हिंदू कोड बिल से नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न केवल चुनावों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकता, सामाजिक समानता, संपत्ति-अधिकार, पारिवारिक सत्ता-संबंधों और निर्णय-निर्माण में वास्तविक भागीदारी से जुड़ा हुआ प्रश्न है। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के राजनीतिक चिंतन में महिलाओं की मुक्ति सामाजिक लोकतंत्र और जाति-विरोधी परिवर्तन की व्यापक परियोजना का अभिन्न अंग थी। इसी संदर्भ में उनका हिंदू कोड बिल भारतीय समाज में महिलाओं के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति, दत्तक ग्रहण और पारिवारिक अधिकारों को पुनर्संगठित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।

हिंदू कोड बिल अपने मूल व्यापक स्वरूप में पारित नहीं हो सका और 1951 में अम्बेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दिया। बाद में इसके अनेक प्रावधान अलग-अलग कानूनों के रूप में सामने आए—विशेषकर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 तथा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956। डॉ. अम्बेडकर के लिए प्रश्न केवल धार्मिक या पारिवारिक कानून का नहीं था; वे महिलाओं को समान नागरिक और आर्थिक अधिकार प्रदान करने के लिए विधि को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में देखते थे। सरकारी संकलित लेखन में भी उनके हिंदू कोड बिल संबंधी हस्तक्षेपों में महिलाओं के आर्थिक अधिकारों और न्याय की स्पष्ट चिंता दिखाई देती है। दूसरी ओर, नारी शक्ति वंदन अधिनियम अधिनियम, 2023, (महिला आरक्षण विधेयक)लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का संवैधानिक प्रावधान करता है। यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में महिलाओं के लिए भी एक-तिहाई प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है। किंतु इसका प्रभाव तत्काल चुनाव से नहीं हुआ; अनुच्छेद 334A में इसे संबंधित जनगणना तथा परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया से जोड़ा गया है। यह लेख इन दोनों ऐतिहासिक पहलों को एक वैचारिक निरंतरता में रखकर विश्लेषित करता है—हिंदू कोड बिल ने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक नागरिकता के प्रश्न को संबोधित किया, जबकि नारी शक्ति वंदन अधिनियम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संस्थागत विस्तार का प्रयास है। साथ ही लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या केवल सीटों का आरक्षण महिलाओं के वास्तविक राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए पर्याप्त है, विशेषकर दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग तथा अन्य हाशिए की महिलाओं के संदर्भ में।
प्रमुख शब्द: राजनीतिक, भागीदारी, हिंदू कोड बिल, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, महिला आरक्षण, SC/ST/OBC महिलाएँ, सामाजिक लोकतंत्र, लैंगिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व।
डॉ. अम्बेडकर की लोकतांत्रिक अवधारणा में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए सिद्धांत थे। लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने नागरिक मतदान करते हैं। लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात से भी निर्धारित होती है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में समाज के विभिन्न वर्गों की कितनी वास्तविक भागीदारी है। भारत में महिलाओं को संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से आरंभ से ही औपचारिक राजनीतिक नागरिकता प्रदान की। लेकिन मतदान का अधिकार और राजनीतिक सत्ता में प्रतिनिधित्व दो अलग-अलग प्रश्न हैं। भारत में महिलाएँ मतदाता के रूप में बड़ी संख्या में उपस्थित रही हैं, किंतु संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व लंबे समय तक सीमित रहा है। 18वीं लोकसभा में 74 महिलाएँ निर्वाचित हुईं, जो कुल 543 सदस्यों का लगभग 14 प्रतिशत है जो 2019 की 78 महिला सांसदों की तुलना में थोड़ी कम है। इस दृष्टि से महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक समानता का केंद्रीय प्रश्न है। यदि महिला को मतदान का अधिकार तो मिले लेकिन परिवार में संपत्ति पर अधिकार न मिले, विवाह में समानता न मिले और राजनीतिक निर्णयों में प्रतिनिधित्व न मिले, तो लोकतंत्र का सामाजिक आधार कमजोर रहेगा। इसीलिए अम्बेडकर के चिंतन से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है कि राजनीतिक लोकतंत्र की स्थिरता सामाजिक लोकतंत्र पर निर्भर करती है।

इस पृष्ठभूमि में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए संवैधानिक आरक्षण का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। किंतु भारतीय महिला अधिकारों का इतिहास केवल राजनीतिक आरक्षण से शुरू नहीं होता। इसके पीछे सामाजिक सुधार, शिक्षा, संपत्ति-अधिकार, विवाह संबंधी अधिकार और पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध संघर्ष का लंबा इतिहास है। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने महिलाओं के प्रश्न को जाति, परिवार, संपत्ति और सामाजिक सत्ता के प्रश्नों से जोड़कर देखा। उनके लिए किसी समाज की प्रगति का प्रश्न महिलाओं की स्थिति से अलग नहीं था। इसीलिए हिंदू कोड बिल को केवल एक कानूनी विधेयक मानना उसके ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देना होगा। महिला राजनीतिक भागीदारी की अवधारणा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—
• राजनीतिक सहभागिता में मतदान, राजनीतिक दलों की सदस्यता, चुनाव प्रचार, आंदोलनों और राजनीतिक अभियानों में भागीदारी शामिल है।
• राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संबंध निर्वाचित संस्थाओं में महिलाओं की उपस्थिति से है, जैसे कि
पंचायत → नगरपालिका → विधानसभा → संसद
• राजनीतिक सत्ता सबसे महत्वपूर्ण स्तर है। इसमें प्रश्न यह है कि निर्वाचित महिला वास्तव में निर्णय ले पा रही है या नहीं। इसलिए महिला सांसदों की संख्या बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि सभी महिलाएँ समान रूप से राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर रही हैं।
डॉ.अम्बेडकर, महिला प्रश्न और हिंदू कोड बिल
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के राजनीतिक चिंतन में महिला प्रश्न को जाति व्यवस्था से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जाति व्यवस्था की निरंतरता के लिए विवाह, परिवार, लैंगिक नियंत्रण और स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण महत्वपूर्ण सामाजिक तंत्र रहे हैं। डॉ. अम्बेडकर ने जाति की संरचना में अंतर्विवाह (endogamy) की केंद्रीय भूमिका पर विशेष ध्यान दिया। इसीलिए जाति-विरोधी संघर्ष में महिलाओं की स्थिति को बदलना अनिवार्य था। उनका महिला संबंधी दृष्टिकोण तीन प्रमुख क्षेत्रों में देखा जा सकता है—शिक्षा, सामाजिक समानता और कानूनी एवं आर्थिक अधिकार। इसी तीसरे क्षेत्र में हिंदू कोड बिल विशेष महत्व प्राप्त करता है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य के सामने व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का प्रश्न उपस्थित था। हिंदू समाज में विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति, दत्तक ग्रहण और परिवार से जुड़े अनेक नियम विभिन्न शास्त्रीय एवं प्रथागत व्यवस्थाओं से प्रभावित थे। डॉ. अम्बेडकर स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के रूप में व्यापक हिंदू कोड के निर्माण से जुड़े। हिंदू कोड बिल का उद्देश्य एक व्यापक विधिक ढाँचा निर्मित करना था जिसमें विवाह, तलाक, एकविवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति, दत्तक ग्रहण, संरक्षकता, भरण-पोषण जैसे विषयों को आधुनिक विधिक सिद्धांतों के आधार पर पुनर्गठित किया जा सके। डॉ. अम्बेडकर के हस्तक्षेपों में विशेष रूप से महिलाओं के संपत्ति अधिकार को लेकर चिंता दिखाई देती है। उनके भाषणों में महिला को अपनी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार देने की बात स्पष्ट रूप से सामने आती है।

हिंदू कोड बिल में महिलाओं के अधिकार
• विवाह में समानता- बिल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विवाह संस्था में पुरुष के एकाधिकार को चुनौती देना था।
• अम्बेडकर ने एकविवाह को कानूनी रूप से लागू करने का समर्थन किया। उनके अनुसार सामाजिक सुधार को केवल धार्मिक परंपरा के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।
• तलाक का अधिकार- विवाह को अपरिवर्तनीय संस्था मानने के बजाय बिल ने कुछ परिस्थितियों में तलाक की वैधानिक संभावना को स्वीकार किया। यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे महिला को असफल या दमनकारी विवाह से बाहर निकलने की कानूनी सहायता प्राप्त होती।
• संपत्ति एवं उत्तराधिकार- महिला के आर्थिक अधिकार हिंदू कोड बिल का केंद्रीय पक्ष थे। अम्बेडकर के लिए आर्थिक निर्भरता महिला की सामाजिक निर्भरता को बनाए रखने वाली प्रमुख संरचनाओं में से एक थी।
• दत्तक ग्रहण एवं संरक्षकता- बिल ने परिवार के भीतर पुरुष-प्रधान अधिकार संरचना को पुनर्गठित करने की दिशा में भी प्रयास किया।
• विधवा एवं पुत्री के अधिकार- उत्तराधिकार के प्रश्न में महिलाओं के अधिकारों का विस्तार पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवार व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

डॉ. अम्बेडकर के लिए हिंदू कोड बिल का व्यापक अर्थ केवल personal law reform के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसका गहरा संबंध था—परिवार → संपत्ति → जाति → पितृसत्ता → सामाजिक सत्ता के संबंध से। यदि महिला के पास संपत्ति नहीं है, विवाह में समान अधिकार नहीं है और पारिवारिक निर्णयों में भागीदार नहीं है, तो केवल मतदान का अधिकार उसे पूर्ण राजनीतिक नागरिक नहीं बना सकता। इस अर्थ में डॉ. अम्बेडकर की परियोजना को सामाजिक सुधार, कानूनी समानता, आर्थिक अधिकार, स्वायत्त नागरिकता, राजनीतिक भागीदारी, सामाजिक लोकतंत्र के रूप में समझा जा सकता है। लेकिन हिंदू कोड बिल को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध के प्रमुख आधार थे—
• धार्मिक परंपराओं में राज्य के हस्तक्षेप की आपत्ति;
• विवाह और परिवार संबंधी पारंपरिक संरचनाओं में परिवर्तन का विरोध;
• महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकार देने का विरोध;
• तलाक एवं एकविवाह जैसे प्रावधानों पर आपत्ति;
• राजनीतिक दलों और विधायकों के बीच मतभेद;
• सामाजिक सुधार की गति को लेकर विवाद।
डॉ. अम्बेडकर के लिए यह केवल एक विधेयक का प्रश्न नहीं था बल्कि सामाजिक सुधार के प्रति राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धता का प्रश्न था। 1951 में बिल के मूल व्यापक स्वरूप को आगे बढ़ाने में असफलता के बाद अम्बेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया। भारत सरकार के अम्बेडकर संबंधी आधिकारिक विवरण में भी हिंदू कोड बिल को लेकर मतभेद और उनके इस्तीफे का उल्लेख है। नेहरू ने भी 1951 में महिला अधिकारों और हिंदू कोड बिल के समर्थन में सार्वजनिक रूप से बात की थी और इसे सामाजिक परिवर्तन से जोड़कर देखा था।
मूल रूप में तो हिंदू कोड बिल पारित नहीं हो सका लेकिन उसके अनेक विचार बाद में अलग-अलग कानूनों के रूप में पारित किये गए —
• हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
• हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
• हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956
• हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
इस प्रकार हिंदू कोड बिल की कहानी को केवल “बिल पास हुआ या नहीं हुआ” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसकी वैचारिक विरासत बाद के विधायी सुधारों में दिखाई देती है।

हिंदू कोड बिल से नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक)तक
लगभग सात दशक बाद महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न फिर एक बड़े संवैधानिक परिवर्तन नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में सामने आया। संविधान के 106वाँ संशोधन अधिनियम, 2023 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 330A, 332A और 334A जोड़े गए तथा दिल्ली की विधानसभा के संदर्भ में अनुच्छेद 239AA में संशोधन किया गया। इसका उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना है। यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन दिखाई देता है कि जहां हिंदू कोड बिल निजी और सामाजिक क्षेत्र में महिला की समानता से जुड़ा था वहीं नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक, जिसे संविधान के 106वें संशोधन अधिनियम, 2023 के रूप में जाना जाता है) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है) सार्वजनिक और राजनीतिक सत्ता में महिला की प्रतिनिधिक उपस्थिति से जुड़ा है।
इसलिए दोनों को साथ पढ़ने पर महिला नागरिकता का एक व्यापक ढाँचा उभरता है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) की प्रमुख विशेषताएँ:
• एक-तिहाई आरक्षण- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।
• SC/ST महिलाओं का प्रतिनिधित्व- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि महिला वर्ग को सामाजिक रूप से एक समान समूह मानना पर्याप्त नहीं है।
• दिल्ली विधानसभा- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा भी इस संवैधानिक व्यवस्था में शामिल है।
• सीटों का रोटेशन (rotation)- महिला आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान किया गया है।
• अवधि- संवैधानिक व्यवस्था में आरक्षण को 15 वर्ष की अवधि से जोड़ा गया है, हालांकि आगे की वैधानिक- कानूनी व्यवस्था के अनुसार इसकी निरंतरता निर्धारित होगी।

क्रियान्वयन में विलंब क्यों?
हालाँकि नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है, लेकिन इसका निर्वाचनात्मक आरक्षण के रूप में कार्यान्वयन (operationalization) तत्काल नहीं हुआ। इसके लिए अधिनियम की संवैधानिक संरचना को समझना पड़ेगा। अनुच्छेद 334A में इसे जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जोड़ा गया है। अर्थात् प्रक्रिया को मोटे तौर पर इस प्रकार समझा जा सकता है कि पहले जनगणना होगी फिर जनसंख्या के आँकड़ों का प्रकाशन होगा। उसके बाद परिसीमन होगा और उसके बाद आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण होगा और तब जाकर कहीं हो पायेगा महिला आरक्षण का चुनावी संचालन । PRS Legislative Research (PRS) के अनुसार, अप्रैल 2026 में परिसीमन से संबंधित तीन नए विधायी प्रस्ताव (संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 तथा केंद्रशासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, 2026) सामने आए जिनमें 2011 की नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार पर परिसीमन करने तथा उस परिसीमन के आधार पर नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के तहत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों को लागू करने का मार्ग प्रस्तावित किया गया था। लेकिन, संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 आवश्यक बहुमत प्राप्त नहीं कर सका, जिसके परिणामस्वरूप संबंधित दोनों विधेयक भी आगे नहीं बढ़ सके। अतः यह कहना ज्यादा सही होगा कि अधिनियम संवैधानिक रूप से अस्तित्व में है, लेकिन आरक्षण का वास्तविक चुनावी क्रियान्वयन संबंधित जनगणना और परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।

महिला आरक्षण में सामाजिक न्याय का प्रश्न: SC/ST/OBC महिलाओं का प्रतिनिधित्व:
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 भारतीय राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को संवैधानिक आधार प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसके अंतर्गत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा दिल्ली विधानसभा में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। विशेष रूप से, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में भी लगभग एक-तिहाई सीटें संबंधित समुदायों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस प्रकार अधिनियम महिलाओं के प्रतिनिधित्व को केवल लैंगिक प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि SC/ST महिलाओं के लिए सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न से भी जोड़ता है। दूसरी ओर, अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) महिलाओं के लिए पृथक उप-आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया है; इसलिए OBC महिलाओं का प्रतिनिधित्व वर्तमान व्यवस्था में सामान्य महिला आरक्षण के व्यापक दायरे में आता है।

यही बिंदु ‘कोटा के भीतर कोटा’ (quota within quota) की बहस को महत्वपूर्ण बनाता है, जिसमें यह प्रश्न उठता है कि महिलाओं के भीतर जातिगत और सामाजिक विविधता को किस प्रकार राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुनिश्चित किया जाए। अतः नारी शक्ति वंदन अधिनियम को सामाजिक न्याय के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाने के बजाय SC/ST/OBC महिलाओं की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी, प्रतिनिधित्व और निर्णय-निर्माण में उनकी प्रभावी भूमिका पर भी विचार आवश्यक है। यदि केवल सामान्य महिला आरक्षण होता और SC/ST महिलाओं के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं होती, तो यह आशंका बनी रहती कि महिला आरक्षण का लाभ सामाजिक रूप से अधिक संसाधन-संपन्न समूहों तक असमान रूप से सीमित हो सकता है। इसलिए SC/ST महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान प्रतिनिधित्व के सामाजिक विविधीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण है।

दलित नारीवादी दृष्टिकोण:
एक दलित नारीवादी के रूप में मेरा यह मानना है कि भारतीय महिला को एक सजातीय श्रेणी (homogeneous category) मानना सामाजिक वास्तविकताओं को छुपाने जैसा है। एक दलित महिला के अनुभव में जातिगत भेदभाव, लैंगिक भेदभाव, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक बहिष्करण जैसे कड़वे और अमानवीय अनुभव एक साथ जुड़े होते हैं। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि “कितनी महिलाएँ संसद में हैं?” बल्कि यह भी है “कौन-सी महिलाएँ संसद में हैं?” और “वे किन सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करती हैं?” इसलिए महिला आरक्षण की सफलता का मूल्यांकन केवल 33 प्रतिशत सीटों की संख्या से नहीं किया जा सकता। बल्कि राजनीतिक दलों को भी अपने भीतर महिलाओं के लिए टिकट, संगठनात्मक पद, निर्णय-निर्माण, संसाधन, चुनावी प्रशिक्षण, नेतृत्व विकास में समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे। यदि दलों की आंतरिक संरचना पुरुष-प्रधान रहती है, तो संवैधानिक आरक्षण का प्रभाव भी सीमित हो सकता है।

पंचायतों से संसद तक: एक अनुभव:
भारत में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण का प्रयोग संसद से पहले स्थानीय शासन में हो चुका है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं तथा शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण का संवैधानिक आधार बना। और लगभग 21 राज्यों तथा 2 केंद्रशासित प्रदेशों ने 50 प्रतिशत तक भी आरक्षण का प्रावधान किया है। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), भारत सरकार (Press Information Bureau (PIB), Government of India) के अनुसार 19 मार्च 2025 तक लगभग 14.5 लाख महिलाएँ पंचायती राज संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत थीं, जो कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों का लगभग 46 प्रतिशत थीं। यह अनुभव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या आरक्षण केवल संख्यात्मक प्रविष्टि (numerical entry) पैदा करता है या दीर्घकालीन राजनीतिक नेतृत्व (political leadership) भी विकसित करता है? पंचायत में महिलाओं की भागीदारी से सम्बंधित उपलब्ध कई शोधों में प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व, परिवार की राजनीतिक भूमिका, महिला भागीदारी और पुनर्निर्वाचन जैसे मुद्दों पर नकारात्मक निष्कर्ष मिलते हैं। अतः “प्रॉक्सी” को सार्वभौमिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा क्योंकि इतने लम्बे समय के बाद जब महिलाओं को खासकर दलित महिलाओ को राजनीति में भागीदारी करने का अवसर मिला है तो वे आगे आकर पितृसत्ता, जाति और धर्म आधारित रूढ़ियों और बंधनो को तोड़ती हुई अपनी राजनितिक भूमिका का उचित निर्वहन करने का प्रयास कर रही हैं। हमें तो उनकी हौसला-अफजाई करनी चाहिए क्योंकि ये तो अभी बस शुरुआत भर थी। अब तो नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने महिलाओं की राष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी और प्रतिधित्व सुनिश्चित करने के रास्ते जो खोल दिए है बर्शते इस अधिनियम का कार्यान्वयन सुचारु और सही ढंग से किया जाए। इसलिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण एक संस्थागत शुरुआत है, अंतिम लक्ष्य नहीं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय महिला राजनीतिक भागीदारी को केवल महिला आरक्षण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह सामाजिक सुधार, कानूनी समानता, आर्थिक अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की परस्पर जुड़ी हुई प्रक्रिया है। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का हिंदू कोड बिल इस प्रक्रिया में एक निर्णायक वैचारिक हस्तक्षेप था। डॉ. अम्बेडकर ने समझा कि यदि परिवार और संपत्ति की संरचना में महिला समान नहीं है, तो राजनीतिक लोकतंत्र की समानता अधूरी रहेगी। उनके लिए कानून सामाजिक परिवर्तन का साधन था। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी प्रश्न को राजनीतिक संस्थाओं के स्तर पर आगे ले जाता है। यदि हिंदू कोड बिल का केंद्रीय प्रश्न था “महिला को परिवार और संपत्ति में समान नागरिक अधिकार कैसे मिले?” तो आज का प्रश्न है “महिला को राज्य और राजनीतिक सत्ता के निर्णय-निर्माण में समान प्रतिनिधित्व कैसे मिले?” इन दोनों प्रश्नों के बीच एक गहरी वैचारिक निरंतरता है। फिर भी, प्रतिनिधित्व को केवल 33 प्रतिशत सीटों के गणित तक सीमित नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का वास्तविक मूल्य तब सामने आएगा जब संसद और विधानसभाओं में आने वाली महिलाएँ सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करेंगी और निर्णय-निर्माण में वास्तविक भागीदारी प्राप्त करेंगी। अंततः अम्बेडकर की दृष्टि से महिला राजनीतिक सशक्तीकरण को केवल “राजनीति में महिलाएँ” के रूप में नहीं बल्कि “महिलाएँ समान नागरिक और राजनीतिक भागीदार के रूप में” देखना अधिक सार्थक होगा। यही वह बिंदु है जहाँ हिंदू कोड बिल से नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक की यात्रा केवल विधायी इतिहास नहीं रह जाती, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में महिला नागरिकता के विस्तार की यात्रा बन जाती है।

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डॉ. सीमा माथुर
सहायक प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग
कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
seemamathur@kalindi.du.ac.in

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