फिल्मों में स्त्री-भूमिका के प्रश्न “भूमिका” फ़िल्म के सन्दर्भ में

0
13

17 अक्टूबर को स्मिता पाटिल के जन्मदिन पर विशेष :

रक्षा गीता 

समाज बनने और उसके विकास के साथ साथ समाज में स्त्री और पुरुषों की भूमिका निर्धारित कर दी गई थी, जिसमें स्त्री को घर की शोभा बनना था जबकि पुरुष को घर के बाहर अपना बल प्रदर्शन करना था, आजीविका धन आदि के कार्य भर उसने संभाल लिए इन्हीं स्थितियों को हमारी फिल्मों ने मोहर लगाते हुए और भी पुख्ता किया। सिनेमा में आज भी स्त्री शोपीस या वस्तु की तरह प्रस्तुत की जाती रही है अपनी तयशुदा भूमिका से इतर नहीं जा सकती    समाज में भी स्थिति कोई अलग या बेहतर नहीं। सिनेमा समाज का आईना होने के साथ-साथ  उद्योग भी है। आज भले ही निर्माण, निर्देशन,लेखन, गीत-संगीत, लेखन आदि में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ने लगी है पर सिनेमा का बहुधा भाग आज भी मध्यकालीन बोध में गोते लगा, नायिका भेद चित्रण करने में लिप्त है,यहाँ पुरुष व पारिवारिक खाँचो के अनुकूल स्त्री चरित्र रचे जातें है और जो इनके अनुकूल न हो वे खलनायिका कहलाती है। सिनेमा का यथार्थ यह है कि इस बाज़ार में स्त्री की भूमिका ‘वस्तु’ से अधिक कुछ नहीं चाहे पर्दे पर हो या पर्दे के पीछे या उसे महिमामंडित किया जाए, अन्यथा क्या कारण है कि ‘मीटू जैसा आंदोलन’ विषय को लेकर कोई फिल्म नहीं आई जबकि इस तरह के सनसनीखेज विषय पर बनने वाली फिल्म को लोग हाथों-हाथ लेते लेकिन इससे फिल्म इंडस्ट्री का पितृसत्तात्मक चरित्र उजागर हो जाता जो पहले ही बदनाम है। 

इतिहास देखे तो पायेगें कि फिल्मों में पुरुष-चरित्र नायक हमेशा आज भी ताकतवर शारीरिक दृष्टि से हृष्ट पुष्ट हर तरह के युद्ध-कौशल से सम्पन्न दिखाया जाता है जबकि नायिका इतनी नाज़ुक कि उसका दुप्पट्टा तक बार-बार सरकता है, उसकी भूमिका मांसल,यौन-उत्तेजक एक खूबसूरत गुड़िया-सी बनी रही है दूसरे वह नायक को कितना रिझा पाती है, अथवा वह निरीह अबला नादान किशोरी होती है जिसका उद्धार नायक करने वाला है। हालाँकि स्वाभिमानी, संघर्षरत नायिकाओं की भूमिका 36-37 से हो चुकी थी ‘प्रभात फिल्म कम्पनी’ ने ‘दुनिया न माने’ नामक फिल्म की नायिका नीरा शांता आप्टे सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी श्रृंखला में मदर इंडिया,गाइड,साहब बीबी और गुलाम,सीमा (जो खुद को बुरी लड़की कहती है) आँधी,सुबह,अर्थ,आदि फिल्में स्त्री को उनके अस्तित्व के पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है लेकिन आज़ादी के बाद स्त्री घर की लक्ष्मी के रूप में भूमिका निभाने लगी और अस्सी नब्बे दशक की फिल्मों में उसका महिमामंडित किया गया जो यथार्थ से परे था उसकी भूमिका को महान बनाकर आम जीवन की स्त्री के लिए कठिनाईयां उत्पन्न की अब हर परिवार में इसी तरह समर्पित,आज्ञाकारी त्याग की प्रतिमूर्ति स्त्रियों की माँग बढ़ने लगी। लेकिन शिक्षा स्त्री की सोच समझ में क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आई और बहू की आवाज़,सौ दिन सास के एक दिन बहू का,ये आग कब बुझेगी, दुश्मन, मृत्युदंड जैसी फ़िल्मों ने सिद्ध किया कि समाज में अब स्त्री अपनी भूमिका स्वयं निर्धारित करेगी लेकिन यहाँ पर भी सशक्तिकरण पुरुष नियमों के दायरे में उन पर निर्भर रहते हुए ही हुआ। समाज और सिनेमा  में अपनी जिस महत्वपूर्ण भूमिकाओं की तलाश में स्त्री भटकती रही है जिसमें स्वतंत्र निर्णय प्रमुख है इसका आरंभ हमें समान्तर सिनेमा से स्मिता पाटिल की फिल्मों में देखने को मिलता है पर साथ ही समाज में अपने निर्णय खुद लेने, अधिकारों के लिए संघर्ष करने और परम्परागत रूढ़ियों को तोड़कर अपना मार्ग बनाने में वह कितनी अकेली रह जाती है यह भी किसी से छिपा नहीं उनकी “भूमिका’”  ऐसी ही फिल्म है । 

फ़िल्मी दुनियाँ में स्त्री कलाकारों की भूमिकाओं और यथार्थ में उनके संघर्षो को ‘भूमिका’ फ़िल्म से पहले भी 1958 में सोने की चिड़िया नामक फ़िल्म में भी दिखया गया है। यह फ़िल्म इस्मत चुगताई की कहानी का सिनेमाई रूपांतरण है जिसे मशहूर अभिनेत्री नर्गिस के जीवन से भी प्रेरित माना जाता है। एक गरीब लड़की जब फिल्मों में काम करते मशहूर व अमीर हो जाती है लेकिन सह-कलाकार से प्रेम के बाद धोखा मिलने पर वह अत्यंत दुखी हो जाती है। नूतन, बलराज साहनी और तलत महमूद के त्रिकोणीय प्रेम की यह कथा फिल्म अभिनेत्रियों के शोषण की भी गाथा है जो घर परिवार के साथ बाहर वालों के द्वारा भी होता है, वह स्वार्थी लोगों से घिरी है,सिवाय पिता के जो बेटी से सहानुभूति रहता है बाकी सभी उसका भावनात्मक शोषण कर  अपनी जेब भरतें हैं। क्लासिक ‘कागज़ के फूल’ भी फ़िल्मी दुनिया का यथार्थ बताती है कि फिल्म इंडस्ट्री में उगते सूरज को सलाम किया जाता है, इसी तरह ‘पेज थ्री’ भी फ़िल्मी दुनियां में मुखौटों के पीछे छिपे कलाकारों की दास्ताँ बताती है।फ़िल्मी अभिनेत्री के जीवन पर आई वेब सीरीज आई ‘फेम गेम” में भी यही विषय वस्तु है लेकिन अंतिम एपिसोड के आते-आते एक समर्पित स्त्री की संकल्पना करने वाला बॉलीवुड का पितृसत्तात्मक चरित्र नायिका की इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं को प्रेम-स्वार्थ से जोड़ कर खलनायिका के रूप में परिवर्तित कर देता है। “वो मैजिकल नहीं बल्कि ब्रिलियंट है” संवाद उसके चरित्र कटाक्ष है। इसे कामकाजी महिला के शोषण से भी जोड़ कर देखना चाहिए जबकि स्त्री सशक्तिकरण में आर्थिक स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना जाता है, वही फिल्म उसके दोहरे शोषण का चक्रव्यूह भी स्पष्ट करती है, जिसमें उसके सभी अपनों ने, उसे शिकंजे में कसा हुआ है।लेकिन पुरुष प्रधान फ़िल्म उद्योग में जब स्त्री फिल्म बनाती है वह स्त्री अधिकारों, उसके शोषण उस की दयनीय स्थिति के साथ-साथ उसकी शक्ति को बहुत ही सहजता और तर्कों के साथ संप्रेषित करने का प्रयास करती हैं। साईं परांजपे, अपर्णा सेन, दीपा मेहता, कल्पना लाजमी, मीरा नायर, जोया अख्तर, मेघना गुलजार, तनूजा चंद्रा आदि का नाम उल्लेखनीय है । 

‘भूमिका’  फिल्म एक फ़िल्मी अभिनेत्री की कथा कहती है जो अपने शोषणों के बाद भी पर्दे पर खुश दिखने का अभिनय कर रही है,जीवन में भी वह यही कोशिश करना चाहती है पर कृत्रिमता या मुखौटा लगाना उसके चरित्र या व्यक्तित्व की विशेषता नहीं ।  श्याम बेनेगल निर्देशित  भूमिका (1977) जिसमें स्मिता पाटिल,अमोल पालेकर,अनंत नाग, नसीरुद्दीन शाह अमरीश पुरी प्रमुख भूमिकाओं में हैं, मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की जीवनी पर आधारित है । इस फ़िल्म में उषा (स्मिता पाटिल) बिंदास लड़की है, अपने पसंद की जीवन शैली अपनाती है, परम्परागत वैवाहिक संस्था को चुनौती देती है और अपने अस्तित्व को खोजती हुई कभी घर कभी होटल कभी अनजान पुरुष के साथ सहजीवन में रहती है पर उसे आत्मसंतुष्टि नहीं मिल पाती और अंत में अकेली ही में रह जाती है। उसका अकेले हो जाना अथवा अकेले कर दिए जाने विवशता देख यही समझ आता है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी स्त्री को पुरुष के बनाए सामाजिक नियमों के  दबाब से मुक्ति नहीं दे सकी । उषा गोवा की देवदासी समुदाय की प्रसिद्ध गायिका की पोती है उसके पिता शराबी है इसलिए उसकी माँ की विवशता है कि वह केशव दलवी जैसे लिजलिजे व्यक्ति को अपने परिवार में दखल करने देती है, केशव लालची स्वार्थी और पितृसत्तात्मक सोच का अगुआई है जो कमाऊँ पत्नी को बेल्ट से मारता है, उसके चरित्र पर लांछन लगाता है। चरित्र के खांचे में कैद से स्त्री को आज छुटकारा नहीं घर पर भी नहीं।

केशव के प्रति अपने माँ के व्यवहार को उषा समझ नहीं पाती कि एक तरफ़ वह उसे घर में आने देती है दूसरी ओर उसे बात करने मिलने-जुलने से रोकती है शायद इसलिए जिद्द व अति उत्साह और कुछ माँ को नीचा दिखने के लिए केशव से प्रेम विवाह कर लेती है, उसे लगता है बुरे दिनों में केशव ने घर-भर का साथ दिया तो अब माँ उससे घृणा क्यों करती है कारण सिर्फ इतना नहीं कि वह दूसरी जाति का है! विवाह पूर्व ही उषा गर्भवती हो जाती है उसकी इच्छा माँ बनकर गृहिणी की तरह सूकून से जीवन बिताने की है लेकिन केशव तो पहले से ही उसका बिजनैस मैनेजर बन उसकी कमाई पर अपना जीवन निर्वाह करने की योजना बना चुका है। उषा बहुत जल्दी केशव के दोहरे-दोगले चरित्र को समझ जाती है और अपने फ़िल्मी नायक राज (अनंत नाग) की ओर आकर्षित होती है पर वह भी उससे विवाह नहीं कर सकता जबकि उषा को एक ‘घर’ की आशा है केशव इस रिश्ते पर जानबूझ कर उसे अपमानित और प्रताड़ित करता है, वह होटल में रहने चली जाती है राज के घर नहीं जा सकती। 

इस बीच सुनील वर्मा (नसीरुद्दीन शाह) से भी उसके सम्बन्ध बनते हैं लेकिन सुनील भी वास्तव में आत्मकेंद्रित व्यक्ति है और उषा को मृत्यु के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाकर ख़ुद  आत्महत्या कर लेता है । इन विषम परिस्थितयों वह फिर टूट जाती है तब ऐसे ही किसी होटल में उसकी मुलाक़ात एक अमीर व्यापारी जो सामंतवादी पितृसता का प्रतीक है विनायक काले (अमरीश पुरी) से होती है वह उसे प्रेम से अधिक अपने घर की शोभा के रूप में सजावट की वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है उसकी पत्नी मृत्यु शैय्या पर है जिसकी देह अब किसी काम की नहीं , उषा के वहां पहुँचने पर काले की माँ प्रसन्न ही होती है, किसी प्रकार का विरोध नहीं करती, काले की पत्नी द्वरा तो विरोध करने का प्रश्न ही नहीं उठता । उषा इस नई जिंदगी से पहले बहुत खुश दिखती है इसे वह अपने सम्मानित जीवन के रूप में देखती है। एक दृश्य में जब विनायक काले उसे साड़ियाँ और गहने देता है तब बक्से के आईने में उसका अक्स धुंधला दिखता है यानी घरेलू बनने की इच्छा पूरी होने पर भी उसका अस्तित्व धुंधला ही रहेगा । शीघ्र उसे अपनी वास्तविक स्थिति का भान होता है और उसे घुटन होने लगती है कि उसकी हैसियत क्या है? वह एक छोटा सा निर्णय भी नहीं ले सकती कि बेटे को मेले दिखाने ले जाये जबकि घर के नौकर के पास ज्यादा अधिकार है । विनायक कहता है “वह तुमसे बहुत पहले से यहाँ रह रहा है” वह जान जाती है कि वह एक साधारण सामान्य स्त्री है जबकि वह तो लोकप्रिय अभिनेत्री हुआ करती थी, अपने तमाम निर्णय खुद लिया करती थी, जब मन करता था होटल में अकेली रहने चली जाया करती थी यहाँ वह विनायक काले के पितृसत्तात्मक नियमों में मछली-सी तड़पने लगती है । काले की पहली पत्नी उसे संकेत में समझाती भी है कि “बिस्तर बदलते हैं, रसोई बदलती हैं,पुरुषों के मुखौटे बदलते रहतें हैं… पुरुष नहीं बदलते”  यानी स्त्री कितना ही बदल जाए जब तक पुरुष की मानसिकता नहीं बदलेगी समाज में बदलाव नहीं आएगा । स्पष्ट है कि स्त्री जो भी भूमिका निभाए, उसकी स्थिति  गौण ही रहेगी दोयम दर्जे की (सेकंड सेक्स) वह काले का भी ‘घर’ छोड़ देती है जब अमरीश पुरी कहता है ‘मैंने तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं कि थी तुम खुद आई थी’ तो सभी जेवर उतारकर उसे वापस कर देती है उस बक्से समेत जिसमे उसका अक्स धुँधला दीखता है,अपनी आज़ादी का संकेत देती है और वह आज़ादी जो समाज कभी न देगा पुलिस यानी कानून से मदद से मिलती है यानी स्त्री ज़रा भी सचेत हो तो अपने अधिकारों के लिए पुलिस की मदद ले सकती है। वह विवशता पूर्वक लेकिन चतुराई से तथाकथित वैध पति केशव का आश्रय लेती है और उस पारिवारिक कैद से आज़ाद होती है लेकिन लौटती मुंबई के होटल में ही है ।होटल में उसकी बेटी उषा को अपने साथ रहने के लिए कहती पर वह इनकार कर देती है । अपने अस्तिव की खोज जीवन में अकेलापन दे जाता है यह उन स्त्रियों की नियति बन जाती है जाओ परम्परागत ढाँचों पर प्रहार करतीं है । भूमिका की अभिनेत्री  जिसे अपने अधिकारों के लिए हर हाल परिवेश में संघर्ष करना है, जो अपनी शर्तों पर जीवन जीना चाहती है इसलिए उसे अकेलापन मिलाता है । ‘अर्थ’ फ़िल्म में भी स्मिता ने एक फिल्म अभिनेत्री की मनोदशा का बेहतर प्रदर्शन किया है जबकि उसे मालूम है हर कोई उसे धोखा देने को तैयार है, यह परवीन बॉबी के फ़िल्मी सफ़र को संकेत में बताती फिल्म है वह ‘असुरक्षा बोध’ से ग्रसित मानसिक रोगी है लेकिन इतना समझ रखती है कि इंदर से कहती है ‘तुम मेरे लिए पूजा को छोड़ सकते हो तो किसी और के लिए मुझे भी छोड़ सकते है’ और पुरुष   वर्चस्व को चुनौती देती है, बाद में इन्दर की पत्नी भी उसे स्वीकार नहीं करती । उषा भी जब लौटती है तो बजाय घर जाने के होटल में ही ठहरती है । 

उषा का पति केशव जो पहले वह उषा की माँ से सहानुभूति दिखाता है सम्भवतः इसलिए ही उषा की माँ पति की मृत्यु के बाद केशव से सम्बन्ध बने रहे ऐसी आशा रखती है लेकिन केशव की दृष्टि सदा से उषा पर थी वह उससे उम्र में बहुत बढ़ा है पर फिर भी उसे राह में तंग करता है और कहता है कि ‘वादा करो बढ़ी होकर मुझसे ही शादी करोगे’ और वह हाँ कहकर भाग जाती है वह उसे वह पैसे भी देता है ताकि उषा का उस पर विश्वास बना रहे । चूँकि माँ ने एक ब्राह्मण से शादी की थी इसलिए नहीं चाहती कि बेटी नाच गाने वाले पेशे से जुड़े क्योंकि वह खुद देवदासी परिवार से थी उषा की नानी उसे गाना सिखाती है । फ़िल्म की शुरुआत में उषा अपनी माँ से एक मुर्गे की रक्षा की कोशिश करते हुए छिप जाती है क्योंकि माँ उसे काट कर भोजन में बनाने वाली है लेकिन असफल होती है, यह भी संकेत ही है कि मुर्गे को पाला-पोसा इसलिए ही जा रहा है कि एक दिन उसे हलाल होना है ,उषा वह मुर्गा वह स्वयं है और जीवन भर ख़ुद को बचाने का प्रयत्न करती है लेकिन सभी उसे भोग रहे है, अलग-अलग लोगों के बीच अलग-अलग भूमिका में!  केशव कमजोर मनोवृत्ति का ईर्ष्यालु और झगड़ालू भी है, उसकी कुंठाओं के दुष्प्रभाव से उषा विद्रोही स्वाभाव क्रांतिकारी हो जाता है वह कहती है ‘मारना है आओ मार लो’। 

उषा ‘घर’ की आकांक्षा में भटकती है लेकिन अंत में उसे होटल मिलता है केशव के लिए वह पत्नी नहीं एक कमाई का जरिया भर है राजन उसे प्रेम दिखता है पर शादी नहीं करना चाहता उसमे हिम्मत नहीं की समाज के सामने इस सम्बन्ध को खुल कर स्वीकार कर सके सुनील  कहता है ‘जीवन में अर्थ न हुआ तो जीवन के मायने क्या हुए… हम किसी कीड़े-मकोड़े की तरह ही है यदि हम अपने जीवन में अर्थ नहीं भरा’  लेकिन आत्महत्या कर लेता है। विनायक काले पत्नी की तरह रखता है पर पत्नी के अधिकार नहीं देता उसे घर की चारदीवारी में कैद करकर रखता है जहाँ उसकी लोकप्रिय छवि,उसका पैसा यहाँ कुछ काम नहीं आता यह बात कचोटती भी  है कि पत्नी के रूप में विनायक और उसके परिवार के आगे उषा का समर्पण पितृसत्ता के आगे ही तो समर्पण है, वह क्यों नहीं इन मूल्यों से भी विद्रोह कर देती! फिर जब समझ आता है तो विद्रोह करती भी है लेकिन यह विद्रोह भी उसे सफलता नही दिलवाता, वह घर नहीं होटल का आश्रय लेती है और बेटी के गर्भाती होने पर खुश होती है क्योंकि वह शादी के बाद गर्भवती हुई है अनायास उसके मुँह से निकलता है ‘चरित्र ही औरत का गहना है’ यह उसका अपने परम्पराओं का सहज स्वीकरण है जबकि उसने खुद कितने पुरुषों से सम्बन्ध बनाए पर आज खुद को अकेला पाकर किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराती मानो उसे अपने निर्णयों पर ग्लानि हो रही हो! इसलिए सबकुछ होते हुए भी बेघर है । अंत में उसका होटल के कमर में रहना भी प्रतीक ही है कि घर नामक संकल्पना सिर्फ पुरुषों के लाभ के लिए है जहाँ स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं,कोई प्रेम अथवा सम्मान नहीं उसके कार्यों को उसका अनिवार्य कर्तव्य दायित्व और उसकी ही भूमिका मान कर कोई अहसान का तो प्रश्न ही नहीं उठता। फ़िल्म में स्मिता पाटिल ने अपनी भूमिका की जबरदस्त छाप छोड़ी है और एक सशक्त, लोकप्रिय और सफल अभिनेत्री की निजी पारिवारिक घरेलु विवशताओं को बहुत मार्मिकता से पर्दे पर चित्रित किया है जो आज भी हमें सोचने पर विवश करता है स्त्री कब अपनी भूमिका स्वयं निर्धारित और संचालित करेगी?