अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी




अरुणा शानबाग सिर्फ बलात्कार पीडिता ही नहीं थी . पिछले 42  सालों में वह समाज के सामने एक सवाल थी, एक आईना थी. बलात्कार और औरत होने की पीड़ा में जीती मुम्बई की वह नर्स आज भी चीख -चीख कर पूछ रही है कि मेरे बाद भी क्यों नहीं थमा सिलसिला  ! उस पर बलात्कार , अप्राकृतिक यौन हमला और कुत्ते की चेन से उसकी ह्त्या के प्रयास के बाद वह कोमा में चली गई थी. 42 सालों तक कोमा में रहने के बाद वह आज सुबह हमें , हमारी जलील दुनिया, जहां औरत औरत होने की सजा पाती है , को अलविदा कहकर चली गई. 
त्रासदी यह कि उसपर बलात्कार करने वाले को मात्र 7 साल की सजा मिली . सवाल यहाँ भी हमारी मानसिकता का है – उसपर हुई इस क्रूर यौन हिंसा के बाद उसकी तथाकथित बदनामी के भय से आरोपी के खिलाफ ह्त्या की कोशिश और डकैती का मामला दर्ज किया / करवाया गया , बलात्कार और अप्राकृतिक यौन हमला का मामला दर्ज नहीं हुआ .  यौन हिंसा की शिकार स्त्री पर यह आरोपित बदनामी आज भी उसकी 42 सालों की यातना के  बाद यथावत है . हम एक ऐसी क्रूर व्यवस्था हैं कि हमारे न्यायालय ने उसे ‘ मर्सी किलिंग’ की अनुमति भी नहीं दी. 

अरुणा की त्रासदी की कहानी प्रभात खबर से साभार : 
अंतत: अरुणा शानबाग की आज मौत हो गयी. पिछले 42 वर्षों से कोमा में रहने के बाद अरुणा को अंतत: मौत नसीब हुई. अरुणा का निधन आज सुबह लगभग 10 बजे केईएम अस्पताल में हुआ. वह 67 वर्ष की थीं. वह पिछले 42 वर्षों से इसी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहीं थीं. पिछले दिनों उन्हें निमोनिया हो गया था और फेफड़े में भी संक्रमण था. किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि 66 वर्षीय अरुणा को निमोनिया का संक्रमण हो गया था और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थीं.

वह मुंबई के परेल इलाके में स्थित इस अस्पताल के आईसीयू में थीं. पिछले चार दशक से अरुणा अस्पताल के वार्ड नंबर चार से लगे एक छोटे से कक्ष में थी. मंगलवार को अरुणा की देखरेख कर रही नर्सों ने देखा कि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। तब उन्होंने उसे कक्ष से बाहर निकाला और आईसीयू ले गयीं जहां उसे एंटीबायोटिक दवाएं दी गयीं.

के ईएम अस्पताल के डीन डॉ अविनाश सुपे ने बताया कि हाल ही में उसे निमोनिया होने का पता चला था और उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था. जांच में पता चला कि अरुणा को फेफड़ों में संक्रमण था। उसे नलियों की मदद से भोजन दिया जाता था.  अरुणा केईएम अस्पताल में जूनियर नर्स के तौर पर काम करती थी। 27 नवंबर 1973 को वार्ड ब्वॉय सोहनलाल भरथा वाल्मीकि ने अरुणा पर यौन हमला किया और कुत्ते के गले में बांधने वाली चेन से अरुणा का गला घोंटने की कोशिश की जिससे अरुणा के मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो गई. हमले के बाद से अरुणा निष्क्रिय अवस्था में आ गई.

जब इस हालत में पडे पडे अरुणा को 38 साल हो गए तब 24 जनवरी 2011 को उच्चतम न्यायालय ने अरुणा की मित्र पत्रकार पिंकी विरानी की एक अपील पर अरुणा की जांच के लिए एक स्वास्थ्य दल गठित किया. पिंकी ने अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी. अदालत ने सात मार्च 2011 को इच्छा मृत्यु संबंधी याचिका खारिज कर दी. पिंकी ने उत्तर प्रदेश के हल्दीपुर की रहने वाली अरुणा की कहानी वर्ष 1998 में अपनी नॉन फिक्शन किताब अरुणा स्टोरी में बताई. अरुणा पर दत्तकुमार देसाई ने 1994….95 में मराठी नाटक कथा अरुणाची लिखा जिसका वर्ष 2002 में विनय आप्टे के निर्देशन में मंचन किया गया.

इस बीच, स्थानीय निकाय अधिकारियों ने अरुणा के रिश्तेदारों से अस्पताल के कर्मचारियों से संपर्क करने को कहा है. अरुणा की आखिरी ज्ञात संबंधी एक बहन थी जिसका कुछ साल पहले निधन हो चुका है.

कौन थीं अरुणा शानबाग
अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं. जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने बलात्कार किया था. उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी. उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं. उस घटना के बाद पिछले 42 वर्षों से अरुणा शानबाग कोमा में थीं. अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था. अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था. जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम था.

अरुणा के साथ हुए अन्याय की नहीं की गयी थी सही शिकायत

अरुणा के साथ जब सोहनलाल ने दरिंदगी की, उसके पहले अरुणा शादी का निश्चय कर चुकी थी और जल्दी ही उसकी शादी होने वाली थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. सोहनलाल अरुणा की जिंदगी में काल बनकर आया और सबकुछ तहस-नहस कर गया, लेकिन अरुणा के साथ हुए यौन शोषण के मामले को कुछ और ही रूप दिया गया था. अस्पताल के डीन डॉक्टर देशपांडे ने डकैती और लूटपाट का केस दर्ज कराया, अरुणा की बदनामी ना हो, इसलिए यौन शोषण के केस को दबाया गया, जिसके कारण सोहनलाल को सिर्फ सात साल की सजा हुई और उसके बाद वह आजाद हो गया, जबकि अरुणा 42 वर्षों तक उसके कुकर्म की सजा भोगती रही.

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