“धरती भर आकाश” में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध

तसनीम पटेल की आत्मकथा : शोध आलेख

आत्मकथा धरती भर आकाशमें स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतिरोध

अहमद अली

शोध सार – हिंदी आत्मकथात्मक साहित्य में तसनीम पटेल की आत्मकथा “धरती भर आकाश” स्त्री जीवन के संघर्षों  का एक सशक्त दस्तावेज़ है। यह कृति केवल लेखिका के निजी अनुभवों को अभिव्यक्त नहीं करती बल्कि भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति व्याप्त सामाजिक, धार्मिक और पितृसत्तात्मक प्रतिरोध को भी उजागर करती है।प्रस्तुत आत्मकथा बताती है कि समाज  में स्त्री की शिक्षा को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, और कैसे उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को पारिवारिक ‘इज़्ज़त’ और पुरुष-सत्ता के लिए ख़तरा माना  गया है

आत्मकथा में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि जब लेखिका की बहन के लिए शिक्षिका की नौकरी का प्रस्ताव आता है वह अवसर उसके जीवन को नई दिशा दे सकता था किंतु पिता द्वारा उस प्रस्ताव का कठोर विरोध पितृसत्ता की जड़ मानसिकता को उजागर करता है। बेटी की कमाई को ‘भाड़’ कहना केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का प्रतीक है जिसमें पुरुष को ही परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य माना जाता है और स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता को पुरुषत्व पर आघात समझा जाता है।

इसके अतिरिक्त आत्मकथा में मज़हबी फ़िरक़ेबंदी भी स्त्री शिक्षा के मार्ग में बाधा बनकर उभरती है। मेहदवी फ़िरक़े से संबंधित होने के कारण परिवार का सामाजिक बहिष्कार और धार्मिक असहिष्णुता बच्चों के मानसिक विकास को भी प्रभावित करती है। इस प्रकार स्त्री शिक्षा का प्रतिरोध केवल लिंग आधारित नहीं रह जाता बल्कि उसमें मज़हब, समाज और परंपरा की कई परतें जुड़ जाती हैं।

धरती भर आकाश यह स्थापित करती है कि स्त्री की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत अधिकार का प्रश्न नहीं यह सामाजिक परिवर्तन का आधार है। यह आत्मकथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए स्त्री अस्मिता, संघर्ष और आत्मसम्मान की सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है।

बीज शब्द – स्त्री आत्मकथा, स्त्री शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, पितृसत्ता, मज़हबी फ़िरक़ेबंदी, सामाजिक प्रतिरोध, मुस्लिम समाज, स्त्री अस्मिता

मूल आलेख – हिंदी साहित्य में आत्मकथा विधा ने हाशिए पर पड़े जीवनानुभवों को अभिव्यक्ति देने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। विशेषतः स्त्री आत्मकथाएँ उस सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं जिसे पुरुष-प्रधान इतिहास और साहित्य प्रायः अनदेखा करता रहा है। तसनीम पटेल की आत्मकथा धरती भर आकाश इसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी है। यह कृति स्त्री जीवन की उन जटिल परिस्थितियों को उजागर करती है जहाँ शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे मूलभूत अधिकार भी संघर्ष का विषय बन जाते हैं। गरिमा श्रीवास्तमव के मतानुसार, “ इन आत्मकथाओं को स्त्री के आक्रोश और प्रतिरोध की रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।”1 

धरती भर आकाश आत्मकथा में जब हम देखते है कि तसनीम को उसके सर बुलाकर उसके घर के हाल चाल पूछते है और उसको पिता को बुला कर लाने के लिए कहते है “प्रार्थना के बाद जोग सर ने मुझे अपने कार्यालय में बुलाया और मेरे घर के हालत की जानकारी ली। मुझसे कहा अभी घर जाकर अपने अब्बा से कहना- ‘सर ने बुलाया है।’ मैं तुरंत घर गई और अब्बा को साथ लेकर जोग सर के ऑफिस में आ गई। सर ने मेरी तारीफ़ करते हुए अब्बा के सामने एक सुझाव रखा कि ‘आपकी बड़ी बेटी’ अभी-अभी मैट्रिक पास हुई है। ऐसा तसनीम ने मुझे बताया है। शिक्षा विभाग में बड़े अधिकारी मेरे परिचित है। स्त्री शिक्षिकाओं की आज भी कमी है। मैं उसकी शिक्षिका की नौकरी लगा सकता हूँ। आपके घर की हालत सुधरेगी। इस बच्ची की पढ़ाई अच्छी होगी। इस बात पर अब्बा वहाँ शांत रहे। सर से कुछ नहीं बोले। घर आकर अम्मी से कहने लगे- हेडमास्टर रानी को नौकरी लगाने को कह रहा है, इस बात को सुनकर ही मेरा खून खौल रहा था। सभी को जहर देकर, मैं भी जहर खाकर मर जाऊँगा लेकिन बेटी की कमाई खाने वाला भाँड़ (नामर्द) मैं नहीं बनूँगा, मैं उसकी भाड़ नहीं खाऊँगा”2 

भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा को लंबे समय तक संदेह और भय की दृष्टि से देखा गया है। आत्मकथा में जब लेखिका के लिए शिक्षिका की नौकरी का प्रस्ताव आता है।  तब यह क्षण सामाजिक बदलाव की संभावना लेकर आता है। शिक्षा विभाग में नौकरी का सुझाव न केवल लेखिका की प्रतिभा की स्वीकृति है बल्कि यह संकेत भी देता है कि स्त्री आत्मनिर्भर होकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती है। किंतु पिता द्वारा इस प्रस्ताव का तीव्र विरोध यह दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की कमाई को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाता। मंजु आर्या लिखती है, “वैसे तो महिलाएं सदैव हाशिये पर रही है। चाहे वो कोई भी समाज हो हिन्दू सिख ईसाई अथवा मुसलमान। इतना हुआ की समय के साथ – साथ और धर्मों में तो काफी चीजे बदल गई और महिलाओं की स्थिति में भी उतरोत्तर सुधार होता गया किन्तु मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति जस की तस रही।”3 

पिता का यह कथन कि “बेटी की कमाई खाने वाला भाँड़ मैं नहीं बनूँगा” स्त्री के श्रम को अपमानजनक ठहराने वाली मानसिकता को उजागर करता है। यहाँ शिक्षा और नौकरी स्त्री की प्रगति के साधन न होकर पुरुष की प्रतिष्ठा के लिए चुनौती बन जाते हैं। यह प्रतिरोध केवल व्यक्तिगत नहीं है बल्कि उस सामाजिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें पुरुष की पहचान ‘कमाऊ मुखिया’ के रूप में स्थापित है और स्त्री की भूमिका घरेलू दायरे तक सीमित कर दी जाती है।

“हम मेहदवी फ़िरक़े से थे। कुरान, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज आदि इस्लाम के पाँच अरकान (पाँच तत्व) मेहदवी फ़िरक़े में भी मानते हैं। फ़र्क़ बस इतना है, सुन्नी फ़िरक़े के लोग यह मानते हैं कि मेहदी अले-सलाम ज़माने आख़िर में आएँगे। और मेहदवी यह कहते हैं कि मेहदी अलैह सलाम इस दुनिया में आकर चले गए। फिर वापस कैसे आएँगे? ऐसी कोई बात नहीं है, यह बहुत बुनियादी फ़र्क़ है। दूसरे धर्मों में जैसे भेदभाव और संप्रदाय हैं, वैसा ही इस्लाम में भी है। इस्लाम में भी 76 फ़िरके (पंथ) हैं। अब्बा पंथाभिमान के कारण नमाज़ अदा करने नहीं जाते थे। इसलिए बिलोली के मुस्लिम समाज का रोष हमारे परिवार पर था। श्रेष्ठ और स्वजन यदि साथ में हों तो इन्सान मुसीबतों का – सामना करता है। अब्बा बिलोली में अकेले ही थे इसलिए वहाँ के मुस्लिम हमें अपना नहीं मानते थे। अब्बा और समाज के बीच मज़हब की श्रेष्ठता की लड़ाई चलती थी और हम बच्चों को मुस्लिम समाज के ताने झेलने पड़ते थे। इस मज़हबी जंग में अब्बा बड़ी हिम्मत से लड़ते रहे लेकिन धर्मांध और नासमझ लोगों से कभी हार नहीं मानी, न उनके सामने झुकना पसंद किया।”4     

आत्मकथा में मज़हबी फ़िरक़ेबंदी का प्रश्न भी स्त्री शिक्षा के प्रतिरोध से गहराई से जुड़ा हुआ है। मेहदवी फ़िरक़े से संबंधित होने के कारण परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। नमाज़ न पढ़ने और धार्मिक मतभेदों के कारण समाज द्वारा तिरस्कार झेलना पड़ता है। इस सामाजिक अलगाव का प्रभाव सीधे बच्चों पर पड़ता है। ऐसे वातावरण में स्त्री शिक्षा और आत्मनिर्भरता को और अधिक संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि समाज पहले से ही परिवार को ‘अलग’ और ‘विरोधी’ मान चुका होता है।

“बिलोली में घर के सामने किराना की दुकान थी। उसके मालिक गनी सेठ से फूफी के नैन लड़ गए, लेकिन यह मुहब्बत दादी को रास नहीं आई। बेटी की हरकत को दादी ने पहचान लिया और अपने बेटे को सब बता दिया। अब्बा बहुत नाराज हुए, क्योंकि गनी सेठ कच्छी मुसलमान था जबकि अब्बा मेहदवी मुसलमान थे। लिहाजा, दोनों में बेटी-व्यवहार जुर्म करने के बराबर था। अब्बा फिर से हैदराबाद पहुँचे और अपने मुर्शिद (धर्मगुरु) से बहन के हालात बताए। अब्बा और अम्मी के जीवन में फुंफू खमरुन्निसा बानो ने एक तूफान खड़ा कर दिया था। हैदराबाद के अशरफुद्दीन को अब्बा ने पसंद किया। उनकी पहली पत्नी मर चुकी थी। अब्बा के सामने एक ही लक्ष्य था, बहन की शादी करना। वह उन्होंने पूरा कर दिया। फूफी का निकाह अशरफुद्दीन से हो गया और फूफी हैदराबाद रहने चली गई।”5 

स्त्री शिक्षा के प्रति यह प्रतिरोध विवाह संस्था से भी जुड़ा हुआ है। आत्मकथा में फूफी की प्रेमकथा यह स्पष्ट करती है कि स्त्री की इच्छा और चयन को सामाजिक अनुशासन के विरुद्ध माना जाता है। विवाह के माध्यम से स्त्री को ‘सुरक्षित’ दायरे में बाँध देना ही समाज का लक्ष्य बन जाता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा और नौकरी जैसी स्वतंत्रताएँ स्त्री को उस दायरे से बाहर निकालने वाली शक्तियाँ प्रतीत होती हैं जिनसे समाज भयभीत रहता है।

आर्थिक स्वतंत्रता स्त्री को निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि पितृसत्ता इसे सबसे बड़ा खतरा मानती है। धरती भर आकाश में शिक्षा और नौकरी का विरोध केवल आर्थिक प्रश्न नहीं है, बल्कि वह स्त्री की सोच, आत्मविश्वास और भविष्य पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश है। पिता का आक्रोश दरअसल उस व्यवस्था का आक्रोश है, जिसमें स्त्री की स्वतंत्र पहचान की कोई जगह नहीं है।

इसके बावजूद आत्मकथा का स्वर पूरी तरह निराशावादी नहीं है। संघर्षों, अपमान और अस्वीकार के बीच लेखिका की चेतना विकसित होती है। शिक्षा के महत्व की समझ, समाज की सच्चाइयों की पहचान और आत्मसम्मान की भावना धीरे-धीरे आकार लेती है। यही संघर्ष आगे चलकर स्त्री की अस्मिता को सुदृढ़ बनाता है।

इस प्रकार धरती भर आकाश स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रतिरोध को केवल समस्या के रूप में नहीं सामाजिक संरचना के भीतर छिपे सत्ता-संबंधों के रूप में प्रस्तुत करती है। यह आत्मकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि जब तक स्त्री की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा।

यह कहा जा सकता है कि तसनीम पटेल की आत्मकथा न केवल एक स्त्री के जीवन संघर्ष की कथा है बल्कि यह भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति व्याप्त विरोध की गहरी पड़ताल भी है। यह कृति स्त्री आत्मकथात्मक लेखन को नई दिशा देते हुए सामाजिक परिवर्तन की चेतना को मजबूत करती है।

निष्कर्ष – धरती भर आकाश स्पष्ट करती है कि किसी भी समाज में स्त्री की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत विकास का विषय नहीं है यह सामाजिक संरचना की परीक्षा है। तसनीम पटेल अपने अनुभवों के माध्यम से यह दिखाती हैं कि धार्मिक पहचान, पारिवारिक निर्णय और सामाजिक प्रतिष्ठा ये तीनों मिलकर स्त्री के अवसरों को सीमित कर देते हैं। शिक्षा और नौकरी का विरोध दरअसल उस मानसिकता का परिणाम है जो स्त्री को परिवार की मर्यादा से बँधी भूमिका में देखना चाहती है।

आत्मकथा यह भी संकेत देती है कि स्त्री का संघर्ष अकेले बाहरी दुनिया से नहीं बल्कि घर के भीतर उपस्थित पितृसत्ता से भी होता है। पिता का कठोर रुख, समाज का अविश्वास और फ़िरक़ों का दबाव इन सबके बीच लेखिका की चेतना धीरे-धीरे मजबूत होती है। यही आंतरिक विकास इस कृति को विशिष्ट बनाता है।

संदभ ग्रंथ सूची

  1. चुप्पियाँ और दरारें’स्त्री आत्मकथाः पाठ और सै‌द्धांतिकी, गरिमा श्रीवास्तव, राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, पृ. 21
  2. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.110 -111 
  3. साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे, मंजु आर्य, साखी प्रकाशन, पृ. 13 
  4. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.99 
  5. धरती भर आकाश, तसनीम पटेल, अगोरा प्रकाशन, ग्राम अहिरान, पोस्ट चमॉव, शिवपुर, पृ.30 

अहमद अली
शोधार्थी (पीएच.डी.)
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
[विभाग का नाम – हिंदी विभाग]
Email – sayaadali99@gmail.com

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ISSN 2394-093X
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