अरुण आनंद
बिहार की राजनीति में वंशवाद शब्द पिछले तीन दशकों से एक खास राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होता रहा है। जब भी इस शब्द का उच्चारण होता है तो निशाना लगभग तय होता है; लालू प्रसाद और उनका परिवार। लेकिन हाल के दिनों में रालोसपा सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिहार विधान मंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाया गया, या जदयू का सदस्य बनते ही नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को जिस तरह प्रोजेक्ट किया गया उसने इस ‘नैरेटिव’ की सारी नैतिकता को नंगा कर दिया है।
जिस राजनीति ने वर्षों तक यह दावा किया कि वह परिवारवाद से मुक्त है, वही राजनीति आज अपने भीतर वंशवाद की सबसे विडंबनापूर्ण मिसाल गढ़ रही है।
निशांत कुमार वे शख्स हैं जो कल तक जदयू के साधारण सदस्य भी नहीं थे। पार्टी के भीतर उनका कोई राजनीतिक इतिहास नहीं था, न कोई संगठनात्मक संघर्ष, न जनता के बीच कोई लंबा संवाद। लेकिन जैसे ही उन्होंने सदस्यता ग्रहण की, रातों-रात उन्हें राजनीतिक वारिस और पार्टी के भविष्य के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। जिस पार्टी में हजारों कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष कर रहे हैं, वहां अचानक एक व्यक्ति को केवल इसलिए तारणहार घोषित कर दिया जाता है क्योंकि वह मुख्यमंत्री का बेटा है। यह सब सिर्फ वंशवाद नहीं है; यह राजनीतिक नैतिकता की खुली हत्या है।
जदयू के उन कार्यकर्ताओं पर क्या गुजरती होगी जो पिछले तीस वर्षों से पार्टी के लिए गाँव-गाँव में पसीना बहा रहे हैं। वे लोग जिन्होंने आंदोलन किए, जेल गए, चुनाव लड़े, हार-जीत का सामना किया उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को एक झटके में अप्रासंगिक बना दिया गया। क्योंकि लोकतंत्र की जगह वंश ने ले ली है।
निशांत कुमार का राजनीतिक उभार इस मायने में भी विचित्र है कि उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है जो न तो सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे हैं और न ही राजनीतिक संवाद में उनकी कोई पहचान रही है। लेकिन अचानक उन्हें ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे जदयू का भविष्य उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है। यह दृश्य किसी लोकतांत्रिक दल का नहीं, बल्कि किसी सामंती दरबार का प्रतीक लगता है जहां राजा के बाद राजकुमार का राज्याभिषेक तय होता है।
बिहार की इस पूरी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सब कुछ उन तस्वीरों के सामने रखकर हो रहा था जिनमें महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया और भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुषों की छवियां अंकित थीं। गांधी का सपना लोकतांत्रिक नैतिकता का था। सिद्धांतविहीन राजनीति के आज के दौर में नीतीश सबसे बड़े प्रतीक रहे हैं। डॉ० राममनोहर लोहिया ने वंशवाद और सामंती राजनीति का खुलकर विरोध किया था। और आंबेडकर ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सामाजिक न्याय से जोड़ा था।

लेकिन उन्हीं की तस्वीरों के नीचे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था खड़ी की गई जहां पार्टी का भविष्य तय करने का अधिकार कार्यकर्ताओं या जनता के पास नहीं, बल्कि परिवार के पास है। यह घटनाक्रम राजनीतिक स्मृतिहीनता का चरम है।
विडंबनापूर्ण बात यह कि यह सब उसी राजनीतिक खेमे में हो रहा है जो वर्षों से परिवारवाद के खिलाफ सबसे जोरदार भाषण देता रहा है। NDA के नेताओं ने लंबे समय तक बिहार में यह प्रचार किया कि वंशवाद केवल लालू प्रसाद के परिवार में है। लेकिन आज वही गठबंधन अपने भीतर उसी प्रवृत्ति को खुलकर बढ़ावा दे रहा है।
अगर किसी दल में नेता का बेटा अचानक राजनीति में आकर पार्टी का भविष्य घोषित कर दिया जाए, तो उसे क्या कहा जाएगा? अगर यह वंशवाद नहीं है, तो फिर वंशवाद की परिभाषा क्या है?
असल समस्या यह है कि बिहार की राजनीति में वंशवाद पर बहस भी वर्गीय और जातीय पूर्वाग्रहों से संचालित होती रही है। जब राजद नेता लालू प्रसाद अपने परिवार के साथ राजनीति में दिखते हैं तो उसे वंशवाद कहकर बदनाम किया जाता है। लेकिन जब सत्ता के भीतर वही काम रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, भाजपा, और नीतीश कुमार करते हैं तो उसे राजनीतिक विरासत कहकर सामान्य बना दिया जाता है।
कभी जदयू खुद को समाजवादी परंपरा की पार्टी कहा जाता था, जब यह पार्टी बिहार में स्थापित होने के लिए संघर्ष कर रही थी तो मंगनीलाल मंडल और उदयकांत चौधरी जैसे पिछड़े वर्ग के विचारवान नेता इसकी अगली कतार में होते थे, लेकिन जैसे ही यह पार्टी सत्तासीन हुई इसने साजिशन पिछड़े वर्ग से किसी नेता को उभरने ही नहीं दिया। उसका चरित्र तेजी से सवर्णमुखी होकर रह गया।
पार्टी के भीतर जिन लोगों का प्रभाव बढ़ा है, उनमें ललन सिंह, संजय झा और विजय चौधरी जैसे नेता शामिल हैं। बहुजन समाज के जिन नेताओं की उनकी पहुंच है वह अशोक चौधरी जैसे भ्रष्टतम नेता शामिल रहे हैं। जाहिर है नीतीश के इसी व्यक्तिवादी सोच के कारण जदयू में समाजवादी विचारधारा या जनआंदोलनों की विरासत की जगह सत्ता-केंद्रित राजनीति हावी होती गई है। परिणाम यह हुआ कि पार्टी धीरे-धीरे एक व्यक्ति और उसके परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। यही वह प्रक्रिया है जिसने जदयू को एक राजनीतिक आंदोलन की बजाय भ्रष्टतम प्रशासनिक तंत्र में बदल दिया।

निशांत कुमार की ताजपोशी को केवल परिवारवाद की घटना मानना अधूरा होगा। यह उस लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें नीतीश कुमार की राजनीति धीरे-धीरे व्यक्तिवाद में बदलती गई। एक समय वे सामाजिक न्याय और विकास के संतुलन की राजनीति का दावा करते थे। लेकिन समय के साथ उनकी राजनीति का केंद्रीय तत्व केवल सत्ता-प्रबंधन बनकर रह गया। इसी प्रक्रिया में उन्होंने बिहार की राजनीति का बड़ा हिस्सा भाजपा के लिए खुला छोड़ दिया।
आज स्थिति यह है कि भाजपा वैचारिक और संगठनात्मक रूप से लगातार मजबूत होती गई, जबकि जदयू अपने ही ढांचे में सिकुड़ती चली गई। ऐसे में निशांत कुमार की एंट्री केवल एक पारिवारिक घटना नहीं है। यह उस राजनीतिक खालीपन का प्रतीक भी है जो जदयू के भीतर पैदा हो चुका है।
राजनीति में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो केवल तत्कालीन घटना नहीं रहते, बल्कि इतिहास का प्रतीक बन जाते हैं। निशांत कुमार की यह ताजपोशी भी शायद वैसा ही एक क्षण है। यह क्षण याद दिलाएगा कि कैसे एक पार्टी, जिसने कभी समाजवाद और लोकतंत्र की बात की थी, धीरे-धीरे परिवार और व्यक्तिवाद की राजनीति में बदल गई। और यह भी याद किया जाएगा कि बिहार की राजनीति में एक समय ऐसा आया जब वंशवाद के खिलाफ सबसे जोरदार भाषण देने वाले ही उसी वंशवाद के सबसे बड़े संरक्षक बन बैठे।
संभव है कि आने वाले वर्षों में इतिहास नीतीश कुमार को केवल एक प्रशासक या गठबंधन-कुशल नेता के रूप में नहीं, बल्कि उस राजनेता के रूप में भी याद करे जिसने अंततः अपनी राजनीति को व्यक्तिवाद में बदल दिया और बिहार की पूरी राजनीतिक जमीन भाजपा के लिए खाली कर दी।
निशांत की ताजपोशी उसी कहानी का सबसे ताजा अध्याय है जहां वंशवाद के खिलाफ खड़ा किया गया नैरेटिव अंततः उसी के सामने नतमस्तक हो गया।
अरुण आनंद स्वतंत्र पत्रकार हैं

Leave a Reply