सूखा नशा

अक्टूबर 2011 की बात है। घर के कामों की भारी व्यस्तता के बावजूद काली ने संस्था के काम से पटना से मोतिहारी जाने का निर्णय लिया। इस यात्रा के पीछे उसका एक छोटा-सा स्वार्थ भी था—इस काम के बदले कुछ पैसे मिल जाएंगे और साथ ही कुछ नया सीखने का अवसर मिलेगा।

उस समय काली के बच्चे बहुत छोटे थे। उसके कुछ दिनों के लिए बाहर रहने पर भी बच्चे मिल-जुलकर घर की जिम्मेदारियाँ संभाल लेते थे। हालांकि उस दौर में काम करना उसकी इच्छा से अधिक उसकी मजबूरी बन चुका था। बच्चों की पढ़ाई से लेकर पूरे घर का खर्च उठाने की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। पति अब घर के कामों में हाथ बँटाने लगे थे, लेकिन आर्थिक सहयोग की उम्मीद उनसे लगभग समाप्त हो चुकी थी। इसलिए काली ने स्वयं को परिवार का कमाने वाला सदस्य मान लिया था।

सुबह-सुबह काली घर से निकली और पटना बस स्टैंड पहुँची। टिकट लेकर वह बस का इंतज़ार करने लगी। जैसे ही बस प्लेटफॉर्म पर लगी, उसने भीतर झाँककर देखा। जितनी सीटें थीं, उनसे लगभग तीन गुना अधिक यात्री बस में भरे हुए थे। बैठे हुए लोगों से कहीं अधिक लोग एक-दूसरे से सटे खड़े थे। बस के भीतर उमस, पसीने और बदबू का ऐसा माहौल था कि अक्टूबर का महीना भी जून की तपती गर्मी जैसा लगने लगा। बाहर हल्की धूप थी और पुरवैया हवा चल रही थी, लेकिन बस के भीतर घुटन असहनीय थी।

काली ने खलासी से कहा, “भैया, मेरे पैसे वापस कर दीजिए। मैं दूसरी बस से चली जाऊँगी। इस बस में जाना मेरे लिए संभव नहीं है।”

खलासी झुंझलाकर बोला, “हाँ-हाँ, दूसरी बस वाला तो आपको इसी किराए में पूरी बस रिज़र्व करके ले जाएगा!”

उसका यह व्यंग्य सुनकर काली को गुस्सा आ गया। भीड़ को चीरते हुए वह किसी तरह बस के दरवाज़े तक पहुँची और अपना किराया वापस माँगने लगी। तभी बस खुलने ही वाली थी कि ड्राइवर की नज़र उस पर पड़ी।

ड्राइवर ने आवाज़ लगाई, “अरे बेटी, इधर आगे आकर बैठ जाओ। दूसरी बस इससे भी ज़्यादा खटारा है और उसमें इससे अधिक भीड़ मिलेगी।”

इतना कहकर उसने अपने बगल में बैठे यात्रियों से थोड़ा-सा खिसकने को कहा और काली के बैठने की जगह बना दी।

ड्राइवर लगभग पचास वर्ष का रहा होगा। उस समय काली की उम्र बत्तीस वर्ष थी, लेकिन दुबली-पतली कद-काठी के कारण लोग अक्सर उसे बीस-बाईस वर्ष की लड़की समझ लेते थे। शायद यही कारण था कि ड्राइवर भी उससे एक बेटी की तरह बात कर रहा था।

उसने मुस्कुराकर पूछा, “कहाँ जाओगी, बेटा?”

उसके बोलने के ढंग से काली को लगा कि वह पढ़ा-लिखा और समझदार व्यक्ति है। उसने अपने गंतव्य का नाम बताया।

ड्राइवर ने फिर पूछा, “अच्छा… किसके घर जाना है? कोई परीक्षा देने जा रही हो क्या? आजकल कौन माँ-बाप अपनी बेटी को अकेले पटना से गाँव-देहात भेजते हैं? किसी को साथ ले लेती।”

काली ने बिना कोई सफाई दिए केवल हल्की-सी मुस्कान के साथ चुप रहना ही उचित समझा।

कुछ देर बाद ड्राइवर ने फिर पूछा, “अरे, अभी तक बताया नहीं कि किसके यहाँ जाना है?”

इस बार काली ने संस्था के सचिव का नाम बता दिया।

नाम सुनते ही ड्राइवर का चेहरा खिल उठा।

“अरे! अब तो बिल्कुल चिंता मत करो। वह तो मेरा छोटा भाई है। मतलब तुम मेरे ही घर जा रही हो।”

काली ने केवल “अच्छा” कहा और फिर खिड़की से बाहर देखने लगी।

तब तक बस पटना शहर की सीमा पार कर चुकी थी।

बस चलने लगी तो हवा आने लगी। थोड़ी देर बाद भीड़ भी कम होने लगी। ड्राइवर ने इशारे से कहा, “वहाँ खिड़की वाली सीट अभी खाली हो जाएगी। वह यात्री रोज़ यहीं तक आता है। उसके उतरते ही तुम वहाँ बैठ जाना।”

काली ने सिर हिलाकर हामी भर दी।

कुछ देर बाद सीट खाली हुई और वह जाकर खिड़की के पास बैठ गई। यह एक कोच बस थी। थोड़ी देर में उसमें फिल्म ‘दिलवाले’ चला दी गई। बस की रफ्तार ठीक थी, लेकिन सड़क इतनी खराब थी कि चार घंटे का सफर लगभग आठ घंटे में पूरा हुआ। रास्ते में दो फिल्में भी दिखाई गईं। अधिकांश यात्री सो चुके थे।

सुबह लगभग नौ बजे पटना से चली बस शाम पाँच बजे के आसपास मोतिहारी पहुँची।

बस से उतरते समय ड्राइवर ने एक यात्री से कहा, “भैया, इन्हें छोटे के घर तक छोड़ दीजिएगा। कहीं रास्ता न भटक जाएँ।”

काली को भीतर ही भीतर थोड़ा डर भी लग रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ड्राइवर की बात पर कितना भरोसा किया जाए। उसके पास मोबाइल तो था, लेकिन रास्ते में ही उसकी बैटरी खत्म हो चुकी थी।

बस से उतरने के बाद उसने अपनी डायरी निकाली। पीठ पर बैग टाँगे वह उस यात्री के साथ चलने लगी। तभी उसने कहा, “सर, दो मिनट रुकिए। मुझे दवा लेनी है।”

वह पास की दवा दुकान पर गई। वहाँ उसने विक्स की गोलियाँ खरीदीं और साथ ही डायरी में लिखे पते के बारे में दुकानदार से जानकारी ली। संस्था के सचिव उस इलाके के प्रसिद्ध व्यक्ति थे, इसलिए दुकानदार ने तुरंत सही रास्ता बता दिया।

करीब दो सौ मीटर चलने के बाद काली की नज़र उस मकान के बाहर लगे बोर्ड पर पड़ी, जहाँ उसे पहुँचना था।

रात, आश्रय गृह और दो लड़कियाँ

दरवाज़े पर पहुँचते ही संस्था के सचिव और उनके सहयोगियों ने काली का आत्मीय स्वागत किया। लंबी यात्रा की थकान के बावजूद वह सहज महसूस कर रही थी। करीब दो घंटे तक संस्था के काम, आने वाले कार्यक्रमों और क्षेत्र की परिस्थितियों पर चर्चा होती रही। रात लगभग आठ बजे सबने साथ बैठकर भोजन किया। भोजन के बाद काली को विश्राम के लिए एक कमरा दे दिया गया।

कमरा काफी बड़ा था। उसमें चार पलंग लगे थे और चारों के ऊपर अलग-अलग पंखे। कमरे से सटे दो स्नानघर थे। पूरे कमरे में बस एक बड़ी दीवार घड़ी और एक कैलेंडर टंगा था। न कोई मेज़, न कुर्सी, न अलमारी। कमरा लगभग खाली-सा था।

बिजली बार-बार आ-जा रही थी। खिड़की के पास एक मोमबत्ती, कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती और माचिस रखी हुई थी।

पूरे दिन की थकान के कारण काली बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में सो गई।

पता नहीं रात का कौन-सा पहर था। अचानक उसे सिगरेट के धुएँ की तीखी गंध महसूस हुई। साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी तो उसकी आँख खुल गई।

कमरे में अँधेरा था। बिजली चली गई थी। केवल मोमबत्ती की हल्की लौ कमरे में काँपती हुई रोशनी फैला रही थी।

काली उठकर बैठ गई।

सामने वाले पलंग पर एक युवती बैठी थी। दाहिनी ओर वाले पलंग पर लाल दुल्हन के जोड़े में एक बहुत कम उम्र की लड़की चुपचाप बैठी थी। दोनों धीमी आवाज़ में आपस में कुछ बातें कर रही थीं।

काली को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। संस्था के सचिव ने पहले ही बता दिया था कि रात तक कुछ और लड़कियाँ भी इस कमरे में आ जाएँगी।

उसने दीवार घड़ी की ओर देखा। धुँधली रोशनी में लगभग तीन बज रहे थे।

मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह स्नानघर गई। लौटते-लौटते बिजली आ गई, लेकिन वोल्टेज इतना कम था कि बल्ब की पीली रोशनी मुश्किल से कमरे को उजाला दे पा रही थी।

अब वह दोनों लड़कियों को साफ़ देख पा रही थी।

सामने वाले पलंग पर बैठी युवती गोल-मटोल शरीर की थी। रंग अत्यंत गोरा, आँखें छोटी और गोल। उसके चेहरे की बनावट देखकर काली ने अनुमान लगाया कि शायद वह नेपाल की रहने वाली होगी। उसके होंठों पर गहरी गुलाबी लिपस्टिक थी और आँखों में मोटा काजल, आईलाइनर तथा मस्कारा लगा हुआ था।

दाहिनी ओर बैठी लड़की बिल्कुल अलग दिख रही थी। उसने लाल रंग का शादी का जोड़ा पहन रखा था। उम्र पंद्रह-सोलह वर्ष से अधिक नहीं रही होगी। दुबली-पतली, लंबा कद, साँवला रंग और बड़ी-बड़ी डरी हुई आँखें। उसके शरीर पर अब भी शादी के गहने सजे हुए थे।

काली दोनों को देख ही रही थी कि सामने वाली युवती उठी। उसने खिड़की के पास रखी माचिस उठाई और हथेली में दबाई हुई आधी बुझी सिगरेट फिर से सुलगा ली।

धुआँ पूरे कमरे में फैलने लगा।

काली ने विनम्र स्वर में कहा,

 “अगर बुरा न मानो तो क्या बाहर जाकर सिगरेट पी सकती हो? मुझे धुएँ से परेशानी होती है।”

लड़की ज़ोर से हँस पड़ी।

“अरे! लगता है अब सती-सावित्री भी इन जगहों पर आने लगी हैं।”

इतना कहकर उसने जान-बूझकर काली के चेहरे की ओर धुएँ का एक बड़ा गुबार छोड़ दिया।

सात वर्षों से सामाजिक कार्य करते हुए काली ने तरह-तरह के लोगों से मुलाकात की थी। इसलिए उस लड़की के व्यवहार से उसे न गुस्सा आया, न आश्चर्य। उसने बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल जाना ही उचित समझा।

बरामदे में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

काली धीरे-धीरे टहलने लगी।

उसकी उन लड़कियों से बातचीत करने या उनके बारे में जानने की कोई योजना नहीं थी। वह केवल थोड़ी देर खुली हवा में साँस लेना चाहती थी।

करीब बीस मिनट बाद सिगरेट खत्म हुई।

कुछ ही देर में लाल जोड़े वाली लड़की भी खाँसती हुई कमरे से बाहर आई।

उसने संकोच से पूछा,

“आप भी… यहीं रहती हैं? या… आपको भी किसी मामले में पकड़कर यहाँ लाया गया है?”

काली मुस्कुरा दी।

“नहीं। मैं पटना की एक संस्था से आई हूँ। दो दिन का काम है। उसके बाद वापस चली जाऊँगी।”

लड़की ने राहत की साँस ली।

“मेरा नाम ज्योति है।” (नाम परिवर्तित)

“मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। मेरे माता-पिता नहीं हैं। मेरे चाचा ने मेरी शादी एक बूढ़े आदमी से कर दी… दरअसल शादी नहीं… मुझे बेच दिया।”

यह कहते-कहते उसकी आवाज़ काँपने लगी।

“वे मेरे माँ-बाप की ज़मीन और घर भी हड़पना चाहते हैं। मैं किसी तरह रात में वहाँ से भाग निकली। स्टेशन पहुँची ही थी कि पुलिस ने पकड़ लिया और यहाँ भेज दिया।”

कुछ क्षण वह चुप रही।

फिर धीमे स्वर में बोली,

“अब बताइए, मैं कहाँ जाऊँ? पटना में मेरे मामा रहते हैं। रेलवे में नौकरी करते हैं। बस इतना ही जानती हूँ। उनका पता मुझे नहीं मालूम।”

काली कुछ देर तक सोचती रही।

फिर बोली,

“संस्था और पुलिस को अपने मामा के बारे में जितनी जानकारी है, सब बता दो। शायद वे उन्हें खोजकर तुम्हें उनके पास पहुँचा दें।”

ज्योति ने धीरे से सिर हिला दिया।

करीब चार बजे दोनों वापस कमरे में आ गईं।

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

अचानक सामने वाले पलंग से आवाज़ आई—

“तो सती-सावित्रियों की बातचीत खत्म हो गई?”

इस बार काली मुस्कुरा दी।

“हाँ, अब आपकी बारी है।”

दोनों एक साथ हँस पड़ीं।

लड़की ने अपना नाम रूपा (परिवर्तित नाम) बताया।

फिर अपने पेट पर हाथ रखते हुए बोली,

“देखो… कितना बड़ा हो गया है। यहाँ सालों से दो सूखी रोटियाँ और पानी जैसी दाल मिलती है। मैं तो भूख सह लेती हूँ… लेकिन मेरे पेट में जो पल रहा है, वह बहुत तंग करता है।”

काली ने बैग खोलकर बिस्कुट का एक पैकेट निकाला।

“लो, पहले इसे खा लो।”

रूपा ने बिना झिझक बिस्कुट खाए और पानी पिया।

फिर वह काली के पलंग पर आकर बैठ गई।

“तुम्हारी शादी हो गई है?”

काली मुस्कराई।

“हाँ। मेरे तीन बच्चे हैं।”

रूपा आश्चर्य से बोली,

“सच? बिल्कुल नहीं लगता। मुझे लगा कहीं प्रेम-विवाह करके भागी हुई लड़की हो, जिसे यहाँ शरण मिली हो।”

दोनों हल्का-सा हँस पड़ीं।

रूपा की कहानी

रूपा कुछ देर तक चुप बैठी रही। उसकी आँखें कहीं दूर शून्य में टिकी थीं, मानो वह वर्तमान में नहीं, अपने अतीत के किसी अँधेरे कोने में लौट गई हो। कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

काली ने उसकी ओर देखा। उसे लगा, जैसे रूपा अपने भीतर वर्षों से दबे दर्द को शब्द देने की हिम्मत जुटा रही हो।

थोड़ी देर बाद उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया—

“मैं नेपाल की रहने वाली हूँ। मेरा नाम रूपा है।” (नाम परिवर्तित)

“हम ब्राह्मण परिवार से हैं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। माँ-पिता दोनों पढ़े-लिखे थे और मुझे भी अच्छी शिक्षा देना चाहते थे।”

कुछ क्षण रुककर उसने गहरी साँस ली।

“मैं तब केवल नौ साल की थी। एक दिन स्कूल की छुट्टी के बाद माँ मुझे लेकर घर लौट रही थीं। स्कूल घर से काफी दूर था। रास्ते में मेरे मामा की दुकान पड़ती थी। माँ अक्सर वहाँ कुछ देर रुक जाती थीं।”

“उस दिन मुझे गाड़ी में ही नींद आ गई। माँ मुझे सोता हुआ छोड़कर मामा की दुकान पर चली गईं। दुकान के सामने ट्रकों की आवाजाही रहती थी। इसलिए माँ ने गाड़ी थोड़ा हटाकर खड़ी कर दी थी।”

रूपा की आवाज़ भर्रा गई।

“बस… शायद वही मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी।”

“माँ के जाते ही कुछ आदमी आए। उन्होंने मुझे गोद में उठाया और दूसरी गाड़ी में डाल दिया। मैं चीखने लगी, लेकिन उन्होंने मेरा मुँह दबा दिया। कुछ देर बाद मैं बेहोश हो गई।”

कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी फैल गई।

काली बिना कुछ बोले उसकी बात सुनती रही।

“जब होश आया तो मैं किसी पहाड़ी इलाके की एक झोपड़ीनुमा जगह पर थी। शायद वह पश्चिम बंगाल का कोई इलाका रहा होगा।”

“झोपड़ी के भीतर पहले से तीन लड़कियाँ और थीं।”

“सभी के हाथ पीछे बँधे थे और पैरों में रस्सी बँधी हुई थी। मुझे भी उनके साथ बाँध दिया गया।”

रूपा कुछ क्षण के लिए रुक गई।

“शाम को खाने के लिए हम सबको ब्रेड दी गई। मैंने नहीं खाई। लेकिन बाकी तीनों लड़कियों ने चुपचाप खा ली और थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गईं।”

“बाद में मुझे समझ में आया कि उस ब्रेड में नींद की दवा मिलाई जाती थी।”

“मैं भूखी रही, लेकिन जागती रही।”

“झोपड़ी के अंदर दो औरतें रहती थीं और बाहर दो-तीन आदमी पहरा देते थे। हमें आपस में बात तक नहीं करने देते थे। कई बार हमारे मुँह भी कपड़े से बाँध दिए जाते थे।”

उसने अपने दोनों हाथों को कसकर पकड़ लिया।

“हर कुछ दिनों में हमें एक इंजेक्शन लगाया जाता था। इंजेक्शन लगने के बाद पूरी छाती में तेज़ दर्द होता था। समझ में नहीं आता था कि हमारे साथ क्या किया जा रहा है।”

काली के भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

“करीब दस दिन बाद हमें फिर कहीं ले जाया गया।”

“उस दिन भी हम आधी बेहोशी की हालत में थे।”

“जब दोबारा होश आया तो मैं एक बहुत बड़े बंगले में थी।”

“पूरे कमरे में लाल रंग का मोटा कालीन बिछा था। एक तरफ़ महँगा सोफ़ा था और दूसरी ओर बड़ा-सा पलंग।”

“मुझे उठाकर उस पलंग पर ऐसे फेंका गया, जैसे मैं कोई इंसान नहीं, सामान हूँ।”

रूपा की आँखों में आँसू भर आए।

“मैंने देखा कि एक लंबा-चौड़ा, गोरा आदमी, जिसकी उम्र मेरे पिता के बराबर रही होगी, उन लोगों को एक थैला दे रहा था जिन्होंने मुझे वहाँ पहुँचाया था।”

“वे लोग पैसे लेकर चले गए।”

“उस आदमी ने एक महिला को आवाज़ दी—

‘मालती… अब इसका ध्यान रखना।'”

“मालती नाम की वह महिला मुझे कुछ नए कपड़े देकर बोली—

‘जाओ, नहा लो और ये कपड़े पहन लो।'”

“एक दूसरी औरत मुझे बाथरूम तक ले गई।”

“बाथरूम में एक बहुत बड़ा शीशा लगा था।”

रूपा की आवाज़ धीमी हो गई।

“घर से निकलने के बाद पहली बार मैंने खुद को आईने में देखा।”

“मैं खुद को पहचान नहीं पा रही थी।”

“जब मेरा अपहरण हुआ था, तब मैं एक बच्ची थी। लेकिन अब… लगभग तीन महीने बाद… मेरा शरीर बदल चुका था। मेरी छाती असामान्य रूप से बड़ी हो गई थी।”

“तीन महीनों से मैंने ठीक से स्नान नहीं किया था। बाल उलझे हुए थे। शरीर गंदा था। चेहरा सूजा हुआ था।”

“आईने में मुझे अपना ही चेहरा अजनबी लग रहा था।”

कुछ पल के लिए उसकी आवाज़ रुक गई।

“अजीब बात यह थी कि मुझे रोना भी नहीं आ रहा था।”

“शायद मेरा दिमाग़ इतना सुन्न हो चुका था कि दुख महसूस करने की ताकत भी खत्म हो गई थी।”

“ऐसा लगता था जैसे मैं आधी नींद में जी रही हूँ।”

“मैंने नहाया। नए कपड़े पहने। बाल सँवारे और बाहर आ गई।”

“बाहर निकलते ही मालती मेरे पास आ गई।”

‘चलो… साहब आए हैं।’

“वह मुझे एक बड़े कमरे में ले गई।”

मुझे सोफ़े पर बैठा दिया गया। कुछ देर बाद कमरे में तीन लोग आए। उस समय मैं नहीं जानती थी कि वे कौन हैं। बाद में मालूम हुआ कि उनमें एक वरिष्ठ अधिकारी था और दो प्रभावशाली नेता। एक को सब “साहब” कहते थे और दूसरे को “छोटे साहब”।

साहब ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कराते हुए कहा, “अच्छा… असली नेपाली है।” इतना कहकर वह ज़ोर से हँस पड़ा। उसके साथ आए बाकी लोग भी हँसने लगे। उस हँसी की गूँज आज भी मेरे कानों में सुनाई देती है।

ये तीनों कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर उस बंगले में आते रहते थे। छोटे साहब का मालती आंटी के पास आना-जाना सबसे अधिक था। जब भी उसके आने की खबर मिलती, मालती आंटी लाल रंग की साड़ी पहनतीं, बड़ी-सी लाल बिंदी लगातीं और पूरे घर की सजावट बदल दी जाती। शायद लाल रंग छोटे साहब की पसंद था। बंगले में बिछा लाल कालीन भी उसी पसंद का हिस्सा लगता था।

उन लोगों ने वर्षों तक मेरे साथ अमानवीय व्यवहार किया। मैं उनके लिए एक इंसान नहीं, केवल एक वस्तु थी। मेरी इच्छा, मेरा दर्द और मेरा अस्तित्व—किसी का कोई मूल्य नहीं था। छोटे साहब अक्सर मुझे अश्लील फिल्में दिखाकर वैसा ही करने के लिए मजबूर करता। विरोध करने पर शारीरिक यातना देता। मेरे शरीर पर पड़े कई निशान आज भी उस हिंसा की गवाही देते हैं।

रूपा कुछ देर के लिए चुप हो गई। उसकी आँखें भर आई थीं।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

“उस गुमनाम दुनिया में मैं बारह साल के दौरान बाईस बार बेची गई। हर बार मुझे किसी नए ठिकाने, नए लोगों और नए डर के हवाले कर दिया जाता था।”

उसने काँपते हुए अपने पेट पर हाथ रखा।

“जब मैं पहली बार गर्भवती हुई, तब मुझे एक होम में भेज दिया गया। वहीं आकर पहली बार पता चला कि मैं बिहार के पटना ज़िले में हूँ। बच्चे के जन्म के बाद मेरा बेटा मुझसे छीन लिया गया। मुझे बताया गया कि उसे लाखों रुपये लेकर विदेश भेज दिया गया।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“तीन साल पहले भी मैं गर्भवती हुई थी, लेकिन गर्भ नहीं बच सका।”

कुछ क्षण बाद उसने फिर कहना शुरू किया—

“इस बार मैं सात महीने की गर्भवती हूँ। मैं और एक दूसरी लड़की—दिव्या—कई बार होम से भाग निकले। हमारा इरादा केवल इतना था कि किसी ऐसी जगह पहुँच जाएँ, जहाँ मेरा बच्चा सुरक्षित जन्म ले सके और कोई उसे मुझसे छीन न सके।”

“लेकिन हर बार पता नहीं कैसे पुलिस तक खबर पहुँच जाती थी। वे हमें पकड़कर वापस ले आते। इस बार भी ऐसा ही हुआ।”

उसने काली की आँखों में देखते हुए कहा—

“मुझे डर लग रहा है। अगर मैं फिर उन्हीं लोगों के हाथ लग गई, तो मेरा यह बच्चा भी मुझसे छीन लिया जाएगा।”

कुछ क्षण तक कमरे में गहरा सन्नाटा छाया रहा।

फिर रूपा ने लगभग विनती करते हुए पूछा—

“आप बताइए… क्या कोई ऐसी संस्था है जो मुझे यहाँ से निकालकर सुरक्षित जगह पहुँचा सके? जहाँ मैं अपने बच्चे के साथ बिना डर के रह सकूँ?”

काली के भीतर मानो एक बवंडर उठ खड़ा हुआ।

एक पल के लिए उसके मन में आया कि किसी तरह रूपा को वहाँ से निकाल दे। लेकिन अगले ही क्षण उसे अपनी सीमाएँ समझ में आने लगीं। वह उस शहर में नई थी। न वहाँ किसी को जानती थी, न व्यवस्था को। बिना तैयारी के उठाया गया एक कदम रूपा के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता था।

वह अभी इसी उधेड़बुन में थी कि अचानक दो पुलिसकर्मी कमरे में आए। उनके साथ दो महिला पुलिसकर्मी भी थीं।

उन्होंने रूपा और ज्योति से चलने के लिए कहा।

दोनों लड़कियाँ उठ खड़ी हुईं।

जाते-जाते रूपा ने एक बार मुड़कर काली की ओर देखा। उस नज़र में डर भी था, उम्मीद भी और एक मौन प्रश्न भी, जिसका उत्तर काली के पास नहीं था।

काली भी उसे देखती रह गई। ऐसा लगा मानो दोनों के शब्द कहीं खो गए हों और केवल आँखें ही बातचीत कर रही हों।

दरवाज़ा बंद हो गया।

कमरे में फिर सन्नाटा उतर आया।

करीब एक घंटे तक काली उसी तरह मौन बैठी रही। उसके भीतर अनगिनत प्रश्न उठ रहे थे। क्या सचमुच व्यवस्था इतनी असहाय है? क्या इन लड़कियों को बचाने का कोई रास्ता नहीं?

इसी बीच संस्था के सचिव कमरे में आए।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“मुझे क्षमा कीजिए। आपको इस कमरे में नहीं ठहराना चाहिए था। कल कोई दूसरा कमरा खाली नहीं था, इसलिए मजबूरी में यहीं व्यवस्था करनी पड़ी। मैंने आपको पहले ही बताया था कि रात में कुछ लड़कियाँ यहाँ लाई जाएँगी, लेकिन आपने स्वयं कहा था कि आपको कोई परेशानी नहीं होगी।”

काली ने उनकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली।

शायद बिना कोई प्रश्न पूछे ही सचिव उसके मन की उलझन समझ गए थे।

कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने भारी आवाज़ में कहा—

“हम भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। जिन लोगों के नाम इन लड़कियों की बातों में आते हैं, वे बहुत प्रभावशाली हैं। सच कहूँ, अगर हम खुलकर कुछ करने की कोशिश करें, तो शायद हम भी ज़िंदा न बचें।”

उन्होंने गहरी साँस ली।

“इसलिए… जो आपने आज रात सुना है, उसे यहीं दफ़न कर दीजिए।”

उनके शब्द कमरे में देर तक गूँजते रहे।

लेकिन काली जानती थी—कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें चाहकर भी दफ़न नहीं किया जा सकता। उस रात जो उसने सुना था, 

उसके भीतर हमेशा के लिए दर्ज हो चुका था।

 काली पहली बार एहसास हुआ कि मानव तस्करी केवल अख़बार की एक ख़बर नहीं होती, बल्कि किसी की पूरी ज़िंदगी को निगल जाने वाला अँधेरा होती है।

प्रतिमा

लेखिका सोशल एक्टिविस्ट है

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ISSN 2394-093X
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