स्त्री सुन्दरता के नये पैमाने : आत्ममुग्धता से आत्मकुंठा तक

मेट्रो में, बस में, सड़क पर,बाज़ार और यहाँ तक की घर में आप गौर करेंगे तो स्त्री-पुरुष के बीच अप्राकृतिक रूप से सुंदर लगने के प्रति एक खास रुझान दिखाई देगा। दिखने और देखे जाने की इस प्रवृत्ति ने मानवजाति को अन्य पशु-जातियों से अलग एक ऐसे प्राणी के रूप में लाकर खड़ा कर दिया है की वह अजूबा बना चुका है।खुद को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता ने इन्सान के भीतर कई कोम्प्लिकेश्न्स को भी जन्म दिया है।ऐसा लगता है मानवजाति के पास खुद को संवारने-सजाने और ‘सुंदर’ दिखाने की एक प्रतिस्पर्धा छिड़ गई हो। यह प्रवृत्ति स्त्री-पुरुष दोनों के बीच देखी जा सकती है। इस मानसिकता ने मानव शरीर में कई भिन्नताओं को खोज निकाला जो उन्हें एक-दूसरें से ‘भिन्न’ ही नहीं बतलाते बल्कि इस धरती पर सबसे अनूठा और हास्यपद प्राणी के रूप में पेश करता है। सुंदर दिखने, आकर्षण लगने, रिझाने की यह कला अन्यों प्रजातियों में भी है।अपनी सुन्दरता से मोहने या आकर्षक लगने का काम नर ही किया करते हैं।मोर अपनी सुंदरता से मोरनी को आकर्षित करता है, ऐसे ही कई नर जीव संबंध और प्रजनन के लिए अपनी सुन्दरता का उपयोग भी करते हैं।लेकिन सुन्दरता ही उनके लिए सर्वोपरी कभी नहीं रही न ही यह जीने-मरने का प्रश्न से जुड़ा था जैसे आज स्त्री-पुरुष के बीच है।

सुदंरता और उसे महसूस करने के अनुभवों को केवल कुछ खास इन्द्रियों तक सीमित कर दिया गया है और इससे सौन्दर्य शरीर के कुछ खास अंगों तक सिमट कर रह गया। वह आन्तरिक विशेषता से ज्यादा देखे जाने, उपभोग किये जाने में बदल गई है।सुंदर लगने की यहप्रवृत्ति, यह दबाव धीरे-धीरे पुरुषों से  स्त्रियों के जिम्मे आगया है। सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से उपजीसौन्दर्य की क्रूर और दकियानूसी धारणाओं ने नर-मादा को‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ बनने पर अत्यधिक जोर दिया है। स्त्री-पुरुष की शारीरिक भिन्नताओं के आधार पर आज उनमें इतनी भिन्नताएं पैदा कर दी है की वह नितांत एक-दूसरे से भिन्न दिखे। पितृसत्तात्मक समाज ने सुन्दरता का जिम्मा स्त्रियों के लिए इसउपक्रम को बहुत सामान्य बनाकर पेश किया।असाधारण दिखने की लालसा, अन्य स्त्रियों से भिन्न नजर आने की कुंठा ने स्त्री को अपने ही शरीर के प्रति संदेह को पाला और पोषित किया।इसने शरीर के प्रति महसूस करने वाली स्वभाविक संवेदनाओं को भी बदल कर रख दिया है। आधुनिक समाज में आज स्त्रियाँ अपने चेहरे और शरीर के प्रति कई धारणाओं, चिंताओं से घिरा हुआ महसूस करती हैं, उनका चेहरा बहुत सुंदर और आत्मविश्वास से भरा दिखाई देगा लेकिन भीतर से वह खुद को सुंदरदिखाने के अत्यधिक दबाव से दबी हुई महसूस करती हैं।

सुन्दरता के पैमानों पर खरे उतरने का दबाव उन पर हमेशा रहता है। मेकअप और सजने-संवरने की यह प्रवृत्ति बचपन से उनके भीतर डाल दी जाती है। कपड़े,आभुषण, सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्रियों की कभी न खत्म होने वाली सूची है जिसमें सभी वर्ग,उम्र और पद की स्त्रियों के लिए कुछ न कुछ मौजूद है।यह हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है की खुद स्त्री ने इस देह को उस तरह दिखाने के लिए क्या कुछ नहीं किया।साहित्य, फैशन, फिल्मों और सोशल मीडिया ने स्त्री देह को प्रस्तुत करने के कई तरीके ईजाद कर दिए है। जिसने स्त्री की एक अलग ही छवि को गढ़ा है।इस नई छवि को लेकर स्त्री स्वयंआत्ममुग्ध और दुविधाग्रस्त दोनों है।क्योंकि यह छवियाँ पितृसत्तात्मक प्रतिमान से गढ़ी गई हैं जिसने स्त्री को केवल वस्तु में रूपांतरित कर दिया है। उसके चारों तरफ भ्रम फैलाया है। उसे एक तरफ नई पहचान देकर उसे ‘आजाद’ दिखाने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ स्त्री के भीतर आत्मविश्वास और संदेह को भी बरकरार रखा है, जैसे स्त्री शरीर उपभोग की जाने वाली कोई वस्तु हो।आधुनिक पूंजीवादी समाज में सुंदर दिखने के लिए स्त्री अपनी जान को खतरें में डाल कर तमाम तरह के हथकंडे अपनाने से भी पीछे नहीं है। गोरा दिखने, एच डी ग्लो पाने, क्रिस्टल क्लियर ग्लास स्किन, स्किन ब्राईट, फ्यूचर ब्राईटजैसी अतार्किकबातों को सबसे जरूरी बातें बना कर पेश की जाती है।

‘नारीवादी निगाह से’ पुस्तक में निवेदिता मेनन न्यूड मेकअप के पीछे की जालसाजी पर लिखती हैं“न्यूड मेकअप में आपकी त्वचा एकदम ताज़ा और ओस से भीगी नजर आती है।ऐसा मेकअप करने के बाद आपको यह लगता ही नहीं कि आपने मेकअप जैसा कुछ किया भी है। इसके लिए कुल मिलाकर एक आई-लाइनर, मस्कारे,न्यूड लिपस्टिक और एक ब्लश की जरूरत पड़ती है जिससे आपकी त्वचा में एक प्राकृतिकचमक पैदा हो सके। इसमें घंटों लगते हैं और इतना फिजूल है की उसके बाद साफ़ करने में भी आपकी शक्ति लगती है।”[1]कुलमिलाकर मेकअप एक ऐसा मुखौटा है जिसके पीछे आप अपने असली रूप को छिपा रहे हैं। सुंदर दिखना आज प्राकृतिकरहा ही नहीं। आज सर्जरी और चिकित्सक के जरिये असुन्दर को सुन्दर भी बनाया जा रहा है।वह भी खरीदी और बेची जाने का व्यवसाय का रूप ले चुकी है, जिसके ग्राहकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है।जाहिर है इस तरह की अर्जित सुन्दरता भी एक खास वर्ग की मुट्ठी भर स्त्रियों के पास ही है। गरीब, श्रमशील स्त्रियों के लिए नहीं उन्हें असुन्दर ही समझा जाएगा।सुंदर औरअसुंदर स्त्रियों को उपेक्षित और शोषित करता है।क्योंकि तमाम सौंदर्य प्रसाधनों पर पहुंच सबके वश की बात नहीं।यह एक तरह से पितृसत्तात्मक सौन्दर्य के यह पैमाने स्त्री-पुरुषमें भिन्नता ही नहीं पैदा करते बल्कि यह अमीर और गरीबमें भी एक बहुत बड़ा फर्क पैदा करते हैं।यह जातिवाद को बढ़ावा देता है।हीनता बोध महसूस करवाता है।

क्योंकी स्त्री सुन्दरता और उससे जुड़े मुद्दे स्त्री के सोचने, उसके जीने और महसूस करने से जुड़ता है तो यह बहुत जरूरी है जानना की वह कौन से कारण हैं जो स्त्री सुन्दरता, स्त्री छवि को वैसा बनाये रखने में सहयोग करती है। इस तरह यह मुद्दा स्त्री मुक्ति और स्त्री सौन्दर्य के बीच के रिश्ते से भी जुड़ा हुआ है।क्यूंकि यह आज उतनी ही अधिक सख्ती और क्रूर रूप से स्त्री सौन्दर्य की छवियाँ पर हावी है जो आत्मघृणा, बढ़ती उम्र का आतंक, अपना नियन्त्रण खोने का डर जैसे विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। इससे अनजाने ही एक विभाजन खड़ा होजाता है कौन सुंदर है और कौन असुन्दर।पितृसत्तात्मक समाज के चलते स्त्रियाँ सहमती से, कभी दबाव से इन पैमानों पर खरा उतरने की कोशिश करती है।सुंदरता का पैमाना भी समय और समाज, विभिन्न समुदायों, वर्गों में अलग-अलग है लेकिन इसने हमेशा एक को कमतर, असहज और अप्राकृतिकदिखाने पर जोर दिया है। यह न केवल स्त्रियों के बीच एक तरह का विभेद कायम रखता है वरन पुरुषों के समक्ष स्त्री शरीर को उपभोग की जाने वाली किसी रहस्यमयी वस्तु के रूप में रखता है।

नारीवादी चिंतक और लेखिका नाओमी वुल्फ के अनुसार सुन्दरता कीविचारधारा पुरानी स्त्री विचारधाराओं में से आखरी बची हुई विचारधारा है, जो अभी भी महिलाओं को नियंत्रित करने की शक्ति रखती है।मेरे ख्याल से यह बात विकाशील हो या विकसित देशों में सभी पर समान रूप से कायम है।सौन्दर्य मिथक स्त्रीके शरीर के प्रति गलत धारणाओं को मजबूत कर रहा है बल्कि, राजनीतिक हथियार के रूप में स्त्री सौन्दर्य की छवियों का उपयोग भी करता है।वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों ने इसे अपनी शक्ति को बचाए रखने, अपना नियन्त्रण बनाये रखने की जुगत के रूप में समझा।सौन्दर्य आज शक्ति संबधों की अभिव्यक्तिव है। यह एक तरह से पुरुष वर्चस्व में अपनी हिस्सेदारी से भी जुड़ा है।जो असल में पुरुष प्रभुत्व को बनाये रखने उसे बरकरार रखने पर जोर देती है।जैसा की नाओमी वुल्फ अपनी किताब ‘द ब्यूटी मिथ’ में बताती हैं की सौन्दर्य मिथक महिलाओं के बारें बिलकुल नहीं है यह पुरुषों की संस्थाओं और संस्थागत शक्ति के बारे में है। सौन्दर्य के प्रति आपकी सचेतता वास्तव में व्यवहार को निर्धारित करता है। महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा को मिथक का हिस्सा बना दिया है ताकि महिलाओं को एक-दूसरे से न सिर्फ अलग देखा जाये बल्कि इस सोच को और ज्यादा मजबूत भी करता है की वह उन जैसी बिलकुल नहीं है, वह असाधारण हैं।

जब से पितृसत्ता है, तब से किसी न किसी रूप में सौन्दर्य मिथक रहा है।आज जिसे सामान्य व्यवहार की तरह आदत में शामिल कर लिया गया है।नाक, होंठकेआकारयात्वचा के रंगकेप्रतिहीनतबोधस्त्रियों में एक प्रकार की समस्या के रूप में उन पर हावीरहता हैजिससेउन्हें बॉडीडिसफॉर्मिकडिसॉर्डरजैसीगंभीरबीमारीघेरलेतीहैं।ऐसेलोगआजीवनअपनेशरीरकेप्रतिअसन्तुष्टरहतेहैं।असहजताहीसुंदरताकापर्यायबनचुकीहैंऔरस्त्रियांइसमेंअपनेआपकोढालनेकाकामबखूबीकरतीहैं।दुनियाभरमें नारीवादियों ने स्त्रियों को चेताया है स्त्री शरीर को लेकर भ्रमित और रूढ़ छवियों को तोड़ा है। अलग-अलग देशों मेंमहिलाएंअपनेकम्फर्टऔरसुरक्षाकेलिएबेझिझकलड़ीहै ‘बर्निंगब्रा’मूवमेंटइसकाउदाहरणहै।“मुक्ति की निशानी मिनीस्कर्ट पर भी बात कर ली जाये ।प्रतिबंधों से त्रस्त बहुत से नारीवादियों ने जिनमें पश्चिम के नारीवादी भी शामिल हैं, यह बात दर्ज की है कि झीने या देह-दिखाऊ कपड़े पहने की ‘आजादी भी उस लैंगिक संस्कृती का ही अंग है जो बाज़ार की सदारत में परवान चढ़ती है क्योंकि इसमें देह के एक खास हिस्से-जवान, तराशे हुए और रंग-रोगन से दमकते हिस्से का ही प्रदर्शन किया जाता है।”[2]

सुंदरताको इतनी अहमियत क्यों मिलती है? और ऐसेसौंदर्यकीसामाजिकभूमिकाक्याहै? जबचारोंतरफएकजैसेलोगही दिखनेवालेहैं।मानवीय संवेदनाओं, इन्द्रियों को सम्मोहन शक्ति को कुछ समय तक अपने नियन्त्रण करने की प्रबल इच्छा इसे जन्म देती है।हम समूह से अलग तो नही दिख रहे इस का जरा सा भी डर हमारा आत्मविश्वास कम कर देता है। दुखद तो यह है की हर रोज ऐसा उपक्रम किया जाता है की पहले से अधिक सुंदर और भिन्न कैसे दिखा जाये जो एक थका देने वाला काम है। यह कभी न संतुष्ट होने वाला काम बन चुका है। बाहरी आवरण को ही सब कुछ मान लेने से सुन्दरता आज बहुत सस्ती और साथ ही बहुत गैर जरूरी लेकिन उपयोगी बन चुकी है।

नामोमी वुल्फ़ कहती है “ब्यूटी एक मर्दवादी पूंजीवादी मिथ है[3]मीडिया, विज्ञापन, फिल्मों में भावरहित कामुकता पर जोर दिया जा रहा है। क्या ‘ग्लैमर’ पुरुष की नई व्यवस्था नहीं है?”[4] जिसमें स्त्री का मनचाहा प्रयोग हो रहा है वो भी स्त्री की बगैर इजाजत के।क्योंकि वह तो देह से जुड़े झूठे लुभावनो में जकड़ी हुई होती है।‘सौन्दर्य पोर्नग्राफी’ कृत्रिमरूप से एक वस्तुगत ‘सौन्दर्य’ को सीधे और स्पष्ट रूप से कामुकता से जोड़ती है। पश्चिम के देशों में फिल्म, फैशन इंडस्ट्री, सौन्दर्य आयोजन और प्रतिस्पर्धाओं, मेट गाला जैसे आयोजनों ने स्त्री छवियों को उनकी कामुकता का उपभोग करने, प्रदर्शनी की तरह कई मौके दिए।जिसमें अभिनेत्रियां ही नहीं अभिनेता भी अजीबो गरीब वेशभूषा में दिखाई देते है। एक-दूसरे से अलग दिखने की उनके बीच एक तरह की होड़ को देखा जा सकताहै।

आज भारत में भी उसी तर्ज पर उर्फी जावेद का नाम लिया जा सकता है।कद काठी में सामान्य, सामन्ती परिवार की लड़की जो अपनी छवि को लेकर,अपनेशरीरके प्रति आत्ममुग्धताने उसे एकप्रदर्शनी में बदलदिया है। अब आकर्षित करने का तरीका बदल गया।अब कपड़े आपको परिभाषित नहीं करते बल्कि, आप उन्हें परिभाषित कर रहे है।यह वह सांस्कृतिक दबाव है जो स्त्रियों को एक खास तरह के कपड़े पहनने के लिए मजबूर करता है।यह दबाव उन्हें चाहें अपनी देह को ज्यादा दिखाने के लिए विवश करता है या छुपाने के लिए दोनों ही मामलों में यह सरोकार वेशभूषा पहनावे से ज्यादा उस ताकत से है जो उन्हें ऐसादिखने के लिए, ऐसा महसूस करने के लिए मजबूर करती है।उसे ही सबसे बड़ा सच मान बैठती हैं।कपड़ो के नाम पर कतरनें, शरीर को रंगना, जंजीर, मार्बल, फूलों, चांदी की वर्क,चाबी, नेट, सिम कार्ड, चेस्टेटी बेल्ट जैसी दिखने वाली ड्रेसज, घड़ियों से बनी पोशाकें हैं जिन्हें आकर्षक कहना भी गलत होगा। यह उसे फूहड़ दिखता है।उर्फी की यह देह प्रदर्शन एक तरह की यौन अश्लीलता नहीं तो और क्या है ?

इस झूठी चयनशीलता ने स्त्री को और भी असुरक्षित भावना से भर दिया है। देह के बनाये इस तिलिस्म का प्रभाव इस कदर है की उससे अलग दिखने वाली साधारण देह जो बनावटी न हो, सहज और स्वस्थ है उसे नकारे जाने पर जोर देती है।सुन्दरता का पैमाना एक खास तरह से ढाली गई देह से जोड़ दिया गया है।एक नयामूल्यबोधबनचुकाहैस्त्रीसौंदर्य का। स्त्री देह देखने निहारने और घूरने अचंभित कर देने वाली कोई चीज बन गई है। शायद स्त्री की कृत्रिमछवि का सर्वाधिक दोहन आज आधुनिक समाज में किया जा रहा है। स्त्री खुद इसमें अपना सहयोग दे रहीं है।नारीवादी लेखिका नाओमी वुल्फ पुस्तक ‘ब्यूटी मिथ’ में लिखती हैं की “ब्यूटी मिथ ने औरत की आजादी को मोड़ कर उसे चेहरे और देह में बदल दियावह सवाल उठाती है क्या हम स्त्री देह की अन्य अवधारणा और रूप की कल्पना कर सकते है ? क्या सुन्दरता वाकई सेक्स है? क्या एक स्त्री की यौनता उसके रूप में निहित है[5]

पारंपरिकऔरआधुनिककेमिलेजुलेइससमाजमेंकेंद्रमेंबनेरहनेकेलिए, जल्दीप्रभावितकरनेऔरआकर्षकदिखनेकीभूखभीबड़ीहै। लेकिन “आधुनिक औरत की छवि को सुन्दरता की मिसाल की तरह पेश करना एक अंतर्विरोधी बात है[6] पूंजीवादी, उपभोगतावादी नजरिये ने स्त्री को जितना ‘आजाद’ महसूस करवाया उससे ज्यादा उसने उसे अपनी शर्तों पर कैद भी किया है। एक स्वतंत्र ख्यालों वाली, मजबूत स्त्री के मुकाबले उसने स्त्रियों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो पल भर में किसी को भी, कहीं भी सुंदर और आकर्षित करने की क्षमता रखती है।भले ही व्यहारिक रूप से वह एकबिम्बोही हो। वह उन तंग कपड़ो में भी अपने आपको सहज करवाने की भरपूर कोशिश करती है और उन जूतों से भी जो तकलीफदेह हो।जिसे पहन वह ज्यादा आत्मविश्वासी होने का ढोंग करती दिखाई देती है।जो मेडोना की ‘मटिरियल गर्ल’ की छवि को ही दिखाता है।जिसके बारे में “कहा गया है की मडोना ने एक ऐसा यौन-यूटोपिया प्रस्तुत किया है जो महान अमरीकी स्वप्न को साकार करता है[7] क्या उर्फी मडोना की इस मटिरियल गर्ल से ही प्रेरित नहीं है। यह स्त्री छवि पुराने प्रतिमानों को बदल रही है जो खुद एक मानक बनने को आतुर नजर आती है।

    नारीवादीलेखिका,चिंतक जर्मेन ग्रीयर कहती हैं “हर युवा और खुबसुरत स्त्री के मन में सपना हो सकता है कि वह छलांग लगाकर सामाजिक  सीढ़ी के शीर्ष पर पहुंच जाए और अपने शुद्ध, सहज, सौन्दर्य से ऐश्वर्य की दमक को फीका कर दे[8]उर्फी जावेद की निर्भीकता चौकांती है लेकिन उसके भीतर के हीनताबोध को भी दिखाती है जो स्वभाव से मुंहफट लगती है लेकिन अपनी सहज दिखने को लेकर उसका यह मुंहफट अदृश्य हो जाता है और अजीब पोशाकों के बीच दबी-धंसी हुई एक कमजोर लड़की दिखाई देगी जो अपने चेहरे के निशान, लकीरों से, बिना मेकअप के खुद कोदेखना उसे भयभीत करता है, गिल्ट पैदा करता है।

मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट के शब्दों में “सुन्दरता स्त्री का राजदंड है, बचपन से ही यह सीखते हुए मांस खुद को शरीर के अनुरूप ढल लेता है और अपने सुनहरे पिंजड़े में घूमता सिर्फ अपने कारागार को सजाना चाहता है[9]जिसे स्त्री के लिए कमी समझा गया है वह सुन्दरता निजी देखभाल से बहुत अलग है।स्त्री देह से जुड़े कई अंतर्विरोध हमेशा से रहे है आज भी है। अपनी देह को परिभाषित करने का जिम्मा भले आज स्त्री ने अपने हाथ में ले लिया हो लेकिन उसकी कमान हमेशा पुरुषों ने अपने हाथ में रखी है।स्त्री को अपनी ही आत्ममुग्धता में इतना व्यस्त रखा गया की उसके भीतर हमेशा खालीपन रहा। वह व्यक्तिवान प्राणी नहीं रह जाती।

देहकेप्रसंगमेंसौंदर्यऔरअश्लीलताकीबहसबहुतपुरानीहै।स्त्री और पुरुष दोनों की ही प्रतिमाओं में नग्नता सराही भीगई है। अजन्ता कि गुफाओं से लेकर राजा रवि वर्मा तक, कला का कोई भी रूप देह की नग्नता को उसके वीभत्स रूप अश्लीलता में नहीं देखता। बल्कि, यह हमारे देखे जाने के आग्रह उन मानको को बदलने का प्रयास भी करता रहा है जो हमें बताता है क्या अश्लील है और क्या अश्लील नहीं है।असल में अश्लीलता एक अर्थ में पुरुषवर्चस्व को कायम रखने का माध्यम रहा है।हिंदी के नारीवादी साहित्य में भी यह एक मूल्य बन चुका है जिसकी परिभाषा भी वह अपने हिसाब से रचता-गढ़ता है। देह को लेकर हमारी सतकर्ता, सचेतता ही है की आजकल तो भगवान की मूर्तियों को भी कपड़े पहनाया जाता है। लेकिन एक ऐसा समय भी था जब स्त्री शरीर के ऊपरी भाग में कोई कपड़ा पहनने की मनाही थी। “जब ब्रिटिश राज के दौरान उच्चवर्गीय महिलाएं साड़ी के नीचे ब्लाउज पहनने लगीं तो उस दौर में इसे उत्तेजक माना जाता था|”[10]वैसे स्त्री देह चाहें बुर्के में हो, दस घुंघट में या जींस में वह कुछ भी पहने आलोचना का शिकार होती है।कपड़ो को लेकर मोरल पुलिसिंगतो आम बात है।जेंडर जो समाज से निर्मित होता है वह यह तय करता है स्त्री-पुरुष को कैसा दिखना चाहिए।स्त्रियों को भी मूंछे आती है यह बात लोगों कोआश्चर्य करती है जबकि, हाथ-पैरों पर उगे बालों को साफ़ करके मोम की तरह चिकना दिखाना सामान्य नजर आता है। लड़की के भी चहरे पर उगी मूंछे देख कर असुविधाजनक लगने लगता है। उस वर्ग को जो अपने इन्सान होने के सभी चिन्हों को मिटा देना चाहते हैं। सर से लेकर अंगूठे का नाख़ून तक सब कुछ नकली है। सुन्दरता को लेकर यह भ्रमआज मानसिक गुलामी को दर्शाती है।आप इस मानसिकता से जितना दूर हो रह सकते उतना ही अपने आप से प्रेम कर सकते हैं, फिर चाहें आप कैसे भी दिखते और बोलते हैं।लेकिन देह के बनाये तिलिस्म अगर आपके सोचने-समझने की शक्ति को ही प्रभावित करने लगे तो समस्या गंभीर हो सकती है।क्या इस देह की सबसे बड़ी उपयोगिता यहीं है दूसरों को आकर्षित करना? दूसरों के लिए महज आकर्षण वस्तु की तरह देखे जाने वाली यह लालसा पहले से ही दूषित मानसिकता को उकसा जरुर सकती है।लेकिन कोई स्वस्थ नजरिया नहीं देती।

बच्चे की देह हो या स्त्री-पुरुष की देह, देह से जुड़े हमारे मन में भ्रांतियां है।जिसके प्रति हम सचेत रहते है अपनी देह के भी और दूसरों की देह के प्रति भी। समय के साथ इस देह के प्रति हमारी चेतना बनती और बदलती भी रही है।बहरहाल, स्त्री देह और उसके वस्तुकरण की उस चरमस्थिति को महसूस किया जा सकता है जिसने पुरुष और स्त्री दोनों ने सहजता से अपना लिया है, इतना ही नहीं उससे भी खतरनाक यह की उसे अपनी ‘आजादी’ से जोड़ लिया है। लेकिन इसी समाज में कुछ लोग है जो सौन्दर्य के पितृसत्तात्मक प्रतिमानों का विरोध करते हैं, सहज और प्राकृतिकरूप से दिखना-देखना पसंद करते हैं। और यही स्वस्थ और प्राकृतिकतरह से जीना और सुन्दरता को महसूस करना है।

सन्दर्भ


[1]निवेदिता मेनन, नारीवादी निगाह से, अनु. नरेश गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ 07

[2]वहीं, पृष्ठ 160

[3]राजेन्द्र यादव संपा, प्रभा खेतान, अभय कुमार दुबे, पितृसत्ता के नये रूप, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, देखे लेख ‘एक अधखुला क्षण: सौंदर्य मिथक की द्वन्दात्म्कता’ सुधीर पचौरी, पेज 40

[4]वहीं, पृष्ठ47

[5]वहीं,पृष्ठ39

[6]वहीं,पृष्ठ37

[7]देवेन्द्र इस्सर,स्त्री मुक्ति के प्रश्न,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ108

[8]जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, अनु. मधु बी. जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001, पृष्ठ57

[9]मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, स्त्री अधिकारों का औचित्य, 1792, पृष्ठ 90

[10]ग्लोरिया स्टाय्नेम, वजूद औरत का- स्त्री विमर्श : प्रतिनिधि पाठ, अनु. भावना मिश्र, चयन एंव संपा रुचिरा गुप्ता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2020, पृष्ठ78

Related Articles

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles