कहानी- चंद्रसेन
‘डूड’…
“इस यूनिवर्सिटी का यही झंझट है,” नैना ने बालों के जूड़े में पेन खोंसते हुए बोली,
“इतनी साहित्यिक हिंदी मुझसे नहीं होती…
वो भी ये इलाहाबादी, संस्कृतनिष्ठ टाइप!”
दीपक की आंखों में हल्की-सी शरारत तैर गई।
“तो क्या हुआ? इलाहाबाद की ज़ुबान है… थोड़ा वक़्त दो, खुद-ब-खुद समझ आ जाएगी।”
“अब आप अपना ज्ञान-प्रदर्शन न करें प्लीज़?” नैना ने भौंहें चढ़ाईं।
“ओके… सेंट स्टीफेंस प्रोडक्ट!”
“डोंट से दिस अगेन… आई एम वार्निंग यू,” नैना बनावटी गुस्से में बोली।
“अच्छा मिस जोशी” दीपक ने और छेड़ा ।
“यार दीपक!”
“कब ये जोशी वाली पूंछ को नोचते रहोगे? तीन साल से इरिटेट किए जा रहे हो।”
“सॉरी…” दीपक ने तुरंत हाथ जोड़ लिए।
“वंस अगेन?”
“सॉरी…”
नैना ने सिर हिलाया-
“नो… ऐसे नहीं।”
वो थोड़ा और करीब आई, धीमी और गर्माहट भरी आवाज में कहा –
“बोलो… ‘सॉरी डार्लिंग’…”
एक पल को समय की रफ़्तार थम सी गई।
दीपक ने उसकी आंखों में झाँका -जहाँ नाराज़गी कम और शरारत ज़्यादा थी।
वो हल्का-सा झुका, और उसके कान में फुसफुसाया-
“सॉरी… डार्लिंग…”
दीपक जैसे ही नैना के कान में फुसफुसा कर सॉरी डार्लिंग बोला। दीपक के होंटो की गरमाहट और फुसफुसाहट से नैना के रोम-रोम चहक गए।
देखो-
‘गूज बम्प्स’।
“हूँ… अब ठीक है,” नैना इतराई,
नैना ने मुस्कुराते हुए दीपक की बाँह थाम ली-
इस पकड़ में थोड़ा-सा हक़ था, थोड़ा-सा लाड़… और बहुत सारा भरोसा।
“जानती हो, नैना…” ?
दीपक ने दीवार पर पेंट से उकेरी कविता को निहारते हुए बोला ,
“दिस इज़ अ वेरी लांग पोएम…”
नैना ने आँखें घुमाईं, मुस्कुराते हुए लापरवाही से झट से बोली –
“अरे… पूरी मत सुनाना, झेल नहीं पाऊँगी।”
वो थोड़ा और करीब आई, उसकी आवाज़ अब धीमी और नर्म थी-
“ये जो मोटा-मोटा तीन शब्द लिखा है… बस वही बता दो…”
दीपक कुछ पल उसे देखता रहा-
जैसे उन शब्दों को ढूंढ रहा हो, जो सिर्फ कहे नहीं… महसूस किए जाएँ।
फिर वो हल्का-सा झुका, उसकी आँखों में उतरते हुए बोला-
‘बदलाव’। ‘बदलाब’। ‘बदलाव’।
एक लंबा, खामोश पल उनके बीच ठहर गया।
नैना की हँसी इस बार कहीं खो गई थी- बस उसकी आँखों में नमी-सी चमक रही थी, और होंठों पर एक हल्की, ठहरी हुई मुस्कान उभरी- चेहरे पर दृढ़ आत्मविश्वास ऐसे झलका, मानो किसी ने खाली कैनवास पर अचानक एक स्पष्ट रेखा खींच दी हो।
‘हूँ’।
‘इम्प्रेसिव’।
‘आई लव इट’।
‘मी टू नैना’।
नैना की बड़ी-बड़ी आंखों में झांकते हुए दीपक मुस्कुराया-
“इलाहाबाद का असर है…”
नैना ने उसकी टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींचते हुआ बोला –
“तो… थोड़ा और असर होने दो…”
और उस पल,
कविता खत्म नहीं हुई-
बस… जीने लगी।
“ओके-ओके, मिस्टर इलाहाबादी…” नैना मुस्कुराई,
“चलो पुरानी दिल्ली-हॉस्टल का खाना खा-खा कर पक गए हैं। साला आज कुछ अच्छा खाते हैं।”
दोनों येलो लाइन मेट्रो में चढ़ गए।
ट्रेन चल पड़ी।
नैना हल्का-सा उसके करीब झुकी-
“तो गाइड साहब, कहाँ ले जा रहे हो?”
दीपक मुस्कुराया-
“जहाँ आप कॉम्फर्टेबल हों …”
नैना ने नजरें मिलाईं-
“इम्प्रेसिव… मिस्टर इलाहाबादी।”
दिल्ली वाली दोपहर अपने चरम पर थी ।
फॉर्मल ड्रेस, पीठ पर टंगे बैग, प्रेसेंटेशन, मीटिंग और फाइल्स की उधेड़बुन में ऑफिस जाने वाले जा चुके थे। मतलब ऑफिस टाइम की भगदड़ निकल चुकी थी, इसलिए मेट्रो में थोड़ी राहत थी, एकरूपता की नीरसता गायब थी -क्योंकि परिवार-बच्चे-बूढ़े झोला-झंडी गाने-रील्स और हसी-ठिठोली बीच जमीन के अंदर ट्रेन पूरी रफ़्तार में समाये जा रही थी। भीड़ थोड़ी कम थी-लेकिन दिल्ली की मेट्रो पूरी तरह खाली हो, सोचना पड़ेगा ।
एक ही सीट मिली। नैना बैठ गई और दीपक उसके पास पोल की आड़ लेकर टिक गया।
“कितने जेंटलमैन हो तुम…” नैना ने ऊपर देखते हुए चुटकी ली।
“सीट खुद ले ली और मुझे खड़ा कर दिया,” दीपक ने पलटवार किया ।
“अरे… तुम तो खड़े होकर ज़्यादा अच्छे लगते हो,” उसने शरारत से कहा।
दीपक थोड़ा झुका-
“और तुम… बैठकर भी उतनी ही खतरनाक लगती हो।”
नैना हँस पड़ी।
फिर वही-
कभी छेड़ना, कभी बहस करना, कभी किसी बात पर सहमत, तो अगले ही पल असहमत।
मेट्रो अपनी रफ्तार से चल रही थी- और उनके बीच बातों का एक छोटा-सा अपना-सा संसार भी।
एक अटूट हिस्सा जो छूटे न छूट रहा है।
बहस-खटपट और आर्ग्यूमेंट में मुंह फुलावा-फुलाई भी होता रहता है।
ये गुस्सा, पांच मिनट से ज्यादा टिक जाए तो इस गुस्से की खैर नही।
उनका संबंध अब एक ऐसी कड़ी बन चुका था-जो टूटने के लिए नहीं, बस और गहराने के लिए बनी हो।
हौज खास से मेट्रो एम्स, दिल्ली हॉट होते हुए केंद्रीय सचिवालय पार कर गई। स्टेशन आता, गेट खुलता। स्टेशन आते रहे, लोग बदलते रहे-
पर वो दोनों वहीँ के वहीँ ।न कोई हड़बड़ी, न कोई भय- केवल साथ होने का एक गहरा मौन आश्वासन।
बस कभी-कभी मेट्रो में हो रहे अनाउंसमेंट से पल भर का खलल जरूर आ जाता। गेट बंद होते सब नॉर्मल।
अगला स्टेशन चांदनी चौक है।
इलाहाबद के कुम्भ जैसी भीड़ वाला राजीव चौक भी निकल गया।
दीपक अभी भी पोल के सहारे टिका हुआ है। नैना बैठी है। दीपक के हाथों को आददतन ऐसे जोर से पकड़ रखी है। मानो किसी अदृश्य झटके से उसे बचा रही हो, या शायद… खुद को ।
मेट्रो थमी।
दरवाज़े खुले।
एक यांत्रिक, निर्विकार आवाज़ गूँजी-
“अटेंशन प्लीज़…”।
लेकिन यह अनाउंसमेंट महज एक नार्मल अनाउंसमेंट नहीं था। अपने-आप में एक इतिहास समेटे हुए था।
‘अटेंशन प्लीज़’।
क्षण भर को समय ठहरा।
चांदनी चौक स्टेशन।
और फिर-
“प्लीज़ डोंट टच एनी ‘अनटचेबल’ मटेरियल… इट मे बी एक्सप्लोसिव।”
शब्द जैसे हवा में नहीं,
सीधे भीतर गिरे।
‘अनटचेबल’…
नैना और दीपक के कानों को चीरता हुआ ये चिरपरिचित शब्द ‘अनटचेबल’ रूह तक धंस गया ।
‘अनटचेबल’।
अनाउन्समेंट के वे सामान्य-से लगने वाले शब्द-‘अनटचेबल मैटेरियल’-
दोनों के सीने में एक तीखी हूक बनकर उठे।
चेहरों पर एक मौन विषाद उतर आया, जिसे भागती हुई भीड़ पढ़ ही न सकी।
वही समाज की विद्रूपता-
जिसकी सड़ांध में कितने दीपक-नैना घुंट गए-आज फिर एक शब्द बनकर सामने खड़ी थी।
किसे पता था- एक शब्द के मात्र उच्चारण ही- दोनों को सदियों की बनायी गयी खाईं में धकेल देगा।
शायद मेट्रो रुपी तंत्र के लिए यह शब्द महज़ एक चेतावनी भर हो-
इसलिए वह इतनी सहजता और सलीके से बार-बार दोहराया जाता है।
पर क्या सचमुच लोगों के लिए भी यह इतना ही सामान्य हो गया है?
क्या कोई शब्द अपने भीतर की सदियों की गूँज खो सकता है-
क्या इसके मायने बदल दिए गए हैं या बदले जा सकते हैं ?
या वह हर उच्चारण के साथ फिर से वही इतिहास जगा सकता है?
नैना और दीपक चुप थे-
मन व्याकुल और आँखें बेचैन।
नज़रें जैसे एक-दूसरे से नहीं,
उन अनगिनत सवालों से उलझी थीं
जो कहे नहीं जाते, सुनाई नहीं देते।
अनकहा।
अनसुना।
एक क्षण को लगा-
मानो किसी ने उन्हें उठाकर
कहीं दो दूर छोरों पर फेंक दिया हो।
जहाँ दूरी दिखती नहीं-
बस महसूस होती है,
जैसे असमय बारिश की बारीक बौछार…
नज़र न आए,
पर भीतर तक भेदती चली जाए।
ट्रेन अपने धुन में सरपट भागी जा रही थी।
दीपक और नैना की पकड़ ढीली पड़ने लगी। गर्माहट कम होती गयी। दोनों भरसक कोशिश में हैं, पकड़ वैसी ही रहे जैसी हुआ करती थी। लेकिन जैसे रेत फिसलती है। मानो रिश्ते भी फिसल रहे हों। छूट रहे हों ।
गले रुंधे हुए से। चेहरे पर बेचैनी और उलझन उपट आयी थी ।
नैना से रहा न गया। हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई। डबडबाई आँखों से दीपक को निहारा। फिर खींच कर ऐसे गले लगी, जैसे सदियों से न मिली हो। लोग क्या देख रहे होंगे, सोच रहे होंगे। इसकी परवाह न रही।दोनों की पकड़ इस बार बड़ी मजबूत रही।टूटे न टूटे। छूटे न छूटे।
फिर अचानक से नैना दीपक को पकड़े-पकड़े चिल्लाई –
‘मुझे सारी जिंदगी इसी ‘अनरीचेबल-अनट्रेसबल-एक्सप्लोसिव-अनटचेबल मटेरियल’ के साथ रहना।
‘समझे’।
दीपक नैना के कान में विश्वास और प्यार से फुसफुसाया।

‘ओके डार्लिंग’।
जैसे ही दीपक ये बोला –
नैना की रोई पलकों ने हल्का-सा काँपकर जवाब दिया-
“देखो… गूज़बम्प्स…”
और फिर चुपचाप
दीपक की बाँहों में समा गई। ।
चंद्रसेन, लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए, नई दिल्ली।
