‘रजत रानी मीनू’ की कविताओं में स्त्री – रुपक कुमार  

शोध सारांश: क्यों समाज में और देश स्त्री को अभी भी वह जगह नहीं मिली है जिसके वो हकदार हैं? स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से समाज को निर्मित करने में अपना योगदान निभाते हैं लेकिन समाज में पुरुष को तो जगह मिल गया, जिसके वो हकदार वो नहीं भी थे या यूं कहें कि उससे ज्यादा ही मिला लेकिन अभी भी स्त्री को जगह नहीं मिल पाया है। जिसके लिए स्त्रियाँ आज भी संघर्ष कर रही है तथा अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ रही है। स्त्रियों के साथ भेदभाव की बात कुछ दशक पहले की नहीं बल्कि सदियों से यह चलता आ रहा है। हमारे धर्म-ग्रंथ और शास्त्र में ही भले लिखा गया हो कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ यानी जिस समाज में और परिवार में स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता निवास करते हैं। यह शब्द ही सिर्फ प्यारा है और सुनने में भी मधुर लगता है मगर स्त्री को उस लायक नहीं समझ ही नहीं गया और ना वो स्थान समाज में मिला, जिसके वो हकदार थी।

बीज शब्द: स्त्री, समाज, स्थिति, हालात, पितृसत्ता, भेदभाव, पुरुष, दलित स्त्री। 

ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था जो स्त्री को हमेशा गुलाम बनाए रखने का काम करता है। मनुस्मृति में जो स्त्री विरोधी बातें लिखी गई है और वो अभी तक समाज में लागू है। मनुस्मृति में लिखा है कि ‘नारी को कभी स्वतंत्र नहीं छोड़ना चाहिए। वह जिस भी अवस्था में हो उसे सदा पुरुषों के संरक्षण में ही रहना चाहिए। मनुस्मृति में यह भी लिखा गया है कि ‘स्त्री अपवित्र है। उसे पढ़ने-लिखने, धन रखने एवं उपनयन का स्त्रियों का अधिकार नहीं है।’ आगे और जब हम बढ़ाते हैं तो वहीं ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित पितृसत्तात्मक समाज के उत्तराधिकारी स्त्री के बारे में लिखते हैं कि “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।” रामचरितमानस से पता चलता है कि स्त्री की इस ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक समाज में क्या स्थान था। आजादी से पहले तक स्त्रियों की हालत बद से बदतर रही और आज भी स्त्री की स्थिति में अमूल चूल ही सुधार हुई है। 

अक्सर आंखों में इंसान के भीतर की स्थिति यानी उसके भीतर छुपे हुए या समाये हुए दर्द, खुशी आदि सब दिख जाती है। औरत के तमाम दर्दों को उनके तकलीफों को गोरख पांडेय पहचानते हैं और वह लिखते हैं- “ये आँखें हैं तुम्हारी/तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर/इस दुनिया को/जितनी जल्दी हो/बदल देना चाहिए।”1 और समाज और देश में ब्राह्मणवादियों, सामंतवादियों, पितृसत्तात्मक सोच के लोगों को अक्सर यह डर बना हुआ रहता है कि उसका यह वर्चस्ववादी सत्ता जो है या परंपरा ध्वस्त ना हो जाए कहीं बराबरी की ना बात करने लग जाए इसके लिए वह हमेशा उठने वाले विरोध और प्रतिरोध की आवाजों को कुचलने  का काम करता है। उनकी आवाजों को उठाने वाले समता, भाईचारा की आवाजों को उठाने वाले लोगों को वह देशद्रोही या आग भरकाने वाले लोग का उसका प्रतिकार करते हैं। हम देख रहे हैं किस तरह देश में जो भी सत्ता के गलत कानून और नीतियों का विरोध करते हैं उसे या तो जेल में बंद कर देते हैं या उसका मोबलिंचिंग करके हत्या कर दी जाती है या उसे अलग-अलग यातनाएं दी जाती है।  इसी को जब महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के हक और अधिकार की आवाजों को जब बुलंद कर रहे होते हैं तो उसे कुचलने का काम करता है, आग भड़काने का आरोप लगता है, झूठ बोलने या झूठ फैलाने का आरोप लगाया जाता है। जिसे गोरख पांडेय इस तरह से दर्ज करते हैं- “हजार साल पुराना है उनका गुस्सा/हजार साल पुरानी है उनकी नफरत/मैं तो सिर्फ/उनके बिखरे हुए शब्दों को/लय और तुक के साथ/लौटा रहा हूँ/मगर तुम्हें डर है कि/आग भड़का रहा हूँ।”2 

समाज में पुरुषों और महिलाओं की बराबर आबादी है और समाज और देश के विकास में दोनों की समान भागीदारी भी है, फिर भी कुछ वर्चस्ववादी, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी एवं पितृसत्तात्मक विचार के लोग खासकर औरत के हक को छीनकर वह अपने नाम कर लिया है। समाज में पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक उसका हर एक रूप में शोषण किया है। इस घिनौना पितृसत्तात्मक सोच समाज में किस तरह से स्थापित हुआ, जिसे जनवादी कवि रामाशंकर यादव विद्रोही इस तरह से दर्ज करते हैं- 

“इतिहास में पहली स्त्री हत्या

उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की

जमदग्नि ने कहा, ओ परशुराम !

मैं तुमसे कहता हूँ कि अपनी माँ का वध कर दो

और परशुराम ने कर दिया

इस तरह पुत्र, पिता का हुआ

और पितृसत्ता आई।”3

ब्राह्मणवादी, वर्णाश्रम और पितृसत्तात्मक व्यवस्था आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद भी समाज में कायम है। इस व्यवस्था में आछूतों, दलितों, स्त्रियों आदि की हालत बद से बदतर रहा है और अभी भी है। इस व्यवस्था में इसको हमेशा से अछूत ही समझा गया और इनके साथ दुर्व्यवहार ही किया गया। इस घनघोर अमानवीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित स्त्रियों को ‘स्तन कर’ भी चुकाना पड़ा है। इस व्यवस्था में इंसान को इंसान नहीं समझा, हमेशा इनके साथ भेदभाव किया। स्त्रियों में भी अधिक दलित स्त्रियों को जहालत झेलनी पड़ी। स्त्रियों के जीवन में सुधार लाने के ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फुले फातिमा शेख, इशवेरचन्द्र विद्यासागर, पेरियार आदि ने कठिन संघर्ष किए। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले को इस प्रयास में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा और जहालत झेलनी पड़ी। कठिन संघर्ष और बलिदानों के बावजूद देश आजाद हुआ और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बहुत कठिन प्रयास एवं संघर्षों के बाद संविधान लागू हुआ एवं सभी को समान स्थान दिया गया। जब संविधान में संवैधानिक रूप से समान अधिकार मिलने के बावजूद भी समाज में आज आजादी के दशकों के बाद भी पूरी तरह सुधार नहीं हो पाया है। देश के आजादी के पहले जिस प्रकार स्त्रियों पर अत्याचार होता था उस प्रकार से तो नहीं मगर पुरुष मानसिकता से यह स्त्री आज भी प्रताड़ित हो रही है। महापुरुषों के बलिदानों और संघर्षों के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति में मामूली सुधार हुआ है। 

रजत रानी मीनू कविता संग्रह ‘पिता भी होते हैं मां’ पुस्तक की भूमिका में लिखती है “मैं जब देश के उसे सामाजिक हिस्से से आती हूँ जिसे सहने को  समुद्र भर संताप है और कहने को बूंद भर अवसर नहीं। स्त्री के हक में आधी आबादी की बात की जाती है, पर इस आदि में वें कौन है जो मेरे जैसियों को हिस्से का बोल जाती हैं। मेरी काया में प्रवेश कर मुझसे बहनापा बनाती है? पर क्या वे सुविधाभोगी, मेरी गैरदलित बहनें स्त्री-मुक्ति की उपलब्धियां मेरे साथ साझा कर पाती हैं? जाहिर है नहीं।”4 ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सदियों से दलित स्त्री ही नहीं बल्कि दलित पुरुष भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित रहे हैं और सामाजिक गुलाम बनर रहे। यह सब कैसे हुआ और किस वजह से हुआ इसका सबसके बड़ा कारण जाहिर है कि इनलोगों को शिक्षा और सम्पत्ति और सामाजिक व्यवस्था से बेदखल रखा। अशिक्षा, निर्धनता, भेदभाव, सामाजिक अस्पृश्यताएं आदि दलितों के साथ बहुत बड़ी समस्याएं हैं। 

समाज में पितृसत्तात्मक व्यववस्था ने पुरुषों एवं महिलाओं को कभी भी बराबरी या समानता के लायक नहीं समझा, इस व्यवस्था में खुद को ही उच्चतर बताया। महात्मा ज्योतिबा फुले कहते हैं ‘स्त्री और पुरुष जन्म से ही स्वतंत्र है इसलिए दोनों को सभी समाज सभी अधिकार समान रूप से भोगने का अवसर प्रदान होना चाहिए’ और डॉक्टर अंबेडकर कहते हैं ‘किसी भी समुदाय को की प्रगति को उसे समाज की महिलाओं की प्रगति से मापा जा सकता है।’ स्त्री की मुक्ति के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है और यही एकमात्र हथियार भी डॉक्टर अंबेडकर जी कहते हैं ‘शिक्षा व श्रेणी का दूध है जो जितना पिएगा वह उतना दहरेगा।’ इसी पुस्तक की भूमिका में मीनू  जी लिखती है कि “पितृसत्ता से अधिक जाति व्यवस्था से उपजी गरीबी, अधिकारहीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, आवासहीनता जैसे अभावों से जूझते हुए जीवन गुजारती हैं। इसलिए यह स्पष्ट दिखाई देता है कि दलित स्त्री समस्याएं गैर-दलित स्त्री की अपेक्षा बहुपरतीय और अलग हैं। इसलिए उनकी मुक्ति के प्रश्न भी अलग समाधानों की मांग करते हैं।”5  

मीनू जी अपनी माँ को याद करते हैं और अपनी मां को पिता के भीतर देखते है यानी पिता को मां की जगह पाती हैं। उनके पिता माँ के द्वारा किया जाने हर कार्य को करते है क्योंकि उनकी माँ की मृत्यु बचपन मे ही हो जाती है। मीनू जी के जीवन में मां की भूमिका के उनके पिता निर्वहन कर रहे हैं। मीनू जी लिखतीं हैं कि 

“मैंने पापा की, आंखों में देखा

अपनी मां का चेहरा

पापा मन हो ही होते हैं

ऐसा महसूस, मां गुजर जाती है

अक्षर सिखाते-सिखाते

और पापा ले लेते हैं, मां की जगह

जो दुख की जगह भी है।”

रजत रानी मीनू दलित छात्राओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए और उनकी पीड़ा को दर्ज करते हैं। अभिजात स्वर्ण छात्रा के साथ बलात्कार होने पर पूरा सांसद और महिला आयोग चीखने लगते हैं। उसके लिए सजा में मौत मांगते हैं, वहीं दलित बालिकाओं के साथ जब बलात्कार होने पर सब चुप रह जाते हैं एवं सिर्फ आंखों से देखते तथा सुनते रहते हैं। अपने मुंह से कुछ नहीं बोलता है वो  गुलामों की भांति में चुप रहती है। मीनू लिखती है-  

“हमारे साथ जब होता है बलात्कार

सामूहिक बलात्कार –

तब क्यों हिलता नहीं पत्ता एक भी?

और जब तुम्हारे साथ हुआ बलात्कार

तब क्यों हिल गयी संसद भी ?

चीख उठीं महिला सांसद बलात्कार के खिलाफ

क्यों उड़ गयी ‘महिला आयोग’ की चैन की नींद ?

आज क्यों उठी बलात्कारियों को

सजा-ए-मौत की माँग, कल क्यों मौन थीं तुम?”

मीनू दलित स्त्री और अभिजात स्वर्ण स्त्री के अंतर को पहचान कर उसे दर्ज करती है। भारतीय समाज में दोनों वर्णों के स्त्री का अलग सनगरक्ष संघर्ष है और दोनों में धरती और आसमान की अंतर है। समाज में दोनों महिलाओं की सामाजिक अंतर हम साफ रूप से देख सकते हैं कि कैसे स्त्री के साथ घिनौना घटना जो बलात्कार हो रहा है अंतर सिर्फ वर्ण की है जिसमें एक दलित परिवार से आती है और एक स्वर्ण परिवार से आती है। समाज में एक स्वर्ण लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर पूरा समाज और देश न्याय के उमड़ जाता है वहीं दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होने पर उसे छुपा दिया जाता है या दबा दिया जाता है, साथ दलित परिवार को धमकाकर चुप कर दिया जाता हैं। दलित लड़की के साथ बलात्कार होने की घटना पर हिन्दी के मशहूर शायर और जनवादी कवि अदम गोंदवी लिखते है- 

“आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

*****

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें

और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

******

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही

या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए

बेचती है जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए!”

अदम गोंदवी नव इस गजल समाज के हकीकत के साथ पुलिस प्रशासन की दलितों और स्वर्णों के प्रति व्यवहार को उजागर कर रख देते है। मीनू वहीं जब दलित लड़कियों के साथ जब बलात्कार होता है तब समाज और देश का क्या व्यवहार होता। जो लोग यानी बोलने वाले चुप हो जाते है मुक होकर सिर्फ देखते रहते है। जो स्वर्ण लड़कियों के साथ हुए बलात्कार पर कैन्डल मार्च निकलते है मगर दलित लड़कियों के बलात्कार पर चुप रह जाते है जिसे मीनू पहचान करती है इसके दोहरी नीति को और उसे अपनी रचनाओं मे दर्ज इस तरह से करती है- 

“जब मेरे साथ हो रहा था बलात्कार/सामूहिक बलात्कार

कारण मालूम है मुझे

क्योंकि तुम हो अभिजात स्वर्ण

और मैं ठहरी दलित

यदि हजारों बालाओं के साथ

किये जा रहे बलात्कारों पर

तुम खामोश नहीं रही होतीं

तो तुम्हारे बोलने से मिल जाता मेरी आवाज को

थोड़ा संबल/और आज तुम्हारी बच्ची के साथ

भी नहीं होता बलात्कार”

इन पंक्तियों के माध्यम से मीनू जी ने दलित और स्वर्ण स्त्रियों के बीच भेदभाव की मानसिकता, विचार एवं संघर्ष को दिखाया है। समाज में स्वर्ण और दलित स्त्रियों के जीवन यापन और जीवन जीने में तमाम अंतर को उजागर करती  है और स्त्री होने के बावजूद भी दोनों का जीवन एक समान नहीं है।

समाज में दलित बालिकाओं की इच्छाओं, सपनों और जाति दंश का शिकार सदियों से आज तक हो रहें हैं। इनके साथ खासकर लड़कियों की चुनौती  को देखते हैं तो  वह घर से बाहर तक निरंतर संघर्ष करती है और उनके साथ मुशीबतों का लगातार हमला होते राहत है। दलित लड़कियां एक घर में पितृसत्ता से लड़ती है और जब मुक्ति के लिए एवं शिक्षा के जब स्कूल जाति है तो वहाँ भी उन मुसीबतों का सामना करना पद रहा है। जो सदियों से शिक्षा पर जिसने या जिस विचारधारा ने कब्जा जमाए हुए है वो आज भी अपने कब्जा मे रखा है एवं रखना चाहता है जिसके लिए आने वाले पिछड़े और दलित लोगों के साथ निरंतर अपना शिकार बना रहा है। दलितों के साथ स्वर्ण शिक्षिका उसे गाली देती है और उसे जलील करती है तथा उसे जाति का नाम लेकर उसे गाली देती है। एक दलित लड़की सोचती है कि उसका क्या दोष है जो उनके साथ ये घिनौना भेदभाव कर रही है जिसे वह समझ नहीं पाती है और वह उदास बाथकर सोचती है कि काश कोई उसे सुनता कि वह भी पढ़ना चाहती है एवं आगे बढ़ना चाहती है। दलित लड़कियों के होने वाले स्कूल में भेदभाव को उजागर मीनू अपनी कविताओं में उजागर करती है- 

“एक दलित बाल, बैठी उदास

कक्ष मेरी भी, कोई सुनता

मैं भी पढ़ना चाहती हूँ आगे बढ़ना चाहती हूँ

मगर- मेरी स्वर्ण शिक्षिका ने

लिख दिया था मेरे माथे पर

काली स्याही से ‘तू चमारी है’

तू नहीं पढ़ सकती

तमाशा बनी थी मैं, उसे दिन।”10 

मीनू अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की उपलक्ष पर समाज और देश में विभिन्न प्रकार की औरतों को पहचान कर उसे अपनी कविता में दर्ज करती है। समाज अधिकार या सघनता से देखें तो दो प्रकार की स्त्रियाँ दिखाई देती है एक वो जो शिक्षित है और अपने अधिकार के बारें में जानती है और दूसरी प्रकार की वो स्त्री है जो सदियों से अपने अधिकार के बारें में जानती ही नहीं है वो सदियों से उसी गुलामी को जीती हुई आती है जिनके लिए अधिकार शब्द से भी अनभिज्ञ है उनका क्या होता होगा उनको कब मुक्ति मिलेगी। हर साल महिला दिवस कुछ महिलायें एकजुट होतीं है और इसको बढ़िया से जश्न मानती है और बहुसंख्यक स्त्रियां नहीं जानती कि उसे उनके समाधान का कोई एक दिन भी होता है उनकी हर तोड़ मेहनत का कोई मूल्य देता है तथा जिनको अपने अधिकार के बारें में जानकारी है ही नहीं। मीनू इस घटनाओं को इस परकर दर्ज करती है- 

वे नहीं जानतीं, किसे कहते हैं, अधिकार?

कैसी होती है-नारी मुक्ति ? उन्हें नहीं पता,

कहाँ, किसके पास, रहते हैं उनके अधिकार?

पाये नहीं, देखे नहीं।

और जिनकी, सुनती है सरकार जो हैं चैनलों,

अखबारों की सम्पादक, जज और प्रोफेसर,

वाइसचांसलर, सांसद और मिनिस्टर जो पाती हैं

विदेशी यात्राओं के टिकट, और मोटी पगार जो- जानती हैं

अपने अधिकार, क्या वे जानती हैं?

उन स्त्रियों के बारे में, जो नहीं जानतीं अपने अधिकार ।

जिनके लिए पैंसठ बार आया यह

प्रकाशमान दिन, किंचित भी कम नहीं कर सका

अंधकार, अंधकार, अंधकार॥”11  

बीसवीं सदी में बहुसंख्यक स्त्रियाँ आज भी अपने हक और अधिकार नहीं जान पाई है। इनका जीवन में अंधकारमय है जो अपने हक और अधिकार से अनभिज्ञ है यानी कोसों दूर हैं तथा इनके लिए अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अनसुना शब्द है, अनसुना, अनजान सा दिन है। 

माँ तो मां होती है। माँ किसी खास दिन के मोहताज नहीं रहती है उनका हर दिन खास दिन ही होता हैं। वो हमेशा अपने बच्चों पर ममता लुटाती है। प्यार करती है। जिसे किसी एक दिन खास दिन मन कर उसे मनाया जाए मां के लिए हर दिन एक जैसा ही होता है। कुछ लोग मदर्स डे को मनाने की दिखावा करते है इस दिन बहुत माँ के प्रति प्यार दिखाता है और बकीं बाकी दिन इनका दुर्गति करता है। इन्हीं विषयों को मीनू कविता में दर्ज करती है-

“पर- माँ तो माँ, होती है-

सारे जहान की, एक सी।

जो किसी डे की, मोहताज नहीं।

उसका आँचल, होता है-

हमेशा अपने, बच्चों के लिए,

हर पल, हर दिन

ममता से लबालब।

नामी-गिरामी लोगों के

फोटो और बयानों से भरे होते हैं”12   

समाज का और देश के प्रगतिशील का जो भी ढिंग पीट रहा है उसके सच्चाई को बयां करती है। आज राजनीति पार्टी के लोग अपने शशन साशन कल काल को विकसित बताने का कोशिश करता है बाकी पीछे हुए विकास को नकार देता है और अपने समाज समय के कमजोरी या कामों को देख नहीं पाता है और आलोचना तो बिल्कुल भी सुनना पसंद नहीं करता है। विषवगुरु बनने की होड में समाज और देश के जिश हिस्से को विकास पर ध्यान देना है उसपर नहीं देता है बल्कि अपनी कमी या कमजोरी को छूओने की कोशिश करती है। देश का सही विकास यानी यथार्थ को एक कवि या साहित्यकार अपनी राचानों के माध्यम से देश के सामने लाने का काम करता है। ठीक उसी प्रकार मीनू महत्वपूर्ण मुद्दों को अपनी रचनों के माध्यम से समाज और पाठकों के सामने रखती है। स्त्रियों की हकीकत को दर्ज करती है। उन मुद्दों और सवालों को सामने रखती है जो प्रासंगिक भी है जिसपर काम करना चाहिए जिसे नहीं कर पाया है या यूं कहे इस मुद्दे पर ध्यान भी नहीं देते है। जो इस शिक्षित और स्वर्ण नहीं है तथा वह सलीके से नहीं रहती है जो समाज की शैली के अर्थ तय किया है। समाज में कोई नहीं उसका और उसका कोई खानदान भी नहीं है इसलिए इसकी ऐसी हालात है। इसका इस दुनिया में कोई नहीं है, जिसके वजह से यह अपना जीवन लावारिस की तरह जीती है। इसको पहचान कर मीनू लिखती है- 

वह सड़क किनारे बैठी-

बस से ऑटो से उतरती चढ़ती

सवारियों से बेखबर।

फटी पुराने बोरी में

रखती तुड़े- मुड़े कागज- गत्ते को सलीके से

****

वह स्त्री मैले कुचले कपड़ों में?

क्यों सूख रहे थे उसके गाल ?

क्यों बिखर रहे थे उसके बाल?

क्यों दिख रही थी वह बेहाल?

******

यदि वह स्वर्ण होती

तो क्या हुआ अपढ़ होती?

यदि वह पढ़ी-लिखी, होती तो

क्या यही होता? उसका हाल”13 

इक्कीसवीं सदी में खासकर गरीब महिलाओं के साथ गाँव ही नहीं, निजी अस्पताल में ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी देखने वाला कोई नहीं नहीं होता है ध्यान भी कोई नहीं देता है। यहाँ लोकतंत्र की धज्जियां उदय देता है नेता,  डॉक्टर, पुलिस प्रसासन आदि। बलात्कार की शिकार दलित स्त्री की चीख किसी को सुनाई नहीं देती है। एक गर्भवती दलित महिला प्रसव की कराहती रही और  सड़क पर ही अपनी बच्चा को जन्म देती है कोई कुछ नहीं करता है बल्कि सिर्फ देखता रहता है। ऐसे ही कई महिलाओं की जान भी चली जाती है। मीनू इस तरह दर्ज करती है- 

“सुनाई देती है, अगली चीख, 

सामूहिक बलात्कार की,

शिकार दलित स्त्री की, सुनाई देती है चीख

एक गर्भवती दलित महिला की

प्रसव से कराहती, सड़क पर जनती बच्चे को

उफ् दम तोड़ती, अस्पताल के बाहर स्त्री को चीख।”14 

इस कविता के माध्यम से मीनू दर्ज की है कि कैसे वर्णाश्रम एवं सामंती  व्यवस्था में गरीबी और जाति की वजह से आदमी आदमी नहीं जानवर जैसा व्यवहार किया जाता है। समाज और देश में पितृसत्ता के पोषक पुरुषों पर सवाल खड़ा करती है साथ ही व्यवस्था को भी कटघरे में भी खड़ा करती है। स्त्री दम तोड़ती है और तोड़ने को मजबूर किया जाता है। इस बाजरवाद ने गरीबों का जिन दुर्भर कर दिया है और यह घटना सत्य को भी उजागर करती है।

निष्कर्ष: रजत रानी मीनू इस समाज में इतिहास से लेकर वर्तमान में हो रहे रोज घटनाओं से रूबरू होती है और पाठकों को रूबरू कराती है। अखबारों से, समाचार पत्रों से और अपने आसपास होने वाले घटनाओं को देखती है। दलित महिलाओं के साथ होने वाले घटनाओं,  अत्याचारों, बलात्कारों, शोषण आदि तमाम रूपों उजागर करती है। समाज में शोषण के जितने भी रूप हैं उस सभी को देखती हैं और उसे महसूस करती है, उसे अपनी कविताओं में दर्द कर  ती है और वो एक  जागरूक और जिंदा मनुष्य होने का प्रमाण देती है। मानव दिलों को मिलाने और मानव की भीतर प्रेम की ज्योति जगाने की कोशिश करती है।

संदर्भ सूची:-

  1. गोरख पांडेय, गोरख पांडेय समग्र कविताएं, सांस्कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2023, पृष्ठ 20
  2. वही पृष्ठ 21
  3. रामाशंकर यादव विद्रोही नई खेती नवरंग प्रकाशन गाजियाबाद 2018 पृष्ठ 51 52
  4. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली,2015  भूमिका, पृष्ठ सं 08
  5. वही, पृष्ठ सं 10
  6. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 30
  7. वही, पृष्ठ सं 39 
  8. धरती की सतह पर, अदम गोंडवी, सं ओम निश्चल, सर्वभाषा प्रकाशन, 2023, पृष्ठ सं 102
  9. पिता भी होते हैं माँ, रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015  पृष्ठ सं 39-40 
  10. वही, पृष्ठ सं 45 
  11. वही, पृष्ठ सं 52  
  12. वही, पृष्ठ सं 55 
  13. वही, पृष्ठ सं 59,60 
  14. वही, पृष्ठ सं 75 

रुपक कुमार   शोधार्थी, हिन्दी विभाग  ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा 

मो नं 9709771436  ईमेल-  kumarrupak993@gmail.com 

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ISSN 2394-093X
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