अरुण नारायण
वीरेंद्र यादव हिन्दी के उन विरल आलोचकों में थे, जो प्रगतिशील परंपरा में खड़े होकर भी उसकी जड़ता को प्रश्नांकित करने का साहस रखते थे। वे ऐसे बौद्धिक थे जिन्होंने प्रगतिशीलता को किसी एक विचारधारा या वर्गीय सीमाओं में कैद नहीं किया, बल्कि उसे जाति, नस्ल, पितृ सत्ता, औपनिवेशिक विरोध और फासीवाद-विरोधी संघर्ष की बहुस्तरीय जमीन पर विस्तार दिया।
उनका लेखन उन आवाज़ों का पक्षधर था जिन्हें हिन्दी की मुख्यधारा ने या तो अनसुना किया या हाशिये पर धकेल दिया। उनकी वैचारिक रेंज जितनी व्यापक थी, उतनी ही विविध और गहन भी। 1857 की क्रांतिकारी विरासत से लेकर प्रेमचंद, रेणु, यशपाल, राही मासूम रजा, निर्मल वर्मा की साहित्यिक परंपरा तक, और समकालीन समय में विनोद कुमार शुक्ल से लेकर महुआ माजी और अरुंधति राय के हस्तक्षेपों तक—इन सभी विषयों को उन्होंने जिस ऐतिहासिक चेतना और आलोचनात्मक सूझबूझ के साथ संबोधित किया, वह हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में दुर्लभ है।
जीवनकाल में ही उन्होंने रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों को जिस निर्भीकता से प्रश्नांकित किया, उससे उनकी स्वतंत्र बौद्धिक मेधा और वैचारिक ईमानदारी का पता चलता है। वे किसी भी स्थापित सत्ता—चाहे वह साहित्यिक हो या वैचारिक—के आगे नतमस्तक नहीं हुए।
हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना परंपरा में वीरेंद्र यादव संभवतः पहले ऐसे बौद्धिक थे जिन्हें फुले, आंबेडकर, पेरियार और रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकी की स्पष्ट, गहन और वैज्ञानिक समझ थी। उनसे पूर्व की प्रगतिशील आलोचना में इस बहुजन वैचारिक धारा की लगभग अनुपस्थिति रही है। इस अर्थ में वीरेंद्र यादव ने न सिर्फ आलोचना को नया दृष्टिकोण दिया, बल्कि उसकी वैचारिक सीमाओं को भी तोड़ा।
उनकी कृतियां—
उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, उपन्यास और देस, प्रगतिशीलता के पक्ष में, विवाद नहीं, हस्तक्षेप, विमर्श और व्यक्तित्व आदि हिन्दी साहित्य की अमूल्य वैचारिक थाती हैं। ये पुस्तकें सिर्फ आलोचना नहीं हैं, बल्कि सत्ता, समाज और साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने की वैचारिक कुंजी भी हैं।
दुखद यह है कि उनकी रचनात्मक मेधा का श्रेष्ठ अभी आना शेष था। उनके विचारों की यात्रा अधूरी रह गई।
आज, जब देश और समाज एक गहरे फासीवादी अंधकार से गुजर रहा है, वीरेंद्र यादव जैसे निर्भीक, विवेकशील और बहुजन-पक्षधर आलोचक की अनुपस्थिति और अधिक खलती है। उनकी वैचारिक रोशनी की जरूरत इस अंधेरे समय में पहले से कहीं ज्यादा है।
भारी मन से उन्हें आखिरी जोहार!
