हंस ब्राह्मणवाद के यम ही नहीं,डाइवर्सिटी आंदोलन के स्तम्भ भी रहे!


— एच. एल. दुसाध

पुरखे बुद्ध शरण हंस का हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना

22 जनवरी की शाम हिंदी पट्टी की आंबेडकरवादी दुनिया स्तब्ध रह गई, जब पाँच बजे के करीब सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हुई कि महान बहुजन लेखक बुद्ध शरण हंस ने पटना एम्स में अंतिम सांस ली! किसी आंबेडकरवादी लेखक के निधन पर हिंदी पट्टी में शोक की ऐसी लहर इसके पूर्व नहीं देखी गई। उसके बाद तो उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए सोशल मीडिया पर सैलाब ही आ गया!

उनके परिनिर्वाण की खबर पाकर आम से लेकर खास लोगों ने तरह-तरह से उनके अवदानों को स्मरण करना शुरू किया, जिनमें डॉ. जय प्रकाश कर्दम, डॉ. विजय कुमार त्रिशरण, प्रो. विलक्षण बौद्ध, संजीव चन्दन, प्रो. हेमलता महिश्वर, मुसाफिर बैठा, हीरालाल राजस्थानी, सत्येन्द्र पासवान, प्रमोद पासवान, अनुराग दुसाध, डॉ. दिनेश पाल, डॉ. कर्मानंद आर्य, विधायक ललन पासवान, डॉक्टर एम.एल. परिहार, इंजी. हरिकेश्वर राम, मुनेश राम, प्रो. कालीचरण स्नेही इत्यादि जैसे बड़े-बड़े लेखक, शिक्षाविद, एक्टिविस्ट भी रहे।

इनकी भावना का उपयुक्त प्रतिबिम्बन प्रख्यात लेखक डॉ. सिद्धार्थ रामू के इन शब्दों में हुआ। डॉ. सिद्धार्थ ने ‘पुरखे बुद्ध शरण हंस का हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना’ शीर्षक से फेसबुक पर लिखा—

‘यह सच है कि ब्राह्मणवाद के चाक-चौबंद किले में कैद दलितों की मुक्ति का द्वार आधुनिक युग में फुले दंपत्ति ने खोला था। उस द्वार को शाहू महाराज ने और चौड़ा किया। बाबा साहेब ने उसे एक विशाल हाईवे में बदल दिया। पर, जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे!

बुद्ध शरण हंस जैसे लाखों मिशनरी लोगों ने यदि बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी न लगाई होती, तो हम आज जहां खड़े हैं, हमारे पास प्रतिवाद, प्रतिरोध और संघर्ष की जो शक्ति और आवाज है, वह नहीं होती। बुद्ध शरण ने बाबा साहेब के आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की। आईएएस बने, पर उन्होंने कभी इसका गुमान नहीं पाला कि वे आईएएस हैं। उनके लिए यह पद बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने का एक साधन था, व्यक्तिगत अहंकार और पद-प्रतिष्ठा का विषय नहीं।

उन्होंने इस उपलब्धि को कभी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना। वे हमेशा बातचीत में कहते थे कि यदि फुले-शाहू जी और बाबा साहेब ने संघर्ष न किया होता, तो हम आज भी अपने बाप-दादों (पुरखों) की तरह हलवाही कर रहे होते या सफाई कर्मी होते। उनके दिल-दिमाग में स्पष्ट था कि उन्हें जो कुछ पद-प्रतिष्ठा और धन के रूप में मिला है, वह बाबा साहेब और अन्य नायकों के नेतृत्व में चले सामूहिक संघर्षों की देन है। यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है।

इसके चलते उन्होंने अपनी योग्यता, क्षमता, प्रतिभा और कमाई को दलित-बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया। जो कोई भी उनसे मिला होगा, उसे इसका अहसास होगा कि उनसे मिलकर लगता ही नहीं था कि यह व्यक्ति इतना बड़ा भारत सरकार का अधिकारी है या रहा है। बुद्ध शरण हंस एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह मिशन के साथी थे।

मैं बड़ा हूं, तू छोटा है; मैं अफसर हूं, तो चपरासी—यह कभी उनके व्यवहार में नहीं दिखता था। उनका झोला पुस्तकालय, उनकी छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं और उनकी किताबें किसी विद्वान के विद्वतापूर्ण उपदेश नहीं थीं, बल्कि इस चिंता से प्रेरित थीं कि कैसे सहज-सरल और सामान्य तरीके से बाबा साहेब और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाया जाए, और कैसे ब्राह्मणवाद से पूर्ण मुक्ति का रास्ता प्रशस्त किया जाए।

ब्राह्मणवाद के चंगुल से दलित-बहुजन मुक्ति के संघर्ष में लगे हममें से बहुत सारे लोग यह शायद भूल रहे हैं कि लाखों बुद्ध शरण हंस इस देश में दलित-बहुजनों के मुक्ति संघर्ष की नींव में खपे, तब जाकर हम आज इस स्थिति में हैं कि ब्राह्मणवाद को हर स्तर पर चुनौती दे सकते हैं।

बुद्ध शरण हंस मेरे लिए मेरे परदादा की तरह थे—सिर्फ वैचारिक और संवेदनात्मक स्तर पर ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी। परदादा की तरह का स्नेह, उसी तरह का ख्याल, उसी तरह की प्रेरणा देने वाले। पटना जाने पर करीब तीन-चार बार ही उनसे मिल पाया, पर उनका फोन अक्सर आ जाता था—इस विषय पर भी लिखो, उस विषय पर लिखो, तुम अच्छा लिखे हो।

निजी बात यह कि वे उन लोगों में से थे, जो पूछते थे—घर में रोटी बन रही है या नहीं; जेब में दो रुपये हैं या नहीं; कोई दिक्कत तो नहीं है, बताओ? बच्ची कैसी है?

पुरखे बुद्ध शरण हंस को सादर नमन के साथ अंतिम अलविदा।’

बुद्ध शरण हंस को अंतिम जोहार!
उनके अवदानों से धन्य पटना के आंबेडकरवादियों ने अभूतपूर्व भावभीनी विदाई दी। इस लेखक को हंस साहब के बेहद करीबी चर्चित लेखक मुसाफिर बैठा ने बताया कि घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए ढाई सौ से अधिक लोग उपस्थित रहे। घर पर उनका अंतिम दर्शन करने के लिए हजार से अधिक लोग आए। उनके अंतिम दर्शन के लिए पटना के बुद्ध विहार में भी सैकड़ों की संख्या में लोग आए!

उनकी अंतिम विदाई का मार्मिक वर्णन चर्चित पत्रकार अरुण नारायण ने ‘बुद्ध शरण हंस सर को अंतिम जोहार!’ शीर्षक से इन शब्दों में किया है —

‘22 जनवरी, 2026 को हिन्दी समाज ने एक साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सजग विवेक और एक निर्भीक वैचारिक पहरेदार को खो दिया। बुद्ध शरण हंस का जाना आज के इस अंधकारमय, फासीवादी समय में उस आवाज़ का मौन हो जाना है, जो सत्ता, सुविधा और समझौतों के विरुद्ध आजीवन खड़ी रही। यद्यपि उन्होंने एक पूरा जीवन जिया, पर उनकी अनुपस्थिति हाशिये के समाज के लिए एक गहरी रिक्ति है—एक ऐसी चुनौती, जिसे वे स्वयं जीवन भर गढ़ते और साधते रहे।

एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए भी उन्होंने कभी सत्ता की चुप्पी को अपना आभूषण नहीं बनाया। पद, प्रतिष्ठा और सुविधा उनके लिए कभी विचारों का विकल्प नहीं बने। अंबेडकर मिशन पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने फुले, पेरियार और आंबेडकर की परंपरा को केवल स्मरण की वस्तु नहीं, बल्कि संघर्ष की जीवित धारा बनाए रखा। अर्जक साहित्य को बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और मध्य प्रदेश तक पहुंचाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक थी।

वे उन विरले व्यक्तित्वों में थे, जिनके विचार और जीवन के बीच कोई फांक नहीं थी। समता और न्याय पर आधारित समाज का सपना उन्होंने केवल देखा ही नहीं, उसे जिया। अर्जक, बौद्ध और आंबेडकरवादी चेतना को उन्होंने अकादमिक विमर्श की सीमाओं से निकालकर जनभाषा, जनसाहित्य और जनसंघर्ष का औज़ार बनाया। हिन्दी कहानी, आत्मकथा और जीवनी विधा को उन्होंने जिन जमीनी अनुभवों से समृद्ध किया, उसका सम्यक मूल्यांकन अभी शेष है—और वह मूल्यांकन आने वाले समय की वैचारिक जिम्मेदारी है।

पिछले दस–बारह दिनों से वे एम्स में भर्ती थे। उनके निधन की सूचना जैसे ही फैली, पूरा बहुजन समाज स्तब्ध रह गया। उनकी अंतिम यात्रा भी उनके विचारों की ही प्रतिछाया थी—आंबेडकर और जोतीराव फुले की तस्वीरों व उद्धरणों से सजा मुक्ति रथ, उनके आवास बुद्धा सिटी हॉस्पिटल, विष्णुपुरी, चितकोहरा से निकलकर गौतम बुद्ध विहार (दारोगा राय मार्ग) पहुंचा।

‘जय भीम’ और ‘जीवन-मरण सत्य है’ के नारों के बीच हुई जनसभा में लोगों ने उन्हें स्मृतियों, संघर्षों और संकल्पों में याद किया। इसके बाद कारवां बांसघाट पहुँचा, जहां बौद्ध परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस यात्रा में उनके सुपुत्र डॉ. यशपाल और डॉ. आनंद दीप सहित फुले–आंबेडकरवादी परिवार के सैकड़ों साथी शामिल थे।

उनकी शवयात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण था कि जो लोग निस्वार्थ भाव से समाज-निर्माण में लगे रहते हैं, समाज उन्हें सम्मान, स्मृति और कृतज्ञता के रूप में अपना प्रतिदान अवश्य देता है। हिन्दी के बौद्धिक परिसर में—विशेषकर बहुजन और अर्जक समाज के बीच—बुद्ध शरण हंस ने तर्कशीलता, वैज्ञानिक चेतना और नैतिक साहस की जो मशाल जलाई, वह बुझी नहीं है। वह मशाल अब हम सबके हाथों में है!’

निहायत ही अर्थाभाव में शिक्षा को मुक्ति का हथियार बनाए बुद्ध शरण हंस ने
पत्रकार अरुण नायर ने सही कहा कि बुद्ध शरण हंस ने तर्कशीलता, वैज्ञानिक चेतना और नैतिक साहस की जो मशाल जलाई, वह बुझी नहीं है। वह मशाल अब हम सबके हाथों में है! उनके परिनिर्वाण के बाद दर्जन भर से अधिक लेखक, शिक्षाविदों, एक्टिविस्टों से मेरी बात हुई—सब में उनके जलाए मशाल को आगे बढ़ाने का संकल्प पाया। उनकी तर्कशीलता और वैज्ञानिक चेतना की मशाल हम कैसे जलाए रखेंगे, इसका रोडमैप जल्द ही सामने आएगा!

बहरहाल, आंबेडकरी आंदोलन में दादा-परदादा और अभिभावक की हैसियत रखने वाले बुद्ध शरण हंस ने 8 अप्रैल, 1942 को गया जिला के वजीरगंज अंतर्गत तिलोरा गाँव को अपने जन्म से धन्य किया था। निहायत ही गरीबी में रहकर उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर के “शिक्षित बनो” आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की, आईएएस बने और वर्ष 2000 में श्रम विभाग के विशेष सचिव के पद से सेवा-निवृत्त हुए।

उन्होंने कितने अभावों में रहकर शिक्षार्जन किया, इसकी जानकारी देते हुए एक चैनल पर कहा था, ‘स्कूल से आने के बाद मैं सबसे पहले घर का चूल्हा देखता था। अगर चूल्हा गरम मिलता, तब विश्वास हो जाता कि आज खाना मिलेगा। ठंडा मिलने पर मन मारकर थोड़ा आराम करता और फिर पढ़ाई में जुट जाता!’

आंबेडकरवादी चिंतन में ‘दलित’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। ढेरों लोग इस शब्द की उत्पत्ति के लिए सत्तर के दशक को चिन्हित करते हैं, किन्तु हंस साहब के साथ यह जन्म से जुड़ गया था। उनके बड़े भाई ने उनका नामकरण ‘दलित प्रसाद’ के रूप में किया था, जिसे बाद में उनके प्राइमरी स्कूल के प्राध्यापक ने ‘दलित पासवान’ कर दिया। किन्तु आंबेडकरवादी चेतना विकसित होने के बाद, सत्तर के दशक की शुरुआत में, उन्होंने बौद्ध धर्म अंगीकार करने के बाद इस नाम का परित्याग कर ‘बुद्ध शरण हंस’ नाम धारण किया।

वे साहित्य सृजन के जरिए इस नाम को भारतमय इतना विख्यात कर गए कि उनके चाहने वाले उनकी अंतिम यात्रा में बार-बार यह नारा उछालते रहे—
‘जब तक सूरज चाँद रहेगा – बुद्ध शरण हंस का नाम रहेगा!’

हंस का साहित्य सृजन आत्म-प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बहुजन मुक्ति को समर्पित रहा

हंस साहब हिंदी दलित साहित्य की शुरुआत करने वाले चुनिंदा साहित्यकारों में एक रहे। उन्होंने साहित्य की प्रायः हर विधा—कविता, कहानी, आत्मकथा, निबंध, यात्रा-वृत्तांत—पर कलम चलाया। किन्तु साहित्य उनके लिए आत्म-प्रतिष्ठा का सुखबोध एन्जॉय करने का जरिया नहीं रहा। उन्होंने इस बात का जरा भी प्रयास नहीं किया कि उनकी किताबें प्रतिष्ठित लाइब्रेरियों में जगह पाएं या उनकी किताबें कोर्स में लगें।

उनके समकालीन ही नहीं, उनसे प्रेरणा लेकर साहित्य सृजन में जुटे ढेरों दलित साहित्यकारों की किताबें विश्वविद्यालयों के कोर्स में लगी हैं, लेकिन यह सुखद संयोग हंस साहब के साथ नहीं है। अरुण नारायण जी ने उनके विषय में ठीक ही लिखा है कि, ‘आंबेडकरवादी चेतना को उन्होंने अकादमिक विमर्श की सीमाओं से निकालकर जनभाषा, जनसाहित्य और जनसंघर्ष का औज़ार बनाया!’

इस विषय में डॉ. सिद्धार्थ रामू का यह कथन काबिले-गौर है कि जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे। सच में, हंस साहब ने साहित्य को वंचित-बहुजनों तक फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के बहुजन-मुक्ति के संदेश को पहुँचाने का जरिया बनाया।

इस दिशा में और लोगों ने भी प्रयास किया, किन्तु हंस साहब का प्रयास बहुत विरल इसलिए रहा क्योंकि उन्होंने फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सिर्फ साहित्य-सृजन ही नहीं किया, बल्कि इससे आगे बढ़कर उन्होंने इसके प्रकाशन व वितरण का चुनौतीपूर्ण काम भी अंजाम दिया। इस क्रम में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण काम दिखता है—पुस्तकों का वितरण!
यह काम सुचारू रूप से चल सके, इसके लिए उन्होंने अपनी जीवन-संगिनी कान्ति बाला के साथ अपने दोनों डॉक्टर पुत्रों और बहुओं को भी लगा दिया। एक बड़े अधिकारी होकर भी अपने परिवार के साथ सड़कों, मेलों इत्यादि में उन्हें स्टॉल लगाते देख लोग विस्मित होते। पूरे परिवार को आंबेडकरी मिशन में लगाने के कारण ही वह 1993 से लेकर अपने जीवन के शेष दिनों तक आंबेडकर मिशन पत्रिका का सफलतापूर्वक प्रकाशन और वितरण कर सके।

किताबों के जरिए फुले-आंबेडकर का संदेश गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए वह मुकदमे झेलने के बावजूद ब्राह्मणवाद से बचो, तीन महाप्राणी जैसी अन्य कई विस्फोटक किताबें तैयार कर सके। इस साहस के जोर से ही बड़े अधिकारी होकर ललई सिंह यादव जैसे क्रांतिकारी को तीन दिन अपने घर पर रखकर अपना जीवन धन्य कर सके।

वह जन-जन तक किताबें पहुँचाने के लिए लगातार तरह-तरह के प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में जीवन के शेष दिनों में उनके जेहन में ‘सावित्रीबाई झोला पुस्तकालय’ का अनूठा कॉन्सेप्ट उभरा। उम्मीद है, उनके नहीं रहने पर भी झोला पुस्तकालय फुले-शाहू जी—बाबा साहेब के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का काम करता रहेगा, जोकि महामानव हंस साहब का सपना था!

ऐसे मिली मुझे हंस की निकटता

आंबेडकर मिशन चलाकर बीसवीं सदी में ही किंवदंती बन चुके हंस साहब से एक नाटकीय घटना के माध्यम से निकटता प्राप्त करने का अवसर मुझे अप्रैल 2000 में मिला। उन दिनों मैं ‘ब्लूमून बुक्स’ प्रकाशन के लिए घूम-घूम कर लोगों के बीच किताबें पहुँचाने का काम किया करता था। यह संस्था खुद की किताबें प्रकाशित करने के साथ दूसरों की भी किताबें लेकर मिशन भाव से उन्हें जन-जन तक पहुँचाने का काम किया करती थी।

वहाँ जॉब करने के दौरान हंस साहब की ढेरों किताबें पढ़कर उनसे मिले बिना ही उनका एक अनुसरणकारी बन चुका था। अप्रैल 2000 में किसी दिन दिल्ली के मावलंकर हॉल में दलित साहित्यकारों का जुटान हुआ था। उस अवसर पर मैं भी ब्लूमून बुक्स की ओर से किताबों की प्रदर्शनी लगाने पहुँचा था। साहित्यकारों की भारी उपस्थिति को देखते हुए लगा कि हंस साहब भी शायद इस आयोजन में शिरकत करने आए होंगे।

इस बात का अनुमान लगाते हुए मैंने किसी साहित्यकार से उनके विषय में पूछा, तो पता चला कि वह भी आए हुए हैं। चूँकि मैंने हंस साहब को कभी देखा नहीं था, इसलिए उस सज्जन से उन्हें मिलवा देने का आग्रह किया और मेरे अनुरोध की रक्षा करते हुए उन्होंने उनसे मिलवा भी दिया। उनका शांत व सौम्य व्यक्तित्व और स्नेहपूर्ण व्यवहार देखकर अभिभूत हुए बिना न रह सका।

उस समय तक मेरी एक छोटी-सी पुस्तिका ‘प्रचारतंत्र और बहुजन समाज’ ही प्रकाशित हो पाई थी, जिसे मैंने साहस जुटाकर उन्हें भेंट किया। दस–पंद्रह मिनट की उस मुलाकात में कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं किंवदंती बन चुके एक ऐसे बौद्धिक नायक से मिल रहा हूँ, जो आईएएस जैसे उच्च पद पर भी रहा हो।

उनकी सहजता देखकर पहली ही मुलाकात में जून में होने जा रही अपने बड़े बेटे की शादी में उपस्थित होने का अनुरोध कर डाला। जब उन्हें यह पता चला कि शादी अंतरजातीय होगी, जिसे अभिभावकों ने खुद आपसी सहमति से तय किया है, तो वह खुशी से उछल पड़े और आने की सहमति दे दी।


मेरे बेटे की शादी में शरीक होने वाले दूर-दराज के अतिथियों में हंस साहब पहले व्यक्ति थे, जो जून की भीषण गर्मी की उपेक्षा कर पुणे से चलकर सबसे पहले सपत्नीक लखनऊ पहुंचे थे। विवाह का आयोजन एक होटल में हुआ था। विवाह कार्य उन्होंने ही प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान अंगने लाल साहब के साथ मिलकर संपन्न करवाया था। जिस तरह जाति के बंधन को तोड़कर दहेज रहित वह शादी भव्यता के साथ हुई थी, वह बहुतों को प्रेरित की थी, लेकिन सबसे ज्यादा स्पर्श शायद हंस साहब को ही की थी। अगले दिन वह लखनऊ छोड़ते समय मुझे और मेरे समधी को एक अनुकरणीय विवाह आयोजित करवाने के लिए बधाई देते हुए आग्रह किए कि मेरे लिए भी इसी तरह उपयुक्त पात्र-पात्री ढूंढें, मैं भी अपने बच्चों की शादी इसी तरह करना चाहता हूँ। वह अपने बच्चों के अंतरजातीय विवाह के प्रति गंभीर थे, इस लिए पटना में बैठे-बैठे थोड़े-थोड़े अंतराल पर योग्य लड़का-लड़की ढूंढ देने के लिए हम दोनों को याद दिलाते रहे। अंततः कुछ अंतराल बाद उनकी छोटी बेटी ज्योति बाला की शादी मेरे समधी के मझले बेटे डॉ. प्रदीप चौधरी से तय हुई, जो बाद में चलकर अंतरजातीय विवाह की एक अनुकरणीय मिसाल बनी। इसके बाद तो हमें हंस साहब की और निकटता मिल गई और उनकी वजह से बिहार डाइवर्सिटी के वैचारिक आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। हंस साहब के सहयोग से 2010 में भागलपुर और उसके निकटवर्ती इलाकों में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर से छः दिवसीय डाइवर्सिटी यात्रा निकली। बाद में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी के एजेंडे को शामिल करवाने के लिए मैंने बिहार के 18 प्रमुख जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के साथ उन सभी जिलों के छात्रावासों में संबोधित किया एवं वहां के कोर्ट-कचहरियों में परचे बांटे। हमारा प्रयास सफल रहा और कुछ पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी एजेंडे को जगह मिली। इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका हंस साहब की रही। उन्होंने इस यात्रा के लिए आर्थिक संसाधन सुलभ कराए और मैं जिस भी जिले में जाता, उनके कद्रदान हर तरह से सहयोग के लिए खड़े मिलते!

हंस साहब ब्राह्मणवाद के यम से आगे की चीज रहे

हंस साहब की पहचान मुख्यतः ब्राह्मणवाद के यम के रूप में रही। वह पूरे देश में घूम-घूम कर साहस के साथ ब्राह्मणवाद के खात्मे का गगनभेदी आह्वान तो करते ही रहते थे, सबसे बढ़कर उनकी ऐसी छवि निर्मित करने में उनकी ब्राह्मणवाद विरोधी किताबों का योगदान रहा! लेकिन ब्राह्मणवाद के खात्मे का उद्घोष करते रहने वाले हंस आंबेडकरवाद के गंभीर अध्येता रहे। उन्हें बाबा साहेब के 13 फरवरी, 1938 के मनमाड वाले ऐतिहासिक भाषण का निष्कर्ष याद था, जिसमें उन्होंने ‘पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को सबसे बड़ा शत्रु’ बताते हुए कहा था, ‘अभी तक दलित वर्ग मुख्य रूप से सामाजिक कष्टों के निवारण के लिए ही आंदोलित होते रहे हैं। उन्होंने अपने आर्थिक कष्टों के निवारण का काम हाथ में लिया ही नहीं था। यह पहला अवसर है जब वे अपने आर्थिक कष्टों पर विचार करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं… जिन आर्थिक समस्याओं से हम जूझ रहे हैं, अपनी उन आर्थिक समस्याओं पर सामाजिक समस्याओं जैसा जोर देने के काम की लंबे समय से उपेक्षा करते आए हैं।’ ऐसा कहकर बाबा साहेब ने मनमाड सम्मेलन को दलित आंदोलन का एक प्रस्थान बिंदु बताते हुए आंदोलन को आर्थिक कष्टों के निवारण पर केंद्रित करने का आह्वान किया था। उनका यह आह्वान जिन दलित लेखकों को स्पर्श किया, उनमें शीर्ष के लोगों में एक रहे बुद्ध शरण हंस साहब, जिसका साक्ष्य वहन करती है 1977 में प्रकाशित उनकी 32 पृष्ठीय पुस्तक: ‘शोषितों की समस्या और समाधान!’ दलित आंदोलनों में मान्यवर कांशीराम के उदय के बाद सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति की बात खूब होती रही है। लेकिन मान्यवर के उदय पूर्व ही हंस साहब ने सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का निर्भूल नक्शा ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ के जरिए पेश कर दिया था। उन्होंने जनसंख्या के अनुपात में इंजीनियर, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, टेक्निशियन, लेक्चरर, डॉक्टर, बैंकों के एजेंट, मैनेजर, कारखानों के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च पदाधिकारी, महलनुमा घरों के स्वामी, लेखक, चिंतक, नेता व अभिनेता बनने का सपना तब दिया था, जब समाज के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी इसकी कल्पना करने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन ब्राह्मणवाद जैसी अमूर्त समस्या के खात्मे में अपनी अधिकतम ऊर्जा लगाने वाले उनके कद्रदान इस पुस्तक की उपेक्षा कर गए! अगर ऐसा नहीं किए होते तो आज उनके निधन के उपरांत वे इस पुस्तिका का जरूर उल्लेख करते एवं इससे प्रेरणा लेने की अपील करते!

हंस ने ऐसे पेश किया था: सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का नक्शा
हंस साहब ने ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ में आने वाले 50 वर्षों का दलित एजेंडा पेश करते हुए बहुजनों के विकास का मापदंड दे दिया था। कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र जैसी धारदार इस पुस्तिका में उन्होंने दलित और आदिवासियों को ‘अवर्ण’ के रूप में चिन्हित करते हुए उन्नत जीवन जीने की आकांक्षा पैदा करने का विरल प्रयास किया था। उन्होंने पुस्तिका के पृष्ठ 11 पर सवाल उठाया था, ‘क्या अवर्ण अभी भी पत्थर की गुफाओं में, झाड़ी-झुरमुटों, फूल और पत्तियों की झोपड़ी में जीवन गुजारें या बड़े-बड़े शहरों के ऊँचे विशाल महलों के स्वामी बनें? अवर्ण साधनहीन, संपत्तिहीन बनकर भूखे पेट आजीवन दुःख झेलते रहें या तेजी से बदलती हुई दुनिया और दौलत के साझीदार बन सुखोपभोग करें? क्या अवर्ण अभी भी सीधेपन का तमगा पहन, अपने धन और धरती गंवाते रहें या अन्य प्रगतिशील लोगों की तरह चुस्त और चतुर बन अपने अधिकारों के लिए दृढ़ संकल्प लें? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं, जिनका अंतिम और स्पष्ट उत्तर पाना आवश्यक है। इन प्रश्नों का उत्तर पाए बिना अवर्णों के विकास की बात सोचना मुश्किल है!’

पृष्ठ 15 पर वह सवाल उठाते हैं, ‘आजादी की इतनी लंबी अवधि के बाद अवर्णों को जिस अनुपात में इंजीनियर, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर, टेक्निशियन, वकील, लेक्चरर, कारखाने के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च अधिकारी होना चाहिए, नहीं हो पाए हैं। ये सब ऐसे पद हैं जहाँ सुख-सुविधा, सम्मान, संपत्ति मिलने की गुंजाइश है। इन पदों पर ऐसी जगहों पर अवर्ण कम मात्रा में हैं, या अति-अल्प पहुँच पाए हैं, तो यह स्वतः सिद्ध होता है कि अवर्णों को सुख-सुविधा, सम्मान और संपत्ति बहुत ही कम मिल पाए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अवर्ण अधिक से अधिक योग्य बनें; भिन्न-भिन्न प्रकार की शिक्षा अपने बाल-बच्चों को दें और स्वयं भी लें। यह अत्यंत आवश्यक है कि भिन्न-भिन्न प्रकार की अधिक से अधिक शिक्षा प्राप्त कर सुखी जीवन जीने के लिए हर क्षेत्र में प्रवेश कर सकें। अवर्ण अपनी जनसंख्या के अनुपात में जब इंजीनियर, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट, टेक्निशियन, लेक्चरर, बैंकों के एजेंट, मैनेजर, कारखानों के मैनेजर और डायरेक्टर, सेना और पुलिस के उच्च पदाधिकारी, लेखक, चिंतक, नेता व अभिनेता का पद प्राप्त कर लेंगे, तभी विकास का सही परिणाम देखा और समझा जा सकता है। ये सब विकास के चिन्ह और मापदंड हैं। इस मापदंड पर अवर्ण अभी अपनी स्थिति का अंदाजा लगाएँ कि वे कहाँ हैं!

अवर्णों के प्रत्येक परिवार में एक सदस्य को व्यवसायी बनाना चाहिए। दो-चार सदस्यों के परिवार में नियमित रूप से एक-दो सदस्यों को व्यवसाय में दिलचस्पी लेनी चाहिए। यह बात सत्य है कि अवर्ण एकाएक खान और कारखानों के मालिक नहीं बन सकते, विभिन्न प्रकार के साधनों का भंडार (आढ़त) नहीं बना सकते, स्टॉकिस्ट नहीं बन सकते, लेकिन खुदरा विक्रेता तो बन सकते हैं! अनाज, कपड़ों, दवाई, बर्तन, जूते आदि की दुकानें तो चला सकते हैं। शहरों में छोटे-बड़े होटल तो चला सकते हैं। अवर्ण को व्यवसाय के क्षेत्रों में जाना है, व्यवसाय करने का दृढ़ संकल्प लेना है और व्यवसाय की सफलता के लिए अथक परिश्रम करना है!’ (वही, पृष्ठ 20)

और सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति की चाह में: हंस साहब बन गए डाइवर्सिटी के स्तंभ!
सत्तर के दशक में उन्होंने ‘शोषितों की समस्या और समाधान’ के जरिए सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति का जो सपना देखा था, 2002 के भोपाल सम्मेलन—जहाँ दलित–आदिवासियों को उद्योगपति-व्यापारी बनाने वाले डाइवर्सिटी के विचार का उदय हुआ था—के बाद उनके सपनों को पंख लग गए। और जब 2007 में भोपाल सम्मेलन से निकले डाइवर्सिटी के विचार को आगे बढ़ाने के लिए ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ (बीडीएम) की स्थापना हुई, वे न सिर्फ इससे सक्रिय रूप से जुड़े, बल्कि देखते ही देखते इसके प्रमुख स्तंभ बन गए। वे बीडीएम की ओर से हर साल औसतन हजार पृष्ठों में प्रकाशित होने वाली जिस ‘डाइवर्सिटी ईयर बुक’ को बहुजनों के आर्थिक विकास का बाइबिल, कुरान, धम्मपद और गुरु ग्रंथ कहा करते थे, उसके मुख्य परामर्शदाता बनकर इसके प्रकाशन में योगदान करने लगे। यह ईयर बुक 2006 से 2020 तक नियमित रूप से उनकी देखरेख में प्रकाशित होती रही। औसतन हजार पृष्ठों की ईयर बुक में कम से कम 50 पृष्ठों में उनके लेख फैले हुआ करते थे। इस तरह देखा जाए तो हंस साहब ने नई सदी में कम से कम 750 पृष्ठों का लेखन सिर्फ डाइवर्सिटी के विचार को फैलाने के लिए किया। उनकी आत्मकथा ‘टुकड़े-टुकड़े आईने’ के पाँच खंडों को छोड़ दिया जाए तो नई सदी में इतना लेखन किसी अन्य विषय पर नहीं किया। वह ऐसा क्यों कर सके, इसका साक्ष्य 1400 पृष्ठों में प्रकाशित ‘डाइवर्सिटी ईयर बुक: 2009-10’ सुलभ कराती है। इसमें पृष्ठ 1339 से 1383 तक उनके लेख हैं। इसके पृष्ठ 1344–45 पर डाइवर्सिटी की अहमियत का अहसास कराते हुए वे कहते हैं—

‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन अपने आप में एक सामाजिक क्रांति है। इसे किसी राजनीति के पक्ष-विपक्ष से कुछ लेना-देना नहीं है। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन कोई राजनीति है ही नहीं; यह स्पष्ट तौर पर एक सामाजिक क्रांति है। यह बहुजन कल्याण, बहुजन विकास का खुला आंदोलन है। आज की तारीख में बेहतर विकास के रास्ते की इजाद डाइवर्सिटी मिशन ने की है। कारण की पहचान हो जाने से कार्य में सुगमता आती है। देश में व्याप्त आर्थिक स्रोतों पर सरकारी व्यवस्था कम, लूटपाट ज्यादा है। आर्थिक स्रोतों पर सुव्यवस्था की मांग डाइवर्सिटी मिशन करता है और साथ ही इनमें हो रही लूट का विरोध भी करता है। इस मिशन के आंदोलन की गति सर्जनात्मक है। बहुजन विकास के इस सर्जनात्मक आंदोलन में किसी के विरोध की गुंजाइश कहाँ! डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपने कार्यक्रम में राजनीति, व्यापार, पलटन और ऊँची सरकारी सेवाओं में सभी वर्गों की आबादी के अनुपात में स्थान सुरक्षित करने की मांग की थी। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन ने आज की तारीख में भूमि, व्यापार, रोजगार, उद्योग-धंधों, मीडिया, स्पोर्ट्स, परिवहन, पार्किंग, फिल्म, उच्च शैक्षणिक संस्थाओं, कॉन्ट्रैक्ट, सप्लाई—यानी कमतर से लेकर बेहतर आय के सभी स्रोतों पर सभी वर्गों की आबादी के अनुसार हिस्सेदारी की मांग और पूर्ति का आंदोलन चलाया है। इस आंदोलन में सभी वर्गों का सुख, सभी वर्गों का हित शामिल है; न किसी वर्ग की उपेक्षा है और न ही किसी को वेटेज। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का एजेंडा समय की मांग है। आज की तारीख में डाइवर्सिटी की मांग को नकारने वाले बहुजनों के द्वारा नकार दिए जाएंगे! भूमि, व्यापार, रोजगार, उद्योग-धंधों, मीडिया, स्पोर्ट्स, परिवहन, पार्किंग, फिल्म, उच्च शैक्षणिक संस्थाओं, कॉन्ट्रैक्ट, सप्लाई इत्यादि आय के सर्वोत्तम स्रोत हैं। इन आय के स्रोतों पर ब्राह्मण-सवर्ण लोगों का एकाधिकार बना हुआ है। सरकार की नीति में न तो आय के सभी स्रोतों में सभी वर्गों के लिए आरक्षण है और न ही डाइवर्सिटी की नियत व्यवस्था। फलतः संपन्न समाज के लोग आय के बेहतर साधनों पर कब्ज़ा जमाकर मालामाल हो रहे हैं और शेष बहुजन बदतर स्थिति में जाने के लिए बाध्य हो रहे हैं। इसी दोरंगी स्थिति से उबरने के लिए डाइवर्सिटी आंदोलन का सूत्रपात किया गया है!’

हंस साहब के सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति एजेंडे को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी

हंस साहब का परिनिर्वाण एक ऐसे समय में हुआ है, जब निकट भविष्य में साधु-संतों द्वारा हिंदू राष्ट्र का संविधान लागू किए जाने की घोषणा हो चुकी है एवं शक्ति के स्रोतों का असमान बंटवारा खतरनाक बिंदु पर पहुँच चुका है। 2024 के मई में आई ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब’ के मुताबिक देश के 89% धन-संपदा पर संघ के चहेते अपर कास्ट का कब्ज़ा हो गया है और दलित-आदिवासी 2.8% धन पर, जबकि विशाल पिछड़ा समाज मात्र 9% वेल्थ पर गुजर-बसर करने के लिए विवश है। वहीं विश्व में सबसे ज्यादा बदहाली का शिकार भारत की आधी आबादी को ग्लोबल जेंडर गैप की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों की बराबरी में आने में 257 साल लगने हैं। ऐसी कठिन स्थिति में ज़रूरत इस बात की है कि हम हंस साहब के गुणानुरागी ब्राह्मणवाद जैसी अमूर्त समस्या के खात्मे के बजाय अपनी अधिकतम ऊर्जा उनके सामाजिक और आर्थिक मुक्ति के विचार को आगे बढ़ाने में लगाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्क: 9654816191)

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