प्रतीकों की लड़ाई: महिष दसरा, वर्चस्व का इतिहास और सत्ता का मौन

किसी समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति को स्वीकार करने का अर्थ दूसरे समुदाय की आस्था को नकारना नहीं है। चामुंडेश्वरी की पूजा करने वालों को दशहरा मनाने का अधिकार है; उसी तरह महिषासुर को अपना नायक मानने वालों को भी शांतिपूर्ण ढंग से उनकी स्मृति मनाने का अधिकार होना चाहिए। किसी की आस्था का सम्मान करने के लिए दूसरे की स्मृति को मिटाना आवश्यक नहीं है।

0
19

11 अक्टूबर 2026 की दोपहर जब मैसूर के चामुंडी पहाड़ी पर पहुंचीं, तो पता चला कि सुबह यहाँ धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। चामुंडी मंदिर से पहले, मुख्य चौराहे पर स्थापित महिषासुर की मूर्ति के चारों ओर मैसूर शहर पुलिस आयुक्त सीमा लटकर के आदेश में 9 अक्टूबर की मध्यरात्रि से 11 अक्टूबर सुबह 6 बजे तक 200 मीटर के दायरे में जमावड़े पर पाबंदी लगाई गई थी। मकसद साफ था, महिषा मंडलोत्सव आयोजन समिति के कार्यकर्ताओं को मूर्ति पर फूल-माला चढ़ाने से रोकना। दशहरा की शुरुआत से ठीक पहले यह दृश्य प्रतीकों की उस पुरानी लड़ाई को फिर से उजागर करता है, जो केवल मैसूर तक सीमित नहीं है, भारतीय समाज में सवर्ण वर्चस्व से पुष्ट इतिहास, पौराणिकता और सत्ता के साथ बहुजन और हाशिये के लोगों के बीच चल रहे सतत संघर्ष का हिस्सा है। इसलिए चामुंडी पहाड़ी पर स्थित महिषासुर की मूर्ति पर फूल -माला चढाने के आवेदन और अनुरोध के बावजूद बिल्कुल पिछले साल की ही तरह (बल्कि पिछले साल के साथ, पिछले दो और साल की बात की जा सकती है क्योंकि मई 2023 से राज्य में कांग्रेस की सरकार है ) इस साल भी आधिकारिक कार्यक्रम टाउन हॉल में हुआ। महिषा दशहरा आचरण समिति के सदस्यों ने 10 अक्टूबर को मैसूरु के टाउन हॉल परिसर में ‘महिषामंडलोत्सव’ मनाया। पूर्व मेयर पुरुषोत्तम के नेतृत्व में समिति के सदस्यों ने अंबेडकर की मूर्ति पर माला चढ़ाई और बुद्ध, महिषासुर व अंबेडकर की छोटी कांस्य मूर्तियों के सामने दीप प्रज्वलित किए। उन्होंने महिषासुर को 7000 साल पुराने अच्छे शासक और अपने समुदाय के पूर्वज के तौर पर रेखांकित किया।

टाउन हॉल परिसर में में ही दलित लेखक-चिंतक ‘विट्ठल वग्गन की “महिषा चरित्रिका, चामुंडी कल्पनिका ” पुस्तक का विमोचन भी हुआ। इस मौके पर ‘विट्ठल वग्गन ने कहा कि महिषा एक शासक थे, इतिहास को पौराणिकता ने हाइजैक कर लिया है और ऐतिहासिक तथ्यों को मिथकीय कथाओं से बदल दिया गया है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि महिषा को पौराणिक राक्षस की बजाय ऐतिहासिक दृष्टि से देखें। विट्ठल वग्गन ने जो अपने वक्तव्य में जो कहा उसका महत्त्व है।
इसी क्रम में इतिहासकार पी.वी. नंजाराज उर्स ने चामुंडी पहाड़ी के पुराने नाम ‘महाबल बेट्टा’ का उल्लेख किया, जबकि लेखक के.एस. भगवान ने आंबेडकर के समाजवादी विचारों पर चर्चा की।

यहाँ बुद्ध, आंबेडकर और महिषासुर को एक साथ प्रस्तुत करना अपने आप में एक वैचारिक वक्तव्य है। आयोजक इन प्रतीकों के जरिए समानता, सामाजिक न्याय और वैकल्पिक सांस्कृतिक इतिहास की अपनी समझ सामने रख रहे थे। इन तीनों के ऐतिहासिक संदर्भ और विचार एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन आयोजन में उनका साथ आना उस सामाजिक दृष्टि को व्यक्त करता है जो प्रचलित धार्मिक आख्यानों के बाहर भी अपने नायक और प्रेरणास्रोत तलाशती है।

इन वक्तव्यों और पुस्तक के विमोचन का महत्व केवल महिषासुर की एक वैकल्पिक छवि प्रस्तुत करने में नहीं है। वे इस प्रश्न को भी सार्वजनिक विमर्श में लाते हैं कि क्या इतिहास और संस्कृति की व्याख्या पर किसी एक परंपरा का स्थायी एकाधिकार होना चाहिए। इन विचारकों की ऐतिहासिक व्याख्याओं से बहुतों को असहमति हो सकती है बल्कि है ही। लेकिन असहमति का अर्थ यह नहीं कि उन्हें सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का अधिकार सीमित कर दिया जाए। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि असुविधाजनक विचार भी बहस के लिए जगह पा सकें।

वैसे कुछ संगठकों ने दावा किया कि उन्होंने मूर्ति पर भी माला चढ़ाई और गृह मंत्री प्रियंक खड़गे के हस्तक्षेप के लिए धन्यवाद दिया। कुछ रिपोर्टों में लगभग 20 लोगों के सुबह फूल चढ़ाने और तिरसरन-पंचशील का पाठ करने का जिक्र है। लेकिन आधिकारिक जानकारी यही है कि मुख्य कार्यक्रम टाउन हॉल तक सीमित रहा। यह भी गौरतलब है कि राज्य के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे स्वयं दलित समुदाय से आते हैं और कांग्रेस सरकार में मंत्री हैं। फिर भी पुलिस प्रशासन ने निषेधाज्ञा लगाई। सवाल यह है, उनके मंत्री होने के बावजूद भी प्रतीकात्मक अधिकार पूरी तरह क्यों नहीं मिल पाया?

महिषा दसरा 2015 से मनाया जा रहा है। समर्थक मानते हैं कि महिषासुर राक्षस नहीं, बल्कि बौद्ध शासक थे जिन्हें अशोक ने महिष मंडल में भेजा था। प्रो. बी.पी. महेश चंद्र गुरु (जो 2024 में दिवंगत हो गए) ने कहा था, “वे मानवीय मूल्यों का सम्मान करने वाले बौद्ध राजा थे, लेकिन पुरोहित वर्ग ने उन्हें ‘असुर’ बताकर चामुंडेश्वरी जैसी काल्पनिक पात्र द्वारा मारे जाने की कहानी गढ़ी।” लोककथा विशेषज्ञ कालेगौड़ा नागवार ने कहा कि तथ्य तोड़े-मरोड़े गए हैं। लेखक सिद्दस्वामी (महिषा मंडल पुस्तक) और अन्य विद्वान कहते हैं कि मैसूर का नाम महिषा से आया है और यदि वे राक्षस होते तो शहर का नाम उनके नाम पर क्यों रखा जाता? के.एस. भगवान ने भी बार-बार कहा है, “मैसूर नाम महिषा से आया। क्या कोई बुरे व्यक्ति के नाम पर राज्य या शहर का नाम रखता है? वे बौद्ध थे, उत्तम काम करने वाले। इसलिए हम महिषा दसरा मनाते हैं।”? मैसूर के कुछ दलित परिवार उन्हें पूर्वज मानकर पूजते हैं, मैसूर के आशोकपुरम जैसे इलाकों में यह परंपरा जीवित है। दूसरी ओर, पारंपरिक पक्ष दसरा को चामुंडेश्वरी की विजय का उत्सव मानता है। इतिहासकारों में भी मतभेद हैं। कुछ कहते हैं कि अभिलेखीय प्रमाण पर्याप्त नहीं, पौराणिकता को इतिहास बनाने की कोशिश है। फिर तो यह बात दुर्गा पूजा पर भी लागू होती है। इसलिए मुद्दा इतिहास, मिथक प्रमाण इन सबका नहीं बल्कि बहुसंख्य के सांस्कृतिक वर्चस्व का है और सत्ता का उसके आगे झुकने का है चाहे सत्ता में शामिल लोगों की वैचारिक, सामाजिक लोकेशन उस बहुसंख्य वर्ग से नहीं आती हो तब भी। यहाँ खासतौर पर बात प्रियंक खरगे की हो रही है जो कांग्रेस के होने के साथ ही दलित भी हैं और महिषा, आंबेडकर और बुद्ध के सम्मान के मार्फ़त दिए जाने वाले सन्देश और उसके महत्त्व को अच्छी तरह समझते हैं।

प्रतीकों की लड़ाई और लोकतंत्र की कसौटी

यह एक बड़ी राजनीतिक विडंबना है। राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गाँधी लगातार सोशल जस्टिस, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात करते रहे हैं। कांग्रेस की वैचारिकी में एक पैराडाइम शिफ्ट” राहुल गाँधी इसी की बात करते रहे हैं। और यह भी कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम खासतौर पर कर्नाटका में कांग्रेस के वोटर रहे हैं। कर्नाटका में दलितों की आबादी 18 प्रतिशत के करीब है और अनुसूचित जनजाति की लगभग 7 फीसद। और इस इतनी बड़ी आबादी का ज्यादातर कांग्रेस को ही वोट करती है। लेकिन फिर भी कांग्रेस कई संवेदनशील, धार्मिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहुसंख्यक भावनाओं या ताकतवर जातियों के साथ खड़ी हो जाती है। प्रियंक खड़गे जैसे मजबूत दलित चेहरा होने के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी सावधानी बरतती है। कानून-व्यवस्था का तर्क दिया जाता है, लेकिन यही तर्क तब कमजोर पड़ता है जब बहुसंख्यक प्रतीकों की रक्षा की बात आती है।

यह भी सच है बीजेपी शासन में महिषा दसरा पर कई साल रोक थी और इसके नाम पर बड़ा विवाद होता रहता था। कांग्रेस आने के बाद अनुमति मिली, लेकिन चामुंडी पहाड़ी पर स्थापित महिषासुर की मूर्ति पर फूल चढ़ाने पर बार-बार पाबंदी लगती रही। 2023 में भी विवाद हुआ। 2025 में भी ऐसे ही निषेधाज्ञा लागू की गई थी और अब 2026 में फिर वही तस्वीर देखने को मिली।

टाउन हॉल में बुद्ध, आंबेडकर और महिषासुर की प्रतिमाओं पर एक साथ पुष्प चढ़ाना आयोजकों की ओर से एक वैचारिक वक्तव्य था। वे इन प्रतीकों के माध्यम से समानता, सामाजिक न्याय और वैकल्पिक सांस्कृतिक इतिहास की अपनी समझ व्यक्त कर रहे थे। इससे यह जरूरी नहीं हो जाता कि तीनों के ऐतिहासिक संदर्भ या विचार एक जैसे मान लिए जाएँ। लेकिन यह स्पष्ट है कि आयोजन ने उन सवालों को सार्वजनिक किया जिन्हें बहुजन चिंतन लंबे समय से उठाता रहा है।किसी समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति को स्वीकार करने का अर्थ दूसरे समुदाय की आस्था को नकारना नहीं है। चामुंडेश्वरी की पूजा करने वालों को दशहरा मनाने का अधिकार है; उसी तरह महिषासुर को अपना नायक मानने वालों को भी शांतिपूर्ण ढंग से उनकी स्मृति मनाने का अधिकार होना चाहिए। किसी की आस्था का सम्मान करने के लिए दूसरे की स्मृति को मिटाना आवश्यक नहीं है।

इसीलिए महिष दशहरा का विवाद केवल इतिहास और मिथक का विवाद नहीं है। यह इस बात का प्रश्न है कि सार्वजनिक स्थानों पर किसकी स्मृति सहजता से स्वीकार की जाती है और किसकी स्मृति को विवाद का विषय बना दिया जाता है। प्रशासन का दायित्व केवल संभावित टकराव को रोकना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए ऐसा करना है। यदि किसी कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो उसके लिए विशिष्ट खतरे, वैधानिक आधार और आवश्यक अनुपात का औचित्य होना चाहिए। आखिरकार, कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। क्या यह कांग्रेस की वैचारिक विडंबना है, भारतीय राजनीति की संरचनात्मक सीमा है, समाज में बहुसंख्यक सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रभाव है, या बहुजन राजनीतिक हस्तक्षेप के मुख्यधारा में आने के बावजूद हाशिये पर बने रहने की त्रासदी? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं, लेकिन इन्हें पूछना जरूरी है। लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि सत्ता अपने सबसे लोकप्रिय प्रतीकों का कितना सम्मान करती है, बल्कि इससे भी होती है कि वह उन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे करती है जो हाशिये पर हैं।

मैसूर की चामुंडी पहाड़ी पर महिषासुर की प्रतिमा के आसपास लागू निषेधाज्ञा इसी कसौटी को सामने रखती है। सत्ता बदलना अपने आप में वैचारिक परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन तब दिखाई देता है जब सरकार कठिन परिस्थितियों में भी समानता, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करती है। प्रतीकों की यह लड़ाई इसलिए केवल अतीत की व्याख्या की लड़ाई नहीं, बल्कि वर्तमान में बराबरी से जीने और अपनी पहचान व्यक्त करने के अधिकार की लड़ाई भी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here