राहुल गाँधी जे जन्मदिन (19 जून ) पर विशेष।
स्थितियों ने,समयचक्र ने राहुल गांधी को भारत के लिए ‘एक भूमिका ‘ में तय कर दिया है-जनता की आकांक्षाओं, उम्मीदों और निराशाओं का आरोपित होना तय भूमिका का प्रत्युत्पाद भर है। 22 साल से उनकी सक्रियता का असर भी इस देश के समयचक्र पर अंकित है। राजनीति का पहिया आने वाले सालों में उनके लिए संभावनाओं से भर चुका है, भारत के हॉट सीट ( प्रधान मंत्री ) के उपहार की संभावनाओं से भर चुका है-इसकी अंतिम परिणति की दिशा उन्हें खुद तय करना है। उनके जन्मदिन के पहले से कुछ दिन, बल्कि जून का महीना घटना प्रधान है। जन्मदिन की पूर्व संध्या पर उनकी अपनी पार्टी ने दक्षिण और पूरब से सम्मिश्र संदेश दिया। दक्षिण से,कर्नाटक से,जहां कांग्रेस की सरकार है, क्रॉस वोटिंग करवाकर एक अतिरिक्त विधानपरिषद की सीट उन्हें उपहार दिया है तो पूरब से, झारखंड से क्रॉस वोटिंग के खेल में कांग्रेस पार्टी हार गई, ऐसे सम्मिश्रत परिणाम उनकी 22 सालों की सक्रियता के सन्देश भी हैं।
8 जून को इण्डिया गठबंधन की बैठक के पहले और बाद में गठबंधन की राजनीति और राहुल गांधी की भूमिकाओं ने विपक्ष की राजनीति को वाक् युद्ध में तब्दील कर दिया है। हद तो तब हो गई जब जन्मदिन की पूर्व संध्या शोर से भर गई। इस शोर में उनके लोग अपनी प्रतिबद्ध विश्वसनीयता के लिए जाने जाने वाले एक सहयोगी दल (सीपीआई एमएल ) को भी वाम दलों की समवेत शत्रुता में डाल रहे हैं। जो पिछले कुछ दिनों, केरल के चुनाव के वक्त से बेहद तीखा होती जा रही है। कांग्रेस अब सहयोगी दलों से दो दो हाथ करने में लगी है। जन्मदिन के दो दिन पूर्व ही सीपीआई एम एल के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य आलोचनाओं के बावजूद राहुल गांधी के प्रति सहिष्णु और उम्मीदों से भरे थे, लेकिन झारखंड की हार के बाद कांग्रेस नेताओं की जल्दबाज टिप्पणियों ने कटुता ही पैदा की है। स्त्रीकाल के संपादक और ‘राहुल गांधी: व्याकुल मन के नायक’ के लेखक संजीव चंदन का यह लेख इण्डिया गठबंधन की हालिया बैठक के बाद की संभावनाओं को सम्बोधित है।
स्टालिन की पार्टी DMK ने अपने मुखपत्र ‘मुरासोली (MURASOLI )’ में राहुल गांधी की बेहद तीखी आलोचना की है, जिसमें सिलसिलेवार विश्लेषणों का सबसे बड़ा तथ्य है कि ‘राज्यों में अपने सहयोगी दलों को कमजोर करके राहुल गांधी और कांग्रेस उनकी मदद से केंद्र में सत्ता पाने की कोशिश कर रहे हैं।’ लेख में यह भी स्पष्ट किया है कि कैसे सीपीआई (एम) ने राहुल को उनके मुंह पर लताड़ा और सीपीआई ने राहुल के बयानों को अपरिपक्व बताया।
राहुल गांधी के भाषण में इतिहास का एक लैंडमार्क हैं-1927। यह बेहद महत्वपूर्ण है, जिसे वे पूर्ण स्वराज की मांग के कारण महत्वपूर्ण बताते हैं। आइए इस साल में चलें और फिर वामपंथी पार्टियों के एक धड़े, सीपीआई (एमएल)के सीपीआई और सीपीआई (एम) से अलग विचार को भी इतिहास के आईने में देखें। इतिहास के आईने में राहुल गांधी के पूर्ण स्वराज का लैंड मार्क भी अधूरा है क्योंकि कांग्रेस ने 1929 के अधिवेशन में पूर्ण स्वराज को लक्ष्य माना , 1927 में प्रस्ताव जरूर पेश हुआ था। इससे भी पहले 1927 के पहले, 1921 में कांग्रेस के भीतर काम कर रहे मसानी जैसे कम्यूनिस्ट नेता ने जब पूर्ण स्वराज की मांग की थी, तो महात्मा गांधी ने उसका विरोध किया था। तब महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को अपने नेतृत्व के प्रभाव में ले रहे थे। उसके लिए वे धनबल सहित मुस्लिम जनता को अपने साथ करने के लिए सांप्रदायिक कार्यक्रम भी दे रहे थे। धनबल की नीति के तहत ‘तिलक स्वराज फंड’ इकट्ठा किया और उसे राज्यों में पार्टी इकाइयों के अलावा कुछ होल-टाइमर कार्यकर्ताओं के मानदेय के लिए इस्तेमाल किया, खासकर कथित तौर पर वकालत छोड़ने के लिए सहमत वकीलों को मानदेय देने के लिए।जाहिर है, वे सवर्ण थे, कथित ऊंची जाति से थे, उसके हितों के संरक्षक थे।गांधी खिलाफत आंदोलन के समर्थन में असहयोग आंदोलन की नीति के तहत मुसलमानों का नेतृत्व हासिल करने का प्रयोग कर रहे थे,जिसके कारण कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष नेता जिन्ना को कांग्रेस छोड़ जाना पड़ा।
1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) का गठन हुआ। उस पर ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया (1934), तो भारत के वामपंथी नेताओं ने कांग्रेस को अपने लिए, अपनी गतिविधियों के लिए, शिल्ड की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई। उस वक्त तक कांग्रेस में दोहरी सदस्यता मान्य थी और वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, कम्यूनिस्ट हों, सोशलिस्ट हों, हिंदू महासभाई हों या आरएसएस के सदस्य, कांग्रेस के भी सदस्य थे।
उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेता-गण ने कांग्रेस के ही भीतर बनी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी-1934) के सदस्य के रूप में भी अपनी सक्रियता रखी। महाराष्ट्र में बाबा साहेब के नेतृत्व वाली इंडियन लेबर पार्टी के भीतर भी सक्रिय रहे, चुनाव लड़े। 1942 के निर्णायक मोड़ पर ब्रिटिश सरकार ने CPI से प्रतिबंध हटाया, तो वे कांग्रेस से कम्यूनिस्ट स्पष्ट मतभेद की ओर बढ़े, भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ गए और कांग्रेस से अलग होते गए, या निकाले गए।
तो 1927। यह वह वर्ष भी नहीं है, जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना उद्देश्य बनाया; वह वर्ष 1929 है। 1927 में प्रस्ताव जरूर आया था, नेहरू जैसे तत्कालीन युवा नेताओं द्वारा। प्रस्ताव वाले वर्ष को ही राहुल गांधी लैंडमार्क बना रहे हैं। यह भारत का एक और लैंडमार्क है, जिसे कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकारों ने महत्व नहीं दिया। इसी साल महाड़ आंदोलन हुआ, जो जाति-विरोधी एक बड़ा आंदोलन था, जिसके साथ बाबा साहेब राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरकर आ चुके थे। साइमन कमीशन से कांग्रेसी बिदके हुए थे, जबकि भारत का स्वतंत्र गैर-ब्राह्मण नेतृत्व, बाबा साहेब सहित, इसमें उम्मीद देख रहा था। यह उम्मीद मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों (1919) के समय से बनी थी, जिसमें एक उम्मीद भारत का महिला नेतृत्व भी देख रहा था—नागरिक अधिकारों की उम्मीद।
इस वक्त तक भारत के सेक्यूलर नेता जिन्ना को कांग्रेस से अलग हुए 7 साल हो गए थे। गांधी जी हिंदू महासभा के नेताओं को अपने साथ समेटे हुए कांग्रेस में सक्रिय थे। 1927 के बाद का 5 साल इसी साल के लैंडमार्क के द्वंद्वात्मक परिवेश में रहा। 1932 में इसका परिणाम पुणा पैक्ट हुआ। 1927 के पहले गांधी जी और कांग्रेस जाति-विरोधी आंदोलनों और नेताओं को ‘जिन्ना बनाने’ में लगे थे। वे मंदिर प्रवेश आंदोलनों के क्रांतिकारी प्रयत्नों को भी अपने प्रभाव से कुंद कर देते थे। इसकी सबसे बड़ी प्रयोग-भूमि केरल थी। 1927 के पहले वैकोम और 1932 के बाद गुरुवायूर मंदिर प्रवेश आंदोलन इसके बड़े उदाहरण हैं।
यह सब कांग्रेस की और महात्मा गांधी की एक खास नीति के तहत था—उस वक्त के महत्वपूर्ण स्वतंत्र आंदोलनों को सबोटाज करने का। डॉ. अंबेडकर इसे अपनी किताब What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables (1945) में प्रमाण के साथ व्याख्यायित करते हैं, जिसके प्रकाशन के बाद महात्मा गांधी बेचैन हो गए थे। डॉ. अंबेडकर बताते हैं कि आखिर क्या था कि तिलक के पंडाल जला देने की धमकी (1895 में पुणे में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान) के बाद सामाजिक सुधार कार्यक्रम को स्थगित कर देने वाली कांग्रेस ने 1917 के अपने अधिवेशन में अछूतों के लिए प्रस्ताव पारित किए, वह भी उन नेताओं द्वारा, जो अछूतों को ही उनकी हालत के लिए जिम्मेदार मानते थे। इसकी पृष्ठभूमि में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की आहट और स्वतंत्र दलित राजनीति की पहलकदमी थी। 1927 के बाद वह बेहद स्पष्ट हो गई थी।
राहुल गांधी, जाने-अनजाने, उसी इतिहास और उसकी प्रवृत्ति को आधुनिक संदर्भ में कांग्रेस की रणनीति बना रहे हैं। कम्युनिस्ट राजनीति राहुल गांधी और कांग्रेस के ‘जिन्ना’ प्रोजेक्ट के रडार पर है, जिसे इंडिया गठबंधन के अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट जाहिर कर दिया है। सीपीआई और सीपीआई (एम) की जमीनी राजनीति ने उन्हें सचेत कर दिया और मजबूर भी कि कांग्रेस और राहुल गांधी की इस नीति के खिलाफ सजग हो जाएं, उसे रिस्पॉन्ड करें और अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को सचेत करें।
लेकिन सीपीआई (एमएल) बिहार की जमीनी हकीकत से ज्यादा बंधी है और उसकी चुनावी आकांक्षाएं देश के अन्य हिस्सों में भी कुछ हद तक दिखने की हैं, इसलिए वह कांग्रेस और राहुल गांधी की इस नीति को जानबूझकर इगनोर करने के लिए बाध्य है। उसने ‘व्यापक हित, व्यापक संघर्ष’ की रणनीति अपनाई है, जो वास्तव में व्यापक से अधिक बिहार-केंद्रित है।CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का लेख, “रेसिस्टेंस, रिन्यूअल एंड द फ्यूचर ऑफ़ द इंडिया ब्लॉक” (जो 16 जून 2026 को ‘द हिंदू’ में छपा था), इसी नज़रिए को दिखाता है। इस लेख में वे कहते हैं कि विपक्ष के सामने मुख्य चुनौती विपक्ष की एकता बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक विरोध को मज़बूत करना है। इसके पीछे मूल सोच यह है कि तानाशाही के ख़िलाफ़ बड़ी लड़ाई के लिए रणनीतिक लचीलेपन और व्यापक राजनीतिक सहयोग की ज़रूरत है। इस लेख के स्त्रीकाल वेब पर नुमाया होने तक झारखंड राज्यसभा चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस नेताओं की बयानबाजियों ने दीपांकर के लेख के प्रभाव को कम कर दिया, दोनों पार्टियां आरोप प्रत्यारोप में शामिल हो गईं। इतिहास की वर्तमान गति, राहुल गांधी और कांग्रेस की नीति, कम्युनिस्ट पार्टियों को उनकी सहयोगी भूमिका से बाहर धकेल रही है।
