्दी भक्ति का अपना कर्मकांड विकसित हो गया| फिर यह विकल्प भी रीत गया| समय के आर-पार देखने की क्षमता वाले संत रविदास ने यह आशंका बिलकुल शुरू में ही भांप ली थी| उन्होंने इसीलिए प्रेम-भगति का विकल्प दिया| एक समय के बाद भक्ति सांचे में ढल सकती है, अपनी अर्थवत्ता खो सकती है मगर प्रेम को सांचे में नहीं ढाला जा सकता| उसे पुनर्नवा ही होते रहना है- “प्रेम भगति नहिं ऊपजै ताते जन रैदास उदास|” नैतिक खोखल से उपजी उदासी से प्रेम ही बचा सकता है| संघर्ष-चेतना को वही कायम रख सकता है| धर्म के विरुद्ध भावना अध्यात्म की ओर ले जाती है| अध्यात्म उन्मुख व्यक्ति तनहाई की ओर जा सकता है, अकेलेपन का वरण कर सकता है| प्रेम में यह खतरा न्यूनतम है| वह अध्यात्म का सुरक्षित विकल्प है| प्रेम समुदाय से, संघर्ष के कारवां से जोड़े रखता है| जिजीविषा से भरी आंतरिकता प्रेम की बदौलत ही प्राप्त होती है| समृद्ध अंतस आत्मीयता रचता है| वह ‘अन्य’ के प्रति उदार बनाता है| उससे जुड़ने और उसे जोड़ने का परिवेश निर्मित करता है| प्रेम की नैतिकता के बगैर हम वर्चस्व की किसी न किसी संरचना- प्रतिउपनिवेशवाद, नवसाम्राज्यवाद, बाजारवाद, लिंगवाद, प्रजातिवाद, उलट-जातिवाद, वर्गवाद में फंसे रहते हैं| हम ताउम्र एक वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष करते हुए दूसरे वर्चस्व को अनदेखा करते रह सकते हैं| उस वर्चस्व का मुखर समर्थन करते हुए भी देखे जा सकते हैं| कोई प्रभुत्व हमें तब नागवार लगता है जब वह हमारे स्वार्थ पर चोट करता है| प्रेम हमें इस संकुचित दृष्टि से मुक्त करता है| हम दूसरे के दुख के विरुद्ध, भले ही हमारा निजी स्वार्थ प्रभावित हो रहा हो, प्रेम की प्रेरणा से सन्नद्ध होते हैं| इससे हमें अपने अंध-बिन्दुओं को पहचानने की कूवत आती है| अपनी अस्मिता को अतिक्रांत करते हुए हम अपने सरोकारों का विस्तार करते हैं| तभी हममें यह सलाहियत आती है कि हम वर्चस्व की राजनीति को समग्रता में समझ सकें और न्याय की लड़ाई को सार्वभौमिक बना सकें, न्याय के दूसरे संघर्षों में भी शामिल हो सकें| जिस क्षण हम प्रेम करने का निर्णय करते हैं उसी क्षण हम वर्चस्व के विरोध में खड़े हो जाते हैं| जाहिर-सी वजह है कि वर्चस्व प्रेम को सहन नहीं करता| प्रेम स्वाधीनता का उद्घोषक है| वर्चस्व की संस्कृति के लिए आजादी नाकाबिले बर्दाश्त है| वह खुद को बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेती है| हिंसा की निरंतरता अपने साये में रहने वालों की प्रेम करने की क्षमता ही सोख लेना चाहती है| बहुधा सोख लेती है| तब बहुत से लोग खुद को या दूसरे को प्रेम करने में असमर्थ पाते हैं| उन्हें पता ही नहीं होता कि प्रेम क्या हैं| ऐसे में प्रेम का अभ्यास स्वतंत्रता का अभ्यास बन जाता है| खोए हुए आत्म की पुनर्प्राप्ति का माध्यम प्रेम ही ठहरता है| आत्म की यह पुनर्प्राप्ति आंतरिक आलोचना से संपृक्त रहती है| जातिवादी दबंगई निजत्व का नाश करती चलती है| इस संस्कृति में खुद से प्रेम करना भी खतरे से खाली नहीं रहता| ऐसे में प्रेम करने का फैसला राजनीतिक जागरूकता की मांग करता है| स्वतंत्रता के अभ्यास की पीठिका के तौर पर| प्रभुत्व की कार्यप्रणाली समझने की जरूरत इसी समय महसूस होती है| अपनी जिंदगी, उसे निर्धारित करने वाली परिस्थितियां, थोपी गई पहचान आदि के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का निर्माण प्रेम की मनोदशा करती है| प्रभुत्वशाली संस्कृति के जिन मूल्यों का आत्मसातीकरण हुआ है, उसे समझ पाने और उससे मुक्त हो पाने की प्रक्रिया अब प्रारंभ होती है| आतंरिक उपनिवेशीकरण से छुटकारा पाने की गुंजाइश बनती है| अन्य से नफरत और आत्मघृणा दोनों का आभ्यंतरीकरण साथ-साथ हो सकता है| इनसे मुक्त हुए बिना न सहज हुआ जा सकता है और न वैकल्पिक संस्कृति के बारे में सोचा जा सकता है| प्रेम यह दायित्व भी निभाता है| वह प्रेमी को अन्तःप्रज्ञा से संपन्न करता है| आत्म पर लगे घाव पूरने शुरू होते हैं| पीड़ा से मुकाबला करने की शक्ति आती है| अन्य को पीड़ा न पहुंचाने की संकल्पात्मक वृत्ति निर्मित होती है| प्रेमपूर्ण समाज इसी बुनियाद पर खड़ा हो सकता है| संत रविदास ने इसे ही बेगमपुरा कहा है|

हीरालाल राजस्थानी

दलित प्रेम कहानी से हमारी वही मुराद है जिसकी रूपरेखा ऊपर देने की कोशिश की गई है| दलित स्त्री के परिदृश्य में आने से संभव हुई यह चर्चा जाति के साथ पितृसत्ता उन्मूलन के सवाल को गूंथकर ही आकार लेती है| वर्ग और पारिवारिक पृष्ठभूमि का मुद्दा भी इससे जुड़ा होता है| जो दलित रचनाकार सरोकारों के इस संश्लिष्ट विधान से जुड़े हुए हैं वहीं मुक्ति के साधन के रूप में प्रेम कहानी लिखने में सफल हो पा रहे हैं| बनती हुई स्त्री, उस स्त्री के व्यक्तित्व का सम्मान करने वाला नया पुरुष, खुद मुख्तार होने में दलित स्त्री की दुश्वारियां, अपने संस्कारों को पहचान कर उससे लड़ने वाला दलित युवा और स्त्री की बाड़ेबंदी करने वाले नए स्मृतिकारों की पहचान किए बिना अब सार्थक प्रेम कहानी लिखना मुश्किल है| अस्मितावादी विमर्श और मुक्तिकारी संघर्ष दोनों ही धाराओं से प्रेम कहानियां आ रही हैं| इनके बीच का फर्क समझना जरूरी है| यहाँ यह कह देना अभीष्ट है कि निकष बनने वाली प्रेम कहानियां नई पीढ़ी के रचनाकार ही दे रहे हैं| इन रचनाकारों में दलित स्त्रियां अग्रिम पंक्ति में हैं|

‘नीला पहाड़ लाल सूरज’ कहानी में अनिता भारती ने एक स्थगित लेकिन नाजुक और महत्वपूर्ण मुद्दे को पूरी शिद्दत से उठाया है| यह है ग्लानि बोध जागृत करके आत्म प्रक्षालन कराना| अधिकार बोध की कहानियाँ अस्मिता विमर्श में केंद्रीय थीं| ‘अन्य’ को अवकाश देने का अवकाश नहीं था| एक प्रविधि के रूप में ग्लानिबोध की इस ‘डोमेन’ में कोई गुंजाइश नहीं थी| अनिता ने यह गुंजाइश बनाई| उनकी कहानी का नायक समर (गैर दलित) है| उसने प्रज्ञा से प्रेम विवाह किया है| यह प्रेम मजदूर आंदोलन में साथ-साथ काम करते पनपा है| विवाह के लंबे अरसे बाद समर के संस्कार उसके व्यक्तित्व पर दस्तक देते हैं| उसका पुरुष अहं प्रज्ञा को अपनी सेवा में न पा चोटिल होता है| सामाजिक कार्यों में प्रज्ञा की निरंतर भागीदारी समर को भन्नाए रखती है| वह उसके आचरण पर भी शक करता है| कहानी के उत्तरार्ध में विप्लव नामक पात्र की एंट्री समर को मौका देती है कि वह अपनी मनोरचना की छानबीन करे| अपने किए पर समर में पश्चाताप का उदय हुआ- “सोचते-सोचते समर ने खुद को कठघरे में पाया|…उसे प्रज्ञा पर गुस्सा क्यों आया?… उसकी उन्मुक्त बौद्धिकता, उसकी ईमानदारी, सच्चाई…वह इन गुणों की बहुत कद्र करता था| अब उसे इन्हीं गुणों से चिढ़ क्यों है?… आसपास की चुप्पी में गूँज रहे ये सवाल एक-एक करके दीवारों से टकरा के वापस आ रहे थे और समर को घायल कर रहे थे|… उसकी आँखों से ग्लानि बहने लगी थी|” मुक्तिकामी विमर्श के लिए यह ग्लानि बहुत मूल्यवान है| इससे विचारधारात्मक सांचावाद टूटता है|

हेमलता महिश्वर की कहानी ‘राग की रागी रागिनी’ दो भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए युवाओं के बीच पनपे प्रेम की कथा है| समीर ब्राह्मण परिवार से है और रागिनी शूद्र परिवार से| विश्वविद्यालय परिसर दोनों की जातिगत पहचान को पीछे रखकर उनके बीच स्वस्थ प्रेम को अंकुरित करता है| प्रेम का अंकुरण उस समय हो रहा है जिस समय जारसत्ता वाले और विमर्शकार फतवा दे रहे हैं कि ‘ब्राह्मण अपना दिल ब्राह्मण से लगाए और शूद्र शूद्र से|’ फतवे की अनुगूंज कहानी में भी है| परिवार और समाज से टक्कर लेते दोनों युवा साथ रहने का निर्णय लेते हैं| समीर को उचित ही नया नाम मिलता है- ‘राग’| वह डिप्टी कलक्टर बनता है और रागिनी प्रोबेशनरी अफसर| समीर के पिता प्रतिशोध लेते हैं| समीर मनोचिकित्सालय में गुमनामी का जीवन काट रहा है| पच्चीस वर्ष से! एक अच्छी कहानी अविश्वसनीय बंद पर आकर समाप्त होती है|

चंद्रकांता की बड़ी संवेदनशील कहानी है ‘शेड्यूल कास्ट’| जिस नई दलित स्त्री की चर्चा की गई यह कहानी उसके निर्माण पर रोशनी डालती है| इसमें एक तरफ तो दलित स्त्री को छलने के लिए सवर्ण चालबाजियों का दर्शन कराया गया है दूसरी तरफ दलित परिवार में मौजूद पितृसत्तात्मक मूल्यों का रेखांकन हुआ है| कहानी की नायिका मीरा शिड्यूल कास्ट की है| इसका बोध उसे सातवीं कक्षा में सरकारी स्कूल में कराया जाता है| परिवार में मीरा दादी के पुरुषवादी रवैए का शिकार बनती है| युवती मीरा को ठगता है प्रेम का नाट्य रचने वाला अभिषेक तिवारी| जितना जरूरी विश्वसनीय चरित्रों को सामने लाना है उससे कहीं ज्यादा जरूरी अभिषेक जैसे छलिया पात्रों की पहचान कराना है| कहानी मीरा के आत्म-उन्मीलन पर आकर संपन्न होती है- “प्रेम की पीड़ा का उत्सव मनाने का समय अब नहीं था| वह तो अपने अस्तित्व की दीपशिखा को प्रज्वलित कर रही थी|…सदियों से मन में सुलगता सूरज आज उसके चेहरे पर जो उग आया था|” दलित स्त्री के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाने वाली एक और कहानी है प्रियंका शाह की ‘अश्रुधारा’| कहानी की नायिका अश्रु अध्यापिका है| सिलीगुड़ी नामक छोटे शहर में अकेली रहती है| लेकिन वह अकेली है कहाँ? अतीत का एक कचोटता प्रसंग उसके साथ रहता है| कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में नितिन और उसकी जोड़ी मशहूर थी| यह जोड़ी स्थायित्व प्राप्त करती इससे पहले नितिन के पिता सौम्यदीप मुखर्जी के जातिवादी मानस ने अपनी विध्वंसक भूमिका निभाई| विस्तार में न जाकर कहानी संकेतों में बहुत कुछ कह देती है| एक कौंध की तरह उसे एक दिन नितिन का ख्याल आता है| पिता द्वारा थोपी जिंदगी से मुक्त हो वह अश्रु की स्मृतियों के सहारे जीवन काट रहा है| अब अश्रु अपनी चुनी हुई तनहाई को घुला देने का निर्णय करती है| अपनी मितभाषिता में कहानी बड़ी मार्मिक बन पड़ी है|

कैलाश वानखेड़े

दो वरिष्ठ कथाकारों- सुशीला टाकभौरे (‘वह नज़र’) और कावेरी (अंतर्द्वंद्व’) की कहानियां एक ढर्रे की हैं| ये कहानियाँ विवाह संस्था के परे जाकर प्रेम का परीक्षण करती हैं| इनमें एक साहसिक प्रयोगशीलता दिखाई देती है| ये प्रयोग दलित प्रेम कहानी का दायरा विस्तृत करते हैं| ‘वह नज़र’ की मुख्य पात्र एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर है| उसकी क्लास का एक छात्र प्रोफ़ेसर से रागात्मक रिश्ता रखता है| यह आकर्षक से बढ़कर है| इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया जा सकता| नाम देने के मजबूरी भी नहीं है| औपचारिक संबंधों से मुक्त इस ‘प्रेम’ कहानी में निर्बंध बयार बही है| कावेरी ने शोध छात्रा शालु को केंद्र में रखकर कहानी रची है| किस्कू शादीशुदा आदिवासी अफसर है| पांच बेटियों और दो बेटों का पिता| सभी संतान बालिग़| आदिवासी संस्कृति पर अपने शोधकार्य के दौरान शालु किस्कू से मिलती है| उनमें प्रेम पनपता है- “इसमें बुराई क्या है? प्रेम को बुरा मनुष्य ने बनाया है| शुद्धता और जाति बंधन के नाम पर जकड़ दिया है| शालु को लगा प्रेम तो सहज स्वानुभूति है|” किस्कू पहले तो शालु की प्रेमाभिव्यक्ति पर मौन रहता है लेकिन कहानी के अंत में विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता के अनाम (प्रेम) संबंध से आगे बढ़कर घोषणा करता है- “मैं समाज सेवा करूंगा| शालु देवी है उसकी पूजा करूँगा||”

  कैलाश वानखेड़े बहुत संवेदनशील और सधे हुए कहानीकार हैं| उनकी कहानी ‘महू’ उच्च शिक्षा में पसरे जातिवाद को फोकस करती है| प्रज्ञा और नरेश दोनों दलित समुदाय से हैं| उनके बीच पनपता प्रेम जातिवादी हिंसा के खिलाफ आकार लेता एक अग्निधर्मी अभियान जैसा दिखता है| प्रज्ञा की क्लासमेट रागिनी सवर्ण मानस का विद्रूप चेहरा है| यह सवर्ण मानसिकता ही विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, इंजीनियरिंग, मेडिकल संस्थानों में दलित विद्यार्थियों की हत्याएं कर रही है| इन हत्याओं को आत्महत्या का नाम दिया जाता है| दलित युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में प्रज्ञा और नरेश बाबासाहेब की संघर्ष की विरासत को और गति प्रदान करना चाहते है| वे तहरीर चौक का विकल्प महू के रूप में देखते हैं| यह कहानी अपने सुगठित शिल्प के कारण भी यादगार बन पड़ी है|

हीरालाल राजस्थानी की कहानी ‘हड्डल’ दो भिन्न वजहों से उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण मानी जा सकती है| यह शायद पहली कहानी है जो कला महाविद्यालय में पहुंचे दलित विद्यार्थियों का चित्र उकेरती है| दूसरी वजह यह कि कहानी पुरख़ुलूस ढंग से आतंरिक जातिवाद का मुद्दा उठाती है| रचित और तूलिका डिपार्टमेंट ऑफ़ फाइन आर्ट्स के विद्यार्थी हैं| दोनों दलित समुदाय से| दीर्घ साहचर्य उनमें प्रेम उपजाता है| रचित कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से है जबकि तूलिका की पारिवारिक पृष्ठभूमि किंचित बेहतर है| रचित की मां मजदूरी करती हैं| पिता नहीं रहे| दोनों विवाह करना चाहते हैं| इसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए| मगर बाधा है, विकट बाधा| बाधा यह कि रचित खटीक जाति का है जबकि तूलिका जाटव| रचित अपनी मां को समझाता है, दोनों पक्ष शिड्यूल कास्ट के हैं, यह तर्क देता है| मां पर इसका कोई असर नहीं होता| वह उलटे बेटे को डांटती है- “अरे तू पागल हो गया है जो अपना धर्म भ्रष्ट करने पर तुला है!” दूसरी ओर तूलिका के घर वाले उसकी पिटाई करते हैं और उसे घर में ही कैद कर लेते हैं| जातिवादी समाज में प्रेम कितना आत्मघाती है, कहानी इस तथ्य को बखूबी उजागर करती है|

कैलाश चंद चौहान की पहचान मंजे हुए कहानीकार के तौर पर उभर रही है| उनकी कहानी ‘प्यार जिसे कहते हैं’ पुरुष मानसिकता का उद्घाटन करती है| प्रेम के जिस सिलसिले को पुरुष जीवन की स्वाभाविक गति बताकर स्वीकार्य बनाता है, रंचमात्र भी वैसी छूट स्त्री को नहीं देना चाहता| आत्मकथात्मक शैली में लिखी कहानी का नायक दलित समुदाय से है| उसके जीवन में पहली बार पारुल आती है| कॉलेज के दिनों में| पारुल खुद ही विवाह का प्रस्ताव रखती है| कथा नायक की मां को कोई दिक्कत नहीं लेकिन पिता इस संबंध को मंजूरी नहीं दे सकते| पारुल की जाति ब्राह्मण जो है! मजबूर नायक का विवाह शिखा से हो जाता है| वह दो बच्चों का बाप है| पत्नी से बेतरह प्रेम करता है| ऑफिस आते-जाते उसका परिचय मान्या से होता है| मान्या भी नौकरीपेशा है और इस अर्थ में स्वतंत्र| नायक उससे प्रेम करने लगता है| पहल यद्यपि मान्या ही करती है| दोनों इस प्रेम को विवाह में नहीं बदलते| इधर शिखा नायक की सहमति से एक एन.जी.ओ. ज्वाइन कर लेती है| हफ्ते में दो दिन जाना है| एक शाम उसे लौटने में थोड़ी देर हो जाती है| नायक की उद्विग्नता तब चरम पर पहुँचती है जब वह अपने घर के छज्जे से शिखा को कार से उतरते और कार चालक एनजीओ के मालिक पुष्पेंद्र को विदा करते देखता है| इधर मान्या का फोन लगातार आ रहा है उधर नायक का मूड उखड़ चुका है| प्रेम की ‘स्वाभाविक’ शृंखला चरमरा चुकी है|

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्रवाद में छिड़ा है संघर्ष : चौथी राम यादव

 पिछले  30-31 मार्च, 2016 को मोती लाल नेहरु कालेज, दिल्ली के नेशनल सेमिनार समिति द्वारा आयोजित ‘मानवाधिकार के सवाल और भारतीय समाज’ विषय  पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार के तमाम वक्ताओं ने गंभीरता से यह दर्ज कराया कि देश के वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल के चलते न केवल सेमिनार का थीम महत्वपूर्ण है,  बल्कि सेमिनार का विमर्श  कालेज के छात्रों, अध्यापकों व अन्य कालेजों के प्रतिभागी अध्यापकों को भी देश की तात्कालीक परिस्थितियों को जानने-समझने, विश्लेषण  करने की मानवतावादी दृष्टि विकसित करने  में भरपूर मद्द कर रहा है ।

उद्घाटन सत्र में बीज भाषण के रुप में एनबीटी के अध्यक्ष श्री बलदेव शर्मा ने कहा कि ‘ भारतवर्ष में मानवाधिकार के सवालों को लेकर विमर्श  ऋषियों-मुनियों के समय होता आया है। आज के दौर में मानवाधिकार की व्याख्याएं लोग अपने-अपने तरीके से कर रहे है। इन्होनें कहा कि राम ने लोक की अराधना के रुप में मानवाधिकार की बहुत बड़ी परिभाषा हमारें सामने रखी थी और गांधी जी ने भारतवर्ष के लिए रामराज्य की संकल्पना दी थी। भरतवर्ष में मनुष्य को सबसे प्रमुख स्थान जाति से उपर उठकर दिया गया है। हमारे समाज में अग्रेंजी गुलामी के समय बहुत सी विकृतियां पैदा हुई थी,  जिनको हम आज तक दूर नहीं कर पाएं।’  सत्र की अध्यक्षता कर रहे  वरिष्ठ आलोचक प्रो चौथी राम यादव  ने बालदेव शर्मा से असहमति जताते हुए   कहा कि ‘ आज हम कौन से मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं,  आज तो संविधान व कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आज  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व संवैधानिक राष्ट्रवाद में भंयकर प्रतियोगिता  छिड़ी नजर आ रही है और निरन्तर संवैधानिक राष्ट्रवाद की धज्जियां उड़ाई जा रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का खेमा मानवाधिकार हनन के मिसाल कायम कर रहा है .  इन्होनें कहा कि यदि आज हम मानवाधिकार की बात करें तो बिना डा. भीमराव अंबेडकर को याद किए बिना इस पर बात करनी बेमानी ही होगी। डा.  बाबा साहेब अंबेडकर ने न केवल महिलाओं, वंचितों, दलितों, श्रमिकों के अधिकारों की बात की बल्कि समस्त मानव समाज के कल्याण के लिए संविधान में अनेको प्रावधान रखे हैं । आज तमाम कवायदें लोकतंत्र को खत्म करने की हो रही हैं ।  आज हमारे प्रमुख अमेरिका में गांधी के सम्मान में बोलते हैं और देश  में आकर गोडसे के सम्मान में उसको देश भक्त कहते हुए कार्यक्रम करते हैं । वैसे हमारे यहां हर समय काल में परस्पर विरोधी चिंतन परम्पराए रही हैं ,  जैसे बुद्ध के समय में, भक्ति काल में व महात्मा फूले व डा अंबेडकर के समय में। ‘

उन्होंने कहा कि ‘ रामराज्य का जातिवाद पर सवार होकर चलना कतई भी सराहनीय व सहनीय नहीं हो सकता है। आज तमाम हाशिये  के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है। हमें दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर ज्यादा बात करनी होगी। आज पुरुषवादी मानसिकता को बदलने की जरुरत है , स्त्री विमर्श  से पूर्व पुरुष विमर्श  अत्यंत आवश्यक है। संम्पूर्ण सेमिनार का संचालन करते हुए कालेज की असिस्टेंट  प्रो.  डा. कौशल पंवार ने कहा  कि ‘ भारतीय समाज बहु-स्तरों पर असमानता और गैर बराबरी पर आधारित है। जहां जाति, धर्म, समुदाय, लिंग, वर्ग, शारिरिक गैरबराबरी, रंग, भाषा, बोली, क्षेत्र, इंसानी अस्मिता में असमानता भरपूर व्याप्त है। वर्तमान समय में जब पूरा देश  और सरकारे भी डा अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहे हैं,  ऐसे समय में इस विषय पर सेमिनार का आयोजन होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज चहुओर मानवाधिकार का मामला चरमरा गया है। कोई भी किसी को भी देश द्रोही कह देता है और जाति व धर्म के नाम पर किसी की भी हत्या कर देना जायज भी ठहराया जा रहा है। दलित का संघर्ष आज अपनी अस्मिता को बचाने और एक इंसान के तौर पर अपनी पहचान को बचाये  रखने की जद्दोजहद का संघर्ष बन रहा है। यह अचानक से घटित नहीं हो रहा है कि एक धर्म के उन्मादी लोग दूसरे धर्म के के लोगों को व इनकी बस्तियों को तथा एक जाति के लोग दूसरी दलित जाति की बस्तियों व लोगों को बर्बर तरिके से जिंदा जलाने एवं सामूहिक कत्लेआम तक पर उतारु हो रहे है। यह सुनियोजित फलसफा आखिर कब तक? ‘

कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार रमणिका जी ने  से कहा कि ‘ हमें आज रामराज्य नहीं चाहिए हमें इंसानों का राज्य चाहिए। आज देश  में तमाम मुद्दे है जिन पर सकारात्मक बहस की जानी चाहिए फिर वो चाहे आदिवासियों का मामला या फिर दलितों व महिलाओं के शोषण के पहलू हों। हमें पड़ताल करनी होगी कि क्यों आखिर एक इंसान नक्सली व माओवादी बन रहा है? कही इसकी जड़ में भी तो इन लोगों के मानवाधिकारों से वंचना का मामला तो नहीं है? यहां बाल विवाह है, दहेज हत्याएं है, भ्रूण हत्याएं की जा रही है पर स्टेट कहीं और ही व्यस्त रहता दिखता है। यहां कानून तो सब है पर लागू कुछ भी नहीं है!

कार्यक्रम में श्री पवन सिन्हा , डा हेमलता महेश्वर,   जामिया विश्वविद्यालय, सुजाता पारमिता,  महाराष्ट्र से सुधा अरोड़ा मुम्बई से,प्रो. श्यो राज सिंह बेचैन,  डा. अंजू गोरवा डीयू, प्रसिद्ध बाल साहित्यकार प्रो रमेश  शर्मा, पत्रकार भाषा सिंह, स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक व पत्रकार संजीव चंदन, , प्रो पंकज मिश्रा,  आदि लोगों ने भी  मानवाधिकार के सवाल पर स्त्री, साहित्य, मीडिया, दलित वंचित व अल्पसंख्यकों की नजर से अपने-अपने विचार सांझा किए।  प्रो हेमलता माहिश्वर ने कहा कि हमारी संस्कृति व परम्परा में हंसना रोना को भी बांट रखा है। लड़की के लिए रोना उसका अधिकार व कर्तव्य है,  लेकिन जब वह हंसती है तो कहते है कि क्यों लड़कों की तरह हंस रही है? इन्होनें कहा कि दलित स्त्री व सवर्ण स्त्री के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।

यहां स्वतंत्रता की परिभाषा व आरक्षण पर डा. अम्बेडकर की सोच को भी विश्लेषित  किया गया। पत्रकार भाषा ने कहा कि भारतीय राजनीति में यह विषय एक जबरदस्त चिंगारी है। इन्होनें डा. अम्बेडकर को कोट करते हुए कहा कि हमारी लड़ाई सम्पत्ति व सत्ता के लिए नहीं बल्कि गरीमा की लड़ाई है। इन्होनें देश भर में मैला प्रथा के खिलाफ चल रही ‘भीम यात्रा’ को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारा संविधान सही मायनों में मानवाधिकारों की गारंटी है। परन्तु भारत में जातिप्रथा व पितृसत्ता मानवाधिकारों के रास्ते मे सबसे बड़ी बाधा है। रजनीतिलक ने दिल्ली के सफाई मजदूरों, एमसीडी कर्मचारियों की जीवन दशाओं  इनके परिवारों व बच्चों के र्मािर्मक पहलूओं को सांझा किया कि हमारी स्टेट कहां है कौन और कब इनकी सुध लेगा? सुजाता पारमिता  ने डा. अम्बेडकर के जीवन संघर्षो, श्रमिकों, महिलाओं ,मजदूरों के कल्याण के लिए बनाए श्रम कानूनों पर प्रकाश  डाला कि वह  आज किस रुप में प्रासंगिक है। बैजवाड़ा विल्सन ने देश  भर में दलित, मजदूर आबादियों के बीच काम करते हुए अपने अनुभवों को सांझा किया। इन्होनें 21वीं सदी में मानव मल  उठाने वाले लोगों, हर रोज सीवर में मरते मनुष्यों के मानवाधिकारों की बात कही कि देश  के तमाम विमर्श ो से ऐसे इंसानों का जीवन गायब ही रहता है। इन आबादियों पर बात किए बिना हम कौन से राष्ट्र का निर्माण करना चाहते है?

 सुधा अरोड़ा ने भी महिलाओं के शोषण  के विभिद आयामों को सामने रखा  और हाशिये  के तमाम समाजों को संगठित होने का मुद्दा उठाया। दिल्ली विश ्वविद्यालय के प्रोफेसर श ्योराज बेचैन ने साहित्य की नजर से मानवाधिकार  के विभिन्न मसलों पर अपने अनुभवों को जोड़ते हुए विमर्श  को और ज्यादा प्रबुद्ध किया। स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि’  डा. आम्बेडकर स्टेट की भूमिका को वंचितों दृदलितों और स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए  महत्वपूर्ण मानते थे और इसके लिए उन्होंने संविधान में व्यवस्थाएं की.  साथ ही मानवाधिकार हासिल करने के लिए वंचितों को ‘अनुकूलन मुक्त’ करने का प्रयास भी करते रहे.

हमारे लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहे जाने मीडिया को भी बीच में रखते हुए सेमिनार में मीडिया और मानवाधिकार विषय पर भी चोथे स्तंभ से कुछ हस्तियों को बुलाया गया था जिनमें सतीश  सिंह ( लाइव इंडिया), अंजना ओम कश्यप (आजतक)  अरफा खानम  (राज्यसभा टी वी )  व विकास पाठक (हिन्दू )  शामिल हुए । यह सत्र विशेष रूप से रोचक रहा। असलियत में मीडिया हाउस में लोकतंत्र है कि नहीं यह सवाल संदेह के घेरे में हो सकता है परन्तु महाविद्यालय में सेमिनार के इस  समंच पर चार लोगों के बीच सत्र  में लोकतंत्र दिखाई दे रहा था! कोई आरक्षण के पक्ष में था तो कोई विरोध में तो कोई बीच बचाव सा भी करता दीख रहा था। एक तरफ अरफा खानम रही थी कि’  आज टीवी मीडिया में दलितों, आदिवासियों, की भागीदारी 1 फीसद से भी कम है। न्यूज रुम में लगता है इन लोगों की इन्ट्री बैन की हुई है! और वर्तमान वातावरण के चलते लगता नही कि अगले 10 सालों में भी इन स्थितियों में कोई सुधार हो सकेगा? ‘ वहीं दूसरी तरफ अंजना व सतीश लगभग इनके विरोधी विचार दे रहे थे। अंजना ओम कश्यप ने  मीडिया में गुणवत्ता की दुहाई दी, कैलिबर की बात की पर दूसरे ही पल अरफा ने कहा कि दलितों, महिलाओं, आदिवासियों में कैलिबर, क्षमता की कहां कमी है,  एक बार हम इनको अंदर तो घूसने दे फिर देखे गुणवत्ता! टीवी पत्रकारिता में गलेमर, सुंदरता जैसे पैमाने डोमिनेट करते है यह बात भी दर्ज हुई। संवैधानिक अधिकार और मानवाधिकार विषय पर प्रो विवेक कुमार, सिद्धार्थ मिश्रा, अरविंद जैन और अनिल चामड़िया ने विमर्श  को ज्यादा खोलने का काम किया। अरविंद जैन ने कहा कि ‘ कानूनों में बदलाव जिस अलगाव के साथ किया जाता है , वह उनके ही खिलाफ हो जाता है ,, जिनके लिए क़ानून बदले जा रहे हैं . निर्भया काण्ड के बाद ‘ बलात्कार ‘ की परिभाषा के विस्तार के बाद यही हुआ .’ इन्होनें नैचूरल राईटस की बात कही,  जिनके बिना आदमी जी नही सकता है। दलितों की वर्तमान दशा  व दिशा  पर विवेक जी ने गहराई से पड़ताल की। डा. अम्बेडकर के समता, स्वतंत्रता व बंधुत्व शब्दों के अर्थो व भावों को विस्तार दिया गया। उन्होंने कहा ‘ हम कानूनी रुप में समता के लिए व स्वतंत्रता के लिए प्रावधान व कानून बना सकते है परन्तु बंधुत्व के लिए कोई कानून नहीं बनाया जा सकता है? आज समता के नाम पर, स्वतंत्रता के नाम, अधिकारों व कानूनों के लिए तो आंदोलन हो रहे है परन्तु बंधुत्व के लिए कोई आंदोलन नही कर रहा है? बाबा साहेब ने भी इसी पर जोर दिया था और कहा था कि सच मे राष्ट्र का निर्माण तभी होगा! बबा साहब ने उस समय संवैधानिक नैतिकता का भी सवाल उठाया था,  परन्तु आज आजादी के 68 साल गुजरने के बाद भी नैतिकता का आलम ये है कि एक आदमी 9000 करोड़ रुपए लेकर दूसरे देश  में भाग जाता है और हम बस तमाश बीन बनकर रह जाते है! हम संवैधानिक नैतिकता की, भाईचारे की बात कहां कर रहे है? आज हमें राष्ट्र निर्माण के लिए भाईचारे के आंदोलन करने होगें।’

उन्होंने कहा कि ‘ सार रुप में यह कहा जा सकता है कि आज मानवाधिकार  के रास्तें में जातिप्रथा, पितृसत्ता, सांमती सोच सबसे बड़ी बाधा है जिनके खिलाफ हमें खड़ा होना होगा। लाजिमी है कि हम साम्प्रदायिकता, उदारीकरण व वैश ्वीकरण जैसे मामलातों से भी अवश्य ही रुबरु होगें। हम सब जानते है कि डा अम्बेडकर समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व की बात करते थे, हर तरह की बराबरी की बात करते थे। आज तमाम न्यायवादी, समतावादी, मानवतावादी लोगों को शोषण , भेदभाव, अत्याचारों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा तभी सही मायने में इंसान के अधिकारों को हासिल किया जा सकेगा। पर इसके लिए हमें ’मै, मेरा पार्टनर, घर, गाड़ी और मेरा सुंदर कुत्ता’ की फिलोसोफी से बाहर आना होगा!’

इस अवसर पर कौशल पंवार द्वारा संपादित किताब ‘ मानवाधिकार के सवाल और भारतीय समाज का लोकार्पण भी किया गया . 

प्रस्तुति : डा. कौशल  पंवार,   असिस्टेंट प्रोफ़ेसर  , संस्कृत विभाग , मोतीलाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली, संपर्क : panwar.kaushal@gmail.com  

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !!

संजीव चंदन

सोचता हूँ , क्यों जरूरी हैं तुम्हारे इस मृत्यु के चुनाव पर लिखना, तब –जबकि भारत में 19 से 49 की उम्र तक की महिलाओं की आत्महत्या का दर पिछले वर्षों में बेतहाशा बढ़ा है- 1990 से 2010 तक के उपलब्ध आंकड़े में 126% इजाफ़ा हुआ है, महिलाओं की आत्महत्या के मामले में. कभी महिलाओं की मौत के कारणों में सबसे बड़ा कारण मातृत्व के दौरान मौत हुआ करती थी, जो इन आंकड़ों के साथ आत्महत्या में तब्दिल हो गई है . महिलाओं की आत्महत्याओं में से 56% आत्महत्याएं 15 से 29 के आयु वर्ग के बीच है – तुम भी उनमें से एक हो प्रत्युषा ! अभी दो –चार दिन पहले ही तो एक दलित लडकी की संदेहास्पद मौत को आत्महत्या बताया गया है – कितने कारणों से मरती हैं लडकियां !

प्रत्युषा बनर्जी बिग बॉस में

ये आंकड़े जिन वर्षों के हैं, उन्हीं वर्षों में तो तुम्हारी इंडस्ट्री भी खडी हुई है. 90 का शुरुआती दौर ही तो था, जब टी वी के पर्दे पर मजबूत मध्यवर्गीय लड़की उभरी थी –शान्ति धारावाहिक से – मंदिरा बेदी ने निभाया था तब यह चरित्र. इसी दौर में दीपिका चेखालिया को लोग घर –घर में पूजने लगे थे. स्क्रीन का ग्लैमर चरित्रों को निभाने वाली अभिनेत्रियों को ग्लैमर देने लगा था, ये अभिनेत्रियाँ तीन घंटे में दस्तक देती सिनेमाई अभिनेत्रियों से ज्यादा समय तक प्रभाव छोड़ने लगी थीं –क्योंकि ये नियमित प्रसारित धारवाहिकों के साथ घर के दैनंदिन में शामिल होने लगी थीं. तुम भी ऐसी ही एक लोकप्रिय चरित्र के उत्तर प्रसंग की तरह आई . तुम्हारे ‘ बालिका वधु’ के लीड रोल में आने के पहले अविका गौड़ इस धारावाहिक को देखने वालों के ज़ेहन में राज कर रही थी, जिसे और उसकी ‘दादी- सास’ की भूमिका निभाने वाली सुरेखा सिकरी को लोग नायिका –प्रतिनायिका की भूमिका में प्यार करने लगे थे. तुम अविका गौड़ की लोकप्रियता के उत्तर –प्रसंग के तौर पर आई और उसी लोकप्रियता पर सवार हुई.

प्रत्युषा तुम्हारा मरना किसी आत्महत्या ग्रस्त किसान के विधवा या उसकी बेटी का मरना नहीं है, न तुम्हारा मरना किसी स्टोव के फटने या पंखे पर झूलने से मरी उस वधु के मरने जैसा है , जिसकी ह्त्या और आत्महत्या के बीच महीन सी भी रेखा नहीं होती , न तुम्हारा मरना किसी खाप के डर से मरी उस लडकी की तरह है, जो पहली बार प्यार करने का साहस कर बैठती है. तुम मरी प्रसिद्धि और ग्लैमर की शिखर पर पहुँच कर. यह प्रसिद्धि और ग्लैमर तुम पर ‘ देवत्व’ आरोपित करता है -जिससे तुम और तुम्हारे प्रशंसक दोनो ही आक्रांत होते हैं , शायद इसीलिए लिख रहा हूँ तुम्हारी आत्महत्या के बाद.

अपने दोस्त के साथ

तुम बहादुर थी, साहसी भी तभी तुम मुम्बई पुलिस जैसी ताकतवर संस्था के चार अफसरों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी कि वे तुम्हारे घर पर तुमसे बदतमीजी कर रहे थे . लेकिन क्या तुम यह सोच सकती थी कि एक और ताकतवर संस्थान, जो तुम्हारे होने को अर्थ दे रहा है , तुम्हारे साथ या तुम जैसी लड़कियों के साथ क्या सुलूक कर रहा है. वह तुम्हारे अलावा उन लाखों लड़कियों के आगे क्या स्टीरियो टाइप बना रहा है. क्या तुमने गौर किया कि 30-32 की उम्र में दादी –सास –नानी की भूमिका निभाने के लिए मजबूर की गई तुम्हारी साथी हों या 15-16 की उम्र में विवाह –ससुराल और घरेलू समीकरणों को जीते चरित्रों को जीवंत करने को मजबूर की गई तुम जैसी लडकियां स्त्रियों के लिए कौन सा आदर्श रच रही हैं. तुम यह समझ भी नहीं सकती थी कि षड्यंत्रों का घर बने वर्चुअल घरों के सदस्यों का अभिनय करने वाली तुम अभिनेत्रियाँ भी कब इन चरित्रों के मनोविज्ञान में फंसती जाती हो. मैं समझता हूँ कि 7-8 साल से लीड भूमिका करती हुई तुम भी अब सास –मां या बड़ी बहू की भूमिकाओं के लिए विवश हो जाने वाली थी, क्योंकि 15-16 की नई लड़कियों की आमद जारी है तुम्हारी इंडस्ट्री में, जो प्रेमिका और पहली मां बनने के अनुकूल उम्र की नायिकाएं होती हैं तुम्हारी इंडस्ट्री के लिए – कौमार्य का पुरुषवादी स्टीरियो टाइप बाजार और भारतीय समाज के मानस के अनुकूल जो बैठता है .

मनोविज्ञान की शिक्षिका मनीषा ठीक ही कहती हैं , दिन में 12-15 घंटे काम करते हुए ‘अच्छे –बुरे’ चरित्रों को निभाते हुए तुम लडकियां भी यथार्थ और चरित्र के अंतर में फंसती जाती हो, जो धीमे अवसाद की ओर धकेलता है तुम्हें. खोने –पाने ,रिश्तों के बनने और उसके छूटने के खौफ में जीना ही तुम लड़कियों का रूटीन बन जाता है – न समाज की सुरक्षा और न कोई आधुनिक मूल्य- शेष रह जाता है खोने –पाने की जद्दोजहद. तुम न पहली लडकी हो इस इंडस्ट्री में , जिसने यह कदम उठाया और दुखद है कि अंतिम भी नहीं होओगी. ज्यादा दिन नहीं हुए, जब जिया खान की आत्महत्या ने झकझोरा था लोगों को, सवाल छोड़े थे, लेकिन जल्द ही जिया खान भी भूला दी गई और भूला दिये गये वे सवाल !

शांति धारवाहिक में मंदिरा बेदी

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !! मौत का तुम्हारा असामयिक चयन तुम्हारी इंडस्ट्री को थोड़ी देर ठहरकर तुम्हारे बारे में या तुम जैसे दूसरी कलाकारों के बारे में सोचने के लिए विवश करेगा क्या- जिसके लिए हर चरित्र ‘ माल’ है, बाजार की टी आर पी के लिए ! क्या यह इंडस्ट्री यह सोचने के लिए दो पल रुकेगी कि तुम जैसी किशोर लड़कियों ( जब तुम आई थी बालिकावधु के लिए पहली बार ,तब तुम्हारी उम्र बमुश्किल 17 साल थी ) को कैसे ग्लैमर और अवसाद एक साथ देती है यह इंडस्ट्री – जिन्हें ड्रग्स, नाईट क्लब और बनते-बिगड़ते रिश्तों का रूटीन ही जीवन की हकीकत से दिखते हैं. सोच और व्यक्तिव दोनो को स्टीरियो टाइप करती है यह इंडस्ट्री !

प्रत्युषा मैंने भी बहुत देखा  है ‘बालिका वधु’- सास – बहु के ड्रामे में तब्दील होने के पहले तक और देखा है तुम्हें बिग बॉस में अति साधारण लडकी की तरह- हालांकि सचेत थी तुम कैमरों से, लेकिन बहन तुम जैसी कितनी प्रत्युषायें देखते हैं हम, अपने छोटे शहरों में , जो देख रही हैं सपने, तुम्हारी इंस्ट्री के ग्लैमर से आकर्षित और फरेब, झूठ तथा उन्माद से अनजान !

आतंक के साये में

सुशीला टाकभौरे  

चर्चित लेखिका. दो उपन्यास. तीन कहानी संग्रह , तीन कविता संग्रह सहित व्यंग्य,नाटक, आलोचना की किताबें प्रकाशित. संपर्क :9422548822

मेरा नाम शोला है, मगर मैं बुझी-बुझी सी रहती हूँ. बहुत दिनों से सोच रही हूँ, सबको बता दूँ अपने मन के भय की बात, मगर कह नहीं पा रही हूँ. बात ही कुछ ऐसी है, सबके सामने कैसे कहूं? फिर भी मन का भय बार-बार करवट लेता है और मैं सहम कर रह जाती हूं.

दो आंखें मुझे हमेशा घूरती हुई नज़र आती हैं. हो सकता है, वे घूरती न हों, सिर्फ देखती हों. मगर उनका देखना मेरे दिल में तेज धार की तरह क्यों उतरने लगता है? उन आंखों की बनावट भी कुछ अलग प्रकार की है. दोनों आंखें भौंह के पास नाक की हड्डी की तरफ सिमटी हैं, फिर भी फैली दिखती हैं. आंखों के आस-पास काला घेरा है, जो आंखों की सफेदी अलग से बताता है. आंखो की यह सफेदी भी मुझे हमेशा डराती है. इस सफेदी के कारण वे आंखें ठहरी हुई शान्त झील जैसी लगती हैं- ठहरी हुई शान्त झील, जैसे बर्फ की तरह जमी हो.

मैं जानती हूं, ऊपर से सर्द सफेद आंखें अन्दर से इतनी ठंडी नहीं हो सकतीं. उनके भीतर आग है. होगी ही, इसकी संभावना ही मुझे दहलाती है. यद्यपि मैं आग से नहीं डरती. आग से खेलना कोई बड़ी बात नहीं है. आग उतनी खतरनाक भी नहीं होती. खतरनाक होती है, इस तरह की आग जो सर्द सफेदी के पीछे छिपी हो.

किस्सा आज का नहीं, काफी दिनों पहले का है, बल्कि बरसों पुराना. हमारे आपस के सम्बन्ध अपनत्व पूर्ण हैं. हंसना, मुस्कराना, नमस्कार, बातें करना, यहां तक कि चर्चा, विचार विमर्श होता रहता है. हंसते-मुस्कराते समय वे आंखें सामान्य रहती हैं, तब उन आंखों से डर नहीं लगता. मगर अपने काम में व्यस्त रहते हुए, कभी क्षणभर के लिए उधर नज़र उठ जाएं और वे आंखें मुझे ही घूरती दिखें, तब मैं अंन्दर तक भयभीत हो जाती हूं.

साभार गूगल

आजकल हर तरफ आतंकवाद का बहुत जोर है. यह जोर आज़कल का नहीं, बरसों पुराना है. लोग आतंकवाद की खुलेआम चर्चा करते हैं, उसकी भर्त्सना करते हैं.आतंकवाद देश के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी खतरनाक है. मैं भी इन खतरनाक लोगों से डरती हूं. डरना ही चाहिए. आतंक किसी भी प्रकार का हो, होना ही नहीं चाहिए. आतंक से आतंकित करने का उद्देश्य खतरनाक होता है. किसी सौम्य चेहरे की सौम्य आंखें किसी खतरनाक इरादे से, किसी को घूरती हुई देखें तो वह भी किसी आतंकवाद से कम नहीं है.

मैं एक सामान्य नागरिक हूं. मेरा सीधा सरल जीवन है. सामान्य शिक्षा, सामान्य नौकरी, सामान्य रहन-सहन, सामान्य जीवनशैली है मेरी. मुझे किसी से न लेना है, न देना. मेरे अपने बच्चे हैं, पति है. समाज के अन्य लोगों से मेरा विशेष लेना देना नहीं है. लेकिन ये बातें कुछ वर्ष पहले की हैं. अब मैं कुछ विशेष बनती जा रही हूं. शिक्षा उतनी ही है, नौकरी भी वही है, घर-परिवार भी वही है. मगर इनके अतिरिक्त मेरे कुछ काम बढ़ गए हैं.मैं अपने पिछड़े दलित समाज के विषय में सोचने लगी हूं. विषमतावादी, जातिवादी समाज-व्यवस्था के विषय में विचार करने लगी हूं. जाति व्यवस्था के विरुद्ध तर्क-वितर्क के साथ बोलने लगी हूं.

अपना स्थान समाज में निश्चित करने लगी हूं. निश्चय ही यह स्थान बहुत पहले से नीचा रहा है. अब तर्क-वितर्क और सतर्क चेष्टा के साथ उसके नीचा न होने और ऊपर क्यों न होने पर विचार करने लगी हूं. मैं कबीर, रैदास, पेरियार, फुले, बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर के जीवन संघर्ष और उनकी विचारधारा को समझने लगी हूं. विचार करने की स्वतन्त्राता हमेशा सबको रही है. चाहे वह गुलाम हो, अछूत हो, फांसी के तख्ते पर खड़ा हो, या अन्धेरी कोठरी में बन्द हो.

मुझे याद है, उन दिनों मैं अन्धेरे में ही थी. यद्यपि कालेज जाती थी. बी.ए. फाइनल में थी. फिर भी मेरी यह शिक्षा सिर्फ किताबी शिक्षा थी. इस शिक्षा से मेरे विचारों में कभी कोई किरण नहीं फूटी, न ही कभी किरणों की ओर आगे बढ़ने की इच्छा जागी थी. मैं अन्धेरी कोठरी में बन्द थी. जैसे रात के अन्धेरे में कुछ नहीं सूझता, उसी प्रकार अन्धेरी कोठरी में बन्द मैं अन्धेरो में जीवन की बात सोचती थी, क्योंकि उजाला कभी मिला ही नहीं था.

जो उजाले से निकालकर अन्धेरे में बन्द कर दिए जाते हैं, उनकी बात अलग है, क्योंकि वे उजाले को जान चुके होते है. लेकिन मैं तब अन्धेरे को ही जानती थी. अन्धेरे में पैदा हुई, अन्धेरे में बड़ी हुई और अन्धेरे में ही शिक्षित हो रही थी. तब यही मेरा जीवन था. अन्धेरे का प्रकाश की ओर देखना, वैसे तो अच्छी बात है. मगर यहां बात अलग है. शायद किसी ने कभी यह बात न सुनी हो, कि अन्धेरा प्रकाश से मिल जाए तो प्रकाश भी अन्धेरा बन जाता है. आप विश्वास नहीं करेंगे, यह समाज का गणित है, जो गांव-शहर की हर सड़क पर, हर गली में, हर मकान की दीवार पर हल किया हुआ मिलेगा. कोई उलझन नहीं, कोई तर्क नहीं, निश्चित रूप से हल किया हुआ सवाल का प्रतिफल भी निश्चित है. अन्धेरे का प्रकाश के साथ योग (बराबर) अन्धेरा.

हां, कभी ऐसा हुआ है, सुना भी है और देखा भी है- प्रकाश का अन्धेरे से मिलना (बराबर) प्रकाश. मगर ये अलग बातें हैं, इनके अन्जाम भी अलग हैं. मैं कह रही थी, अन्धेरे में होने की बात . इतना जरूर कहूंगी, मैंने उन दिनों जान लिया था- किसी का नाम मात्रा प्रकाश होने से वह उजाले का पर्याय नहीं हो जाता. जैसे कि किसी नेत्राहीन का नाम नयनसुख होने मात्रा से, वह नयनसुख नहीं होता.

उन दिनों मैंने ब्राह्मण पुत्र प्रकाश को देखा था वह प्रकाश बस नाममात्र का प्रकाश था, एकदम डरपोक, शरीर से दुबला-पतला, निश्चय और दृढ़ता में भी कमजोर. मुझे देखते हुए देखकर वह डर गया था. झट से उसने मुझे सावधान कर दिया था, ”पगली, ऐसा कहीं हो सकता है?” उसके कहने का तात्पर्य था, तुम कहां कदमों के नीचे का अन्धेरा और मैं कहां बादलों के उस पार का उजाला. उसके विचारों का स्पष्ट उल्लेख था, ‘तुम कहां दलित अछूत कन्या और मैं कहां सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कुमार.’

वह मुझे निम्न और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानता था. वह अपने आपको प्रचण्ड सूर्य, आसमान का तारा समझता था. यही उसने सुना था, यही सीखा था. यही उसकी मानसिकता थी. चलो, अच्छा हुआ- इस तरह मुझे असलियत मालूम हुई. असल में मैंने उसकी सच्चाई जान ली थी. सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूँ कि उसके चंगुल में नही फंसी. नहीं तो, पछतावे के सिवा और क्या मिलता? उन दिनों मुझे गुस्सा बहुत आया था, भले ही मैं अन्धेरे में थी. मगर अपने होने का पूरा अहसास था. दिशा ज्ञान नहीं था. मगर, “जिस दिशा में निकलूंगी, उस दिशा को चीर दूंगी.” यह पूरा विश्वास था.

अन्धेरे में रहते हुए, मैं अधिकतर अपने आसपास ही देखती थी. वहां कुछ दिखाई नहीं देता था, तब आंखे बन्द कर लेती थी. इस तरह दिन, महीने, बरस बीतते गए और मैं उस अन्धेरी, सीली जगह से ऊंचे पठारी क्षेत्रा की एक नगरी में आ गई. मैं बाबा साहब अम्बेडकर की कर्मभूमि में, बाबासाहब की दीक्षाभूमि की नगरी में आ गई. यहां की जमीन सख्त है, जमीन पर अन्धेरा कम है. शायद धरती से सूर्य की दूरी कम है, अथवा शायद यहां सूर्य की किरणें बहुत प्रखर हैं. जो भी हो, मगर यह सच है, यहां मेरी आंखे बहुत चौंधियाई सी रहती थीं.

यह बात मुझे बाद में पता चली कि सूर्य सिर्फ उजाले का नहीं रहता, विचारों का भी होता है. यहां उजाले के सूरज की तरह, विचारों का सूरज भी चमकता है. चकाचैंध परिवर्तनशील विचारों की थी. धीरे-धीरे मैंने देखने का अभ्यास किया और फिर सचमुच देखने लगी. जब देखना सीखा, तब ज्यादा ही गहराई से देखने लगी. इस धूप की नगरी में, पहले से रहने वाले, अपने लोगों से भी ज्यादा प्रखर रूप में देखने लगी. साथ ही प्रखर रूप में विचार भी करने लगी.

बस, यहां से मेरे जीवन में बदलाव आया. मेरी आंखें बाहर देखने के साथ-साथ अपने अन्दर भी देखने लगीं. और जब मैंने अपने भीतर देखना शुरु किया, तब से मैं दूसरों के अन्दर-अन्तर्मन में भी देखने लगी. किसी का चेहरा देखकर और उसका आचार-व्यवहार देखकर, मैं उसके मन के भाव समझ जाती. ऊपर से सब ठीक-ठाक होने पर भी, मन के भीतर छिपे भेदभाव-दुराव भाव को ताड़ लेती.

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने मान लिया कि मैं भी कुछ हूं. और वे किंचित रूप से मुझसे खिंचे-खिंचे रहने लगे. उनका विरोध मेरे लिए खुशी की बात नहीं है. उनका विरोध मुझे भयभीत कर देता. यद्यपि वे हंसते, मुस्कराते हुए मुझे यह टाईटल भी दे चुके थे, “आपका नाम ही शोला है. आप तो सूरज हो. आपके रहते अन्धेरे की बात कैसे होगी?”
अन्धेरे में रहने वाली मैं, अब स्वयं सूरज कही जा रही हूं- यह सत्य है या व्यंग्य? पता नहीं. लेकिन मैं जानती हूं, वे इस सूरज को कभी भी ढक देंगे. बिलकुल उसी तरह, जैसे किसी मुर्गी को बन्द करने के लिए, उसके ऊपर टोकरी या डलिया रख दी जाती है.

मेरा नाम शोला है. मैं आसमान का सूरज नहीं, धरती का दीपक हूं. स्वयं अपना तेल, अपनी बाती जलाकर, अपने आसपास का अन्धेरा हटाने का प्रयास कर रही हूं. मैं किसी का अहित नहीं कर रही, फिर भी डरती हूं. कुछ लोगों को मुझसे शिकायत है. मेरी प्रशंसा करने वालों में मेरे दुश्मन भी हैं, जो नहीं चाहते कि मैं दीपक की तरह जलूं. वे चाहते हूं, मैं जलूं मगर उजाले की बात न करूं.

धीरे- धीरे यह हुआ कि मैं दीपक की तरह जलते हुए उजाले की बात भी करने लगी, उजालों को जिन्दा रखने की बात भी करने लगी. तब धीरे-धीरे मेरे आसपास निस्तब्धता छाने लगी. यह निस्तब्धता नहीं थी, लोग जानबूझ कर चुप रहने लगे थे. किसी को धोखा देने की तरह लोग अचानक ठहाके लगाकर हंसते, खूब जोर-जोर से बातें करते, फिर अचानक चुप हो जाते, जैसे कुछ हुआ ही न हो. अक्सर खाने-खिलाने की बातें की जातीं. विशेष आग्रह के साथ, घर से खाने की चीजें लाकर खिलाने की बात कही जाती. लोग खा लेते, पानी भी पी लेते, मगर फिर स्तब्धता छा जाती, जैसे यह सब कुछ भी नहीं. जो है वह तो मन में है- उसे कौन, कैसे बाहर निकाल सकता है?

साभार गूगल

किसी को नकारने का यह तरीका बहुत खूब है- उपेक्षा करो, ध्यान ही मत दो. ध्यान देकर भी ध्यान मत दो. बात करके भी बातें मत करो. उसकी सुनकर भी कुछ न सुनो. उसके कहने – सुनने के समय तुरन्त दूसरों से बातें करने लगो. मैं उनकी इन बातों को समझने लगी थी.कभी कभी मुझे आभास होता कि मैं अपने हाथ मल रही हूं. जैसे मैंने अपना कुछ खो दिया है. मगर नहीं, जो खोया, वह मेरा था ही नहीं. वह तो मात्रा दिखावा था, उनका अपनेपन का दिखावा. दिखावे के पीछे का सच, जब अपने आप सामने आने लगे, तब यह दुख की नहीं, खुशी की बात होती है. मुझे भी खुश होना चाहिए. मगर मैं खुश नहीं हो सकती. यह खुश होने की बात नहीं है, दुखी होने की बात है, “क्यों लोग दिखावे के पीछे सच को छिपाकर रखते हैं? क्यों बहरुपियापन रखते हैं? क्यों दोमुंही बातें करते हैं?”

कुछ दिनों से मन शांत रहने लगा था. अच्छी तरह मालूम हो गया था, सदियों से यही होता आया है, शायद आगे भी होता रहता, फिर सम्भावना यह बनने लगी कि अब आगे ऐसा नहीं चल सकेगा. समाज व्यवस्था में परिवर्तन – जिन परिवर्तनवादी लोगों के प्रयास से यह सम्भावना बनी है, उन लोगों में मैं भी शामिल हो गई हूं. मैं भी तकरार, फटकार, ललकार के साथ अपने अस्तित्व की, अपने अधिकारों की बातें करने लगी हूं. विषमतावादी पुरानी परम्पराओं को तोड़ने की बातें और समतावादी नई सम्भावनाओं को जोड़ने की बातें मैं करने लगी हूँ.

लोगों को आश्चर्य भी है, अन्धेरे में उपजी, बुझी-बुझी सी, कम अक्ल, कम शक्ल, कम-कम, क्यों कमबख्त बनती जा रही है? लेकिन लोग मुंह पर कुछ नहीं कहते हैं. यदि कहते तो वाद-विवाद और तर्क-वितर्क से बात का स्पष्टीकरण हो जाता. लोग जानतें हैं, बात उनके पक्ष में नहीं है, इसलिए वे इसे अस्पष्ट रूप में ही खत्म करना चाहते हैं. खत्म करने की बात है, उसी बात का खतरा है. लोग पत्ता-पत्ता, डाल-डाल नहीं, जड़ को ही खत्म करना चाहते हैं.

कौन हैं वे लोग ? किस बात से नाराज हैं ? क्यों नाराज हैं? किससे नाराज हैं? यह सब स्पष्ट है, फिर भी अस्पष्ट बनाकर रखा जाता है, कुछ इस तरह, “नहीं, नहीं. हम वे लोग नहीं, हमें कोई ऐतराज नहीं. हम किसी से नाराज नहीं. हमें किसी की प्रगति से नाराजगी नहीं.”ऐसे ही कुछ लोग मेरे साथ हैं. नहीं, मैं उनके साथ, उनके बीच हूं. उनकी नजरें मुझपर हैं और मैं उनसे भयभीत हूं.

उनमें वह विशेष आंखों वाला व्यक्ति विशेष है, जिसने समाज को वर्णवादी -जातिवादी परम्पराओं में जकड़े रहने का, पुरानी रूढि़वादी परम्पराओं को चिरजीवी बनाए रखने का बीड़ा उठाया है. उसने ही जैसे इस बात का प्रण किया है कि वह अपने सनातन मार्ग के विरोधियों को समाप्त कर देगा. समता, सम्मान और स्वतन्त्रता के अधिकारों की बात करने वाले समतावादी मूलनिवासियों को अकेले ही खत्म कर देगा. वह छल, बल और प्रपंचो के द्वारा, साम-दाम-दण्ड-भेद के द्वारा, पुनः विषमतावादी, जातिवादी मनुवादी- वर्णवादी परम्पराओं को स्थापित करके, चिर स्थाई रखना चाहता है. उसकी आंखों में मुझे भयानक आतंकवाद नजर आता है.

आकाशवाणी से समाचार प्रकाशित होते हैं, समाचार पत्रों में खबरें छपती हैं, दूरदर्शन पर भी बताया जाता है- सरकार आतंकवादियों से निपटने के यथा-संभव प्रयत्न कर रही है. सरकार के कार्यों को और उसकी सराहना को भी मीडिया वाले बताते रहते हैं. यह खुला आतंकवाद है. सबके सामने आतंकवादी निडरता के साथ लोगों की नाकों में चने डालते हैं. खुले आम उनका विरोध किया जाता है. आतंकवाद के विरुद्ध खुलेआम मोर्चे बनाए जाते हैं, ताकि उसे खत्म किया जा सके.

मेरी समस्या अलग है. यहां घने जंगल और सुनसान रास्तों की बात नहीं है. यहाँ बन्दूक और तलवार जैसे हथियारों की बात भी नहीं है. न ही सेना या सुरक्षा बल बुलाने की जरूरत है. जरूरत सिर्फ इस बात की है- यह पता लगाया जाए कि वे आंखे मुझे इस तरह क्यों घूरती हैं? मेरे लिए कभी कोई सरकारी सहायता नहीं मिल सकेगी- मैं जानती हूं. यदि मेरी हत्या हो जाए तो किसी को यह पता भी नहीं चलेगा कि मेरी हत्या किसने की? और क्यों की? न ही यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि असली हत्यारे कौन हैं? क्योंकि इन बातों को पूरे प्रयत्नों द्वारा छिपाया जाएगा. उनका ऊपर का मुखौटा सहज ही अपनापन, सद्भावना और संवेदना बताता रहेगा.

उनकी बेईमानी वे जानते हैं. खुलेआम बेईमानी करते हैं मगर खुद पर कभी शर्म नहीं करते. वे अपने छल और प्रपंचों के द्वारा लोगों को सही बात समझने नहीं देते. हमारे कुछ अपने लोग भी ऐसे हैं कि न तो वे खुद इन बातों को समझ पाते हैं, न ही किसी ईमानदार के समझाने पर समझते हैं. खैर, इतनी दूर की बात, हत्या की बात नहीं सोचना चाहिए. चिन्ता का कारण यह है कि इन आतंकवादी नजरों का उद्देश्य किसी निर्दोष की हत्या करना है, तो इनसे कैसे बचा जाए ?

उनकी साम, दाम, दण्ड, भेद की बात मैं बहुत पहले से जानती हूं. उनकी इन नीतियों के जाल में बिना उलझे, साफ-साफ बच गई हूं. मगर मृत्युदण्ड का उनका ब्रह्मास्त्र सबसे कठोर और निर्दयी है. कब क्या हो जाए- कुछ कह नहीं सकते, इसलिए मन ही मन भयभीत हूं. भय से घबराकर माफी मांग लूं और उनके बताए पुराने रास्ते पर चलने लगूं- यह तो अब मेरे लिए संभव नहीं है. साथ में, उनकी भी बात है. वे मुझे पहचान गए हैं. अब वे मेरे सरल और निर्बल होने का विश्वास नहीं कर सकते. भले ही वे क्षमा करें. भले ही वे दया करें. मीठी-मीठी, चिकनी-चुपड़ी बातें करें, मगर अन्त वही होगा, जो दण्ड विधान का अन्तिम सत्य है- मृत्युदण्ड !

निर्दोषों को मृत्युदण्ड देने का इतिहास है. जिस तरह क्राईस्ट को सूली पर टांगा गया था. उसी तरह हमारे विद्रोही क्रान्तिकारी विचारकों, समाज सुधारकों और परिवर्तनवादी महापुरुषों, सन्तों को देश निकाला और मृत्युदण्ड देकर उन्हें चुप करा दिया गया. आतंक के साथ में जीवन, मौत की सूली पर रहता है. मुझे मृत्युदण्ड दिया जा सकता है. मगर किस कसूर का? आतंकवाद का लक्ष्य है- बेकसूरों को भयभीत करना, उन्हें नेस्तनाबूत कर देना. इस छिपे आतंकवाद पर पुलिस की नजर क्यों नहीं जाती?

विषमतावादी – जातिवादी लोगों के इस आतंकवाद को जड़ांे से उखाड़ने के लिए सवर्ण समाज के सुविधा-सम्पन्न समझदार लोग आगे क्यों नहीं आते? चुप रहकर या चुपके-चुपके शह देकर, वे इस आतंक से बेकसूर निरीह, दलित, शोषित मूलनिवासी लोगों को भयभीत क्यों बनाये रखना चाहते हैं?

उनकी चालबाजी तो देखो. आतंक खुद फैलाते हैं, मगर कसूरवार ठहराते हैं – निर्दोष गरीब, पिछड़े आदिवासी, शूद्र अछूत बहुजनों को. इनको डराकर, अग्निकाण्ड- हत्याकाण्ड और सामूहिक नरसंहार करके इन्हें भयभीत रखते है. इन पीडि़तों को और अधिक पीडि़त करते हैं. उनकी आतंकवादी भावनाओं, विचारों और उन नजरों से मैं भयभीत हूं- साथ ही सतर्क भी, हमेशा चैकस, हर बात को ताड़ते हुए, हर परिवर्तित बात को आंकते हुए.

देखते देखते आजकल सब कुछ बदलने लगा है. जैसे कोई शुद्ध शाकाहारी कहलाने वाला व्यक्ति मुर्गी को दाना डाले, तो आश्चर्य होता है. मुझे भी आश्चर्य होने लगा है. आजकल मुझे भी दाना डाले जाने या चुग्गा चुगाए जाने की, प्रक्रिया का प्रयत्न किया जाने लगा है.

मैं चुप हूं, तटस्थ हूं. मेरे देखते, मेरे जैसे कई लोग उस चुग्गे के जाल में फंसे हैं. बाद में चुग्गा नहीं, बस जाल ही रह गया. फिर भी वे जाल को छोड़ नहीं सके, अथवा अब वह जाल उन्हें नहीं छोड़ रहा है. मंै इन सब बातों को देख रही हूं और समझ भी रही हूं.

अचानक एक विशेष घटना हो गई है. कई बरसों के बाद प्रकाश मिला. एकदम कमजोर, बूढ़ा जैसा. मगर आन-बान-शान वही है. बड़प्प्न का रौब चेहरे पर झलकता है. मुझे देखकर तपाक से बोला, “ओह शोला, तुम कैसी हो?” मेरे मन में आया, कसकर एक झापड़ उसके चेहरे पर लगा दूं. मेरी निर्भीकता करवट बदलती है. मैं कई बरसों से त्रस्त, आतंक के साये से मुक्त होना चाहती हूं. मैंने निर्भीकता से कहा, “मैं आपसे बेहतर हूं. हर  बात में बेहतर.”

वह मेरा मुंह देखने लगा. मेरे भीतर शोले भड़कने लगे. सदियों पुरानी आग, जो ज्वालामुखी के भीतर दबी थी, अचानक मेरे भीतर विस्फोट की स्थिति में आ गई. मैंने उससे कहा, “आप कैसे हो? जरा अपने आपको भी देखो. अपनी कमजोरी कबूल करो. अपनी बेईमानी कबूल करो.”

वह कुछ समझा नहीं. मगर वह समझ गया, मैं बिल्कुल बदल गई हूं. वह समझ नहीं पा रहा था, मुझसे कैसे बात करे? फिर भी वह ठहरा रहा. शायद वह मेरे बदलाव का कारण जानना चाहता था. वह बहुत ही मिठास के साथ बोला, “सुनो, मुझे बताओ, क्या तुम्हें किसी ने धोखा दिया है?”
मैं चीख पड़ी, “हां, तुमने. तुमने. तुम धोखेबाज, धूर्त, कुटिल, क्रूर, दुष्ट और कायर हो.”
वह बहुत अपनेपन के साथ हंसा. फिर बहुत प्यार के साथ बोला, “शोलू, तुम अभी भी मुझे चाहती हो. अब मैं भी जातिवाद नहीं मानता. चलो, हम शादी कर लेते हैं.”
मैं हंसी. हंसती रही. बहुत देर तक हंसती रही. फिर मैंने व्यंग्य से कहा, “क्या यह तुम्हारी सामाजिक समता की चाल है?”
वह गम्भीरता के साथ बोला, “सामाजिक एकता और समरसता एक ही बात है.”
मुझे गुस्सा आने लगा. मैंने गुस्से से कहा, “अब तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते. मैंने सबको पहचान लिया है. हर बात को परख लिया है. तुम्हारी सद्भावना मात्रा दिखावा है, एक मुखौटा है.”

वह क्रूरता के साथ हंसा. फिर बहुत कुटिलता के साथ सम्बोधन करते हुए बोला, ”मूर्ख, तुमने अपने आपको क्या समझ लिया है? क्या मैं सचमुच तुमसे विवाह कर लूंगा? कहां तुम? कहां मैं? तुम्हारी मेरी कभी कोई बराबरी नहीं हो सकती. तुम जहां पहले थी, मेरे लिए आज भी वहीं हो. चौथे क्रमांक से भी नीचे, सबसे अन्तिम क्रमांक पर अन्त्यज, अछूत.

और मेरे भीतर विस्फोट हो गया. पता नहीं क्या-क्या हुआ? मेरे आसपास गरम लावा बह रहा है और मैं शांत चित्त, सन्तोष के साथ, निश्चिन्त हो गई हूं. लोग उस ब्राह्मण कुमार की आकस्मिक मृत्यु के कारणो की खोज कर रहे हैं, उसी तरह जैसे शम्बूक की तपस्या के कारण ब्राह्मण के बालक की मृत्यु की खोज की गई थी. मगर मैं निश्चिन्त हो गई हूं. अब मैं आतंक के साये से मुक्त हूं. जो लोग मुझे बरसों से, आतंक से भयभीत बनाए हुए हैं, मैं अब उन लोगों को, उन आंखों को खोजने लगी हूं.

विष्णु जी, ब्राहमणवाद से हमारी लड़ाई जारी रहेगी !

प्रमोद रंजन


( दलित -बहुजन संघर्षों और सपनों के लिए समर्पित पत्रिका का मासिक प्रिंट एडिशन बंद होने जा रहा है . जितना इस पत्रिका का प्रकाशन कयासों को जन्म दे रहा था उससे कम कयासों को जन्म नहीं दे रही है , इसके एक हिस्से के बंद होने की सूचना . पत्रिका के प्रिंट एडिशन का बंद होना निश्चित रूप से दलित -बहुजन -स्त्री आवाज के लिए क्षति है .  पत्रिका के सम्पादक प्रमोद रंजन इसके प्रकाशन और बंद होने के साथ जुड़े कयासों पर पहली बार विस्तृत जवाब दे रहे हैं . )

”यह होना ही था। यह एक रहस्य ही है कि आप इसे द्विभाषीय और इतना महंगा क्यों निकाल रहे थे। बिना सब कुछ जाने मैं ऐसे पत्रों में कुछ नहीं लिखता’’- विष्णु खरे, वरिष्ठ वरिष्ठ हिंदी कवि, पूर्व संपादक, नवभारत टाइम्स का ईमेल, 12 मार्च, 2016।  



यह लेख न लिखता, अगर विष्णु खरे जी का उपरोक्त मेल नहीं आया होता। फारवर्डप्रेस जैसी पत्रिका के लिए जगह बहुत कीमती चीज रही है। पिछले वर्षों में पांचजन्य,आर्गनाइजर जैसे आरएसएस के मुखपत्रों समेत भारी-भरकम बजट वाली ब्राह़्मणवाद की प्रचारक वेबसाइटें व दैनिक जागरण, पायनियर जैसे दक्षिणपंथी पत्र हमारे विरोध में निरंतर अभियान चलाते रहे हैं। जबसे उन्हें पत्रिका के कथित रूप से बंद होने की सूचना मिली है, वे फू ले नहीं समा रहे हैं। इन दिनों अति उत्साह में उनकी ओर से सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि चूंकि”मोदी जी ने एफ सीआरए के नये नियम बना दिये हैं, जिससे फारवर्ड की फारेन फंडिंग बंद हो गयी, इसलिए इन्हें पत्रिका बंद करना पड रहा है।’’पहले भी कई बार इनका उत्तर देने की इच्छा हुई। लेकिन हर बार लगा कि फारवर्डप्रेस में फुले-आम्बेडकरवाद को, समानता के विचार को, बढ़ाने के लिए जो जगह उपलब्ध है, उसका उपयोग इन कम महत्वपूर्ण कामों में करना उचित नहीं होगा। वैसे भी, उन्होंने किसको छोड़ा है? फूले, आम्बेडकर, कांशीराम, पेरियार – सभी पर उन्होंने फारेन फंडेड होने के आरोप लगाये हैं। जो कोई भी ब्राह्मणवाद का विरोध करे, वह फारेन फंडेडहै। आजकल सरकार में आने के बाद उन्होंने इस ‘फारेन फंडेड’ वाले आरोप को थोड़ा और घना कर दिया है। अब तो जो ब्राह्मणवाद का विरोध करे वह देशद्रोही है। हमारे लोग इन आरोपों के सच को खूब समझते हैं। हमें उन्हें इस बारे में कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं विष्णु खरे जी का क्या करूं? वे मेरे प्रिय कवियों में से रहे हैं। उनके तीन कविता संग्रह ‘खुद अपनी आँख से’ (1978), ‘सबकी आवाज के पर्दे में ‘(1994), तथा ‘काल और अवधि के दौरान’ (2003) मेरी प्रिय काव्य पुस्तकों में शुमार हैं।
सवाल सिर्फ  विष्णु जी का भी नहीं है। उन्हें तो मैंने ईमेल से उत्तर भेज ही दिया है। लेकिन वे अकेले नहीं है, वे हिंदी साहित्य जगत की एक विचित्र मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे मैंने पिछले पांच वर्षों में फारवर्ड प्रेस के लिए काम करते हुए महसूस किया है। लेखकों-कवियों का एक भरा-पूरा समुदाय है, जो न सिर्फ कूपमंडूक है, बल्कि हमेशा किम्कर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में रहता है। विचार के क्षेत्र में कुछ नया करने के इच्छुक हम जैसे लोगों के लिए कानाफू सी में माहिर यह समुदाय उनसे अधिक पीड़ादायक है, जो सीधे हमला करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि इन कानाफूसियों का यथाशीघ्र अंत किया जाए। जिसे हमला करना है, पूरी तरह सामने आए। आंख में आंख मिलाकर बात करे।

विष्णु जी के उपरोक्त ईमेल का जो उत्तर मैंने भेजा है, उसे बताने से पहले मैं उनके साथ इससे पहले हुए ईमलों के आदान-प्रदान को आपके सामने रखता हूं। इससे आप समझ पाएंगे कि फांस कहां हैं। पिछले साल मैंने फारवर्ड प्रेस के लेखकों के गुगल ग्रुप (एक प्रकार का सामूहिक ईमेल) से साहित्य वार्षिकी की ई-कॉपी भेजी तथा सभी से आग्रह किया कि वे 29 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित फारवर्ड प्रेस के वार्षिक समारोह सह वार्षिकी विमोचन कार्यक्रम में शामिल हों।  इसके उत्तर में विष्णु खरे ने 26 अप्रैल, 2015 को लिखा कि : ”आपका विशेषांक पूरा पढ़ गया। बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर सारे समसामयिक हिंदी साहित्य को गर्व होगा। 29 अप्रैल के समारोह में आ तो न सकूँगा किन्तु मुझे मालूम है कि वह सार्थक और सफ ल रहेगा। (लेकिन) आप ‘डी-ब्रह्मनाइजिंग हिस्ट्री’ लिखते हैं -‘डिसवर्णनाइजिंग’ क्यों नहीं ?इससे तो दूसरे दोनों वर्ण बच निकलते हैं और लगता है सिर्फ ब्राह्मणों को टार्गेट किया जा रहा है।’’ – विष्णु खरे, 26 अप्रैल, 2015
इसके उत्तर में मैंने लिखा : 
”धन्यवाद विष्णु जी। आपके स्नेह भरे शब्दों के लिए आभारी हूं। हां, यह आपने कुछ हद तक ठीक ध्यान दिलाया है। अंग्रेजी में होने के कारण ‘डी-ब्रह्मनाइजिंग’ हमारे इस पूरे संघर्ष को आम जनता के सामने ठीक से अभिव्यक्त भी नहीं कर पाता। इसलिए मैं इन संघर्षों को ‘गैर-द्विज’ नाम से संबोधित करने का पक्षधर रहा हूं, या फि र सुविधा के लिए ‘बहुजनों’ का संघर्ष। लेकिन ‘डी ब्राह़मनाइजिंग’ का अर्थ भी वह नहीं है, जो आप ग्रहण कर रहे हैं।आप कार्यक्रम मे रहते तो बहुत अच्छा लगता। फ ारवर्ड प्रेस के लिए कभी कुछ लीखिए न!’’-प्रमोद रंजन, 26 मार्च, 2015
खरे जी का उत्तर उसी दिन आया : 
”हिंदी में ‘गैर-द्विज’ एकदम मौजूँ है लेकिन अंग्रेजी में दुर्भाग्यवश द्विज के लिए twice-born’ चला हुआ है इसलिए उसमें ‘de-Dwijification’  अपरिचित लगता है और ‘twice-born’  से आप वैसी संज्ञा बना नहीं सकते। लेकिन उसका कोई हल खोजा जाना चाहिए।
भाई, यह तो शायद आप जानते होंगे कि मुझे मुम्बई के लिए दिल्ली छोड़े अब चार बरस हो गए हैं और यह पत्राचार भी मैं 29 अप्रैल को देश लौटने से पहले जर्मनी से कर रहा हूँ। आना असंभव ही था। आपके लिए लिखने की हसरत तो है लेकिन अभी खुद को उसके काबिल नहीं पाता।’’

हमारा पिछला पत्र (ईमेल) व्यवहार यहीं खत्म हो गया था। मैंने फारवर्ड प्रेस के लिए लिखने की उनकी हसरत और ‘खुद को उसके काबिल न पाने’का कोई उत्तर नहीं दिया। कारण यह था कि उनकी यह बात मुझे उस समय भी अजीब लगी थी। मेरे लिए यह समझना कठिन था कि ‘खुद को काबिल नहीं पाता’ का क्या अर्थ निकाला जाए। यह सच है कि हिंदी के अधिकांश साहित्यकार इस काबिल नहीं हैं कि वे फुले-आम्बेकरवाद को आत्मसात कर पाएं, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि स्वयं ही इसमें बहुत बड़ी बाधा है। लेकिन इसके बावजूद कई ऐसे लेखक हैं जिन्होंने इस बाधा को पार किया है। लेकिन विष्णु खरे के लिखने का जो अंदाज था, वह यह नहीं था। अब उनका ताजा मेल मिलने के बाद मैं ज्यादा स्पष्ट हूं कि वे व्यंग्य ही कर रहे थे कि फारवर्ड प्रेस ही इस काबिल नहीं है कि उनके जैसा जर्मनी में रह रहा हिंदी साहित्यकार इसके लिए लिखे। जबकि देश-विदेश में साहित्येत्तर अनुशासनों में काम कर रहे अंग्रेजी-हिंदी के अनेक प्रमुख बुद्धिजीवी फारवर्ड प्रेस के लिए न सिर्फ लिखते हैं, बल्कि इसके द्वारा समाज और संस्कृति के नये पहलुओं पर किये जा रहे काम की खुले मन से सराहना करते रहे हैं। लेकिन हिंदी के साहित्यकार के लिए शायद यह सब ध्यान देने योग्य बातें नहीं हैं।

बहरहाल, यह भी कितना अजीब है कि विष्णु खरे जैसा हिंदी का एक बड़ा कवि इतना भी नहीं जानता कि ब्राह्मणवाद, डी-ब्रह्मनाइजिंग (अब्राह्मणीकरण) आदि फुले-आम्बेडकरवाद के अवधारणात्मक शब्द हैं, इसका उनकी जाति अथवा किसी भी जाति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द सांस्कृतिक वर्चस्व के सहारे समाज पर कायम किये गये सामाजिक और आर्थिक वर्चस्व और इसके जरिए बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार और शोषण को व्यक्त करता है। इसी तरह, ‘डी-ब्राह्मनाइजिंग’ का अर्थ है, वर्चस्व की इस विचारधारा से मुक्त होना। मसलन, हम कह सकते हैं कि राहुल सांकृत्यायन, मुक्तिबोध, राजेंद्र यादव, वीरभारत तलवार, उदय प्रकाश आदि के साहित्य में उनके ‘डी-ब्रह़मनाइज्ड’ होने की प्रक्रिया दिखती है। वैसे भी, यह इतना नया शब्द नहीं है। माक्र्सवाद के जिन घरानों से विष्णु खरे संबंध रखते हैं, उनमें एक समय ‘डी-क्लास’शब्द बहुत प्रचलित था। क्या उस समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ था कि सिर्फ  उनके क्लास को टार्गेट किया जा रहा है?
क्लास और कास्ट में यही फर्क है। डी- क्लास का जुमला किसी के लिए परेशानी नहीं खड़ी करता लेकिन डी कास्ट होने में ब्राह्मणवाद सर पर सवार हो जाता है।

खैर, अब मुख्य प्रसंग पर लौटें। विष्णु जी के ताजा मेल का मैंने निम्नांकित विस्तृत उत्तर लिखा : 
”सम्माननीय विष्णु जी, फारवर्ड प्रेस का प्रकाशन बहुत महंगा नहीं था/ न है। बल्कि तुलनात्मक रूप से साहित्यक पत्रिकाओं से काफी सस्ता है। एक पत्रिका जो एक हजार प्रति छपती है, उनका प्रति कॉपी छपाई मूल्य काफी ज्यादा होता है। फारवर्ड प्रेस की अभी 10 हजार प्रतियां छपती हैं। प्रति कापी छपाई का मूल्य लगभग 11 रूपये पड़ता है, जबकि इसका कवर प्राइस 25 रूपया है। अगर आप ‘रहस्य’ ही समझना चाहते हैं तो इसे ऐसे देखें :
1. फारवर्ड प्रेस सिर्फ 64 पेज की पत्रिका है, जिसके अब सिर्फ  8 पेज कलर होते हैं और इसकी कीमत इसके आरंभ होने के समय मई, 2009 से ही 25 रूपये है। पृष्ठ संख्या के हिसाब से यह ‘मार्केट’ में इस श्रेणी की सबसे महंगी पत्रिका रही है। 100 से अधिक पेजों की फु ल कलर शुक्रवार 10 रूपये का था। लगभग 76 पेज का इंडिया टुडे (फुल कलर, बहुत महंगा कागज, उच्च सैलरी) 15 रूपये का था, जो अब बढ़कर 20 रूपया हुआ है। आप एक समय में नवभारत टाइम्स के किसी संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। उम्मीद है आप इसका अर्थ समझते होंगे। इसका अर्थ है कि पत्रिका को खरीदने वाले उसकी सामग्री के कारण अधिक मूल्य का भुगतान करने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि पत्रिका विज्ञापन की बजाय अपने पाठकों पर निर्भर है।
2. हमसे बहुत कम प्रसार वाली पत्रिकाओं को अच्छे विज्ञापन मिल जाते हैं। कौन सी पत्रिका कितनी छपती है, यह आप भी जानते होंगे और मैं भी जानता हूं। (उन्हें विज्ञापन कैसे मिलते हैं इसका रहस्य वे ही जानें)। फारवर्ड प्रेस प्रेस को आठ साल के प्रकाशन के दौरान सरकारी/गैरसरकारी विज्ञापन बहुत कम मिले। (क्यों कम मिले, इसका कारण हम जानते हैं। इसका कारण है समाज के कोने-कोने में बैठा जातिवाद और प्रसार संख्या के बारे में किसी भी प्रकार का लिखित अथवा मौखिक झूठ न बोलने तथा किसी भी प्रकार की घूस न देने की फारवर्ड प्रेसके मालिकों – कोस्का दंपति – की प्रतिबद्धता)
3. पिछले वर्षों में बड़े-छोटे सभी शहरों में पत्रिकाओं की दुकानें बंद होती जा रही हैं। उनकी जगह पर रेस्त्रां और जनलर स्टोर खुल रहे हैं। यह काफी तेजी से हो रहा है। हालत यह है कि अनेक नामी और ‘प्रतिष्ठित’ हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्रिकाएं प्रमुख दुकानों को सिर्फ  पत्रिका ‘रखने’ के लिए 2 से 4 हजार रूपये प्रति माह पेमेंट कर रही हैं। यानी, वे दुकानें पत्रिकाओं की बिक्री के लिए नहीं, बल्कि विज्ञापनदाताओं को पत्रिका की उपलब्धता दिखाने के लिए चल रही हैं। सिर्फ  बिक्री के बूते चलने वाले फारवर्ड प्रेस के लिए दुकानों को यह भुगतान करना संभव नहीं है।
4. हमारी डाक व्यवस्था बदहाल है, हमें सदस्यों की ओर से पत्रिका न मिलने की शिकायतें बड़ी संख्या में मिल रही हैं। इसे ठीक करने के लिए डाक विभाग के विभिन्न फोरमों का दरवाजा खटखटा कर हम थक चुके हैं। ऐसे में नयी सदस्यता लेते हुए भी हमें एक अपराध बोध घेरता है। कुछ साल पहले तक जब चिटि़ठयां आया-जाया करतीं थी, तो लोगों का एक प्रकार का दवाब डाक व्यवस्था पर बना रहता था। अब वह लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। 25 रूपये के एक अंक के लिए रजिस्टर्ड डाक अथवा कूरियर का खर्च न हम वहन कर सकते हैं, न ही हमारे पाठक।
5. फारवर्ड प्रेस का पाठक मुख्य रूप से दलित-आदिवासियों और पिछड़ों का वह तबका है, जो पिछले सालों में सरकारी नौकरियों, समाजिक-राजनैतिक कार्यों व छोटे-मोटे स्वरोजगारों के बूते ‘मुख्यधारा/ मध्यम वर्ग/ निम्न मध्यम वर्ग’ में आया है। यह इन बंचित तबकों का क्रीमी लेयर है और इस बाजार में फारवर्ड प्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। दूसरों की तुलना में फारवर्ड प्रेस की बहुत अधिक प्रतियां बिकती हैं और हर प्रति के कम से कम दस पाठक होते हैं। विशेषकर गावों और विश्वविद्यालयों में। यानी, हम अपने पाठकों के बूते इसे चला पा रहे थे। यह भारत के दक्षिण टोलों की पत्रिका है। पाठकों के खत्म हो जाने का रोना रोते रहने वाले हिंदी साहित्य की यह विडंबना ही है कि वह समाज के वंचित तबकों में अपनी हालत को समझने तथा उसका प्रतिकार करने के लिए पढऩे की भूख को समझ ही नहीं पाया। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी का बुद्धिजीवी समाज और इस क्षेत्र की बहुंसख्यक आबादी अलग-अलग दुनियाओं के वासी हैं। बहरहाल, यह हमारा सौभाग्य ही है कि हमें पाठकों की कमी नहीं रही। एक ऐसे समय में जब बाजार में उपलब्ध अन्य पत्रिकाओं की बिक्री नाममात्र की हो रही है, फारवर्ड प्रेस की मांग निरंतर बढ़ रही थी, लेकिन हम अकेले दम पर ध्वस्त हो रही पत्रिका वितरण प्रणाली को तो नहीं ठीक कर सकते। यही फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण को स्थगित करने का मुख्य कारण है।
6. हां, आपने द्विभाषी होने के बारे में पूछा है। फारवर्ड प्रेस के अनेक थोक खरीददार अंग्रेजी सिखाने वाले प्राइवेट संस्थान रहे हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या ऐसे पाठकों की है, जिनका कहना है कि वे इसे पढ़कर अपनी अंग्रेजी ठीक करते हैं। यह भी एक कारण है कि विभिन्न यूनिवर्सिटी कैंपसों में हम लोकप्रिय रहे तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भी पत्रिका के सदस्य अच्छी संख्या में हैं। एक और बात ध्यान में आती है। हिंदी लेखकों के मन में अंग्रेजी में अनुदित होने की तो बड़ी ललक रहती है। उनके लिए अंग्रेजी का मतलब यूरोप के प्रभावशाली लोग होते हैं। लेकिन इस देश में जो दक्षिण भारत है, वहां जो संघर्षरत लोग हैं, उन तक पहुंचने की कोई जिज्ञासा नहीं दिखती। ऐसा क्यों है, इसका रहस्य शायद आप बता पाएं।

विष्णु जी, उम्मीद है उपरोक्त बिंदुओं में मैंने आपके प्रश्नों का उत्तर दे दिया है, लेकिन यह भी नि:संकोच बताना चाहूंगा कि आपके मेल ने मुझे कहीं भीतर गहरी पीड़ा पहुंचायी है। बहरहाल, कोई बात नहीं। होता है। हम लोगों को यह सब सुनने-सहने, बार बार सप्ष्टीकरण देने की आदत डाल लेनी चाहिए।’-प्रमोद रंजन, 17 मार्च, 2016
कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन विष्णु जी ने न तो मेरे मेल का कोई उत्तर दिया है, न ही मुझे पहुंची पीड़ा के लिए किसी प्रकार का खेद जताया है। बहरहाल, मैं उनसे यह भी पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें ‘शुक्रवार’ का रहस्य मालूम है, ‘तहलका’ का रहस्य मालूम है, ‘द पब्लिक एजेंडा’ का रहस्य मालूम है, या फि र नवभारत टाइम्स का ही, जिसमें वे वर्षों तक नौकरी करते रहे? मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले आउटलुक (हिंदी) में पत्रकार दिवाकर ने विष्णु खरे पर आयी किसी किताब की समीक्षा लिखी थी। उस पर वे भड़क गये थे तथा एक लेख लिख मारा था, जिसमें उन्होंने दिवाकर पर उनकी कम उम्र के लिए तंज कसते हुए कहा था कि ‘मैं उस समय से पत्रकारिता कर रहा हूं, जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे।’ दिवाकर ने उसका एकदम सटीक उत्तर देते हुए कहा था कि ‘मैं उस समय पैदा नहीं हुआ था, इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन सच क्या है यह मैं जानता हूं’। वही बात मैं विष्णु जी को एक बार फिर याद दिलाना चाहता हूँ।

पाठकों और शुभचिंतकों से
पत्रिका के कथित तौर पर ‘बंद’ होने की सूचना पहुंचने के बाद आर्थिक सहयोग देने के इच्छुक लोगों के फोन और मैसेज मुझे लगातार आ रहे हैं। दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले इन फोन काल्स में से कुछ तो इतने भावुकतापूर्ण होते हैं कि कई बार तो लगता है कि हमने सचमुच कोई गलत निर्णय तो नहीं कर लिया। लेकिन जैसे ही मैं उन्हें पूरी योजना के बारे में बताता हूं वे बहुत हद तक आश्वस्त हो जाते हैं। मैं उन्हें बताता हूं कि पत्रिका का प्रकाशन स्थगित किया गया है, ‘बंद’ नहीं। इसके सुचारू संचालन के लिए हमें अपनी वितरण प्रणाली बनानी होगी, जो तभी संभव है जब या तो सामाजिक संगठनों का व्यापक सहयोग मिले,या फिर बड़ा पूंजी निवेश हो। अगर भविष्य में ऐसा हो सका तो हम पुन: इसके प्रिंट संस्करण का भी प्रकाशन करेंगे।
छोटे शहरों के पाठकों के संदेशों से ऐसा लगता है कि वे यह समझते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से उनकी तरह, मैं भी बहुत दु:खी हूं। मै उन्हें बताता हूं कि जून के बाद से आपकी यह प्रिय संपादकीय टीम फारवर्ड प्रेस की वेबसाइट को भारत का सबसे विचरोत्तेजक वेब-स्थल बनाने में जुट जाएगी।

मैं ‘प्रिंट’ को लेकर कतई नॉस्टलजिक नहीं हूं। लिखने के, छपाई के, ज्ञान के प्रसार के कितने माध्यम बदले हैं। कभी शाल पत्रों पर लिखा जाता था, फिर चमड़े पर, फिर कपड़े पर, विगत लगभग चार सौ सालों से कागज पर लिखा जा रहा है। और अब वेब पर। ज्ञान की दुनिया में आने वाले दशक वेब के ही होंगे। हमें कागज का मोह छोडऩा ही होगा। लिखा भी जाएगा, किताबें भी रहेंगी, पत्रिकाएं भी, पुस्तकालय भी रहेंगे लेकिन कागज पर छपी हुई चीजें सिर्फ  संग्रहालयों में ही देखी जा सकेंगी, जैसे हम आज शाल पत्रों पर लिखीं गयीं पाण्डुलिपियां वहां देखते हैं।

प्रिंट संस्करण के पाठक सवाल उठाते हैं कि गांवों और छोटे शहरों के लोगों की पहुंच अभी वेब तक नहीं हैं। जहां यह सुविधा है भी, वहां अधिक उम्र के लोग वेब पर जाने को तैयार नहीं हैं। मैं उन्हें कहता हूं कि मोदी जी के भक्तगण भले ही हमें अपना दुश्मन समझते हों, लेकिन मोदी जी हमारा एक काम जतन से कर रहे हैं। उनका ‘डिजीटल इंडिया’ प्रोजक्ट ठीक-ठाक प्रगति कर रहा है। आप लोग सिर्फ  यह ध्यान रखें कि मोदी जी रहें या जाएं, डिजीटल इंडिया न रूके। यह भारत में ब्राह्मणवाद के नाश की दिशा में बहुत बडी छलांग साबित होगा।
इस बात पर हमारे प्रिय पाठक हंसते हैं, लेकिन यह जानकर कुछ आश्वस्त भी हो जाते हैं कि फारवर्ड प्रेस का वेब संस्करण चलता रहेगा और कहते हैं कि ठीक हैं हम वहां से प्रिंट आउट निकलवा वितरित करवाया करेंगें। मैं कहता हूं कि आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। फारवर्ड प्रेस सिर्फ  वेब पर ही नहीं होगा। हम हर तीन महीने पर आठ किताबें भी छापेंगे। चार हिंदी में और चार अंग्रेजी में। वेब पर आने वाले सभी महत्वपूर्ण लेख विषयवार इन किताबों में संकलित होते जाएंगे। यानी अगर आप मासिक प्रिंट पत्रिका के हिसाब से देखते हों तब भी आपकी इस प्रिय पत्रिका का विस्तार ही हुआ है। इस पर वे हंसते नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की खनक बता देती हैं कि इस जानकारी से उन्हें सचमुच राहत मिली है। मैं उन्हें बताता हूं कि हर किताब लगभग 128 पेज की होगी तथा कीमत होगी सिर्फ 100 रूपये। जितनी अधिक प्रतियां हो सके मंगवाइए। यह हमारे लिए सबसे बड़ा सहयोग होगा। अगर आप इसके अतिरिक्त भी आर्थिक सहयोग कर सकने में सक्षम हैं तो उसके लिए अब हमारी वेबसाइट पर ‘सहयोग’ बटन होगा। आप उसके माध्यम से बहुजन पत्रकारिता का और विस्तार करने में हमारी मदद कर सकते हैं।

अपने इन पाठकों को मैं यह भी बताना चाहता हूं कि फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण में हमारे पास सिर्फ 64 पेज होते थे। उसमें भी हिंदी और अंग्रेजी, दोनों। कवर पेज, विषय सूची आदि से जो जगह मूल सामग्री के लिए बचती है, वह बमुश्किल 28-30 पेजों की होती है। मई, 2011 में इस पत्रिका से जुडऩे के बाद मैंने पहला काम यह किया था कि इसके दो पृष्ठों में चल रहे ‘पाठकों के पत्र’ वाले कॉलम को बंद कर दिया था। यह निश्चित रूप से उन पाठकों के प्रति अत्याचार था, जो प्रकाशित लेखों के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहते थे। लेकिन उस कॉलम को जगह की बचत करने के लिए बंद करना पड़ा था। यही कारण रहा कि मैंने भी खुद हर अंक में लिखने की बजाय फूले-आम्बेडकरवादी विचारों के आधार पर समसामयिक समस्याओं पर शोधपूर्ण लेखन करने  वाले नये-पुराने लोगों को अधिकाधिक जगह देने की कोशिश की। लेकिन अब वेब पर जगह की किल्लत खत्म हो जाएगी। वहां खूब जगह होगी, आपके लिए भी और मेरे लिए भी। तो आइए, जून केबाद चलें एक नयी यात्रा की ओर।

हां, मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि पत्रिका के प्रिंट संस्करण के स्थगित हो जाने के बाद हम पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अब हम देश और विदेश, दोनों जगहों से सहयोग स्वीकार करने सकेंगे। हम आम्बेडकरवादी संगठनों/व्यक्तियों तथा समान विचारधर्मा अन्य संगठनों से अपील करेंगे कि वे हर संभव सहयोग के लिए आगे आएं तथा भारत का पहला व्यावसायिक बहुजन प्रकाशन गृह खड़ा करने में हमारी मदद करें।

प्यारे विरोधियों के नाम

मैं जानता हूं कि उन लोगों को मेरे इस लेख से बड़ा आघात लगेगा जो यह मानकर खुश हो रहे थे कि फारवर्ड प्रेस बंद होने जा रहा है। लेकिन मैं उन्हें कहना चहता हूं कि मित्र, फारवर्ड प्रेस आपके विरोध में नहीं है। ब्राह्मणवाद और मनुवाद का विरोध करना आपका विरोध करना नहीं है। आज जो आजादी आप और हम महसूस कर रहे हैं, वह इसी कारण है, क्योंकि इस देश में ब्राह्मणवाद और मनुवाद कमजोर हुआ है। इन व्यवस्थाओं के कमजोर करने का अर्थ है समाज में, परिवार में – सब जगह व्यक्ति की आजादी सुनिश्चित करना। आप युवाओं को आज जो आजादी हासिल है, वह भी इसी का नतीजा है। आपके दुष्प्रचारों का उत्तर भी आज दे ही देता हूं। आप कह रहे हैं कि फारवर्ड प्रेस इसलिए बंद हो रहा है कि मौजूदा सरकार ने स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) को विदेशी फंडिंग के लिए बने ‘एफ सीआरए’ नियम में कुछ बदलाव किये हैं। प्रिय भाई, फारवर्ड प्रेस एक पत्रिका है, कोई एनजीओ नहीं। फारवर्ड प्रेस को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चलाती  है। कंपनी एक्ट में प्रावधान है कि कंपनियां किसी प्रकार का – देशी अथवा विदेशी – अनुदान नहीं ले सकतीं। समाचार व सम-सामयिक मुद्दों पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर 25 प्रतिशत की ऊपरी सीमा निर्धारित है। फारवर्ड प्रेस के प्रिंट एडिशन के लिए जो भी छोटी सी पूंजी रही है, वह मुख्य रू प से निदेशकों की रही है।

प्यारे विरोधियों, यह अपील आपके लिए भी है। आइए, हम को भारत को एक समतामूलक समाज के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करें। 
पुनश्च,

काश! यह फारवर्ड प्रेस में मेरा अंतिम लेख होता, तो मैं इसमें प्रधान संपादक श्री आयवन कोस्का और श्रीमती कोस्का के बारे में विस्तार से लिखने की अपनी इच्छा पूरी कर पाता। लेकिन अभी शायद हमें लंबे समय तक साथ काम करना है और अभी मैं जो कुछ भी लिखूंगा, वह एक अधूरा संस्मरण ही होगा। बहरहाल, इतने समय तक साथ काम करने बाद इतना तो कह ही सकता हूं कि जितना कठिन श्री कोस्का के उच्च लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की मिसाल मिलनी है, उतना ही मुश्किल श्रीमती कोस्का जैसी त्यागमयी महिला ढूंढना है। इस पत्रिका को जीवित रखने के लिए उनके द्वारा उठाये गये आर्थिक और शारीरिक कष्टों को मैंने देखा है। प्रिंट संस्करण में काम करते हुए न जाने कितनी बार कोस्का दंपत्ति और मैं एक दूसरे से असहमत हुए होंगे। लेकिन ऐसा एक बार भी नहीं हुआ, जब मुझे हारने के लिए मजबूर होना पड़ा हो। संपादकीय स्वतंत्रता के पतन के इस दौर में तो यह विरल ही है। संभव है श्री कोस्का आगामी अंक में पत्रिका के प्रिंट संस्करण से जुड़े अपने अनुभव लिखें। पाठकों के लिए, तथा स्वयं मेरे लिए भी वह कहीं अधिक उपयोगी होगा।

प्रमोद रंजन दिल्लीि से प्रकाशित भारत की पहली संपूर्ण द्विभाषी पत्रिका फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। यह पत्रिका फूले- आम्बेंडकरवाद के प्रति पक्षधरता के कारण चर्चित रही है। पत्रिका का वेब पोर्टल आप यहां देख सकते है – https://www.forwardpress.in/संपर्क : janvikalp@gmail.com

मंजरी श्रीवास्तव की कविताएं

हड़ताल

मैं सोच रही हूँ कि कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चली जाऊं
क़ायदे से बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे
क्योंकि
मुझे मेरे काम से कभी फ़ुर्सत नहीं दी गई
न मैंने ही लेने की कोशिश की.

जबसे होश संभाला
हमेशा काम ही करती रही
खाने के वक़्त और थिएटर में
बैठक में और शिकार के समय
कॉफ़ी पीते हुए और मातम मनाते हुए भी
शादी के मौक़े पर, मेज़ पर
सैर के समय पहाड़ी पगडंडियों पर
सफ़र के समय रेलगाड़ी, हवाई जहाज, ट्राम, मेट्रो, बस, ऑटो में
चौक-चौराहे, नुक्कड़, नदी के किनारे, समंदर तट पर
जंगल और किसी ए.सी. केबिन में भी
खेत में भी
अपने प्रियतम के लिए दोपहर का भोजन गठरी बाँधकर ले जाते समय भी
यहाँ तक कि नींद में भी करती रहती हूँ काम
नींद में भी जारी रहता है मेरा कार्य-दिवस
नींद में भी बनती रहती है कविता
कविता की पंक्तियाँ, उपमाएं और विचार तथा
कभी-कभी तो दिखाई देती है पूरी की पूरी तैयार कविताएँ
ऐसा लगता है
पृथ्वी पर हर पल, हर जगह मेरा ही कार्यक्षेत्र है.

बड़े मज़े से पक्षी गाते रहते हैं ज़िन्दगी भर वही गीत
जो सीखते हैं बचपन में एक ही बार अपने माँ-बाप से
नदी भी रहती है मस्त
एक ही धुन पर थिरकती हुई, गाती हुई
पर मैं…
मैं तो नहीं गा सकती न एक ही गीत बारम्बार
मुझे तो अपनी छोटी-सी ज़िन्दगी में रचने हैं इतने गीत
जो काफ़ी हों सालों-साल तक
और
मेरे मरने के बाद भी गाये जाते रहें बार-बार
पर मैं क्या रचूँ
कुछ भी तो नहीं बचा
न योग, न वियोग, न संयोग, न दुर्योग
न काम, न क्रोध, न लोभ, न मोह
न क्षमा, न दया, न ताप, न त्याग
न साम, न दाम, न दंड, न भेद
फिर भी
लम्बी और उनींदी रातों में
एक खेतिहर की तरह
शब्दों के सर्वोत्तम बीज चुनकर
काँटों और घास-पात से बचाते हुए
उनकी बुआई, निराई, गुड़ाई करती हूँ और
कोशिश करती हूँ
सभी हानिकारक जीव-जंतुओं, कीड़ों-मकोड़ों, टिड्डियों, चूहों और
अपने सबसे भयानक शत्रु ‘समय’ के भय से मुक्त
कविता और गीत की ऐसी फसलें पैदा करूं जो सदियों तक ज़िन्दा रहें.

रचना चाहती हूँ ऐसे गीत
जो उस शराब की तरह हो
जिसका ख़ुमार हमेशा बना रहे.

इसके लिए जागना ज़रूरी है
जागती रहती हूँ उन रातों में भी
जब बाहर बारिश पटापट का अपना राग अलापती होती है और
उन सर्द रातों में भी जब लम्बे गर्म लबादे में
अपने प्रियतम के साथ दुबककर मज़े की नींद ली जा सकती है.
उस सर्द रात के बाद ज़रूर सुबह होती है,
फिर दिन निकलता है और
दिन के बाद रात आती है…
जाड़े के बाद वसंत आता है और
वसंत के बाद प्यारी गर्मी
फिर छिन्न-भिन्न होते बादलों के पीछे से
सूरज कभी-कभार झाँकने लगता है
बुलबुल चाँदनी रात की निस्तब्धता में गाने लगती है
पर मुझे नींद नहीं आती
आराम करने का भी मन नहीं करता
इन चीज़ों को महसूस करती रहती हूँ
अपने दिल में एक न बुझनेवाली आग लिए
वे अलाव लिए
जिनसे मुझे बचपन में ही बहुत प्यार हो गया था
हरपाल सोचती रहती हूँ कि
ऐसा क्या लिखा जाए उस अलाव की रौशनी में
जो किसी को गरमाए बिना
अँधेरे में किसी का पथ रोशन किए बिना
बुझने न पाए

अब आप ही बताएं
हड़ताल पर जाने के बारे में मेरा सोचना
कितना उचित है….?

पतझड़ का एक गीत 

इन दिनों पतझड़ का शक्तिशाली, गहरा और मोहक जादू विलुप्त होने लगा है
खोने लगा है पतझड़ अपना सम्मोहन
पतझड़ का रंग भी उड़ रहा है धीरे-धीरे आजकल
फिर भी
जीवन का एक किनारा कहीं प्यार से भरा बचा है और
उस कोने से फूटती रोशनी से मैं रोशन रखने की कोशिश करती रहती हूँ अपना पूरा वजूद
आज भी वफ़ा का वह वादा थामे रहता है मेरी छोटी अंगुली
और दिलाए रखता है यह यक़ीन कि पतझड़ का तिलिस्म अभी बाक़ी है ज़रा-सा.

सिगरेट के जलते सिरे दूर तलक टिमटिमाते हैं तारों-से
जिनमें दिखाई पड़ता है अरसे से संचित जीवन
जलते-बुझते टिमटिमाते छोटे-छोटे रंगीन बल्बों की मानिंद
‘भक-भुक’, जल्दी-जल्दी जलती बुझती है आत्म-चेतना
ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ती-दौड़ती साँसे
अनायास निकलकर गिरने लगी हैं दमघोंटू घाटियों में
जहाँ बबूल की कांटेदार झाड़ियों में ज़रा-से फूल खिले हैं.
सहसा याद आने लगती है उन दिनों की
जब जीवन ऊपर को उड़ता हुआ गोल-सा गुब्बारा था
और प्रेम था उन्मुक्त संगीत-सा
विरक्त स्वरों-सा
मेरे इतना पास जितनी मेरी साँसें
और मुझसे इतना दूर जितना मैं ख़ुद-से.

अब मेरी जलती-बुझती आत्म-चेतना दिखाती है मुझे मेरे कई-कई रूप
“एक मैं वो जो ख़ुद के लिए
एक मैं वो जो इस जहान के लिए
एक मैं वो जो न ख़ुद के लिए और न इस दुनिया के लिए”
इसी ‘मैं’ की तलाश में मैं फर्लांग आती हूँ
कई-कई संवत्सर, कई-कई युग.

फ्लैशबैक में
तुम्हारी बाहों के दायरे में बंधी मैं…और तुम…
तुम मुझे गेटे (मशहूर जर्मन कवि) और होरेस (प्राचीन रोम का मशहूर कवि) की कविताएँ सुना रहे हो
और वह फ्लैशबैक मुझमें आज भी जागृत रखे हुए है उस ताकत को कि
मैं पकड़ सकती हूँ कोई निडर यूनिकॉर्न (ग्रीक किम्वदंती के अनुसार यूनिकॉर्न घोड़े जैसा पंखों वाला एक जानवर है जिसे केवल कोई स्त्री ही पकड़ सकती है) किसी परीकथा का.
अचानक तुम्हारी बांहों से निकल जाता है मेरा मन और तैरने लगता है
सपनों में देखे,
पानी में डूबे, छोड़े हुए
और ज़रा-सा याद रह गए किसी शहर की सतह पर.
इस महाद्वीप के इस स्थिर महानगर की सतह पर तैरते मेरे चंचल मन में
बज उठती है बीथोवन और शॉपन की सिम्फ़नी
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी की स्वरलहरियों पर थिरकने लगता है पानी से अठखेलियाँ करता मेरा मन.
पंडित भीमसेन जोशी के हिन्दुस्तानी आलापों के मूक स्वरों में
हिन्दोस्तान की गूढ़ लिपियों में लिखा गया गुप्त संगीत
झनझना उठता है पंडित रविशंकर के सितार के तार-सा मेरी नस-नस में
धीरे-धीरे भारत की यह अजनबी सांगीतिक भाषा
शामिल करने लगती है पूरे संसार को ख़ुद में और
बनने लगती है किसी अनंत संगीत-संसार का अंग.

मैं कभी बड़ी आसानी से
कभी एक नामालूम-सी हूक के साथ
कभी एक अनजानी तड़प में सिमटी
अलग-अलग भावनाओं में लिपटी
थिरकती हूँ इन धुनों पर, इन स्वरलहरियों और अपनी कविताओं पर
अपने गीतों के रागों पर
रोते हुए वाद्ययंत्र अनायास गाने लगते हैं
पतझड़ के काले जादू की एक फूंक से
हौले-हौले रात आकाश में बिखरने लगती है
और मैं अपनी हर रचना,  हर जादू से रचती हूँ
एक नया तिलिस्म.
इतिहास नहीं
एक नयी इतिहास दृष्टि
जिसकी ज़रूरत मेरे बाद भी युग-युगांतर तक पड़नेवाली है.

अचानक पोस्ते के लाल फूल से भी हल्की लगने लगती है मौत की सांस
वक्ष पर हाथ रखकर बुझती हुई सांस की ज़रा-सी आहट महसूसने की कोशिश करती हूँ तो सुनाई पड़ता है एक मौन
जो गा रहा है.
वक्ष और हाथ दोनों स्थिर हो गए हैं.
मैं और तुम साथ-साथ
नींद की एक अंतहीन, अँधेरी, गहरी गुफ़ा में उतरने लगते हैं
लेकिन अलग-अलग
और मुझे यहाँ भी (जहाँ सिर्फ़ मैं और तुम हैं)
इस घुप्प अंधियारे में भी
यह याद रखना पड़ता है कि तुम्हारा प्रेम मेरे लिए एक सपना है
एक सुखद स्वप्न
जबकि तुम भी जानते हो यह हक़ीक़त कि
तुम्हारे साथ सुना हुआ संगीत
संगीत नहीं है सिर्फ़
तुम्हारे साथ महसूसी गई ख़ुशी
ख़ुशी नहीं है केवल
तुम्हारे साथ जिए गए पल
पल नहीं हैं मात्र
उससे बहुत अधिक है कुछ
और हमारी शिराओं और मज्जा में बहता हुआ रक्त
रक्त नहीं है केवल
प्रेम की तरल तरंगें हैं ये रक्तकण.

अचानक दिखाई देती हैं
सूखी स्टार फिशेज़ जो समुद्र तट पर मरी पड़ी हैं.
फिर सुनाई देता है एक विद्रूप-सा अट्टहास
क़यामत के तूर-सा
(तूर – ईसाई विश्वास के अनुसार वह तुरही जो क़यामत के दिन इस्त्राफ़ील बजाएगा)
समुद्र बन जाता है बहर-ए-अहमर
(ईसाई विश्वास के अनुसार बहर-ए-अहमर वह समुद्र है जो मूसा पैग़म्बर के सामने दो हिस्सों में बंट गया था ताकि वह और उसके साथवाले फ़राओ की सेना से भाग सकें)
सूरज के सिन्दूरी धागों से हम बांध जाते हैं पतंगों की तरह
और ज़िन्दगी की आंधी हमें तेज़ी और अधीरता के साथ
कभी ऊंचे आसमान में उड़ाती है
तो कभी तंग घाटियों में भी ला पटकती है
और मैं ‘अंतिगोन’ सी भटक रही हूँ
(अंतिगोन प्राचीन यूनानी त्रासदी नाटक ‘अंतिगोन’ की नायिका है)
वह जलमग्न नगर हमारे साथ सफ़र करता है
हम इस शहर के साथ ख़ानाबदोश-से भटकते हैं
दरअसल हमलोग हैं कौन – ख़ानाबदोश ही तो न …?

तुम्हारे जाने के बाद का हर बीतता लम्हा
सुलझाने की ज़द्दोजहद में और उलझता रहा
उघड़े हुए ऊन-सा
यादों के उघड़े हुए वरक से झांकती हैं गीली पहाड़ियां
और हमारी यात्राएं
कच्चे धागे के टाँके-से उघड़ी हुई सफ़ेद सिलाइयों से झांकते हैं सफ़ेद बादल के टुकड़े
या बादल की एक पतली रेखा
पृथ्वी की गोलाई के साथ हम भी नाचते हैं गोल-गोल
और अलग होने के बावजूद मिल ही जाते हैं किसी न किसी ध्रुव पर
हवा के कुनकुने और ठन्डे बहावों के साथ
हमारी आत्माएं आहिस्ता-आहिस्ता तैरती हैं पंडुक-सी
जिसकी ‘डब-डुब’
पानी के निगलने की एक घूँट-सी
हम दोनों को ही सुनाई पड़ती रहती है यदा-कदा.

हमारे पास बचा ही क्या है
सिवाय कुछ गूढ़ लिपियों, मूक स्वरों, जलरंग चित्रों, भाषा, शब्दों और कुछ बिम्बों के अतिरिक्त.

सपने में फिर-फिर उभर ही आता है वह शहर
जिसने बतौर ज़मानत रख लीं तुम्हारी यादें और मेरा उल्लास.

तुम न जाने कहाँ हो
और मैं न जाने कहाँ
आसमान की आँखों में हम
और हमपर हैं आसमान की जासूसी निगाहें
वह देख रहा है पल-पल धूप भरी ख़ामोशी में
किसी नदी की सतह पर
बेपरवाह बहता हमारा प्यार
हमारी यादें
हमारा उल्लास
हमारा एक-एक एहसास.

खुली आँखों का स्वप्न

आजकल खुली आँखों से कुछ गड्ड-मड्ड होती-सी आकृतियाँ मुझे अक्सर दिखाई देने लगी हैं
सबसे पहले आँखों के आगे उभरता है

बिना आँखों वाला
लम्बे बालों वाला
या यूं कहें कि घोड़े की अयालों-सी बालों वाला
एक धुंधला-सा चेहरा
फिर वह दो बंजारा आकृतियों में बदल जाता है
पर गौरतलब यह है कि आँखें उन आकृतियों की भी नहीं हैं
पर शायद यह प्रेमी-प्रेमिका हैं
एक-दूसरे को गुलाब भेंट करते हुए
फिर वे घोड़े पर सवार होकर सूरज की तरफ निकल जाते हैं.

अब सूरज है ,मेरी आँखों के आगे चमचमाता हुआ
अपने प्रचंड ताप से मुस्कुराता हुआ
जग को जलाता हुआ
पर इसका ताप प्रेमी-प्रेमिका को डरा नहीं पाता
वह असंख्य पत्तियों वाला एक पेड़ तलाश ही लेते हैं.
प्रेमी, प्रेमिका को वृक्ष की छाँव के नीचे ले जाता है
फिर एक बांसगाड़ी में बिठाकर
उसे ले जाने की कोशिश कर रहा है किसी अँधेरी, शीतल जगह पर
बांसगाड़ी पालकी में तब्दील हो जाती है
उसके सिरे प्रेमी से छूटकर कहारों के हाथ में जा पहुँचते हैं.
पालकी चल रही है और भाग रहा है उसके पीछे-पीछे प्रेमी
पेड़ों की पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं धीमे-धीमे
अचानक वहां प्रकट हो जाते हैं पंखोंवाले कई श्रृगाल
वे अपने पंख फड़फड़ा-फड़फड़ाकर
पालकी और प्रेमी के चारों ओर नाच रहे हैं
और न जाने किस बात का जश्न मना रहे हैं
तपते सूरज को थाम लिया है दो श्रृगालों ने
पालकी एक विचित्र पशु में तब्दील हो गई है
और श्रृगालों के पंख नाव में
कुछ श्रृगाल नाव में बैठकर नदी पार कर रहे हैं
नाव खेते समय वे न जाने किस बात का जश्न मना रहे हैं
सूरज की एकाध रश्मियों को तोड़कर उन्होंने पतवार बना लिया है
पानी बिच्छुओं में बदल गया है
और श्रृगालों द्वारा तोड़ी गई रश्मियाँ एक दीपक की लौ में तब्दील हो गई हैं.

मेरी नज़रों के आगे फिर एक चेहरा है
शंक्वाकार-सा
जिसकी आँखें तो हैं लेकिन बंद
नाक भी बंद है और
होंठों की जगह पर सील किया हुआ-सा कुछ है
ध्यान से देखती हूँ तो पता चलता है कि
अरे…! यह तो सूरज का चेहरा है
बग़ैर रश्मियों के
बिना ताप के
बुझा-बुझा सा
श्रृगाल रश्मियों का एक-एक टुकड़ा लेकर फिर से जश्न मनाते नज़र आते हैं
उसी पेड़ के नीचे
जिसे तलाशा था उस प्रेमी-प्रेमिका ने
अब प्रेमी का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं
प्रेमिका ख़ुश है
बेहद ख़ुश
पेड़ फिर पत्तियों से लहलहा उठा है और
प्रेमिका श्रृगालों के साथ मदमस्त होकर नाच रही है
उसके चेहरे पर अजीब-सी ख़ुशी है
जिसे व्यक्त कर पाना मेरे बस की बात नहीं
शब्द चुक गए हैं मेरे.

संपर्क : manj.sriv@gmail.com

होली : एक मिथकीय अध्धयन

(कँवल भारती)
डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म” में एक जगह लिखा है, “आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और इसलिए हैं, क्योंकि वे उसके वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से भयभीत हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष की भूमि रहा है, बल्कि वर्ग-संग्राम की भी भूमि रहा है.” अब एक साक्षी ऋग्वेद (१०,२२-८) से लेते हैं, “हे इंद्र! हमारे चारों ओर यज्ञ-कर्म से शून्य, किसी (ईश्वरीय सत्ता) को न मानने वाले, वेद-स्तुति के प्रतिकूल कर्म करने वाले दस्यु हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनका नाश करो.”

प्रहलाद

स्पष्ट है कि यह वर्गसंघर्ष और वर्गसंग्राम भारत के लिए नया नहीं हैं. वैदिक काल में जो देवासुर संग्राम शुरू हुआ, वह आज तक, इस इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी, चल रहा है. देवों ने न केवल अपने विरोधी असुरों को मारा, बल्कि उसे उन्होंने अपने धर्म की जीत भी घोषित किया और व्यापक स्तर पर उसका जश्न मनाया. लगभग सभी हिंदू त्यौहारों की बुनियाद में यही देवासुरसंग्राम है, चाहे वह दुर्गापूजा हो, दशहरा हो, दिवाली हो, या होली हो. ये सारे त्यौहार असुरों की मौत पर देवों अर्थात ब्राह्मणों के जश्न हैं. ब्राह्मणों ने अपने विरुद्ध चलने वाली विचारधारा को पसंद नहीं किया. भारत के जनजातीय क्षेत्रों में ब्राह्मणों ने अपना ब्राह्मण राज्य कायम करने की हर संभव कोशिश की. इस योजना में वे सबसे पहले अपने धर्मगुरुओं को वहाँ भेजते थे, जो वहाँ अपने आश्रम बनाकर यज्ञयागादि की गतिविधियों आरंभ करते थे, उनका जो विरोध करते, उनको वे मरवा देते थे, कुछ जन जातीय लोगों को वे प्रलोभन देकर मिशन से भी जोड़ लेते थे. ऐसा वे आज भी करते हैं. आज भी दलित-पिछड़े समुदायों के बहुत से बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के फोल्ड में हैं. उन्हीं की मदद से उन्होंने अपनी योजना को आगे बढ़ाया और विरोधियों का राज्य समाप्त करके वहाँ अपना उपनिवेश कायम किया. बलि, हिरण्यकश्यप, शम्बर, दिवोदास, रावण से लेकर मौर्य राज्य की स्थापना तक उनका यही मिशन चला. किसी ने ठीक ही कहा है, इतिहास अपने को दुहराता है. ठीक उसी मिशनरी रास्ते से मुगलों और ब्रिटिश ने भी भारत को अपना उपनिवेश बनाया. हालाँकि उन उपनिवेशों में भी ब्राह्मण ही प्रभुत्त्वशाली थे.

आज जिस तरह हिन्दूराष्ट्रवादी वर्ग ने अपनी विद्यार्थी परिषद के द्वारा देशभर के शिक्षण संस्थानों में दलित-वाम शक्ति के खिलाफ वर्गयुद्ध छेड़ा हुआ है, ठीक वैसा ही वर्गयुद्ध हमें पुराणों में असुर राजाओं और उनकी संस्थाओं के खिलाफ मिलता है. मैं यहाँ हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा का विश्लेषण करूँगा. महाभारत के अनुसार, प्रह्लाद ने देवासुरसंग्राम में इंद्र को परस्त कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था. वह अपनी जनता में अपने धार्मिक सद्गुणों से इतना लोकप्रिय था कि इंद्र उससे अपना राज्य वापिस नहीं ले सकता था. अत: इंद्र ब्राह्मण का भेष बनाकर प्रहलाद के पास गया, और उससे अपना धर्म सिखाने की प्रार्थना की. इंद्र की प्रार्थना पर प्रह्लाद ने इंद्र को अपने सनातन धर्म की शिक्षा दी. अपने शिष्य से प्रसन्न होकर प्रह्लाद ने इंद्र से वरदान मांगने को कहा, और ब्राह्मण भेष बनाए हुए इंद्र ने कहा, ‘मेरी इच्छा तुम्हारे सद्गुण पाने की है,’ इंद्र प्रहलाद का गुण और धर्म अपने साथ लेकर चला गया. और प्रह्लाद के धर्म पर चलकर इंद्र ने उसकी सारी कीर्ति खत्म कर दी.

देव-विरोधी असुरों के साथ ब्राह्मण-छल की यह कोई पहली घटना नहीं है, हिंदू कथाओं में, जिसे वे इतिहास कहते हैं, ब्राह्मणों के छल की ऐसी अनेक कहानियां हैं. यही छल एकलव्य के साथ किया गया था, जिसका अंगूठा मांगकर गुरु द्रोणाचार्य ने उसको विद्या-रहित कर दिया था. ठीक उसी तरह प्रहलाद से उसका धर्म लेकर उसका सर्वस्व ले लिया गया था. प्रहलाद ने जिस सनातन धर्म की शिक्षा दी थी, वह वैदिक वर्णव्यवस्था वाला धर्म नहीं था, क्योंकि इंद्र उसे क्यों सीखता, जबकि वह उसी धर्म से आता था? दरअसल, इंद्र ने प्रहलाद से देव-विरोधी असुर धर्म को त्यागने का वरदान माँगा था. अपने धर्म को त्यागने के बाद प्रह्लाद अपने समुदाय की नजर में गिर गया था, और इंद्र ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त कर लिया था. ठीक यही तरीका हमें बलि की कहानी में मिलता है, जिसमे विष्णु ने बौने वामन का रूप धारण करके एक वरदान के जरिये उसका समस्त राज्य छीन लिया था. बलि राजा से जुड़े अनेक मिथकों से पता चलता है कि प्रह्लाद ने, जो रिश्ते में बलि का दादा था, बलि को सावधान किया था कि यह बौना वामन असल में विष्णु है. एक अन्य कथा में प्रह्लाद बहुत ही तीखे शब्दों में प्रतिवाद करता है कि विष्णु ने बौना बनकर उसके पोते बलि के साथ धोखा किया है और उसे लूटा है. (देवीभागवतपुराण). एक और मिथक, जो एकलव्य से जुड़ा है, बताता है कि किस तरह स्वयं इंद्र ने बलि के पिता विरोचन से भी वरदान के जरिये उसका सिर मांग लिया था. इंद्र ने कहा था, “मुझे अपना सिर दे दो.” और विरोचन ने तुरंत अपना सिर काटकर इंद्र को सौंप दिया था. (स्कन्दपुराण).

महाबलीपुरम

मिथक इतिहास नहीं हैं, यह सच है, पर उनमें भारत के मूल निवासी असुरों के साथ हुए वर्गयुद्धों और उस युद्ध में शहीद हुए असुर राजाओं की नृशंस हत्याओं का पूरा राजनीतिशास्त्र है. कोई भी व्यक्ति न अपने हाथ से अपना अंगूठा काटकर किसी को देगा, और न अपना सिर काटकर देगा. किसी का भी अपने हाथ से अपना सिर काटना, और फिर, उस कटे सिर को अपने ही हाथ में लेकर दूसरे को सौंपना—ये दोनों ही बातें अविश्वसनीय है. हकीकत में एकलव्य का जबरन अंगूठा काटा गया था, और विरोचन की हत्या की गयी थी. आज भी धर्म के लिए की गयीं हत्याओं को मिथकीय रंग दे दिया जाता है, पुराणों ने भी यही काम किया था. पर उसने एक कदम आगे बढ़कर देव-विरोधी असुरों को जनता का खलनायक बनाने का भी काम किया.

प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु की हत्या तो और भी बड़ी क्रूरता है. उसे उसी के महल में घुसकर नरसिंह ने मारा था. ऐसा प्रतीत होता है कि इस असुर राजा का पूरा वंश ही ब्राह्मणों के निशाने पर था, और उसका बीजनाश करके ही उन्होंने दम लिया था. इसकी जो मिथकीय कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में मिलती, उसके अनुसार, देवविरोधी हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा से यह वरदान मिला हुआ था कि वह न मनुष्य के द्वारा, न देवताओं के द्वारा, न पशु के द्वारा, न भीतर, न बाहर, न दिन में, न रात में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न शस्त्र से, न अस्त्र से मारा जायेगा. अपनी अमृत्यु से निश्चिंत होकर उसने पृथ्वी और स्वर्ग में उत्पात मचाना शुरू कर दिया. किन्तु, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था. सो, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने की धमकी दी, जो विष्णु को सर्वव्यापी ईश्वर मानने पर जोर देता था. तब हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे में लात मारकर पूछा, “क्या वह इसमें भी है?” अचानक उसी समय खम्बा फाड़कर शेर जैसा मनुष्य (नरसिंह) प्रगट हुआ. और उसने हिरण्यकशिपु को अपने घुटनों पर रखकर अपने लम्बे नाखूनों से फाड़कर मार डाला. उसके बाद विष्णु-भक्त प्रह्लाद असुरों का राजा बना और अपनी देवविरोधी प्रकृति को त्यागकर देवों के प्रति समर्पित हो गया.
यह बहुत ही सामान्य कहानी है, जो अनेक असुरों पर दुहराई गयी है. महाभारत में वर्णित इंद्र और असुर वृत्र (अथवा नमुची) की कहानी भी इसी तरह की है, जिसे गोधूलि (न दिन और रात) में समुद्र के किनारे (न भूमि और न समुद्र) मारा गया था. रावण और महिष की हत्याओं की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.

इस कहानी में प्रकृति को ही चुनौती दी गयी है. सभी वस्तुएं और जीवजन्तु मरणशील हैं, कोई भी अमर नहीं है. इस पौराणिक कहानी में इसी प्रकृति का खंडन किया गया है. यह माया हिन्दूधर्म में ही है कि देवता मनुष्यों को अमर होने का वरदान देते हैं, पर इसके बावजूद कोई अमर नहीं रहता है. दूसरी बात यह विचारणीय है कि जो प्रह्लाद राजा बलि को चेता रहा है, वह खुद विष्णु-भक्त कैसे हो सकता है? तीसरी बात यह कि अगर प्रह्लाद इतना परम विष्णु-भक्त था कि उसके लिए वह खम्बा फाड़ कर नरसिंह के रूप में प्रगट हुए, तो उसने अपने पिता को बचाने को क्यों नहीं कहा? उसने अपने पिता की हत्या कैसे बर्दाश्त कर ली? यह कहानी यह साबित करने की कोशिश है कि प्रह्लाद ने अपनी ब्राह्मण-भक्ति में अपने असुर-धर्म, अपनी असुर-संस्कृति और अपने पिता तक को कुर्बान कर दिया.

हकीकत यह है कि हिरण्यकशिपु ने बलि और विरोचन की तरह ब्राह्मणों के आगे घुटने नहीं टेके थे, और उसने अंत तक असुरों के हित में संघर्ष और युद्ध किया था. जब उसके पुत्र प्रहलाद को ब्राह्मणों ने राज्य का लालच देकर अपने ब्राह्मण राष्ट्रवाद में शामिल कर लिया था, तो भी हिरण्यकशिपु ने हथियार नहीं डाले थे. किन्तु यही विष्णु-भक्ति प्रह्लाद के भी पतन का कारण बनी थी. ब्राह्मण-भक्ति की जो भूमिका विभीषण ने निभाई थी, वही प्रह्लाद ने निभाई थी.

इस सम्बन्ध में महात्मा जोतिबा फुले का मत भी गौरतलब है. सम्भवतः फुले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दू मिथकों का बहुत ही वैज्ञानिक विश्लेषण किया है. वे नरसिंह के विषय में “गुलामगीरी” में लिखते हैं, ‘वराह के मरने के बाद द्विजों का मुखिया नरसिंह बना था. सबसे पहले उसके मन में हिरण्यकशिपु की हत्या करने का विचार आया. उसने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि उसको मारे वगैर उसका उसे मिलने वाला नहीं था. उसने अपने एक द्विज शिक्षक के माध्यम से हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के अबोध मन पर अपना धर्म-सिद्धांत थोपना शुरू किया. इसकी वजह से प्रह्लाद ने अपने हरहर नाम के कुलस्वामी की पूजा करनी बंद कर दी. प्रह्लाद पर द्विज रंग ऐसा चढ़ा कि हिरण्यकशिपु की उसे समझाने की सारी कोशिशें बेकार गयीं. तब नरसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की हत्या करने को उकसाया. पर ऐसा करने की प्रह्लाद की हिम्मत नहीं हुई. अंत में नरसिंह ने अपने शरीर को रंगवाकर मुंह में नकली शेर का मुखोटा लगाकर अपने शरीर को साड़ी से ढककर प्रह्लाद की मदद से हिरण्यकशिपु के महल में एक खम्बे की आड़ में छिपकर खड़ा हो गया. और जब हिरण्यकशिपु आराम के लिए पलंग पर लेटा, तो शेर बना नरसिंह उस पर टूट पड़ा, और बखनखा से उसका पेट फाड़कर उसकी हत्या कर दी.’ महात्मा फुले ने यह भी लिखा है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद नरसिंह सभी द्विजों को साथ लेकर अपने मुल्क भाग गया. जब क्षत्रियों को पता चला तों वे आर्यों को द्विज कहना छोड़कर ‘विप्रिय’ (अप्रिय, धोखेबाज़, दुष्ट) कहना शुरू कर दिया. बाद में इसी ‘विप्रिय’ शब्द से उनका नाम ‘विप्र’ पड़ा.

हिरण्यकशिपु के प्रकरण में अभी होलिका का प्रवेश होना बाकी है. यह शायद किंवदंती है, जिसमें कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका को अग्नि से बचने का वरदान प्राप्त था. उसको वरदान में एक ऐसी चादर मिली हुई थी, जो आग में नहीं जलती थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी इसी बहिन की सहायता से प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई. होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धू-धू करती आग में जा बैठी. किन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, और होलिका जलकर भस्म हो गयी. कहते हैं कि तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा.

क्या इस कहानी पर यकीन किया जा सकता है? वास्तव में इसकी अंतर्कथा यह है कि हिरण्यकशिपु की हत्या के बाद उसकी बहिन ने देवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और प्रह्लाद को भी उसने चेताया था कि ब्राह्मण राष्ट्रवाद समस्त असुर संस्कृति के विनाश का दर्शन है. वह देवों और ब्राह्मणों के रास्ते की अंतिम बाधा थी, जिसे हटाकर ही वे प्रह्लाद के मुखोटे से ब्राह्मण-राज्य कायम कर सकते थे. अत: एक दिन अवसर पाकर लाठी-डंडों से लैस ब्राह्मणों ने होलिका को जिन्दा जलाकर मार डाला. उसकी मौत पर ढोल-नगाड़े बजाए गए. आज उसी तर्ज पर हिंदू हर वर्ष होलिका के रूप में होली जलाकर ब्राह्मणवाद की विजय का जश्न मनाते हैं. आज लाठी-डंडों की जगह उनके हाथों में गन्ने होते हैं, पर ढोल-डीजे का शोर तो होता ही हैं.

कँवल भारती विचारक -दलित चिंतक हैं : kbharti53@gmail.com