ग्राउंड स्टोरी:मनोरमा सिंह
कर्नाटक का विजयपुरा (पूर्व नाम बीजापुर) राज्य के सबसे सूखाग्रस्त जिलों में से एक रहा है। बल्कि इसे कर्नाटक का जैसलमेर कहा जाता था। लेकिन 2016 में हुई एक शुरुआत ने 2026 तक आते आते सूखे को हरियाली में बदल दिया, भूमिगत जलस्तर को कई तालुके में साल दर साल बेहतर किया। लगातार यहाँ की AQI या एयर क्वालिट बेहतर हुई है। साथ ही तापमान में 0.6°C से 2-3°C तक की कमी दर्ज हुई। हालाँकि बीजापुर अपने 51 मीटर ऊँचे गोल गुम्बज (जो विश्व के सबसे बड़े बिना सहारे वाले गुंबदों में से एक है और वैसे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुंबद है) के लिए प्रसिद्ध है लेकिन अब इसकी चर्चा इसकी हरियाली के कारण हो रही है, अंतर्राष्ट्रीय अख़बारों में एक केस स्टडी के तौर पर यहाँ के ग्रीन इनिसिएटिव का जिक्र हो रहा है।
आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई?
संतोष अजूर, जो विजयपुरा में रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (आरएफओ) हैं और कोटि वृक्ष अभियान (मिलियन ट्रीज़ मूवमेंट) का नेतृत्व करते हैं बताते हैं, साल 2016 की गर्मियों में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री एम.बी. पाटिल को एक फॉरेस्ट अधिकारी ने बताया कि विजयपुरा का फारेस्ट कवर सिर्फ 0.17% है जबकि पूरे कर्नाटक का औसत फारेस्ट कवर 20% से कुछ ज्यादा ही था। इस जानकारी ने उन्हें तुरंत इस पर कार्य करने को बाध्य कर दिया और यहीं से विजयपुरा के कोटि वृक्षा अभियान की शुरुआत हुई। जिसमें एम.बी.पाटिल के साथ फॉरेस्ट अधिकारियों, अलग अलग विभागों, स्कूल कॉलेज के बच्चों, छात्रों, आम लोगों, पंचायतों और कई एनजीओ सबने मिलकर काम करना शुरू किया।
एम.बी. पाटिल ने जिले के तीन वन विभागों टेरिटोरियल, सोशल फॉरेस्ट्री और केबीजेएनएल समेत 50 से ज्यादा एनजीओ, शिक्षा-संस्थानों, किसानों, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों को इस अभियान के साथ जोड़ा। एक नॉन-प्रॉफिट संगठन बनाया गया ताकि सरकारी प्रक्रियाएं तेज हों सके। इसके कार्यान्वयन के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये जुटाए गए थे और सरकारी के अलावा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी ) मॉडल से भी अभियान के लिए पर्याप्त फण्ड जुटाया गया। एमबी पाटिल दूसरे मंत्रालय में होने के बाद भी इस अभियान से जुड़े हैं और सरकारी के साथ निजी स्तर पर भी लगातार मदद करते रहे हैं। एक अच्छी बात अन्य सरकारी विभागों का इस अभियान के लिए बेहतर संयोजन और सहयोग भी है, राजस्व विभाग से वन लगाने के लिए जमीन इसलिए आसानी से मिल जाती है।

अभियान की चुनौतियों में सबसे पहले सिंचाई, बंजर अनुपजाऊ मिट्टी और पौधों का सर्वाइवल था। विजयपुरा के स्थानीय पत्रकार फिरोज रोजींदार कोटि वृक्षा अभियान की सफलता को सबसे पहले एम बी पाटिल के द्वारा 2016 से भी पहले बतौर सिंचाई मंत्री किये गए सिंचाई और जल प्रबंधन के कार्यों से जोड़कर देखते हैं और बताते हैं कि जिले की लगभग 60 फीसदी कृषि भूमि सिंचित भूमि की श्रेणी में है इससे लम्बे समय में पेड़ लगाने के साथ खेती करना भी आसान हुआ है। वो कहते हैं आज बीजापुर अरहर दाल के उत्पादन में राज्य में दूसरे स्थान पर आता है इसके अलावा पारम्परिक मोटे अनाजों की खेती के साथ बीजापुर नीम्बू, अनार, गन्ना, आम इन सभी के उत्पादन में आगे आ रहा है। क्या इससे किसानों की आमदनी, रोजगार में फर्क आया है? फिरोज कहते हैं ऐसा कोई अध्ययन नहीं है लेकिन एग्रो फॉरेस्ट्री से किसानों की आमदनी के नए स्रोत बने हैं और सिंचाई की सुविधा ने खेती -किसानी में मजदूरों के कार्यदिवस में बढ़ोतरी की है। और इसकी तस्दीक संतोष अजूर भी करते हैं और इस अभियान के संयोजक प्रोफ़ेसर मुरुगेश पट्टनशेट्टी भी। अक़्वा डक्ट को यहाँ लोग आधुनिक समय का गोल गुम्बज जैसा बड़ा निर्माण कहते हैं। वैसे इस शहर में आदिलशाही के समय से ही जल संग्रह तालाबों, नहरों और जलसेतु का जाल मौजूद था जिसे बाद में अलमाटी डैम के अलावा खासतौर पर एमबी पाटिल ने अक़्वा डक्ट और नहरों के मार्फ़त और बेहतर किया।
संतोष अजूर बताते हैं, हमने चरणबद्ध तरीके से काम किया और सबसे ज्यादा फोकस पौधों के सर्वाइवल पर रहा। सामान्य प्लांटेशन में सर्वाइवल रेट 60-70% होता है, लेकिन यहां 95-98% पौधे जिंदा रहे। पहले 14 सरकारी नर्सरी बनाई गईं।दो सौ से ज्यादा देसी (नेटिव) प्रजातियों पर फोकस किया गया नीम, बरगद, पीपल , अंजीर, आम, इमली, पीपल, बरगद, जामुन, चन्दन, बांस आदि। फलदार पेड़ों को प्राथमिकता दी ताकि किसानों को लाभ हो। पौधे 25-80 किलो के बड़े बैगों में उगाए गए जिसमें मिट्टी में नमी बरकरार रहती है। सब्सिडाइज्ड रेट पर या फ्री में किसानों और आम लोगों में पौधा वितरण किया गया (1-10 रुपये प्रति पौधा) CSR के तहत कंपनियोन को शामिल किया गया। उपहार में पौधे देने को प्रचारित किया गया, स्कूलों में वृक्षारोपण के साथ बच्चों को चॉकलेट देकर प्रोत्साहित किया गया। कम्युनिटी पार्टिसिपेशन के तहत ‘जन्मदिन पर पेड़ लगाओ’, रक्षाबंधन के दिन ‘वृक्ष बंधन, अप्रैलकूल, कैंपेन, शादियों में गुलदस्ते की जगह पौधा गिफ्ट, ‘वृक्षाथॉन’आदि शुरू किया गया।
सिंचाई की मौजूदा सभी सुविधा के अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाला ड्रिप इरिगेशन सिस्टम अपनाया गया जिसमें पानी की बर्बादी लगभग नहीं होती है। मियावाकी मेथड को भी अपनाया गया। कृष्णा नदी के पानी को पाइपलाइन और अक़्वा डक्ट से जिले के पुराने तालाबों, झीलों और कुओं में मोड़ा गया। सदियों पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया। फिर देखभाल और सस्टेनेबिलिटी 24 घंटे निगरानी, निरिक्षण और मेंटेनेंस पर ध्यान दिया गया। किसानों को एग्रोफॉरेस्ट्री से जोड़ा गया , फसल (गन्ना, कपास) के साथ पेड़ लगाने से उनकी आय बढ़ी। एंटी-पोचिंग टीम बनाई गई, फॉरेस्ट गार्ड्स को इंश्योरेंस दिया गया।

भूतनाल झील जहां 545 एकाद बिलकूल पथरेली और बंजड़ जमीन पर ड्रिप सिंचाई से जंगल उगाया गया
संतोष अजुर कहते हैं, विजयपुरा 10 लाख हेक्टेयर के साथ कर्नाटक का दूसरा सबसे बड़ा जिला है जिसमें 0 .17 या 1700 हेक्टेयर नोटिफाइड फारेस्ट है और 8 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है। बाकी 2 लाख हेक्टेयर जमीन ही बाकी और जरूरतों और वृक्ष अभियान के लिए है। सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि इस अभियान से हर साल लगभग 247 एकड़ जमीन फारेस्ट कवर में बदल रहा है। जिसके तहत गांवों में कम्युनिटी फॉरेस्ट ब्लॉक, स्कूल-कॉलेज, सड़क किनारे, कब्रिस्तान, निजी खेतों में एग्रोफॉरेस्ट्री, पहाड़ियों पर रोपण किया जा रहा है। मामादपुर आरक्षित वन इस अभियान का सबसे प्रमुख क्षेत्र है। यहाँ 600 एकड़ से अधिक बंजर भूमि को हरे-भरे वन में बदला गया है, और 60,000 से अधिक देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा विजयपुरा शहर के बाहरी इलाकों में बड़े शहरी वन विकसित किए गए हैं। टिकोटा और बबलेश्वर तालुका के ग्रामीण इलाकों में भी बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है। दोमानल गाँव की बंजर पहाड़ियों को हरा-भरा किया गया है।
भूतनाल झील के पास अब 547 एकड़ में नीम, पीपल, बरगद, पाइकस जैसे लगभग 67 हजार स्थानीय पेड़ों का हरा -भरा जंगल तैयार है लेकिन नौ साल पहले यह बिल्कुल बंजर जमीन थी चट्टानों से भरी हुई राजस्व विभाग की जमीन को इस अभियान ने वन भूमि में बदल दिया, चट्टानों को ब्लास्ट करके तोड़ा गया और झील के गाद या सिल्ट को मिट्टी की तरह भरा गया, ख़ास बात ये है कि जंगल पूरी तरह से ड्रिप इरिगेशन से सिंचित है, अस्सी के करीब एचपी पम्प हैं और ढ़ाई लाख लीटर पानी का इस्तेमाल होता है, ड्रिप मॉडल से पहले टैंकर से पानी डाला जाता था। मुरुगेश कहते हैं यहाँ अब 180 प्रजाति की चिड़िया देखी जा सकती हैं, इसके अलावा एक दर्जन से ज्यादा दुर्लभ सांप और सियार, लोमड़ी, तीतर, खरगोश जैसे जानवर भी हैं।
संतोष अजुर कहते हैं, बीजापुर के ग्रीन कवर में नरेगा और मनरेगा का भी बहुत बड़ा हाथ है, और हम ये गर्व से कह सकते हैं कि मनरेगा का बहुत प्रभावी तरीके से हमने इस्तेमाल ग्रीन कवर विकसित करने में किया। तो क्या मनरेगा में बदलाव से क्या इस अभियान पर फ़र्क़ पड़ेगा? संतोष कहते हैं मुझे नहीं लगता इससे कोई फ़र्क़ पड़ेगा, अभी नए बदलाव के तहत काम नहीं लिया गया है।
ग्रीन मैराथॉन जिसे वृक्षाथॉन कहते हैं इस अभियान को लेकर जागरूकता और फण्ड के लिए एक सालाना आयोजन है जहाँ 23 हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया इसके अलावा यहाँ के सीटिंग एमएलए बसनागौड़ा आर. पाटिल हर साल इसमें हिस्सा लेते हैं और अपनी ओर से 10 लाख से ज्यादा राशि का सहयोग इस अभियान के लिए करते हैं, और वृक्षाथॉन को स्पांसर भी करते हैं। ये भी उल्लेखनीय है कि यहाँ पिछले चार टर्म से भाजपा के सांसद हैं और 8 विधायकों में 6 कांग्रेस के और 1-1 भाजपा और जेडीएस के हैं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता राज्य में किसी की भी पार्टी की सरकार रही हो लेकिन पेड़ लगाने का यह अभियान बगैर रोक टोक के जारी रहा है। मुरुगेश इसके पीछे एक ख़ास प्रेरणा का जिक्र करते हैं और कहते हैं सिद्धगंगा मठ के दिवंगत प्रमुख डॉ. शिवकुमार स्वामीजी जिन्हें यहाँ लोग “नदेदादुवा देवरु” (चलते-फिरते भगवान) कहते रहे हैं, उन्होंने शिक्षा और समाजसेवा के जरिए बीजापुर (विजयपुरा) इलाके में बहुत बड़ा बदलाव किया , खासकर गांवों के विकास और गरीब लोगों की मदद करने में। किसी भी राजनीतिक विचारधारा, जाति धर्म से अलग यहाँ के लोगों और राजनीतिज्ञों में कोटि वृक्षा अभियान के प्रति प्रतिबद्धता के पीछे वो एक सशक्त प्रेरणा रहे हैं।सफलता की एक और बड़ी वजह संतोष पौधों की कैजुअल्टी कम होना बताते हैं। लगभग 15 नर्सरी में पौधे तैयार होते हैं, जिसमें बरगद, इमली, चन्दन, पाइकस , जामुन, मिस्वाक, महोगनी, बांस, जैसे पौधे तैयार किये जाते हैं लेकिन बरगद और इमली जैसे पौधों को तीन साल तक नर्सरी में ही रखा जाता है वो भी 25 X 25 के बड़े बैग में, बाकी पौधे भी एक -दो साल नर्सरी में रहते हैं, इसके कारण पौधे दूसरी जगह लगाने पर मरते नहीं हैं। इस अभियान की सफलता इन नर्सरियों के मार्फ़त निः शुल्क या बहुत कम कीमत पर पौधों का वितरण भी है।

संतोष बताते हैं, अपने स्तर पर पेड़ लगाने के लिए पौधों के लिए यहाँ लोगों की लम्बी लाइन लगती है ।
मुरुगेश इस अभियान की सफलता ये भी मानते हैं कि देखिये महाराष्ट्र के 170 अधिकारी यहाँ से प्रशिक्षण लेकर गए और अब देखिये वहां मुख्यमंत्री ने 300 करोड़ पेड़ लगाने के अभियान की घोषणा की है। हम इसे सकरात्मक असर मान सकते हैं। अब आगे पांच करोड़ पेड़ लगाने के लिए आप लोगों की क्या योजना है ? संतोष बताते हैं , अभी निर्देश नहीं आया है लेकिन यह आइडिया के तौर पर सरकार के द्वारा जाहिर किया जा चूका है।
वैसे बीजापुर शहर में हरियाली बढ़ी है यह पूछने पर स्थानीय निवासी और गोल गुम्बज में कर्मचारी सविता ( नाम परिवर्तित ) बताती है बढ़ी है लेकिन पिछले चार -पांच साल में निर्माण कार्यों में बढ़ोतरी के कारण शहर के पेड़ कटे भी हैं। इसके जवाब में एक और स्थानीय निवासी सतीश कहते हैं लोगों को चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर भी चाहिए आखिर इसके लिए पेड़ काटेंगे ही। लेकिन संतोष अजुर कहते हैं इस अभियान ने लोगों को पहले से बहुत अधिक जागरूक किया है, बीजापुर में पेड़ काटने के लिए वन विभाग की अनुमति नहीं चाहिए लेकिन फिर भी लोग पेड़ कटते देखने पर हमारे हेल्पलाइन पर फ़ोन करते हैं। स्टेशन रोड पर हमने अपने हस्तक्षेप से सौ साल से ज्यादा पुराने चार इमली के पेड़ को बचाया जो सड़क निर्माण के दौरान अनिवार्य रूप से काटे जाने थे। लेकिन हमेशा यह संभव नहीं है, संतुलन जरूरी है और पुराने पेड़ों के बदले नए पेड़ लगाकर क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती उसमें पचास, सौ साल लगेंगे। संतोष अजुर बताते हैं पेड़ों का प्रत्यारोपण या ट्री ट्रांसप्लांटिंग सभी प्रजाति के वृक्षों में सफल नहीं होता अतः उन्हें कटने नहीं देना ही सबसे बढ़िया विकल्प है। निर्माण कार्यों के लिए शहर में साल में 300 -400 पेड़ जरूर कटते हैं इसकी भरपाई निर्माण में शामिल पार्टी को ज्यादा जवाबदेह बनाकर ही किया जा सकता है।
लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि इस अभियान के कई प्रकृति प्रेमी हीरोज में से एक 71 वर्षीय सेवानिवृत्त जिला पंचायत अधीक्षक एन.डी. पाटिल जैसे लोग भी हैं जो बीजापुर में “डोमनल के हरित पुरुष” के रूप में जाने जाते हैं, उन्होंने अपने रिटायमेंट के पैसे लगाकर एक बंजर पहाड़ी को नीम, अंजीर और जामुन जैसे स्थानीय प्रजाति के पेड़ों से हरे-भरे जंगल में बदल दिया है। इस जंगल को तैयार करने में उन्होंने शुरूआती तीन -चार साल एक एक पौधे की खुद से देखभाल की ताकि पौधे बच सकें और बढ़ सकें। फिरोज बताते हैं ऐसे कई छोटे छोटे प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं जिसमें लोग अपने घर में उपलब्ध थोड़ी सी भी खाली जमीन पर पेड़ लगा रहे हैं। खुद से देखभाल की ताकि पौधे बच सकें और बढ़ सकें। फिरोज बताते हैं ऐसे कई छोटे छोटे प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं जिसमें लोग अपने घर में उपलब्ध थोड़ी सी भी खाली जमीन पर पेड़ लगा रहे हैं।
साढ़े 500 एकड़ ड्रिप सिंचाई वाला जंगल जो नौ साल के अथक परिश्रम और ड्यूटी से बढ़कर कमिटमेंट और लोगों की भागीदारी से तैयार हो रहा है! राजस्व विभाग की ये जमीन अब फॉरेस्ट लैंड है!


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