पटना, 5 मई 2026। श्रीअरविंद महिला कॉलेज, पटना में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) और स्त्रीकाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कविता पाठ का आज सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय था— “सांस्कृतिक–सामाजिक–राजनीतिक स्पेस में स्त्रियों की भागीदारी: परिदृश्य और उम्मीदें।”
संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. अंजलि प्रसाद ने की। इस अवसर पर अनिता भारती, एडवोकेट अलका वर्मा, डॉ. माधवी, अरुण नारायण और अरुण कुमार सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। संचालन डॉ प्रिया जायसवाल ने किया।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की भागीदारी निश्चित रूप से बढ़ी है, लेकिन इसे और सुदृढ़ एवं सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज जो स्त्री-भागीदारी दिखाई दे रही है, वह अचानक नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे लगभग 100 से 150 वर्षों का लंबा संघर्ष, सामाजिक सुधार आंदोलनों और निरंतर प्रयासों का इतिहास है।

वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा, कानून, सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक चेतना के विस्तार ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अभी भी निर्णय लेने की प्रक्रिया, नेतृत्व के उच्च पदों और नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है।
दिल्ली से आई स्त्रीवाद और दलित अधिकार की प्रवक्ता – चिंतक लेखिका अनिता भारती ने सोशल मीडिया, AI आदि के इस्तेमाल के साथ विद्यार्थियों को इतिहास और ज्ञान से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि
आप इसके जरिए भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदी बाई जोशी, परम्परा से संघर्ष के लिए जानी जाने वाली रखमा बाई, स्त्री शिक्षा की नेतृ सावित्री बाई फुले, पहली दलित लेखिका मुक्ता साल्वे जैसी स्त्रियों के जीवन, संघर्ष और हासिल के बारे में जानें।

एडवोकेट अलका वर्मा ने स्त्रियों की भागीदारी के परिदृश्य को आशावादी नजरिए से देखते हुए कहा कि हम, पहली दूसरी जेनरेशन की महिला कानून के क्षेत्र में हैं। खासकर बहुजन समाज की महिलाएं, लड़कियां आएं हमें अपना पूर्व का जेनरेशन मानते हुए आत्मविश्वास के साथ आएं।
आलोचक और साहित्यकार अरुण नारायण ने महिलाओं के मताधिकार के इतिहास को संक्षिप्त में रखते हुए साहित्य और भाषा में स्त्रियों की भागीदारी से, उनके जाति लोकेशन से अभिव्यक्ति और स्पेस की विविधता पर चर्चा की।
मोकामा में हिंदी के प्राध्यापक एवं आलोचक अरुण कुमार ने स्त्रियों के सामाजिक इकाई होने की बात कही और यह भी कहा कि पुरुष की सत्ता उन्हें अपने ही खिलाफ सोच में जकड़ लेती है। एक अलग किस्म से अच्छी लड़की होने की जिम्मेवारी में बांध देती है। अच्छी लड़की की परिभाषा भी बदल जाती है। कभी स्कूल जाने वाले लड़की को भी समाज का बड़ा हिस्सा अच्छी लड़की नहीं मानता था।

विषय प्रवेश कराते हुए स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि हमें सावधानी से हमारे हासिल मजबूत करना होगा। हमें आज जो सामान्य लगता है वह सौ सालों में संघर्ष से पाया हासिल है। आज से सौ साल पहले महिलाएं डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस नहीं कर सकती थी। कुछ दिन भागलपुर में रहीं कादम्बिनी पहली महिला डॉक्टर थीं। संघर्ष कर, लड़कर 1923 में पहली बार महिला वकालत करने का अधिकार पा सकी। आज भी सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला चीफ जस्टिस बनने में सालों लगेंगे। मताधिकार भी 100 साल पहले नहीं था।
उन्होंने महिलाओं की भागीदारी से भाषा, परिदृश्य सबकुछ सकारात्मक रूप से बदल जाने के उदाहरण दिए और सचेत रूप में इस हासिल को बनाए रखने के लिए और संघर्ष पर जोर दिया।
कविता सत्र में प्रतिभागियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री-अनुभव, संघर्ष और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। अनिता भारती, प्रत्युष चंद मिश्रा, अरुण नारायण,नेहा, प्रतिमा पासवान, सदानंद चौधरी, डॉ सपना ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को संवेदित एवं प्रेरित किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सपना बरुआ ने किया . कार्यक्रम में मंजीत आनंद, वीरेंद्र यादव आदि के साथ बड़ी संख्या में छात्राएं उपस्थित रही।
