जितेन्द्र सिंह : स्मृति में जीवित पत्रकारिता और समाजवादी आंदोलन का एक मूल्यवान दौर

वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र सिंह की हिन्दी पुस्तक ‘इन्द्रधनु का टुकड़ा’ के लोकार्पण समारोह में वक्ताओं ने उनकी बहुआयामी पत्रकारिता, साहित्यिक दृष्टि, गांधीवादी समाजवादी विचारधारा और मानवीय संवेदना को याद किया। बिहार म्यूजियम और वातायन प्रकाशन की संयुक्त पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में हरिवंश, प्रो. रामवचन राय, शिवानंद तिवारी, रजी अहमद सहित कई गणमान्य लोगों ने उनसे जुड़े संस्मरण साझा किए। यह आयोजन जितेन्द्र सिंह के योगदान के साथ पत्रकारिता, साहित्य और समाजवादी राजनीति के उस दौर को समझने का अवसर भी बना, जिसमें वे विभिन्न वैचारिक धाराओं के बीच संवाद का सेतु थे। अरुण नारायण की रिपोर्ट

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‘जितेन्द्र सिंह का पत्रकारिता जीवन बहुआयामी था। उन्होंने सर्चलाइट और लीडर जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में काम किया तथा गांधी पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया। वे हर काम पूरी गंभीरता और निष्ठा से करते थे। उनकी दृष्टि राष्ट्रीय थी। वे गांधीवादी समाजवादी थे और बुद्ध उनके चिंतन के प्रमुख स्रोतों में थे। संगीत तथा ऐतिहासिक स्थलों से भी उन्हें गहरा लगाव था। ’ ये बातें राज्यसभा के उपसभापति एवं प्रभात खबर के पूर्व संपादक हरिवंश ने एक पुस्तक के लोकार्पण समारोह में कही। बिहार म्यूजियम और वातायन प्रकाशन की संयुक्त पहल पर वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र सिंह की हिन्दी पुस्तक ‘इन्द्रधनु का टुकड़ा’ के इस लोकार्पण समारोह में उनके अलावे बिहार विधान परिषद के उपसभापति प्रो. (डॉ.) रामवचन राय, पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी, गांधीवादी रजी अहमद और बिहार म्यूजियम के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से भाग लिया। इस अवसर पर उपस्थित वक्ताओं ने जितेन्द्र सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनकी पत्रकारिता, साहित्यिक अभिरुचियों, समाजवादी प्रतिबद्धता और सहज मानवीय व्यवहार से जुड़े अनेक संस्मरण साझा किये। कार्यक्रम में पत्रकार अरुण सिंह ने अतिथियों को शॉल और बुके देकर सम्मानित किया। संचालन वातायन प्रकाशन के निदेशक एवं जितेन्द्र सिंह के शिष्य राजेश शुक्ला ने किया।

हरिवंश ने आगे कहा कि जितेन्द्र सिंह का पत्रकारिता जीवन बहुआयामी था। उन्होंने 1948-50 के दौरान सर्चलाइट में काम किया और के. रामाराव के संपादन में पत्रकारिता की। बाद में वे लीडर से जुड़े, जिसकी शुरुआत मदन मोहन मालवीय ने की थी। वे इसके सहायक और संयुक्त संपादक भी रहे। उन्होंने गांधी पर केंद्रित एक त्रैमासिक पत्रिका का संपादन किया, जिसमें गांधी से संबंधित दुनिया भर की गतिविधियों और विचारों की अद्यतन जानकारी मिलती थी। हरिवंश ने कहा कि जितेन्द्र सिंह जिस काम को हाथ में लेते थे, उसे पूरी गंभीरता और निष्ठा से अंजाम देते थे। उन्होंने बताया कि जितेन्द्र सिंह का परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहा था और वह लोहिया तथा आचार्य नरेंद्र देव की विचारधारा से प्रभावित था। उनकी मां ने अपने गहने गिरवी रखकर उनकी पढ़ाई कराई। संपूर्णानंद उनके शोध-निर्देशक थे। पंत और निराला से उनके निकट संबंध थे। हरिवंश ने निराला से जुड़ा एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि निराला एक बार तरबूज लेकर उनके घर पहुंचे थे, लेकिन जितेन्द्र सिंह की अनुपस्थिति में वापस लौट गए। अज्ञेय से भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। डॉ. राममनोहर लोहिया को कॉफी हाउस में धर्मवीर भारती से मिलवाने का काम भी जितेन्द्र सिंह ने ही किया था। परिमल और प्रगतिशील, दोनों साहित्यिक खेमों में उनकी समान लोकप्रियता थी। हरिवंश ने कहा कि जितेन्द्र सिंह कविता, डायरी और रिपोर्ताज लेखन में समान रूप से दक्ष थे। वे मूलतः अंग्रेजी के लेखक थे, लेकिन हिन्दी में भी उन्होंने अपने ढंग का दुर्लभ लेखन किया। राजेश शुक्ला ने उनके हिन्दी लेखन का अत्यंत दृष्टिसंपन्न और सुरुचिपूर्ण संकलन प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में उनके कई उत्कृष्ट निबंध शामिल हैं।

हरिवंश ने बिहार के 1967 के अकाल पर धर्मयुग में प्रकाशित जितेन्द्र सिंह के रिपोर्ताज को याद करते हुए कहा कि उन्होंने इन रपटों को पढ़कर पहली बार जितेन्द्र सिंह को जाना था। बिहार के सूखे पर उनकी चार किस्तें प्रकाशित हुई थीं। अकाल की त्रासदी को सुजाता के प्रतीक से जोड़कर देखने की उनकी दृष्टि उनकी पत्रकारिता की संवेदनशीलता का प्रमाण थी। उनकी रपटें पत्रकारिता लेखन का मानक हैं। वे अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण हैं। उनकी भाषा की मर्यादा और ऐतिहासिक दृष्टि पाठक को प्रभावित करती है। उनके लेखन में दर्शन और कल्पनाशीलता का अद्भुत मेल था।
उन्होंने 1960 में रायपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन का एक संस्मरण भी साझा किया। उस समय वे लीडर के लिए रिपोर्टिंग करने गए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने घोषणा की थी कि यदि चंद्रभान जीत गए तो वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। इसके बाद अधिवेशन के अन्य मुद्दे पीछे छूट गए और संपूर्णानंद के इस्तीफे की चर्चा प्रमुख हो गई। हरिवंश ने कहा कि जितेन्द्र बाबू ने इस शोर के बीच भी वास्तविक मुद्दों को रेखांकित किया। यह उनकी पत्रकारिता की विशिष्टता थी।

आज की पत्रकारिता से तुलना करते हुए हरिवंश ने कहा कि पत्रकारिता का स्वरूप बहुत बदल गया है। उत्तर भारत के लोग दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने में रुचि नहीं लेते, जबकि जितेन्द्र सिंह जैसे लोग राष्ट्रीयता और पूरे देश की चिंता करते थे। वे गांधीवादी समाजवादी थे। बुद्ध उनके दर्शन के प्रमुख स्रोत थे। वे संगीत प्रेमी थे और ऐतिहासिक स्थलों को शक्ति एवं प्रेरणा का स्रोत मानते थे।

अपने अध्यक्षीय भाषण में बिहार विधान परिषद के उपसभापति प्रो. (डॉ.) रामवचन राय ने कहा कि जितेन्द्र सिंह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्थान थे। वे अपने पूरे दौर के प्रतिनिधि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ, जहां राही मासूम रजा और शिवप्रसाद सिंह जैसे लेखक पैदा हुए। बनारस और इलाहाबाद में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और इन दोनों शहरों के सांस्कृतिक संस्कार उनके व्यक्तित्व में गहरे रचे-बसे थे। रामवचन राय ने कहा कि जितेन्द्र सिंह अंग्रेजी के बड़े पत्रकार थे और द टाइम्स ऑफ इंडिया के संवाददाता रहे, लेकिन उन्होंने हिन्दी को अंग्रेजी से कम महत्व नहीं दिया। हिन्दी उनके हृदय की भाषा थी। उस दौर में धर्मयुग और दिनमान में प्रकाशित होना बड़ी उपलब्धि माना जाता था। धर्मवीर भारती उनके मित्रों में थे। उनकी बेटी किरण सिंह धर्मवीर भारती की गोद में खेलती थीं। बाद में किरण ने पटना विश्वविद्यालय से धर्मयुग पर पीएचडी की। उन्होंने कहा कि जितेन्द्र सिंह के छोटे पुत्र मून में भी उनके पिता का अक्स दिखाई देता है।

जितेन्द्र सिंह के साथ कॉफी हाउस में बिताई अनेक शामों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जयप्रकाश आंदोलन की पृष्ठभूमि इलाहाबाद में 1972 में ही बनने लगी थी। इस संदर्भ में उन्होंने महादेवी वर्मा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि 1972 में इलाहाबाद में महादेवी वर्मा की पहल पर एक लेखक सम्मेलन आयोजित किया गया था। उस समय वे पटना विश्वविद्यालय में व्याख्याता नियुक्त हुए ही थे। जितेन्द्र बाबू उन्हें लेकर उस सम्मेलन में पहुंचे थे। महादेवी वर्मा का भाषण ऐतिहासिक था। नेहरू परिवार से उनकी निकटता जगजाहिर थी, लेकिन देश में कांग्रेस शासन से मोहभंग का जो वातावरण बन रहा था, उसका प्रभाव उन पर भी दिखाई दे रहा था। उनका भाषण बदलते राजनीतिक परिदृश्य और आसन्न परिस्थितियों पर केंद्रित था। बसंत पंचमी के दिन हिन्दुस्तानी अकादमी के सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में निराला की तस्वीर पर माल्यार्पण होना था। तस्वीर छोटी थी, इसलिए महादेवी वर्मा ने पूछा कि निराला की कोई बड़ी तस्वीर नहीं है क्या। उन्होंने बताया कि उनके ड्राइंग रूम में निराला की बड़ी तस्वीर है, उसे मंगवा लिया जाए। रामवचन राय ने कहा कि उन्होंने महादेवी जी के चरण छूकर प्रणाम किया और उनकी गाड़ी से उनके घर पहुंचे। वहां से पांडे जी से तस्वीर लेकर वे आये। इसके बाद माल्यार्पण कर कार्यक्रम शुरू हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि महादेवी वर्मा निराला को राखी बांधती थीं।

रामवचन राय ने कहा कि जितेन्द्र बाबू की दुनिया बहुत बड़ी थी। अपने समय के अनेक बड़े नेताओं से उनके परिचय थे, लेकिन उन्होंने कभी इन संबंधों का निजी लाभ नहीं उठाया। आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है। उन्होंने जितेन्द्र बाबू की स्मृति को सामने लाने के लिए बहुत परिश्रम और निष्ठा से काम किया है। उन्होंने जितेन्द्र सिंह को अत्यंत सहज और संत-स्वभाव का व्यक्ति बताते हुए कहा कि उन्होंने न जाने कितने लोगों की मदद की। उनके ससुर सत्यनारायण सिंह जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री थे, लेकिन जितेन्द्र सिंह ने एक सामान्य व्यक्ति और पत्रकार की तरह जीवन बिताया। अहर्निश दूसरों की खबर लेना और लोगों की चिंता करना उनका स्वभाव था। रेणु से भी उनकी गहरी मित्रता थी। रामवचन राय ने बताया कि 1967 में जितेन्द्र बाबू ने कर्पूरी ठाकुर से कहकर पटना में एक लेखक सम्मेलन आयोजित कराया था। इसमें विजयदेव नारायण शाही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और ओमप्रकाश दीपक शामिल हुए थे। शंकर दयाल सिंह और जितेन्द्र बाबू की जोड़ी भी उस समय काफी विख्यात थी। वे शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार थे। अज्ञेय की ‘जानकी जीवन यात्रा’ के दौरान वे जितेन्द्र बाबू के साथ हाजीपुर गए थे। इस यात्रा की एक दुर्लभ तस्वीर पुस्तक के परिशिष्ट में शामिल है।

गांधी संग्रहालय, पटना के मंत्री एवं गांधीवादी रजी अहमद ने कहा कि पटना की नागरिक चेतना ने जितेन्द्र बाबू को भुलाया नहीं है। सदाकत आश्रम में जब पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद रह रहे थे, तब जितेन्द्र बाबू पाटलिपुत्र मोहल्ले से रोज पैदल घूमते हुए उनसे मिलने आ जाया करते थे। रजी अहमद ने बताया कि वे अक्सर जितेन्द्र सिंह को ‘फिलॉसफर’ कहकर संबोधित करते थे, लेकिन वे हंसकर कहते थे कि उन्हें फिलॉसफर न कहा जाए। रजी अहमद ने कहा कि ऐसे दोस्त अब कहां मिलते हैं! उन्हें विश्वास है कि जितेन्द्र बाबू जहां भी होंगे, आज के इस आयोजन को देखकर मुस्कुरा रहे होंगे।
उन्होंने पूर्व लेखक, राज्यसभा सदस्य एवं प्रकाशक शंकर दयाल सिंह तथा उनके पारिजात प्रकाशन से जुड़ी स्मृतियां भी साझा कीं। रजी अहमद ने बताया कि शंकर दयाल सिंह संसद सदस्य रहते हुए हिन्दी के सलाहकार भी थे। एक बार वे उनसे मिलने पहुंचे तो गेट पर नजर पड़ते ही शंकर दयाल सिंह ने जोर से आवाज लगाई—‘रजी भाई!’ इस पर वहां मौजूद एक गैर-बिहारी व्यक्ति ने चुटकी ली कि दो बिहारी जमा हो गए।

पूर्व मंत्री एवं राज्यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी ने कहा कि उन्होंने जितेन्द्र बाबू को सबसे पहले जेपी आंदोलन के दौरान एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जाना था। उस समय वे उन्हें पत्रकार कम और आंदोलन का सिपाही ज्यादा लगते थे। उनके ससुर सत्यनारायण सिंह लोकसभा में कांग्रेस के नेता थे। जितेन्द्र बाबू बहुत भावुक व्यक्ति थे। गांधी मैदान की एक रैली में दस लाख लोगों के शामिल होने की उनकी रिपोर्ट के कारण वे चर्चाओं में थे। शिवानंद तिवारी ने 1977 की एक घटना का उल्लेख किया। उस समय पटना से सामयिक वार्ता का पहला अंक निकला था, जिसमें जयप्रकाश नारायण का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था। उनसे पूछा गया था कि क्या सरकार उनसे सलाह-मशविरा करती है। इस पर जेपी ने कहा था, ‘हमको कौन पूछता है।’ इस साक्षात्कार को लेकर महिला चरखा समिति में एक बैठक के दौरान तनाव पैदा हो गया था। बैठक में जितेन्द्र बाबू, गंगा बाबू और तत्कालीन सिंचाई मंत्री सच्चिदानंद सिंह मौजूद थे। शिवानंद तिवारी ने कहा कि उस तनावपूर्ण स्थिति को जितेन्द्र बाबू ने ही शांत कराया था।

उन्होंने कहा कि जितेन्द्र सिंह का संघर्ष इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ था। वे इस संघर्ष में पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़े रहे। शिवानंद तिवारी ने पत्रकार जुगनू शारदेय से जुड़ा एक प्रसंग भी सुनाया। एक बार बोरिंग रोड चौराहे पर उन्होंने देखा कि जुगनू शारदेय अपनी शर्ट उतारकर कंधे पर रखे बैठे हैं और जितेन्द्र बाबू संकोच में सिर झुकाए बैठे हैं। यह दृश्य देखकर उनके मन में जुगनू को पीटने का विचार आया। उन्होंने पारिजात प्रकाशन में शंकर दयाल सिंह के साथ हुई मुलाकातों को भी याद किया। वहां शंकर बाबू के पिता कामता प्रसाद सिंह का भव्य व्यक्तित्व, घनी मूंछें और ठहाकों से गूंजती आवाज पूरे माहौल को जीवंत बना देती थी। इन सबके बीच जितेन्द्र बाबू की अपनी अनोखी दुनिया थी। उनकी भाषा भी निराली और प्रभावशाली थी। शिवानंद तिवारी ने कहा कि वह एक अलग ही दौर था, जब ऐसे व्यक्तित्वों का मिलना संभव होता था।

पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी राम उपदेश सिंह विदेह ने कहा कि वे इस आयोजन में मंचासीन अतिथियों को देखकर आह्लादित हैं। उन्होंने जितेन्द्र सिंह की रचनाओं को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने के लिए राजेश शुक्ला के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि जितेन्द्र बाबू उनके जवारी थे। वे गाजीपुर के रहने वाले हैं और जितेन्द्र सिंह बनारस के थे। द टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार के रूप में जितेन्द्र सिंह की काफी प्रतिष्ठा थी। राम उपदेश सिंह ने बताया कि 1962 में उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ सदाकत आश्रम में समय बिताया और उनके अंतिम दिनों तक उनका साथ दिया। उन्होंने एक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अंत तक इस बात का मलाल रहा कि महात्मा गांधी उनके घर आये थे, लेकिन उनके सेवक ने उन्हें पहचान नहीं पाया, जिसके कारण उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिल सका।

पत्रकार रंजन कुमार ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में जितेन्द्र सिंह से जुड़े कई दिलचस्प पारिवारिक संस्मरण साझा किये। उन्होंने कहा कि उनके पिता शंकर दयाल सिंह और जितेन्द्र चाचा की शाश्वत जोड़ी थी। आज दोनों जहां भी होंगे, हम पर आशीर्वाद की वर्षा कर रहे होंगे। रंजन कुमार ने कहा कि उनके और जितेन्द्र सिंह के जीवन में कई समानताएं थीं। जितेन्द्र सिंह द टाइम्स ऑफ इंडिया की अंग्रेजी पत्रकारिता छोड़कर हिन्दी पत्रकारिता में आये, जबकि वे हिन्दी के नवभारत टाइम्स से अंग्रेजी पत्रकारिता में चले गए। उन्होंने बताया कि जब कभी उनकी मां और पिता के बीच नोकझोंक होती थी, तो उनके पिता जितेन्द्र चाचा से कहते थे, ‘भैया, देख रहे हैं।’ इस पर जितेन्द्र चाचा के चेहरे पर उभरने वाली बालसुलभ मुस्कान देखने लायक होती थी। इसी तरह, जब वे जितेन्द्र सिंह के घर जाते और वहां पति-पत्नी के बीच तू-तू, मैं-मैं होती, तो जितेन्द्र चाचा आंखें बंद कर लेते, मानो कुछ हुआ ही न हो। रंजन कुमार ने बताया कि उनकी एक अंग्रेजी पुस्तक का संपादन भी जितेन्द्र सिंह ने किया था, जो उनके लिए अमूल्य धरोहर है।

बिहार म्यूजियम के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि जितेन्द्र सिंह बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने विविध विषयों पर व्यापक लेखन किया। बिहार म्यूजियम के लिए इतने व्यापक विषयों पर इतने वक्ताओं को सुनना सुखद अनुभव है। इस गोष्ठी में एक पूरे दौर का परिदृश्य सामने आ गया। उन्होंने कहा कि ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केंद्रित कार्यक्रम और भी होने चाहिए, ताकि समाज अपने बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास से परिचित हो सके।

बिहार म्यूजियम के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा ने जितेन्द्र सिंह से जुड़े दो महत्वपूर्ण संस्मरण साझा किये। उन्होंने बताया कि पारिजात प्रकाशन में उन्होंने बिहार नव निर्माण समिति से जुड़े दिनेश्वर सिंह ‘ददन’ के साथ जितेन्द्र बाबू को कई बार देखा था। वे कई अवसरों पर उनके घर भी गए थे। उस समय जितेन्द्र सिंह का अपना अलग आभामंडल था।
उन्होंने दूसरा संस्मरण कर्पूरी ठाकुर और धनिक लाल मंडल से जुड़ा सुनाया। उस समय धनिक लाल मंडल अशोक कुमार सिन्हा के किदवईपुरी स्थित किराये के सरकारी क्वार्टर में रहते थे। एक दिन कर्पूरी ठाकुर और धनिक लाल मंडल ने जितेन्द्र सिंह को आदरपूर्वक बाहर से रिसीव किया। कमरे में बैठने के लिए केवल एक कुर्सी और एक चौकी थी। दोनों नेताओं ने कुर्सी पर जितेन्द्र सिंह को बैठाया और स्वयं चौकी पर बैठकर उनसे घंटों बातचीत करते रहे। बातचीत समाप्त होने पर दोनों उन्हें सम्मानपूर्वक घर के बाहर तक विदा करने गये। अशोक कुमार सिन्हा ने कहा कि यह प्रसंग जितेन्द्र सिंह के व्यक्तित्व और उनके प्रति समकालीन समाजवादी नेताओं के सम्मान को दर्शाता है।

कार्यक्रम में जितेन्द्र सिंह की बेटी किरण सिंह ने उनके दो चुने हुए प्रतिनिधि रिपोर्ताज के महत्वपूर्ण अंशों का पाठ किया। इससे उपस्थित श्रोताओं को उनके लेखन की संवेदना, भाषा और पत्रकारिता की दृष्टि से परिचित होने का अवसर मिला।
कार्यक्रम का संचालन वातायन प्रकाशन के निदेशक एवं जितेन्द्र सिंह के शिष्य राजेश शुक्ला ने किया। उन्होंने पुस्तक तैयार करने के दौरान आई चुनौतियों और इस काम में सहयोग देने वाले लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जितेन्द्र सिंह अपने दौर के अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदृष्टि संपन्न पत्रकार थे। उनके निधन के कई वर्षों बाद उनकी हिन्दी रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर उन्हें गहरी प्रसन्नता हो रही है।

यह कार्यक्रम कई मामले में अनूठा और प्रेरक साबित हुआ।पत्रकारिता, साहित्य और समाजवादी राजनीति से समृद्ध एक पूरे दौर को समारोह में शामिल वक्ताओं ने जीवंत ढंग से उपस्थित कर दिया। विभिन्न वैचारिक धाराओं के बीच जितेन्द्र सिंह संवाद के सेतु थे, जिनकी स्मृति आज भी उनके समकालीनों और अगली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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