अकादमिक हत्या की गूंज
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सहसा ; कौंधता है मेरा वह वजूद
जो मैंने पाया
छोटे शहर से बाहर जब निकली थी तो लगता था
सहज होगा हर कुछ
पर शिक्षा के मंदिर के द्वार
जब राजधानी में खटखटाए
तो वेलकम वार्म नहीं हुआ था
चिकुटी काट जगाया गया था
कि लड़की हो
शरीर सहेजना होगा
भाषा में इतनी मिठास और धैर्य ?
यह कहाँ से पाया है,
उसे भी खोना होगा?
सबके प्रति संवेदना ऐसे बाँटे फिर रही
जैसे हो कोई मुफ़्त की चीज़
ओह प्लीज़
अपने यूटोपिया को
अपने घनेरे जंगल के संस्कारों में छोड़ आओ ।
यहाँ प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी
दौड़ना, हाँफना होगा बहुत।
चलने होंगे कई कई चाल
‘फिटेस्ट की थ्योरी’ जो है केंद्र में ।।
एक मायावी दुनिया से
मेरा हुआ था पहला पहला परिचय
अपने आदिवासियत पर गुमान को
लोग मद्धिम मद्धिम ही सही
लेकिन मुझे प्रतिक्षण बदल रहे थे।
ख़्वाब था –
घर से बाहर कुछ बड़ा सीखा जाएगा
पर
मालूम कहाँ था यह द्रोणाचार्यों की नगरी है
प्रतिपल कोई ना कोई
कुछ लूटकर ही जाएगा
कुछ अपने भी भेष बदले आयेंगे
कोई कुछ लूट रहा होगा, कोई कुछ।
पर लूटेंगे सब।।
कुछ को मेरी असहमतियों से दिक़्क़त है,
कुछ को मेरे भोलेपन से।
वह सब लूट लेना जानते हैं।
मुझे भी
और
मेरी सामर्थ्यता को भी
मेरे सपनों सहित मुझे लूटा गया।।
मैं कुछ नहीं हूँ,
यह मुझे बताया गया ।
और जो बता रहा था
वह ख़ुद क्या है
वह आज सब कोई बतिया रहा है।।
बस कुर्सी और सत्ता के डर से
कुछ निज हित में
कुछ बहुत हासिल कर लेने के उद्देश्य से,
वो चापलूस बन चुप्पी साधते हैं।
वो रीढ़ विहीन
और मृत्प्राय तक हो जाते हैं ।
अकादमिक हत्या का सिलसिला
यह नया
या
मात्र मेरे तक नहीं है
ऐसी कई हत्याएँ मेरे पुरखा, पुरखिनों ने झेले हैं।
मेरे समकालीनों ने झेले हैं
और
ना जाने
कितनी पीढ़ियाँ इसे झेलेंगी।
एकलव्य और द्रोणाचार्य की संस्कृति
हर बार मिथकिय कह
दोहराई जाएगी ।
चुप्पी और सर्वश्व देने का भाव
तब भी एकलव्य के पास था
और आज भी वही भाव
एकलव्य ने
अपनी पीढ़ियों को सुपुर्द की है ।।
पर मन अब मानता नहीं
उसने भूत
और आज तक को तो स्वीकारा है
पर घुटन,
संत्राश ने बदले हैं
मेरे अंदर का जैव तत्व ।
भावी पीढ़ियों द्वारा यह हत्याएँ
अब ना होने दी जायेंगीं ।
वह जूझेंगी –
प्रतिरोध करेंगी –
प्रतिशोध भी लेंगी –
पर बावजूद इसके
सृजन को ही बोयेंगी ।।
उन अमानवीय द्रोणाचार्यों के
मन मस्तिष्क और चेतना में
कुहरेंगे वो
अपनी मृत्युसैया में।
जब इन अकादमिक हत्याओं की चीखें
इन्हें चित्कारने तक का मौक़ा नहीं देंगीं।।
जलता है –
धधकता है –
अंदर ही अंदर
वह प्रयास हत्या के
मीठे ज़हरों से सराबोर होती देह पर
असंख्य विषैले साँपों के झुंड में
लिपटी पाती हूँ
अपनी सीखने की अभिलाषा को।।
दम तोड़ते ,
उखड़ती साँसों के बीच भी
एक जिजीविषा रहती है
कि
अब माफ़ करने का समय
चाह कर भी नहीं रह गया।।
बदलना होगा ही
अपने हथियार
इन हत्याओं के ख़िलाफ़ –
क्योंकि
मेरा होना
अब जज्ब करना होगा ही तुम्हें
अवतार और परम ज्ञान में लिपटे
तुम्हारी अर्द्ध नंगी सोच को
समझ लिया है मैंने।
मैं मज़बूत रही ना रही,
मेरी भावी संततियाँ
मेरे लेखन को औज़ार बना तुमसे जूझेंगी
खेल शुरू किया तुमने था
ख़त्म करना हमें है।
हिंसा ; शायद तुम्हारी तरह
वे नहीं करेंगी
जैसा अब तक तुम करते आये हो ।
वह बदलेगी अपने उपक्रम –
और धराशायी होगी तुम्हारी सांस्कृतिक धरोहर
सर्वश्रेष्ठ होने का भाव बोध भी होगा तार-तार
लो अब तुम्हें बिखरना ही पड़ेगा बार-बार
हर बार।।
युद्ध होंगे नहीं
लहू गिरेगा नहीं
पर
तू अचेत बन
परास्त शून्य में ताकते
अपने अहम को धिक्कारते
तजोगे जान ।
और याद रखना
वह जान भी तुमसे दूरी ना बना पाएगा ।
वह मथेगा तुम्हारे कृत्य
तुम्हारे सामने
और तुम सिसकोगे उतना
जितना मेरे पुरखिन और पुरखा सिसके थे।।
हत्या का बोझ
ना आदमी को जीने देता है
ना ही मरने ।।
जैसे तुमने कहा था ना –
“ना उगला जा रहा है;
ना ही निगला जा रहा”
वही बात
तुम्हें तुम्हारे अंत समय तक
“ना जान छोड़ा जा रहा है
ना ही जान को जिया जा रहा है।।“
वाले पायदान पर
तुम्हें तुम्हारे कृत्य याद दिलवायेगी।।
रघुवीर सहाय के भी ‘रामदास’ को पता था
कि
उसकी हत्या होगी
वह उदास भी था
लेकिन यहाँ की आदिवासी पात्र
को पता तक ना था
कि उसकी हत्या होगी ।।
वह भी अकादमिक हत्या ।।
इतनी तो जघन्यता से बच जाते ना तुम अकर्मणा ।।।
2.एक शोर है सभ्यताओं के पास
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एक शोर है सभ्यताओं के पास—
इतना घना
कि वह सुन ही नहीं पाता
वे धीमी, महीन आवाज़ें
जो प्रकृति
हमसे करना चाहती है।
हम उलझे हुए हैं
कुछ नाकाम-से कामों में;
जबकि वही
हमारी असली ‘हीलर’ है।
फिर भी
उसे भुलाकर
न जाने किस जंग में
जलते जा रहे हैं हम।
प्राकृतिक आपदाएँ
अब उतनी स्वाभाविक नहीं रहीं;
बल्कि आज हम
मानव-निर्मित आपदाओं से
लगातार जूझ रहे हैं।
न कोई सब्र,
न प्रेम,
न बंधुत्व—
बस एक अंधी होड़
सत्ता और शक्ति को
मुट्ठी में बंद रखने की।
जबकि
कितना सरल है
ज़िंदगी को जीना
यदि वह श्रम पर आधारित हो।
प्रकृति में बिखरी खुशियाँ समेटना—
जैसे हर नए दिन
फूलों का खिलना,
और हर रात
चुपके से झर जाना
महुआ के मदमाते फूलों का,
किसी के हिस्से का हो जाना—
टोकरी में बंद
या थाली में परोसा जाना।
क्योंकि प्रकृति
स्वयं उपभोक्ता नहीं होती।
वह बनी ही है
किसी ‘और’ को देने के लिए,
और किसी ‘और’ से कुछ लेकर
जीने के लिए।
पेड़ों को देखिए—
फल-फूल सब ढोते हैं
अपनी देह पर,
पर उनका उपयोग
दूसरों के लिए होता है।
मेरे बाग के फूलों का रस
कितनी मक्खियाँ, मधुमक्खियाँ
धीरे-धीरे चुनती हैं—
हौले से,
बिना उसे सुखाए,
बिना उसे मुरझाए।
मेरे पेड़ों के आम, कटहल, पपीते
खाते हैं असंख्य चिड़ियाँ,
गिलहरियाँ,
और छोटे-छोटे जीव भी।
पेड़ की ऊँचाइयों को देखिए—
जहाँ ज़मीन पर चलने वाली
चींटियाँ, कीड़े-मकोड़े
नहीं पहुँच पाते,
वहाँ से वह पेड़
खुद गिरा देता है
अपने फलों का एक हिस्सा
उनके लिए।
बाँटना
हम इनसे क्यों नहीं सीखते?
संग्रह करना
मनुष्य ने अपनी प्रवृत्ति बना ली है,
पर देना—
कितना सुकून देता है,
यह प्रकृति
हमें बार-बार सिखाती रही है।
नदियाँ भी
अपना सारा पानी
खुद नहीं पी जातीं,
न समुद्र
अपने भीतर का
सारा विस्तार।
जल के हर स्थल में
जीवन बसता है—
केकड़े, मछलियाँ, साँप
और न जाने कितने जीव।
वे नहीं माँगते किराया,
न कोई कर।
फिर मनुष्य ने
कहाँ से सीखा
यह लेन-देन,
यह संग्रह,
यह अनैतिक व्यवहार?
सुना है—
प्रकृति की जड़ें भी
अपने आसपास की जड़ों का
ख़याल रखती हैं।
उनके सुख-दुख में
भागीदार बनती हैं,
संसाधन बाँटती हैं,
बीमारी में
उन्हें जिलाने की कोशिश करती हैं।
उन्हें चिंता होती है
हर एक के अस्तित्व की।
फिर हमने
यह धूर्तता
कहाँ से सीख ली?
कैसे भूल गए हम
कि हमारा अस्तित्व भी
संभव नहीं
प्रकृति के इन तत्वों के बिना।
हम पूजते भी हैं
और उजाड़ते भी हैं।
पेड़ पूजते हैं—
जंगल काटते हैं।
नदी पूजते हैं—
उसमें कूड़ा डालते हैं।
पहाड़ पूजते हैं—
उसे उजाड़ देते हैं।
भूमि पूजते हैं—
और उसी को खोद डालते हैं।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करते हैं
और हर दिन
अपने पड़ोसियों को
रेत डालते हैं।
‘विभिन्नता में एकता’ पर लेख लिखते हैं,
और अपने से भिन्न संस्कृति पर
मॉब बनकर
लिंचिंग तक कर डालते हैं।
पढ़ती हुई बच्चियों पर
बमबारी करते हुए
चल पड़ते हैं
मंगल और चंद्रमा पर
जीवन खोजने।
जो जीवन
इस धरा ने दिया है,
उसकी कद्र
हमसे हुई ही नहीं।
तो अन्य ग्रहों से
क्या भाईचारा
और बहनापा
उम्मीद करेंगे हम?
बल्कि
इस धरती को ही
नरक बनाने पर
सवाल होने चाहिए।
अन्य ग्रहों को
नष्ट करने की कोशिश भी
नहीं होनी चाहिए।
मनुष्य को
अपने अस्तित्व पर
थोड़ा कम गुमान करके
उसे ठहरना चाहिए।
बहुत कम जाना है हमने
प्रकृति को।
इतना इतराना
नेस्तनाबूद होने की ओर
बढ़ना है।
जिए तो डायनासोर भी थे
इसी धरती पर—
वे अपनी बृहत् काया पर इतराए थे,
और तुम
अपने मस्तिष्क पर इतराते हो।
आओ—
इन पक्षियों की बोलियों पर ठहरें,
गिलहरी की चंचलता से
मोहित हो जाएँ।
हत्याओं और संहारों का आयोजन रुके,
और कुछ नया रचा जाए।
ग्रंथ—
वह भी धार्मिक नहीं,
न ही वर्चस्व की संस्कृतियाँ।
बस सहेजा जाए
प्रेम और सहअस्तित्व—
चर और अचर के साथ।
इस संपूर्ण धरातल के साथ।।
दसों दिशाओं के साथ।।।
और उसमें बसे
हर एक कण-कण के साथ।
एक अंतहीन अनंत उत्पत्ति के विस्तार के साथ।।
3.हिन्द रज़ब
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तुमने पुकारा था—
उस इंसानी क़ौम को,
जिसकी गोद में
तुमने जन्म लिया था।
तुम आई थीं इस दुनिया में
दो मासूम अनुभूतियों के साथ—
एक,
अपनी तकलीफ़ को
रोकर कह देना,
और दूसरी—
इस सृष्टि की सुंदरता पर ठहरकर
साँसों की लय में
धीरे से मुस्का देना।
पर एक तीसरी अनुभूति—
जो तुम्हारी उम्र की थी ही नहीं —
हमने ही बो दी तुम्हारे भीतर वह :
डर…
ख़ौफ़…
और इसके लिए—
हम हमेशा
शर्मिंदा रहेंगे।
अभी तो तुम्हें
जीवन के अनगिनत रंगों से गुजरना था,
अनुभूतियों के आकाश में
उड़ना था,
पर तुम्हारे हिस्से जो आया वह धूसर था,
मटमैला था,
खून से लथपथ वीभत्स था।
पर हमने—
अपनी अंधी आस्थाओं में—
धार्मिक उन्माद में
सत्ता शक्ति की भूख में
तुम्हारी काँपती हुई आवाज़ तक को
अनसुना कर दिया।
वह आवाज़,
जो कह रही थी—
एक नन्हीं-सी जान
डर रही है।
एक बंद कार में,
अपने ही अपनों की निस्तब्ध चेतानहीन हो चुके
लहू में भीगे देहों के बीच,
तुम सिमट गई थीं
एक कॉल में—
समेट रही थी तुम अपना अस्तित्व भी
और भय से लिपटकर
बस इतना ही कह पाईं—
“मुझे यहाँ से ले जाओ ना…”
तुम्हारे चारों ओर
मौत का शोर था—
टैंकों की गड़गड़ाहट,
गोलियों की बरसात,
और हर दिशा में
विनाश का फैलता अंधकार—
जिसमें तुम्हें भी
समा जाना था
ना जाने अब
और तब ।
पर तुम्हारी वह निरीह पुकार—
मानवता के नाम—
समय की दीवारों पर
हमेशा गूँजती रहेगी।
वह आवाज़
हमारी चेतना में
काँटे की तरह चुभेगी,
और हमें हमारे ‘मानव’ होने पर
एक अंतहीन प्रश्न बनकर
ठहरी रहेगी।
कितना रोया होगा
यह आकाश, धरा, वायु भी—
तुम्हारी हर एक जीने की पुकार के साथ!
अगर यह कोई प्राकृतिक अंत होता,
तो शायद
सब्र होता…
पर यह—
हमारी ही रची हुई
एक नृशंस कहानी थी,
जहाँ पहले से तय था
कि तुम्हारी साँसें छीन ली जाएँगी,
और दुनिया—
बस देखती रहेगी।
वजह ??
बस तुम्हारी पहचान
तुमसे तुम्हारी साँसें ले लेगा।।
कभी उल्कापिंडों ने भी
डायनासोरों को खत्म किया था—
वह प्रकृति थी।
पर यह—
यह मनुष्य है।
और उसकी
सबसे भयावह रचना।
हम शर्मिंदा हैं, हिन्द रज़ब—
कि तुम्हें
बस छह बरस की उम्र दे सके।
घृणा है हमें
इन युद्धों से,
इन खोखले धार्मिक आडंबरों से—
सत्ता व शक्ति की आराधना से
जिन्होंने
इंसानियत को
निगल लिया है।
हम गुनाहगार हैं तुम्हारे—
और शायद
क्षमा के योग्य भी नहीं।
अगर फिर कभी
जन्म चुनना—
तो यह धरा मत चुनना,
जहाँ आदमीयत ही
ज़िंदगियों पर भारी पड़ती है।
जहां सृजन का
शांति का अमन का
कोई मोल नहीं।।
ज़िंदगियाँ जो दे नहीं सकते
उसको लूटने का हक़
एक इनसान के पास
कैसे भला हो सकता था?
शायद नहीं बल्कि यकीनन
जानवर होना बेहतर है —
जहाँ युद्ध होते हैं,
पर सिर्फ
जीवित रहने के लिए।
सर्वाइयवल के लिये।
परंतु
यहाँ युद्ध हैं
हड्डियों को चबाने के लिए,
मांस के लोथड़ों को नोचने के लिए,
और वह भी—
मासूमों का।
आज मनुष्य
हैवानियत की नई परिभाषा लिख रहा है।
और तुम जीने की ;
अपनी अंतिम कोशिशों में—
हमें एक प्रश्न दे गई :
क्या हमने पाया?
मौत!!
या मौत का विस्तार!!
फिर भी; याद रखें
गाज़ा की सरज़मीं कहती है –
वह ज़िंदा था,
वह ज़िंदा है,
और वह ज़िंदा रहेगा—
इन तमाम आहुतियों के बाद भी।
कहीं और ज़्यादा मज़बूती से।।
तुम्हारी शहादत
अब एक मशाल है—
जो हर आँसू में,
हर सिसकी में
जलता रहेगा।
अब हमें तय करना ही होगा
कि
हम अपने हिस्से का अपराध माने,
और यह संकल्प लें
कि
अब कोई और हिन्द रज़ब नहीं,
अब कोई और युद्ध नहीं।
क्योंकि
सृजन की इस दुनिया में
कोई स्थान नहीं;
विध्वंस का,
हत्याओं का,
लूट का,
और शक्ति-पूजा का।

नीतिशा खलखो मैथन, बृहत् झारखण्ड
