बापू टावर (पटना) में युवा कवयित्रियों का स्त्रीवादी कविता-पाठ
पटना का साहित्यिक समाज लंबे समय से ध्रुवों, गुटों और आपसी गिरोहबंदियों में बंटा हुआ दिखाई देता है। ऐसे में किसी साहित्यिक समारोह में शामिल होने की इच्छा सहज ही क्षीण हो जाती है। विचारों से ज्यादा व्यक्तियों और खेमों की निष्ठा को प्राथमिकता देने वाला यह माहौल अक्सर साहित्य की मूल आत्मा को आहत करता है। लेकिन जब युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्रा की ओर से युवा कवयित्रियों के कविता-पाठ का निमंत्रण मिला, तो तमाम संकोचों के बावजूद उसे स्वीकार करने से स्वयं को रोक पाना संभव नहीं हुआ।
प्रत्युष मिश्रा की पहल से पटना के बापू टावर में आयोजित यह संगोष्ठी कई अर्थों में अपवाद थी। यह पूरी तरह स्त्रीवादी एप्रोच के साथ आयोजित कार्यक्रम था, कविता-पाठ से लेकर अध्यक्षता तक। मंच पर उपस्थित सभी प्रतिभागी स्त्रियां थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ये कवयित्रियां अलग-अलग सामाजिक, भौगोलिक और वैचारिक पृष्ठभूमियों से आई थीं, जिसने इस आयोजन को एकरूपता से बाहर निकालकर बहुस्तरीय बना दिया।
कविता-पाठ में मंच से स्त्री दृष्टि के जरिए जिस यथार्थ की यात्रा कराई गई, वह न तो चिकनी थी और न ही पूरी तरह व्यवस्थित, बल्कि वह कच्चे-पक्के रास्तों से होकर गुजरने वाली वह यात्रा थी, जो स्त्री जीवन के संघर्ष, अस्मिता, प्रतिरोध और स्वप्नों को एक साथ उद्घाटित करती है। यह अनुभव इसलिए भी आह्लादकारी था क्योंकि मंच से कही जा रही कविताओं को श्रोताओं ने पूरे धैर्य और तल्लीनता से सुना। यह आज के साहित्यिक आयोजनों में विरल होता जा रहा है।
ज्योति स्पर्श, कंचन राय, चाहत अन्वी, ज्योति रीता, नताशा और गुंजन उपाध्याय पाठक—इन 6 युवा कवयित्रियों ने पाठ किया। इन सभी की कविताओं में अपने समय की व्यापक चिंताएं, स्त्री जीवन की जटिलताएं और सत्ता-संरचनाओं से टकराने की स्पष्ट आकांक्षा दिखाई दी। कहीं निजी अनुभव सामाजिक यथार्थ में रूपांतरित होता दिखा, तो कहीं राजनीतिक हिंसा और ऐतिहासिक चुप्पियों पर स्त्री दृष्टि से सवाल खड़े किये गए। विशेष रूप से कंचन राय की कविता “बंदूक की गोली” ने अपनी स्त्रीवादी तेवर और प्रतीकात्मक भाषा के कारण गहरा प्रभाव छोड़ा। कविता की ये पंक्तियां श्रोताओं के भीतर तक उतरती चली गईं—
चाहती हूं
आग होना..
पहाड़ होना..
पखेरू होना…
होना चाहती हूं
मूक इतिहास की बोली
जरूरत पड़े तो
बंदूक की गोली….
कविता स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास से संवाद करती, जरूरत पड़ने पर प्रतिरोध का रूप धारण करती एक सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुनीता गुप्ता ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने गांधी और उनके स्त्री सशक्तिकरण संबंधी विचारों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह रेखांकित किया कि ‘गांधी की राजनीतिक और नैतिक दृष्टि में स्त्री केवल सहायक नहीं, बल्कि परिवर्तन की केंद्रीय शक्ति थी।’ साथ ही उन्होंने पठित कविताओं में निहित विविध स्त्रीवादी अप्रोच को समकालीन साहित्य के लिए न केवल आवश्यक बल्कि श्रेयस्कर बताया।
संचालन युवा कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्रा ने किया। संचालन में अनावश्यक औपचारिकता से बचते हुए उन्होंने संवाद और कविता को केंद्र में रखा, जिससे कार्यक्रम की प्रवाहशीलता बनी रही।
इस अवसर पर श्रोताओं के रूप में संजीव चंदन, कुमार मुकुल, वीरेंद्र यादव, नरेंद्र कुमार विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि , सुशील, राजेश कमल, अरविंद पासवान, मुसाफिर बैठा, धर्मवीर यादव गगन और श्वेता शेखर सहित कई लेखक, कवि और साहित्यकार उपस्थित थे। यह उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि यदि मंच वैचारिक रूप से ईमानदार हो, तो पटना का साहित्यिक समाज अभी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुआ है।
कुल मिलाकर, यह आयोजन पटना के साहित्यिक परिदृश्य में एक ताजी हवा के झोंके की तरह था—जहां न गुट थे, न गिरोह, बल्कि स्त्री स्वर, स्त्री दृष्टि और कविता का ईमानदार संवाद था। ऐसे आयोजन यह उम्मीद जगाते हैं कि यदि मंच स्त्रीवादी, समावेशी और वैचारिक रूप से सजग हों, तो साहित्य अब भी समाज से गहरे संवाद की क्षमता रखता है।
