महकार की महागाथा: लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य है महकार

क्या आपने डॉन्स ऑफ डेमोक्रेसी देखा है? लोकतंत्र का संगीत सुना है? महकार गांव आइए, हमारी तरह।लोकतंत्र का एक जीवित महाकाव्य, घटित महागाथा है महकार- गया जिले के खिजरसराय प्रखंड का महाकार गांव!

संविधान आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य की रोशनी से पहले अंधेरा था उस गांव में और इसके पड़ोस के गांवों में – आज से 83 साल पहले।

कल्पना करिए -धुप्प अंधेरा, उन्मादी बाढ़ से जलमग्न खेत,खलिहान, बरसात की रात में बरसता बादल, कड़कती बिजली और फुस व मिट्टी के घर में रहने वाला चार पांच मजदूर परिवार बरगद के पेड़ पर जान बचाने के लिए दुबका बैठा है।एक मां और पिता की गोद में कुछ सप्ताह का बच्चा भी है – साल 1944। इसके 70 साल बाद बंधुआ मजदूर मां और पिता का वह बच्चा बिहार का मुख्यमंत्री बना-जीतनराम मांझी। है न डांस ऑफ डेमोक्रेसी! है न महकार में रचा गया महाकाव्य!

कई सर्ग – उपसर्ग का महाकाव्य है महकार। जब महकार का जीतन स्कूल पढ़ने पहुंचा देश में दलितों का साक्षरता दर 15% से भी कम था। मुसहर – भुइंया जाति में साक्षरता दर शून्य के बराबर। आज भी साक्षरता दर बेहद कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार 10% , महिलाओं की तो 10% से भी कम। आज भी मुसहर जाति में दस हजार की आबादी पर एक एमए है, जीतन राम मांझी ने एमए किया 7वें दशक में।

पिछले दिनों दिल्ली में बात बात में बात निकली कि ‘ महकार में लिट्टी ड्यू है।’ मन और व्यवहार से सरल मांझी जी ने पूछा, ‘ आइएगा महकार, खाइएगा लिट्टी!’ हमारा उत्तर सकारात्मक था और हम अगले दो दिन में खिजरसराय प्रखंड के गांव महकार में थे।गांव का काया कल्प हो चुका है। यह गांव अब उसी बंधुआ मजदूर के बेटे के नाम से जाना जाता है, जिसे घर बनाने के लिए मिली बंजर पथरीली जमीन भी उसके मालिकाना में नहीं थी, जमींदार की थी जमीन। यह गांव अब जीतन राम मांझी का गांव है।

हमलोग-सुबोध जी, अरुण नारायण, हुलासगंज और खिजरसराय के बीच से महकार जाने वाली सड़क पर मुड़े तो हमें कहां पता था कि लोकतंत्र के महाकाव्य की यथार्थ रचना देखने जा रहे हैं। हमारे मित्र जितेंद्र दिल्ली से नहीं पहुंच पाए थे, रास्ते में थे, बाय रोड। उनके न पहुंच पाने का हमें अफसोस था।

नहर के दो किनारों से सड़क है। बाईं वाली पकड़ेंगे आप तो 45 किलोमीटर के बाद राजगीर पहुंचेंगे, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री की सांस्कृतिक अवधारणा का केंद्र। दाईं वाली से जायेंगे तो 11 किलोमीटर के बाद महकार पहुंचेंगे, पूर्व मुख्यमंत्री के सपनों का केंद्र।

हमसब चकित रह गए जब हमने देखा कि गांव शिक्षा का हब बन चुका है- पोलीटेक्निक कॉलेज, आईटीआई, अनुसूचित जाति के लड़कों और लड़कियों के लिए आवासीय स्कूल, प्राइमरी और हायरसेकेंड्री स्कूल। ये सारे संस्थान सरकार के उपक्रम हैं, उन्हें संभव करने वाला इस गांव का ही जीतन है, जो आज केंद्रीय मंत्री है – जीतन राम मांझी, जो बिहार का मुख्यमंत्री रहा है, जिसकी घोषित राजनीति है शिक्षा का सरकारीकरण, अफसर, नेता और जनता के बच्चे समान स्कूल में पढ़ें, समान पाठ्यक्रम में पढ़ें। निजी तौर पर मेरी एक शिकायत जाती रही मांझी जी से। वह यह कि अपने प्रयास से शिक्षा के लिए उन्होंने क्या किया। यह कि मुसहर और दलित समाज में शिक्षा के लिए क्या किया। अवसर मिला तो जितना संभव हो सका वह किया, यह महकार आकर समझ में आता है। वैसे मुख्यमंत्री रहते हुए गया में आईआईएम भी तो लेकर आए।

महकार को रात में देखिए। बिजली से जगमगाता गांव। बिजली का ग्रिड लगा है, गांव में 24 घंटे बिजली है। पइन/ नहर बना है, गांव के इलाके में सिंचाई की सुविधा है। महकार को प्रखंड बनाने का सपना मांझी जी का। प्रस्ताव पर नीतीश कुमार को एक्जिक्यूट करना है। प्रखंड कार्यालय के लिए भवन बनकर तैयार है। प्रखंड बना नहीं है लेकिन प्रखंड इलाके में डिग्री कॉलेज हो चुका है। बिहार सरकार की भी योजना है अब कि हर प्रखंड में होगा एक डिग्री कॉलेज।

जब हम गांव में पहुंचे तो मांझी जी इंतजार में थे। एक दिन उन्होंने अपने लिए तय किया था। हर सप्ताह आते हैं वे महकार, लोगों से मिलते हैं। उस दिन को उन्होंने अपने लिए रखा था, आराम के लिए, लेकिन अब वह पूरा दिन उन्होंने हमारे लिए कर दिया था।

‘ महकार की लिट्टी ‘ अब एक आयोजन बन गया था। हमारे आने को उन्होंने एक आयोजन में तब्दील कर दिया था, गेट टुगेदर। परिवार के लोगों को बुला लिया। बिहार सरकार में मंत्री और अपने बड़े बेटे संतोष कुमार सुमन को, उनकी विधायक पत्नी दीपा जी को। छोटे बेटे और उनके परिवार को। पार्टी के एक दो और विधायकों को। चुनिंदा कार्यकर्ताओं को। एक क्लोज गेट टुगेदर।

हर कोई पहुंचा लेकिन मांझी जी आज हमारे लिए थे। आज हम उनके खास मेहमान थे। ग्रामीणों के साथ बैठे थे, हमारे इंतजार में, खासकर उसी जमींदार परिवार के अपने हमउम्र मित्र के साथ, जहां उनके पिता, उनका परिवार कभी बंधुआ मजदूर था – सबसे मिलवाया, बैठे ग्रामीणों से, परिवार के सदस्य से।

हमारा तो उद्देश्य था महकार के महाकाव्य के पन्नों से गुजरना, उसकी काव्यात्मकता का आनंद लेना। बहुत कुछ हम पहले से सुन चुके थे। आज फिर उकसा कर सुन रहे थे। आज देख भी रहे थे। जीतन राम मांझी बड़े अच्छे किस्सागो हैं। वे नेता नहीं होते तो साहित्यकार होते। अच्छा हुआ नेता हुए -महाकाव्य पन्नों पर नहीं, पगडंडियों पर रचा गया, घटित हुआ।जितना संभव हो सके पुराने क्षणों का रिप्लिका तैयार हो रहा था। पुराने का कुछ ढांचागत अवशेष नहीं है, लेकिन पुराने अवशेष पर ही खड़ा है सपनों का यथार्थ, वर्तमान का यथार्थ।

वे हमें दिखाना चाहते हैं वह जगह, जहां बाढ़ में बरगद पर मां – पिता की गोद में बच सका था जीतन। 83 साल पहले की घटना। वे नॉस्टैल्जिया में हैं, वे कोमल उछाह से भरे हैं। कहते हैं 50 साल पहले आए थे यहां। 50 साल बाद फिर से आए हैं। हमें अच्छा लगा। हमलोग निमित्त बने हैं।

एक मृत पईन है, जिसके किनारे बसा था उनका परिवार, कुछ और मुसहर – भुइंया परिवार, एक – दो घुमंतू परिवार। बरगद कट चुका है। हमलोग कहते हैं रिप्लिका बनाइए। पुराने अवशेष की स्मृति। बेटे संतोष कुमार सुमन का विभाग है, पुराने पईन को जिंदा किया जा सकता है। झोपड़ियां खड़ी हो सकती है। 83 सालों में लोकतंत्र के महाकाव्य का बड़ा सर्ग है यह। झोपड़ी से महल तक।

जीतन राम मांझी अब लय में आ गए थे। गांव में ही अपना एक तालाब बनवाया है- पानी रचना है, पानी विध्वंस है। पानी के विध्वंस से पानी की रचना है! तालाब पर फिर से कहानियों का सिलसिला। कहानियां हम पहले भी सुन चुके हैं उनसे। कुछ नई बातें, कुछ नए उपसर्ग।

अब मांझी जी के सपनों के गांव का शैक्षणिक हब देखना है दुबारा। मांझी जी की निगाहों से, उनके विवरणों के साथ।एक हेलीपेड बना है। महकार का जीतन अब जीतनराम मांझी है बरगद से भी ऊंचा उड़ने की क्षमता, योग्यता और असवर वाला, हेलीपेड तो होना ही चाहिए महकार में। हेलीपेड दिखाकर ही नहीं रुकने वाले हैं मांझी जी।

जीवन का एक और यथार्थ है। लोकतंत्र का महाकाव्य अंतिम सर्ग वाला नहीं होता है। हमेशा शेष रहता है महाकाव्य, महागाथाओं में गाथाओं के सूत्र निरंतर होते है, लेकिन व्यक्ति शेष होगा। व्यक्ति रुकता है एक जगह – बरगद के पेड़ पर पिता की गोद में दुबका जीतन पूरा संसार लांघ चुका है। देश दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ चुका है। देश और विदेश के महान विश्व विद्यालयों में व्याख्यान दे चुका है। महकार की कस्तूरी फैल चुकी है। जीतन को महकार में लेनी है पर आखिरी नींद!

महकार में ही सोएंगे आखिरी नींद जीतन राम मांझी। बताते हैं, दिखाते हैं कि अपने लिए बना लिया है श्मशान। तय कर लिया है वह चबूतरा, जहां उनकी देह पंच तत्व में विलीन होगी ! क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर- गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारे केस। लेकिन लोकतंत्र के महाकाव्य के पन्नों पर रैन नहीं होता। जीतन राम मांझी खुद सो जायेंगे अपने भाई, पिता, मां और पत्नी के बगल में। लेकिन महकार में अपनी क्षमताओं के साथ रच दिया है आने वाले जीतन का भविष्य – अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए 400 बेड का छात्रावास और बच्चियों के लिए 250 बेड का छात्रावास!

हमें तो महकार से विदा लेना ही था फिलहाल! संवैधानिक व्यवस्थाओं के भीतर, संसदीय लोकतंत्र का एक पुरोधा, लोकतांत्रिक हासिल का बड़ा रचनाकार हमें विदा दे रहा था और गांव की सीमा से हमने भी उन्हें विदा किया, महकार में ही रात होगी, अपने जिले में, बोध गया में, एक खादी उद्योग का हब बनाने का सपना लिए सोएंगे वे, सुबह अधिकारियों से उसके लिए मीटिंग हैं ।

पुनश्च: लोकतंत्र के महाकाव्य, महकार की महागाथा का एक स्थाई रस है, एक स्थाई भाव, स्टेट पावर को साथ लेकर समन्वय का भाव – इस भाव के साथ अपने स्पेस को बढ़ाते जाना, विराटता हासिल करना। भूमिहीन बंधुआ पिता का पुत्र एक गांव नहीं, एक प्रखंड नहीं, एक राज्य, एक देश पर काबिज हो जाता है। इस रस और इस भाव को समझने के लिए, उसके आस्वाद के लिए, उस आस्वाद के साथ उत्सव के लिए आपको भी पात्रता हासिल करनी होगी। जाति श्रेणी की ऊंची सीढ़ी से ‘ फासीवाद के खिलाफ विद्रोह का ‘वीर भाव ‘ खोजने पर हासिल नहीं होता है उसका आनंद। 10% से भी कम साक्षरता और 80% से भी अधिक परिवारों के 6 हजार रुपए में मासिक जीवन की सीढ़ी से फासीवाद कुछ अलग ढंग से दिखता है। तब ‘ घोषित आपातकाल ‘ में भी जीवन सुंदर दिखने लगता है, जैसे जीतनराम मांझी को दिखा था, अघोषित आपातकाल तो महकार का जीतन, इस देश का जीतन हर रोज झेलता है।

लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं।

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ISSN 2394-093X
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