कहानी: टुकी मिसिर


अभय कुमार 

बारह साल की ललिता जब किराने की दुकान पर नमक, तेल, ज़ीरा, मिर्च इत्यादि सामान ख़रीदने जाती, तो पास बैठे कुछ बूढ़े-बुज़ुर्ग, अगर उसे पहचान न पाते, तो पूछ बैठते— “किसकी बेटी हो?” बाप का नाम पूछने पर उन्हें जवाब मिलता, “टुकी मिसिर (मिश्र) की।”

ललिता कई सालों से चौथी क्लास में ही है। जिस तरह पैसेनजर गाड़ी को स्टेशनों पर एक्सप्रेस रेलगाड़ियों के गुज़र जाने के लिए रोक दिया जाता है, उसी तरह टुकी मिसिर ने अपनी इकलौती बेटी को एक ही क्लास में रोक रखा है। पिछले साल की तरह ललिता का यह साल भी बर्बाद हो गया, क्योंकि पिता ने बेटी का परीक्षा शुल्क नहीं भरा।

टुकी मिसिर को लगता है कि बेटी इम्तहान दे या न दे, क्या ही फ़र्क़ पड़ता है। उनकी यह समझदारी है कि बेटा होता तो कुछ और बात होती। परीक्षा में बैठने के लिए स्कूल ने पूरे एक सौ रुपये माँगे थे। टुकी मिसिर को यह लगा कि सौ रुपये के मकई के बीज से दो कठा खेत आबाद हो जाएगा; वहीं बेटी को पाँचवीं में भेजकर छठी क्लास के ख़र्च की मुसीबत को दावत देना होगा।

एक समय था, जब ललिता या उसकी माँ किसी के मुँह से “टुकी मिसिर” सुन लेती थीं, तो बहुत लड़ाई करती थीं और गंदी-गंदी गालियाँ देती थीं। जब गाँव के कुछ निठल्लों को मनोरंजन करने का दिल करता, तो जानबूझकर वे परिवारवालों के सामने राजेंद्र मिसिर को “टुकी मिसिर” कहकर संबोधित करते थे। “टुकी मिसिर” सुनते ही ललिता, उसकी माँ, उसका भाई विकास—सब ऐसे भड़क जाते थे, गोया गैस सिलिंडर अचानक फट गया हो।

एक बार गाँव के बच्चों ने सरस्वती पूजा का आयोजन किया। पूजा की तैयारी और चंदे की रक़म जमा करने के बहाने बच्चों को स्कूल न जाने का मौक़ा मिल जाता था। इतना ही नहीं, पूजा के नाम पर उन्हें कई दिनों तक लाउडस्पीकर बजाने, प्रोजेक्टर की मदद से फ़िल्म स्क्रीन करने और मूर्ति-विसर्जन के दौरान डांस करने का भी पूरा मौक़ा मिल जाता था। यही वजह थी कि गाँव के बच्चों में पंडाल स्थापित करने का काफ़ी क्रेज़ था।

चंदा इकट्ठा करने के क्रम में बच्चे टुकी मिसिर के दरवाज़े पर गए और ज़ोर से बोले, “बाबूजी, गेट खोलिए।” अंदर से जब कोई आवाज़ नहीं आई, तो बच्चे और ज़ोर से चिल्लाने लगे।

भरी दोपहरिया थी। टुकी मिसिर अभी-अभी खाना खाकर लेटे ही थे। बाहर आते ही उन्होंने अपने कर्कश स्वर में कहा, “क्या करने आए हो तुम लोग? भागो यहाँ से!”

सच पूछिए तो बच्चों को टुकी मिसिर से चंदा लेने से ज़्यादा उनके साथ मनोरंजन करने में दिलचस्पी थी। यही वजह थी कि वे जितना ग़ुस्से में चिल्लाते और गालियाँ देते, बच्चों को उतना ही मज़ा आता था और वे ज़ोर-ज़ोर से हँसते थे।

“बाबूजी, चंदा दीजिए। मूर्ति वाले को पेशगी में पाँच सौ रुपये देने हैं। आपको एक सौ एक रुपये देना है।”

एक सौ एक रुपये चंदे की फ़रमाइश सुनकर टुकी मिसिर और ज़ोर से चिल्लाने लगे— “मेरे पास ज़हर खाने के लिए एक रुपया नहीं है!”

टुकी मिसिर की पत्नी कमला को भी अपने पैसे से कम मोह नहीं था। मगर बच्चों की ज़िद देखकर उन्हें यह एहसास हो गया कि ये बच्चे यमराज की तरह ख़ाली हाथ लौटकर जाने वाले नहीं हैं।

दिल पर पत्थर रखकर वे पाँच रुपये का नोट लेकर आईं और बच्चों के सामने उसे पेश करते हुए कहा, “अब हल्ला मत करो यहाँ पर। सर-दर्द से मैं मर रही हूँ। ये लो पाँच रुपये और जाओ। जिसकी जितनी औक़ात होगी, उतना ही तो चंदा देगा।”

बच्चों को भी यह समझ में आ गया था कि पत्थर से तेल निकालना और रेगिस्तान में खेती करना भी शायद आसान हो, मगर टुकी मिसिर से एक पाई निकलवाना बेहद मुश्किल है।

बच्चों की टोली में से एक ने पाँच रुपये का नोट जेब में रखा और चंदे की रसीद पर चंदे की रक़म और चंदा देने वाले का नाम लिखने लगा। फिर उसने धीरे से रसीद आगे बढ़ाते हुए कहा, “बाबूजी, रसीद ले लीजिए। हम लोग चंदा जमा करने में कोई बेईमानी नहीं करते हैं। सबको रसीद देते हैं और पाई-पाई का हिसाब होता है।”

टुकी मिसिर ने जब रसीद अपने हाथों में ली और उस पर एक नज़र डाली, तो बारूद की तरह भड़क उठे। बोले, “किस नालायक ने रसीद के ऊपर मेरा नाम ‘टुकी मिसिर’ लिखा है? दो मेरे नोट वापस, कुत्तों…!”

बच्चे तो इसी घड़ी के इंतज़ार में थे। उन्होंने अपने प्लान के तहत रसीद पर राजेंद्र मिसिर लिखने के बजाय टुकी मिसिर लिख दिया था। जैसे-जैसे टुकी मिसिर उन्हें गालियाँ दे रहे थे, वैसे-वैसे कुछ बच्चे उनसे दूर भागते हुए “टुकी मिसिर, चूक-चूक…!” कहकर उन्हें चिढ़ा रहे थे।

दरअसल, टुकी मिसिर के माई-बाबूजी ने बड़े प्यार से उनका नाम राजेंद्र रखा था, मगर उनकी कुछ ऐसी हरकत गाँववालों ने पकड़ ली कि राजेंद्र मिसिर, “टुकी मिसिर” कहलाए जाने लगे।

टुकी मिसिर किसानी किया करते थे। घर में पैसों की आमदनी बहुत कम थी। पिताजी एक सरकारी दफ़्तर में चपरासी का काम करते थे। तीन बेटियों की शादी की वजह से वे काफ़ी क़र्ज़ में डूबे हुए थे। खेती-बारी भी बहुत जोखिम का पेशा था। कभी बाढ़, तो कभी सूखाड़ की वजह से खेती में लगे पैसे भी कई बार नहीं निकल पाते थे। ऊपर से ज़मीन के झगड़े की वजह से पट्टीदारों से केस-मुक़दमा भी हो गया था। मोतिहारी कचहरी में तारीख़ के दिन काफ़ी पैसे ख़र्च होते थे। घर की महिलाओं के कुछ गहने भी गिरवी रखे हुए थे।

परिवार की समस्याओं की वजह से टुकी मिसिर पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाए और मैट्रिक किसी तरह ‘थर्ड डिवीज़न’ से पास हुए। पढ़ाई छूटने की एक बड़ी वजह पिताजी का अचानक देहांत होना भी था। जब मैट्रिक का रिज़ल्ट आया, उसके कुछ ही दिनों बाद पिताजी रात को खाना खाकर सोए, तो सोए ही रह गए।

घर की सारी ज़िम्मेदारी अचानक टुकी मिसिर के कंधों पर आकर गिर पड़ी। विधवा माँ, छोटा भाई वीरेंद्र, बेटी ललिता और छोटा बेटा विकास—इन सबका ख़र्च उठाना इतना आसान नहीं था। खेती से अनाज तो मिल जाता था, मगर तेल, मसाले, कपड़ा, दवा-दारू, खाद और न्योता के लिए तो नक़द चाहिए ही चाहिए। सिर्फ़ धान और गेहूँ बेचकर सब कुछ पूरा करना मुश्किल था। सामाजिक हालात ने टुकी मिसिर को कंजूसी के गुण सिखा दिए थे।

समय गुज़रने के साथ टुकी मिसिर की बख़ीली बढ़ती चली गई। किसी को चाय पिलाना तो दूर की बात, वे किसी को अपने दरवाज़े पर बैठने तक के लिए नहीं कहते थे। उन्हें डर लगता था कि अगर कोई उनके घर बैठ गया, तो शायद उसे कुछ खाने-पीने को देना पड़ सकता है। किसी को कुछ देना उन्हें काफ़ी पीड़ादायक लगता था। जैसे ख़ून को सिरिंज से खींचने पर कष्ट होता है, वैसे ही अपनी कोई भी चीज़ किसी दूसरे को देने पर उनकी जान हाथ में आ जाती थी।

जहाँ अपनी चीज़ दूसरों को देना उन्हें बिल्कुल भी नागवार गुज़रता था, उसके उलट दूसरों की चीज़ खाने और लेने में उनका दिल बाग़-बाग़ हो जाता था। पूरे गाँव में कहीं भी शादी हो, तो वे कई दिनों से कुछ नहीं खाते; और जब खाने को कुछ मिलता, तो रामायण के लोकप्रिय पात्र और रावण के भाई कुंभकर्ण को भी टक्कर दे देते थे। शादी से ज़्यादा उन्हें मृत्युभोज का इंतज़ार रहता था, क्योंकि ब्राह्मणों को वहाँ न सिर्फ़ खाना मिलता था, बल्कि कुछ दान भी मिल जाता था। भोले-भाले लोगों को ठगने में भी उन्हें महारत हासिल थी।

दिन भर टुकी मिसिर दूसरों के सामान को पलक झपकते ही उठाकर अपने घर में छुपा लेने की कला भी सीख गए थे। दो कमरों का उनका घर किसी गोदाम से कम नहीं था। यही वजह थी कि उनका घर चूहों का अड्डा बन गया था, क्योंकि वे घर का कचरा फेंकना तो दूर की बात, दूसरों के कचरों से भी कुछ चुनकर अपने घर में लाकर रख देते थे। वे जिस ऊर्जा के साथ अपने घर में हर तरह के सड़े-गले और टूटे-फूटे पुराने सामान जमा करते थे, मानो कुछ दिनों बाद वह सोने में तब्दील होने वाला हो! 

टुकी मिसिर को बीड़ी पीने की बड़ी बुरी लत लग गई थी। जब वे छोटे बच्चे थे, तो पड़ोस की बुधिया काकी के लिए दुकान से बीड़ी ख़रीद कर लाते थे। गाँव में ब्राह्मण औरतों के घर से निकलने पर एक तरह की पाबंदी होती है। घर के भीतर उनके साथ जैसा भी बुरा सलूक हो, सब जायज़ माना जाता है, क्योंकि यह सब तो घर के अंदर ही होता है।

बुधिया काकी के पति शंभु मिसिर दिन भर मुखिया के दरवाज़े पर बैठे रहते थे। एक तरह से वे मुखिया के चमचे थे—मुखिया की हर बात में ‘हाँ’ भरते थे, और बदले में मुखिया के यहाँ उन्हें चाय, नाश्ता और खाना मिल जाता था। जब भी मुखिया दारू पीते, तो गिलास धोने से लेकर चखने का इंतज़ाम तक शंभु मिसिर करते थे। जब दारू चलती, तो गाँजे की चिलम भी जलती थी।

बुधिया काकी ने खाया या नहीं, घर में तेल, मसाला, साग-सब्ज़ी है या नहीं—इससे उनके पति को कोई मतलब नहीं होता था। जिस दिन मुखिया के घर से खाना नहीं मिलता, उसी दिन वे घर का खाना खाते थे।

शाम होने के बाद बुधिया काकी बीड़ी पीते हुए अपने मालिक के घर आने का इंतज़ार करती रहती थीं। बचपन से ही टुकी मिसिर बुधिया काकी को बीड़ी पीते देख-देखकर बीड़ी पीना सीख गए। वक़्त गुज़रने के साथ टुकी मिसिर की बीड़ी पीने की लत उनके शरीर से भी ज़्यादा तेज़ी से जवान होने लगी।

बीड़ी की गंध सूँघते ही टुकी मिसिर बेचैन हो जाते थे। उनकी समस्या यह थी कि बीड़ी ख़रीदने के लिए उनके पास अक्सर पैसे नहीं होते थे। अगर कभी कुछ पैसे होते भी, तो कंजूसी की वजह से वे उन्हें खर्च नहीं करना चाहते थे। उन्हें बीड़ी भी पीनी है और पैसे भी खर्च करने से बचना है। यही वजह थी कि वे बीड़ी पीने वालों के पास बिन बुलाए जाकर बैठ जाते थे, ताकि कोई उन्हें बीड़ी पीने में शरीक कर ले। 

टुकी मिसिर कई सारी दुकानों से बीड़ी उधार पर ले चुके थे, और जब दुकानदार ने पैसे के लिए टोकना शुरू किया, तो उन्होंने उस दुकान पर जाना ही छोड़ दिया और नई दुकान की तलाश में लग जाते।

गाँव कोई शहर तो है नहीं कि हर क़दम पर दुकान मिल जाएगी। गाँव में तो कुल चार ही दुकानें थीं—तीन ब्राह्मण, बनिया और कायस्थ के इलाक़े में, जहाँ से सब जाति और धर्म के लोग सामान लेते थे, और एक दलितों की बस्ती में, जहाँ से दलितों को छोड़कर कोई नहीं जाता था।

मगर टुकी मिसिर की बीड़ी की लत ऐसी थी कि उन्होंने दलित बस्ती वाली दुकान से भी बीड़ी उधार लेना शुरू कर दिया था, और तब तक लेते रहे, जब तक कि दुकानदार ने पुराने हिसाब न चुकाने की वजह से नया सामान देने से मना नहीं कर दिया।

दलित बस्ती से बीड़ी ख़रीदने की वजह से ब्राह्मणों ने टुकी मिसिर को बुरा-भला भी कहा और जात से निकालने की धमकी भी दी, मगर मुफ़्त की बीड़ी कोई भी जात-बिरादरी का आदमी दे दे तो टुकी मिसिर को उससे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता था। 

जब टुकी मिसिर को कहीं भी मुफ़्त की बीड़ी पीने को नहीं मिलती थी, तो मजबूरी में वे आधा किलो धान लेकर दुकान पर उसे बेचने के लिए निकल पड़ते थे। आधा किलो धान को बोरी से निकालने और बेचने में उनकी जान निकल जाती थी। 

घर में नक़द न होने की वजह से किसान के पास अनाज बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता था। चूँकि गाँव के दुकानदार अपना सामान नक़द से भी बेचते थे, और जिनके पास नक़द नहीं होता था उनसे अनाज के बदले सामान दे दिया करते थे। यह एक तरह के ‘बार्टर सिस्टम’ की तरह काम करता था। इस ‘एक्सचेंज’ प्रणाली में दुकानदारों को ज़्यादा फ़ायदा होता था, क्योंकि वे अनाज सस्ते दाम पर ख़रीदते थे और तौलते समय न सिर्फ़ डंडी मारते थे, बल्कि उनका एक किलो का पत्थर का बटखरा भी सवा किलो का होता था।

जब कभी टुकी मिसिर आधा किलो धान लेकर दुकान बीड़ी ख़रीदने जाया करते थे, तो वे सोचते रहते थे कि इस धान को उगाने में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी है, मगर बीड़ी के धुएँ के लिए वे अपनी ही मेहनत में आग लगा रहे हैं।

धान की रोपाई के समय का मंज़र उनकी आँखों के सामने उभर आता था—किस तरह उन्हें घंटों पानी से भरे खेत में खड़ा रहना पड़ता था। कीचड़ की वजह से उनके पैरों की उँगलियों में खुजली होने लगती और कई बार वे सड़ भी जाती थीं। कुछ अवसरों पर उन्हें कीड़ों ने भी काटा था। दिन भर खेत में रोपाई करने के बाद, जब शाम को वे घर लौटते, तो पैरों को धोते और फिर उँगलियों के बीच में गरम तेल डालते, ताकि सड़न जल्दी ठीक हो जाए।

रास्ते भर टुकी मिसिर सोचते रहते कि आधा किलो धान का भात बन जाए, तो एक इंसान का पेट भर जाएगा; मगर उसी धान को वे बीड़ी के लिए—जो मुफ़्त में खाँसी ही देती है—दुकानदार को बेच रहे हैं। हालाँकि अगले ही पल उनके दिमाग़ में यह ख़याल भी आता कि कमाया आखिर किस लिए जाता है? अगर शौक़ पूरे ही न हों, तो फिर सारे धन का क्या फ़ायदा?

मगर जब वे धान बेचकर बीड़ी लाते, तो बड़े आराम से उसे पीते। सोकर उठते ही जब गाँव के दूसरे ब्राह्मण भगवान का नाम लेते, टुकी मिसिर बीड़ी जलाना शुरू कर देते थे; और बीड़ी पीते-पीते खाँसने का सिलसिला भी शुरू हो जाता था।

एक दिन टुकी मिसिर सुबह-सुबह बीड़ी पी रहे थे कि अचानक उनके दिमाग़ में एक ‘आइडिया’ आया। वे यही चाहते थे कि उन्हें बीड़ी पीने को भी मिल जाए और घर का अनाज भी घर में ही बचा रहे। चूँकि गाँव के लोगों ने पहले ही उन्हें बीड़ी देना बंद कर दिया था और दुकानदारों ने भी कब का उधार देने से मना कर दिया था, इसलिए उन्हें किसी नए रास्ते की तलाश थी। आज रात वे उसी रास्ते पर चलकर अपनी तलब पूरी करने का इरादा कर चुके थे।

रात में जब सब लोग खाना-पीना खाकर सो रहे थे, तब टुकी मिसिर घर से टॉर्च लेकर बाहर निकले। उन्होंने अपने ‘प्लान’ के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया—अपनी पत्नी को भी नहीं, जो दूसरे कमरे में सो रही थी। रात के अँधेरे में वे टॉर्च लिए बाज़ार की तरफ़ निकल पड़े। 

गाँव से पूरब की ओर पाँच मिनट पैदल चलने पर एक प्राइमरी स्कूल था, जहाँ पर कुछ ज़मीन ख़ाली थी। हर शाम सब्ज़ी वाले यहाँ अपनी टोकरी रखकर अपना सामान बेचते थे। बग़ल में एक मंदिर था। मंदिर के पास बरगद का एक पुराना पेड़ था। कुछ साल पहले, जब मुखिया जी की माँ का स्वर्गवास हुआ था, तो पंडित के कहने पर मुखिया जी ने मंदिर की मरम्मत करवाई थी और पास के बरगद के चारों तरफ़ एक चबूतरा बनवाया था, जहाँ कुछ लोग दिन भर ताश खेलते थे और उनमें से कुछ वहीं बीड़ी भी पीते थे।

गाँव में लोग शाम ढलते ही खाने और सोने की तैयारी करने लगते हैं। शहर के लोग जब शाम को ‘मार्केटिंग’ करने निकलते हैं, तो आधा गाँव सोने के लिए बिस्तर पर लेट जाता है। शहरों की तरह गाँव में बिजली और ‘स्ट्रीट लाइट’ नहीं थी। इसलिए हर तरफ़ अंधेरा पसरा हुआ था। गाँव के कुत्ते भूख से भौंक रहे थे। मगर इन सब से टुकी मिसिर बेफिक्र थे। उनके ऊपर बीड़ी की लत का ऐसा नशा छाया था कि अगर कोई कह दे कि शेर की गुफा में बीड़ी का एक पैकेट रखा हुआ है, तो वह उसे पाने के लिए दौड़ पड़ते।

रात में जब सब सो रहे थे, तो टुकी मिसिर चुपके-चुपके मुखिया जी के बरगद के पेड़ की तरफ़ बढ़ने लगे। पूरे रास्ते भर वह यही सोच रहे थे कि अगर किसी ने उन्हें देख लिया तो कल से गाँव में मुँह दिखलाना मुश्किल हो जाएगा। अंदर से थोड़ा बहुत डर तो लग ही रहा था कि कहीं कुत्ता न काट ले। कुछ ही दिन पहले किशून पधेया (उपाध्याय) के घर के पास काले कुत्ते ने दो लोगों को काट लिया था और फिर उन्हें मोतिहारी सदर अस्पताल जाकर सुई लगवानी पड़ी थी।

जब वह किशून पधेया के घर से गुज़र रहे थे, तो मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। सांस को थामे वे चुपके से गुज़र रहे थे। काला कुत्ता सड़क के किनारे बैठा उन्हें देख रहा था। टुकी मिसिर को यह मालूम था कि कुत्ता कितना भी ख़तरनाक क्यों न हो, उसके पास से गुज़रते वक्त न तो डरना चाहिए और न ही भागना। हालाँकि, उनकी हालत अंदर से पतली थी, मगर वे बाहर से निडर बने हुए थे। जैसे-जैसे वे कुत्ते को पार करके आगे बढ़े, उनकी निकली हुई जान फिर से वापस आने लगी। मगर दूर तक वे पीछे मुड़कर देखते रहे कि कहीं कुत्ता उनका पीछा तो नहीं कर रहा है।

रात के काले अंधेरे में वह बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गए। इधर उधर देखा तो दूर तक कोई नज़र नहीं आया। उनको इस बात की ख़ुशी हुई कि वह जो कुछ भी करने जा रहे हैं उसे गाँव का कोई भी आदमी नहीं जान पाएगा। अचानक से टुकी मिसिर ने अपनी टॉर्च जलाई और पेड़ के चबूतरे के आस पास कुछ ढूँढने लगे। दिन भर चबूतरे के आस पास लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। लोग वही बैठ कर ताश खेलते हैं। ताश खेलते वक़्त बीड़ी बात बात पर जलती है। बीड़ी के कश को खींचते वक़्त, ताश के खिलाड़ी पत्ते फेकते हैं और हारने वाले अपने प्रतिद्वंदी पर जुमले कसते हैं।

 

टॉर्च की लाइट में टुकी मिसिर बड़ी तेज़ी से वहाँ आस-पास बिखरी हुई बीड़ी के टुकड़े चुन रहे थे। अंदर से इस बात का डर भी था कि कोई उन्हें यह सब करते हुए देख न ले। मगर जैसे-जैसे उन्हें बीड़ी के टुकड़े मिलते, उनके दिलों में आँधी में आम चुनते छोटे बच्चों की तरह ख़ुशी होती। कुछ ही देर में उनके पास दर्जनों बीड़ी के टुकड़े मिल गए। वह अंदर ही अंदर खुश हो रहे थे कि चलो, कई दिनों का काम हो गया। 

बीड़ी के टुकड़े उन्होंने अपनी अगुच्ची में बंधा। सोचा कि घर जाकर इत्मीनान से पियेंगे। मगर तलब का ज़ोर ऐसा था कि रहा नहीं गया और झटसे बीड़ी के एक टुकड़े को उन्होंने जला दिया। बीड़ी को जैसे-जैसे वह खींचते, उन्हें ऐसा महसूस होता कि भगवान ने ज़िंदा रहते ही उन्हें स्वर्ग में पहुँचा दिया हो। बीड़ी खींचते वक़्त वह मन ही मन सोच रहे थे, “क्या बुराई है इसमें? लोगों के पास पैसे बहुत हैं, तो वह थोड़ी बीड़ी पीकर फेंक देते हैं। इस तरह से बीड़ी को बर्बाद करना ठीक थोड़े ही है? पैसे हैं तो क्या है, चीज़ों को नुक़सान करोगे?”

बीड़ी के अभी दो कश भी नहीं लिए थे कि उनके पीछे से आवाज़ आई।

“जा हो राजेंद्र, गाँव के नाम पर कलंक हो! ब्राह्मण के कुल में पैदा हो कर तुमने सब सत्यानाश कर दिया। तुम फेंकी हुई बीड़ी का टुकड़ा पी रहे हो। जब नशे के लिए जेब से पैसे नहीं निकलते, तो नशा छोड़ क्यों नहीं देते? भिकारी कहीं का… टुकी बीड़ी पिता है… टुकी बीड़ी…।”

दरअसल, किशून पधेया किसी मर्त्यु-भोज में पेट से चार गुना ज़्यादा खा कर लौटे थे। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी खुराक कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही थी। कहीं भी भोज का मौका आता, तो उसकी तैयारी वह कई दिन पहले से करते थे। भोज से एक-दो दिन पहले हल्का खाना लेने लगते थे, ताकि मौके पर छक्के लगा सकें। मगर आज के भोज से लौटने के बाद उनका पेट भारी सा हो गया। कुछ घंटों के बाद पतला दस्त आने लगा। खेत से शौच कर के आते और हाथ भी नहीं धो पाते कि फिर लोटा लेकर खेत में निकल पड़ते थे।

जिस दिन टुकी मिसिर बीड़ी चुन रहे थे, उसी वक्त किशून पधेया बरगद के पास के खेत में शौच कर रहे थे, और टॉर्च की लाइट में उन्हें सब कुछ दिख गया। अगले ही दिन किशून पधेया ने पूरी बात गाँव में फैला दी। गाँववालों ने इस पूरे मामले को बड़े चटकारे से सुना और मिर्च-मसाला लगाकर इसे दूसरों को भी सुनाया। टुकी मिसिर को बात-बात पर लोग पकड़ कर इस मामले पर बात करना चाहते। दरअसल, यह सब उनका मज़ा लेने के लिए होता था।

न सिर्फ़ टुकी मिसिर, बल्कि उनके परिवार वालों का भी हर तरफ़ मज़ाक उड़ने लगा। देखते ही देखते राजेंद्र मिसिर को लोग टुकी मिसिर कह कर पुकारने लगे। गाँव में नाम बदलने के लिए कोई ‘एफिडेविट’ नहीं बनता। माँ-बाप ने भले ही उनका नाम बड़े प्यार से रखा हो, मगर गाँव वाले अपने ढंग से लोगों का नामकरण करते हैं। देखते ही देखते राजेंद्र मिसिर टुकी मिसिर हो गए। शुरू-शुरू में तो टुकी मिसिर के घरवालों ने काफ़ी एतराज किया, मगर धीरे-धीरे सब ‘नार्मल’-सा हो गया।

लेखक अभय कुमार

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ISSN 2394-093X
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