बेटी दिवस पर विशेष : संजना तिवारी की कविताएं

बेटियों के लिए 

सुबह 

किरणों के रथ पर 

आती हैं बेटियां 

इन्हीं से खुशबू उधार लेकर 

फूल बिखेरते हैं खुशबू 

बेटियाँ ही कोयल को

सिखलाती हैं तान

जहाँ जन्म लेती हैं ये

बसंत खूद-ब-खूद 

वहां आ जाता है।

अनमोल धरोहर हैं ये धरती की 

फिर भी इनके आगमन पर 

उदासी क्यों छा जाती?

आखिर हम

कब समझेंगे 

कि बेटियों के हाथ में ही 

जगती की डोर है

इन्हीं से अंजोर है।

———————

बेटियाँ 

बेटियाँ नियामत हैं पृथ्वी की 

उन्हें जन्म देती हुई माँएं 

खुद को ही नए रूप में अवतरित करती हैं 

और बेटी के रूप में अपने को पाकर 

गहरे आनंद में डूब जाती हैं 

बेटी जैसे-जैसे बड़ी होती है 

माँ भी उसके साथ ही

वैसे-वैसे बड़ी होती है 

मगर बड़ी होती हुई बेटी पर 

माँ अपने दुख की छाया 

नहीं पड़ने देना चाहती 

बड़ी होती हुई बेटियाँ भी 

माँ की इस पीड़ा को समझती हैं 

इसलिए वह माँ के दुख को 

भगाना चाहती हैं 

मगर दुख है कि 

भागने का नाम ही नहीं लेता

माँ के दुख को भगाने के लिए बेटियाँ 

न जाने कबसे दुख से लड़ रही हैं,

लङती हुई बेटियाँ आगे बढ रही हैं ।

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बेटियों को बचाएँ 

विश्वास को बचाएं 

इसीसे बचेंगे रिश्ते 

रिश्तों को बचाएं 

इसीसे बचेगी खुशी   

प्यार को बचाएं 

इसीसे बचेगा का घर 

घर को बचाएं 

इसीसे बचेगी शांति  

त्याग को बचाएँ 

इसीसे बचेगा समाज 

समाज को बचाएँ 

इसीसे बचेगी मनुष्यता

पेड़ को बचाएँ 

इसीसे बचेगी आक्सीजन 

आक्सीजन को बचाएँ 

इसीसे बचेगा जीवन 

बेटियों को बचाएँ 

इसीसे बचेगा मनुष्य 

मनुष्य को बचाएँ 

इसीसे बचेगी जिजीविषा।

—————————

रिश्ते 

पेङों को जमीन से रिश्ते हैं 

जीवन को हवा से

नदियों को समुद्र से रिश्ते हैं 

रोगी को दवा से

पत्तियों को टहनियों से रिश्ते हैं 

मछलियों को पानी से

धरती को सूरज से रिश्ते हैं 

सरहद को जवानी से

चिङियों को आकाश से रिश्ते हैं 

पाठक को किताब से

कवि को कविता से रिश्ते हैं 

चांदनी को आफताब से

ये रिश्ते प्रेम से संचालित हैं 

मगर जो लोग 

बाजार में रिश्ते ढूंढते हैं 

वे यह भूल जाते हैं 

कि जहां बाजार है 

वहां प्रेम नहीं है 

और जहाँ प्रेम नहीं है 

वहां रिश्ते कहाँ से होंगे। 

सच्चे रिश्ते बाजार में नहीं 

वे होते हैं दिल के पास 

जो रिश्ते बाजार में बनते 

वे हैं रिश्तों की लाश।

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अजन्मा होता है प्रेम 

पेट में पल रहे बच्चे के साथ 

प्रेम भी पल रहा होता है 

मगर वह बच्चे की तरह 

जन्म नहीं लेता 

प्रेम अजन्मा होता है 

अगर वह जन्म लेगा 

तो उसका अंत भी निश्चित है 

इसलिए जिससे हम प्रेम करते हैं 

उसके नहीं रहने के बाद भी

हम उससे प्रेम करते रहते हैं 

बल्कि उससे हम विशेष प्रेम करते हैं 

जो प्रेम के लिए 

अपने को निछावर कर देते हैं 

प्रेम के साथ जीने वाला भी 

प्रेम की तरह ही अजन्मा हो जाता है 

दुनिया के सारे तानाशाह 

प्रेम को ही मारना चाहते हैं 

मगर वे इस काम में 

कभी सफल नहीं हो पाते

भगत सिंह, खुदीराम बोस, गांधी 

और न जाने कितने ही 

ऐसे लोग मार दिए गए 

मगर फिर भी वे 

इसलिए बचे रह गए 

कि उन्होंने अपने देश 

और मनुष्यता से प्रेम किया था

जीवन प्रेम का ही परिणाम है 

जो लोग घृणा और गैर बराबरी 

कायम कर

हथियारों के बल पर 

 दुनिया बनाना चाहते हैं 

वे प्रेम की ताकत को नहीं समझते।

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आजादी का मतलब 

हमेशा हमें कमजोर कहा गया

कि हमें अपनी सीमाओं में चाहिए 

वही कहना चाहिए 

जिससे पुरुष प्रधान व्यवस्था को 

आघात न लगे

स्त्री होने का मतलब अबला होना

मान लिया गया 

कवियों ने भी दया भाव से 

खूब कविताएँ लिखी कि-

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, 

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।”

गोया हमारे पास प्रतिरोध की 

शक्ति ही न हो

मगर यह सोच किसकी है?

पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर 

चलनेवाली स्त्री 

जिस दिन अबला हो जाएगी 

उस दिन पुरुष भी असहाय हो जाएगा 

वह समय आ गया है 

कि अपने इस सोच को बदलना होगा 

एक-दूसरे का सम्मान करते हुए 

साथ-साथ चलना होगा 

आजादी का एक मतलब यह भी है।

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बेटियाँ 

बेटियाँ कभी निराश नहीं करतीं 

वह जीवन के हर मोर्चे पर 

साथ देने को तत्पर रहती हैं 

वह सुबह की किरणों की तरह आती हैं 

और रात में चांदनी जैसी हो जाती हैं 

जिसकी शीतलता से 

निहाल हो जाता है मन

बेटियों का जीवन 

उस फूल की तरह है 

जिसकी खुशबू से धरती का आंगन 

महकता रहता है

वे कितने भाग्यवान हैं 

जिनके घर में बेटियाँ हैं। 

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लङकियां 

कठिनाइयों को पार कर 

आसमान छूने की 

कोशिश कर रही हैं लङकियां 

अब चारदीवारी तोड़ कर 

बंधनों को छोड़ कर 

खुली हवा में सांस 

ले रही हैं लङकियां 

अब अपने जीवन का फैसला 

स्वयं करने में सक्षम हैं लङकियां 

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सावन

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में 

कि धरती की छाती 

जुड़ा जाती 

हरियाली वसन पहन

बादल को ललचाती 

हर्षित हो मेघ

बरस जाते

परदेशी याद बहुत आते

आखिर सखी 

क्या है इस सावन में। 

——————

समुद्र और स्त्री 

समुद्र से बड़ा होता है 

स्त्री का विस्तार 

मगर वह अपने में सिमटी 

घर के किसी कोने में 

दुबकी रहती है चुपचाप 

चंद्रमा के आकर्षण में 

समुद्र में उठते ज्वार भाटा को 

दुनिया देखती है 

मगर स्त्री के भीतर उठते 

ज्वार भाटा को 

कोई नहीं देखता 

सुनामी में 

समुद्री जहाज का 

कुछ खास नहीं बिगड़ता 

मगर तटीय इलाके 

हो जाते हैं तबाह 

प्रेम ही है वह जहाज 

जिस पर दुनिया को थामे

भटकती रहती है स्त्री 

अपने विस्तृत दुख के सागर में।

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संजना तिवारी
साहित्यकार व संजना बुक्स की फाउंडर

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