भारतीय राजनीति के आधुनिक दधीचि हैं लालू प्रसाद!

यह लेख बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के जन्मदिवस (11 जून) के अवसर पर BYN (बीरेंद्र यादव न्यूज) के लिए लिखा गया है। वहीं प्रकाशित।

26 फ़रवरी 2025 को बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक वीडियो राष्ट्रीय जनता दल की ओर से वायरल हुआ। वीडियो में वे गिरिराज सिंह आदि भाजपा नेताओं को यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि पार्टी के नेताओं को तेजस्वी यादव पर हमला करने से परहेज करते हुए लालू प्रसाद पर हमलावर रहना चाहिए। इस बयान की पृष्ठभूमि में भारतीय राजनीति के और भी दृश्य हैं।

बिहार की राजनीति के पुराने जानकारों को याद होगा कि लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद तब के कांग्रेस नेता जगन्नाथ मिश्रा ने, जिनसे लालू प्रसाद ने सत्ता हासिल की थी, कहा था कि, “लालू बाबू छह महीना भी सरकार नहीं चला पाएंगे।” उनका यह बयान बाद में लालू प्रसाद ने बिहार विधानसभा के पटल पर रेफर किया, जब सरकार कई महीने बाद भी सुचारु रूप से चलती रही और बिहार के दलितों, वंचितों, पिछड़ों में जोश देखा जाने लगा था।

1990 से 1995 की घटनाप्रधान राजनीति में लालू प्रसाद पूर्वी-उत्तरी भारत में ‘ध्रुवतारा’ की तरह दिखाई देते हैं, जब जनता दल के तत्कालीन सांसद नीतीश कुमार भी, जो जल्द ही उनके प्रतिद्वंद्वी बन गए, अपने नेता के लिए सदन से सड़क तक प्रवक्ता थे।

1990 के सत्ता परिवर्तन के बाद एक दृश्य भारतीय राजनीति की दिशा को प्रभावित करने वाला और लालू प्रसाद की राजनीति पर स्थायी झटका देने वाला सिद्ध हुआ। इसे लेखक ने अपनी किताब ‘राहुल गांधी : व्याकुल मन के नायक’ में कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया है :

“10 जुलाई, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस बनाम भारत सरकार मामले में निर्णय सुनाया। इस निर्णय के अनुसार दो साल या उससे अधिक सजा प्राप्त सांसद या विधायक की सदस्यता समाप्त हो जानी थी। इसके पहले सजायाफ्ता जनप्रतिनिधि किसी भी सदन की सदस्यता तभी खो सकते थे, जब वे सभी उपलब्ध न्यायिक उपायों से गुजरने के बाद भी अंतिम तौर पर सजायाफ्ता रहें। निर्णय के बाद पूरी राजनीतिक जमात में प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। सरकार ने इस निर्णय के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल की और 30 अगस्त, 2013 को The Representation of the People (Second Amendment and Validation) Bill, 2013 राज्यसभा में पेश किया।

इसी बीच चारा घोटाला मामले में निर्णय आने की संभावना को देखते हुए सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए जनप्रतिनिधियों के मामले में यथास्थिति बहाल करने की कोशिश की और अध्यादेश राष्ट्रपति के पास भेजा गया। इसके पहले कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं के अनुसार प्रमुख विपक्षी दल भाजपा सहित लगभग सभी विपक्षी पार्टियां बिल और ऑर्डिनेंस से सहमत थीं। हालांकि भाजपा ने इस ऑर्डिनेंस के खिलाफ तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से गुहार भी लगाई थी, ऐसा इसलिए भी कि बिहार की राजनीति उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही थी। चारा घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सजा सुनाए जाने की संभावना थी। 2015 में बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले थे।

बीरेंद्र यादव न्यूज का कवर पेज

27 सितंबर को इस अध्यादेश के पक्ष में कांग्रेस के नेताओं ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस वार्ता रखी थी। वहीं राहुल गांधी ने पहुंचकर अध्यादेश के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी की। कहा जाता है कि अध्यादेश की कॉपी उन्होंने वहीं फाड़ दी। कॉपी फाड़ने को लेकर अलग-अलग राय है मीडिया में, लेकिन सार्वजनिक आलोचना तो की ही, और उसके बाद कांग्रेस का स्टैंड बदल गया। वहां प्रेस कर रहे नेताओं का सुर बदल गया। यह मनमोहन सरकार और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए अपमानजनक था। इसके बाद अध्यादेश और बिल दोनों वापस हो गए।

इस घटना का असर राजद नेता लालू प्रसाद पर भी पड़ा, जिन्होंने सांप्रदायिक और हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ हमेशा स्टैंड लिया था, और आज भी लेते रहे हैं। यहां तक कि 2004 में, जब सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर कई बड़े नेताओं की राजनीतिक विचारधारा स्त्री-विरोधी और प्रतिस्पर्धी दिखी, तब लालू प्रसाद सोनिया गांधी के साथ थे, प्रगतिशील पोजीशन पर थे।”

2013 की घटना के बाद मिथकों को भारतीय समाज और संस्कृति की गति के प्रतीकात्मक इतिहास की तरह देखने वाले इस लेखक के सामने एक मिथक याद आया, ‘दधीचि’ का। इस घटना के पूर्व तक राजनीतिक इतिहास में भ्रष्टाचार के नाम पर अन्ना-केजरीवाल के मेगा शो के खिलाफ सदन के पटल पर लालू प्रसाद मुखर थे और वे जन लोकपाल के नाम पर संसदीय परंपरा पर हमलावर प्रवृत्ति को चिह्नित कर रहे थे। लेकिन राजनीतिक घटनाक्रमों ने उन्हें दधीचि बना दिया।

दधीचि की पुराण-कथा संक्षेप में इतनी है कि दानवों के राजा वृत्रासुर को हराने के लिए दधीचि की हड्डी का दान देवताओं के राजा इंद्र ने ले लिया और उसके अस्त्र से उन्होंने वृत्रासुर की हत्या की। अब सवाल है कि लालू प्रसाद के लिए किसी ब्राह्मण का रूपक मेरे सामने क्यों आया, जो तत्कालीन संदर्भ के द्वंद्वात्मक सामाजिक और राजनीतिक गति में ‘प्रतिपक्ष’, जो जाहिर है भारत की बहुसंख्य जनता के साथ खड़ा प्रतिपक्ष था , के खिलाफ एक ब्राह्मण का रूपक दिखता है।

इस संदर्भ के लिए दधीचि की कथा को उसके विकासक्रम में देखते हैं। ऋग्वेद में दध्यंच नामक एक ऋषि हैं, जिनकी हत्या देवताओं के राजा इंद्र ने की थी। दध्यंच ने तब एक बहुमूल्य ज्ञान, इंद्र के मना करने के बावजूद, अश्विनी कुमारों को दे दिया था। इस अपराध के दंडस्वरूप देवताओं के राजा ने दध्यंच की हत्या कर दी। यही दध्यंच पुराणों तक आते-आते दधीचि हो जाते हैं। दध्यंच या दधीचि अथर्वण परंपरा के माने जाते हैं। अथर्ववेद अपने पूर्ववर्ती तीन वेदों की दार्शनिक और यज्ञ आदि की ऋचाओं से अलग आम जनजीवन, विज्ञान और व्यावहारिक समस्याओं की ऋचाओं का वेद है। कांचा आयलैया की किताब ‘बफ़ैलो भारत’ के संदर्भ में भी इसे समझा जा सकता है।

दधीचि की परंपरा के ही ऋषि हैं शुक्राचार्य, जमदग्नि, परशुराम, विश्वामित्र, भृगु, च्यवन ऋषि आदि। इन ऋषियों की अलग-अलग कथाएं डिकोड होकर बताती हैं कि किस तरह ज्ञान-विज्ञान के संधान में लगे ये ऋषि भारत की यज्ञ-संस्कृति आधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था, जिसे आजकल सनातन का नया आवरण दे दिया गया है, की वशिष्ठ परंपरा के खिलाफ संघर्ष करते हैं, दधीचि की तरह हत्या का शिकार होते हैं, और फिर वशिष्ठी परंपरा इसे दान बताते हुए स्वेच्छा से देहत्याग का आवरण दे देती है। दधीचि की इस परंपरा के राजन्यों में हिरण्यकश्यप, राजा बलि से लेकर शिवाजी महाराज, शाहू जी और लालू प्रसाद तक आ सकते हैं।

तो भारतीय राजनीति की दधीचि परंपरा के ऋषि या राजन्य लालू प्रसाद 2013 की ऑर्डिनेंस वाली घटना के बाद सक्रिय संसदीय राजनीति से एलिमिनेट हो गए। लालू प्रसाद को दधीचि बनाने और उनके अंश से शक्ति लेने का प्रयोग उनके विरोधियों और उनके स्पेस से आने वाले नेताओं ने भी खूब किया। पहली बार यह प्रयोग सफलता से अंजाम देने वालों में रहे 1994 तक लालू प्रसाद को तत्कालीन राजनीति का ध्रुवतारा बनने में सहयोग करने वाले नीतीश कुमार। वे ‘जंगल राज’ के नाम पर इस प्रयोग को सत्ता तक ले जाते हैं और उसे बनाए रखते हैं, सुविधा से कभी लालू प्रसाद के साथ खड़े होकर (2014 से 2017 तक और फिर अगस्त 2022 से जनवरी 2024 तक), तो कभी उनके खिलाफ खड़े होकर।

लालू प्रसाद के स्पेस से आने वाले वर्तमान मुख्यमंत्री भी वही कर रहे हैं, जिन्होंने कभी उनके साथ होकर ही अपनी राजनीति खड़ी की थी। यह वह दौर था जब भाजपा के केंद्रीय शासन द्वारा, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा बनाए गए बिहार के राज्यपाल ने वर्तमान मुख्यमंत्री के जन्मदिन के दिन उन्हें राबड़ी मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी का तोहफा दिया था और उनका उपहास भी उड़ाया था। तब वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद ही स्पष्ट किया था कि राबड़ी जी उन्हें मंत्रिमंडल से हटाना नहीं चाहती थीं।

वामपंथ की धारा ने, जो लालू प्रसाद के राजनीतिक स्पेस पर राजनीति करती रही है और अपने नेतृत्व को वशिष्ठ परंपरा में बढ़ावा देती रही है, या 2013 की घटना को अंजाम देने वाली कांग्रेस की इंद्र-धारा ने, प्रत्यक्ष रूप से भी लालू प्रसाद के अंश से ही अपनी ताकत हासिल की है, हड्डी का दान।

दधीचि की कथा में सबसे पहला संदेह तभी पैदा हो जाना चाहिए, जब एक ब्राह्मण की हड्डी के दान के तौर पर कथा स्थिर होती है। ब्राह्मण दान नहीं देते, बल्कि लेते हैं। प्राणों के दान का सवाल ही नहीं बनता। दान अथर्वण परंपरा के राजन्य के हिस्से ही रहा है। राजा बलि इसमें सिरमौर हैं, जिनसे बौने वामन ने सब कुछ हर लिया था।

‘जंगल राज’ और अन्य कहानियों के फलसफे को भारत की राजनीति, खासकर बिहार की राजनीति में, ‘दधीचि की हड्डी’ की तरह इस्तेमाल किया गया है। प्रत्यक्ष रूप से वह इस्तेमाल किसी ने भी किया हो, अंतिम मुस्कराहट ‘वशिष्ठ परंपरा’ के होठों पर ही होती है। लोकतांत्रिक भारत में इस इस्तेमाल का असर भी अपनी द्वंद्वात्मकता में रहा है, उस पर विस्तार से फिर कभी लिखा जा सकता है, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव की एक आखिरी बात जरूर दर्ज करना चाहूंगा।

मिथकीय कथा में दधीचि उपेक्षित होते गए, दोनों ओर से। वशिष्ठ या ब्राह्मणवादी, या कथित सनातन परंपरा के लिए उनका उपयोग था नहीं, लेकिन व्यापक प्रभाव को ‘हड्डी दान कथा’ का हर्जाना देकर कथा के भीतर रूढ़ कर दिया गया था। दूसरी ओर, वशिष्ठ-विरोधी परंपरा के लिए भी वे इस कथा-प्रभाव में उपेक्षित होते गए, कुछ भ्रम और संशय के कारण, और कुछ कांचा आयलैया के ‘बफैलो राष्ट्रवाद’ या ‘अथर्वण धारा’ की ज्ञान-परंपरा को कुंद कर दिए जाने के कारण।

लोकतंत्र के आधुनिक दधीचि को 2025 के चुनाव में एक बार फिर दोतरफा स्थितियों का सामना करना पड़ा। एक ओर एनडीए उन पर हमलावर था, तो दूसरी ओर उनके अपने समूह में दुरभिसंधियां भी थीं और अपने लोगों का संशय भी था। 26 जुलाई को तेजस्वी यादव के फ़ेसबुक पेज पर आखिरी पोस्ट आया, जब लालू प्रसाद के खिलाफ ‘जंगल राज’ के विपक्षी हथियार को भोथरा करने की उनकी और राष्ट्रीय जनता दल की कोशिश, और लगभग हासिल सफलता, राहुल गांधी की यात्रा में विलीन हो गई। दधीचि की हड्डी का कथित दान लेने के लिए इंद्र का नुमाया होना ऐसे ही घटित हुआ होगा, या इसी जैसे किसी दूसरे स्वरूप में।

मेरे प्रिय नेता को जन्मदिन की अनंत मंगलकामनाएं! स्वस्थ रहें वे। सीमाओं में सक्रिय भी।

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