(कहानी: क्षमा शर्मा / प्रकाशन: हंस / संवाद : स्त्रीकाल) कल्पना मनोरमा की टिप्पणी
क्षमा शर्मा की अत्यंत समकालीन कहानी ‘सेलिब्रिटी’ एक गहरी और प्रतीकात्मक कथा है, जिसमें मध्यमवर्गीय शहरी परिवार के भीतर बनते-बिगड़ते रिश्तों की गुत्थियों को स्त्री दृष्टि से उकेरा गया है।
यह कहानी केवल मां, पिता और बेटियों के आपसी संबंधों की नहीं, बल्कि आज की आभासी दुनिया के प्रभाव, स्त्री की स्वतंत्र आकांक्षाओं, पुरुष की मौन उदासीन स्वीकृति और युवा पीढ़ी के हताश प्रेम-व्यवस्था और व्यथा को भी संजीदगी से प्रस्तुत करती है । युवा हो या बुजुर्ग ‘अर्थ’की कामना यानी पैसे के प्रति ख़ास लगाव और उनके सामाजिक-मानसिक ख़ाके को भी कहानी कुछ दृश्य और घटनों के माध्यम से चित्रित करती है ।
रोमिता के प्रति कहानी की लेखिका के ये वाक्य देखिये …
“उसने कंप्यूटर बंद किया. फोन ड्राअर में रखा फिर सीढ़ियां उतरती नीचे उतर आई. वहां कोने में खड़े होकर सिगरेट पीने लगी. आज ईशान से भी मिलना था. सामने आम के पेड़ पर लगी अमियां लहरा रही थीं. कोयल भी कूक रही थी. वह तेज हवा में उन्हें झूमते देखती रही. यह इलाका भी कैसा है. पुराने सरकारी क्वाटर्स, उनमें रहने वाले एक से एक तीर तमंचे. अक्सर घरों में आम के ऊंचे, घने पेड़. पता नहीं किसने इन्हें लगाया होगा, कौन इनके फल खाता होगा।”
एक आधुनिक लड़की जो स्वतंत्र है अपने व्यसनों के प्रति। जिसे प्रकृति की कोमलता रास नहीं आ रही क्योंकि उलझनों में डूबा उसका मन और तमाम प्रपंचों में जकड़ा जीवन उसे इसकी इज़ाज़त ही नहीं देता , व्यस्तता का आलम यह था कि इसके पूर्व के दृश्य में थकान से चूर नींद भर लेने को उसने सिगरेट भी अधूरी छोड़ दी और लापरवाही में बुझाना भी भूल गई जिससे परदे में आग लग जाती है ।
कहानी की प्रतिनिधि पात्र रोमिता की मां है। ये किरदार उस वर्ग की स्त्रियों की अगुआई करता दिखता है, जिनके पास न विशेष शिक्षा है, न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता और न ही धन कमाने की कामना । इन्हें जीवन में सिर्फ उपेक्षा ही मिली है। अब जब सोशल मीडिया पर लोग उसकी पोस्ट को लाइक्स कमेंट्स आदि करते हैं तो वह हवा हवाई हो अमरबेल की तरह दूसरे के ऊपर सवार होकर उनका खून चूसने लगती हैं। इस कहानी में मां की बनी बनाई छवि टूटती है जो यथार्थ परक भी है। आज हर व्यक्ति सोशल मीडिया और ग्लैमर की चमक में विलीन होता जा रहा है। रोमिता की मां इंस्टाग्राम और फेसबुक पर दिखने वाले जीवन की नकली भव्यता से इतनी प्रभावित है कि वह खुद को भी उसी खांचे में फिट करने की जद्दोजहद में एक बनावटी जीवन जीने लगती है।

कहानी लेखिका क्षमा शर्मा
करीना कपूर को ऑटोग्राफ देते हुए देखना, और उसकी तरह नकल करना फिर बच्चों को हजार रूपये की चाकलेट देकर उनसे कहलवाना कि वह “सोसायटी की सेलिब्रिटी” है। यह सब उस गहरे मानसिक खोखलेपन और ‘डिजिटल इन्फीरियरिटी’ का संकेत है जो वर्तमान समाज में व्यापक से फ़ैल रहा है। मज़े की बात ये कि किसी को ये दिखता नहीं।
कहानी का पुरुष पात्र पिता एक ऐसा व्यक्ति है, जो न तो परिवार का नेतृत्व कर सका और न ही पत्नी की मनःस्थिति को समझ सका। कभी पिता के कहने पर कारोबार अपनाया और अब पत्नी की नाराजगियों को मौन सहता है। सामाजिक रूप से एक ‘दब्बू’ किस्म का पुरुष है, जिसकी भूमिका नगण्य-सी होती है। न ही अपनी आय को विस्तार दे सका, न पत्नी को खुश कर सका। उसके पास एक हथियार है मौन का, उसी के सहारे जीना उसका ध्येय है। वह स्त्री की आत्ममुग्धता या आक्रोश को सहता है, बेटियों की भलाई के लिए स्थान बदलता है, लेकिन संवादहीनता की अवस्था में ही जीता है। उसकी ‘गिल्ट’ भी कहानी का एक गूढ़ पहलू है। एक ऐसा पुरुष जो खुद को असफल मान चुका है।
रोमिता, कहानी का सबसे संतुलित पात्र लगता है। पर है नहीं, वह पढ़ी-लिखी है, नौकरी करती है, अपने परिवार के प्रति दायित्वपूर्ण भी दिखती है। मां की गैरवाजिब अपेक्षाओं और अतिशय कृत्रिमता से वह आहत भी होती है। वह मां को निराश नहीं करना चाहती लेकिन उस पर ऑफिस और घरेलु जिम्मेदारियों का दोहरा दबाब है इसलिए उसे लेकर मन में जो विरोध है, वह गहराता जाता है। रोमिता, एक ऐसी बेटी है जो मां से बुरा भला कहने से नहीं चूकती लेकिन उनकी इच्छा पूरी कर देना चाहती है ।
“तुम्हें हमेशा यंग बने रहने और पतले होने का शौक है तो हम क्या करें। गूगल पर कुछ भी देखकर उसे फॉलो करती रहती हो और बनती हो बड़ी डाइटीशियन. अपनी उम्र देखी है?”
रोमिता एक डेटिंग एप के जरिये वह ईशान से मिली जिसे वह अफेयर की तरह मानती है। माँ के रवैये के प्रति गुस्सा दिखाकर घर भी छोड़ देती है, मां से जितना बुरा बोल सकती है, बोलती है। मां के लिए “पागल” शब्द तो उसके मुंह पर रहता है। लेकिन कभी अपने परिवार के साथ बैठकर संवाद स्थापित नहीं करती। रोमिता की बहन आत्ममुग्ध अपने प्रति ही सोचने वाला किरदार है। रोमिता के प्रति किसी का स्नेहिल न होना, जो झुके उसे वहां तक झुकाओ की रीढ़ चटक जाए, इस भौतिक युग की देन है। प्रेम में विफलता, तथाकथित प्रेमी की लफंगई को पहचानना, और उससे पीछा छुड़ा लेना भी स्त्रैण जज़्बा है। सिबलिंग्स की लापरवाहियों को झेलना भी समकालीन युवतियों और युवाओं की जमीनी समझ का एक यथार्थ चित्रण है।

कहानी का सबसे गहरा बिंदु यह है कि मां की बेचैनी, दिखावे की प्रवृत्ति, असंतोष के लिए कृत्रिमता और न मिलने की संभावना में चिड़चिड़ापन, क्या केवल बाहरी है ? जबकि मां रूपी स्त्री की ये गहरी मानसिक परेशानी का संकेत भी हो सकता है। परिवार में इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। जबकि आज अवसाद, एंग्ज़ायटी, और यहां तक कि ऑटिज़्म के लक्षणों को समझना और पहचानना ज़रूरी हो गया है, उस स्थिति में परिवार, विशेषकर पढ़े-लिखे बच्चों द्वारा इन संकेतों को न समझ पाना भी एक सामाजिक सच्चाई है जिसे लेखिका ने इंगित किया है।
सेलिब्रिटी कहानी एक आईना है, न केवल परिवारों का, बल्कि हमारे उस सामाजिक ढांचे का भी, जहां आभासी सफलता की भूख और घरेलू संवादहीनता एक गहरी खाई बनाती जा रही हैं। साथ में यह कथा केवल एक घरेलू संघर्ष नहीं, बल्कि उस ‘पलायनवादी आधुनिकता’ की कथा है, जिसमें संवेदना से ज़्यादा दिखावा है, संबंधों से ज़्यादा अपनी छवि निखारने की चिंता है। लेखिका ने यहां पुरुष सत्ता को सीधा केंद्र न बनाकर उसके ‘अप्रभावी स्वरूप’ को दिखाया है, और स्त्री को केवल शोषित नहीं बल्कि ‘आकांक्षा और अभाव के बीच छटपटाती सत्ता’ के रूप में चित्रित किया है। यानी ‘सेलिब्रिटी’ कहानी एक बहुस्तरीय कथा है। इसे केवल किसी एक दृष्टिकोण से नहीं पढ़ा जा सकता। इसके स्थूल (surface), सूक्ष्म (psychological), और दार्शनिक (existential) तल पर उतर कर एक गंभीर विमर्श के रूप में भी देखना होगा। यह कहानी हमें यह सोचने पर भी विवश करती है कि हम साथ रहकर भी क्या वास्तव में एक-दूसरे को पूरी तरह देख पा रहे हैं?
एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं।
एक बात पर और ध्यान ले जाना चाहती हूं। अब जबकि समय बदल गया है। ‘सेलिब्रिटी’ कहानी कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित करती है कि आज की माएँ जहाँ बेटियों को अपना वारिस बनाकर एहसान जाता देती हैं तो दूसरी ओर अपने अधिकारों को दस गुना बढ़ाकर लड़कियों को उन्हें पूरा करवाने की धुन में दिखती है। जबकि इतना अधिकार बेटे वाली माएं अपने बेटों पर भी नहीं दिखाती हैं। “क्या तेरे खर्चे इतने बढ़ जाएंगे कि अपनी एक मां का खर्चा न उठा सके. तुझे इसीलिए पढ़ाया-लिखाया है, अपने पांवों पर खड़ा किया है कि जब देखो तब मुझे सुनाती रहे कि तू मुझ पर कितना खर्च कर रही है”.
“ऐसा करो कि जितना मुझ पर खर्च किया है, उसकी किश्त बांध दो. चुका दूंगी. रोज-रोज के तानों से तो मेरा पीछा छूटेगा”.
“अरे नालायक! लड़कियां अपने मां-बाप के लिए न जाने क्या-क्या करती हैं और एक तू है…”
मशीनी युग की मां बेटी के संवादों से पता चलता है कि मनुष्य के भीतर अपने को महत्व देने की भूख का तांडव किस तरह उन्हें खोखला बनाता जा रहा है।
कहानी के अंत में रोमिता परिवार के पिता को छोड़ सभी ब्लॉक कर देती है। अपने पिता की दयनीय स्थिति को देखते हुए वह नहीं चाहती कि उसका हश्र उसके पिता जैसा हो वास्तव में ये भी आक्रोश दर्ज कराने का तकनीकी तरीका है। पल पल बनते बिगड़ते रिश्तों को लोग यूं ही ब्लॉक-अनब्लॉक करते दिखते हैं।
एक मध्यमवर्गीय स्त्री की आभासी चमक से मोहित होकर अपनी वास्तविकता को अस्वीकार करने की छटपटाहट, और उस अस्वीकार के परिणामस्वरूप परिवार में उपजे तनाव, दूरी और मौन पीड़ा की पड़ताल करती है कहानी सेलिब्रिटी।
कहानी यह भी उजागर करती है कि दिखावे की दुनिया में फंसी स्त्री की आकांक्षा, जब घर की सीमाओं से टकराती है, तो वह केवल स्वयं नहीं टूटती, अपने साथ पूरे परिवार की भावनात्मक संरचना को भी हिला डालती है।
यह कहानी उस स्त्री की है, जो ‘सेलिब्रिटी’ बनने के छलावे में मां, पत्नी और गृहणी की अपनी असल भूमिका से भटक जाती है — और उसका परिवार उसकी इस भटकन को समझ ही नहीं पाता है।

कल्पना मनोरमा
हिंदी और संस्कृत विषय की अध्यापक, कुछ वर्षों तक अकादमिक पब्लिकेशन हाउस में बतौर सीनियर एडिटर और हिंदी काउंसलर । फिलहाल पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन में संलग्न।’कब तक सूरजमुखी बनें हम’ नवगीत संग्रह, ‘बाँस भर टोकरी’, ‘नदी सपने में थी’ और ‘अब लौटने दो’ कविता संग्रह, कहानी संग्रह “एक दिन का सफ़र”, साक्षात्कार “संवाद अनवरत” प्रकाशित। एक बालकथा संग्रह और दो कविता संग्रह प्रकाशन की राह पर हैं। कल्पना मनोरमा ने पुरुष-पीड़ा जैसे विशेष संदर्भों पर आधारित दो कहानी संग्रह भी संपादित किए हैं। जिनके नाम हैं-‘काँपती हुईं लकीरें’ और ‘सहमी हुईं धड़कनें’ उन्हें ‘सूर्यकांत निराला सम्मान’, ‘लघुकथा लहरी सम्मान’, ‘आचार्य सम्मान’, ‘काव्य प्रतिभा सम्मान’ सहित कहानियों के लिए साहित्य समर्था टिक्कू पुरस्कार और कथा समवेत के द्वारा धनपति देवी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।ई-मेल : kalpanamanorama@gmail.com
कहानी पर संवाद सुन सकते हैं –
