कहानी: चंद्रसेन
हॉय, डॉ. मोहन!”
“हेलो, बेंसन।”
मोहन अभी अपनी क्लॉस लेकर बाहर निकले ही थे कि उनका सबसे प्रिय, किंतु नटखट चीनी छात्र बेंसन सामने आ खड़ा हुआ। चेहरे पर वही आधी मुस्कान, नुकीला सवाल।
ज़रा ठहरिए। पहले डॉ. मोहन को जान लीजिए।
कभी वे ‘मोहना’ थे-इलाहाबाद के छोटे से गाँव-भीमपुर के।
ऊसर ज़मीन, लहलहाते सपने।
वहीं से शुरुआती पढ़ाई, फिर संघर्ष, फिर शोध। भारत से पीएचडी पूरी कर आज वे कोलंबिया विश्वविद्यालय में पोस्ट-डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। कक्षाएँ लेते हैं-पर वे सिर्फ़ सिलेबस नहीं पढ़ाते। समाज पढ़ाते हैं, गढ़ते हैं इतिहास की तहों में छिपे वर्तमान को निचोड़ते हैं।
बेंसन चीनी है, लेकिन उसका शोध भारत की जाति-व्यवस्था पर है। चीन से आए छात्रों को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की नहीं होती कि यहाँ हज़ारों देवता हैं, बल्कि यह कि इंसान अब भी इंसान नहीं है।
ब्राह्मणों की इस ‘अतुल्य खोज’ ने उन्हें चकित कर रखा है-एक ऐसी खोज, जिसमें यह तय कर लिया गया कि कौन छूने लायक है और कौन नहीं।
वे बार-बार पूछते हैं: “क्या सच में इंसान-इंसान को नहीं छूता?”
और हमें जवाब देते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि सदियों की मूढ़ता, क्रूरता और गुलामी को यहाँ परंपरा कहा जाता है।
खैर आज बेंसन डॉ मोहन का मजा लेने के मूड में हैं।
“डॉ. मोहन, क्या आप हमें ग़लत पढ़ाते थे?”
बेंसन ने मासूमियत से पूछा।
“आपने तो हमें यही पढ़ाया था कि भारत में हिंदू हैं-और आजकल सब कट्टर हिंदू हो चुके हैं।
अखंड भारत बनाना है।
प्रधानमंत्री ईश्वर के अवतार हैं?”
डॉ. मोहन मुस्कराया-वह मुस्कान, जो जवाब नहीं होती, स्वीकारोक्ति होती है।
“बेंसन, यही तो है आज का नूतन भारत,” डॉ. मोहन ने कहा।
“यही सब अब किताबों में है। जाओ, बॉलीवुड की फ़िल्में देखो।
सब जगह यही कथा चल रही है-संसद में भी और हमारी सनातनी मीडिया में तो खासकर।
वहाँ सब हिंदू हैं और जो नहीं हैं, वे जल्द समझा दिए जाते हैं।”
बेंसन चुप रहा।
डॉ. मोहन ने बात पूरी की-
“और हाँ, हमारे प्रधानमंत्री अब केवल प्रधानमंत्री नहीं रहे।
वे हिंदू-हृदय सम्राट हैं-लोकतंत्र के सिंहासन पर विराजमान एक पवित्र नॉन-बायोलॉजिकल आत्मा।”
बेंसन अपने बाल नोचने लगा। डॉ मोहन को सिगरेट बढ़ाते हुए एक वीडियो का लिंक शेयर कर दिया।
“आप रूम पर जाइए और इस वीडियो को देखिए”।
“मस्ट वॉच इट”। बेंसन चिल्लाते हुए निकल गया।
डॉ मोहन दिन भर की थकान से फ्लैट पर आया। वाइन की बोतल निकाली। मोरक्कन डिश ऑर्डर करते-करते वीडियो देखने लगा।
“यूजीसी हाय-हाय”।
‘इस तेली को किसने पीएम बनाया’?’ इसका तो सुबह-सुबह मुंह देखना अशुभ होता है’।
एक मिश्रा महराज इंटरव्यू दे रहें हैं।
टीवी खोला तो विचित्रा त्रिपाठी एंकरिंग नहीं श्राप देने की मुद्रा में एंकर कम ‘राष्ट्रीय शर्मा संगठन’ की नेता ज्यादा लग रहीं हैं।
विपक्ष का नेता चुप है।
सब हिन्दू अगड़ा-पिछड़ा में बट गया है।
मसला यह नहीं है कि भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिवाद रोकने के लिए कोई नया नियम आ गया है।

मसला यह है कि जिन्हें पीढ़ियों से जातिवाद करने की आदत रही है, वे यह सच्चाई अच्छी तरह जानते हैं कि आदत नियम से नहीं जाती।
वे यह भी जानते हैं कि हम किसी न किसी के साथ करेंगे ही-
फिर पकड़े जाएँगे,
फिर पीड़ित बनेंगे,
और अंत में “हमारे साथ अन्याय हो रहा है” का राष्ट्रीय विलाप शुरू होगा। होगा क्या ?हो ही चुका है।
भेदभाव के महज अंदेशे से सवर्ण हिन्दू दिन रात एक किए पड़ा है।
आदत सुधारी नहीं जा सकती, क्योंकि यही आदत तो पहचान है, परंपरा है और ज़रूरत पड़ने पर संस्कृति भी।
सदियों से सीखी गई सामाजिक हिंसा को कोई विश्वविद्यालयी गाइडलाइन कैसे मिटा दे?
जातिवाद यहाँ अपराध नहीं, स्वभाव है-और स्वभाव बदलना तो पश्चिमी साज़िश मानी जाती है।
फलस्वरूप तथाकथित हिंदू समाज अगड़ा और पिछड़ा में नहीं, बल्कि विशेषाधिकार और असुरक्षा में बँट गया है।
जो ऊपर हैं, वे डर रहे हैं कि बराबरी न आ जाए।
जो नीचे हैं, वे अब भी समझा रहे हैं कि वे भी इंसान हैं।
सवर्ण लड़कियां ब्राह्मणवाद जिंदाबाद के नारे लगा रही हैं।थिरक रहीं है। सनातन धर्म को बचाने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में जोर आजमाइश कर रहीं हैं।
हिंदू-एकता का महान राजनीतिक भ्रम अब टूट चुका है-वह नारे से उतरकर ज़मीन पर बिखर गया है-सूखे पत्तों की तरह ।
शायद यही बात बेंसन कहना चाहता था।
वीडियो देखते-देखते, स्क्रॉल करते हुए मोहन को एक और वीडियो दिखा।
स्क्रीन पर एक तीस-पैंतीस धरा का सूअर था-पूरी तरह निश्चिंत, आत्ममुग्ध।
चर्बी लटक रही थी, आत्मविश्वास से भरी हुई।
वह झूम-झूमकर चल रहा था, जैसे किसी सत्ता का प्रतीक हो-भारी, सुरक्षित और बेख़ौफ़।
वीडियो के साथ एक कविता चल रही थी—
“मुझे मार डालो,
मेरे रोम-रोम उखाड़ डालो, राजा।”
विडंबना यह थी कि उस सूअर के बाल (बरौंछी) बहुत घने थे—
लहलहाते हुए, स्वस्थ, संरक्षित।
हिंसा की पुकार कविता में थी,
और ऐश्वर्य देह पर।
“कम से कम आधा किलो तौ होबय करी”?
“का रे मोहना”?
“होई बप्पा”।
“अच्छा बहुत तेज बनत हस”?
“एक छटांक के पांच रुपया मिली तो आधा किलो कित्ते के होई”?
“अरे अपने गांव का सबसे नीक गदेल है। काहे का चिल्लात रहत हस बिरजू”?
राम सुरेमन बाबा ने मोहना का पक्ष लिया।
“ठीक है, ठीक है। चल अच्छा। स्कूल जाय से पहले सूअरन का चराय आवा जाय”।
“हम न जाब”।
“मारब ससुर के नाती दुइ पनही”।
“फीस मांगय बप्पय के पास आवत हस”।
“हां पांच रुपिया कब से पड़ी है फीस। वू श्रीवास्तव मास्टर तीन दिन से क्लॉस से भगाय देत हैं”।
“ई बात है। चल कल बार उखाड़य वाले आइये हैं”।
“ई मोटका सुअरा के बाल दस-बारह रुपिया म बिक जाई”।
मोहना के बप्पा ने उसे आश्वासन दिया।
मोहना और बप्पा सुअर ढील कर खेतों की तरफ चल दिए।
हूछी-हूछी की आवाज करते हुए मोहना पीछे-पीछे और उसका बप्पा कंधे पर लाठी रखे आगे-आगे। सुवारों का झुंड विष्ठा चपर-चपर खाते बढ़े जा रहे थे। सुवरों को बराबर जमीन अच्छी नहीं लगती। अपने थूथनो से ऊबड़-खाबड़ कर रहें हैं।
इस प्रजाति को एक साथ चलना ही नहीं आता। कहीं भी धड़ल्ले से घुसे जा रहे हैं।
एक जगह पर टिकते नहीं। कभी सर्र से गेहूं के खेत में तो कभी सर्र से चना के खेत में घुस जाते हैं। माघ का महीना है। मोहना ठंड में डंडा लिए खेत, मेड़ इधर-उधर भाग रहा है। ओस से भीग गया है। चप्पल लस्सर-फ़सर हो रही है। ओस और माटी से सनी चप्पल बार-बार पैर से सरक-सरक जा रही है। जितना वह इन सुवरों का पीछा करता उतना ही ये चालबाजी करके आगे निकल भागते।
अचानक मोहना—जो कभी भीमपुर की गलियों में इन कथाओं को सिर्फ़ चमत्कार समझता था-अब समझ पाया कि इन्हें भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक क्यों माना गया है।
“भगवान को कोई नहीं पा सकता। वही जो भगवान का सबसे प्रिय हो… जो खुद भगवान हो… जो भगवान के मुख से पैदा हुआ हो।”
“अइसन कऊनव भगवान होई सकत है, मोहना?”
शाम को खाना खाते हुए बप्पा यही समझा रहे थे। आख़िरी बात कहकर उन्होंने महुआ का बड़ा-सा घूँट भरा।
मोहना चुप था। अब उसे समझ में आने लगा था कि अवतार सिर्फ़ कहानी नहीं होते- वे एक षड्यंत्रकारी व्यवस्था भी बन जाते हैं।
“अरे मोहना तय खूब पढ़। हम्मय सब का ई सब भगवान न चाही” ।
“हमार सब जने का भगवान तै बन”।
“लेकिन बप्पा कल वू बाल उखाड़य वाला आयी न? कल फीस न देब तौ ऊ श्री ..
“अरे रोवां बोल मोहना रोवां”।
मोहना की बात काटते हुए बप्पा नशे में बड़बड़ाया।
“एक भौंकी म राख, तेल अउर गुड़ लाओ”।
“ई मोटका सुअर का गुआरी से खींच लाओ”।
“मुंह बांध देव लस्सी से नहीं तव बहुतय नारिआयी”।
“गोड़ पकड़व हो सुक्खू। बहुतय चर्बियान है। बांधव सारे के दुईनव पांव”।
मोहना पांव पकड़े है। बप्पा जौरी से बंधे जबड़े पर पैर रखे हैं।
बप्पा की भाषा में रोवां उखाड़ने वाले रोवां उखाड़ रहा है।
मोहना रोवां पर नजर लगाए है। डर रहा है कि ये कम से कम दुई छटांक हो जाए।
अगर इससे कम हुआ तो फीस नहीं भर पाएगी।
तौलकर जब मोहना के बप्पा को दस रुपये मिले, तो मोहना खुशी से चिल्ला उठा।
“हो गई फीस”।
डॉ मोहन– डॉ मोहन।
आज मोहना-मोहना के स्थान पर मुझे डॉ मोहन क्यों सुनाई दे रहा है।
आंख खुली ।
दरवाजा खोला।
बेंसन की सामने से चीरती हुई आवाज आयी ।
“गुड मॉर्निंग डॉ मोहन”।
डॉ चंद्रसेन लेखक व रिसर्च ऑफिसर आईआईपीए नई दिल्ली।

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