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सी बी आई क्या न्याय दिलवा पायेगी डेल्टा को !

गुलज़ार  हुसैन 
नोट- 
(राजस्थान सरकार की ओर से दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने के फैसले को न्याय के मार्ग की पहली सीढ़ी माना जा सकता है। न्याय पाने के लिए पूरी ताकत लगा देने वाले डेल्टा के परिजनों और अन्य न्यायप्रिय लोगों के आक्रोश का ही यह परिणाम है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को यह निर्णय करना पड़ा है। डेल्टा मेघवाल की मौत जिन परिस्थितियों में हुई है, वह गंभीर सवाल उठाती है। इसके अलावा प्रशिक्षण संस्थान के सुस्त रवैये और पुलिस की कार्रवाई में शुरुआती लापरवाही भी एक बड़े षड्यंत्र की ओर संकेत करती है। )

वह अपने गांव त्रिमोही (राजस्थान) की पहली लड़की थी, जो सेकेंडरी स्कूल पहुंची थी, लेकिन दुर्व्यवस्था ने उसकी जान ले ली. हां, डेल्टा मेघवाल न केवल होनहार छात्रा थी, बल्कि बहुमुखी प्रतिभा की धनी भी थी.  वह एक बेहतरीन चित्रकार होने के साथ-साथ अच्छी गायिका, कवयित्री, नृत्यांगना और वक्ता भी थी, लेकिन उस 17 वर्षीय लड़की की आंखों में बसने वाले हर सपने उससे छीन कर रौंद डाले गए. उस दलित लड़की के साथ रेप हुआ और फिर हत्या हुई, लेकिन उसकी खबर न तो मीडिया की सुर्खियां बनीं और न ही उसे न्याय दिलाने को लेकर तेजी से सरकारी पहल होती देखी गई। 29 मार्च को डेल्टा मेघवाल की लाश जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, नोखा के टैंक में मिली थी, लेकिन उस समय प्रशिक्षण संस्थान के सुस्त रवैये और पुलिस की कार्रवाई में शुरुआती लापरवाही देखी गई. उसके साथ रेप क्यों और कैसे हुआ? उसे क्यों मार डाला गया? जैसे कई अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिससे उसके रिश्तेदार लगातार जूझ रहे हैं और रोज टूट रहे हैं. क्या डेल्टा का दोष केवल यह था कि उसने एक दलित परिवार में एक ऐसे समय में जन्म लिया, जब दलित लड़कियों से रेप और हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं? सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह मामला एक दलित छात्रा से जातीय घृणा करते हुए उसे ‘सॉफ्ट  टारगेट’ समझकर शिकार करने का नहीं है?



राजस्थान में बाड़मेर जिले के त्रिमोही गांव में जन्मी डेल्टा मेघवाल बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली थी. 2014 में उसने जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की प्रवेश परीक्षा पास कर नोखा के जैन आदर्श कन्या शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय में दाखिला लिया था. लेकिन इस महाविद्यालय ने उसके सपनों को पंख देने की बजाय उसकी जान ले ली.  डेल्टा की हत्या से जुड़े सवाल तो कई हैं, जो हमारे सामने मुंह चिढ़ाते खड़े हैं. आखिर उसे होस्टल की वार्डन ने पीटी इंस्ट्रक्टर के रूम में सफाई करने के लिए क्यों भेजा? वह छात्रा थी, सफाईकर्मी तो नहीं थी.  आरोप है कि वहीं उसके साथ रेप हुआ, क्योंकि उसने खुद अपने पिता को फोन कर हालात असहनीय होने की बात कही थी. कल होकर उसकी लाश एक टैंक में मिली थी। इसके बाद उसे अस्पताल तक ले जाने के लिए पुलिस ने एक ट्रैक्टर का इस्तेमाल क्यों किया? आरोप है कि जब लाश पर चोट के निशान थे, तब भी इसे शुरू में पुलिस ने आत्महत्या का मामला ही क्यों बनाए रखने का प्रयास किया. इन सब तथ्यों से एक सुनियोजित षड्यंत्र का संदेह होता है. एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान में दलित लड़की के साथ इतनी क्रूरता कैसे की गई?



डेल्टा के पिता ने पुलिस पर भी भेदभाव करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा है कि मेरी बेटी की लाश को पुलिस ने कचरे और मरे जानवर ढोने वाले ट्रैक्टर से अस्पताल पहुंचाया. यह सबसे अधिक चौंकाने वाला तथ्य है. इससे एक लड़की से रेप और हत्या किए जाने की घटना के बाद पुलिस की लापरवाही और भेदभाव का पता चलता है. इससे यह भी संदेह होता है कि उसके साथ जो भी हुआ, उसके लिए पहले से कोई खतरनाक प्लानिंग तो नहीं की गई थी? शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय की लापरवाही को और कई तथ्यों की रोशनी में देखा जा सकता है. लड़कियों के होस्टल में किसी पुरुष इंस्ट्रक्टर की पहुंच या उस परिसर में क्वार्टर देना क्या दर्शाता है? इसके अलावा आरोप है कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद उस महाविद्यालय में कोई हलचल नहीं हुई. न तो बंद रखा गया और न ही किसी शोक सभा का आयोजन किया गया. ऐसा माहौल बनाए रखा गया, जैसे इस संस्थान में किसी पंछी को चोट भी नहीं लगी हो? इसके अलावा आरोप यह भी है कि डेल्टा से कई बार साफ-सफाई और बर्तन मांजने और कपड़े  धुलवाने जैसे काम कराए जाते थे.



 आरोप यह भी है कि डेल्टा को किसी अन्य छात्राओं से मिलने देने पर पाबंदी लगाई गई थी. इन जैसे कई आरोपों और तथ्यों से यह साबित होता है कि डेल्टा की हत्या करने वालों ने जातीय वर्चस्व और साजिश को अपना हथियार बनाया है. डेल्टा के पिता महेंद्र राम मेघवाल अपनी बेटी की नृशंस हत्या पर पूरी तरह टूट कर बिखर गए थे. कभी अपनी बेटी को आईपीएस बनाने का ख्वाब देखने वाले महेंद्र ने दुखी होकर यहां तक कह दिया कि कोई अपनी बेटी को नहीं पढ़ाए. यह उनकी निराशा थी, जो बेटी के साथ हुए जुल्म और उसे न्याय दिलाने के बदले मुंह मोड़े व्यवस्था से उपजी थी. वे ही नहीं बल्कि देश में  दलित विरोधी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने और सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले हर लोग निराश थे. आरोप है कि कुछ टीवी न्यूज चैनलों और ताकतवर राजनीतिक लोगों ने तो डेल्टा के चरित्र को लेकर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. यह सब असहनीय था.  एक कम उम्र की छात्रा पर इस तरह के झूठे लांछन का विरोध भी हुआ. एक छात्रा जो अपने पिता को फोन कर कहती है कि मुझे यहां से ले जाओ, मुझे यहां डर लग रहा है कि प्रशासन कोई अनहोनी न कर दे

.



इसके बाद अब क्या कुछ कहना शेष रह जाता है कि उसके साथ शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालय में किस तरह का अत्याचार हो रहा था. इतनी घोर निराशा के बावजूद डेल्टा के पिता महेंद्र राम मेघवाल ने हार नहीं मानी.  वे बेटी को न्याय दिलाने के बहाने स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली हर लड़की की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं. हर तरफ से निराशा में घिरे उसके पिता के हौसले, स्थानीय और देशभर के न्यायप्रिय लोगों के जुझारूपन और सोशल मीडिया में साहसिक ढंग से आवाज उठाने वाले लोगों ने इस मुद्दे को ऊपर तक
पहुंचाया, जिसका परिणाम सकारात्मक हुआ.  पुलिस ने आरोपी टीचर और वॉर्डन को रिमांड पर लेकर पूछताछ शुरू की. इधर डेल्टा के परिजनों की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मुलाकात के बाद डेल्टा मेघवाल से रेप और उसकी हत्या के मामले की जांच राजस्थान सरकार ने सीबीआई को सौंपने का फैसला किया है. इस फैसले को न्याय पाने के मार्ग में पहली सीढ़ी माना जा सकता है.

गुलज़ार हुसैन जितने संवेदनशील और बेहतरीन  कवि हैं उतने ही अच्छे रेखा -चित्रकार. मुम्बई में पत्रकारिता करते हैं . संपर्क: मोबाईल न. 9321031379

समानित हुई ‘ महिषासुर की बेटी’ ( राष्ट्रपति ने दिया ‘नारी शक्ति सम्मान’)

संजीव चंदन

महिला दिवस, 8 मार्च 2016 को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने बिहार के नवादा जिले की डा. सौरभ सुमन को जब ‘ नारी शक्ति’ सम्मान से सम्मानित किया तो शायद उन्हें भी नहीं पता हो कि डा. सौरभ सुमन को सम्मानित करना उन 14 दूसरी महिलाओं के सम्मानित करने से अलग क्यों है ! तब राष्ट्रपतिभवन में एक कार्यक्रम में सामाजिक कार्यों से जुडी देश भर की 15 महिलायें सम्मानित की गईं. इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने के अलावा देश की कई नामी-गिरामी हस्तियां उपस्थित थी।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे, जब देश की मानवसंसाधन विकास मंत्री ने क्रमशः 25 और 26 फरवरी को संसद के दोनो सदनों में महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने पर ‘शोक’ प्रकट किया था. इसके दो सप्ताह के भीतर ही डा. सौरभ सुमन को राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जा रहा था, जो खुद को ‘महिषासुर की बेटी’ मानती हैं और 2010 से ही अपने शहर में ‘ महिषासुर शहादत दिवस’ मना रही हैं. हालांकि यह सम्मान उन्हें ‘कृषि –शोध’ के लिए दिया गया, लेकिन सत्ता के शीर्ष प्रतीक राष्ट्रपति भवन पहुँची डा. सौरभ इस बात का प्रतीक थीं कि यह देश जल्द ही ‘ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक कुंठा’ से बाहर निकल जायेगा- यह राष्ट्रराज्य एक ऐसी शख्स को सम्मानित कर रहा था, जो सत्ता की एक ताकतवर मंत्री और सत्ता में बैठे बड़े समूह की नजरों में तथाकथित ‘सांस्कृतिक-वैमनस्यता’ (!) का कार्य पिछले 6 सालों से करती रही हैं. जब 8 मार्च को उन्हें सम्मानित किये जाने की पूर्व सूचना उनके जिले में पहुँची तो जिले के पत्रकारों ने उनसे महिषासुर की शहादत दिवस आयोजित करने संबंधी सवाल भी पूछे. ‘सवाल तीखे थे,

 मुझे दिल्ली पहुँचना था इसलिए उस दिन तो कुछ ख़ास मैं उन्हें कह नहीं सकी लेकिन आज मैं बताना चाहती हूँ कि क्यों मनाते हैं हम  महिषासुर शहादत दिवस,’ खुद को महिषासुर की बेटी बताते हुए सौरभ कहती हैं .
क्यों मनाती हैं महिषासुर शाहदत दिवस
“पहली बार मेरे मन में एक सवाल वर्ष 2010 में आया  कि एक ही पर्व का तीन नाम क्यों-दुर्गापूजा, विजयादशमी और दशहरा-?  ‘अपना शासन कायम करने के लिए आर्यों ने शुभ्म , निशुम्भ, मधु कैटय, धु्म्रलोचन आदि राजाओं को छल से मारा.  उसी क्रम में राजा महिषासुर , जो बंग देश के राजा थे, उन्हें विष्णु‘ मारने के असफल रहा तो दुर्गा,  जिसका नाम अमृतापुष्पम था,  उसे सजा-धजा कर और युद्ध कला में प्रशिक्षित कर राजा महिषासुर को मारने के लिए भेजा. अमृतापुष्पमने अपने जाल में फंसाकर राजा महिषासुर की हत्या कर दी। इसी तरह मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि पर आर्यो ने कब्जा किया. अमृतापुष्पमका नाम दुर्गा प्रचलित किया गया और उसकी पूजा की जाने लगी.  मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की ह्त्या करके दस मौर्य राजाओं के सुशासन का अंत कर दिया और ब्राह्मणों की सत्ता स्थापित की दस मौर्यों के शासन को समाप्त करने के प्रतीक के तौर पर दशहरा मनाया जाने लगा.”

आश्विन महीने में विजयी पखवारा के तौर पर महान शासक अशोक विजयोत्सव मनाते थे. विजयोत्सव पखवारे का समापन आश्विन महीना के दशमी के दिन सेनापति, सभी सेनाओं एवं प्रजा के बीच राजा तलवार की सलामी देकर करते थे। इसलिए इसे विजयादशमी कहा जाता था। लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने इस दिवस के महत्व का अपने अनुसार इस्तेमाल कर लिया और पुष्यमित्रशुंग के द्वारा सम्राट वृहद्रथ की ह्त्या का जश्न इसी नाम से मनाया जाने लगा.”  सौरभ कहती हैं “ इन लड़ाइयों को मैने करीब से समझा और समाजिक समझ पैदा करने के दृष्टिकोण से मैंने महिषासुर शहादत दिवस मनाने का संकल्प पहली बार 2010 में लिया और अपने घर में ही अपने ही परिवार को बुलाकर इसके लिए मानसिक तौर पर तैयार किया। काफी विरोध हुआ और मुझे सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी. बाबजूद मैं निराश नहीं हुई। मैं आगे बढ़ती गई। वर्ष 2013 में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका पढ़ने का मौका मिला. उससे पता चला कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘महिषासुर शहादत दिवस’  खुले तौर पर मनाया गया तो मैंने भी इसे खुले तौर और  वृहत रूप से मनाने का संकल्प लिया.
निरंतर मनाने का संकल्प व 2014 में मुझे सामाजिक तौर पर भी काफी सहयोग मिला.  मैंने वृहत पैमाने पर ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन किया .

बिहार सेवा संस्थान, नवादा में आयोजित इस कार्यक्रम में पूर्व मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, विधायक कृष्णे नन्दन यादव, उप विकास आयुक्त, नवादा, चन्द्रिका यादव, जिला परिषद् सदस्य, अनिता देवी, जिला परिषद सदस्य, उमेश  सिंह, संस्थापक बुद्ध विहार, नवादा, गायत्री कुमारी, चन्दन चैधरी, दिलीप साव आदि सैकडों लोगों ने भाग लिया.  2015 में बिहार में आदर्श अचार संहिता लागू होने की वजह से वृहत कार्यक्रम की अनुमति नही मिली. बाबजूद इसके सैकड़ो महिषासुर अनुयायियों के साथ महिषासुर की प्रतिमा पर श्रृद्धाजंली पुष्पव अर्पित करते हुए बिहार सेवा संस्थान के प्रागण में ‘‘शहादत दिवस’’ मनाया गया.  साथ ही एक समिति बनायी गई – महिषासुर शहादत दिवस आयोजन समिति.
इसके सदस्यों का नाम हैं  –
1. उमेश सिंह बौद्ध (संरक्षक)
2. डा0 सौरभ सुमन (संरक्षिका)
3. सुरेश पासवान (अध्यक्ष),
4. कमल नयन (महासचिव)
5. सावित्री बौध (कोषाध्यक्ष)
6. चंदन कुमार चैधरी (सदस्य)
7. दिलीप साव (सदस्य)
8. गायत्री कुमारी (सदस्य)

बहुजन समाज की बेटी का संघर्ष 
अलीगढ़ विश्वविद्यालय से ‘ कृषि विज्ञान’ में डाक्टरेट डा. सौरभ की जीवन –यात्रा कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा है . जब छोटी थीं, तो पिता कामेश्वर सिंह एक सामंत की ह्त्या के आरोप में 1980 में  जेल चले गये. नवादा जिले के चांदो सिंह हत्याकांड नाम से जानी जाने वाली इस घटना में डा. सौरभ के अनुसार यूं तो सामंत से  त्रस्त जनता ने ‘यह कार्रवाई’ की थी , लेकिन न्यायालय ने उनके पिता को फांसी की सजा दे दी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा समाप्त कर दी. पिता की अनुपस्थिति में उनके परिवार का  देखभाल उनके यहाँ काम करने वाले मुसहर जाति के श्रमिक ने की. ‘ यूं तो मैं ओ बी सी परिवार में पैदा हुई . लेकिन मैं खुद को अपने पालक दलित पिता की बेटी मानती हूँ , जिन्होंने मजदूरी करके मुझे , मेरी बहन और मेरी मां का ख्याल रखा. पढ़ाया –लिखाया .’ नवादा से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद घर के आर्थिक हालात के कारण सिलाई सिखकर सिलाई का काम करने लगीं. मैट्रिक की पढाई उन्होंने ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ नवादा से की थी . |1992 में ‘बिहार सेवा संस्थान’ से जुडीं और आगे की पढाई के लिए प्रेरित हुईं . फिर तो गया से कॉलेज की पढाई की और अलीगढ़ से ‘रूरल एग्रीकल्चर एंड मार्केटिंग’ विषय पर डाक्टरेट किया.



पढाई के बाद डा. सौरभ अपने जिले में आकर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगीं. लोगों के बीच कृषि –संबंधी जानकारियां देने के अलावा वर्चस्वशाली संस्कृति के खिलाफ सामाजिक रूप से सक्रिय हो गई . बताती हैं , ‘मैंने बुद्ध को पढ़ा, डा. आम्बेडकर को पढ़ा और बहुजनों के खिलाफ मायाजाल को समझ सकी.’ वे बताती हैं कि ‘नवादा सहित मगध के कई जिलों में बौद्ध मठों , मंदिरों पर कब्जा किया जा रहा है . बौद्ध मूर्तियों को तेल, सिन्दूर लगाकर हिन्दू नाम दिया जा रहा है. यह प्रत्यक्ष सांस्कृतिक गुंडागर्दी है , जिसके खिलाफ भी हम जनजागृति कर रहे हैं.’ जारी रहेगा महिलओं के लिए संघर्ष.  इतने विद्रोही तेवर की महिला को सरकार ने कैसे सम्मानित किया के सवाल पर वे कहती हैं कि दरअसल कृषि विज्ञान केंद्र नवादा ने अपने यहाँ से सक्सेस स्टोरी के तौर पर उनका नाम आगे बढाया. वे कहती हैं, ‘ सरकार क्या सिर्फ ब्राह्मणवादियों की है? कोई मंत्री ब्राह्मणवादी हो सकता है , हो सकती है , लेकिन संविधान ब्राह्मणवादी  या किसी भी समूह या व्यक्ति के वर्चस्व के खिलाफ है.’ डा. सौरभ ने सम्मान के लिए मिले एक लाख रूपये को जिले की महिलाओं के विकास के लिए स्थानीय प्रशासन को दे दिया . डा. सौरभ सुमन कहती हैं, ‘ यह सम्मान मुझे  नहीं बल्कि उन तमाम दबे -कुचले महिलाओं को मिला है,  जो आज हमारे प्रयास से समाज के मुख्यधारा से जुड़ कर आम लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन कर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास हो गया है कि काम करने से सम्मान जरूर मिलता है।‘

दूसरा पड़ाव

हनीफ मदार


हनीफ मदार कहानियां लिखते हैं . सामाजिक -सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय, ऑनलाइन मैगजीन हमरंग के संपादक. संपर्क: 08439244335

जब भी उसकी आंखों को देखता तो उनमें डूब जाने को बेकल होने लगता.  और सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा नहीं होता बल्कि उन आंखों को जो भी देखता होगा निश्चित ही उसका यही हाल होता होगा, यह बात मैं इतने आत्म-विश्वास से इसलिए कह सकता हूँ कि मुझे उसकी आंखें महज आंखें नहीं कोई झील लगती थीं.  जिसकी अतल गहराईयों में उतर कर कोई भी इन्सान थाह लेने को बेकल हो ही जायेगा. उसकी आंखें उस खारे पानी से लवालव रहती थीं जिस खारेपन को दुनिया भर के दीवाने अपने होठों से सोखने की कल्पनायें दिन-रात करते रहे हैं या यूँ कहूँ कि उसकी आंखों का पानी सूखा नहीं था. उसकी आखों में मुझे न जाने क्यूँ एक प्रणय निवेदन सा दिखाई देता था. ऐसा मेरे सामने ही होता था या किसी के लिए भी यही दिखता हो इसे मैं पूरे विश्वास के साथ कह नहीं सकता हूँ. लड़कियों की आंखें बचपन से ही मेरी कमजोरी रही हैं. उस वक्त मेरी उम्र शायद दस या बारह वर्ष रही होगी तब भी पड़ोस की एक मैली, कुचैली, लड़की की आंखों में मुझे प्रणय निवेदन दिखता था. यह आदत मुझमें तब से आज तक बनी हुई है.  किन्तु मुझे एक संतोष भी है कि मैं केवल आखों में ही झांकता हूँ वरना…. मैं ऐसा इसलिए भी करता हूँ कि इन्सान का दिमाग प्रोग्राम बनाने का काम करता है तो उसकी आखें सम्पूर्ण स्क्रीन का.  सच कहूँ तो इन्सानी शरीर में आंखें ही ऐसा ऊतक है . जो कभी सच का दामन नहीं छोड़तीं। शब्दों से या क्रिया-कलापों से इन्सान अपनी अंतरंग स्थितियों को छुपाने का लाख प्रयत्न करे किन्तु ये आखें उस सच को दिखाने की ईमानदारी से दूर नहीं होती।

सच इतना ताकतवर भी होता है कि आदमी आखों से डर भी जाता है क्योंकि भीतर का सच केवल आंखों में ही होता है. इसलिए मैं आंखों में झाकना नहीं छोड़ पाया. हाँ तो मैं कह रहा था उसकी आखों में प्रणय निवेदन दिखने की बात किन्तु समझ नहीं पाता था कि क्या यह वाकई मेरे प्रति ऐसा कुछ है…? या उसकी कोई मर्मान्तक पीड़ा जो आखों के रास्ते निकलना चाहती है. मैं सोचता एक हफ्ते पहले ही तो उसने हमारी कम्पनी को ज्वाइन किया है और वह मेरे सामने वाली टेबिल पर बैठती भर है और इस हफ्ते भर में मेरी उससे सुबह-शाम हलो-हाय के अलावा कोई बातचीत भी नहीं हुई है फिर एक दम से मेरे प्रति ऐसा होना नितान्त असंभव है.
कितनी बार मन हुआ कि उससे बात की जाय……लेकिन साली यह नौकरी इसे पाने की स्थितियों को सोचकर ही कलेजा मुंह को आता है……। हाँ…  कल तो हाफ डे है कल तो जरूर इससे बातचीत हो पायेगी. मैं यह सब सोच ही रहा था कि एक घुँघुँरूओं सा बजता मधुर स्वर मेरे कानों से टकराया ‘‘राकेश सर आज रात तक काम करने का इरादा है क्या ? जाना नहीं है……?’’ यह आवाज उसी की थी मिस शालिनी की जो मेरे सामने वाली टेबिल से उठकर अपना पर्स कंधे पर लटकाती बोल रही थी. मैने तुरन्त खुद को सहज करने की सफल-असफल सी कोशिश की ‘‘हाँ….न……निकलुँगा.’’ जाने मुझे क्या हो गया था. वह हल्की सी ऐसे मुस्कराई जैसे उसने मेरी सम्पूर्ण मनः स्थिति को मेरी आंखों में देख लिया हो. वह मुड़कर चली गयी. मुझे एक और अजीब सी उलझन में फंसा कर.  मैं उसे एक टक जाता देखता रहा.

जब कि वह तो आंखों से कभी की ओझल हो गयी थी. अब मेरी आंखों के सामने मेरा ही मन मस्तिष्क उसकी अपनी-अपनी तस्वीर बना बिगाड़ रहे थे जैसे उनमें एक प्रतिस्पर्धा हो रही थी . मुझे  उन तस्वीरों में से किसी एक को चुनना था. मैं अजीब संकट की स्थिति में खुद को कोस रहा था कि ले बेटा किसी की आंखों में  झाकने की सजा यह है. मगर भला हो आॅफिस की उस घड़ी का जो छः बजते ही टन-टन करने लगी और मैं उस दिल और दिमाग के झगड़े से मुक्त होकर घर तो पहुँच गया. लेकिन घर पहुँच कर भी मैं भारी तनाव महसूस कर रहा था.  एक अजीब विचलन की स्थिति में  था जिसे नौकरी लगने के बाद पिछले पांच सालों में पहली बार देख रहा था। जबकि आॅफिस से निकलते ही मैं खुद को बहुत हल्का पाता था. घर आते ही सुन्दर पत्नी  का चेहरा देखते ही आफिस की सारी थकान कपड़ों के साथ उतार कर हैंगर पर लटका देता था. लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हो पाया था. जबकि पत्नी और दिनों से ज्यादा खुश दिख रही थी. मुझे प्राण वायु देने वाली उसकी मुस्कान मुझे छू भी नहीं पा रही थी. मैं जैसे शालिनी के मुँह से निकली मधुर आवाज के शब्द वाण से मूर्छित सा हो रहा था. अब मैं, शायद मैं नहीं रह गया था एक जंग का मैदान बन गया था जहां मेरा मन और मस्तिष्क बार-बार आपस में गुथ रहे थे. ‘वह दो वर्षों में ही यहां तीसरी जगह नौकरी क्यों कर रही है….? और नौकरी भी अलग-अलग शहरों में…? अगर सब ठीक ठाक है तो उसकी आंखें….?

अगर कोई समस्या है तो उसका इतना खुश रहना……?‘ मेरे मन में उठते ऐसे ही अनेक सवालों ने मेरा दिमाग भारी कर रखा था. आॅफिस में  और भी लड़कियां काम करती हैं, या इस टेबिल पर इससे पहले भी दो लड़कियां काम करती रहीं, वे तो इससे सुन्दर भी थीं, बातचीत भी खूब होती थी. उनके लिए तो मैंने कभी कुछ नहीं सोचा फिर इसके लिए ही मैं क्यों सोच-सोच कर परेशान हो रहा हूँ. यह सोचकर मैने उन तमाम सवालों को जब भी झटकना चाहा उसके सांवले चेहरे पर चमकती वही काली आंखें खुद में डूब जाने का निमंत्रण देती सामने आ खड़ी होती. लगता जैसे वे काजल के काले घेरे को तोड़कर कभी भी बाहर निकल आंयेगी और मुझे खुद में समा लेगी, और मैं फिर उलझ जाता. पत्नी को सिर दर्द का बहाना बनाकर मैं न जाने कब सो पाया. दूसरे दिन आॅफिस में दस बजे तक उसकी कुर्सी खाली थी. वह आॅफिस क्यों नहीं आयी यह बात किसी से पूछते हुए  मुझे डर लग रहा था कि कोई यह न कह दे कि उसकी छुट्टी हो गयी है. बड़े सर अभी नहीं आये हैं, सोचकर में उनके आफिस में घुस गया और बायोडाटा वाली फाइल से उसका पता लेकर मैं बाहर आ गया. अगर बड़े सर आकर मुझे ऐसा करते देख लेते तो मेरे पाँच साल के रिकार्ड की मिट्टी-पलीद तो होती ही नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता था.  यह जानते हुए भी यह सब मैं न जाने क्यों कर रहा था. ‘बी. 175, चन्दनबन फेस-2’ एक नजर में  ही बिना लिखे मेरे दिमाग में कम्प्यूटर की मैमोरी की तरह फीड हो गया था.

उस दिन भी शालिनी छुटटी पर थी. मैंने भी छुट्टी ले रखी थी घर के किसी काम से और असल बात कहूँ तो मैंने उस दिन खास उससे मिलने को ही छुट्टी ली थी . लगभग चार बजे का समय था मैं सोच रहा था कि वह घर में अकेली होगी.  जब उसने दरवाजा खोला तो वह चूड़ीदार पायजामी और कुर्ता पर कमर में कसकर बांधे हुए दुपट्टे के साथ दिखी चेहरे पर पसीने की बूँदे चमक रही थीं उसकी तेज चलती सांसों से लगता था जैसे कहीं से दौड़कर आ रही है.  तब उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी. किन्तु वह मुझे देखकर कुछ ऐसे सकपकाई जैसे कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ हो. और था भी, क्योंकि मेरे इस तरह उसके घर पहुँचने की शायद उसे उम्मीद नहीं थी. होती भी कैसे पिछले तीन महीनों में मेरी उससे बात-चीत भी कितनी हो पाई थी.  मैं खुद ही उसकी आंखों में बस डूबता उतराता रहा हूँ.  उसे तो मैंने इस बात की भनक भी नहीं होने दी थी. हां यदा-कदा आॅफिस में साथ चाय जरूर पी ली थी. लेकिन तब भी वे बाते कहां कर पाया था जो मैं चाह रहा था.  अब आॅफिस में, मैं कोई अकेला तो था नहीं कि मैं, और वह बस एक दूसरे के आगे पीछे ही घूमते रहे. इतने पर भी तो आॅफिस के कई लोग चुटकियां लेने लगे थे.  मुझे इन बातों से बड़ी नफरत है इसलिए भी मैं आफिस में उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया था. मैंने सोच लिया था कि अब छुट्टी लेकर ही बात बनेगी.
‘‘सर आप…..?’’


‘‘हाँ……..आज छुट्टी पर था……और इधर एक काम से आया था…..अचानक याद आया कि आज आप भी छुट्टी पर हैं सोचा आपसे मिलता चलूँ…… वैसे भी आपके बिना आॅफिस में मन नहीं लगता’’ मेरी इस बात पर उसके चेहरे पर एक सहज मुस्कराहट उभरी थी हाँ लेकिन…..उसके चेहरे पर उगी पसीने की बूँदें गहरा गई थीं.
उसी दिन उसने बताया था कि ‘‘मैं रिहर्सल करा रही थी आज छुट्टी है तो थोड़ा जल्दी करा रही हूँ नहीं तो आॅफिस से आने के बाद शाम को करा पाती हूँ.’’
‘‘रिहर्सल…….किसकी……?’’
‘‘नाटक की..”
सुनकर मैंने उसे ऐसे ताका जैसे उसने ठहरे हुए पानी में पत्थर मार दिया हो. नाटक और इस शहर में…….मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. होता भी कैसे पिछले पांच सालों से इस शहर में मैं रह रहा हूँ लेकिन कोई नाटक तो क्या इस तरह की कोई चर्चा भी नहीं सुनी थी मैंने.  हाँ इससे पहले स्टूडैण्ट लाइफ में दिल्ली में जरूर सैकड़ों नाटक देखे और सच कहूँ तो वहीं से मुझे पढ़ने की आदत लगी और कभी-कभी अखवारों में चिटठी लिखने का शौक भी. लेकिन नौकरी के बाद इस शहर में और फिर शादी के बाद तो जैसे सब बीते जमाने की बातें हो गई. फिर वह शाम को आफिस के बाद देर रात कैसे यह सब कर पाती होगी ? मुझे उसकी बात कुछ अटपटी लगी तो मैने उसे और कुरेदना चाहा.
‘‘…..और तुम्हारे पति……..?’’

इस सवाल पर वह न जाने क्यों एक दम से चुप हो गई और अगले ही पल ‘‘मैं आपके लिए चाय लेकर आती हूँ’’ कह कर उठ गई. मुझे उसकी यह चुप्पी सामान्य नहीं लगी थी.शायद उसे यह बात बुरी लगी जैसे कोई किताब झटके से बन्द हुई हो.  मेरे साथ चाय पीते हुए शालिनी ने अपनी चाय बड़ी जल्दी में  खत्म की जबकि मैं चाय के साथ ही उसके बारे में बहुत कुछ जान लेने की मंशा में  था। मुझे लगा आज वह बात करने के मूंड़ में नहीं है. मैं अपनी शंका जाहिर करने को कुछ पूछता कि मेरा चाय का कप खाली होते ही उसी ने कहा ‘‘सर…..क्षमा करना, आज मैं आपको ज्यादा समय नहीं दे पा रही हूँ.. …हालांकि मैं भी आपके साथ बैठना चाह रही थी. कुछ बातें करनी थीं.’’ उसने यह बात जितनी सहजता से कही थी मैं उतना ही असहज हो गया था. मन में  आया कि कह दूँ कि अरे छोड़े अपने काम को बैठे तो हैं बातें कर ही लेते हैं लेकिन शिष्टाचार का ख्याल आते ही ‘‘हां….हां कोई बात नहीं मैं भी आज तनिक जल्दी में  ही था. “ मेरे झूठ बोलते समय भी मेरी आंखें मेरे मन की सच्चाई के साथ उसकी आंखें में  झांक रहीं थीं. शालिनी उन्हें पढ़ पाई थी या नहीं यह तो नहीं मालूम लेकिन कल शाम को बैठते हैं….आॅफिस के बाद….यहीं घर पर…..वह बोलती जा रहीं थी. मेरी नसों में  बहता खून और तेज दौड़ने लगा था या शायद जमता जा रहा था पता नहीं किन्तु मेरीे आवाज नहीं निकल पा रही थी बस हां में सिर हिला पा रहा था


 ‘‘सर यदि आप बुरा न मानें तो कल शाम को  मैं आपकी बाइक पर आपके साथ ही आ जाती हूँ. आपको आना तो है ही मुझे यहां तक लिफ्ट मिल जायेगी’’ यह बात कहते हुए वह इतनी अनौपचारिक लगी थी जैसे हम एक-दूसरे को वर्षो से जानते हैं. या कहूँ केवल जानते ही नहीं बल्कि करीब से जुड़े हैं। उसकी इन बातों और उसकी आंखों के निवेदन ने मेरे रक्तचाप को इतना बढ़ा दिया गोया कुछ और पल वहां रूकता तो शायद मेरे दिमाग की नसें फट पड़ती.  रात में कई बार पत्नी ने मुझे छुआ तो कहा ‘‘आपको तो बुखार है…..’’
सुबह आफिस जाते समय मैंने हैलमैट लिया तो पत्नी ने अचम्भा किया ‘‘आज हैलमैट की जरूरत क्यों आ पड़ी…….आप तो कभी पहनते ही नहीं हैं.’’ ‘‘हां आजकल चैकिंग चल रही है…..इसलिए साथ ले जा रहा हूँ.’’ असल में यह कहकर मैंने पत्नी को बस समझाया भर था. वैसे यहाँ इस शहर में  हैलमैट को पूछता कौन है. हाँ कुछ लोग जो हैलमैट पहनकर चलते हैं उसमें भी दो तरह के लोग है , पहले जो अपने जीवन के प्रति जागरूक हैं  दूसरे वे जो हैलमैट में अपना सिर छुपाकर आश्वस्त हो जाते हैं कि उन्हें कोई देख या पहचान नहीं सकता और फिर मस्ती से किसी के साथ किसी भी गली में आते जाते हैं.  सच पूछो तो मैंने भी हैलमैट इसीलिए साथ लिया था कि शाम को शालिनी के साथ बाइक पर जाते हुए कोई पहचान न सके.

आॅफिस में शाम तक किसी काम में मन नहीं लगा. आठ घंटे का आॅफिस टाइम जैसे आठ वर्ष का हो गया हो.  मैं अपनी मनोदशा को जाहिर न होने देने की इच्छा के चलते न जाने कितनी बार बाहर गया सिगरेट पीने, आॅफिस में हमें सिगरेट पीने की अनुमति नहीं है ऐसा रूल है हाॅ बड़े सर अपने केबिन में बैठकर चाहें तो डिब्बियां खाली करें तब वह रूल केवल रबड़ की तरह मुड़कर रह जाता है टूटता नहीं है. बाहर बैठे बाबा चाय वाले को न जाने क्या मजा है कि कौन क्या सोच रहा है क्या कर रहा है उसे सबमें उगली करनी. मैं हर बार सिगरेट के साथ चाय पीता इसलिए कि मैं उसकी आदत से वाकिफ था तो कही यह न सोचे कि आखिर मैं बार-बार क्यों बाहर आ जाता हूँ. लेकिन उसने मुझे टोक ही दिया राकेश सर आज आप कुछ परेशान से हैं क्या……..? यह आपकी आज आठवीं चाय है. मैं अन्दर से कुछ सकपका सा गया. किन्तु बाहर से मैंने बनाबटी गुस्सा दिखाया जैसे मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो ‘क्यों आठ हों या दस तुझे पैसे से मतलब या कुछ और.. ? मेरी झिडकी से वह  सहम गया और मोके का फायदा उठाकर अन्दर चला आया.  ठीक पांच बजे मैं शालिनी को अपनी बाइक पर बिठाकर उसके घर को निकला. न जाने क्यों बाइक चलाते हुए मुझे लगने लगा कि हम आॅफिस से नहीं बल्कि काॅलेज से आ रहे हो.

मोटर साइकिल भी अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ तेज चल रही थी. चलते-चलते ब्रेक लगाने पर शालिनी मुझसे टकराती तो लगता शालिनी मेरे साथ शरारत कर रही हो. हैलमैट लगे होने के कारण हम दोनों कोई बात नहीं कर पा रहे थे. शालिनी भी एक दम शान्त बैठी थी. उसने अपना दाहिना हाथ मेरे कन्धे पर रख लिया था.  ब्रेक लगाने पर उसके हाथ का दबाब मेरे कंधे पर बढ़ जाता जो मुझे एक अजीब से सुख से तर कर जाता। इसलिए मैं जानबूझ कर बाइक को ऐसे भीड़ भरे इलाके से निकाल रहा था जहां बार-बार ब्रेक लगाने पढ़ रहे थे. मैंने एक काॅफी हाउस पर बाइक रोकी भी ‘क्या हुआ सर……?’  ‘‘मैं सोच रहा था…….एक काॅफी हो जाय……..?’’ मेरी बैचेनी बढ़ रही थी मैं किसी फिल्मी हीरो की तरह काॅफी टेबिल के इर्द-गिर्द बैठकर कुछ आत्मीय बाते कर उसे परख लेना चाह रहा था कि जैसे मैं उसके लिए सोच रहा हूँ वह भी मेरे लिए सोचती है. या मेरा भ्रम ही है . ‘‘नहीं …..घर पर ही करेंगें जो भी करना है . यहां बैठ गये तो देर हो जायेगी.” भले ही उसने काॅफी पीने से इनकार किया था . लेकिन मुझे जैसे आश्वस्त कर दिया था कि मैं जो सोच रहा हूँ वह उससे दो कदम आगे है.  दुकानों में जल उठी लाइटों की रोशनी दुकानों से बाहर सड़क तक पसरने लगी जो बारी-बारी मेरे मन में उठते विचारों की तरह आ जा रही थी.  यह आधुनिक स्त्रियां हैं…….इनसे प्रेम की उम्मीद करना तो बेमानी है.

इनके लिए नित नये पुरूष बदलना एक खेल जैसा होता है, इस्तेमाल करना ही जानती हैं. ये यह अलग बात है कि कई दफा ये खुद भी इस्तेमाल होती है, जैसे आज…….तभी तो आसानी से कह दिया इसने कि जो भी करेंगें घर पर ही करेंगें शायद इसीलिए अकेली भी रहती है.  मैं ऐसे ही सोचता विचारता उसके घर से आगे निकल जाता यदि वह नहीं टोकती ‘‘अरे कहां जा रहे हो सर घर पीछे छूट गया .’’ मैंने मुरझाये से चहरे से बाइक रोकी . दरअसल मेरे मन में  बना उसका एक प्रतिमान न जाने कब बाजार से यहां तक आते-आते मेरे मन से ढह गया था. शालिनी के घर की सीढ़ियां चड़ते हुए उससे अकेले में मिलने की कल्पना भर से मेरे भीतर एक और पुरूष उठ खड़ा हो रहा था.  सीढ़ियों  पर मेरे आगे-आगे चलती वह, मुझे किसी ब्लू फिल्म की एक्टर लग रही थी. रोमांच से शायद मेरा चेहरा सुर्ख हो गया था. शालिनी के साथ कमरे में प्रवेश करते ही एक वारगी मेरी आंखें खुद पर विश्वास नहीं कर पाईं.  मेरे चेहरे की रंगत एक साथ कई बार बदली.  वे रंग भी कई बार गये और आये जिन्हें मैं शालिनी की आंखों में झांकने के पहले दिन से आज तक शालिनी की तस्वीर में  भरता रहा था.  मेरा मन हुआ कि मैं यहां से वापस भाग खड़ा होऊँ. जिस कमरे में, मैं कल अकेला शालिनी के साथ बैठा था वहां एक साथ कई जवान लड़के-लड़कियों  के साथ एक अधेड़ को बैठा देखकर मैं इतना असहज हो गया जैसे मेरा अपराध खुल गया हो. मुझे लगा मैं बलि का बकरा बन गया हूँ.

शालिनी सबके सामने मुझे अपमानित करेगी…..लेकिन ये लोग हैं कौन…? शालिनी ने तो कभी किसी के विषय में बताया ही नहीं. पल भर में  कई सवालों ने एक साथ फन उठाया और जवाब के अभाव में दम तोड़ दिया. मैं भी तो बिना कुछ सोचे समझे शालिनी को लेकर जाने क्या-क्या उल-जुलूल गणनायें करता रहा.  एक बारगी मुझे खुद पर तेज गुस्सा आने लगा मन हुआ चीखकर अपने बाल नौंचने लगूं.  मेरा दिमाग सुन्न हो गया था. इसी लिए मेरी आंखें खुली की खुली रह गयीं थीं. पलक ही नहीं झपका. शालिनी शायद मेरी स्थिति को भांप गयी है यह सोचकर मैं अपने में और गढ़ा जा रहा था. लेकिन गनीमत रही कि शालिनी ने बड़ी सहजता से कहा
‘‘आइये सर बैठिए…..यह सब हमारी यूनिट के लोग हैं.’’
‘‘यूनिट…..?’’ मैंने सहज होने की प्रक्रिया में बैठते हुए पूछा. ‘‘जी सर ! मैं अभी आपका परिचय कराती हूँ.’’ शालिनी ने उस अधेड़ व्यक्ति से शुरूआत की ‘‘आप हैं श्री जगदीश चन्द्र माथुर जी बी.वी.एन.ए. महाविद्यालय के लाइब्रेरियन और ये  इनके काॅलेज के स्टूडैन्ट.’’ सबने अपना-अपना नाम बता दिया.  शालिनी ने मेरा परिचय भी खुद ही कराया ‘‘आप मेरे आॅफिस में बड़े बाबू है, आप एक अच्छे इन्सान है और कभी-कभी लिखते भी हैं.’’ मैं सबके साथ बारी-बारी हाथ मिला रहा था किन्तु मेरी उलझन बड़ती जा रही थी.

मैं परेशान था यह सोचकर कि शालिनी को यह कैसे जानकारी हो गयी कि मैं कभी लिखता भी रहा हूं जब कि यह बात तो अब बहुत पुरानी हो गई लगभग आठ वर्ष हो जब मैं दिल्ली के जामिया में एम-काॅम कर रहा था. उस समय कभी कभार अखबारों या पत्रिकाओं को पढ़ने पर दोस्तों के साथ सहमति असहमति पर वहस हो जाती तो हम अखबारों  या पत्रिकाओं में चिटठी लिख लिया करते थे. वह तो ऐसा साहित्य भी नहीं था कि उसे पढ़कर मेरे नाम से इसने मुझे पहचान लिया हो. फिर….. मैं अपनी याददाश्त को और झकझोरता कि एक लड़की चाय लेकर आ गई और मेरा ध्यान चाय की तरफ चला गया. चाय हाथ में आते ही शालिनी ने कमरे में स्थापित हुए मौन को तोड़ते हुए मेरी आंखों में अपनी आंखें डााली ‘‘सर हम सब मिलकर यहां एक रंग मंचीय संस्था की स्थापना कर रहे हैं……..और हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ खड़े हों तो हम सबको अच्छा लगेगा.’’
शालिनी की बात सुनकर मुझे एक अजीब झटका सा लगा. जैसे मैं कहीं ऊँचे से गिरा होऊँ…..मेरा मन हुआ मैं ठठाकर हंस पडूँ. इस शहर में रंगमंच बड़ी बचकानी सी बात लगी मुझे. मैं बारी-बारी सबके चेहरे ऐसे देखने लगा जैसे वे सब मूर्ख हो. अंत में  मेरी नजरें शालिनी की झील सी आंखों के गहरे समुद्र में डूबकर फंस गई.  उसका वह निवेदन लगातार गहराता जा रहा था. मैं उसके इस प्रस्ताव को ठुकराना चाहता था लेकिन न जाने क्या था उन आंखों में कि मैं बोल ही न सका. मेरी मूक सहमति समझकर शालिनी ने मुझे उकसाया.

‘‘सर आप पिछले कई वर्षों से इस शहर में रह रहे हैं. आपका सर्किल भी बड़ा होगा. अपने कुछ सुझाव तो रखिए.’’ उसकी आंखों से निकलते ही मैं जैसे जमीन प आया था. ‘‘शालिनी मेरा लिखा तुमने ऐसा क्या पढ़ लिया जो बताया कि मैं लिखता रहा हूं.’’ ‘‘आप एक दिन आफिस में फोन पर अपने किसी दोस्त से बात कर रहे थे तब मैंने सुुना था.’’ मुझे याद आ गया था विजय से बात हुई थी जो आगरा में रहता है. जामिया में हम दोनों साथ थे.  ‘‘शालिनी मैं पिछले पांच वर्षो से इस शहर में  हूँ. रोजाना के अखबा र या लोकल चैनल शहर भर के धार्मिक अनुष्ठानों या साम्प्रदायिक तनाव की खबरों से भरे रहते है. जहाँ अपने-अपने धार्मिक कर्मकाण्डों को ही सांस्कृतिक क्रिया कलापों के रूप में जाना जाता हो. हिन्दू मुस्लिम जहां इक्कीसवी सदी में पहुँचकर भी इन्सानों जैसा व्यवहार न कर पा रहे हों वहां तुम्हारी यह कोशिश किसी चट्टान पर पेड़ उगाने जैसी नहीं लगती ?’’ मैंने एक विराम लेकर सबके चेहरों को प्रतिक्रिया स्वरूप पढ़ना चाहा सबके चेहरों पर जैसे वर्फ पड़ गई हो.  हां लेकिन शालिनी हल्के से मुस्करा रही थी. देखकर मुझे पहली बार शालिनी पर खीझ हुई थी.
‘‘तुम्हें मेरी बातें मज़ाक लग रही है …..शालिनी….?’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है सर, बल्कि मैं कहूँ कि यह सब जानकारी मुझे पहले से है और इसीलिए मैंने इस शहर को चुना है.’’
‘‘तुम कहना क्या चाहती हो ….?’’

‘‘यही कि आपको नहीं लगता कि इसी शहर को कहीं ज्यादा जरूरत है ऐसे संगठन की……?’’
‘‘मुझे तो पिछले पांच वर्षों से लगता रहा है.  लेकिन उससे क्या…….? मैं अकेला कर भी क्या सकता था ?’’
’’तो फिर किसी न किसी को तो शुरूआत करनी ही होगी.’’ ‘‘और अब तो तुम अकेले नहीं हो हम सब है.’’ बीच में ही मेरे सामने बैठा लड़का बोल पड़ा था. ‘‘बिल्कुल सही गांधी ने जब अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की तब वे भी अकेले ही थे……..हालांकि मैं गांधी नहीं हूँ किन्तु सोचें सर एक व्यक्ति पूरे देश को अपने पीछे कर सकता है तो क्या हम सब मिलकर  एक शहर के चन्द लोगों को अपने साथ लाने का प्रयास नहीं कर सकते.’’
शालिनी की इस बात पर सबने तालियां बजा दी जैसे वे सब पहले से इन सब बिन्दुओं पर एक मत थे बस मैं ही बचा था. और यह जिम्मा शालिनी पर था.मैं तो पहले से ही उसके प्रभाव में था रही कसर उसकी बातों ने पूरी कर दी थी. ‘‘शालिनी इतने लोगों को इकटठा करके एक बड़ा काम तो कर ही चुकी है. मैं हां करुं या ना करुं इस पर क्या फर्क पड़ेगा. फिर इस बहाने शालिनी का साथ तो बना ही रहेगा यह सोचकर मैं, न नहीं कर सका.’’हमारे बीच देर तक बहस होती रही.मेरी हर कोशिश शालिनी के इरादों के सामने पानी के बबूलों की तरह फूटती रही.

‘‘सबसे पहले हमें करना क्या होगा ?’’ मेरे इतना पूछते ही सब एक साथ जीत की मुद्रा में एक दूसरे के हाथ में हाथ देते हुए लगभग चीखे. मैं परेशान आखिर क्या हो गया.
‘‘राकेश सर ! आपने ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल करके सब में एक नई ताकत भर दी है.’’ माथुरजी के स्पष्टीकरण से मेरे भीतर भी खुशी का एक ऐसा पटाखा फूटा लगा जैसे पांच वर्षों से परिवार से अलग इस शहर में रहते-रहते मैं खुद को भी भूल चला था. तब अचानक, एक बड़े परिवार ने मुझे मनाकर गले लगा लिया हो. मेरी आंखों की कोरें शायद फूट पड़ती यदि मैंने अपनी पूरी ताकत से पानी के घुटों की तरह खुद अपने अन्दर ही न सोख लिया होता. शायद मेरी आंखें मेरे भीतर के सच को छुपा नहीं पाई थीं. मेरे न चाहते हुए भी वे पानी में तैर गयीं थी शालिनी ने पूछ ही लिया ‘‘क्या हुआ सर….?’’ ‘‘मुझे अचम्भा हो रहा है कि इस शहर में इतनी आत्मीयता और प्रेम भी मौजूद है….’’  ‘‘हर शहर में होता है सर, शायद आपने कभी खोजा ही नहीं .’’ इस जवाब ने शालिनी को मेरी नजरों में बहुत बड़ा बना दिया था.  मेरे भीतर अब तक की बनी उसकी तस्वीर की किरचें मेरे भीतर चुभ रहीं थीं जैसे मुझे सजा मिल रही हो.  हम शहर भर में नुक्कड़ नाटक करेंगें ‘जागो रे’ अन्त तक यह बात तय होते-होते शहर पूरी तरह रात के अंधेरे की गिरफ्त में आ चुका था.

नाटक की रिहर्सल का समय तय होेते ही सब जैसे पूर्ण तृप्त होकर घर से निकल रहे थे। लेकिन मेरे भीतर शालिनी को लेकर एक नया बीज अंकुरित हो गया था। इन बात-चीतों मंे मैंने कई दफा शालिनी के पैरों को देखा कोई निशानी नहीं थीं उसके शादी-शुदा होने की….तो क्या…..मैं उसे…… मन में उठते विचार को मैंने हल्के से झटक दिया और चला आया था. मगर मैने देखा वह विचार झटका नहीं था बल्कि मेरे साथ ही चिपका रहा था.  रोजाना शाम को शालिनी के साथ उसके घर तक जाने के लालच में मैं रिहर्सल में शामिल होने लगा. इस बीच कभी आॅफिस से जल्दी निकल आते तो रास्ते में पड़ने वाले काॅफी हाउस पर चाय या काॅफी पीकर जरूर जाते. यह आग्रह मेरा ही होता था. इस बहाने हम नाटक के अलावा अन्य बातें भी करते. तभी मैं यह जान पाया था कि वह इलाहाबाद की रहने वाली है. वहीं उसने बताया था. ‘इलाहाबाद में हमारे घर के पड़ोस में एक मैडम रहती थीं जहां मैं टयूशन पढ़ने जाती थी. उनके पास सहित्यिक किताबों का अम्बार रहता था.  हंस, नया ज्ञानोदय, शेष, वर्तमान साहित्य जैसी अनेक पत्रिकायें मासिक रूप से उनके घर आती थीं. न जाने कब वहीं मुझे पढ़ने का शोक लगा. एक दिन, अखवार में उनका फोटो छपा देखकर मैं चौकी थी और मैंने पूछा था. तब उन्होंने बताया कि मैं थियेटर भी करती हूँ. और लगातार कई दिन तक उसके विषय में बताती रहीं.

मुझे उनकी बातें सुनकर अच्छा लगता था. उसके बाद मेरे कहने पर उन्होंने ही मुझे अपनी नाट्य संस्था से जुड़वाया था ’ इन बातों के बीच में मैं कई दफा उसकी आंखों में झांकता न जाने क्यों मैं जब भी उसको कुरेदने को कोई सवाल करता वह मुझे गोल-मोल घुमा देती कहती ‘‘अब सब कुछ आज ही जान लोगे रिहर्सल का समय हो रहा है सब लोग इन्तजार करेंगे….शेष बातें फिर कभी.’’ मैं कहता ‘‘शालिनी रिहर्सल की कभी छुट्टी भी कर दिया करो ….’’ वह हंसते हुए कहती ‘‘सर यह काम जले हुए कंडे की आग की तरह है जिसे लगातार हवा न दी गई तो उपर राख की परत जम जायेगी और न जाने कब ठंडी पड़ जाय… इसलिए जल्दी चलो.’’ फिर मेरे पास कोई जवाब  नहीं रहता था.  रिहर्सल के बीच आपसी नोक-झोक , हंसी-मजाक, छेड़-छाड़ और शरारतों में मुझे भी आनन्द आने लगा था. नौकरी के बाद का मेरा ज्यादातर समय, शालिनी के साथ पढ़ने, बहस करने और नाटकों की तैयारियों में  ही बीतने लगा था.  जैसे मेरे लिए किसी हसीन राजमहल का दरवाजा खुल गया था और मैं उस राजकुमारी के सपनों का राजकुमार बन गया था. रिहर्सल के बाद या पहले मैं उसे छूता-छेड़ता और बांहों में भर लेता रिर्हसल में फौजी कमाण्डर सी दिखती शालिनी ऐसे सिमट जाती जैसे उसका पूरा वजूद मेरी मुट्ठी में भर गया हो।

उस दिन रिहर्सल के बाद नाटक के पहले शो की तैयारियों में हम सब जुटे थे. मेरे साथ सब लोगों के लिए यह पहला अनुभव था. सब के भीतर उत्साहपूर्ण उथल-पुथल थी.  क्या होगा…? कैसा होगा…? कब अंधेरा हो गया किसी को भी भान नहीं हुआ. अंधेरा होते ही लड़के-लड़कियों के घर से फोन आने शुरू हो गये थे. उस दिन वहां से जाने का किसी मन ही नहीं हो रहा था. वैसे तो सब ड्रैस, प्राॅपर्टी, मेकअप के सामान के साथ सबकी जिम्मेदारियां तय हो चुकी थीं. इस लिए शालिनी ने कह दिया था ‘‘ठीक है तुम लोग निकल जाओ केवल कल के कार्यक्रम को लिस्ट-आउट करना है सो मैं और राकेश जी कर देगें.’’ काम कुछ ही देर में पूरा हो गया था उस दिन शालिनी खुशी और उत्तेजना से बेहद चहक रही थी. मैं जाने लगा तो वह कुछ उदास हुई. मैंने पूछा तो बोली ‘‘खाना बनाती हूँ खाना खाकर चले जाना.’’ ‘‘देर हो जायेगी……..’’
‘‘तो आज यहीं रूक जाना……’’
शायद मेरा मन भी यही था. मैंने घर फोन कर दिया आज आॅफिस में  आॅडिट हो रहा है रात को आ न सकूँगा. बिनी किसी जबाब की प्रतीक्षा के मैंने फोन काटा था. उस रात बातें करते-करते शालिनी कितनी बार मोतियों की तरह विखरी थी और मैं हर बार उसे समेटकर अपने बजूद में समाता रहा था.

सुबह तक शालिनी के बिस्तर में कितनी ही सलबटें आ गई थीं. मैं अपराध बोध से ग्रसित था जबकि शालिनी और ज्यादा निर्मल और मुक्त दिख रही थी पुण्य-पाप के घेरे से एकदम मुक्त. उसी ने तो कहा था राकेश सर जो कुछ भी हुआ उसके लिए हम नहीं यह देह जिम्मेदार हैं और देह किसी भी पाप-पुण्य  के घेरे में नहीं रह सकती. बल्कि उसको घेरे में कैद करने की मानसिकता में हम अपराध कर बैठते हैं. वह खिलखिला कर हंसी और लैटस गो आॅन शो कह कर काम में जुट गयी. हालनगंज चैराहे पर हम सब इकटठे हो गये थे. दर्शक के रुप में चार-छह लोग ही हमें देखकर रुके थे.  हालांकि शालिनी ने सबको खूब हिम्मत दी थी लेकिन सभी शर्म और संकोच से कहीं गढ़े जा रहे थे. अचानक शालिनी का उत्तेजक स्वर गूंजने लगा ‘‘दोस्तो हमारी आजादी को बासठ वर्ष हो गये. सरकारों के रुप में केवल मुखौटे बदलते रहे.  वोटों के लिए, हमें कभी मंदिर बनवाने तो कभी मस्जिद की सुरक्षा के नाम पर बरगलाया, भड़काया अैर लड़ाया जाता रहा ताकि हमारा ध्यान हमारी ही रोजमर्रा की समस्याओं की तरफ न जा सके और वे असानी से अपने फायदे के लिए चाहे जैसे कानून बनाते अैर पास करते रहें. इसलिए दोस्तो अब वक्त आ गया हेै जागने का अपने हक मांगने का अैर जरुरत पर जवाब देने का. तो आईये हमारे साथ एक होकर जागने और जगाने के लिए…..’’ न जाने शालिनी के इन भाषणों ने क्या जादू किया कि हमारे इर्द-गिर्द पब्लिक का एक हुजूम उमड़ आया.

उसके बाद उस भीड़ ने कौतूहल जगाया और लोग जुटते गये.  भीड़ देखकर हम में भी न जाने कहां से ताकत आई और सब शर्म ओैर संकोच दूर छिटक गया. शहर के लोगों ने हमारे नाटक को अजूबे की तरह देखा और खूब सराहा. वर्षों बाद अखवार की सुर्खियां बदली नजर आई ‘सलिल रंग मंच ने जनसमस्याओं की ओर ध्यान खींचा प्रशासन का. नुक्कड की बड़ी  सफलता यह रही कि सरकारी महकमे को शहर भर की टूटी सड़कों की मरम्मत का कार्य शुरू करवाना पड़ा. हम सब उस दिन जश्न के रूप में चाय पार्टी कर रहे थे शालिनी इतनी खुश थी मानो जिन्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके हाथ लगी हो. यकायक वह खड़ी हुई और सबको हाथ उठाकर शान्त किया जैसे कोई भाषण देने जा रही हो। लेकिन वह विषेशतः मुझे कुछ कहना चाह रही थी. ‘‘क्यों राकेश सर अब तो देख ली अपनी ताकत……..जनसमस्याओं के साथ-साथ अब हमें ऐसी प्रस्तुतियां तैयार करनी होंगी जो आम जन के बीच हिन्दू-मुस्लम का भेद मिटाकर एक सूत्र में  बांधने की बात कर सकें. अचम्भे की बात है कि परोक्ष रुप से बहुत बड़ी राजनैतिक शक्तियां इस गैर जरुरी भेद को बढ़ाने में जुटी हैं ।’’ शालिनी ने एक बार सबके ऊपर नजर डाली फिर बोली ‘‘हमारा असल मकसद तभी पूरा होगा जब हम राजनैतिक इच्छाओं के लिए साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने की दिशा में बढ़े.’’

जाने क्यों मुझे लग रहा था जैसे इन सब बातों को कहते हुए वह अन्दर ही अन्दर कहीं क्रोध से कंपकपा रही थी. उसकी आंखें कुछ अजीब सी रोशनी से चमक उठी थीं. ‘‘अगले नाटक की तैयारी के लिए हम रोजाना दो घंटे के लिए माथुर साहब के घर बैठेंगें.’’ शालिनी ने हंसी-ठहाकों के बीच अचानक प्रस्ताव फेंका और माथुर ने सहर्ष स्वीकार भी लिया. अभी हम बातें कर ही रहे थे कि गांव से फोन आया पिताजी की तबियत ज्यादा खराब हो गई है. सुनकर सब परेशान होंगे इसलिए मैं बिना किसी को कुछ बताए दूसरे ही दिन गांव चला आया था. हां लेकिन शालिनी को फोन कर दिया था. मैं हफ्ते भर बाद गांव से लौटा था. इस पूरे हफ्ते भर शालिनी मेरे साथ न होकर भी जैसे मेरे साथ थी. मुझे छेड़ती और गुदगुदाती रही कभी-कभी फिलौस्फार की तरह व्याख्यान भी देती रही. मैं उसे मिलने को इतना बेचैन हो रहा था कि अपने घर जाने से पहले मैं शालिनी के घर पहुँचा. मैं सीढ़ियां चढ़ ही रहा था कि किसी ने नीचे से पुकारा अरे अब वह यहां नहीं रहती…….आखिर खुल गया न उसका भेद इसलिए रात में ही निकल गई …. आप खूब बच गये…..उस अधेड़ की बातें मेरे भीतर नस्तर की तरह चुभती रहीं. मेरा सिर झन्ना गया, हाथ पैर जैसे लकवे  का शिकार हो गये हो.  मुझे धराशाई करने को तो उसके चले जाने की खबर ही काफी थी फिर यह उसका भेद कौन सा खुल गया था.

मैने जान बूझकर उस अधेड़ से कुछ भी नहीं कहा न पूछा बस किसी लाश की तरह लगभग लुड़कते हुए से मैंने माथुरजी को फोन लगाया शायद उन्हें कुछ पता हो. हां राकेश जी वे चलीं गईं. हां… आपके लिए एक चिट्ठी छोड़ी है. माथुरजी जितनी आसानी से सब बातें कह गये थे मैं सुनने तक में व्यथित था. चिट्ठी की बात सुनते ही मेरी बेकली इतनी बड़ी कि मैं कंधे पर बैग लटकाये ही माथुरजी के घर जा पहुँचा, उनसे वह चिट्ठी लेने. हालांकि माथुरजी के चेहरे पर चिन्ता की कुछ बेतवीर सी लकीरें उभर रही थीं किन्तु मेरी बदहवासी को देखकर वे ज्यादा परेशान हो उठे थे. मुझे पीठ थपथपाकर बिठाया और एक सफेद बन्द लिफाफा मुझे सौंप दिया.  सर ! मेरा इस तरह जाना आप सब को अच्छा नहीं लगा होगा . खासकर आपको, इसके लिए मैं आपकी अपराधिनी हूं . मैं भागी नहीं बल्कि जा रही हूं. यहां मेरे साथ जो हुआ उसका मुझे पहले ही भान था। वैसे भी मुझे जाना तो था लेकिन ऐसे नहीं हां आपको वह सब बताकर जो आप जानना चाहते थे कुछ और भी जो आपने नहीं जानना चाहा. आपने कई बार पूछा कि मैं शादी शुदा हूं कि नही तो सर मैं शादी-शुदा हूॅ. तीन वर्ष पहले मेरी शादी रवि से हुई थी.हुई भी क्या मैंने ही कर ली थी. रवि एक व्यवसायी होने के साथ राजनैतिक रसूख वाला आदमी था लेकिन इलाहाबाद में हमारी नाट्य संस्था को खड़ा करने में उसकी बड़ी भूमिका थी.

हमारे हर शो को आर्थिक मदद, रिहर्सल व शो के लिये जगह की व्यवस्था करना उसी की जिम्मेदारी रहती.  रहती भी क्या वह खुद लेता था . बैठे-बैठाये सब व्यवस्थायें उसके फोन से ही हो जाया करतीं थीं. हम उसे किसी भी समस्या के लिए परेशान होते नहीं देखते थे. किसी भी समस्या पर जब वह सलीके से अपनी बात रखता तो वह मुझे किसी महापुरुष से कम न लगता. उसके सकारात्मक तर्क किसी को भी अपने साथ बांध पाने में सक्षम दिखते. मुझे उसकी बातें बड़ी मजेदार लगतीं थीं. कभी-कभी मैं कहती क्या-क्या पढ़ते हैं आप? तो मुस्कुरा कर कहता ‘‘कुछ शेष नहीं बचा है सबको पढ़ लिया है.’’ उसके सामने मुझे अपनी समझ बड़ी तुच्छ प्रतीत होती थी. सच कहूॅ तो मैं उसके आकर्षण में थी लेकिन यह सोचकर नहीं कि उससे शादी करनी है क्योंकि मैं शादी तो करना ही नहीं चाहती थी. अपने साथ की शादी-शुदा लड़कियों की हालत देखकर मुझे शादी के नाम से ही नफरत थी.  वे लड़कियां जो मेरे साथ हंसती, खेलती, गाती, पढ़ रहीं थीं लगता था गोया तितलियां हमसे जीने की कला सीखती हैं. अचानक उनकी शादी के बाद न जाने क्या हुआ कि वे सब सहमी-सिकुड़ी उस गाय की तरह लगने लगीं जिसे उसकी बिना इच्छा के कहीं भी बांधा, खोला या ले जाया जा सकता हो.

जैसे वे सब जीवित इन्सान न होकर गोश्त की पोटली हैं. मैं पूछती तो वे कहती ‘‘शालिनी यही हमारी मान मर्यादा है……शादी के बाद तू भी ऐसे ही हो जायेगी.’’ ऐसी बातें सुन-सुन कर मैंने शादी न करने की ठान रखी थी. तब मेरी समझ में आया था कि शायद मेरी ट्यूशन वाली मैम ने भी इसीलिये शादी नहीं की होगी. पापा मुझे बहुत चाहते थे लेकिन मेरे नाटक करने के खिलाफ थे. मैं ही नहीं मानी थी. हमेशा एक ही बात कहती ‘‘नाटक करती हूॅ….तो इसमें बुरा क्या है… और फिर इससे आपकी कौन सी इज्जत जा रही है.’’ पापा बस कसमसा कर रह जाते, उनके किसी दोस्त ने उन्हें यह तरीका सुझा दिया कि शादी कर दो सब अपने-आप भूल जायेगी. बस पापा जबरन से मेरी शादी करने पर तुल गये थे. फिर शुरु हुआ मेरी नुमाइश का दौर, नये-नये लोग, अजीब-अजीब सवाल…. कितने बजे सो कर जागती हो? पूजा करती हो या नहीं ? इतनी जोर से हॅसती हो ? क्या-क्या पका लेती हो..?  मैं झका जाती और बात नहीं बन पाती थी. पापा मुझे दुश्मनों की तरह कोसते.  मां तिलमिला कर कभी पापा को धैर्य बंधाती तो कभी मुझे सपोर्ट करती. मैं खुद कभी हथियार डालती फिर अचानक आसमान को देखती, दूर…..जहां तक भी मेरी नजरें जा पातीं . मैं देखती, आसमान उससे और आगे तक है. दूर, बहुत दूर तक  बिना सीमाओं के उड़ती हुई चिड़ियों को देखती और फिर अपने फैसले पर अड़ जाती . इसी मानसिक विचलन के कारण मेरी रिहर्सल भी छूट रहीं थीं.

मैडम का फोन आया था ‘‘शालिनी शो नहीं करना है क्या..? चार दिन से गायब हो .’’ उस दिन रिहर्सल पर मैंने अपनी मनः स्थिति खुली किताब की तरह सबके सामने खोलकर रखी थी. खासकर मैं सबके बहाने रवि को ही अपनी परेशानी बता रही थी यह सोचकर कि वह सही सलाह देगा. उस दिन रवि ने कहा था ‘‘देखो शालिनी ! अभी तुम खुद अस्थिर हो… पहले तुम खुद फैसला करो कि शादी करनी है या नहीं ? क्योंकि, लड़कियों की शादी का अर्थ तो केवल इतना ही समझा जाता है कि इस बोझ को अपने सिर से उतार कर दूसरे के सिर पर रखना. और यदि तुम इसके लिये तैयार नहीं हो तो तुम किसी पर बोझ न बनकर खुद आत्म निर्भर बन जाओ फिर तुम तो पढ़ी-लिखी हो, आसानी से कहीं भी नौकरी कर सकती हो . यदि शादी करना चाहती हो तो… मुझ में भी कोई बुराई नहीं है.  परेशानी से भी मुक्ति और नाटक भी होता रहे यानी आम के आम अैार गुठलियों के भी दाम .’’ कहकर रवि ठठाकर हँस पड़ा था. उसने मजाक किया था या गम्भीर, मैं नहीं जानती…. हाॅ लेकिन, मैं जरुर गम्भीर थी.  मैने मैडम से बात की अगर रवि मजाक नहीं कर रहा हो तो मैं तैयार हूँ . उस दिन मैडम ने हम दोनो के साथ बातें की और तीसरे दिन हमने कार्ट में शादी कर ली.

मैंने पापा की व उनके परिवार की मर्यादा तोड़ी थी इसलिये पापा से रिश्ता तो टूटना तय ही था. माॅ भी कुछ न कर सकी इस बार पापा किसी की मानने को तैयार नहीं थे. ज्यादा कहने पर माॅ को भी घर से निकालने की धमकी मिली, और मम्मी कटे कबूतर सी छटपटा कर रह गईं. मुझे उस दिन समझ आई कि पापा मुझसे नहीं बल्कि मेरे साथ जुड़ी अपनी मर्यादा को प्यार करते थे जिसे मैने तोड़ दिया था . मैं फोन कर लेती माॅ चुपचाप बातें कर लेती.  माॅ ने यह सोचकर सन्तोष कर लिया था कि मैं खुश हूॅ. मैं थी भी बेहद खुश मुझे लगता ही नहीं था कि मैंने शादी कर ली हैै. वही रिहर्सल, वही नाटक, वही अल्हड़ता में हंसना-खिलखिलाना, बहसें, नोंक-झोंक सब कुछ तो वैसा ही था बस शहर बदल गया था. रवि का परिवार तो गांव में ही था. दो पैट्रोल  पंप लखनउ में थे रवि उन्हें देखता  था. लखनउ मेरे लिए नया शहर जरुर था लेकिन बहुत ज्यादा नहीं.  मैं अपनी टीम के साथ कई बार वहां नाटक करने जा चुकी थी.  शाम को तो रिहर्सल होती लेकिन दिन भर, मैं अकेली, घर में बोर होती. आखिर किताबें भी कितनी पढ़ती। मैंने एक फाइनेन्स कम्पनी में नौकरी कर ली। मैंने रवि को चहकते हुए यह खबर सुनाई थी ‘‘रवि मुझे बारह हजार रुपये महीने की नौकरी मिल गई है.’’ रवि ने मेरे चेहरे को कुछ अजीब तरह से देखा उसका मुस्कुराता चेहरा धीरे-धीरे सपाट होता गया ‘‘सिर्फ बारह हजार के लिये तुम इतना खुश हो रही हो….. इससे कहीं ज्यादा खर्चा मेरे जल-पान का होता है .’’

 रवि की यह बात सुनकर मुझे अचम्भा हो रहा था. मैं एकदम से यह तय कर पाने की स्थिति में भी नहीं थी कि रवि मजाक कर रहा है या गम्भीर होकर मुझे मेरी औकात बता रहा है. फिर भी मैंने गम्भीरता से अपने मन की बात कही ‘‘रवि मैं यह नौकरी तुम्हारे लिये नहीं कर रही यह तो मैं आत्मनिर्भर होने को कर रही हूॅ. आप ही तो कहते थे किसी पर बोझ न बनने की बात….और मेरा मन भी लगा रहता है.’’  ‘‘अब उसकी कोई जरुरत नहीं है और वैसे भी मम्मी-पापा को यह शादी रास नहीं आई है .’’
‘‘क्यों…….?’’
‘‘वही बड़े-बूड़ों की सोच, खानदान में चाचा मंत्री रहे हैं और बेटे की शादी ऐसे सामान्य तरीके से… लेकिन तुम उसकी फिक्र मत करो मैं मैनेज कर लुंगा बस तुम….. यह नौकरी-वौंकरी……? खैर, कुछ दिन मन बहलाने को कर लो… वैसे भी अब तुम्हें आत्मनिर्भर होने की जरुरत नहीं है क्योंकि तुम अब शादी-शुदा हो और रवि प्रकाश की पत्नी…. समझ गई .’’ अब मैं समझ गई थी कि रवि मजाक नहीं कर रहा था. लेकिन उसमें अचानक आये इस बदलाव को मैं समझ नहीं पा रही थी.



‘रवि जरुर किसी उलझन में होगा उससे उसका मूड अपसैट है तभी इस तरह की बातें कर गया है.’ यही सब सोचकर मैंने रवि की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. शाम तक नौकरी फिर रिहर्सल या बहसें गप्प गोष्ठियां कालेज का समय जैसे वापस आ गया था. कालेज, ट्यूशन फिर रिहर्सल. दोस्तों के साथ हंसना-ठठाना ताने-उलाहने, कभी घर जल्दी पहुॅचना कभी थोड़ी देर हो जाना, रवि अभ्यस्त था इन सब चीजों के लिए इसलिये मैं भी बे-फिक्र थी. रवि भी लगभग रोज सा ही हमारे साथ रिहर्सल पर आ ही जाता था. मैं भी खुश थी समय जैसे वे परों के उड़ने लगा था. कुछ ही दिनों के बाद से एक अजीब बात होने लगी थी और न चाहते हुए भी मेरा ध्यान उस तरफ जा रहा था. पिछले एक महीने से रवि हमारे नाट्य ग्रुप के साथ आकर नहीं बैठ रहा था. शाम को मैं अक्सर उसे घर पर दो-चार लोगों के साथ मीटिंग करते हुए पाती. उनके बातों, लहजों और पहनावे से वे राजनैतिक लोग थे इतना मैं समझती थी. शुरु-शुरु में यह बात मुझे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं लगी क्योंकि यह बात मैं पहले से ही जानती थी कि उसके राजनैतिक रसूख भी है . लेकिन अब कुछ अघटित सा घटने लगा था.। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया में बहुत कुछ घटित होते सुकून नहीं देता और न घटित हो ऐसी संभावना के लिए छटपटाते हैं. मेरी स्थिति लगभग ऐसी ही थी.

उस दिन इतवार था. हमारे ग्रुप के डायरेक्टर ने अगले नाटक के चयन के लिये तीन बजे मीटिंग में हम सब के साथ रवि को भी बुला रखा था. तीन बजे का समय भी रवि के कारण ही रखा गया था क्योंकि रवि दो से पांच घर पर ही होता था लेकिन रवि नहीं आया. सबने बहुत देर तक रवि का इन्तज़ार भी किया.अन्ततः मीटिंग शुरु हुई और नाटक का चुनाव कर लिया गया. न जाने क्यूॅ मुझे उस दिन रवि का वहाॅ न पहॅुचना अच्छा नहीं लगा. उस दिन मैं यह सोचकर घर पहुॅची कि आज रवि से बात जरुर करुॅगी और इस बदलाव का कारण भी जानकर रहूॅगी.
उस दिन भी कुछ लोग रवि को घेरे बैठे थे. वे सब शराब पी रहे थे. एक गिलास रवि के हाथ में भी था. मैने उसे इस रुप में पहली बार देखा था. देखते ही मुझे बिजली का सा झटका लगा. मैं शायद रवि पर बिफर पड़ती, लेकिन मैंने अपनी पूरी ताकत लगाकर खुद को संयत किया और इस तरह अन्दर गई जैसे मैंने उन लोगों को देखा तक न हो. हालांकि घर आने से पहले मुझे बहुत तेज भूख लगी थी लेकिन घर पहुॅचते ही मेरी चाय पीने तक की इच्छा नहीं रही थी. मैं बस उन लोगों के जाने का इन्तजार कर रही थी. मुझे यह इन्तजार लगभग दो घंटे करना पड़ा.  रवि आज नशे में है इसलिये तेज आवाज या क्रोध से बात बिगड़ सकती है इस खयाल से मैंने रवि से बड़ी सहजता से पूछा ‘‘रवि आज आप आये क्यों नहीं…. ?

पता है आज बड़ा मजा आया पूरा यूनिट इकट्ठा था तुम्हारा बहुत वेट भी किया ।’’ ‘‘आज ऐसे काम में फंसा रहा जिसकी उम्मीद भी नहीं थी कोशिश भी की लेकिन निकल नहीं पाया और फिर, तुम तो थी हीें वहां आखिर तुम केवल शालिनी नहीं हमारी पत्नी भी हो . ’’रवि की सहजता से लगा कि बात आगे बढ़ाई जा सकती है ‘‘आज तुम शराब पी रहे थे…. और..ये कौन लोग हैं ? जिन्हें मैं अक्सर यहां बैठा देखती हूॅ .’’ रवि की आंखों की गोलाई देख मैंने बात हल्की करनी चाही ‘‘तुम्हारी पत्नी हूॅ इसलिये पूछ रही हूॅ .’’  मैं  सहम गई थी लेकिन मुस्कान की मुद्रा में फैलते रवि के होठों को देख मुझमें साहस सा आ गया था ‘‘शालिनी ये पार्टी के लोग हैं चुनाव करीब हैं… इसलिये कुछ तैयारियों पर चर्चा करने आ जाते हैं, और रही बात शराब की तो वह मैं नहीं, वे लोग पी रहे थे.  मैं तो बस गिलास हाथ में लिये उनको साथ देने का बहाना भर कर रहा था, सब करना पड़ता है. तुम खुद देख लो मैं, तुम्हें नशे मैं दिख रहा हूॅ क्या ?’’ अपने क्रिया-कलाप और हंसी-मजाक से रवि ने मुझे निरुत्तर कर दिया था . मैं उसे उस दिन मीटिंग में चुने गये नाटक के विषय में बताना चाह रही थी कि रवि यकायक गंभीर हो गया ‘‘शालिनी एक बात कहूॅ….?
‘‘जी….’’

‘‘तुम यह नौकरी छोड़ दो…..दरअसल, मेरे जानने वाले जो बातें करते हैं, मुझे अच्छी नहीं लगती .’’ कहकर रवि ने ऐसे मुँह  बनाया जैसे कोई कड़वी दवा चाट ली हो. मैं एक पल में समझ गई थी रवि जो कहना चाहता था फिर भी चीखी या चिल्लाई नहीं क्योंकि ऐसी समस्याओं से जूझने और निकलने की कला मैंने ग्रुप  में रहकर मैडम से सीखी थी. वे भी बड़ी से बड़ी समस्या पर धैर्य नहीं खोती थीं.  ‘‘रवि ! लोग कहते हैं इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता…. लेकिन तुम क्या कहते हो ?’’ ‘‘शालिनी मैं तुम्हें गलत नहीं समझता… लेकिन बाजार तो है ही, और काम है तो लोगों से हाथ भी मिलाना होता है उनसे हंसना-मुस्कुराना, फोन करना, बातें करना यह सब तो होता ही है .’’ ‘‘तो इससे….और कितनी औरतें आज काम कर रही हैं अगर ऐसे ही सोचें तो काम कैसे चलेगा ?’’
‘‘सबकी बात अलग है शालिनी….. कुछ तो देह तक बेचती हैं.. लेकिन तुम तो ऐसा नहीं कर सकतीं . तुम्हारे लिए मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है  शालिनी…..! मैंने कहा न, करना पड़ता है सब.. इसीलिये कहता हूॅ कि तुम नौकरी छोड़ दो और तुम छोड़ भी सकती हो….’’रवि की बात सुनकर एकवारगी मैं कांप गई । उसकी बातों ने मुझ में एक बौखलाहट पैदा कर दी थी. यहीं मेरे धैर्य की पराकाष्ठा थी वाबजूद इसके मैं कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती थी . मेरे शब्द कांप रहे थे ‘‘रवि तुम तो ऐसे नहीं थे..कितने समझदार थे लेकिन तुम इस तरह की बातें…..?’’

‘‘समझदार हूं तभी तो कह रहा हूं नौकरी छोड़ दो इससे पहले कि……फिर नहीं छोड़ पाओगी .’’ व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ अपनी बात अधूरी छोड़कर रवि उठा और अन्दर जाकर बैड पर पड़कर सो गया.  बहुत देर तक तो मेरा दिमाग कुछ कहने या करने की स्थिति में ही नहीं रहा था. अजीब-अजीब सी आवाजों के साथ लगता जैसे कमरे की दीवारें आपस में टकरा रही हों उनके बीच में दबकर जैसे मैं पिस रही हूं. मेरा शरीर मृत हो गया है. बाई घर जाने की पूछ रही थी, उसने मुझे झकझोर कर एहसास दिलाया कि मैं जिन्दा हूॅ. मन बहुत कसैला हो रहा था, फिर भी मैं यह सोचती बैड पर जा पड़ी कि रवि आज शराब के नशे में है इसलिये यह अनाप-शनाप बक गया है, सुबह तक होश में आ जायेगा तो उसे याद भी नहीं रहेगा कि उसने रात क्या कहा था. ऐसा नहीं है कि मैं रवि की बातों के निहितार्थ नहीं समझती थी इसीलिये मैं उस रात बिल्कुल भी सो नहीं सकी थी. घड़ी की मामूली टिक-टिक मेरे मस्तिष्क पर किसी हथोड़े की सी चोटें मारती रही. मन का दीपक बुझा तो अंधेरा मेरे मन के साथ जुड़ गया फिर मैं अंधेरे से बातें करती रही. शंका-आशंकाओं के झूले से लटकती कूदती रही, बिखरते सपनों पर पैबन्द लगा कर जोड़ने की कोशिश करती रही. सुबह के उजास से मन का अंधेरा हटा तो आंख लग गई.

रवि ने तैयार होकर आॅफिस जाने से पहले मुझे जगाया सामने घड़ी की सुईयां ग्यारह बजने का इशारा कर रहीं थीं. खिड़की से छनकर आती धूप के घेरे में बेतहासा भाग-दौड़ करते धूल के कण जैसे मेरे अन्दर की कहानी को बयां कर रहे थे.  मैं यह सोचकर हड़बड़ा कर उठी कि आज आॅफिस को बहुत लेट हो गई.  ‘‘क्या हो गया……?’’ रवि ने पूछा तो ‘‘रवि मैं आॅफिस के लिए….’’ मैं अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाई कि रवि ठठाकर हंसने लगा ‘‘अब उसकी जरुरत नहीं है. मैंने चावला जी को फोन कर दिया तुम्हारी जगह वे किसी और को अपाॅइन्ट कर लेंगे.’’ उसने मुस्कुराते हुए कहा और मेरे गाल पर हल्की सी चपत लगाकर चला गया. उस दिन मुझे लगा कि मैं तो हिल भी नहीं पा रही हूं.  मुझे जंजीरों में जकड़ दिया है.  उसकी जकड़न मेरी हड्डियों को तोड़ रही है. जिन्दगी मेरे सामने अचानक एक बोझ की तरह आ खड़ी हुई थी . जिसे ढोना शायद मेरे वश में नहीं था.  मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं बचा था सिवाय यह सोच लेने के कि न सही नौकरी, नाटक तो है.  नाटक में कितनी जिन्दगियां हैं मैं उनमें डूबकर अपनी जिंदगी तलासुगी. सिसकती ही सही मेरी जिन्दगी वहीं है. सब कुछ तो छीन लिया मुझसे.  क्या कुछ मैने नहीं छोड़ा…? अपना घर, मां-बाप का प्यार, अपना शहर, अपने लोग, अपने रिश्ते-नाते इन सब पर भारी था मेरा जुनून, नाटक के लिए,  मैं इसे नहीं छोड़ सकती यही सब सोचकर मैंने अपना नाट्य दल बना लिया था, बिल्कुल अपने इसी सलिल रंग मंच की तरह.

पैसे की मेरे लिये न कमी थी न अहमियत, मैंने रिहर्सल के लिये एक हाॅल किराये पर ले लिया था.  जहां मेरा ज्यादा समय व्यतीत होने लगा था. करती भी क्या…? घर बचा ही कहां था मकान रह गया था बड़ा सा मकान .
मैं भीष्म साहनी का ‘मुआवजे’ की तैयारियों में जुटी थी. एक दिन रवि रिहर्सल में आ गया और बड़े अच्छे मूड में था. वह सब लोगों के लिए समोसे लेकर आया था. उस दिन मैं उसे देखकर खुश थी. मुझे लगा रवि आज नही तो कल वापस आ जायेगा और फिर सुबह का भूला शाम को घर वापस आये तो उसे भूला नहीं कहते. हम सब रिहर्सल में जुट गये. रिहर्सल खत्म होते ही रवि कुछ जल्दी में घर चला गया मैने सोचा था चुनाव करीब  है तो कोई काम याद आ गया होगा . मुझे तो इस बात का इल्म भी नहीं था कि वह मुझे घर पर इस मूड में मिलेगा । रवि कमरे में मेरा इन्तजार कर रहा था.
‘‘शालिनी एक बात पूंछू ….?’’
‘‘हां.. हां मैं चहक उठी थी.’’ ‘‘यदि, मैं कहूं, तुम नाटक छोड़ दो या कहूं कि तुम्हें नाटक या मुझमें से किसी एक को चुनना हो तो तुम किसे चुनोगी ?’’मैं उसके चेहरे को गौर से देखने लगी उसकी आंखें स्थिर थीं मुझे अंदाजा हो गया था कि रवि मजाक नहीं कर रहा है.

 अगले ही पल मुझे लगा उसने सवाल नहीं थप्पड़ मारा है. मैं चाह कर भी सहज नहीं रह पा रही थी लेकिन अंधेरे में भी कोई किरण खोजने की कोशिश में मैने खुद को सम्भाला ‘‘रवि तुम क्या कह रहे हो, तुम्हें लगता है नाटक तुम्हारी जगह ले सकता है और यह भी संभव नहीं कि तुम मेरे नाटक की भरपाई कर सको. सच कहूं तो तुम मेरी जिन्दगी हो और नाटक मेरी आस्था .’’ मुझे लगा रवि खुश हो जायेगा लेकिन उसका चेहरा कुछ अजीब विकृति से भर उठा. ‘‘शालिनी ! वैसे तुम्हैं अब यह नाटक-वांटक छोड़ देना चाहिए क्या मिलना है इससे.’’
‘‘वही जो तुम्हें इलाहाबाद में नाटक करने से मिलता था सुकून, आनन्द.’’ अचानक रवि ठठाकर हंसने लगा. ‘‘हां आनन्द तो था….. लेकिन नाटक से नहीं, तुम जैसी कटीले नाक-नक्श की चटपटी बालाओं का साथ पाकर और तुम्हें तो उड़ा ही लया न …’’ मैं अवाक रह गयी एक दम सन्न. रवि इतना गिर भी सकता है. मैं सोच भी नहीं सकती थी. मैने फिर भी सोचा शायद मजाक कर रहा हो ….‘‘रवि मजाक नहीं साफ कहो क्या कह रहे हो ?’’
‘‘शालिनी मैं मजाक नहीं कर रहा, सच कह रहा हूं.  मैं नाटक केवल मजा लेने के लिए ही करता था. सस्ता टाइम पास किसी फिल्मी हीरो की तरह, तुम्हारे गले में बांहें डालकर नाचने के लिए , मैं तब भी कहता था क्या हो जाना है इन नाटकों से ? क्या बदल जाना है ? यह अनपढ़ समाज जो केवल धर्म के लिए जीता है बल्कि कहूं तो धार्मिक पाखण्डों के लिए.


गरीबी दूर हो जायेगी उस गरीब की जो केवल धनवानों को कोसने में अपना पूरा वक्त लगा देता है या उस मजदूर की कया पलट हो जायेगी जो मजदूरी करना ही नहीं चाहता . फिर भी तुम्हें लगता है कि, नाटक से क्रान्ति हो जायेगी . यह पागलपन नही तो और क्या है …..? शालिनी !  दुनिया बाजार से चलती है और बाजार पूंजी से, ताकत पूंजी में हेै. यह पांच-पांच सौ के लिए चन्दा करते घूमना मुझे अच्छा नहीं लगता.’’
मैंने देखा रवि गम्भीर हो गया था.  न जाने क्यों मुझे लगा उसके दो बड़े-बड़े दांत बाहर उग आये हैं . सिर पर सींग निकल आये हैं .उसके मुंह से खून टपक रहा है .नहीं यह रवि नहीं हो सकता वह रवि जो हमारी यूनिट का एक समझदार इन्सान था.  जिसके पीछे मैं अपना हंसता-खिलखिलाता अतीत छोड़ आई हूं. जिससे मैंने शादी की …..और अगर यह वही रवि है तो यह मेरे जीवन की सबसे  बड़ी भूल थी जो अब असल रुप में मेरे सामने है .
मैं निहत्थी थी फिर भी मैं न जाने कैसे खड़ी हो गयी .मेरे अन्दर एक आग सी जल उठी थी. मैं जैसे फट पड़ना चाहती थी. मैं अपना अगा पीछा सेाचना ही भूल गई थी.‘‘रवि मुझे तरस आता है तुम्हारी सोच पर ..मैं  नहीं समझती कि अब तुम्हें यह बताना भी सही होगा कि नाटक महज़ टायम पास नहीं है नाटक केवल कला ही नहीं आत्म सम्मान है.

संस्कृति है । हमारी ताकत है । नाटक जरिया है उन लोगों को जगाने का जिन्हें सदियों से सुलाए रखने को धर्म की थपकी दी जाती रही है . किसी ने जागने की कोशिश भी की तो उसे पाप-पुण्य  और संस्कारों की बेड़ियो में जकड़ने की साजिशें रची जाती रहीं, ईंट-पत्थरों से हमले किये जाते रहे.  तुम भी कुछ अलग तो नहीं कर रहे हो. वही कर रहे हो जो सदियों  से होता आ रहा है. फिर गरीब मजदूर का दर्द तुम जान भी कैसे सकते हो ?’’
‘‘शालिनी पागल मत बनो, भावनाओं में बहने से कुछ हासिल नहीं है.  जो सदियों से चला आ रहा है उसे कोई नहीं बदल सकता न मैं, और तुम भी नहीं. ’’
‘‘तो मुझे क्यों फोर्श कर रहे हो बदलने को…?’’
‘‘क्योंकि तुम पर मेरा अधिकार है .’’
‘‘और मेरा …..?’’
‘‘सब तुम्हारा ही तो है……’’
‘‘इस सबके बदले में आखिर मुझसे चाहते क्या हो ….?’’
‘‘यही कि तुम इस नाटक को मत करो……नाटक और भी तो हैं करने को….. ’’ सुनकर मुझे हंसी आ गई थी, दरअसल वह घबराया हुआ था. इतनी देर बहस के बाद वह असल मुद्दे पर आ गया था.

‘‘यह समय इस नाटक के लायक नहीं है ’’  ‘‘कैसा समय है….? यही तो समय है इस नाटक के लिए .’’
‘‘शालिनी ! समझने की कोशिश करो, तुम मेरी पत्नी  हो और तुम यह नाटक करोगी, तो क्या संदेश जायेगा पब्लिक में .’’ ‘‘लेकिन रवि यह कैसे मुमकिन है.  अब जब लगभग नाटक तैयार है तब कह दूं कि यह नाटक नहीं कर रहे. क्या सोचेंगे सब लोग कैसे चलेगा यह संगठन सब छोड़ बैठैंगे.  अब यह कोई तुम्हारी राजनैतिक पार्टी तो है नहीं कि जो हाई कमान ने कहा वही सबको मानना पड़ेगा. ’’ कहते हुए मैं उसके चेहरे पर उभरती कुछ अजीब सी लकीरें देख रही थी जैसे मेरा हर शब्द उसे गेाली सा लग रहा था . ‘‘यह मैं नहीं कर सकती .’’ आखिर मैंने फैसला सुना दिया था.  वह कुछ देर चुप रहा फिर बोला ‘‘शालिनी मैं चाहता हूं कि तुम राजी-वाजी से ही बात मान जाओ  नही तो ….?’’  ‘‘नही तो क्या ……?’ ‘‘यही कि यदि तुम नाटक के लिए अपना घर छोड़ सकती हो तो मैं भी  ……..’’ अब वह मेरे सामने पूरी तरह नंगा हो गया था . ‘‘मैने सोचा था अन्य औरतों की तरह तुम भी ऐशो-आराम, चमक-दमक पाकर सब कुछ खुद व खुद भूल जाओगी लेकिन तुम मूर्खता से बाहर नहीं आ सकीं …..अब तुम्हें,… नाटक या मुझमें से किसी एक को चुनना पड़ेगा, तय तुम कर लो. एक दिन भूखी  रहोगी तो सब नाटक भूल जाओगी…..’’

उसने जितनी सहजता से कह दिया था मैं उतनी ही असहज हो गई थी  वह क्षण मेरे लिए पूरा जीवन चुनने का था . मुझे एक ओर होना था.  एक तरफ सदियों से लीक पर चलता, मान मर्यादा के आभूषणों से सजा-धजा स्थूल सा जीवन.  सिमटी-सिकुड़ी छोटे से आसमान को  टुकुर-टुकुर झांकती जिन्दगी थी तो दूसरी ओर गाती, बजाती, नाचती, इठलाती, भूखी, प्यासी, भागती, दौड़ती, अलमस्त परिंदों सी खुले आसमाान में पंख पसारे उड़ती, संघर्ष, निस्वार्थ, प्यार, मुहब्ब्त में खेलती, रोती, सिसकती, हंसती, ठिठोली करती, सर्दी से कांपते हाथों चाय सुड़कती तो कभी चिलचिलाती धूप में सरपट दौड़ती, वारिश में भीगती बसंती रंगों से सजी, नाटक, रिहर्सल, नौक-झौंक, चूं-चपड़ करती जिन्दगी.   मुझे एक को चुनना था. मैं जीना चाहती थी.  जिन्दगी को खेलना चाहती थी . मैंने ठुकुरा दिया था स्थूल जिन्दगी को. सुनकर रवि बौखला गया था . ‘‘शालिनी आज मुझे यकीन हो गया कि तुम वास्तव में बहुत बड़ी मूर्ख हो… तुम्हें क्या लगता है तुम इस शहर में नाटक कर पाओगी’’
‘‘यह शहर दुनिया नहीं है. दुनिया कितनी बड़ी है यह तुम नहीं जान सकते . पूजा या नमाज के लिए किसी मंदिर या मस्जिद का होना जरुरी नहीं है उसे करने के लिए इच्छाओं का होना जरुरी है….’’ न जाने कैसे मैं यह सब कह गई थी. और एक बार फिर मैने अपना घर छोड़ा था.

राकेश सर ! बिना किसी इरादे के मैं इस शहर में चली आई थी.  एक सस्ते गैस्ट हाउस में मैंने ठिकाना बनाया था . नौकरी पाना मेरे लिए मुश्किल काम नहीं था. मैं नौकरियां करती और छोड़ती रही.  बिना किसी मंजिल के बस चलने जैसा था . मेरी आंखें जैसे कुछ खोजती रहती थीं .मन की बेचैनी और यही खोज मुझे एक दिन माथुर जी की लाइब्रेरी ले पहुंची थी यह सोचकर कि शायद वहां मेरे जैसा कोई मूर्ख मिल जाय. माथुर जी इस शहर में ऐसा ही कुछ करना चाहते थे लेकिन उनकी बीमारी उन्हैं कुछ करने नहीं दे रही थी. उन्होने ही मुझे यहां कमरा दिलाया और अपने छात्रों को साथ लेकर संगठन बना और ……. यही है मेरी जिन्दगी की कहानी जिसे आप जानना चाहते थे……….. राकेश सर आपको याद है, जब आप अपने दोैस्त से फोन पर एक दिन कह रहे थे ‘कहां यार इस शहर में आकर नाटक साहित्य सब सपने की सी बातें हो गईं.  तू दिल्ली में मजे में है. यहां तो अखवारों में भी कभी कोई ऐसी खबर भी नहीं पढ़ी. ’ बस तभी से मेरी नजरें आप पर थीं । और आप मिले भी……लेकिन……..

इस सब के साथ मैं यह भी जानती थी कि रवि आसानी से मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा.  उसकी राजनैतिक ताकत कभी भी मुझ तक पहुंच जायेगी . उसने ठीक वही किया जिसकी मुझे उम्मीद थी . उसका हमला मुझ पर नहीं संगठन की ताकत पर था उन लोगों ने मुझ से कुछ नहीं कहा था.  वे दो तीन लोग थे जो घिसे पिटे फिल्मी से संवाद बोलकर पूरे चंदनवन केे लोगों को उकसा रहे थे ‘‘यहां आप लोगों के बीच रंडीखाना आबाद है, जवान लड़के-लड़कियां  रोज शाम होते ही जुटने लगते हैं . क्या कभी सोचा हैैैै क्या होता है यहां. क्या संस्कार जायेंगे हमारी बहन-बेटियों में…..? लोगों में भी फिल्मी तर्ज पर ही पागलपन सवार हुआ था.  राकेश सर ! आप सोच रहे होंगे कि मैने लोगों को जवाब क्यों नही  दिया…….दरअसल जवाब के लिए मेरे पास था क्या ? उस भीड़ में, सभी में ही मेरे पिता थे जो मुहल्ले भर की मर्यादा को टूटने नहीं देना चाहते थे.  मेरे पड़ोसी चाचा जो अपनी ताकत से खड़े नहीं हो सकते . उनमें भी कितनी ताकत भर गई थी.  उन जवान और अधेड़ों के शरीर गुस्से से कांप रहे थे जिनकी नजरें हमेशा मुझे गिद्धों की तरह नौचती रही थी. किसी भी बहाने वे मेरी करीबी की आकांक्षा पाले जी रहे थे.  मौका था तो उनकी भड़ास भी निकल रही थी.  ऐसे में मैने उनका सामना करना उचित नहीं समझा था.

मुझे यह बिल्कुल भी डर नहीं था कि वे लोग मेरे साथ क्या करेंगे बल्कि मैं ऐसा कुछ भी होने देना नहीं चाहती थी जैसा  रवि चाहता था .  लोग मेरे साथ बदतमीजी करें  हंगमा हो पुलिस आये.  दूसरे दिन दो लोगों से पूछ कर मीडिया खबर बनाए और संगठन के नये लड़के-लड़कियां घबराकर दूर छिटक जांय, रवि यही तो चाहता था.
यहां से जाने से पहले मेैं रातभर सोचती रही कि क्या मेरा रहना यहां ठीक है….? अंतः मुझे लगा कि अब आप और माथुर जी मेरे बिना भी नाटक करते रहेगो. मैने आपके साथ मिलकर युवा पीढ़ी में वह बीज बो दिया है जिसे कोई रवि नहीं उखाड़ सकता.   राकेश सर ! क्या मेरा यह फैसला गलत था ? मैं नहीं जानती आप इसे गलत कहेंगे या सही लेकिन आप, माथुर जी और पूरा संगठन जानता है कि ‘‘आंधी हो तूफान बबंडर नाटक नहीं रुकेगा’’ आपका अगला नाटक ही, रवि और मर्यादा के रक्षकों को जवाब होेगा,  रही बात मेरे जाने की तो मुझे तो वैसे  भी जाना था एक नये शहर में एक और संगठन का बीज बोने  मुझे फिर एक राकेश और माथुर जी को तलाशना है . इसलिए मैं दूसरे पड़ाव पर जा रही हूँ  । अलविदा दोस्तो
आपकी दोस्त – शालिनी…….
 पूरी चिट्ठी पढ़ने के बाद मै देर तक पत्थर का बुत बना बैठा रह गया था जैसे मेरे हाथ-पैरों को काठ मार गया था.  इस चिट्ठी में शालिनी की वही आंखें अब भी मैं देखता हूं और माथुर जी के घर पहुंच जाता हूं जहां पूरा यूनिट मेरा इन्तजार कर रहा होता है.

मस्सा ( जापानी कहानी )

सुशांत सुप्रिय


सुशांत सुप्रिय कथाकार, कवि और अनुवादक हैं.  दो कथा-संग्रह ‘हत्यारे’ (२०१०) तथा ‘हे राम’ (२०१२) और एक काव्य-संग्रह ‘ एक बूँद यह भी ‘ ( 2014) प्रकाशित । अनुवाद की एक पुस्तक ‘ विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ ‘ प्रकाशनाधीन  ।संपर्क: 09868511282 / 08512070086

— मूल कहानी : यासुनारी कावाबाटा
— अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


कल रात मुझे उस मस्से के बारे में सपना आया  ‘ मस्सा ‘ शब्द के ज़िक्र मात्र से तुम मेरा मतलब समझ गए होगे. कितनी बार तुमने उस मस्से की वजह से मुझे डाँटा है . वह मेरे दाएँ कंधे पर है या यूँ कहें कि मेरी पीठ पर ऊपर की ओर है. ” इसका आकार बड़ा होता जा रहा है और खेलो इससे  जल्दी ही इसमें से अंकुर निकलने लगेंगे” तुम मुझे यह कह कर छेड़ते , लेकिन जैसा तुम कहते थे , वह एक बड़े आकार का मस्सा था , गोल और उभरा हुआ . बचपन में मैं बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपने इस मस्से से खेलती रहती .जब पहली बार तुमने इसे देखा तो मुझे कितनी शर्मिंदगी महसूस हुई थी .मैं रोई भी थी और मुझे तुम्हारा हैरान होना याद है . ” उसे मत छुओ तुम उसे जितना छुओगी , वह उतना ही बड़ा होता जाएगा ” मेरी माँ भी मुझे इसी वजह से अक्सर डाँटती थी . मैं अभी छोटी ही थी ,शायद तेरह की भी नहीं हुई थी . बाद में मैं अकेले में ही अपने मस्से को छूती थी . यह आदत बनी रही , हालाँकि मैं जान-बूझकर ऐसा नहीं करती थी. जब तुमने पहली बार इस पर ग़ौर किया तब भी मैं छोटी ही थी , हालाँकि मैं तुम्हारी पत्नी बन चुकी थी. पता नहीं तुम , एक पुरुष , कभी यह समझ पाओगे कि मैं इसके लिए कितना शर्मिंदा थी , लेकिन दरअसल यह शर्मिंदगी से भी कुछ अधिक था . यह डरावना है — मैं सोचती. असल में मुझे तब शादी भी एक डरावनी चीज़ लगती ।

मुझे लगा था जैसे तुमने मेरे रहस्यों की सभी परतें एक-एक करके उधेड़ दी हैं — वे रहस्य , जिनसे मैं भी
अनभिज्ञ थी और अब मेरे पास कोई शरणस्थली नहीं बची थी .तुम आराम से सो गए थे . हालाँकि मैंने कुछ राहत महसूस की थी , लेकिन वहाँ एक अकेलापन भी था. कभी-कभी मैं चौंक उठती और मेरा हाथ अपने-आप ही मस्से तक पहुँच जाता. ” अब तो मैं अपने मस्से को छू भी नहीं पाती ” मैंने इस के बारे में अपनी माँ को पत्र लिखना चाहा , लेकिन इसके ख़्याल मात्र से मेरा चेहरा लाल हो जाता ” मस्से के बारे में बेकार में क्यों चिंतित रहती हो ? ” तुमने एक बार कहा था . मैं मुस्करा दी थी , लेकिन अब मुड़ कर देखती हूँ , तो लगता है कि काश , तुम भी मेरी आदत से ज़रा प्यार कर पाते . मैं मस्से को लेकर इतनी फ़िक्रमंद नहीं थी .ज़ाहिर है , लोग महिलाओं की गर्दन के नीचे छिपे मस्से को नहीं ढूँढ़ते फिरते. और चाहे मस्सा बड़े आकार का क्यों न हो , उसे विकृति नहीं माना जा सकता तुम्हें क्या लगता है , मुझे अपने मस्से से खेलने की आदत क्यों पड़ गई ? और मेरी इस आदत से तुम इतना चिढ़ते क्यों थे ? ” बंद करो ,” तुम कहते , ” अपने मस्से से खेलना बंद करो. ” तुमने मुझे न जाने कितनी बार इसके लिए झिड़का . ” तुम अपना बायाँ हाथ ही इसके लिए इस्तेमाल क्यों करती हो ? ” एक बार तुमने चिढ़ कर ग़ुस्से में पूछा था.

” बायाँ हाथ ? ” मैं इस सवाल से चौंक गई थी . यह सच था , मैंने इस पर कभी ग़ौर नहीं किया था , लेकिन मैं अपने मस्से को छूने के लिए हमेशा अपना बायाँ हाथ ही इस्तेमाल करती थी .” मस्सा तुम्हारे दाएँ कंधे पर है. तुम उसे अपने दाएँ हाथ से आसानी से छू सकती हो ” अच्छा ?  मैंने अपना दायाँ हाथ उठाया. लेकिन यह अजीब है.  ” यह बिलकुल अजीब नहीं है ” लेकिन मुझे अपने बाएँ हाथ से मस्सा छूना ज़्यादा स्वाभाविक लगता था  ” दायाँ हाथ उसके ज़्यादा क़रीब है.  ” दाहिने हाथ से मुझे पीछे जा कर मस्से को छूना पड़ता है ”
” पीछे ? ” “हाँ.  मुझे गर्दन के सामने बाँह लाने या बाँह इस तरह पीछे करने में से किसी एक को चुनना होता है”
अब मैं चुपचाप विनम्रता से तुम्हारी हर बात पर हाँ में हाँ नहीं मिला रही थी  हालाँकि तुम्हारी बात का जवाब देते-देते मेरे ज़हन में आया कि जब मैं अपना बायाँ हाथ अपने आगे लाई , तो ऐसा लगा जैसे मैं तुम्हें परे हटा रही थी , जैसे मैं खुद को आलिंगन में ले रही थी मैं उसके साथ क्रूर व्यवहार कर रही हूँ , मैंने सोचा . मैंने धीमे स्वर में पूछा , ” लेकिन इसके लिए बायाँ हाथ इस्तेमाल करना ग़लत क्यों है ? ”
” चाहे बायाँ हाथ हो या दायाँ , यह एक बुरी आदत है । ”
” मुझे पता है. ”

” क्या मैंने तुम्हें कई बार यह नहीं कहा कि तुम किसी डॉक्टर के पास जा कर इस चीज़ को हटवा लो ? ”
” लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी मुझे ऐसा करने में शर्म आएगी.”  ” यह तो एक मामूली बात है . ”
” अपना मस्सा हटवाने के लिए कौन किसी डॉक्टर के पास जाता है ? ”
” बहुत से लोग जाते होंगे .”
” चेहरे के बीच में उगे मस्से के लिए जाते होंगे , लेकिन मुझे संदेह है कि कोई अपनी गर्दन के नीचे उगे मस्से को हटवाने के लिए किसी डॉक्टर के पास जाएगा .डॉक्टर हँसेगा. उसे पता लग जाएगा कि मैं उसके पास इसलिए आई हूँ , क्योंकि मेरे पति को वह मस्सा पसंद नहीं है. ”
” तुम डॉक्टर को बता सकती हो कि तुम उस मस्से को इसलिए हटवाना चाहती हो , क्योंकि तुम्हें उससे खेल के बुरी आदत है ” मैं उसे नहीं हटवाना चाहती ”
” तुम बहुत अड़ियल हो । मैं कुछ भी कहूँ , तुम खुद को बदलने की कोई कोशिश नहीं करती . ”
” मैं कोशिश करती हूँ . मैंने कई बार ऊँचे कॉलर वाली पोशाक भी पहनी ताकि मैं उसे न छू सकूँ .”
” तुम्हारी ऐसी कोशिश ज़्यादा दिन नहीं चलती . ”

” लेकिन मेरा अपने मस्से को छूना क्या इतना ग़लत है ? ” उन्हें ज़रूर लग रहा होगा कि मैं उनसे बहस कर रही हूँ . ” वह ग़लत नहीं भी हो सकता , लेकिन मैं तुम्हें इसलिए मना करता हूँ , क्योंकि मुझे तुम्हारा ऐसा करना पसंद नहीं .”
” लेकिन तुम इसे नापसंद क्यों करते हो ? ”
” इसका कारण जानने की कोई ज़रूरत नहीं असल बात यह है कि तुम्हें उस मस्से से नहीं खेलना चाहिए  यह एक बुरी आदत है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम ऐसा करना बंद कर दो. ”
” मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ऐसा करना बंद नहीं करूँगी ”
” और जब तुम उसे छूती हो , तो तुम्हारे चेहरे पर वह अजीब खोया-सा भाव आ जाता है और मुझे उससे वाकई नफ़रत है ” शायद तुम ठीक कह रहे हो — कुछ ऐसा था कि तुम्हारी बात सीधे मेरे दिल में उतर गई और मैं सहमति में सिर हिलाना चाहती थी .” अगली बार जब तुम मुझे ऐसा करते देखो , तो मेरा हाथ पकड़
लेना  मेरे चेहरे पर हल्की चपत लगा देना ”

 ” लेकिन क्या तुम्हें यह बात परेशान नहीं करती कि पिछले दो-तीन सालों से कोशिश करने के बाद भी तुम    अपनी इतनी मामूली-सी आदत भी नहीं बदल सकी हो ? ” मैंने कोई जवाब नहीं दिया  मैं तुम्हारे शब्दों ‘ मुझे उससे वाकई नफ़रत है ‘ के बारे में सोच रही थी. मेरे गले के आगे से मेरी पीठ की ओर जाता हुआ मेरा बायाँ
हाथ –यह अदा ज़रूर कुछ उदास और खोई-सी लगती होगी . हालाँकि मैं इसके लिए ‘ एकाकी ‘ जैसा कोई शब्द इस्तेमाल करने से हिचकूँगी. दीन-हीन और तुच्छ — केवल खुद को बचाने में लीन एक महिला की भंगिमा और मेरे चेहरे का भाव बिल्कुल वैसा ही लगता होगा जैसा तुमने बताया था — ‘ अजीब , खोया-सा ‘
क्या यह इस बात की एक निशानी थी कि मैंने खुद को पूरी तरह तुम्हें समर्पित नहीं कर दिया था , जैसे हमारे बीच अब भी कोई जगह बची हुई थी और क्या मेरे सच्चे भाव तब मेरे चेहरे पर आ जाते थे , जब मैं अपने मस्से को छूती थी और उससे खेलते समय दिवास्वप्न में लीन हो जाती थी , जैसा कि मैं बचपन से करती आई थी ?
लेकिन यह इसलिए होता होगा , क्योंकि तुम पहले से ही मुझसे असंतुष्ट थे , तभी तो तुम उस छोटी-सी आदत को इतना तूल देते थे. यदि तुम मुझसे खुश रहे होते , तुम मुस्कुरा देते और मेरी उस आदत के बारे में ज़्यादा सोचते ही नहीं

 वह एक डरावनी सोच थी. तब मैं काँपने लगती , जब अचानक मुझे यह ख़्याल आता कि कुछ ऐसे मर्द भी होंगे , जिन्हें मेरी यह आदत मोहक लगती होगी. यह मेरे प्रति तुम्हारा प्यार ही रहा होगा जिसकी वजह से तुमने इस ओर पहली बार ध्यान दिया होगा, मुझे इसमें कोई संदेह नहीं , लेकिन यह ठीक उन छोटी-मोटी खिझाने वाली चीज़ों की तरह होता है , जो बाद में बढ़कर विकृत हो जाती हैं और वैवाहिक सम्बन्धों में अपनी जड़ें फैला लेती हैं वास्तविक पति और पत्नी के बीच इन व्यक्तिगत सनकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किंतु मुझे लगता है कि दूसरी ओर ऐसे पति और पत्नी भी होते हैं , जो हर बात पर खुद को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ पाते हैं. मैं यह नहीं कहती कि वे दम्पति , जो आपस में समझौता करके चलते हैं , एक-दूसरे से प्यार ही करते हों, न ही ऐसा है कि जिनकी राय एक-दूसरे से भिन्न होती है , वे दम्पति एक-दूसरे से घृणा ही करते हों  हालाँकि मैं यह ज़रूर सोचती हूँ ( और यह सोचने से खुद को रोक नहीं पाती हूँ ) कि यह बेहतर होता , यदि तुम मस्से से खेलने की मेरी आदत की अनदेखी कर पाते.  असल में तुम मुझे पीटने और ठोकरें मारने पर उतारू हो गए. मैं रोई और मैंने तुमसे पूछा कि तुम इतने हिंसक क्यों हो गए हो ? केवल अपना मस्सा छूने भर की मुझे ऐसी सज़ा क्यों मिले ? अपनी त्वचा ही तो छू रही थी मैं.

 ” तुम्हारे इस रोग का उपचार क्या है ? ” ग़ुस्से से काँपती हुई आवाज़ में तुमने पूछा था.  मैं समझ गई कि तुम कैसा महसूस कर रहे थे.तुमने जो किया था , उस बारे में मेरी नाराज़गी भी जाती रही. यदि मैंने किसी और को इस के बारे में बताया होता तो वे तुम्हें हिंसक पति कहते , लेकिन चूँकि हमारे सम्बन्ध एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच गए थे जहाँ कोई मामूली बात भी हमारे बीच तनाव बढ़ा देती थी , जब तुमने मुझ पर हाथ उठाया , तो उसने असल में मुझे अचानक जैसे मुक्ति दे दी , छुटकारा दे दिया. ” मैं इस आदत को कभी नहीं छोड़ पाऊँगी , कभी नहीं.  मेरे हाथ बाँध दो. ” मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ कर तुम्हारी छाती की ओर बढ़ा दिए. गोया मैं खुद को पूरी तरह से तुम्हारे हवाले कर रही थी . तुम चकरा गए । तुम्हारे ग़ुस्से ने तुम्हें शिथिल बना दिया था , मनोभावों से रिक्त कर दिया था । तुमने मेरी कमरबंद में से डोरी ले कर उससे मेरे हाथ बाँध दिए. मैं अपने बँधे हुए हाथों से अपने बालों को सँवारने की कोशिश करने लगी और मुझे ख़ुशी हुई , जब मैंने तुम्हें अपनी ओर ताकते हुए देखा .मैंने सोचा कि इस बार मेरी यह आदत छूट ही जाएगी.  हालाँकि तब भी उस मस्से का हल्का-सा स्पर्श भी किसी के लिए ख़तरनाक था.

क्या मेरी मस्सा छूने की आदत दोबारा लौट आने की वजह से ही अंत में मेरे प्रति तुम्हारा बचा-खुचा स्नेह भी ख़त्म हो गया ? क्या तुम मुझे यह बताना चाहते थे कि तुम्हें अब मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी और मैं जो चाहे कर सकती थी ? अब जब मैं अपने मस्से से खेलती , तुम ऐसा बहाना बनाते जैसे तुमने यह सब देखा नहीं तुम कुछ नहीं कहते. फिर एक अजीब बात हुई.  मेरी वह आदत , जो डाँटने और मारने से भी नहीं गई , एक दिन अपने-आप छूट गई .डराने-धमकाने वाला कोई भी इलाज काम नहीं आया . वह आदत खुद-ब-खुद चली गई.
” क्या तुम जानते हो , अब मैं अपने मस्से से नहीं खेलती हूँ .” मैंने कहा जैसे मुझे इसके बारे में अभी पता चला हो. तुम घुरघुराए और तुमने अपना हाव-भाव ऐसा बनाया जैसे तुम्हें इस बात की कोई परवाह न हो.
यदि तुम्हारे लिए इस बात की कोई अहमियत नहीं थी , तो फिर तुम मुझे इसके लिए डाँटते क्यों थे ? मैं चाहती थी कि तुम मुझसे इसके बारे में पूछो , लेकिन तुम थे कि मुझसे बात ही नहीं कर रहे थे. जैसे मस्सा छूने की मेरी आदत की तुम्हें कोई परवाह न हो , जैसे मैं जो चाहूँ करने के लिए स्वतंत्र हूँ — तुम्हारे चेहरे के हाव-भाव से तो यही लगता था. मैंने खुद को निरुत्साही और उदास महसूस किया. तुम्हें चिढ़ाने के लिए ही सही , मैं अपने मस्से को तुम्हारे सामने दोबारा छूना चाहती थी , लेकिन अजीब बात यह हुई कि मेरे हाथों ने हिलने से इंकार कर दिया

मैंने खुद को अकेला महसूस किया  और मुझे ग़ुस्सा आया . जब तुम आस-पास नहीं थे , तब भी मैंने अपने मस्से को छूने के बारे में सोचा , लेकिन न जाने क्यों यह मुझे शर्मनाक और घृणास्पद लगा और एक बार फिर मेरे हाथों ने हिलने से इंकार कर दिया.  मैंने फ़र्श की ओर देखा और अपने दाँतों से अपना होठ काटने लगी .
” तुम्हारे मस्से को क्या हुआ ? ” मैं प्रतीक्षा करती रही कि तुम मुझसे यह पूछोगे , लेकिन इसके बाद तो हमारी आपसी बातचीत से ‘ मस्सा ‘ शब्द ही ग़ायब हो गया और शायद इसके साथ ही हमारे बीच कई और चीज़ें भी ग़ायब हो गईं. जब तुम मुझे डाँटा करते थे , उन दिनों मैं कुछ क्यों नहीं कर सकी ? मैं कितनी बेकार औरत हूँ. फिर मैं अपने मायके लौटी.  उन्हीं दिनों जब मैं एक बार माँ के साथ स्नान कर रही थी , तो वह बोली , ” अब तुम उतनी सुंदर नहीं रही जितनी पहले थी , सायोको ! शायद तुम बढ़ती उम्र को बेअसर नहीं कर सकती . ” मैंने चौंक कर माँ की ओर देखा. वे अब भी पहले जैसी ही दिखती थीं — गोल-मटोल , किंतु चमकीली त्वचा वाली
” और तुम्हारा वह मस्सा पहले बेहद आकर्षक हुआ करता था. ” उस मस्से की वजह से मुझे वाकई तकलीफ़ सहनी पड़ी थी — किंतु मैं अपनी माँ से यह नहीं कह सकती थी. मैंने कहा — ” लोग कहते हैं कि शल्य-चिकित्सक आसानी से मस्से को हटा सकता है. ”

 ” अच्छा ? डॉक्टर ! लेकिन दाग़ तो रह ही जाएगा . ” मेरी माँ कितनी शांत और स्वाभाविक प्रकृति की थी. ” हम तुम्हारे मस्से के बारे में बातें करके हँसा करते थे. हम कहते कि शादी के बाद भी सायोको अपने मस्से से खेलती होगी. ”
” हाँ , मैं उससे खेलती थी. ”
” हाँ , हमें लगता था कि तुम यह करती होगी. ”
” यह एक बुरी आदत थी । मैंने अपने मस्से से खेलना कब शुरू किया होगा ? ”
” पता नहीं , बच्चों की देह में मस्सा कब से दिखने लगता है ? नवजात शिशुओं के तो मस्सा नहीं होता. ”
” मेरे बच्चों की देह पर कोई मस्सा नहीं. ”
” अच्छा ? लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं , वे नज़र आने लगते हैं. और फिर वे ग़ायब नहीं होते , लेकिन तुम्हारी गर्दन के आकार का मस्सा आम तौर पर नहीं होता. जब तुम बहुत छोटी होगी , यह मस्सा तभी से वहाँ होगा. ” मेरी माँ मेरी गर्दन और कंधे की ओर देख कर हँसी.

मुझे याद आया, जब मैं छोटी थी, तो मेरी माँ और मेरी बहनें कभी-कभार उस मस्से को छूती थीं. वह मस्सा तब बेहद मोहक लगता था. क्या यही वह वजह नहीं थी, जिसके कारण मुझे भी उस मस्से से खेलने की आदत पड़ गई ? मैं बिस्तर पर लेटे हुए अपने मस्से से खेलती रही. मैं याद करने की कोशिश करती रही कि जब मैं बच्ची थी , क्या तब भी मैं इस मस्से से खेलती थी. यह बहुत समय पहले की बात थी , जब मैं पिछली बार अपने मस्से से खेली थी. पता नहीं कितने साल पहले की बात थी. तुमसे दूर अपने मायके के उस घर में जहाँ मेरा जन्म हुआ था , मैं अपने मस्से के साथ जैसे चाहे खेल सकती थी. यहाँ मुझे रोकने वाला कोई नहीं था. किंतु यह भी सुखकर नहीं लगा. जैसे ही मेरी उँगली ने उस मस्से को छुआ , मेरी आँखों में आँसू आ गए.  मैं बरसों पहले की बात सोचना चाहती थी , जब मैं छोटी थी , लेकिन जब मैंने मस्से को छुआ , तो मुझे केवल तुम याद आए.  मुझे एक बुरी पत्नी के रूप में धिक्कारा गया है  और शायद मुझे तलाक़ भी दे दिया जाएगा , किंतु यह तो मैंने भी नहीं सोचा था कि यहाँ मायके में बिस्तर पर लेटे हुए मुझे केवल तुम्हारा ही ख़्याल आएगा  मैंने अपने गीले तकिये पर करवट बदली । मुझे झपकी आ गई और मुझे सपना भी उसी मस्से का आया ।

जब मैं जगी , तो मैं नहीं बता सकती थी कि वह कमरा कहाँ का था, लेकिन तुम वहाँ मौजूद थे. सम्भवत: हमारे साथ कोई और महिला भी थी. मैं शराब पी रही थी. यक़ीनन मैं नशे में थी. मैं न जाने किस चीज़ के लिए तुमसे निवेदन कर रही थी. मेरी बुरी आदत फिर उभर कर सामने आ गई.  मैंने मस्से को छूने के लिए अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाया. हमेशा की तरह मेरी बाँह मेरी छाती के आगे से हो कर पीछे की ओर जा रही थी , लेकिन छूते ही मस्से को क्या हो गया ? क्या वह मेरी त्वचा पर से निकल कर मेरी उँगलियों में नहीं आ गया ? बिना किसी दर्द के वह त्वचा पर से ऐसे निकल आया जैसे यह दुनिया की सबसे स्वाभाविक बात हो.  मेरी उँगलियों में वह मस्सा ठीक किसी भुनी हुई हुई सेम-फली के छिलके-सा लगा.  किसी बिगड़ैल बच्ची की तरह मैंने तुमसे ज़िद की कि तुम मेरे उस मस्से को अपनी नाक के बगल में मौजूद अपने मस्से के पास वाले हल्के से गड्ढे में डाल
लो.  मैंने अपनी उँगलियों में पकड़े उस मस्से को तुम्हारी ओर धकेला ! मैं हाथ-पैर पटक कर चिल्लाई । मैंने तुम्हारी क़मीज़ की आस्तीन पकड़ ली और तुम्हारी छाती से लटक गई ..जब मेरी नींद खुली , मेरा तकिया तब भी गीला था. मैं अब भी रो रही थी.  हालाँकि मैं बेहद थकान महसूस कर रही थी , मुझे ऐसा भी लगा जैसे मैं हल्की हो गई हूँ , जैसे एक भारी बोझ मेरे सिर पर से उतर गया है.

कुछ देर तक मैं मुस्कराते हुए लेटी रही , यह सोचते हुए कि क्या मेरा मस्सा वाकई ग़ायब हो गया था. उसे छूने में भी मुझे मुश्किल हो रही थी. मेरे मस्से की पूरी कहानी बस यही है.  मैं अब भी उसे अपनी उँगलियाँ के बीच किसी बड़े काले दाने-सा महसूस कर सकती हूँ. तुम्हारी नाक के बगल में उगे उस छोटे-से मस्से के बारे में मैंने तो कभी ज़्यादा नहीं सोचा.  न ही मैंने उसके बारे में कभी बात ही की . फिर भी मुझे लगता है कि तुम्हारा वह मस्सा मेरे अवचेतन में हमेशा रहा है. यह कितनी बढ़िया परी-कथा बन जाएगी, यदि तुम्हारा वह मस्सा इसलिए वाकई सूज जाए, क्योंकि तुमने उसके ऊपर मेरा मस्सा रख लिया हो, और इस बात से मैं कितनी खुश हो जाऊँगी यदि मुझे पता चले कि तुम्हें मेरे मस्से के बारे में सपना आया था .एक बात मैं भूल ही गई. ” यही वह चीज़ है जिससे मुझे नफ़रत है ” तुम कहते थे.  मैं इसके बारे में इतनी अच्छी तरह जानती थी कि मुझे लगता जैसे तुम्हारा यह उद्गार मेरे प्रति तुम्हारे स्नेह का सूचक है. मुझे भी लगने लगता कि जब मैं अपने मस्से को उँगलियों से छू रही होती, तो मेरे भीतर की सारी घटिया चीज़ें जैसे बाहर आ जातीं. लेकिन मुझे लगता है कि क्या वह एक तथ्य , जिसका ज़िक्र मैंने पहले भी किया है, मुझे पुनः प्रतिष्ठित नहीं कर देता ? शायद मेरी माँ और बहनें मेरे बचपन में जिस तरह से मेरे मस्से को पुचकारती थीं , यही वह वजह थी जिसके कारण मुझे अपने मस्से को छूने की आदत पड़ गई होगी.

 ” मुझे लगता है, बचपन में जब मैं अपने मस्से से खेलती थी, तो तुम मुझे डाँटती थी, ” मैंने माँ से कहा.
” हाँ , लेकिन यह केवल बचपन की ही बात नहीं है. ”
” तुम मुझे क्यों डाँटती थी , माँ ? ”
” क्यों ? क्योंकि यह एक बुरी आदत थी , इसलिए. ”
” लेकिन जब तुम मुझे अपने मस्से से खेलते हुए देखती थी, तो कैसा महसूस करती थी ? ”
” देखो …” माँ अपना सिर एक ओर झुका कर बोली, ” मुझे अच्छा नहीं लगता था. वह शोभनीय नहीं था. ”
” सही कहा, लेकिन मेरे ऐसा करने पर क्या तुम्हें मेरे प्रति अफ़सोस होता था ? या तुम यह सोचती थी कि मैं घृणित कार्य करने वाली एक गंदी लड़की थी ? ”
” इसके बारे में मैंने कभी ज़्यादा नहीं सोचा. तुम्हारे चेहरे का उनींदा भाव देख कर मुझे लगता था कि तुम अपने मस्से से न खेलो तो अच्छा है. ”
” क्या तुम मेरी इस हरकत से चिढ़ती थी ? ”
” हाँ , मुझे थोड़ी फ़िक्र होती थी. ”

यदि यह सच है, तो क्या मेरा खोए हुए अंदाज़ में अपने मस्से को सहलाना बचपन में मेरे प्रति मेरी माँ और बहनों के प्यार को याद करने का मेरा एक तरीका नहीं था? जिन लोगों से मैं प्यार करती थी , क्या मैं उनके बारे में सोचते हुए ऐसा नहीं कर रही थी ? यही वह बात है जो मुझे तुमसे ज़रूर कहनी है. क्या मेरे मस्से के बारे में तुम्हारी धारणा शुरू से अंत तक ग़लत नहीं थी ? जब मैं तुम्हारे साथ होती थी, तो क्या मैं किसी और के बारे में सोच सकती थी ? बार-बार मैं सोचती हूँ कि मेरी जिस हरकत से तुम्हें इतनी चिढ़ है क्या वह मेरे उस प्यार के इज़हार का एक तरीका नहीं था, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती थी.  मस्से से खेलने की मेरी आदत तो एक बेहद मामूली बात थी , और मैं इसके बचाव में कोई बहाना नहीं बना रही , लेकिन तुम्हारी निगाहों में मुझे एक बुरी पत्नी बना देने वाली वे सभी चीज़ें भी क्या इसी तरह शुरू नहीं हुई थीं ? क्या ऐसा नहीं था कि शुरू-शुरू में वे सब भी तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की सूचक ही थीं , जो तुम्हारे लिए बाद में इसलिए अशोभनीय हो गईं , क्योंकि तुमने उनकी सच्चाई को स्वीकार करने से इनकार कर दिया ? अब जब मैं यह सब लिख रही हूँ, तो क्या अपने साथ हुए अन्याय की बात करके मैं एक बुरी पत्नी जैसा व्यवहार कर रही हूँ ? जो भी हो , ये कुछ बातें हैं , जो तुम्हें बतानी ज़रूरी हैं.

पलाश दहकने का मौसम

वन्दना गुप्ता  

कवयित्री, कहानीकार. एक कहानी संग्रह और एक काव्य संग्रह प्रकाशित. एक उपन्यास ‘अंधेरे का मध्य बिंदु’ प्रकाशित. संपर्क :rosered8flower@gmail.com

उपन्यास ‘ अँधेरे का मध्यबिंदु’ का एक अंश


सुबह के धुँधलके में रवि मन में ढेरो उठापटक लिए गाड़ी में बैठ चल पड़ा अपने घर की ओर. उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर से आगे अनूपशहर नाम की जगह जिसे गाँव और शहर के बीच की स्थिति में स्थित एक विकासशील कसबे के रूप में जाना जा सकता है. जिसके नाम के साथ तो शहर लगा था मगर उसका बुनियादी ढर्रा आज भी वही था जो आज से पच्चीस साल पहले था. वही अपनी लकीर पर कायम बेशक बदलाव की बयारें वहाँ भी पहुँच रही थीं मगर असर कम ही दिखाई देता था. बुलंदशहर से अनूपशहर के बीच का रास्ता आज भी वैसा ही था, जाने वाला जब तक उछले न तो उसे लगे कैसे कि वह अपना गाँव पहुँच गया. सड़क नयी बनाने के बावजूद गड्ढे और स्पीड ब्रेकर बचपन की याद ताजा कर देते हैं, जब कच्चे-पक्के रास्ते थे और ऐसे ही उछलते हुए घर पहुँचा करते थे, कुछ भी तो नहीं बदला आज भी धचके खाते उछलते हुए चार घंटे में रवि ये सब सोचता अपने गाँव की सीमा में पहुँच गया जहाँ अन्दर घुसते ही बाजार से सामना होता था. हर तरह के सामान से लबरेज बाजार तो दूसरी तरफ आढ़त का चैक. एक चहल-पहल से भरे बाजार से जैसे ही गली में घुसो तो पतली-पतली सँकरी गलियाँ स्वागत में खड़ी मिलतीं. कुछ दूर पर एक चैक पर रवि ने अपनी गाड़ी साइड में खड़ी कर दी और पैदल घर की ओर चल दिया तो रास्ते में कोई न कोई मिलता गया.

अरे, रवि भैया आ गए, रवि भैया आ गए का शोर मचाती सुमन चाची की बेटी ने घर की ओर दौड़ लगा दी तो रास्ते में ही रवि को अपना पुराना दोस्त मिल गया.
‘‘अरे रवि, कब आये?’’
‘‘बस आ ही रहा हूँ, तू बता कैसा है शेखर.’’
‘‘मजे में हूँ.’’
‘‘क्या कर रहा है आजकल?’’ साथ-साथ चलते हुए रवि ने पूछा.
‘‘हमने क्या करना है भाई, वही पिताजी की दुकान है न वहीं बैठते हैं’’, अब एक फीकी-सी मुस्कान के साथ शेखर ने जवाब दिया.
‘‘क्यों तू तो नौकरी करने की कह रहा था तो क्या हुआ’’ आश्चर्य में पड़ा रवि बोल उठा.
‘‘अरे भैया, नौकरी आसानी से मिलती कहाँ है और फिर जो मिल रही थीं तो उनमें तो अपना खर्चा ही पूरा नहीं पड़ रहा था…शहर के खर्चों से तू वाकिफ है ही इसलिए सोचा कि जब इतना ही कमाना है तो बाप की दुकान क्या बुरी है इसलिए वापसी की टिकट कटा ली’’, मुस्कुराते हुए शेखर ने कहा.
‘‘और शादी तो हो गयी तेरी…कैसी गुजर रही है।’’
‘‘हाँ भाई, बंध गयी गले में घंटी लेकिन एक शिकायत है तू आया नहीं?’’

‘‘क्या करता उस वक्त मैं बंगलौर गया हुआ था कंपनी के काम से तो बता कैसे आता…चल शिकवा मत कर अभी चलता हूँ और घर आकर मिलता हूँ भाभी से, तब कर लेना जितनी चाहे शिकायतें…अच्छा शेखर मिलता हूँ फिर’’, कह रवि आगे चल दिया क्योंकि सोच के बिखरे बादल उसके अंतस में हलचल मचाये थे तो उसका ध्यान बातों में कम और अपनी समस्या पर ज्यादा था. दिल-दिमाग में उथल-पुथल हो तो सामने से आता हाथी भी दिखाई नहीं देता और रवि अपनी ही धुन में आगे बढ़ रहा था कि तभी आगे से आती सीमा आंटी दिखाई दी मगर रवि अपने ही ख़्यालों में गुम था तो उन्हें देख नहीं पाया, ये देख सीमा ने खुद ही कहा, ‘‘ओह हो! लल्ला जी अब बड़े हो गए तो आंटी को भी भूल गए?’’
अचकचाकर जैसे ही रवि ने देखा तो अपनी भूल का उसे अहसास हुआ और एकदम आंटी के पैर छूते हुए बोला, ‘‘अरे नहीं आंटी, आपको भी भला कोई भुला सकता है. आप तो मेरी सबसे समझदार और पसंदीदा आंटी हो. एक आप ही तो हो जिन्हें मैं सबसे ज्यादा सम्मान देता हूँ क्योंकि आपकी सोच बाकियों की तरह नहीं है फिर कैसे हो सकता है कि आपको भूल जाऊँ’’ मक्खन लगाते हुए रवि ने जवाब दिया.

‘‘कहाँ रहते हो आजकल जो हम सबकी याद ही नहीं आती तुम्हें’’ मुस्कुराते हुए सीमा ने कहा. ‘‘आंटी आप तो जानती ही हैं शहर की लाइफ कैसी होती है उस पर कंपनी को तो काम चाहिए वह भी अपनी डेडलाइन तक यदि समय पर काम करके न दो तो बाहर का रास्ता हमेशा खुला होता है. एक मशीन बन जाता है जीवन…खुद के लिए ही समय कहाँ मिल पाता है। कोई छुट्टी हो तभी आना होता है और अब जैसे ही समय मिला मिलने चला आया’’ सफाई सी देता हुआ रवि बोला. ‘‘चलो, तुम कहते हो तो मान लेती हूँ…अभी आये हो, जाओ घर जाकर आराम कर लो बाद में मिलती हूँ, कह सीमा चली गयी तो रवि आगे बढ़ा। अपने गाँव की गलियों में तो आँख मीचकर भी चला जाए तो भी अपने घर इंसान पहुँच जाता है मगर यहाँ की हवा और यहाँ की मिट्टी की खुशबू वह खुद में बसाता हुआ चल रहा था और सोच रहा था, ‘आज भी कुछ नहीं बदला यहाँ, वही कच्ची नालियाँ और उनमें बहती गंदगी है यहाँ, जाने कब सरकार सुध लेगी और यहाँ की दशा सुधरेगी. ढाँचों तक में कोई परिवर्तन नहीं आया और जो आये भी हैं तो इतने मामूली हैं, बदलाव महसूस ही नहीं होता.

क्योंकि अनूपशहर में गंगा मैया ने अपना डेरा लगाया हुआ था तो पवित्रपुरी के नाम से भी जाना जाता था और फिर रवि तो इतने दिनों बाद यहाँ आया था घर पहुँचने से पहले गंगा मैया के दर्शन करने पहुँच गया. गंगा की गोद तो किसी माँ की गोद से कम नहीं होती, वहाँ दूर तक बहती गंगा और ऊपर नीला आसमान जैसे अपने अक्स को गंगा के निर्मल जल में देख रहा हो, ठंडी बहती हवा ने उसके तन-मन को कुछ देर के लिए हर चिंता से मुक्त कर दिया और वह जूते उतार कर कुछ देर गंगा जी में खड़ा हो गया, जल के निर्मल शीतल स्पर्श से जैसे उसकी सारी शारीरिक और मानसिक थकान उतर गयी और वह वहाँ अविचल जाने कितनी देर खड़ा रहता कि अचानक से पीछे से आकर किसी ने उसकी आँखें बंद कर दीं और वह खुद का संतुलन बनाते हुए सोचने लगा आख़िर ये है कौन जो इस अधिकार से मेरी आँखें बंद कर सके तभी एक कच्ची सी, भीनी-सी गंध उसके नथुनों से जा टकराई जिससे वह अच्छी तरह वाकिफ था, जिसके लिए वह उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़ता था, वही गंध उसे मतवाला बना देती थी और ख़्यालों में एक साँवला-सलोना अक्स उभरा, चेहरे का मुख्य आकर्षण चंचल आँखें और भरे लाल होंठ, गालों को चूमती बालों की एक लट हमेशा झूलती रहती, उस पर साँवला रंग उसके आकर्षण को ड्योढ़ा कर देता था,

याद आते ही उसका हाथ आँखों से हटा खिलखिलाते हुए रवि बोल उठा, ‘‘नहीं मानेगी न संध्या की बच्ची, तेरी शरारतें अब तक कम नहीं हुईं.’’ इठलाते हुए संध्या भी बोल पड़ी, ‘‘कैसे हो सकती हैं, शहरी बाबू तू बना है हम नहीं, हम तो आज भी वही हैं तेरी राह में दिल थाम के खड़ी हैं’’, छाती पर हाथ रख, मुख पर बेचारगी का भाव ला गहरी ऊँसाँस लेते हुए संध्या ने जवाब दिया. ‘‘हो गयी न वही तेरी बेकार की बातें शुरू’’, कहते हुए झुँझलाहट रवि के चेहरे पर उभर आई. ‘‘अरे काहे नाराज होते हो, ऐसा क्या कह दिया मैंने, जब दिल का सौदा किया तब तो निर्माेही कुछ न बोला और आज इस तरह नाराज हो रहे हो जैसे हमने कोई गुनाह कर दिया“ रुआँसी हो संध्या ने कहा. ‘‘हे, पागल हो गयी है क्या? कैसी बातें कर रही है संध्या? बता-बता कब तुझसे ऐसी कोई बात कही है, बेमतलब गले पड़ रही है. अकेला खाता कमाता लड़का देख तेरी भी राल टपक रही है मुझे तो ऐसा ही लगता है’’ रवि ने भी अब दिल्लगी करने की सोच ही ली. ‘‘अरे जा जा, तुझसे तो जाने कितने संध्या की ड्योढ़ी पर रोज पानी भरते हैं…ये तो संध्या ही किसी को भाव नहीं देती सिर्फ तेरे लिए…तुझे दिल दे दिया न…अब बता दूसरा दिल कहाँ से लाऊँ’’ दिल पर हाथ रख गहरी साँस लेती संध्या ने कहा तो रवि कौन-सा पीछे रहने वाला था बोल ही दिया।

‘‘तो जा न उन्हीं के पास यहाँ क्या करने आई है…और देख मेरा दिमाग खराब तो कर मत…वैसे ही परेशान हूँ और अब तू और परेशान कर रही है। माँ बाबा जहाँ कहें वहाँ रिश्ता कर और अपना घर बसा ले…तेरा मेरा मिलन तो सपने में भी नहीं हो सकता ये तू जानती है.’’ ‘‘हाँ रवि जानती हूँ…संध्या तो आती ही तब है, जब रवि अस्ताचल को गमन करता है…हमारे मिलन का कोई क्षितिज बना ही नहीं फिर भी तू कहे तो एक बार अपने घर में बात करूँ’’ उत्साहित हो संध्या ने कहा…”नहीं तो हम भाग जायेंगे इस दुनिया से दूर, बहुत दूर एक अपना जहान बनायेंगे. जहाँ तू होगा, मैं होऊँगी और हमारे दो प्यारे-प्यारे चाऊँ-माऊँ बच्चे होंगे, जो रोज तेरी कभी पीठ पर चढ़ेंगे तो कभी तुझे बाहर घुमाने ले जाने की जिद करेंगे…ओह रवि, कितना हसीन आलम होगा न जब मैं कहूँगी, रवि, बस बच्चों का ही ध्यान रखा करो, मुझे तो भूल ही गए हो और फिर तुम बच्चों को बहाने से बाहर भेज कर मुझे अपने अंक में भर लोगे और शरारत करने लगोगे’’ आह भरते हुए संध्या ने कहा.
‘‘ओये चुप कर संध्या वरना मार खाएगी…लगता है आज तूने कोई नशा किया है जो इतना बकबक करे जा रही है बिना सोचे समझे…ठहर जा, अभी जाकर चाचा-चाची को तेरी सारी हरकत बताता हूँ,

तभी वे तुझे घर से धक्का देंगे किसी ऐसे के घर जो रोज सुबह-शाम तेरी अच्छे से खबर लेगा, तब करना याद ये सब बातें’’ चिढ़़ते हुए रवि ने कहा. ‘‘हाँ हाँ…कर ले शिकायत मैं भी कह दूँगी ये सब तेरे दिखाए स्वप्न थे फिर देखना किसकी शामत आती है“ अँगूठा दिखाते हुए संध्या बोली.  सुन रवि आपे से बाहर हो उसे जो मारने दौड़ा तो संध्या खिलखिलाकर हँसते हुए दौड़ी और पीछे से हँसी के फव्वारे जो फूटे तो रवि ने पीछे मुड़कर देखा तो क्या देखता है पीछे तो लड़कियों का झुण्ड खड़ा है जो उन्हें देख हँस रही हैं. असमंजस में रवि कभी संध्या को तो कभी उन लड़कियों को देखने लगा. ‘‘देखा, मैं न कहती थी ये आज भी वैसा ही साधु-सन्यासी है, इसके बस की नहीं है लड़की पटाना और उसका साथ निभाना…देखा एक मिनट में कैसे इसकी घिग्घी बँध गयी“ जीभ चिढ़ाते हुए संध्या ने कहा. ‘‘ए संध्या की बच्ची…क्या था ये सब? क्यों परेशान करने पर तुली है?’’ रवि झुँझलाकर बोला. ‘‘कुछ भी नहीं, मुझमें और इनमें शर्त लगी थी कि शहर में रहकर तू बदल गया होगा और मैंने कहा नहीं ये जीव बदलने वालों में से नहीं है और फिर क्या तुझसे थोड़ा-सा मजाक करने का भी हक़ नहीं रहा क्या अब हमारा’’, इठलाते हुए संध्या ने कहा. ‘‘ओह संध्या, तुझे पता है न ऐसी बातों से मुझे कितनी कोफ़्त होती है।’’
‘‘हाँ, हाँ, संन्यासी जी…सब पता है वह तो तुझे देखकर मुझे शरारत सूझ जाती है और मुझे अपने वही पहले वाले दिन याद आ जाते हैं तो मैं खुद को रोक नहीं पाती’’

 जैसे ही संध्या ने कहा रवि को ध्यान आया कि अभी तक वह घर तो पहुँचा ही नहीं है तो एकदम संध्या से बोला, ‘‘अरे संध्या तेरी बातों में मैं तो भूल ही गया कि अभी घर तो गया ही नहीं.’’
‘‘अरे तो जाओ न मैंने कब रोका है’’ कह संध्या मुँह चिढ़ा कर चल दी और रवि ने भी घर की तरफ कदम बढ़ा दिए. संध्या उसकी बचपन की दोस्त थी जो इसी तरह उसे अक्सर परेशान किया करती थी और हर बार वह न चाहते हुए भी उसकी बातों पर यकीन कर मज़ाक का शिकार बन जाता था। यहाँ आकर वह कुछ देर के लिए अपनी सारी उलझन भूल चुका था मगर जैसे ही घर की याद आई एकदम फिर उसी दुनिया में पहुँच गया और कशमकश के सागर में गोते लगाता हुआ अपने माता-पिता के पास पहुँच गया. उसे अचानक आया देख दोनों हक्का-बक्का रह गये, आख़िर बिना सूचित किए तो कभी आता ही नहीं। वैसे भी वही कहते रहते हैं कब आयेगा इतने दिन हो गए, तब जाकर आता था तो आज बिन मौसम बरसात की तरह उसका आना संदेहास्पद बना रहा था। ‘‘अरे रवि, अचानक कैसे आ गए? सब ठीक तो है न? तबियत वगैरह सही है न?’’
‘‘हाँ माँ, सब सही है, क्या मैं अचानक नहीं आ सकता.’’

‘क्यों नहीं, तुम्हारा घर है बस ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए पूछ लिया कि सब सही तो है न’’
‘‘हाँ माँ, सब सही है बस तुम दोनों की याद आयी तो आ गया’’ कह रवि फ्रेश  होने चला गया. माँ उसकी मन पसन्द चीजें बनाने में व्यस्त हो गयी और पिता अभी भी असमंजस का दुशाला ओढे़ अपने ख़्यालों में खोए रहे कि कहीं न कहीं कुछ तो है जो अभी दिख नहीं रहा आख़िर ज़िन्दगी का अनुभव था इसलिए इंतज़ार करने लगे जब रवि खुद कुछ कहे. दो दिन हो गए रवि को मगर कहने की हिम्मत ही नहीं हुई और अब तो माता-पिता को भी लगा शायद इस बार वह सिर्फ़ हमसे ही मिलने आया है और सच कह रहा है तो थोडे़ से निश्चिंत हो गए.
रवि के पापा दीनानाथ जी एक सरकारी नौकर थे तो जब जहाँ ट्रान्सफर हो जाता बोरिया बिस्तर उठा चल देते. ऐसे में रवि और उसकी माँ भी उनके साथ कभी शहर तो कभी गाँव की धूल फाँकते हुए चलते. एक खानाबदोश-सा जीवन जीने के बाद उनकी इच्छा थी कि रिटायरमेंट के बाद बाकी का जीवन अपने गाँव की शांति में बिताएँ इसलिए काफी सालों से वे तो यहीं रह रहे थे मगर रवि पढ़ाई के सिलसिले में दसवीं के बाद तो बाहर ही रहा. आता भी था तो छुट्टियों में और फिर नौकरी भी दिल्ली में लगी थी तो अब उसका आना और भी कम हो चुका था।
वह चाहता था पापा और माँ उसके साथ रहें मगर वे मानते ही नहीं थे.  मगर दूरी होने से बच्चे दिल से दूर थोड़े न होते हैं, ये रवि जानता था और आज जब ज़िन्दगी का इतना बड़ा फैसला उसे लेना था तो चाहता था कि उस पर उनकी सहमति की मोहर लग जाये मगर ये सब इतना आसान नहीं लग रहा था. उसे मौका ही नहीं मिल रहा था, आखिर कैसे बात चलाये इसी उधेड़बुन में वह शाम को गंगा किनारे जाकर बैठ गया.  पहले भी जब कभी वह परेशान होता तो इसी तरह गंगा के किनारे आकर बैठ जाता था, तो कुछ सुकून महसूस किया करता था मगर अभी बैठकर जैसे ही इधर-उधर देखा तो क्या देखता है गंगा के घाट पर एक तख्त पर दो लोग बैठे हैं, जिन्हें वह जानता तो नहीं था मगर क्या देखा वहाँ बैठ कर शराब पी रहे हैं और आस-पास दो बोतलें पड़ी हैं, यह देख उसका खून खौल उठा. एक तरफ पवित्र माँ गंगा और उसी के तट पर कैसा घिनौना कृत्य ये लोग कर रहे हैं, क्या मूल्य और मर्यादायें बिल्कुल ही ख़त्म हो गयी हैं?…सोचता उनकी तरफ बढ़ चला और उन्हें टोका, ‘‘भाई जी, मैं नहीं जानता आप लोग कौन हैं मगर एक ही बात कहता हूँ कि क्या घर में जगह कम पड़ गयी थी जो अपना विष यहाँ उड़ेलने चले आये?’’

‘‘ओ भैये, तू है कौन हमें ये उपदेश देने वाला?’’ लड़खड़ाती जबान में एक बोला.  ‘‘मैं कोई भी होऊँ क्या फर्क पड़ता है, तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आती, एक तरफ तो गंगा का पवित्रा किनारा और दूसरी तरफ तुम्हारा ये घिनौना रूप, माँ गंगा भी कितना व्यथित होती होंगी तुम्हें देखकर, कुछ तो शर्म कर लेते और अपना ये कृत्य कहीं और कर लेते’’ धिक्कारते हुए रवि ने कहा. ‘ओये गंगा के हमदर्द! तू है कौन हमें रोकने वाला? हमारी मर्ज़ी हम जहाँ चाहे बैठ कर पीयें’’ कहते हुए वह लड़खड़ाते हुए उठा और रवि को धक्का देने लगा। रवि ने भी उसे खुद से दूर करने की गरज से जैसे ही पीछे धकेला वह नशे में होने की वजह से गिर पड़ा तो दूसरा रवि पर झपटा और फिर तीनों में खींचतान होने लगी, ये कुछ दूर पर जाते रवि के दोस्तों ने जब देखा तो छुड़ाते हुए बोले.
‘‘रवि तू दूर रह इनसे, इन्हीं लोगों के कारण आज गंगा दूषित हो रही है, हम लोग इनके मुँह नहीं लगते, इन्हें और कोई काम नहीं है बस दिन भर पीते हैं और लड़ते हैं.’’ ‘‘इसी वजह से अब यहाँ कोई स्नान करने भी नहीं आता और औरतें तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि इन जैसे कुछ  गुंडों ने यहाँ कब्ज़ा कर लिया है और उन पर गन्दी-गन्दी फब्तियाँ कसते हैं इसलिए उन्होंने भी आना छोड़ दिया,

तू चल यहाँ से’’, रवि का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उसे उसके घर पर घरवालों को सारी बात बताकर चले गए मगर रवि का मन बहुत खराब हो चुका था इसलिए चुप होकर अपने कमरे में चला गया और पिता दीनानाथ चुपचाप उसे देखते रहे, वैसे भी उन्हें ज्यादा बोलने की आदत नहीं थी. वह चुप रहकर सामने वाले को ज्यादा सुना करते थे इसलिए संवाद होने का सवाल ही नहीं उठता था और इसी परेशानी में लेटे-लेटे रवि की आँख लग गयी. शाम को पड़ोस की सीमा आंटी आयीं. रवि के रिश्ते के लिए एक लड़की की फोटो लेकर रवि को दिखाने तो रवि को मौका मिल गया. जो बात वह दो दिनों से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. अब कहने की सोची जब उनके जाने के बाद माता-पिता ने उसे फोटो दिखाकर बात करनी चाही.
‘‘नहीं माँ, मैं पहले भी कह चुका हूँ मैं शादी नहीं करूँगा.’’
‘‘तो क्या करोगे? कोई साथ तो चाहिए आखिर जीने के लिए’’ हारकर पिता ने पूछ ही लिया.
‘‘पापा, सही कहा आपने कोई साथ चाहिए और वह साथ मुझे मिल गया है।’’
‘‘ओह! तो ये कहो तुमने दूसरी लड़की पसन्द की है अपने मन की तो पहले क्यों नहीं कहा, हम तो हमेशा से तैयार रहे हैं तुम्हें पता ही है’’ खुश होते हुए दीनानाथ बोले।

‘पापा पहले पूरी बात तो सुन लो’’ जैसे ही रवि ने कहा. असमंजस के बादल एक बार फिर पिता के मुख पर लहराने लगे. ‘‘पापा, यह सही है कि एक लड़की मुझे पसन्द है और उसे मैं क्योंकि हम दोनों की विचारधारा एक जैसी है. यह कोई जवानी का जोश ही नहीं है इसलिए हम दोनों एक साथ रहना चाहते हैं, बिना किसी बंधन में बँधे ताकि एक-दूसरे पर अपनी चाहतें, अपेक्षायें न थोपें और बेवजह ज़िन्दगी बोझ बन जाए, फिर हम ज़िन्दगी भर उस रिश्ते की लाश को ढोते रहें. ऐसे जीने से अच्छा है खुलकर निश्चिंत होकर जीया जाए, कम से कम अपनी-अपनी स्वतंत्राता के साथ खुश होकर तो जीयेंगे. ‘‘रवि, यह कैसी बात कर रहे हो, क्या तुम समाज से अलग हो?’’ ‘‘तो क्या समाज के लिए मैं अपनी ज़िन्दगी को आग में झोंक दूँ पापा?’’
‘‘शादी-ब्याह को तुम आग समझते हो?’’
‘‘पापा, मैं पहले भी बता चुका हूँ मुझे बंधन स्वीकार नहीं.’’
‘‘इसका मतलब तुम समाज के बनाये नियम कानून तोड़ना चाहते हो, अपनी मर्ज़ी से जीना चाहते हो तो एक बात बताना तुममें और उन शराबियों में क्या फर्क रह गया जिनसे आज तुम लड़ रहे थे? बता सकते हो किसलिए लड़ रहे थे?

तुम्हें भी लगा वह मर्यादा का हनन कर रहे हैं इसलिए न, मर्यादा कोई भी तोड़े उसका कानून सभी पर लागू होता है और तुम भी रिश्तों की मर्यादा तोड़ अपनी मर्ज़ी से एक नयी लकीर खींचना चाहते हो तो क्या फर्क है तुममें और उनमें?’’ पिता के प्रश्न ने रवि को झंझोड़ डाला. ‘‘पापा, आप भी किस बात को किससे जोड़ने लगे. अरे गंगा को हम माँ मानते हैं, वह एक पवित्र नदी है जिसकी हम पूजा करते हैं, उसमें हमारी श्रद्धा है, आस्था है, विश्वास है पापा, लेकिन शादी जैसे बंधन में नहीं है फिर आप कैसे दो बातों को एक चश्मे से देख सकते हो. फिर मैं कौन-सा अपने संस्कारों को भूला हूँ. मैं आपके सिखाये आदर्शों और संस्कारों को जीता हूँ पापा लेकिन इस तरह के बंधन स्वीकार्य नहीं क्योंकि इसमें कोई गारंटी नहीं हम निभा भी पायेंगे या नहीं और फिर न निभा सको तो उम्र भर पिसते रहो एक अनपेक्षित रिश्ते में, यह तो मानो उम्र कैद हो गयी और मैं ऐसा जीवन नहीं जी सकता आपको पहले भी बता चुका हूँ.’’ ‘‘अच्छा तुम करो तो सब जायज और दूसरा करे तो मर्यादा का हनन…ये कैसी दोहरी मानसिकता है तुम्हारी रवि? जैसे तुम कह रहे हो मेरा शादी में विश्वास नहीं वैसे ही उन शराबियों का गंगा के अस्तित्व पर विश्वास नहीं, वे भी कह सकते हैं न…है क्या एक नदी ही…लेकिन तुम आहत हुए तो उनसे भिड़ गये तो यही बात हमारी सोच पर भी तो लागू होती है…हमें भी लगता है तुम समाज की बनायी परम्पराओं को तोड़ रहे हो तो कैसे उचित हो गया’’, उत्तेजित हो दीनानाथ बोले.

‘‘पापा फर्क है,…वे नशे में थे और मैं किसी नशे में नहीं हूँ, सोचने समझने की शक्ति रखता हूँ. उनकी तरह नहीं कि नशे की हालत में जो चाहे बकवास करूँ. ये फैसला मैंने खूब सोच समझकर ही लिया है.’’
‘‘मैंने फैसला कर लिया है मैं शीना के साथ रहूँगा’’, जैसे ही अपना यह निर्णय रवि ने सुनाया दीनानाथ उसका मुख देखते रह गए. अनपेक्षित शब्दों के बाण जैसे किसी ने सीने में घोंप दिए हों यूँ लगा रवि के माता-पिता को, सुन्न हो गए. सोच को मानो लकवा मार गया हो इस तरह मूक हो बैठ गए.  आखिर ये कैसी सोच है रवि की? क्या उस पर अपने निर्णय न थोपने के उनके विचार गलत थे, उनकी सोच गलत थी कि बच्चे का खुद विकास होना चाहिए, जीवन में उसे अपने निर्णय स्वयं लेने चाहिए? क्या स्वतंत्राता का ये मतलब रह गया कि अब हमें बच्चे को एक अंधे कुएँ में उतरते भी देखना होगा क्योंकि जानते थे कि अब तीर कमान से निकल चुका है. यदि कुछ कहा तो जो रहा सहा है वह भी हाथ से निकल जाएगा. शायद रवि न माने और उनसे भी रिश्ता न रखे इसलिए अब सख्ती या प्रतिकार का उन्हें कोई औचित्य ही नज़र नहीं आया इसलिए गुमसुम हो गए. न हाँ कहते बना और न ही ना…रवि ने अपनी तरफ़ से काफी समझाने की कोशिश की मगर उनके तो सारे अरमान धराशायी हो चुके थे,

अब तो सिर्फ़ उसकी सहमति पर मोहर लगानी बाकी रह गयी है. ये वह जानते थे इसलिए अब रवि कुछ कहे क्या असर होना था…एक चुप की खाई उन तीनों के बीच खिंच चुकी थी और रवि भी समझ चुका था उनके मौन का मुखर अर्थ इसलिए अगले ही दिन वापस आ गया और सीधा शीना से मिला ताकि उसे बता सके उसका क्या निर्णय है. इस तरह रवि और शीना ने लिव-इन में ज़िन्दगी का एक नया अध्याय शुरू किया जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ वे दोनों थे और उनकी दुनिया जिसमें वे विचरना चाहते थे, जिसमें वे साँस लेना चाहते थे, जिसमें वे उड़ान भरना चाहते थे और दोनों पंछी उड़ने लगे अपने आकाश में अलग अस्तित्व के साथ मगर साथ-साथ. एक दिन रवि ने कहा, ‘‘शीना मुझे लगता है हमें एक फ्लैट लेना चाहिए जहाँ हम खुलकर अपनी ज़िन्दगी जी सकें, ये वन बेडरूम सैट अब सही नहीं है। कम से कम अब जब हम दोनों रहते हैं तुम्हारे और मेरे दोनों के दोस्त आते रहेंगे तो जरूरी है थोड़ी-सी स्पेस भी.’’ ‘‘हाँ, रवि, कह तो सही रहे हो तो ऐसा करो तुम भी अपने जानकारों से कह दो और मैं भी कह देती हूँ फिर जहाँ अच्छा लगेगा ले लेंगे.’’ ‘‘ठीक है, बात करता हूँ.’’
कुछ दिन बाद दोनों रोहिणी में एक सोसाइटी में फ्लैट देखने जाते हैं जो उन्हें पसन्द आ जाता है और वे उसे किराये पर ले लेते हैं. ‘‘रवि देखो, किराये का पैसा हो या बिजली पानी, राशन आदि दोनों आधा-आधा देंगे.’’
‘‘ठीक है शीना मुझे ऐतराज नहीं.’’

दो दिन बाद ही दोनों फ्लैट में शिफ़्ट कर जाते हैं और फ्लैट को शीना अपनी और रवि की रुचि का ध्यान रखते हुए सजाती है. इसके साथ-साथ अपनी शॉप पर भी ध्यान देती है साथ ही उसने अब आस-पास की महिलाओं से भी संबंध बनाने शुरू कर दिए. किसी को मौसी तो किसी को चाची बना लिया। उनके बच्चों के दिल में भी अपने व्यवहार से दोनों ने एक खास जगह बना ली, फिर बच्चे छोटे हों या हम उम्र जब तक उन दोनों से आकर अपने सारे दिन का हाल न कह लेते चैन न मिलता। नीचे के फ्लोर में रहने वाली कुसुम आंटी का बेटा अंशुल और बेटी प्रियंका तो मानो शीना और रवि के व्यवहार से इतने प्रभावित हुए कि जब तक एक बार उनसे मिल न लें उन्हें चैन न पड़ता. अंशुल इंजीनियरिंग कर रहा था और प्रियंका सी.ए. की तैयारी तो हमउम्र होने के नाते उनका उठना-बैठना शुरू हो गया था. अपनी दैनिक दिनचर्या उनसे शेयर करना उन्हें अच्छा लगता था और कुसुम आंटी और अंकल भी हमेशा खुलकर मिलते हाल-चाल पूछते. बराबर में रहने वाली सुधा आंटी और अंकल ज्यादा तो नहीं बोलते थे बस नमस्ते आदि का जवाब दे दिया करते थे. उनकी एक ही बेटी थी सुरभि जो जब भी अंशुल, प्रियंका, शीना और रवि के कहकहे सुनती तो खुद भी उनकी महफ़िल में शामिल होने चली आती. इस तरह घर आने के बाद शाम को लगभग एक डेढ़ घंटे ये महफ़िल सजती और उसके बाद सब अपने-अपने घर चले जाते. इस तरह शीना और रवि ने वहाँ हर किसी से बेहद आत्मीय सम्बन्ध बना लिए थे।

दिन पखेरु अपनी रफ़्तार से उड़ने लगे और दो दिल धीरे-धीरे एक दूजे की तरफ़ बढ़ने लगे. रवि की कुछ अदायें, कुछ बातें शीना को अपनी सी लगतीं तो शीना की शालीनता और रिश्ते की मर्यादा रवि को अपने निर्णय लेने पर गौरवान्वित करती. बेशक दोनों साथ रह रहे थे मगर एक मर्यादा अब तक दोनों के बीच कायम थी जो उनके रिश्ते को मजबूत आधार प्रदान कर रही थी.  उस दिन सुबह शीना जल्दी में थी और रवि को थोड़ा देर से जाना था क्योंकि एक क्लाइंट से मिलना था इसलिए वह अभी सो रहा था। शीना जल्दी-जल्दी अपने लिए नाश्ता बनाने में लगी थी कि सेब काटते-काटते अचानक जल्दबाजी में उसकी उँगली कट गयी और एक जोर की चीख उसके मुँह से निकली रवि सोता हुआ उठ बैठा और शीना की उँगली से खून बहता देख लपककर उसके पास पहुँचा और उसकी उँगली मुँह में ले ली ताकि खून रुक सके मगर खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था, फिर पानी की धार में हाथ को रख फ़स्र्ट एड का बाॅक्स निकाल कर लाया और पट्टी करने लगा.

‘‘शीना, तुम ध्यान से काम नहीं कर सकती? देखो कितना ज्यादा कट लगा है, चलो अभी तो टैम्परेरी काम मैंने कर दिया है डाॅक्टर से सही ढंग से पट्टी करवा लो और टिटनैस का इंजैक्शन लगवा लो कहीं कोई और मुसीबत न आ जाए’’ ‘‘अरे रवि, ये तो रोज का काम है, क्यों परेशान होते हो, तुमने बैंडेज कर दी न अब देखो ठीक हो जाएगा.’’ ‘‘नहीं, किसी भी चोट को हल्के नहीं लेना चाहिए और फिर सारा दिन काम कैसे करोगी’’
‘‘अरे, मैंने कौन-सा काम करना है काम के लिए हैं न कर्मचारी।’’
फिर भी चिंतित होते हुए रवि ने कहा, ‘‘एक बार मेरे कहे पर दिखा लो.’’
‘‘अच्छा बाबा! दिखा लूँगी.’’
कुछ निश्चिंत होते हुए रवि शीना के लिए नाश्ते और लंच की तैयारी करने लगा क्योंकि उसे पता था कि शीना यदि लंच लेकर नहीं जायेगी तो शाम तक कुछ नहीं खायेगी, न मँगवायेगी क्योंकि उसकी आदत है सिर्फ़ अपने अकेली के लिए कुछ नहीं करती इसलिए शीना को हिदायत दे खुद उसके लिए लंच और नाश्ता बनाने लगा। यह देख शीना के दिल में रवि के लिए जगह और बढ़ गयी.

रवि और शीना अपनी आज़ाद ज़िन्दगी को अपनी मर्जी से जी रहे थे. पूरे हफ़्ते काम करना और वीकेंड पर कभी मूवी तो कभी शाॅपिंग तो कभी लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाना. कभी घर में बनाना तो कभी बाहर से खाना मँगवा लेना. पूरी मस्ती पूरी आज़ादी, कोई रोक-टोक नहीं और यही तो उनका मकसद था पर फिर भी कुछ कमी थी जिसे दोनों शिद्दत से महसूसते थे बेशक साथ रहते थे मगर अपने अंदर की उस कमी को नज़र अंदाज़ करते शायद अभी परखने जानने और समझने को दोनों को वक्त की जरूरत थी. वक्त अपनी रफ़्तार से कुलाँचे भरता रहा. कभी उड़ान भरता तो कभी किसी मुंडेर पर ठहर जाता ये देखने पंछी कब दाना चुगेंगे और एक नए जीवन की शुरुआत करेंगे. एक दिन रवि बेहद उदास घर आया, उसे देख शीना घबरा गयी आखिर रवि को कभी ऐसे उदास नहीं देखा था वह तो जैसे ही घर में घुसता बच्चा बन जाता था, मस्ती के मूड में रहता तो आज क्या हुआ सोच पहले उसे चाय और कुछ खाने के लिए लेकर आई और फिर पूछा. ‘‘रवि क्या बात है, आज इतने उदास किसलिए?’’ ‘‘शीना तुम तो जानती हो मेरे माता-पिता ने कभी मुझ पर कोई बंदिश नहीं लगायी. मुझे ज़िन्दगी मेरी मर्जी से जीने दी और मैं हमेशा अपने फैसले खुद करने लगा.

तुम्हारे साथ रहने का फैसला भी मेरा खुद का था जिसमें मेरे माता-पिता की सहमति नहीं थी तो अस्वीकार्यता भी नहीं थी क्योंकि वे अपने फैसले दूसरों पर थोपने के पक्षधर नहीं रहे.  इसलिए चुप हो गए थे मगर आज पता चला कि पापा को फ्रैक्चर हो गया है और अकेली मम्मी बहुत परेशान हैं. घर बाहर ऊपर से पापा की देखभाल सब उन्हें अकेले करना पड़ रहा है, जिस वजह से उनकी हालत भी ख़राब होती जा रही है तो मैंने कहा मेरे पास आ जाओ तो मना कर दिया. ‘कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ?’’
‘‘ओह, इतनी सी बात है।’’
‘‘तुम्हें इतनी सी बात लग रही है?’’ आश्चर्य से शीना की ओर देखते हुए रवि बोला।
‘‘हाँ, देखो रवि वे नहीं आ सकते तो क्या हम तो उनके पास जा सकते हैं.’’
‘‘हम…मतलब?’’
‘‘यानी तुम और मैं दोनों.’’
‘‘मगर वे शायद तुम्हारा आना बर्दाश्त न कर पायें’’
‘‘तो कोई नहीं ऐसा करो कुछ दिन की छुट्टी ले लो और उनकी सेवा कर आओ. उनकी तो सही ढंग से देखभाल होगी ही और तुम्हारी आत्मग्लानि भी कम होगी’’ बिना उनकी सोच पर कोई टीका-टिप्पणी किये शीना ने जैसे ही कहा झूम उठा रवि उसकी बात सुन और फ़ौरन कम्पनी में छुट्टी की अर्जी लगा निकल गया.

रवि चला गया तो शीना को घर का अकेलापन काटने को दौड़ता…शाम को घर आती तो रवि की उपस्थिति से सारा घर महक उठता था, उसकी ज़िंदादिली अल्हड़ स्वभाव ज़िन्दगी को खुल कर जीने का जज़्बा और उसकी बातें शीना को बेचैन किए रहती और वह उसके ख्यालों में डूब जाती. शीना, तुम पर नीला रंग बहुत सुन्दर लगता है मन करता है कहकर आँख दबाते हुए चूमने का इशारा भर कर देता मगर कभी अपनी सीमा न लाँघता और उस पल यूँ लगता रवि तुम सिर्फ कह क्यों रहे हो, आगे बढ़ो न, तोड़ दो ये बीच की दीवार लेकिन सिर्फ अंतर्मन से उठती कसक सिर्फ कसक बन कर ही रह जाती, दोनों में से कोई भी पहल न करता…जब भी रवि ऐसा कोई इशारा करता शीना के दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो जाती कि उसे लगता दिल अभी उछलकर बाहर आ जायेगा. उस दिन जब वह अपने बाल सुखा रही थी, तभी रवि पीछे से आया और उसके हाथ पकड़ कर रोक दिया, ‘‘शीना गिरने दो इन बूँदों को इसी तरह तुम्हारे चेहरे पर, जानती हो जब ये एक-एक बूँद तुम्हारे चेहरे का स्पर्श करती है जाने कितने सितार बज उठते हैं मेरे मन में मानो ये गिरती हुई बूँद मैं ही हूँ जो पल-पल तुम्हारा स्पर्श कर रहा है।’’
‘‘धत् रवि…क्या बात है आज शायर बन रहे हो’’ ‘‘नहीं शीना सच कह रहा हूँ…तुम उस पल और भी सुन्दर हो जाती हो…जी करता है.’’ निगाह नीचे झुकाये धड़कते दिल से शीना बोल उठी, ‘‘रवि, क्या जी करता है.’’
‘‘कुछ नहीं शीना…तुम नहीं समझोगी’’ कहकर रवि उसके माथे को चूमकर चला गया और एक बार फिर गुलाबी मौसम उसकी देहरी पर दस्तक देने से पहले ही वापस मुड़ गया और प्यास का दामन प्यासा ही रह गया. मगर शीना जो जानती थी रवि के दिल की बात, समझती है उसके जज़्बात, सब बिना कहे ही समझ जाती थी मगर फिर वही एक अजनबियत बीच में पसरी रहती, रवि के ख्याल शीना के आस-पास मँडराते रहते और एक-एक पल उसके बिना युगों समान लग रहा था. कब रवि आये और वह उसे बाँहों में कस ले और कहे शीना तुम्हारे बिना अधूरा हूँ मैं…उफ़! ख्यालों की जुम्बिश भी कैसी होती है सोच शीना मुस्कुरा दी.  दूरी में कितनी निकटता समायी होती है ये शीना ने अब जाना, हर पल सिर्फ रवि का ख्याल, उसकी बातें और उन बातों से खुद बतियाती शीना. एक अजीब सम्मोहन में बंधती जा रही थी और रवि की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी.

उधर रवि शीना की दूरदर्शिता से बहुत खुश हुआ कि वह नाहक परेशान हो रहा था और शीना ने चुटकी में उसकी एक समस्या सुलझा दी. अपने माता-पिता की अच्छे से देखभाल करके जब रवि वापस आ रहा था तो सिर्फ शीना के ख्यालों में ही गुम था. कैसे शीना हर काम को कितनी सहजता से कर लेती है, कभी कोई शिकन नहीं आती न केवल अपने बल्कि उसके भी, उसकी कार्यकुशलता और शीघ निर्णय लेने की क्षमता का तो कायल था ही रवि मगर उसके सौंदर्य से भी प्रभावित था क्योंकि शीना की सादगी ही उसका सौंदर्य थी जो उसे हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती. जी करता उसे बाँहों में भर लूँ और कभी न छोड़ूँ, शीना का हया की बदली में खुद को छुपा लेना, शर्म से लाल होते उसके गाल और झुकी निगाहें एक मदहोशी को जन्म देतीं और मन करता बस ये निगाहें यूँ ही झुकी रहे और वह उन्हें बस देखता रहे…काश वह शायर होता तो लिख देता एक ग़ज़ल सोच मन ही मन मुस्कुरा दिया रवि क्योंकि ख्यालों की लड़ियाँ यहाँ भी उसी शिद्दत से दस्तक दे रही थीं जिस शिद्दत से शीना को। इस दूरी ने दोनों के सुप्त तारों को न केवल जगा दिया था बल्कि अब तो बेचैनी में दोनों इतने उत्कंठित थे जैसे ही रवि ने बेल दबायी और शीना ने दरवाज़ा खोला तो दोनों ने हर मर्यादा को आज तोड़ दिया और एकदम एक-दूसरे के गले लग गए मानो जन्मों के बिछड़े प्रेमी आज अचानक मिले हों,


यूँ दोनों एक दूसरे में समाहित होने को आतुर हो उठे.  ‘‘रवि, कहाँ चले गए थे“ बेचैन हो अधीरता से शीना ने फुसफुसाते हुए कहा. ‘‘शीना, तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूँ अब जाना“ उसी शिद्दत से रवि ने जवाब दिया और चुम्बनों की बौछार एक-दूसरे पर करते रहे इस तरह एक-दूसरे के गले लगे कि एक-दूसरे में समा जाएँ और फिर कभी न बिछड़े, यूँ एक-दूसरे को पकड़ा मानो छोड़ा तो कहीं हमेशा के लिए न अलग होना पड़े. दूरियाँ ही नजदीकियों का अहसास कराती हैं. ‘‘ओह शीना! तुम्हारे बिना हर पल खुद को अधूरा महसूस किया, जाने क्या जादू कर दिया है तुमने’’ बाहों के घेरे को और कसते हुए रवि शीना की आँखों में आँखें डाले बोला.
‘‘रवि, मुझे ऐसा लगा मानो मेरा कोई अंग ही मुझसे जुदा हो गया है, मैं खुद को अपंग महसूस करती रही इतने दिन। कहीं मन नहीं लगता था, शाम घर आने का दिल ही नहीं करता था तो माँ-पापा के पास चली जाती मगर वहाँ भी अन्दर एक अकेलापन कचोटता रहता और फिर मैं वहाँ से भी जल्दी आ जाती. पता नहीं रवि मुझे क्या हो गया था तुम्हारे बिना एक-एक पल जैसे जन्मों का इंतज़ार बन गया था.’’ रवि के गालों पर हाथ फेरती हुई शीना ने जवाब दिया और यूँ जकड़ लिया मानो अब के बिछड़े तो जाने कब और कहाँ मिलें. आज वर्जनायें टूटनी शुरू हो गयी थीं.  दोनों अपनी-अपनी कहते रहे. थोड़ा संयत हुए तो अंदर आकर बैठे. शीना ने सबसे पहले रवि के पिता का हाल जाना जिसे सुन रवि को अच्छा लगा कि शीना की यही वह अदा है जिसने उसे उसके साथ रहने को प्रेरित किया. वह अपने सिवा अपने आस-पास वालों का भी उसी शिद्दत से ध्यान रखती है जैसे अपना.

स्त्रीवादी आंबेडकर

ललिता धारा 
बी आर आंबेडकर को कई नामों से जाना जाता है.उन्हें भारतीय संविधान का निर्माता, पददलितों का मसीहा, महान बुद्धिजीवी, प्रतिष्ठित विधिवेत्ता और असाधारण मेधा वाला अध्येता कहा जाता है. परंतु बहुत कम लोग, महिलाओं के अधिकारों और उनकी बेहतरी के प्रति आंबेडकर की प्रतिबद्धता से वाकिफ  हैं.जो भी मंच उन्हें उपलब्ध हुआ, उसका उपयोग आंबेडकर ने लैंगिक दृष्टि से न्यायपूर्ण कानूनों के निर्माण की पैरवी के लिए किया. सन् 1928 में बंबई विधानपरिषद के सदस्य के रूप में, आंबेडकर ने उस विधेयक को अपना समर्थन दिया, जिसमें फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाओं को सवैतनिक मातृत्व अवकाश दिए जाने का Feminist Ambedkar प्रावधान था. उन्होंने कहा कि चूंकि नियोक्ता महिलाओं के श्रम से लाभ अर्जित करते हैं, इसलिए मातृत्व अवकाश के दौरान महिला कर्मियों को कम से कम आंशिक आर्थिक संबल प्रदान करना उनका कर्तव्य है. बाबा साहब ने कामकाजी महिलाओं द्वारा बच्चों को जन्म देने और उन्हें पालने-पोसने के आर्थिक और उत्पादक आयामों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया. यह इस बात का सुबूत है कि वे वर्गीय और लैंगिक, दोनों चेतनाओं से लैस थे। आंबेडकर का मानना था कि मातृत्व अवकाश के दौरान कामकाजी महिलाओं को दिए जाने वाले वेतन का आंशिक भार सरकार को वहन करना चाहिए, क्योंकि ”यह राष्ट्रहित में है कि प्रसव के पूर्व और उसके पश्चात, महिलाओं को आराम मिले’’यह महिलाओं की मां के रूप में भूमिका के सामाजिक महत्व को मान्यता प्रदान करना था.
सन् 1938 में बंबई विधानमंडल के सदस्य बतौर आंबेडकर ने यह सिफारिश की कि महिलाओं को गर्भ-निरोधक उपायों का इस्तेमाल करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए. उनका तर्क था कि अगर किसी भी कारणवश, कोई महिला गर्भधारण न करना चाहे, तो उसे उसकी पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए. उनकी यह मान्यता थी कि गर्भधारण करने या न करने का निर्णय पूरी तरह से महिला पर छोड़ दिया जाना चाहिए. इस प्रकार, आंबेडकर ने गर्भधारण के मामले में, महिलाओं को चुनने की आजादी, पूर्ण नियंत्रण का अधिकार व अंतिम निर्णय लेने का हक देने की पैरवी की. वाईसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य बतौर 1942 से 1946 के बीच आंबेडकर ने कई ऐसे प्रगतिशील कानूनों को पारित किया, जिनसे महिला श्रमिकों को कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाएं मिल सकीं. इनमें आकस्मिक अवकाश, अर्जित अवकाश, विशेष अवकाश, पेंशन व कार्य के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे के प्रावधान संबंधी कानून शामिल थे. ये प्रावधान कुछ हद तक ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन’की 20 जुलाई 1942 को आयोजित परिषद में पारित किए गए प्रस्तावों पर आधारित थे. इन प्रस्तावों में कामकाजी महिलाओं के लिए ये सभी प्रावधान किए जाने की मांग की गई थी.

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हिन्दू कोड बिल
स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री बतौर आंबेडकर ने 9 अप्रैल 1948 को संविधानसभा के समक्ष हिन्दू कोड बिल का मसविदा प्रस्तुत किया. इसमें बिना वसीयत किए मृत्यु को प्राप्त हो जाने वाले हिन्दू पुरूषों और महिलाओंं की संपत्ति के बंटवारे के संबंध में कानूनों को संहिताबद्ध किए जाने का प्रस्ताव था. यह विधेयक मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार देता था। इसके अतिरिक्त, पुत्रियों को उनके पिता की संपत्ति में अपने भाईयों से आधा हिस्सा प्राप्त होता. हिन्दू कोड बिल दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देता था- सांस्कारिक व सिविल.  उसमें हिन्दू पुरूषों द्वारा एक से अधिक महिलाओं से शादी करने पर प्रतिबंध और विवाह के विघटन संबंधी प्रावधान भी थे. किसी भी विवाहित व्यक्ति को विवाह की संविदा समाप्त करने के तीन रास्ते उपलब्ध थे-पहला, विवाह को शून्य घोषित करवाना, दूसरा, विवाह को अवैध घोषित करवाना और तीसरा, विवाह का विघटन.  विधेयक में यह प्रावधान भी था कि किसी विवाह को अदालत द्वारा अवैध घोषित कर देने के बाद भी उससे उत्पन्न संतानों की वैधता प्रभावित नहीं होगी. विवाह विच्छेद के लिए सात आधारों का प्रावधान था. 1- परित्याग, 2 – धर्मांतरण, 3 – रखैल रखना या रखैल बनना, 4 – असाध्य मानसिक रोग, 5 – असाध्य व संक्रामक कुष्ठ रोग, 6 – संक्रामक यौन रोग व 7- क्रूरता.
आंबेडकर द्वारा हिन्दू कोड बिल में जो प्रावधान किए गए उनसे दो बातें स्पष्ट होती हैं. पहली, वे पिछड़ी जातियों के राजनीतिक नेता थे और उनके हितों का प्रतिनिधित्व करते थे। दो, जब उन्होंने हिन्दू कोड बिल तैयार किया तब तक उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि वे हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाएंगे। उसके बाद भी उन्होंने कठोर परिश्रम से ऐसे विधेयक का मसविदा तैयार किया, जिससे हिन्दू महिलाओं को लाभ होता और उनमें से भी ऊँची जातियों / वर्गों की महिलाओं को, जिनके परिवार के सदस्यों के पास संपत्ति होती. आंबेडकर को केवल किसी विशेष वर्ग या जाति की महिलाओं के हितों की चिंता नहीं थी. वे सभी जातियों व वर्गों की महिलाओं के हितों का संरक्षण चाहते थे.इस तरह यह साफ  है कि आंबेडकर ने उन्हें उपलब्ध हर मंच का इस्तेमाल लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए किया।
लैंगिक दृष्टिकोण
आंबेडकर का लैंगिक परिप्रेक्ष्य क्या था? वे जाति को किस प्रकार देखते थे? वे इन दोनों के बीच क्या संबंध पाते थे? अपने मौलिक शोधपत्र ‘कॉस्ट्स इन इंडिया’ (1916) में आंबेडकर ने यह बताया है कि भारतीय संदर्भ में विभिन्न समुदायों में वर्गीय अंतर किस प्रकार जाति में बदल गए. आंबेडकर जाति को एक ऐसा बंद वर्ग बताते हैं जिसका मुख्य लक्षण है जाति के अंदर ही विवाह. उनकी यह मान्यता थी कि सबसे पहले पुरोहित वर्ग ने स्वयं को बंद किया और अन्यों को बाहर कर दिया.  फिर अन्य जातियों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया. वर्चस्वशाली जाति में यह कैसे सुनिश्चित किया जाता था कि जाति के बाहर विवाह न हों? आंबेडकर के अनुसार इसके लिए पर कड़ी रोक लगाई जाती थी और महिलाओं पर कठोर नजर और नियंत्रण रखा जाता था। आंबेडकर की यह राय थी कि जाति के निर्माण, संरक्षण और पुनरूत्पादन के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता था. उनका कहना था कि नीची जातियों और महिलाओं के दमन के लिए जाति-लैंगिक गठजोड़ जिम्मेदार है और उसे उखाड़ फेकना आवश्यक है. इस प्रकार आंबेडकर जाति के साथ-साथ लैंगिक विभेद का भी उन्मूलन करना चाहते थे.
आंबेडकर की लैंगिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के तीन स्त्रोत थे:
‘अछूत’बतौर जातिगत दमन का उनका व्यक्तिगत अनुभव- उन्हें भेदभाव के अनेक अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा.  सन् 1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया, ”तुम लोगों ने हम पुरूषों को जन्म दिया है. तुम लोग जानती हो कि कैसे अन्य लोग हमें जानवरों से भी कमतर मानते हैं. कुछ स्थानों पर लोग हमारी छाया भी उन पर नहीं पडऩे देना चाहते.  दूसरे लोगों को अदालतों और कार्यालयों में सम्मानजनक कार्य मिलता है.  परंतु तुम्हारे गर्भ से पैदा हुए पुत्रों को इतनी नीची नजरों से देखा जाता है कि हम पुलिस विभाग में चपरासी भी नहीं बन सकते. अगर हममें से कोई तुमसे पूछे कि तुमने हमें जन्म क्यों दिया तो तुम क्या उत्तर दोगी? हम लोगों और कायस्थ व अन्य ऊँची जातियों की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए संतानों में क्या फर्क है…. ’’आंबेडकर के लिए अपनी जाति के निचले दर्जे और पितृसत्तातमक व्यवस्था में महिलाओं की दासता के पारस्परिक संबंध को समझना कठिन नहीं था. सैद्धांतिक समझ- उनकी असाधारण बौद्धिक क्षमता और विद्वता और संवेदनशीलता के चलते यह स्वाभाविक था कि उन्होंने जातिगत पदक्रम के सबसे नीचे के पायदान पर खड़े व्यक्ति की दृष्टि से जाति और लैंगिक मुद्दों के बीच सैद्धांतिक अंत:संबंध को समझा और उसकी व्याख्या की.  अपने इस विश्लेषण को आंबेडकर ने अपने शोधपत्र ‘कॉस्टस इन इंडिया’में प्रस्तुत किया जिसकी चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं.
मैदानी स्तर पर काम करने वाले महिला संगठनों का उनका नेतृत्व और उसका उनपर प्रभाव- आंबेडकर के नेतृत्व में चले महिला आंदोलन के तीन चरण थे. अ.  सन् 1920 के दशक के अंत में आंदोलनों में पुरूषों के साथ महिलाओं की भी भागीदारी : इनमें शामिल थे विभिन्न मंदिर प्रवेश आंदोलन जिनमें महिलाओं ने उत्साहपूर्वक पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया. . 1930 के दशक में महिलाओं के स्वायत्त संगठन: जनांदोलनों में भाग लेने का अनुभव हासिल करने के बाद महिलााओं को अपने अलग संगठन बनाने की आवश्यकता महसूस हुई जिससे उन्हें अपनी आवाज उठाने का मंच मिल सके. .  सन् 1940 के दशक में महिलाओं के राजनीतिक संगठन: इनमें शामिल थी ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन जिसके देशभर में विभिन्न स्थानों पर सम्मेलन हुए जिनमें आंबेडकर के नेतृत्व में कई संकल्प पारित किए गए. आंबेडकर के भाषणों और उनके विचारों का महिलाओं पर काफी प्रभाव पड़ा. विशेषकर 1927 के महाड़ आंदोलन के दौरान उनके भाषणों से नीची जाति की महिलाओं के जीवन मे अभूतपूर्व परिवर्तन आया. उन्होंने महिलाओं को यह सलाह दी कि वे ऐसे कपड़े और गहने न पहनें जिनसे अछूत के रूप में उनकी पहचान हो सके, इससे महिलाओं में साहस का संचार हुआ और उन्होंने अलग ढंग से साड़ी बांधना शुरू कर दिया. जब आंबेडकर ने 1935 में यह घोषणा की कि वे अपना धर्म बदलेंगे तब महिलाओं ने अनेक बैठकें आयोजित कर उन्हें अपना समर्थन दिया. महिलाओं ने उनसे अपील की कि वे उन्हें ऐसे किसी धर्म में न ले जाएं जो उनपर पर्दा प्रथा लाद दे.
सन् 1938 में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा कि एक महिला एक व्यक्ति भी है और इस नाते उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त है. उसी वर्ष एक अन्य भाषण में उन्होंने महिलाओं से कम बच्चे पैदा करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा ”अगर बच्चे कम होंगे तो महिलाएं उन्हें पालने-पोसने के कठिन श्रम से बच जाएंगी और अपनी ऊर्जा व ताकत का इस्तेमाल अन्य कार्यों के लिए कर सकेंगी” जनांदोलनों का नेतृत्व करते हुए भी आंबेडकर जमीनी हकीकत से दूर नहीं हुए. उनके अनुरोध पर उनकी महिला अनुयायियों ने कम खर्चीली शादियां करने का आंदोलन चलाया. महिलाएं इस बात से भी सहमत हुईं कि लड़कियों की शादी कम उम्र में नहीं होनी चाहिए और अंतरजातीय विवाह होने चाहिए. जिन महिलाओं को आंबेडकर ने नेतृत्व दिया वे तो उनसे प्रभावित हुईं ही,आंबेडकर भी उनसे प्रभावित हुए बगैर न रह सके.  लैंगिक मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का मुख्य स्त्रोत यही महिलाएं थी.
निष्कर्ष
आंबेडकर का हिन्दू समाज का विश्लेषण इस प्रकार है:-
यह मूलत: जाति व ऊँच-नीच पर आधारित समाज है जिसमें विभिन्न जातियां सम्मान के बढते क्रम और तिरस्कार के घटते क्रम में श्रेणीबद्ध हैं. यह महिलाओं की लैंगिकता, उनकी प्रजनन क्षमता व श्रम के नियंत्रण पर आधारित है. मनु के धर्म के दो स्तंभों वर्णाश्रम धर्म और पतिव्रत धर्म पर यह जातिगत-लैंगिक गठजोड़ खड़ा है. बिना एक से छुटकारा पाए हम दूसरे से छुटकारा नहीं पा सकते.
आंबेडकर की इस समझ और उस पर उनकी भावनात्मक और बौद्धिक प्रतिक्रिया ने महिलाओं और दमितों को मुक्ति दिलाने के उनके मिशन का पथप्रदर्शन किया.
(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल, 2016 अंक में प्रकाशित )

नीरा जलछत्री की कवितायेँ

1.

नीरा जलछत्री

युवा कवयित्री, दौलतराम कॉलेज ,दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापिका. संपर्क : neerajalchhatri@gmail.com

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारा घूरना, फब्तियां कसना
धक्का देकर आगे बढ़ जाना
और निर्लज्जता से हँसना
हमें अच्छी लगती है,
जबरन प्रेम न स्वीकार करने पर
जान लेने और देने की धमकी

हमें बहुत अच्छा लगता है,
मुंह अँधेरे उठकर
दिन-भर घर के कामों में खटना
और तुम्हारा शाम को लौटकर यह कहना
कि करती क्या हो तुम घर पर पड़ी-पड़ी ?

हमें अच्छा लगता है,
तुम्हारी पसंद का खाना,
तुम्हारी इच्छा से घूमना,
तुम्हारी पसंद के कपडे-जेवर
तुम्हारी फरमाइश किये गए पकवानों को बनाना
ये सब और करवाचौथ का निर्जल व्रत तुम्हारे लिए,
इन्ही के साथ बच्चों का  टिफिन, होमवर्क,
और पी.टी.एम. की मीटिंग्स,
दूध-सब्जी और धोबी का हिसाब
और …और भी बहुत कुछ
अच्छा लगता है मुझे,
ऐसा तुम सोचते हो !
पर क्या सच में ?
तो सुनो!

नहीं पसंद मुझे, तुम्हारे नाम का सिन्दूर मांग में भरना
बाल कम हो रहे है बीच में,
वहां खुजली होती है।
पाँव के बिछुओं से पैर की अंगुलियाँ कट गई हैं,
साडी फंसती है बार-बार,
और दर्द रहता है बहुत ।
मंगलसूत्र के लगातार घिसने से
गले में एक काली धारी बन गई है

और
कांच की चूड़ियाँ तो न जाने कितनी बार
टूट कर चुभी  हैं
कई निशान हैं वहां छोटे-बड़े
सुनो सबको उतार फेकने का मन हो रहा है !
तुम्हारी पाबंदियों, तानों और फब्तियों को सुन कर
कस कर एक तमाचा मारने का मन होता है मेरा,
मन हो रहा है

आज तुम्हारी आँख में आँख डालकर
बेनकाब करूँ तुम्हारा वीभत्स चेहरा
और बताऊँ कि तुम्हारे ‘जबरन’ की पैदाइश हैं ये बच्चे!
और नहीं मिली तुम्हारे संग-साथ से कभी कोई तृप्ति
सिर्फ झेला है तुम्हे मैंने अपने शरीर और आत्मा पर!
हे वाहियात आदमी !
नहीं है तुम्हे कोई शऊर
उठने-बैठने और बात करने का

टांग पर टांग चढ़ाये
बेवजह की बकवास करते हुए
जब देते हो आदेश
बार-बार
चाय- पानी- अखबार देने का
तो मन करता है कि,
कान पकड़ कर दिखा दूँ बाहर का रास्ता,
सुनो
नहीं है पता मुझे
तुम्हारे मोजे, रुमाल, पर्स और घड़ी
और सुनो ..
नही हो तुम आदमी मेरी नज़र में !

2.  


शनि के मंदिर में जाने के लिए
लालायित स्त्रियों,
किसलिए जाना है तुम्हे वहां ?
बेजान पत्थरों पर सर पटककर
क्या होगा हासिल ?
होना तो ये चाहिए था
कि मंदिर प्रवेश पर रोके जाने पर
तुम एकजुट होकर,
ठोकर मार देतीं
सभी मठ-मंदिरों को
धार्मिक आडम्बर के घरों को,
उपेक्षा कर त्याग देना चाहिए था
तुम्हे ऐसे सभी पावन स्थलों को |
फिर …….
फिर क्या होता,
भागते भगवान तुम्हारे पीछे
और उनके साथ
उनका पूरा दल-बल  भी
भागते हुए आते तुम्हारे पीछे
क्यूंकि
तुम्हारे न जाने से, रुक जाता उनका व्यापार
ठप्प पड़ जाती
अंधविश्वासों की ख़रीदफ़रोख्त
और बंद हो जाती अंधश्रद्धा की दूकानें
तुम्हे घुटनों के बल चलकर
लेने आते वे |

क्यूंकि,
हे नादान स्त्रियों!
सभी धर्मों का पूरा व्यापार
तुम्हारे ही काँधे पर टिका है
दरअसल तुमने ही तो
मूर्खतापूर्ण व्रत-उपवासों,
द्वेषपूर्ण तीज-त्योहारों
और जड़ परम्पराओं का
बोझ उठाया हुआ है |
इस सबके लिए
उन्हें तुम्हारा कोमल, टिकाऊ
और सहनशील कन्धा चाहिए
पर अब समय आ गया है
कि क्लाइमेक्श तुम तय करो
नकार कर सब मठ और मठाधीशों को |

3.
महानगर की जीवन शैली को
दौड़ते हाँफते अपनाने की जद्दो जहद में
कई बार
वो पुराना आराम तलब शहर
मुझमें अंगडाई लेता है
जिसकी सुस्त सुबह
चाय की चुस्कियों के साथ उठती थी
आज इस महानगर में
नींद खट से टूटती है
अलार्म घड़ी की तेज़ आवाज़ के साथ
और चाय पीते नहीं गटकते हैं
फटाफट फटाफट
दौड़ते  हुए पकड़ते हैं ऑटो

किसी बुजुर्ग को पीछे छोड़ते हुए
अब नहीं कहते कभी
“पहले आप”
ठसाठस भरी मेट्रो में दूसरों को धकेलकर
जगह बनाते हुए
कह देते हैं सॉरी
जिसे महसूस नहीं करते बस कह देते हैं
इस शहर की जीवनशैली को
अपनाते हुए लगता है
मेरे शहर का कुछ
लगातार मुझमे टूट रहा है और
छूट रहा है

धर्मराष्ट्रवाद और राजनीति-खतरनाक गठजोड़ की नयी परंपरा

1914-15 में ही शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का दखल नहीं  और न  ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सभी  को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता।इसीलिए गदरपार्टी जैसे आंदोलन एकजूट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़ कर फांसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे. यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.हमारा ख्याल है कि भारत  के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है उससे हम बचा लेंगे. रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चल रहे आन्दोलन  के दौरान अचानक से जेएनयू में पिछले कुछ वर्षों से मनाई जाने वाली महिषासुर जयंती और दुर्गा पर संसद में बवाल मच गया.केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने वही काम किया जो 26 पहले उस समय प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा संसद में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किए जाने वाले बिल को संसद में बहस के लिए रखे जाने के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्रीलालकृष्ण आडवानी ने किया था। उस वक्त बीजेपी मुसीबत में आ गयी थी.

बिल का समर्थन आरएसएस की विचारधारा  के विरूद्ध था और विरोध जनमत के . उस वक्त लालकृष्ण आडवानी ने रथ यात्रा निकाल कर देशभर में ध्रुवीकरण का जो माहौल तैयार किया उसकी परिणिति बाबरी मस्जिद के गिराने और उसके बाद हुए भयानक हिंदू मुस्लिम दंगों से हुई. क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है,  आज राजनैतिक माहौल ऐसा संकेत दे रहे हैं.चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका दंगों से बनाए गए ध्रुवीकरण का है,  जिसका शिकार हमेशा गरीब दलित मुसलमान और सिख जैसे कमजोर वर्ग बने हैं.जिनके जनसंहार भी राजनैतिक दलों की जीत का कारण है  यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सच है. महाबली विष्णु, महिषासुर-दुर्गा और राम-रावण के बीच हुए संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष हैं .रामयण में वर्णित राम-रावण संघर्ष आर्य-अनार्य के बीच हुआ सांस्कृतिक संघर्ष हैं. राम और रावण दोनो ही हिंदू थे. धर्म को लेकर उनमें कोई विवाद नहीं था.यह लड़ाई नस्ल की थी. पुराणों में सुर-असुर देवता-राक्षस, आर्य-अनार्य और द्रविड वर्गों की नस्लों के रूप में ही पहचान की गयी है।राम आर्य हैं,  श्रेष्ठ हैं और रावण अनार्य हैं इसलिए श्रेष्ठ नहीं है.यही मान्यता आज तक संघर्ष का कारण बनी हुई है. यहां तक की हनुमान, बाली, सुग्रीव जैसे रामायण के कई पात्रों को वनवासी बनाने की भी असफल कोशिशें भी होती रही हैं.

जबकि दुनिया भर में आदिवासी किसी भी धर्म का हिस्सा  नहीं है। उनका अपना धर्म है अपनी संस्कृति है. जो कहीं-कहीं  35-40  हजार साल या उससे भी अधिक पुरानी मानी गयी है.जबतक कोई धर्म अस्तित्व में नहीं आया था. सभी धर्म केवल आस्था पर टिके हुए  हैं. आजतक किसी भी धर्म का वैज्ञानिक आधार साबित नहीं हो पाया है,  लेकिन संस्कृति की प्रमाणिकता दुनिया भर में पाषाण युग की जगह-जगह मिली चित्राकारियों में दिखायी देती है. यह ब्राह्मणवादी आस्था है जो हिंदू धर्म को करोड़ो साल पुराना बताती है जबकि यह साबित किया जा चुका है कि  उस समय पृथ्वी पर मानव जाति का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिला बल्कि उस वक्त तो डायनासोर जैसे जीव यहां रहा करते थे. पुराण इतिहास नहीं हो सकते प्रमाणित होते हुए भी कुछ वर्गों द्वारा यह सच स्वीकार नहीं किया गया.धार्मिक भावनायें या आस्था वैज्ञानिक सोच पर आधारित नहीं होती,  इस कमजोर पक्ष को केवल दैवीय शाप का डर या दंगों से ही जिंदा रखा जा सकता , है जिससे कुछ ताकतवर लोगों के आर्थिक उद्देश्य जुड़े हों उनसे लड़ना असंभव होता है.जितना पैसा धार्मिक संस्थानों  के पास है उतना तो सरकार के पास भी नहीं है.

इस पैसे का भारतीय नागरिक वर्ग को आजतक  कितना फायदा पहुंचा है इसपर भी गंभीर चर्चा  की    जरूरत है आखिर यह उन्हीं का पैसा है. इक्कीसवीं सदी में  दुनिया में कई जगहों पर उभरते नए धार्मिक आतंकवाद से धर्म,राष्ट्रवाद र्और संस्कृति के मायने बदल रहे हैं. इस संघर्ष में स्त्री और वंचित वर्ग भयानक हिंसा का शिकार बन रहे हैं.भारत में उसके विरोध की आवाज चाहे वह कन्हैया की हो या उसके साथियों की, उसी भगतसिंह की आवाज है उसका राष्ट्रवाद है,  जिससे डरकर 23 साल के युवा को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था और आज इस आवाज से डरकर सरकार राष्ट्रद्रोह साबित करनेकी
तैयारी कर रही है.

( सुजाता पारमिता थियेटर और आर्ट क्रिटिक तथा साहित्यकार हैं . संपर्क : sujataparmita@yahoo.com )

स्त्रीवादी आंबेडकर की खोज

आज 14 अप्रैल, 2016 को देश बाबा साहेब डा. आंबेडकर की 125 वीं  जयन्ती मना रहा है . डा. बाबा साहेब आंबेडकर इस देश को सच्चे अर्थों में  लोकतांत्रिक बनाना चाहते  थे . संविधान निर्माता डा. आंबेडकर दलितों -वंचितों -स्त्रियों को उनके अधिकार दिलवाने के लिए राज्य को नैतिक रूप से  जिम्मेवार बनाने के लिए प्रयासरत रहे . आंबेडकर आधुनिक भारत के आदि स्त्रीवादियों में से एक हैं .  स्त्रीकाल ने अपने यू ट्यूब चैनल के लिए चर्चित स्त्री बुद्धिजीवियों और
स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं से स्त्रीवाद के लिए  डा.आंबेडकर के मायने पर
बातचीत की . परिचर्चा में भाग लिया रजनी तिलक , सुजाता पारमिता, हेमलता
माहिश्वर , रजत रानी मीनू और भाषा सिंह ने .बातचीत के सूत्रधार मुन्नी
भारती और संजीव चंदन. पूरी बातचीत सुनने -देखने  के लिए वीडियो लिंक पर
क्लिक करें .

एक तस्वीर भी

भारत माता जार-बेजार रो रही है

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

( ‘भारत माता की जय’ का नारा संघ परिवार , हिन्दू राष्ट्रवादियों और भाजपा सरकार का वैसा ही खतरनाक हथियार है, जैसा ‘राम मंदिर’ , या ‘गोमाता’ अभियान रहा है – कई अर्थों में उससे ज्यादा असर वाला साम्प्रदायिक हथकंडा . प्रेमकुमार कुमार मणि का यह लेख ‘भारत माता’  सहित सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को प्रिय ‘राष्ट्रवाद  के दूसरे प्रतीकों ‘पर लिखा गया मुझे सबसे सुचिंतित और महत्वपूर्ण दिखता है – हिन्दी और अंग्रेजी में इस विषय पर एक दर्जन से अधिक लेखों के आधार पर यह निष्कर्ष है , जो मैंने पढ़ा है , इन दिनों .) 
फणीश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध उपन्यास ‘मैला आँचल’में एक पात्र है बावन दास, डेढ़ हाथ का सुराजी, गांधीजी के श्राद्ध वे दिन कालाबाजारी के खिलाफ अकेले जूझता हुआ बैलगाड़ियों के काफिले से कुचल दिया जाता है और भारत-पाकिस्तान (स्वतंत्र बंगलादेश )को बाँटने वाली एक नदी के किनारे के पेड़ पर चेथारिया पीर बन कर रह जाता है. उपन्यास का अंत ही होता है ‘कलीमुद्दीनपुर घाट पर चेथारिया पीर में किसी ने मन्नत करके एक चिथड़ा और लटका दिया.’ रेणु का यह उपन्यास एक बड़ी ट्रेजडी, जिसकी तरफ हमारा देश जा रहा हैं, को  इंगित करता है. इसलिए यह कृति आज भी उतनी ही प्रांसगिक है, जितनी लिखे जाने के समय. हम कह सकते हैं कि उस उपन्यास ने जिस ट्रैजेडी की ओर तब इशारा किया था,  उसके बीच आज हम खड़े हैं,  इसलिए यह तब से कहीं अधिक आज प्रासंगिक है.  लेकिन मैं उक्त उपन्यास पर चर्चा करने के लिए आपको इस आमंत्रित नहीं कर रहा हूँ. मैं तो डेढ़ हाथ के उस सुराजी बावनदास के एक मर्मस्पर्शी संवाद की और आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ.  बावनदास कई प्रसंगों में कई बार कहता हैं ‘भारत माता जार बेजार रो रही है.’ भारत को ब्रिटिश गुलामी से आजादी मिल गयी है. ‘

मैला आँचल’ के केन्द्रीय गाँव मेरीगंज में राजनीतिक –सामाजिक परिवर्तन अंगड़ाईयाँ ले रहे हैं.  देश का मुख्य राजनीतिक लक्ष्य आजादी हासिल होते ही अन्य कई तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं वंचित-उत्पीडित समाजों के लोग चाहते हैं कि इस आजाद राजनीतिक वातावरण में उनकी आकांक्षायों भी अंगडाइयां लें.  उन्हें भी खुल कर सांस लेने का अवसर मिले.  हजारो साल से वह जो सामन्ती-पुरोहिती गुलामी झेल रहे हैं उससे मुक्त हों . भूखमरी, अशिक्षा, बीमारी ख़त्म हो.  इन सबको लेकर गाँवों में उत्साह है, लेकिन दूसरी तरफ जमींदार,पुरोहित, पूंजीपति और लूट खसोट कर संपत्ति हासिल करने वाले भ्रष्ट-दलाल –कालाबाजारिये भी सक्रिय हैं.  मेरीगंज के तीन सुराजी सेनानी थे- बावनदास ,बालदेव और चुन्नीगोसाई.  आजादी  के लिए सब मिला कर दस बार जेल जाने वाला चुन्नीगोसाई सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि अंग्रजों के खिलाफ लड़ाई ख़त्म हो गई और अब जमींदारों पूंजीपतियों से लड़ाई लडनी है. यह लड़ाई कोंग्रेस नहीं लड़ सकती,

सोशलिस्ट पार्टी ही लड़ सकती है. बालदेव अपने गाँव में ही जनवितरण प्रणाली से जुड़ कर परची काटने लगे हैं और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार में जाने –अनजाने धंसने लगे हैं. लेकिन व्याकुल बैचेन बावनदास की पीड़ा कहीं गहन है. चारों और लालच लूट और भ्रष्टाचार को देख कर वह बैचेन है, और कहता है-भारत माता जार-बेजार रो रही है.  व्याकुल बैचेन सुराजी बावनदास की भारतमाता रो रही है. सामान्य साधारण रुलाई  नहीं हैं उसकी, वह जार बेजार रो रही है. बावनदास माता की रुलाई देख कर चुप कैसे रह सकता है.  अपने गांधी बाबा के श्राद्ध के दिन ही वह भ्रष्टाचार से लड़ता हुआ कुचला जाता है,  मारा जाता है.  अपनी भारतमाता और अपने गांधी बाबा को वह अपनी शहादत की श्रद्धांजलि देता है. लेकिन आज जो भारतमाता को लेकर कोहराम कर रहे हैं, वे कौन से लोग हैं? कैसी है इनकी भारतमाता और कैसा है इनका कोहराम. क्या बालदेव की भारतमाता और इनकी भारतमाता एक है, और यदि दो है, तो क्या इन दोनों माताओं में कोई सम्बन्ध भी है या नहीं? ये सवाल मेरे मन में बार बार उठते रहे हैं.

प्रीति गुलाटी कॉक्स की ( पेंटिंग)   काउंटरकरेंट्स से साभार

मैं ऐतिहासिक दस्तावेजों और उत्खननों में न जाकर सिर्फ इतना ही बतलाना चाहता हूँ कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद को एक मूर्त रूप, भारतमाता में परिवर्तित हो जाने की पूरी अवधारणा ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति संग्राम के दरम्यान व्यक्तित्व और समाज सक्रिय भावुक आवेगों से घिरा होता है, ऐसे में उसकी भावुकता का अनेक रूपों में मूर्त होना संभव होता है. वह नए देवता, कविता राग और यहाँ तक कि नारों में मूर्त होता है. हमें इन तमाम स्थितियों का अध्ययन विश्लेषण करना चाहिए और समझना चाहिए किन -किन ख़ास परिस्थितियों में इनका सृजन हुआ था, जो लोग हिंदुत्व को लेकर रात-दिन छाती कूटते हैं उन्हें भी क्षण भर रुक कर अपनी परम्परा पर विमर्श करना चाहिए.  हिंदुत्व की प्रतिमा गढ़ने वाली परम्परा ही उसके सही समय पर विसर्जन की भी शिक्षा देती है. जब प्रतिमा का समय से विसर्जन नही होता तब ‘अशुभ’ की आशंका होती है. भारतमाता की प्रतिमा हमारे देश में उस कुलीन हिन्दू समाज ने निर्मित की, जिसकी अस्मिता को ब्रिटिश हुकूमत लगातार कुचल रही थी.  उसके पास कोई नायक नहीं था , कोई नेता नहीं था.  नायक-नेता विहीन समाज प्राय: देवी देवताओं का सृजन करता है.  ऐसे ही दौर में जब स्वतंत्रता आन्दोलन अपने प्राक्काल में था तब भारतमाता की समन्वित प्रतिमा उठ खड़ी हुई. चूकी इसके निर्माता बड़े लोग थे, कुलीन हिन्दू लोग थे,

इसलिए भारतमाता की प्रतिमा उनकी अन्य देवियों– वैष्णो या दुर्गा-की भांति बाघ –शेर पर बैठी, कर्पूर गौरा, स्वस्थ- सती और दो मुहें केसरिया ध्वज को धारण की हुई उभरीं.  इससे कम धज वाली किसी माता की जय करने में कुलीनों की तौहीन भी होती. राष्ट्रीय आन्दोलन के अगुआ और कर्ता धर्ता वहीं थे,  इसलिए तब इस पर कुछ ख़ास विचार नहीं हुआ, विरोध भी नहीं हुआ. १९२० के बाद जैसे ही गांधी के रूप में राष्ट्रीय आन्दोलन को एक सर्वमान्य नेता मिला,  भारतमाता का महत्त्व कम होने लगा अथवा भारतमाता और गांधी बाबा एक रूप होने लगे.  दूरदराज के गाँवों तक में गांधी इसलिए लोकप्रिय होने लगे कि उन्होंने अपनी धज को किसान मजूर से एकरूप कर लिया. गांधी अवतारी पुरुष बन गए और बहुतों के लिए भारतमाता उनमें समाहित हो गई. हमारे अनेक राष्ट्रीय नेताओं को इन देवी देवतावाद की कमजोरियों  का अहसास था, लेकिन वे चुप रहे, क्योंकि देश की बहुसंख्यक जनता अशिक्षित थी और बड़े बड़े राजनीतिक मसलों को धार्मिकता के रैपर में ही स्वीकार सकती थी. क्यूबा में फिदेलकास्त्रो जैसे नेता ने भी कुछ धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया था , जैसे क्राइस्ट को बन्दुक उठाये दिखाना आदि. यह उतना बुरा नहीं होता है, यदि एक समय तक ही इसका उपयोग हो.
आजादी मिलने के साथ ही गांधी की सलाह थी कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाये.

इसकी व्याख्या लोगों ने अनेक रूपों में की है. मुझे बार-बार यही प्रतीत हुआ है कि गांधी को लगा था कि जिन उपकरणों, औजारों से राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम लड़ा गया, उन्हीं औजारों-उपकरणों से राष्ट्र निर्माण नहीं किया जा सकता. कांग्रेस राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम का मंच था. वह तो प्रतीक था. उसके साथ अन्य औजारों को भी अब दरकिनार करना था. इसलिए राष्ट्रनिर्माण के लिए उन्होंने अपने दो वैचारिक विरोधियों, नेहरू और आंबेडकर को सामने किया. पटेल, राजाजी, राजेंद्र प्रसाद जैसे उनके पटुशिष्यों को पता नहीं कैसा महसूस हुआ होगा. लेकिन गांधी जानते थे कि उनकी दक्षिणपंथी सोच भारत को किस ठिकाने ले जायेगी. नेहरू की आत्मकथा और आम्बेडकर की कांग्रेस व गांधी को लेकर एक किताब का एक-एक पूरा अध्याय गांधी वाद की तीखी आलोचना है. हकीकत तो यह हैं कि नेहरु की आलोचना आम्बेडकर से भी ज्यादा तीखी है, लेकिन गांधी ने राजगोपालाचारी या पटेल के बजाय नेहरू को अपना उतराधिकारी बताया और संविधान  का प्रारूप तय करने की जिम्मेदारी डॉक्टर आम्बेडकर को देने के लिए लोगों को तैयार किया. सविधान सभा ने देश का जो झंडा या चिह्न तय किया, उसमें न भारतमाता रही, न गांधी का चरखा.

हिन्दूवादियों की चलती तो राष्ट्रीय चिह्न में स्वस्तिक का निशान तय कर देते, जो हिटलर की आर्य अस्मिता का प्रतीक था. बिहार में पटेल के शिष्य सरकार पर हावी थे, और बिहार सरकार के राज चिह्न में एक जोड़ा स्वस्तिक आज भी है. कहते है सुप्रसिद्ध चित्रकार उपेंदर महारथी से बिहार सरकार के राजचिन्ह का प्रारूप माँगा गया था और उन्होंने बोधिवृक्ष अथवा पीपल के एक पात को प्रतीक चिह्न का रूप दिया था. लेकिन सरकार में बैठे हिंदुवादियों को इतना गुस्सा आया कि तुलसी के पौधे के दायें बायें स्वस्तिक को राजचिह्न बना दिया. तो क्या आजादी के इतने दिनों बाद जब हमारा राष्ट्र भारत एक सर्व सम्मत रूप ले चुका है. हमारे राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय चिह्न को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक के हर बार भारत माता का विवाद खडा कर हम राष्ट्र विरोधी कार्य ही नहीं कर रहे हैं ? ज़रा क्षण भर रुक कर हम विचार करें कि भारतमाता के ये सुपुत्र  हैं कौन ?क्या इन्हीं लोगों ने कभी हमारे राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का विरोध नहीं किया था, ऐसे में इनकी राष्ट्र भक्ति और देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह उठना स्वाभाविक हैं.

किसी को अपना देश माता भाई पिता या पुत्र-पुत्री के रूप में दिख रहा है और उसके प्रति अपनापा या भावुकता विकसित करने में सहायक हो रहा है, तो इसे कौन रोक सकता है. नहरू सुभाष जैसे नेताओं तक ने भारतमाता का जिक्र किया है (गांधी, अम्बेडर को भारतमाता का जिक्र करते मैंने नहीं पाया). अन्य अनेक लेखकों स्वतन्त्रता- सेनानियो, कवियों –लेखकों ने भारतमाता का उल्लेख किया है, लेकिन यह भारतमाता हमारा राष्ट्र नहीं है. हमारा राष्ट्र भारत है, और हम सब इसके वासी हैं. हम पर कोई भारतमाता थोप नहीं सकता. भारतमाता की जय करना क्या है, मैं नही जानता, लेकिन इसकी जय करने के लिए मजबूर करना राष्ट्रद्रोह है. क्योकि वह हामारे राष्ट्र को कमजोर करता है. भारत को भारतमाता में बदलना या एकरूप करना भारत के हिन्दूकरण  का पहला सोपान है और हर किसी को इसका विरोध करना चाहिए, जो भारत के सविधान में आस्था रखता है. यह सही है कि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतमाता की जय होता रहा था, लेकिन उस आन्दोलन के कई तत्वों को हमने बाद में सुधारा है, या खरिज किया है. मसलन राष्ट्रीय आन्दोलन में ही गांधी जी ने अनुसूचित जातियों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग किया था. इस नाम का वीकली अखबार भी निकालते थे. लेकिन आज इस शब्द को हमने खारिज कर दिया है. इसका प्रयोग करना क़ानूनी तौर पर मना है.  राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतमाता के प्रयोग से उसे संवैधानिक दर्जा नहीं मिल जाता . इसकी जगह हमने सुभाषचंद्र बोस के कौमी नारे ‘ जय हिंद’  को सभी रूपों में स्वीकार कर लिया है, और राजकीय समारोहों में भी इसका प्रयोग होता रहा है. लेकिन भारतमाता की जय का प्रयोग राजकीय समारोहों में होने का कोई प्रचलन नही रहा. आज सरकारी पदों पर बड़े लोगों को इसके प्रयोग के पूर्व कुछ सोचना चाहिए.