लेखक: नवनीत नीरव
कला: नरेश पासवान
प्रकाशक: एकलव्य
नाच उपन्यास एक ऐसे पात्र की कहानी है जो कहने के लिए तो शिक्षित परिवार से आता है लेकिन सामाजिक बन्धन उनकी शिक्षा पर हावी हैं, नाच जैसे पेशों को आज भी सहज स्वीकार्यता नहीं है और जब पुरुषों की बात हो तो यह और भी वर्जित माना जाता है| ऐसा क्यों है? उसे समझने में यह उपन्यास मदद करता है| 13 छोटे-छोटे अध्यायों में बांटकर लिखा गया यह एक बहुत ही संवेदनशील उपन्यास है| इस उपन्यास में दो कहानियाँ समानांतर चलती हैं| एक जो प्राचीन साहित्य से आती है जिसके मुख्य पात्र शिलालीन और कृशाश्व हैं जिन्होंने नाटक, नृत्य और संगीत जैसी कलाओं को समाज में जगह दिलाने के लिए संघर्ष किया और वे पहले ऐसे विद्वानों थे जिन्होंने इन कलाओं का गहन अध्ययन किया| दूसरी कहानी सरोज की है जो एक 12 वर्ष का किशोर है, जो अपनी पहचान को लेकर सशंकित है, लड़का और लड़की के बीच बना दिए गए अंतरों से परेशान है और अपने मनोभावों में हो रही उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है| स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए सरोज नाटक और संगीत का माध्यम चुनता है जिसे समाज में सम्मान जनक पेशे की रूप में नहीं देखा जाता। उसकी वजह से सरोज अपने माता-पिता घर परिवार यहाँ तक कि अपना गाँव तक छोड़ देने पर मजबूर हो जाता है| जहाँ प्राचीन समय में शिलालीन और कृशाश्व को नाच देखने पर प्रवजनीय दंड मिला अर्थात आश्रम से निष्कासित कर दिया गया ! वहीं आज के संदर्भ में सरोज को अपनी नाच और संगीत में रुचि के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा | हालाँकि दोनों कहानियों के बीच ढाई शताब्दियों का अंतराल है ,पर आत्म-परिचय और विद्रोह ही वे तत्व हैं जो दोनों कहानियों को एक धरातल पर ला खड़ा करते हैं|
नाटक-नौटंकी, संगीत और नाच जैसी कलाओं को लेकर आज के समय में जिस तरह का नज़रिया है उससे ऐसा लगता है कि उस पुरानी कहानी में कुछ नई घटनाओं और किरदारों को जोड़कर किस्सा आगे बढ़ा दिया गया पर मुद्दा वही है|

किताब पढ़ते हुए मेरा झुकाव सरोज के किस्सों पर अधिक रहा| जब सरोज के बारे पढ़ रही थी तब मुझे उन कुछ बच्चों के चेहरे और उनके साथ हुए संवाद याद आए जिनसे मैं अपने काम के दौरान मिली जो कि सरोज की तरह अपनी पहचान को लेकर जद्दोजहद कर रहे हैं। मुझे लगता है ,एक तरफ जहाँ ये कहानी सरोज को उसके मनोभावों को करीब से समझने के अवसर देकर मन को संवेदना से भर देती है वहीं दूसरी तरफ यह भी एहसास दिलाती है कि ये किताब उन सभी बच्चों के लिए अभिव्यक्ति का ज़रिया बन सकती है जो इस अवस्था से गुज़र रहे होते हैं|
लेखक ने सरोज के पात्र को बहुत अच्छे से गढ़ा है। कहानी में जिस तरह से संवाद प्रस्तुत किए हैं उससे समझ आता है कि उन्होंने बिहार के ग्रामीण परिवेश को बहुत करीब से देखा-समझा है और अपने सूक्ष्म अवलोकन प्रस्तुत किए हैं| पढ़ते-पढ़ते कहानी आँखों के सामने चित्रित होने लगती है और मन सरोज के साथ-साथ कभी कुमुद दीदी के घर गाए जा रहे गीतों में ठहर जाता है तो कभी मास्टर जी राममूरत के द्वारा करवाए जा रहे नुक्कड़ नाटक में उलझ के रह जाता है|
लौंडा नाच-परंपरा और उन कलाकारों के जीवन और समस्याओं को भी इस कहानी में बखूबी उभारा गया है| हालाँकि शहरीकरण के साथ अब यह परम्परा अधिक चलन में नहीं रही| हो सकता है अगली पीढ़ियों को यह सिर्फ किताबों में ही दिखे| मुझे तो आज भी इस परंपरा के बारे में इस किताब को पढ़कर ही पता चला, फिर उन दोस्तों से चर्चा की जो बिहार या उसके आसपास से हैं और ग्रामीण परिवेश से जुड़े हैं। पता चला कि यह एक वास्तविक परंपरा रही है| किन्तु एक बात तय है कि ,जेन्डर से जुड़े अस्मिता और पहचान के मुद्दे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
किताब में सरोज के लिए हर जगह वे, उन्हें और उनका जैसे सर्वनाम का प्रयोग जेंडर के प्रति संवेदनशीलता का आभास करवाता है| यह एक तरह से पाठक के लिए सरोज को स्त्री और पुरुष की सीमा के परे समझने का संकेत है| प्रयोग हालाँकि इस किताब की भाषा थोड़ी कठिन और क्लिष्ट हिंदी है, खास तौर से वे अध्याय जो शिलालीन और कृशाश्व पर आधारित हैं| अगर थोड़ी सरल-सहज भाषा का इस्तेमाल किया जाता तो पठनीयता की द्रष्टि से यह किताब और अधिक पाठकों को आकर्षित कर पाती | बीच-बीच में किया गया भोजपुरी भाषा के शब्दों और गीतों का इस्तेमाल इसके कहन में जान डाल देता है और भाषा की सुन्दरता को निखार देता है| संवाद ऐसे लिखे गएँ हैं जैसे कि दो लोग प्रत्यक्ष रूप से बातचीत करते हों यहाँ प्रस्तुत वाक्यांश जब सरोज के संगीत कार्यक्रम से देर से लौटने पर उसकी माँ जिस तरह उसे डांट लगाती है वह एक दम सहज और मौलिक-सा आभास देता है|
“ईsss सब गाँव घूमनी हैं| दिन भर… रात भर…कौनो क्षण चैन नहीं है| खर-खानदान की इज़्ज़त बुड़वाएँगी गीतगवनी सब…”
जिसमें सरोज के लिए चिंता और उसके शौक को उभारने में शामिल सभी लोगों प्रति एक सहज गुस्सा झलकता है|
किताब के अंत में शब्दकोश कई शब्दों को समझने में मदद करता है जिससे इन शब्दों से लगाव-सा बन जाता है| एक वाक्य जो मुझे याद ही रह गया “कुमुद दीदी आपके इ भाई मऊग हैं का?” उसकी वजह है उसमें प्रयोग किया गया शब्द मऊग| मैंने जब भी कभी इस तरह की चर्चाएँ सुनी हैं जिसमें ऐसे लड़के जो अपनी कुछ ख़ास पहचान के लिए जाने जाते हैं उनके लिए जो शब्द प्रयुक्त होते हैं जैसे मीठा, लड़की-टाइप, छक्का इन सभी की तुलना में यह कुछ संतुलित-सा लगा| कहानी में जितनी सहजता से ये सवाल पूछा गया है और उतनी ही सहजता से उसका जवाब दिया गया है, उससे पात्र की खास क्षमता उजागर होती है| कहीं भी शर्म और अपनी उस खासियत को छिपा लेने के दबाव का आभास नहीं होता| कहानी को कहने की यही शैली इस उपन्यास को खास और संवेदनशील बनाती है|

किताब में बीच-बीच में आ रहे मिथिला शैली के चित्र इस किताब को एक क्लासिक रूप देते हैं| चूँकि मिथिला चित्र शैली बिहार की है और इस उपन्यास में भी बिहार की क्षेत्रीय भाषा, रीति-रिवाजों की झलकियाँ मिलती है| जिससे बिहार के सांस्कृतिक सौन्दर्य की झलक देखने को मिलती है| काले रंग से लकीरों और पैटर्न का इस्तेमाल करके बनाए गए चित्र किताब को आकर्षक बनाते हैं और उसे पढ़ने के लिए उकसाते हैं| कुल मिलकर यह एक बहुत ही बढ़िया उपन्यास है| इसे पढ़ने के बाद कई दिनों तक सरोज जहन में बना रहता है|

नीतू यादव: भोपाल (मप्र) में रहती हैं| वर्तमान में एकलव्य फाउंडेशन में प्रकाशन समूह और लाइब्रेरी से दोस्ती कोर्स का हिस्सा हैं| अपने अनुभवों को कहानियों और लेखों में साझा करना अच्छा लगता है| पाथरूट का लक्ष्या: कौन है लक्ष्मण गायकवाड़ द्वारा रूम टू रीड और नरम-गरम दोस्ती द्वारा मुस्कान बच्चों के लिए लिखी गईं दो प्रकाशित किताबें|
