राष्ट्रीय राजनीति में राहुल के बढ़ते असर से यूपी-बिहार में कांग्रेस बेअसर क्यों? 

चुनाव आयोग सहित संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के खत्म होने का मुद्दा राष्ट्रीय कंसर्न बनाने में राहुल गांधी सहित विपक्ष सफल हुआ है , लेकिन वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश अपने इस लेख में सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह पर्याप्त है ?

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पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का राजनीतिक प्रभामंडल निश्चय ही बढ़ा है। उनकी छवि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के एक साहसी और संघर्षशील नेता के तौर पर उभरी है। देश-परदेस में उन्हें पहले के मुकाबले आज ज्यादा गंभीरता से लिया जा रहा है। सत्ताधारी भाजपा के नेताओं के अलावा देश के राजनीतिक हलकों में ज्यादातर लोग राहुल के बारे में इस आकलन से सहमत दिखते हैं। पर राहुल के इस राजनीतिक उभार का उनकी पार्टी में, खासतौर पर यूपी-बिहार जैसे प्रमुख हिंदी-भाषी सूबों में कितना असर दिख रहा है? दोनों सूबों में हुए हाल के विधान-परिषद चुनावों के मद्देनजर यह सवाल आज प्रासंगिक नजर आता है। वैसे तो देश के कई अन्य राज्यों के बारे में भी इस पर चर्चा हो सकती है पर इस लेख में हम अपना आकलन सिर्फ यूपी-बिहार तक सीमित रखते हैं।

यूपी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वहां कुछ ही महीने बाद विधानसभा का चुनाव होना है और प्रांतीय कांग्रेस के अनेक नेता 403 सदस्यीय विधानसभा की कम से कम 180  से 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। राज्य के संगठन प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद कई बार इस आशय के बयान भी दे चुके हैं। बिहार में अभी चुनाव नहीं होने हैं इसलिए ऐसे बयान वहां के कांग्रेसियों की तरफ से नहीं आये। पर हाल के विधान परिषद चुनावों की तैयारी के दौरान वहां भी पार्टी की राजनीतिक दावेदारी को लेकर बहुत सारे बयान आये थे। अंततः ऐसे ही बयानों और दावों के चलते कांग्रेस का उसके राजनीतिक-गठबंधन के अन्य सहयोगियों-राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथियों से कोई औपचारिक तालमेल नहीं हो सका। यूपी में कांग्रेस के बड़े से छोटे-हर स्तर के नेता इन दिनों राहुल गांधी के बढ़ते प्रभामंडल से उत्साहित होकर प्रदेश में कांग्रेस के राजनीतिक पुनरुत्थान को लेकर आये दिन बयान दे रहे हैं। कांग्रेस क्या किसी भी राजनीतिक पार्टी के राजनीतिक-पुनरुत्थान की संभावना से इंकार करना उस पार्टी के प्रति पूर्वाग्रह का संकेत है।

लोकतंत्र में किसी भी पार्टी या नेता के फिर से उभरने या डूबने की संभावना-आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। हमारे देश में इसके अनेक उदाहरण हैं। हाल के वर्षों में टीडीपी और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू जिनके सितारे गर्दिश में थे, एक बार फिर आंध्र के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद दक्षिण भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण बन गये हैं। तेलंगाना में कांग्रेस का पुनरुत्थान हुआ है। लेकिन किसी क्षेत्र विशेष में किसी पार्टी के पुनरुत्थान के लिए वहां के हालात के मुताबिक उसे काम भी करना होता है। क्या वाकई यूपी में कांग्रेस ऐसा कोई काम करती नजर आ रही है, जिससे उसका पुनरुत्थान सुनिश्चित माना जाय?  हाल के कुछ वर्षों में उसने प्रदेश में ढेर सारे अध्यक्ष बनाये और बदले हैं। इस समय आराधना मिश्रा प्रदेश अध्यक्ष हैं। कुछ ही सप्तार पहले अजय राय थे। उनके कार्यकाल में पार्टी का हर छोटा-बड़ा नेता बयान देता नजर आता था कि समाजवादी पार्टी अगर विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को180 से कम सीटें देने की बात करती है तो कांग्रेस को गठबंधन में नहीं उतरना चाहिए और अपने बल पर राज्य की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। ऐसे तमाम नेता बताते थे और आज भी बताते मिलते हैं कि कांग्रेस प्रदेश में अब बड़ी ताकत बन चुकी है। इस दावे के पक्ष में कांग्रेस के नेताओं के पास अपनी-अपनी दलीलें और दावे हैं। पहली दलील है कि यूपी का सवर्ण, खासतौर पर ब्राह्मण समुदाय का बड़ा हिस्सा अब भाजपा को छोड़कर कांग्रेस की तरफ मुखातिब हो चुका है। कांग्रेसियों की इस ‘राजनीतिक थीसिस’  को सटीक और सही मानने का फिलहाल कोई ठोस आधार नहीं दिखता। यह बात सही है कि ब्राह्मण समुदाय का एक हिस्सा भाजपा से कुछ निराश जरूर है। उसे लगता है कि योगी-राज में उसकी हैसियत कम हुई है और ठाकुरों की बढ़ गई है। पर संघ-भाजपा के राजनीतिक योजनाकारों के पास इस सोच की काट के लिए बहुत सारे तर्क हैं और वे उन तर्कों या तथ्यों को अभी से प्रचारित भी कर रहे हैं। वैसे किसी भी निष्पक्ष और प्रोफेशनल सर्वेक्षण में सवर्ण समुदाय के भाजपा से मोहभंग की बात अभी तक सामने नहीं आई है। हां, ये बात स्थानीय स्तर पर जरूर कही जा रही है कि ब्राह्मणों के एक हिस्से में भाजपा से नाराजगी है और ऐसे हिस्से कांग्रेस की तरफ आशा भरी नजर से देख रहे हैं। पर यह कितना बडा हिस्सा है, इसके बारे में किसी तरह का कोई प्रोफेशनल सर्वे या आब्जेक्टिव आकलन सामने नहीं आया है। पिछले दिनों यूपी में प्रदेश के सांगठिनक प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने दावा किया कि सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, दलित और मुसलमान भी कांग्रेस की तरफ बड़े पैमाने पर आ रहे हैं। सच ये है कि यूपी में दलित मतदाता काफी समय से विभाजित हैं। उनका एक हिस्सा अगर बसपा के साथ है तो दूसरा हिस्सा भाजपा के भी साथ है। भाजपा ने हाल के वर्षों में बाल्मीकि और कुछ अन्य दलित जातियों में अपना काफी असर बनाया है। गौतम जी क्या बता सकते हैं कि कांग्रेस ने यूपी के दलितों में सांगठनिक स्तर पर ऐसा कोई काम कब किया? इस बीच चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण पश्चिम यूपी के कुछ हलकों में सक्रिय हैं। दलितों के एक हिस्से में पिछले संसदीय चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी को भी समर्थन मिला था। तब से अब तक कांग्रेस के स्थानीय नेता चाहते तो इन वर्गों में ठोस काम के जरिये अपनी बैठ बना सकते थे। पर वे निश्चित रहे कि सारा कुछ राहुल गांधी के बढते राजनीतिक प्रभामंडल से हो जायेगा। पर जमीनी स्तर पर यूपी-बिहार की राजनीति में ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

यूपी में कांग्रेस ने इस बीच दलितों को अपने साथ जोडने के लिए सिर्फ एक काम किया है। उसने राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाया। निश्चय ही वह ज्यादातर पारंपरिक कांग्रेसियों से अलग किस्म के नेता हैं। लोगों के साथ संवाद करना भी जानते हैं और संगठन चलाना भी। लेकिन कांग्रेस के पास समूचे यूपी में ओबीसी से कितने प्रमुख नेता हैं? प्रदेश में ओबीसी पचास फीसदी से ज्यादा हैं। इस 50 फीसदी से ज्यादा आबादी के बीच से कांग्रेस के पास ऐसा कोई नेता नहीं दिखता, जिसे आलाकमान की तरफ से महत्वपूर्ण भूमिका में उतारा गया हो! भाजपा से लेकर समाजवादी पार्टी तक में, इन समुदायों से अनेक नेता हैं। पर कांग्रेस यूपी में अभी ज्यादातर राजनीतिक प्रयोग कभी भूमिहार तो कभी ब्राह्मण समुदाय के बीच ही कर रही है! शायद यूपी में वह आज भी सत्तर-अस्सी के दशक की राजनीति और रणनीति से बाहर निकल नहीं पा रही है। इस बीच, उसने सिर्फ एक समझदारी भरा काम किया। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व समाजवादी पार्टी के साथ बेहतर तालमेल करके चल रहा है। वह प्रदेश के बड़बोले नेताओं की तरह सीटों को लेकर ऊलजलूल दावे नहीं पेश कर रहा। आराधना मिश्रा के आने के बाद प्रदेश के नेताओं का बड़बोलापन भी कुछ कम हुआ है। संभवतः यह भी दिल्ली का निर्देश है। कांग्रेस ने यूपी के विधान परिषद चुनाव में बेहवजह कई सीटों पर प्रत्याशी देने की बिहार जैसी मूर्खता नहीं की। 

बिहार में कांग्रेस ने विधान परिषद की खाली आठ में पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसे एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली। पांच में ज्यादातर सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। पटना स्नातक सीट पर तो उसकी दयनीय स्थिति रही। उसके उम्मीदवार संजय कुमार को महज 21 वोट मिले। पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व प्रदेश अघ्यक्ष मदनमोहन झा भी दरभंगा शिक्षक सीट से चुनाव हार गये। मजे की बात है कि उनको प्रशांत किशोर की नई-नवेली पार्टी जनसुराज ने हराया। उसके उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता श्री झा को हराकर राजनीतिक सनसनी पैदा कर दी। इस जीत के साथ ही जन सुराज ने विधान परिषद में अपना खाता खोल लिया। विधानसभा के एक उपचुनाव में बांकीपुर से चुनाव जीतकर प्रशांत किशोर ने विधान सभा में अपना खाता खोला था। बिहार में भाजपा को 8 में 2 , राजद को 2, जद-यू को 1 जनसुराज को1 और निर्दलीयों को 2 सीटें मिलीं। कांग्रेस जीरो हो गई।

ये बात सही है कि ये चुनाव आम जनता के चुनाव नहीं थे। इनमें सिर्फ ग्रेजुएट या शिक्षकों को मतदान करना था। पर नतीजों से यह सवाल तो उठता ही है कि अपेक्षाकृत ‘पढ़ा-लिखा’ समझे जाने वाले लोगों( मतदाताओं) में राष्ट्रीय स्तर पर कांगेस नेता राहुल गांधी की अगुवाई में चल रही संविधान, वोट का अधिकार और लोकतंत्र बचाने की राजनीतिक लड़ाई का असर क्यों नहीं दिखा? अगर इनमें नहीं दिखा तो क्या गारंटी है कि आम मतदाताओं में वह उसका जरूर असर दिखेगा! निश्चय ही राहुल गांधी की अगुवाई में जारी राजनीतिक संघर्ष को बेमतलब नहीं कहा जा सकता लेकिन पार्टियों को इस बात का आकलन जरूर करते रहना चाहिए कि जरूरी होने के बावजूद ऐसे मुद्दों पर होने वाले राजनीतिक संघर्ष अगर आम जनता के अपने जरूरी सवालों में नहीं शुमार होते तो वे चाहे जितने महत्वपूर्ण हों, वे चुनावों के जरिये कोई बड़ा बदलाव नहीं ला सकते। लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक बदलाव जनता के मिजाज-विचार के बदलने से ही आता है। चुनावों में जनता के बदले मिजाज-विचार से ही सरकारें बदलती हैं। ऐसे में कांग्रेस को जरूर सोचने और आत्ममंथन करने की जरूरत है कि पूरे देश की तरह हिंदी क्षेत्र के इन दोनों प्रदेशों में राहुल के बढ़ते प्रभामंडल के बावजूद उसकी अपनी सेहत क्यों नहीं सुधरती नजर आ रही है!  

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि संविधान की रक्षा और चुनावी धांधली जैसे मुद्दे आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं. पर आम जनता के ठोस और जरूरी मुद्दों को नजरंदाज कर सिर्फ उक्त दोनों पर बड़ा जन-समर्थन हासिल करना संभव नहीं दिखता. फिर सारी कवायद के सिर्फ विपक्ष दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं और कुलीन सिविल सोसायटी तक ही सीमित रहने की संभावना बनी रहेगी. समाज के बड़े हिस्से में आज भी बेरोजगारी, सामाजिक न्याय? स्वास्थ्य और शिक्षा सबसे बड़े मुद्दे हैं. विपक्ष फिलवक्त इन्हें नजरंदाज करता दिख रहा है. जातिवार जनगणना में ओबीसी की सही गिनती नहीं होने दी जा रही है. पर कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष इस पर खामोश है जबकि समाज की तकरीबन 50 फीसदी से ज्यादा आबादी का यह बड़ा मुद्दा है. ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि विपक्ष अपने सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्ष को संयोजित करने यानी अपने शब्द और कर्म में एकरूपता लाने में की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है?

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