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शराबबंदी , महिला मतदाता और नीतीश कुमार

संजीव चंदन

नीतीश कुमार की नई सरकार के द्वारा शराबबंदी को महिलाओं का व्यापक समर्थन मिल रहा है. राज्य और राज्य से बाहर की महिलायें उनके इस फैसले के साथ खड़ी हैं. हाल ही में उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें महाराष्ट्र के वर्धा से कुछ महिलाओं ने पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया है कि वे बिहार आकर उन्हें बधाई देना चाहती हैं. इन्ही दिनों नीतीश कुमार राज्य से आगे बढ़कर अपनी राजनीति विस्तृत करना चाह रहे हैं. राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी के प्रसंग में भी शराबबंदी को मुद्दा बना रहे हैं और भाजपा शासित राज्यों में शराबबंदी की चुनौती दे रहे हैं.

तो क्या शराबबंदी नीतीश कुमार का एक भावुक मुद्दा भर है या वे महिलाओं को मतदाता के रूप में एक अलग इकाई के रूप में देख रहे हैं तथा उनकी रहनुमाई से एक बड़े वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं. यदि ऐसा है, तो एक सवाल यह भी है कि क्या महिलायें अलग मतदाता के रूप में व्यवहार करती हैं, पति और परिवार से अलग निर्णय लेते हुए? इसका कोई विश्वसनीय अध्ययन या आंकड़ावार दावा नहीं मिलता. हालांकि नीतीश कुमार अपने राज्य में लगातार महिलाओं के लिए नीतिगत निर्णय लेकर उनकी राजनीतिक चेतना की दिशा में काम भी कर रहे हैं.

बिहार उन प्रदेशों में है, जो 1920 के दशक में महिलाओं को दूसरे प्रदेशों के द्वारा दिये जाने वाले मताधिकार के प्रति अडियल रुख अपनाता रहा था और 1929 में कई राज्यों के द्वारा पहल किये जाने के बाद बिहार विधानसभा ने इसे पारित किया था. जबकि 2005 में नीतीश कुमार ने स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने वाला बिहार को पहला राज्य बनाया. नौकरियों में 33% प्रतिशत, कुछ में 50% तक का आरक्षण नितीश सरकार की एक और पहल है. उनकी साइकिल योजना की चर्चा देश भर में हुई है. लेकिन क्या महिलायें अपने लिए इन पहलों का प्रत्युत्तर चुनावों में मतदान के रूप में दे रही हैं, यद्यपि पुरुषों की तुलना में उनका वोटिंग प्रतिशत अधिक रहा है

मैंने पिछले चुनावों के दौरान महिला मतदाताओं के मन जानने की कोशिश की थी. मुझे तो कम से कम युवाओं और महिलाओं के मत किसी अलग एजेंडे से संचालित होकर अपना अलग व्यवहार करते नहीं दिखे, ऐसा नहीं होता तो नीतीश कुमार के द्वारा महिलाओं के लिए किये गए कार्य की चर्चा करने वाली लडकियां या महिलायें किसी ख़ास जाति-समूह की नहीं होतीं.  इस अध्ययन में गौरतलब था कि महिलाओं की सुरक्षा सभी लडकियों, महिलाओं के लिए अहम मुद्दा था, चाहे वह जे डी वीमेंस कालेज की लडकियां हों या मसौढी और हाजीपुर की महिलायें. लेकिन जब सुरक्षा और महिलाओं के सम्मान के वैसे मामले सामने आये, जहां उनके प्रिय नेताओं पर सवाल उठते हैं, वे पुरुषों की तरह ही बचाव के तर्क के साथ उपस्थित हुईं.

इसके बावजूद कि महिला मतदाताओं के निजी राजनीतिक निर्णय के पुख्ता आंकड़े नहीं हैं, किसी राजनेता का लगातार महिलाओं को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में देखते हुए अपनी नीतियाँ तय करना सुखद है. शराबबंदी के प्रति महिलाओं के आग्रह को देखते हुए नीतीश कुमार की यह पहल भी इसी रूप में स्वागत योग्य है. हालांकि नितीश जिस वर्धा के महिलाओं के उत्साह का हवाला दे रहे हैं, उस वर्धा में अपने 10 साल के प्रवास के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि यद्यपि वर्धा जिला में पूर्ण शराबबंदी है, लेकिन वहाँ अवैध रूप से हर जगह शराब उपलब्ध है. इसके अलावा पूर्ण बंदी को सुनिश्चित कराने में पुलिस और अदालत का का अतिरिक्त समय लगता है. जिले में कई पुलिस अधीक्षकों ने शराबबंदी हटाने और उसे सिर्फ गांधी आश्रम तक सीमित करने का प्रस्ताव भेजा है, जो गांधीवादियों के दवाब में संभव नहीं हो सका है. जिले में पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर यह भी दावा करने में कोई हर्ज नहीं है कि वहाँ अवैध शराब के निर्माण में भी कई महिलायें लगी हैं. फिर भी यह भी सच है कि अधिकाँश महिलायें शराबबंदी की पक्षधर हैं और एक दूरदर्शी राजनेता की तरह उनके हित में काम करना अनुचित भी नहीं है.

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं 


इस लेख का एक हिस्सा दैनिक भास्कर में प्रकाशित 

‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग: लोकशायर संभाजी से बातचीत

 पिछले दिनों लोकशायर संभाजी भगत का नया अलबम ‘ ब्लू नेशन’  जे एन यू में रिलीज हुआ. गीत डा. आमोल देवलेकर  ने लिखा है. रिलीज के दौरान संभाजी जे एन यू आये थे. उनका प्रसिद्द गीत है, ‘हमारा देव- तुम्हारा देव’. ‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग में  स्त्रीकाल के लिए उनसे बात की  मुन्नी भारती और अनिल कुमार ने.

संभाजी भगत जे एन यू में

हमारे देव देखो बिल्कुल हमारे जैसे
हमको नहीं है सूरत उनको भी नहीं सूरत
हमारा नाम कचरू भगवान है कचरोवा
हमारा है खंडोबा हमारा है मसोबा
हमारा है चेड़ोबा, हमारा है एड़ोबा
हम गोरे नहीं काले, माता है काड़ोबाई
काड़ोबाई, एड़ोबाई , छोटीमाई मोठी माई
मैसम्मा हो पोसम्मा वो सब हमारी अम्मा

पूरी बातचीत देखें  वीडियो लिंक क्लिक करें :

हम मटन मच्छी वाले
सल्ली डलली बोटी वाले
संडे को नल्ली वाले और गुड्सा ठोकने वाले
हमारे देव देखो खाते हैं मुर्गी काली,
खाते हैं बकरी काली
हमारे देव देखो खुन्नस में आने वाले
दो बूंद छिडकने से सब शांत होने वाले
तुम्हारे देव देखो, अब उनके देव देखो
बिलकुल तुम्हारे जैसे
चिकनी है उनकी सूरत
चिकनी है उनकी मूरत
गदाधारी, चक्रधारी और शुद्ध शाकाहारी
खाते न मुर्गी काली, खाते न बकरी काली
लेकिन मानव का लेते बलि
रंगी -ढंगी दंगाई भगवान काहे को रे
शान काहे को रे उनकी शान काहे को रे
उनकी शान में अपनी जान काहे को रे
घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी लफड़ा काहे को रे
झोपड़े में झंझट झमेला काहे को रे …..
घड़ी -घड़ी -घड़ी -घड़ी लफड़ा काहे को रे
झोपड़े में झंझट झमेला काहे को रे
काहे का राईट काहे का फाईट
काहे का राईट काहे का फाईट, भरम काहे को रे
भेजा गरम काहे को रे
जलाए जिन्दगी ऐसा धरम काहे को रे

देह का स्त्रीवादी पाठ और मित्रो मरजानी

शशिकला त्रिपाठी

 विभागाध्यक्ष , हिन्दी,वसंता कॉलेज, बनारस. उत्तरशती के उपन्यासों में स्त्री सहित कई आलोचना पुस्तक प्रकाशित shashivcr9936@gmail.com

किसी वरिष्ठतम रचनाकर की उस कृति का पुनर्मूल्यांकन करना जिससे उसकी पहचान पुख्ता हुई हो, आसान नहीं होता; उस स्थिति में और भी जब उसकी रचनाओं की संख्या दर्जन पार हो चुकी हो. ’बादलों के घेरे’ ’तिन पहाड़’ ’डार से बिछुड़ी’ ’मित्रो मरजानी’ ’यारों के यार’ ’ऐ लड़की’ ’समय सरगम’ ’हम हशमत’ (तीन खण्डों में समकालीनों पर संस्मरण), ’बुद्ध का कमंडल’ लद्वाख’ आदि की लेखिका कृष्णा सोबती छठें दशक के कथा लेखन में विशिष्ट हस्ताक्षर बनकर उभरती हैं. उर्दू में इस्मत चुगताई और हिन्दी में कृष्णा सोबती ने ’स्त्री-यौनिकता’ को प्रमुखता से रेखांकित कर उन अनछुए पहलुओं को उजागर किया जो निराकार, निर्गुण या वायवीय नहीं होते. स्त्रियों की अबूझ मनोभूमि और तन के यथार्थबोध से कथा-साहित्य सचमुच उनसे समृद्ध हुआ. यशस्विनी कथाकर मन्नू भण्डारी और उषा प्रियम्वदा के बरक्स कृष्णा सोबती कथा के हिसाब से क्रान्तिकारी कहलायीं. ’मित्रो मरजानी’ में ’देह’ की सच्चाई की अभिव्यक्ति सारे ख़तरे उठाकर भी उन्होंने किया. बहुचर्चित यह रचना इन्हीं विशेषताओं के कारण विवादास्पद रही. किरदार मित्रो उपन्यास में ही हलचल पैदा नहीं करती वह हिन्दी-साहित्य की भी सतह को आन्दोलित करती है. उपन्यास में तन-मन का झंकार और बुद्धि, वाणी की पारस्परिकता इस तरह गुँथा गया है कि कभी पाठक रचनात्मक यथार्थ से अभिभूत होता है, कभी उसकी पेशानी पर बल पड़ता है तो कभी ठगा सा रह जाता है.


 मित्रो जैसी अलमस्त, अल्हड़, वाचाल निडर और ईमानदार चरित्र साहित्य में अनन्य है. उसके सारे बात-व्यवहार और क्रियाकलाप में देह-उत्सव का उत्साह उमड़ता है. उसकी तरुणाई का एक ही मकसद है आनन्द जिसके आयोजन के लिए हमेशा वह फिक्रमंद रहती है. ’समय सरगम’ की सत्तरवर्षीय आरण्या भी अपने अनूठेपन से चमत्कृत करती हैं. स्त्री-चिन्तन की पितामही मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट ने बड़े ज़ोरदार ढंग से कहा था कि स्त्री प्रज्ञा, बुद्धि में पुरुषों से कमतर नहीं. स्त्री को ’देह’ के रूप में देखने की ज़िद तो पुरुषों की रही है ताकि, वह उस पर शासन कर सके. इस तथ्य को स्त्री-आन्दोलनों में बार-बार रखा भी गया. फिर भी, विडम्बना यह कि उसे सामन्ती समाज ने ’भोग्या’ कहा और पूँजीवादी सभ्यता भी उसे ’देह’ की ही ज़द में समेटती रही है. ’मित्रो मरजानी’ जिसका प्रकाशन पहले लम्बी कहानी के रूप में 1966 में (अब पचास वर्ष हो गए) हुआ, बाद में विधा का अतिक्रमण कर वह उपन्यास होती है; उसमें स्त्री-देह का वर्णन-मूल्यांकन पुरुष-दृष्टि से नहीं, पहली बार स्त्री-दृष्टि से किया गया. पुरुष-वर्चस्व समाज ने यौनिकता के प्रसंग में पुरुषों की सराहना की, कहा ’साठा तब पाठा’ और स्त्री की यौनिकता की निन्दा ’संतान’ नहीं हुई तो स्त्री ’बाँझ’ कहलाई. ’सन्तानोत्पत्ति के लिए पुरुष ने दूसरा विवाह भी किया. किन्तु, स्त्री हर हाल में कुल की मर्यादा बनाकर विवाह-संस्था में बँधी अपने मन को ही नहीं, ’तन’ को भी मारती रही है. हिन्दी साहित्य में पहली बार कृष्णा सोबती ने स्त्रीपक्ष में ’सेक्सुअलिटी, को एक समस्या के रूप में उभार दिया. ’सेक्स’ अगर पुरुष के लिए आनन्दप्रद है तो स्त्री के लिए भी है.

स्त्री, सिर्फ ’करण’ कारक नहीं; ’कर्ता’ भी होना चाहती है परन्तु, पुरुष ऐसा नहीं होने देता. उसकी ’इच्छा’ या ’अक्षमता’ से स्त्री को समझौता करना पड़ता है. ’मर्द’ और ’पाठा’ जैसे जुमलों का प्रयोग इस सच्चाई ’स्त्रियों की कामशक्ति पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा होती है’ को झुठलाने का मात्र कुटनीतिक प्रयास है कि साहसी लेखिका ने ऐसे अनछुए विषय को एक समस्या के रूप में ’मित्रो मरजानी’ में प्रस्तुत किया सातवें दशक में. लेकिन, इक्कीसवीं सदी में भी यह समस्या स्त्रियों  की हो सकती है, होती है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता.
उपन्यास की संरचना में पंजाबियों का मध्यवर्गीय कस्बाई परिवार है जिसमें सास-ससूर के रूप में धनवन्ती-गुरुदास हैं. उनके तीन विवाहित बेटे-बनवारीलाल, सरदारीलाल और गुलजारी हैं तथा उनकी पत्नियाँ हैं- सुहागवन्ती, समित्रावन्ती (मित्रो) व फूलावन्ती; मगर बच्चों की किलकारी या धमाचैकड़ी बिल्कुल नहीं है, यह सन्नाटा अचम्भित करता है. सम्भवतः रचनाकार के कथ्यार्थ का सीधा संबंध न होने से. कथानक की बुनावट में संवाद-संयोजन स्त्रियों के माध्यम से अधिक हुआ है ताकि, स्त्रियों की ज़िन्दगी अधिक मुखर हो. ’घर’ की अवधारणा ’घरवालियों’ से ही बनती है अतएव, उनकी बातचीत में ही समस्या को कथा शृंखलाओं में पिरोया गया है. इस संयुक्त परिवार में कोई भी प्रसंग ’व्यक्तिगत’ नहीं रहा पाता, सब कुछ पारिवारिक होता है, यह संयुक्त परिवार की विशेषता भी है.

 सास धनवन्ती अस्वस्थ पति के साथ ज्यादा समय बिताती है. जब कभी रसोईं में जाती है तो वहाँ बहुओं ख़ासतौर से परिवार से असन्तुष्ट फूलावन्ती द्वारा उनकी निगहबनी होती है. उसे घर के मालिक के लिए ही दूध लेना असहज लगता है तो भी वह, पति-बेटों के साथ समस्याओं का समाधान ढूढ़ती रहती है..उपन्यास में तीनों पुत्रवधुओं के रंग-ढंग अलग-थलग हैं. सुहागवन्ती बिल्कुल पारम्परिक, सीधी-साधी पुत्रवधू और पत्नी है और आचार-विचार और व्यवहार में पूर्णरूपेण कुलीन. सबसे छोटी फूलावन्ती इर्ष्या -द्वेष से ग्रसित झगड़ालू है. वह, न तो परिवार के प्रति  ज़िम्मेदारी का भाव रखती है और न ही सम्मान का. व्यवसाय एक होने से सभी भाई एक साथ हैं लेकिन, फूलावन्ती उनके बीच असहिष्णुता दर्शाकर पति गुलजारी के साथ मायके रहने का निश्चय करती है. गुलजारी, कठपुतली बना ससुराल में रहता तो है मगर खुश नहीं है, क्योंकि उसे अर्थसंकट भी बना रहता है. इस प्रकार, उपन्यास में संयुक्त परिवार की अनेकानेक समस्याएं, उठा-पटक, इर्ष्या -द्वेष और विघटनकारी तत्व मौजूद हैं. सास-ससूर और जेठ बनवारी, जिठानी सुहागवन्ती के सौहार्द्र और धैर्य से येन-केन प्रकारेण परिवार संयुक्त है. लेकिन, मझली बहू समित्रावन्ती की समस्या सबसे जुदा है इसलिए, वही प्रमुख चरित्र है. उसकी जैविक ज़रुरत, अर्थ-संकट से अधिक बड़ी समस्या प्रतीत होती है. फ्रायडीय सिद्धान्त उपन्यास को समझने में अधिक मददगार होता है. मित्रो, वाक्पटु, मुखर, हाज़िरज़वाब, मज़ाकिया और व्यंग्य-विधा में निपुण है. जबकि वह, शिक्षित हो, ऐसा कोई उल्लेख उपन्यासिका में नहीं है. वह, सबको हँसती खिझाती परेशान करती है और घर के लोग उसकी चिरौरी करते रहते हैं. वह, अपनी ज़िद और हठ में ऐंठी हुई रहती है.

उसकी स्वच्छन्दता खिलदड़ापन पूरे उपन्यास में अभिव्यंजित है. वह, पति सरदारी से प्रेम न करती हो, ऐसा नहीं; किन्तु उसकी शिकायत है कि पति में उसके लिए चाहत तड़प नहीं हैं. ’जिठानी तुम्हारे देवर सा बकलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीति-प्यार न जलन-प्यास– बस आए दिन धौल धप्पा– लानत मलानत.’’2 पति का मतलब उसके लिए सही मायने में ’संगी’ है जो मन-तन की साझीदारी करे. लेकिन, सरदारी का व्यवहार संयुक्त परिवार के पुरुषों की भाँति पूर्णतया औपचारिक है. उससे सन्तुष्ट न होते हुए भी मित्रो उसे अर्थ-संकट से उबारने के लिए तीन-चार लाख रूपए भी देती है. परन्तु, उसका यह औदात्य या खिलंदड़ापन उपन्यास का केन्द्रीय कथ्य नहीं है, केन्द्रीय विषय है ’यौनिकता’ जिसके साझीदार स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं और सहमति में दोनों को आनंदानुभूति होती है. लेकिन, उपन्यास में मित्रो की समस्या उसकी देह-प्यास का न मिटना है. स्त्री की जैविक आवश्यकता को कभी तवज्जो नहीं दी गई. जब, स्त्री द्वितीय कोटि की है तो उसकी आवश्यकता महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है ? कृष्णा जी ने मित्रो के माध्यम से पुरुषों की घोषित मर्दानगी पर सवालिया निशान लगाया है. स्त्री की आवश्यकता से कन्नी काटना और दमनात्मक रवैया अपनाना क्या पुरुषों का अन्याय  नहीं है ? प्रश्न यह कि अनंग का असर तो स्त्री पर भी होता है. पुरुष, अपनी कामनापूर्ति के लिए घर और घर से बाहर भी कई रास्ते निकाल लेता है लेकिन औरत………



औरत अपनी देह-पिपासा का संकेत भी करे तो ’निर्लज्ज’ कहलाए. ’कामिनी’ की निन्दा गौतम बुद्ध, संत, भक्त कवियों सभी ने किया. पितृकुल और श्वसुरगृह दोनों संस्थानों में उसकी ’सेक्सुअलिटी’ पर नियन्त्रण रखने के लिए उस पर मर्यादा की चादर डाली जाती है. उसकी शुचिता ही इज्ज़त का पर्याय हुई. परन्तु, मित्रो काम की धधकती ज्वाला से शान्त नहीं रह पाती. वह कहती है, ’’मेरा यह बेकल मर्द जना यही नहीं जानता है कि मुझ जैसी दरियाई नार किस गुर से काबू आती है. मैं निगोड़ी बन-ठन के बैठती हूँ तो गबरू सौदा सुल्फ लेने उठ जाता है. जिसने नार-मुटियार को सधाने की पढ़ाई नहीं पढ़ी, वह इसे बालों की बलूगड़ी को क्या सधाएगा ? 3 मित्रो ऐसी उफनती नही है कि जेठ बनवरी को भी अपनी कामना धार में बहा लेना चाहती है. वह कहती है, ’’मर्द जन होते तो या चटखारे ले ले मुझे चाटते या फिर शेर की तरह कच्चा चबा डालते.’’4 वह, अपने अंग-प्रत्यंग के माधुर्य और देह सौन्दर्य पर खुद रीझती है. स्त्री परिवार की मर्यादा होती है.अगर वह ’विपथगा’ है तो परिवार पर आँच आयेगी. इसीलिए उपन्यास के सभी बड़े स्त्री-पुरुष पात्र मित्रो को समझाते रहते है. गुरुदास कहता है, ’’आँख का पानी उतर गया तो फिर क्या घर-घराने की इज्ज़त और क्या लोक मरजाद? सरदारी उस पर तोहमत लगाता उसे ’छिनालों की भी छिनाल’ कहता है. उसके रोग का इलाज उसके लिए संभव नहीं होता. बेबसी में उसके उद्दाम वेग पर नियंत्रण ’पिटाई’ द्वारा करना चाहता है. यानी, अपनी कमी को डण्डे के बल से झुठलाना चाहता है. नज़रे न मिला पाने की स्थिति में मित्रो को ही नज़र नीची करने के लिए पीटता है.

 तब धनवन्ती मित्रो  को समझाती है- ’तू ही आँख नीची कर ले. बेटी, मर्द मालिक का सामना हम बेचारियों को क्या सोहे ?5 जब तक ससुराल का प्रसंग कथानक में चलता है तब तक घरेलू स्त्री की छवि मित्रो में अन्य पात्र तलाशते हैं. जिठानी सुहाग कहती है, ’’सरदारी देवर देवता पुरुष हैं देवरानी. ऐसे मालिक से तू झूठ-मूठ का व्यवहार कब तक करोगी ? यह राह कुराह छोड़ दे बहना.’’6 हालांकि, उपन्यास में प्रत्यक्ष कोई कथा-संयोजन चरित्रहीनता का नहीं रचा गया है मगर, उसके लिए घर के बाहर बाज़ार तक में लोगों के व्यंग्य बाण चलते हैं. उसके चरित्र को लेकर सभी सशंकित हैं. ’इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती  औरत की देह निरे पाप का घट है. ’7 सुहागवन्ती प्रार्थना करता है- ’’हे जोतेवाली देवी। इस घर की इज्जत-पत रखना.’’8 लज्जा का आवरण डालकर भारतीय स्त्रियाँ मन-तन की आवश्यकता को मारती रही हैं और उसी लज्जा को स्त्री का आभूषण माना गया. जयशंकर प्रसाद ने ’कामायनी’ का एक पूरा सर्ग ’लज्जा’ मनोभाव पर लिख डाला है. परन्तु, कृष्णा सोबती की मित्रो का संबंध लज्जा से तनिक भी नहीं है. वह यौवन के उमंग, तरंग में आकंठ निमज्जित रहती है. उसे, मर्यादा, नैतिकता जैसे मूल्यों का तनिक भी बोध नहीं है. देह की भूख उसके लिए उतनी ही प्राकृतिक है जितना साँस लेना.

लेखिका ने मित्रो जैसा उन्मुक्त व्यवहार, बिन्दास अन्दाज, पारदर्शिता व उसकी लज्जारहित वाणी के माध्यम से जिस स्त्री का निर्माण किया है, वह किसी कुलीन परिवार की बेटी नहीं हो सकती, ऐसी सोच, स्वयं कृष्णा जी की भी है इसीलिए, उन्होंने उसे ऐसी औरत की आत्मजा बताया है जिसका पारिवारिक जीवन नहीं है, अपितु, वह देह के कारोबार में संलग्न है. फिर भी मित्रो लेखिका के लिए सहानुभूति की पात्र है. शायद, इसलिए कि कृष्णाजी उन लोगों में शुमार हैं जो मनुष्य को जाति, वर्ग और जेंडर के कटघरे में बाँटने से पहले उसके आत्यंतिक सत्य को महत्व देती हैं- शबारी ऊपरे मानुष सत्य…..9 निम्नमध्यवर्गीय गुरुदास के परिवार में वेश्या पुत्री मित्रो का आगमन चकित करता है. लगता है, लोग दहेज और सौन्दर्य से आसक्त हुए होंगें अन्यथा परिवारों में प्रायः ऐसा नहीं होता. मित्रो स्वयं कहती है,’’ सात नदियों की तारू, तवे सी काली मेरी माँ और मैं गोरी चिट्टी उसकी कोख पड़ी. कहती है इलाके के बड़भागी तहसीलदास की मुँहादरा है मित्रो…… अब तुम्हीं बताओं जिठानी, तुम जैसा- सत्तबल कहाँ से पाऊँ-लाऊँ देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं समझता……… और मेरी इस देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मछली सी तड़पती हूँ.’’ 10 तात्पर्य यह कि संस्कार, नैतिक मूल्य पारिवारिक संरचना में निर्मित होते हैं। इसीलिए, विवाह के वक्त लड़के लड़की के कुल की छानबीन की जाती है. जब तक मित्रो गुरुदास के परिवार में रहती है, वह पाठकीय करुणा अर्जित करती है किन्तु, मायके पहुँचने पर, उसकी जो लीला रची जाती है; उसका ध्वन्यार्थ यही निकलता है कि परिवेश का असर चारित्रिक संरचना में सौ फीसदी होता है. वहाँ, उसकी अर्जित नैतिकता का गुब्बारा बहुत जल्दी फूटता है.

उपन्यास के उत्तरार्ध के पृष्ठों पर जिस तरह लेखिका ने ’स्त्री की स्वतन्त्रता को प्रश्नांकित किया है; यशपाल के उपन्यास  ’दिव्या’ की स्मृति ताज़ा हो जाती है कि ’वेश्या’ ही स्वतन्त्र होती है. अन्य के लिए अभिभावक पिता, पति या बेटे की अनुमति आवश्यक है.’’11 विवाह ’संस्था’ की जितनी भी आलोचना की जाय, उसकी जड़ें मजबूत है; कृष्णा जी भी उसके अस्वीकार के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने कुलवधू मित्रो और वेश्या बीबो के माध्यम से स्त्री के दोनो  पक्षों पर प्रकाश डाला है. बीबो को ’खसम’ न पाने की कचोट है तो ’बड़े-बडे बाघ छका डाले’ का अहंकार भी. मित्रो, मायके पहुँचकर ’घरवाले का मान-गुमान’ भुलाकर विपथपा होना चाहती है. माँ-बेटी की गरिमा भी वहाँ हवा हो जाती है, वे सिर्फ दो स्त्रियाँ रह जाती हैं. बीबो मित्रो से कहती है, ’’अरी लहर हो तो बुलाऊँ तेरी बगीची के लिए कोई माली ?’’ वह अपने पुराने साथी के पास उसे भेजने का उपक्रम भी करती है, तभी उसे आत्मग्लानि होती है, ’’एक दिन जो डिप्टी सौ-सौ चावकर तेरी शरजी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरलियाँ मनाएगा. थू; री बालो तेरी ज़िन्दगी पर.12 निस्संदेह, उपन्यास में, आदर्श/नैतिकता का मुलम्मा हटाकर स्त्री पात्रों का रचाव प्राकृतिक ढंग से करने की कोशिश है. इसी कारण मित्रो कह पाती है- ’अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म.’’ उसका यह तर्क सामाजिक मूल्यों के समक्ष चुनौनी है. अलबत्ता, व्यक्ति और समाज के द्वन्द्व का विकास क्रमिक होता हुआ दिखता है.

मित्रों के सारे कार्य-व्यापार में ’सेक्सुअलिटी’ की कुंठा है. इस तरह उपन्यास के चारित्रिक विश्लेषण के लिए मनोवैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित है. कृष्णा सोबती विवाह संस्था के विपक्ष में खड़ी नहीं है.उपन्यास का विषय बोल्ड होने के बावजूद भी उन्होंने मित्रो को जिस तरह सरदारी से प्रेम करते हुए दिखाया है, उसे, माँ बीबो के ’काले चेहरे पर दो चील की-सी आँखे’ दिखती हैं तो वह तड़प कर चीखती है-’तू सिद्ध भरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी ? सो न होगा, बीबो कहे देती हूँ.’13 या बीबो का यह कहना……… ’’न-न री, अब इस ठठरी ठण्डी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं. कोई मरे मनुक्ख का नाम भी नहीं……14 वेश्या स्त्री के जीवन का निर्जन एकान्त, हाहाकार करता सन्नाटा इतना भयावह होता है कि मित्रो भय से काँप उठती है. उसे सरदारी लाल दिल के और करीब लगने लगता है. समस्या का निदान भिन्न परिवेशों की संरचना और मानसिक चेतना के बदलाव में ही होता है. उपन्यास का कथानक, पंजाबी भाषा की देशज साज, रवानगी, कविता जैसी अर्थव्यंजकता, झरने जैसा शब्द-प्रवाह और नदी जल जैसी ध्वन्यांत्मकता प्रभावित करती है.रचना की पठनीयता इतनी कि एक पाठ में ही उपन्यास समाप्त हो जाय. मित्रो मरजानी अमर कृति बन जाती है प्राकृतिक समस्याओं के उठान और समाधान के विमर्श हेतु, यही कारण है इसकी पठनीयत और लोकप्रियता का. सौ पन्नों की यह उपन्यासिका कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित होकर पढ़ी-पढ़ाई जा रही है, यह किसी भी रचना के महत्व का द्योतक है.

सन्दर्भ

1.  मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट-स्त्री अधिकारों का औचित्यसाधन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
2. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
3. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 34, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
4. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
5.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 11, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
6.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 92, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
7 . कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 18, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
8. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 19, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
9 .  गरिमा श्रीवास्तव-कृष्णा सोबती, के साथ साक्षात्कार, पृ.सं. 50, ’लहक’ मार्च-अप्रैल 2016 कोलकाता
10. कृष्णा सोबती-दिव्या, पृ.सं. 20, राजकमल
11. यशपाल-दिव्या, पृ.सं. 118-119, लोकभारती प्रकाशन
12. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 108 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
13. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 111, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
14. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 110, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

क्रान्ति

राज वाल्मीकि

 युवा रचनाकार , सामाजिक कार्यकर्ता rajvalmiki71@gmail.com

‘‘आप सभी साथियों को जयभीम ! मेरा नाम क्रान्ति है. मैं उन्नीस साल की लड़की हूं. दिल्ली की एक स्लम बस्ती में वंचित वर्ग के बीच रहती हूं. इस बारे में मेरा कहना है कि-हम वंचित समाज के लोग हैं. हमें सदियों से हमारे अधिकारों, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म-संस्कृति आदि से वंचित रखा गया है. यहां मैं  यह स्पष्ट कर दूं कि धर्म-संस्कृति से मेरा तात्पर्य पूजा-पाठ, देवी-देवताओं से नहीं है.  धर्म-संस्कृति एवं ईश्वर के नाम पर पंडे-पुजारियों से लुटना मूर्खता है. धर्म-संस्कृति  से मेरा मतलब वंचित वर्ग की  मानवतावादी धर्म-संस्कृति से है. जिसे हिन्दुत्ववादी शक्यिों ने नष्ट कर दिया है. उसकी पुनःस्थापना करना कोई बच्चों का खेल नहीं है. जैसे हिन्दू अपने होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस, बैसाखी, पोंगल आदि अनेक त्योहार मनाते हैं.  वैसे ही अम्बेडकर जयन्ती, बुद्ध पूर्णिमा को वंचित वर्ग के बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि वंचित तबके के जन-जन का त्योहार बनाया जाना चाहिए. साबित्रीबाई फुले की जयन्ती को लोकप्रिय बनायें ज्योतिबा फुले, कबीर, रैदास आदि वंचित वर्ग के जो महापुरूष हुए हैं, झलकारी बाई जैसी महानायिका हुई हैं, उनका जन-जन तक प्रचार-प्रसार करें. वंचित वर्ग को कनविंस करें कि स्वतन्त्रता,समता, बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित प्रथाएं ही वंचित वर्ग की धर्म-संस्कृति है. लेकिन यह सब कहना आसान है, इसे कार्यान्वित करना मुश्किल. लेकिन मेरा मानना है कि यह मुश्किल तो है-पर नामुमकिन नहीं. हमें ठोस पहल करते हुए वंचित वर्ग के द्वार-द्वार पर दस्तक देनी चाहिए. इस योजना को कार्यरूप देने हेतु मैं आपके साथ घर-घर जाने को तैयार हूं..’’

अभी आपने इस युवा लड़की की बातें सुनीं. अरे, मैं आपका इस गोष्ठी में स्वागत करना तो भूल ही गया.आइए हमारी इस साप्ताहिक गोष्ठी में आपका स्वागत है. हर संडे को हमारी यह गोष्ठी आयोजित की जाती है. हम सभी स्वरोजगारकर्ता अथवा नौकरी पेशा लोग हैं.इतवार का दिन ही हमारे अनुकूल रहता है. पहले मैं इस गोष्ठी के सदस्यों से आपका परिचय करा दूं. हम पांच लोग हैं. नहीं-नहीं, अब छह कहिए. नयी-नयी जुड़ने वाली क्रान्ति भी तो हमारे साथ है. हम लोग सामाजिक-साहित्यिक रूचि के लोग हैं. संदीप जी एम.सी.डी. में कार्यरत हैं. रमेश जी एक निजी कम्पनी में काम करते हैं. महेश जी ट्रेवेल एजेंसी चलाते हैं. डाॅ. सन्तराम आर्य का अपना क्लीनिक है. वे आयुर्वेद के डाॅक्टर हैं. राज यानी मैं एक एन.जी.ओ. में काम करता हूँ . डाॅक्टर साहब को छोड़कर हम सभी थर्टी प्लस एज ग्रूप के हैं. डाॅक्टर साहब सिक्सटी प्लस में हैं. हम सभी दलित हैं. सोशल वर्क करने में हम सभी की रूचि है. एक बार हमने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि हमारे दलित समाज में वाल्मीकि समुदाय के लोग शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़े हैं. क्यों न उन्हें शिक्षित किया जाए ?  इसी सिलसिले में हमने स्लम बस्ती में सर्वे किया. सर्वे के दौरान यह लड़की हमें मिली. क्रान्ति ने हमें विशेष रूप से प्रभावित किया. उस ने अभी बारहवीं की परीक्षा दी है. रिजल्ट दो महीने बाद आएगा. तब तक वह बस्ती के लोगों विशेष कर महिलाओं को जागरूक करने में लगी हुई है. टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा से मिलता-जुलता चेहरा. गेहुंआ रंग एवं सामान्य कद-काठी. यौवन की दहलीज पर खड़ी इस लड़की में एक विशेष आर्कषण है.

तेज बोलने वाली-यह रेडिकल लड़की-सबको अपनी बातों से सम्मोहित कर लेती है. इसी कारण यह अपनी बस्ती की अघोषित नेत्री है. जब हम पांचो लोग शिक्षा हेतु जरूरतमंद बच्चों का सर्वे करने गये तो बस्ती वालों ने सबसे पहले इसी लड़़की से मिलवाया. हमें स्वयं भी ऐसी लड़़की की तलाश थी जो बच्चों को शिक्षित करने में हमारा सहयोग कर सके. पहले तो इस लड़की ने तरह-तरह के प्रश्न पूछ कर हमें जांचन-परखने की कोशिश की. यह कि हम अपने किसी मतलब से तो नहीं आए हैं. हम से हमारी पहचान के सबूत मांगे. जब हमने सबूत पेश किये और विस्तार से उसे समझाया कि हमारा एकमात्र उद्देश्य वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को शिक्षित करना है तो कुछ कनविंस हुई और हमारा सहयोग करने को तैयार हुई. वैसे हम लोग सिर्फ वाल्मीकि समुदाय तक सीमित नहीं हैं. दलित शब्द के अन्तर्गत जो भी जातियां आती हैं-हम सब के उत्थान की बात करते हैं. और न सिर्फ बात करते हैं बल्कि उनके उत्थान का कार्य करते हैं. जो दलित जागरूक नहीं हैं. उन्हें जागरूक करने का प्रयास करते हैं. बाबा साहब के विचारो की रोशनी से उनके मन का अज्ञान-अंधकार दूर करते हैं. किन्तु शिक्षा के बारे में हमें वाल्मीकि समुदाय सबसे पिछड़ा लगा. अतः उसे शिक्षित करने की हमने पहल की.  इसी दौरान क्रांति से मुलाकात हुई. अब हम क्रांति को भी अपनी गोष्ठी में बुलाने लगे. इस नवयुवा लड़की के विचारों में भी नयापन होता है. वह ‘दलित’ शब्द पर भी आपत्ति करती है. उसका कहना है कि दलित शब्द का शाब्दिक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे. फिर हम स्वयं को दलित क्यों कहें ?

जब हम स्वयं ही दलित कहना पसन्द करेंगे तो अन्य लोग तो हमें दलित कहेंगे ही. हम मनुष्य हैं तो हमें मनुष्य के रूप में ही जाना जाए. क्रांति की लेखन में भी रूचि है. वह कविताएं और लेख लिखती है. उस की कविताएं पढ़कर आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल की याद आना स्वाभाविक है. उसे ‘दलित साहित्य’ पर भी आपत्ति है. उसने हमें ‘अपेक्षा’ के संपादक डाॅ. तेज सिंह एवं उप संपादक ईश कुमार गंगानिया का स्मरण दिलाते हुए कहा कि वे दलित साहित्य की बजाय अम्बेडकरी अथवा अम्बेडकरवादी साहित्य शब्द को प्रमुखता देते हैं. और सही देते हैं. अम्बेडकर की विचारधारा और विमर्श से उपजे साहित्य को अम्बेडकरवादी साहित्य ही कहा जाना चाहिए. आज जब हम सब गोष्ठी में दलित धर्म की अवधारणा एवं दलित संस्कृति की बात कर रहे थे तो क्रांति ने धर्म-संस्कृति पर जो विचार रखे वो आपने शुरू में पढ़ ही लिए हैं.  हमारी गोष्ठी में एकबार स्त्री-पुरूष समानता का विषय छिड़ गया तो क्रांति का न जाने कब से दबा आक्रोश ज्वालामुखी फूट पड़ा.‘‘ मत करिये आप लोग स्त्री-पुरूष समानता की बातें ! आप लोग दोहरे  मापदण्ड अपनाते हैं. घर में कुछ और-बाहर कुछ और ! महिलाओं के सामने कुछ और-उनकी पीठ पीछे कुछ और ! इस पितृृृसत्तात्मक समाज में सारे अधिकार पुरूषों को ही दिये गये हैं. वंचित वर्ग के पुरूषों ने भी स्त्रियों को उनके अधिकारो से वंचित किया है. विडम्बना यह है कि जागरूक नहीं होने के कारण महिलाओं ने भी पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की कमान अपने हाथों मेें संभाल रखी है। और इस तरह से अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मार रही हैं.

 मैं तो बस्ती की महिलाओं से जाकर कहती हूं कि पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की अफीम के नशे में बेसुध महिलाओं जागो ! अपनी अस्मिता को पहचानों।.शोषण मुक्त समाज बनाओ….मैं तो स्पष्ट कहती हूं कि मैं आप जैसे बुद्धिजीवियों पर भी विश्वास नहीं करती. आप लोग कागजों पर क्रांति करते हैं. अपने लेखन-भाषण में कुछ होते हैं-और असली जीवन में कुछ और ! सच कहूं तो आप बुद्धिजीवी लोग बहुत घाघ होते हैं.बगुला भगत की तरह जो मौके की तलाश में सन्त बने रहते हैं और मौका देखते ही मछली गप से अपनी चोंच में पकड़ लेते हैं. यूं मैं सभी बुद्धिजीवियों की बात नहीं कर रही हूं. अपवाद हर जगह होते हैं  किन्तु अधिकांश बुद्धिजीवी बहुत ही घाघ होते हैं. वे कहते कुछ हैं.करते कुछ हैं.अब आप अपने साथी दिनकर का ही उदाहरण लें. मैं अपनी मौसी के घर जा रही थी. दिनकर द्वारा बाईक पर लिफ्ट देने का आग्रह करने पर आपलोगों ने ही कहा था कि दिनकर का आॅफिस भी उधर ही है, वह तुम्हें बाईक से ड्राप कर देगा. आपकी बात मानकर मैं उसकी बाईक पर बैठ गई. आधे रास्ते में ही कहने लगा कि भूख लगी है, चलो किसी रेस्तरां में बैठकर कुछ खाते हैं. सुबह का समय था. मुझे भूख नहीं लगी थी. मैंने मना किया लेकिन वो नहीं माना. कहने लगा मुझे भूख लग रही है. मैकडोलैंड में बैठ कर वह विदेशी महिलायों  उनके खुलेपन की तारीफ करने लगा. फिर कहने लगा मैं आज आॅफिस की छुट्टी कर लेता हूं. कहीं घूमने चलते हैं. फिल्म देखते हैं. अपने बारे में बताने लगा कि मैं एक राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका में संपादक हूं. दिल्ली की अन्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी मेरी जान-पहचान है.

 मुझे आप अपनी रचनाएं दीजिए मैं अपनी पत्रिका में भी छापूंगा और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपवाउंगा. और आप बहुत जल्द राष्ट्रीय स्तर की लेखिका बन जाएंगी. मैंने कहा मुझे छपास रोग नहीं है और न राष्ट्रीय  स्तर की लेखिका बनने की ख्वाहिशमंद हूं.  मैं एक सोशल एक्टिविस्ट हूं. मैं इसी कार्य को प्रमुखता देती हूं.यही मेरा लक्ष्य है. मैं समझ गई थी कि वह मुझे दाने डाल रहा है. यानी वह अपनी असलियत पर उतर आया था. शराफत और नारी-सम्मान की बात करने वाला चालीस वर्षीय दिनकर अपनी बेटी की उम्र की लड़की को पटाने पर आमादा था. मैने उसे अच्छी-खासी डांट पिलाई. मन तो कर रहा था उसके गाल पर तमाचा रसीद कर दूं. मैं वहां से उठकर सड़क पर आ गई और बस पकड़ कर मौसी के घर चली गई. ’’क्रांति ने  हम से पूछा.‘‘अच्छा, क्या ये आवारा/लफंगा अभी तक कुंआरा है ?’’  संदीप ने कहा-‘‘ क्रांति जी , हम आपसे क्षमा चाहते हैं कि हमारा एक साथी आपके साथ इस तरह पेश आया. यों तो दिनकर हमारी गोष्ठी का सदस्य नहीं है. पर वह लेखक-संपादक है. हम लोग भी साहित्यिक रूचि के लोग हैं. इसलिए हमारी उससे मित्रता है. वैसे दिनकर शादी-शुदा है. उसके दो बच्चे भी हैं. पर वह लड़कियों को फ्लर्ट करता रहता है. हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह आपके साथ बदतमीजी से पेश आएगा.’’‘‘ अगर मुझे पहले पता होता तो सैंडिल उतार के उसके वहीं बजा देती. उसकी वो गत करती कि लड़कियों को फ्लर्ट करना भूल जाता.

मुझ से कह रहा था कि-‘मैं कुंआरा हूं. कोई अच्छी लड़की ही नहीं मिली. कोई आप जैसी लड़की मिल जाती तो शादी कर लेता….’ ऐसी हरकतों से ही मेरा पुरूषों से विश्वास उठ गया है. हालांकि मैं मानती हूं कि सब पुरूष ऐसे नहीं होते. पर अधिकांश ऐसे ही होते हैं. …वैसे कोई भी पुरूष मेरी मर्जी के खिलाफ मुझे भोग नहीं सकता. मैं चाहूं तो किसी मंदबुद्धि और कुरूप युवक के साथ भी सो सकती हूं और न चाहूं तो कोई फिल्मी हीरो जैसे स्मार्ट-हैंडसम बुद्धिजीवी युवक भी मुझे हाथ नहीं लगा सकता.’’ क्रांति की बात सुनकर इस से मिलता-जुलता रमणिका गुप्ता का कहीं पढ़ा हुआ संवाद दिमाग में कौंध  गया. लगा कि बन्दी ये बिन्दास है. क्रांति ने  बातचीत में कहा था कि इस गोष्ठी के माध्यम से दिनकर जैसे लोगों के कटु अनुभव हुए हैं तो अनिता दीदी जैसी मार्गदर्शिका भी मिली हैं. मैं राज जी की आभारी हूं कि उन्होंने अनिता दीदी से मेरा परिचय कराया. अनिता दीदी से उसका तात्पर्य अनिता भारती से था.अनिता जी की दलित समाज में अच्छी पहचान है. वे सर्वोदय विद्यालय में वरिष्ठ अध्यापिका हैं.समाज-सेविका व लेखिका हैं.हम अपनी साप्ताहिक गोष्ठी में समसामयिक दलित मुद्दों पर भी चर्चा करते रहते हैं. जैसे कानपुुर में बाबा साहब की मूर्ति तोड़े जाने पर या खैरलांजी कांड पर या हरियाणा के सालवन गांव में दलितों के घर जलाए जाने पर. क्र्रांति हमारी गोष्ठी में सक्रिय भागीदारी करती है. वह अपने विचार गोष्ठी में रखती है. वह पुरूषों पर आरोप लगाती है कि वंचित वर्ग के  पुरूष भी सिर्फ पुरूष मुद्दों को  ही उठाते हैं स्त्री विषय पर विशेष तबज्जो नहीं देते. वह दलित समुदाय में  व्याप्त  अंधविश्वासों पर चर्चा  करती है.

 उसका कहना है कि रूढि़वादी एवं अंधविश्वासो में जकड़े होने के कारण वंचित समाज महिलाओं को जादू-टोना करने वाली डायन आदि करार देकर उन्हें तिरस्कृत करता है.  सरेआम उनका अपमान करता है. उन्हें नग्न करके गांव में घुमाता है. दूसरी ओर वंचित वर्ग की महिलाएं सवर्णों की आसान शिकार होती हैं. उनसे बलात्कार करना सवर्ण अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं. अगर वे विरोध करें तो उन्हें नग्नावस्था में गांव में घुमाया जाता है. उन पर तरह-तरह से अत्याचार किये जाते हैं.  उन्हें जिन्दा जला दिया जाता है. उड़ीसा में एक लड़की को साईकिल पर चढ़ने नहीं दिया गया. वह साईकिल पर सवार होकर स्कूल जाती थी. हरियाणा में वंचित वर्ग की बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की के साथ दबंग जाति के लोगों ने सिर्फ इसलिए बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी क्योंकि मना करने के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी. वह अपने गांव में सर्वाधिक पढ़ी-लिखी लड़की थी. हमेशा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती थी. ऐसी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि दबंग जाति समुदाय को वंचितों का आगे बढ़ना सहन नहीं हो रहा है. उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि कल तक हमारी गुलामी करने वाले, हमारे इशारों पर चलने वाले आज पढ़-लिख कर हम से आगे बढ़ें. हमारी गुलामी करने से इन्कार करें. स्पष्ट है कि क्रांति काफी  जागरूक लड़की है .हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखती है। सच कहूं तो क्रांति ने मुझे इम्प्रेस्ड कर दिया था। मैंने क्र्रांति को शाम को अपने घर खाने पर बुलाया। उसने आना स्वीकार किया। दरअसल क्र्रांति के विचारों ने मेरे अन्दर जिज्ञासा पैदा कर दी थी। मैं उसके बारे में और अधिक जानना चाहता था।

शाम को क्रांति हमारे  घर आई. मैंने पत्नी को क्रांति  के बारे में पहले ही बता दिया था अतः वह भी उस से मिलने को उत्सुक थी. उसके बारे में जानना चाहती थी. पत्नी ने उसके लिए भोजन तैयार किया. औपचारिक अभिवादन के पश्चात् मैंने क्रांति  को बैठने का संकेत करते हुए कहा.‘‘क्रांति तुम्हारे सामाजिक विचारों से तो कुछ-कुछ अवगत हूं. हम पति-पत्नी चाहते हैं कि तुम अपने निजी जीवन, परिवार आदि के बारे में बताओ.’’
‘‘देखिए राज जी, मेरा जन्म एक साधारण वाल्मीकि परिवार में दिल्ली में हुआ. मेरे पापा एम.सी.डी. में फोर्थ क्लास कर्मचारी थे. जब मैं सात-आठ साल की हुई तब से मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़ते देखा था।.दरअसल पापा बहुत दारू पीते थे और अन्य महिलाओं से अवैध संबंध रखते थे जो कि मेरी मां को पसन्द नहीं था. इसी विषय में घर में लड़ाई-झगड़े होते रहते थे. मेरे मम्मी-पापा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. मम्मी-पांचवी छठी तक तथा पापा सातवीं या आठवीं तक पढ़े थे. मुझ पर उनके लड़ाई-झगड़े का बुरा प्रभाव न पड़े इस लिए मम्मी ने मुझे गांव में नानी के पास भेज दिया था. गांव में नानी के अलावा मामा-मामी थे. नानाजी गुजर चुके थे. मामा-मामी नानी को दो रोटी भी टाईम पर नहीं देते थे. अतः नानी को गांव में पाखाने कमाने का कार्य करना पड़ता था. मामा को कभी गांव में मजदूरी मिल गई तो कर ली नहीं तो यों ही आवारा घूमते रहते या लोगों के साथ ताश खेलते रहते. मामी भैंस पालती थीं. उसका दूध बेच कर घर-खर्च चलातीं थीं….’



इस बीच पत्नी ने खाना तैयार कर लिया था. वे खाना लेकर आ गईं. हम तीनों खाना खाने लगे.
‘‘आपकी पढ़ाई की शुरूआत कैसे हुई ? ’’ मेरे यह पूछने पर क्रांति  ने बताया-‘‘तीसरी कक्षा तक तो मैं दिल्ली में ही पढ़ी.  फिर मां ने नानी के यहां भेज दिया. वहां नानी ने चैथी कक्षा में एडमीशन करवा दिया. मेरी नानी बूढ़ी हो चुकी थी.  सिर पर मैला ढोने जैसे घृणित कार्य के एवज में नानी को रोटी मिलती थी. यूं यह गन्दा काम मुझे बिलकुल पसन्द नहीं था. पर मैं अपनी बूढ़ी नानी को यह सब करते देखती तो मुझे तरस आता.  अपनी नानी की मदद करने के लिए मैं भी मैला साफ करने का कार्य करने जाती. फिर जल्दी से तैयार होकर स्कूल जाती. इस तरह दो साल मैंने गांव में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ पाखाने साफ करने का कार्य किया. छठी पास करने पर मम्मी ने मुझे पुनः दिल्ली बुलवा लिया. और सातवीं में एडमीशन करा दिया. इस बीच पापा किसी औरत को लेकर मुम्बई चले गये थे. और उन्होंने वहीं अपना घर बसा लिया था. पापा की एम.सी.डी. की नौकरी करके मम्मी घर का खर्च और मेरी पढ़ाई का खर्च चलाती थीं. गनीमत यह थी कि मकान हमारा अपना था. मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान  हूं. यूं सुना है दूसरी मां के भी बच्चे हैं पर मैंने उन्हें देखा नहीं. वे मुम्बई में रहती हैं. पापा जब से उसे लेकर गये तब से आज तक दिल्ली नहीं लौटे. मम्मी ने मुझे एक बेटे की तरह पाला और वो सारी छूट दीं जो हमारे समाज में लड़के को दी जाती हैं. लेकिन मैंने उनका मिसयूज कभी नहीं किया. मैंने अपना खाली समय अध्ययन करने में, लेखन मे, लोगों से मिलने में तथा पैंटिंग में बिताया. समाज सेवा के अलावा पैंटिंग और लेखन मेरा शौक है.

इधर मैं पढ़-लिख कर जागरूक हो रही थी.साथ ही कुछ सामाजिक लोगों से परिचय हुआ. कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं. इस से मेरा मानसिक विकास हुआ. जब मैं दसवीं में थी तब मैंने सरकार का सफाई कर्मचारियों के बारे में 1993  और 2013 का एक्ट पढ़ा तो मुझे पता चला कि मैला ढोने की प्रथा गैरकानूनी है और इस पर प्रतिबन्ध है. इस कार्य के बदले सरकार की पुनर्वास योजना के बारे में भी पता चला. मुझे नानी का ख्याल आया. मेरी नानी बुढ़ापे में यह कार्य कर रही है. दसवीं की परीक्षा के बाद दो महीनें की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल गई. सरकार के संबंधित विभागों से संपर्क करके तथा काफी भाग-दौड़ करके मैंने सीनियर सिटीजन की उनको सुविधाएं दिलवाईं. सरकार की स्कीमों का लाभ उठाया. उनके दो रोटी आराम से मिलने का प्रबंध कराया. और अपनी नानी का मैला ढोने का कार्य छुड़वाया. इतना ही नहीं ननिहाल में मोहल्ले की अन्य महिलाएं जो मैला ढोने का कार्य कर रहीं थीं. उनको समझाया. उनका पुनर्वास करवाया. आज वे ये काम छोड़ चुकी हैं. पुनर्वास का लाभ लेकर अन्य सम्मानीय कार्य कर रही हैं . अन्याय एवं शोषण के खिलाफ मेरे मन में एक आक्रोश-एक आग भरी हुई है. जब भी मैं अन्याय-शोषण देखती हूं तो मेरा खून खौलने लगता है. मुझ से रहा नहीं जाता और मैं बीच में कूद पड़ती हूं. हालांकि मुझे परेशानियों का सामना करना पड़ता है. पर मैं हिम्मत हारने वाली नहीं. अभी तो मेरे संघर्ष की शुरूआत है. अभी मुझे बहुत पढ़ना है. अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना है. अपनी जैसी बहनों को जागरूक करना है. अनपढ़ मां-बहनों का अंधविश्वास दूर करना है.  उनके फिजूल के खर्चं कम कराने हैं. उन्हें शिक्षा का महत्व समझाना है.

मेरी बस्ती में महिलाएं पहले लड़का-लड़की में भेदभाव करती थीं.  मैंने उन्हें समझाया कि यह गलत है.
लड़का-लड़की बराबर हैं. व्यवहार में बेटियां बेटों से ज्यादा वफादार साबित होती हैं. मेरे समझाने का उन पर सकारात्मक असर पड रहा है.  अपने वंचित समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाना है. यही मेरे जीवन का लक्ष्य है. आप लोगों के साथ भी इसीलिए जुड़ी हुई हूं कि आप वंचित वर्ग के लिए कुछ करना चाहते हैं. आपकी करनी-कथनी में अन्तर नहीं है. आपके इरादे नेक हैं. पर मैंने इस छोटी-सी उमर में ही इतना अन्याय/अत्याचार देखा है कि मेरी जबान बहुत तीखी हो गई है. मैं किसी को बख्स नहीं पाती. आप इसे मेरा जोश भी कह सकते हैं. क्रांति  ने घड़ी की  ओर देखा. हम लोग खाना खा चुके थे. वह बोली. ‘‘अरे घर जाने से पहले मुझे एक जरूरी काम करना है.  यह कह कर वह उठ खड़ी हुई. मेरे स्टडीरूम में गई. मेरे दोनों बच्चे हर्ष और मिली भी उसके साथ गये. क्रांति  ने अपने बैग से मोमबत्ती के कुछ पैकेट्स निकाले. स्टडीरूम में लगे बाबा साहब के चित्र को नमन किया. फिर मोमबत्ती जलाने लगी. मिली बोली-‘‘दीदी ये आप क्या कर रही हैं ?’’
‘‘मिली, आज 13 अप्रैल है। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के जन्म की पूर्व संध्या। इसलिए उनके चित्र और इन किताबों वाले कमरे में मोमबत्ती जला रही हूं. ’’हर्ष बोला-‘‘दीदी मोमबत्ती क्यों जला रहीं हो ?’’
‘‘देखो हर्ष, जिस तरह से हिन्दुओं की दो दीवाली होती हैं-एक छोटी दीवाली एक बड़ी दीवाली. ऐसे ही बाबा साहब का जन्म दिन एक त्योहार है-हम सब के लिए. जैसे दीवाली पर दीपक जलाते हैं उसी तरह बाबा साहब का जन्मदिन भी उजाले का पर्व है.

ये पुस्तकें देख रहे हो-ये शिक्षा की प्रतीक हैं. ये इतनी सारी मोमबत्तियां संगठन का प्रतीक हैं. और इन मोमबत्तियों की ज्योतियां कमरे का अंधेरा दूर कर रही हैं-ये संघर्ष का प्रतीक है. हमें अज्ञान का अंधेरा अपने अन्दर से मिटाना है. अर्थात् बाबा साहब ने जो तीन मूलमंत्र दिये हैं-‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो. उसे अपने जीवन में उतारना है. इसके बाद क्रांति  ने हम सब से विदा लेते हुए कहा-‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. अपने बस्ती वालों के घर-घर जाकर बाबा साहब के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बाबा साहब का महत्व समझाना है. आखिर उन्हें भी तो यह त्योहर मनाना है. और पूरे जोश तथा धूमधाम से मनाना हैै.’’ यह कहती हुई क्रांति चली  गई. मैं कल्पना कर रहा हूं. क्रांति अपनी बस्ती में घर-घर जाकर मोमबत्तियों के साथ ज्ञान की ज्योति जला रही है. लोंगों के मन का अज्ञान-अंधेरा दूर भगा रही है. उन्हें स्वतन्त्रता, समता, लैंगिक समानता, बंधुता, आत्मसम्मान का पाठ पढ़ा रही है. बस्ती वालों के घरों एवं हृदयों में उजाला भर गया है. इस उजाले में पूरी बस्ती जगमगा रही है. क्रांति इस वंचित समाज में एक नई क्रांति की लहर जगा रही है.

नील नीले रंग के

प्रियंका सोनकर

 प्रियंका सोनकर  असिस्टेन्ट प्रोफेसर
दौलत राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय. priyankasonkar@yahoo.co.in

“भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात वैश्विक स्तर पर उसका एक मजबूत स्थान कहीं न कहीं यह आश्वस्त करता है कि हम प्रगति के प्रशस्त पथ पर अग्रसर हो रहे हैं . इसके पश्चात जब हम भारतीय स्त्री का आकलन करते हैं तो बहुत निराश नहीं होते. हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि आनुपातिक तौर पर स्त्रियों की संख्या कम हुई है, बावजूद इसके पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री ने अपनी प्रभावपूर्ण उपस्थिति दर्ज करने में आंशिक सफलता प्राप्त की है . इसका श्रेय भारतीय संविधान को जाता है कि उसमें मनुष्य मात्र की अस्मिता की रक्षा करने का दायित्व-बोध निहित है.”——- हेमलता महिश्वर

दलितों के लेखन का जो स्रोत है वह उसका अपना समाज है, उसका अपना भोगा हुआ कटु यथार्थ है और इसी समाज की पूरी सच्चाई उनकी आत्मकथा, कहानियों, उपन्यासों और कविताओं में अभिव्यक्त हुई है. कवयित्री इस बात को सहज स्वीकार करती हैं – ‘मेरी बेचैनी किसी अनजान के कारण कभी नहीं हुई . मेरी व्याकुलता का कारण हमेशा चिर परिचित या अचिर-परिचित ही रहा है. समाज से परे किसी में इतनी ताकत नहीं कि वह मुझे बेकल कर सके.’ उस बेकरारी को नामालूम सा-करार देने के लिए मैं चल पड़ी हूं- नील, नीले रंग लेकर.’(नील, नीले रंग के)  40 कविताओं का यह काव्य संग्रह उस दलित और आदिवासी समाज की मार्मिक पीड़ा को उघाड़ता चलता है साथ ही उघाड़ता है एक कवयित्री का पूरा अन्तर्मन भी जिसमें पूरी की पूरी एक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है, वह दलित-आदिवासी स्त्रियों के संघर्ष को भी याद करना नहीं भूलती हैं. नीले बादल,(काव्य-संग्रह, दक्षिण भारत में स्त्री-स्वतन्त्रता की मुखर अभिव्यक्ति) नीला आकाश (उपन्यास-सुशीला टाकभौरे) नीला सूरज इसके विस्तार में यदि हम ‘नील, नीले रंग के’- को देंखे तो हमें यह ज्ञात होगा कि यह नीला रंग कितनी ऊर्जा देता है दलित रचनाकार को.  नीला रंग दलितों के लिए उनकी चेतना है और यह चेतना बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने दी है .

हेमलता महिश्वर उन दलित कवयित्रियों में प्रमुख हस्ताक्षर हैं जो अपने लेखन की प्रेरणा डॉ.भीमराव अंबेडकर से ग्रहण करती हैं. उन्होंने डॉ. अंबेडकर के 22 प्रतिज्ञासूत्र के तर्ज पर ही अपने जीवन में 22 प्रतिज्ञा सूत्र बनाये हैं जो अवतारवाद, ईश्वरवाद, ब्राह्मणवाद स्त्री-पुरूष असमानता के विरूद्ध एक महाख्यान रचते हैं. उनकी कविता में हम बुद्ध और डॉ.अंबेडकर का जो स्वरूप पाते हैं वह एक अलग और नया आकार ग्रहण करता हुआ नजर आता है. संग्रह के नाम पर ही नील नीले रंग की कविता का विस्तार देखिए:-

‘नीले रंग का मतलब
नहीं ज़ख्मों के निशान
या उससे उपजी उदासी
उठी उंगली
बाबासाहेब की है बताती
नीलों के अंतरिक्ष में
सूर्य एक रक्तबंबा्ळ्
लगा है धधकने
नीलों की गहराई का
नील गगन में हुआ विस्तार
सम्यक् मार्ग पर चलते
नील
अशोक चक्र में जा उभरे
स्वतन्त्र गणतन्त्र भारत की
तस्वीर लगी है पनपने’———-नील, नीले रंग के-2

नीले रंग की अभिव्यंजना जितने स्पष्ट और अद्भभूत  ढंग से हेमलता महिश्वर ने अपनी कविताओं में किया है वह बहुत ही काबिले तारीफ है. गहरी पीड़ा, उदासी, अपमान, अत्याचार और ज़ख्म से चोटिल हुए नीले रंग का जो अर्थ उनके मस्तिष्क में बना हुआ था, वह उनकी कविता नील, नीले रंग के क्रमशः पांच चरणों में अपना नया अर्थ खोलती नजर आती है. नीला रंग पीड़ा, अपमान, अत्याचार का नहीं वरन् नीला अंतरिक्ष, नील गगन, सम्यक् मार्ग और अशोक चक्र तक अपना विस्तार पाता है.
किस तरह से यह नीला रंग मानवता और मनुष्यता की बात करता है. नील, नीले रंग के-4 में इसको बहुत ही सरल और सहज ढंग से कवयित्री चित्रित करती है-
नील
नीले रंग के
पीपल से मिल गले
मनुष्यत्व की ओर बढ़ रहे थे.

डॉ.अंबेडकर ने समानता, स्वतन्त्रता और मानवता की बात की थी और यही मूलमंत्र दलित साहित्य और रचनाकारों के लिए भी है. मानवता की स्थापना और उसका प्रसार दलित लेखकों का लक्ष्य है.
अंधाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के दौर में आज आदिवासी एक पहेली बन गया है और उनका जीवन तो एक गहन पहेली.  इस पहेली को बड़ी तल्खी से कवयित्री ने अपनी कविता ‘पहेली’ में खोला है. आदिवासियों पर निरन्तर हो रहे शोषण, उनको माओवादी, नक्सली करार देना और विकास के नाम पर उनको जल, जंगल और जमीन से बेदखल करना यह पूंजीवादी सत्ता की चाल है. इस प्रकार देखें तो आदिवासियों का जीवन ही एक पहेली बन गया है.

‘सारे के सारों की सभ्यता से
जंगल अटा पड़ा था/इस सभ्यता को सहेजने
आगे आदिवासी/पीछे आदिवासी
यहां से जड़ उखाड़े /तो कहां जाकर
जड़ गाड़े आदिवासी
बूझो ! बूझो ! (पहेली, पेज नं.21)

‘स्वर्ग और स्त्री’ शीर्षक कविता स्त्री विमर्श की कविता है, जहां समाज में कवयित्री लैंगिक भेद-भाव के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराती है वहीं वह स्वर्ग और इन्द्रलोक को भी नहीं छोड़ती. यह कविता समान कर्तव्य और समान जिम्मेदारियों का बोध कराते तो चलती है उससे भी अधिक यह एक ऐसे लोक पर करारा व्यंग्य भी है जहां धरालोक की तरह ही असमानता व्याप्त है. प्रश्न करती हुई यह कविता स्वर्ग में आसीन इन्द्र के दरबार में घोर विषमता का भी बोध कराती है.

इंद्र के दरबार में/बहुत सारी हैं
देवियां भी/देवताओं की तरह
पर क्या कोई है/अप्सर भी
अप्सराओं की तरह/चांपने को चरण
देवियों के ? (पेज नं.32)

उपस्थित/अनुपस्थित-1-5 शीर्षक श्रृंखला कविता में झाड़न और मन दोनों शब्द एक बिम्ब रचते हैं जो इनकी कविता के उपस्थित/अनुपस्थित-1,2, 3 और 5 की श्रृंखला में क्रमशः प्रयोग हुए हैं.  जहां झाड़न एक तरफ अपनी पूरी मौजूदगी के साथ उपस्थिति दर्ज कराता है वहीं स्त्री का मन पूरे जद्दोजहद के साथ भी उपस्थित नहीं हो पाता है. झाड़न और मन का अन्तर्सम्बन्ध भी इस कविता में प्रतिलक्षित होता है.

बस/चमकाती रहीं/घर का मन
झाड़न की तरह/गंदले होते रहे /उनके मन ” (पेज नं.35)
स्त्री मन की यह कविता अपनी श्रृंखला में स्त्रियों के मनोमन को महसूस कराती और साथ ही घर में उनके हाड़-तोड़ मेहनत और कर्म की उपस्थिति तथा उनके मन की अनुपस्थिति का गहरा यथार्थ प्रस्तुत करती है.

घर में
अपनी उपस्थिति का/एहसास दिलाते
वे दुनिया से/अनुपस्थित हो गईं (उपस्थित/अनुपस्थित-4)
पराया धन या अपना घर न होने से स्त्री पीड़ित है । स्त्री का स्वयं का कोई घर नहीं है । बचपन से उसे पिता के घर में कहा जाता है कि तुझे अपने पति के घर जाना है, परायेपन का बोध बार-बार कराया जाता है और पति के घर उसको ताने पर ताना कि पता नहीं किस घर से आयी है .यह जो पीड़ा है स्त्री की, उससे वह स्वयं को कहीं का भी नहीं पाती .
ओ पगली
लड़कियां हवा/ धूप/ मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नहीं होता .’

रमणिका गुप्ता इस संदर्भ में लिखती हैं कि ‘यानी जिसका कोई अपना घर नहीं वह औरत होती है ।’ (हाशिए उलांघती स्त्री, युद्धरत आम आदमी, विशेषांक, 2011, पेज नं.12)
विद्रोह कविता दलित-आदिवासी स्त्रियों के साथ हुए अत्याचार और अन्याय की कहानी कहती है . दलित और आदिवासी स्त्रियों को समाज में चौतरफा शोषण का शिकार होना पड़ता है. कभी यौन शोषण, कभी डायन के नाम पर हर पल उनका उत्पीड़न जारी है, फिर भी वे अपने प्रति हो रहे अत्याचार के विरूध उठ खड़ी हो रही हैं. हम मथुरा और भंवरीदेवी को नहीं भूल सकते. वे अब कर्मठ, पहले से ज्यादा जुझारू और संघर्षशाली हो गयी हैं और उनकी पीड़ा एक विद्रोह में बदल गयी है.

“मनोरमा, प्रियंका/ दामिनी, गुड़िया
तलाश में इनकी/ दूर से दूर तक
ओढ़े चादर /एक दर्द की
सोनी सोढ़ी, शीतल साठे /इरोम शर्मिला
चल पड़े हैं साथ /कि उग आई है भीतर
सुनहरी चांदनी
रक्ताभ धूप
अग्नि तेज
और
उत्ताल रहा /उष्ण तूफान.”

बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था कि जो इसे पी लेगा वह गुर्राए बिना नहीं रह सकता अर्थात अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ा होगा. आज आजाद भारत में जब स्त्रियां शिक्षा हासिल कर अपने अधिकारों की मांग करने लगी हैं तो मनुवादी और ब्राह्मणवादी तथा कठमुल्लेपन से ग्रसित ताकतें उनको हर संभव परास्त करने में लगे हुए हैं. सवाल शीर्षक कविता में ऐसे लोगों से सवाल है कि भारत को लोकतान्त्रिक देश बने कितने साल गुजर गये किन्तु स्त्रियों की शिक्षा पर अभी भी मनुवादी ताकतें कभी बन्दूक तो कभी मल जैसे घातक हथियार लेकर तैनात हैं जो सामाजिक स्वतन्त्रता नहीं लाना चाहते देश में.

‘क्या इतना खतरनाक होता है
शिक्षा नामक शेरनी का दूध
पहले सावित्री को
विभूषित किया
मल विष्ठा से
और आज
सलामी दी/ मलाला को
बंदूक की गोलियों से
कागजी लोकतन्त्र के पैरोकार/
राजनीतिक स्वतन्त्रता के अभिलाषी
लगने न देंगे
सामाजिक स्वतन्त्रता का अर्थ.’

हेमलता महिश्वर भारतीय संविधान को अपने लेखन और जीवन का मूल-मंत्र मानती हैं. इसीलिए जो लोग भारतीय संविधान के साथ छेड़-छाड़ (संशोधन) करना चाहते हैं तो वह उन सभी भारतीयों को सावधान करती हैं जो बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर के लिखित भारतीय संविधान में अपना विश्वास रखते हैं. क्योंकि वह ऐसे लोगों को कतई भारतीय नहीं मानती जिन्हें संविधान में विश्वास नहीं है. परिवर्तन शीर्षक कविता में हेमलता महिश्वर याज्ञवल्क्य जैसे पुरूषों को यह याद दिलाना चाहती हैं कि यदि तुमने वैदिक काल में गार्गी को चुप करा दिया था तो तुम भी यह जान लो कि हम औरतें भी थेरियों के उदात्त इतिहास के बारे में तुम्हें बोध करा देना चाहती हैं.

‘हम औरतें
अब तुम्हें दिलाती हैं याद/भूल जाते हो तुम
बार-बार/इस देश में है थेरियों का
उदात्त इतिहास ।—-(पेज नं.70-71)
‘मैं कौन’ शीर्षक कविता में कवयित्री ऐसे पुरूष-समाज को आगाह करना चाहती हैं जो स्त्री को मात्र एक देह मानते हैं उससे परे कुछ भी नहीं, न उनकी संवेदना और न ही उनकी भावना. सबसे अधिक उन्हें एक मनुष्य भी नहीं मानना, मात्र एक देह.
‘मैं न थी/ न हूं/ बस/ देह थी
और है/ मेरे आंसू/ कब दिखाई पड़े/ तुम्हें.

दलित साहित्य बदलाव का साहित्य है बदलाव एक सकारात्मक अर्थ में जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की बात हो. सभी को सामाजिक न्याय मिले. उन्हें लगता है कि यदि इंसान की मानसिकता में बदलाव लाया जाय तब बहुत कुछ संभव है.इसी समाजिक न्याय के लिए कवयित्री अपनी कविता बदलाव में लिखती हैं कि-

‘करारी सी झाड़ू लेकर/ खोंपचे से तुम्हारा
बजबजाता दिमाग निकालकर
दूसरा दिमाग रख देना चाहती हूं.’ (पेज नं.81)

स्त्री की भी अपनी भाषा होती है स्त्री भाषा के सन्दर्भ में डॉ. के. वनजा लिखती हैं.“ स्त्री भाषा में रोष, आक्रोश एवं प्रतिरोध की आवाज इसलिए आती है कि उसने जीवन में बहुत कठोर संदर्भों का सामना किया है. इसलिए तद्जन्य साहस, शक्ति एवं ओजगुण उसमें आ जाते हैं. जो जीवन में शांति एवं सुख अनुभव करते हैं, उनकी भाषा में चिनगारियां नहीं होतीं. स्त्री बोलती है तो पहचानना चाहिए उसका जीवन कष्टकंटकों से भरा है. इसलिए आत्मान्वेषण का घनत्व एवं रोष उसमें सहजात होंगे.’ (युद्धरत आम आदमी, विशेषांक, पेज नं.28)

आशा, संघर्ष और अपनी अस्मिता से जगाए शब्द व्यक्तिगत सुख-दुःखों का गणित न होकर विशाल जन-समुदाय की अभिव्यक्ति के रूप में प्रतिध्वनित होने लगते हैं. इसीलिए दलित स्त्रियों का साहित्यिक बयान मानवता की पुकार के रूप में गूंजने लगा है. क्रांति और समाज परिवर्तन का बिगुल और मशाल लेकर जब कोई रचनाकार समूची कौम को ललकारता है, तब खदबदाती बेचैनी निश्चित रूप से ही अपनी दिशा पाती है. हेमलता महिश्वर की भाषा बहुत ही सरल और संयमित है. कविता कहने की जो अभिव्यक्ति है वह वास्तव में मनुष्य में बेचैनी तो पैदा करेगी अपने समाज में व्याप्त असमानता और शोषण के प्रति साथ ही उसके बदलाव के लिए संघर्षरत भी होगी.इक्कीसवीं सदी भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण और कहें तो ग्रामीकरण की सदी है । सम्पूर्ण दुनिया एक गांव में बदलती जा रही है लेकिन गांव से निकाल दिये गये समाज का एक तबका विश्व से जुड़ने की आस लगाए है । आज भी महज वही परिदृश्य है जो सदियों पहले था । ‘आज भी गांवो के दूसरे छोर पर अछूतों की बस्ती हाथ बांधे, पिघलती आंखों से, रूधे कंठ से, गूंगे की तरह अपने मालिकों के आदेशों का पालन करने के लिए विवश है ।’ आज से बहुत पहले डॉ.अंबेडकर ने ‘शूद्र पहले कौन थे’ नामक पुस्तक में लिखा है, ‘किसी को सजा देनी हो तो उसे अछूत घोषित कर गांव में भेज दीजिए ।’…केवल इस एक वाक्य में अर्द्ध सदी पहले लिखे उद्गार आज भी ज्यों के त्यों ही हैं  ।’ (डॉ.दामोदर खड़से, अन्यथा, जून 2008, पेज नं.65)

विकास के नाम पर देखें तो भारत डिजिटल इण्डिया बनने जा रहा है वहीं दूसरी ओर रोहित वेमुला, डेल्टा मेघवाल, अखलाक, दादरी, फरीदाबाद और भी बहुत से जगहों पर दलितों की नृंशसीय हत्या हो रही है.  बिहार में दलितों की झोपड़ियां जला दी गयीं. एक तरफ जब दलित साहित्य लिखा जाता है तो कहा जाता है कि यह घृणा का, आक्रोश का और प्रतिक्रियावादी साहित्य है इसके नकारने की बात तक होती है और दूसरे तरफ आप देखेंगे कि आक्रोश और घृणा किसके द्वारा समाज में फैलायी जा रही है.  इसको समझने की आवश्यकता है । दलित साहित्य बुद्ध से मानवता, करूणा और अंहिसा का दर्शन ग्रहण करता है और यही उसकी रचना का प्रेरणा बिन्दू है । वह सामाजिक न्याय की बात करता है न कि समाज को तोड़ने की. दलित कवियों ने और कवयित्रियों ने समाज में व्याप्त विषमता को लेकर अपनी प्रतिकिया अभिव्यक्त की है. हेमलता महिश्वर का काव्य-संग्रह ‘नील, नीले रंग के’ सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्षरत नजर तो आता ही है साथ ही समाज के हर वर्ग, दलित, शोषित, आदिवासी और स्त्री सबकी पीड़ा को भी रेखांकित करता चलता है.उनकी कविता में बुद्ध, नीला रंग, बदलाव, परिवर्तन, स्वर्ग और स्त्री तथा फंदे ये शब्द एक प्रतीक के रूप में आये हैं. अन्त में डॉ.दामोदर खड़से के शब्दों में ‘‘दलित कविता से दलित दुनिया की एक संस्कृति ने जन्म लिया है.दलित स्त्रियों द्वारा लिखी जा रही अभिव्यक्तियां जहा दमन, शोषण और अपमान-तिरस्कारों की प्रतिध्वनियां हैं, वहीं उनके अपने सपनों, आचार-विचार, ध्येय-आकांक्षा, जीना-मरना और सुख-दुखों का दस्तावेज भी हैं.’

यह आलेख भारतीय भाषा केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय,  में महात्मा फुले जयंती, 2016,  के अवसर पर प्रो. रामचन्द्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा गया था.

क्योंकि वह स्त्री थी

डा .कौशल पंवार

  युवा रचनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता ,  मोती लाल नेहरू कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय, में संस्कृत  की  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संपर्क : 9999439709

ऐसा तो नहीं ही था कि उसके दिल पर किसी ने दस्तक ही न दी हो, पर अनु ने तो मानों पारिवारिक जिम्मेदारियों और अपने आप से भी लड़ने के लिए एक अभेद किला गढ लिया था,  जो मनु के धर्मशास्त्रों मे भी कहां व्याखियत हो पाया था! मनु द्वारा बताये उन किलों को तो रियासतों ने सत्ता लाभ पाने के लिए भेदा भी था, पर…………..पर अनु का ये किला तो उसकी भी सोच से परे था, कब ये उसके पूरे स्त्रीतत्व पर छा गया, उसे पता ही नहीं चल पाया. कितनी बार , कितनी आँखों में उसके लिए प्यार दिखा, इजहार हुआ, आज अनु को भी अपनी इन्द्रियों पर जोर ड़ालकर याद आ रहा है. जिस बेंच पर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में वह बैठा करती थी, उस पर दिलजलों ने कितनी बार अपने प्यार की इबारते लिखी थी, और वह कितनी बेदर्दी से उसे मिटा देती थी, आज उसे याद आ रहा था. कैसे अखबार में सुराख करके छुप-छुपकर उसे मनचली निगाहों से ताका जाता था और उसके देखे जाने पर, पकडे जाने पर कैसे वो आंखों नकारने का नाटक कर जाती थी, उसे याद आ रहा था. कितनों ने ही इस फ़िल्मी धुन को कहा ’कभी अंखियां मिलाऊं, कभी अंखियां चुराऊं, क्या तूने किया जादू’  पर..पर… अनु अपने उस किले मे किसी की दस्तक नहीं चाहती थी, बस वो तो आगे बढना चाहती थी, और आगे….. और आगे… इतना की, सदियों की गुलामी से वह बाहर आ जाये वह.

 सूखी हड़डियों से झांकते उसके पिता का चेहरा, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए ही अनु को इतना मजबूत बना दिया था कि उस अल्हड़पण में भी उन चाहतों की तपिश महसूसा न जा सके, उसके सामने हमेशा पहरेदार होता.  हमउम्र  लड़कियां जहां इस सुख को अपने दिल में बंद करके आंखों से बयाँ कर प्रेम की सीढियां चढ जाती थी और उस दौर से गुजरकर अपनी सखियों के साथ साझा किया करती थी, वहीं अनु कहां उनमें घुलमिल पाती !  धीरे धीरे सब उससे अलग होती गई- सुखी, सम्पन्न, सभ्रांत परिवारों से आयी लड़कियां  जहां हास्टल की जिन्दगी को एक सुनहरे पल के रुप में देखकर जीती थी, वहीं अनु की जिन्दगी उसी हास्टल की चाहरदिवारियों के बाहर फ़ैली झुग्गी में किराये पर ली गयी झुग्गी में बीत रही थी, जब भी वह झुग्गी की दिवार में टूटे हुए रास्ते को फ़ांदकर विश्वविद्यालय की कक्षा में  आती तो लड़के-लड़किया सीटी बजाकर, फ़ब्बतियां कसकर उसे वापिस जाने के लिए मजबूर करते रहते थे. इसके बावजूद अनु अपने पिता के चेहरे को हाथों में लेकर अपनी मंजिल की ओर बढती चली गयी थी.  समाज की जातीय जकड़न उसके हौंसले को कुचल नहीं पाये थे और आज वह इस मुकाम तक पहुंच पायी थी.  प्रकृति की उद्दाम लालसाएं उसके चट्टान जैसे मजबूत इरादों के आगे रास्ते बदलकर निकल गई थीं. उसने समाजिक परिवेश को समझने के लिए खूब अध्ययन किया था .



जाति का सवाल उसके सामने राक्षस की तरह खड़ा रहता था, जिसका सामना वह पल-पल कर रही थी, इसलिए उसने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन और विमर्श किया. हकीकत क्या थी? वह बाबा साहेब के “जाति का उन्मूलन” का अध्ययन करने में उसे मिल गया था. इसलिए स्वभाविक रूप से उसमें ब्राह्मणों के प्रति एक घृणा पनप गयी थी, उस पर, उसके पिता  व उसके समाज के लोगों पर हुए अत्याचारों की जड़ को अब वह समझ गयी थी. यह घृणा कम होने का नाम नहीं ले रही थी,  क्योंकि दिनोदिन इसी जातिवादी मानसिकता का वह शिकार होती आ रही थी, एक कारण यह भी था कि वह पुरुष समाज से भी कट सी गयी थी, जहां लड़के उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढाते वहीं पर उससे ये पूछा जाना कि “तुम्हारा पूरा नाम क्या है ?” , उसमे घृणा को भर देता था. इसलिए वह कभी इसमे नहीं पड़ती.  हमेशा दूर दूर रही. ऐसा नहीं था कि यौवन की इस दहलीज में उसकी धड़कनों को किसी ने भी न छुआ हो पर इससे पहले कि कोई संबंध पनपता,  कि जाति का राक्षस उसके सामने आ जाता. उसकी जाति कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की चाहरदिवारियों के पीछे बनी झुग्गी में समायी हुई थी, जिसे सब छात्र-छात्रायें भंगी बस्ती के नाम से पुकारते थे.  उस झुग्गी वाली  जिन्दगी में “निर्मल अभियान” और स्वच्छ भारत अभियान कभी नहीं पहुंच पाया था. ऐसे में प्यार नाम किस चिडियां का है ? वह उसे हंस जैसी पत्रिकाओं में पढकर ही पता चल पाती थी.और ……….यह भी की यह केवल किताबों में पाया जाने वाला प्रेम है,

असल जिन्दगी में नहीं. प्रेम की परिभाषा को पढने और समझने में ही उसका वह यौवन बीत गया था और वह ……इसी विषय की थ्योरी को समझने में लगी रही- प्रैक्टटिकल का सामना जातीय जकड़न ने कभी नहीं होने दिया था…….! “कहां रहती है आप………” दिल फेंक अंदाज में पूछा था उसने.” यहीं पास में”…..संक्षिप्त सा जवाब दिया था अनु ने. अच्छा मुझे लगा कि तुम कहोगी……..आपके दिल में रहती हूं. बेबाकी व बेपरवाही से कहा था उसने……….बस यही शब्द थे,  जो शहद की तरह घुल गये थे अनु के रोम –रोम में. उन शब्दों में ऐसी रोमानियत थी कि अनु कभी इससे बाहर नहीं निकल पायी बल्कि यूं कहूं कि इससे निकलने की कभी इच्छा ही नहीं हुई उसकी, वह तो इसी में खोई रही. ऐसा होता भी क्यों न…..? आज तक रखे गये बंद दरवाजे में झरोखे सा आया था वह इन शब्दों को लेकर. कौन है वह? उसे ये तक नहीं पता था………..पर अनु भी कहां पूछ पायी थी किसी से ! मनो खो गयी वह इसमें. सावन में मोरों के नाचने की धूनन सा. आह! क्या सुकून था उन शब्दों को सुनने में. पर उनकी वास्तविकता…………….! उसने ये तक नहीं जानना चाहा. वह तो उसके दिल में नहीं रहती थी, पर वह शख्स उसकी दिल में बस गया था हमेशा हमेशा के लिए………वह अब ऐसे प्रेम में थी,  जिसकी कोई न बुनियाद थी और न हकीकत…….!



वह तो उन शब्दों के आगे यह भूल गयी थी कि एक विवाहित स्त्री के लिए पर पुरुष के बारे में सोचना भी घोर अपराध की श्रेणी में आता है. सारे धर्मशास्त्र, पुराणों के व्याख्यान – यही तो संदेश देते हैं. विवाह नामक संस्था उसी की घेराबंदी के लिए ही तो बनी थी, तभी न सिमोन दी बोउवार  कहती है कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनायी जाती है.’ पर अनु का ये प्रेम इस सीमा में कहां बधने वाला था, और उसने इस प्रेम के अंकुर को मर्यादाओं का पालन करते हुए भी अपने मन के एक कोने में ऐसे छुपा कर रख दिया था,  जो किसी को दिखायी ही न दे. यहां तक की उसको भी नहीं , जिसने इसे पैदा किया था. यह ब्रहमा के द्वारा रचित स्त्री के दैवीय  रूप को भी चुनौती थी, उसके भी बस के बाहर की बात थी. थोड़े दिनों बाद पता चला की वह आखिर है कौन. एक दिन अनु के साथ काम करने वाले सहकर्मी ने बताया की गैस्ट के रुप में आज हमारे यहां सर्वेश्वर श्रीवास्तव आयेंगे. कौन है और क्या करता है, पूछा था अनु ने. जवाब में बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के जाने – माने महाविद्यालय में प्रोफ़ेसर है वह, तेजतर्रार, बेबाक टिप्प्णी के लिए जाना जाने वाला व्यक्तित्व. बस- ‘बस इतनी तारीफ़ मत कीजिए,  मुझे जेलसी फ़िल हो रही है,’ कहकर खिलखिकार हंस पड़ी थी अनु. वह आज जिस मुकाम पर थी,  जिस तरह से वह आगे बढी थी इसका उसे गर्व भी था और कहीं न कहीं अभिमान भी. इसलिए मानवीय प्रतिस्पर्धा भी महसूस हुई थी उसे जानकर.अगले दिन सब तैयारी में लगे थे,

कार्यक्रम को सफ़ल बनाने के लिए. वह भी अपने छात्र-छात्रों के साथ मिलजुलकर तैयारी की देखरेख कर रही थी. उसके सीनियर ने बताया कि गेस्ट आ गये है और आप उन्हे प्रिंसिपल रूम में ले जायें,
चाय नास्ता करवायें. झिझकते हुए उसने कहा कि सर मैने उन्हे देखा नहीं है इसलिए आप लोग ही चले जाये .पर उन्होंने अधिकार सहित डांटकर कहा कि –’जाओ तुम’ मिलोगी नहीं तो जानोगी कैसे? और अनु चुपचाप बरामदे से गुजरते हुए उस ओर बढ गयी.’ जैसे ही वह आगे बढी…..कि……. उसकी दिल की धडकन थोड़ी देर के लिए रुक सी गयी. सामने वही शख्स था,  जिसे वह अपने दिल के एक कोने में सम्भाल कर रखे हुए थी, जब भी अकेली होती थी,  उसे कोने से बाहर लाती और अपने दिल के पास रखकर उसे बातें करती, उसके साथ अपने गिले- शिकवे करती, उसे उल्हाना देती कि देखो, मैं मीरा बन तुम्हारी पूजा कर रही हुं और तुम हो कि मूर्त रुप मे कभी नहीं आते …….ढेरों उल्हाने उसे देती, और जब किसी के आने की आहट पाती तो उसे फिर उसके लिए तय कोने में उसे सबसे नजरें चुराकर छुपा देती. ऐसा नहीं था कि वह अपने पति से प्रेम नहीं करती थी, अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी वह अपने लिए अपने होने के उस अहसास को जी लेती थी. यह उसका रुहानियत भरा प्रेम था जिसे वह जानती तक नहीं थी. उन्हें एकदम अपने सामने पाकर वह दंग रह गयी. उसकी अंखों की पुतलियां फ़ड़फ़ड़ा रही थी. उसे देखकर न तो वह आगे बढ पायी और न ही पीछे ही हट पायी.

कुमारसम्भव के ब्रहमाचारी और पार्वती के आख्यान इसमे हकीकत का रुप धरके सामने आ खड़े हुए थे. वह तो ऐसे लोक में विचरण करने लगी थी,  जो हकीकत से कोसों दूर था. अचानक उसे महसूस हुआ कि वह तो प्रसिंपल के आफ़िस में है. वह उल्टे पांव वापिस आ गयी और अपने सहकर्मी को ये जिम्मेदारी देकर अपने मन बहलाने और इस रुमानियत से बाहर आने के लिए अपने छात्रों के साथ काम में उलझने का प्रयास करने लगी.
कार्यक्रम सफ़ल रहा और अनु ने भी आज उसका पूरा परिचय जान लिया. साथ ही साथ ये भी कि जिसे वह अभी तक पूजती आयी है,  वह ऐसे वर्ग से आता है जिसका सामना वह सदियों से करती आ रही है. पर प्रेम तो प्रेम है न…! कहां मानता है वह जाति, धर्म, सम्प्रदाय, समाज, स्त्री-पुरुष, इतर वैवाहिक संबंधों की आलोचनाओं को. श्रीवास्तव के द्वारा कहे गये उन शब्दों की वास्तविकता को वह जानना चाहती थी,  पर जैसे ही ये प्रश्न उसके दिमाग में आया तो दिल ने उसे एक झटके से उसे दूर कर दिया. मानने के लिए तैयार ही नहीं हुआ कि छात्र जीवन में घटी घटनायें दोबारा से इस रुप में आकर खडी होंगी. वह इस विचार को छोड़कर आगे बढना चाहती थी, और अपने दिल के कोने में छुपे उस अंकुर को भी आज पनपने देना चाह रही थी. जानती थी कि जो वह सोच रही है , वह ऐसा नहीं है, पर फ़िर भी अपने मन के कोने में दुबके पडे इस अहसास को एक बार वह भी जीना चाहने लगी थी, बिना इसकी परवाह किए कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोचता है. और वह इसे इसी रूप में जो कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सेमिनार के बाहर दरवाजे पर खड़े हुए श्रीवास्त्व ने जो शब्द कहे, उसे अपने मन में समेटकर जीने लगी थी



अनु का सामना श्रीवास्तव से कई बार हुआ. कई बार उसी के महाविद्यालय मे, और कई बार कांफ़्रेस में, पर, अनु जहां इस संबंध के प्रति भावुक थी, वही वह मजबूत इरादे वाली महिला भी थी. उसने उसके सामने कभी दर्ज नहीं करवाया कि उसके द्वारा कहे गये “वे शब्द” अपने मन मन्दिर में उसने इस कदर बिठाये है कि कोई उसे भांप तक नहीं सकता. पुरुषवादी और सामंतवादी मानसिकता के सामाजिक विश्लेषण से उसे इन्कार नहीं था.  एक तरफ़ उसका अध्ययन का दायरा धर्मशास्त्रों में था, तो दूसरी तरह इतिहास सामाज-शास्त्रों का भी वह लगातार अध्ययन कर रही थी, सामाजिक आन्दोलनों में भी उसकी भागीदारी बढ गयी थी, स्त्रीवादी मानसिकता का विकास उसमे घर कर गया था, वह अब आम महिला भी नहीं रह गयी थी, वाम आन्दोलन में भागिदारी करते हुए वह इतनी परिपक्कव हो चुकी थी कि हर स्थिति का सामना वह तर्क की कसौटी पर कर सकती थी.
समय अपने पंख लगाकर उड़ रहा था, आज वह अपनी उम्र के अड़त्तीसवे दौर से गुजर रही थी. इस दौर के उतार-चढावों को पार करते हुए सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन को भरपूर जिन्दगी के साथ जी रही थी. प्रेम के उस कोने को अनु ने दबाकर रख दिया था,  जैसे मां अपने नन्हे नन्हे बच्चों के कपड़ों की तह लगाकर अपने साथ लाये पुराने संदूक में छुपा कर रख देती है. जब वह अपने बड़े हुए बच्चों के बचपन को देखना चाहती है, तो उन कपड़ों की तह खोलकर भरीपूरी निगाह ड़ालकर, देखकर, वापिस संदूक में रख देती है. ठीक उसी तरह अनु ने श्रीवास्तव के प्रेम को बंद करके रख लिया था.

इस अनुभूति को वह समाज की जातीय सोच पर कुर्बान नहीं करना चाहती थी, चाहे वह खुद श्रीवास्तव ही क्यों न हो, आखिर वह भी तो इसी धरा का प्राणी था, इस सच्चाई को वह अपने आपसे भी छुपाकर रखे रही थी.
आखिर कभी तो अनु की भावनाओं का समुद्र अपनी सीमा को लांघकर बाहर आना था.  एक दिन उसे मेल प्राप्त हुआ की विश्व हिन्दी सम्मेलन बैंकाक में होने जा रहा है, और आपकी भागीदारी प्रार्थनीय है. पढकर गौरवान्वित हुई थी वह, उसने इसकी सूचना अपने पति को दी, वह भी बहुत खुश हुए थे सुनकर. तय समय में वह पहुंच गयी थी. अभी कांफ़्रेस शुरु होने में टाइम था. अनु की निगाह उसकी तरफ़ पीठ करके खड़े एक आदमी की ओर गयी. उसे लगा कि ये श्रीवास्तव ही हैं. कब उसके पांव उसे उसकी ओर ले गये, उसे पता ही नहीं चला. कहते हैं सावन के मारों को हरा ही हरा दिखता है, कुछ ऐसा ही हुआ अनु के साथ.सामने वाला आदमी श्रीवास्तव नहीं कोई ओर था. मन मार कर रह गयी अनु और वापिस मुड़ने को हुई कि उस व्यक्ति ने अनु को ’हलो’ कहा. उसने सुना ही नही और औपचारिकता भी पूरी नहीं कर पायी. उसने फ़िर टोका और कहा कि आप कुछ कह रही थी, अनु ने ’ना’ मे सिर हिलाया और वापिस अपनी जगह आ गयी, अजीब सी हालत थी उसकी. एक- एक करके सब लोग अन्दर आ गये थे,  जहां पर कार्यक्रम का उदघाटन सत्र होना था. वहां पर कुर्सियां तरतीब से रखी गयी थी,

बैंकाक के महामहिम राज्यपाल इस सत्र को सम्बोधित करने वाले थे, इसलिए पूरा प्रशासन भी सतर्कता से अपने काम में लगा था, अतिथियों को तयशुदा जगहों पर स्थान दे दिया गया था, सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे जा चुके थे. फ़िर अनु की आंखे फ़िसली,  आगे वाली सीट पर बैठे आदमी की ओर. उसे लगा की श्रीवास्तव बैठे है, आज वह अपने आपको रोके नहीं रोक पा रही थी, जैसे ही अपनी कुर्सी से वह आगे की ओर झुकने लगी तो उस खुद पर ही हंसी आ गयी, और वह पीछे की ओर ही लौट गयी कि कहीं अब फ़िर किसी को कोई गलतफहमी न हो जाये. मेरा वहम होगा और उसने अपने ध्यान को सत्रमें लगाने की कोशिश की, पर फ़िर से सामने वाली कुर्सी पर बैठे आदमी की ओर देखा तो वह तो वही था,  जिसकी तलाश उसकी आंखे तब से करती आ रही थी, जब से वह इस कार्यक्रम में आयी थी. हां वह वही था,  जिसे पता नही इस बात का अहसास भी था कि नहीं,  कि जो शब्द उसने सहज भाव से किसी को यूं ही कहें थे, वे किसी के दिल में इस तरह से समायें हुंए हैं कि सब बंधनों को तोड़ने पर उतारू हैं. पहचान लिया था शायद अनु को भी उन्होने, आखिर उनके महाविद्यालय में वे कई बार आ चुके थे, इसी औपचारिकतावश अनु ने भी उन्हे ’नमस्ते सर’ कहा. जवाब में उन्होने भी हल्की- फ़ुल्की बातचीत की. सत्र खत्म हुआ था, तो चाय पर सब आमत्रिंत थे, वह आज इस आकर्षण के सामने अपने आपको उसके नजदीक जाने में रोक नहीं पायी, श्रीवास्तव ने भी उससे बात की. थोड़ा सा साथ पाकर अनु उसमे बहे जा रही थी,

इतने सालों का इन्तजार का जवाब आज उसके सामने था. वह आज जवाब पाने का बेसब्री से इन्तजार करने लगी कि आखिर श्रीवस्तव जी उसके बारे में क्या सोचते है? क्या उनको भी मेरी याद आती है/ क्या वे शब्द उन्होंने सहज भाव से कहे थे/क्या ये ऐसे ही सब के साथ बोलते हैं/ उसके मन में घुड़कते सारे सवालों के जवाब आज अनु चाहती थी. आखिर अपने प्रेम से जवाब मांगने का हक तो बनता था न उसका? बस वह श्रीवास्तव से बात करने, उसके नजदीक रहने का बहाना खोजती रही थी, हांलाकि ये सब जो वह उसका जवाब पाने के लिए कर रही थी, उसके व्यक्तित्व से बिल्कुल उल्टा था, बहुत स्वाभिमानी थी वह! पर प्रेम के सामने उसका स्वाभिमान आज उसे छोटा लगा था. अनु ने श्रीवास्तव के सामने अपनी भावनायें रख ही दी. कविता के माध्यम से……….ये प्रेम भी बड़ा विचित्र है, जब यह पुरुष में होता है, तो वह इसे अपनी मर्दानगी समझता है, इसे जाहिर करना अपना अधिकार समझता है.  और वही प्रेम जब किसी स्त्री में होता है,  तो वह अपने आपको ही- समाज का , परिवार का, अपराधी मानकर देखती है, समाज के द्वारा गढ़ी  उसकी छवि को वह धुंधली नहीं होने देना चाहती, अपने दैवीय रुप के अनावरण को वह खत्म नहीं होने देना चाहती पर दूसरी और छुप-छुपकर प्रेम के अंकुर को पेड़ भी बनाने में लगी रहती है. श्रीवास्तव के सामने उसने अपनी भावनाये प्रकट तो कर दी पर…… उसका जवाब, उसे हक से लेने का अधिकार, वह नहीं ले पायी. उसने उससे अकेले में बात करनी की बहुत कोशिश की, पर वह बार-बार उसे टालता रहा. शायद उसकी भी अपनी कोई मर्यादा  थी, या स्त्री के द्वारा जाहिर प्रेम उसे स्वीकार्य न था.

यू पी एस सी में स्त्रीकाल

यू पी एस सी में 22 साल की छात्रा अव्वल 


संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की 2015 की परीक्षा में दिल्ली की टीना डाबी ने सर्वोच्च स्थान हासिल किया है. यूपीएससी ने मंगलवार को परीक्षा परिणाम घोषित किया. परीक्षा में जम्मू-कश्मीर के अतहर आमिर उल शफी खान दूसरे स्थान पर रहे हैं और दिल्ली के ही जसमीत सिंह संधू ने तीसरा स्थान हासिल किया है. अपनी पहली ही कोशिश में अव्वल रहने वालीं 22 साल की टीना ने राजधानी के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक किया है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस की स्टूडेंट टीना महज 22 साल की है.
टीना के पिता जसवंत डाबी बीएसएनएल में अफसर हैं और दिल्ली में पोस्टेड हैं. परिवार मूलत: जयपुर का है, लेकिन टीना का जन्म भोपाल में हुआ. उनके दादा नंदकिशोर जयपुर में रहते हैं टीना बताती हैं कि उन्होंने फर्स्ट अटेम्प्ट में ही इस एग्जाम को क्लियर किया.उन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर यह मेरे के लिए गर्व करने वाला क्षण है.

 इससे पहले टीना ने 12वीं में सीबीएससी बोर्ड में भी टॉप किया था. 12वीं में पॉलीटिकल साइंस की छात्रा थीं .. टीना ने अपने कॉलेज में भी टॉप किया था.टीना डाबी बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में होशियार थीं, टीना की शुरुआती पढ़ाई भोपाल में हुई उसके बाद दिल्ली में. CBSE की 12वीं बोर्ड परीक्षा में टीना ने राजनीति विज्ञान में सौ फीसदी अंक हासिल किए. दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से टीना ने पॉलिटिकल साइंस में बीए किया. BA में भी टीना ने कॉलेज में टॉप किया.टीना कहती हैं कि उनकी प्रेरणा उनकी मां हैं, टीना की मां एक इंजीनियर हैं.
जिन्होंने 12वीं क्लास से ही उन्हें IAS की तैयारी में लगा दिया था. जैसे ही बेटी के टॉप करने की खबर मां को मिली तो मां की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. टीना की मां एक इंजीनियर हैं.


टीना यूपीएससी की सिलेक्शन प्रॉसेस के दौरान कैडर प्रेफरेंस के लिए हरियाणा को चुना. वे कहती हैं, ”मैंने हरियाणा इसलिए चुना क्योंकि वहां का एग्जाम्पल इंटरेस्टिंग है. वहां काफी ज्यादा इकोनॉमिक प्रोग्रेस है लेकिन जब बात सोशल इंडिकेटर्स की आती है तो हरियाणा पिछड़ जाता है.”  ”हरियाणा जेंडर इनइक्वैलिटी के चलते पिछड़ जाता है. यह ऐसा मुद्दा है जो मेरे दिल के करीब है. मैं बराबरी चाहती हूं. चूंकि मैं एक प्रोग्रेसिव फैमिली की महिला हूं और महिला-पुरुष के बीच बराबरी को बढ़ावा देने वाले कॉलेज से पढ़ी हूं तो मैं हरियाणा की महिलाओं के लिए भी कुछ करना चाहती हूं.”



सक्सेस का क्रेडिट मां को टीना ने बताया , ”मेरी सक्सेस का क्रेडिट मेरी मां को है। वे इंजीनियर रही हैं। टेलिकॉम डिपार्टमेंट में लंबी सर्विस के बाद उन्होंने इसलिए वीआरएस लिया ताकि मुझे पढ़ा सकें.’  ”मैंने आज अपनी मां को प्राउड फील कराया, जिन्होंने मेरे लिए काफी सेक्रिफाइस किया है.”  ”मुझे सक्सेस का तो यकीन था लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि मैं टॉप करूंगी। मेरी इंटरव्यू 40 मिनट का था।’

टीना डाबी ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए कहा, “मैं बहुत ज्यादा खुश हूं. 22 साल की उम्र और पहले प्रयास में परीक्षा टॉप करना मेरे बहुत बड़ा सरप्राइज़ है. जब परीक्षा दी थी उस समय ये तो पता था कि अच्छा हुआ है. लेकिन रिजल्ट बहुत ज्यादा सरप्राइज़ कतने वाला है.”टीना ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए कहा कि उन्हें अपनी ट्रेनिंग का इंतजार है और वे देश के लिए कुछ करना चाहतीं हैं. टीना ने IAS कैडर के लिए हरियाणा को पहली पसंद चुना है. टीना कहती हैं कि वो दस साल भोपाल में रही फिर दिल्ली में और अब वो आईएएस बनकर हरियाणा जाना चाहती हैं.

साभार ऑनलाइन समाचार ….

दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार?

वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास का पोस्ट 

दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार ? रवींद्र जयंती के मौके पर भी सियासती मजहब और मजहबी सियासत के शिकंजे में इंसानियत का मुल्क ? যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে..যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,..কেনো ভোরের আকাশ ভরে দিলে এমন গানে গানে…!!কেনো তাঁরার মেলা গাঁথা,,কেনো ফুলের শয়ন পাথা…..কেনো দক্ষিন হাওয়া গোপন কথা জানায় কানে কানে…..!যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,কেন আকাশ তবে এমন চাওয়া,চায় এ মুখের পানে………..! हाल में बंगाल में हुए लोकतंत्र महोत्सव के दौरान बाहुबली भूतों का रणहूंकार यही रहा है कि अब बंगाल में गली गली में रवींद्र संगीत नहीं बजेगा और उसके बदले पीठ की खाल उतारने वाले ढाक के चड़ा चड़ाम बोल दसों दिशाओं में गुंजेंगे और तब प्रचंड लू से दम घुट रहा था. मनुष्यता का और दावानल में राख हो रहा था हिमालय भी. अब रवीन्द्रजयंती के साथ सूखे के सर्वग्रासी माहौल में भुखमरी के बादलों को धता बताकर फिर वृष्टि है और कालवैशाखी भी है.

बंगाल की गली -गली में फिर वही रवींद्र संगीत है. कल हमारे आदरणीय मित्र आनद तेलतुंबड़े से एक लंबे व्यवधान के बाद फोन पर लंबी बातचीत हुई और इस बातचीत का निष्कर्ष यही है कि समता और न्याय की लड़ाई में आज छात्र युवा सड़कों पर हैं,  तो हमें बिना शर्त उनका साथ देना चाहिए. इसके साथ ही पितृसत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई अगर शुरु ही नहीं होती तो आधी आबादी को बदलाव की लड़ाई में शामिल किये बिना और उनके नेतृत्व को स्वीकार किये बिना हमारी समता और न्याय की यह लड़ाई अधूरी होगी. रवींद्र साहित्य और लोकसंस्कृति का पहला पाठ यही है.মন্ত্রহীণ,ব্রাত্য,জাতিহারা রবীন্দ্র,রবীন্দ্র সঙ্গীত!

टैगोर  जी जयन्ती  के साथ ही इस बार मां दिवस भी मना. कसमकस  मैंने अपनी मां कि सेवा में कुछ भी नहीं किया. साझा परिवार में पला बढ़ा और किशोरावस्था में जो घर छोड़कर निकला, मां के पास रहा ही नहीं कभी और न मां गांव छोड़कर हमारे पास कभी रही नहीं. वे बसंतीपुर छोड़कर कहीं नहीं गयीं. उन्हीं के नाम बसा है बसंतीपुर.


आज सड़क पर उतरने से पहले सड़क पर ताजिंदगी जनता के हक हकूक के लिए लड़ने वाले पिता को याद करता हूं तो मां की वह धूमिल सी तस्वीर खूब याद आ रही है कि उन्होंने  कभी आहिस्ते से भी पिता के जुनून के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठायी. उनके बिना पिता की जनप्रतिबद्धता कितनी संभव थी ? तेभागा से लेकर शरणार्थी किसान आंदोलनों के साथियों के बसाये गांव बसंतीपुर में दरअसल कोई औरत मेरी मां से कम नहीं थीं और मेरा बचपन ऐसी असंख्य माओं  की ममता की छांव में पला,  जहां हिमालय की छांव भी उनके प्यार के आगे छोटी रही है. शादी से पहले तक मेरी तहेरी दीदी मीरा दीदी पल प- ल मेरा ख्याल रखती थीं तो ताई और चाची और गांव की दूसरी तमाम औरतों के प्यार के मुकाबले मुझे अपनी मां के प्यार का अहसास अलग से कभी नहीं हुआ. तराई के हर गांव में फैला था मेरा बचपन,तमाम दीवारों के आर पार,जाति,भाषा और धर्म की सरहदों के बाहर,इसलिए अलग से मां का वजूद मैंने समझा ही नहीं.

पढ़ने के लिए नैनीताल गया तो तराई और पहाड़ की हर मां मेरी मां बन गयी और आज बूढ़ा अकेला जब सड़क पर उतरने की नौबत है  हर बेटी,बहन मां के चेहरे पर मेरी मां की तस्वीर चस्पां हैं. इस कोलकाता में हाट में सब्जी बेचने वाली और घर-घर काम करने वाली औरतें फिर वही मेरी मां है तो तमाम आदिवासी औरतें जो उत्पीड़न और दमन के खिलाफ सोनी सोरी से भी बड़ी लड़ाई रोज रोज लड़ रही हैं,वे भी मेरी मां है और मेरे लिए वही भारत माता का असल चेहरा है. मेरे लिए वही भारत मां का असल चेहरा है जो सेना को चुनौती देने वाली मणिपुर की निर्वस्त्र माताओं का है या रोज रोज देश के कोने कोने में पितृसत्ता के खिलाफ खड़ी हर औरत और पितृसत्ता के अनंत भोग और बलात्कार की शिकार औरत का चेहरा है. इसलिए मुक्तबाजार के मुकाबले मैं इंफाल के इमा बाजार,14 साल से अनशन पर इरोम शर्मिला और जल जंगल जमीन के लिए आदिवासी औरतों की तरह हर रोज लड़ रही मेरे हिमालय की इजाओं और वैणियों की गोलबंदी देखता हूं.



 आज रवींद्र जयंती है और सरहद के आर – पार इंसानियत के मुल्क पर सिर्फ रवींद्र संगीत की पूंजी के सहारे उत्पीड़ित वंचित स्त्री की जिजीविषा ही मेरे लिए असल रवींद्र संस्कृति है जो बंगाल और भारत की भी संस्कृति है,जहां धर्म या ईश्वर कही नहीं है और राष्ट्रीयता है तो वह विशुद्ध वैश्विक मानवता है,और उसका भी चेहरा मां का ही चेहरा है.रवींद्र साहित्य और रवींद्र रचनाधर्मिता के मूल में बंगाल की बौद्धमय विरासत प्रबल स्थाईभाव है और उनकी तमाम कविताओं और यहां तक की गद्य रचनाओं में मूल स्वर बुद्धं शरणम् गच्छामी है और इसी लिए किसी मोहनदास करमचंद गांधी को उन्होंने ही महात्मा की उपाधि दी क्योंकि उनका जीवन दर्शन भी बंगाल की तरह बुद्धमय रहा है और उनका धर्म धम्म रहा है,सत्य और अहिंसा का ,जबकि वे खुद कट्टर हिंदू थे और वर्णाश्रम और जाति व्यवस्था के खिलाफ नहीं थे लेकिन अस्पृश्यता उनकी भी बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर की तरह मुख्य चिंता थी.हमारे पुरखों की विविधता और बहुलता,सहिष्णुता और उदारता,विश्वबंधुत्व की गौरवशाली परंपरा ही दरअसल रवींद्र संस्कृति है और उसकी नींव वही भारत तीर्थ है जहां मनुष्यता की असंख्य धाराएं मानवता की एक रक्तधारा में तब्दील है.

संत फकीर बाउल आंदोलन,आदिवासी किसान विद्रोह की जनसंस्कृति से गढ़ी है रचनाधर्मिता रवींद्र की,जो भारत मां की असली तस्वीर बनाती है जो अंततः पितृसत्ता के विरुद्ध खड़ी स्त्री है. चंडालिका से लेकर चित्रांगदा,रक्तकबरी से लेकर गोरा,चोखेर बाली और राशियार चिठि तक वह स्त्रीकाल सर्वत्र व्याप्त है.
इसीलिए बंगाल में स्त्री  की अस्मिता की लड़ाई पितृसत्ता के खिलाफ मोर्चाबंद रवींद्र संस्कृति  और इंकलाब  जिंदाबाद के कोलाहल के स्थान पर उनके प्रतिवाद का स्वर संगीतबद्ध आमार सोनार बांग्ला तोमाय भालो बासि है, जिसकी अभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष अंतर्निहित शक्ति बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम में इस महादेश की हुई भारत विभाजन के बाद सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है. हाल में बंगाल में हुए लोकतंत्र महोत्सव के दौरान बाहुबली  भूतों का रणहूंकार यही रहा है कि अब बंगाल में गली – गली में रवींद्र संगीत नहीं बजेगा और उसके बदले पीठ की खाल उतारने वाले ढाक के चड़ा चड़ाम बोल दसों दिशाओं में गुंजेंगे और तब प्रचंड लू से दम घुट रहा था मनुष्यता का और दावानल में राख हो रहा था हिमालय भी.अब रवीन्द्र जयंती के साथ सूखे के सर्वग्रासी माहौल में भुखमरी के बादलों को धता बताकर फिर वृष्टि है और कालबैशाखी भी है.

बंगाल की गली गली में फिर वही रवींद्र संगीत है. वैसे तो बंगाल रवींद्र की छाया से बाहर कभी नहीं रहा है और रवींद्र जयंती के मौसम में हर छवि फिर रवींद्रनाथ की है.संगीत भी वही रवींद्र संगीत है. फिर भी खुशवंत सिंह के कहे मुताबिक रवींद्र को ई पवित्र गाय नहीं है और उनकी हर छवि में भारतीयता और भारत की लोकविरासत भीतर बाहर गूंथी हुई है और उसे देखने की दृष्टि हो तो सियासती या मजहबी उन्माद की कोई जगह ही नहीं बनती. यह भी समझना बेहद अनिवार्य है कि रवींद्र पक्ष दरअसल स्त्री पक्ष है और बंगाल में जब तक एक भी स्त्री के कंठ में गूंजेगा रवींद्र संगीत,रवींद्रनाथ की मृत्यु हो ही नहीं सकती.इसी संदर्भ में यह भी समझना बेहद जरुरी है कि चिंत्रांगदा की तरह स्त्री जब सत्ता के विरुद्ध मोर्चाबंद हो जाती है तो जीत स्त्री की ही होती है और हारती हर बार पितृसत्ता है.रवींद्र विमर्श एकमुश्त स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श का समाहार है,जिसपर भारत या बंगाल में भी कायदे से चर्चा शुरु नहीं हुई है,जबकि पितृसत्ता के मुक्तबाजारी राष्ट्र के चरित्र को लोकतांत्रिक और जनपक्षधर बनाने के लिए इस पर सिलसिलेवार चर्चा भी अनिवार्य है.संक्षेप में बोलें तो एक वाक्य में कहा जा सकता है कि लोकसंस्कृति की विरासत जहां स्त्री के हवाले है,वहां लोक-संस्कृति की मृत्यु हो नहीं सकती चाहे तमाम माध्यमों और विधाओं की मृत्यु हो जाये.


संक्षेप में बोलें तो एक वाक्य में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीयता की पैठ जितनी गहरी लोक-संस्कृति में होगी उतनी ही वह निरंकुश सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी और जैसे निर्वासित सीता के पुत्रों ने रामराज्य के अश्वेमेधी घोड़ों के लगाम थाम लिये,जैसे अश्वमेधी सर्वश्रेष्ठ  धनुर्धर अर्जुन मणिपुर की चित्रांगदा से पराजित हो गया. जैसे चीरहरण से अपमानित द्रोपदी की शपथ से कुरुक्षेत्र में हारे कुरु रथी महारथी,वैसे ही स्त्री शक्ति के आगे अंध राष्ट्रवाद की पराजय तय है और यह रवींद्र विमर्श है , मेरा मौलिक दर्शन नहीं. हालिया उदाहरण बांग्लादेश में लाखों औरतों का बलात्कार है और उनकी कुर्बानी किसी सैन्य हस्तक्षेप से छोटी हरगिज नहीं है और मरते दम उनके मुस्काते लहूलुहान होंठों पर धरे थे रवींद्र के परमाणु बम जैसे अमोघ बोल,आमार सोनार बांग्ला आमि तोमाय भालोबासि,बांग्लादेश स्वत्त्रता संग्राम का प्रस्थानबिंदू वही है. उससे भी हालिया  एकदम ताजा उदाहरण बंगाल में लोकतंत्र महोत्सव में भूत बिरादरी की हिंसा तांडव दहशतगर्दी के विरुद्ध झाड़ू,दरांती वगैरह वगैरह घरेलू हथियार लेकर अपने मताधिकार के लिए मोर्चा बंद स्त्रियों के चेहरे हैं.हाली शहर में तीन साल की बच्ची की पिटाई के बावजूद उसकी मां ने बूथ तक पहुंचकर वोट डाले और माफियाराज के खिलाफ अबतक खुलकर बोल रही.खास कोलकाता में अपने कलेजे के टुकड़ों,दूधमुंहा शिशुओं पर हमले के बाद भी स्त्री के प्रतिवाद का स्वर कुंद नहीं हुआ.

वर्धमान में बूथलुटेरों को हथिरयारबंद औरतों ने खदेड़ दिया.यह प्रतिरोध निरंकुश सत्ता का प्रतीक बनीं ममता बनर्जी के फासिस्ट केसरिया गठबंधन के खिलाफ हैं तो याद करें कि दीदी का वह अभ्युत्थान भी और पुरानी तस्वीरें देख लें,नंदीग्राम,सिंगुर और लालगढ़ के मोर्चे पर परिवर्तन के लिए लड़ रही थीं स्त्रियां तो भूमि अधिग्रहण के खिलाफ प्रतिरोध में ममता के अलावा मेधा,अनुराधा जैसी तमाम स्त्रियां नेतृत्व में थीं.भूल गयीं दीदी इतनी जल्दी बंगाल में तेभागा आंदोलन और खाद्यआंदोलन से लेकर नक्सल आंदोलन तक सर्वत्र फिर वहीं स्त्रीकाल है. मणिपुर की कथा सभी जानते हैं.सोनी सोरी की कथा भी मालूम है.जेएनयू से लेकर यादवपुर तक हमारी बहादुर बेटियों की तस्वीरें भी लाइव हैं.आज सुबह सुबह संडे इकोनामिक टाइम्स में आगजनी का परिणाम है उत्तराखंड दावानल आशय का आलेख पढ़ा तो लेखक का नाम भीमताल तितली अनुसंधान केंद्र के तितिली अनुसंधान केंद्र के तितली विशेषज्ञ पीटर स्मैटचेक का नाम देख बहुत सारी पुरानी यादें ताजा हो गयीं.तुरंत नैनीताल में राजीव लोचन दाज्यू को मोबाइल पर पकड़ा.शमशेर दाज्यू की तबीयत खराब थी और वे दिल्ली एम्स में भर्ती थे तो उनकी चिंता पहले से थी.सबसे पहले उनका हाल पूछा तो पता चला कि शमशेर दाज्यू अल्मोड़ा में सकुशल वापस पहुंच गये हैं क्योंकि लड़ाई अभी बाकी है.

फिर मैंने पूछा कि यह पीटर तो फेड्रिक के भाई हैं तो दाज्यू ने कंफर्म कर दिया. कई बरस हुए फेड्रिक स्मैटचेक की असमय मौत हो गयी.वे डीएसबी में एमए इंग्लिश फर्स्ट ईयर में हमें प्रोज पढ़ाते थे और डीएसबी के पुराने टापर थे.वे पर्यावरण कार्यकर्ता थे और उनकी संस्था थी S.A.V.E.भारत भर में उनके पसंदीदी लेखक दो ही थे,भारत डोगरा और अनिल अग्रवाल.  तब हमारा लिखा इधर उधर छप ही रहा था और नैनीताल समाचार में यदा कदा फेड्रिक भी लिख देते थे और वे राजीव दाज्यू के दोस्त भी थे.उन्हीं फेड्रिक के पिता अंतरराष्ट्रीय तितली विशेषज्ञ थे और उन्हीं का बनाया हुआ भीमताल तितली अनुसंधान केंद्र है जो उनका स्टेट भी है सात ताल और भीमताल के मध्य नौकुचियाताल के ऊपर,फेड्रिक मुझे कहा करते थे कि पर्यावरण पर ही लिखो क्योंकि भारत डोगरा और अनिल अग्रवाल के अलावा भारत में किसी को वे पर्यावरण का लेखक नहीं मानते थे और उनकी इच्छा थी कि सामाजिक कार्यकर्ता के बजाये हम पर्यावरण कार्यकर्ता बने.उस तितली केंद्र में हम फेड्रिक के साथ ठहरे भी. यह सत्तर के दशक के आखिरी दौर की बात थी और तब शमशेर सिंह बिष्ट उत्तराखंड संघर्षवाहिनी के अध्यक्ष थे और हमारे नेता थे.हम लोग तब गिरदा के साथ वैकल्पिक मीडिया बनाने में लगे थे और आंदोलन भी कर रहे थे. उधर दिल्ली में आनंद स्वरुप वर्मा तीसरी दुनिया निकाल रहे थे या निकालने ही वाले थे.

गिर्दा कहा करते थे कि पैसा वैसा कुछ नहीं चाहिए,बस,जनता का साथ होना चाहिए. जनता से लेकर जो लौटाओ,लोकसंस्कृति की वही धरोहर रचनाधर्मिता है और वैकल्पिक मीडिया की नींव भी वहीं लोकसंस्कृति है जो हमेशा सत्ता के खिलाफ मोर्चाबंद रही है.उनका मानना था कि आंदोलन के रास्ते ही वैकल्पिक मीडिया लोक संस्कृति की जमीन पर बन सकता है,वरना हर्गिज नहीं. उस वक्त बंगाल की लोकविरासत और रवींद्र साहित्य के बारे में हमें कुछ खास नहीं मालूम था हालांकि हम बचपन से रवींद्र नजरुल पढ़ते रहे हैं लेकिन लोक विरासत की समझ के बिना वह पढ़ाई हमें रवींद्र संस्कृति को समझने में कोई मदद कर नहीं रही थी.आज रवींद्र संगीत और रवींद्र साहित्य पर बोलते लिखते हुए चिपको आंदोलन समेत पहाड़ में हर आंदोलन में सबसे आगे रहने वाली तमाम इजाओं और वैणियों की याद आती हैं जो मेरी मां से कम नहीं हैं और मैंने उनकी भी कभी कोई सेवा नहीं की है.कल हमारे आदरणीय मित्र आनद तेलतुंबड़े से एक लंबे व्यवधाने के बाद फोन पर लंबी बातचीत हुई और इस बातचीत का निष्कर्ष यही है कि समता और न्याय की लड़ाई में आज छात्र युवा सड़कों पर हैं तो हमें बिना शर्त उनका साथ देना चाहिए.

इसके साथ ही पितृसत्ता के खिलाफ हमारी लड़ाई अगर शुरु ही नहीं होती तो आधी आबादी को बदलाव की लड़ाई में शामिल किये बिना और उनके नेतृत्व को स्वीकार किये बिना हमारी समता और न्याय की यह लड़ाई अधूरी होगी.रवींद्र साहित्य और लोकसंस्कृति का पहला पाठ यही है. दिलों में मुहब्बत नहीं तो कायनात में यह कैसी बहार ? रवींद्र जयंती के मौके पर भी सियासती मजहब और मजहबी सियासत के शिकंजे में इंसानियत का मुल्क?যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে..যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,..কেনো ভোরের আকাশ ভরে দিলে এমন গানে গানে…!!কেনো তাঁরার মেলা গাঁথা,,কেনো ফুলের শয়ন পাথা…..কেনো দক্ষিন হাওয়া গোপন কথা জানায় কানে কানে…..!যদি প্রেম দিলেনা প্রাণে,,কেন আকাশ তবে এমন চাওয়া,চায় এ মুখের পানে………..!

खोल दो ..

सआदत हसन मंटो की जयंती पर आज उनकी ‘खोल दो’ कहानी स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . बलात्कार पीडिता के दर्द को अभिव्यक्त करती एक बेहतरीन कहानी, जिसमें विभाजन का दंश और राष्ट्रवाद एवं धार्मिक उन्माद की चक्की पर पीसती स्त्री की कहानी है- जिसका होना एक देह , मांस के लोथड़े में तब्दील होना है. 


अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची.रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए. सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं. वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा. यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे. उसे कुछ सुनाई नहीं देता था. कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था. उसके होशो-हवास गायब थे.उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था.



गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं. तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा. ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना…सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया .पूरे तीन घंटे बाद वह ‘सकीना-सकीना’ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला. चारों तरफ एक धांधली-सी मची थी. कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी. सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतड़ियां बाहर निकली हुईं थीं. उससे आगे वह और कुछ न सोच सका.


सकीना की मां मर चुकी थी. उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी , जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था, “मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ.”
सकीना उसके साथ ही थी. दोनों नंगे पांव भाग रहे थे. सकीना का दुप्पटा गिर पड़ा था. उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था. सकीना ने चिल्लाकर कहा था “अब्बाजी छोड़िए !” लेकिन उसने दुप्पटा उठा लिया था….यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब का तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुप्पटा था, लेकिन सकीना कहां थी ? सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका. क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था ?क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी ?

रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए . सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था. उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ जितने भी इनसान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी. सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की. आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे.छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुसत हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे. आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं. सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआऐं दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है… मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी…उम्र सत्रह वर्ष के करीब है………..आंखें बड़ी-बड़ी…बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल…मेरी इकलौती लड़की है. ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा.

रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढे¸ सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी. आठों नौजवानों ने कोशिश की. जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए. कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली. एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी. लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया. रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे. एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया. देखा, तो बहुत खूबसूरत थी. दाहिने गाल पर मोटा तिल था. एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?

लड़की का रंग और भी जर्द हो गया. उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है. आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की. उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया. एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी.कई दिन गुजर गए. सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली. वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला.

 रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे. एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा. लारी में बैठे थे. सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया. लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला ? सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा. और लारी चला दी. सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया.शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई. चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे.

 उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी. लोग उसे उठाकर लाए हैं. सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया. लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए. कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा. फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया. कमरे में कोई नहीं था. एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी. सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा. कमरे में अचानक रोशनी हुई. सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना…..

डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है ? सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं…जी मैं…इसका बाप हूं. डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो. सकीना के मुद्रा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी. बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है-। डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।

ग्रामीण महिलाओं के श्रम का राजनीतिक अर्थशास्त्र

आकांक्षा

 महात्मा  गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत।
संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com

महिला श्रम की बात करते समय हमारे मस्तिष्क में जो विचार सबसे पहले आता है वह यह कि महिलाओं के द्वारा घर के भीतर किया जाने वाला काम यानी घरेलू श्रम. कोई भी शब्द अपने पीछे वे मूल्य और संस्कृतियां लिए हुए होता है जिनमें उसका निर्माण हुआ रहता है. यही कारण है कि ‘घरेलू’ शब्द अपने आप में हमेशा से यही अर्थ लिए हुए है कि इसका संबंध केवल और केवल महिलाओं से है और इससे जुड़े सारे कामों का जिम्मा महिलाओं पर है. आम तौर पर महिलाएं खुद को मां और गृहणी के रूप में देखती हैं न कि एक वेतनभोगी के रूप में. चूंकि, इस आलेख में राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे जटिल अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए महिला  श्रम की बात की गयी है इसलिए राजनीतिक अर्थशास्त्र के सैद्धांतिक पहलूओं पर भी संक्षिप्त रूप में चर्चा करना आवश्यक हो जाता है. ऐसे तो राजनीतिक अर्थशास्त्र जिसे कि १८ वीं शताब्दी में राज्य के अर्थतंत्र के अध्ययन के उद्देश्य शुरू किया गया था, एक बड़ी अवधारणा है पर संक्षेप में इस अवधारणा को इस रूप में समझा जा सकता है कि, ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ समाज में राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के बंटवारे की जानकारी देने के साथ-साथ यह भी बताता है कि इस तरह का वितरण, विकास एवं अन्य नीतियों पर किस तरह का प्रभाव डालता है.’ इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ मूलत: उत्पादन एवं व्यापार का विधि, प्रथा, सरकार आदि से संबद्ध और राष्ट्रीय आय एवं संपदा के वितरण का अध्ययन है.

 नैतिक दर्शन से इस आवधारणा की उत्पति  मानी जाती है. पहली बार एक फ्रांसीसी विद्वान मोंक्रेतीन द वातविते ने ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ नामक शब्दावली का प्रयोग किया. इस समय तक आमतौर पर प्राचीन यूनानियों के अनुसार अर्थशास्त्र का क्षेत्र सिर्फ घरेलू-खर्च तक ही सीमित होता था पर, मोंक्रेतीन ने इसे राजनीति से भी जोड़ा. एडम स्मिथ ने ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ का आशय यह बताया कि ‘जनता को जीवनयापन के लिए पर्याप्त आमदनी उपलब्ध कराने का प्रावधान करना एवं सरकार के लिए उतने राजस्व का इंतजाम करना जिससे सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके.’ कार्ल-मार्क्स और जे.एस. मिल. ने इसे और भी व्यापक अर्थ दिया और  मूल्य, व्यापार, धन, आबादी, आर्थिक प्रणाली इत्यादि को ध्यान में रखते हुए ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ की व्याख्या की. घरेलू श्रम महिलाओं और पुरुषों के बीच असमान शक्ति-संबंधों का भौतिक आधार है. किसी भी राज्य के राजनीतिक अर्थशास्त्र में महिलाओं की दोयम दर्जे  की स्थिति को समझने के क्रम में घरेलू श्रम एक बहुत ही जटिल और चुनौतीपूर्ण अवधारणा है.  भारतीय मध्यवर्ग में घरेलू महिला की अवधारणा का उदय एक ऐतिहासिक निर्मिति है जिसे ब्रिटिशकालीन विचारधारा की उपज के रूप में देखना चाहिए. आगे चलकर यह भारतीय सभ्यता को संरक्षित करने के क्रम में और मजबूती से उभरकर आया.

यह सर्वविदित है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है. कृषि का संबंध सीधे तौर पर गांवों से और उसमें काम कर रहे लोगों से. लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रश्न यहां यह है कि यदि देश की अर्थव्यवस्था का संबंध गांव और उसमें रह रहे लोगों से है तो यहाँ काम करने वाले लोगों को (खासकर महिलाओं को) इस अर्थव्यवस्था के ‘अर्थ’ में कितना हिस्सा मिलता है और वे सीधे तौर पर इससे कितना जुड़े होते हैं ?
ग्रामीण इलाकों में मुख्य काम खेती को ही माना जाता है लेकिन इस खेती के काम के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू श्रम की भी खेती के कार्यों के लिए आवश्यकता होती है. इस आधार पर महिलाओं का घरेलू श्रम भी कहीं न कहीं ‘अर्थ’ को पैदा करने में भूमिका अदा कर रहा है. अब दूसरा सवाल यहां फिर आता है कि क्या इस घरेलू श्रम का महिलाओं को कोई अलग से मूल्य मिलता है ?  नहीं, दरअसल ग्रामीण महिलाओं के घरेलू श्रम को नजरअंदाज़ करते हुए ‘अर्थ’ पैदा करने वाले कामों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, जबकि बिना इसके खेती करना असंभव सा है. इस आलेख में  उदाहरण के तौर पर पंजाब में निवास कर रही प्रवासी ग्रामीण कृषक महिला एवं उनके श्रम की बात की गई है.

पंजाब भारत का कृषि-प्रधान राज्य है और यहां आज भी बहुत सारे लोग कृषि कार्य में लगे हैं. यहां धान, गेहूं और मक्के की खेती बड़े पैमाने पर होती है. यह कहा जा सकता है कि पंजाब बहुत सारे लोगों के रोजगार का स्रोत भी है. बहुतायत संख्या में स्थानीय लोगों के पलायन कर जाने के बाबजूद भी पंजाब में बहुत सारे ऐसे परिवार हैं जो कि कृषि पर ही निर्भर हैं. भूमंडलीकरण एवं औद्योगीकीकरण की इस अंधे दौर में पंजाब के अधिकांश निवासी अन्य दूसरे-दूसरे कार्य में रुचि लेने लगे. पंजाब में कृषि-कार्य संभालने के लिए अतिरिक्त मजदूरों की आवश्यक्ता पड़ी. भूमंडलीकरण एवं औद्योगिकीकरण का प्रभाव अन्य राज्यों जैसे, बिहार, झारखंड, उत्तर-प्रदेश इत्यादि राज्यों पर भी पड़ा. बेरोजगारी इन राज्यों की बहुत ही गंभीर समस्याओं में से एक है. बढती बेरोजगारी की वजह से रोजगार की तलाश में लोग दूसरे स्थान पर पलायन करने लगे. फलत:, इन राज्यों से बड़े पैमाने पर लड़कियां और महिलाएं भी पंजाब और दिल्ली की तरफ भी रवाना हुईं और कृषि कार्य में लगी. स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने आया कि अधिकांश महिलाएं कुछ समय बाद अपने गृह राज्य में वापस चली आती हैं, लेकिन हाल के वर्षों में एक नया परिवर्तन आया है.

अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में पंजाब में जाने वाली महिलाओं में से कुछ महिलाओं/लड़कियों के साथ वहां के किसान शादी कर लेते हैं. स्थानीय किसान शादी तो कर लेते हैं लेकिन, प्रवासी विवाहित महिला की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता. शादी के बाद पत्नी का दर्जा तो दूर उसकी स्थिति एक काम करनेवाली मशीन जैसी हो जाती है, साथ ही उसका नाम भी बदल दिया जाता है और उसके रहने के लिए घर के ही किसी कोने में जगह दे दी जाती है. वे महिलाएं जो सिर्फ खेती का काम करती हैं और कुछ समय बाद अपने घर वापस आ जाती हैं . उन्हें तो पर्याप्त मूल्य नहीं मिलने के बाबजूद अत्याधिक श्रम करना ही होता है. इन्हें कई घंटो तक लगातार खेतों में ही काम करना पड़ता है. जैसे, धान की रोपाई करने के लिए कई घंटों तक लगातार पानी में झुककर खड़ा रहना, फसल के बीच उगे खर-पतवार एवं गंदगी को साफ करना, कटाई, मंड़ाई इत्यादि. इसी प्रकार, मक्के, गेहूं तथा अन्य फसलों की खेती में भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. पर, ऐसी महिलाएं जिनसे पंजाब के किसान विवाह कर लेते हैं उनकी स्थिति और भी बदतर हो जाती है. नाम बदलने के बाद उसका अस्तित्व तो खत्म ही हो जाता है. उसे न तो पर्याप्त भोजन मिलता और न ही पीने योग्य साफ पानी. स्वास्थ्य और अन्य सुविधाएं तो बिल्कुल ही नहीं मिलती.

शादी के बाद खेती के कामों के अतिरिक्त घर के कामों का बोझ भी उसपर आ जाता है वह भी बिना किसी वेतन के. इन महिलाओं को सुबह से देर रात तक कड़ी मेहनत करनी होती है. जैसे, घर का खाना बनाना, जानवरों की देखभाल करना, चारा लाना, गोबर-पाथना, दूध-दूहना, खेतों पर जाकर काम करना, फसल की सफाई, धुलाई. इसके अलावा अन्य कार्य जो कि फसल के खेत से आने के बाद घर के अंदर करना होता है. जैसे, फसल को सुरक्षित स्थान पर रखना, किटाणु से बचाव एवं फसल के गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए समय-समय पर उसमें धुप एवं हवा लगाना इत्यादि. काम की स्थितियों के बाद दूसरा मसला राजनीतिक अर्थशास्त्र का भी है. मजदूर महिलाओं पर ही अधिकांशत: परिवार का अर्थशास्त्र टिका होता है. एक महिला जब रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों मे प्रवास करती है तब वह अपने और अपने परिवार की आय आपूर्ति का एक साधन भी होती है. अविवाहित लड़कियों के साथ भी यही स्थिती है. उसके सारे आय पर उसके मायके वालों का अधिकार होता है पर, जैसे ही लड़की का विवाह हो जाता है उसके आय पर ससुराल वालों का अधिकार हो जाता है. हां, इतना जरुर है कि किसी लड़की की शादी के बाद उसका अपना परिवार या मायके वाले उसपर होने वाले खर्च से मुक्त हो जाते हैं.

ऐसी प्रवासी महिलाएं/लड़कियां जो कि पंजाब के किसान से विवाह करती हैं वे अत्याधिक गरीब परिवार की होती हैं. उसके परिवार के लिए दोनों समय खाना मिल पाना भी असंभव होता है. ऐसी स्थिती में लड़कियों के विवाह का खर्च उठा पाने में उसके परिवार वाले असमर्थ होते हैं. एक निश्चित उम्र के बाद भारतीय समाज में लड़की का अविवाहित रहना स्वीकार्य नहीं होता. ऐसे में लड़की के घरवालों को इस विवाह से कोई ऐतराज नहीं होता है. क्योंकि, इस तरह के विवाह से लड़की का परिवार उसके विवाह में होने वाले खर्च और लड़की के व्यक्तिगत खर्च दोनों से मुक्त हो जाता है. किसान के परिवार में ऐसी लड़की जाने से किसान को हर तरह से लाभ पहुंचता है.  पहला, उसे खेती के कामों के लिए बिना कोई मजदूरी भुगतान किए हर समय उपलब्ध एक मजदूर मिल जाता है.  दूसरा, पत्नी बनने के बाद घरेलू कार्यों को करना उस महिला की जिम्मेदारी और कर्तव्य बन जाता है. तीसरा, उस महिला की सेक्शुअलिटी पूरी तरह से उसके नियंत्रण में आ जाती है.

मार्क्सवादी नारीवादी व्याख्या के अनुसार यदि हम उक्त परिस्थितियों का आंकलन करें तो, महिला किसान के लिए सरप्लस वैल्यू उत्पन्न भी करती है. किसान को एक मजदूर के वेतन-भुगतान की बचत होती है. चूंकि इस महिला के लिए काम करने की कोई निश्चित समयावधि नहीं होती इसलिए उसे कभी भी काम पर जाना पड़ सकता है. अर्थात, वेतन भुगतान का प्रश्न तो आज भी विमर्श के दायरे में है जिसमें मार्क्ससवादी नारीवादियों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था कि महिलाओं को घरेलू कार्यों के लिए वेतन दिया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी उत्पादन प्रक्रिया में घरेलू कार्यों का भी योगदान होता है. इस प्रकार यहां भी किसान को फायदा पहुंचता है. किसान को इन महिला मजदूरों को न तो वेतन देना होता है, न बुनियादी-सुबिधा. यहां तक कि कमरतोड़ मेहनत की वजह से ये महिलाएं तरह-तरह की बीमारियों का शिकार भी होती हैं पर, किसान परिवार में महिला के स्वास्थ्य को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई जाती है या यह कहा जा सकता है कि उसकी बीमारी को नजर अंदाज कर दिया जाता है. अत:, यह कहा जा सकता है कि इस महिला का अपना अस्तित्व ही खत्म हो जाता है उसे न तो सही मायने में पत्नी का दर्जा मिल पाता है और न ही मजदूर का.

संपूर्णता में यदि बात करें तो ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के द्वारा किए जाने वाले काम अन्य स्थानों के घरेलू श्रम से बिल्कुल अलग हैं. घरों में खाना बनाने, कपड़े-बर्तन धोने के अतिरिक्त उपले बनाना, अनाज रखने के लिए लिपाई करना, लकड़ी बीनना, पुआल के ढेर लगाना, जानवरों की देखभाल करना, उन्हें चराना, गोबर उठाना, अनाज को बेचने लायक तैयार करना, आदि ऐसे काम हैं जो एक कस्बाई या शहरी महिला के घरेलू कामों से बिल्कुल अलग और उनकी तुलना में ज्यादा भी हैं. विभिन्न फसल चक्रों में महिलाएं एक जरूरत सी बन जाती हैं. गांवों में यह देखा जा सकता है कि लड़कियां जब तक अविवाहित रहती हैं तब तक तो वे घरेलू और खेती के कार्यों को तो करती ही हैं, लेकिन उनके विवाह के बाद भी वे फसल तैयार होने के मौसम में अपने पिता के घर पर आ जाती हैं और फसल कटाई से लेकर सारा काम संभालती हैं. इस अर्थ उत्पादन में उनका कोई हिस्सा नहीं होता बजाए इतने के कि वे जब तक उस घर में हैं तब तक वे बिना कोई मूल्य चुकाए खाना खा सकती हैं. कई बार तो खाने के लिए रखे अनाज को भी बेच दिया जाता है जो कि महिलाओं की कमरतोड़ मेहनत का हिस्सा होता है. लेकिन यह हिस्सा बंटता नहीं बल्कि इस पर पुरुष मालिकाने का नियंत्रण होता है.महिलाओं को इस श्रम के बदले में खुद के स्वास्थ्य, शिक्षा सहित तमाम चीजों से वंचित भी रहना पड़ता है.



ग्रामीण इलाकों में यह अक्सर देखा जाता है कि महिलाओं को गर्भ धारण के बाद सीधे उनके पिता के घर पहुंचा दिया जाता है, जब तक बच्चा पैदा नहीं हो जाता. बच्चा के जन्म होने के बाद जब महिला स्वस्थ हो जाती है तब फ़िर ससुराल से बुलावा आ जाता है. फसलों की कटाई के समय ससुराल पक्ष उसे अपने पिता के घर भेजने पर इसलिए राजी हो जाता है कि जिससे उसके द्वारा किए गए श्रम से जो उत्पादन हो वह ससुराल में आए. होता भी ऐसा है कि अनाज घर में आने के बाद ससुराल पक्ष सीधा अपनी बहू को लेने उसके पिता के घर पहुंच जाता है. बहू के साथ ही वह अनाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी ले जाता है. इस प्रकार घरेलू श्रम के राजनीतिक अर्थशास्त्र को देखना और समझना जरूरी है. हमें पता चलेगा कि महिलाएं केवल और केवल धन उगाही के एक यंत्र के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं.

संदर्भ-
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 Political Economy- A Textbook issued by the Institute of  Economics of the Academy of sciences of the USSR, Lawrence  & Wishart, London, 1957