अभी कुछ दिन पहले अरुंधति रॉय का इंटरव्यू सुन रहा था, इंटरव्यू किया था बीबीसी के लिए रूपा झा और उनकी टीम ने। अरुंधति से गांधी प्रसंग में रूपा झा के सवाल ‘डेविल्स एडवोकेट ‘ वाले थे। डेविल्स को मुहावरे की तरह लें, अक्षरशः गांधी जी के लिए नहीं।
The Doctor and The Saint की लेखिका अरुंधति रॉय ने एक सवाल के जवाब में कहा कि महात्मा की दिक्कत थी कि सबकी ओर से वे खुद प्रतिनिधि होने का दावा करते थे, कोशिश करते थे।
अरुंधति के इस कथन की बहुत सी पुष्टियां इतिहास में हैं। महात्मा गांधी को उस वक्त ठीक – ठीक समझते थे बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर, मुहम्मद अली जिन्ना और नेहरू। चूकी महात्मा की राजनीति नेहरू के पक्ष में थी इसलिए उन्होंने कभी भी उनके छिलके सीधे नहीं उतारे। समझते पटेल और कई अन्य भी थे, लेकिन महात्मा के लिए स्नेह, मोह, सम्मान और उनके कई के अपने हितों के जाल उन्हें महात्मा के सामने पस्त कर देते थे।
महात्मा ने सबकुछ, सारे मुद्दे, सारे नेतृत्व को अधिगृहित करने की रणनीति राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश के साथ ही अपनायी थी। सबसे पहले तो 5000 वकीलों को कांग्रेस से 500 रुपये मासिक मानदेय दिलवाते हुए वकालत छुड़वाकर कंसेंट मेकर्स की टीम बनाई, जाहिर है वह टीम ऊंची जाति के हिन्दू मुसलमान की ही थी। उस समय 500 की राशि कई वकील कमाते भी नहीं थे, वैसे भी वकालत छोड़कर कांग्रेस के सिपाही बने।
टीम निर्माण के बाद उन्होंने उस दौर के एक साम्प्रदायिक मुद्दे, खिलाफत आंदोलन, को अपना हथियार बनाया अपने व्यक्तित्व में ‘सेक्युलरिज्म ‘ के स्थायी लेबल के लिए और एक ठोस वोट बैंक के लिए। खिलाफत को असहयोग आंदोलन का मुद्दा बनाने के पक्ष में बहुत से कांग्रेसी भी नहीं थे और जिन्ना जैसे तब वास्तविक सेक्यूलर नेता भी। वे तुर्की के वैसे मसले को, जिसके साथ वहां की मुस्लिम जनता भी नहीं थी, भारत का मुद्दा मानने के पक्ष में नहीं थे। गांधी ने कांग्रेस से जिन्ना का नेतृत्व खत्म किया जिन्ना उसके बाद धीरे -धीरे खुद सम्प्रदायिक तो नहीं हुए लेकिन सम्प्रदायिक राजनीति को साधने में सफल हुए, उसके स्वीकृत नेता हो गए।
खिलाफत को कांग्रेस व असहयोग आंदोलन का मुद्दा बनाने के लिए कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में दर्जनों टैक्सी ड्राइवर कांग्रेस के सदस्य, डेलीगेट बनाये गये और विपक्ष में पड़े 118 वोट, जो वास्तव में कांग्रेस के पुराने सदस्यों के थे, को 500 से अधिक मतों से हरा दिया गया। इस तरह गांधी सर्व मान्यता की ओर बढ़े।
राहुल गांधी की राजनीति भी मुद्दों को अपने नेतृत्व में लेने की राजनीति तब से है जब से कांग्रेस सत्ता में थी, फर्क सिर्फ इतना होता रहा है कि मुद्दों की विविधता सरकारों के अनुरूप बदलती रही है, वे इससे तय होते हैं कि राहुल लड़ किससे रहे हैं। वर्धा के डोरली, यवतावल आदि की यात्राओं के मुद्दे उनकी अपनी सरकार के लिए शील्ड था उस वक्त। उसके बाद उन्होंने बहन जी की सरकार के खिलाफ संघर्ष ठाना, फिर अखिलेश यादव की सरकार को हटाने में भाजपा की मदद की। इन दोनों ही वक्त में उनके मुद्दे बदले। वे केजरीवाल के प्रभाव को कम करने और अपनी सरकार बचाने के लिए अपनी सरकार का ऑर्डिनेंस रोकने प्रेस क्लब तक गए थे।
मुद्दों और प्रतिनिधित्व को हड़पने में वे गांधी नहीं हो सकते, क्योंकि उसके लिए गांधी जी जैसी राजनीतिक चतुराई भी चाहिए, फिर भी कोशिश जारी है उनकी, उनका साथ देने के लिए है ब्राह्मण वर्ग के नेतृत्व वाली सिविल सोसाइटी।
पिछले दिनों, लगभग तीन साल तक वे समाजिक न्याय की बात करते हुए उसके प्रतिनिधित्व को समेटने की कोशिश करते रहे और अब युवाओं के मुद्दे का एकमात्र नेता होने की कोशिश में हैं। ऐसा करने के लिए उनके पास पर्याप्त तंत्र और पैसा भी है। समाजिक न्याय न अब उनका साधन रहा और न साध्य, उसका आखिरी इस्तेमाल चेहरे के रूप में वे यूपी में कर रहे हैं राजेंद्र पाल गौतम आदि को आगे कर। ठीक बिहार पैटर्न। वहां वे अखिलेश यादव के बढ़ते रथ में पत्थर की तरह काम करेंगे। देखना यह है कि हेमंत सोरेन की तरह अखिलेश यादव उस पत्थर के साथ लक्ष्य हासिल कर लेते हैं, या पत्थर का बोझ उनके अभियान को सुस्त कर देता है।
गांधी इसलिए भी नहीं हो सकते राहुल गांधी क्योंकि गांधी जी के सारे प्रयत्नों में एक प्रयत्न होता था संगठन निर्माण। उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश से लेकर जिला स्तर की समितियों को मजबूत किया, अपने लेफ्टिनेंट भी साथ में बनाए। यूं ही नहीं उन्होंने कांग्रेस पर लगभग 22 से 25 वर्ष तक पकड़ रखी, मार्ग दर्शक मंडल में जाने के बाद भी उनकी आभा बनी रही और कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व को कई बार झुका पाने में सफल हुए थे।
राहुल गांधी अपने द्वारा ही चलाए गए अभियानों से ही क्षत क्षत्रपों के साथ नेतृत्व की रेस में निर्विकल्प होने के अभियान पर हैं। यह निर्विकल्पता शायद उन्हें पीएम भी बना दे, बशर्ते वक्त के सारे सितारे एक साथ उनकी शुभता में उनकी ओर गति करने लगें, उनके हित में उनके शुभ ग्रह बन जायें। संकट है कि ग्रहों की लंगड़ी, कुटिल और पस्त चाल उन्हें घेर कर भी उनके हित में शोर और संघर्ष भी करेगी तो कुछ खास हासिल नहीं होगा। रामलीला मैदान में आज जैसा जुटान 2024 के चुनाव के पहले भी हुआ था। इंडिया गठबंधन के गुब्बारे में तब हवा भी बहुत प्रभावी थी। आज अनुकूलता है कि सामने 12 साल से आगे की यात्रा करती अपनी कुटिल चालों के प्रतिघात से खुद आहत, घिरी एक सत्ता है।
