सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक प्रतिबंध के समर्थक अंग्रेजी (भयंकर शब्दों में गुंथी अभिव्यक्ति वाली अंग्रेजी ) के विद्वान शशि थरूर की चिंता है कि केरल में ‘पहचान की राजनीति’ के उभार ने वहां सामाजिक संबंधों/ समरसता और शासन के लिए खतरा पैदा किया है। (TharoorThink ( The Indian Express, April 30, 2026)
वाह शशि थरूर वाह ! यह सच है कि भाजपा की बांटने की राजनीति या व्याप्त खाई पर अपने प्रसार/विस्तार की राजनीति ने अस्मिता की राजनीति को और गहराया होगा , लेकिन आप जिस केरल के समाज को या केरल की राजनीति को महिमा मंडित कर रहे हैं उसका सारा सच आप नहीं जानते? जानते हैं लेकिन लगभग समरसता ( आरएसएस की नीति) का गौरव प्रस्तुत करते हुए आप नैरेटिव रच रहे हैं।
क्या केरल में आबादी के बड़े हिस्से की महिलाओं को अधोवस्त्र पहनने पर रोक नहीं थी? क्या ब्रेस्ट टैक्स देने नहीं पड़ते थे, नांगोळी की कथा क्या कहती है ?
क्या नायर घरों में नम्बूदरियों के दर्जनों विवाह होते नहीं थे? क्या कठोर छुआछूत नहीं था। क्या पुलाया जाति से आने वाल अय्यंकाली का आंदोलन, सुधार केरल का इतिहास नहीं है ? क्या उन्हें सार्वजनिक मार्ग अदि का प्रयोग का अधिकार था ? क्या जाति विरोधी नारायण गुरु का सामाजिक आंदोलन सच नहीं है केरल के समाज का ? क्या कोई राजनीति इससे अछूती थी ? हाँ, वामपंथी राजनीति भी और आज आप जिस पार्टी यानी कांग्रेस की, राजनीति कर रहे हैं उसकी भी। क्या यह सच नहीं है कि वैकोम मंदिर में प्रवेश और उसके रास्तों के इस्तेमाल से केरल की बड़ी गैर ब्राह्मण जातियां वंचित की गई थीं और इसके खिलाफ आंदोलन से महात्मा गांधी भी पीछे हट गए थे ?
क्या वामंथियों के किसानों के बीच काम करने और एझवा समुदाय की पहचान के सवाल के उपस्थित होने में कोई विरोधाभाष था ? क्या टिकट बंटवारे में अघोषित रूप से जाति और धर्म के संतुलन नहीं किये जा रहे थे?
शशि थरूर के दावे के विरुद्ध प्रमाण खोजने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। इसका एक स्पष्ट संदर्भ 23 मई 2016 को The Indian Express में प्रकाशित लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट-पोल विश्लेषण में मिलता है, जिसका शीर्षक था — “Why This Vote for Change Was Different” और जिसे संदीप शास्त्री तथा के. एम. साजिद इब्राहिम ने लिखा था। यह लेख स्वयं इस बात के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत करता है कि केरल की राजनीति और चुनावी परिदृश्य में जाति, समुदाय और पहचान की राजनीति लंबे समय से गहराई से अंतर्निहित रही है — ठीक इसके विपरीत उस नॉस्टैल्जिक छवि के, जिसे थरूर अब प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। लेख में कहा गया है, “भाजपा के उभार ने दलों के सामाजिक आधार में भी बदलाव पैदा किया है। ईसाई और मुस्लिम समुदायों को बड़े पैमाने पर यूडीएफ का वोट आधार माना जाता रहा है, जबकि एझवा समुदाय अक्सर एलडीएफ के साथ खड़ा रहा। पिछली चुनावों में नायर समुदाय यूडीएफ की ओर झुक गया था। अब नायर और एझवा वोटों में त्रिकोणीय विभाजन दिखाई देता है, जिसमें भाजपा को नायरों के बीच बेहतर समर्थन मिल रहा है, जबकि यूडीएफ एझवाओं के बीच बेहतर प्रदर्शन कर रही है।”
आपका नैरेटिव है कि केरल की राजनीति विकास आधारित और जाति-मुक्त राजनीति का प्रदेश था ? वाह, क्या सफ़ेद झूठ- ‘ Why I AM A HINDU ‘ का लेखक और महिलाओं के मंदिर प्रवेश-निषेध का समर्थक राजनेता लिख रहा है ? क्या आपके हिसाब से ‘पहचान की राजनीति’ और हमारे हिसाब से अस्मिता बोध और जाति विरोध की राजनीति ने केरल के समाज में बदलाव नहीं किये हैं, जिसे आप जानबूझकर इतिहास से गायब कर रहे हैं ? आप जानबूझकर जाति, जेंडर की पहचान के उभरने और उसकी समतावादी राजनीति का केरल के समाज पर प्रभाव को गायब कर देना चाहते हैं?
क्या मुस्लिम और क्रिश्चन समाज की भिन्नताएं भेद के स्तर पर नहीं थीं ? क्या इन धार्मिक पहचानों के साथ वहां कई संस्थाओं का वजूद नहीं है? आखिर आपको क्यों हिन्दू होने की पहचान के पक्ष में किताब लिखनी पड़ा ? क्या इन्हीं सामाजिक भेदों पर आरएसएस और भाजपा राजनीति नहीं कर रहे, खाई को और गहरा करते हुए ?
