यौन स्वतंत्रता, कानून और नैतिकता (अरविन्द जैन)




वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', मगर सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है 'आदर्श बहू'।वैसे भारतीय शहरी मध्य वर्ग को 'बेटी नहीं चाहिए', मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम 'सुरक्षित' रहनी चाहिए।हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं।यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती, सीता, सावित्री, पार्वती, तुलसी या आनंदी,) चाहिए और अपने ‘आनंद बाज़ार’ चलाने और ब्रांड बेचने के लिए ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’बिकनीवाली। सो, स्त्रियों को सहमति के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे। पुरुषों के लिए घर-बाहर पूर्ण यौन स्वतंत्रता है।



संक्षेप में ‘नया कानून’ यह है कि शादी से पहले ‘सहजीवन’ और शादी के बाद पत्नी से बलात्कार और अन्य यौन क्रीड़ाओं तक का कानूनी अधिकार और घर से बाहर‘व्यभिचार’ (कॉल-गर्ल, एस्कॉर्ट, वेश्या या प्रेमिका) की खुली कानूनी छूट...’समलैंगिकता’ भी अपराध नहीं! स्त्रियों को ‘सबरीमाला’ या किसी भी मंदिर जाने पर रोक नहीं और मर्दों को किसी भी लाल बत्ती क्षेत्र में कोई नहीं पकड़ेगा। व्यभिचारिणी (अपवित्र) पत्नी को गुजाराभत्ता तक नहीं मिलेगा...! दहेज़ की शिकायत पर कोई गिरफ़्तारी नहीं....बहुत कर लिया दहेज़ कानूनों का दुरुपयोग! समाज में व्यभिचारबढे या देह-व्यापर, स्त्री शोषण-उत्पीड़न बढे या यौन-हिंसा के आंकड़े! स्त्रियाँ चीखती-चिल्लाती रहें ‘सोशल मीडिया’ पर...#METOO...#मीटू!

व्यभिचार कानून असंवैधानिक: मर्दों के लिए भीविवाहेत्तर सम्बन्ध अपराध नहीं!
सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायमूर्तियों(दीपक मिश्रा, खानविलकर, नरीमन,धनन्जय चंद्रचूड और इंदु मल्होत्रा) की संवैधानिक पीठ ने 'व्यभिचार' (भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497) को असंवैधानिक करार दे ही दिया। (जोसफ शाइन बनाम भारत सरकार (रिट पेटिशन क्रिमिनल194/2017,दिनांक 27.09.2018) और कोई रास्ता भी नहीं था।158 साल पुराने कानूनों में से एक, इस कानून को देश कि सबसे बड़ी अदालत असंवैधानिक ही करार दे सकती थी। पत्नियों को पति के विरुद्घ शिकायत का अधिकार देती, तो पितृसत्ता के लाडलों की सारी पोल ही ना खुल जाती।
‘व्यभिचार कि भाषा-परिभाषा (असंवैधानिक होने से पहले)
सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्णय से पहले धारा-497 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी से, उसके पति की सहमति से या मिली-भगत के बिना सहवास (बलात्कार नहीं) करता था, तो व्यभिचार का अपराधी माना जाता था, जिसके लिए उसे पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते थे। लेकिन ऐसी किसी भी स्थिति में महिला को उत्प्रेरणा का अपराधी नहीं माना जाता था। जबकि तलाक के लिए पति या पत्नी द्वारा शादी के बाद (पहले नहीं) पति-पत्नी के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ स्वेच्छा से सहवास करने पर एक-दूसरे के विरुद्ध तलाक का मुकदमा दायर किया जा सकता है। मतलब सजा के लिए व्यभिचार की परिभाषा अलग और तलाक के लिए परिभाषा अलग।
धारा-497 का दूसरा साफ-साफ अर्थ यह था कि व्यभिचार सिर्फ किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध रखना था और वह भी अगर उसके पति की भी सहमति या मिली-भगत हो। दो पति आपस में अपनी पत्नियां एक-दूसरे से बदल लें, तो कोई व्यभिचार नहीं था/है। मैं नहीं जानता कि भारतीय समाज में ऐसा भी होता है या नहीं, लेकिन इस संदर्भ में कुछ साल पहले एक कहानी जरूर पढ़ी थी और पढ़कर बहुत दिन तक भुनभुनाता रहा था ( ‘हंस’, अक्तूबर 1998 में ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी“ अंततः” पृष्ठ 24)। इधर ‘वाइफस्वैपिंग’ पर, हिंदी कि यशस्वी लेखिका गीताश्री का उपन्यास “बाँहों के दरमियान” भी एक वेबसाईट पर उपलब्ध है।
खैर…इसका अर्थ यह हुआ कि आपसी सहमति से पुरुष किसी भी बालिग, अविवाहित, विधवा या तलाक-शुदा महिला से कोई अपराध किए बिना यौन संबंध रख सकते थे/हैं, चाहे ऐसी महिला उनकी अपनी ही मां, बहन, बेटी, बुआ, मौसी, भाभी, चाची, ताई, भतीजी या भानजी क्यों न हो। हालांकि ऐसी कुछ महिलाओं के साथ वैध विवाह नहीं किया जा सकता। विवाहित महिला से भी संबंध रख सकते थे बशर्ते उसके पति को कोई ऐतराज न हो। पति का क्या है, वह सहमति दे सकता था/है या सब कुछ देखते हुए भी चुप्पी साध सकता है, अगर उसका कोई हित सधता हो। अपने हित के लिए सब कुछ उचित था/है शायद। इस संदर्भ में शानीजी की कहानी‘इमारत गिराने वाले’ और कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘दिलोदानिश’ उल्लेखनीय है।पढना चाहें तो ‘मदाम बावेरी, ‘लेडी चैटरलीज लवर’ और ‘अन्ना केरेनिना’ भी महत्वपूर्ण हैं।
कुल मिलाकर कानूनी मतलब यह कि पत्नी पति की संपत्ति थी/है, पति चाहे तो खुद इस्तेमाल करे, न चाहे तो न करे या चाहे तो किसी को इस्तेमाल करने दे और न चाहे तो न करने दे। पत्नी की अपनी इच्छा, मर्जी या सहमति का न कोई अर्थ, न अधिकार। पति की सहमति के बिना संबंध रखने का परिणाम होता पुरुष के लिए जेल और पत्नी के लिए तलाक। पति अगर व्यभिचारी हो, तो पत्नी को पति या उसकी प्रेमिका के खिलाफ शिकायत तक करने का अधिकार नहीं था/है (आपराधिक दंड संहिता की धारा-198)
व्यभिचार के कानूनी प्रावधान (धारा-497) में पुरुषों को ऐय्याशी की खुली छूट ही नहीं दी गईथी, बल्कि कहीं यह अधिकार भी दे दिया गया था (है) कि वह जरूरत पड़ने पर, अपनी पत्नी को अपने हितों की खातिर ‘वस्तु' की तरह इस्तेमाल भी कर सके। इधर अखबारों में पति-पत्नी द्वारा मिलकर वेश्यावृत्ति करने की बहुत सी खबरें छपी हैं, जो हमारी धारणा को और अधिक पुष्ट करती हैं।
वास्तव में, धारा-497 ही ऐसा कानूनी सुरक्षा-कवच है जिसके कारण समाज,जिस में व्यापक स्तर पर वेश्यावृतिऔर काल-गर्ल व्यापार फैल रहा है। वेश्यावृत्ति के बारे में बने कानून के अनुसार अनैतिक देह-व्यापार नियंत्रण अधिनियम के किसी भी प्रावधान में पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध ही नहीं बनता। पकड़ी जाती हैं हमेशा वेश्याएं, कालगर्ल या दलाल। देह व्यापार में अरबों का लेन-देन हर साल होता है लेकिन वेश्याओं की आर्थिक स्थिति? वेश्या, कालगर्ल या अनैतिक चरित्र की महिलाएं ही क्यों, भारतीय कानून पति द्वारा 18 साल से  बड़ी उम्र की पत्नी के साथ सहवास को भी बलात्कार नहीं मानता-धारा 375 का अपवाद)। इंग्लैंड की एक अदालत ने कुछ साल पहले एक निर्णय में पति द्वारा पत्नी से जबरदस्ती सहवास को बलात्कार माना जाता था, लेकिन भारत में अभी ऐसे किसी फैसले की उम्मीद करना मूर्खता होगी।

सवाल है कि अदालतें सामाजिक नैतिकता की ‘सुरक्षा प्रहरी’क्यों नहीं होतीं? सामाजिक नैतिकता का कानून से कोई संबंध हो या न हो लेकिन कानून की अपनी भी तो कोई नैतिकता होनी ही चाहिए? सामाजिक नैतिकता और कानून के बीच जो गहरी खाई है, वह समाज में अनैतिकता,व्यभिचार और  यौन-हिंसा, को बढ़ावा नहीं दे रही? या फिर समाज में लगातार बढ़ती अनैतिकता,व्यभिचारऔर यौन-हिंसा को रोकने में कानून पूरी तरह लाचार और बेकार नहीं है? क्या व्यभिचार पर कानूनी अंकुश न होने के कारण ही कहीं अवैध संबंधों की पृष्ठभूमि में तनाव, लड़ाई झगड़े, मारपीट, तलाक, आत्महत्या या हत्या के मामले नहीं बढ़ रहे....बढ़ेंगे ? व्यभिचार के परिणामस्वरूप इसकी सबसे अधिक शिकार या पीड़ित पक्ष औरतें ही क्यों हैं? क्या इसलिए कि उऩके पास कोई विकल्प या बचाव का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया है?
व्यभिचार के आधार पर तलाक
व्यभिचार के आधार पर तलाक-संबंधी प्रावधान फौजदारी कानून से कहीं बेहतर हैं, क्योंकि वहां पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे के अलावा किसी से भी यौन संबंध को व्यभिचार माना गया है। परिभाषा बेहतर है लेकिन व्यभिचार को प्रमाणित करना कितना मुश्किल है या कितना आसान? अधिकतर इस प्रावधान का प्रयोग पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी पर व्यभिचार के झूठे-सच्चे आरोप लगाकर अपमानित करने और छुटकारा पाने के लिए ही किया जाता है। भरण-पोषण भत्ता न देने-लेने के लिए तो,अक्सर ऐसे ही आरोप लगाए जाते हैं, क्योंकि बचाव के लिए ऐसे कानूनी प्रावधान बनाए गये हैं।
व्यभिचार के आधार पर तलाक के एक मुकदमे में (ए.आई.आर.1982, दिल्ली 328) पत्नी ने पति को एक लड़की के साथ कमरे में आपत्तिजनक अवस्था में रंगे हाथों पकड़ा और फिर तलाक का मुकदमा दायर किया। तलाक मिल जाता लेकिन अपील में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री महेंद्र नारायण ने कहा कि अधिक से अधिक यह पति के ‘असभ्य व्यवहार’ का प्रमाण है ‘व्यभिचार’ का नहीं, क्योंकि यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि पति ने लड़की के साथ सहवास किया, जो कानून की परिभाषा के अनुसार अनिवार्य है। अपने फैसले की पुष्टि में इंग्लैंड के दो फैसलों का उदाहरण भी दिया गया था कि पत्नी द्वारा किसी अन्य से हस्तमैथुन या बिना सहवास के यौन-संबंध व्यभिचार नहीं है। इसी फैसले में एक जगह (पृष्ठ 331) लिखा है ‘कृत्रिम गर्भाधान’ व्यभिचार नहीं है।क्योंकि इसमें सहवास नहीं है या पुरुषों का कृत्रिम गर्भाधान द्वारा पिता बनने का गौरव पाने में कोई परेशानी नहीं है? पिता भी बन गये और किसी को पता भी नहीं चला कि पति ‘नपुंसक’ है। पत्नी को कृत्रिम रूप से गर्भाधान करने का अधिकार तो है, लेकिन बच्चे गोद लेने का फैसला और अधिकार सिर्फ पति को, पत्नी की तो सहमति-भर चाहिए। हां, ऐसे ही दोहरे चरित्र(हीन) वाला है हमारा कानून और समाज।

यह सच है कि अवैध संबंधों में स्त्री-पुरुष समान रूप से भागीदार होते हैं। दो बालिग स्त्री-पुरुष आपस में जैसे संबंध रखना चाहें रखें, लेकिन कानून में विवाहित स्त्रियों के साथ जिस तरह पक्षपात किया जा रहा था/है, वह उचित ही नहींअन्यायपूर्ण भी था/है। पत्नी को व्यभिचारी पुरुष या प्रेमिका के विरुद्ध फौजदारी कानून में शिकायत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए, परन्तु पुरुष समाज को डर है कि अगर ऐसा हो गया तो उनकी ऐय्याशी ही नहीं, सारा देह व्यापार, नारी शोषण-उत्पीडन के हथकंडे और औरतों पर हुकूमत के सारे हथियार ही चौपट हो जाएंगे। सामाजिक नैतिकता से जुड़े बिना, कानून समाज का कोई भला नहीं कर सकते। कानून सामाजिक नैतिकता के प्रहरी नहीं बन सकते, तो न्याय के प्रहरी कैसे बन सकते हैं? तब तो मानना पड़ेगा कि अदालतें न्याय नहीं, सिर्फ फैसले सुनाती हैं और न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नहीं मात्र निर्णायक भर हैं। नैतिकता के बिना, न्याय नपुंसक नहीं होता क्या?
सौमित्र विष्णु बनाम भारत सरकार (ए. आई.आर1985 एस. सी.1618) मामले में न्यायमूर्ति वाई.वी.चंद्रचूड  का विचार था कि "फौजदारी कानून की अपेक्षा दीवानी कानून में बेहतर व्याख्या दी गई है। अगर हम फरियादी की दलील मान लें तो धारा-497 को कानून से निकाल फेंकना पड़ेगा। उस हालत में व्यभिचार और भी निरंकुश हो जाएगा और तब किसी को भी व्यभिचार के अपराध में सजा देना नामुमकिन हो जाएगा, इसलिए समाज का हित इसी में है कि “सीमित व्यभिचार दंडनीय बना रहे”। लेकिन सभी न्यायमूर्तियों और उनके पुत्र न्यायमूर्ति धनन्जयचंद्रचूड अपने (न्यायमूर्ति) पिता के विचारों-तर्कों से सहमत नहीं।
फैसले से स्त्रियों को क्या मिला?
लिंग समानता और स्त्री मुक्ति के नारे की आड़ में, यह निर्णय मर्दों को व्यभिचार/ऐय्याशी/शोषण/देह व्यापार की असीमित छूट ही देगा और फैसले के दूरगामी भयंकर परिणाम होंगे। हालांकि विवाहित स्त्री के लिए तो 'व्यभिचार' पहले भी, ना अपराध था और ना कोई सज़ा। हाँ! इस फैसले से मर्दों को भी, 'अपराध-मुक्त' कर दिया गया है। पत्नी को व्यभिचारी पति या उसकी प्रेमिका के विरुद्ध शिकायत तक करने का अधिकार नहीं था। अब 'व्यभिचार' अपराध नहीं रहा, तो शिकायत की बात ही खत्म। विवाहित स्त्री को इस फैसले से कुछ भी 'हासिल' नहीं हुआ और होना भी ना था। कुछ अति उत्साही महिलाएँ इस फैसले से बहुत खुश हैं कि अब वो किसी की संपत्ति नहीं...पति मालिक नहीं...! मीडिया भी खूब लिंग समानता की बात उछाल रहा है। 'परस्त्री गमन' अब संविधान सम्मत। कानून (अ)नैतिकता का प्रहरी नहीं। समझना मुश्किल है कि इस फैसले से स्त्रियों को ऐसा क्या मिल गया, जो पितृसत्ता का प्रचार-प्रसार तन्त्र इतनी उछल कूद मचा रहा है?
लिंग समानता और स्त्री गरिमा की आड़ में
सवाल है कि अगर आपसी सहमति से यौन संबंध अपराध या अनैतिक नहीं, तो अनैतिक मानव व्यापार अधिनियम, 1986 (वेश्यावृति) भी असंवैधानिक होना चाहिए!18 साल से कम उम्र की लड़की से यौन संबंध बलात्कार का अपराध माना जाता है, मगर लाखों नाबालिग लड़कियों से रोज बलात्कार होता है, और आज तक एक भी रिपोर्ट दर्ज़ नहीं, क्यों? अगर 'व्यभिचार' अपराध नही, तो 'बहुविवाह' का विरोध क्यों? जब तक पति को कानूनी रूप से अपनी बालिग पत्नी से बलात्कार तक करने की छूट (कानूनी अधिकार) है, तब तक ऐसे कागज़ी फैसले व्यर्थ और अर्थहीन हैं....कानून की नज़र में तो विवाहित औरत अभी भी पति की ही संपत्ति है...बनी रहेगी। पति को वैवाहिक बलात्कार से छूट का प्रावधान भी असंवैधानिक घोषित करके तो दिखाओ ना! वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना संबंधी क़ानून (Restitutionofconjugalrights) तो अभी भी बना ही हुआ है ना! रुकमा बाई केस (1884) से लेकर अब तक क्या बदला! (विस्तार में जानने के लिए पढ़ें ‘एन्स्लेवडडाटर’स’- सुधीर चन्द्रा)

व्यभिचारिणी (अपवित्र) पत्नी को गुजाराभत्ता नहीं मिलेगा!
लगभग अठारह साल पहले लिखा था “आपराधाधिक प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा125 की उप-धारा 3 के अंत में एक स्पष्टीकरण दिया गया है “अगर पति ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया है या रखैल रख ली है, तो यह समझा जाएगा कि पत्नी के के लिए, पति से अलग रहने का उचित कारण मौजूद है।” लेकिन उप-धारा 4 में प्रावधान किया गया है कि अगर पत्नी (तलाकशुदा भी) व्यभिचारपूर्णजीवन व्यतीत कर रही है, तो वह अपने पति(पूर्व पति)से गुजारा-भत्ता लेने की अधिकारी नहीं होगी। मतलब यह कि पुरुष (पति) को व्यभिचार करने (रखैल रखने) का कानूनी अधिकार है, लेकिन ऐसी पत्नी (व्यभिचारिणी, कुलटा, पतिता, छिनाल, वेश्या, वगैरह) को गुजाराभत्ता तक नहीं मिलेगा। ऐसे ही प्रावधान हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25, हिन्दू दत्तकता और भरण पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 24, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और पारसी विवाह अधिनियम, 1936 में भी हैं। कहीं ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ शब्द का प्रयोग किया गया है और कहीं ‘शुडबीचेस्ट’। धर्मांतरण के बाद भी भत्ता नहीं मिलेगा।यानि स्त्री ना धर्म बदल सकती है और ना पुरुष। गुजारा भत्ता चाहिए तो ‘सती, सीता-सावित्री’ बन कर रहे......वरना! भारतीयविधि आयोग की 132वीं रिपोर्ट (1991) में इन प्रावधानों को हटाने का सुझाव दिया गया था, लेकिन स्त्री की चीख कौन सुनता है!” (‘नारी न्याय और नैतिकता’-अरविन्द जैन,'हिंदुस्तान'2 जून, 2000)
'औरत होने की सज़ा'(ओं) की लिस्ट बहुत लंबी-चौड़ी है, वो यहाँ और अभी नहीं। विवाहेतर संबंध अपराध नहीं, मगर इसके परिणाम स्वरूप हुए बच्चों (अवैध) का उत्तरदायित्व स्त्री को ही उठाना होगा। यही सलाह देंगें ना कि "सुरक्षित संबंधों के लिए 'निरोध' इस्तेमाल करें!" मत भूलो कि व्यभिचारी तो अभी भी 'अपराधी'/अधम/नीच/पापी ही समझा जाएगा। कानून ने अपराध_मुक्त कर दिया तो क्या...अर्धसामंती समाज के 'मर्द' भी उसे क्षमा कर देंगे? मामला खाप पंचायत से लेकर 'ऑनरकिलिंग' तक फैला है..और फैलेगा। धाँय.. धाँय..! पत्नी को गैर-मर्द के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख कर, गुस्से या उत्तेजना (grave and sudden provocation) में उनकी हत्या करने पर सज़ा में कमी/छूट/रियायत करने का विधि-विधान अभी भी वही है...है ना! पाठक चाहें तो पढ़ें के.एम.नानावती बनाम महाराष्ट्र (ए.आई.आर.1962 सुप्रीम कोर्ट 605) केस या याद करें फिल्म “ये रास्ते हैं प्यार के” या ‘रुस्तम’...!
समलैंगिकता अपराध नहीं
'व्यभिचार' को असंवैधानिक घोषित करने से पहले, उल्लेखनीय है कि समलैंगिकता (भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 ) पर दिल्ली उच्चन्यायालय ने नाज़ फाउंडेशन (2009 डीआरजे 1) और सुरेश कौशल (2014(1) एस.सी.सी.1) मामले में फैसला सुनाया था कि यह प्रावधान असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्चन्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए कहा था कि संसद/सरकार चाहे तो इस पर कानून बनाए। लेकिन 2018 में नवतेज़ सिंह जोहर बनाम भारत सरकार और अन्य याचिकाओं (नंबर 572/2016 व अन्य) में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति खानविलकर, नरीमन. धनंजय चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा)ने अपना ही निर्णय बदलते हुए, समलैंगिकता कानून (भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 ) की वैधता के सवालपर कहा कि बालिग स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से एकांत में समलैंगिक संबंध (अप्राकृतिक यौन संबंध) बनाते हैं, तो इसे अपराध नहीं माना-समझा जाएगा। सब न्यायमूर्तियों ने सैंकड़ों पृष्ठों में अपना अलग-अलग फैसला लिखा-सुनाया। मतलब पितृसत्ता ने अपने  विशिष्ट बेटे-बेटियों को समलैंगिक यौन संबंधों की छूट देकर, 'सम्पूर्ण यौन क्रांति' का सूत्रपात कर दिया।
यौन हिंसा बलात्कार कानूनों में संशोधन
निर्भयाबलात्कार-हत्या कांड (16 दिसम्बर, 2012) के बाद देशभर में हुए विरोध, प्रदर्शन, आंदोलन के परिणाम स्वरूप बलात्कार कानून में बदलाव के लिए, रातों-रात जे. एस. वर्मा कमीशन बैठाया गया, अध्यादेश (फरवरी, 2013) जारी हुआ और फिर कानूनी संशोधन किये गए। पितृसत्ता द्वारा अपनी नाबालिग बेटियों को 'सुरक्षित' रखने के लिएसहमति से सहवास की उम्र सौलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की गई।(भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 375) मतलब अठारह साल से कम उम्र की लड़की से, उसकी सहमति से भी यौन संबंध बनाना बलात्कार का अपराध माना-समझा जाएगा।मगर बेटों(पति) को उनकी अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की (बहू) पत्नी से सहवास ही नहीं, बल्कि संशोधन के बाद 'अन्य यौन क्रीड़ाओं' (अप्राकृतिक यौन क्रीड़ाओं/ मैथुन) तक का कानूनी अधिकार दिया, जिसे किसी भी स्थिति में (वैवाहिक) बलात्कार नहीं माना-समझा जाएगा।(भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 375 का अपवाद) कोई पुलिस-अदालत पत्नी की शिकायत का संज्ञान नहीं ले सकती।(आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973 कि धारा 198 उप-धारा 6) कोई दलील-अपील नहीं। यह दूसरी बात है कि चार साल बाद (अक्टूबर 2017) सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और दीपक गुप्ता ने अपने 127 पृष्ठों के निर्णय में कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध को बलात्कार का अपराध माना जाएगा।लेकिन माननीय न्यायमूर्तियों ने अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी के बारे में चुप्पी साध ली। सो बालिग़ विवाहिता अभी भी, पति के लिए घरेलू 'यौन दासी' बनी हुई है...बनी रहेगी। कोई नहीं कह सकता कि वैवाहिक बलात्कार से पति को कानूनी छूट पर विचार विमर्श कब शुरू होगा?
12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार की सज़ा फाँसी
याद रहे कि इसी साल (2018)12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में भी, फांसी की सज़ा का भी प्रावधान किया गया। आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 जारी होने के बाद, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी।न्यूनतम 20 साल कैद। (भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1873, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता और बाल अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की कुछ धाराओं में अध्यादेश जारी कर संशोधन किया गया है। 'कठुआ' और 'उन्नाव' बलात्कार कांड (2018) के बाद उभरे जनाक्रोश को ठंडा करने के लिए 2012-13 फिर दोहराया गया। फाँसी के फंदे से बचने के लिए अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह भी मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। सो अबोध बच्चियों की बलात्कार के बाद हत्या की संभावना ही नहीं आंकड़े भी बढ़ रहे हैं...बढ़ेंगे ही। बाकी कुछ बचा तो, न्यायिक विवेक करता रहेगा, उचित सज़ा का फैसला। गंभीर चिंता यह है कि कहीं ऐसा ना हो कि अदालतें, 'दुर्लभतम में #दुर्लभ' मामला ही ढूँढती रहे और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये।अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना, यह मिशन अधूरा ही होगा। और अगर सही से अनुपालन हुआ, तो यह अध्यादेश स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा सिद्ध होगा।सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला होने के बावजूद, अभी तो ‘निर्भयाकाण्ड’ के हत्यारे/दोषियों को भी फाँसी नहीं हुई।
सहजीवन: यौन स्वतंत्रता के रास्ते

बालिग स्त्री-पुरुष द्वारा आपसी सहमति से यौन संबंध बनाना, किसी भी कानून में कभी कोई अपराध नहीं था/है। बालिग स्त्री-पुरुष को बिना विवाह, पति-पत्नी की तरह साथ रहने और यौन संबंध बनाने की वैधानिक मान्यता 2006 में ही प्रदान कर दी गई थी।(घरेलू हिंसा अधिनियम, 2006) मगर एस. आर. बत्रा बनाम तरुण बत्रा (सिविल अपील 5837/2006) में सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा और मार्कन्डेकाटजू ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2006 कि धारा 17(1) के अंतर्गत पत्नी को सिर्फ अपने पति के घर में ही रहने का अधिकार है। अपने सास-ससुर के घर में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। मतलब बहू को ससुराल वाले, जब चाहें अपने घर से धक्के मार कर बाहर निकाल सकते हैं।
शादी का झांसा देकर सहजीवन में किसी लड़की के साथ शारीरिक रिश्ते बनाना और बाद में शादी से मना करना, बलात्कार के दायरे में आता है।वह भी तब, जब लड़के का लड़की से शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा न हो। हम इसे' शादी की आड़ में‘यौन शोषण' भी कह सकते हैं।अधिकतर लड़के शादी का झांसा देकर, शारीरिक रिश्ते बनाते हैं औरत तब तक बनाते रहते हैं, जब तक लड़की गर्भवती नहीं हो जाती।कुछ समय बाद, गर्भपात कराना भी मुश्किल हो जाता है और अंततः मामला परिवार और पड़ोसियों की नजर में आ ही जाता है।बाद के अधिकतर मामलों में,ऐसे दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज होते हैं।रोज़ हो रहे हैं....होंगे!
वास्तव में यौन शोषण (हिंसा) के अधिकांश मामले, अनियंत्रित काम-वासना को संतुष्ट करने के लिए, बेहद सावधानी से रचे होते हैं।कामुक फिल्मी छवियों का एहसास और उद्दाम‘फैंटेसी’का एकमात्र उद्देश्य,महिलाओं पर हावी होना है।दरअसल, वास्तविक बलात्कार या 'डेट रेप' करने से पहले, बलात्कारी के दिमाग में नशे की तरह, कई बार इसकी‘रिहर्सल’की गई होती है।मगर प्राय पीड़िता को ही सदा दोषी ठहराया और अपमानित किया जाता है।परिजनों द्वारा कथित‘खानदान की इज्ज़त' के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है। ऐसे दहशतज़दा धार्मिक-सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में, स्त्रियों के लिए अपनी मर्जी से निर्णय लेने का कितना ‘स्पेस’ बचता है?
विवाह-पूर्व सेक्स अपराध नहीं
सर्वोच्च अदालत ने विवाह-पूर्व सेक्स मसले पर यह फैसला सुनाया था – “यह सच है कि भारतीय समाज की आम राय है कि वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध होने चाहिए।यदि(भारतीय दंड संहिता कीधारा-497 द्वारा परिभाषित 'व्यभिचार' को अपवाद स्वरूप)कोई वयस्क आम सहमति से यौन संबंध बनाता है,तो यहां कोई कानूनन अपराध नहीं है।“ (एस.खुशबू बनाम कान्निम्मल और अन्य)

जहाँ एक औरत ने दूसरी जाति के पुरुष से शादी की,उनके परस्पर सहवास को 'लिव-इन रिलेशनशिप' में वयस्कों के बीच के रिश्ते को अपराध नहीं माना (व्यभिचार के स्पष्ट अपवाद के साथ), हालांकि इसे अनैतिक माना जा सकता है।इस तरह एक वयस्क लड़की अपनी पसंद से शादी कर सकती है या फिर पसंद के साथ रह सकती है। (लता सिंह बनाम उत्तरप्रदेश सरकार और अन्यए.आई.आर. 2006,एस.सी. 2522)
दहेज़ उत्पीडन: महिलाओं द्वारा कानूनों का दुरूपयोग
एक तरफ यौन स्वतंत्रता कि घोषणाएं मगर दूसरी ओर तमाम उदारवादी-सुधारवादी न्यायिक सक्रियता के बावजूद (विपरीत), अनेक फैसलों में कहा गया है कि विवाहित महिलाएँ दहेज कानूनों का दुरुपयोग कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति चन्द्र मोली कुमार प्रसाद और पिनाकीचन्द्रा घोष ने दहेज उत्पीड़न के अपराधियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया। (अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य, 2014 (8) एस. सी. सी. 273) सुप्रीम कोर्ट की एक और खंड पीठ (न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और उदय उमेश ललित) ने 27 जुलाई 2017 को दहेज उत्पीड़न मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए, हर शहर में जाँच समिति बनाने के आदेश के साथ अन्य दिशा-निर्देश भी दिए थे। (राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, क्रिमिनल अपील 1277/2014) इस निर्णय से बहू को दहेज के लिए उत्पीड़ित करने वाले पति एवमपरिवार को असीमित छूट मिली और बहुओं को विकल्पहीन अंधेरे में धकेल दिया गया।
इस निर्णय का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आलोचना हुई। होनी ही थी। खैर....एक साल बाद ही पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड़) को  अपना (राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) फैसला बदलना पड़ा और जाँच समितियों के गठन को गैर कानूनी बताया।(सोशलएक्शनफ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार, क्रिमिनल अपील 1265 /2017) 498ए पर इस निर्णय से भी, दहेज उत्पीड़न की शिकार बहुओं को कोई विशेष राहत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। हाँ! इतना ही कह सकते हैं कि पुराने निर्णय के पैबन्दों को, नए रेशमी लबादे से ढंक दिया गया है। क्या विधायिका और न्यायपालिका मिल कर, अपने बेटे-बेटियों/परिवार की ही वैधानिक सुरक्षा में नहीं लगे हैं? बहुओं की चिंताकौन करेगा! सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए स्त्रियाँ, रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं.

कानून के चोर दरवाज़े!
बाल विवाह करना या करवाना संगेय पर जमानत योग्य अपराध है,जिसकी सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों है मगर तीन तलाक़ संगेय पर गै रजमानती अपराध बनाया गया है, जिसकी सज़ा तीन साल कैद या ज़ुर्माना या दोनों।
अगर अठारह साल से अधिक उम्र का लड़का, अठारह साल से कम उम्र लड़की से विवाह करे तो अपराध।सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों हो सकते हैं।(बालविवाहनिषेधअधिनियम, 2006 कीधारा 9)
इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि अगर लड़का भी अठारह साल से कम हो, तो कोई अपराध नहीं!1929 से बाल विवाह विरोधी कानूनों के बावजूद, क्या यह नाबालिग़ बच्चों को भी विवाह की आज़ादी नहीं? क्या संसद,सरकार और सुप्रीम कोर्ट को मालूम नहीं कि कितनी चतुराई से जान बूझकर बाल विवाह के लिए, एक सुरक्षित चोर दरवाज़ा बनाकर छोड़ दिया गयाहै? ग्रामीण वोट बैंक ही नहीं, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कारों का भी मामला है।
उदारवादी-सुधारवादी या क्रन्तिकारी ‘कॉस्मेटिक सर्जरी
स्पष्ट है कि पश्चिमी विश्वविद्यालयों की आधुनिकतम सोच-समझ से प्रभावित और व्यक्तिगत आज़ादी के विचारों से प्रेरित, इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. सामाजिक उत्तरदायित्व के तमाम सिद्धांतों की उपेक्षा और विरोध में गढ़े तर्क-वितर्कों से किसी भी कल्याणकारी योजना का शिलान्यास नहीं किया जा सकता. समय और समाज की सांस्कृतिक सीमाओं में कैसे-कैसे सभ्य स्त्री-पुरुष संवाद और आपसी संबंध विकसित होंगे- कहना कठिन है. ‘सहजीवन’ कानून से लेकर ‘समलैंगिकता’ और ‘व्यभिचार’ तक के कानूनों को संवैधानिक कसौटी पर जांचने-परखने और सुधारने से पहले, क्या यह अपेक्षित नहीं कि एक बार न्याय और कानून के पूरे जाल-जंजाल को समझा जाए, ताकि विचार-विमर्श के बाद एक साथ समुचित संशोधन किये जा सके! वरना विसंगतियां और अन्तर्विरोध यूँ के यूँ बने रहेंगे. उदारवादी-सुधारवादी या क्रन्तिकारी ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से कोई आमूल-चूल बदलाव होने वाला नहीं है.
खैर....नायाब 'आंनद बाज़ार' का उद्घाटन हो गया हैं..! कल 'सम्पूर्ण यौन क्रांति' भी सफल होगी ही। क्या यही सार है बदलते समय और समाज में, पितृसत्ता के नये समाजशास्त्र का? लगता है अब पितृसत्ता के युवा राजकुमारों (समलैंगिक भी शामिल) को 'सम्पूर्ण यौन स्वतंत्रता' चाहिए, जो वो हर कीमत पर पाने-हथियाने के तमाम कानूनी-गैरकानूनी रास्ते और हथकंडे जानने-समझने लगे हैं। पत्नी यौन संबंधों से मना करे, तो ‘मानसिक क्रूरता’ के आधार पर तलाक़ की धमकी भी देंगे और बाहर यौन संबंधों की खुली छूट है ही! पितृसत्ता के रोज बदलते नए-नए चेहरे सामने आये..आ रहे हैं। लिंग समानता और स्त्री गरिमा की आड़ में, पितृसत्ता अपने पुत्रों के लिए, जो 'सम्पूर्ण यौन क्रांति' ला रही है, उस पर गंभीरता से सोचना-विचारना और समझना होगा।

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. 
सम्पर्क: 9810201120
अरविन्द जैन,
फ्लैट ए1, प्लाट नंबर 835, सेक्टर 5,
वैशाली, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश पिन 201010

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