फिल्म कक्कुज (पखाना) की निर्माता दिव्या भारती किसके निशाने पर ?

कुमुदिनी पति 


विवाद , समाज और सियासत,
दिव्या भारती अपने गृह-राज्य तमिलनाडु से बाहर रहने के लिए मजबूर कर दी गईं हैं।उनके कुछ करीबी मित्रों के अलावा किसी को नहीं पता कि वह कहां हैं और किस हालत में जी रही हैं। हालांकि पिछले दिनों वे इरोम शर्मिला की शादी में वधु सखी के तौर पर देखी गईं। उनके ऊपर जातीय हिंसा व वैमनस्य पैदा करने का आरोप लगाकर 3 अगस्त कोमदुरई में केस भी दर्ज कर दिया गया है।

मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री को ख़त

क्या गुनाह है इस 28 वर्षीया महिला फिल्मकार का, जिसको लगातार ‘स्टाक’ किया जा रहा है, बलात्कार और हत्या की धमकियां मिल रही हैं और सुरक्षित रहने के लिए अपनों से दूर अज्ञातवास में रहना पड़ रहा है?
सवाल उठाना, सच बोलना और ज़मीनी हक़ीकत को उजागर करना आज सबसे बड़ा जुर्म है। दिव्या माले से जुड़ी हैं। वह कहती हैं कि अलग-अलग नाम से संगठन बन रहे हैं, जो दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रतिपादन कर रहे हैं। दिव्या का मानना है कि ‘‘पुट्टिया तमिलघम पार्टी भाजपा का एक ‘फ्रन्ट’ हैऔर उसका नेता कृष्णास्वामी  दलितों को पिछड़ी जाति की श्रेणी में शामिल करना चाहता है, इसलिए उसे लगता है कि जाति का नाम बदनाम हो रहा है।’’दिव्या पर आरोप है कि वे पाल्लर जाति को बदनाम कर रही हैं।

फिल्म निर्माता दिव्या भारती

समाज का सच सामने लाती है ‘कक्कूज़’


पर दिव्या की डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘कक्कूज़’ आज जिस बात को सामने ला रही है, उसे स्वीकारने से बचा नहीं जा सकता। यह फिल्म भारत के सबसे उन्नत राज्य तमिलनाडु के करीब 25 जिलों में हाथों से मैला ढोने व सीवर साफ करने वाले सफाई कर्मियों के जीवन की दुर्दशा को उजागर करती है और‘स्वच्छ भारत’ के भीतर छिपी घिनौनी सच्चाई का पर्दाफाश भी करती है। फिल्म में बताया गया है कि अरुनदतियार, चकिलियार, इरुलार, कुरवार व अन्य दलित उप-जातियां भी इस काम को करने के लिए मजबूर हैं। ‘कक्कूज़’ का मतलब है ‘पाख़ाना’। दिव्या ने अपनी फिल्म में अनेकों महिला और पुरुषसफाई कर्मियों से बात ही नहीं की, बल्कि उनके कार्यस्थल पर जाकर सीवर की सफाई, पाखानों की सफाई, कूड़ों के ढेरों की सफाई, नालों से पॉलिथीन और महीनों का सड़ा कचरा निकालना और उनकी झुग्गियों की स्थिति को ‘शूट’ किया है, जिसमें उन्हें एक साल लगा। वह कहती हैं  कि वह कानून की स्नातक होने के नाते जान पाती हैं कि 2013 में ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ पर प्रतिबन्ध के बावजूद यह काम धड़ल्ले से चल रहा है। फिल्म देखने के बाद शायद खाना तक खाना मुश्किल लगे, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि ये सफाई कर्मी काम के बाद खाना कैसे खा पाते होंगे; कई बार तो उन्हें दिन भर उल्टियां होती हैं।

सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायलय की अवहेलना


दिव्या ने मदुरई, चेन्नई, कोइम्बाटूर, थिरुप्पूर, रामनाथपुरम, थिरुनलवेली जैसे तमाम जिलों में जाकर 20 परिवारों से बातचीत की, जिनके पति, भाई या पुत्र सेप्टिक टैंक साफ करने के लिए अन्दर घुसे और फिर वापस बाहर नहीं आ सके। वे फिसलकर अन्दर ही समा गए, पर अधिकारी ठेकेदारों और सुपरवाईज़रों पर आरोप लगाकर मुक्त हो गए; किसी को सज़ा नहीं मिली। घर की औरतें 10 लाख के मुआवज़े के लिए दलालों और सरकारी अफसरों के पास भटकती रहीं और अक्सर पैसे सबूत के अभाव में नहीं मिले। कभी पैसे मिले तो दलालों ने बड़ा हिस्सा हड़प लिया। सरकारी अफसर अक्सर यह साबित करने में लग जाते कि मौत किसी अन्य कारण से हुई थी। कई बार तो दौड़-भाग करने के बादकेवल 1.5-2 लाख रुपये से अधिक नहीं मिले। घर की औरतें कहती हैं कि जब कमाने वाला ही चला गया तो पैसे लेकर क्या होगा? वे पूछती हैं, ‘‘क्या इस खतरे वाले काम को करने के लिए हम ही बचे हैं; क्या हमारे जान की कोई कीमत नहीं, जो कीड़े-मकोड़ों की भांति मरते रहें? कई कर्मचारी आंध्रप्रदेश से पलायन करके प्रदेश में इस काम को कर रहे हैं, तो उन्हें लोकल समर्थन नहीं मिलता।
भारत में नई सरकार का नया जुमला है ‘स्वच्छ भारत’। तो प्रधानमंत्री सहित कुछ मंत्री, नेता व अधिकारी साफ सड़कों पर झाड़ू फेरते हुए फोटो खिंचवाते हुए मिल जाएंगे। पर कोई इन मृत सफाईकर्मियों के घरों के अंदर पांच मिनट भी बैठ न सकेंगे, उनके दुख-दर्द को बांटना तो बहुत दूर की बात है।

लेखिका कुमुदिनीपति

आत्म-सम्मान का प्रश्न


दिव्या ने फिल्म में इन दलितों के आत्म-सम्मान का प्रश्न भी बहुत संजीदगी से उठाया है-कैसे हर जगह उनका सफाई का काम ही प्रधान बन जाता है। कुछ कर्मियों ने बताया कि उनके बच्चों को स्कूलमें भी सफाई कर्मी समझा जाता है, तो जब पाखाना जाम हो जाता है तो तुरंत प्रशासन उन्हें बुलाकर सफाई करवाने लगता है। उन्हें अछूत समझकर अध्यापक सहित दूसरे बच्चे हेय दृष्टि से देखते हैं।कोई उनके पास बैठना नहीं चाहता, इसलिए वे स्कूल में भी अलग बैठते हैं। इसके कारण बच्चों को स्कूल जाने का ही मन नहीं करता।

कई माताओं ने रोते हुए कहा, ‘क्या हमारी पीढ़ियां कभी इस नारकीय ज़िन्दगी से नहीं निकल पाएंगी?’ उन्हें लगता है कि पढ़कर उनके बच्चे इस कुचक्र से आखिर निकलें भी तो कैसे-वे आरक्षण के बारे में कहते हैं कि उससे भी क्या लाभ हुआ जब उनका सामाजिक दर्ज़ा कभी ऊपर नहीं उठ सकता? कई कर्मचारी महिलाओं ने बताया कि महिलाओं और लड़कियों के मासिक के कपड़ों को, अस्पतालों की गन्दगी और होटलों के सड़े खाने व मरे चूहों को उठाने से संक्रामक रोगों का खतरा रहता है। यह सारा काम हाथ से करना पड़ता है।

देखा जाए तो यह बड़ी विडम्बना है कि आधुनिक भारत के आधुनिकतम राज्य में सूखे शोचालयों की कमी है, खुले में हर प्रकार का कूड़ा फेका जाता है, सीवर साफ करने के लिए मशीनों का प्रयोग नहीं होता है और समाज के एक बड़े हिस्से को इसलिए गंदा माना जाता है कि वे अन्य लोगों के घरों की गंदगी साफ करते हैं। महिलाओं ने बताया कि काम से घर आने पर कई बार बच्चे भी घिना जाते हैं और उनके हाथ से खाना नहीं लेते। अक्सर उनकी बस्तियां शहर से बाहर होती हैं क्योंकि तथाकथित सभ्यलोग उनके आस-पास भी नहीं रहना चाहते।

कक्कूज़ फिल्म में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं और कर्मचारी नेताओं से बातचीत की गई है। दलित नेता कहते हैं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीरें तो बहुत जगह लगीं हैं पर जाति-विहीन समाज की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं किया गया। ट्रेड यूनियन नेता भी कहते हैं कि इतने सारे यूनियन बन चुके हैं, लड़ाई लड़कर कई बार मुआवजा दिलाया जाता है और पगार बढ़वा लिया जाता है, पर सामाजिक सम्मान की लड़ाई जीतने में अभी बहुत समय लगेगा। कर्मचारी बताते हैं कि ट्रेड यूनियन और दलित संगठनों के नेता भी दलाली करते हैं और पैसा कमाते हैं। ‘कक्कूज़’ केअन्तिम सीन में एक तरफ स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्रधानमंत्री तक लम्बी झाड़ू उठाए हुए हैंऔर दूसरे फ्रेम में मैला ढोने वाले हाथों से मल साफ कर रहे हैं।



दिव्या के खिलाफ साजिश?
एक साजिश के तहत पहले जुलाई 25 को दिव्या को पुलिस उसके अलंगाकुलम के घर से उठा ले गई।और यह गिरफ्तारी 2009 के एक पुराने केस में दो बार हाज़िर न होने के चलते की गई। दिव्या को जमानत तो मिल गई पर नया केस दर्ज हो गया। हालांकि 3 अगस्त वाले नये केस में मद्रास हाईकोर्ट ने स्टे लगा दिया है लेकिन धमकियां मिलनी बंद नहीं हुईं। उधर, सरकार अलग नाराज है कि जो बातें समाज में ढकी-छुपी हैं उन्हें उठाकर समाज में उथल-पुथल मचाने का हक दिव्या को कैसे प्राप्त हो गया? पर कौन इसका जवाब देगा कि आज भी भारत में 1 लाख 80 हज़ार 6 सौ सत्तावन मैनुअल मेहतर परिवार हैं?

(लेखिका सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अलावा महिला अधिकारों के लिए सजग तौर पर लिखती और लड़ती रही हैं। )


साभार:janchowk.com


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