वंचित तबकों की लड़कियों के भी खिलाफ है यह साजिश: जेएनयू प्रकरण

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आरती रानी प्रजापति 


रोहित वेमुला, जीशा, डेल्टा और न जाने कितने एकलव्य इस ब्राह्मणवादी भारत में मारे जा चुके हैं| इनका दोष इतना ही होता है कि ये सभी छात्र अपनी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक परिस्तिथियों को धकेलते हुए पढ़ाई में आगे आते हैं| मनुवाद इसकी अनुमति नहीं देता|यह ऐसा नियम है जिसमें यदि समाज का चौथा वर्ण पढ़-लिख जाएगा तो वह जान जाएगा कि जिस व्यवस्था को इस ब्राह्मणवदियों ने फैलाया है वह कितनी खोखली है| JNU ऐसा ही विश्वविद्यालय है जहाँ गरीब, दलित, स्त्री, आदिवासी तथा मुस्लिम का छात्र-छात्रा अपनी मेहनत और लगन से दाखिला लेते हैं| हैरानी कीबात यह है कि जो छात्र प्रवेश-परीक्षा में 70 में से अच्छे नंबर लाता है उसे वाइवा में 30 में से 3, 2 4, 1, कभी-कभी 0 तक दिया जाता है| इसे JNU प्रशासन द्वारा गठित अब्दुल नाफे कमेटी भी साबित करती है| यह कवायद कई सालों से चल रही है|

जेएनयू के तथाकथित क्रांतिकारी जो ‘साथी हम आपके लिए लड़ेंगे’ कहकर वोट मांगते हैं, इन मुद्दों पर  इसपर चुप्पी साध लेते हैं| उनकी ऐसी ही अवस्था फैकल्टी में ओबीसी रिजर्वेशन, अल्पसंखकों के लिए डीप्रवेशन पॉइंट्स को बढ़ाने पर होती है| एकेडमिक काउंसिल मीटिंग में छात्र मीटिंग एरिया के बाहर अपनी उन मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें वे मनवाना चाहते हैं| इस बार की जेएनयू  की अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में भी ऐसा ही किया जा रहा था| छात्र वाइवा के 30 नंबर को घटाकर 10 करवाना चाहते थे | ताकि वाइवा में होने वाले शोषण को कम किया जा सके| जबकि प्रगतिशील /संघी  अकादमिक काउन्सिल  मेंबर चाहते हैं कि यूजीसी  के नियम के अनुसार प्रवेश परीक्षा सिर्फ औपचारिकता मात्र रहे और वाइवा के नंबर ही प्रमुख हों| यदि ऐसा नियम बनाया जाता है तो वंचित समाज का छात्र कभी उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं पा सकेगा|

लड़कियाँ, जो घर व पढ़ाई दोनों को संभाल बड़ी मुश्किल से आगे आ रही हैं उन्हें भी जानबूझ कर वाइवा में फेल कर दिया जाएगा| आज वंचित समुदाय, खासकर ओबीसी के लिए उच्च शिक्षा में दखल का एक चरण पूरा हुआ दिख रहा है. अगले चरण में इन समुदायों की लड़कियां बड़ी संख्या में  उच्च शिक्षण संस्थानों में आने वाली हैं, जेएनयू सहित उच्च शिक्षण संस्थानों में इन लड़कियों के लिए दरवाजे बंद करने की साजिश शुरू हो गई है,  जिससे शिक्षित हो वह अपनी पारंपरिक भूमिका से अलग कोई कार्य न कर सके|

छात्र हितों की बात करने वाला छात्र संघ अकादमिक काउंसिल की पहली मीटिंग में आता है तो उनके कुछ क्रांतिकारी अन्य विरोध कर रहे छात्रों से धक्का-मुक्की करते हैं| दूसरी अकादमिक काउन्सिल   मीटिंग के समय क्रांतिकारी गायब हो जाते हैं| अकादमिक काउन्सिल  मीटिंग के विरोध प्रदर्शन के लिए कई छात्रों, जिनमे सभी दलित, ओबीसी, अन्य वंचित तबकों के हैं, को  जेएनयू कैंपस से निलंबित किया गया है| उनके अकादमिक कार्य और होस्टल, लाइबेरी जैसी सुविधाएं छीन ली गई हैं| ध्यान रहे ऐसा ही फरमान रोहित वेमुला को सुनाया गया था| चयनित छात्र संघ की नेता निष्कासन की कड़े शब्दों में निंदा तो करती हैं पर अपने संघी रवैये से अलग कोई काम नहीं करती| 24  घंटे के अन्दर 12 छात्रों का निष्कासन करने वाले वीसी ने 15 अक्टूबर से गायब नजीब की कोई सुध लेने की कोशिश नहीं की है| आज भी उसको मारने-पीटने वाले एबीवीपी के छात्र कैंपस में खुले घूम रहे हैं| उनके खिलाफ कोई नोटिस अभी तक जेएनयू प्रशासन नहीं जारी कर पाया है|

वंचित तबकों की यह लड़ाई जारी है| हमारी यह लड़ाई सिर्फ वीसी से नहीं  जेएनयू के उन तमाम तथाकथित प्रगतिशील क्रांतिकारियों से है जो क्रान्ति के नाम पर झूठ बोलते हैं| सत्ता में आए  छात्र संघ से एक सवाल ‘जब दलित, आदिवासी, मुस्लिम , ओबीसी, महिला, अपने अधिकारों के लिए अकादमिक काउन्सिल मीटिंग में लड़ रहा था , आप कहाँ थे साथी?

छात्र राजनीति में सक्रिय आरती रानी प्रजापति जेएनयू से हिन्दी में पीएचडी कर रही हैं.

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