अतिपिछड़ा दावेदारी सम्मेलन में 18 जिलों के प्रतिनिधि जुटे, जाति गणना और संख्यानुपातिक हिस्सेदारी पर जोर

अतिपिछड़ा दावेदारी सम्मेलन में दस सूत्री मांगों पर बनी सहमति, बिहार के सभी जिलों में चरणबद्ध सम्मेलन और जन-जागरण अभियान चलाने का संकल्प

पटना, 24 अक्टूबर 2026। अतिपिछड़ा दावेदारी सम्मेलन में पटना सहित बिहार के 18 जिलों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक हिस्सेदारी के सवाल पर एकजुटता दिखाई। पटना स्थित जगजीवन राम शोध संस्थान के सभागार में आयोजित सम्मेलन में अतिपिछड़ा समाज के अधिकारों, जाति आधारित गणना, प्रतिनिधित्व, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन में दस सूत्री मांगों पर सहमति बनी। साथ ही, बिहार के सभी जिलों में चरणबद्ध तरीके से अतिपिछड़ा दावेदारी सम्मेलन आयोजित करने तथा मांगों के समर्थन में व्यापक जन-अभियान चलाने का संकल्प लिया गया।

दस सूत्री मांगों पर बनी सहमति

सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने निम्नलिखित दस मांगों को लेकर पूरे बिहार में अभियान चलाने पर सहमति जताई।संख्यानुपातिक हिस्सेदारी: अतिपिछड़ा वर्ग ने अपनी 38 प्रतिशत आबादी के अनुपात में सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्रों में धन, धरती और राजपाट सहित सभी क्षेत्रों में 38 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग की। इसमें ठेका-पट्टा भी शामिल है।अत्याचार से संरक्षण: अतिपिछड़ा समाज के लिए अत्याचार निवारण कानून बनाने और उसके माध्यम से कानूनी संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग की गई।
रोहिणी आयोग की रिपोर्ट: लंबे समय से लंबित रोहिणी आयोग की रिपोर्ट जल्द प्रकाशित करने, उस पर जन-समीक्षा कराने और उसके बाद लागू करने की मांग की गई।पिछड़ा वर्ग का पुनर्वर्गीकरण: 2022-23 की जाति आधारित गणना के आधार पर पिछड़ा वर्ग का पुनः वर्गीकरण किया जाए।
जाति जनगणना: 1931 की जाति जनगणना को आधार बनाकर जाति जनगणना कराने की मांग की गई।स्थानीय निकायों में आरक्षण: पंचायती राज व्यवस्था में संविधान के अनुरूप अतिपिछड़ा वर्ग को तत्काल 30 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की गई।
विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व: लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद में अतिपिछड़ा वर्ग को आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की मांग की गई। साथ ही, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राज्यसभा तथा विधान परिषद में भी सीटें सुरक्षित करने की मांग उठाई गई।
संविदा कर्मियों का नियमितीकरण: आउटसोर्सिंग और संविदा पर कार्यरत कर्मियों के साथ आशा, जीविका, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका तथा सफाईकर्मियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देकर स्थायी करने की मांग की गई।
रोजगार और बेरोजगारी भत्ता: बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार की गारंटी तथा रोजगार मिलने तक प्रतिमाह 5,000 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने की मांग की गई।
पुरानी पेंशन योजना: सरकारी नौकरियों में पुरानी पेंशन योजना लागू करने की मांग की गई।

एसआईआर के खिलाफ जन-जागरण अभियान, ईडब्ल्यूएस पर भी उठे सवाल
सम्मेलन में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि इसके नाम पर दलितों, अतिपिछड़ों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और विपक्षी दलों के समर्थकों के नाम मतदाता सूची से बाहर किए जा रहे हैं। इसे लोकतंत्र और मताधिकार के विरुद्ध बताते हुए इसके खिलाफ जन-जागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया गया।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए लागू ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर भी सवाल उठाए गए। सम्मेलन में इसे समाप्त करने अथवा इसके भीतर वर्गीकरण करने की मांग सामने आई। वक्ताओं ने यह भी कहा कि ईडब्ल्यूएस के लिए गरीबी की सीमा वही होनी चाहिए, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में निर्धारित है।

अतिपिछड़ा समाज की स्थिति और हिस्सेदारी पर चर्चा

सम्मेलन दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहले सत्र की अध्यक्षता किशोरी दास ने की, जबकि संचालन डॉ. गौतम कुमार प्रीतम ने किया। विषय प्रवेश कराते हुए सम्मेलन की संयोजन टीम के सदस्य नवीन कुमार प्रजापति ने कहा कि आजादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी अतिपिछड़ा समाज सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर है। उन्होंने कहा कि अतिपिछड़ा समाज के समर्थन के बिना सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है, इसके बावजूद अलग-अलग सरकारों ने इस समाज को ठगने का काम किया है।
उन्होंने अतिपिछड़ा समाज के ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समाज ने अंग्रेजी हुकूमत के साथ-साथ सामंती शक्तियों का भी मुकाबला किया है। छोटी-छोटी आबादी वाली अनेक जातियों से मिलकर अतिपिछड़ा समाज बना है। ऐसे में जातिगत पहचान के साथ-साथ वर्गीय चेतना को केंद्र में लाना जरूरी है, ताकि समाज की सामूहिक आवाज को ताकत मिल सके।

मुख्य वक्ता डॉ. शिवजतन ठाकुर ने कहा कि अतिपिछड़ा समाज चौतरफा हमले और वंचना का सामना कर रहा है। उन्होंने अतिपिछड़ा अत्याचार निवारण कानून बनाने तथा शिक्षा, रोजगार और राजनीति में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया।

गांव-शहर तक सम्मेलन और जनसंवाद का आह्वान

दूसरे सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय अतिपिछड़ा संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने की और संचालन डॉ. गौतम कुमार प्रीतम ने किया।
विजय कुमार चौधरी ने 2022-23 की जाति आधारित गणना के आधार पर पिछड़ा वर्ग के पुनर्वर्गीकरण की मांग दोहराई। उन्होंने संविदा और आउटसोर्सिंग पर कार्यरत कर्मियों, जीविका कर्मियों, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं तथा सफाईकर्मियों को स्थायी सरकारी कर्मचारी बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
 गौतम कुमार प्रीतम और पत्रकार संजीव कुमार बिट्टू ने कहा कि अतिपिछड़ा समाज के पास न पर्याप्त भूमि है, न उच्च शिक्षा में समुचित भागीदारी और न ही बड़े व्यापार तथा उद्योगों में उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों में भी अतिपिछड़ा समाज की मौजूदगी नगण्य है। यह स्थिति सत्ता में बैठे लोगों की लगातार उपेक्षा को दर्शाती है।
दोनों वक्ताओं ने समाज को संगठित करने के लिए गांवों, शहरों और कस्बों में अतिपिछड़ा दावेदारी सम्मेलन आयोजित करने का आह्वान किया। उन्होंने पर्चे, पोस्टर, सोशल मीडिया और जनसंवाद के माध्यम से अभियान चलाने की जरूरत बताई। उनके अनुसार, अतिपिछड़ा समाज की लड़ाई आर्थिक और सामाजिक आजादी की लड़ाई है, जिसे व्यापक एकजुटता के साथ आगे बढ़ाना होगा।

एसआईआर पर भाजपा सरकार और विपक्ष से सवाल

स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने अपने वक्तव्य में एसआईआर के मुद्दे पर भाजपा सरकार की आलोचना की।  उन्होंने इसे लोकतंत्र पर हमले के रूप में देखते हुए इसके खिलाफ व्यापक विरोध और जन-अभियान चलाने की जरूरत बताई लेकिन जोर देकर कहा कि अतिपिछड़ा समाज हो या पूरा बहुजन समाज सबको मिलकर पहला मुद्दा जाति गणना को बनाना चाहिए, वही सत्ता और संसाधनों में भागीदारी का, हासिल का पहला सोपान है।  उन्होंने विपक्षी दलों से भी सवाल किया कि अतिपिछड़ा समाज सहित समूचे बहुजन समाज के सवालों पर उनका रुख क्या है। उन्होंने कहा कि विपक्ष को इन मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय के सवालों पर ठोस प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए।
सम्मेलन में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि अतिपिछड़ा समाज की मांगों को केवल सम्मेलनों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें व्यापक जन-आंदोलन का रूप दिया जाए। कार्यक्रम के अंत में विनोद बिहारी मंडल ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

सम्मेलन में शामिल वक्ता
सम्मेलन में डॉ. कर्नाल अहमद अंसारी, जय भगवान विमल, राजाराम पंडित, सविता कुमारी, प्रियवंदा कुमारी, नीतू निषाद, अटल प्रजापति, सुरेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता ललन भगत, अधिवक्ता मणिलाल, राजीव रंजन, डॉ. अजय कुमार, मुन्ना मालाकार, जितेंद्र कुमार, बिंदेश्वरी सिंह, गुलाब ठाकुर, सुदेश सिंह निषाद, महेश कुमार पंडित, नरेश ठाकुर, अजय मालाकार, अर्जुन ठाकुर, उस्मान हलालखोर और नूर हसन सहित अन्य वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।