मी टू कैंपेन से जुड़े कुछ सवाल, शंकाएं और भविष्य का भारत


जया निगम 

तनुश्री दत्ता के नाना पाटेकर द्वारा यौन उत्पीड़न के 10 साल पहले के एक हादसे की स्वीकारोक्ति ने हमारे देश में #MeToo की आमद पर कस कर लगाये गये पितृसत्ता के ढक्कन को एक झटके में जिस तरह खोला है उससे लगता है सिस्टम के अंदर ये भाप बहुत दिन से घुमड़ रही थी. 



बाहर की ‘जहरीली’ हवाओं से हमारे देश और उसके पुरुषप्रधान देशवासियों को बड़ा डर लगता है कि कहीं ये बाहर की हवायें उनके देश-समाज की बहू-बेटियों को बिगाड़ न दे. इन बाहर की हवाओं को अपने घर-परिवार-गांव-देहात तक न पहुंचने देने कि लिये भारतीय पुरुषों में सनातन एका रहा है. बाहर की हवा ना आने देने की वजह से औरतें-बच्चे हमेशा बीमार बने रहे पर हमने सदैव पारिवार-बिरादरी और धर्म को पहला स्थान दिया. यही हमारी लोक संस्कृति रही है.

संस्कृति की अपनी सुविधा के लिए मनमानी व्याख्या के क्रम में यही भारतीय समाज और राजनीति का सदियों से छिपाया जाता वो खजाना बन गया जिसकी सुरक्षा के लिये भारतीय राजनीति और समाज में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते पुरुष एक के बाद पितृसत्ता का गौरवध्वज अगली पीढ़ी को थमाते चलते हैं.

महिलाओं से ‘सत्ता’ के इस पुरातन खजाने की रक्षा करना भारतीय पुरुषों का सबसे सनातन कर्तव्य है जो उन्हे असली मर्द होने का अहंकार देता है. ये खजाना भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन के हर खेत में दबा-गड़ा है. हर क्षेत्र के अपने नियम हैं जिनका मकसद है महिलाओं से लगातार संपर्क के बावजूद सत्ता के खजाने की चाभी उन तक ना पहुंचने पाए. यह एक पवित्र काम माना जाता है. 

हमारे देश में इन दिनों लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह की तानाशाही शैली की राजनीति समाज की दशा-दिशा तय कर रही है उसमें कोई छोटा सा भी परिवर्तन अक्सर बड़ी उम्मीद जगाने लगता है. मसलन मीटू से पहले किसानों का एक जत्था दिल्ली पहुंचा, गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन और उस पर सरकारी पुलिसिया मशीनरी की दमन प्रक्रिया के विरोध में सोशल मीडिया में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आयीं, उन्होने देखने वालों को कृषिप्रधान भारत में किसान क्रांति होने के काल्पनिक रास्ते दिखा दिये. क्रांति पिछले दस-बीस सालों में एक ऐसे जुमले में बदल गयी है जिसने सामाजिक परिवर्तन की चाह रखने वालों की बेचैनी और तड़प को मात्र एक शब्द में, उनके जीवन के सबसे विद्रूप मजाक में बदल दिया है. आश्चर्य तो तब होता है जब सामाजिक बदलाव की बात करने वाले तमाम सामाजिक, राजनीतिक, कॉरपोरेट और रचनात्मक संगठनों के आचार्य और उनकी भक्त अनुगामनियां तक, क्रांति शब्द का इस्तेमाल अपने ही जैसे किसी अन्य मुद्दे पर बदलाव की चाह रखने वाले के लिये भर्त्सना स्वरूप इस्तेमाल करते हैं.

मीटू के पिछले साल भारत आगमन पर कुछ इसी तरह का दृश्य देखने को मिला था जब भारतीय अकादमिक जगत के बहुत से नामों को राया सरकार नाम की लॉ पढ़ने वाली छात्रा ने एक सूची बना कर अपने सोशल एकाउंट में डाल दिया था और वहां इन देश-विदेश में प्रख्यात, कुख्यात आचार्यों की यौन कुंठाओं के किस्से पीड़ितों ने मुंहजबानी कहने शुरू कर दिये.

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ज़ाहिर है कि ये एक विश्वस्तरीय ख्याति अर्जित किये जाने का मसला बन गया जो हमारे देश के स्वनामधन्य पुरुष मठाधीशों के मठों पर बहुत गहरी छाप छोड़ने में सक्षम था. आनन-फानन नारीवाद की इस विदेशी लहर को नियंत्रित करने के लिये विभिन्न नारीवादियों ने काफिला पर एक पर्चा निकाल कर इस तरह की किसी मुहिम से अपनी नाराज़गी जाहिर करते हुए इन पीड़िताओं को व्यवस्था के विभिन्न सांगठनिक ढ़ांचों के जरिये ऑफीशियल तरीके से अपनी कंप्लेन करने के लिये सलाह दी.

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इस दौरान हॉलीवुड के तमाम निर्माता-निर्देशकों के खिलाफ पूरी दुनिया में महिलाओं ने अपने-अपने अनुभव लिखे और अपनी कहानियां, व्यक्तिगत रूप से शेयर कर पूरी दुनिया को ये जता दिया कि महिलायें कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के इन मामलों को किसी भी कीमत पर छिपाने और सहन करने के लिये तैयार नहीं है. वहां से ये सिलसिला विभिन्न देशों में आगे बढ़ा और पूरी दुनिया के सबसे सफल, स्थापित और हसीन मर्दों की तरक्की के गोपनीय सूत्रों को उजागर कर वापस भारत में दस्तक दिया.

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भारत में अब तक केवल फिल्म और मनोरंजन जगत के अलावा अंग्रेजी मीडिया के एक हिस्से में इस कैंपेन की आंच महसूस की जा रही है. लेकिन भारत की महिलाओं के काम-काजी समूहों ने, व्यक्तिगत स्तर पर इस मुहिम को जितना गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है. उतनी ही तरह की कहानियां बाहर आ रही हैं. ताजा मामले विदेश मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर और केरल के विधायक महेश कुमार का है. जहां एक ओर एम जे अकबर ने राजनीति का रास्ता अंग्रेजी मीडिया में पूरा जीवन संपादक और बुद्धिजीवी के रूप में बिताने के बाद तय किया उसी तरह विधायक महेश का मामला केरल के फिल्मी जगत से जुड़ा हुआ है.

पिछले दिनों हमारे देश में जेंडर  से जुड़े कानूनों के मूल स्वरूप में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कुछ रेडिकल बदलाव किये हैं. धारा 377, एडल्ट्री या सबरीमाला मंदिर में औरतों के जाने का फैसला, ये ताज़ातरीन मामले हैं लेकिन इससे पहले तीन तलाक हो या उससे भी पहले महिलाओं के मज़ार तक जाने का मसला या इससे थोड़ा और पहले जायें तो पिछले एक दशक में कानूनों के जरिये महिलाओं के हकों और हैसियत में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं. जिसमें घरेलू हिंसा का कानून और संपत्ति में महिलाओं का हिस्सा तय किये जाने का मामला या लिव-इन रिलेशन में रहने वाली महिला के अधिकारों में हुई बढ़ोत्तरी के फैसले अहम हैं. प्रशासनिक स्तर पर भी इस तरह की पहलें हुई हैं जैसे लोक कल्याणकारी योजनाओं में परिवार के मुखिया के बतौर महिला का नाम होना या पासपोर्ट जैसे कानूनी कागज़ातों को तलाकशुदा महिलायें भी आसानी से अपने पूर्व पति के जिक्र के बगैर बनवाने में सक्षम हो पायें. इस तरह की व्यवस्थायें ये लगातार इशारा कर रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं के बढ़ते कदमों ने भारत के पारंपरिक सामंती प्रशासनिक और कानूनी ढ़ांचे को बदलने पर विवश किया है.

इसके बावजूद बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिला को व्यक्ति से पहले देह समझे जाने से उपजने वाले तनावों के कारण, प्रतिक्रियास्वरूप उनका उत्पीड़न बढ़ा है. लैंगिक हिंसा भारतीय घरों, संयुक्त परिवारों और सामुदायिक तनावों की बड़ी वजह रही है. इसके बावजूद महिलायें इस तरह की हिंसा, समाज में आगे बढ़ने के दौरान हर स्तर पर झेलते हुए भी अक्सर खामोशी और उपेक्षा के व्यवहार के जरिये अपना आगे बढ़ना सुनिश्चित करती हैं. इसके पीछे अक्सर उनकी विवशता होती है जो परिवारिक स्तर से लेकर पास-पड़ोस, संस्थागत और फिर सांगठनिक स्तर के लगभग हर चरण में समायी होती है. भारत में महिलाओं की अर्थव्यवस्था में साल 2012 में मात्र 27 फीसदी हिस्सेदारी थी. जबकि इस मुकाबले भारत में मर्दौं का अर्थव्यवस्था में 79 फीसदी यानी लगभग 80 फीसदी हिस्सेदारी है. ये आंकड़े विश्व बैंक की साउथ एशिया प्रमुख एनेट डिक्सन ने दिये हैं.

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देश में बेरोजगारी के इस भीषण दौर में महिलाओं का बड़ा हिस्सा साल 2012 के बाद अर्थव्यवस्था से बाहर हुआ है. साथ ही महिलाओं पर शादी करने के बाद काम छोड़ने का दबाव पहले की तुलना में निजी क्षेत्रों में अधिक बढ़ा है क्योंकि निजी क्षेत्रों में रिक्रूटमेंट तो कम हुए ही है बल्कि 2012 से पहले मिलने वाले बोनस, वेतन में बढ़ोत्तरी, कैब-कैंटीन वगैरह की सुविधायें और महंगाई बढ़ने से घर के खर्चों में हुई बढ़ोत्तरी वगैरह की सबसे ज्यादा मार भारतीय घरों में महिलाओं पर ही पड़ती है. इसके बावजूद महिलाओं का पुरुषों के मुकाबले कार्यक्षेत्रों और शिक्षा जगत में बेहतर प्रदर्शन बना हुआ है.

इस दौरान हमारे देश की राजनीति में आये बदलावों ने सामाजिक न्याय की राजनीति को एक तरफ विविध स्तरों पर कमजोर किया है वहीं दूसरी ओर कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति के गठजोड़ ने विभिन्न सामाजिक, न्यायिक और मानवाधिकार के लड़ाई लड़ने वाले संगठनों को एक-दूसरे से लड़ाने में बड़ी सफलता अर्जित की है. इन लड़ाईयों में जेंडर के मुद्दे पर पारंपरिक और प्रगतिशील खेमों की  आपसी  लड़ाईयों ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कमजोर किया है.

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महिलाओं के ऊपर यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले घर-परिवार, पास-पड़ोस, दोस्त-रिश्तेदार, कार्यस्थलों से लेकर गांव, कस्बों, जंगलों तक हर जगह हो रहे हैं लेकिन हमारी मौजूदा पुरुष प्रधान राजनीति इस मुद्दे को हर बार सबसे पीछे धकेल कर बाकी मुद्दों के बरक्स जिस तरह से खड़ा कर देती है उससे यह महसूस होता है कि ये सिलसिला दरअसल नया नहीं है. ये हमारे डीएनए का मामला है.

भारत के आजादी आंदोलन में काफी बड़ी संख्या में महिलाओं की शिरकत ने उन्हे पुरुष के बराबर वोटिंग राइट तो दिला दिये लेकिन उसके अलावा लगभग हर मोर्चे पर महिलाओं के मुद्दे समाज के सर्वांगीण विकास के लिये जितने अहम होने चाहिये उसकी कोई समझदारी जनता के बड़े हिस्से में पैदा नहीं हुई है. शायद यही वजह है कि ये महिलाएं सामाजिक उत्पादन के विविध चरणों में हिस्सेदारी के बगैर घर-परिवार के अंदर दोबारा धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़ दी गयीं. सामंती या प्रगतिशील पुरुषों के डीएनए में मौजूद वही ऐतिहासिक चरित्र, महिलाओं के मुद्दों को देश और समाज के लिये सबसे जरूरी और प्राथमिक मानने से रोकता रहा है.

#MeToo इन सबसे बीच एक उम्मीद पैदा करता है कि आने वाले दिनों में यदि ये ऑनलाइन कैंपेन ऑफलाइन संस्थाओं के नज़रिये के जरिये थोड़ी ऊर्जा समाज में पैदा करता है तो ये बेचैनी समाज के विभिन्न धड़ों में संघर्ष और रचनात्मकता के नये कदमों में बदल सकती है. सबसे अधिक यह कि नई सोच पैदा कर सकती है.

पढ़ें : पुरुषों पर प्रतिक्रिया 

अधेड़ उम्र के पुरुषों की यौन कुंठाओं का लंबे समय से शिकार हो रही महिलायें अपने नवयुवा होने पर तो उनका प्रतिकार नहीं कर पायीं लेकिन अपने को लैंगिक आधार पर भेदभाव के कारण नष्ट किए जाने की सतत प्रक्रिया के दौरान खत्म होने बचा ले गयीं, वही आज मीटू के जरिये देश की मौजूदा पीढ़ी को ईमानदार होकर उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट होने का संदेश दे रही हैं. ये देश उन्हे सुन सकता है और खारिज भी कर सकता है जो उसे हमेशा से करने की आदत है... लेकिन जो सुनेंगे, वही सींखेंगे और एक समानता पर आधारित समाज बनाने का सपना भी देख पाएंगे.

टाइम्स अप मुहीम 

जया निगम स्वतंत्र पत्रकार,  टिप्पणीकार हैं. 

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