प्रतिमा कुमारी की ख़ास रिपोर्ट
ग्रामीण बिहार के कई इलाकों में बीते कुछ वर्षों से एक खामोश लेकिन भयावह संकट फैल रहा है, जिसे स्थानीय लोग “सूखा नशा” कहते हैं। ब्राउन शुगर, स्मैक और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ अब शहरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि गाँवों की गलियों, खेतों के रास्तों और यहाँ तक कि स्कूलों के आसपास तक पहुँच चुके हैं। यह समस्या 2016 के बाद धीरे-धीरे उभरनी शुरू हुई, लेकिन शुरुआत में किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। परिवारों को लगा बच्चे बिगड़ रहे हैं, गलत संगत में पड़ गए हैं या जिद्दी हो गए हैं। असलियत तब सामने आई जब बच्चों का व्यवहार अचानक बदलने लगा — वे घर से पैसे चुराने लगे, गहने और बर्तन बेचने लगे और रात-रात भर गायब रहने लगे।
2017–18 तक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि कई गाँवों में किशोर उम्र के बच्चों का एक बड़ा हिस्सा नशे की गिरफ्त में आ चुका था। लेकिन असली झटका 2020 में लगा, जब परसा बाजार क्षेत्र में ओवरडोज़ से पहली चर्चित मौत हुई। उस घटना ने पूरे इलाके को हिला दिया। तब जाकर अभिभावकों ने अपने बच्चों पर नजर रखनी शुरू की और कई परिवार मजबूरी में उन्हें नशा मुक्ति केंद्रों में भेजने लगे। समस्या यह थी कि जब तक लक्षण दिखते, तब तक लत गहरी हो चुकी होती थी।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह नशा अपने आप नहीं फैल रहा, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से बच्चों तक पहुँचाया जा रहा है। स्कूलों के आसपास संदिग्ध लोग मंडराते दिखते हैं। पहले मुफ्त या बहुत सस्ते में नशा दिया जाता है, फिर धीरे-धीरे बच्चे पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं। परिवारों को अक्सर तब पता चलता है जब घर से सामान गायब होने लगता है या बच्चा हिंसक हो जाता है। 2020 के आसपास हालात इतने खराब बताए जाते हैं कि हर पाँच-छह घरों में कोई न कोई बच्चा इस लत से जूझ रहा था।
इन वर्षों में कई दर्दनाक मौतें सामने आई हैं। परसा बाजार थाना क्षेत्र के एक गाँव में 8 सितम्बर 2025 को एक युवक का शव एक कुएँ से मिला। मृतक की पहचान “राहुल” (काल्पनिक नाम) के रूप में की गई है। गले में गमछा बंधा था और शरीर पर बर्बर पिटाई के निशान थे। हाथ-पैर टूटे हुए थे और बेल्ट जैसे गहरे दाग शरीर पर साफ दिख रहे थे। ग्रामीणों ने इसे हत्या बताया और आरोप लगाया कि वह कुआँ पहले भी अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है। उनका कहना है कि पुलिस की गश्त और नशा विरोधी अभियान लगभग बंद हो चुके हैं, जिससे नशा कारोबारियों का मनोबल बढ़ा है।
इसी क्षेत्र के पास रेलवे लाइन के किनारे 22 वर्षीय एक अन्य युवक का शव मिला, जिसे यहाँ “अमित” (काल्पनिक नाम) कहा जा रहा है। परिवार इसे हत्या मानता है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि वह नशे की हालत में ट्रेन के सामने आ गया होगा। ऐसी मौतों में सच्चाई अक्सर धुंधली रह जाती है, क्योंकि परिवार बदनामी और पुलिस झंझट के डर से खुलकर सामने नहीं आते।
एक दिहाड़ी मजदूर, जिन्हें हम “सुरेश” (काल्पनिक नाम) कह रहे हैं, ने 2023 में अपने 13–14 साल के बेटे को ओवरडोज़ से खो दिया। वे कहते हैं, “माँ-बाप के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि बच्चा आँखों के सामने तड़प कर मर जाए और हम कुछ न कर सकें।” उनका आरोप है कि सिस्टम की नाक के नीचे यह ज़हर बिक रहा है, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। शराबबंदी के बाद ग्रामीणों में यह डर भी बैठ गया है कि कहीं शिकायत करने पर उल्टा उन्हीं पर केस न दर्ज हो जाए। कई लोग कहते हैं कि थाने में जाने पर उन्हें टाल दिया जाता है या कहा जाता है कि बड़े अधिकारी ही कुछ कर सकते हैं।
एक अन्य परिवार, जिनका नाम यहाँ “महेश” (काल्पनिक नाम) के रूप में दिया जा रहा है, ने 23 वर्षीय बेटे को खो दिया। उसने पहले ब्राउन शुगर लेना शुरू किया, फिर इंजेक्शन तक पहुँच गया और आखिरकार ओवरडोज़ से उसकी जान चली गई। इसी तरह “राजीव” (काल्पनिक नाम) नाम से संदर्भित एक पिता ने 2020 में अपने इकलौते बेटे को खोया था। उनकी घटना के बाद ही कई परिवारों को समझ आया कि पहले जो बच्चों की “आत्महत्या” या “अचानक मौत” लगती थी, उसके पीछे नशे की भूमिका हो सकती है।
एक 16 वर्षीय लड़के की कहानी पूरे इलाके में लोगों की जुबान पर है, जिसे यहाँ “गुड्डू” (काल्पनिक नाम) कहा जा रहा है। उसके पिता का निधन उसके जन्म से पहले हो गया था। माँ घरों में काम करती थी, बड़ा भाई किसी तरह परिवार चलाता था। उसने 11–12 साल की उम्र में साथियों के साथ नशा शुरू किया और 2022 में रेलवे ट्रैक पर मृत मिला। उसका भाई आज भी कहता है, “ये लोग सौदागर नहीं, हत्यारे हैं।”
एक अन्य परिवार, जिसे यहाँ “शंकर” (काल्पनिक नाम) के नाम से दर्शाया गया है, के दो बेटे थे। बड़ा बेटा नशे का शिकार हुआ, जबकि छोटा बेटा, सिर्फ 18 साल की उम्र में, 2023 में नशे की हालत में फाँसी लगाकर मर गया।
कई परिवारों ने बच्चों को नशा मुक्ति केंद्रों में भेजा, लेकिन वहाँ से जो अनुभव सामने आए, वे खुद एक अलग चिंता का विषय हैं। कुछ युवाओं ने बताया कि उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, उल्टी साफ करने और गंदे शौचालय नंगे हाथों से साफ करने को मजबूर किया गया। कई बच्चे डर के मारे पूरी बात बताने से भी हिचकते हैं। उनके शब्दों में, “वहाँ रहना जीते-जी नरक में रहने जैसा है।” नतीजा यह कि इलाज के नाम पर भी परिवार असमंजस में हैं — घर रखें तो नशे का खतरा, भेजें तो अमानवीय व्यवहार का डर।
इस संकट ने गरीब परिवारों को आर्थिक रूप से भी तोड़ दिया है। इलाज और पुनर्वास के लिए लोगों ने माइक्रोफाइनेंस से कर्ज़ लिए, गहने बेचे, घर गिरवी रखे। एक कर्ज़ चुकाने के लिए दूसरा कर्ज़ लेना अब आम बात है। एक माँ ने रोते हुए कहा, “बच्चा गया, अब कर्ज़ भी नहीं उतर रहा। रोने का भी वक्त नहीं मिला।” स्थानीय लोगों का कहना है कि दलित, पिछड़े और बेहद गरीब परिवार इस मार को सबसे ज्यादा झेल रहे हैं।
राज्य स्तर के अधिकारियों ने भी माना है कि शराबबंदी के बाद सूखे नशे का चलन तेजी से बढ़ा है। स्मैक, ब्राउन शुगर और सिंथेटिक ड्रग्स युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं। सरकार ने विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म और हेल्पलाइन व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, लेकिन गाँवों के लोग कहते हैं कि कागजों से बाहर इनका असर बहुत कम दिखता है। स्थानीय स्तर पर कार्रवाई छिटपुट है और अक्सर कुछ दिनों के अभियान के बाद सब ठंडा पड़ जाता है।
आज हाल यह है कि स्कूल के छात्र, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक — हर वर्ग के युवा इस जाल में फँसते दिख रहे हैं। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा का रूप ले चुका है। परिवार डर में जी रहे हैं, बच्चे भविष्य खो रहे हैं और समाज धीरे-धीरे भीतर से टूट रहा है। ग्रामीणों की एक ही मांग है — नशा बेचने वालों पर सख्त कार्रवाई, मानवीय पुनर्वास व्यवस्था और ऐसा माहौल जहाँ पीड़ित परिवार बिना डर अपनी बात कह सकें। जब तक यह नहीं होता, “सूखा नशा” गाँवों में चुपचाप अपनी अगली पीढ़ी निगलता रहेगा।
