मीटू, यूटू: चुप हो तो बोलो, बोलने से उनका मनोबल टूटता है



यशस्विनी पाण्डेय 

बचपन से लेकर अब तक यदि आप किसी तरह की लैंगिक हिंसा के शिकार हुए हैं उसकी स्वीकारोक्ति (अपराधी के नाम के साथ) है मीटू (#MeToo).यह स्वीकारोक्ति न सिर्फ अपराधियों के मनोबल तोडती है बल्कि हिंसा से पीड़ित व्यक्ति को इस अपराध भाव से मुक्त करती है कि लैंगिक हिंसा कोई छुपाने वाली घटना है .

हाल ही में बॉलीवुड की अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा बॉलीवुड के नायक नाना पाटेकर पर बलात्कार का आरोप लगाया गया है .उसके बाद बॉलीवुड की कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अन्य कई लोगों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं . तनुश्री के इस खुलासे के बाद मीटू अभियान के भारतीय संस्करण की शुरूआत हुई . मीटू अभियान पिछले साल हॉलीवुड की एक अभिनेत्री के द्वारा एक अभिनेता पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों के बाद शुरू हुआ था .उसके बाद इस अभियान के तहत अन्य बहुत सी महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन हिंसा के ऐसे अनुभवों को साझा किया था .



मीटू अभियान से प्रभावित होकर कई महिला पत्रकारों ने भी अपने साथ काम करने वाले कई पत्रकारों पर इसी तरह के अरोप लगाए हैं . अभिनेताओं, निर्देशकों, पत्रकारों, नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस अभियान के तहत महिलाओं द्वारा किए जा रहे खुलासों पर बॉलीवुड और समाज में कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.कुछ लोगों का मानना है कि यह महिलाओं के लिए एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह है. दूसरी तरफ कुछ अन्य का कहना है कि इन आरोपों में निश्चित तौर पर कहीं न कहीं सच्चाई है. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इसे अपनी दुश्मनी निकालने के तरीके के तौर पर देख रहे हैं.हालांकि सालों पुराने ऐसे मामलों के सच का पता लगाना लगभग असंभव है, लेकिन समाजशास्त्रियों का कहना है कि फिर भी ऐसे अभियान का समर्थन किए जाने की सख्त जरूरत है.ताकि लड़कियों और महिलाओं का किसी भी किस्म का यौन उत्पीड़न करने वालों के मन में एक डर पैदा हो.

आम तौर पर मान्यता है कि उच्च पदों की तुलना में निम्न पदों पर महिलाएं संभवतः ज्यादा यौन शोषण का शिकार होती हैं.लेकिन असल में पद की ताकत महिलाओं को यौन शोषण से बचाने में बहुत ज्यादा कारगर नहीं होती.हाल ही में इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया है, कि सभी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौनशोषण की शिकार होती हैं.

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा 2017 में कराए गए एक सर्वे में सामने आया था कि हर उम्र, पेशे और वर्ग की महिलाएं कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकार होती हैं.हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ा कोई भी व्यापक शोध आज तक नहीं हुआ है.इसलिये इस बात के कोई भी सीधे आंकडे हमारे पास नहीं हैं, कि कार्यस्थल पर होने वाला यौन शोषण, कामकाजी महिलाओं की घटती संख्या के लिए कितने जिम्मेदार है?लेकिन कुछ समय पहले आई 2017 की वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट में सामने आया था, कि दो दशक पहले हमारे देश में जहां 38 प्रतिशतकामकाजी महिलाएं थीं, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 27 फीसदी रह गई है.इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, कि कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा भी महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य करती हैकार्यस्थल पर हुई यौन हिंसा को वे बहुत बड़ा और ज्यादा डिस्टर्बिंग मानने लगती हैं.साथ ही इसी तरह महसूस भी करने लगती हैं.इस कारण ऑफिस में हुई यौन हिंसा से निपटने की तरकीबें सोचने की बजाए, वे नौकरी छोड़कर घर पर बैठने का विकल्प चुनने लगती हैं.लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब घर में यौन हिंसा झेलने पर लड़कियां घर नहीं छोड़ती, तो इसी कारण से उन्हें ऑफिस क्यों छोड़ देना चाहिए?

महिला गार्ड ,सिपाही ,जज या फिर बॉलीवुड की नायिकाओं से लेकर महिला मजदूरों तक, हर किसी को जब-तब यौन शोषण शिकार होना पड़ता है.वरिष्ठ वकील  वृंदा ग्रोवर बताती हैं कि अदालतों में अक्सर ही वकील महिला जज से तू-तड़ाक से बात करते हैं या फिर कोई न कोई अपमानजनक टिप्पणी करते हैं...और यह बहुत आम है.यौन शोषण के मामलों पर काम करने वाली वरिष्ठ वकील रेबेकाजॉन का कहना है, कि ऐसे ज्यादातर मामलों में कोई भी पीड़िता जांच से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती. इस कारण वे थककर जांच प्रक्रिया से बाहर आ जाती हैं.उनका कहना है कि कुछ महिलाओं के लिए तो यह सब इतना ज्यादा संत्रासपूर्ण होता है, कि वे आत्महत्या तक की कोशिश करने लगती हैं.



कई बार महिलाएं अपने साथ लम्बे समय तक शोषण होने देती हैं क्योंकि न्याय के लिए मुंह  खोलने वाली, पुरुषों पर उंगली उठाने वाली, और यौन हिंसा की शिकार होकर भी शर्म से न गड़ने वाली लड़कियों से समाज ‘अच्छी लड़की‘ होने का तमगा अक्सर छीन ही लेता है. लड़कियों/महिलाओं को न्याय पाने के लिए अपनी ‘अच्छी लड़की‘ की छवि के मोह को भी छोड़ना होगा.असल में कानूनों को लागू करने के लिए समाज में पुरुष संवेदीकरण की प्रक्रिया को भी शुरू करने की सख्त जरूरत है संवेदीकरण की यह प्रक्रिया किसी कार्यशालाओं के साथ-साथ, यदि सभी घरों में शुरू होगी तो ही इसके स्थाई परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

घर, सार्वजनिक स्थलों और ऑफिस में होने वाली यौन हिंसा से बचने के लिए सरकार लगातार नए-नए कानून बनाती जा रही है. लेकिन यौन हिंसा में कहीं कोई कमी नही आ रही है.बल्कि महिलाएं कानूनों का प्रयोग भी पूरी तरह से नहीं कर पा रही हैं.कुछ समय पहले इंडियन बार काउंसिल द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया कि70प्रतिशतकामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती.इन्ही सब कारणों के चलते कानून की धार कुंद पड़ती जाती है.अक्सर ही देखने में आता है कि यौन हिंसा के केस में पीड़िता अकेली पड़ जाती है.ऑफिस वालों का सहयोग मिलने की बजाए उनका पीड़िता के साथ उनका रवैया ही बदल जाता है.पीड़िता को ऑफिस वाले न सिर्फ अजीब सी नजर से देखने लगते हैं, बल्कि उसके कपड़ों, व्यवहार या काम करने के तरीके तक को ही उस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है.ऐसे में यदि शिकायत किसी सीनियर के खिलाफ दर्ज होनी है तो, पीड़िता के प्रमोशन में अडंगे, ट्रांसफर में गैर जरूरी दखल की संभावना बढ़ जाती है.न सिर्फ कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकायत दर्ज करना एक बड़ी चुनौती है, बल्कि सार्वजनिक जगहों पर होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ एक्शन लेना भी बेहद चुनौती भरा है.

इस पर बात करना औरतों के लिए कभी सुविधाजनक नहीं रहा, खासकर तब जब मामला यौन शोषण का हो। लेकिन जब सामने वाले की बातों से उसका मंतव्यसाफ जाहिर हो रहा हो तो फिर इंतजार किस बात का किया जाना चाहिए?किसी भी तरह के हैरेसमेंट को शुरू में ही न पनपने दिया जाए तो कितनी अप्रिय घटनाएँ घटने से बचजाएँगी. असल में कानून और व्यवस्था से अलग, महिलाओं को कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण से निपटने के तोड़ खुद ही निकालने होंगे.उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि वे अपने घरों तक में भी कभी, बहुत ज्यादा सुरक्षित नहीं रही हैं.इसलिए इस कारण से नौकरी छोड़ना कोई अच्छा विकल्प नहीं है....और सच तो यह है कि यदि लड़कियों/महिलाओं को यौन हिंसा से आकंठ भरे इस समाज में जीना है, तो उन्हें हर हाल में अच्छाई-बुराई पतित-पावन से ऊपर उठना होगा.

कई बार हैरेसमेंट करने वाला व्यक्ति भी यह नहीं जानता वह जो कर रहा है वह असहज,अपराध या शोषण है .मीटू कैम्पेन समाज के इस समझ को भी गहरा करेगा उसे कंसेट (रजामंदी) का अर्थ भी समझाएगा .यदि आपका जीवन बिना किसी लैंगिक हिंसा या शोषण के गुजरा है तो आप अजूबें हैं या शायद ब्लेस्ड.यदि आप इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे हैं तो चुप तो रह सकते हैं | इस मुहीम को कमजोर न करें यह समाज को बेहतर बनाएगी.कहते हैं ना पावर करप्ट्स….कम लोग हैंडल कर पाते हैं पावर को महिला हों या पुरुष।कायदे से, इस मुद्दे को स्त्री बनाम पुरुष के खाँचे से निकाल के शोषक बनाम शोषित जैसे व्यापक सोच के तौर पर विकसित होना चाहिए।

यशस्विनी पाण्डेय फ्रीलांस लेखन करती हैं. संपर्क:yashaswinipathak@gmail.com

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