बागमती किनारे बढ़ती प्यास

राइडर राकेश

बागमती किनारे के बाशिंदों का बाढ़ से पुराना नाता रहा है। बाढ़ के पानी और माटी पर बागमती कछार में समृद्धि-कथाएँ लिखी जाती रही हैं। बाढ़ यहाँ की संस्कृति का हिस्सा रही है। बाढ़ का बागमती वालों के लिए मेहमान-सा नाता रहा है। आज आए। कल दोपहर से चलने की तैयारी शुरू कर दी। परसों शाम तक चले गए। कभी ऐसा नुकसान नहीं किया जो याद रहे। न, विस्थापन भी नहीं।

बागमती का इलाका आज अजीब दोराहे पर खड़ा है। पानी अब भी आता है। कभी मेहरबान बनकर। कभी आफत बनकर। कभी कौतूहल भर ही! हकीकत मगर यही है कि यह इलाका अब प्यासा रहने लगा है। चार साल हो गए, प्यास साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। खेत सूखे हैं। कुएँ भरते चले गए। हैंडपंप जवाब दे रहे हैं। पोखर-तालाब घटे हैं। जो हैं वे सूखे रहते हैं। शिवहर, सीतामढ़ी, मुज़फ्फरपुर जिलों में बागमती कछार पर पसरे गॉवों में पानी की कहानी एक सी है। चार सालों में यह संकट और गहरा हुआ है। ये कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे वजहें हैं। बहुत साफ।

सबसे पहली बात। जलवायु बदल चुकी है। बारिश का मिजाज़ बदल गया है। चक्र बदल गया है। पहले जो पानी महीनों में गिरता था, अब कुछ दिनों में गिर जाता है। तेज बारिश होती है। धरती को सोखने का मौका नहीं मिलता। पानी बह जाता है। बाढ़ बनता है। फिर कुछ हफ्तों बाद वही जमीन प्यास से फटने लगती है। अजीब चरम की अवस्था है। एकाएक बहुत ज्यादा पानी। फिर एकदम से कमी। यही असली संकट है।

दूसरी बात। जैव विविधता का नुकसान। पहले मेड़ों पर पेड़ थे। आसपास किस्म-किस्म की झाड़ियाँ थीं। घास थी। ये सब मिलकर पानी को रोकते थे। धीरे-धीरे सोखते थे। अब खेत साफ कर दिए गए हैं। एक ही फसल। एक ही पैटर्न। न पेड़। न परिंदा। न कीड़े। जमीन जिंदा नहीं रही। जमीन जिंदा नहीं रहती तो वह पानी को पकड़कर रख भी नहीं सकती।

तीसरी बात। मिट्टी पर कार्बन की गड़बड़ कहानी। रासायनिक खेती ने मिट्टी को सख्त बना दिया है। जैविक पदार्थ घट गया है। जो कार्बन मिट्टी के भीतर जिंदा रूप में होना चाहिए था, वो अब उस तरह मौजूद नहीं है। ऊपर एक तरह की सख्त परत बन गई है। पानी अंदर नहीं जाता। बह जाता है। यही वजह है कि ग्राउंड वाटर रिचार्ज नहीं हो पा रहा।

चौथी बात। खेती का बदलता ढर्रा। धान-गेहूँ का चक्र। ज्यादा पानी लेने वाली फसलें। ट्यूबवेल पर बढ़ती निर्भरता। धड़ाधड़ बढ़ती बोरिंगें। पानी निकालने की रफ्तार तेज। भरने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। मानो टंकी खाली करते जाएँ और भरने का नल बंद हो।

पाँचवीं बात। नदियों की हालत। बागमती खुद परेशान है। उसका रास्ता सिकुड़ गया है। तटबंधों ने उसे बाँध दिया है। जहाँ उसे फैलना था, वहाँ दीवार खड़ी है। नतीजा ये कि बाढ़ का पानी दबाव बनाकर निकलता है। कहीं टूटता है। कहीं जमता है। और जब उतरता है, तो मोटी गाद छोड़ जाता है। ये गाद भी जमीन की पानी सोखने की ताकत को कम करती है।

छठी बात। पारंपरिक जल स्रोतों का छिजते जाना। पहले हर गाँव में पोखर थे। तालाब थे। गबरे-डबरे थे। ये छोटे-छोटे ढाँचे पानी को रोकते थे। धीरे-धीरे जमीन में उतारते थे। अब ये या तो भर दिए गए हैं, या भुला दिए गए हैं। बारिश का पानी आता है और बिना रुके निकल जाता है।

सातवीं बात। कॉंक्रीटिकरण अब शहरों तक सीमित नहीं रही। उसने गाँव-देहात का रास्ता भी देख लिया है। सड़कें पक्की। आँगन पक्का। छत पक्की। हर तरफ सीमेंट की परत। पक्का मकान की योजनाओं ने इस रफ्तार को और तेज किया है। पहले जहाँ मिट्टी साँस लेती थी, अब वहाँ कंक्रीट जम गया है। पानी के लिए जगह ही नहीं बची। वो जमीन में जाएगा कहाँ? नालियों से भागेगा। तेजी से भागेगा। बाढ़ को और उकसाएगा। मगर धरती खाली ही रहेगी। भूजल नहीं भरेगा।

आठवीं बात। भूजल का अंधाधुंध दोहन। हर साल पानी के सतह की बढ़ती गहराई। 20 बरस पहले 20 फीट पर पानी था। अब कहीं-कभी 60 फीट पर। वरना औसतन150-200 फीट पर। ये गिरावट खतरनाक है। जमीन का पानी रिचार्ज नहीं होगा तो ये सिलसिला चलता रहेगा। एक दिन बोरिंग भी बेकार हो जाएगी।

नौवीं बात। नीति और समझ का फर्क। हमने पानी को सिर्फ संकट के वक्त याद किया। बाढ़ आई तो राहत। सूखा पड़ा तो टैंकर। मगर बीच के समय में कोई गंभीर योजना नहीं। न जल संरक्षण की ठोस पहल। न सामुदायिक जिम्मेदारी। न स्थानीय ज्ञान का इस्तेमाल।

अब सवाल उठता है कि रास्ता क्या है।

रास्ता आसान नहीं है। मगर है। सबसे पहले जमीन को जिंदा करना होगा। जैविक पदार्थ बढ़ाना होगा। गोबर। कम्पोस्ट। हरी खाद। इससे मिट्टी मुलायम होगी। पानी सोखेगी। जैव विविधता को फिर से समृद्ध करना होगा। खेत को फिर से जंगल की तरह सोचना होगा। एक फसल नहीं। कई फसलें। पेड़, झाड़ियाँ, घास: सब साथ। कीड़े लौटेंगे। परिंदे लौटेंगे। जमीन जिंदा होगी। और जब जमीन जिंदा होगी, तभी पानी ठहरेगा।

इसके साथ-साथ पानी को रोकने की छोटी-छोटी तरकीबें भी जरूरी हैं। हर खेत में मेड़ मजबूत करनी होगी। मेड़ पर घास और पेड़ लगाने होंगे। बारिश का पानी खेत में ही रुके। धीरे-धीरे नीचे जाए। गाँव में छोटे-छोटे गड्ढे। सोख्ता। कूँओं का पुनर्जीवन। छत का पानी भी बेकार न जाए। उसे जमीन में उतारने का इंतजाम हो। वर्षा जल संचय की व्यवस्था भी।

चरागाह और खुली जमीन को बचाना होगा। हर जगह पक्का बना देना हल नहीं है। कुछ जगहों को सांस लेने के लिए छोड़ना होगा। यही जगहें पानी को जमीन तक पहुँचाती हैं।

नदी के साथ रिश्ता भी बदलना होगा। ये उसे बाँधकर नहीं हो सकता। उसे समझकर सहजीवन से होगा। जहाँ उसे फैलने की जरूरत है, वहाँ जगह देनी होगी। बाढ़ के पानी को दुश्मन की तरह दुत्कारना या डराना नहीं होगा। बढ़ के पानी को मेहमान की तरह संभालना होगा।

सबसे जरूरी, पानी को सिर्फ सरकार का काम समझना बंद करना होगा। समुदाय तय करे। गाँव खुद तय करे। पंचायत मिलकर काम करे। पानी बचाने का काम जितना स्थानीय होगा, उतना ही असरदार होगा।

यह धरती पानी से खाली नहीं है। बस पानी को ठहरने की जगह नहीं मिल रही। पानी आता है। हम उसे रोक नहीं पाते। बहने देते हैं। सहेज नहीं पाते। यही भूल है। लिहाज़ा वक्त की ज़रुरत है कि हम खेती के अपने तरीके बदलें। जमीन को जिंदा करें। पानी को ठहरने दें। उसे अपना बनाएं। वरना आने वाले दिनों में बागमती के किनारे रहने वाले लोग पानी के बीच खड़े होकर भी प्यासे ही रह जाएंगे।

(राइडर राकेश जेंडर सापेक्षता, क्लाइमेट रेसिलियेंस और क्लाइमेट एजुकेशन के प्रति समर्पित एक लेखक, शोधार्थी और किसान हैं। फ़िलहाल वे तरियानी छपरा, शिवहर में रहते हैं।)

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